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अरुणाचल के CM ने चीन की कमजोर नस दबाई: जानिए क्यों कहा तिब्बत से लगती है हमारी सीमा, क्या ‘बफर स्टेट’ बना पड़ोसी बदल सकता है भारत?

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है जो भारत-चीन संबंधों में नई बहस छेड़ सकता है। प्रेमा खांडू ने कहा कि अरुणाचल की 1200 किलोमीटर लंबी सीमा तिब्बत से लगती है, चीन से बिलकुल नहीं। कोई भी भारतीय राज्य चीन का पड़ोसी नहीं है, क्योंकि तिब्बत को चीन ने जबरन कब्जा किया हुआ है।

खांडू ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि 1950 में चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया था और उसके बाद से दुनिया उसे चीन का हिस्सा मानती है, लेकिन हकीकत में अरुणाचल की 1200 किलोमीटर लंबी सीमा तिब्बत से लगती है। तिब्बत की अपनी अलग पहचान है और भारत का रिश्ता उसी से है, चीन से नहीं। खांडू ने 1914 के शिमला समझौते का हवाला दिया, जिसमें तिब्बत को अलग माना गया था। उन्होंने दलाई लामा के उत्तराधिकारी चुनने में चीन की दखलंदाजी को भी खारिज कर दिया, बोले कि ये तिब्बती बौद्धों का आंतरिक मामला है।

भारत के राज्य अरुणा प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू का ये बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि ये चीन की विस्तारवादी नीतियों पर सीधा हमला है। खासकर तब जब ये बयान तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के ठीक बाद आया है, जहाँ खांडू खुद शामिल हुए थे।

इस रिपोर्ट में हम इस बयान के मायने, इसकी टाइमिंग, तिब्बत पर चीन के कब्जे की कहानी, दलाई लामा का रोल और शी जिनपिंग की अगुवाई वाली चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की टेंशन को समझेंगे। ये भी जानेंगे कि ये मामला भारत के लिए कितना अहम है।

चीन पर सवाल उठाना मतलब नीतियों में परिवर्तन

पेमा खांडू का बयान सीधे-सीधे चीन की उस कहानी को चुनौती देता है जिसमें वो तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा बताता है। खांडू ने पीटीआई न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा, “हम तिब्बत के साथ सीमा साझा करते हैं, चीन के साथ नहीं।” उन्होंने ये भी जोड़ा कि अरुणाचल तीन अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ साझा करता है – भूटान के साथ 150 किलोमीटर, तिब्बत के साथ 1200 किलोमीटर और म्यांमार के साथ 550 किलोमीटर। कोई भारतीय राज्य चीन से सीधे नहीं जुड़ता।

ये बात इसलिए मायने रखती है क्योंकि चीन लंबे समय से अरुणाचल को अपना हिस्सा बताता रहा है, उसे ‘दक्षिण तिब्बत’ कहकर दावा करता है। खांडू का बयान ये कहता है कि चीन पहले तिब्बत पर कब्जा करके आया, वरना भारत का पड़ोसी तिब्बत होता, जो नेपाल या भूटान की तरह एक अलग देश या बफर स्टेट हो सकता था।

इसके मायने राजनीतिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक स्तर पर हैं। राजनीतिक रूप से, ये भारत की तरफ से चीन को संदेश है कि हम तुम्हारी विस्तारवादी कहानी को नहीं मानते। सांस्कृतिक रूप से, खांडू ने जोर दिया कि अरुणाचल की संस्कृति और भूगोल तिब्बत से जुड़े हैं, जहाँ बौद्ध धर्म की जड़ें गहरी हैं।

रणनीतिक रूप से ये सीमा विवाद को नया मोड़ दे सकता है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर डैम बना रहा है, जो खांडू ने ‘टिकिंग वॉटर बॉम्ब’ कहा है। अगर तिब्बत अलग होता, तो ये समस्या नहीं होती।

कुल मिलाकर ये बयान बताता है कि भारत अब चुप नहीं रहेगा, बल्कि तिब्बत की हकीकत को दुनिया के सामने रखेगा। इससे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) को झटका लग सकता है, क्योंकि ये उनके ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर सवाल उठाता है। अगर भारत जैसे बड़े देश तिब्बत को अलग मानने लगें, तो चीन की वैश्विक छवि पर असर पड़ेगा।

दलाई लामा के जन्मदिन के बाद आया बयान

अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का बयान 9 जुलाई 2025 को आया, ठीक दलाई लामा के 90वें जन्मदिन (6 जुलाई 2025) के कुछ दिनों बाद। खांडू खुद धर्मशाला में उस समारोह में शामिल हुए थे, जहाँ उन्होंने दलाई लामा को सम्मान दिया और तिब्बती संस्कृति की बात की।

ये टाइमिंग संयोग नहीं लगती। दलाई लामा ने 2 जुलाई 2025 को एक बयान जारी किया कि उनका उत्तराधिकारी होगा और वो तिब्बती बौद्ध परंपरा के मुताबिक चुना जाएगा, चीन का कोई रोल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी और चीन का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।

ये बयान चीन के लिए सीधा चैलेंज है, क्योंकि चीन दावा करता है कि वो दलाई लामा के उत्तराधिकारी को मंजूरी देगा। टाइमिंग इसलिए अहम है क्योंकि दलाई लामा 90 साल के हो चुके हैं और उनके बाद का सवाल बड़ा है। खांडू का बयान इसी समय आया, जब दुनिया तिब्बत मुद्दे पर ध्यान दे रही है। समारोह में हॉलीवुड स्टार रिचर्ड गेयर, केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू और अन्य नेता मौजूद थे।

ये दिखाता है कि भारत तिब्बत को सपोर्ट कर रहा है। कुल मिलाकर पेमा खांडू के बयान की टाइमिंग चीन को बताती है कि भारत अब आक्रामक रुख अपनाएगा, खासकर जब दलाई लामा का मुद्दा गर्म है।

तिब्बत पर चीन के कब्जे की कहानी

तिब्बत की कहानी समझने के लिए पीछे जाना पड़ेगा। तिब्बत दुनिया का सबसे ऊँचा पठार है, लगभग 24 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला। इसकी औसत ऊँचाई 4900 मीटर है, जिससे जुड़ी माउंट एवरेस्ट जैसी दुनिया की सबसे ऊँची पर्वतर चोटी है। तिब्बत एशिया की कई नदियों का स्रोत है। 1950 से पहले तिब्बत एक स्वतंत्र क्षेत्र था। 1913 में 13वें दलाई लामा ने इसे स्वतंत्र घोषित किया, लेकिन चीन दावा करता रहा कि ये उसका हिस्सा है। हकीकत ये है कि 1912 से 1949 तक चीन का तिब्बत पर कोई नियंत्रण नहीं था। दलाई लामा की सरकार ही चलती थी।

साल 1949 में चीन में माओ जेडोंग की कम्युनिस्ट सरकार बनी। उसने तिब्बत को अपना हिस्सा मानकर आक्रमण की योजना बनाई। 7 अक्टूबर 1950 को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने तिब्बत में घुसपैठ की। 19 अक्टूबर को चामडो शहर पर कब्जा कर लिया। उस समय तिब्बती सेना छोटी थी, विरोध नहीं कर पाई।

फिर 1951 में चीन ने तिब्बती नेताओं पर दबाव डालकर ’17 पॉइंट एग्रीमेंट’ करवाया। इसमें कहा गया कि तिब्बत को स्वायत्तता मिलेगी, बौद्ध धर्म का सम्मान होगा, लेकिन चीन की सेना ल्हासा (तिब्बत की राजधानी) में रहेगी। तिब्बती इसे जबरदस्ती का समझौता कहते हैं।

ये कब्जा क्रूर था। चीन ने तिब्बती संस्कृति को कुचलने की कोशिश की – मठ तोड़े, लोगों को मार डाला। 1959 में विद्रोह हुआ, दलाई लामा भारत भाग आए। आज भी तिब्बत में चीन का कब्जा है, लेकिन तिब्बती इसे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ कहते हैं। खांडू का बयान इसी इतिहास को याद दिलाता है कि तिब्बत अलग था, चीन ने जबरन लिया।

दलाई लामा ने शी जिनपिंग और चीन के हस्तक्षेप को बताया खतरा

दलाई लामा तिब्बत की आत्मा हैं। वे 1959 से भारत में निर्वासित हैं। हाल में उन्होंने चीन पर तीखा हमला बोला। 2025 में अपने जन्मदिन से पहले उन्होंने कहा कि चीन बौद्ध धर्म को जहर मानता है और इसे खत्म करने की साजिश रच रहा है, लेकिन सफल नहीं होगा। उन्होंने मंगोलिया से हिमालय तक बौद्ध अनुयायियों का जिक्र किया। शी जिनपिंग की अगुवाई वाली सीसीपी बौद्ध मठों को नष्ट कर रही है, लेकिन चीन में भी करोड़ों लोग बौद्ध हैं।

शी जिनपिंग के लिए ये मुश्किल है क्योंकि वे ‘सिनाइजेशन’ नीति चला रहे हैं, जहाँ तिब्बत को पूरी तरह चीनी बनाना चाहते हैं। दलाई लामा का उत्तराधिकारी का मुद्दा बड़ा है। चीन कहता है कि वो मंजूरी देगा, लेकिन दलाई ने साफ कहा कि उत्तराधिकारी ‘फ्री वर्ल्ड’ में जन्मेगा, चीन में नहीं।

खांडू ने भी कहा कि चीन का कोई रोल नहीं। ये शी को चिढ़ाएगा, क्योंकि चीन दलाई को ‘विभाजनकारी’ मानता है। हाल में एक चीनी जासूस को दलाई के कार्यक्रम में पकड़ा गया, जो चीन की जासूसी दिखाता है।

भारत बदल सकता है पड़ोसी, इसीलिए चीन की तड़प लाजिमी

खांडू का बयान ये सुझाता है कि भारत अपने पड़ोसी को ‘बदल’ सकता है – मतलब तिब्बत को अलग मानकर। अगर दुनिया तिब्बत को स्वतंत्र या अलग पहचान दे, तो चीन के लिए तिब्बत बफर स्टेट बन सकता है, जैसे नेपाल। चीन की टेंशन इसी से है। उसके लिए तिब्बत रणनीतिक है – पानी के स्रोत, खनिज और सीमा सुरक्षा। अगर भारत तिब्बत मुद्दे को उठाए, तो चीन की ‘वन चाइना’ पॉलिसी कमजोर होगी।

चीन तड़प रहा है क्योंकि हाल की घटनाएँ – दलाई लामा का बयान, पीएम मोदी का दलाई लामा को बधाई और अब पेमा खांडू का बयान… ये सब भारत की तरफ से हैं। चीन विरोध कर रहा है लेकिन भारत अब अपना स्टैंड ले रहा है। यही नहीं, भारत क्वाड के साथ मिलकर चीन को घेर भी रहा है। ऐसे में अगर तिब्बत मुद्दा अंतरराष्ट्रीय बने, तो चीन अलग-थलग पड़ सकता है।

तिब्बत की हकीकत को दुनिया के सामने लाने को तैयार है भारत

पेमा खांडू का बयान एक नई शुरुआत है। ये बताता है कि भारत अब तिब्बत की हकीकत को छिपाएगा नहीं। दलाई लामा के साथ खड़े होकर भारत चीन को संदेश दे रहा है कि हम अपनी सीमा और संस्कृति की रक्षा करेंगे। उनका ये बयान दोनों ही तरफ टेंशन बढ़ाएगा, लेकिन लंबे समय में भारत को फायदा देगा। तिब्बत की आजादी का सपना जिंदा है और खांडू जैसे नेता उसे आवाज दे रहे हैं। कुल मिलाकर ये बयान चीन को तड़पाने वाला है, लेकिन भारत के लिए मजबूती का संकेत।

‘छांगुर पीर’ भय-लालच से त्यागी को बनाता है वसीम अकरम, पंडित शंखधर के पास तीन तलाक से मुक्ति के लिए आती है शबनम: बिलबिलाओ मत, धर्मांतरण और घर वापसी का समझो फर्क

बलरामपुर के छांगुर पीर को हाल ही में उत्तर प्रदेश की पुलिस ने गिरफ्तार किया। छांगुर पीर अब तक दर्जनों हिन्दू महिलाओं का धर्मांतरण करवा चुका है। छांगुर पीर ने सैकड़ों करोड़ की फंडिंग ली है और लोगों को ब्रेनवॉश कर उनकी सम्पत्ति कब्जाई है। धर्मांतरण गैंग के इस सरगना पर कार्रवाई होते ही इस्लामी कट्टरपंथी गुट बिलबिला उठा है। उसने इस इस्लामी धर्मांतरण सरगना की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से चालू की है, जो स्वेछा से घर वापसी करने वालों की सहायता करते हैं।

छांगुर पीर पर कार्रवाई के बाद इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर अली त्यागी ने बरेली के KK शंखधर को निशाना बनाया है। इस्लामी कट्टरपंथी त्यागी ने जाति के आधार पर रेट तय करके धर्मांतरण करवाने वाले सरगना छांगुर और उन KK शंखधर को एक पंक्ति में खड़ा कर दिया है, जिनके पास लोग खुद घर वापसी करने आते हैं और जिनका हर कदम कानूनी तौर पर सही है। इस्लामी कट्टरपंथियों का यह दर्द छांगुर पीर पर UP पुलिस, UPATS और ED की कार्रवाई के बाद छलका है।

जानिए छांगुर पीर के कारनामे

बलरामपुर के गाँव रेहरामाफ़ी में करोड़ों की कोठी बना कर रहने वाले धर्मांतरण सरगना छांगुर पीर धर्मांतरण का पूरा नेटवर्क चलाता था। इसके लिए विदेशों से फंडिंग की जा रही थी। अब सामने आया है कि वह सामाजिंक संगठनों के नाम पर बैंक में खाता खुलवाता था। इसमें चंदा जुटाने और उसे विदेश भेजने के लिए इन संगठनों का इस्तेमाल करता था।

छांगुर पीर ने शिजर-ए-तैयब्बा नाम की किताब प्रकाशित कराई थी। इस किताब से आसपास के लोगों से इस्लाम का प्रचार-प्रसार कराता था। इस किताब को पढ़कर लोगों का ब्रेनवॉश करता था। छांगुर पीर ने लड़कियों की जाति के अनुसार धर्मांतरण की रकम तय कर रखी थी।

ब्राह्मण, क्षत्रिय व सरदार लड़कियों के लिए 15-16 लाख, पिछड़ी जाति के लिए 10-12 लाख और अन्य के लिए 8-10 लाख रुपए। उसके नेटवर्क को खाड़ी देशों से 100 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग मिली थी, जिससे पीर ने लग्जरी संपत्तियाँ, गाड़ियाँ व शोरूम खरीदे। गिरोह के पास 40 से ज्यादा बैंक खाते हैं, जिनमें भारी लेन-देन हुआ है।

जमालुद्दीन बाबा एक ऐसा नेटवर्क चलाता था जो गरीब और असहाय लोगों को इस्लाम कबूल करवाने के लिए ब्रेनवॉश करता था। वह खुद को ‘पीर बाबा’ या ‘हजरत बाबा’ कहलवाता था और ‘शिजर-ए-तैय्यबा’ नाम की किताब से इस्लाम का प्रचार करता था।

लोगों को पैसों, विदेश में नौकरी का लालच दिया जाता था और न मानने पर मुकदमे में फँसाने की धमकी दी जाती थी। मुंबई के एक सिंधी परिवार नवीन रोहरा, उनकी पत्नी नीतू और बेटी को ब्रेनवॉश कर मुस्लिम नाम (जमालुद्दीन, नसरीन और सबीहा) दिया गया।

लखनऊ में भी गुंजा गुप्ता नाम की हिंदू लड़की को एक मुस्लिम युवक ने ‘अमित’ बनकर फँसाया, फिर दरगाह ले जाकर उसका धर्म परिवर्तन कर उसे अलीना अंसारी बना दिया। ऐसे ही बलरामपुर, लखनऊ, बरेली जैसे शहरों में इसका ये षड्यंत्र फैल चुका था।

लड़कियों को प्रेम के जाल में फँसाकर फिर डर और लालच के जरिए धर्म बदलने पर मजबूर किया गया। कुछ मामलों में उन्हें छोड़ दिया गया,  कुछ को तीन तलाक दे दिया गया और कुछ के बारे में आरोप लगे कि उन्हें खाड़ी देशों और आतंकी संगठनों तक पहुँचाने की कोशिश की गई।

छांगुर पीर की सोच गजवा-ए-हिंद वाली थी। यह सोच भारत को इस्लामी राष्ट्र में बदलने की कोशिश कर रही है। इसके तहत भारत के खिलाफ नफरत फैलाना और युवाओं को भड़काकर उन्हें हिंसा की राह पर ले जाना लोगों का बहला फुसला कर धर्मांतरण करना होता है।

छांगुर पीर के इन कृत्यों के चलते उसकी कोठी तोड़ी जा चुकी है। उसके खिलाफ UPATS, पुलिस, ED समेत कई एजेंसियाँ FIR कर चुकी हैं और जाँच चल रही है। वह कोई संत महात्मा नहीं बल्कि एक इस्लामी कट्टरपंथी है।

बरेली के पंडित KK शंखधर कौन?

बरेली के पंडित शंखधर का उदाहरण छांगुर पीर के एकदम विपरीत है। पंडित शंखधर बरेली में अगस्तय मुनि आश्रम चलाते हैं। वह उन लड़कियों की सहायता करते हैं जो किन्हीं कारणों से स्वेच्छा से हिन्दू बनना चाहती हैं। वह ना कभी किसी पर दबाव बनाते हैं और ना ही किसी को लोभ लालच देकर उसकी घर वापसी का प्रयास करते हैं।

पंडित शंखधर मुख्य रूप से उन लड़कियों की सहायता करते हैं, जो किसी हिन्दू लड़के से प्रेम करती हैं और उनका इस्लामी परिवार इस काम के लिए राजी नहीं हो रहा। उन्होंने जिन लड़कियों की घर वापसी में सहायता की भी, वह स्वयं उनकी प्रशंसा करती हैं।

2022 में एक मुस्लिम युवती ने तीन तलाक के डर से सनातन धर्म अपनाया और हिंदु लड़के से शादी की थी। उसका नाम अमरीना है। अमरीना घर वापसी के बाद राधिका बन गई थी। राधिका ने बताया, “मैं बालिग हूँ। आधार कार्ड में मेरी जन्म तारीख 9 अगस्त 2000 है। हिंदुओं में तीन तलाक नहीं देते। यहाँ (इस्लाम में) तो पता नहीं कब तीन तलाक देकर घर से निकाल दिया जाए। हमारे पड़ोस के रहने वाली एक युवती का निकाह पाँच साल पहले हुआ था।”

उन्होंने आगे बताया, “उसके शौहर ने उसे पीट-पीटकर 3 तलाक देकर घर से निकाल दिया था। मैंने अपनी मर्जी से शादी की है। मेरा निर्णय मेरे भविष्य के लिए सुखद होगा। मेरे पति पप्पू जहाँ चाहेंगे, मैं वहाँ अपना गुजर-बसर कर लूँगी।” यह केवल एक उदाहरण है। पंडित शंखधर ने जिनकी घर वापसी करवाई है, वह ऐसी ही कहानियाँ बताते हैं।  

भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को अपना धर्म या मजहब चुनने की आजादी देता है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपना मजहब बदलता है और कोई व्यक्ति इसमें उसकी सहायता करता है तो यह कहीं भी कानूनी रूप से गलत नहीं है। यह काम पंडित KK शंखधर करते हैं। लेकिन अगर किसी पर दबाव बना कर, उसको पैसे का लालच देकर, उसके घर वालों को निशाना बना कर धर्मांतरण करवाए तो यह कानूनी तौर पर गलत है और छांगुर पीर इससे कहीं आगे तक था।

जिस लाल सागर में हूती विद्रोहियों ने जहाज डुबोया, उससे आता है भारत का तेल-गैस: जानिए क्यों दुनिया भर के लिए महत्वपूर्ण है ‘खारा पानी’ का ये इलाका

यमन के हूती विद्रोहियों ने 6 जुलाई, 2025 को लाल सागर में मैजिक सीज नाम के एक बड़े जहाज को निशाना बनाया। इसके बाद उन्होंने एटरनिटी जहाज को भी निशाना बनाया। हूती विद्रोहियों ने इसका वीडियो भी जारी किया है। सामने आया है कि दोनों जहाज इन हमलों के बाद डूब गए।

हूतियों ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि जहाज मैजिक सीज इजरायल पर लगाई गई उनकी नाकाबंदी का उल्लंघन कर रहा था। हूतियों ने जहाज पर ड्रोन, मिसाइल, रॉकेट-लॉन्चर आदि से हमला किया था, यही वजह है कि थोड़ी ही देर में एक भीषण धमाके के बाद जहाज दो टुकड़ों में टूट गया और जल्दी ही पूरी तरह से डूब गया। यूरोपियन यूनियन के नौसैनिक मिशन ‘ऑपरेशन एस्पाइड्स’ के अनुसार इस हमले में 3 नाविकों की मौत हुई है और दो लोग घायल हुए हैं। बाकियों की तलाश जारी है। 

हूतियों के इस हमले के बाद लाल सागर के महत्व और इस पर नियंत्रण को लेकर बहस तेज हो गई है। लाल सागर इजरायल और हमास के बीच संघर्ष चालू होने के बाद से विवाद का केंद्र बिंदु रहा है और यहाँ होने वाली कोई भी घटना पूरे विश्व के तेल बाजार को प्रभावित करती है।

लाल सागर : हिंद महासागर का समुद्री प्रवेश द्वार

लाल सागर को एरिथ्रियन सागर के नाम से भी जाना जाता है। यह अफ्रीका और एशिया के बीच में स्थित है। यह हिंद महासागर का समुद्री प्रवेश द्वार है। लाल सागर, स्वेज नहर के जरिए यूरोप के भूमध्य सागर से जुड़ता है। इसी रास्ते से यूरोप और एशिया के देशों के बीच समुद्र के जरिए व्यापार भी होता है।

इसके एक तरफ अफ्रीका के मिस्र, सूडान, इरिट्रिया और जिबूती देश हैं, वहीं दूसरी तरफ एशिया के सऊदी अरब और यमन देश स्थित हैं। जानकारी के अनुसार इसे विश्व का सबसे खारा सागर माना जाता है, क्योंकि अन्य समुद्र और महासागरों के मुकाबले इसमें सबसे अधिक नमक पाया जाता है। यहाँ

बहुत अधिक गर्मी की वजह से लाल सागर का पानी लगातार उड़ता रहता है इसलिए इसमें नमक की मात्रा अधिक ही रहती है। रिपोर्ट्स का मानें तो जहाँ विश्व के अन्य महासागरों में अधिकतम 35 फीसदी नमक होता है, वहीं लाल सागर में नमक की मात्रा 40 फीसदी होती है।

व्यापारिक दृष्टि से भी अहम लाल सागर

रेड सी (लाल सागर) क्षेत्र में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का असर पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ रहा है। यह इलाका पहले भी कई बार अस्थिरता और संकट का केंद्र रहा है, इसलिए संभव है कि भविष्य में भी यहाँ से व्यापार में रुकावटें आती रहेंगी।

लाल सागर, गल्फ ऑफ एडन और स्वेज नहर के बीच का रास्ता एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला एक अहम समुद्री मार्ग है। आज के समय में इसी रास्ते से होकर करीब 12% वैश्विक व्यापार और दुनिया के लगभग 30% कंटेनर जहाज गुजरते हैं। यदि इस सागर में कोई व्यवधान पैदा होता है तो दुनिया भर का व्यापार प्रभावित होता है।

जब भी इस मार्ग में कोई परेशानी आती है, चाहे वह युद्ध हो, राजनीतिक तनाव, प्राकृतिक आपदा या कोई और वजह तो उसका सीधा असर दुनियाभर की आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ता है। केवल रोजमर्रा की चीजें ही नहीं, बल्कि तेल और LNG जैसी जरूरी ऊर्जा सामग्री का निर्यात भी इससे बुरी तरह प्रभावित होता है।

लाल सागर का व्यापार में महत्व कोई नया नहीं है। प्राचीन मिस्र के समय से यह क्षेत्र व्यापार, संस्कृति और राजनीति के लिए एक अहम केंद्र रहा है। अफ्रीकी, इस्लामी, ओटोमन और यूरोपीय ताकतों ने कई पीढ़ियों तक इस रास्ते को नियंत्रित कर व्यापार और विस्तार के लिए इस्तेमाल किया है।

यही वजह है कि रेड सी आज भी दुनिया के सबसे रणनीतिक और संवेदनशील व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। हर बार व्यापार में रुकावट का कारण युद्ध या संघर्ष ही नहीं होता। साल 2021 में इसका एक बड़ा उदाहरण देखने को मिला।

उस समय स्वेज नहर में रोजाना औसतन 55 से ज्यादा जहाज गुजरते थे और हर दिन लगभग 11 से 16 बार आवाजाही होती थी। उसी साल एक बड़ा कंटेनर जहाज ‘एवर गिवन’ नहर में तिरछा फँस गया था, जिससे पूरे मार्ग का ट्रैफिक छह दिनों तक पूरी तरह रुक गया। इसके चलते शिपिंग कम्पनियों को भारी नुकसान हुआ है।

इस घटना ने यह साफ दिखा दिया कि स्वेज नहर वैश्विक व्यापार और शिपिंग के लिए कितनी जरूरी है। जब भी इस तरह की रुकावटें आती हैं, तो इसका असर सिर्फ शिपिंग कंपनियों पर नहीं बल्कि आम लोगों और दुनियाभर के व्यापार पर भी पड़ता है।

खासकर उन लोगों के लिए जो सामान का निर्यात करते हैं, इसका असर तुरंत दिखने लगता है। आज भी कई जहाजों को स्वेज नहर की जगह अफ्रीका के चक्कर लगाकर या किसी और रास्ते से भेजा जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है लाल सागर?

लाल सागर भारतीय व्यापार के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्ग की भूमिका निभाता है। भारत के लगभग 50% निर्यात इसी के रास्ते होते हैं। यूरोप को जाने वाला 80% सामान लाल सागर के रास्ते ही जाता है। इसी से अमेरिका को सामान पहुँचाया जाता है।

इसके अलावा भारत को आने वाला लगभग तेल और गैस इसी के रास्ते आता है। इसकी कीमत लगभग ₹2 लाख करोड़ से अधिक है। ऐसे में यह भारत के लिए व्यापारिक और रणनीतिक, दोनों तरीके से जरूरी है। इसके अलावा भारत से जाने वाला माल इस रास्ते के बंद होने से देरी होती है। इससे लगभग 15% तक किराया भी बढ़ता है।

इसके अलावा, लाल सागर भारतीय नौसेना के गश्ती क्षेत्र से कोई विशेष दूर नहीं है। 2024 में भारतीय नौसेना ने ऐसे एक जहाज से क्रू को बचाया था, जिस पर हूतियों ने मिसाइल हमला किया था। इस रास्ते से निकलने वाले भारतीय जहाजों को भी हूती निशाना बना सकते हैं, ऐसे में भारत के लिए सुरक्षा चिंताएँ भी हैं।

कैसे रुकेंगे हूतियों के हमले?

हूतियों के यह हमले बीते लगभग 2 वर्षों से जारी हैं। उनका कहना है कि यह हमले वह हमास के समर्थन में कर रहे हैं। हूतियों को ईरान हथियार सप्लाई करता है। ईरान लाल सागर में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है और इसीलिए वह हूतियों पर अपना प्रभाव जमाए हुए हैं।

हूतियों को रोकने के लिए अमेरिका और इजरायल लगातार हवाई हमले कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद हूतियों पर हवाई हमले और भी तेज हुए हैं। इजरायल लगातार यमन के भीतर हूतियों के ठिकानों को निशाना बना रहा है। इजरायल ने इस जहाज पर हमले के बाद भी हूतियों को निशाना बनाया है।

इन हमलों के बाद भी हूती यमन में अपना कब्जा जमाए हुए हैं। उनके खिलाफ जमीन पर वर्तमान में कोई बड़ी लड़ाई नहीं चल रही है, इसके चलते उन्हें यमन की सत्ता से नहीं हटाया जा सकता है। यमन में इससे पहले एक बार जमीन पर सेना भेजने का प्रयास भी फेल हो चुका है।



चढ़ावा हड़प लो, सोना पिघला दो, ब्याज छीन लो… तमिलनाडु में ‘विकास’ के नाम पर राज्य सरकार ऐंठ रही मंदिर की कमाई, मस्जिद-चर्च की आय पूछने वाला कोई नहीं

तमिलनाडु सरकार के मंदिरों के पैसों से कॉलेज खोलने की योजना पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। ‌अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के महासचिव एडप्पादी के. पलानिस्वामी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (Hindu Religious & Charitable Endowments) विभाग की ओर से मंदिरों में आने वाले दान को कॉलेजों के निर्माण में खर्च कर किया जा रहा है।

AIADMK महासचिव ने इसे धार्मिक निधि का दुरुपयोग बताते हुए सवाल किया कि क्या सरकार के पास खुद खर्च के लिए फंड नहीं हैं। इस मामले पर द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) सरकार का कहना है कि ये कदम शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए और जनता के हित में उपयोग किया जा रहा है।

इस मामले पर बहस नई नहीं है। मंदिरों के प्रशासन पर सरकार का नियंत्रण और निधि का उपयोग एक लंबे समय से बहस का विषय रहा है। ये मामला नवंबर 2021 से शुरू हुआ था। DMK सरकार ने मंदिरों में चढ़ने वाले पैसे और सोना समेत हर तरह के दान की निधि से 4 कला और विज्ञान कॉलेज खोलने की योजना बनाई थी। विपक्षी दलों में इस पर तब भी विरोध किया था।

हालाँकि इस पर मद्रास हाई कोर्ट ने ये कहकर अंतरिम रोक लगा दी थी कि मंदिर का धन श्रद्धालुओं की ओर से धार्मिक आस्था के कारण दिया जाता है। साथ ही इसका उपयोग मंदिर के ट्रस्टियों की अनुमति के बिना भी नहीं किया जा सकता।

इसके बाद ताजा विवाद जुलाई 2025 में फिर सामने आया। AIADMK ने फिर आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार मंदिरों के चढ़ावे को कालेजों के निर्माण में कर रही है। ये विवाद तब और सुलग गया जब अप्रैल 2025 को करुणानिधि स्मारक पर श्रीविल्लिपुत्तूर मंदिर के गोपुरम (मंदिर का ऊपरी हिस्सा) की छवि बनाई गई। BJP ने इसे हिंदू आस्था पर हमला कहा।

तमिलनाडु भाजपा के उपाध्यक्ष नारायणन तिरुपति ने सोशल मीडिया पर स्मारक की तस्वीर साझा की और लिखा कि यह अहंकार और मूर्खता की पराकाष्ठा है। हालाँकि इस पर भी DMK ने सफाई दी कि ये धार्मिक बयान के बजाय तमिलनाडु के राज्य प्रतीक का हिस्सा है। इस प्रतीक को 1949 में तत्कालीन सीएम ओमांदुर रामास्वामी रेड्डी के कार्यकाल में अपनाया गया था।

देश के सिर्फ 10 राज्यों में सरकार के नियंत्रण में 1,10,000 हिंदू मंदिर हैं। तमिलनाडु में मंदिरों के 4.78 लाख एकड़ भूमि, 36,425 मंदिर और 56 मठ सरकार के नियंत्रण में हैं। HR&CE विभाग 35,000 से अधिक मंदिरों का रखरखाव करता है। इन मंदिरों से मिलने वाली निधि का उपयोग अस्पतालों, अनाथालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के निर्माण और रखरखाव में किया जाता है।

इसी साल अप्रैल में रिपोर्ट्स सामने आईं कि सरकार की ओर से तमिलनाडु के 21 मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए सोने को पिघलाकर 24 कैरेट की छड़ों के रूप में बदलकर इन्हें बैंक में जमा कर दिया गया है। इसके जरिए निवेश से मिले ब्याज का उपयोग विकास कार्यों के लिए किया जाता है। इस निवेश से सरकार को हर साल लगभग 17.81 करोड़ रुपए का ब्याज मिल रहा है।

HR&CE ने विधानसभा में पेश एक नोट में कहा कि सरकार की इस योजना से मंदिरों को आर्थिक लाभ मिला है। इस विभाग को मिले फायदों को इस तरह से भी जाना जा सकता है कि जब जुलाई 2025 में AIADMK महासचिव ने मंदिर निधि के दुरुपयोग पर सवाल उठाए तो DMK के मंत्री पीके शेखरबाबू ने उन पर निशाना तो साधा ही पर साथ में ये भी बताया कि विभाग ने मंदिर धन का उपयोग करके 25 स्कूल, 9 कॉलेज और 1 पॉलिटेक्निक संस्थान स्थापित किया जा चुका है। इसके अलावा 19 अस्पताल भी स्थापित किए गए।

मंदिर और शिक्षण संस्थानों का इतिहास

अगर इतिहास की बात करें तो भारत में मंदिर केवल पूजा के लिहाज से ही अहम नहीं थे बल्कि शिक्षा और चिकित्सा का केंद्र हुआ करते थे। मंदिरों में ही गुरुकुल और शोध केंद्रों की भी स्थापना थी। बदलते समय के साथ मंदिरों का सरकारी नियंत्रण में रखरखाव किया जाने लगा और उनकी संपत्ति, भूमि और आय पर भी आधिपत्य कर दिया। इसके साथ ही मंदिरों को सिर्फ धार्मिक प्रयोजनों तक के लिए सीमित कर दिया गया।

अगर सरकारी तंत्र की बात की जाए तो इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि सिर्फ मंदिर ही सरकार के अधीन रखे गए हैं। किसी मस्जिद या चर्च को या उनकी संपत्ति को सरकार के न तो अधीन रखा गया और न ही सरकार का उन पर किसी भी तरह का नियंत्रण है।

मंदिर को ही सरकारी तंत्र में शामिल कर श्रद्धालुओं की ओर से धर्म के नाम पर दिए गए दान को सार्वजनिक उपयोग के लिए किया जा रहा है। इस लिहाज से ये धार्मिक असंतुलन के साथ हिंदुओं की आस्था के साथ भी दोगलापन है।

इस तरह के नीतिगत पक्षपात के लिए न केवल आवाज उठाना सही है बल्कि मंदिर के साथ सभी धार्मिक संस्थाओं के साथ एक जैसा व्यवहार सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

अवैध ढाँचों के बाद ढोंगियों पर सख्त हुई उत्तराखंड की सरकार, ‘ऑपरेशन कालनेमि’ का CM पुष्कर सिंह धामी ने किया ऐलान: कहा- पहचान छिपा साधु-संत बन ठगने वालों पर होगी कार्रवाई

उत्तराखंड में अब सनातन के नाम पर ठगने वालों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान उत्तराखंड की सरकार चलाएगी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह विशेष अभियान चलाने का ऐलान किया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक एक्स (10 जुलाई, 2025) को एक ट्वीट में बताया, ” देवभूमि उत्तराखंड में सनातन धर्म की आड़ में लोगों को ठगने और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले छद्म भेषधारियों के खिलाफ ऑपरेशन कालनेमि शुरू करने के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।”

उन्होंने कहा, “प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ असामाजिक तत्व साधु-संतों का भेष धारण कर लोगों, विशेषकर महिलाओं को ठगने का कार्य कर रहे हैं। इससे न सिर्फ लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सनातन परंपरा की छवि को भी नुकसान पहुँच रहा है।”

CM धामी ने कहा है कि किसी भी धर्म का व्यक्ति यदि ऐसे कृत्य करता हुआ मिलता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार असुर कालनेमि ने साधु का भेष धारण कर भ्रमित करने का प्रयास किया था, उसी तरह आज भी कई कालनेमि सक्रिय हैं।

उत्तराखंड में इस अभियान के सहारे उन लोगों को तलाशा जाएगा जो साधु-संत या धर्मगुरु बन कर लोगों को ठगते हैं। कई मामलों में ऐसे लोग दूसरे मजहबों से भी होते हैं। अब उत्तराखंड में इनकी पकड़-धकड़ के लिए विशेष अभियान चलेगा।

CM धामी ने इससे पहले ऑपइंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम वो सब काम कर रहे है जो सनातन के लिए जरूरी हैं। उन्होंने इस दौरान बताया था कि राज्य में अब तक 6500 एकड़ की जमीन अवैध अतिक्रमण से मुक्त करवा चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया था कि राज्य के भीतर 500 से अधिक मजारों पर भी एक्शन लिया जाएगा।

ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह राज्य की डेमोग्राफी नहीं बदलने देंगे। इसी कड़ी में अब उन्होंने ऑपरेशन कालनेमि चालू किया है।

कालनेमि रामायण में वर्णित एक राक्षस था। उसे रावण ने बजरंग बली को मारने का काम सौंपा था। शक्ति बाण से मूर्क्षित लक्ष्मण को बचाने के लिए जिस समय बजरंग बली संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरि पर्वत जा रहे थे, तब हनुमान को रोकने के लिए रावण ने कालनेमि को भेजा था।

जिसके बाद कालनेमि ने एक मायावी साधु का वेश धारण कर बजरंग बली को भ्रमित करने की कोशिश की थी, हालाँकि भगवान हनुमान ने वहीं उसका वध कर दिया था।

देवबंद में मस्जिद के पास DJ बजाते हुए निकली दलित की बारात, मुस्लिम भीड़ ने लाठी-डंडे और धारदार हथियार से किया वार: कई बाराती घायल, असदज- इसरार-फहीम समेत 5 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद इलाके में रविवार (6 जुलाई 2025) की रात दलित की बारात पर हमला किया गया। यह घटना तब हुई जब बारात एक मस्जिद के पास से डीजे बजाते हुए गुजर रही थी।

पुलिस के अनुसार, गाँव निवासी माँगे राम (कुछ रिपोर्ट के अनुसार नाम-नाथी राम) की दो बेटियों की शादी थी। एक बारात साधारणपुर गाँव से अमरपुर गढ़ी गाँव जा रही थी। रास्ते में मस्जिद के पास मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने डीजे की तेज आवाज का विरोध किया और कहा कि नमाज का समय है, इसलिए डीजे बंद किया जाए।

बारात वालों ने डीजे बंद करने से इनकार किया, जिसके बाद दोनों पक्षों में बहस हुई और मामला हिंसक हो गया। आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने डीजे के उपकरण तोड़ दिए और बारातियों पर लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया।

इस हमले में कई लोग घायल हुए, जिनमें पंकज और वंश नामक दो दलित युवक गंभीर रूप से जख्मी हो गए। उन्हें पहले देवबंद में प्राथमिक उपचार दिया गया, फिर मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

घटना के बाद दुल्हन के पिता माँगे राम ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने BNS की धाराओं 191(2), 115(2), 352, 189(4) और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।

कार्रवाई करते हुए पुलिस ने पाँच आरोपितों मोहम्मद अबुजर, असजद, इसरार, सादिक और फहीम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। चूँकि मामला दो समुदायों के बीच विवाद से जुड़ा है, इसलिए गाँव में तनाव की स्थिति को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

किसी भी तरह की हिंसा को रोकने के लिए इलाके में नियमित गश्त की जा रही है। वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं।

उन्होंने दोनों समुदायों से शांति और संयम बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों ने साफ किया है कि कानून-व्यवस्था में बाधा डालने या अफवाह फैलाने की किसी भी कोशिश पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

गाँ$ में बाँस कर देंगे, भूरा बाल साफ करो… बिहार में लौटा ‘लालू के जंगलराज’ वाला नारा, क्या चुनाव से पहले जातीय नरसंहारों की साजिश रच रही RJD?

बिहार में विधानसभा चुनाव को कुछ ही महीने शेष हैं। 2025 का अंत होते-होते नई सरकार बिहार में बन चुकी होगी। इस चुनाव की तैयारियाँ राजनीतिक दलों के साथ ही चुनाव आयोग तेजी से कर रहा है। इसी कड़ी में चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को भी दुरुस्त कर रहा है।

विपक्षी पार्टियों को यह रास नहीं आया है। उन्होंने इसके विरोध में 9 जुलाई, 2025 को बिहार बंद बुलाया था। लेकिन चुनाव आयोग का यह विरोध RJD के गुंडाराज-जंगलराज की तैयारी और ‘भूरा बाल साफ़ करों’ जैसी धमकियों में बदल गया है।

बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया को राजद और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने मुद्दा बनाया जबकि आमजन को कोई परेशानी नहीं थी। जब आम लोग चुनाव आयोग के खिलाफ नहीं हुए तो यह बीड़ा उन्होंने खुद ही उठा लिया और 9 जुलाई के बंद के दौरान हिंसा और धमकियों का दौर चालू कर दिया।

कहीं RJD कार्यकर्ताओं ने एम्बुलेंस रोकी तो कहीं खुले मंच से नरसंहार वाले नारों की धमकियाँ चालू कर दीं। राजद के गुंडों की यह हरकतें वापस जंगलराज की यादें ले आई और साथ ही वह डर भी ले आई, जिसने 40 सालों से बिहारियों के मन में घर बनाया हुआ है।

मंच से ऐलान- भूरा बाल साफ़ करो

इसी 9 जुलाई, 2025 को बिहार में गया जिले में वह नारा गूंजा, जिसने 1990 के दशक में जनता को भयाक्रांत रखा था। यह नारा है- भूरा बाल साफ़ करो। इसमें भू का मतलब भूमिहार, रा का मतलब राजपूत और बा का मतलब ब्राह्मण तथा ल का मतलब लाला (कायस्थ) था। इस नारे का अर्थ था कि इन जातियों के लोगों को खत्म कर दिया जाए।

बिहार के गया जिले में 9 जुलाई, 2025 को ही अतरी विधानसभा क्षेत्र में विधायक रंजीत यादव की मौजूदगी में मुनारिक यादव ने ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा बुलंद किया। मुनारिक यादव बोला, “शुरू में हमारे लालू जी बोले थे भूरा बाल साफ़ करो की बात किए थे।”

मुनारिक यादव ने इस नारे को दोहराने की बात की। इस दौरान मंच पर मौजूद नेता खीसें निपोरते रहे। यानी उन्हें इस नारे या उसके वापस आने से कोई दिक्कत नहीं थी। ना मुनारिक यादव को यह बोलने से रोका गया और ना ही इसका कोई खंडन किया गया। यानी कहीं ना कहीं वहाँ की जनता इस बात से राजी थी।

भूरा बाल साफ करो के इस नारे के मंच से ऐलान करना RJD कार्यकर्ताओं के बुलंद हौसलों और उनकी मनोस्थिति बताती है कि वह सत्ता पाकर क्या करना चाहते हैं।

एम्बुलेंस पर बोले- गा@ में बाँस कर देंगे

इसी 9 जुलाई के बंद में दरभंगा के धोई घाट में RJD कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम की और एक एम्बुलेंस का रास्ता ब्लॉक कर दिया। RJD के कार्यकर्ताओं की गुंडई इस दौरान तब चरम पर दिखी जब उन्होंने एम्बुलेंस जाने देने की विनती पर धमकियाँ चालू कर दीं।

RJD के गुंडों ने एम्बुलेंस जाने देने की धमकी पर लड़ाई-झगड़ा किया और कैमरे पर हाथ मारा। एक गुंडे ने कहा, “गाँ#@ में बाँस कर देंगे, 90 वाला लहर आएगा तो नीचे पटक देंगे।” यानी RJD कार्यकर्ताओं को चुनाव चालू होने से पहले ही जंगलराज वाली खुमारी वापस चढ़ गई।

जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझना और कुछ कहने पर धमकियाँ देना गुंडई की पहली निशानी है। RJD वालों ने यह साफ़ कर दिया कि उनकी सत्ता में लोगों का नीचे पटका जाना तय है। यह सब गुंडई चुनाव से महीनों पहले हो रही है और कैमरे के सामने हो रही है।

यानी RJD के लोग अगर साथ में हैं तो उन्हें ना क़ानून का डर है और ना ही उन्हें आमजन के साथ सिम्पथी है। अगर उनके राजनीतिक मास्टर ने एजेंडा दे दिया है तो चाहे एम्बुलेंस फँसे या फिर जातीय नरसंहार हो। उनका एजेंडा पूरा होना चाहिए।

मुहर्रम हिंसा भी इसी राजनीति का हिस्सा

बिहार में कटिहार, भागलपुर, दरभंगा समेत कई जगह पर मुहर्रम में हिंसा हुई। हिन्दू घरों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। लेकिन यह हिंसा ऐसे समय में हुई जब लगभग 10 दिन पहले ही बिहार में एक रैली का आयोजन राजद और बाकी विपक्षी पार्टियों ने की थी। यह रैली वक्फ कानून का विरोध करने के नाम पर आयोजित की गई थी।

इस रैली में तेजस्वी यादव, पप्पू यादव समेत कॉन्ग्रेस और RJD के कई नेता शामिल हुए थे। इस रैली के दौरान भड़काऊ भाषण दिए गए थे। तेजस्वी यादव ने कहा था कि उनकी सरकार बनी तो वह वक्फ कानून कूड़े में फेंक देंगे और संसद, अदालत से लेकर सड़क तक मुस्लिमों के लिए उतरेंगे।

इस रैली के बहाने कवायद तो वोट बढ़ाने की थी लेकिन हौसलाअफजाई का रिजल्ट 10 दिन बाद ही दिखा और बिहार के कई जिले हिंसा की आग में झुलसे। इस पर भी राजद ने चुप्पी साध ली। ध्यान देने वाली बात है कि यह सब हिंसा चुनाव से ठीक पहले हो रही है।

ये गुंडई कोई खोखली हरकत नहीं

RJD के गुंडों की यह हरकतें कोई शक्ति प्रदर्शन भर नहीं है। भूरा बाल साफ़ करो का आह्वान दिखाता है कि वह भविष्य में क्या करने की इच्छा रखते हैं। इसी भूरा बाल साफ़ करो के नारे ने बिहार को 1980 और 1990 में जातीय हिंसा के नरक में झोक दिया था।

जब बिहार में 1980 और 1990 के दशक में भूरा बाल साफ़ करो का नारा गूंजा था तो बारां, डालेचक और सेनारी जैसे नरसंहार हुए थे। इन नरसंहारों में भूमिहार और राजपूत जातियों के 100 से अधिक लोग मार दिए गए थे। हत्यारे वो नक्सली थे जो कथित ‘सामाजिक न्याय’ चाहते थे।

तब ये सब कुछ भूरा बाल साफ़ करो के नाम पर हुआ था। आज वही नारा बिहार में वापस लगा है और कहा गया है कि ये वापस दुहराया जाएगा। भूरा बाल साफ़ करो के ऐलान और मुहर्रम में हुई हिंसा एक और बात बताती है। यह बताती है कि RJD के समीकरण का का कोर वोटर MY आजकल उत्तेजित है।

और इतिहास रहा है कि जब ये वोटर उत्तेजित हुआ है तो बिहार जंगलराज के दलदल में घुसा है। और जंगलराज अपने साथ पलायन, गरीबी और कुव्यवस्था का दौर लाता है।

भाजपा बोली- जनता हो जाए सावधान

ऑपइंडिया ने बिहार बंद के दौरान जातीय हिंसा के लिए लगाए जाने वाले नारों और जनता को परेशान करने की घटनाओं पर भाजपा OBC मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री निखिल आनंद से बात की। उन्होंने कहा, “आरजेडी का चाल- चरित्र- चेहरा जगजाहिर है। धार्मिक तुष्टिकरण की आड़ में घोर मुस्लिमपरस्ती और जातिवादी कुंठा की अभिव्यक्ति करना ही राजद का मूल राजनीतिक चरित्र है।”

उन्होंने कहा, “बिहार बंद की आड़ में राजद ने जो विभिन्न जगहों पर तांडव किया, महिलाओं को अपमानित किया, बीमार लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई और जातिगत आधार पर लोगों के साथ दबंगई और मारपीट की घटना को अंजाम दिया, उससे बिहार की जनता को सावधान होने की जरूरत है।”

महामंत्री निखिल आनंद ने कहा कि जब राजद का सत्ता के बाहर यह हाल है तो अगर ऐसे लोगों के हाथ में सत्ता आएगी तो किस तरीके से कानून व्यवस्था को ताक पर रखकर इनकी गुंडागर्दी चलेगी, यह समझा जा सकता है।

क्या चुनाव में ज्यादा हिंसा होगी इसका परिणाम?

बिहार ने 1990 से लेकर 2005 तक का वह दौर देखा है जब चुनाव का मतलब हिंसा हो गया था। तब बैलट बॉक्स लूटना, उसमे स्याही डाल देना, लाठी-डंडे और गोलियाँ चलना सामान्य बात सी हो गई थी। लालू प्रसाद यादव इसे ‘बोतल से जिन्न निकलने’ का नाम देते थे।

बिहार में चुनावी धांधली का यह हाल था कि 2005 आते-आते चुनाव आयोग को यहाँ शुचितापूर्ण चुनाव करवाने के लिए विशेष पर्यवेक्षक KJ राव को भेजना पड़ा था। इसके बाद चुनावी हिंसा पर लगाम लग पाई थी। और जैसे ही यह चुनावी हिंसा बंद हुई, वैसे ही बिहार में RJD का बोरिया बिस्तर भी बंध गया था।

तब से कुछ वर्ष को छोड़ दिया जाए तो RJD सत्ता में आने को तरस गई है। लोगों को वही भूरा बाल साफ़ करो और जंगलराज वाले दिन याद आते हैं। अब जब फिर से RJD नेताओं ने यही चालू किया है तो आगामी चुनाव में भी हिंसा के बादल मंडराने लगे हैं।

संभवतः इस बार के चुनाव फिर से एक हिंसक हों। बूथ पर लोगों को जाने ना देने, उनमें डर फ़ैलाने से लेकर कई ऐसी हरकतें हो सकती हैं जो चुनाव प्रभावित करें। चुनाव आयोग को इस बार फिर सतर्क रहना होगा।

जमीन पर लिटा ओढ़ा देते हैं कंबल, फिर गोली मार दिल के उड़ा देते हैं चिथड़े… क्या ऐसे ही निमिषा प्रिया को ‘मौत की सजा’ देगा यमन: क्या है केरल की नर्स का मामला, क्या होता है ‘ब्लड मनी’

केरल की नर्स निमिषा प्रिया को 16 जुलाई 2025 को यमन में मौत की सजा दी जाएगी। उन पर यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की हत्या का आरोप है।

इस मामले में केंद्र सरकार से राजनयिक हस्तक्षेप की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए 14 जुलाई 2025 की तारीख तय की है। निमिषा प्रिया इस समय यमन की राजधानी सना की सेंट्रल जेल में बंद हैं।

यमन में ‘मौत की सजा’ कैसे दी जाती है?

यमन में मौत की सजा गोली मारकर दी जाती है। यह तरीका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसमें जिस व्यक्ति को सजा दी जानी होती है, उसे जमीन पर पेट के बल लेटाया जाता है और फिर कंबल से ढक दिया जाता है।

एक डॉक्टर पीछे से दिल के चारों ओर निशाना बनाता है, जहाँ गोली मारी जाती है। इसके बाद एक व्यक्ति ऑटोमैटिक राइफल से दिल में तीन-चार गोलियाँ मारता है।

यमन में मौत की सजा खुले में या निजी तौर पर भी दी जा सकती है। हालाँकि, पथराव या सिर कलम करने जैसे पुराने तरीके अब यमन में इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं।

‘ब्लड मनी’ क्या है?

इस्लामी कानून के मुताबिक, हत्या के मामलों में सजा के 2 विकल्प हैं- किसास और दियाकिसास का मतलब ‘जान के बदले जान’ और दिया यानी ब्लड मनी। इस्लामी कानून में ‘दिया’ यानी ब्लड मनी ऐसा प्रावधान है जो सुलह का अवसर प्रदान करता है।

शरिया कानून के अनुसार, हत्या के मामलों में पीड़ित परिवार को यह तय करने का अधिकार होता है कि वे हत्यारे को माफ करेंगे या सजा दिलाएँगे। कुरान के अनुसार, माफी और ब्लड मनी को न्याय और दया का माध्यम बताया गया है।

कुरान की सूरह अल-बकरा, आयत 178 में उल्लेख है: “मगर यदि हत्यारे को पीड़ित के संरक्षक द्वारा क्षमा कर दिया जाए, तो ब्लड मनी को न्यायपूर्वक तय किया जाए और सम्मानपूर्वक भुगतान किया जाए। यह तुम्हारे पालनहार की ओर से एक दया और सुविधा है।”

निमिषा प्रिया के मामले में ‘ब्लड मनी’ पर सहमति क्यों नहीं बनी

यमन और कई अन्य इस्लामी देशों में ब्लड मनी का भुगतान परिवारों के बीच आपसी सहमति से तय होता है। निमिषा प्रिया को बचाने के लिए उनके परिवार और कुछ संगठन ब्लड मनी इकट्ठा कर रहे हैं। वे मृतक तलाल के परिवार को पैसा देकर निमिषा को माफ करवाने की कोशिश कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, ब्लड मनी कारगर नहीं हो पा रही है क्योंकि, मृतक तलाल के परिवार ने अभी तक पैसा लेने पर सहमति नहीं जताई है। बता दें, कि बल्ड मनी की रकम 8 करोड़ हैं।

रकम के साथ मृतक तलाल के परिवार को एजुकेशन, मेडिकल के साथ कई अन्य सहयोग देने का भरोसा जताया है। लेकिन पीड़ित के परिवार ने पेशकश ठुकरा दी है।

निमिषा प्रिया का मामला

निमिषा प्रिया पर आरोप है कि उन्होंने 2017 में एक यमनी नागरिक ‘तलाल अब्दो महदी’ को नशीला इंजेक्शन दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

हालाँकि, निमिषा का कहना है कि तलाल के पास उनका पासपोर्ट था, जो वापस लेना चाहती थीं और उन्होंने उसे सिर्फ बेहोश करने की कोशिश की थी, मारने की नहीं।

मृतक तलाल के शव को टुकड़े-टुकड़े करके पानी की टंकी में डालने का भी आरोप है।

यमन की कोर्ट ने निमिषा को 2020 में मौत की सजा सुनाई थी। निमिषा प्रिया की आखिरी अपील को 2023 में यमन की सबसे बड़ी अदालत ने भी खारिज कर दिया था।

इसके बाद, जनवरी 2024 में यमन के हूती विद्रोहियों की सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल ने भी उन्हें मौत की सजा देने की मंजूरी दे दी है।

बिहार पर सुप्रीम कोर्ट में ‘गैंग’ ने मुँह की खाई, वोटर वेरिफिकेशन पर रोक लगाने से इनकार: चुनाव आयोग से कहा- आधार, राशन कार्ड और वोटर ID को भी पहचान का प्रमाण मानें

बिहार में चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह करना चुनाव आयोग का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया की टाइमिंग को लेकर प्रश्न उठाए हैं और कहा है कि वह आधार कार्ड और राशन कार्ड को भी दस्तावेज के तौर पर शामिल करने पर विचार करे।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमलय बांग्ला की एक बेंच ने गुरुवार (10 जुलाई, 2025) को इस मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस दावे को सिरे से खारिज किया कि चुनाव आयोग यह प्रक्रिया नहीं कर सकता है और उसके पास यह अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट का रिवीजन करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ इस पूरी प्रक्रिया के खिलाफ कोई भी अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले को 28 जुलाई को सुनेगा और तब तक चुनाव आयोग इस मामले में और जानकारियाँ कोर्ट के सामने रखे।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से कहा कि वह यह पूरी प्रक्रिया चुनाव से कुछ ही महीने पहले क्यों कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके अलावा चुनाव आयोग के आधार कार्ड के दस्तावेज के रूप में स्वीकार ना करने के फैसले पर भी प्रश्न उठाए हैं।

चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट ने पहचान के प्रमाण के रूप में आधार और राशन कार्ड को लेने पर विचार करने को कहा है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने तीन बातों पर चुनाव आयोग से जवाब दाखिल करने को कहा है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया इस बीच चलती रहेगी।

गौरतलब है कि जून, 2024 से चुनाव आयोग ने बिहार के अंदर वोटर लिस्ट रिवाइज करने की कार्यवाही चालू की थी। इसे चुनाव आयोग ने SIR का नाम दिया था। चुनाव आयोग ने इसे 25 जुलाई तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।

इस फैसले को विपक्षी पार्टियों ने अघोषित NRC-CAA जैसा बताया है और दावा किया है कि इससे मुस्लिम वोट काटे जाने का प्रयास है। ADR, RJD और योगेन्द्र यादव समेत कई लोगों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर यह प्रक्रिया रोकने को कहा था, इससे सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है।

शशि थरूर ने दिलाई इमरजेंसी की याद, इंदिरा गाँधी को ‘तानाशाह’ बताते हुए कहा – लोकतंत्र को रौंदा गया: संजय गाँधी की क्रूरता पर भी लिखा, आज के भारत को बताया मजबूत

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने हाल ही में एक ओपिनियन लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने इमरजेंसी के दौर और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की नीतियों की जमकर आलोचना की है। यह लेख प्रोजेक्ट सिंडिकेट में छपा है और इमरजेंसी की 50वीं वर्षगांठ पर आधारित है।

तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेस सांसद थरूर ने इस लेख में बताया है कि कैसे 1975 में लगाई गई इमरजेंसी ने भारत की लोकतंत्र की नींव हिला दी थी। उन्होंने इसे स्वतंत्रता के क्षरण का उदाहरण बताया और कहा कि आज का भारत 1975 वाले भारत से बहुत अलग है। लेकिन इमरजेंसी के सबक हमें हमेशा याद रखने चाहिए।

लेख की शुरुआत में थरूर ने 25 जून 1975 की उस रात का जिक्र किया, जब इमरजेंसी घोषित की गई थी। उन्होंने लिखा कि रेडियो पर सरकारी ऐलान आया और पूरे देश में मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लग गई, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया और असहमति की आवाजों को दबा दिया गया। थरूर खुद उस समय भारत में थे, लेकिन बाद में अमेरिका चले गए और वहाँ से इस दौर को देखते रहे। उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी ने दावा किया था कि इमरजेंसी आंतरिक अव्यवस्था, बाहरी खतरों से निपटने और देश में अनुशासन लाने के लिए जरूरी थी। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र पर हमला था।

थरूर ने न्यायपालिका की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने दबाव में आकर हाबेअस कोर्पस के अधिकार को मान लिया, जिससे नागरिकों की स्वतंत्रता छिन गई। पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया। उन्होंने अपने लेख में मानवाधिकारों के उल्लंघन की भयावह कहानियाँ बताई हैं। उन्होंने जेल में यातनाओं, गैर-कानूनी हत्याओं का उल्लेख किया, जो उस समय ज्यादा प्रचारित नहीं हुईं।

शशि थरूर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

शशि थरूर ने लिखा है कि इमरजेंसी के नाम पर अनुशासन लाने की कोशिश में क्रूरता की हद पार हो गई। जैसे संजय गाँधी की अगुवाई में जबरदस्ती नसबंदी अभियान चलाया गया। यह गरीब और ग्रामीण इलाकों में ज्यादा केंद्रित था, जहाँ लक्ष्य पूरा करने के लिए हिंसा और दबाव का इस्तेमाल किया गया। शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों को बेरहमी से उजाड़ा गया, हजारों लोग बेघर हो गए। थरूर ने कहा कि ये सब ‘अतिरेक’ के रूप में बाद में खारिज किए गए, लेकिन ये अनियंत्रित सत्ता की तानाशाही के परिणाम थे।

उन्होंने आगे लिखा कि इमरजेंसी के दौरान कुछ समय के लिए व्यवस्था लगी दिखी, लेकिन यह लोकतंत्र की आत्मा की कीमत पर थी। असहमति को चुप कराना, बोलने, लिखने और एकत्र होने के अधिकारों को कुचलना और संवैधानिक मानदंडों की अवहेलना ने भारत की राजनीति पर गहरा घाव छोड़ा। न्यायपालिका ने बाद में खुद को सुधारा, लेकिन शुरुआती कमजोरी को भुलाया नहीं जा सकता। इमरजेंसी के बाद 1977 के चुनावों में जनता ने इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया, जो प्रभावित लोगों के गुस्से का नतीजा था।

थरूर ने इमरजेंसी से सीखने वाली बातें गिनाईं-

  • पहली – सूचना की स्वतंत्रता और स्वतंत्र प्रेस का महत्व। जब मीडिया दबाव में आता है, तो जनता नेताओं को जवाबदेह बनाने से वंचित रह जाती है।
  • दूसरी – न्यायपालिका की स्वतंत्रता जरूरी है, जो कार्यकारी शाखा के अतिरेक को रोक सके।
  • तीसरी और सबसे मौजूदा समय के लिए प्रासंगिक बात- एक ताकतवर कार्यकारी शाखा, जो बहुमत पर टिकी हो, लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है, खासकर जब वह खुद को अचूक मानती हो और जाँच-पड़ताल की प्रक्रियाओं से बेचैन हो।

थरूर ने जोर दिया कि आज का भारत ज्यादा आत्मविश्वासी, समृद्ध और मजबूत लोकतंत्र है। लेकिन इमरजेंसी के सबक अभी भी प्रासंगिक हैं। हमें लोकतांत्रिक मूल्यों के सूक्ष्म क्षरण पर नजर रखनी चाहिए। क्या हम तानाशाही को पहचान और विरोध कर सकते हैं? थरूर ने अंत में कहा कि इमरजेंसी को सिर्फ इतिहास के काले अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि सबक के रूप में याद रखें। लोकतंत्र को हल्के में न लें, इसे लगातार पोषित और बचाया जाना चाहिए।

यह लेख ऐसे समय आया है जब थरूर और कॉन्ग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। उन्होंने सरकारी नीतियों का कई बार समर्थन किया है, जो पार्टी लाइन से अलग है। बीजेपी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शशि थरूर ने कॉन्ग्रेस के इमरजेंसी का बचाव करने वाले यू-टर्न को समझ लिया है।

अब पूरी तरह से एंटी कॉन्ग्रेस हो गए थरूर?

बता दें कि जब भी कोई कॉन्ग्रेस नेता प्रो-इंडिया की बात करता है, जैसे शशि थरूर ने देश हित में दुनिया के कई देशों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जानकारी देने वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया, तो कॉन्ग्रेस पार्टी में उन पर उँगलियाँ उठी। और अब उन्होंने इमरजेंसी की आलोचना करके लोकतंत्र की रक्षा पर जोर दिया है। ऐसे में ये सब कुछ ऑटोमैटिकली एंटी-कॉन्ग्रेस हो जाता है। क्योंकि पार्टी का इतिहास और वर्तमान नेतृत्व अक्सर पुरानी गलतियों का बचाव करता है, जबकि देशहित में बोलने वाले को विद्रोही ठहराया जाता है। यह दिखाता है कि पार्टी में सच्ची लोकतांत्रिक बहस की कमी है।