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कम हो जाएगा आयकर का मकड़जाल, मोदी सरकार लाई 60 साल बाद नया कानून: इनकम टैक्स भरना होगा सिंपल, रिफंड के लिए भी भागदौड़ होगी कम

मोदी सरकार नए आयकर कानून को लागू करने के लिहाज से आयकर विधेयक-2025 लेकर आई है। इसे सोमवार (21 जुलाई 2025) को मानसून सत्र में पेश किया गया। बिल के कई प्रावधानों को जस का तस रखा गया है। पर साथ ही 285 नए सुझाव भी शामिल किए गए हैं।

आयकर विधेयक-2025 पर प्रवर समिति की रिपोर्ट में ‘डिजिटल पासवर्ड और गोपनीयता’से जुड़े प्रावधानों को लेकर विशेष ध्यान दिया गया है। 64 साल पुराने आईटी कानून में कुछ अहम बदलाव होने जा रहे हैं। 4575 पन्नों की रिपोर्ट में कई संशोधन के साथ अहम बातें शामिल की गई हैं।

मोदी सरकार ने वर्तमान आयकर अधिनियम 1961 को बेहतर बनाने के लिए कई संशोधन किए हैं। इसके तहत अधिकारियों को दिए गए अधिकारों, खास तौर पर तलाशी और जब्ती के दौरान जाँच के दायरे में आने वाले लोगों के सोशल मीडिया और निजी ईमेल तक को जाँच सकते हैं और जानकारी निकालने की मंजूरी भी दी गई है।

13 फरवरी 2025 को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने संसद में आयकर बिल पेश किया था। इसके कई प्रावधानों को लेकर तीखी आलोचना हुई थी। इसके बाद विधेयक को बीजेपी सांसद बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली 31 सदस्यीय समिति के पास समीक्षा के लिए भेजा गया था। समीक्षा पूरी करने के बाद समिति ने मानसून सत्रह को पहले दिन अपनी रिपोर्ट पेश कर दी।

डिजिटल पासवर्ड और गोपनीयता पर समिति की टिप्पणियाँ

अपने सुझाव में समिति ने बिल को लेकर कहा है कि सरकार को नया अधिकार देने का प्रस्ताव है ताकि तलाशी और जब्ती के मौजूदा अधिकारों के तहत डिजिटल पासवर्ड या एक्सेस कोड को अपने नियंत्रण में रख सकता है। यह प्रावधान टैक्स अधिकारियों को सोशल मीडिया, ईमेल, व्हाट्सएप जैसे एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म तक पहुँच की अनुमति भी दे सकता है।

नए बिल में 5 लाख 12 हजार की जगह 2 लाख 60 हजार शब्द ही शामिल किए गए हैं। इसके अलावा समिति ने कहा है कि अगर कोई व्यक्ति समय पर इनकम टैक्स रिटर्न (ITR) फाइल नहीं कर पाता है, फिर भी उसे रिफंड मिलना चाहिए। जुर्माने से बचने के लिए रिटर्न फाइल करने के लिहाज से कोई कानून नहीं होना चाहिए।

हालाँकि विशेषज्ञों ने इस पर निजता के हनन की आशंका जताई है। उनका कहना है कि इससे उपयोगकर्ताओं के निजी डिजिटल डेटा की जानकारी सरकारी लोगों तक पहुँच सकती है। विधेयक में ‘वर्चुअल डिजिटल स्पेस’ की परिभाषा दी गई है। इसमें ईमेल सर्वर और सोशल मीडिया अकाउंट्स, ऑनलाइन बैंकिंग और ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म के साथ क्लाउड स्टोरेज और रिमोट सर्वर जैसी बातें शामिल की गई हैं।

सरकार का कहना है कि बिल में बदलाव केवल भाषा को बेहतर और स्पष्ट करने के लिए किया गया है। साथ ही कई पुराने अधिकारों को जस का तस शामिल किया गया है। हालाँकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह एक नया अहम अधिकार है, जिससे टैक्स अधिकारी पासवर्ड क्रैकिंग सॉफ़्टवेयर या सेवा प्रदाताओं से लॉग-इन जानकारी माँग सकते हैं।

समिति के सुधार

समिति ने रिपोर्ट में 285 सुझाव दिए हैं। इनमें विधेयक भाषा को सरल बनाने, धाराओं को 819 से 536 करने, 1200 प्रोविजन और 900 स्पष्टीकरण हटाने और डिजिटल अधिकारों और गोपनीयता से जुड़े मुद्दों को आदि को शामिल किया गया है।

समिति ने सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की परिभाषा को MSME एक्ट के साथ मिलाने का भी सुझाव दिया है। रिपोर्ट के संशोधनों में अध्यायों की संख्या 47 से घटाकर 23 कर दी गई है। इन प्रावधानों को सूची की तरह सरल रखा गया है कि करदाताओं को आसानी से समझ आए। गैर-लाभकारी संगठनों के लिए विशेष अध्याय बनाया गया है। इसमें सरल भाषा में विस्तृत जानकारी दी गई है ताकि ऐसे संगठनों को प्रावधानों का अनुपालन करना आसान हो।

‘पिछले वर्ष’ और ‘मूल्यांकन वर्ष’ की जगह अब केवल ‘कर वर्ष’ का प्रयोग किया जाएगा। इससे कर भुगतान उसी वर्ष में होगा जिसमें आय अर्जित की गई है। नये विधेयक में स्पष्टता बढ़ाने के लिए तालिकाओं की संख्या 18 से बढ़ाकर 57 कर दी गई है, और सूत्रों की संख्या भी 6 से बढ़ाकर 46 कर दी गई है।

राजस्व विभाग ने किया स्वीकार

वित्त मंत्रालय के तहत राजस्व विभाग ने समिति को कहा कि प्रस्तावित बदलाव मौजूदा परिस्थितियों के अनुरूप किए गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में शामिल किसी भी जानकारी को सीमित करने के लिहाज से मंत्रालय ने कहा कि डिजिटल डेटा व्यापक होता है।

इसमें किसी भी ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट का लॉगिन आईडी और पासवर्ड शामिल होता है, जिन्हें एन्क्रिप्टेड चैट्स में वित्तीय डेटा छिपाने के लिए उपयोग किया जाता है। ऐसे में इसे सीमित नहीं किया जा सकता है।

समिति की ओर से डिजिटल स्पेस की परिभाषा से सोशल मीडिया अकाउंट्स को बाहर करने के सुझाव पर मंत्रालय ने कहा कि कई जरूरी साक्ष्य और जानकारी इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स से हासिल किए जाते हैं। इनमें व्हाट्सएप, ईमेल आदि शामिल होता है।

तलाशी अभियानों के अधिकांश मामलों में करदाता (टैक्सरेपेयर्स) ऑनलाइन मंचों, पोर्टल्स और ईमेल अकाउंट्स आदि के पासवर्ड या लॉगिन क्रेडेंशियल साझा नहीं करते। इसके पीछे कारण ये है कि करदाता अपने कई बेहिसाब लेनदेन पर एन्क्रिप्टेड संचार माध्यमों के जरिए चर्चा करते हैं। ऐसे में डेटा उपयोग को लेकर संशोधन सही हैं ताकि अन्य प्रावधान भी तर्कसंगत रह सकें।

जो कल तक जगदीप धनखड़ के चलने-बोलने के स्टाइल का भी उड़ाते थे मजाक, वे आज ‘हमदर्द’ हुए जा रहे: कभी उपराष्ट्रपति को हटाना चाहता था यही विपक्ष

जगदीप धनखड़ ने भले ‘स्वास्थ्य कारणों’ से उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया हो, पर विपक्ष इसमें ‘राजनीति’ देख रहा है। ये वही विपक्ष है जिसने न केवल धनखड़ की मिमिक्री कर सदन के बाहर उनका मजाक उड़ाया, बल्कि सदन के भीतर उन्हें ‘विपक्ष की आवाज दबाने वाला सभापति’ से लेकर ‘बीजेपी प्रवक्ता’ तक कहने में भी हिचक नहीं दिखाई।

यहाँ तक कि देश में पहली बार किसी उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने की कोशिश तक की। अब कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश कह रहे हैं कि उन्होंने विपक्ष को मिलाकर चलने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य वजह से बजाए जगदीप धनखड़ के इस्तीफे की वजह ‘गहरे’ हैं।

धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला चुका है कॉन्ग्रेस

कॉन्ग्रेस को जगदीप धनखड़ विपक्ष को साथ लेकर चलने वाले नजर आने लगे हैं। ये वही कॉन्ग्रेस है जिसने देश के इतिहास में पहली बार उपराष्ट्रपति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उनका ‘संवैधानिक अपमान’ किया । 72 साल के संवैधानिक इतिहास में धनखड़ पहले ऐसे उपराष्ट्रपति रहे जिनके खिलाफ प्रमुख विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस की अगुवाई वाली इंडी गठबंधन ने दिसंबर 2024 में सदन में महाभियोग प्रस्ताव लेकर आया था।

उस वक्त धनखड़ पर ‘पक्षपातपूर्ण तरीके’ से सदन चलाने और विपक्ष को ‘बोलने का मौका नहीं ‘देने का आरोप लगाया था। हालाँकि तकनीकी कारणों से महाभियोग प्रस्ताव खारिज हो गया। राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने प्रस्ताव को खारिज कर दिया था।

लेकिन आज उपराष्ट्रपति धनखड़ कॉन्ग्रेस को सभी दलों को मिला कर चलने वाले नेता नजर आने लगे हैं। कॉन्ग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने यहाँ तक कहा है कि धनखड़ सत्ता पक्ष और विपक्ष को मिलाकर चलना चाहते थे और दुनिया में भारत के लोकतंत्र की बेहतर छवि प्रस्तुत करना चाहते थे।

धनखड़ की मिमिक्री का मामला

उपराष्ट्रपति धनखड़ को विपक्ष ने आहत भी किया है। याद कीजिए मोदी सरकार 2.0 का वो आखिरी शीतकालीन सत्र जब सदन में हंगामे की वजह से राज्यसभा के 45 सांसदों समेत कुल 78 सांसदों को निलंबित कर दिया गया था। सभी निलंबित सांसद संसद भवन की सीढ़ियों पर बैठकर निलंबन का विरोध कर रहे थे।

इसी दौरान टीएमसी सांसद कल्याण बनर्जी उठे और राज्यसभा के सभापति जगदीप धनखड़ की मिमिक्री करने लगे। उनके बात करने और शारीरिक संरचना की खिल्ली उड़ाई। इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गांधी खड़े होकर हँसते और मिमिक्री का वीडियो बनाते नजर आए।

इस पर जगदीप धनखड़ ने अपनी नाराजगी भी जताई। उन्होंने संसद में कहा था कि एक सांसद चेयरमैन का मजाक बनाता है और कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हँसते हैं और उसका वीडियो बनाते हैं। उन्होंने इसे व्यक्तिगत और जाति आधारित अपमान बताया था। उन्होंने कहा था कि उनकी जाट पहचान और किसान बैकग्राउंड का मजाक उड़ाया गया। ये पूरे जाट समुदाय का अपमान है।

सांसद कल्याण बनर्जी ने इसके बाद भी कई बार जगदीप धनखड़ की मिमिक्री बनाई और कहा कि वो 1000 बार ऐसा करेंगे।

हाथ धोकर पीछे पड़ी रही टीएमसी

विपक्ष के हर उस दांव में टीएमसी साथ देती रही जो धनखड़ के खिलाफ थी। दरअसल उपराष्ट्रपति की मुखर आलोचक टीएमसी के साथ धनखड़ का रिश्ता उस वक्त से खराब रहा था, जब वह बंगाल के राज्यपाल थे। 2019 से 2022 के बीच राज्यपाल धनखड़ ने बंगाल की ममता बनर्जी की अगुवाई वाली सरकार की कई मुद्दों पर आलोचना की।

उन्होंने कहा था कि राज्य में संविधान का शासन नहीं है और अराजकता,गुंडागर्दी का बोलबाला है। इसको सीएम ममता बनर्जी ने राज्य का अपमान बताया था। उन्होंने सरकार के कामकाज में दखलंदाजी के आरोप भी लगाए। ऐसे में जब जगदीप धनखड़ उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार बने तो उनका जमकर विरोध किया।

सुप्रीम कोर्ट पर टिप्पणी को लेकर धनखड़ और विपक्ष के बीच बहसबाजी

सुप्रीम कोर्ट को लेकर उपराष्ट्रपति धनखड़ ने कहा था कि संसद के बनाए कानूनों को अगर कोर्ट रोक देती है तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक है। धनखड़ के इस बयान का विपक्ष ने कड़ा विरोध किया था। टीएमसी ने कहा था कि यह व्यक्ति बीजेपी का एजेंडा चला रहा है वहीं कॉन्ग्रेस ने कहा था, “उपराष्ट्रपति संवैधानिक मर्यादाओं को तोड़ रहे हैं।” अब वही कॉन्ग्रेस उपराष्ट्रपति का गुणगान करती नजर आ रही है।

विश्वविद्यालयों पर धनखड़ की टिप्पणी पर विपक्ष हुआ था आग-बबूला

मार्च 2023 में जब शैक्षणिक संस्थानों और छात्र राजनीति पर राज्यसभा में बहस चल रही थी तो सभापति धनखड़ ने कहा था, “कुछ विश्वविद्यालय देशविरोधी विचारधाराओं को प्रश्रय देते हैं।” उनका इशारा जेएनयू की तरफ था। इस पर कॉन्ग्रेस और वामपंथी पार्टियों ने उपराष्ट्रपति की भाषा को ‘संघी एजेंडा’ करार दे दिया और बयान वापस लेने पर अड़े रहे। इस दौरान संसद में कई दिनों तक व्यवधान रहा।

विपक्ष ने लगाया बीजेपी प्रवक्ता होने का आरोप

दिसंबर 2023 में शीतकालीन सत्र के दौरान विपक्ष ने धनखड़ पर विपक्षी सांसदों को नहीं बोलने का आरोप लगाया था। इस दौरान कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा था, “ये उपराष्ट्रपति नहीं, बीजेपी प्रवक्ता की तरह बर्ताव कर रहे हैं।” आज वही कॉन्ग्रेस उनकी तारीफ के पुल बाँध रही है और ‘लोकतंत्र का सच्चा सिपाही’ कह रही है।

2022 में उपराष्ट्रपति बनने का भी विपक्ष ने किया था विरोध

मोदी सरकार ने 2022 में बंगाल के राज्यपाल से सीधे केन्द्र में उपराष्ट्रपति के उम्मीदवार के तौर पर पेश किया। इंडी गठबंधन ने कॉन्ग्रेस नेता मार्गेट अल्वा को अपना उम्मीदवार बनाया था। धनखड़ ने 725 में से 528 वोट पाकर जीत दर्ज की थी और 11 अगस्त 2022 को उपराष्ट्रपति बने।

बंगाल के पीड़ित हिन्दुओं का बने सहारा, ‘मीलॉर्ड्स’ को बार-बार दिखाया आईना, चूर किया जया बच्चन का ‘अभिमान’: राजनीति के ‘जग’ में ‘दीप’ की तरह जले धनखड़

भारत के 14वें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने सोमवार (21 जुलाई 2025) को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को त्याग पत्र भेजा। पत्र में इस्तीफे के कारण खराब स्वास्थ्य उल्लेख किया गया। इसके अलावा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और कैबिनेट के बाकी मंत्रियों का शुक्रिया अदा किया।

उन्होंने पत्र में लिखा, “स्वास्थ्य देखभाल को प्राथमिकता देने और चिकित्सीय सलाह का पालन करने के लिए मैं भारत के उपराष्ट्रपति पद से तत्काल प्रभाव से इस्तीफा देता हूँ। जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 67(ए) में प्रावधान है।” उपराष्ट्रपति धनखड़ के इस्तीफे पर लगातार कयास लग रहे हैं।

इस बीच उनकी साधारण किसान परिवार वाली पृष्ठभूमि और फिर सुप्रीम कोर्ट में वकालत से लेकर उनकी राजनीतिक पारी तक पर चर्चाएँ चल रही हैं। उनका सबसे प्रभावशाली कार्यकाल पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और उपराष्ट्रपति के रूप में रहा है, जहाँ हर बार उन्हें लोकतंत्र के हित में खड़े देखा गया।

राजस्थान के जाट परिवार में जन्मे जगदीप धनखड़

जगदीप धनखड़ का जन्म 18 मई 1951 को राजस्थान के झुंझुनूं जिले के किठाना गाँव में एक जाट परिवार में हुआ था। उनके पिता गोकुलचंद किसान थे। किसान के बेटे ने जगदीप धनखड़ ने सैनिक स्कूल से पढ़ाई की। फिर राजस्थान विश्वविद्यालय से बीएससी और एलएलबी की डिग्री पूरी की।

साल 1979 में सुदेश धनखड़ से शादी की। उनकी एक बेटी है, जिसका नाम कामना है। साल 1990 में जगदीप धनखड़ ने राजस्थान हाईकोर्ट में सीनियर एडवोकेट बने। इसके बाद उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में भी वकालत की। वह राजस्थान हाईकोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।

वर्षों की सक्रिय राजनीति के बाद उन्हें 2019 में पश्चिम बंगाल का राज्यपाल बनाया गया था। इस कार्यकाल में उनकी राज्य की ममता बनर्जी सरकार पर कई मुद्दों से तनातनी देखी गई।

राज्यपाल रहते संवैधानिक मूल्यों पर मुखर रहे धनखड़

जगदीप धनखड़ राज्यपाल के रूप में लगातार संवैधानिक मूल्यों को संरक्षित करते रहे। जब वे पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे, तब ममता बनर्जी की सरकार से कई मुद्दों पर टकराव हुआ, लेकिन उन्होंने हमेशा संविधान के पक्ष में ही बात की।

बंगाल में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा पर भी जगदीप धनखड़ ने आवाज उठाई। TMC के गुंडों ने जब हिंदुओं पर अत्याचार किया और महिलाओं का रेप से लेकर हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमा को तोड़ा, तब धनखड़ ने मामले में न्यायिक जाँच के निर्देश दिए।

यही नहीं, बंगाल चुनाव 2021 के बाद हुई हिंसा में भी जगदीप धनखड़ ने न्याय के लिए लड़ाई लड़ी और ममता सरकार की करतूतों को सामने रखा। बतौर राज्यपाल रहते उन्होंने ममता बनर्जी सरकार पर कई गंभीर प्रश्न उठाए।

जब चुनाव बाद की हिंसा पर रिपोर्ट तक नहीं भेजी गई, तब उन्होंने खुद सामने आकर आवाज उठाई। तबलीगी जमात के बांग्लादेशी नागरिकों को लेकर लुकआउट नोटिस जारी न होने पर भी उन्होंने सरकार की चुप्पी पर सवाल किया।

जब धनखड़ ममता सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाने लगे, तो TMC सांसदों ने उनके खिलाफ खूब हँगामा किया। लेकिन धनखड़ बंगाल की लड़ाई के लिए डटे रहे। कोरोना संकट में जब कई जगह शव सड़कों पर पड़े मिले, तो उन्होंने सार्वजनिक रूप से नाराज़गी जताई और सरकार की लापरवाही पर सवाल उठाया।

बंगाल की TMC सरकार ने हमेशा राज्यपाल का अपमान किया। TMC सांसद महुआ मोइत्रा ने उन्हें ‘सड़ा हुआ सेब’ और ‘अंकल जी’ तक कहा, तब भी उन्होंने जवाब संयम और सच्चाई से दिया।

जया बच्चन की ‘बदतमीजी’ पर सिखाया सबक

जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा में सभापति के तौर पर अनुशासन और गरिमा को सर्वोपिर रखा है, चाहे सामने कोई भी हो। समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने राज्यसभा में जब धनखड़ के लहजे पर आपत्ति जताई थी, तब भी उन्होंने सख्त और सटीक जवाब दिया था।

जगदीप धनखड़ ने कहा, “जया जी, आपने बहुत नाम कमाया है। आप जानती हैं कि एक अभिनेता निर्देशक के अधीन होता है। लेकिन हर दिन मैं खुद को दोहराना नहीं चाहता। हर दिन मैं स्कूली (आपसे) शिक्षा नहीं लेना चाहता। आप मेरे लहजे के बारे में बात कर रही हैं? बहुत हो गया। आप कोई भी हो सकते हैं, आपको मर्यादा को समझना होगा। आप एक सेलिब्रिटी हो सकते हैं, लेकिन मर्यादा को स्वीकार करें।”

‘न्यायिक दखल’ पर प्रश्न उठाते रहे धनखड़

जगदीप धनखड़ ने राज्यसभा के भीतर लगातार के दखल (Judicial Overreach) पर भी लगातार प्रश्न उठाए। उन्होंने इसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट के राष्ट्रपति को आदेश देने वाले फैसले का भी विरोध किया था।

जब कोर्ट ने राष्ट्रपति और राज्यपालों को लंबित विधेयकों पर 3 महीने में फैसला लेने का आदेश दिया था, तब धनखड़ ने साफ कहा कि अदालत राष्ट्रपति जैसे संवैधानिक पदक को आदेश नहीं दे सकती। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ‘सुपर संसद’ बनने की कोशिश में है।

इतना ही नहीं, जगदीप धनखड़ ने जस्टिस यशवंत वर्मा के घर से करोड़ों रुपए मिलने वाले मामले में भी सुप्रीम कोर्ट को घेरा है। उन्होंने सवाल किया कि अगर इतनी नगदी किसी आम आदमी के घर मिलती, तो उसी दिन कार्रवाई हो जाती।

उपराष्ट्रपति रहते हुए जगदीप धनखड़ ने वर्ष 2022 में न्यायिक नियुक्ति बिल (NJAC) को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट पर प्रश्न उठाए थे। मोदी सरकार द्वारा पास किए गए कानून को सुप्रीम कोर्ट ने असंवैधानिक करार दिया था। इसके जरिए न्यायिक नियुक्तियों की व्यवस्था की गई थी। जगदीप धनखड़ ने इसे संसद की संप्रुभता के साथ समझौता करार दिया था।

राज्यसभा के सभापति के तौर पर वह हमेशा ही सक्रिय रहे और प्रमुख मुद्दों पर अपनी राय रखने से नहीं चूके।

‘सत्ता में रहते हुए किया ताकत का दुरुपयोग, अब कानून याद आ रहा’: समाजवादी पार्टी को सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा, सरकारी इमारत पर कब्जे को लेकर पूछा- ₹115 में कहीं बिल्डिंग किराए पर मिलती है?

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (21 pgneR 2025) को पीलीभीत में समाजवादी पार्टी के कार्यालय की जगह को सिर्फ 115 रुपए में हथियाने को लेकर धोखाधड़ी की बात कही है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग बताते हुए समाजवादी पार्टी को कड़ी फटकार लगाई।

पीलीभीत नगरपालिका परिषद ने अपने परिसर से सपा कार्यालय के बेदखली आदेश पर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी।

बार एंड बेंच की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट पीलीभीत नगर पालिका परिषद के बेदखली के आदेश पर सुनवाई कर रही थी। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जयमाल्य बागची की पीठ इस मामले पर सुनवाई कर रही थी। समाजवादी पार्टी की ओर से इस मामले पर सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ दवे ने अपना पक्ष रखा था।

दवे ने अपनी दलील में कहा था कि कार्यालय का किराया चुकाने के बाद भी नगरपालिका उसे बेदखल करना चाहती है। बेदखली के आदेश को रोकने के लिए याचिका भी डाली गई थी।

पीठ ने वकील से पूछा, “आपने परिसर कैसे लिया था?” इस पर वकील दवे की ओर से नगरपालिका की ओर से ‘आवंटित’ किए जाने की बात कही गई। इस पर पीठ ने कहा, “क्या आपने कभी नगरपालिका क्षेत्र में 115 रुपए पर कार्यालय की जगह के बारे में सुना है? यह सत्ता के दुरुपयोग को साफ तौर पर दिखलाता है।”

इसके बाद दवे ने दलील दी कि नगरपालिका अधिकारी इस तरह से हमारे परिसर पर ताला नहीं लगा सकते। उनकी दलीलों पर सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, “आप एक राजनीतिक पार्टी हैं। एक जगह पर कब्जा करने के लिए अपने पद और राजनीतिक शक्ति का दुरुपयोग किया। उस दौरान आपको प्रक्रिया नहीं याद रही। जब कार्रवाई होती है तो आपको सब कुछ याद आने लगता है।”

इसके बाद पार्टी के वकील ने 6 हफ्ते के लिए बेदखली रोकने की माँग कर डाली। इस पर पीठ ने कहा,” ये फर्जी आवंटन नहीं बल्कि फर्जी कब्जा है। आप एक धोखाधड़ी वाले कब्जे हैं।” इसके साथ ही कोर्ट ने सपा को सिविल कोर्ट जाने की हिदायत दी।

क्या है मामला

समाजवादी पार्टी में पीलीभीत नगर पालिका के अधिशासी अधिकारी कार्यालय की परिसर में 2005 में अपना कार्यालय बनाया था। उत्तर प्रदेश में सपा सरकार के दौरान उसे समय के अधिकारियों ने पार्टी को इस जगह को अस्थाई रूप से आमंत्रित भी कर दिया था। इसके बाद सपा नेताओं ने वहाँ पर जिला कार्यालय खोलकर निर्माण कर लिया।

इसके बाद 2018 से ही नगरपालिका इस जगह पर कब्जा हटवाने का प्रयास कर रही है। इसके खिलाफ सपा नेता स्थानीय कोर्ट और हाई कोर्ट तक जा चुके हैं। हाई कोर्ट ने 18 जून 2025 को नगर पालिका के पक्ष में अपना आदेश दिया। इसके बावजूद समाजवादी पार्टी ने अपना कब्जा नहीं हटाया।

इस साल कोर्ट की ओर से 10 जून 2025 को पार्टी को 17 जून तक कब्जा हटाने की नोटिस जारी की गई। 18 जून को जिला मजिस्ट्रेट विजय वर्धन तोमर कब्जा हटाने की कार्रवाई के लिए पहुँचे तो सपा नेताओं ने इसका विरोध कर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सुनवाई करते हुए अपनी टिप्पणी दी है।

60+ साल उड़ने के बाद रिटायर हो जाएगा वायुसेना का MiG-21, चंडीगढ़ में होगा विदाई समारोह: 800+ हुए IAF में शामिल, 1965 के बाद हर युद्ध में लिया हिस्सा

भारतीय वायुसेना सितम्बर, 2025 में अपने अंतिम MiG-21 विमानों को रिटायर कर देगी। इनकी विदाई के लिए एक ख़ास समारोह का आयोजन किया जाएगा। MiG-21 देश में सबसे अधिक समय तक सेवा देने वाला लड़ाकू विमान रहा है। उसकी विदाई के बाद भारतीय वायु सेना की घटती विमानों की समस्या और गहरी हो जाएगी।

इकॉनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वायु सेना में सेवा दे रहे अंतिम MiG-21 विमानों को सितम्बर, 2025 में रिटायर किया जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार, इन्हें रिटायर करने से पहले चंडीगढ़ एयरबेस में समारोह में अधिकारिक विदाई दी जाएगी। यह समारोह 19 सितम्बर, 2025 को होने वाला है।

भारतीय वायुसेना में अभी 23वीं स्क्वाड्रन में MiG-21 सेवाएँ दे रहे हैं। इस स्क्वाड्रन को पैंथर्स के नाम से जाना जाता है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वर्तमान में भारतीय वायु सेना में लगभग 30 के आस-पास MiG-21 सेवाएँ दे रहे हैं। इनकी सेवा की अवधि पूरी हो चुकी है और अब यह पुराने हो चुके हैं।

MiG-21 को अंतिम रूप से रिटायर करने के लिए लम्बे समय से कोशिश चल रही थी। हालाँकि, विमानों की कमी और नए विमान ना आने के चलते भारतीय वायु सेना इन्हें रिटायर नहीं कर पा रही थी। इन्हें पहले LCA तेजस से रिप्लेस करने की योजना बनाई गई थी। हालाँकि, उनकी आपूर्ति रुक गई है।

MiG-21 विमानों ने भारतीय वायु सेना ने 60 वर्षों से अधिक सेवाएँ दी हैं। इन्हें 1963 में भारतीय वायु सेना में शामिल किया गया था। MiG-21 लड़ाकू विमान सोवियत संघ से खरीदे गए थे। इनको बाद में हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड (HAL) ने भारत में भी बनाया है।

MiG-21 भारतीय वायु सेना में शामिल होने पहले ऐसे विमान थे, जो सुपरसोनिक स्पीड (1236 KM/h+) पर उड़ते थे। यह काफी हलके भी थे इसलिए इन्हें दूसरे विमानों के खिलाफ किसी युद्ध में इस्तेमाल करना भी आसान था।

भारतीय वायु सेना में 1963 के बाद से लगभग 800 MiG-21 विमान शामिल किए गए थे। यह भारतीय वायु सेना में सबसे अधिक संख्या में शामिल होने वाला विमान रहा है। 6 दशक की सेवा में इसने 1965, 1971 और 1999 के कारगिल युद्ध में भाग लिया।

MiG-21 ने इसके अलावा ऑपरेशन मेघदूत और बाकी सैन्य अभियानों में हिस्सा लिया है। यह विश्व का सबसे अधिक निर्माण किया जाने वाला लड़ाकू विमान भी है। इसे विश्व के लगभग 60 देशों ने इस्तेमाल किया है। भारत इसके शुरूआती उपयोगकर्ताओं में से एक था।

‘घर में पूजा-पाठ से चिढ़ती थीं दोनों बहनें, पूरे परिवार को बनाना चाहती थी मुस्लिम’: ‘ऑपरेशन अस्मिता’ से लाई गईं वापस, पिता ने CM योगी को कहा थैंक्यू

आगरा में धर्मांतरण के गिरोह से बच कर घर वापसी करने वाली आगरा की दोनों बहनों को लेकर परिवार ने नए खुलासे किए हैं। उनके माता-पिता का कहना है कि वे गिरोह के चंगुल में पूरी तरह फँस चुकी थी। दोनों पूजा-पाठ का विरोध भी करती थी।

जानकारी के अनुसार, रविवार (20 जुलाई 2025) उनके माता-पिता ने को आगरा कैंप कार्यालय पहुँचकर पुलिस आयुक्त से मुलाकात की। पिता का कहना है कि उनकी बेटियों का पूरी तरह से ब्रेनवॉश किया गया था। वह अपने धर्म के बारे में बात करना भी पसंद नहीं करती थीं।

इतना ही नहीं दोनों बहनें अपनी परिवार के लोगों पर भी धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाती थी। रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तर प्रदेश पुलिस ने कुछ दिनों पहले ‘ऑपरेशन अस्मिता’ अभियान चलाया था। इसमें एक बड़ा धर्मांतरण गिरोह पकड़ा गया था।

अभियान के तहत छह राज्यों से कुल 10 लोग गिरफ्तार हुए थे। ये सभी आरोपित लव जिहाद के जरिए धर्मांतरण कराते थे। पुलिस के अनुसार गिरोह ISIS जैसे आतंकी संगठन की तरह काम करता था।

कैसे मिली थी आगरा की दो सगी बहनें?

मार्च 2025 में आगरा के सदर बाजार थाने में दो सगी बहनों के गायब होने की रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। दोनों बहनें अपना फोन भी साथ नहीं ले गई थी और सोशल मीडिया पर अपने असली नामों से एक्टिव नहीं थी, इसलिए पुलिस को भी उनकी कोई जानकारी नहीं मिल पा रही थी।

अंत में परिवार से मिली जानकारी के आधार पर साइबर सेल ने कमान सँभाली। इस दौरान उन्हें इंस्टाग्राम पर एक ‘कनेक्टिंग रिवर्ट आईडी’ मिली। इस आईडी से जो भी लोग जुड़े थे उनकी जाँच की गई। पुलिस की एक महिला दारोगा ने फेक नाम बताकर खुद के धर्मांतरण के लिए संपर्क किया।

इस पर उन्हें जवाब भी आता है। जवाब देने वाली एक महिला होती है। कोलकाता को लोकेशन मिलने के बाद वहाँ एसीपी के साथ चार टीमें भेजी गईं। दिल्ली, राजस्थान, गोवा, उत्तराखंड और यूपी के बाकी इलाकों में भी टीमें भेजी गईं, जिनमें चार से पाँच पुलिसकर्मी थे।

एक ही समय पर पुलिस ने सभी 6 राज्यों में छापा मारा। 50 पुलिसकर्मियों ने चार दिन तक हर गतिविधि पर नजर रखा। अंत में दोनों बहनों को भी बरामद कर लिया गया और गिरोह का भी पर्दाफाश हुआ।

घर वापसी करने वाली लड़कियों के माता-पिता ने कहा कि चार साल से बेटियाँ गिरोह के चंगुल में थीं। उन्होंने उनकी वापसी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और आगरा पुलिस को धन्यवाद कहा है।

जानकारी के अनुसार, इस मामले में एक और बड़ी सफलता हासिल करते हुए ATS और IB ने दिल्ली के मुस्तफाबाद इलाके से मास्टरमाइंड अब्दुल रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया है। अधिकारियों के अनुसार, अब्दुल रहमान को हाल ही में आगरा में सामने आए बड़े पैमाने पर धर्मांतरण रैकेट का मुख्य सूत्रधार माना जा रहा है।

अब्दुल रहमान के घर की तलाशी ली गई थी, तो वहाँ से बड़ी संख्या में किताबें बरामद की गईं, जिनका उद्देश्य हिंदुओं का धर्मांतरण के लिए ब्रेनवॉश करना था।

‘असम में 4 साल में छुड़ाई 1.29 लाख बीघा जमीन’: असम के घुसपैठियों और बांग्लादेशी मुस्लिमों को CM हिमंता का साफ संदेश – ‘हम डर जाएँगे, ये गलतफहमी है’

असम में लगभग 29 लाख बीघा जमीन पर ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए और संदिग्ध नागरिकों’ का कब्जा है। यह दावा प्रदेश के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने किया है। सीएम ने कहा कि साल 2021 में बीजेपी सरकार आने के बाद जमीन खाली करने का अभियान चलाया गया, लेकिन उनपर इसी रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव बनाया गया।

दरअसल, सीएम ने यह बातें सोमवार (21 जुलाई 2025) को दरंग जिले में गोरुखुटी में गोरुखुटी बहुउद्देशीय कृषि परियोजना की चौथी वर्षगाँठ के अवसर पर आयोजित एक समारोह को संबोधित करते हुए कहीं। इस परियोजना को साल 2021 में शुरू किया गया था, जिसके तहत अब तक 77,420 बीघा जमीन को अतिक्रमण से साफ कर दिया गया है। इसमें अधिकतर बंगाल के मुस्लिमों का कब्जा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सीएम सरमा ने कहा, “दरंग जिले में अभियान की सफलता के बाद बोरसोल्ला, लुमडिंग, बुरहापहाड़, पाभा, बतद्रा, चापर और पैकन में भी इस अभियान को चलाया गया। पिछले 4 वर्षों में हमने 1.29 लाख बीघा कब्जे वाली जमीन को मुक्त कराया है। अब इस जमीन का एक बड़ा हिस्सा जंगल बनाने के लिए और प्रदेश की जनता के लिए उपयोग में लाया जा रहा है।”

उन्होंने आगे कहा, “अगर कोई सोचता है कि दो-तीन अभियानों के बाद हम डर जाएंगे, उनकी आँखों में आँखें नहीं डालेंगे और झुक जाएंगे तो वे गलतफहमी में हैं। असम आंदोलन के शहीदों का बदला जरूर लिया जाएगा।” उन्होंने कहा कि 1983 से 1985 के बीच असम आंदोलन के दौरान लोगों में हार की भावना आ गई थी और कई लोगों ने कांग्रेस के आगे ‘समर्पण’ कर दिया था, जिससे प्रदेश में राजनीति की दिशा बदल गई थी।

शंकर-माधव की जगह शंकर-अजान कहने लगे थे

सीएम सरमा ने कहा, किसी समय पर शंकर-माधव की जगह हम शंकर-अजान कहने लगे। अजान पीर अपनी जगह पर रहेंगे, लेकिन माधव (माधवदेव) का भी अपना स्थान है। तभी हमारी ‘जाति’ बच सकती है। श्रीमंत शंकरदेव और श्री श्री माधवदेव असम के पूज्य वैष्णव संत हैं, जबकि अजान पीर एक मुस्लिम सत थे, जो 17वीं सदी में इराक से असम आए थे।

गोलपाड़ा में 1000 बीघा से अधिक जमीन से हटाया अतिक्रमण

असम की हिमंता सरकार प्रदेश की डेमोग्राफी रक्षा के लिए लगातार कार्रवाई कर रही है। बेदखली अभियान के तहत जगह-जगह अतिक्रमण भूमि को मुक्त कराया गया। 12 जुलाई 2025 को गोलपाड़ा जिले में पैकन रिजर्व फोरेस्ट में बेदखली अभियान चलाया गया था। यहाँ 140 हेक्टेयर (1038 से 1040 बीघा) तक वन भूमि पर अधिकतर बांग्लादेशी मुस्लिमों का अवैध कब्जा था।

गोलपाड़ा के डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर तेजस मारिस्वामी ने बताया कि 1,080 परिवारों ने यहाँ घर बना रखे थे। इनमें से ज्यादातर बंगालादेशी मूल के मुसलमान थे, जो पड़ोसी इलाकों या बांग्लादेश से आकर बसे हुए थे। अभियान में 36 बुलडोजर लगाए गए, इलाके को 6 ब्लॉकों में बाँटा गया। करीब 2,500 से 2,700 संरचनाएँ (घर, दुकानें) ढहाई गईं। सुरक्षा के लिए 1,000 से ज्यादा पुलिस और फॉरेस्ट गार्ड तैनात थे।

ममता बनर्जी ने ‘बंगालियों पर अत्याचार’ का लगाया आरोप

हाल ही में असम में घुसपैठियों और अवैध कब्जे हटाने को लेकर सीएम हिमंता बिस्वा सरमा और पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी के बीच सोशल मीडिया पर वाकयुद्ध छिड़ गया था। ममता दीदी ने कहा था कि असम में बंगाली जनसंख्या को निशाना बनकर हिमंता सरकार उत्पीड़न कर रही है, उन्होंने इसे बीजेपी का विभाजन का एजेंडा बताया था।

इसका जवाब देते हुए सीएम सरमा ने कहा कि असम में बंगालियों से नहीं बल्कि मुस्लिम घुसपैठिए को हटाया जा रहा है। सीएम ने सुप्रीम कोर्ट के बयान का भी जिक्र किया, जिसमें घुसपैठ को बाहरी आक्रमण कहा गया है।

‘कबॉट्स केवल गॉड से बात करते हैं’: कौन हैं ‘बोस्टन ब्राह्मण’, अमेरिका को आबाद करने में इनका कितना योगदान, कोल्डप्ले स्कैंडल के बाद क्यों हो रही चर्चा?

हाल ही में एक कोल्डप्ले कंसर्ट ने दुनिया भर में हलचल मचा दी, जब एक किस कैम ने एस्ट्रोनॉमर कंपनी की HR एक्जीक्यूटिव क्रिस्टी कबॉट को उनके CEO एंडी बायरन के साथ गले लगाते हुए कैद कर लिया। दोनों शादीशुदा हैं, लेकिन कंसर्ट में वे एक-दूसरे के करीब नजर आए। क्रिस्टी ने कैमरे से मुँह छिपाने की कोशिश की, जबकि एंडी ने चेहरा फेर लिया।

इस वीडियो ने सोशल मीडिया पर तूफान ला दिया और कोल्डप्ले के सिंगर क्रिस मार्टिन ने मजाक में कहा कि या तो ये अफेयर है या वे बहुत शर्मीले हैं। क्रिस्टी अब कंपनी से छुट्टी पर हैं और ये स्कैंडल अब सिर्फ एक ऑफिस रोमांस से ज्यादा बन गया है।

इस घटना ने क्रिस्टी के पति एंड्र्यू कबॉट की फैमिली को फिर से दुनिया की नजरों में ला दिया। एंड्र्यू प्राइवेटियर रम कंपनी के मालिक हैं और कबॉट फैमिली बोस्टन की सबसे पुरानी और अमीर फैमिलीज में से एक है। बोस्टन की ये फैमिलीज ‘बोस्टन ब्राह्मण’ के नाम से जानी जाती है। ये फैमिली सदियों से न्यू इंग्लैंड की सत्ता और संस्कृति पर छाई हुई है।

इस स्कैंडल ने न सिर्फ व्यक्तिगत जीवन पर सवाल उठाए, बल्कि अमेरिका की इस पुरानी एलीट क्लास की परतें भी खोल दीं, जहाँ धन, परंपरा और गोपनीयता का बोलबाला है। ऐसे में अब हिंदुस्तान के लोग भी जानना चाहते हैं कि ये बोस्टन ब्राह्मण कौन हैं, और कबॉट फैमिली की ये पहचान कैसे बनी।

अमेरिका में बसे सबसे पुराने यूरोपीय परिवारों में से एक

कबॉट फैमिली बोस्टन की उन चुनिंदा फैमिलीज में से एक है, जिन्हें ‘फर्स्ट फैमिलीज ऑफ बोस्टन’ कहा जाता है। ये फैमिली 10 पीढ़ियों से न्यू इंग्लैंड में बसी हुई है और इनकी जड़ें 17वीं सदी के यूरोपीय आप्रवासियों से जुड़ी हैं। फैमिली की शुरुआत जॉन कबॉट से हुई, जो 1680 में जर्सी द्वीप (ब्रिटिश क्राउन डिपेंडेंसी) से सलेम, मैसाचुसेट्स आए थे।

कबॉट फैमिली के जॉन और उनके बेटे जोसेफ कबॉट ने जहाजरानी का बिजनेस शुरू किया, जो अफीम, रम और गुलामों की तस्करी तक फैला। 18वीं सदी में ये बोस्टन के सबसे अमीर मर्चेंट बन गए। उनके बेटों जोसेफ जूनियर, जॉर्ज और सैमुअल ने हार्वर्ड यूनिवर्सिटी छोड़कर शिपिंग में हाथ आजमाया और फैमिली की दौलत को आसमान छू लिया।

कबॉट फैमिली की अमीरी का राज कई बिजनेस में छिपा है। शुरुआत में शिपिंग से, फिर 19वीं सदी में कार्बन ब्लैक (सूट) का व्यापार, जो कार के टायरों में इस्तेमाल होता है। गॉडफ्रे लॉवेल कबॉट ने 1861 में कबॉट कॉर्पोरेशन की नींव रखी, जो आज दुनिया की सबसे बड़ी कार्बन ब्लैक प्रोड्यूसर है। इसके अलावा एंड्र्यू कबॉट (क्रिस्टी कबॉट के पति) प्राइवेटियर रम के छठे जनरेशन के मालिक हैं, जो फैमिली का पुराना ब्रैंड है।

1972 में न्यू यॉर्क टाइम्स ने फैमिली की दौलत को 200 मिलियन डॉलर आँका था, जो आज के हिसाब से करीब 15.4 बिलियन डॉलर (करीब 1.3 लाख करोड़ रुपये) है। फैमिली ने हार्वर्ड, MIT, नॉर्विच यूनिवर्सिटी और पर्किन्स स्कूल फॉर ब्लाइंड जैसी संस्थाओं को दान दिए। राजनीति में भी इनका दबदबा रहा। इस परिवार के जॉर्ज कबॉट सीनेटर थे, हेनरी कबॉट लॉज राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार और जॉन मूर्स कबॉट कई देशों में अमेरिकी राजदूत।

फैमिली के वारिस फ्रांसिस कबॉट ने मजाक में कहा कि वे दो चीजों में इंटरेस्टेड हैं- अमीर औरतों से शादी और ग्रुप सिंगिंग। आज क्रिस्टी और एंड्र्यू का 2.2 मिलियन डॉलर का घर न्यू हैम्पशायर में है, लेकिन फैमिली की असली ताकत उनकी पुरानी दौलत और कनेक्शंस में है।

बोस्टन ब्राह्मण होने का मतलब है एलीट

बोस्टन ब्राह्मण अमेरिका की वो पुरानी एलीट क्लास है, जो 18वीं से 20वीं सदी तक न्यू इंग्लैंड की संस्कृति, राजनीति, अर्थव्यवस्था और समाज पर छाई रही। ये ज्यादातर व्हाइट एंग्लो-सैक्सन प्रोटेस्टेंट (WASP) फैमिलीज हैं, जो पुरिटन कॉलोनिस्ट्स के वंशज हैं। नाम ‘बोस्टन ब्राह्मण’ 1861 में ओलिवर वेंडेल होम्स सीनियर ने अपनी किताब ‘एल्सी वेनर’ में गढ़ा। उन्होंने बोस्टन की ऊपरी क्लास को ‘ब्राह्मण कास्ट ऑफ न्यू इंग्लैंड’ कहा, क्योंकि वे खुद को एक चमकती हुई शहर बनाने के लिए चुने हुए मानते थे- कड़ी मेहनत, किफायत, संस्कृति और शिक्षा पर जोर। ये फैमिलीज जैसे एपल्टन, बेकन, कबॉट, कूलिज, फोर्ब्स, लॉज, लॉवेल, पर्किन्स, रसेल, साल्टनस्टॉल, शॉ और विंथ्रोप- पुरानी दौलत और विरासत पर टिकी हैं।

इनकी पहचान कैसे बनी?

17वीं सदी में इंग्लैंड से आए पुरिटन्स ने बोस्टन को बसाया। 18वीं सदी में शिपिंग, मर्चेंट ट्रेड और बैंकिंग से अमीर बने। 19वीं सदी तक वे बोस्टन की अर्थव्यवस्था पर काबिज थे- चाइना ट्रेड, रेलरोड, टेक्सटाइल मिल्स। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी उनके कंट्रोल में थी, जहाँ वे पढ़ते और पढ़ाते थे। वे संस्कृति के संरक्षक बने, जिसमें उन्होंने बोस्टन सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा, म्यूजियम ऑफ फाइन आर्ट्स, बोस्टन एथेनियम जैसी संस्थाएँ बनाईं। उन्होंने राजनीति में मौजूदा समय की पार्टी रिपब्लिक्स को भी सहयोग दिया। हालाँकि इन परिवारों ने प्रवासियों के साथ बुरा किया, साथ ही ईसाईयों में भी वो आयरिश कैथोलिकों से दूरी बरतते रहे।

भारत के ब्राह्मणों से बिल्कुल अलग हैं ये एलीट ब्राह्मण

ये भारत के ब्राह्मणों से बिलकुल अलग हैं। भारत में ब्राह्मण धार्मिक कास्ट है – जो वेदों, पूजा और ज्ञान के रखवाले हैं, जन्म से तय। बोस्टन ब्राह्मण कोई धार्मिक ग्रुप नहीं, बल्कि सेकुलर एलीट क्लास है, जो दौलत, शिक्षा और विरासत पर आधारित। वे यूनिटेरियन या एपिस्कोपल चर्च फॉलो करते हैं, लेकिन रिलिजन से ज्यादा कल्चर पर जोर।

नाम में भारत की छाया इसलिए है क्योंकि होम्स ने हिंदू ब्राह्मणों की तरह उन्हें हाईएस्ट इंटेलेक्चुअल क्लास माना। भारत के ब्राह्मण रिलिजियस ड्यूटीज निभाते हैं, जबकि बोस्टन वाले बिजनेस और सोसाइटी लीड करते हैं। अंतर ये कि बोस्टन ब्राह्मणों में मैरिज से एंट्री हो सकती है, जबकि भारत में कास्ट जन्म से फिक्स।

धार्मिक आजादी के लिए अमेरिका आए, और सबको दी भी

बोस्टन ब्राह्मणों की कहानी इंग्लैंड और कुछ हॉलैंड से शुरू होती है। 17वीं सदी में पुरिटन्स- इंग्लिश प्रोटेस्टेंट्स जो चर्च ऑफ इंग्लैंड से असहमत थे- धार्मिक आजादी के लिए अमेरिका आए। 1620 में मेफ्लावर जहाज से प्लिमथ कॉलोनी बसाई। 1630 में जॉन विंथ्रोप ने बोस्टन की नींव रखी, जो ‘शाइनिंग सिटी ऑन ए हिल’ बनना था। कुछ डच भी आए, लेकिन मेनली इंग्लिश गेंट्री और मजिस्ट्रेट्स के वंशज। वे मैसाचुसेट्स में सेटल हुए, फार्मिंग से ट्रेड में शिफ्ट हुए। 18वीं सदी में ब्रिटिश ट्रूप्स से लड़कर इंडिपेंडेंस जीती। 19वीं सदी में इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन से अमीर बने, जैसे फ्रांसिस कबॉट लॉवेल ने टेक्सटाइल मिल्स शुरू कीं।

इन्हीं बोस्टन ब्राह्मणों का बसाया हुआ है आज का अमेरिका

असल में आज का अमेरिका काफी हद तक इन्हीं बोस्टन ब्राह्मणों का बसाया हुआ है। वे फाउंडिंग फादर्स के डिसेंडेंट्स हैं, जैसे जॉन एडम्स, जॉन क्विंसी एडम्स। उन्होंने बोस्टन लैटिन स्कूल (अमेरिका का पहला हाईस्कूल), हार्वर्ड, एंडोवर, फिलिप्स एक्सेटर जैसे एलीट स्कूल्स बनाए।

अर्थव्यवस्था में रेलरोड, यूनियन पैसिफिक, जनरल इलेक्ट्रिक जैसी कंपनियाँ फंड कीं। कल्चर में लिटरेचर (हॉथोर्न, एमर्सन), म्यूजियम्स, ऑर्केस्ट्रा दिए। राजनीति में जॉन केरी, हेनरी कबॉट लॉज जैसे लीडर्स दिए। वे अमेरिका को ‘अरिस्टोक्रेसी ऑफ वेल्थ’ बनाना चाहते थे, लेकिन डेमोक्रेसी से टकराते रहे।

ये एलीट क्लास है, जहाँ दौलत से ज्यादा रेस्ट्रेंट और ट्रेडिशन मायने रखते हैं। उनका बातचीत का अंदाज रिजर्व्ड और ब्रिटिश-टिंग्ड एक्सेंट वाला है, जैसे ‘कॉड’ को ‘काह्ड’ बोलना। उनका उच्चारण अंग्रेजों के अधिक करीब है और इसे उन्होंने बरकरार रखा।
पहनावे के मामले में भी बोस्टन ब्राह्मण सबसे अलग दिखते हैं। वो चमकदार कपड़े नहीं पहनते, लेकिन अच्छे सूट पहनना अपनी परंपरा का हिस्सा समझते हैं।

डाइट एक ट्रेडिशनल यानी पक्की। हर संडे रोस्ट बीफ और मंडे कोल्ड लेफ्टओवर्स, जिससे ‘कोल्ड रोस्ट बोस्टन’ फ्रेज आया, जिसे अपने यहाँ बासी खाना कहते हैं। शादी विवाह के मामले में भी काफी कड़े नियम हैं। बोस्टन फैमिली की शादियाँ अक्सर बोस्टन फैमिली में ही होती हैं, या फिर काफी अमीर घरानों में।

बोस्टन ब्राह्मण आर्ट्स, चैरिटी, कम्युनिटी लीडरशिप में सक्रिय भूमिका निभाते हैं, लेकिन किसी भी तरह के विवाद से खुद को दूर रखते हैं।

एलीटिज्म का उड़ता रहा है मजाक

कविता ‘कबॉट्स टॉक ओनली टू गॉड’ इस क्लास की हाईब्रो एटीट्यूड को कैद करती है-

“एंड दिस इज गुड ओल्ड बोस्टन

द होम ऑफ द बीन एंड द कॉड

वेयर द लॉवेल्स टॉक ओनली टू कबॉट्स

एंड द कबॉट्स टॉक ओनली टू गॉड।

इसे जॉन कोलिंस बॉसिडी ने लिखा था, जो बोस्टन की एलीट की हाई सोसाइटी को मजाक उड़ाती है। कबॉट फैमिली अपर क्लास इसलिए है क्योंकि वे पुरानी दौलत (ओल्ड मनी) के मालिक हैं, नई अमीरी (न्यू मनी) से अलग। वे अमीर हैं क्योंकि सदियों से ट्रेड, इंडस्ट्री और इन्वेस्टमेंट्स से- शिपिंग से कार्बन ब्लैक तक। लेकिन उनकी अमीरी दिखावे में नहीं, बल्कि पावर और इंस्टीट्यूशंस में है। केनेडी फैमिली जैसी आयरिश-कैथोलिक डायनेस्टी को वे बाद की बात मानते हैं और भाव नहीं देते।

कबॉट फैमिली के बारे में सबकुछ जानें तो पता चलता कि वे बोस्टन ब्राह्मणों का परफेक्ट उदाहरण हैं। जॉन कबॉट से शुरू होकर उन्होंने स्लेव और ओपियम ट्रेड से दौलत बनाई, लेकिन बाद में चैरिटी से इमेज साफ की। पॉल कोडमैन कबॉट ने अमेरिका का पहला म्यूचुअल फंड बनाया,और फैमिली हार्वर्ड की एंडाउमेंट को मैनेज करती। वे अपर क्लास हैं क्योंकि सोसाइटी में उनका स्टेटस जन्म से मिलता है, न कि सिर्फ पैसों से।

आज भी वे प्राइवेट क्लब्स, एलीट स्कूल्स और बिजनेस में छाए हैं। लेकिन कोल्ड प्ले जैसे स्कैंडल्स उनकी सीक्रेसी को चैलेंज करते हैं। बोस्टन ब्राह्मण अमेरिका की अरिस्टोक्रेसी हैं, जो हिंदुस्तान के लोगों को बताते हैं कि पुरानी दौलत कैसे दुनिया चलाती है।

भारतीय सेना में AI टास्क फोर्स, ऑपरेशन सिंदूर के बाद तैयार हुआ रोडमैप: 2027 तक बन जाएगा सिस्टम, जानिए कैसे मिनटों में दुश्मन का काम होगा तमाम

भारतीय सेना जल्द ही अपने कामकाज में AI का इस्तेमाल करेगी। इसके जरिए दुश्मन की पहचान की जाएगी और उसको निशाना बनाया जाएगा। AI और बिग डाटा को लेकर यह तैयारी सेना युद्धस्तर पर कर रही है। सेना AI को लेकर अपनी खुद की लैब तक स्थापित कर रही है। सेना इस पर पहले से काम कर रही थी लेकिन ऑपरेशन सिंदूर के बाद और तेजी आ गई है। सेना ने इस काम के लिए एक जनरल स्तर के अधिकारी को जिम्मेदारी दी है।

बन गया रोडमैप

इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेना न एक बड़ा रोडमैप बनाया है। इसके तहत सेना AI, मशीन लर्निंग और बिग डाटा जैसी तकनीकों को अपनी लड़ाई में शामिल करना चाहती है। इनका इस्तेमाल ड्रोन और हवाई हमलों आदि में किया जाएगा।

AI सॉफ्टवेयर और तकनीक का इस्तेमाल करके राडार, सेंसर और सैटेलाइट का डाटा एनालाइज करने के लिए किया जाएगा। इससे दुश्मन के विषय में जल्द पता लग सकेगा। इसके अलावा उन रिपोर्ट्स और गड़बड़ी को पहचानने में भी सेना का AI कारगर होगा, जिसने कोई खतरा पैदा होता है।

सेना का AI इस सब का इस्तेमाल करके फैसले लेने में सक्षम होगा और यह जानकारी भी उन जवानों या विमानों, जहाजों तक भी पहुँचाई जाएगी, इससे उन्हें दुश्मन की लोकेशन और उसकी क्षमताओं के विषय में भी पता चल सकेगा।

काउंटर इंटेलीजेंस में भी होगा इस्तेमाल

AI का इस्तेमाल सेना काउंटर इंटेलीजेंस में भी करेगी। इसके अलावा ताजा सूचनाओं का विश्लेषण करने, सोशल मीडिया पर नजर रखने और सप्लाई चेन तक की समस्या हल करने के लिए किया जाएगा। AI का इस्तेमाल सेना हथियारों की तैनाती में भी कर सकती है।

AI का इस्तेमाल करके तोपें या टैंक उन जगह लगाए जा सकते हैं जहाँ दुश्मन की एक्टिविटी पहचानी गई हो। इसके अलावा सेना AI तकनीक के जरिए अपने हथियारों का मेंटेनेंस करने तक में कर सकती है। इससे उसकी युद्ध को लेकर तैयारी भी तेज रहेगी।

सेना AI के जरिए उन जगहों तक की जानकारी निकालने के प्रयास में है, जहाँ GPS भी काम नहीं करता। सेना यह मिशन जल्द पूरा करने के मोड में है और इसके लिए उसने तैयारी भी तेज रखी हुई है। सेना अपनी AI तकनीक का एयरफोर्स और नेवी के साथ भी तालमेल बिठाएगी।

2026-27 तक बन जाएँगे सिस्टम

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने बताया है कि सेना AI और मशीन लर्निंग के यह सिस्टम्स 2026-27 तक बनाना चाह रही है। सेना ने इस मिशन के लिए डायरेक्टरेट जनरल ऑफ़ इनफार्मेशन सिस्टम्स (DGIS) के तहत एक AI लैब बनाई है। DGIS को देखने वाला अधिकारी तीन स्टार और लेफ्टिनेंट जनरल रैंक का अधिकारी होता है।

इसमें तेजी ऑपरेशन सिंदूर के बाद आई है। सेना ऐसे ऑपरेशन में ली गई सीख का इस्तेमाल AI को सिखाने में करना चाहती है, जिससे आगे अगर कभी ऐसी स्थिति बने तो वह तकनीकी तौर पर और सक्षम हो। अब AI के लिए एक टास्क फ़ोर्स भी बनाई जा रही है।

बच्चा नाम में लगा सकता है माँ का भी सरनेम, कलकत्ता हाई कोर्ट का फैसला: कहा-ये उसकी पहचान का हिस्सा, 14 साल की लड़की ने डाली थी याचिका

कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि कोई बच्चा अपनी माँ का उपनाम भी अपने नाम में लगा सकता है। कलकत्ता हाई कोर्ट ने कहा है कि किसी बच्चे का नाम उसकी पहचान का अभिन्न हिस्सा है। हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ एक नाबालिग बच्ची की याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जो अपनी माँ का नाम अपने उपनाम के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती थी। हाई कोर्ट ने उसे माँ का उपनाम इस्तेमाल करने की अनुमति दे दी है।

क्या कहा कलकत्ता हाई कोर्ट ने?

कलकत्ता हाई कोर्ट ने बच्ची के नाम में माता का उपनाम लगाने की अनुमति देते हुए कहा, “यह निर्णय इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि एक बच्चे का उपनाम, उसकी पहचान और उसके व्यक्तिगत विकास का एक अभिन्न अंग है और अदालतों ने लगातार यह कहा है कि जब तक नाम या उपनाम में परिवर्तन किसी तीसरे पक्ष के हित ना प्रभावित करता हो और बच्चे के हित में माँगा गया हो, तो इसकी अनुमति दे देनी चाहिए।”

हाई कोर्ट ने इसके बाद 14 वर्षीय बच्ची को अपने उपनाम में पिता की जगह माँ का उपनाम लिखने की अनुमति दे दी। हालाँकि, हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पिता का नाम किसी सरकारी दस्तावेज से निकाले जाने का असर उसके जैविक पिता के अधिकारों पर नहीं पड़ेगा।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि नाम में बदलाव के बावजूद लड़की अपनी पिता की सम्पत्ति की विरासत और बाकी मामलों में अधिकार रखेगी। हाई कोर्ट ने इसी के साथ चंद्रनगोर म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन को यह आदेश दिया कि नए उपनाम वाला यह जन्म प्रमाण पत्र 4 सप्ताह के भीतर 14 वर्षीय बालिका को जारी किया जाए।

क्या था मामला?

कलकत्ता हाई कोर्ट में माँ का उपनाम लेने सम्बन्धित यह याचिका एक 14 वर्षीय बालिका ने डाली थी। बालिका वर्तमान में कक्षा 9 की एक छात्रा है। बच्ची अपने माता-पिता के बीच तलाक के बाद माँ के साथ रहती है। बच्ची के माता-पिता का 2015 में तलाक हुआ था।

तलाक के बाद बच्ची और उसकी माँ ने ‘चटर्जी’ के जगह पर उपनाम ‘भट्टाचार्य’ को अपनाया। इसके चलते बच्ची के सरकारी दस्तावेजों में कहीं उपनाम चटर्जी तो कहीं भट्टाचार्य हो गया। उसने अपने उपनाम को बदलने के लिए नगर निगम को याचिका डाली थी, लेकिन उसकी इस अपील को इनकार कर दिया गया।

इसके बाद बच्ची ने हाई कोर्ट का रास्ता अपनाया। यहाँ बच्ची के पिता से भी जवाब माँगा गया लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। कोर्ट के भीतर नगर निगम ने दावा किया कि गृह मंत्रालय के नियमानुसार बच्चे का नाम नहीं बदला जा सकता। हालाँकि, बच्ची के वकील ने इसके विरोध में एक और ऐसे ही मामले का उदाहरण दिया।

इसके बाद कोर्ट ने दोनों पक्ष को सुनते हुए बच्ची के पक्ष में निर्णय दिया।