छांगुर पीर के धर्मांतरण नेटवर्क का खुलासा हो गया है। छांगुर को गिरफ्तार भी किया जा चुका है, लेकिन उसके गुर्गे अब भी खुलेआम धमकी देते घूम रहे हैं। गुर्गे कहते हैं, “छांगुर बाबा बाहर आएँगे और सबको सबक सिखाएँगे।” छांगुर के धर्मांतरण का गैंग अब भी सक्रिय है, पीड़िताओं को बयान वापस लेने का दबाव डाला जा रहा है।
यह दावा हिंदू रक्षा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष गोपाल राय ने किया है। उन्होंने बताया कि छांगुर के खिलाफ बयान देने वाली पीड़िताओं को उसके गुर्गे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं। ये धमकी कभी फोन कॉल, कभी मैसेज और कभी रास्ता रोककर दी जा रही हैं। पीड़िताओं को बयान वापस लेने का दबाव बनाया जा रहा है। इन धमकियों से पीड़िताओं की जान को खतरा बना हुआ है।
गोपाल राय ने आगे कहा कि छांगुर पीर भले ही जेल में है, लेकिन उसका गैंग अब भी सक्रिय है। उन्होंने साफ कहा कि धर्मांतरण का रैकेट दबाया नहीं गया है, बस अब पर्दे के पीछे चला गया है। उन्होंने कहा, “गैंग पहले हिंदू लड़कियों को फँसाकर उनका ब्रेनवॉश करता था, वही आज उन्हें धमका रहा है। वो चाहते हैं कि केस वापस ले लिया जाए और गवाही न हो सके।”
रिपोर्ट्स के मुताबिक छांगुर का गैंग अब भी सक्रिय है। कुछ पीड़िताएँ उसके कब्जे में भी हैं। छांगुर की गैंग के अधिकतर गुर्गे फरार चल रहे हैं। पुलिस और जाँच एजेंसियाँ इसकी तलाश में लगी हुई हैं।
बलरामपुर से धर्मांतरण का नेटवर्क चलाने वाले छांगुर पीर ने हिंदुओं का खूब प्रताड़ित किया है। कहीं हिंदू लड़की से गैंगरेप तो कहीं जमीन हड़प ली गई। ऐसे ही कुछ पीड़िताओं ने सामने आकर छांगुर के अत्याचार की आपबीती सुनाई है।
बेंगलुरु की हिंदू युवती से गैंगरेप
छांगुर के धर्मांतरण नेटवर्क का शिकार हुई कर्नाटक के बेंगलुरु की युवती से गैंगरेप किया गया था। युवती ने जब धर्मांतरण करने से इनकार किया तो उसे छांगुर के गुर्गों ने रास्ते से उठा लिया। युवती का गैंगरेप कर बुरी तरह पीटा। पुलिस को बताई आपबीती में युवती ने बताया कि उसे सहारनपुर के मोहम्मद वसीम ने लव जिहाद में फँसाया था।
वसीम ने विवेक राठौड़ बनकर इंस्टाग्राम पर दोस्ती की थी। फिर सऊदी अरब बुलाकर बेचने की प्लानिंग थी। लेकिन युवती उनके चंगुल से भाग निकली थी। इसके बाद भी गुर्गों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा और जान से मारने की धमकी देने लगे।
बाप तलाश रहे बेटियाँ, छांगुर के गुर्गे धर्मांतरण कर भगा ले गए
छांगुर के गुर्गों गुंडागर्दी पर उतर आए हैं। कही किसी बाप की बेटी गायब कर दी तो कहीं विधवा की जमीन कब्जा कर मजार बनवा दी। गाजियाबाद के रहने वाले वृद्ध आजाद चौधरी की बेटी चार महीने से गायब है। पिता ने आरोप लगाया कि बेटी का अपहरण कर धर्म परिवर्तन करवा दिया गया है।
बलरामपुर के उतरौला निवासी रघुनाथ निषाद की बेटी का पड़ोसी मुबारक अली ने धर्म परिवर्तन करवा दिया। छह महीने पहले बेटी को बहला-फुसलाकर निकाह कर भगा ले गया। निषाद कहते हैं कि अब उनकी बेटी कहाँ है, इसकी जानकारी नहीं है। निषाद का कहना है कि छांगुर के गुर्गे अब अन्य तीन बेटियों का धर्मांतरण करवाने की धमकी दे रहे हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मेरठ के सिविल लाइंस निवासी सुनील नेगी की बहन आशा नेगी भी धर्मांतरण का शिकार हुई हैं। सुनील बताते हैं कि उनकी बहन 2019 से गायब हैं। बदर अख्तर सिद्दीकी उनकी बहन को लव जिहाद में फँसाकर भगा ले गया है। तभी से उसका पता नहीं लग पा रहा है। इसके बाद सिद्दीकी ने मेरठ की ही अन्य हिंदू युवती को फँसाया। अब दोनों पीड़िताएँ गायब हैं।
विधवा की जमीन कब्जा मजार बनवा दी
इतना ही नहीं छांगुर पीर के गुर्गे हिंदुओं की जमीन हड़प उस पर मजार भी बना देते थे। दादरी की एक ऐसी ही पीड़ित विधवा सामने आई है। उन्होंने बताया है कि दादरी में उनकी जमीन पर छांगुर के गुर्गों ने कब्जा कर मजार बनवा दी। अब वहाँ नमाज पढ़ी जाती है।
पंजाब की यूनिवर्सिटी में गोवा की एक हिंदू लड़की पढ़ने पहुँचती है। यहाँ कश्मीरी छात्राएँ लड़की को इस्लाम कबूलने के लिए ब्रेनवॉश करती हैं। उनसे प्रभावित होकर एसबी कृष्णा अब आयशा बन जाती है। यह कहानी है आगरा से जुड़े धर्मांतरण गिरोह में पकड़ी गई एक लड़की की।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, आयशा ने फंडिंग जुटाने के लिए व्हाट्सऐप पर कई ग्रुप बनाए हुए थे। इनके माध्यम से वह प्रभावशाली लोगों से संपर्क में रहती थी। इस प्रक्रिया में आयशा की मदद दिल्ली से पकड़ा गया गैंग का सरगना अब्दुल रहमान करता था। पुलिस पूछताछ में आयशा के बारे में कई खुलासे हुए हैं।
गोवा की हिंदू लड़की का कश्मीरी छात्राओं ने कराया धर्मांतरण
आयशा मूलरूप से गोवा की रहने वाली है। धर्मांतरण से पहले उसका नाम एसबी कृष्णा था। कृष्णा साल 2020 में पंजाब यूनिवर्सिटी में एमएससी डाटा साइंस की पढ़ाई करने आई थी। कॉलेज में उसकी दोस्ती कश्मीर की कुछ छात्राओं से हुई। इन्होने ही कृष्णा का ब्रेनवॉश किया। नमाज पढ़ने और बुर्का पहनने के फायदे गिनाए। धीरे-धीरे कृष्णा इससे प्रभावित होने लगी।
इसके बाद छात्राएँ कृष्णा को अपने साथ कश्मीर ले गईं। यहाँ काफी दिन कृष्णा उनके साथ रही। उधर, कृष्णा के माता-पिता को इसकी जानकारी नहीं थी। बेटी की गुमशुदगी को लेकर परिजनों ने दिल्ली में रिपोर्ट दर्ज करवाई। काफी दिन बाद कश्मीर में मन ना लगने पर कृष्णा अपने आप दिल्ली वापस लौट आई।
कृष्णा वापस लौटने पर परिजन उसे अपने साथ गोवा ले आए। परिजनों ने उसका मोबाइल भी छीन लिया था। इसके चलते अपने सभी दोस्तों और धर्मांतरण गिरोह में शामिल कुछ लोगों से जिन्हें वह तब जानती थी, उनसे संपर्क टूट गया। लेकिन छह महीने बाद वह फिर भागी और इस बार कोलकाता चली गई।
यहाँ एसबी कृष्णा ने धर्म परिवर्तन कर आयशा नाम रख लिया। कोलकाता से ही आयशा का धर्मांतरण गिरोह से जुड़ाव शुरू हुआ। अब आयशा धर्मांतरण कराने के लिए फंडिंग जुटाने लग गई। इस फंडिंग को धर्मांतरण कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।
गिरोह में शामिल 6 लोग पहले थे हिन्दू
आयशा जैसे ही 5 अन्य आऱोपितो धर्मांतरण कर गिरोह से जुड़े थे। इन्हें पुलिस ने अलग-अलग राज्यों से गिरफ्तार किया है। जयपुर से गिरफ्तार मोहम्मद अली पहले पियूष पँवार था। मुस्लिम युवती से प्यार में पढ़कर उसने इस्लाम कबूला।
लेकिन कुछ समय बाद युवती उसे छोड़कर चली गई। इसके बाद कलीम सिद्दीकी की मदद से PFI संगठन से जुड़ गया। संगठन के लिए काम करते हुए वह कोलकाता में दीन की तालीम देने लगा। यहाँ गिरोह की सदस्य आयशा से मिला। आयशा से फंडिंग लेकर धर्म परिवर्तन के काम में लग गया।
आरोपित में से एक मोहम्मद इब्राहिम भी पहले रीथ बनिक था। इब्राहिम ने ही आगरा की दोनों बहनों का कोलकाता पहुँचने का इंतजाम कराया था। गैंग का सरगना फिरोजाबाद निवासी अब्दुल रहमान ने भी धर्म परिवर्तन कराया था। इस्लाम कबूलने से पहले उसका नाम महेंद्र पाल जादौन था।
कलीम सिद्दीकी चलाता था गिरोह
धर्मांतरण गिरोह चलाने वाला अब्दुल रहमान है, जिसे दिल्ली के मुस्तफाबाद से पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पूछताछ में सामने आया कि रहमान भी असली मास्टरमाइंड नहीं है। रहमान खुद जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे मौलाना कलीम सिद्दीकी के लिए काम कर रहा था।
UPATS ने सिद्दी को साल 2021 में सामूहिक धर्मांतरण के मामले में गिरफ्तार किया था। 2024 में सिद्दीकी और उसके 11 साथियों को उम्रकैद की सजा मिली। तब से वह रहमान के माध्यम से अपनी एक्टिविटी चलाई हुई है।
मुजाहिदा बनने को तैयार थी आगरा की लड़की
कोलकाता से बचाई गई आगरा की दो सगी बहनों का भी धर्मांतरण करा दिया गया था। उन्हें सलफी मुस्लिमों की तरह ब्रेनवॉश किया गया था। दोनों में से एक बहन तो इस कदर ब्रेनवॉश हुई कि वह मुजाहिदा (कुर्बान होने को तैयार) तक बन गई थी। वह बरामद होने के बाद भी घर तक नहीं जाना चाहती थी।
वहीं, गिरोह में शामिल मोहम्मद इब्राहिम ने पुलिस को बताया कि हिंदू युवतियों को मुगल शासन की कहानियाँ सुनाई जाती थी। मुस्लिम शासकों के भारत पर राज की वीडियो दिखाई जाती थी। इससे सिर्फ लड़कियाँ धर्म परिवर्तन नहीं बल्कि कुर्बान तक होने को तैयार हो जाती थीं।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस को बहनों का धर्मांतरण कराने वाली आयशा के फोन से कुछ वीडियो भी बरामद हुए हैं। एक वीडियो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर का उद्घाटन कर रहे हैं और वॉयसओवर में एक इस्लामी कट्टरपंथी कह रहा है- “बहुत बन गए सोमनाथ में मंदिर… अब टूटने चाहिए।”
वहीं, पुलिस ने बताया कि कोलकाता में जब बहनों को बचाने के लिए पुलिस पहुँची, तो उन्होंने हिजाब पहना हुआ था। पुलिस को देखते ही वह छिप गईं और वापस लौटने से इनकार कर दिया। बहनों का कहना था कि उन्हें मकसद मिल गया है। महिला पुलिस ने बहनों की काउंसलिंग की और उन्हें सुरक्षित वापस आगरा लाया गया।
पुलिस को बहनों की सोशल मीडिया ID पर AK-47 के साथ तस्वीरें मिली। जाँच एजेंसी ने बहनों को ISIS मॉड्यूल में इस्तेमाल होने का शक जताया है। सोशल मीडिया पर उनका गैंग के सरगना अब्दुल रहमान से भी लंबी-लंबी चैट्स मिली हैं।
बातचीत में बहनों को इस्लाम के लिए मरने और मारने के लिए तैयार किया जा रहा था। इन सभी चैट्स को आरोपितों के खिलाफ तैयार हो रही केस डायरी में भी शामिल किया गया है।
पुलिस इस मामले में लगातार जाँच कर रही है और पीड़ितों को पहचानने का प्रयास कर रही है।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने सोमवार (21 जुलाई 2025) को 2006 के मुंबई ट्रेन विस्फोट मामले में दोषी पाए गए सभी 12 आरोपितों को बरी कर दिया है। 2015 में एक विशेष मकोका (महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गेनाइज्ड क्राइम एक्ट) कोर्ट ने उनमें से पाँच को मौत की सजा और बाकी को आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
जस्टिस अनिल किलोर और जस्टिस श्याम चांडक की दो सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया। उन्होंने कहा कि अधिकांश साक्ष्य और गवाहों के बयान विश्वसनीय नहीं थे। ऑपइंडिया ने 2015 के मकोका कोर्ट के फैसले और 21 जुलाई 2025 के बॉम्बे हाई कोर्ट के फैसले को आधार बनाकर घटनाक्रम, सुनवाई, हाई कोर्ट में अपील और अंत में वर्तमान फैसले की समयरेखा तैयार की है।
वह शाम जिसने मुंबई को दहला दिया
11 जुलाई 2006 को मुंबई शहर में बेहद दर्दनाक घटना घटी। इस दिन शाम 6:24 बजे से 6:28 बजे के बीच मुंबई की लाइफलाइन मानी जाने वाली लोकल ट्रेनों को निशाना बनाकर 7 बम धमाके किए गए। ये धमाके वेस्टर्न रेलवे लाइन की फर्स्ट क्लास बोगियों में हुए, और इनका समय इस तरह तय किया गया था कि सब एक के बाद एक कुछ ही मिनटों में हुए।
धमाके जिन स्टेशनों के पास हुए थे, उनमें माटुंगा रोड, माहिम, बांद्रा, खार, जोगेश्वरी, बोरीवली और मीरा रोड शामिल थे। इनमें कुछ ट्रेनें चर्चगेट तो कुछ विरार की ओर जा रही थी। ये धमाके उस समय हुए जब ट्रेनों में सबसे ज्यादा भीड़ होती है। उस समय हजारों यात्री ट्रेनों में सफर कर रहे थे। बमों को प्रेशर कुकर में रख कर काले बैगों में छुपा कर बोगियों के अंदर सामान रखने वाली जगह पर रखा गया था।
बम में RDX और अमोनियम नाइट्रेट जैसे खतरनाक विस्फोटक इस्तेमाल किए गए थे। इसके साथ ही नुकसान को बढ़ाने के लिए बॉल बेयरिंग्स भी रखी गई थीं। टाइमर डिवाइसेज की मदद से सभी धमाके एक साथ कराए गए। सरकारी आँकड़ों के मुताबिक इस हमले में 187 लोगों की जान गई थी और 829 लोग घायल हुए थे।
धमाकों में फर्स्ट क्लास के डिब्बे पूरी तरह तबाह हो गए थे। शव पटरियों और प्लेटफॉर्म पर बिखरे हुए मिले थे। इस घटना के बाद बोरीवली, बांद्रा, माहिम, खार, माटुंगा रोड और जोगेश्वरी रेलवे पुलिस थानों में FIR दर्ज की गई। घटना की गंभीरता और इसके पीछे की योजना देखकर यह साफ था कि यह एक बड़ी साजिश थी।
अगले दिन महाराष्ट्र एंटी टेररिज्म स्क्वाड (ATS) ने इसकी जाँच शुरू की। बमों को रखने का तरीका और स्टेशन के चुनाव से ये भी समझ आया कि इसके पीछे बहुत सोच-समझकर और प्लानिंग से काम किया गया था। बाद में कोर्ट ने इस घटना को एक जानबूझकर किया गया बड़ा आतंकी हमला बताया। कोर्ट ने साफ किया कि इस हमले का मकसद ज्यादा से ज्यादा लोगों को नुकसान पहुँचा कर शहर में आतंक फैलाना था।
मुंबई में हुए कई मामले दर्ज और ATS ने सँभाली जाँच की कमान
11 जुलाई 2006 को मुंबई में लोकल ट्रेनों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के तुरंत बाद पुलिस ने कई FIR दर्ज की थी। इनमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धाराएँ 302 (हत्या), 307 (हत्या की कोशिश), 326, 324, 120B (षड्यंत्र), और 427 के अलावा रेलवे एक्ट, एक्सप्लोसिव सब्सटेंस एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने से रोकथाम कानून (PDPP Act) के प्रावधान लगाए गए थे।
बाद में ATS ने कहा कि सभी धमाके एक बड़ी साजिश का हिस्सा हैं, इसलिए इन सभी FIR को मिलाकर एक संयुक्त मामला बनाया गया। यह मामला ATS की मुंबई कालाचौकी यूनिट ने दर्ज किया और पूरे मामले को एक संगठित और सुनियोजित साजिश के रूप में जाँचा गया।
जाँच के दौरान ATS ने महाराष्ट्र कंट्रोल ऑफ ऑर्गनाइज्ड क्राइम एक्ट (MCOCA) लगाने का फैसला किया। 30 सितंबर 2006 को सक्षम प्राधिकरण से इसकी मंजूरी भी मिल गई। बाद में 11 जनवरी 2007 को और जाँच के बाद, गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) और PDPP एक्ट भी आरोपितों पर लागू किए गए।
ATS ने धमाकों की गहराई से जाँच की। इसमें फॉरेंसिक जाँच, ब्लास्ट साइट्स से सबूत जुटाना, विस्फोटक सामग्री और अवशेषों की जाँच शामिल थी। इस जाँच के दौरान 13 लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से ज्यादातर महाराष्ट्र और आस-पास के राज्यों से थे। कई अन्य आरोपित अब भी फरार हैं।
कई गिरफ्तार आरोपित प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (SIMI) से जुड़े बताए गए और पाकिस्तान स्थित लश्कर-ए-तैयबा से संपर्क होने की भी बात सामने आई। ATS ने जाँच के बाद साफ किया कि यह पूरी साजिश पाकिस्तान में रची गई थी और उसे स्थानीय लोगों की मदद से भारत में अंजाम दिया गया।
लंबे मुकदमे के बाद 2015 में दोष हुआ सिद्ध
ATS कालाचौकी केस में 13 आरोपितों के खिलाफ एक बड़ी चार्जशीट दाखिल की गई। इसके बाद विशेष मकोका कोर्ट में मुकदमा शुरू हुआ। इन पर आईपीसी, मकोका, यूएपीए, एक्सप्लोसिव्स एक्ट, रेलवे एक्ट और पासपोर्ट एक्ट जैसे कई गंभीर कानूनों के तहत आरोप लगाए गए थे।
मामले की शुरुआत 30 नवंबर 2006 को पहली चार्जशीट दायर होने से हुई और करीब 9 साल बाद 11 सितंबर 2015 को अदालत का अंतिम फैसला आया। इस दौरान 192 गवाहों के बयान दर्ज किए गए, जिनमें चश्मदीद, डॉक्टर, फॉरेंसिक एक्सपर्ट, ATS अधिकारी और पंच गवाह शामिल थे। कोर्ट के सामने पोस्टमार्टम रिपोर्ट्स, फॉरेंसिक रिपोर्ट्स, पंचनामा और मकोका के तहत दर्ज कबूलनामे जैसे कई अहम सबूत पेश किए गए।
अभियोजन पक्ष का कहना था कि यह पूरी साजिश पाकिस्तान में रची गई थी। उनके अनुसार लश्कर-ए-तैयबा और SIMI ने मिलकर योजना बनाई थी। आरोपित पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में ट्रेनिंग लेकर भारत पहुँचे और फिर बम तैयार करने, रेलवे स्टेशनों की रेकी करने और विस्फोटकों को ट्रेनों तक पहुँचाने में लगे। बताया गया कि गोवंडी के एक कमरे में प्रेशर कुकर में RDX और अमोनियम नाइट्रेट भर कर बम बनाए गए और चर्चगेट से रवाना होने वाली सात ट्रेनों में रखे गए थे।
मकोका के तहत आरोपियों के दिए गए कबूलनामों को अदालत ने स्वीकार किया। हालाँकि इनमें से कई बयान बाद में वापस ले लिए गए। कोर्ट ने सबूतों का गहराई से विश्लेषण किया और यह भी माना कि प्रेशर कुकर की खरीद, यात्रा विवरण और घटनास्थल की रेकी जैसी बातें अभियुक्तों को इस साजिश से जोड़ती हैं।
फैसले में कोर्ट ने कमरुद्दीन अंसारी, एहतेशाम सिद्दीकी, फैसल शेख, जीशान सिद्दीकी, सोहेल शेख, आसिफ खान, साजिद अंसारी, माजिद शफी, मुज़म्मिल शेख, तनवीर अंसारी, नवीन खान और शरीफ खान सहित 12 आरोपितों को दोषी करार दिया। वहीं एक आरोपी, अब्दुल वहीद शेख को पर्याप्त सबूत न होने के कारण बरी कर दिया।
इनमें से 5 दोषियों को मौत की सजा सुनाई गई और बाकी 7 को उम्रकैद दी गई। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह हमला केवल आम नागरिकों पर नहीं बल्कि भारत की संप्रभुता पर भी सीधा हमला था। इसे एक सटीक, योजनाबद्ध और आतंकवादी कार्रवाई बताया गया, जिसमें सभी दोषियों की सीधी और सक्रिय भूमिका थी।
दोष सिद्ध होने के बाद दायर अपील, कानूनी लड़ाई और बरी
2015 के फैसले के बाद बॉम्बे हाई कोर्ट में कई अपीलें दायर की गईं। एक दशक बाद 21 जुलाई 2025 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने 12 आरोपितों की 2015 की सजा को पलट दिया। डिवीजन बेंच ने सभी आरोपितों को बरी कर दिया।
यह फैसला ट्रायल कोर्ट के रिकॉर्ड की दोबारा समीक्षा करने के बाद दिया गया। इसमें गवाहों की गवाही, फॉरेंसिक रिपोर्ट्स, कबूलनामे और कानूनी प्रक्रियाओं के पालन की जाँच शामिल थी। अभियोजन का केस ज्यादातर उन कबूलनामों पर आधारित था जो आरोपितों से महाराष्ट्र संगठित अपराध नियंत्रण अधिनियम (MCOCA) की धारा 18 के तहत लिए गए थे।
यह कानून पुलिस के सामने दिए गए कबूलनामों को कोर्ट में मान्यता देता है। लेकिन हाई कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ कबूलनामों के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती और इस केस में कोई पुख्ता सबूत मौजूद नहीं थे। कोर्ट ने कबूलनामों की सच्चाई (authenticity) पर शक जताया।
कोर्ट ने पाया कि कई आरोपितों के कबूलनामों में समानता थी। उदाहरण के तौर पर नामों की क्रमबद्धता और घटनाओं का वर्णन बिल्कुल एक जैसा था। कोर्ट ने कहा कि यह समझ से परे है कि अलग-अलग लोग बिल्कुल एक जैसे शब्दों में एक ही बात कहें। कोर्ट को यह भी शक हुआ कि कई हिस्से नकल किए गए हो सकते हैं।
कोर्ट ने कहा कि पुख्ता सबूत के बिना सिर्फ पुलिस हिरासत में दिए गए ऐसे कबूलनामों के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। इसलिए सभी 12 आरोपितों को बरी कर दिया गया।
अभियोजन पक्ष ने यह दावा किया कि आरोपितों की निशानदेही पर प्रेशर कुकर, अमोनियम नाइट्रेट, टाइमर, सिम कार्ड्स और अन्य सामग्री बरामद की गई थी। लेकिन कोर्ट ने पाया कि इन वस्तुओं का उन विस्फोटों में इस्तेमाल हुए उपकरणों से कोई ठोस संबंध साबित नहीं हुआ।
कुछ मामलों में ये सामान ऐसे स्थानों से मिला, जहाँ तक लोग आसानी से पहुँच सकते थे। इससे इनकी प्रामाणिकता और कमजोर हो गई। फॉरेंसिक रिपोर्ट्स भी इन बरामदगी और असली धमाकों में इस्तेमाल हुई सामग्री के बीच कोई सीधा संबंध नहीं दिखा सकी।
फैसले में अदालत ने कहा कि अभियोजन यह साबित करने में पूरी तरह असफल रहा कि आरोपित सीधे तौर पर इस अपराध से जुड़े थे। यह टिप्पणी खासतौर पर उस स्थिति में की गई जब अभियोजन पक्ष आरोपितों की कॉल डाटा रिकॉर्ड (CDR) पेश नहीं कर सका।
जाँच एजेंसियों ने कोर्ट को बताया कि जिन मोबाइल फोन की कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) की बात हो रही थी, वे आरोपितों के नाम पर नहीं थे। इसलिए CDRs को सबूत के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया गया। बचाव पक्ष ने CDRs की माँग की, लेकिन उन्हें यह जानकारी समय पर नहीं दी गई। जब कोर्ट ने इसकी अनुमति दी तब तक CDRs को सुरक्षित रखने की समय सीमा खत्म हो चुकी थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों का जो दावा किया गया था, खासकर आतंकवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर मामलों में, उसके लिए ठोस और मजबूत सबूत होना जरूरी है। कोर्ट ने माना कि अगर यह मान भी लिया जाए कि आरोपित पाकिस्तान गए थे, तो भी इस बात का कोई सबूत नहीं था कि वहाँ की गई कथित ट्रेनिंग का 7/11 मुंबई बम धमाकों से कोई सीधा संबंध था।
कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ विदेश यात्रा या ट्रेनिंग से किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि यह साबित न हो जाए कि उनका सीधा संबंध धमाकों से था। चूँकि अभियोजन पक्ष अन्य बिंदुओं पर भी आरोप साबित करने में असफल रहा, इसलिए पाकिस्तान यात्रा से सिर्फ साबित नहीं किया जा सकता कि विस्फोट इनलोगों ने किया।
मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष के कई गवाहों को कोर्ट ने ‘hostile witness’ घोषित किया। कुछ गवाहों की गवाही, भले ही दर्ज की गई थी, लेकिन उनके पास कोई ठोस सबूत या कानूनी आधार नहीं था, जिससे अभियोजन का केस मजबूत नहीं हो पाया। कोर्ट ने कई गवाहों की बातों को अविश्वसनीय माना।
उदाहरण के तौर पर, गवाह संख्या PW-59 आलम गुलाम कुरैशी ने अपनी गवाही में कहा कि आरोपित नंबर 3 मोहम्मद फैसल शेख ने उसे बताया था कि वह एक जिहादी है और पाकिस्तान जाकर लश्कर-ए-तैयबा से हथियारों की ट्रेनिंग ली है।
यह बात बहुत गंभीर थी, लेकिन इसके बावजूद गवाह ने तुरंत पुलिस को इसकी जानकारी नहीं दी और अक्टूबर 2006 में इसका खुलासा होने तक किसी और को भी इसके बारे में कुछ नहीं बताया।
जब यह साफ था कि आरोपित बम धमाकों के केस में गिरफ्तार हो चुका था, तब भी गवाह ने इतनी अहम जानकारी इतने लंबे समय तक छुपाए रखी। कोर्ट ने कहा कि इतनी देर से किए गए इस खुलासे के कारण गवाह PW-59 की गवाही पूरी तरह अविश्वसनीय हो जाती है और इसलिए उसे खारिज किया जाता है।
भारतीय कानून के अनुसार, अगर परिस्थितिजन्य साक्ष्य (circumstantial evidence) की श्रृंखला मजबूत, स्पष्ट और एक जैसी हो, तो सिर्फ उन्हीं के आधार पर दोष सिद्ध किया जा सकता है। हालाँकि इस मामले में हाई कोर्ट ने उस रास्ते को अपनाने से इनकार कर दिया।
अभियोजन पक्ष ने कई ऐसे परिस्थितिजन्य सबूत पेश किए थे जिन्हें वह एक मजबूत पैटर्न मान रहा था और जिन्हें ट्रायल कोर्ट ने भी सही माना था। लेकिन हाई कोर्ट को यह नहीं लगा कि ये सबूत कानूनी रूप से आरोपितों को अपराध से जोड़ते हैं।
जजों ने यह नहीं कहा कि अपराध नहीं हुआ और न ही इस बात को नजरअंदाज किया कि साजिश हुई थी। लेकिन उन्होंने यह कहा कि अपराध साबित करने का जो कानूनी मापदंड है, वह इस मामले में पूरा नहीं हुआ। इसी कारण मुंबई में हुए एक सबसे भयावह आतंकी हमले के लिए पहले दोषी ठहराए गए 12 लोगों को अब बरी कर दिया गया है।
प्रॉसिक्यूशन ने भले ही एक विस्तृत केस तैयार किया था, लेकिन हाई कोर्ट ने पाया कि वह सबूत अदालत में स्वीकार्य होने के मानदंडों पर खरे नहीं उतरे। आरोपित इसलिए बरी नहीं हुए क्योंकि अपराध नहीं हुआ, बल्कि इसलिए क्योंकि प्रॉसिक्यूशन उन्हें कानून की सख्ती के साथ अपराध से नहीं जोड़ पाया।
मूल रुप से ये रिपोर्ट अंग्रेजी में अनुराग ने लिखी है। इसे सौम्या सिंह ने अनुवाद किया है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।
मोदी सरकार नए आयकर कानून को लागू करने के लिहाज से आयकर विधेयक-2025 लेकर आई है। इसे सोमवार (21 जुलाई 2025) को मानसून सत्र में पेश किया गया। बिल के कई प्रावधानों को जस का तस रखा गया है। पर साथ ही 285 नए सुझाव भी शामिल किए गए हैं।
आयकर विधेयक-2025 पर प्रवर समिति की रिपोर्ट में ‘डिजिटल पासवर्ड और गोपनीयता’से जुड़े प्रावधानों को लेकर विशेष ध्यान दिया गया है। 64 साल पुराने आईटी कानून में कुछ अहम बदलाव होने जा रहे हैं। 4575 पन्नों की रिपोर्ट में कई संशोधन के साथ अहम बातें शामिल की गई हैं।
मोदी सरकार ने वर्तमान आयकर अधिनियम 1961 को बेहतर बनाने के लिए कई संशोधन किए हैं। इसके तहत अधिकारियों को दिए गए अधिकारों, खास तौर पर तलाशी और जब्ती के दौरान जाँच के दायरे में आने वाले लोगों के सोशल मीडिया और निजी ईमेल तक को जाँच सकते हैं और जानकारी निकालने की मंजूरी भी दी गई है।
13 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में आयकर बिल पेश किया था। इसके कई प्रावधानों को लेकर तीखी आलोचना हुई थी। इसके बाद विधेयक को बीजेपी सांसद बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय समिति के पास समीक्षा के लिए भेजा गया था। समीक्षा पूरी करने के बाद समिति ने मानसून सत्रह को पहले दिन अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।
डिजिटल पासवर्ड और गोपनीयता पर समिति की टिप्पणियाँ
अपने सुझाव में समिति ने बिल को लेकर कहा है कि सरकार को नया अधिकार देने का प्रस्ताव है ताकि तलाशी और जब्ती के मौजूदा अधिकारों के तहत डिजिटल पासवर्ड या एक्सेस कोड को अपने नियंत्रण में रख सकता है। यह प्रावधान टैक्स अधिकारियों को सोशल मीडिया, ईमेल, व्हाट्सएप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म तक पहुँच की अनुमति भी दे सकता है।
नए बिल में 5 लाख 12 हजार की जगह 2 लाख 60 हजार शब्द ही शामिल किए गए हैं। इसके अलावा समिति ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल नहीं कर पाता है, फिर भी उसे रिफंड मिलना चाहिए। जुर्माने से बचने के लिए रिटर्न फाइल करने के लिहाज से कोई कानून नहीं होना चाहिए।
हालाँकि विशेषज्ञों ने इस पर निजता के हनन की आशंका जताई है। उनका कहना है कि इससे उपयोगकर्ताओं के निजी डिजिटल डेटा की जानकारी सरकारी लोगों तक पहुँच सकती है। विधेयक में ‘वर्चुअल डिजिटल स्पेस’ की परिभाषा दी गई है। इसमें ईमेल सर्वर और सोशल मीडिया अकाउंट्स, ऑनलाइन बैंकिंग और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के साथ क्लाउड स्टोरेज और रिमोट सर्वर जैसी बातें शामिल की गई हैं।
सरकार का कहना है कि बिल में बदलाव केवल भाषा को बेहतर और स्पष्ट करने के लिए किया गया है। साथ ही कई पुराने अधिकारों को जस का तस शामिल किया गया है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक नया अहम अधिकार है, जिससे टैक्स अधिकारी पासवर्ड क्रैकिंग सॉफ़्टवेयर या सेवा प्रदाताओं से लॉग-इन जानकारी माँग सकते हैं।
समिति के सुधार
समिति ने रिपोर्ट में 285 सुझाव दिए हैं। इनमें विधेयक भाषा को सरल बनाने, धाराओं को 819 से 536 करने, 1200 प्रोविजन और 900 स्पष्टीकरण हटाने और डिजिटल अधिकारों और गोपनीयता से जुड़े मुद्दों को आदि को शामिल किया गया है।
समिति ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की परिभाषा को MSME एक्ट के साथ मिलाने का भी सुझाव दिया है। रिपोर्ट के संशोधनों में अध्यायों की संख्या 47 से घटाकर 23 कर दी गई है। इन प्रावधानों को सूची की तरह सरल रखा गया है कि करदाताओं को आसानी से समझ आए। गैर-लाभकारी संगठनों के लिए विशेष अध्याय बनाया गया है। इसमें सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है ताकि ऐसे संगठनों को प्रावधानों का अनुपालन करना आसान हो।
‘पिछले वर्ष’ और ‘मूल्यांकन वर्ष’ की जगह अब केवल ‘कर वर्ष’ का प्रयोग किया जाएगा। इससे कर भुगतान उसी वर्ष में होगा जिसमें आय अर्जित की गई है। नये विधेयक में स्पष्टता बढ़ाने के लिए तालिकाओं की संख्या 18 से बढ़ाकर 57 कर दी गई है, और सूत्रों की संख्या भी 6 से बढ़ाकर 46 कर दी गई है।
राजस्व विभाग ने किया स्वीकार
वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग ने समिति को कहा कि प्रस्तावित बदलाव मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शामिल किसी भी जानकारी को सीमित करने के लिहाज से मंत्रालय ने कहा कि डिजिटल डेटा व्यापक होता है।
इसमें किसी भी ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट का लॉगिन आईडी और पासवर्ड शामिल होता है, जिन्हें एन्क्रिप्टेड चैट्स में वित्तीय डेटा छिपाने के लिए उपयोग किया जाता है। ऐसे में इसे सीमित नहीं किया जा सकता है।
समिति की ओर से डिजिटल स्पेस की परिभाषा से सोशल मीडिया अकाउंट्स को बाहर करने के सुझाव पर मंत्रालय ने कहा कि कई जरूरी साक्ष्य और जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स से हासिल किए जाते हैं। इनमें व्हाट्सएप, ईमेल आदि शामिल होता है।
तलाशी अभियानों के अधिकांश मामलों में करदाता (टैक्सरेपेयर्स) ऑनलाइन मंचों, पोर्टल्स और ईमेल अकाउंट्स आदि के पासवर्ड या लॉगिन क्रेडेंशियल साझा नहीं करते। इसके पीछे कारण ये है कि करदाता अपने कई बेहिसाब लेनदेन पर एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों के जरिए चर्चा करते हैं। ऐसे में डेटा उपयोग को लेकर संशोधन सही हैं ताकि अन्य प्रावधान भी तर्कसंगत रह सकें।
जगदीप धनखड़ ने भले ‘स्वास्थ्य कारणों’ से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया हो, पर विपक्ष इसमें ‘राजनीति’ देख रहा है। ये वही विपक्ष है जिसने न केवल धनखड़ की मिमिक्री कर सदन के बाहर उनका मजाक उड़ाया, बल्कि सदन के भीतर उन्हें ‘विपक्ष की आवाज दबाने वाला सभापति’ से लेकर ‘बीजेपी प्रवक्ता’ तक कहने में भी हिचक नहीं दिखाई।
यहाँ तक कि देश में पहली बार किसी उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश तक की। अब कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश कह रहे हैं कि उन्होंने विपक्ष को मिलाकर चलने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य वजह से बजाए जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की वजह ‘गहरे’ हैं।
The Congress claimed that there are "far deeper reasons" for #JagdeepDhankhar's resignation as the Vice-President than the health reasons cited by him, and said his resignation speaks highly of him but poorly of those who got him elected to the post.https://t.co/G9ML3g5T5Z
धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला चुका है कॉन्ग्रेस
कॉन्ग्रेस को जगदीप धनखड़ विपक्ष को साथ लेकर चलने वाले नजर आने लगे हैं। ये वही कॉन्ग्रेस है जिसने देश के इतिहास में पहली बार उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उनका ‘संवैधानिक अपमान’ किया । 72 साल के संवैधानिक इतिहास में धनखड़ पहले ऐसे उपराष्ट्रपति रहे जिनके खिलाफ प्रमुख विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली इंडी गठबंधन ने दिसंबर 2024 में सदन में महाभियोग प्रस्ताव लेकर आया था।
उस वक्त धनखड़ पर ‘पक्षपातपूर्ण तरीके’ से सदन चलाने और विपक्ष को ‘बोलने का मौका नहीं ‘देने का आरोप लगाया था। हालाँकि तकनीकी कारणों से महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।
लेकिन आज उपराष्ट्रपति धनखड़ कॉन्ग्रेस को सभी दलों को मिला कर चलने वाले नेता नजर आने लगे हैं। कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने यहाँ तक कहा है कि धनखड़ सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलाकर चलना चाहते थे और दुनिया में भारत के लोकतंत्र की बेहतर छवि प्रस्तुत करना चाहते थे।
धनखड़ की मिमिक्री का मामला
उपराष्ट्रपति धनखड़ को विपक्ष ने आहत भी किया है। याद कीजिए मोदी सरकार 2.0 का वो आखिरी शीतकालीन सत्र जब सदन में हंगामे की वजह से राज्यसभा के 45 सांसदों समेत कुल 78 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। सभी निलंबित सांसद संसद भवन की सीढ़ियों पर बैठकर निलंबन का विरोध कर रहे थे।
इसी दौरान टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी उठे और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री करने लगे। उनके बात करने और शारीरिक संरचना की खिल्ली उड़ाई। इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गांधी खड़े होकर हँसते और मिमिक्री का वीडियो बनाते नजर आए।
इस पर जगदीप धनखड़ ने अपनी नाराजगी भी जताई। उन्होंने संसद में कहा था कि एक सांसद चेयरमैन का मजाक बनाता है और कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हँसते हैं और उसका वीडियो बनाते हैं। उन्होंने इसे व्यक्तिगत और जाति आधारित अपमान बताया था। उन्होंने कहा था कि उनकी जाट पहचान और किसान बैकग्राउंड का मजाक उड़ाया गया। ये पूरे जाट समुदाय का अपमान है।
सांसद कल्याण बनर्जी ने इसके बाद भी कई बार जगदीप धनखड़ की मिमिक्री बनाई और कहा कि वो 1000 बार ऐसा करेंगे।
हाथ धोकर पीछे पड़ी रही टीएमसी
विपक्ष के हर उस दांव में टीएमसी साथ देती रही जो धनखड़ के खिलाफ थी। दरअसल उपराष्ट्रपति की मुखर आलोचक टीएमसी के साथ धनखड़ का रिश्ता उस वक्त से खराब रहा था, जब वह बंगाल के राज्यपाल थे। 2019 से 2022 के बीच राज्यपाल धनखड़ ने बंगाल की ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना की।
उन्होंने कहा था कि राज्य में संविधान का शासन नहीं है और अराजकता,गुंडागर्दी का बोलबाला है। इसको सीएम ममता बनर्जी ने राज्य का अपमान बताया था। उन्होंने सरकार के कामकाज में दखलंदाजी के आरोप भी लगाए। ऐसे में जब जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार बने तो उनका जमकर विरोध किया।
सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी को लेकर धनखड़ और विपक्ष के बीच बहसबाजी
सुप्रीम कोर्ट को लेकर उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा था कि संसद के बनाए कानूनों को अगर कोर्ट रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। धनखड़ के इस बयान का विपक्ष ने कड़ा विरोध किया था। टीएमसी ने कहा था कि यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडा चला रहा है वहीं कॉन्ग्रेस ने कहा था, “उपराष्ट्रपति संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ रहे हैं।” अब वही कॉन्ग्रेस उपराष्ट्रपति का गुणगान करती नजर आ रही है।
विश्वविद्यालयों पर धनखड़ की टिप्पणी पर विपक्ष हुआ था आग-बबूला
मार्च 2023 में जब शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर राज्यसभा में बहस चल रही थी तो सभापति धनखड़ ने कहा था, “कुछ विश्वविद्यालय देशविरोधी विचारधाराओं को प्रश्रय देते हैं।” उनका इशारा जेएनयू की तरफ था। इस पर कॉन्ग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने उपराष्ट्रपति की भाषा को ‘संघी एजेंडा’ करार दे दिया और बयान वापस लेने पर अड़े रहे। इस दौरान संसद में कई दिनों तक व्यवधान रहा।
विपक्ष ने लगाया बीजेपी प्रवक्ता होने का आरोप
दिसंबर 2023 में शीतकालीन सत्र के दौरान विपक्ष ने धनखड़ पर विपक्षी सांसदों को नहीं बोलने का आरोप लगाया था। इस दौरान कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था, “ये उपराष्ट्रपति नहीं, बीजेपी प्रवक्ता की तरह बर्ताव कर रहे हैं।” आज वही कॉन्ग्रेस उनकी तारीफ के पुल बाँध रही है और ‘लोकतंत्र का सच्चा सिपाही’ कह रही है।
2022 में उपराष्ट्रपति बनने का भी विपक्ष ने किया था विरोध
मोदी सरकार ने 2022 में बंगाल के राज्यपाल से सीधे केन्द्र में उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया। इंडी गठबंधन ने कॉन्ग्रेस नेता मार्गेट अल्वा को अपना उम्मीदवार बनाया था। धनखड़ ने 725 में से 528 वोट पाकर जीत दर्ज की थी और 11 अगस्त 2022 को उपराष्ट्रपति बने।
भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सोमवार (21 जुलाई 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को त्याग पत्र भेजा। पत्र में इस्तीफे के कारण खराब स्वास्थ्य उल्लेख किया गया। इसके अलावा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कैबिनेट के बाकी मंत्रियों का शुक्रिया अदा किया।
उन्होंने पत्र में लिखा, “स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और चिकित्सीय सलाह का पालन करने के लिए मैं भारत के उपराष्ट्रपति पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूँ। जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 67(ए) में प्रावधान है।” उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे पर लगातार कयास लग रहे हैं।
इस बीच उनकी साधारण किसान परिवार वाली पृष्ठभूमि और फिर सुप्रीम कोर्ट में वकालत से लेकर उनकी राजनीतिक पारी तक पर चर्चाएँ चल रही हैं। उनका सबसे प्रभावशाली कार्यकाल पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और उपराष्ट्रपति के रूप में रहा है, जहाँ हर बार उन्हें लोकतंत्र के हित में खड़े देखा गया।
राजस्थान के जाट परिवार में जन्मे जगदीप धनखड़
जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले के किठाना गाँव में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता गोकुलचंद किसान थे। किसान के बेटे ने जगदीप धनखड़ ने सैनिक स्कूल से पढ़ाई की। फिर राजस्थान विश्वविद्यालय से बीएससी और एलएलबी की डिग्री पूरी की।
साल 1979 में सुदेश धनखड़ से शादी की। उनकी एक बेटी है, जिसका नाम कामना है। साल 1990 में जगदीप धनखड़ ने राजस्थान हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट बने। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत की। वह राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।
वर्षों की सक्रिय राजनीति के बाद उन्हें 2019 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया था। इस कार्यकाल में उनकी राज्य की ममता बनर्जी सरकार पर कई मुद्दों से तनातनी देखी गई।
राज्यपाल रहते संवैधानिक मूल्यों पर मुखर रहे धनखड़
जगदीप धनखड़ राज्यपाल के रूप में लगातार संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित करते रहे। जब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे, तब ममता बनर्जी की सरकार से कई मुद्दों पर टकराव हुआ, लेकिन उन्होंने हमेशा संविधान के पक्ष में ही बात की।
बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर भी जगदीप धनखड़ ने आवाज उठाई। TMC के गुंडों ने जब हिंदुओं पर अत्याचार किया और महिलाओं का रेप से लेकर हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमा को तोड़ा, तब धनखड़ ने मामले में न्यायिक जाँच के निर्देश दिए।
यही नहीं, बंगाल चुनाव 2021 के बाद हुई हिंसा में भी जगदीप धनखड़ ने न्याय के लिए लड़ाई लड़ी और ममता सरकार की करतूतों को सामने रखा। बतौर राज्यपाल रहते उन्होंने ममता बनर्जी सरकार पर कई गंभीर प्रश्न उठाए।
जब चुनाव बाद की हिंसा पर रिपोर्ट तक नहीं भेजी गई, तब उन्होंने खुद सामने आकर आवाज उठाई। तबलीगी जमात के बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर लुकआउट नोटिस जारी न होने पर भी उन्होंने सरकार की चुप्पी पर सवाल किया।
जब धनखड़ ममता सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने लगे, तो TMC सांसदों ने उनके खिलाफ खूब हँगामा किया। लेकिन धनखड़ बंगाल की लड़ाई के लिए डटे रहे। कोरोना संकट में जब कई जगह शव सड़कों पर पड़े मिले, तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई और सरकार की लापरवाही पर सवाल उठाया।
बंगाल की TMC सरकार ने हमेशा राज्यपाल का अपमान किया। TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने उन्हें ‘सड़ा हुआ सेब’ और ‘अंकल जी’ तक कहा, तब भी उन्होंने जवाब संयम और सच्चाई से दिया।
जया बच्चन की ‘बदतमीजी’ पर सिखाया सबक
जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में सभापति के तौर पर अनुशासन और गरिमा को सर्वोपिर रखा है, चाहे सामने कोई भी हो। समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने राज्यसभा में जब धनखड़ के लहजे पर आपत्ति जताई थी, तब भी उन्होंने सख्त और सटीक जवाब दिया था।
जगदीप धनखड़ ने कहा, “जया जी, आपने बहुत नाम कमाया है। आप जानती हैं कि एक अभिनेता निर्देशक के अधीन होता है। लेकिन हर दिन मैं खुद को दोहराना नहीं चाहता। हर दिन मैं स्कूली (आपसे) शिक्षा नहीं लेना चाहता। आप मेरे लहजे के बारे में बात कर रही हैं? बहुत हो गया। आप कोई भी हो सकते हैं, आपको मर्यादा को समझना होगा। आप एक सेलिब्रिटी हो सकते हैं, लेकिन मर्यादा को स्वीकार करें।”
‘न्यायिक दखल’ पर प्रश्न उठाते रहे धनखड़
जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के भीतर लगातार के दखल (Judicial Overreach) पर भी लगातार प्रश्न उठाए। उन्होंने इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को आदेश देने वाले फैसले का भी विरोध किया था।
जब कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों को लंबित विधेयकों पर 3 महीने में फैसला लेने का आदेश दिया था, तब धनखड़ ने साफ कहा कि अदालत राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदक को आदेश नहीं दे सकती। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ‘सुपर संसद’ बनने की कोशिश में है।
इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से करोड़ों रुपए मिलने वाले मामले में भी सुप्रीम कोर्ट को घेरा है। उन्होंने सवाल किया कि अगर इतनी नगदी किसी आम आदमी के घर मिलती, तो उसी दिन कार्रवाई हो जाती।
उपराष्ट्रपति रहते हुए जगदीप धनखड़ ने वर्ष 2022 में न्यायिक नियुक्ति बिल (NJAC) को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट पर प्रश्न उठाए थे। मोदी सरकार द्वारा पास किए गए कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके जरिए न्यायिक नियुक्तियों की व्यवस्था की गई थी। जगदीप धनखड़ ने इसे संसद की संप्रुभता के साथ समझौता करार दिया था।
राज्यसभा के सभापति के तौर पर वह हमेशा ही सक्रिय रहे और प्रमुख मुद्दों पर अपनी राय रखने से नहीं चूके।
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 pgneR 2025) को पीलीभीत में समाजवादी पार्टी के कार्यालय की जगह को सिर्फ 115 रुपए में हथियाने को लेकर धोखाधड़ी की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग बताते हुए समाजवादी पार्टी को कड़ी फटकार लगाई।
पीलीभीत नगरपालिका परिषद ने अपने परिसर से सपा कार्यालय के बेदखली आदेश पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।
बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट पीलीभीत नगर पालिका परिषद के बेदखली के आदेश पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की पीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी। समाजवादी पार्टी की ओर से इस मामले पर सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने अपना पक्ष रखा था।
दवे ने अपनी दलील में कहा था कि कार्यालय का किराया चुकाने के बाद भी नगरपालिका उसे बेदखल करना चाहती है। बेदखली के आदेश को रोकने के लिए याचिका भी डाली गई थी।
पीठ ने वकील से पूछा, “आपने परिसर कैसे लिया था?” इस पर वकील दवे की ओर से नगरपालिका की ओर से ‘आवंटित’ किए जाने की बात कही गई। इस पर पीठ ने कहा, “क्या आपने कभी नगरपालिका क्षेत्र में 115 रुपए पर कार्यालय की जगह के बारे में सुना है? यह सत्ता के दुरुपयोग को साफ तौर पर दिखलाता है।”
इसके बाद दवे ने दलील दी कि नगरपालिका अधिकारी इस तरह से हमारे परिसर पर ताला नहीं लगा सकते। उनकी दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “आप एक राजनीतिक पार्टी हैं। एक जगह पर कब्जा करने के लिए अपने पद और राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग किया। उस दौरान आपको प्रक्रिया नहीं याद रही। जब कार्रवाई होती है तो आपको सब कुछ याद आने लगता है।”
इसके बाद पार्टी के वकील ने 6 हफ्ते के लिए बेदखली रोकने की माँग कर डाली। इस पर पीठ ने कहा,” ये फर्जी आवंटन नहीं बल्कि फर्जी कब्जा है। आप एक धोखाधड़ी वाले कब्जे हैं।” इसके साथ ही कोर्ट ने सपा को सिविल कोर्ट जाने की हिदायत दी।
क्या है मामला
समाजवादी पार्टी में पीलीभीत नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी कार्यालय की परिसर में 2005 में अपना कार्यालय बनाया था। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के दौरान उसे समय के अधिकारियों ने पार्टी को इस जगह को अस्थाई रूप से आमंत्रित भी कर दिया था। इसके बाद सपा नेताओं ने वहाँ पर जिला कार्यालय खोलकर निर्माण कर लिया।
इसके बाद 2018 से ही नगरपालिका इस जगह पर कब्जा हटवाने का प्रयास कर रही है। इसके खिलाफ सपा नेता स्थानीय कोर्ट और हाई कोर्ट तक जा चुके हैं। हाई कोर्ट ने 18 जून 2025 को नगर पालिका के पक्ष में अपना आदेश दिया। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने अपना कब्जा नहीं हटाया।
इस साल कोर्ट की ओर से 10 जून 2025 को पार्टी को 17 जून तक कब्जा हटाने की नोटिस जारी की गई। 18 जून को जिला मजिस्ट्रेट विजय वर्धन तोमर कब्जा हटाने की कार्रवाई के लिए पहुँचे तो सपा नेताओं ने इसका विरोध कर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए अपनी टिप्पणी दी है।
भारतीय वायुसेना सितम्बर, 2025 में अपने अंतिम MiG-21 विमानों को रिटायर कर देगी। इनकी विदाई के लिए एक ख़ास समारोह का आयोजन किया जाएगा। MiG-21 देश में सबसे अधिक समय तक सेवा देने वाला लड़ाकू विमान रहा है। उसकी विदाई के बाद भारतीय वायु सेना की घटती विमानों की समस्या और गहरी हो जाएगी।
इकॉनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायु सेना में सेवा दे रहे अंतिम MiG-21 विमानों को सितम्बर, 2025 में रिटायर किया जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार, इन्हें रिटायर करने से पहले चंडीगढ़ एयरबेस में समारोह में अधिकारिक विदाई दी जाएगी। यह समारोह 19 सितम्बर, 2025 को होने वाला है।
भारतीय वायुसेना में अभी 23वीं स्क्वाड्रन में MiG-21 सेवाएँ दे रहे हैं। इस स्क्वाड्रन को पैंथर्स के नाम से जाना जाता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वर्तमान में भारतीय वायु सेना में लगभग 30 के आस-पास MiG-21 सेवाएँ दे रहे हैं। इनकी सेवा की अवधि पूरी हो चुकी है और अब यह पुराने हो चुके हैं।
MiG-21 को अंतिम रूप से रिटायर करने के लिए लम्बे समय से कोशिश चल रही थी। हालाँकि, विमानों की कमी और नए विमान ना आने के चलते भारतीय वायु सेना इन्हें रिटायर नहीं कर पा रही थी। इन्हें पहले LCA तेजस से रिप्लेस करने की योजना बनाई गई थी। हालाँकि, उनकी आपूर्ति रुक गई है।
MiG-21 विमानों ने भारतीय वायु सेना ने 60 वर्षों से अधिक सेवाएँ दी हैं। इन्हें 1963 में भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया था। MiG-21 लड़ाकू विमान सोवियत संघ से खरीदे गए थे। इनको बाद में हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने भारत में भी बनाया है।
MiG-21 भारतीय वायु सेना में शामिल होने पहले ऐसे विमान थे, जो सुपरसोनिक स्पीड (1236 KM/h+) पर उड़ते थे। यह काफी हलके भी थे इसलिए इन्हें दूसरे विमानों के खिलाफ किसी युद्ध में इस्तेमाल करना भी आसान था।
भारतीय वायु सेना में 1963 के बाद से लगभग 800 MiG-21 विमान शामिल किए गए थे। यह भारतीय वायु सेना में सबसे अधिक संख्या में शामिल होने वाला विमान रहा है। 6 दशक की सेवा में इसने 1965, 1971 और 1999 के कारगिल युद्ध में भाग लिया।
MiG-21 ने इसके अलावा ऑपरेशन मेघदूत और बाकी सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया है। यह विश्व का सबसे अधिक निर्माण किया जाने वाला लड़ाकू विमान भी है। इसे विश्व के लगभग 60 देशों ने इस्तेमाल किया है। भारत इसके शुरूआती उपयोगकर्ताओं में से एक था।
आगरा में धर्मांतरण के गिरोह से बच कर घर वापसी करने वाली आगरा की दोनों बहनों को लेकर परिवार ने नए खुलासे किए हैं। उनके माता-पिता का कहना है कि वे गिरोह के चंगुल में पूरी तरह फँस चुकी थी। दोनों पूजा-पाठ का विरोध भी करती थी।
जानकारी के अनुसार, रविवार (20 जुलाई 2025) उनके माता-पिता ने को आगरा कैंप कार्यालय पहुँचकर पुलिस आयुक्त से मुलाकात की। पिता का कहना है कि उनकी बेटियों का पूरी तरह से ब्रेनवॉश किया गया था। वह अपने धर्म के बारे में बात करना भी पसंद नहीं करती थीं।
इतना ही नहीं दोनों बहनें अपनी परिवार के लोगों पर भी धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाती थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ दिनों पहले ‘ऑपरेशन अस्मिता’ अभियान चलाया था। इसमें एक बड़ा धर्मांतरण गिरोह पकड़ा गया था।
अभियान के तहत छह राज्यों से कुल 10 लोग गिरफ्तार हुए थे। ये सभी आरोपित लव जिहाद के जरिए धर्मांतरण कराते थे। पुलिस के अनुसार गिरोह ISIS जैसे आतंकी संगठन की तरह काम करता था।
कैसे मिली थी आगरा की दो सगी बहनें?
मार्च 2025 में आगरा के सदर बाजार थाने में दो सगी बहनों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। दोनों बहनें अपना फोन भी साथ नहीं ले गई थी और सोशल मीडिया पर अपने असली नामों से एक्टिव नहीं थी, इसलिए पुलिस को भी उनकी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी।
अंत में परिवार से मिली जानकारी के आधार पर साइबर सेल ने कमान सँभाली। इस दौरान उन्हें इंस्टाग्राम पर एक ‘कनेक्टिंग रिवर्ट आईडी’ मिली। इस आईडी से जो भी लोग जुड़े थे उनकी जाँच की गई। पुलिस की एक महिला दारोगा ने फेक नाम बताकर खुद के धर्मांतरण के लिए संपर्क किया।
इस पर उन्हें जवाब भी आता है। जवाब देने वाली एक महिला होती है। कोलकाता को लोकेशन मिलने के बाद वहाँ एसीपी के साथ चार टीमें भेजी गईं। दिल्ली, राजस्थान, गोवा, उत्तराखंड और यूपी के बाकी इलाकों में भी टीमें भेजी गईं, जिनमें चार से पाँच पुलिसकर्मी थे।
एक ही समय पर पुलिस ने सभी 6 राज्यों में छापा मारा। 50 पुलिसकर्मियों ने चार दिन तक हर गतिविधि पर नजर रखा। अंत में दोनों बहनों को भी बरामद कर लिया गया और गिरोह का भी पर्दाफाश हुआ।
घर वापसी करने वाली लड़कियों के माता-पिता ने कहा कि चार साल से बेटियाँ गिरोह के चंगुल में थीं। उन्होंने उनकी वापसी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आगरा पुलिस को धन्यवाद कहा है।
जानकारी के अनुसार, इस मामले में एक और बड़ी सफलता हासिल करते हुए ATS और IB ने दिल्ली के मुस्तफाबाद इलाके से मास्टरमाइंड अब्दुल रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, अब्दुल रहमान को हाल ही में आगरा में सामने आए बड़े पैमाने पर धर्मांतरण रैकेट का मुख्य सूत्रधार माना जा रहा है।
अब्दुल रहमान के घर की तलाशी ली गई थी, तो वहाँ से बड़ी संख्या में किताबें बरामद की गईं, जिनका उद्देश्य हिंदुओं का धर्मांतरण के लिए ब्रेनवॉश करना था।
असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिकों’ का कब्जा है। यह दावा प्रदेश के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने किया है। सीएम ने कहा कि साल 2021 में बीजेपी सरकार आने के बाद जमीन खाली करने का अभियान चलाया गया, लेकिन उनपर इसी रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया गया।
दरअसल, सीएम ने यह बातें सोमवार (21 जुलाई 2025) को दरंग जिले में गोरुखुटी में गोरुखुटी बहुउद्देशीय कृषि परियोजना की चौथी वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कहीं। इस परियोजना को साल 2021 में शुरू किया गया था, जिसके तहत अब तक 77,420 बीघा जमीन को अतिक्रमण से साफ कर दिया गया है। इसमें अधिकतर बंगाल के मुस्लिमों का कब्जा था।
In the last 4 years, we have freed over 42,000 acres of land from encroachers and dedicated it to public use. pic.twitter.com/AaWDKMcNTK
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सीएम सरमा ने कहा, “दरंग जिले में अभियान की सफलता के बाद बोरसोल्ला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बतद्रा, चापर और पैकन में भी इस अभियान को चलाया गया। पिछले 4 वर्षों में हमने 1.29 लाख बीघा कब्जे वाली जमीन को मुक्त कराया है। अब इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा जंगल बनाने के लिए और प्रदेश की जनता के लिए उपयोग में लाया जा रहा है।”
उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई सोचता है कि दो-तीन अभियानों के बाद हम डर जाएंगे, उनकी आँखों में आँखें नहीं डालेंगे और झुक जाएंगे तो वे गलतफहमी में हैं। असम आंदोलन के शहीदों का बदला जरूर लिया जाएगा।” उन्होंने कहा कि 1983 से 1985 के बीच असम आंदोलन के दौरान लोगों में हार की भावना आ गई थी और कई लोगों ने कांग्रेस के आगे ‘समर्पण’ कर दिया था, जिससे प्रदेश में राजनीति की दिशा बदल गई थी।
शंकर-माधव की जगह शंकर-अजान कहने लगे थे
सीएम सरमा ने कहा, किसी समय पर शंकर-माधव की जगह हम शंकर-अजान कहने लगे। अजान पीर अपनी जगह पर रहेंगे, लेकिन माधव (माधवदेव) का भी अपना स्थान है। तभी हमारी ‘जाति’ बच सकती है। श्रीमंत शंकरदेव और श्री श्री माधवदेव असम के पूज्य वैष्णव संत हैं, जबकि अजान पीर एक मुस्लिम सत थे, जो 17वीं सदी में इराक से असम आए थे।
गोलपाड़ा में 1000 बीघा से अधिक जमीन से हटाया अतिक्रमण
असम की हिमंता सरकार प्रदेश की डेमोग्राफी रक्षा के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है। बेदखली अभियान के तहत जगह-जगह अतिक्रमण भूमि को मुक्त कराया गया। 12 जुलाई 2025 को गोलपाड़ा जिले में पैकन रिजर्व फोरेस्ट में बेदखली अभियान चलाया गया था। यहाँ 140 हेक्टेयर (1038 से 1040 बीघा) तक वन भूमि पर अधिकतर बांग्लादेशी मुस्लिमों का अवैध कब्जा था।
गोलपाड़ा के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर तेजस मारिस्वामी ने बताया कि 1,080 परिवारों ने यहाँ घर बना रखे थे। इनमें से ज्यादातर बंगालादेशी मूल के मुसलमान थे, जो पड़ोसी इलाकों या बांग्लादेश से आकर बसे हुए थे। अभियान में 36 बुलडोजर लगाए गए, इलाके को 6 ब्लॉकों में बाँटा गया। करीब 2,500 से 2,700 संरचनाएँ (घर, दुकानें) ढहाई गईं। सुरक्षा के लिए 1,000 से ज्यादा पुलिस और फॉरेस्ट गार्ड तैनात थे।
ममता बनर्जी ने ‘बंगालियों पर अत्याचार’ का लगाया आरोप
हाल ही में असम में घुसपैठियों और अवैध कब्जे हटाने को लेकर सीएम हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के बीच सोशल मीडिया पर वाकयुद्ध छिड़ गया था। ममता दीदी ने कहा था कि असम में बंगाली जनसंख्या को निशाना बनकर हिमंता सरकार उत्पीड़न कर रही है, उन्होंने इसे बीजेपी का विभाजन का एजेंडा बताया था।
इसका जवाब देते हुए सीएम सरमा ने कहा कि असम में बंगालियों से नहीं बल्कि मुस्लिम घुसपैठिए को हटाया जा रहा है। सीएम ने सुप्रीम कोर्ट के बयान का भी जिक्र किया, जिसमें घुसपैठ को बाहरी आक्रमण कहा गया है।