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राम सिंह कूका: गाँधी से पहले असहयोग आंदोलन छेड़ने वाले संत, जिनके शिष्य अंग्रेजों की तोप में डाल देते थे सिर

असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) को लेकर हमेशा से हमें यही पढ़ाया गया है कि ये महात्मा गाँधी के नेतृत्व में चलाया जाने वाला पहला जन आंदोलन था जिसे देश भर में हर वर्ग के लोगों का समर्थन मिला था। अंग्रेजों के विरुद्ध चलाए गए इस आंदोलन की शुरुआत औपराचिक रूप से अगस्त 1920 से बताई जाती है। आज अगर हमें इस अहसयोग आंदोलन के बारे में अधिक जानकारी एकत्रित करनी हो तो इसके तमाम बिंदु हमें स्कूली किताबों से लेकर इंटरनेट पर पढ़ने को मिल जाएँगे। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये असहयोग आंदोलन का कॉन्सेप्ट पहली दफा महात्मा गाँधी द्वारा भारत को नहीं दिया गया था। ये कॉन्सेप्ट 1920 से 50 साल पहले यानी 1870 के समय में भारत आ गया था। इसे लाने वाले भारतीय का नाम ‘राम सिंह कूका (Ram Singh Kuka)’ था जिनका जन्म 3 फरवरी 1816 को हुआ था। बाद में देश ने उन्हें एक सैनिक, धार्मिक सिख नेता और भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के रूप में जाना।

राम सिंह कूका

1816 में पंजाब के लुधियाना जिले के भैनी गाँव में जन्मे राम सिंह कूका सिख सेना के एक सैनिक हुआ करते थे। उन्होंने महाराजा रणजीत सिंह की सेना में भी अपनी सेवा दी थी और समाजिक कुरीतियों से लड़ते हुए उन्होंने न केवल सिखों के बीच जाति-व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज उठाई थी, बल्कि सिखों में अंतरजातीय विवाह व विधवा औरतों के पुनर्विवाह के लिए लोगों को प्रोत्साहित भी किया था। आज देश उन्हें एक ऐसे सेनानी के रूप में जानता है जिन्होंने असहयोग आंदोलन की शुरुआत कर लोगों को बताया कि अंग्रेजों का विरोध का तरीका उनके सामानों और सेवाओं को बहिष्कार भी हो सकता है। राम सिंह कूका के बारे में मौजूद जानकारी से पता चलता है कि उनके विचार समाज में इतनी तेजी से फैल रहे थे कि अंग्रेजों ने घबराकर उन्हें आजीवन कारावास में भेज दिया था।

जब राम सिंह कूका के शिष्यों ने मौत को लगाया गला

नामधारी संप्रदाय के प्रवर्तक सदगुरु राम सिंह कूका का प्रभाव उनके अनुयायियों पर और समाज में कितना अधिक था इसका पता कुछ किस्सों से भी चलता है जो कि उनसे नहीं उनके शिष्यों से जुड़े हैं। ये वाकये तब के हैं जब सद्गुरु राम सिंह कूका के नेतृत्व में ‘कूका आंदोलन’ अपनी चरम पर था और जब विदेशी चीजों के बहिष्कार के साथ गौहत्या पर भी प्रतिबंध लगाने की माँग की जा रही थी। राम सिंह कूका के ऐसे सैंकड़ों अनुयायी थे जो देश के लिए बलिदान होने को हमेशा तत्पर रहते थे। उन्हें न गोली का डर था, न फाँसी का और न ही तोप का।

शायद यही वजह थी 17 जनवरी, 1872 की सुबह-सुबह जमालपुर गाँव के मैदान में अंग्रेजों ने 50 कूका वीरों को मारने के लिए इकट्ठा किया तो उनमें से एक का पाँव भी पीछे नहीं हटा। बल्कि, जब ब्रिटिश अधिकारी के आदेश पर जब इन सबके मुँह पर कपड़ा बाँधकर पीठ पर गोली मारने की तैयारी हुई तो ये लोग नाराज हो गए और कहा कि ये न तो मुँह पर कपड़ा बँधवाएँगे और न ही पीठ पर गोली खाएँगे। कूका वीरों को मौत के आगे भी इस तरह बेखौफ देख अंग्रेजों ने तोपें मँगवाईं और एक-एक करके सबको मारना शुरू किया।

एक तरफ जहाँ हर तोप के साथ हवा से लेकर जमीन तक में खून और मांस बढ़ता जा रहा था। वहीं देखने वालों के भीतर ब्रिटिश शासन के खिलाफ़ खौफ बैठ रहा था। धीरे-धीरे सभी कूका अनुयायियों को तोप उड़ा रही थी। लेकिन तभी बारी आई एक 12 साल के बालक बिशन सिंह की। बिशन को जब मारने के लिए मैदान में खड़ा किया गया तो उनकी न दाढ़ी थी और मूंछ। उनकी माँ अलग से अंग्रेजी अधिकारी की बीवी से दया की भीख माँग रही थीं। ये सारा दृश्य मैदान में खड़े सभी लोग देख रहे थे। तभी बिशन सिंह की आवाज आई और देश पर कुर्बान होने के लिए वह चिल्लाकर बोले- “ये औरत पागल है इस पर भरोसा मत करना।” 

बिशन सिंह के शब्द सुन अंग्रेजी अधिकारी बौखला गया। उसने राम सिंह कूका को गाली दी और फिर कहा “अगर तूने उस बदमाश राम सिंह का साथ छोड़ा तो हम तुझे छोड़ देंगे।” लेकिन बिशन सिंह मानने की जगह और बिदक गए। उन्होंने अपने गुरु का अपमान सुन अंग्रेजी अधिकारी पर प्रहार कर उसकी दाढ़ी पकड़ ली। बड़ी मशक्कत के बाद जब अधिकारी उस बच्चे से खुद को नहीं छुड़ा पाया तो उसे जमीन पर गिराकर गला दबाया। फिर उसके हाथ-पैर काटे और फिर उसे वहीं गोली मार दी।

इस घटना के बाद अगले दिन जिन लोगों को उसी मैदान में मौत के घाट उतारा गया उसमें एक गौभक्त का नाम वरयाम सिंह था। वरयाम की लंबाई बहुत छोटी थी। इसे देख ब्रिटिश अधिकारी ने कहा कि इसकी लंबाई कम है और छाती तोप के सामने बराबर नहीं आ रही। ऐसे में इसे छोड़ दो। मगर तभी वरयाम सिंह उठ खड़े हुए। उन्होंने आसपास से पत्थर इकट्ठा किए और उन पर खड़े होकर तोप में सिर लगाया और कहा कि अब उनकी छाती तोप के सामने है इसलिए उन्हें भी मार डाला जाए। अंत में संत वरयाम सिंह को भी उनके कहने पर तोप से मारा डाला गया।

ब्रिटिश हुकूमत को लगने लगा राम सिंह कूका से डर

ब्रिटिश हुकूमत को राम सिंह कूका के शिष्यों के अंदर निडरता देख समझ आने लगा था कि उनको यदि छोड़ा गया तो ये उनके लिए खतरा बन जाएँगे। ब्रिटिशों ने बहुत कोशिशें की कि वह नामधारियों को कुचलें। लेकिन संप्रदाय की ताकत दिन पर दिन बढ़ती गई। इसे देख एक दिन ब्रिटिशों ने राम सिंह को बहाने से पकड़ लिया और फिर उन्हें बर्मा भेजा दिया गया। इसके बाद उन्हें रंगून भेजा गया, जिसके बाद 1885 में उनकी मौत हो गई। वे आज भी स्वतंत्रता, स्वदेशी, समाज सुधार, गौरक्षा, गुलामी के सारे शांसन तंत्र को उखाड़ फेंकने के लिए छेड़ी गई अपनी जंग के लिए याद किए जाते हैं। स्वामी रामदेव ने एक ट्वीट में उन्हें संत सिपाही, योगी योद्धा, योद्धा संन्यासी बताया था। मालूम हो कि ये राम सिंह कूका का ही आह्वान था कि लाखों सैनिकों ने असहयोग आंदोलन के तहत संकल्प लिया कि वह अंग्रेजों के नल से पानी नहीं पिएँगे, डाकखाने का, रेल का प्रयोग नहीं करेंगे और जहाँ तक हो सकेगा हर तरह अंग्रेजों का बहिष्कार करेंगे। उनके कूका आंदोलन के नाम पर भारत सरकार ने 2014 में स्टैंप भी जारी किया था।

‘विश्वासघाती’ हामिद अंसारी के लिए देश से ज्यादा इस्लाम जरूरी: जूनियर साथी ने खोला राज, बताया विदेशी-इस्लामी कनेक्शन पर जाँच शुरू

देश के 73 वें गणतंत्र दिवस के मौके पर पूर्व उप-राष्ट्रपति हामिद अंसारी (Hamid Ansari) ने इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में भारत के लोकतंत्र के ख़िलाफ़ जो-जो जहर उगला, अब उस पर पूरा देश उनसे नाराज है। इसी क्रम में शीर्ष भारतीय राजनयिक, प्रधानमंत्री के विशेष सलाहकार व पूर्व राजदूत दीपक वोहरा ने इस बात की पुष्टि की है कि हामिद अंसारी के विदेशी व इस्लामी लिंक्स की जाँच शुरू हो गई है और जल्द ही इस जाँच के नतीजे आएँगे।

द सिटी न्यूज से बातचीत में दीपक वोहरा ने कहा, “ये चेतावनी हमारी कई खुफिया एजेंसियों द्वारा भारत सरकार को दी जा चुकी है कि हामिद अंसारी की प्राथमिकताएँ कभी भी भारत के पक्ष में नहीं थीं। वह हमेशा इस्लाम से जुड़ी थीं। उनकी ईमानदारी हमारे पड़ोसी मुल्क वालों के साथ देखने को मिलती थी।” वोहरा ने बातचीत में ईरान में पकड़े गए भारतीय अधिकारियों का मुद्दा उठाया और याद दिलाया कि कैसे भारतीय अधिकारियों के बच्चे और बीवियाँ अंसारी के आगे गिड़गिड़ा रहे थे कि उनके अपनों को छुड़ा लिया जाए, लेकिन उन्होंने ऐसा करने से मना कर दिया।

इस्लामी और विदेशी लिंक्स की हुई जाँच शुरू

पीएम के विशेष सलाहकार दीपक वोहरा ने बताया कि जब हामिद अंसारी ने आंतकी लिंक से जुड़े वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर भारत की निंदा की तो ये साफ हो गया कि उनके कनेक्शन हैं और जिनपर अब जाँच शुरू हो गई है। अब उम्मीद है कि जैसे ही इस जाँच के परिणाम बाहर आते हैं तो अंसारी का न्याय होगा। इस बातचीत में वोहरा ने स्पष्ट तौर पर हामिद अंसारी के बारे में बात करते हुए कहा उनके लिए देश से ज्यादा इस्लाम जरूरी है। 

बता दें कि दीपक वोहरा IFS में हामिद अंसारी के जूनियर थे। इस बात का जिक्र भी उन्होंने सिटी न्यूज के साथ इस बातचीत में किया। उन्होंने जानकारी दी कि हामिद अंसारी उनके IFS में सीनियर रहे हैं और वह उन्हें विश्वासघातियों (Trust Buster) की श्रेणियों में रखते हैं। उन्होंने पूछा कि अगर हामिद अंसारी को देश के प्रधानमंत्री से कोई दिक्कत है भी तो उन्होंने भारत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर क्यों बदनाम करने का कार्य किया। उन्होंने बताया कि हामिद अंसारी द्वारा मातृभूमि के बारे में बोले गए शब्दों को लेकर विदेश मंत्रालय ने भी अपनी नाराजगी जाहिर की है।

वह कहते हैं कि इंडियन-अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के साथ हामिद शामिल हुए, उसका ट्रैक रिकॉर्ड हर कोई जानता है। इसी का इस्तेमाल करते हुए हामिद ने भारत को अनाप-शनाप बोला। इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल को संदिग्ध सूत्रों से फंड मिलता है और इसका संबंध पाकिस्तान खुफिया एजेंसियों से भी है। आगे की बातचीत में दीपक वोहरा ने हामिद अंसारी के उन कारनामों को उजागर किया जो उन्होंने अपने पद पर रहते हुए किए, फिर चाहे वो राष्ट्रीय ध्वज का अपमान हो या फिर ईरान के राजदूतों को दिया गया धोखा हो।

वोहरा ने कहा कि हामिद अंसारी ने ऐसे वर्चुअल प्लेटफॉर्म पर अपनी उपस्थिति जताकर सिर्फ अपनी छवि बिगाड़ी है, अपना स्तर को गिराया है। वह कहते हैं कि हामिद को इस चर्चा में भाग लेने से पहले समझाया गया था कि ये विवादित हो सकता है, इसलिए उन्हें इस पर विचार करना चाहिए। हालाँकि उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बाद भारतीय राजनयिक ने पूर्व उप राष्ट्रपति को याद दिलाया कि जिस संविधान को लेकर वो एंटी इंडिया मंच पर इतना बोल आए हैं उस संविधान में 100 से ज्यादा दफा संशोधन हो चुका है।

हामिद अंसारी ने क्या बोला?

बता दें कि गणतंत्र दिवस के मौके पर हामिद अंसारी ने देश के लोकतंत्र की आलोचना की थी और कहा था कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और ये अब संवैधानिक मूल्यों से हट गया है। हिंदू राष्ट्रवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए अंसारी ने भारत के ‘बहुलतावादी संविधान के संरक्षण’ भाषण दिया। उन्होंने कहा था, ‘‘हाल के वर्षों में हमने उन प्रवृत्तियों और प्रथाओं के उद्भव का अनुभव किया है, जो नागरिक राष्ट्रवाद के सुस्थापित सिद्धांत को लेकर विवाद खड़ा करती हैं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक नई एवं काल्पनिक प्रवृति को बढ़ावा देती हैं। वह नागरिकों को उनके धर्म के आधार पर अलग करना चाहती हैं, असहिष्णुता को हवा देती हैं और अशांति और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं।’’ इसके साथ ही अंसारी ने खुद से ही अपनी पीठ भी थपथपाई और बताया कि उपराष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान देश की संसदीय प्रणाली और कानून पूरी तरह से पारदर्शी था।

सरकारी जमीन पर अवैध मदरसा… लेकिन ढाह नहीं सकते: सूरत नगर निगम की गलती, समय पर रिकॉर्ड नहीं किया अपडेट

सूरत नगर निगम केवल तीन महीनों में वक्फ बोर्ड की दूसरी संपत्ति खो सकता है। इसके पीछे रिकॉर्ड को अपडेट करने में की गई लापरवाही बताई जा रही है। वक्फ बोर्ड को सूरत नगर निगम की जमीन पर बने अवैध मदरसे को गिराने पर रोक लगाने की अनुमति दे दी गई है। इसका कारण है जिला प्रशासन द्रारा कथित तौर पर समय पर रिकॉर्ड अपडेट नहीं करना।

स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक वार्ड नंबर 3 में सिटी सर्वे नंबर 4936 और 4939 में अनवर-ए-रब्बानी तालीम-उल-इस्लाम के नाम से एक मदरसा चल रहा है। लंबे समय से इस बात को लेकर विवाद है कि यह सूरत नगर निगम के स्वामित्व वाली भूमि पर अवैध रूप से बनाया गया है। इसलिए पहले इसे ध्वस्त करने के लिए जिला प्रशासन ने पुलिस बंदोबस्त की भी माँग की थी। हालाँकि वक्फ बोर्ड में रजिस्टर्ड मदरसे पर वक्फ व न्यासियों के बीच विवाद के चलते पुलिस बल की व्यवस्था नहीं की गई थी।

घटनाक्रम से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सूरत महानगरपालिका के प्रतिनिधियों ने सुनवाई के दौरान अदालत में पेश होने तक की जहमत नहीं उठाई। अंचल अधिकारी द्वारा प्राप्त जानकारी के अनुसार 1969 से नगर सर्वेक्षण रिकॉर्डों में यह भूमि निजी सम्पत्ति थी जबकि पालिका टाउन प्लानिंग के अनुसार यह भूमि सरकार की थी। इसलिए, मध्य क्षेत्र ने उस समय उसे वापस करने के लिए कहा था और निगम ने टाउन प्लानिंग ऑफिस से निजी संपत्ति का अधिग्रहण किया था। हालाँकि यह रिकॉर्ड नगर निगम के रिकॉर्ड में अपडेट नहीं किया गया।

मामले को लेकर प्रशासन ने अब वक्फ बोर्ड से जवाब माँगा है और उन्हें जवाब देने के लिए 16-17 फरवरी तक का समय दिया है। विभाग ने कहा है कि मदरसे की पहली मंजिल अवैध है और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने इसे ध्वस्त करने की माँग की है।

गौरतलब है कि 29 दिसंबर 2021 को अवैध मदरसे को ढाहने का नोटिस जारी किया गया था। हालाँकि, अब गुजरात राज्य वक्फ बोर्ड ने ट्रिब्यूनल कोर्ट का रुख किया है। इस पर यथास्थिति तब तक बनी रहेगी, जब तक सूरत नगर पालिका उस पर उचित प्रतिक्रिया नहीं देती। मदरसा पिछले 60 साल से यहाँ पर स्थित पर है। नगर पालिका अवैध रूप से बने मदरसे को तोड़कर उसके ऊपर पार्किंग स्थल बनाना चाहती है। सूरत नगर निगम के स्वामित्व वाली यह दूसरी संपत्ति है, जो केवल तीन महीनों में वक्फ बोर्ड से हार सकती है। वह भी रिकॉर्ड अपडेट करने में की गई लापरवाही की वजह से।

उल्लेखनीय है कि इससे पहले नवंबर 2021 में सूरत नगर निगम मुख्यालय मुगलिसरा को वक्फ संपत्ति घोषित किया गया था। बोर्ड ने दावा किया था कि शाहजहाँ के मुगल शासन के दौरान, उनकी बेटी जहाँआरा बेगम सूरत की मालकिन थीं और उनके विश्वासपात्र इशाकबैल यज़्दी उर्फ ​​हकीकत खान ने 1644 में इमारत का निर्माण किया था। इसका नाम हुमायूँ सराय रखा गया था। यह कथित तौर पर हज यात्रियों को आराम करने के लिए दान किया गया था।

वक्फ बोर्ड ने दावा किया था कि चूँकि संपत्ति एक मुस्लिम शासक द्वारा वक्फ संपत्ति के रूप में दान की गई थी, इसलिए उद्देश्य नहीं बदलता है और इसलिए कॉर्पोरेशन बिल्डिंग वक्फ बोर्ड का हिस्सा होगा। बोर्ड ने शरिया और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए दावा किया था कि ‘एक बार जो वक्फ की संपत्ति होगी, वह हमेशा के लिए वक्फ की ही संपत्ति रहेगी’। 

जब 20000 की फ़ौज पर भारी पड़े 1000 मराठा सैनिक: उंबरखिंड का युद्ध और छत्रपति शिवाजी की रणनीति, मुगलों को ऐसे दी मात

हमारा इतिहास काफी समृद्ध रहा है, लेकिन अंग्रेजों द्वारा चलाई गई शिक्षा व्यवस्था के अभी तक चले आने का नतीजा ये रहा है कि हमारे भीतर गुलामी की मानसिकता भर दी गई है। हमें ये तो पढ़ाया गया कि महाराणा प्रताप या छत्रपति शिवाजी महाराज कब हारे, लेकिन ये नहीं पढ़ाया गया कि उन्होंने कैसे इस्लामी आक्रांताओं को हराया। कई ऐसे राजाओं के तो हमें नाम तक नहीं मालूम। ऐसा ही एक ‘उंबरखिंड का युद्ध’ है, जिसके बारे में आज महाराष्ट्र के कई बच्चों को भी नहीं पता होगा।

करतलब खान ने बनाया शिवाजी पर ‘सरप्राइज अटैक’ का प्लान

इस युद्ध के बारे में बता दें कि इसे छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व वाली मराठा सेना और करतलब खान के नेतृत्व वाली मुग़ल फ़ौज के बीच लड़ा गया था। करतलब खान ने चिंचवड़, तालेगाँव, वडागाँव और मालवाली होकर पुणे से होकर शिवाजी पर चढ़ाई की। आज भी भारतीय रेलवे लाइन सामान्यतः यही रास्ता होकर गुजरती है। वहाँ से वो बाएँ लोहागढ़ के किले की तरफ मुड़ गया, जहाँ का किला दक्कन के पठार और कोंकण की सीमा पर स्थित था। लोहागढ़ को विसपुर के बीच स्थित संकरी गलियों से कोंकण के भीतर बढ़ चला।

उसकी योजना थी कि वो तुंगारण्य के घने जंगलों में घुसे, जिसकी दोनों तरफ से पहाड़ियाँ थीं। इसके बाद वो उंबरखिंड होकर कोंकण में आमजनों के इलाके में घुसना चाहता था। जानकारी के लिए बता दें कि जब अंग्रेजों ने वहाँ रेलवे लाइन बनाई तो उन्होंने मुंबई से पुणे जाने के लिए खंडाला घाट को चुना, उंबरखिंड को नहीं। इसका कारण है कि खंडाला घाट, जिसे बोरघाट भी कहते हैं – वो काफी चौड़ा और खुला-खुला सा है। वहीं उंबरखिंड वाला इलाका अचानक हमले के लिए उपयुक्त था।

करतलब खान भले ही उंबरखिंड की तरफ से बढ़ रहा था, लेकिन छत्रपति शिवाजी को पता था कि वो उधर से आ रहा है और निश्चिंत भी है। भले ही करतलब खान एक गुप्त हमले की साजिश रची थी, लेकिन शिवाजी के जासूस कहीं ज्यादा सक्रिय और दक्ष थे। खान को पता चला था कि क़ुरावण्डा में शिवाजी अपनी सेना के साथ होंगे, जो लोनावला से 3 मील (4.8 किलोमीटर) की दूरी पर स्थित है। लेकिन, जब वो वहाँ पहुँचा तो उसे गहरा धक्का लगा।

ये इसीलिए, क्योंकि वहाँ न तो शिवाजी थे और न ही उनकी सेना का कोई नामोनिशान था। उसके जासूसों ने आकर सूचना दी कि शिवाजी पेन में हैं, घाट के नीचे। इसका परिणाम ये हुआ कि करतलब खान ने अचानक हमले के लिए आगे बढ़ना शुरू कर दिया। वो पहाड़ से निकल कर नाचे आने की कोशिश में था, इस बात से अनभिज्ञ कि महान छत्रपति शिवाजी महाराज की मराठा सेना उंबरखिंड की पहाड़ियों को चारों तरफ से घेर कर पहले से ही घेर कर उसका इंतजार कर रही है।

करतलब खान के साथ एक नुकसान ये भी था कि उसकी फ़ौज कोंकण की जिन नदियों के आसपास से गुजर रही थी, उनमें पानी नहीं था। वो फरवरी का ही महीना था। पीने के पानी की भारी कमी थी। शिवाजी की सेना में कई घुड़सवार भी थे। वो सब छोटे-बड़े पत्थरों के अलावा राइफल और तीन-धनुष से भी लैस थे। शिवाजी की सेना में उस समय 1000 सैनिक थे, लेकिन जंगलों के कारण वो करतलब खान को नहीं दिख रहे थे। 4 घंटे में जब उसकी फ़ौज पहाड़ से नीचे उतरी, तब तक उसे किसी बाधा का सामना नहीं करना पड़ा।

उसी दौरान शिवाजी की सेना के कुक सैनिक ऊपर चढ़ गए और उन्होंने करतलब खान की फ़ौज की संरचना को तोड़ने की। जैसे ही करतलब खान की फ़ौज नीचे आई, उन पर बड़े-बड़े पत्थर बरसने लगे। करतलब खान की फ़ौज नीचे थी और अब शिवाजी की सेना को ऊपर होने का फायदा था। दुश्मन उसे दिख नहीं रहा था, लेकिन उसकी फ़ौज बिखर गई थी। अब आगे बढ़ने से पहले आपको तब की परिस्थितियाँ और इस युद्ध के कारण को भी समझा देते हैं।

क्या था उंबरखिंड के युद्ध का कारण

दरअसल, 10 नवंबर, 1659 को शिवाजी ने अफजल खान को मार डाला था, जो साजिश कर के मुलाकात के बहाने उन्हें मारने के लिए मिला था। प्रतापगढ़ के इस युद्ध के लगभग एक महीने बाद शिवाजी पन्हाला किले के पास प्रकट हुए और बीजापुर के रुस्तम जमान को पराजित किया। शिवाजी के सेनापति नेताजी पालकर ने बीजापुर को दिला डाला, जिस कारण वहाँ के आदिल शाह ने मुग़ल बादशाह से मदद माँगी। मुगलों ने शाइस्ता खान के नेतृत्व में एक बड़ी फ़ौज पुणे भेजी।

बीजापुर से चले सिद्दी जौहर ने पन्हाला को घेर लिया, जिसके बाद शिवाजी फँस गए। लेकिन, फिर वो किसी तरह वहाँ से निकलने में कामयाब रहे। शाइस्ता खान ने उज्बेक फौजदार करतलब खान को कोंकण में शिवाजी के प्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी दी और उसके साथ एक बड़ी फ़ौज भेजी। और अब वापस वहाँ आते हैं, जब करतलब खान ने शिवाजी पर ‘सरप्राइज अटैक’ की साजिश तो रच ली लेकिन गच्चा खा गया और उसकी फ़ौज तितर-बितर होने लगी।

पहाड़ के ऊपर से करतलब खान की फ़ौज पर शिवाजी की सेना ने तगड़ा हमला बोला। इस तरह 20,000 की एक फ़ौज को शिवाजी की 1000 की सेना ने रणनीतिक तरीके से हरा दिया और उसके पास आत्मसमर्पण करने के अलावा कोई चारा न रहा। मात्र 2-3 घंटे में ही इस युद्ध का परिणाम आ गया। उसके माफ़ी माँगने के बाद शिवाजी ने उसे वापस तो जाने दिया, लेकिन उनके सारे हथियार, घोड़े, भोजन और सारे साजोसामान ले लिए। साथ ही उनमें से जो भी शिवाजी की सेना में आना चाहता था, उन्हें ले लिया गया।

इस युद्ध के बाद बढ़ा मराठा सेना का हौसला

शिवाजी और उनकी फ़ौज ने एक-एक कर के सभी फौजियों की तलाशी ली, ताकि शर्तों का पालन हो रहा है इसे सुनिश्चित किया जा सके। जब उसकी फ़ौज वहाँ से चली गई, तब शिवाजी की सेना ने बाकी दिन साजोसामान की पैकिंग करने में लगाया। इसके बाद वो राजगढ़ की तरफ निकल गए। इस युद्ध की जीत ने मराठों को मानसिक रूप से एक बड़ी शक्ति दी। उनके साहस को बल मिला। मुगलों ने भी रणनीति बदल ली और कोंकण पर कब्जे की अपनी योजना को बदल डाला।

इसके बाद एक और युद्ध की चर्चा आती है, जिसमें रात के समय शाइस्ता खान पर शिवाजी ने हमला बोला और उसे वहाँ से घायल अवस्था में भागना पड़ा। उंबरखिंड के युद्ध में मिली जीत के बाद उत्साहित होकर ही ये योजना तैयार की गई थी। जहाँ मराठा सैनिकों में से 50 को बलिदान देना पड़ा, इस युद्ध में मुगलों के 400 फौजी मारे गए। लेकिन, हमें सिर्फ यही पढ़ाया गया कि औरंगजेब ने कैसे शिवाजी को कैद किया था। इन युद्धों के बारे में हमें अगली पीढ़ियों को भी बताने की ज़रूरत है।

कर्नाटक में मुस्लिम छात्राओं के हिजाब के विरोध में छात्रों ने पहना भगवा स्कार्फ, श्रीराम सेना प्रमुख बोले- आतंकी मानसिकता को बाहर करे कॉलेज

कर्नाटक के उडुपी के एक कॉलेज में मुस्लिम छात्राओं द्वारा क्लासरूम में हिजाब पहनने की जिद के कारण यह मामला बढ़ता जा रहा है। मुस्लिम छात्राओं द्वारा हिजाब को अपना मौलिक अधिकार बताकर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल करने के अगले दिन कुंडापुर के सरकारी कॉलेज में 100 से अधिक छात्र भगवा स्कार्फ पहनकर कॉलेज पहुँच गए। छात्रों का कहना है कि उनकी कॉलेज में लड़कियाँ हिजाब पहनकर कक्ष में आ सकती है तो वे भगवा दुपट्टा डालकर क्यों नहीं आ सकते। वहीं, श्रीराम सेना के प्रमुख प्रमोद मुतालिक ने कहा कि यूनिफॉर्म को दरकिनार कर हिजाब पहनने की जिद आतंकी मानसिकता है और ऐसे छात्राओं को कॉलेज से बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए।

भगवा दुपट्टा पहनकर उडुपी के पड़ोसी शहर कुंडापुर के सरकारी पीयू कॉलेज के छात्रों का कहना है कि लगभग 28 छात्राएँ अपने धार्मिक पहचान हिजाब पहनकर कक्षा में आती हैं। इसी के विरोध में उन्होंने बुधवार (2 फरवरी) को कक्षा में भगवा दुपट्टा पहनकर आने का निर्णय लिया। हिंदू छात्रों का कहना है कि जब तक कॉलेज कैंपस में हिजाब पहनने पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाता, तब तक वे भगवा स्कार्फ पहनकर कॉलेज आएँगे।

कॉलेज डेवलपमेंट कमिटी के अध्यक्ष और कुंडापुर के विधायक हलदी श्रीनिवास ने कहा कि किसी भी पक्ष को कॉलेज के शैक्षणिक माहौल को खराब करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। इसको लेकर श्रीनिवास ने कॉलेज प्रबंधन के मिलकर मुस्लिम छात्राओं के साथ बैठक की। हालाँकि, बैठक में कोई नतीजा नहीं निकला। छात्राओं के परिजन लड़कियों के हिजाब पहनने को लेकर अड़े रहे। रिपोर्ट्स के मुताबिक, विधायक ने कहा है कि मुस्लिम छात्राओं के अभिभावकों के साथ बैठक में निर्णय नहीं हो पाया, इसलिए वह हिजाब और भगवा दुपट्टा पहनकर कॉलेज आने वालों के खिलाफ कार्रवाई शुरू करेंगे।

इस बैठक का एक वीडियो भी सामने आया है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस वीडियो में दिख रहा है कि मुस्लिम माता-पिता तर्क दे रहे हैं कि कि उन्होंने कभी भी किसी भी धर्म के साथ भेदभाव नहीं किया और सभी हिंदू त्योहारों के दौरान अपने बच्चों को कॉलेज भेजा। अभिभावकों का कहना है, “जहाँ तक हिजाब की बता है तो यह अनिवार्य है। हमें यह करना होगा। उनके बीच भेदभाव न करें। वे यहाँ पढ़ने आते हैं।”

उधर श्रीराम सेना के अध्यक्ष प्रमोद मुतालिक ने मंगलवार (1 फरवरी) को कहा कि हिजाब पहनकर कॉलेज आने वालों को बाहर का रास्ता दिखा देना चाहिए। मुतालिक ने कहा, यह उन्हें (छात्राओं को) आतंकवादी के स्तर पर ले जाने की मानसिकता है। आज वे हिजाब कह रहे हैं, कल बुर्का माँगेंगे, फिर नमाज और मस्जिद पर अडेंगे। यह स्कूल है या आपका धार्मिक केंद्र है?”

उन्होंने कहा कि इस बहस मे उलझने के बजाए छात्राओं को स्थानांतरण प्रमाण-पत्र देकर उन्हें कॉलेज से बाहर निकाल देना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कोलार जिले के कुनिगल तालुक के एक मुस्लिम बहुल गाँव बोम्मनहल्ली के एक सरकारी स्कूल में काम करने वाली एक हिंदू शिक्षिका का तबादला कर दिया गया।

कोलार के ही एक अन्य स्कूल का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि चिंतामणि तालुक के एक स्कूल में बच्चों द्वारा नमाज अता करने की घटना को लेकर कहा, “क्या आप इसे (भारत) पाकिस्तान या अफगानिस्तान बनाने के लिए निकले हैं? अपनी अलगाववादी मानसिकता के साथ यदि आप हिजाब और बुर्का की माँग करते हैं तो पाकिस्तान जाइए।” उन्होंने सरकार की इस तरह की मानसिकता पर रोक लगाने की माँग की।

क्लास में हिजाब बैन होने के बाद एक मुस्लिम छात्रा ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। कोर्ट में याचिका दायर करते हुए मुस्लिम छात्रा ने कहा कि उसका कॉलेज उसके व अन्य मुस्लिम लड़कियों के साथ भेदभाव कर रहा है और उन्हें हिजाब पहनकर कॉलेज में घुसने और क्लास लेने से रोक रहा है। याचिका में दावा किया गया है कि कॉलेज प्रशासन की कार्रवाई असंवैधानिक और मनमानी है।

बता दें कि उडुपी जिले के पीयू कॉलेज में हिजाब का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक, कक्षा में एकरूपता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है।

भले ही इस विरोध प्रदर्शन को ‘हिजाब’ के नाम पर किया जा रहा हो, लेकिन मुस्लिम छात्राओं को बुर्का में शैक्षणिक संस्थानों में घुसते हुए और प्रदर्शन करते हुए देखा जा सकता है। इससे साफ़ है कि ये सिर्फ गले और सिर को ढँकने वाले हिजाब नहीं, बल्कि पूरे शरीर में पहने जाने वाले बुर्का को लेकर है। हिजाब सिर ढँकने के लिए होता है, जबकि बुर्का सर से लेकर पाँव। कई इस्लामी मुल्कों में शरिया के हिसाब से बुर्का अनिवार्य है। कर्नाटक में चल रहे प्रदर्शन को मीडिया/एक्टिविस्ट्स भले इसे हिजाब से जोड़ें, ये बुर्का के लिए हो रहा है।

अनुच्छेद-370 हटने के बाद 1700 कश्मीरी पंडितों को नौकरी, 439 आतंकी मारे गए: J&K पर संसद में सरकार ने दिए आँकड़े

जम्मू-कश्मीर (Jammu and Kashmir) में अनुच्छेद-370 निरस्त करने के बाद से अब तक यहाँ विभिन्न सरकारी विभागों में करीब 1700 कश्मीरी पंडितों को नियुक्त किया गया है। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय (Nityanand Rai) ने बुधवार (2 फरवरी, 2022) को राज्यसभा में यह जानकारी दी। राज्यसभा में कश्मीरी पंडितों की नौकरियों को लेकर पूछे गए सवाल पर केंद्रीय गृह राज्य मंत्री ने जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा उपलब्ध कराए गए आँकड़ों का हवाला देते हुए कहा, “1,54,712 में से 44,684 कश्मीरी प्रवासी परिवारों को राहत और पुनर्वास आयुक्त (प्रवासी) जम्मू के कार्यालय में पंजीकृत किया गया था। जम्मू-कश्मीर प्रशासन द्वारा विभिन्न सरकारी विभागों में करीब 1700 कश्मीरी पंडितों को नियुक्त किया गया है।”

नित्यानंद राय ने एक लिखित प्रश्न का जवाब देते हुए कहा, “कश्मीरी प्रवासी परिवारों के पुनर्वास के लिए जम्मू-कश्मीर सरकार ने 5 अगस्त 2019 से 1697 ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त किया है और इस संबंध में अतिरिक्त 1140 व्यक्तियों का चयन किया है।”

नित्यानंद राय ने राज्यसभा सांसद नीरज डांगी को एक लिखित जवाब में बताया कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 के हटने के बाद से यानी 5 अगस्त 2019 से 26 जनवरी 2022 तक 541 आतंकी घटनाएँ हुई हैं, जबकि 439 आतंकवादी मारे गए हैं। इसके अलावा 98 नागरिक भी मारे गए और 109 सुरक्षा बल (एसएफ) ​बलिदान हुए हैं। गृह राज्य मंत्री ने बताया इन घटनाओं के दौरान, किसी भी महत्वपूर्ण सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान नहीं हुआ है।

बता दें कि जम्मू-कश्मीर में मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद-370 को निरस्त करने के बाद वहाँ पर पथराव की घटनाएँ भी कम हुई हैं। इसके अलावा घाटी में आतंकवादियों को होने वाली फंडिंग पर भी रोक लगी है और अलगाववादी नेताओं पर एनआईए ने कार्रवाई की है।

‘सिख कौम जिहादी आ, बदला लावेगी’: कस्तूरबा नगर पहुँचे निहंगों ने दिल्ली गैंगरेप पीड़िता को भेंट की तलवार, अफवाह फैलाने के मामले में 2 पर FIR

पूर्वी दिल्ली में विवेक विहार के कस्तूरबा नगर इलाके में 26 जनवरी को एक महिला के अपहरण और गैंगरेप का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। दिल्ली पुलिस ने मंगलवार (1 फरवरी 2022) को महिला के घर की ओर जाने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया था। इसके बावजूद सोमवार रात करीब 11 बजे पंजाब से 100-150 निहंग सिख कस्तूरबा नगर आ पहुँचे। यहाँ उन्होंने पीड़िता को तलवार भेंट की। इसकी जानकारी मिलते ही मौके पर पुलिस पहुँची और निहंगों को वहाँ से वापस लौटा दिया। वहीं, सोशल मीडिया पर पीड़ित महिला के सिख होने की बात कह इस मामले को मजहबी चश्मे से देखा जा रहा है।

वायरल वीडियो में एक निहंग महिला के पिता के सिर पर पगड़ी बाँधता हुआ भी दिखाई दे रहा है। उनके घर की दीवार पर एक निहंग ने लिखा, “सिख कौम जिहादी आ, बदला लावेगी (जहाँ भी सिख समुदाय रहेगा, वहाँ बदला लिया जाएगा)।” जबकि पीड़िता की बहन का कहना है उनका परिवार हिंदू है, ना की सिख

वहीं, दिल्ली पुलिस ने ट्विटर पर बयान जारी कर कहा कि उन लोगों के खिलाफ मामले दर्ज किए गए हैं, जिन्होंने इस घटना को धार्मिक रंग देने का प्रयास किया है। उन्होंने लिखा, “शाहदरा अपहरण एवं यौन हिंसा केस। भ्रामक सूचना फैलाने के मामले में विवेक विहार थाने में 2 FIR दर्ज की गई हैं। दिल्ली पुलिस महिलाओं के प्रति अपराध में जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाती है।”

इस मामले में दिल्ली पुलिस ने 31 जनवरी को ट्विटर पर विक्टिम की पहचान उजागर न करने और उनके बारे में भ्रामक जानकारी न फैलाने की अपील की थी। उन्होंने कहा था कि पीड़िता की पहचान उजागर न करें, भ्रामक तथ्य न फैलाएँ। इस मामले में जिन लोगों ने भी अफवाह फैलाई है उनकी पहचान कर आवश्यक कार्रवाई की जा रही है।

बताया जा रहा है कि मंगलवार को दिन भर जिला पुलिस उपायुक्त आर. सत्यसुंदरम खुद विवेक विहार इलाके में मौजूद रहे हालात को देखते हुए पुलिस ने पूरे कस्तूरबा नगर इलाके की नाकाबंदी कर वहाँ धारा-144 लगा दी। वहीं, जिले के वरिष्ठ पुलिस अधिकारी धारा-144 लगने की बात से इनकार कर रहे हैं।

बता दें कि आरोपितों पर गैंगरेप, शारीरिक हमला, यौन हमला और आपराधिक साजिश की धाराओं में केस दर्ज हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, नवम्बर 2021 में आरोपित पक्ष के परिवार से एक नाबालिग लड़के ने पीड़िता से एकतरफा प्यार में असफलता के बाद आत्महत्या कर लिया था। पीड़िता पर हमला और उसके साथ किया गया कृत्य उसी का बदला था। इस पूरे घटनाक्रम में अब तक कुल 11 आरोपित गिरफ्तार किए गए हैं। इनमें 9 महिलाएँ भी शामिल हैं। पकड़े गए आरोपितों में 2 नाबालिग भी हैं। पीड़िता की उम्र लगभग 20 साल बताई जा रही है। 

70 साल में 12 मेडिकल कॉलेज, डेढ़ साल में हो गए 33, दो एम्स की भी सौगात: कोरोना से भी निपटने में सफल रही योगी सरकार

उत्तर प्रदेश में जिन क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं, उनमें से एक है – स्वास्थ्य। कोरोना संक्रमण महामारी के दौरान हमने देखा कि किस तरह देश की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला राज्य होने के बावजूद उत्तर प्रदेश का प्रदर्शन बाकी राज्यों से बेहतर रहा। खासकर भारत के सबसे अमीर राज्यों में से एक महाराष्ट्र और सबसे कम जनसंख्या वाले राज्यों में से एक केरल की स्थिति सबसे बदतर रही। लेकिन, योगी आदित्यनाथ की नेतृत्व वाली सरकार ने पूरी मुस्तैदी इस महामारी से निपटने में लगा दी और सकारात्मक परिणाम भी मिले।

खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कह चुके हैं कि केंद्र में चल रही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के समर्थन के कारण उत्तर प्रदेश अब एक ‘मेडिकल हब’ बन गया है। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे एक ऐसा समय था जब उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य इंफ्रास्ट्रक्चर ठीक नहीं था। लेकिन, आज स्थिति ये है कि सभी 75 जिलों में ICU बेड्स की व्यवस्था है, 1.80 लाख इमरजेंसी बेड्स हैं और 518 ऑक्सीजन प्लांट्स को संचालन की अवस्था में लाया जा रहा है।

इन सबके अलावा पहले राज्य डॉक्टरों की कमी से भी जूझ रहा था, लेकिन योगी सरकार ने 310 स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की बहाली ‘पब्लिक सर्विस कमीशन’ के तहत की गई है। इसके अलावा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 15 जिलों में कोरोना से बचने के लिए ‘बायो सेफ़्टी लेवल (BSL)’ का उद्घाटन भी किया। अमरोहा, बागपत, संभल, हरदोई, भदोही, चंदौली, शामली, रामपुर, प्रतापगढ़, हापुड़, मुजफ्फरनगर, पीलीभीत, फर्रुखाबाद,, सुल्तानपुर और संत कबीर नगर में इनका उद्घाटन किया गया।

आज सभी जिलों में वेंटिलेटर भी उपलब्ध है। आपको ये बात जान कर सुखद आश्चर्य होगा कि राज्य में 33 मेडिकल कॉलेज बन रहे हैं। इनमें से 9 मेडिकल कॉलेज सभी संचालन की स्थिति में हैं। जब कोरोना की पहली लहर आई थी, तब उत्तर प्रदेश में जो स्थिति थी और दूसरी लहर के समय जो स्थिति थी, उसमें भी अंतर था। दूसरी लहर के समय योगी सरकार और ज्यादा तैयार थी। उत्तर प्रदेश 4 से अधिक लाख कोरोना टेस्ट प्रतिदिन की क्षमता की स्थिति में भी या गया था।

हमने देखा कि किस तरह यूरोप, यूके और चीन में जिस तरह से कोरोना ने तीसरी लहर के दौरान भी कहर मचाया, उत्तर प्रदेश में इसका कोई खास असर नहीं देखने को मिला। ये भी जान लीजिए कि 70 वर्षों में उत्तर प्रदेश में मात्र 12 मेडिकल कॉलेज थे, लेकिन सिर्फ डेढ़ वर्षों में 33 मेडिकल कॉलेज बन गए। 8 मेडिकल कॉलेजों में MBBS की तैयारी शुरू हो गई है और 9 मेडिकल कॉलेजों में इसकी पढ़ाई जल्द ही शुरू होगी। गोरखपुर और रायबरेली में AIIMS (अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान) का निर्माण किया गया।

मेडिकल संस्थानों ने आउटडोर सेवाएँ भी शुरू की हैं, जिससे लाखों लोगों को फायदा हो रहा है। साथ ही सभी मेडिकल कॉलेजों, संस्थानों और विश्वविद्यालयों में सामान्य वर्ग के गरीबों (EWS) के लिए भी सीटें आरक्षित की गई हैं। साथ ही यूपी सरकार ‘वन स्टेट, वन मेडिकल कॉलेज’ के प्रस्ताव पर भी काम कर रही है। राज्य के 16 जिलों में ‘पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP)’ के तहत मेडिकल कॉलेजों के निर्माण का काम भी चल रहा है। जिन जिलों में स्वास्थ्य सेवाएँ बेहतर नहीं रहीं, वहाँ खास ध्यान दिया जा रहा है।

वहीं अखिलेश यादव और मायावती के शासनकाल में एक भी PPP मॉडल वाले मेडिकल कॉलेज नहीं थे। 9 जिलों में इस कार्य के लिए 17 निवेशक भी सामने आए हैं। इसके लिए जनवरी 2022 में ही अप्लीकेशन मँगाया गया था। एक दर्जन से भी अधिक निवेशक प्रशासन से संपर्क में हैं। इसी तरह गोरखपुर और उसके आसपास के जिलों में इंसेफ्लाइटिस के मामले भी काफी कम हुए हैं। 2005 से 2018 तक 47,509 कोरोना मामले सामने आए। इससे 8373 मरीजों की मौत भी हुई है।

इसी तरह जापानी इंसेफ्लाइटिस के भी 4677 मरीज सामने आए थे और 881 मरीजों की मौत हो गई थी। आँकड़े कहते हैं कि इनमें अब 99 प्रतिशत की कमी आई है। इसी तरह अब डेंगू की समस्या से निपटने के लिए भी काम किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश में स्वास्थ्य और चिकित्सा क्षेत्र में काफी काम हुए हैं, लेकिन बहुत कुछ होना बाकी भी है। इतना बड़ा राज्य, गरीबी और लंबे समय की उपेक्षा के कारण काम कठिन तो है, लेकिन उस दिशा में योगी सरकार ने काफी काम किया है।

‘न्यायपालिका और EC से लोगों की आवाज़ दबाती है मोदी सरकार’: चीन-Pak पर भी राहुल गाँधी को केंद्रीय मंत्री ने पढ़ाया इतिहास

संसद के बजट सत्र में बोले हुए कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी ने न्यायपालिका का भी अपमान कर डाला। उन्होंने कह डाला कि न्यायपालिका, चुनाव आयोग और पेगासस – ये वो माध्यम हैं, जिनका इस्तेमाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने लोगों की आवाज को दबाने के लिए किया। केन्द्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू ने उनके इस बयान की नींद की है। उन्होंने कहा कि न सिर्फ भारत के कानून मंत्री के रूप में, बल्कि एक सामान्य नागरिक के रूप में भी वो न्यायपालिका और EC को लेकर राहुल गाँधी के कहे शब्दों की निंदा करते हैं।

उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और चुनाव आयोग हमारे लोकतंत्र के महत्वपूर्ण संस्थान हैं। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी को अपने इस बयान के लिए न्यायपालिका और चुनाव आयोग से माफी माँगनी चाहिए। बता दें कि राहुल गाँधी केरल के वायनाड से सांसद हैं। इसके अलावा चीन और पाकिस्तान के मुद्दे पर भी उन्होंने केंद्र की मोदी सरकार को घेरना चाहा, लेकिन केन्द्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सोशल मीडिया के माध्यम से उन्हें आईना दिखाया है और तथ्यों से अवगत कराया है।

उन्होंने कहा, “लोकसभा में राहुल गाँधी ने आरोप लगाया कि मौजूदा सरकार चीन और पाकिस्तान को करीब लेकर आई है। शायद, उन्हें एक क्रम में इतिहास का पाठ पढ़ने की जरूरत है। 1963 में पाकिस्तान ने अवैध रूप से शाख्सगाम घाटी को चीन को सौंप दिया था। चीन ने 1970 के दशक में काराकोरम हाइवे का निर्माण ‘पाक अधिकृत कश्मीर (POK)’ से होकर किया गया। उसी समय से इन दोनों देशों ने परमाणु क्षेत्र में भी अपना गठबंधन शुरू कर दिया था।”

केन्द्रीय विदेश मंत्री ने याद दिलाया कि कैसे 2013 में ‘चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरीडोर’ की शुरुआत हुई। उस समय केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए-2 की सरकार चल रही थी। उन्होंने राहुल गाँधी को खुद से ये सवाल पूछने की सलाह दी कि क्या तब चीन और पाकिस्तान एक-दूसरे के दूर थे। राहुल गाँधी ने ये आरोप भी लगाया कि अबकी गणतंत्र दिवस पर भारत एक विदेशी अतिथि तक नहीं ला पाया। एस जयशंकर ने याद दिलाया कि सेंट्रल एशियाई देशों के जो 5 राष्ट्रपति आने वाले थे, उन्होंने 27 जनवरी को एक वर्चुअल समिट में भारत के साथ हिस्सा लिया। उन्होंने पूछा कि क्या राहुल गाँधी ने ये भी मिस कर दिया?

प्रदर्शन के दौरान कॉन्ग्रेसियों ने SI पर जलता पुतला फेंका, मुँह पर पेट्रोल भी डाला: गंभीर हालत में दिल्ली रेफर, MP पुलिस ने 5 को किया अरेस्ट

मध्य प्रदेश के ग्वालियर (Gwalior, Madhya Pradesh) के फूलबाग चौराहे पर कॉन्ग्रेस नेताओं द्वारा किए जा रहे पुतला दहन की चपेट में आने से सब-इंस्पेक्टर दीपक गौतम बुरी तरह झुलस गए हैं। उनकी गंभीर हालत को देखते हुए स्थानीय डॉक्टरों ने बुधवार (2 फरवरी 2022) को उन्हें दिल्ली रेफर कर दिया है। उधर प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान (Shivraj Singh Chauhan) फोन कर गौतम से कुशलक्षेम पूछा है। वहीं, कॉन्ग्रेस विधायक ने कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्रवाई को स्थगित करने का आग्रह किया है।

इस संबंध में मुख्यमंत्री कार्यालय ने ट्वीट किया, “ग्वालियर के फूलबाग चौराहे पर पुतला दहन के दौरान कानून व्यवस्था संभालते वक़्त अग्नि दुर्घटना में घायल हुये इंदरगंज थाने के एएसआई श्री दीपक गौतम से सीएम श्री @ChouhanShivraj ने फ़ोन पर चर्चा कर कुशलक्षेम जानी।”

डॉक्टरों ने बताया है कि दीपक गौतम आग से 45 प्रतिशत तक जल गए हैं। उनकी छाती में गहरे घाव हैं। उनका हाथ और चेहरा भी बुरी तरह झुलस गए हैं। स्थिति को गंभीरता को देखते हुए दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के बर्न विभाग में एडमिट किया गया है, जहाँ डॉक्टरों की निगरानी में उनका इलाज चल रहा है।

पुलिस अधीक्षक अमित सांघी का कहना है कि इस मामले में 6 नामजद लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इनमें पाँच कॉन्ग्रेस से जुड़े नेता हैं। जिन आरोपितों के गिरफ्तार किया गया है, उनमें NSUI के प्रदेश उपाध्यक्ष शिवराज यादव, आकाश तोमर, अनीश खान, अभिमन्यु पुरोहित, घनश्याम घुड़साले और सचिन भदौरिया शामिल हैं। आरोपितों पर भारतीय दंड संहिता की धारा 307, 188, 147, 148, 149 और 353 के तहत मामला दर्ज किया गया है। वीडियो के आधार पर अन्य आरोपितों की तलाश की जा रही है। आरोपितों के खिलाफ रासुका के तहत भी कार्रवाई की जा सकती है।

पुलिस की इस कार्रवाई पर कॉन्ग्रेस के विधायक सतीश सिकरवार आपत्ति जाहिर की है और कार्यकर्ताओं पर पुलिस कार्रवाई को स्थगित करने की माँग की है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन और पुतला दहन होता रहा है। इस तरह के प्रदर्शन में कई जनप्रतिनिधि भी हादसे के शिकार होते रहे हैं। उन्होंने कहा कि सब इंस्पेक्टर भी हादसे के शिकार हुए हैं। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने किसी द्वेष के तहत कार्य नहीं किया है। उन्होंने कहा कि 20-25 कार्यकर्ताओं पर कार्रवाई करना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। इसलिए जाँच को स्थगित किया जाए।

दरअसल, कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता अपने नेता सुनील शर्मा की गिरफ्तारी का विरोध करते हुए पुतला दहन कर रहे थे। पुलिस ने पुतला छीनने का प्रयास किया। इस दौरान कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने जलता पुतला दीपक गौतम के ऊपर फेंक दिया। इतना ही नहीं, दीपक गौतम के मुँह पर पेट्रोल भी फेंका गया। इससे दीपक गौतम की वर्दी में आग लग गई और वे बुरी तरह झुलस गए।