उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर चल रहे अवैध धर्मांतरण रैकेट के साजिशकर्ता जलालुद्दीन उर्फ छांगुर का कनेक्शन माफिया मुख्तार अंसारी गैंग से सामने आया है। इस खुलासे के बाद, अब मुख्तार अंसारी के गैंग की अन्य अवैध संपत्तियों पर भी कार्रवाई की तैयारी की जा रही है।
जलालुद्दीन उर्फ छांगुर और उसकी सहयोगी नीतू उर्फ नसरीन को लखनऊ से गिरफ्तार कर लिया गया है। न्यायिक हिरासत में भेजने के बाद, गुरुवार (10 जुलाई 2025) को यूपी ATS ने उसे 7 दिनों की रिमांड पर लिया है और पूछताछ जारी है।
माफिया मुख्तार अंसारी से कनेक्शन
धर्मांतरण रैकेट में छांगुर के साथ मोहम्मद अहमद खान का भी नाम सामने आया। पुणे में मोहम्मद अहमद खान ने मीडिया को बताया कि छांगुर गैंग का कनेक्शन माफिया मुख्तार अंसारी से भी था। छांगुर मुख्तार की मदद से धर्मांतरण और अवैध जमीन का काम करता।
अहमद खान छांगुर को महाराष्ट्र में जमीन खरीदवाने की डील में शामिल था। हालाँकि, अहमद खान का कहना है कि उसका छांगुर के गलत कामों से कोई लेना-देना नहीं है।
गिरोह के अन्य सदस्य और पूछताछ
FIR में छांगुर के बेटे महबूब, भतीजा सबरोज, साले का बेटा शहाबुद्दीन, गोंडा के रिश्तेदार रमजान और बलरामपुर के रसीद को भी नामजद किया गया है। इन सभी की संपत्तियों की भी जाँच की जा रही है।
ATS की टीम छांगुर और नीतू से उनकी दुबई यात्राओं और विदेशी फंडिंग में उनकी भूमिका को लेकर गहनता से पूछताछ कर रही है। नीतू के अब्बू दुबई में कबाड़ के बड़े कारोबारी हैं।
विदेशी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग
जाँच में सामने आया है कि छांगुर गिरोह के 40 खातों में खाड़ी देशों और अन्य जगहों से अब तक ₹106 करोड़ भेजे गए हैं।
ED ने भी इस मामले में मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत जाँच शुरू कर दी है। ED ने बलरामपुर के एसपी और डीएम से बैंक खातों व अन्य तथ्यों की विस्तृत जानकारी माँगी है।
धर्मांतरण का तरीका
छांगुर पिछले 15 सालों से सुनियोजित तरीके से धर्मांतरण का रैकेट चला रहा था। छांगुर हिंदू लोगों का ब्रेनवॉश करता था और विरोध करने वालों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज करवाकर उन्हें डराता था।
फिर मुकदमा हटवाने के नाम पर जबरन धर्म परिवर्तन करवाता था। बलरामपुर के उतरौला में उसने एक सिंधी परिवार का धर्मांतरण कराकर उन्हीं के नाम पर एक शानदार कोठी भी बनवाई थी।
वकीलों और प्रापर्टी डीलरों की भूमिका की जाँच
विदेशी फंडिंग का उपयोग धर्मांतरण में कराने के पुख्ता सबूत मिलने के बाद पुलिस ने उन प्रापर्टी डीलरों और वकीलों की भी तलाश शुरू कर दी है, जिन्होंने धर्मांतरण गैंग को सहयोग किया है।
जमीन की खरीद-फरोख्त में कई वकीलों की भूमिका की भी जाँच एजेंसी कर रही है।
बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार कोई नई बात नहीं है। पहले भी खबरें आती रही हैं कि दुर्गा पूजा के समय मंदिरों पर हमला हुआ, घरों में आग लगाई गई और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया गया। लेकिन, अब बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ हिंसा बहुत तेजी से बढ़ गई है।
बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद नाम के एक संगठन ने गुरुवार (10 जुलाई, 2025) को बताया कि 4 अगस्त 2024 से लेकर पिछले 330 दिनों में कुल 2,442 हिंसक घटनाएँ हुई हैं। यह वो समय था जब बांग्लादेश में बहुत राजनीतिक उथल-पुथल चल रही थी और प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार बदल गई थी।
हिंसा का स्वरूप और आँकड़े
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में परिषद ने बताया कि ज्यादातर हिंसा पिछले साल 4 अगस्त से 20 अगस्त के बीच हुई। इन हमलों में लोगों की हत्याएँ हुईं। सामूहिक बलात्कार सहित कई यौन हमले हुए। पूजा स्थलों पर हमला किया गया। लोगों के घर और व्यापार छीन लिए गए। हिंदू धर्म के अपमान के आरोप में गिरफ्तारियाँ भी हुईं।
अल्पसंख्यकों को संगठनों से जबरदस्ती हटाया गया। इन हमलों के शिकार बनने वाले अल्पसंख्यक समुदायों में पुरुष, महिलाएँ और किशोर सभी शामिल थे।
रिपोर्ट पर युनुस सरकार की चुप्पी
परिषद ने बताया कि 4 अगस्त 2024 से 31 दिसंबर 2024 के बीच 2184 हिंसक घटनाएँ हुईं। वहीं, 2025 के पहले छह महीनों में 258 और घटनाएँ दर्ज की गईं। इसका मतलब है कि 4 अगस्त 2024 से अब तक कुल 2442 हिंसक घटनाएँ हो चुकी हैं।
2025 की घटनाओं में 20 बलात्कार के मामले थे। हिंदू पूजा स्थलों पर 59 बार हमले हुए। जनजातीय समुदायों पर भी 12 बार हमला किया गया।
परिषद का आरोप है कि सरकार ने कुछ नहीं किया। परिषद ने कहा कि सरकार ने इन घटनाओं को ‘झूठ’ कहकर पलड़ा झाड़ा था। इससे हमलावरों को और हिम्मत मिली। अल्पसंख्यक समुदायों में डर का माहौल बढ़ा।
हिंसा के 88 मामलों में अब तक 70 लोगों को पकड़ा गया है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार यानि मोहम्मद यूनुस ने अभी तक परिषद की इस नई रिपोर्ट पर कोई जवाब नहीं दिया है।
बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय
2022 की जनगणना के मुताबिक, बांग्लादेश में हिंदू सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समुदाय हैं। वे कुल आबादी का 7.95% हैं। उनके बाद बौद्ध (0.61%) और ईसाई (0.30%) आते हैं।
बांग्लादेश हिंदू बौद्ध ईसाई एकता परिषद अल्पसंख्यकों का सबसे पुराना संगठन है। यह 1960 के दशक में शुरू हुआ था। तब सांप्रदायिक घटनाएँ बढ़ रही थीं। यह संगठन हमेशा अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए आवाज उठाता रहा है।
अमेरिका ने कनाडा से आने वाली वस्तुओं पर 35 फीसदी टैरिफ लगाने का एलान किया है। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी को खत लिख कर राष्ट्रपति ट्रंप ने नए टैरिफ दरों की जानकारी दी। नया टैरिफ 1 अगस्त 2025 से लागू होगा।
अमेरिका का ये कदम दोनों देशों के रिश्ते को और तनावपूर्ण कर सकता है।
ट्रंप का खत
ट्रंप ने लिखा है, ” मैं आपको खत लिख रहा हूँ ये मेरे लिए सम्मान की बात है। ये हमारे व्यापारिक संबंधों की मजबूती और प्रतिबद्धता को दिखाता है। अमेरिका इस बात पर राजी है कि वह कनाडा के साथ काम करता रहेगा, भले ही कनाडा ने अमेरिका से आर्थिक दुश्मनी निकाली हो। जैसा कि आपको पता है अमेरिका ने फेंटेनाइल संकट से उभरने के लिए 25 फीसदी टैरिफ आप पर लगाया था। लेकिन अमेरिका के साथ सहयोग करने के बजाए कनाडा ने टैरिफ लगाकर जवाब दिया।”
उन्होंने कहा, “अब अमेरिका 1 अगस्त से 35 फीसदी टैरिफ कनाडा पर लगाएगा, जो सेक्टोरल टैरिफ से अलग होगा। ये अमेरिका भेजे जाने वाले उत्पादों पर लागू होगा। अगर इससे बचने के लिए किसी दूसरे देश के माध्यम से उत्पाद अमेरिका में भेजने की कोशिश की गई तो उस पर भी यही नियम लागू होगा। अगर कोई कंपनी अमेरिका में ही उत्पाद बनाती है तो उस पर कोई टैरिफ नहीं लगेगा।”
वाइट हाउस ने जारी किया खत, फोटो साभार-cnn
अमेरिका से साफ किया है कि अगर कनाडा ने नए टैरिफ दरों पर प्रतिक्रिया दी और अमेरिकी सामानों पर टैरिफ बढ़ाया तो अमेरिका और टैरिफ बढ़ाएगा। अमेरिका के मुताबिक कनाडा जितना फीसदी टैरिफ बढ़ाएगा, अमेरिका उतना फीसदी टैरिफ बढ़ा देगा। ये 35 फीसदी टैरिफ से अलग होगा। कनाडा की डेयरी नीति पर भड़कते हुए राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा है कि कनाडा अमेरिका के डेयरी किसानों पर 400 फीसदी टैरिफ लगाता है जिससे इनलोगों को लगातार काफी नुकसान का सामना करना पड़ रहा है।
इससे पहले ब्राजील समेत 8 देशों पर अमेरिका का टैरिफ बम फूटा। राष्ट्रपति ट्रंप ने सबसे अधिक 50 फीसदी टैरिफ ब्राजील पर लगाया है। इस पर ब्राजील के राष्ट्रपति लूला डा सिल्वा ने कहा है कि ब्राजील पर 50 फीसदी टैरिफ लगाया गया तो ब्राजील भी उतना ही यानी 50 फीसदी टैक्स अमेरिका से आने वाले सामानों पर लगाएगा। ब्राजील ने इस मुद्दे को विश्व व्यापार संगठन के सामने भी रखने का फैसला किया है।
भारत के खिलाफ फिलहाल अमेरिका ने नए टैरिफ दरों का ऐलान नहीं किया है। हालाँकि भारत अभी से अमेरिका के तर्ज पर जवाब देने की तैयारी कर रहा है। अमेरिका ने स्टील पर 25 फीसदी और एल्यूमिनियम पर 10 फीसदी टैक्स लगाया था और इसे मार्च 2025 में लागू भी कर दिया। भारत इसका लगातार विरोध कर रहा है।
9 जुलाई को भारत ने विश्व व्यापार संगठन में जवाबी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया है। दरअसल अमेरिका ने स्टील और एल्यूमिनियम जैसे कुछ उत्पादों पर नया टैक्स लगा दिया है। ये कदम ऐसे समय उठाया गया है जब भारत-अमेरिका के बीच टैरिफ दरों को लेकर बातचीत चल रही है।
बिहार में होने वालों चुनावों से पूर्व हाल ही में जारी किए गए आधार कार्ड सैचुरेशन के आँकड़ों ने एक नई बहस छेड़ दी है। जहाँ राज्य का औसत आधार सैचुरेशन 94% है, वहीं किशनगंज (126%), कटिहार (123%), अररिया (123%), और पूर्णिया (121%) जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में यह आँकड़ा 100% से भी ज्यादा है।
यानी हर 100 लोगों पर 120 से ज्यादा आधार कार्ड। ये आँकड़े डुप्लीकेट आधार कार्ड या गैर-नागरिकों को आधार जारी किए जाने के सवाल खड़े करते हैं। खासकर पश्चिम बंगाल और नेपाल की सीमा से सटे सीमांचल क्षेत्र में जहाँ अवैध घुसपैठ सबसे ज्यादा होते है।
वहीं, किशनगंज जिले के जियापोखर से मुस्लिम व्यक्ति अशराफुल को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि वो बांग्लादेशी और नेपाली घुसपैठियों के लिए फर्जी आधार कार्ड बनाता था।
आधार सैचुरेशन और जनसंख्या
बिहार के सीमांचल क्षेत्र में किशनगंज, कटिहार, अररिया और पूर्णिया जैसे जिले आते हैं। इन जिलों में मुस्लिम आबादी 38% से 68% तक है। यहाँ आधार कार्ड की संख्या आबादी से ज्यादा है।
आमतौर पर, एक व्यक्ति का एक ही आधार कार्ड होता है। लेकिन यहाँ के आँकड़े बताते हैं कि या तो नकली आधार कार्ड बने हैं या फिर ऐसे लोगों को भी आधार कार्ड मिले हैं जो भारत के नागरिक नहीं हैं।
संवेदनशील सीमांचल क्षेत्र
सीमांचल क्षेत्र पश्चिम बंगाल और नेपाल से सटा हुआ है। बांग्लादेश भी यहाँ से दूर नहीं है। इस इलाके में लंबे समय से अवैध घुसपैठियों के रहने की बात कही जाती रही है। कुछ लोग मानते हैं कि ज्यादा आधार कार्ड बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए बनाए गए हैं।
उनका दावा है कि स्थानीय नेताओं और कट्टरपंथी समूहों ने इसमें मदद की है। हालाँकि, इन दावों के लिए अभी पुख्ता सबूत नहीं हैं। फिर भी, यह एक चिंता का विषय है।
चुनाव और आधार कार्ड
बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची की जाँच चल रही है। विपक्षी दल सवाल उठा रहा है कि वोटर लिस्ट में नाम के लिए आधार कार्ड और आवासीय प्रमाण पत्र को क्यों नहीं माना जा रहा है।
लेकिन सच्चाई यह भी है कि सीमांचल के चार जिलों में आधार कार्ड की संख्या आबादी से ज्यादा है। यहाँ तक कि नागरिकता का सबूत न होने के बावजूद आधार कार्ड के आधार पर निवास प्रमाण पत्र भी जारी किए गए हैं।
जानकारी के अनुसार, किशनगंज में आधार कार्ड की संख्या आबादी का 105.16%, अररिया में 102.23%, कटिहार में 101.92% और पूर्णिया में 101% है।
जनसांख्यिकी में बदलाव
पिछले दो दशकों में, इस क्षेत्र में बांग्लादेशी घुसपैठ बढ़ी है। इससे यहाँ की आबादी में तेजी से बदलाव आया है। 1951 से 2011 तक, इन जिलों में मुस्लिम आबादी में 16% की बढ़ोतरी हुई।
हाल ही में हुई जातिगत जनगणना से पता चला है कि किशनगंज में मुस्लिम आबादी 68%, अररिया में 50%, कटिहार में 45% और पूर्णिया में 39% हो गई है।
कुल मिलाकर, इन चार जिलों में मुस्लिम आबादी 47% हो गई है। केंद्र सरकार सीमांचल में हो रहे इन बदलावों को लेकर चिंतित है। चुनाव आयोग की मतदाता सूची की विशेष जाँच भी इसी वजह से की जा रही है।
मतदाता सूची की जाँच का सबसे ज्यादा विरोध राज्य के मुस्लिम इलाकों में हो रहा है। मुस्लिम समुदाय लंबे समय से विपक्षी महागठबंधन का समर्थन करता रहा है। महागठबंधन इस विरोध के बहाने इस समुदाय को एकजुट करना चाहता है।
आने वाले चुनाव
बिहार में अक्टूबर-नवंबर में चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में विपक्ष सवाल उठा रहा है कि केवल तीन से चार महीनों में यह जाँच अभियान कैसे पूरा किया जा सकता है।
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने हाल ही में एक ऐसा बयान दिया है जो भारत-चीन संबंधों में नई बहस छेड़ सकता है। प्रेमा खांडू ने कहा कि अरुणाचल की 1200 किलोमीटर लंबी सीमा तिब्बत से लगती है, चीन से बिलकुल नहीं। कोई भी भारतीय राज्य चीन का पड़ोसी नहीं है, क्योंकि तिब्बत को चीन ने जबरन कब्जा किया हुआ है।
खांडू ने स्पष्ट शब्दों में बताया कि 1950 में चीन ने तिब्बत पर जबरन कब्जा किया था और उसके बाद से दुनिया उसे चीन का हिस्सा मानती है, लेकिन हकीकत में अरुणाचल की 1200 किलोमीटर लंबी सीमा तिब्बत से लगती है। तिब्बत की अपनी अलग पहचान है और भारत का रिश्ता उसी से है, चीन से नहीं। खांडू ने 1914 के शिमला समझौते का हवाला दिया, जिसमें तिब्बत को अलग माना गया था। उन्होंने दलाई लामा के उत्तराधिकारी चुनने में चीन की दखलंदाजी को भी खारिज कर दिया, बोले कि ये तिब्बती बौद्धों का आंतरिक मामला है।
भारत के राज्य अरुणा प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू का ये बयान सिर्फ एक राजनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि ये चीन की विस्तारवादी नीतियों पर सीधा हमला है। खासकर तब जब ये बयान तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा के 90वें जन्मदिन के ठीक बाद आया है, जहाँ खांडू खुद शामिल हुए थे।
इस रिपोर्ट में हम इस बयान के मायने, इसकी टाइमिंग, तिब्बत पर चीन के कब्जे की कहानी, दलाई लामा का रोल और शी जिनपिंग की अगुवाई वाली चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की टेंशन को समझेंगे। ये भी जानेंगे कि ये मामला भारत के लिए कितना अहम है।
चीन पर सवाल उठाना मतलब नीतियों में परिवर्तन
पेमा खांडू का बयान सीधे-सीधे चीन की उस कहानी को चुनौती देता है जिसमें वो तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा बताता है। खांडू ने पीटीआई न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में कहा, “हम तिब्बत के साथ सीमा साझा करते हैं, चीन के साथ नहीं।” उन्होंने ये भी जोड़ा कि अरुणाचल तीन अंतरराष्ट्रीय सीमाएँ साझा करता है – भूटान के साथ 150 किलोमीटर, तिब्बत के साथ 1200 किलोमीटर और म्यांमार के साथ 550 किलोमीटर। कोई भारतीय राज्य चीन से सीधे नहीं जुड़ता।
ये बात इसलिए मायने रखती है क्योंकि चीन लंबे समय से अरुणाचल को अपना हिस्सा बताता रहा है, उसे ‘दक्षिण तिब्बत’ कहकर दावा करता है। खांडू का बयान ये कहता है कि चीन पहले तिब्बत पर कब्जा करके आया, वरना भारत का पड़ोसी तिब्बत होता, जो नेपाल या भूटान की तरह एक अलग देश या बफर स्टेट हो सकता था।
इसके मायने राजनीतिक, सांस्कृतिक और रणनीतिक स्तर पर हैं। राजनीतिक रूप से, ये भारत की तरफ से चीन को संदेश है कि हम तुम्हारी विस्तारवादी कहानी को नहीं मानते। सांस्कृतिक रूप से, खांडू ने जोर दिया कि अरुणाचल की संस्कृति और भूगोल तिब्बत से जुड़े हैं, जहाँ बौद्ध धर्म की जड़ें गहरी हैं।
रणनीतिक रूप से ये सीमा विवाद को नया मोड़ दे सकता है। चीन ब्रह्मपुत्र नदी पर डैम बना रहा है, जो खांडू ने ‘टिकिंग वॉटर बॉम्ब’ कहा है। अगर तिब्बत अलग होता, तो ये समस्या नहीं होती।
कुल मिलाकर ये बयान बताता है कि भारत अब चुप नहीं रहेगा, बल्कि तिब्बत की हकीकत को दुनिया के सामने रखेगा। इससे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीसी) को झटका लग सकता है, क्योंकि ये उनके ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर सवाल उठाता है। अगर भारत जैसे बड़े देश तिब्बत को अलग मानने लगें, तो चीन की वैश्विक छवि पर असर पड़ेगा।
दलाई लामा के जन्मदिन के बाद आया बयान
अरुणाचल के मुख्यमंत्री पेमा खांडू का बयान 9 जुलाई 2025 को आया, ठीक दलाई लामा के 90वें जन्मदिन (6 जुलाई 2025) के कुछ दिनों बाद। खांडू खुद धर्मशाला में उस समारोह में शामिल हुए थे, जहाँ उन्होंने दलाई लामा को सम्मान दिया और तिब्बती संस्कृति की बात की।
ये टाइमिंग संयोग नहीं लगती। दलाई लामा ने 2 जुलाई 2025 को एक बयान जारी किया कि उनका उत्तराधिकारी होगा और वो तिब्बती बौद्ध परंपरा के मुताबिक चुना जाएगा, चीन का कोई रोल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि दलाई लामा की संस्था जारी रहेगी और चीन का हस्तक्षेप अस्वीकार्य है।
ये बयान चीन के लिए सीधा चैलेंज है, क्योंकि चीन दावा करता है कि वो दलाई लामा के उत्तराधिकारी को मंजूरी देगा। टाइमिंग इसलिए अहम है क्योंकि दलाई लामा 90 साल के हो चुके हैं और उनके बाद का सवाल बड़ा है। खांडू का बयान इसी समय आया, जब दुनिया तिब्बत मुद्दे पर ध्यान दे रही है। समारोह में हॉलीवुड स्टार रिचर्ड गेयर, केंद्रीय मंत्री किरण रिजिजू और अन्य नेता मौजूद थे।
ये दिखाता है कि भारत तिब्बत को सपोर्ट कर रहा है। कुल मिलाकर पेमा खांडू के बयान की टाइमिंग चीन को बताती है कि भारत अब आक्रामक रुख अपनाएगा, खासकर जब दलाई लामा का मुद्दा गर्म है।
तिब्बत पर चीन के कब्जे की कहानी
तिब्बत की कहानी समझने के लिए पीछे जाना पड़ेगा। तिब्बत दुनिया का सबसे ऊँचा पठार है, लगभग 24 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला। इसकी औसत ऊँचाई 4900 मीटर है, जिससे जुड़ी माउंट एवरेस्ट जैसी दुनिया की सबसे ऊँची पर्वतर चोटी है। तिब्बत एशिया की कई नदियों का स्रोत है। 1950 से पहले तिब्बत एक स्वतंत्र क्षेत्र था। 1913 में 13वें दलाई लामा ने इसे स्वतंत्र घोषित किया, लेकिन चीन दावा करता रहा कि ये उसका हिस्सा है। हकीकत ये है कि 1912 से 1949 तक चीन का तिब्बत पर कोई नियंत्रण नहीं था। दलाई लामा की सरकार ही चलती थी।
साल 1949 में चीन में माओ जेडोंग की कम्युनिस्ट सरकार बनी। उसने तिब्बत को अपना हिस्सा मानकर आक्रमण की योजना बनाई। 7 अक्टूबर 1950 को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ने तिब्बत में घुसपैठ की। 19 अक्टूबर को चामडो शहर पर कब्जा कर लिया। उस समय तिब्बती सेना छोटी थी, विरोध नहीं कर पाई।
फिर 1951 में चीन ने तिब्बती नेताओं पर दबाव डालकर ’17 पॉइंट एग्रीमेंट’ करवाया। इसमें कहा गया कि तिब्बत को स्वायत्तता मिलेगी, बौद्ध धर्म का सम्मान होगा, लेकिन चीन की सेना ल्हासा (तिब्बत की राजधानी) में रहेगी। तिब्बती इसे जबरदस्ती का समझौता कहते हैं।
ये कब्जा क्रूर था। चीन ने तिब्बती संस्कृति को कुचलने की कोशिश की – मठ तोड़े, लोगों को मार डाला। 1959 में विद्रोह हुआ, दलाई लामा भारत भाग आए। आज भी तिब्बत में चीन का कब्जा है, लेकिन तिब्बती इसे ‘सांस्कृतिक नरसंहार’ कहते हैं। खांडू का बयान इसी इतिहास को याद दिलाता है कि तिब्बत अलग था, चीन ने जबरन लिया।
दलाई लामा ने शी जिनपिंग और चीन के हस्तक्षेप को बताया खतरा
दलाई लामा तिब्बत की आत्मा हैं। वे 1959 से भारत में निर्वासित हैं। हाल में उन्होंने चीन पर तीखा हमला बोला। 2025 में अपने जन्मदिन से पहले उन्होंने कहा कि चीन बौद्ध धर्म को जहर मानता है और इसे खत्म करने की साजिश रच रहा है, लेकिन सफल नहीं होगा। उन्होंने मंगोलिया से हिमालय तक बौद्ध अनुयायियों का जिक्र किया। शी जिनपिंग की अगुवाई वाली सीसीपी बौद्ध मठों को नष्ट कर रही है, लेकिन चीन में भी करोड़ों लोग बौद्ध हैं।
शी जिनपिंग के लिए ये मुश्किल है क्योंकि वे ‘सिनाइजेशन’ नीति चला रहे हैं, जहाँ तिब्बत को पूरी तरह चीनी बनाना चाहते हैं। दलाई लामा का उत्तराधिकारी का मुद्दा बड़ा है। चीन कहता है कि वो मंजूरी देगा, लेकिन दलाई ने साफ कहा कि उत्तराधिकारी ‘फ्री वर्ल्ड’ में जन्मेगा, चीन में नहीं।
खांडू ने भी कहा कि चीन का कोई रोल नहीं। ये शी को चिढ़ाएगा, क्योंकि चीन दलाई को ‘विभाजनकारी’ मानता है। हाल में एक चीनी जासूस को दलाई के कार्यक्रम में पकड़ा गया, जो चीन की जासूसी दिखाता है।
भारत बदल सकता है पड़ोसी, इसीलिए चीन की तड़प लाजिमी
खांडू का बयान ये सुझाता है कि भारत अपने पड़ोसी को ‘बदल’ सकता है – मतलब तिब्बत को अलग मानकर। अगर दुनिया तिब्बत को स्वतंत्र या अलग पहचान दे, तो चीन के लिए तिब्बत बफर स्टेट बन सकता है, जैसे नेपाल। चीन की टेंशन इसी से है। उसके लिए तिब्बत रणनीतिक है – पानी के स्रोत, खनिज और सीमा सुरक्षा। अगर भारत तिब्बत मुद्दे को उठाए, तो चीन की ‘वन चाइना’ पॉलिसी कमजोर होगी।
चीन तड़प रहा है क्योंकि हाल की घटनाएँ – दलाई लामा का बयान, पीएम मोदी का दलाई लामा को बधाई और अब पेमा खांडू का बयान… ये सब भारत की तरफ से हैं। चीन विरोध कर रहा है लेकिन भारत अब अपना स्टैंड ले रहा है। यही नहीं, भारत क्वाड के साथ मिलकर चीन को घेर भी रहा है। ऐसे में अगर तिब्बत मुद्दा अंतरराष्ट्रीय बने, तो चीन अलग-थलग पड़ सकता है।
तिब्बत की हकीकत को दुनिया के सामने लाने को तैयार है भारत
पेमा खांडू का बयान एक नई शुरुआत है। ये बताता है कि भारत अब तिब्बत की हकीकत को छिपाएगा नहीं। दलाई लामा के साथ खड़े होकर भारत चीन को संदेश दे रहा है कि हम अपनी सीमा और संस्कृति की रक्षा करेंगे। उनका ये बयान दोनों ही तरफ टेंशन बढ़ाएगा, लेकिन लंबे समय में भारत को फायदा देगा। तिब्बत की आजादी का सपना जिंदा है और खांडू जैसे नेता उसे आवाज दे रहे हैं। कुल मिलाकर ये बयान चीन को तड़पाने वाला है, लेकिन भारत के लिए मजबूती का संकेत।
बलरामपुर के छांगुर पीर को हाल ही में उत्तर प्रदेश की पुलिस ने गिरफ्तार किया। छांगुर पीर अब तक दर्जनों हिन्दू महिलाओं का धर्मांतरण करवा चुका है। छांगुर पीर ने सैकड़ों करोड़ की फंडिंग ली है और लोगों को ब्रेनवॉश कर उनकी सम्पत्ति कब्जाई है। धर्मांतरण गैंग के इस सरगना पर कार्रवाई होते ही इस्लामी कट्टरपंथी गुट बिलबिला उठा है। उसने इस इस्लामी धर्मांतरण सरगना की तुलना एक ऐसे व्यक्ति से चालू की है, जो स्वेछा से घर वापसी करने वालों की सहायता करते हैं।
छांगुर पीर पर कार्रवाई के बाद इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर अली त्यागी ने बरेली के KK शंखधर को निशाना बनाया है। इस्लामी कट्टरपंथी त्यागी ने जाति के आधार पर रेट तय करके धर्मांतरण करवाने वाले सरगना छांगुर और उन KK शंखधर को एक पंक्ति में खड़ा कर दिया है, जिनके पास लोग खुद घर वापसी करने आते हैं और जिनका हर कदम कानूनी तौर पर सही है। इस्लामी कट्टरपंथियों का यह दर्द छांगुर पीर पर UP पुलिस, UPATS और ED की कार्रवाई के बाद छलका है।
जानिए छांगुर पीर के कारनामे
बलरामपुर के गाँव रेहरामाफ़ी में करोड़ों की कोठी बना कर रहने वाले धर्मांतरण सरगना छांगुर पीर धर्मांतरण का पूरा नेटवर्क चलाता था। इसके लिए विदेशों से फंडिंग की जा रही थी। अब सामने आया है कि वह सामाजिंक संगठनों के नाम पर बैंक में खाता खुलवाता था। इसमें चंदा जुटाने और उसे विदेश भेजने के लिए इन संगठनों का इस्तेमाल करता था।
छांगुर पीर ने शिजर-ए-तैयब्बा नाम की किताब प्रकाशित कराई थी। इस किताब से आसपास के लोगों से इस्लाम का प्रचार-प्रसार कराता था। इस किताब को पढ़कर लोगों का ब्रेनवॉश करता था। छांगुर पीर ने लड़कियों की जाति के अनुसार धर्मांतरण की रकम तय कर रखी थी।
ब्राह्मण, क्षत्रिय व सरदार लड़कियों के लिए 15-16 लाख, पिछड़ी जाति के लिए 10-12 लाख और अन्य के लिए 8-10 लाख रुपए। उसके नेटवर्क को खाड़ी देशों से 100 करोड़ से ज्यादा की फंडिंग मिली थी, जिससे पीर ने लग्जरी संपत्तियाँ, गाड़ियाँ व शोरूम खरीदे। गिरोह के पास 40 से ज्यादा बैंक खाते हैं, जिनमें भारी लेन-देन हुआ है।
जमालुद्दीन बाबा एक ऐसा नेटवर्क चलाता था जो गरीब और असहाय लोगों को इस्लाम कबूल करवाने के लिए ब्रेनवॉश करता था। वह खुद को ‘पीर बाबा’ या ‘हजरत बाबा’ कहलवाता था और ‘शिजर-ए-तैय्यबा’ नाम की किताब से इस्लाम का प्रचार करता था।
लोगों को पैसों, विदेश में नौकरी का लालच दिया जाता था और न मानने पर मुकदमे में फँसाने की धमकी दी जाती थी। मुंबई के एक सिंधी परिवार नवीन रोहरा, उनकी पत्नी नीतू और बेटी को ब्रेनवॉश कर मुस्लिम नाम (जमालुद्दीन, नसरीन और सबीहा) दिया गया।
लखनऊ में भी गुंजा गुप्ता नाम की हिंदू लड़की को एक मुस्लिम युवक ने ‘अमित’ बनकर फँसाया, फिर दरगाह ले जाकर उसका धर्म परिवर्तन कर उसे अलीना अंसारी बना दिया। ऐसे ही बलरामपुर, लखनऊ, बरेली जैसे शहरों में इसका ये षड्यंत्र फैल चुका था।
लड़कियों को प्रेम के जाल में फँसाकर फिर डर और लालच के जरिए धर्म बदलने पर मजबूर किया गया। कुछ मामलों में उन्हें छोड़ दिया गया, कुछ को तीन तलाक दे दिया गया और कुछ के बारे में आरोप लगे कि उन्हें खाड़ी देशों और आतंकी संगठनों तक पहुँचाने की कोशिश की गई।
छांगुर पीर की सोच गजवा-ए-हिंद वाली थी। यह सोच भारत को इस्लामी राष्ट्र में बदलने की कोशिश कर रही है। इसके तहत भारत के खिलाफ नफरत फैलाना और युवाओं को भड़काकर उन्हें हिंसा की राह पर ले जाना लोगों का बहला फुसला कर धर्मांतरण करना होता है।
छांगुर पीर के इन कृत्यों के चलते उसकी कोठी तोड़ी जा चुकी है। उसके खिलाफ UPATS, पुलिस, ED समेत कई एजेंसियाँ FIR कर चुकी हैं और जाँच चल रही है। वह कोई संत महात्मा नहीं बल्कि एक इस्लामी कट्टरपंथी है।
बरेली के पंडित KK शंखधर कौन?
बरेली के पंडित शंखधर का उदाहरण छांगुर पीर के एकदम विपरीत है। पंडित शंखधर बरेली में अगस्तय मुनि आश्रम चलाते हैं। वह उन लड़कियों की सहायता करते हैं जो किन्हीं कारणों से स्वेच्छा से हिन्दू बनना चाहती हैं। वह ना कभी किसी पर दबाव बनाते हैं और ना ही किसी को लोभ लालच देकर उसकी घर वापसी का प्रयास करते हैं।
पंडित शंखधर मुख्य रूप से उन लड़कियों की सहायता करते हैं, जो किसी हिन्दू लड़के से प्रेम करती हैं और उनका इस्लामी परिवार इस काम के लिए राजी नहीं हो रहा। उन्होंने जिन लड़कियों की घर वापसी में सहायता की भी, वह स्वयं उनकी प्रशंसा करती हैं।
बरेली की रहने वाली आसमीन अब खुशबू बन गई है।
मुस्लिम से हिंदू बन अपने प्रेमी जयवीर के साथ ली 7 फेरे।
आचार्य के.के शंखधार ने गंगाजल व गौमुत्र से कराया शुद्धिकरण।
2022 में एक मुस्लिम युवती ने तीन तलाक के डर से सनातन धर्म अपनाया और हिंदु लड़के से शादी की थी। उसका नाम अमरीना है। अमरीना घर वापसी के बाद राधिका बन गई थी। राधिका ने बताया, “मैं बालिग हूँ। आधार कार्ड में मेरी जन्म तारीख 9 अगस्त 2000 है। हिंदुओं में तीन तलाक नहीं देते। यहाँ (इस्लाम में) तो पता नहीं कब तीन तलाक देकर घर से निकाल दिया जाए। हमारे पड़ोस के रहने वाली एक युवती का निकाह पाँच साल पहले हुआ था।”
उन्होंने आगे बताया, “उसके शौहर ने उसे पीट-पीटकर 3 तलाक देकर घर से निकाल दिया था। मैंने अपनी मर्जी से शादी की है। मेरा निर्णय मेरे भविष्य के लिए सुखद होगा। मेरे पति पप्पू जहाँ चाहेंगे, मैं वहाँ अपना गुजर-बसर कर लूँगी।” यह केवल एक उदाहरण है। पंडित शंखधर ने जिनकी घर वापसी करवाई है, वह ऐसी ही कहानियाँ बताते हैं।
भारत का संविधान किसी भी व्यक्ति को अपना धर्म या मजहब चुनने की आजादी देता है। यदि कोई व्यक्ति स्वेच्छा से अपना मजहब बदलता है और कोई व्यक्ति इसमें उसकी सहायता करता है तो यह कहीं भी कानूनी रूप से गलत नहीं है। यह काम पंडित KK शंखधर करते हैं। लेकिन अगर किसी पर दबाव बना कर, उसको पैसे का लालच देकर, उसके घर वालों को निशाना बना कर धर्मांतरण करवाए तो यह कानूनी तौर पर गलत है और छांगुर पीर इससे कहीं आगे तक था।
यमन के हूती विद्रोहियों ने 6 जुलाई, 2025 को लाल सागर में मैजिक सीज नाम के एक बड़े जहाज को निशाना बनाया। इसके बाद उन्होंने एटरनिटी जहाज को भी निशाना बनाया। हूती विद्रोहियों ने इसका वीडियो भी जारी किया है। सामने आया है कि दोनों जहाज इन हमलों के बाद डूब गए।
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Yemeni Forces released footage of raiding and blowing up the bulk carrier MAGIC SEAS for violating the blockade imposed on Israel pic.twitter.com/aBsTSugmpl
हूतियों ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि जहाज मैजिक सीज इजरायल पर लगाई गई उनकी नाकाबंदी का उल्लंघन कर रहा था। हूतियों ने जहाज पर ड्रोन, मिसाइल, रॉकेट-लॉन्चर आदि से हमला किया था, यही वजह है कि थोड़ी ही देर में एक भीषण धमाके के बाद जहाज दो टुकड़ों में टूट गया और जल्दी ही पूरी तरह से डूब गया। यूरोपियन यूनियन के नौसैनिक मिशन ‘ऑपरेशन एस्पाइड्स’ के अनुसार इस हमले में 3 नाविकों की मौत हुई है और दो लोग घायल हुए हैं। बाकियों की तलाश जारी है।
हूतियों के इस हमले के बाद लाल सागर के महत्व और इस पर नियंत्रण को लेकर बहस तेज हो गई है। लाल सागर इजरायल और हमास के बीच संघर्ष चालू होने के बाद से विवाद का केंद्र बिंदु रहा है और यहाँ होने वाली कोई भी घटना पूरे विश्व के तेल बाजार को प्रभावित करती है।
लाल सागर : हिंद महासागर का समुद्री प्रवेश द्वार
लाल सागर को एरिथ्रियन सागर के नाम से भी जाना जाता है। यह अफ्रीका और एशिया के बीच में स्थित है। यह हिंद महासागर का समुद्री प्रवेश द्वार है। लाल सागर, स्वेज नहर के जरिए यूरोप के भूमध्य सागर से जुड़ता है। इसी रास्ते से यूरोप और एशिया के देशों के बीच समुद्र के जरिए व्यापार भी होता है।
इसके एक तरफ अफ्रीका के मिस्र, सूडान, इरिट्रिया और जिबूती देश हैं, वहीं दूसरी तरफ एशिया के सऊदी अरब और यमन देश स्थित हैं। जानकारी के अनुसार इसे विश्व का सबसे खारा सागर माना जाता है, क्योंकि अन्य समुद्र और महासागरों के मुकाबले इसमें सबसे अधिक नमक पाया जाता है। यहाँ
बहुत अधिक गर्मी की वजह से लाल सागर का पानी लगातार उड़ता रहता है इसलिए इसमें नमक की मात्रा अधिक ही रहती है। रिपोर्ट्स का मानें तो जहाँ विश्व के अन्य महासागरों में अधिकतम 35 फीसदी नमक होता है, वहीं लाल सागर में नमक की मात्रा 40 फीसदी होती है।
व्यापारिक दृष्टि से भी अहम लाल सागर
रेड सी (लाल सागर) क्षेत्र में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का असर पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ रहा है। यह इलाका पहले भी कई बार अस्थिरता और संकट का केंद्र रहा है, इसलिए संभव है कि भविष्य में भी यहाँ से व्यापार में रुकावटें आती रहेंगी।
लाल सागर, गल्फ ऑफ एडन और स्वेज नहर के बीच का रास्ता एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला एक अहम समुद्री मार्ग है। आज के समय में इसी रास्ते से होकर करीब 12% वैश्विक व्यापार और दुनिया के लगभग 30% कंटेनर जहाज गुजरते हैं। यदि इस सागर में कोई व्यवधान पैदा होता है तो दुनिया भर का व्यापार प्रभावित होता है।
जब भी इस मार्ग में कोई परेशानी आती है, चाहे वह युद्ध हो, राजनीतिक तनाव, प्राकृतिक आपदा या कोई और वजह तो उसका सीधा असर दुनियाभर की आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ता है। केवल रोजमर्रा की चीजें ही नहीं, बल्कि तेल और LNG जैसी जरूरी ऊर्जा सामग्री का निर्यात भी इससे बुरी तरह प्रभावित होता है।
लाल सागर का व्यापार में महत्व कोई नया नहीं है। प्राचीन मिस्र के समय से यह क्षेत्र व्यापार, संस्कृति और राजनीति के लिए एक अहम केंद्र रहा है। अफ्रीकी, इस्लामी, ओटोमन और यूरोपीय ताकतों ने कई पीढ़ियों तक इस रास्ते को नियंत्रित कर व्यापार और विस्तार के लिए इस्तेमाल किया है।
यही वजह है कि रेड सी आज भी दुनिया के सबसे रणनीतिक और संवेदनशील व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। हर बार व्यापार में रुकावट का कारण युद्ध या संघर्ष ही नहीं होता। साल 2021 में इसका एक बड़ा उदाहरण देखने को मिला।
उस समय स्वेज नहर में रोजाना औसतन 55 से ज्यादा जहाज गुजरते थे और हर दिन लगभग 11 से 16 बार आवाजाही होती थी। उसी साल एक बड़ा कंटेनर जहाज ‘एवर गिवन’ नहर में तिरछा फँस गया था, जिससे पूरे मार्ग का ट्रैफिक छह दिनों तक पूरी तरह रुक गया। इसके चलते शिपिंग कम्पनियों को भारी नुकसान हुआ है।
इस घटना ने यह साफ दिखा दिया कि स्वेज नहर वैश्विक व्यापार और शिपिंग के लिए कितनी जरूरी है। जब भी इस तरह की रुकावटें आती हैं, तो इसका असर सिर्फ शिपिंग कंपनियों पर नहीं बल्कि आम लोगों और दुनियाभर के व्यापार पर भी पड़ता है।
खासकर उन लोगों के लिए जो सामान का निर्यात करते हैं, इसका असर तुरंत दिखने लगता है। आज भी कई जहाजों को स्वेज नहर की जगह अफ्रीका के चक्कर लगाकर या किसी और रास्ते से भेजा जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है लाल सागर?
लाल सागर भारतीय व्यापार के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्ग की भूमिका निभाता है। भारत के लगभग 50% निर्यात इसी के रास्ते होते हैं। यूरोप को जाने वाला 80% सामान लाल सागर के रास्ते ही जाता है। इसी से अमेरिका को सामान पहुँचाया जाता है।
इसके अलावा भारत को आने वाला लगभग तेल और गैस इसी के रास्ते आता है। इसकी कीमत लगभग ₹2 लाख करोड़ से अधिक है। ऐसे में यह भारत के लिए व्यापारिक और रणनीतिक, दोनों तरीके से जरूरी है। इसके अलावा भारत से जाने वाला माल इस रास्ते के बंद होने से देरी होती है। इससे लगभग 15% तक किराया भी बढ़ता है।
इसके अलावा, लाल सागर भारतीय नौसेना के गश्ती क्षेत्र से कोई विशेष दूर नहीं है। 2024 में भारतीय नौसेना ने ऐसे एक जहाज से क्रू को बचाया था, जिस पर हूतियों ने मिसाइल हमला किया था। इस रास्ते से निकलने वाले भारतीय जहाजों को भी हूती निशाना बना सकते हैं, ऐसे में भारत के लिए सुरक्षा चिंताएँ भी हैं।
कैसे रुकेंगे हूतियों के हमले?
हूतियों के यह हमले बीते लगभग 2 वर्षों से जारी हैं। उनका कहना है कि यह हमले वह हमास के समर्थन में कर रहे हैं। हूतियों को ईरान हथियार सप्लाई करता है। ईरान लाल सागर में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है और इसीलिए वह हूतियों पर अपना प्रभाव जमाए हुए हैं।
हूतियों को रोकने के लिए अमेरिका और इजरायल लगातार हवाई हमले कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद हूतियों पर हवाई हमले और भी तेज हुए हैं। इजरायल लगातार यमन के भीतर हूतियों के ठिकानों को निशाना बना रहा है। इजरायल ने इस जहाज पर हमले के बाद भी हूतियों को निशाना बनाया है।
इन हमलों के बाद भी हूती यमन में अपना कब्जा जमाए हुए हैं। उनके खिलाफ जमीन पर वर्तमान में कोई बड़ी लड़ाई नहीं चल रही है, इसके चलते उन्हें यमन की सत्ता से नहीं हटाया जा सकता है। यमन में इससे पहले एक बार जमीन पर सेना भेजने का प्रयास भी फेल हो चुका है।
तमिलनाडु सरकार के मंदिरों के पैसों से कॉलेज खोलने की योजना पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के महासचिव एडप्पादी के. पलानिस्वामी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (Hindu Religious & Charitable Endowments) विभाग की ओर से मंदिरों में आने वाले दान को कॉलेजों के निर्माण में खर्च कर किया जा रहा है।
AIADMK महासचिव ने इसे धार्मिक निधि का दुरुपयोग बताते हुए सवाल किया कि क्या सरकार के पास खुद खर्च के लिए फंड नहीं हैं। इस मामले पर द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) सरकार का कहना है कि ये कदम शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए और जनता के हित में उपयोग किया जा रहा है।
इस मामले पर बहस नई नहीं है। मंदिरों के प्रशासन पर सरकार का नियंत्रण और निधि का उपयोग एक लंबे समय से बहस का विषय रहा है। ये मामला नवंबर 2021 से शुरू हुआ था। DMK सरकार ने मंदिरों में चढ़ने वाले पैसे और सोना समेत हर तरह के दान की निधि से 4 कला और विज्ञान कॉलेज खोलने की योजना बनाई थी। विपक्षी दलों में इस पर तब भी विरोध किया था।
हालाँकि इस पर मद्रास हाई कोर्ट ने ये कहकर अंतरिम रोक लगा दी थी कि मंदिर का धन श्रद्धालुओं की ओर से धार्मिक आस्था के कारण दिया जाता है। साथ ही इसका उपयोग मंदिर के ट्रस्टियों की अनुमति के बिना भी नहीं किया जा सकता।
इसके बाद ताजा विवाद जुलाई 2025 में फिर सामने आया। AIADMK ने फिर आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार मंदिरों के चढ़ावे को कालेजों के निर्माण में कर रही है। ये विवाद तब और सुलग गया जब अप्रैल 2025 को करुणानिधि स्मारक पर श्रीविल्लिपुत्तूर मंदिर के गोपुरम (मंदिर का ऊपरी हिस्सा) की छवि बनाई गई। BJP ने इसे हिंदू आस्था पर हमला कहा।
I strongly condemn the @arivalayam for placing a temple Gopuram on top of the former Chief minister Mr. Karunnidhi’s burial place. This is height of arrogance and stupidity to the core. How can a temple gopuram be portrayed on a place where a body is buried. This is an assault… pic.twitter.com/FFa7c4QvyY
तमिलनाडु भाजपा के उपाध्यक्ष नारायणन तिरुपति ने सोशल मीडिया पर स्मारक की तस्वीर साझा की और लिखा कि यह अहंकार और मूर्खता की पराकाष्ठा है। हालाँकि इस पर भी DMK ने सफाई दी कि ये धार्मिक बयान के बजाय तमिलनाडु के राज्य प्रतीक का हिस्सा है। इस प्रतीक को 1949 में तत्कालीन सीएम ओमांदुर रामास्वामी रेड्डी के कार्यकाल में अपनाया गया था।
देश के सिर्फ 10 राज्यों में सरकार के नियंत्रण में 1,10,000 हिंदू मंदिर हैं। तमिलनाडु में मंदिरों के 4.78 लाख एकड़ भूमि, 36,425 मंदिर और 56 मठ सरकार के नियंत्रण में हैं। HR&CE विभाग 35,000 से अधिक मंदिरों का रखरखाव करता है। इन मंदिरों से मिलने वाली निधि का उपयोग अस्पतालों, अनाथालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के निर्माण और रखरखाव में किया जाता है।
इसी साल अप्रैल में रिपोर्ट्स सामने आईं कि सरकार की ओर से तमिलनाडु के 21 मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए सोने को पिघलाकर 24 कैरेट की छड़ों के रूप में बदलकर इन्हें बैंक में जमा कर दिया गया है। इसके जरिए निवेश से मिले ब्याज का उपयोग विकास कार्यों के लिए किया जाता है। इस निवेश से सरकार को हर साल लगभग 17.81 करोड़ रुपए का ब्याज मिल रहा है।
HR&CE ने विधानसभा में पेश एक नोट में कहा कि सरकार की इस योजना से मंदिरों को आर्थिक लाभ मिला है। इस विभाग को मिले फायदों को इस तरह से भी जाना जा सकता है कि जब जुलाई 2025 में AIADMK महासचिव ने मंदिर निधि के दुरुपयोग पर सवाल उठाए तो DMK के मंत्री पीके शेखरबाबू ने उन पर निशाना तो साधा ही पर साथ में ये भी बताया कि विभाग ने मंदिर धन का उपयोग करके 25 स्कूल, 9 कॉलेज और 1 पॉलिटेक्निक संस्थान स्थापित किया जा चुका है। इसके अलावा 19 अस्पताल भी स्थापित किए गए।
मंदिर और शिक्षण संस्थानों का इतिहास
अगर इतिहास की बात करें तो भारत में मंदिर केवल पूजा के लिहाज से ही अहम नहीं थे बल्कि शिक्षा और चिकित्सा का केंद्र हुआ करते थे। मंदिरों में ही गुरुकुल और शोध केंद्रों की भी स्थापना थी। बदलते समय के साथ मंदिरों का सरकारी नियंत्रण में रखरखाव किया जाने लगा और उनकी संपत्ति, भूमि और आय पर भी आधिपत्य कर दिया। इसके साथ ही मंदिरों को सिर्फ धार्मिक प्रयोजनों तक के लिए सीमित कर दिया गया।
अगर सरकारी तंत्र की बात की जाए तो इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि सिर्फ मंदिर ही सरकार के अधीन रखे गए हैं। किसी मस्जिद या चर्च को या उनकी संपत्ति को सरकार के न तो अधीन रखा गया और न ही सरकार का उन पर किसी भी तरह का नियंत्रण है।
मंदिर को ही सरकारी तंत्र में शामिल कर श्रद्धालुओं की ओर से धर्म के नाम पर दिए गए दान को सार्वजनिक उपयोग के लिए किया जा रहा है। इस लिहाज से ये धार्मिक असंतुलन के साथ हिंदुओं की आस्था के साथ भी दोगलापन है।
इस तरह के नीतिगत पक्षपात के लिए न केवल आवाज उठाना सही है बल्कि मंदिर के साथ सभी धार्मिक संस्थाओं के साथ एक जैसा व्यवहार सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
उत्तराखंड में अब सनातन के नाम पर ठगने वालों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान उत्तराखंड की सरकार चलाएगी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह विशेष अभियान चलाने का ऐलान किया है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक एक्स (10 जुलाई, 2025) को एक ट्वीट में बताया, ” देवभूमि उत्तराखंड में सनातन धर्म की आड़ में लोगों को ठगने और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले छद्म भेषधारियों के खिलाफ ऑपरेशन कालनेमि शुरू करने के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।”
उन्होंने कहा, “प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ असामाजिक तत्व साधु-संतों का भेष धारण कर लोगों, विशेषकर महिलाओं को ठगने का कार्य कर रहे हैं। इससे न सिर्फ लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सनातन परंपरा की छवि को भी नुकसान पहुँच रहा है।”
देवभूमि उत्तराखंड में सनातन धर्म की आड़ में लोगों को ठगने और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले छद्म भेषधारियों के खिलाफ ऑपरेशन कालनेमि शुरू करने के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।
प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहां असामाजिक तत्व साधु-संतों का भेष धारण कर लोगों, विशेषकर…
CM धामी ने कहा है कि किसी भी धर्म का व्यक्ति यदि ऐसे कृत्य करता हुआ मिलता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार असुर कालनेमि ने साधु का भेष धारण कर भ्रमित करने का प्रयास किया था, उसी तरह आज भी कई कालनेमि सक्रिय हैं।
उत्तराखंड में इस अभियान के सहारे उन लोगों को तलाशा जाएगा जो साधु-संत या धर्मगुरु बन कर लोगों को ठगते हैं। कई मामलों में ऐसे लोग दूसरे मजहबों से भी होते हैं। अब उत्तराखंड में इनकी पकड़-धकड़ के लिए विशेष अभियान चलेगा।
CM धामी ने इससे पहले ऑपइंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम वो सब काम कर रहे है जो सनातन के लिए जरूरी हैं। उन्होंने इस दौरान बताया था कि राज्य में अब तक 6500 एकड़ की जमीन अवैध अतिक्रमण से मुक्त करवा चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया था कि राज्य के भीतर 500 से अधिक मजारों पर भी एक्शन लिया जाएगा।
ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह राज्य की डेमोग्राफी नहीं बदलने देंगे। इसी कड़ी में अब उन्होंने ऑपरेशन कालनेमि चालू किया है।
कालनेमि रामायण में वर्णित एक राक्षस था। उसे रावण ने बजरंग बली को मारने का काम सौंपा था। शक्ति बाण से मूर्क्षित लक्ष्मण को बचाने के लिए जिस समय बजरंग बली संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरि पर्वत जा रहे थे, तब हनुमान को रोकने के लिए रावण ने कालनेमि को भेजा था।
जिसके बाद कालनेमि ने एक मायावी साधु का वेश धारण कर बजरंग बली को भ्रमित करने की कोशिश की थी, हालाँकि भगवान हनुमान ने वहीं उसका वध कर दिया था।
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद इलाके में रविवार (6 जुलाई 2025) की रात दलित की बारात पर हमला किया गया। यह घटना तब हुई जब बारात एक मस्जिद के पास से डीजे बजाते हुए गुजर रही थी।
पुलिस के अनुसार, गाँव निवासी माँगे राम (कुछ रिपोर्ट के अनुसार नाम-नाथी राम) की दो बेटियों की शादी थी। एक बारात साधारणपुर गाँव से अमरपुर गढ़ी गाँव जा रही थी। रास्ते में मस्जिद के पास मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने डीजे की तेज आवाज का विरोध किया और कहा कि नमाज का समय है, इसलिए डीजे बंद किया जाए।
बारात वालों ने डीजे बंद करने से इनकार किया, जिसके बाद दोनों पक्षों में बहस हुई और मामला हिंसक हो गया। आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने डीजे के उपकरण तोड़ दिए और बारातियों पर लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया।
इस हमले में कई लोग घायल हुए, जिनमें पंकज और वंश नामक दो दलित युवक गंभीर रूप से जख्मी हो गए। उन्हें पहले देवबंद में प्राथमिक उपचार दिया गया, फिर मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।
घटना के बाद दुल्हन के पिता माँगे राम ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने BNS की धाराओं 191(2), 115(2), 352, 189(4) और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।
कार्रवाई करते हुए पुलिस ने पाँच आरोपितों मोहम्मद अबुजर, असजद, इसरार, सादिक और फहीम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। चूँकि मामला दो समुदायों के बीच विवाद से जुड़ा है, इसलिए गाँव में तनाव की स्थिति को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।
किसी भी तरह की हिंसा को रोकने के लिए इलाके में नियमित गश्त की जा रही है। वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं।
उन्होंने दोनों समुदायों से शांति और संयम बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों ने साफ किया है कि कानून-व्यवस्था में बाधा डालने या अफवाह फैलाने की किसी भी कोशिश पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।