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भगवान के लिए किसी स्थान विशेष की जरूरत नहीं: मद्रास हाईकोर्ट ने मंदिर की याचिका खारिज की, सार्वजनिक जमीन पर निर्माण को बताया अवैध

मद्रास हाईकोर्ट (Madras High Court) ने शुक्रवार (28 नवंबर 2022) को सार्वजनिक जमीन पर बनाई गई मंदिर को हटाने पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि ईश्वर तो सर्वव्यापी हैं और उनकी दैवीय उपस्थिति के लिए किसी विशेष स्थान की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने कहा कि यही कट्टरता धर्म के नाम पर लोगों के बीच दीवार पैदा करने वाली सारी समस्याओं की जड़ है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, जस्टिस एस वैद्यनाथन और जस्टिस डी भारत चक्रवर्ती की खंडपीठ ने मंदिर के ट्रस्टी द्वारा दी गई याचिका को खारिज करते हुए कहा कि हाइवे बनाने का उद्देश्य लोगों को सहूलियत देना है और इसमें सभी धर्म और जाति के लोग शामिल हैं। खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता मंदिर बनाने की आड़ में सार्वजनिक संपत्ति को नहीं हड़प सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता विनयगर की पूजा करने और अपने भक्तों को सुविधा देने के लिए इतने आग्रही हैं तो उसके लिए कई रास्ते हैं। वह या तो अपनी जमीन पर या पास की जमीन पर मंदिर बनवाकर वहाँ मूर्ति को स्थानांतरित कर दें।

दरअसल, हाईकोर्ट तमिलनाडु के राज्य हाइवे विभाग ने पेराम्बलुर जिले के बेपन्नथट्टई में स्थिति एक मंदिर को हटाने के लिए नोटिस दिया था। इसके बाद इस नोटिस को रद्द करने के लिए मंदिर के ट्रस्टी एस. पेरियासामी ने हाईकोर्ट का रूख किया था। याचिकाकर्ता ने कहा कि मंदिर 30 साल पुराना है और इसके कारण लोगों और वाहनों की आवाजाही में किसी तरह की समस्या भी नहीं उत्पन्न होती।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता कह रहा है कि यह मंदिर तीन दशक पुराना है और यह जमीन मंदिर की है तो मंदिर की ओर से आवश्यक दस्तावेज क्यों नहीं पेश किया जा रहा है। ऐसा करने से उसे कौन रोक रहा है? कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता कह रहा है कि जमीन मंदिर के ट्रस्ट की संपत्ति है, लेकिन इसका कागजी साबूत पेश करने में असफल रहा है। इसलिए याचिकाकर्ता की यह दलील नहीं मानी जा सकती कि मंदिर का उद्देश्य सिर्फ पूजा के लिए है और इसके कारण लोगों या वाहनों को किसी तरह समस्या नहीं उत्पन्न हो रही।

कोर्ट ने कहा कि यदि याचिकाकर्ता के इस बात को मान ली जाए तो कल हर कोई सार्वजनिक जमीन पर कब्जा करके बैठ जाएगा और एक याचिका लेकर चला आएगा कि इससे किसी अन्य को परेशानी नहीं हो रही है। इसलिए उनके अवैध अतिक्रमण को अनुमति दी जाए।

‘चीन वापस जाओ’: नेपाल में ड्रैगन के विरोध में सड़कों पर उतरे लोग, देश के आंतरिक मामलों में दखल से हैं खफा

चीन (China) नेपाल (Nepal) के अंदरूनी मामलों में लगातार हस्तक्षेप कर रहा है। इसको लेकर नेपाल के सियासी तबकों से लेकर आम लोगों तक ने आवाज उठाई है। इसको लेकर एक बार फिर गुरुवार (27 जनवरी 2022) को नेपाल के राष्ट्रीय एकता अभियान ने बिराटनगर, मोरंग और खाबरहुब में चीन के खिलाफ प्रदर्शन (Protest) किया। देश के नागरिक समाज ने नेपाल के आंतरिक मामलों में चीन के हस्तक्षेप और उत्तरी सीमा के इलाके में अतिक्रमण का विरोध किया है।

विरोध प्रदर्शन के दौरान राष्ट्रीय एकता अभियान के सदस्यों ने महेंद्र चौक से बिराटनगर के भट्टा चौक तक मार्च निकाला। साथ ही चीन की विस्तारवादी नीति और नेपाल के शीर्ष राजनीतिक क्षेत्र में इसके अनुचित हस्तक्षेप के खिलाफ नारेबाजी की। प्रदर्शन के दौरान लोगों ने चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का पुतला भी फूँका।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, चीन ने नेपाली व्यापारियों को दबाने के लिए बॉर्डर प्वाइंट्स पर अनौपचारिक नाकाबंदी लगा दी है। इसके साथ ही वह उन नेपाली छात्रों के प्रति भी उदासीनता दिखा रहा है, जो चीनी विश्वविद्यालयों से अपनी मेडिकल की डिग्री अभी तक पूरी नहीं कर पाए हैं। संगठन के मोरंग समन्वयक जितेंद्र यादव ने कहा कि उन्होंने समाज और सरकार को नेपाल के आंतरिक मामलों में चीन के व्यापक हस्तक्षेप का एहसास कराने के लिए विरोध प्रदर्शन किया है।

अक्टूबर 2019 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग नेपाल की यात्रा पर आए थे। इसके बाद से चीन नेपाल के राजनीतिक और सरकारी एजेंडे को निर्देशित करने की कोशिश कर रहा है। रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि नेपाल ही एकमात्र ऐसा देश है, जहाँ चीन एक निश्चित प्रकार का लाभ उठाता है। हालाँकि, माना जाता है कि जुलाई 2021 में जब से केपी शर्मा ओली ने प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा दिया, तब से चीन के लिए स्थिति मुश्किल हो गई है।

उल्लेखनीय है कि चीन के खिलाफ नेपाल में विरोध प्रदर्शन आम बात हो गई है। इससे पहले 13 जनवरी 2022 को राष्ट्रीय एकता अभियान ने इसी तरह का विरोध प्रदर्शन किया था और राजधानी काठमांडू में चीनी राजदूत होउ यांकी की फोटो को जलाया था। प्रदर्शनकारियों ने यांकी के खिलाफ नारे लगाए और तख्तियों का प्रदर्शन किया था, जिस पर लिखा था ‘चीन वापस जाओ’।

हरीश रावत के खिलाफ संध्या डालाकोटी ने उत्तराखंड के लालकुआँ सीट से ठोकी ताल, कहा- ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ वाली पार्टी ने किया अपमान

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव (Uttarakhand Assembly Polls) के मद्देनजर जारी सियासी खींचतान के बीच कॉन्ग्रेस की अंदरूनी सिरफुटौवल सामने आ गई है। उत्तराखंड की लालकुआँ विधानसभा सीट से कॉन्ग्रेस (Congress) ने पहले संध्या डालाकोटी (Sandhya Dalakoti) को टिकट दिया था, लेकिन बाद में उनसे छीनकर कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत (Harish Rawat) को दिया। हरीश रावत ने लालकुआँ सीट से अपना पर्चा दाखिल कर दिया है। अब संध्या ने मैदान में बने रहने की बात कही है।

सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे वीडियो के मुताबिक, संध्या डालाकोटी ने कहा कि वो आज शुक्रवार (28 जनवरी 2022) को अपना नामांकन दाखिल करने के लिए जा रही हैं। उन्होंने कहा, “लालकुआँ विधानसभा क्षेत्र की 66,000 महिलाओं और 70,000 युवाओं के दम पर मैं ये नामांकन दाखिल कर रही हूँ। बेटी दिवस के दिन कॉन्ग्रेस पार्टी ने मुझे यहाँ से टिकट दिया था, लेकिन दो दिन बाद 26 जनवरी की रात 7 बजे मेरा टिकट काट दिया गया।”

संध्या डालाकोटी ने जनता से वादा किया अगर वो इस विधानसभा से चुनाव जीतती हैं तो वो जनता के कल्याण के लिए कार्य करेंगी। हालाँकि, टिकट कटने पर नाराजगी के बीच संध्या से हरीश रावत ने गुरुवार (27 जनवरी 2022) को मुलाकात की थी। हरीश रावत उन्हें मनाने की कोशिश कर रहे हैं।

इससे पहले संध्या डालाकोटी ने लालकुआ के नाम खुला पत्र लिखते हुए कहा था कि उन्होंने कॉन्ग्रेस के एक निष्ठावान कार्यकर्ता के रूप में 12-12 बजे तक काम किया। कोरोना में लोगों को हजारों पैकेट बाँटे। एक आपदा पीड़ित को अपनी जमीन भी दी थी, लेकिन हरीश दुर्गापाल और हरीश रावत ने उनका अपमान किया। संध्या ने यह भी कहा कि ‘लड़की हूँ लड़ सकती हूँ’ का नारा देने वाली पार्टी ने मेरा अपमान किया। उन्होंने कॉन्ग्रेस से सवाल किया कि उनके सेवा भाव में आखिर क्या कमी रह गई थी, जिसके चलते उनके साथ ऐसा किया गया।

इसरो वैज्ञानिक के खिलाफ साजिश, गल्फ में रॉ पर चोट… हामिद अंसारी पर लग चुके हैं कई गंभीर आरोप: पूर्व उपराष्ट्रपति की राष्ट्रवाद से खुन्नस पुरानी

देश के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी (Hamid Aansari) को एक बार फिर से देश मे असहिष्णुता (Intolerance) नजर आने लगी है। उन्हें देश में एक बार फिर से लोकतंत्र खतरे में दिखाई देने लगा है। उन्होंने 27 जनवरी 2022 को इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) के कार्यक्रम को संबोधित करते हुए हिंदू राष्ट्रवाद (Hindu Nationalism) पर चिंता व्यक्ति की। अंसारी ने कहा कि देश में धार्मिक आधार पर लोगों को बाँटा और धर्म विशेष के लोगों को उकसाने की कोशिश की जा रही है।

गणतंत्र दिवस (26 जनवरी) के मौके पर हामिद अंसारी ने देश के लोकतंत्र की आलोचना की और कहा कि देश में असहिष्णुता बढ़ रही है और ये अब संवैधानिक मूल्यों से हट गया है। हिंदू राष्ट्रवाद पर चिंता व्यक्त करते हुए अंसारी ने भारत के ‘बहुलतावादी संविधान के संरक्षण’ भाषण दिया। उन्होंने कहा था, ‘‘हाल के वर्षों में हमने उन प्रवृत्तियों और प्रथाओं के उद्भव का अनुभव किया है, जो नागरिक राष्ट्रवाद के सुस्थापित सिद्धांत को लेकर विवाद खड़ा करती हैं और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की एक नई एवं काल्पनिक प्रवृति को बढ़ावा देती हैं। वह नागरिकों को उनके धर्म के आधार पर अलग करना चाहती हैं, असहिष्णुता को हवा देती हैं और अशांति और असुरक्षा को बढ़ावा देती हैं।’’

इसके साथ ही अंसारी ने खुद से ही अपनी पीठ भी थपथपाई और बताया कि उपराष्ट्रपति के तौर पर उनके कार्यकाल के दौरान देश की संसदीय प्रणाली और कानून पूरी तरह से पारदर्शीा था। खास बात यह है कि जिस ‘इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल’ (IAMC) के वर्चुअल कार्यक्रम में हामिद अंसारी ने हिस्सा लिया उस पर पहले से भी पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से जुड़े होने के आरोप हैं।

पहले भी देश विरोधी बयान देते रहे हैं हामिद अंसारी

उल्लेखनीय है कि हामिद अंसारी के जिस बयान को लेकर बवाल मचा हुआ है। ऐसी बातें वो पहले भी कर चुके हैं। मुस्लिमों को भारत में असुरक्षित बताने वाले हामिद अंसारी ने पिछले साल जनवरी 2021 में जी न्यूज के एंकर अमन चोपड़ा को एक इंटरव्यू दिया था। वो अपनी नई किताब ‘बाय मैनी ए हैप्पी एक्सीटेंड’ को प्रोमोट करने शो में गए थे। उस दौरान उन्होंने कहा था कि भारत में मुस्लिम असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। मॉब लिंचिंग के सवाल पर पूर्व उपराष्ट्रपति ने चीख-चीख कर कहा था कि लिंचिंग वास्तव में धार्मिक रूप से प्रेरित है। उन्होंने ये साबित करने की कोशिश की थी कि जब से हिंदू राष्ट्रवादी बीजेपी ने भारत में सत्ता हासिल की है, देश के अल्पसंख्यकों की लिंचिंग बढ़ गई।

यहीं नहीं हामिद अंसारी पर ये भी आरोप लग चुके हैं कि जब वो 1990-92 के दौरान ईरान के राजदूत थे तो उन्होंने गल्फ कंट्री में रॉ के सेटअप को उजागर कर रॉ के अधिकारियों की जिंदगी को खतरे में डाल दिया था। रॉ के पूर्व अधिकारी एनके सूद ने 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर हामिद अंसारी के रोल की जाँच करने की माँग की थी। सूद ने 1991 में भारतीय अधिकारी संदीप कपूर के अपहरण का भी जिक्र किया था। इस मामले में हामिद अंसारी पर लापरवाही का आरोप भी लगा था।

इसके साथ ही 2019 में एनके सूद ने इस बात का भी खुलासा किया था। सूद ने बताया था कि रतन सहगल नाम का व्यक्ति हामिद अंसारी का सहयोगी था। उस दौरान वो आईबी में था। रतन सहगल ने ही वैज्ञानिक नाम्बी नारायणन (Nambi Naraynan) को साजिश में फँसाया था और उनका कैरियर तबाह कर दिया। सूद ने यह भी खुलासा किया था कि हामिद अंसारी का करीबी होने के कारण रतन सहगल अक्सर उन्हें डराया करता था।

लावण्या सुसाइड जाँच में स्टालिन सरकार डाल रही अड़ंगा: ईसाई धर्मांतरण पर लीपापोती के बाद NCPCR अध्यक्ष जाएँगे तमिलनाडु, CBI जाँच की माँग

तमिलनाडु (Tamil Nadu) में जबरन धर्म परिवर्तन (Forced Conversion) की कोशिशों से आहत होकर आत्महत्या (Suicide) करने वाली 12वीं की छात्रा लावण्या के मामले को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने गंभीरता से लिया है। आयोग के अध्यक्ष प्रियांक कानूनगो 30 और 31 जनवरी को तंजावुर जाएँगे और जिले के माइकलपट्ट स्थित सेक्रेड हर्ट सीनियर सेकेंड्री स्कूल की 17 वर्षीय नाबालिग छात्रा की आत्महत्या मामले की जाँच करेंगे। वहीं, भाजपा ने मामले की जाँच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से कराने की माँग की है।

अपने प्रेस नोट में आयोग ने कहा कि NCPCR को शिकायत मिली थी कि इस नाबालिग छात्रा को ईसाई धर्म अपनाने के लिए बाध्य किया गया था। इसके लिए तैयार नहीं होने पर स्कूल प्रशासन द्वारा उसे शारीरिक दंड दिया गया, घर जाने से रोका गया और टॉयलेट तथा बर्तन साफ करवाए गए। प्रताड़ना से तंग आकर छात्रा ने जहर खाकर आत्महत्या कर ली।

आयोग का यह भी कहना है कि इस मामले में उसने तमिलनाडु सरकार से NCPCR के दल को मामले की जाँच के लिए जरूरी सहयोग देने के लिए कहा था, लेकिन स्थानीय निकाय चुनावों के लिए आचार संहिता लागू होने का हवाला देते हुए राज्य सरकार ने असमर्थता जाहिर कर दी। इसके बावजूद आयोग की टीम वहाँ जाँच के लिए जाएगी। इसके साथ ही जिले के पुलिस अधीक्षक और जाँच अधिकारी को वहाँ उपस्थित रहने के लिए कहा गया है।

इस दौरान आयोग की टीम मृतक छात्रा के माता-पिता और उसके सहपाठी (Classmates) से मुलाकात करेगी। इसके साथ ही मृतक का इलाज करने वाले डॉक्टर, मरने के बाद उसका पोस्टमॉर्टम करने वाले डॉक्टर और स्कूल प्रशासन से भी पूछताछ करेगी। अगर वहाँ का कोई स्थानीय व्यक्ति आयोग से मुलाकात करना चाहेगा तो उससे भी आयोग बातचीत करेगा।

NCPCR द्वारा जारी प्रेस नोट का स्क्रीनशॉट

NCPCR ने इस पूरी घटना को लेकर तमिलनाडु की सरकार से भी स्पष्टीकरण माँगा है। आयोग के अध्यक्ष कानूनगो ने कहा, “NCPCR ने 21 जनवरी को राज्य के डीजीपी (DGP) को नोटिस जारी किया था और उन्हें एक तथ्यात्मक रिपोर्ट प्रस्तुत करने और लड़की के माता-पिता के बयान के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने के लिए कहा था। अभी तक डीजीपी की तरफ से हमें कोई रिपोर्ट नहीं मिली है। मैं प्रारंभिक जाँच करने और लड़की के माता-पिता से मिलने तंजावुर जा रहा हूँ। मैं स्कूल भी जाकर स्थिति का जायजा लूँगा।”

आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि वहाँ के अधिकारी NCPCR को जानकारी देने से कतरा रहे हैं। उन्होंने कहा कि कुछ राज्य सरकारें आयोग द्वारा ऐसे आश्रयों की निगरानी के संबंध में सहयोग नहीं दे रही हैं, जहाँ ऐसी लड़कियाँ रहती हैं। आयोग ऐसी निगरानी तंत्र स्थापित करने की कोशिश कर रहा है।

लावण्या के आत्महत्या के मामले में स्थानीय पुलिस ने धर्मांतरण के कोण को मिटाने की कोशिश की है। पुलिस ने अदालत में दी गई अपनी स्थिति रिपोर्ट में लावण्या की आत्महत्या के पीछे मानसिक प्रताड़ना बताया है। धर्मांतरण के ऐंगल पर कई मीडिया संस्थानों ने भी लीपापोती करने की कोशिश की है। अब इस मामले में भाजपा ने सीबीआई जाँच की माँग की है।

बता दें कि लावण्या पिछले पाँच वर्षों से सेंट माइकल गर्ल्स हॉस्टल में रह रही थीं। सरकारी सहायता प्राप्त ईसाई मिशनरी स्कूल उस पर ईसाई धर्म अपनाने का दबाव बना रहा था। स्कूल प्रशासन की लगातार प्रताड़ना से तंग आकर उसने जहर खा लिया था। 9 जनवरी की रात को लावण्या को बेचैनी और लगातार उल्टी होने के बाद स्थानीय क्लिनिक ले जाया गया। उसके लगभग 85 फीसदी फेफड़े में जहर पहुँच चुका था और उसने 19 जनवरी 2022 को अस्पताल में अंतिम साँस ली।

सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में लावण्या बेहोशी की हालत में अपने साथ हुए टॉर्चर के बारे में बताती है। मूल रूप से यह वीडियो तमिल में है, जिसका अनुवाद द कम्यून ने किया है। इसके मुताबिक वीडियो में कहा गया है, “मेरा नाम लावण्या है। उन्होंने (स्कूल) मेरे माता-पिता से मेरी उपस्थिति में पूछा था कि क्या वे मुझे ईसाई धर्म में परिवर्तित कर सकते हैं और आगे की पढ़ाई के लिए मदद कर सकते हैं। मैं नहीं मानी वे मुझे डाँटते रहे।” लावण्या ने इस दौरान राचेल मैरी का भी नाम लिया, जिसने कथित तौर पर उसे प्रताड़ित किया था।

‘BJP के अलावा किसी पार्टी को राम मंदिर की परवाह नहीं, CM योगी 40 बार आए अयोध्या’: महंत सत्येंद्र दास ने कहा- PM मोदी ने दिया विशेष ध्यान

उत्तर प्रदेश राज्य विधानसभा चुनाव से पहले, शुक्रवार (28 जनवरी 2022) को अयोध्या के राम मंदिर के मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास ने कहा कि समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कॉन्ग्रेस समेत किसी भी राजनीतिक दल ने राम मंदिर की परवाह नहीं की। महंत सत्येंद्र दास ने कहा कि उन लोगों ने विकास की बात की, लेकिन कभी देखने नहीं आए।

द न्यू इंडियन की एक विशेष रिपोर्ट में उन्होंने कहा कि पिछली सरकार केवल अयोध्या के विकास और राम जन्मभूमि को न्याय प्रदान करने की बात करती थी, लेकिन उन्होंने कभी भी इस पर काम नहीं किया। सब कुछ शासन-प्रशासन पर रहा, लेकिन कभी धरातल पर दिखाई नहीं दिए। उन्होंने कहा, “बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लोग भगवान राम के जन्मस्थान पर कभी नहीं गए और राजनीति करते रहे।”

कई वर्षों से अयोध्या में भगवान राम की मूर्ति की सेवा कर रहे महंत सत्येंद्र दास ने कहा कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ एकमात्र ऐसे मुख्यमंत्री हैं, जिन्होंने अयोध्या और राम मंदिर के विकास के मूल्यांकन और योजना के लिए पिछले 5 वर्षों में 40 बार अयोध्या का दौरा किया। उन्होंने कहा कि इससे पहले कोई अन्य सीएम या पीएम साइट पर नहीं गए थे, पीएम मोदी ने खुद राम मंदिर का शिलान्यास किया। यह अद्वितीय बात रही।

उन्होंने कहा, “पीएम मोदी ने ‘भव्य’ राम मदिर की आधारशिला रखी और व्यक्तिगत रूप से ट्रस्ट के गठन पर ध्यान दिया।” आगे उन्होंने कहा, “यह ट्रस्ट केंद्र सरकार के माध्यम से बना है। इसमें ऐसे-ऐसे लोगों को चुन-चुन कर रखा गया है जो भगवान राम के लिए समर्पित हों।”

84 वर्षीय महंत ने राम मंदिर के चल रहे निर्माण पर व्यक्तिगत रूप से ध्यान देने के लिए सीएम योगी आदित्यनाथ की भी प्रशंसा की। मुख्य पुजारी सत्येंद्र दास 5 मार्च 1992 को विवादित स्थल के रिसीवर द्वारा पुजारी के रूप में नियुक्त किए जाने के बाद से नियमित रूप से भगवान राम की पूजा कर रहे हैं। रिपोर्टों के अनुसार, नियुक्ति के बाद से महंत का वेतन 100 रुपए प्रति महीना था। हालाँकि, योगी आदित्यनाथ द्वारा वर्ष 2018 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बनने के बाद इसे बढ़ाकर 13,000 रुपए प्रति माह कर दिया गया।

उल्लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा के सभी 403 सीटों पर 7 चरणों में चुनाव होंगे। यूपी में इन चरणों के तहत 10 फरवरी, 14 फरवरी, 20 फरवरी, 23 फरवरी, 27 फरवरी, 3 मार्च और 7 मार्च को मतदान होगा। वहीं 10 मार्च को चुनाव के नतीजे आएँगे।

बिजली बिल भी नहीं दे रहे नवजोत सिंह सिद्धू, कॉन्ग्रेस ने पंजाब में किया है फ्री देने का वादा: बहन के ‘क्रूर आदमी’ बताने के बाद सामने आई एक और कारगुजारी

पंजाब कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू फिर मुश्किलें काम होने का नाम नहीं ले रहे रहीं है। बड़ी बहन सुमन तूर द्वारा उन्हें क्रूर आदमी बताते हुए लगाए गए गंभीर आरोपों के बीच अब सिद्धू पर बिजली बिल के भारी-भरकम बकाया का मामला सामने आया है। उन्होंने बहुत लम्बे समय से अमृतसर स्थित अपने घर का बिजली बिल नहीं भरा है। ऐसे में सिद्धू पर पिछले छह महीने से जो बिल बकाया है, उसकी राशि 4,22,330 रुपया है।

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, नवजोत सिंह सिद्धू पर बकाया बिल 19 जनवरी, 2022 को जारी किया गया था, और इसमें बकाया राशि पर सरचार्ज और ब्याज भी शामिल है। बताया जा रहा है कि उन्होंने अगस्त 2021 से बिल का भुगतान नहीं किया है। फिर भी पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) ने अभी तक सिद्धू का बिजली कनेक्शन नहीं काटा है।

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब सिद्धू ने समय पर बिजली बिल का भुगतान नहीं किया है। जुलाई 2021 में भी उन्होंने ऐसे ही एक विवाद को जन्म दिया था, जब पीएसपीसीएल ने उन्हें 8,74,784 रुपए का बकाया बिजली बिल थमाया था। बता दें कि पंजाब के मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी ने नवंबर 2021 में बिजली पर 3 रुपए प्रति यूनिट की कटौती की घोषणा की वहीं सिद्धू भी राज्य में घरेलू ग्राहकों को 300 यूनिट मुफ्त बिजली का वादा भी करते रहे हैं।

वहीं आज सुबह ही नवजोत सिंह सिद्धू की NRI बहन डा. सुमन तूर ने उनपर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि सिद्धू ने पिता भगवंत सिद्धू की मौत के बाद माँ निर्मल भगवंत और बड़ी बहन को घर से निकाल दिया था। पंजाब विधानसभा चुनावों के बीच उनकी बहन सुमन ने शुक्रवार (28 जनवरी, 2022) को प्रेस कॉन्फ्रेंस करके कहा कि जो परिवार का नहीं हुआ हुआ वो किसी और का क्या होगा।

सिद्धू की अमेरिका में रहने वाली बहन डा. सुमन तूर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में रो-रो कर बताया, “सिद्धू ने इंडिया टुडे के साथ बातचीत में झूठ बोला कि मेरे माता-पिता कानूनी तौर पर अलग हुए। सिद्धू उस वक्त अपनी उम्र 2 साल बता रहे हैं लेकिन वह सब भी झूठ है।”

गौरतलब है कि सुमन तूर ने एक पुरानी तस्वीर दिखाते हुए पत्रकारों से ही पूछा, क्या इसमें सिद्धू दो साल का लग रहा है।” उन्होने कहा कि उनकी माँ ने लावारिस हालत में दिल्ली रेलवे स्टेशन पर दम तोड़ा था और वह (सिद्धू) उनके पैसे पर ऐश कर रहा है। सुमन तूर ने बताया कि सिद्धू 1986 में उनके पिता की मृत्यु के बाद उनकी बूढ़ी माँ को छोड़ दिया और बाद में 1989 में दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक बेसहारा महिला के रूप में उनकी मृत्यु हो गई थी।

महाराष्ट्र के सुपर मार्केट और किराना दुकान में भी मिलेगी वाइन, बोले संजय राउत- यह शराब नहीं, किसानों को होगा फायदा

महाराष्ट्र (Maharashtra) में अब सुपर मार्केट और किराना की दुकानों में भी वाइन (Wine) मिलेगी। उद्धव ठाकरे (Uddhav Thackeray) के नेतृत्व वाली सरकार के इस फैसले की तीखी आलोचना भी हो रही है। लेकिन शिवसेना सांसद संजय राउत (Sanjay Raut) ने इसके बचाव में अजीबोगरीब तर्क दिया है। उनका कहना है कि वाइन, शराब (liquor) नहीं है और इसकी बिक्री बढ़ने से किसानों को फायदा होगा।

संजय राउत ने समाचार एजेंसी ANI से कहा सरकार ने किसानों की आय को दोगुना करने के लिए यह निर्णय लिया है। उन्होंने कहा, “वाइन, शराब नहीं है। अगर वाइन की बिक्री बढ़ती है तो इसका फायदा किसानों को मिलेगा। हमने किसानों की आय को दोगुना करने के लिए ऐसा किया है।”

राउत का यह बयान भाजपा द्वारा शिवसेना सरकार के फैसले के विरोध के बाद आया है। उन्होंने आगे कहा, “भाजपा केवल विरोध करती है, लेकिन किसानों के लिए कुछ नहीं करती।”

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडनवीस (Devendra Fadnavis) ने उद्धव सरकार के फैसले का विरोध करते हुए कहा था कि महाराष्ट्र में शिवसेना के नेतृत्व वाला गठबंधन राज्य को ‘मद्य-राष्ट्र (शराब राज्य)’ बनाने की कोशिश कर रहा है। उन्होंने ट्वीट किया कि अब सुपरमार्केट/किराना दुकानों से शराब की बिक्री! हम महाराष्ट्र को ‘मद्य’ राष्ट्र नहीं बनने देंगे। फडणवीस ने कहा कि ये बड़े ही आश्चर्य की बात है कि कोरोना को रोकने के लिए स्कूलों और कॉलेजों के साथ-साथ मंदिरों जैसे धार्मिक स्थलों को बंद कर दिया है, लेकिन शराब की दुकानों को खुला रहने दिया था।

उद्धव सरकार का फैसला

महाराष्ट्र कैबिनेट (Maharashtra Cabinet) ने गुरुवार को फैसला लिया था कि राज्य के हर सुपर मार्केट में वाइन उपलब्ध होगी। नए नियम के तहत अब से राज्य भर में किराना स्टोर और डिपार्टमेंटल स्टोर में वाइन बेची जा सकेगी।

अन्ना हजारे के सवाल

कोरोना का हवाला देकर महाराष्ट्र सरकार ने राज्य में स्कूल, मंदिरों को बंद कर रखा है। समाजसेवी अन्ना हजारे (Anna Hazare) ने पिछले साल भी सरकार के आदेशों पर सवाल उठाया था। उन्होंने एक बयान में कहा कि शराब की दुकानों में लंबी लाइनें राज्य सरकार को ठीक लगती हैं, लेकिन मदिरों को खोलना उसे सही नहीं लगता।

‘ब्रा साइज’ पर FIR के बाद श्वेता तिवारी ने माँगी माफी, कहा- ‘भगवान’ पर मेरी बात को गलत समझा गया

बिग बॉस सीजन 4 की विनर और टेलीविजन एक्ट्रेस श्वेता तिवारी (Shweta Tiwari) ने भोपाल में FIR दर्ज होने के बाद अपने विवादित बयान पर माफी माँग ली है। श्वेता तिवारी ने अपने बयान में कहा कि उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ है। उनके आधिकारिक बयान को सेलिब्रिटी फोटोग्राफर विरल भयानी ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट (Instagram account) पर पोस्ट किया है। यह बयान अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

श्वेता तिवारी ने अपने बयान में कहा, “मेरे संज्ञान में आया है कि एक सहयोगी की पिछली भूमिका के बारे में दिए गए मेरे एक बयान को संदर्भ से बाहर लिया गया और गलत समझा गया। जब कोई इसे संदर्भ में रखकर देखेगा तो यह समझ जाएगा कि ‘भगवान’ के संदर्भ में यह बयान सौरभ राज जैन की एक देवता की लोकप्रिय भूमिका के लिए था। लोग किरदारों के नामों को अभिनेताओं से जोड़ते हैं और इसलिए मैंने मीडिया के साथ अपनी बातचीत के दौरान इसे एक उदाहरण के रूप में इस्तेमाल किया था।”

श्वेता ने अपने बयान में आगे कहा, “इसे पूरी तरह से गलत समझा गया है और इसे देखकर दुख होता है। मैं ‘भगवान’ में पूर्ण विश्वास करती हूँ और मैं जानबूझकर या अनजाने में ऐसा कोई बात कहूँ या काम करूँ, जिससे लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँचे। मगर मुझे यह समझ में आया है कि जब इसे संदर्भ से बाहर समझा गया तो इससे अनजाने में लोगों की भावनाओं को ठेस पहुँची है। मेरे शब्दों या कार्यों से किसी को चोट पहुँचाने का मेरा इरादा कभी नहीं रहा है। इसलिए मैं विनम्रतापूर्वक अपने बयान के लिए माफी माँगती हूँ।”

गौरतलब है कि एक बेव सीरीज की घोषणा करने के लिए तमाम कलाकारों के साथ श्वेता तिवारी भोपाल गई थीं। बुधवार (26 जनवरी 2022) को प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान इस बेव सीरीज और स्टार कास्ट को लेकर पत्रकारों को जानकारी दी जा रही थी। इसी दौरान श्वेता तिवारी ने कहा, “मेरी ब्रा का साइज भगवान ले रहे हैं।” इतना कहने के बाद वो अपने बगल में बैठी दूसरी एक्ट्रेस के साथ हँसने लगती हैं।

इस बयान को लेकर मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा (Narottam Mishra) ने जाँच के आदेश दिए थे। अब भोपाल के श्यामला हिल्स थाने में तिवारी के खिलाफ FIR दर्ज हो गई है। उनके खिलाफ धार्मिक भावना को ठेस पहुँचाने के आरोप में धारा 295ए के तहत मामला दर्ज हुआ है।

दिल्ली में वादे पूरे नहीं कर पाई, अब पंजाब में मुफ्त का लॉलीपॉप दिखा जनता को धोखा दे रही AAP: जानिए कैसे

पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर सियासी सरगर्मियाँ काफी बढ़ गई हैं। हर पार्टी अपने-अपने तरीके से मतदाताओं को लुभाने के लिए वादे कर रही हैं। इसी क्रम में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind kejriwal) भी लोगों को मुफ्तखोरी (Freebies) का लॉलीपॉप दिखा रहे हैं।

हाल ही में पंजाब विधानसभा चुनाव के मद्देनजर केजरीवाल ने रैलियों में वादा किया कि अगर 2022 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी जीतती है तो वे पंजाब के हर घर में 300 यूनिट फ्री बिजली देंगे और हर पंजाबी महिला को उसकी आर्थिक स्थिति या जरूरत देखे बिना मुफ्त पैसे दिए जाएँगे। केजरीवाल के अनुसार, उनकी पार्टी दिल्ली में 200 यूनिट फ्री बिजली दे रही है।

दिलचस्प बात यह है कि जब से दिल्ली में केजरीवाल की सरकार बनी है तब से तो उनके फ्री बाँटने के मामलों में अभूतपूर्व तरीके से तेजी देखने को मिली है। आम आदमी पार्टी तो दिल्ली में महिलाओं के लिए मुफ्त बिजली से लेकर बस यात्रा भी फ्री करने की घोषणा कर चुकी है। उल्लेखनीय है कि चुनावों को लेकर की गई इस तरह की घोषणाएँ कभी भी समझदारी भरी नहीं होती। इन नीतियों से दूरदर्शिता की कमी हमेशा परिलक्षित होती है।

दरअसल, आम आदमी पार्टी जनता के लिए लाई गई रेगुलर योजनाओं का क्रियान्वयन करने में विफल रही है। ऐसे में पार्टी मुफ्तखोरी को बढ़ावा देकर अपनी कमियों को ढँकने की कोशिश कर रही है, ताकि जनता में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सके। अगर सही तरीके से अगर योजनाओं का क्रियान्वयन किया गया होता तो उसे मुफ्तखोरी का सहारा नहीं लेना पड़ता।

AAP लगातार मुफ्त बिजली देने के अपने वादे का प्रचार कर रही है, लेकिन यहाँ हम यह जानने की कोशिश करते हैं कि किस तरह के आम आदमी पार्टी की कुछ नीतियाँ देश को नुकसान पहुँचा रही हैं।

विद्युत कंपनियाँ गंभीर समस्याओं से जूझ रही हैं

भारत में विद्युत उत्पादक कंपनियों का बुरा हाल है। ये कंपनियाँ सामान्यतया दो कारकों के कारण समस्याग्रस्त हैं। पहला ट्रांसमिशन और डिस्ट्रीब्यूशन (T&D) के नुकसान को कम न कर पाना और दूसरा है बढ़ते खर्चों को पूरा करने के लिए कीमतें बढ़ाना। ये दोनों देश भर के घरों को प्रभावित कर सकते हैं, क्योंकि राज्यों के पास ये अधिकार है कि वो टैरिफ बढ़ा सकते हैं। इसी मुफ्तखोरी के कारण 2019-20 में कंपनियों के राजस्व में 3,000 करोड़ रुपए की कमी आई थी, जिसके कारण दिल्ली में बिजली कंपनियों ने नियामक डीईआरसी से अनुरोध किया था कि लागत आधारित एक क्रमिक दर लागू की जाए।

अपनी इन मुफ्त की योजनाओं के बचाव में केजरीवाल ये तर्क देते हैं कि राज्य के नागरिक के तौर पर लोगों को सरकार से मुफ्त की सेवाएँ लेने का अधिकार है। वो ऐसा करके लोगों को धोखा देते हैं, क्योंकि बहुत ही गुप्त तरीकों से इसका सारा भार जनता पर डाल दिया जाता है, जबकि इन योजनाओं के जरिए मिलने वाला लाभ अल्पकालिक होता है। इसके बजाय अगर वो लोगों को नौकरी, आत्मनिर्भर बनने का अवसर देते तो वो दीर्घकालिक सामाधान होता।

सब्सिडी की फंडिंग

विशेष लक्ष्यों की पूर्ति के लिए दी जाने वाली सब्सिडी अहम होती है। जिन लक्ष्यों के लिए सब्सिडी दी जाती है, उन्हें पूरा करने के बाद इसे बंद कर दिया जाना चाहिए। बिजली व्यक्ति की हर दिन की जरूरत है औऱ सब्सिडी के तौर पर इसकी कुल खपत को माफ कर देना किसी भी रूप में सही नहीं है। ये केवल एक चुनावी चाल है। अक्सर लोग राजनीतिक पार्टियों के इसी बहकावे में आ जाते हैं, लेकिन हकीकत ये है कि मुफ्त की इस सब्सिडी को दूसरे तरीकों से वसूल किया जाता है। उल्लेखनीय है कि दिल्ली में इस तरह की फ्री सुविधा के कारण सरकारी खजाने पर बहुत भार पड़ता है।

दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने 2021-22 के बजट में ऊर्जा क्षेत्र के लिए 3,227 करोड़ रुपए का प्रस्ताव रखा था, जिसमें से 3,090 करोड़ रुपए तो केवल बिजली सब्सिडी के लिए आवंटित थे। इस तरह से यह कुल आवंटन का 96 प्रतिशत और पूरे बजट का 4.4 प्रतिशत है। अगर उपभोक्ता अपने इस्तेमाल की गई बिजली का पैसा देता तो इस फंड का इस्तेमाल किसी दूसरे कार्यों में किया जा सकता था।

पंजाब जैसे सीमावर्ती राज्य में ऐसी योजनाओं के प्रभाव

पंजाब जैसे बॉर्डर स्टेट में विकास के अवसरों और प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है। पंजाब की 553 किलोमीटर की अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो पाकिस्तान से लगती है। ड्रग माफिया से पंजाब लंबे वक्त से जूझ रहा है, जिसे सुरक्षित रखने के लिए बहुत अधिक प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। राज्य का बजट करीब 6 लाख करोड़ रुपए का है, जो कि दिल्ली से करीब 9 गुना अधिक है। इस हिसाब से पंजाब में बिजली सब्सिडी की लागत का अनुमान लगाया जाए तो वह दिल्ली की सब्सिडी से 9 गुणा, यानी करीब 27,000 करोड़ रुपए होगा।

पंजाब सरकार का इतिहास रहा है कि डिस्कॉम को कम भुगतान करते हुए सब्सिडी देने पर वह अधिक जोर देती रही है। इसका पहले से ही संकट झेल रही स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड पर बुरा प्रभाव पड़ा है। यहाँ उल्लेखनीय है कि 2017 में जब कॉन्ग्रेस ने राज्य में सत्ता की बागडोर संभाली थी, तभी से वह हर वर्ष देय सब्सिडी बकाए का भुगतान करने में विफल रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब पर पहले से ही 10,000 करोड़ रुपए के बिजली का बिल बकाया है, जिसका अभी तक कंपनियों को भुगतान नहीं हुआ। वहीं, सीएम चरणजीत सिंह चन्नी की लुभावनी घोषणाओं के कारण चालू वित्त वर्ष के लिए सब्सिडी बिल बढ़कर 20,016 करोड़ रुपए पर पहुँच गया है, जिसमें से अभी तक सरकार ने केवल 7,800 करोड़ रुपए का ही भुगतान किया है।

ऐसे में अगर AAP इस तरह की नीतियाँ लाती है तो इससे राज्य में कई तरह की अव्यवस्थाएँ पैदा हो सकती हैं। अगर वर्तमान सरकार पहले से ही अपने पुराने वादों को पूरा नहीं कर पा रही है तो आने वाली सरकार मौजूदा बकाया के 1.5 गुना बिल का भुगतान कैसे करेगी? इसका परिणाम यह होगा कि किसी न किसी सेक्टर में महत्वपूर्ण चीजों को छोड़ना होगा, फिर वो चाहे सुरक्षा बजट हो, परिवहन हो या ग्रामीण विकास खर्च हो।

मुफ्त योजनाओं से प्रभावित हो रहा पर्यावरण

उल्लेखनीय है कि पंजाब एक कृषि प्रधान राज्य है, जो पहले से ही पानी की कमी से जूझ रहा है। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (PAU) के 1998 से 2018 तक किए गए एक रिसर्च के मुताबिक, राज्य के 22 में से 18 जिलों में धरती का जलस्तर हर साल करीब एक मीटर नीचे जा रहा है। बावजूद इसके, राज्य के लोग कम पानी वाली फसलों की जगह अधिक पानी वाली फसलों पर निर्भर हैं। अब अधिक पानी के लिए अधिक बिजली की जरूरत होगी और मुफ्त बिजली से अधिक ऊर्जा का शोषण होगा। इससे भूजल का स्तर भी नीचे गिरेगा।

हालाँकि, देश की राजधानी दिल्ली एक कृषि आधारित राज्य नहीं है, फिर भी इसका भूजल स्तर लगातार गिर रहा है। एक स्टडी में दावा किया गया है कि एनसीआर में ग्राउंड डिस्प्लेसमेंट के कारण 100 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र को खतरा है। रिपोर्ट के मुताबिक, राजधानी में भूजल की कमी की खतरनाक दर से शहर के कुछ हिस्से ढह सकते हैं। हालात ये हैं कि दिल्ली में जलापूर्ति में कुप्रबंधन के कारण पानी की जरूरतों को सबमर्सिबल मोटर्स के जरिए पूरा किया जाता है और यह वॉटर टैंकर की तुलना में अधिक सुविधाजनक है।

दिल्ली में कुछ खास नहीं कर पाई ‘AAP’

दिल्ली की हालत खराब है। यहाँ अरविंद केजरीवाल ने जनता से वादे तो बड़े-बड़े किए, लेकिन उसे पूरा करने में वो नाकाम रहे। हालात तो ये हैं कि जब केजरीवाल अपनी पहल के बारे में भी बात करते हैं तो उनमें से किसी में भी उचित विकास नहीं दिखा। MCD दिल्ली सरकारी की ओर से होने वाली फंडिंग की कमी से जूझ रही है। यहीं नहीं AAP जिस स्कूली व्यवस्था को देश में सबसे अच्छी बात रही है, वो भी सिर्फ एक छलावा है। हकीकत ये है कि आम आदमी पार्टी अपने आधे से अधिक चुनावी वादे पूरे कर पाने में नाकाम रही है। केजरीवाल ने 2019 तक 1000 से अधिक इलेक्ट्रिक बसों को दिल्ली में चलाने का वादा किया था, लेकिन अभी तक केवल एक ही बस रोड पर आ सकी।

केजरीवाल यमुना को दुनिया की सबसे स्वच्छ नदी और दिल्ली को लंदन बनाने का वादा भी कर चुके हैं। जबकि, हकीकत ये है कि अरविंद केजरीवाल के कारण ही बीते तीन सालों से दिल्ली दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानी बनी हुई है।

मुफ्तखोरी समस्या है, समाधान नहीं

गौरतलब है कि किसी भी राज्य की पूरी आबादी के लिए मुफ्त योजनाओं को व्यवहारिक नीति नहीं माना जा सकता है। वोटों और कैम्पेन फंड के बदले किसी समुदाय पर एहसान करना विधायकों के लिए बहुत कम या फ्री होता होगा, लेकिन इसका भार सरकारी खजाने पर ज्यादा पड़ता है। यह सब राजनीति से प्रेरित फैसलों के कारण होता है।

इस बार पाँच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में राजनीतिक पार्टियों द्वारा किए गए मुफ्त के वादे पर संज्ञान लेते हुए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय चुनाव आयोग को नोटिस भेजा था। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उसने पहले ही चुनाव आयोग को इस तरह के आचरण से बचने के लिए दिशा-निर्देश बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन आयोग ने केवल एक बार ही राजनीतिक दलों के साथ उनकी राय जानने के लिए बैठक की।

उल्लेखनीय है कि अगर सच में आम आदमी पार्टी जनता की भलाई के लिए काम करना चाहती है तो अपनी बेईमान मानसिकता छोड़कर जनता की वास्तविक जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करे न कि मुफ्तखोरी को बढ़ावा दे।