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पूरे देश में ‘बिहार मॉडल’ लागू करेगा चुनाव आयोग, हर एक घुसपैठिया वोटर लिस्ट से होगा बाहर: बोले मुख्य चुनाव आयुक्त- असम-बंगाल में भी 11 दस्तावेजों से होगी जाँच

बिहार में वोटर्स की लिस्ट की जाँच के बाद, अब यही काम पश्चिम बंगाल और असम में होगा। मुख्य चुनाव आयोग यहाँ के मतदाता सूची की लिस्ट को बहुत ध्यान से देखेगा। मुख्य चुनाव आयोग इस अभियान के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई भी गैर-भारतीय मतदाता सूची में शामिल न हो।

यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जब इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी पर पहले से ही राजनीति गरमाई हुई है।

घर-घर जाकर होगी जाँच

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची की यह गहन समीक्षा देश के हर राज्य में की जाएगी। इसमें घर-घर जाकर मतदाताओं की पुष्टि की जाएगी।

बिहार में चुनाव के बाद, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी में यह अभियान चलाया जाएगा, जहाँ 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी राज्यों की मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा पूरी करने की योजना है।

हालाँकि, विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नागरिकता तय करना सरकार का काम है, ना कि चुनाव आयोग का।

विपक्षी दल यह भी तर्क दे रहे हैं कि बिहार में ज्यादातर लोगों के पास आधार या राशन कार्ड जैसे दस्तावेज ही हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने 11 विशिष्ट दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिनमें ये शामिल नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट में भी इस अभियान के खिलाफ याचिकाएँ दाखिल की गई हैं।

क्यों खास हैं बंगाल और असम?

यह अभियान पश्चिम बंगाल और असम में खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी को लेकर लंबे समय से राजनीतिक विवाद रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हो सकते हैं जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।

चुनाव आयोग का यह अभियान घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करने में मदद कर सकता है।

आधार कार्ड और नागरिकता का सवाल

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की समीक्षा के लिए 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, लेकिन इसमें आधार कार्ड, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस शामिल नहीं हैं।

इसका कारण यह है कि ये दस्तावेज पहचान का प्रमाण तो हैं, लेकिन नागरिकता का नहीं।

हालाँकि, फॉर्म 6 (नए वोटर बनने के लिए) में आधार का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे यह सवाल उठता है कि अगर आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो इसे क्यों स्वीकार किया जाता है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि आधार का इस्तेमाल गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल होने का मौका दे सकता है।

आगे की राह

वोटर लिस्ट का गहन रिवीजन जरूरी है ताकि मतदान के लिए पहले से रजिस्टर्ड लोगों की प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सके। भारत जैसे देश में अवैध इमीग्रेशन एक बड़ी समस्या है। इसलिए वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में ढिलाई नहीं बरती जा सकती।

विशेषज्ञों का मानना है कि पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए सिर्फ घोषणा ही नहीं, बल्कि नागरिकता का प्रमाण भी अनिवार्य होना चाहिए।

कोरोना वैक्सीन का हार्ट अटैक से कोई लेना-देना नहीं… रिसर्च में खुलासा, वामपंथी मीडिया ‘द प्रिंट’ ने झूठ फैलाया: मौतों के पैटर्न पर दे रहे थे ज्ञान, फैक्ट चेक में पोल खुली

द प्रिंट ने मंगलवार (8 जुलाई 2025) को रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें दावा किया गया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) और INCLEN इंटरनेशनल मिलकर 45 वर्ष से कम उम्र के लोगों में कोविड-19 महामारी के पश्चात अचानक मौतों में किसी पैटर्न की जाँच कर रहे हैं।

इस खबर में बताया गया कि यह राष्ट्रीय स्तर पर एक सामुदायिक अध्ययन होगा, जिसका उद्देश्य अचानक हो रही मौतों की जानकारी रखना और उनके जोखिम के कारकों के बारे में पता करना था।

द प्रिंट द्वारा प्रकाशित समाचार लेख का स्क्रीनशॉट

हालाँकि, द प्रिंट की यह रिपोर्ट पूरी तरह झूठी निकली। PIB ने सरकार की ओर से जारी की गई जानकारी में इस तरह के किसी भी अध्ययन से इंकार कर दिया। इसमें कहा गया कि ICMR और AIIMS ने विस्तृत रूप से डेटा के आधार पर अध्ययन किया है। इसमें पाया गया है कि कोविड-19 टीकाकरण युवाओं में अचानक मौतों का जोखिम नहीं बढ़ाता बल्कि जोखिम को कम करता है।

जानकारी में ये बात भी शामिल की गई कि हार्ट अटैक और अचानक होने वाली मौतों के असली कारणों में जन्मजात बीमारियाँ, निष्क्रिय जीवनशैली और हृदय-रोग जैसे प्राकृतिक कारक शामिल हैं, न कि कोविड-19 के बचाव में लगाई गई वैक्सीन।

PIB ने द प्रिंट के झूठ को सोशल मीडिया पर भी उजागर किया। उसका खबर को एक्स प्लेटफॉर्म पर साझा कर PIB ने खबर को भ्रामक कहा है।

PIB ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “@ThePrintIndia की खबर में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार ने देशभर में अचानक हो रही मौतों के पैटर्न का आकलन करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन शुरू किया है, लेकिन यह दावा गलत है। न तो केंद्र सरकार और न ही @DeptHealthRes (DHR) ने ऐसा कोई सर्वे शुरू किया है।”

अचानक हुई मौतों को कोविड वैक्सीन से जोड़ने का दावा

कोरोना महामारी आने के बाद उसके बचाव में टीकाकरण अभियान चलाया गया। हालाँकि इसके बाद कुछ वर्षों से सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि दिल के दौरे से होने वाली अचानक मौतें कोविड-19 वैक्सीन की वजह से हो रही हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने हाल ही में ऐसे सभी दावों को गलत बताया है।

सरकार ने यह बात ICMR और AIIMS द्वारा किए गए दो बड़े अध्ययनों के आधार पर कही है। इन अध्ययनों में साफ तौर पर पाया गया कि कोविड-19 टीके और दिल के दौरे से होने वाली अचानक मौतों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।

इसके अलावा ICMR और NCDC (राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र) द्वारा किए गए अध्ययन में यह भी साबित हुआ कि भारत में कोविड-19 के टीके सुरक्षित और असरदार हैं। गंभीर साइड इफेक्ट्स के मामले बहुत ही कम हैं।

ICMR और NCDC ने 18 से 45 साल की उम्र के लोगों में अचानक होने वाली मौतों को समझने के लिए 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 47 बड़े अस्पतालों में एक अध्ययन किया।

इसके साथ ही AIIMS ने ICMR के सहयोग से एक और अध्ययन किया जिसमें पाया गया कि अचानक दिल से जुड़ी मौतों के पीछे जेनेटिक कारण है, साथ ही पहले से मौजूद बीमारियाँ और खराब जीवनशैली जैसे कारण भी हैं, न कि कोविड-19 वैक्सीन। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन को इन मौतों से जोड़ना गलत और भ्रामक है।

प्रोपेगेंडा को फैलाकर भले ही द प्रिंट ने अपनी खबर को बेचने की कोशिश की हो लेकिन वह गलत साबित हो गया। हालाँकि इन भ्रामक खबरों से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों का होता है क्योंकि वे इस तरह की खबरों पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं।

अमित शाह का रिटायरमेंट प्लान! इस साहस के पीछे छिपा है 1986 हरिद्वार कुंभ मेले वाला इतिहास, स्वामी वामदेव के चरण दबाकर सीखी सनातन की बारीकियाँ

22 अक्टूबर, 2025 को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह 61 वर्ष के हो जाएँगे। सरकारी नौकरियों में ये भले ही रिटायरमेंट की उम्र हो, राजनीति में व्यक्ति इस उम्र के बाद और सक्रिय दिखने लगता है। 75 वर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्राएँ करते हैं, रैलियाँ करते हैं, सरकार व पार्टी की बैठकों में हिस्सा लेते हैं और रणनीतियाँ बनाते हैं। ऐसे में कोई नेता अगर रिटायरमेंट की बात करे तो लोगों का चौंक जाना स्वभाविक है।

हालाँकि, जब अमित शाह रिटायरमेंट की बात करते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। दूर की रणनीतियाँ बनाने वाले और हर क़दम गणना करके रखने वाले अमित शाह ने ज़रूर सोच रखा होगा कि किस उम्र व किन परिस्थितियों में उन्हें रिटायर होना है। राजनीति में रिटायरमेंट जैसा कुछ नहीं होता, फिर भी अमित शाह अगर इसका जिक्र करने का साहस करते हैं तो ये बताता है कि क्यों अमित शाह, अमित शाह हैं। आइए, जानते हैं पूरा माजरा क्या है।

क्या है अमित शाह का रिटायरमेंट प्लान?

असल में गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान की महिलाओं और सहकारी कार्यकर्ताओं के साथ अमित शाह ने ‘सहकार संवाद’ आयोजित किया था। जुलाई 2021 में ही नए सहकारिता मंत्रालय का गठन किया गया था। इससे पहले सहकारिता के क्षेत्र में राजनीतिक परिवारों का दबदबा हुआ करता था, जिसे तमाम सुधारों के जरिए अमित शाह ठीक करने की कोशिश में जुटे हैं। अमित शाह ने महिलाओं के साथ संवाद करते हुए कहा कि रिटायरमेंट के बाद वो वेद-उपनिषद का अध्ययन करेंगे और प्राकृतिक खेती करेंगे।

उन्होंने कहा, “मैंने तो तय किया है कि मैं जब भी रिटायर हो जाऊँगा, मैं बाक़ी का जीवन वेद, उपनिषद और प्राकृतिक खेती के लिए ख़र्च करूँगा। ये प्राकृतिक खेती एक वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसके कई फायदे हैं। फर्टिलाइजर वाला गेहूँ खाने से कैंसर होता है, रक्तचाप और डायबिटीज बढ़ता है, थायराइड की समस्या आती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बगैर फर्टिलाइजर वाला भोजन करना, मतलब दवाइयों की ज़रूरत नहीं। मैंने मेरे खेत पर प्राकृतिक खेती आजमाई, जिससे उत्पादन डेढ़ गुना बढ़ गया।”

अक्सर हमारे देश की समस्या ये रही है कि यहाँ विदेश से पढ़कर आने वालों को ही नीतिज्ञ माना गया। भारत के सनातन साहित्य को लेकर हमें हीनभावना से ही ग्रसित रखा गया। ऐसे में वेद-उपनिषद की बात करने वाले अमित शाह के बारे में एक नई बात जान लीजिए। उनकी बात को मजाक में मत लीजिए। 1980 के दशक में वेदांत के विद्वान वामदेव के पाँव दबाकर अमित शाह ने धर्म-दर्शन की बारीकियाँ सीखी हैं। ऋषि सेवा का ही फल है उनकी सफलता!

कुशल राजनेता व रणनीतिकार के पीछे छिपा है वेदांत का अध्येता

अब तक आपने अमित शाह को राजनीति करते, चुनाव जीतते, अनुच्छेद-370 हटाने और CAA लाने जैसे ऐतिहासिक फ़ैसले लेते हुए देखा होगा। भारत में नक्सलवाद के अंत का पूरा श्रेय भी उन्हें ही जाने वाला है। अब तक आपने अमित शाह को संगठन के पेंच कसते, देशभर में घूम-घूमकर मंडल कार्यकर्ताओं से लेकर मुख्यमंत्रियों तक की बैठक लेते और रैलियों में गरजते देखा होगा। लेकिन, रणनीतिकार व दूरदृष्टा अमित शाह के पीछे एक वेदांत दर्शन का अध्येता छिपा हुआ है!

उन्होंने कई दिनों तक वामदेव की सेवा की। वो वामदेव नामक ब्राह्मण ही थे जिन्होंने उन्हें महाकुंभ में हिस्सा लेने के लिए कहा था और अमित शाह ने ऐसा किया भी। इसके पीछे ऋषि का उद्देश्य यह था कि अमित शाह अधिक से अधिक संख्या में साधु-संतों से संवाद करके भारतीय धर्म-दर्शन को सीखें, जानें, समझें। यही हुआ भी! अमित शाह गुरु की बात मानकर कुंभ में शामिल हुए।

एक रोचक बात जानिए अब। प्रत्येक सुबह वामदेव अपने शिष्य को एक हस्तलिखित पर्ची देते थे। उस पर्ची को रोज़ अलग-अलग संतों के पास लेकर जाना होता था। उसमें अमित शाह के लिए सिफ़ारिश होती थी। इस तरह अमित शाह रोज़ किसी न किसी नए संत के साथ समय व्यतीत करते थे, भंडारे में खाते और दक्षिणा इकट्ठा किया करते थे। अमित शाह पैरवी लगाते थे, लेकिन किसी पद या किसी वित्तीय फ़ायदे के लिए नहीं — ज्ञान के लिए, सनातन धर्म को समझने के लिए।

और हाँ, क्या आपको पता है वो दक्षिणा के पैसे का क्या करते थे? उन्होंने उन सिक्कों को जमा करके एक साइकल ली। उस साइकल से वो कुंभ में घूमते थे, सनातन के हर रूप का अवलोकन करते थे। हरिद्वार में 1986 में आयोजित हुए कुंभ में यूँ तो 2 लाख श्रद्धालु थे, लेकिन उनमें एक 21 साल का वो युवक भी था जो आगे चलकर इस देश के इतिहास को बदलने के क्रम का हिस्सा बनने वाला था। 21 साल का वो लड़का, जो स्वामी वामदेव के शिविर में रहकर संतों-महंतों से सीख रहा था।

विजयराजे सिंधिया को तो जानते होंगे आप? वही, ग्वालियर की राजमाता। ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी। एक दिन उनके शिविर से अमित शाह को 10 रुपए मिले। जानते हैं उन रुपयों का क्या हुआ? उस रुपए से अमित शाह स्वामी वामदेव के लिए एक हार ख़रीदकर ले गए। एक शिष्य ने अपने गुरु के प्रति इस निष्ठा और समर्पण का प्रदर्शन किया है, तभी आज वो देश का दूसरा सबसे शक्तिशाली नेता है।

सनातन साहित्य से आता है बड़े फ़ैसले लेने का साहस

चाणक्य, शंकराचार्य और सावरकर — ये 3 हस्तियाँ आज अमित शाह की विचारधारा को प्रभावित करती हैं। यही वो अध्ययन है जो उन्हें बड़े फ़ैसले लेने का साहस देता है, रणनीति देता है। 2014 में जो रणनीतिकार था, वो 2019 आते-आते जननेता बन गया और 250 रैलियों के जरिए भाजपा की जीत सुनिश्चित की। 2024 लोकसभा चुनाव में भी 188 रैलियाँ करके अमित शाह ने अपना लोहा मनवाया।

इन सबके दौरान स्वामी वामदेव को मत भूलिए। वही तो थे, जिनके साथ ने एक युवक का जीवन बदलकर उसे अमित शाह बना दिया। वामदेव, जो महंत अवैद्यनाथ और परमहंस रामचन्द्रदास के साथ राम मंदिर के आंदोलन में सक्रियता से शामिल थे।

स्वामी वामदेव, जिनके मार्गदर्शन ने बदल दिया युवा अमित शाह का जीवन

1997 में वामदेव 75 वर्ष की आयु में अपना भौतिक शरीर छोड़ गए, लेकिन अपने शिष्य को नए भारत का निर्माण करने के लिए स्थापित करके गए। एक संयोग देखिए कि जिस वर्ष वामदेव का निधन होता है उसी वर्ष अमित शाह पहली बार विधायक बनते हैं। शायद अमित शाह के इसी अनुभव व अध्ययन का परिणाम है कि आज भारत में वो बड़े से बड़े फ़ैसले यूँ ही हो जाते हैं, जिनके बारे में कभी सोचना भी अपराध माना जाता था। ये फ़ैसले पूरी क़ानूनी तैयारी के साथ होते हैं, इनके कार्यान्वयन का फल भी दिखाई देता है। अब UCC (समान नागरिक संहिता) की बारी है।

भारतीय UPI तकनीक अपनाने वाला पहला देश बना नामीबिया, किया ₹6680+ करोड़ का व्यापार: PM मोदी बोले- हमारी दोस्ती समय की कसौटी पर खरी, मिला 27वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (9 जुलाई 2025) को नामीबिया पहुँचे। यहाँ उन्हें नामीबिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द मोस्ट वेल्वित्विया मिराबिलिस’ से सम्मानित किया गया। नामीबिया में 27 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने दौरा किया है। पीएम अपनी पाँच देशों को यात्रा पूरी कर फिलहाल दिल्ली पहुँच चुके हैं।

2014 में प्रधानमंत्री बनने से लेकर अब तक पीएम नरेंद्र मोदी का यह 27वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। अपनी आधिकारिक यात्रा के आखिरी चरण में नामीबिया पहुँचे पीएम मोदी ने नामीबिया की संसद को भी संबोधित किया।

पीएम मोदी ने कहा “यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं इस लोकतंत्र के मंदिर में बोल रहा हूँ। मैं भारत की 140 करोड़ जनता की ओर से शुभकामनाएँ और स्नेह लेकर आया हूँ।”

उन्होंने कहा “भारत और नामीबिया दोनों ने औपनिवेशिक शासकों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। आज हम समानता, स्वतंत्रता और न्याय के मार्ग पर साथ चल रहे हैं।”

नामीबिया की राष्ट्रपति डॉ. नेटुम्बो नंदी-नदैतवाह ने पीएम मोदी को राजधानी विंडहोक स्थित स्टेट हाउस में यह सम्मान दिया। पीएम ने अपने संबोधन में कहा “मैं सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेते हुए बहुत गर्व महसूस कर रहा हूँ। नामीबिया के मजबूत और सुंदर पौधों की तरह हमारी दोस्ती समय की कसौटी पर खरी उतरी है। यहाँ के राष्ट्रीय पौधे वेल्वित्शिया मिराबिलिस की तरह यह समय और उम्र के साथ और भी मजबूत होगी।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2 जुलाई से शुरू हुई आधिकारिक यात्रा 10 जुलाई तक 5 देशों- घाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील और नामीबिया का दौरे के साथ समाप्त हुई। इस यात्रा में उन्हें पिछले 7 दिनों में 4 देशों ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के संविधान का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ महीने पहले नामीबिया ने अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुनी। हम आपके गर्व और खुशी को समझते हैं, क्योंकि भारत में हम भी राष्ट्रपति को गर्व से मैडम प्रेसिडेंट कहते हैं। यह भारत के संविधान की शक्ति है कि एक गरीब आदिवासी परिवार की बेटी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रपति है।”

प्रधानमंत्री ने नामीबिया और भारत के व्यापार के मुद्दे को लेकर कहा “भारत कैंसर के इलाज के लिए नामीबिया को भाभाट्रॉन रेडियोथेरेपी मशीन देने के लिए तैयार है। भारत में विकसित इस मशीन का उपयोग 15 देशों में किया जा चुका है। इसने विभिन्न देशों में लगभग पाँच लाख गंभीर कैंसर रोगियों की मदद की है। हम नामीबिया को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं तक पहुँच के लिए जन औषधि कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भी आमंत्रित करते हैं”।

इसके साथ ही पीएम ने कहा “नामीबिया भारत की UPI तकनीक अपनाने वाला पहला देश बन गया है। हमारा द्विपक्षीय व्यापार 80 करोड़ डॉलर (6,680 करोड़ रुपए) को पार कर गया है। लेकिन क्रिकेट के मैदान की तरह, हम अभी तैयारी कर रहे हैं। हम तेजी से और ज्यादा रन बनाएँगे।”

बता दें कि नामीबिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह पहली और किसी भारतीय प्रधानमंत्री की तीसरी यात्रा है। आज से 27 साल पहले 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नामीबिया गए थे। वहीं उनसे पहले 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ नामीबिया के पहले स्वतंत्रता दिवस पर वहाँ पहुँचे थे।

अमेरिका ने ब्राजील पर ठोका 50% का टैरिफ, राष्ट्रपति लूला बोले-अब हम भी लेंगे बदला: अल्जीरिया, इराक, लीबिया पर भी 30% का भार; ट्रंप मानते हैं BRICS को यूएस के लिए नुकसान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में व्यापार असंतुलन को ठीक करने के नाम पर कई देशों पर नए और भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की घोषणा की है। इन फैसलों से ग्लोबल ट्रेड में तनाव बढ़ने की आशंका है।

नए टैरिफ की घोषणा और प्रभावित देश

ब्राजील पर सबसे ज्यादा असर- ट्रंप ने बुधवार (9 जुलाई 2025) को ब्राजील से आयात होने वाले सामानों पर 50% का भारी टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसे लेकर एक पत्र साझा किया।

ट्रंप ने इस कदम को ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो पर चल रहे मुकदमे का बदला भी बताया, जिसे उन्होंने ‘अंतर्राष्ट्रीय शर्मिंदगी’ और ‘विच हंट‘ करार दिया। यह नया चार्ज 1 अगस्त 2025 से लागू होगा।

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने भी टैरिफ पर अपना जवाब दिया है। राष्ट्रपति ने कहा कि यदि राष्ट्रपति ट्रम्प 50% टैरिफ लगाते हैं तो वे इसका जवाब देने के लिए तैयार हैं।

अन्य 7 देशों पर टैरिफ– ब्राजील के अलावा, बुधवार (9 जुलाई 2025) को 7 और देशों, जिसमें अल्जीरिया, ब्रुनेई, इराक, लीबिया, मोल्दोवा, फिलीपींस और श्रीलंका पर नए टैरिफ लगाने की घोषणा की गई।

अल्जीरिया, इराक, लीबिया और श्रीलंका पर 30% टैरिफ, ब्रुनेई और मोल्दोवा पर 25% टैरिफ और फिलीपींस पर 20% टैरिफ लगाने की घोषणा की गई है। ये सभी टैरिफ भी 1 अगस्त 2025 से ही लागू होंगे।

पहले के टैरिफ

सोमवार (7 जुलाई 2025) को ट्रंप ने दक्षिण कोरिया और जापान सहित 14 अन्य देशों पर भी टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। इन देशों में म्यांमार, लाओस, दक्षिण अफ्रीका, कजाकिस्तान, मलेशिया, ट्यूनीशिया, इंडोनेशिया, बोस्निया और हर्जेगोविना, बांग्लादेश, सर्बिया, कंबोडिया और थाईलैंड शामिल हैं।

कुछ देशों पर 25% चार्ज लगाया गया, जबकि कुछ को 30% से 40% तक का भारी चार्ज देना पड़ सकता है।

ट्रंप का तर्क और BRICS देश

व्यापार असंतुलन- ट्रंप का मानना है कि यह टैरिफ कई सालों से चला आ रहा है। इसमें अमेरिका तो दूसरे देशों से बहुत सारा सामान खरीदता है, लेकिन दूसरे देश अमेरिका से उतना सामान नहीं खरीदते। इसलिए ट्रंप ने इसे ‘व्यापार असंतुलन’ बताते हुए ठीक करने के लिए कहा है।

BRICS देश भी निशाने पर- ट्रंप ने BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) समझौता पर भी हमला बोला। ट्रंप ने दावा किया कि BRICS अमेरिका को नुकसान पहुँचाने के लिए बनाया गया है।

ट्रंप ने मंगलवार (8 जुलाई 2025) को घोषणा की कि BRICS देशों पर भी जल्द ही 10% का टैरिफ लगाया जाएगा। इसमें भारत भी शामिल है। ट्रंप का मानना है कि BRICS देश डॉलर को विश्व की स्टैंडर्ड करेंसी के रूप में कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

व्यापार समझौते और चेतावनी

अमेरिका में प्रोडक्शन को बढ़ावा- ट्रंप ने इंटरनेशनल मैन्युफैक्चरर को यह भी भरोसा दिया कि यदि वे अपनी प्रोडक्शन यूनिट्स को अमेरिका में ट्रांसफर्ड करते हैं तो उन्हें नए टैरिफ से छूट मिलेगी।

जवाबी कार्रवाई की चेतावनी- ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि कोई देश इन टैरिफ के जवाब में जवाबी कार्रवाई करता है तो वाशिंगटन के जरिए और टैरिफ बढ़ाए जाएँगे।

भारत के साथ व्यापार समझौता- ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार समझौते की संभावना पर भी बात की। यह समझौता इस महीने (जुलाई 2025) या उनकी भारत यात्रा के दौरान हो सकता है।

इसका लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाना है। हालाँकि, इसमें कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल नहीं होंगे।

ट्रंप के इन फैसलों से वैश्विक व्यापार संबंधों में काफी उथल-पुथल मचने की संभावना है, क्योंकि 1 अगस्त 2025 से ये टैरिफ लागू होंगे।

BRICS में घुसने का तुर्की का सपना भारत-चीन ने तोड़ा, ‘खलीफा’ बनने के सपने हुए चूर: पाकिस्तान से गलबहियाँ-उइगर का समर्थन बना कारण

विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाओं के समूह BRICS (ब्रिक्स) की 2025 की शिखर बैठक 6-7 जुलाई को ब्राजील के रियो डी जनेरियो शहर में आयोजित हुई। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ नए शामिल हुए सदस्य देशों ने भी हिस्सा लिया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस बैठक में शामिल हुए।

इस बार की बैठक में जहाँ आंतकवाद समेत तमाम मुद्दों पर बात हुई, वहीं तुर्की की सदस्यता पर फैसला नहीं हो पाया। तुर्की ने पिछले साल BRICS का सदस्य बनने के लिए आधिकारिक रूप से आवेदन किया था। हालाँकि, उस समय उसे केवल ‘पार्टनर देश’ का दर्जा दिया गया था। इसे सदस्य बनने की दिशा में पहला कदम माना जाता है।

उम्मीद की जा रही थी कि 2025 की शिखर बैठक में तुर्की को पूर्ण सदस्य का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। लेकिन इस आवेदन पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया और उसकी हैसियत बस पार्टनर देश तक ही सीमित रखी गई। इसका मतलब है कि तुर्की को अभी और इंतजार करना होगा। हालाँकि, इस बार तुर्की की सदस्यता पर चर्चा हुई है।

बताया गया कि तुर्की के सदस्य ना बन पाने के पीछे भारत और चीन थे। तुर्की को BRICS सदस्य बनाने के पक्ष में वर्तमान में भारत और चीन नहीं है। दोनों देशों की आपत्तियाँ अलग-अलग हैं। चीन तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके आपसी रिश्तों में कुछ मतभेद मौजूद हैं।

BRICS का विस्तार धीरे-धीरे हो रहा है, और नए सदस्य जोड़ने से पहले सभी मौजूदा सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। चीन और भारत BRICS के संस्थापक सदस्य हैं। यदि वह सहमत नहीं होते तो तुर्की को कभी भी इसकी सदस्यता नहीं मिल सकती।

भारत ने तुर्की के BRICS में आने पर क्यों लगाया वीटो?

भारत और तुर्की के रिश्ते हालिया सालों में कोई विशेष अच्छे नहीं रहे हैं। भारत, तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध इसीलिए कर रहा है क्योंकि वह लगातर पाकिस्तान के पक्ष में खडा खड़ा रहा है। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था।

तुर्की ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा भी नहीं की थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी मंत्री शाहबाज शरीफ और आर्दोआन की मुलाक़ात भी हुई थी, जहाँ दोनों ने एक दूसरे के लिए काफी मीठी मीठी बातें की थी। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्की ने पाकिस्तान को मजबूत किया था।

पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के खिलाफ जो ड्रोन इस्तेमाल किए थे, वह तुर्की के ही थे। इसने भारत के लिए सुरक्षा खतरे भी खड़े किए थे। इसके अलावा कश्मीर मुद्दे पर भी तुर्की हमेशा पाकिस्तान के ही पक्ष में खड़ा रहा है। राष्ट्रपति एर्दोआन ने कई बार भारत के खिलाफ बयान दिए हैं।

भारत ने न केवल तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध किया है, बल्कि देश में तुर्की कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम भी उठाए हैं, जैसे एयरपोर्ट सेवाएं देने वाली तुर्की की कंपनी के सुरक्षा मंजूरी को रद्द कर दिया। वही भारत में तुर्की के सामानों का बहिष्कार भी किया जा रहा है।

चीन क्यों कर रहा है विरोध?

BRICS में तुर्की की एंट्री पर भारत के अलावा दूसरा वीटो चीन का रहा। दरअसल, चीन से तुर्की का दूसरा विवाद है तुर्की में उइगर मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है और तुर्की सरकार ने कई बार चीन के शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगरों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई है।

तुर्की ने सार्वजनिक रूप से चीन द्वारा उइगरों के साथ किए जा रहे कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है। इससे चीन को यह लगता है कि तुर्की उसकी आंतरिक नीतियों में हस्तक्षेप कर रहा है। चीन यह भी मानता है कि तुर्की उइगर अलगाववादियों को समर्थन देता है, जो उसकी एकता और सुरक्षा के लिए खतरा है।

तुर्की ने 2019 और 2021 में संयुक्त राष्ट्र मंच पर भी चीन की नीतियों की आलोचना की थी और उइगरों के अधिकारों की रक्षा की माँग की थी। तुर्की के कुछ मीडिया चैनल और राजनीतिक नेता चीन की नीतियों को ‘नस्लीय दमन’ तक कह चुके हैं। इसके साथ ही, तुर्की ने कई बार उइगर प्रवासियों को अपने देश में शरण भी दी है।

इस रुख से चीन लगातार तुर्की के खिलाफ रहा है और उसे अपने साथ मंच साझा नहीं करने देना चाहता है। इसके अलावा, तुर्की सैन्य गठबंधन NATO का हिस्सा है जो अमेरिकी अगुवाई वाला है। चीन यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई NATO सदस्य उसके बराबर शक्ति किसी संगठन में पाए।

तुर्की क्यों बनना चाहता है BRICS का हिस्सा?

अब यहाँ सवाल उठते हैं कि तुर्की BRICS का हिस्सा बनना ही क्यों चाहता है। तुर्की स्वयं NATO का सदस्य है और उसके संबंध यूरोप तथा अमेरिका से अधिक हैं। जबकि BRICS को मोटे तौर पर अमेरिकी अगुवाई वाले G-7 के विकल्प के तौर पर देखा जाता है।

दरअसल, इसके पीछे तुर्की और और उसके नेता आर्दोआन की ग्लोबल महत्वाकांक्षा है। तुर्की वैश्विक स्तर पर बड़ा नेता बनना चाहता है। इसलिए वह हर उस संगठन में शामिल होना चाहता है, जो वैश्विक राजनीतिक पर असर डालता हो। इसके अलावा BRICS कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, जिससे अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचे।

ऐसे में NATO का सदस्य होने के बावजूद वह BRICS में घुसना चाहता है। इसके अलावा एक कारण और है। दरअसल, BRICS में सऊदी अरब भी सदस्य बनने के रास्ते में है। सऊदी अरब इस्लामी नेता माना जाता है और तुर्की उससे यह तमगा लेना चाहता है। ऐसे में वह भी यहाँ आना चाहता है। हालाँकि, जब तक वह भारत और चीन से अपने रिश्ते ठीक नहीं करता, उसकी BRICS सदस्यता की इच्छा पूरी नहीं होने वाली।

किशनगंज में 1 महीने में आते थे 25 हजार आवेदन, अब 1 सप्ताह में ही आए 1.27 लाख: क्या घुसपैठियों को बचाने के लिए बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का विरोध कर रही RJD-कॉन्ग्रेस

बिहार में आगामी 4-5 महीनों में चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले चुनाव आयोग तैयारियों में लगा हुआ है। चुनाव आयोग इसी कड़ी में वोटर लिस्ट का निरीक्षण कर रहा है। सभी मतदाताओं से कागज माँगे जा रहे हैं ताकि उनका नाम वोटर लिस्ट में फिर से शामिल किया जा सके। जैसे ही यह प्रक्रिया चालू हुई है, बिहार के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज में निवास प्रमाण पत्र के लिए आवेदन की संख्या 5-6 गुना बढ़ गई है। किशनगंज में इस बढ़त ने जिले में घुसपैठ और डेमोग्राफी चेंज के सवाल दोबारा खड़े कर दिए हैं।

किशनगंज में 5 गुना बढ़े निवास प्रमाण पत्र के आवेदन: डिप्टी CM सम्राट चौधरी

बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया है कि 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से लेकर 28 हजार आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए किशनगंज में आ रहे थे। उन्होंने बताया कि जैसे ही चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया चालू हुई यह संख्या तेजी से बढ़ गई।

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन किशनगंज में आ गए। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि किशनगंज में घुसपैठिए बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

सम्राट चौधरी ने यह भी बताया कि पैन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों में समय और प्रमाण लगते हैं जबकि निवास प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा है। उनका यह बयान अब वायरल हो रहा है।

उनकी यह चिंताएँ जायज भी हैं क्योंकि किशनगंज बिहार का अकेला ऐसा जिला है जहाँ मुस्लिम आबादी 60% से अधिक है और यहाँ डेमोग्राफी बदलाव तेजी से हुआ है। किशनगंज में घुसपैठ भी बड़े स्तर पर हुई है।

क्यों जायज हैं सम्राट चौधरी की चिंताएँ?

घुसपैठियों और आवेदन में एक दम तेजी आने की बात अकारण ही सम्राट चौधरी नहीं कर रहे। इसके पीछे किशनगंज का इतिहास है। किशनगंज बिहार का अकेला ऐसा जिला है जहाँ लगभग 70% आबादी मुस्लिम है। यह बात कागजों में दर्ज है।

देश की आजादी के समय किशनगंज हिन्दू बहुल इलाका था। लेकिन बीते कुछ दशकों में यहाँ की डेमोग्राफी काफी तेजी से बदली है। अब यहाँ हिन्दू अब एक तिहाई भी नहीं रह गए हैं। यहाँ हिन्दू बीते कुछ दशक में अल्पसंख्यक हो चुके हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह घुसपैठ मानी जाती है।

यह जिला पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा हुआ है। यहाँ से लगातार बांग्लादेशी घुसपैठिए और रोहिंग्या गिरफ्तार हुए हैं। बीते माह ही यहाँ 9 बांग्लादेशी धराए थे। यहाँ अलग-अलग मौकों पर यह घुसपैठिए पकड़े जाते रहे हैं। इसी किशनगंज की सीमा नेपाल से सटी हुई है।

किशनगंज में ही फर्जी आधार और पैन जैसे दस्तावेज बनाने वाले पकड़े गए हैं। यानी यहाँ बांग्लादेशी और रोहिंग्या को मदद करने वाले भी मौजूद हैं। इसके अलावा, यहाँ बड़ी संख्या में बंगाली बोलने वाले हैं जो इन घुसपैठियों को आम जनसंख्या में मिलने का मौक़ा देता है।

इस जिले की जनसंख्या वृद्धि रफ़्तार देश के भीतर सबस तेज रही है। इस जिले में 2001 से 2011 के बीच 3% की दर से आबादी बढ़ी है जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यही नहीं, किशनगंज में लगातार बच्चे भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा तेजी से पैदा हो रहे हैं।

किशनगंज में TFR राष्ट्रीय औसत से 2.5 गुनी है। रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, किशनगंज का TFR लगभग 4.9 है जबकि पूरे देश का यह औसत 2.0 रहा है। कोई 15-49 वर्ष की महिला जितने बच्चों को इन वर्षों के दौरान जन्म देती है, वह उसका TFR कहा जाता है।

यदि किसी देश का औसत TFR 2.1 हो तो जनसंख्या बराबर बनी रहती है जबकि इससे कम होने पर जनसंख्या घटती है। पूरे देश में अब जनसंख्या घट रही है जबकि किशनगंज में दुगनी तेजी से बढ़ रही है।

16% बढ़ी सीमांचल में मुस्लिम आबादी

किशनगंज बिहार के सीमांचल क्षेत्र का हिस्सा है। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच देश की कुल आबादी में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 4% बढ़ा लेकिन इन सीमांचल के जिलों में यह हिस्सा 16% बढ़ा है और यह सभी जिलों का औसत है। किशनगंज ही नहीं बल्कि इससे सटे पूर्णिया, खगड़िया, अररिया और कटिहार जैसे जिलों में असामान्य तरीके से मुस्लिमों की आबादी बढ़ी है। इसका असर सामाजिक ढाँचे पर भी दिखा है।

CAA-NRC का भी किशनगंज में हुआ था खूब विरोध

किशनगंज में CAA-NRC का भी खूब विरोध हुआ था। तब भी देश भर में कागज नहीं दिखाने के प्रोपेगेंडा को हवा दी गई थी। गौरतलब है कि इस बार भी चुनाव आयोग सत्यापन के लिए कुछ दस्तावेज माँग रहा है। राजद और कॉन्ग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियाँ इस मामले में फिर मुस्लिमों को भड़काने में जुटी हुई हैं। चुनाव आयोग की प्रक्रिया को CAA-NRC का नाम दिया जा रहा है। 9 जुलाई को इस मामले में बिहार बंद तक करवाया गया।

चीन ने दुनिया भर में राफेल को बदनाम करने के लिए काम पर लगाए थे अपने राजदूत, लेकिन भारत में पहले ही राहुल गाँधी-वामपंथी मीडिया ने नहीं छोड़ी थी कोई कसर: जानिए कैसे चलता रहा प्रोपेगेंडा

फ्रांस की खुफिया एजेंसियों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। फ्रांस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने दुनिया भर में राफेल को लेकर भ्रामक खबरें फैलाईं ताकि डसॉल्ट एविएशन के राफेल लड़ाकू विमानों की छवि को नुकसान पहुँचाया जा सके।

यह सब मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद शुरू हुआ। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने राफेल का सफलतापूर्वक उपयोग किया था। इसके बाद राफेल की विश्वसनीयता और माँग में तेजी आने की संभावना थी।

फ्रांस का कहना है कि चीन ने अपने राजनयिक दूतावासों और रक्षा अधिकारियों के जरिए यह अभियान चलाया। इसका मकसद एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को राफेल खरीदने या पहले से किए गए सौदों को रद्द करने के लिए भ्रमित करना था।

उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया, जिसने पहले ही राफेल की खरीद के लिए समझौता किया था, उस पर दबाव डाला गया कि वह फ्रांसीसी जेट्स की बजाय चीन के बनाए विमानों को खरीदे।

वहीं पाकिस्तान ने भी चीन के साथ मिलकर यह प्रचार किया कि ऑपरेशन सिंदूर में राफेल विमानों को भारी नुकसान हुआ, जबकि भारत ने इसकी कोई पुष्टि नहीं की है। दरअसल, ये एक चाल थी, जिससे पाकिस्तान अपनी नाकामी को छुपा सके और चीन अपनी रक्षा प्रणाली की विफलता से ध्यान भटका सके।

जहाँ एक तरफ चीन यह अभियान विदेशी दूतावासों के जरिए चला रहा था, दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दल और वामपंथी मीडिया भी लंबे समय से राफेल के खिलाफ इसी तरह की बातें फैलाते आ रहे हैं। इसके पीछे केवल एक ही उद्देश्य रहा, वह था राफेल की विश्वसनीयता पर शक पैदा करना, चीन के सैन्य सामान को बढ़ावा देना और भारत की सैन्य ताकत को कमजोर दिखाना।

विपक्ष और वामपंथी मीडिया ने चलाया राफेल विरोधी अभियान

आज जब चीन राफेल लड़ाकू विमानों के खिलाफ दुनिया भर में दुष्प्रचार कर रहा है, तब ये भी याद रखना जरूरी है कि भारत में भी कॉन्ग्रेस पार्टी और वामपंथी मीडिया पहले ही इंडो-फ्रेंच राफेल सौदे को बदनाम करने की कोशिश कर चुके हैं।

भारत ने 2020 में फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदे थे। यह सौदा भारतीय वायुसेना के लिए बेहद अहम साबित हुआ। इससे भारत को न सिर्फ अपनी हवाई ताकत बढ़ाने में मदद मिली, बल्कि पाकिस्तान के F-16 जेट्स पर बढ़त भी मिली।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में भारत के राफेल विमानों ने पाकिस्तानी सीमा से 100 किलोमीटर अंदर बहावलपुर को निशाना बनाया। ये हमले SCALP मिसाइलों से किए गए और खास बात ये रही कि हमला करने के लिए इन्हें पाकिस्तानी सीमा में घुसने की जरूरत भी नहीं पड़ी।

इस सौदे को लेकर 2018 में एक बड़ा राजनीतिक विवाद तब खड़ा हुआ जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि मोदी सरकार ने डसॉल्ट एविएशन को रिलायंस डिफेंस के साथ साझेदारी करने के लिए कहा था। असल में भारत की रक्षा खरीद नीति के तहत विदेशी कंपनियों को सौदे के कम से कम 30% मूल्य का निवेश भारत में करना होता है, जिसे ‘ऑफसेट पॉलिसी’ कहा जाता है।

इस बयान को आधार बनाकर कॉन्ग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाए कि उन्होंने कारोबारी अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाने के लिए सौदे में हस्तक्षेप किया और इसे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (अपने खास और करीबी उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाना) बताया।

बीजेपी सरकार ने शुरू से इन आरोपों को खारिज किया। बीजेपी ने हमेशा ये स्पष्ट किया कि यह सौदा वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हुआ था।

2019 के लोकसभा चुनावों में राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को एक बड़ा चुनावी हथियार बनाया और राफेल सौदे को ‘घोटाला’ बताया। हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी को फटकार लगाई और कहा गया कि उन्होंने कोर्ट के नाम का गलत इस्तेमाल किया और राजनीतिक लाभ के लिए झूठ फैलाया।

रायबरेली से लोकसभा सांसद राहुल गाँधी ने एक बार प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए नारा दिया था ‘चौकीदार चोर है’। उन्होंने यह बात राफेल सौदे को लेकर कही थी और दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी की है।

हालाँकि ये बयान सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत तरीके से पेश करने के चलते विवाद में आ गया। इसके खिलाफ पूर्व केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका भी दायर की। राहुल गाँधी ने एक सुनवाई में इसके लिए माफी भी माँग ली थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनके हलफनामे से संतुष्ट नहीं था, इसलिए उनसे लिखित माफी माँगी गई।

इस मामले में आप सांसद संजय सिंह, TMC नेता यशवंत सिन्हा और अन्य नेताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राफेल डील की खरीद फरोख्त की प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप लगाया और न्यायालय की निगरानी में जाँच की माँग की। 14 दिसंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह माँग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि ऑफसेट पार्टनर के चयन में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई।

इसके बावजूद कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार और क्रोनी कैपिटलिज्म के आरोप लगाते हुए बेबुनियादी अभियान चलाया। इस अभियान में प्रोपेगेंडा मीडिया संस्थानों जैसे ‘द वायर’  और वामपंथी मीडिया हाउस ‘द हिंदू’  ने भी साथ दिया और बार-बार सौदे की कीमत और पारदर्शिता पर सवाल उठाने का प्रयास किया। लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को सही माना और न ही जनता ने। 2019 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने राहुल गाँधी के आरोपों को पूरी तरह नकारते हुए नरेंद्र मोदी की सरकार को ऐतिहासिक जीत दिलाई।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में पहले भी खुलासा किया था कि ‘द हिन्दू’ अखबार के प्रकाशक और कस्तूरी एंड सन्स लिमिटेड के चेयरमैन एन. राम ने 2019 में राफेल सौदे को एक ‘रक्षा घोटाले’ के रूप में पेश करने की कोशिश की थी ताकि प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाया जा सके।

8 फरवरी 2019 को द हिन्दू ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के नोट का हवाला दिया गया था। इसमें अधिकारी ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) राफेल सौदे की प्रगति के बारे में जानकारी लेने पर आपत्ति जताई थी।

द हिन्दू ने इस रिपोर्ट के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि रक्षा मंत्रालय खुद भी इस सौदे के खिलाफ था। लेकिन सच्चाई यह थी कि वह अधिकारी सौदे की बातचीत (negotiation) का हिस्सा ही नहीं था और उसकी आपत्ति का कोई ठोस आधार भी नहीं मिला।

सबसे अहम बात यह है कि उसी दस्तावेज में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का एक नोट भी था। इसमें उन्होंने साफ लिखा था कि वह अधिकारी जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहा है। उन्होंने बताया कि जैसा कि अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में होता है, सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय तथा फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय को ही सौदे की प्रगति के बारे में पूरी जानकारी थी।

अपने झूठे नैरेटिव को आगे बढ़ानेक के चक्कर में द हिन्दू ने जानबूझकर इस हिस्से को अपनी रिपोर्ट से हटा दिया। द हिन्दू अखबार की राफेल सौदे पर भ्रामक रिपोर्ट के तुरंत बाद ANI न्यूज एजेंसी ने पूरा दस्तावेज प्रकाशित किया। इसके बाद यह बात सबके सामने आ गई कि एन. राम ने रिपोर्ट को काट-छाँट कर प्रकाशित किया था।

ANI की रिपोर्ट के लगभग 10 दिन बाद द हिंदू ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उसने रिपोर्ट में कोई छेड़छाड़ नहीं की है। अपने कॉलम रीडर्स एडिटर में अखबार ने दावा किया कि उसके द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट एक पुराना संस्करण था, जिसमें रक्षा मंत्री का नोट शामिल नहीं था।

इसके सबूत के तौर पर द हिंदू ने उल्लेख किया कि ANI द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में प्रत्येक नोट पर सीरियल नंबर थे, जबकि हिंदू द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट पर कोई सीरियल नंबर नहीं था।

बाद में जाँच के दौरान सामने आया कि द हिन्दू ने न सिर्फ दस्तावेज को दो जगह से काटा था, बल्कि उसमें मौजूद रक्षा मंत्री पर्रिकर की टिप्पणी छुपाने के लिए डिजिटल तरीके से एक स्टैंप का हिस्सा भी मिटा दिया था।

जाँच में यह भी साबित हुआ कि रक्षा सचिव के नोट से पहले मौजूद तारीख के स्टांप को भी जानबूझकर हटाया गया था। पूरा मामला यह दिखाता है कि राफेल सौदे को लेकर द हिन्दू  और उसकी पत्रिका ‘फ्रॉंटलाइन’ ने बार-बार सरकार पर झूठे आरोप लगाने की कोशिश की।

फ्रांस की एक मीडिया वेबसाइट मीडियापार्ट ने फर्जी बिल वाले रिपोर्ट्स प्रकाशित किए हैं। इसमें बताया गया है कि ये रिपोर्ट्स भारत और फ्रांस के बीच हुई राफेल लड़ाकू विमान डील में घोटाले का संकेत देते हैं। मीडियापार्ट ने बताया कि इन फर्जी बिलों की मानें तो डसॉल्ट कंपनी का भारत सरकार के साथ 36 राफेल जेट का सौदा हुआ था।

इन रिपोर्ट्स को भारत के कुछ वामपंथी रुझान रखने वाले मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि द वायर, द हिंदू और न्यूज लाउंड्री ने बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। विपक्ष के नेताओं ने भी इन्हीं रिपोर्ट्स को आधार बनाकर मोदी सरकार पर आरोप लगाए और राफेल डील की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से जाँच की माँग की।

हालाँकि सच्चाई यह है कि जिन तथाकथित ‘फर्जी बिलों’ की बात की जा रही थी, वे उस समय के हैं जब UPA सरकार सत्ता में थी। इन बिलों के अनुसार करीब 11 मिलियन यूरो (लगभग 90 करोड़ रुपये) एक सिंगापुर स्थित कंपनी को दिए गए थे। ये भुगतान उस राफेल सौदे से जुड़े थे जिसे UPA सरकार अंतिम रूप देने की कोशिश कर रही थी।

बाद में जब NDA सरकार सत्ता में आई तो उसने UPA का प्रस्तावित सौदा रद्द कर दिया। और मोदी सरकार ने राफेल खरीदने के लिए फ्रांस से G2G स्तर पर नया समझौता किया। साल 2021 में विपक्ष ने इन मीडिया रिपोर्ट्स का सहारा लेकर संसद में भारी हंगामा किया और संसद सत्रों को भी बाधित किया। वहीं इन झूठे और भ्रामक रिपोर्ट्स को जारी करने की टाइमिंग पर भी सवाल उठे, क्योंकि माडियापार्ट ने संसद सत्र से ठीक दो हफ्ते पहले ये रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

गौरतलब है कि राफेल डील पर जिस NGO ने शिकायत दर्ज करवाई थी , वह असल में मोदी विरोधी गुट के लिए काम करने वाले जॉर्ज सोरोस की संस्था ओपन सोसाइटी, मिजेरेओर और ऑक्सफैम जैसी संस्थाओं का साझेदार था।

यहाँ तक कि हाल ही में जब प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के विमान को क्षति पहुँचने और वायुसेना के एक अधिकारी के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश कर मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की तो पोर्टल को भारत में बंद कर दिया गया था।

पाकिस्तान ने भारत विरोधी हथकंडे और चाल चलने के लिए हरसंभव प्रयास किए। इसमें द वायर ने चीन और पाकिस्तान की ओर से बैटिंग की। इसके बाद जब सरकार ने वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया तो द वायर ने अपनी उस रिपोर्ट को हटा दिया।

इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी मीडिया पोर्टलों की ओर से चलाए जा रहे नैरेटिव ज्यादातर चीन के नैरेटिव से मेल खाता दिखता है। इनमें एक न्यूजक्लिक नाम का पोर्टल भी शामिल है जिसे 2023 में एंटी-राफेल जैसे मुद्दे को हवा देने और चीन से फंडिंग मिलने के मुद्दे पर बेनकाब किया गया था।

कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी का चीन के प्रति अटूट प्रेम

कॉन्ग्रेस और उसके युवराज राहुल गाँधी चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी (CCP) के साथ काफी गहरा और अटूट रिश्ता कायम करते हैं। राहुल गाँधी ने कई मौकों पर चीन की प्रशंसा के पुल बाँधे हैं।

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज जज पब्लिक स्कूल में एक विवादास्पद बयान दिया। इसमें उन्होंने चीन को ‘उभरती हुई महाशक्ति’ बताया था। उन्होंने ये भी दावा किया था कि चीन में सामाजिक समरसता है।

2022 में द प्रिंट की कॉलमिस्ट श्रुति कपिला के साथ बातचीत के दौरान राहुल गाँधी ने चीन के विवादास्पद वेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) के भी कसीदे पढ़े थे। इसे उन्होंने ‘समृद्धि’ कहा जबकि चीन की ये पहल कई देशों को कर्ज के जाल में फँसाने के लिए बदनाम है।

2023 में लद्दाख का दौरा करने के दौरान राहुल गाँधी ने दावा किया था कि चीन ने लद्दाख में भारत की चरागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले मई 2022 में अपने यूके दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि “लद्दाख चीन के लिए वही है जो यूक्रेन, रूस के लिए है।”

राहुल गाँधी ने पहले भी विदेशी शक्तियों को भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की बात कही है। 2020 में राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) के वित्तीय मामले उभरल कर सामने आए।

ऑपइंडिया ने पहले भी एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें ये बात सामने आई थी कि RGF को 2006 के बाद से चीन की सरकार की ओर से 1 करोड़ रुपए से भी अधिक की राशि भेजी गई।

2008 में UPA की सरकार के दौरान चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी (CPC) और कॉन्ग्रेस सरकार ने उच्च स्तरीय जानकारी और साझेदारी के लिए एक समझौता भी किया था। इसमें दोनों देशों के बीच अहम द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से सबंधित विकास पर बातचीत की बात शामिल थी।

ये बात गौरतलब है कि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा इस राजीव गाँधी फाउंडेशन के 2005 से ही ट्रस्टी हैं और सोनिया गाँधी इस फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं। अब ये देखना काफी दिलचस्प है कि बदलते समय के साथ राजनीतिक लाभ के लिए साझेदार भी अपना पलड़ा बदल लेते हैं।

2017 में भी डोकलाम विवाद के दौरान भी राहुल गाँधी ने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई से भारत में गुपचुप मुलाकात की थी। सितंबर 2018 में कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान भी उन्होंने चीन के मंत्रियों से गुप्त मुलाकात की थी।

इससे पहले 8 जुलाई 2017 को राहुल गाँधी और लुओ झाओहुई की एक निजी बैठक हुई। कॉन्ग्रेस ने उस समय इस बैठक पर मीडिया रिपोर्ट्स को फर्जी कहा। हालाँकि बाद में चीनी दूतावास ने अपनी वेबसाइट पर ही बैठक की पुष्टि कर दी। इसके बाद राहुल गाँधी को भी इश मुलाकात की पुष्टि करनी पड़ी।

फरवरी 2025 में राहुल गाँधी के करीबी और इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने चीन के खतरे को कमतर दिखाने की कोशिश की और कहा कि चीन ‘हमारा दुश्मन नहीं’ है।

IANS न्यूज एजेंसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि चीन से क्या खतरा है। मुझे लगता है कि इस विषय को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है।”

सैम पित्रोदा ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह चीन के खिलाफ नकारात्मक धारणा बनाता है। साथ ही भारत पर भी इस बात का दोष मढ़ना नहीं भूले कि भारत कम्युनिस्ट शासन के प्रति टकराव की मानसिकता रखता है।

उन्होंने कहा, “यह मान लेना कि चीन शुरू से ही दुश्मन है, ये सही नहीं है। अब समय आ गया है कि हम बातचीत बढ़ाएँ, सहयोग करें, और एकसाथ मिलकर विकास करें। चीन हमारे आस-पास है और वह विकास कर रहा है।”

कॉन्ग्रेस की चीन के प्रति यह रुचि महज राफेल सौदे के विरोध या समझौतों पर हस्ताक्षर और RGF को चीनी फंडिंग तक ही सीमित नहीं है। राहुल गाँधी ने भारतीय संसद में भी चीन की सैन्य प्रणाली पर खास रुचि दिखलाई है।

2021 में राहुल गाँधी ने लोकसभा में सवाल किया था कि भारतीय सुरक्षा बल चीन के सर्विलांस (निगरानी) ड्रोन का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। साथ ही वह लद्दाख गतिरोध के दौरान PLA की रणनीति की प्रशंसा करना नहीं भूले।

2023 में यूके के दौरे में उन्होंने दावा किया कि चीन ‘टेकनोलॉजी रेस’ में काफी आगे है। साथ ही भारत को चीनी सैन्य नवाचार और विशेष तौर पर ड्रोन युद्ध से सीखने की सलाह भी दे डाली।

फरवरी 2025 में संसद में अपने 45 मिनट के भाषण के दौरान राहुल गाँधी ने चीन का लगभग 34 बार नाम लिया। इसमें उन्होंने चीन के मैनुफैक्चरिंग सेक्टर और तकनीकी प्रगति के बारे में कई बातें कहीं।

इसी वर्ष फरवरी में राहुल गाँधी ने एक प्रतिबंधित चीनी ड्रोन को सोशल मीडिया पर साझा किया। उनकी ये पोस्ट चीन की ओर से प्रायोजित विज्ञापन के जैसे लग रही थी। इसमें वे कहते नजर आए कि भारत को सिर्फ बातों के बजाय ड्रोन निर्माण के लिए ‘उत्पादन के लिए मजबीत बेस’ चाहिए।

चीन की रक्षा प्रणाली को बेहतर दिखाने के चक्कर में राहुल गाँधी ने भारतीय ड्रोन उद्योग को नीचा दिखाने की कोशिश की। कहा जा सकता है कि शायद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में स्वदेशी ड्रोन की सफलता से राहुल गाँधी कुछ असहज हो गए।

राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “ड्रोन केवल एक तकनीक नहीं हैं, वे एक मजबूत औद्योगिक प्रणाली से उत्पन्न नवाचार हैं। दुर्भाग्य से, पीएम मोदी इसे समझने में विफल रहे हैं। जब वे टेलीप्रॉम्प्टर का सहारा लेकर AI पर भाषण दे रहे होते हैं तो उस समय हमारे प्रतिस्पर्धी नई तकनीकों में महारत हासिल कर रहे हैं। भारत को केवल शब्दों की नहीं, एक मजबूत उत्पादन आधार की जरूरत है।”

इस साल जून में राहुल गाँधी ने तथ्यों और आँकड़ों को ताक पर रखते हुए ये दावा किया कि मोदी सरकार की ‘मेक इनइंडिया’ पहल असल में सिर्फ ‘असेम्बल इन इंडिया’ है और चीन मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में भारत से काफी आगे है। हालाँकि ऑपइंडिया ने गाँधी के चीनी प्रेम पर आधारित दावों का आँकड़ों के जरिए खंडन भी छापा।

निष्कर्ष

ये बात तो साफ है कि BJP सरकार का विरोध करने के चक्कर में विपक्षी दलों और वामपंथी मीडिया ने चीनी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने, राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श को कमतर करने और यहाँ तक कि राफेल सौदे के लिए भी अनर्गल बात करने में पीछा नहीं रहे।

विपक्ष और वामपंथी मीडिया इस तरह लगातार चीन की पैरवी करने और चीनी के प्रोपेगेंडा को दोहराकर भारत सरकार पर हमला बोलने से भी नहीं चूकते। अपने ही देश के राष्ट्रीय हितों के साथ ये एक विश्वासघात ही है।

इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखा है। मूल कॉपी को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद किया है सौम्या सिंह ने

उन लड़कियों को भूल गईं स्वरा भास्कर जिन्हें नंगा कर प्राइवेट पार्ट में मारी गोली, जिनके शवों तक से हुआ रेप: हमास आतंकियों से ‘हमदर्दी’ में इजरायली बंधकों से बर्बरता को बता रही ‘अफवाह’

इजरायल पर हमास आतंकियों के हमले के 2 साल होने वाले हैं। अभी भी हमास की कैद में करीब 50 इजरायली हैं, जिसमें से माना जा रहा है कि 28 लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच, हमास की कैद से छूटे एक इजरायली ने अपनी आपबीती बताते हुए हमास के आतंकियों की बर्बरता को बयान किया है।

टाइम्स ऑफ इजरायल पर कीथ सीगल की आपबीती छपी है। कीथ सीगल एक अमेरिकी-इजरायली हैं, जिन्हें 7 अक्टूबर 2023 को किबुत्ज कफर आजा से हमास ने अगवा कर लिया था। उन्होंने बताया कि वहाँ एक महिला बंधक को बहुत बुरी तरह सताया गया। उसे माथे पर नुकीली रॉड और सिर पर बंदूक रखी गई। कीथ को फरवरी 2025 में रिहा किया गया, लेकिन वो अभी भी सदमे में हैं। उन्होंने बताया कि मटान अंगरेस्ट नाम के सैनिक के साथ वो कैद में थे, जो 7 अक्टूबर को बुरी तरह जख्मी हो गया था। मटान को सांस लेने में दिक्कत थी और उसे बचाने के लिए हमास ने उसे सुरंग से बाहर निकाला।

कीथ सीगल ने अपनी कैद के बारे में बताया। उसने कहा कि उसने एक महिला बंधक को भयानक यातनाएँ झेलते देखा। आतंकियों ने उसके माथे पर नुकीली रॉड रखी और सिर पर बंदूक तानी। कीथ ने बताया कि उसे और अन्य बंधकों को बार-बार मारने की धमकी दी जाती थी।

ऐसी ही एक और गवाही लिशाय मिरान-लवी की है, जिनके पति ओमरी मिरान अभी भी बंधक हैं। उन्होंने बताया कि उनके पति को हर मिनट यातनाएँ दी जा रही हैं। हमास ने यौन हिंसा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, जैसा कि पहले आईएसआईएस और बोको हरम जैसे आतंकी संगठन कर चुके हैं। कई पीड़ितों के शव बिना कपड़ों के, हाथ बंधे हुए और अंग-भंग की हालत में मिले। इजरायल ने हमास को युद्ध में यौन अपराधों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

लंदन के अखबार द टाइम्स की एक जाँच रिपोर्ट में 15 रिहा हुए बंधकों, एक रेप से बची महिला और 17 प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों का जिक्र है। इन गवाहों ने बताया कि हमास ने कम से कम 6 अलग-अलग जगहों पर रेप और गैंगरेप किए। कई पीड़ितों के शव बिना कपड़ों के मिले, उनके हाथ बंधे थे और प्राइवेट पार्ट्स तक को विकृत (काटा गया, गोली मारी गई) किया गया था।

हमास की हैवानियत: 7 अक्टूबर की वह काली तारीख

हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर अचानक हमला बोला। यह हमला इतना सुनियोजित और क्रूर था कि पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। आतंकियों ने जमीन, पानी और हवा… तीनों रास्तों से इजरायल में घुसपैठ की। उन्होंने नागरिक इलाकों में घुसकर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को निशाना बनाया। इस हमले में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए, 2200 से ज्यादा घायल हुए और 251 लोग बंधक बनाए गए। आज भी 50 बंधक हमास की कैद में हैं, जिनमें से 28 की मौत की पुष्टि हो चुकी है।

हमास की क्रूरता का सबसे बड़ा निशाना दक्षिणी इजरायल में चल रहा एक म्यूजिक फेस्टिवल बना। इस फेस्टिवल में 3000 से ज्यादा लोग मौजूद थे, ज्यादातर युवा। आतंकियों ने पहले इलाके को घेरा, फिर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं। इस हमले में 260 से ज्यादा लोगों की हत्या हुई।

जर्मन नागरिक शानी लौक भी इसी फेस्टिवल में थीं। हमास के आतंकियों ने उनकी हत्या की, उनके शव को नग्न करके पिकअप ट्रक में लादा और फिलिस्तीन में परेड निकाली। भीड़ ने उनके शव पर थूका और नारे लगाए। शानी की माँ ने बाद में अपील की कि कम से कम उनकी बेटी का शव वापस कर दिया जाए। यही नहीं, शानी के इंटग्रास अकाउंट तक पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने उसकी मौत का जश्न मनाया और घटिया कमेंट्स किए।

ऐसी ही एक और महिला नोआ को भी हमास ने अगवा किया। वीडियो में दिखता है कि आतंकी ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाते हुए औरतों को गाड़ियों में भर रहे हैं। कई औरतों के साथ रेप की खबरें सामने आईं। एक इजरायली शख्स योनी आशेर ने बताया कि उन्होंने एक वायरल वीडियो में अपनी पत्नी और बेटी को देखा, जिन्हें हमास के आतंकी ट्रक में लादकर ले गए। योनी आशेर ने अपनी पत्नी के फोन को ट्रैक किया, जो गाजा में मिला।

हमास की बर्बरता: रेप, अंग-भंग और लाशों के साथ हैवानियत

हमास की क्रूरता सिर्फ हत्याओं तक सीमित नहीं थी। प्रत्यक्षदर्शियों और रिहा हुए बंधकों ने जो बताया, वो रोंगटे खड़े करने वाला है। आतंकियों ने औरतों के साथ रेप किया, गैंगरेप किया, उनके स्तन काटे, प्राइवेट पार्ट्स में गोली मारी। कई मामलों में लाशों के साथ भी रेप किया गया। द टाइम्स की रिपोर्ट में एक सह-लेखक शारोन जगागी ने बताया कि कई गवाहों ने देखा कि हमास ने पीड़ितों को गोली मारने के बाद उनके शवों के साथ रेप की कोशिश की।

हमास की करतूत की निंदा हर तरफ हुई। संयुक्त राष्ट्र से लेकर कई देशों ने इस हमले को आतंकवादी करार दिया और यौन हिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। लेकिन भारत में स्वरा भास्कर जैसे कुछ लोग और इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ सहानुभूति रखने वाले हमास को क्लीन चिट देने की कोशिश कर रहे हैं। यह शर्मनाक है कि ऐसे लोग तथ्यों को नजरअंदाज करके आतंकवाद का समर्थन करते हैं।

दरअसल, पार्ट टाइम हिरोइन और फुल टाइम एक्टिविस्ट स्वरा भास्कर चाहती है कि इन सब पर बात न हो। वो हमास की बर्बरता को अफवाह बताती है और वो चाहती है कि इस पर बात न हो।

ये पूरी दुनिया जानती है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजरायल पर हमले के दौरान क्या-क्या हुआ और अभी पूरी दुनिया हमास की उस क्रूरता के बारे में बात कर रही है। लेकिन स्वरा ने अपने ट्वीट में उल्टा इजरायल पर इल्ज़ाम लगाए। यही नहीं, उसने कहा कि हमास ने कोई भी यौन उत्पीड़न नहीं किया। इसके साथ ही उसने कहा कि इजरायल दशकों से फिलिस्तीनी कैदियों के खिलाफ रेप और यौन उत्पीड़न का इस्तेमाल कर रहा है। स्वरा ने बीबीसी की रिपोर्ट को खारिज करते हुए सारा दोष इजरायल पर ही मढ़ दिया। वैसे, ये काम वो पहले भी कर चुकी है और उसका गैंग भी।

यह ट्वीट स्वरा की उस पुरानी आदत को दिखाता है, जिसमें वो बिना पूरी तस्वीर देखे, एकतरफा दावे करती हैं। हमास की बर्बरता के सामने, जिसे दुनिया ने वीडियो, गवाहों और पीड़ितों के बयानों से देखा, स्वरा का यह दावा न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि आतंकवाद को सफेद चादर ओढ़ाने की कोशिश भी लगता है।

स्वरा की इस नौटंकी का मकसद सिर्फ हेडलाइन बनाना और अपने फॉलोअर्स को खुश करना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वो सचमुच उन तस्वीरों और वीडियो को नजरअंदाज कर सकती हैं, जहाँ हमास के आतंकियों ने औरतों, बच्चों और बूढ़ों के साथ हैवानियत की सारी हदें पार कीं?

स्वरा के दावे कि हारेत्ज़ और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हमास की क्रूरता को खारिज किया, पूरी तरह बेबुनियाद हैं। हारेत्ज़ ने कभी ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं छापी। उल्टा संयुक्त राष्ट्र और कई मानवाधिकार संगठनों ने हमास की बर्बरता की पुष्टि की है। स्वरा की इस हरकत से साफ है कि वो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर एक खास नैरेटिव चलाना चाहती हैं, जिसमें हमास को पीड़ित और इजरायल को खलनायक दिखाया जाए। ऐसी सोच न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि उन पीड़ितों का अपमान भी है, जिन्होंने हमास की क्रूरता को झेला।

स्वरा जैसे लोगों की मानसिकता ही घटिया

हमास की बर्बरता को नजरअंदाज करने वाले स्वरा भास्कर और उसके जैसे तथाकथित सेकुलर लोगों की मानसिकता पर सवाल उठता है। ये लोग आतंकवाद को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं, क्योंकि ये उनके नैरेटिव को सूट करता है। स्वरा को शानी लौक का अपहरण, उसकी हत्या और शव की परेड ड्रामा लगती है, क्योंकि वो खुद कैमरे के सामने नौटंकी करने में माहिर हैं। लेकिन क्या वो उन माँओं का दर्द समझ सकती हैं, जिनकी बेटियों को हमास ने नग्न करके सड़कों पर घसीटा? क्या वो उन बच्चों का दुख समझ सकती हैं, जिनके सामने उनकी माँओं के साथ रेप हुआ?

स्वरा और उनके जैसे लोग सिर्फ हेडलाइन बेचने के लिए ऐसी बातें करते हैं। इनका कोई वास्तविक स्टैंड नहीं है, बस हर बार वो उस तरफ खड़े हो जाते हैं, जो उनके लिए सुर्खियाँ लाए। इनके लिए लानतें ही भेजी जा सकती हैं, क्योंकि ये सच को दबाकर झूठ को चमकाने की कोशिश करते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ लोग शांति और इंसानियत की बात करते हैं, ऐसे लोग समाज के लिए खतरा हैं।

सच को दबाने की कोशिश बेकार है स्वरा

स्वरा भास्कर का ट्वीट और उनकी सोच उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती है, जो सच को तोड़-मरोड़ कर अपने एजेंडे को चमकाना चाहते हैं। लेकिन हमास की हैवानियत को कोई नहीं छिपा सकता। 7 अक्टूबर 2023 की घटनाएँ, शानी लौक, नोआ, और सैकड़ों अन्य पीड़ितों की कहानियाँ और रिहा हुए बंधकों के बयान इस बात का सबूत हैं कि हमास ने इंसानियत को शर्मसार किया। दुनिया को अब एकजुट होकर ऐसी बर्बरता के खिलाफ खड़ा होना होगा और स्वरा जैसे लोगों को उनकी नौटंकी के लिए जवाबदेह बनाना होगा।

30 KG के X-गॉर्ड डिकॉय को राफेल समझ मिसाइल चलाता रहा पाकिस्तान, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत ने AI तकनीक से बनाया बेवकूफ: रक्षा विशेषज्ञ ने कहा- ये बेस्ट स्पूफ सिस्टम

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जिस तरह भारतीय सेना ने पाकिस्तान की फ़ौज के ठिकानों को तबाह किया, उसकी कहानियाँ अब भी सामने आ रही हैं। वायु सेना हो या थल सेना, उनकी रणनीतियाँ अब रक्षा विशेषज्ञों की चर्चा का विषय बन रही हैं।

अब इस मामले में खुलासा हुआ है कि इस दिन के ऑपरेशन के दौरान के दौरान भारतीय वायुसेना ने राफेल लड़ाकू विमानों के साथ ‘X-गार्ड’ नाम का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बना टो डिकॉय सिस्टम का इस्तेमाल किया।

X-गार्ड एक हल्का (लगभग 30 किलो का) AI से चलने वाला डिकॉय सिस्टम है। इसे राफेल एडवांस्ड डिफेन्स सिस्टम्स ने विकसित किया है। यह सिस्टम 100 मीटर लंबे फाइबर-ऑप्टिक वायर से विमान के पीछे चलता है और 500 वॉट का 360-डिग्री जैमिंग सिग्नल पैदा करता है।

यह सिग्नल रडार और मिसाइल सिस्टम को असली विमान की तरह दिख का धोखा देता है। इसमें रडार इमिशन और डॉपलर इफेक्ट जैसी विशेषताएँ होती हैं। यानी दुश्मन को यह कोई विमान जैसा जैसा दिखता है जबकि असल में यह एक अलग सिस्टम होता है। पूर्व F-16 पायलट रयान बोडनहाइमर ने इसे आधुनिक हवाई लड़ाई में एक बड़ा मोड़ बताया है।

उन्होंने X-गार्ड को ‘अब तक का सबसे बेहतरीन स्पूफिंग और धोखा देने वाला सिस्टम’ कहा। उनका मानना है कि इस तकनीक ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के नियम ही बदल दिए हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय राफेल को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान ने चीनी PL-15E एयर-टू-एयर मिसाइलें और J-10C फाइटर जेट्स तैनात किए थे।

लेकिन X-गार्ड ने इन मिसाइलों और रडार सिस्टम को धोखा देकर उन्हें असली विमान के बजाय डिकॉय पर निशाना लगाने पर मजबूर कर दिया। PL-15E मिसाइल, जो कि चीन की PL-15 का एक निर्यात वर्जन है, उसमें अत्याधुनिक स्पूफिंग रेजिस्टेंस नहीं है। यानी वह ऐसी तकनीकों को चकमा नहीं दे सकती।

इसलिए वह X-गार्ड के नकली सिग्नल से भ्रमित हो गई। संभवतः J-10C के KLJ-7A AESA रडार को भी यह लगा कि उन्होंने असली राफेल को लॉक किया है, जबकि वह डिकॉय था।

पाकिस्तान की सेना ने जिन डिकॉय सिस्टम को गिराया, उन्हें असली राफेल मान लिया और खूब शोर मचाया कि उन्होंने 4-5 भारतीय फाइटर जेट मार गिराए। लेकिन जब उनसे सबूत माँगे गए तो पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का जवाब था, ‘ये सब सोशल मीडिया पर है।’

एक्स-गार्ड के अलावा भारतीय डिकॉय ड्रोन ने भी अहम भूमिका निभाई। ये ड्रोन ऐसे हीट सिग्नेचर (गर्मी के निशान) बनाते हैं जैसे कि असली फाइटर जेट बनाते हैं। इससे पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम और भी ज्यादा भ्रमित हो गया।