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गाँ$ में बाँस कर देंगे, भूरा बाल साफ करो… बिहार में लौटा ‘लालू के जंगलराज’ वाला नारा, क्या चुनाव से पहले जातीय नरसंहारों की साजिश रच रही RJD?

बिहार में विधानसभा चुनाव को कुछ ही महीने शेष हैं। 2025 का अंत होते-होते नई सरकार बिहार में बन चुकी होगी। इस चुनाव की तैयारियाँ राजनीतिक दलों के साथ ही चुनाव आयोग तेजी से कर रहा है। इसी कड़ी में चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को भी दुरुस्त कर रहा है।

विपक्षी पार्टियों को यह रास नहीं आया है। उन्होंने इसके विरोध में 9 जुलाई, 2025 को बिहार बंद बुलाया था। लेकिन चुनाव आयोग का यह विरोध RJD के गुंडाराज-जंगलराज की तैयारी और ‘भूरा बाल साफ़ करों’ जैसी धमकियों में बदल गया है।

बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया को राजद और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने मुद्दा बनाया जबकि आमजन को कोई परेशानी नहीं थी। जब आम लोग चुनाव आयोग के खिलाफ नहीं हुए तो यह बीड़ा उन्होंने खुद ही उठा लिया और 9 जुलाई के बंद के दौरान हिंसा और धमकियों का दौर चालू कर दिया।

कहीं RJD कार्यकर्ताओं ने एम्बुलेंस रोकी तो कहीं खुले मंच से नरसंहार वाले नारों की धमकियाँ चालू कर दीं। राजद के गुंडों की यह हरकतें वापस जंगलराज की यादें ले आई और साथ ही वह डर भी ले आई, जिसने 40 सालों से बिहारियों के मन में घर बनाया हुआ है।

मंच से ऐलान- भूरा बाल साफ़ करो

इसी 9 जुलाई, 2025 को बिहार में गया जिले में वह नारा गूंजा, जिसने 1990 के दशक में जनता को भयाक्रांत रखा था। यह नारा है- भूरा बाल साफ़ करो। इसमें भू का मतलब भूमिहार, रा का मतलब राजपूत और बा का मतलब ब्राह्मण तथा ल का मतलब लाला (कायस्थ) था। इस नारे का अर्थ था कि इन जातियों के लोगों को खत्म कर दिया जाए।

बिहार के गया जिले में 9 जुलाई, 2025 को ही अतरी विधानसभा क्षेत्र में विधायक रंजीत यादव की मौजूदगी में मुनारिक यादव ने ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा बुलंद किया। मुनारिक यादव बोला, “शुरू में हमारे लालू जी बोले थे भूरा बाल साफ़ करो की बात किए थे।”

मुनारिक यादव ने इस नारे को दोहराने की बात की। इस दौरान मंच पर मौजूद नेता खीसें निपोरते रहे। यानी उन्हें इस नारे या उसके वापस आने से कोई दिक्कत नहीं थी। ना मुनारिक यादव को यह बोलने से रोका गया और ना ही इसका कोई खंडन किया गया। यानी कहीं ना कहीं वहाँ की जनता इस बात से राजी थी।

भूरा बाल साफ करो के इस नारे के मंच से ऐलान करना RJD कार्यकर्ताओं के बुलंद हौसलों और उनकी मनोस्थिति बताती है कि वह सत्ता पाकर क्या करना चाहते हैं।

एम्बुलेंस पर बोले- गा@ में बाँस कर देंगे

इसी 9 जुलाई के बंद में दरभंगा के धोई घाट में RJD कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम की और एक एम्बुलेंस का रास्ता ब्लॉक कर दिया। RJD के कार्यकर्ताओं की गुंडई इस दौरान तब चरम पर दिखी जब उन्होंने एम्बुलेंस जाने देने की विनती पर धमकियाँ चालू कर दीं।

RJD के गुंडों ने एम्बुलेंस जाने देने की धमकी पर लड़ाई-झगड़ा किया और कैमरे पर हाथ मारा। एक गुंडे ने कहा, “गाँ#@ में बाँस कर देंगे, 90 वाला लहर आएगा तो नीचे पटक देंगे।” यानी RJD कार्यकर्ताओं को चुनाव चालू होने से पहले ही जंगलराज वाली खुमारी वापस चढ़ गई।

जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझना और कुछ कहने पर धमकियाँ देना गुंडई की पहली निशानी है। RJD वालों ने यह साफ़ कर दिया कि उनकी सत्ता में लोगों का नीचे पटका जाना तय है। यह सब गुंडई चुनाव से महीनों पहले हो रही है और कैमरे के सामने हो रही है।

यानी RJD के लोग अगर साथ में हैं तो उन्हें ना क़ानून का डर है और ना ही उन्हें आमजन के साथ सिम्पथी है। अगर उनके राजनीतिक मास्टर ने एजेंडा दे दिया है तो चाहे एम्बुलेंस फँसे या फिर जातीय नरसंहार हो। उनका एजेंडा पूरा होना चाहिए।

मुहर्रम हिंसा भी इसी राजनीति का हिस्सा

बिहार में कटिहार, भागलपुर, दरभंगा समेत कई जगह पर मुहर्रम में हिंसा हुई। हिन्दू घरों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। लेकिन यह हिंसा ऐसे समय में हुई जब लगभग 10 दिन पहले ही बिहार में एक रैली का आयोजन राजद और बाकी विपक्षी पार्टियों ने की थी। यह रैली वक्फ कानून का विरोध करने के नाम पर आयोजित की गई थी।

इस रैली में तेजस्वी यादव, पप्पू यादव समेत कॉन्ग्रेस और RJD के कई नेता शामिल हुए थे। इस रैली के दौरान भड़काऊ भाषण दिए गए थे। तेजस्वी यादव ने कहा था कि उनकी सरकार बनी तो वह वक्फ कानून कूड़े में फेंक देंगे और संसद, अदालत से लेकर सड़क तक मुस्लिमों के लिए उतरेंगे।

इस रैली के बहाने कवायद तो वोट बढ़ाने की थी लेकिन हौसलाअफजाई का रिजल्ट 10 दिन बाद ही दिखा और बिहार के कई जिले हिंसा की आग में झुलसे। इस पर भी राजद ने चुप्पी साध ली। ध्यान देने वाली बात है कि यह सब हिंसा चुनाव से ठीक पहले हो रही है।

ये गुंडई कोई खोखली हरकत नहीं

RJD के गुंडों की यह हरकतें कोई शक्ति प्रदर्शन भर नहीं है। भूरा बाल साफ़ करो का आह्वान दिखाता है कि वह भविष्य में क्या करने की इच्छा रखते हैं। इसी भूरा बाल साफ़ करो के नारे ने बिहार को 1980 और 1990 में जातीय हिंसा के नरक में झोक दिया था।

जब बिहार में 1980 और 1990 के दशक में भूरा बाल साफ़ करो का नारा गूंजा था तो बारां, डालेचक और सेनारी जैसे नरसंहार हुए थे। इन नरसंहारों में भूमिहार और राजपूत जातियों के 100 से अधिक लोग मार दिए गए थे। हत्यारे वो नक्सली थे जो कथित ‘सामाजिक न्याय’ चाहते थे।

तब ये सब कुछ भूरा बाल साफ़ करो के नाम पर हुआ था। आज वही नारा बिहार में वापस लगा है और कहा गया है कि ये वापस दुहराया जाएगा। भूरा बाल साफ़ करो के ऐलान और मुहर्रम में हुई हिंसा एक और बात बताती है। यह बताती है कि RJD के समीकरण का का कोर वोटर MY आजकल उत्तेजित है।

और इतिहास रहा है कि जब ये वोटर उत्तेजित हुआ है तो बिहार जंगलराज के दलदल में घुसा है। और जंगलराज अपने साथ पलायन, गरीबी और कुव्यवस्था का दौर लाता है।

भाजपा बोली- जनता हो जाए सावधान

ऑपइंडिया ने बिहार बंद के दौरान जातीय हिंसा के लिए लगाए जाने वाले नारों और जनता को परेशान करने की घटनाओं पर भाजपा OBC मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री निखिल आनंद से बात की। उन्होंने कहा, “आरजेडी का चाल- चरित्र- चेहरा जगजाहिर है। धार्मिक तुष्टिकरण की आड़ में घोर मुस्लिमपरस्ती और जातिवादी कुंठा की अभिव्यक्ति करना ही राजद का मूल राजनीतिक चरित्र है।”

उन्होंने कहा, “बिहार बंद की आड़ में राजद ने जो विभिन्न जगहों पर तांडव किया, महिलाओं को अपमानित किया, बीमार लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई और जातिगत आधार पर लोगों के साथ दबंगई और मारपीट की घटना को अंजाम दिया, उससे बिहार की जनता को सावधान होने की जरूरत है।”

महामंत्री निखिल आनंद ने कहा कि जब राजद का सत्ता के बाहर यह हाल है तो अगर ऐसे लोगों के हाथ में सत्ता आएगी तो किस तरीके से कानून व्यवस्था को ताक पर रखकर इनकी गुंडागर्दी चलेगी, यह समझा जा सकता है।

क्या चुनाव में ज्यादा हिंसा होगी इसका परिणाम?

बिहार ने 1990 से लेकर 2005 तक का वह दौर देखा है जब चुनाव का मतलब हिंसा हो गया था। तब बैलट बॉक्स लूटना, उसमे स्याही डाल देना, लाठी-डंडे और गोलियाँ चलना सामान्य बात सी हो गई थी। लालू प्रसाद यादव इसे ‘बोतल से जिन्न निकलने’ का नाम देते थे।

बिहार में चुनावी धांधली का यह हाल था कि 2005 आते-आते चुनाव आयोग को यहाँ शुचितापूर्ण चुनाव करवाने के लिए विशेष पर्यवेक्षक KJ राव को भेजना पड़ा था। इसके बाद चुनावी हिंसा पर लगाम लग पाई थी। और जैसे ही यह चुनावी हिंसा बंद हुई, वैसे ही बिहार में RJD का बोरिया बिस्तर भी बंध गया था।

तब से कुछ वर्ष को छोड़ दिया जाए तो RJD सत्ता में आने को तरस गई है। लोगों को वही भूरा बाल साफ़ करो और जंगलराज वाले दिन याद आते हैं। अब जब फिर से RJD नेताओं ने यही चालू किया है तो आगामी चुनाव में भी हिंसा के बादल मंडराने लगे हैं।

संभवतः इस बार के चुनाव फिर से एक हिंसक हों। बूथ पर लोगों को जाने ना देने, उनमें डर फ़ैलाने से लेकर कई ऐसी हरकतें हो सकती हैं जो चुनाव प्रभावित करें। चुनाव आयोग को इस बार फिर सतर्क रहना होगा।

जमीन पर लिटा ओढ़ा देते हैं कंबल, फिर गोली मार दिल के उड़ा देते हैं चिथड़े… क्या ऐसे ही निमिषा प्रिया को ‘मौत की सजा’ देगा यमन: क्या है केरल की नर्स का मामला, क्या होता है ‘ब्लड मनी’

केरल की नर्स निमिषा प्रिया को 16 जुलाई 2025 को यमन में मौत की सजा दी जाएगी। उन पर यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की हत्या का आरोप है।

इस मामले में केंद्र सरकार से राजनयिक हस्तक्षेप की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए 14 जुलाई 2025 की तारीख तय की है। निमिषा प्रिया इस समय यमन की राजधानी सना की सेंट्रल जेल में बंद हैं।

यमन में ‘मौत की सजा’ कैसे दी जाती है?

यमन में मौत की सजा गोली मारकर दी जाती है। यह तरीका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसमें जिस व्यक्ति को सजा दी जानी होती है, उसे जमीन पर पेट के बल लेटाया जाता है और फिर कंबल से ढक दिया जाता है।

एक डॉक्टर पीछे से दिल के चारों ओर निशाना बनाता है, जहाँ गोली मारी जाती है। इसके बाद एक व्यक्ति ऑटोमैटिक राइफल से दिल में तीन-चार गोलियाँ मारता है।

यमन में मौत की सजा खुले में या निजी तौर पर भी दी जा सकती है। हालाँकि, पथराव या सिर कलम करने जैसे पुराने तरीके अब यमन में इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं।

‘ब्लड मनी’ क्या है?

इस्लामी कानून के मुताबिक, हत्या के मामलों में सजा के 2 विकल्प हैं- किसास और दियाकिसास का मतलब ‘जान के बदले जान’ और दिया यानी ब्लड मनी। इस्लामी कानून में ‘दिया’ यानी ब्लड मनी ऐसा प्रावधान है जो सुलह का अवसर प्रदान करता है।

शरिया कानून के अनुसार, हत्या के मामलों में पीड़ित परिवार को यह तय करने का अधिकार होता है कि वे हत्यारे को माफ करेंगे या सजा दिलाएँगे। कुरान के अनुसार, माफी और ब्लड मनी को न्याय और दया का माध्यम बताया गया है।

कुरान की सूरह अल-बकरा, आयत 178 में उल्लेख है: “मगर यदि हत्यारे को पीड़ित के संरक्षक द्वारा क्षमा कर दिया जाए, तो ब्लड मनी को न्यायपूर्वक तय किया जाए और सम्मानपूर्वक भुगतान किया जाए। यह तुम्हारे पालनहार की ओर से एक दया और सुविधा है।”

निमिषा प्रिया के मामले में ‘ब्लड मनी’ पर सहमति क्यों नहीं बनी

यमन और कई अन्य इस्लामी देशों में ब्लड मनी का भुगतान परिवारों के बीच आपसी सहमति से तय होता है। निमिषा प्रिया को बचाने के लिए उनके परिवार और कुछ संगठन ब्लड मनी इकट्ठा कर रहे हैं। वे मृतक तलाल के परिवार को पैसा देकर निमिषा को माफ करवाने की कोशिश कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, ब्लड मनी कारगर नहीं हो पा रही है क्योंकि, मृतक तलाल के परिवार ने अभी तक पैसा लेने पर सहमति नहीं जताई है। बता दें, कि बल्ड मनी की रकम 8 करोड़ हैं।

रकम के साथ मृतक तलाल के परिवार को एजुकेशन, मेडिकल के साथ कई अन्य सहयोग देने का भरोसा जताया है। लेकिन पीड़ित के परिवार ने पेशकश ठुकरा दी है।

निमिषा प्रिया का मामला

निमिषा प्रिया पर आरोप है कि उन्होंने 2017 में एक यमनी नागरिक ‘तलाल अब्दो महदी’ को नशीला इंजेक्शन दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

हालाँकि, निमिषा का कहना है कि तलाल के पास उनका पासपोर्ट था, जो वापस लेना चाहती थीं और उन्होंने उसे सिर्फ बेहोश करने की कोशिश की थी, मारने की नहीं।

मृतक तलाल के शव को टुकड़े-टुकड़े करके पानी की टंकी में डालने का भी आरोप है।

यमन की कोर्ट ने निमिषा को 2020 में मौत की सजा सुनाई थी। निमिषा प्रिया की आखिरी अपील को 2023 में यमन की सबसे बड़ी अदालत ने भी खारिज कर दिया था।

इसके बाद, जनवरी 2024 में यमन के हूती विद्रोहियों की सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल ने भी उन्हें मौत की सजा देने की मंजूरी दे दी है।

बिहार पर सुप्रीम कोर्ट में ‘गैंग’ ने मुँह की खाई, वोटर वेरिफिकेशन पर रोक लगाने से इनकार: चुनाव आयोग से कहा- आधार, राशन कार्ड और वोटर ID को भी पहचान का प्रमाण मानें

बिहार में चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह करना चुनाव आयोग का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया की टाइमिंग को लेकर प्रश्न उठाए हैं और कहा है कि वह आधार कार्ड और राशन कार्ड को भी दस्तावेज के तौर पर शामिल करने पर विचार करे।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमलय बांग्ला की एक बेंच ने गुरुवार (10 जुलाई, 2025) को इस मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस दावे को सिरे से खारिज किया कि चुनाव आयोग यह प्रक्रिया नहीं कर सकता है और उसके पास यह अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट का रिवीजन करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ इस पूरी प्रक्रिया के खिलाफ कोई भी अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले को 28 जुलाई को सुनेगा और तब तक चुनाव आयोग इस मामले में और जानकारियाँ कोर्ट के सामने रखे।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से कहा कि वह यह पूरी प्रक्रिया चुनाव से कुछ ही महीने पहले क्यों कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके अलावा चुनाव आयोग के आधार कार्ड के दस्तावेज के रूप में स्वीकार ना करने के फैसले पर भी प्रश्न उठाए हैं।

चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट ने पहचान के प्रमाण के रूप में आधार और राशन कार्ड को लेने पर विचार करने को कहा है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने तीन बातों पर चुनाव आयोग से जवाब दाखिल करने को कहा है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया इस बीच चलती रहेगी।

गौरतलब है कि जून, 2024 से चुनाव आयोग ने बिहार के अंदर वोटर लिस्ट रिवाइज करने की कार्यवाही चालू की थी। इसे चुनाव आयोग ने SIR का नाम दिया था। चुनाव आयोग ने इसे 25 जुलाई तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।

इस फैसले को विपक्षी पार्टियों ने अघोषित NRC-CAA जैसा बताया है और दावा किया है कि इससे मुस्लिम वोट काटे जाने का प्रयास है। ADR, RJD और योगेन्द्र यादव समेत कई लोगों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर यह प्रक्रिया रोकने को कहा था, इससे सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है।

शशि थरूर ने दिलाई इमरजेंसी की याद, इंदिरा गाँधी को ‘तानाशाह’ बताते हुए कहा – लोकतंत्र को रौंदा गया: संजय गाँधी की क्रूरता पर भी लिखा, आज के भारत को बताया मजबूत

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने हाल ही में एक ओपिनियन लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने इमरजेंसी के दौर और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की नीतियों की जमकर आलोचना की है। यह लेख प्रोजेक्ट सिंडिकेट में छपा है और इमरजेंसी की 50वीं वर्षगांठ पर आधारित है।

तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेस सांसद थरूर ने इस लेख में बताया है कि कैसे 1975 में लगाई गई इमरजेंसी ने भारत की लोकतंत्र की नींव हिला दी थी। उन्होंने इसे स्वतंत्रता के क्षरण का उदाहरण बताया और कहा कि आज का भारत 1975 वाले भारत से बहुत अलग है। लेकिन इमरजेंसी के सबक हमें हमेशा याद रखने चाहिए।

लेख की शुरुआत में थरूर ने 25 जून 1975 की उस रात का जिक्र किया, जब इमरजेंसी घोषित की गई थी। उन्होंने लिखा कि रेडियो पर सरकारी ऐलान आया और पूरे देश में मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लग गई, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया और असहमति की आवाजों को दबा दिया गया। थरूर खुद उस समय भारत में थे, लेकिन बाद में अमेरिका चले गए और वहाँ से इस दौर को देखते रहे। उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी ने दावा किया था कि इमरजेंसी आंतरिक अव्यवस्था, बाहरी खतरों से निपटने और देश में अनुशासन लाने के लिए जरूरी थी। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र पर हमला था।

थरूर ने न्यायपालिका की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने दबाव में आकर हाबेअस कोर्पस के अधिकार को मान लिया, जिससे नागरिकों की स्वतंत्रता छिन गई। पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया। उन्होंने अपने लेख में मानवाधिकारों के उल्लंघन की भयावह कहानियाँ बताई हैं। उन्होंने जेल में यातनाओं, गैर-कानूनी हत्याओं का उल्लेख किया, जो उस समय ज्यादा प्रचारित नहीं हुईं।

शशि थरूर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

शशि थरूर ने लिखा है कि इमरजेंसी के नाम पर अनुशासन लाने की कोशिश में क्रूरता की हद पार हो गई। जैसे संजय गाँधी की अगुवाई में जबरदस्ती नसबंदी अभियान चलाया गया। यह गरीब और ग्रामीण इलाकों में ज्यादा केंद्रित था, जहाँ लक्ष्य पूरा करने के लिए हिंसा और दबाव का इस्तेमाल किया गया। शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों को बेरहमी से उजाड़ा गया, हजारों लोग बेघर हो गए। थरूर ने कहा कि ये सब ‘अतिरेक’ के रूप में बाद में खारिज किए गए, लेकिन ये अनियंत्रित सत्ता की तानाशाही के परिणाम थे।

उन्होंने आगे लिखा कि इमरजेंसी के दौरान कुछ समय के लिए व्यवस्था लगी दिखी, लेकिन यह लोकतंत्र की आत्मा की कीमत पर थी। असहमति को चुप कराना, बोलने, लिखने और एकत्र होने के अधिकारों को कुचलना और संवैधानिक मानदंडों की अवहेलना ने भारत की राजनीति पर गहरा घाव छोड़ा। न्यायपालिका ने बाद में खुद को सुधारा, लेकिन शुरुआती कमजोरी को भुलाया नहीं जा सकता। इमरजेंसी के बाद 1977 के चुनावों में जनता ने इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया, जो प्रभावित लोगों के गुस्से का नतीजा था।

थरूर ने इमरजेंसी से सीखने वाली बातें गिनाईं-

  • पहली – सूचना की स्वतंत्रता और स्वतंत्र प्रेस का महत्व। जब मीडिया दबाव में आता है, तो जनता नेताओं को जवाबदेह बनाने से वंचित रह जाती है।
  • दूसरी – न्यायपालिका की स्वतंत्रता जरूरी है, जो कार्यकारी शाखा के अतिरेक को रोक सके।
  • तीसरी और सबसे मौजूदा समय के लिए प्रासंगिक बात- एक ताकतवर कार्यकारी शाखा, जो बहुमत पर टिकी हो, लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है, खासकर जब वह खुद को अचूक मानती हो और जाँच-पड़ताल की प्रक्रियाओं से बेचैन हो।

थरूर ने जोर दिया कि आज का भारत ज्यादा आत्मविश्वासी, समृद्ध और मजबूत लोकतंत्र है। लेकिन इमरजेंसी के सबक अभी भी प्रासंगिक हैं। हमें लोकतांत्रिक मूल्यों के सूक्ष्म क्षरण पर नजर रखनी चाहिए। क्या हम तानाशाही को पहचान और विरोध कर सकते हैं? थरूर ने अंत में कहा कि इमरजेंसी को सिर्फ इतिहास के काले अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि सबक के रूप में याद रखें। लोकतंत्र को हल्के में न लें, इसे लगातार पोषित और बचाया जाना चाहिए।

यह लेख ऐसे समय आया है जब थरूर और कॉन्ग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। उन्होंने सरकारी नीतियों का कई बार समर्थन किया है, जो पार्टी लाइन से अलग है। बीजेपी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शशि थरूर ने कॉन्ग्रेस के इमरजेंसी का बचाव करने वाले यू-टर्न को समझ लिया है।

अब पूरी तरह से एंटी कॉन्ग्रेस हो गए थरूर?

बता दें कि जब भी कोई कॉन्ग्रेस नेता प्रो-इंडिया की बात करता है, जैसे शशि थरूर ने देश हित में दुनिया के कई देशों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जानकारी देने वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया, तो कॉन्ग्रेस पार्टी में उन पर उँगलियाँ उठी। और अब उन्होंने इमरजेंसी की आलोचना करके लोकतंत्र की रक्षा पर जोर दिया है। ऐसे में ये सब कुछ ऑटोमैटिकली एंटी-कॉन्ग्रेस हो जाता है। क्योंकि पार्टी का इतिहास और वर्तमान नेतृत्व अक्सर पुरानी गलतियों का बचाव करता है, जबकि देशहित में बोलने वाले को विद्रोही ठहराया जाता है। यह दिखाता है कि पार्टी में सच्ची लोकतांत्रिक बहस की कमी है।

पूरे देश में ‘बिहार मॉडल’ लागू करेगा चुनाव आयोग, हर एक घुसपैठिया वोटर लिस्ट से होगा बाहर: बोले मुख्य चुनाव आयुक्त- असम-बंगाल में भी 11 दस्तावेजों से होगी जाँच

बिहार में वोटर्स की लिस्ट की जाँच के बाद, अब यही काम पश्चिम बंगाल और असम में होगा। मुख्य चुनाव आयोग यहाँ के मतदाता सूची की लिस्ट को बहुत ध्यान से देखेगा। मुख्य चुनाव आयोग इस अभियान के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई भी गैर-भारतीय मतदाता सूची में शामिल न हो।

यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जब इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी पर पहले से ही राजनीति गरमाई हुई है।

घर-घर जाकर होगी जाँच

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची की यह गहन समीक्षा देश के हर राज्य में की जाएगी। इसमें घर-घर जाकर मतदाताओं की पुष्टि की जाएगी।

बिहार में चुनाव के बाद, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी में यह अभियान चलाया जाएगा, जहाँ 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी राज्यों की मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा पूरी करने की योजना है।

हालाँकि, विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नागरिकता तय करना सरकार का काम है, ना कि चुनाव आयोग का।

विपक्षी दल यह भी तर्क दे रहे हैं कि बिहार में ज्यादातर लोगों के पास आधार या राशन कार्ड जैसे दस्तावेज ही हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने 11 विशिष्ट दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिनमें ये शामिल नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट में भी इस अभियान के खिलाफ याचिकाएँ दाखिल की गई हैं।

क्यों खास हैं बंगाल और असम?

यह अभियान पश्चिम बंगाल और असम में खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी को लेकर लंबे समय से राजनीतिक विवाद रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हो सकते हैं जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।

चुनाव आयोग का यह अभियान घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करने में मदद कर सकता है।

आधार कार्ड और नागरिकता का सवाल

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की समीक्षा के लिए 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, लेकिन इसमें आधार कार्ड, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस शामिल नहीं हैं।

इसका कारण यह है कि ये दस्तावेज पहचान का प्रमाण तो हैं, लेकिन नागरिकता का नहीं।

हालाँकि, फॉर्म 6 (नए वोटर बनने के लिए) में आधार का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे यह सवाल उठता है कि अगर आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो इसे क्यों स्वीकार किया जाता है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि आधार का इस्तेमाल गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल होने का मौका दे सकता है।

आगे की राह

वोटर लिस्ट का गहन रिवीजन जरूरी है ताकि मतदान के लिए पहले से रजिस्टर्ड लोगों की प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सके। भारत जैसे देश में अवैध इमीग्रेशन एक बड़ी समस्या है। इसलिए वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में ढिलाई नहीं बरती जा सकती।

विशेषज्ञों का मानना है कि पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए सिर्फ घोषणा ही नहीं, बल्कि नागरिकता का प्रमाण भी अनिवार्य होना चाहिए।

कोरोना वैक्सीन का हार्ट अटैक से कोई लेना-देना नहीं… रिसर्च में खुलासा, वामपंथी मीडिया ‘द प्रिंट’ ने झूठ फैलाया: मौतों के पैटर्न पर दे रहे थे ज्ञान, फैक्ट चेक में पोल खुली

द प्रिंट ने मंगलवार (8 जुलाई 2025) को रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें दावा किया गया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) और INCLEN इंटरनेशनल मिलकर 45 वर्ष से कम उम्र के लोगों में कोविड-19 महामारी के पश्चात अचानक मौतों में किसी पैटर्न की जाँच कर रहे हैं।

इस खबर में बताया गया कि यह राष्ट्रीय स्तर पर एक सामुदायिक अध्ययन होगा, जिसका उद्देश्य अचानक हो रही मौतों की जानकारी रखना और उनके जोखिम के कारकों के बारे में पता करना था।

द प्रिंट द्वारा प्रकाशित समाचार लेख का स्क्रीनशॉट

हालाँकि, द प्रिंट की यह रिपोर्ट पूरी तरह झूठी निकली। PIB ने सरकार की ओर से जारी की गई जानकारी में इस तरह के किसी भी अध्ययन से इंकार कर दिया। इसमें कहा गया कि ICMR और AIIMS ने विस्तृत रूप से डेटा के आधार पर अध्ययन किया है। इसमें पाया गया है कि कोविड-19 टीकाकरण युवाओं में अचानक मौतों का जोखिम नहीं बढ़ाता बल्कि जोखिम को कम करता है।

जानकारी में ये बात भी शामिल की गई कि हार्ट अटैक और अचानक होने वाली मौतों के असली कारणों में जन्मजात बीमारियाँ, निष्क्रिय जीवनशैली और हृदय-रोग जैसे प्राकृतिक कारक शामिल हैं, न कि कोविड-19 के बचाव में लगाई गई वैक्सीन।

PIB ने द प्रिंट के झूठ को सोशल मीडिया पर भी उजागर किया। उसका खबर को एक्स प्लेटफॉर्म पर साझा कर PIB ने खबर को भ्रामक कहा है।

PIB ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “@ThePrintIndia की खबर में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार ने देशभर में अचानक हो रही मौतों के पैटर्न का आकलन करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन शुरू किया है, लेकिन यह दावा गलत है। न तो केंद्र सरकार और न ही @DeptHealthRes (DHR) ने ऐसा कोई सर्वे शुरू किया है।”

अचानक हुई मौतों को कोविड वैक्सीन से जोड़ने का दावा

कोरोना महामारी आने के बाद उसके बचाव में टीकाकरण अभियान चलाया गया। हालाँकि इसके बाद कुछ वर्षों से सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि दिल के दौरे से होने वाली अचानक मौतें कोविड-19 वैक्सीन की वजह से हो रही हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने हाल ही में ऐसे सभी दावों को गलत बताया है।

सरकार ने यह बात ICMR और AIIMS द्वारा किए गए दो बड़े अध्ययनों के आधार पर कही है। इन अध्ययनों में साफ तौर पर पाया गया कि कोविड-19 टीके और दिल के दौरे से होने वाली अचानक मौतों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।

इसके अलावा ICMR और NCDC (राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र) द्वारा किए गए अध्ययन में यह भी साबित हुआ कि भारत में कोविड-19 के टीके सुरक्षित और असरदार हैं। गंभीर साइड इफेक्ट्स के मामले बहुत ही कम हैं।

ICMR और NCDC ने 18 से 45 साल की उम्र के लोगों में अचानक होने वाली मौतों को समझने के लिए 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 47 बड़े अस्पतालों में एक अध्ययन किया।

इसके साथ ही AIIMS ने ICMR के सहयोग से एक और अध्ययन किया जिसमें पाया गया कि अचानक दिल से जुड़ी मौतों के पीछे जेनेटिक कारण है, साथ ही पहले से मौजूद बीमारियाँ और खराब जीवनशैली जैसे कारण भी हैं, न कि कोविड-19 वैक्सीन। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन को इन मौतों से जोड़ना गलत और भ्रामक है।

प्रोपेगेंडा को फैलाकर भले ही द प्रिंट ने अपनी खबर को बेचने की कोशिश की हो लेकिन वह गलत साबित हो गया। हालाँकि इन भ्रामक खबरों से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों का होता है क्योंकि वे इस तरह की खबरों पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं।

अमित शाह का रिटायरमेंट प्लान! इस साहस के पीछे छिपा है 1986 हरिद्वार कुंभ मेले वाला इतिहास, स्वामी वामदेव के चरण दबाकर सीखी सनातन की बारीकियाँ

22 अक्टूबर, 2025 को केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह 61 वर्ष के हो जाएँगे। सरकारी नौकरियों में ये भले ही रिटायरमेंट की उम्र हो, राजनीति में व्यक्ति इस उम्र के बाद और सक्रिय दिखने लगता है। 75 वर्ष के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्राएँ करते हैं, रैलियाँ करते हैं, सरकार व पार्टी की बैठकों में हिस्सा लेते हैं और रणनीतियाँ बनाते हैं। ऐसे में कोई नेता अगर रिटायरमेंट की बात करे तो लोगों का चौंक जाना स्वभाविक है।

हालाँकि, जब अमित शाह रिटायरमेंट की बात करते हैं तो हैरानी नहीं होनी चाहिए। दूर की रणनीतियाँ बनाने वाले और हर क़दम गणना करके रखने वाले अमित शाह ने ज़रूर सोच रखा होगा कि किस उम्र व किन परिस्थितियों में उन्हें रिटायर होना है। राजनीति में रिटायरमेंट जैसा कुछ नहीं होता, फिर भी अमित शाह अगर इसका जिक्र करने का साहस करते हैं तो ये बताता है कि क्यों अमित शाह, अमित शाह हैं। आइए, जानते हैं पूरा माजरा क्या है।

क्या है अमित शाह का रिटायरमेंट प्लान?

असल में गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान की महिलाओं और सहकारी कार्यकर्ताओं के साथ अमित शाह ने ‘सहकार संवाद’ आयोजित किया था। जुलाई 2021 में ही नए सहकारिता मंत्रालय का गठन किया गया था। इससे पहले सहकारिता के क्षेत्र में राजनीतिक परिवारों का दबदबा हुआ करता था, जिसे तमाम सुधारों के जरिए अमित शाह ठीक करने की कोशिश में जुटे हैं। अमित शाह ने महिलाओं के साथ संवाद करते हुए कहा कि रिटायरमेंट के बाद वो वेद-उपनिषद का अध्ययन करेंगे और प्राकृतिक खेती करेंगे।

उन्होंने कहा, “मैंने तो तय किया है कि मैं जब भी रिटायर हो जाऊँगा, मैं बाक़ी का जीवन वेद, उपनिषद और प्राकृतिक खेती के लिए ख़र्च करूँगा। ये प्राकृतिक खेती एक वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसके कई फायदे हैं। फर्टिलाइजर वाला गेहूँ खाने से कैंसर होता है, रक्तचाप और डायबिटीज बढ़ता है, थायराइड की समस्या आती है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए बगैर फर्टिलाइजर वाला भोजन करना, मतलब दवाइयों की ज़रूरत नहीं। मैंने मेरे खेत पर प्राकृतिक खेती आजमाई, जिससे उत्पादन डेढ़ गुना बढ़ गया।”

अक्सर हमारे देश की समस्या ये रही है कि यहाँ विदेश से पढ़कर आने वालों को ही नीतिज्ञ माना गया। भारत के सनातन साहित्य को लेकर हमें हीनभावना से ही ग्रसित रखा गया। ऐसे में वेद-उपनिषद की बात करने वाले अमित शाह के बारे में एक नई बात जान लीजिए। उनकी बात को मजाक में मत लीजिए। 1980 के दशक में वेदांत के विद्वान वामदेव के पाँव दबाकर अमित शाह ने धर्म-दर्शन की बारीकियाँ सीखी हैं। ऋषि सेवा का ही फल है उनकी सफलता!

कुशल राजनेता व रणनीतिकार के पीछे छिपा है वेदांत का अध्येता

अब तक आपने अमित शाह को राजनीति करते, चुनाव जीतते, अनुच्छेद-370 हटाने और CAA लाने जैसे ऐतिहासिक फ़ैसले लेते हुए देखा होगा। भारत में नक्सलवाद के अंत का पूरा श्रेय भी उन्हें ही जाने वाला है। अब तक आपने अमित शाह को संगठन के पेंच कसते, देशभर में घूम-घूमकर मंडल कार्यकर्ताओं से लेकर मुख्यमंत्रियों तक की बैठक लेते और रैलियों में गरजते देखा होगा। लेकिन, रणनीतिकार व दूरदृष्टा अमित शाह के पीछे एक वेदांत दर्शन का अध्येता छिपा हुआ है!

उन्होंने कई दिनों तक वामदेव की सेवा की। वो वामदेव नामक ब्राह्मण ही थे जिन्होंने उन्हें महाकुंभ में हिस्सा लेने के लिए कहा था और अमित शाह ने ऐसा किया भी। इसके पीछे ऋषि का उद्देश्य यह था कि अमित शाह अधिक से अधिक संख्या में साधु-संतों से संवाद करके भारतीय धर्म-दर्शन को सीखें, जानें, समझें। यही हुआ भी! अमित शाह गुरु की बात मानकर कुंभ में शामिल हुए।

एक रोचक बात जानिए अब। प्रत्येक सुबह वामदेव अपने शिष्य को एक हस्तलिखित पर्ची देते थे। उस पर्ची को रोज़ अलग-अलग संतों के पास लेकर जाना होता था। उसमें अमित शाह के लिए सिफ़ारिश होती थी। इस तरह अमित शाह रोज़ किसी न किसी नए संत के साथ समय व्यतीत करते थे, भंडारे में खाते और दक्षिणा इकट्ठा किया करते थे। अमित शाह पैरवी लगाते थे, लेकिन किसी पद या किसी वित्तीय फ़ायदे के लिए नहीं — ज्ञान के लिए, सनातन धर्म को समझने के लिए।

और हाँ, क्या आपको पता है वो दक्षिणा के पैसे का क्या करते थे? उन्होंने उन सिक्कों को जमा करके एक साइकल ली। उस साइकल से वो कुंभ में घूमते थे, सनातन के हर रूप का अवलोकन करते थे। हरिद्वार में 1986 में आयोजित हुए कुंभ में यूँ तो 2 लाख श्रद्धालु थे, लेकिन उनमें एक 21 साल का वो युवक भी था जो आगे चलकर इस देश के इतिहास को बदलने के क्रम का हिस्सा बनने वाला था। 21 साल का वो लड़का, जो स्वामी वामदेव के शिविर में रहकर संतों-महंतों से सीख रहा था।

विजयराजे सिंधिया को तो जानते होंगे आप? वही, ग्वालियर की राजमाता। ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी। एक दिन उनके शिविर से अमित शाह को 10 रुपए मिले। जानते हैं उन रुपयों का क्या हुआ? उस रुपए से अमित शाह स्वामी वामदेव के लिए एक हार ख़रीदकर ले गए। एक शिष्य ने अपने गुरु के प्रति इस निष्ठा और समर्पण का प्रदर्शन किया है, तभी आज वो देश का दूसरा सबसे शक्तिशाली नेता है।

सनातन साहित्य से आता है बड़े फ़ैसले लेने का साहस

चाणक्य, शंकराचार्य और सावरकर — ये 3 हस्तियाँ आज अमित शाह की विचारधारा को प्रभावित करती हैं। यही वो अध्ययन है जो उन्हें बड़े फ़ैसले लेने का साहस देता है, रणनीति देता है। 2014 में जो रणनीतिकार था, वो 2019 आते-आते जननेता बन गया और 250 रैलियों के जरिए भाजपा की जीत सुनिश्चित की। 2024 लोकसभा चुनाव में भी 188 रैलियाँ करके अमित शाह ने अपना लोहा मनवाया।

इन सबके दौरान स्वामी वामदेव को मत भूलिए। वही तो थे, जिनके साथ ने एक युवक का जीवन बदलकर उसे अमित शाह बना दिया। वामदेव, जो महंत अवैद्यनाथ और परमहंस रामचन्द्रदास के साथ राम मंदिर के आंदोलन में सक्रियता से शामिल थे।

स्वामी वामदेव, जिनके मार्गदर्शन ने बदल दिया युवा अमित शाह का जीवन

1997 में वामदेव 75 वर्ष की आयु में अपना भौतिक शरीर छोड़ गए, लेकिन अपने शिष्य को नए भारत का निर्माण करने के लिए स्थापित करके गए। एक संयोग देखिए कि जिस वर्ष वामदेव का निधन होता है उसी वर्ष अमित शाह पहली बार विधायक बनते हैं। शायद अमित शाह के इसी अनुभव व अध्ययन का परिणाम है कि आज भारत में वो बड़े से बड़े फ़ैसले यूँ ही हो जाते हैं, जिनके बारे में कभी सोचना भी अपराध माना जाता था। ये फ़ैसले पूरी क़ानूनी तैयारी के साथ होते हैं, इनके कार्यान्वयन का फल भी दिखाई देता है। अब UCC (समान नागरिक संहिता) की बारी है।

भारतीय UPI तकनीक अपनाने वाला पहला देश बना नामीबिया, किया ₹6680+ करोड़ का व्यापार: PM मोदी बोले- हमारी दोस्ती समय की कसौटी पर खरी, मिला 27वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बुधवार (9 जुलाई 2025) को नामीबिया पहुँचे। यहाँ उन्हें नामीबिया के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘ऑर्डर ऑफ द मोस्ट वेल्वित्विया मिराबिलिस’ से सम्मानित किया गया। नामीबिया में 27 साल बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री ने दौरा किया है। पीएम अपनी पाँच देशों को यात्रा पूरी कर फिलहाल दिल्ली पहुँच चुके हैं।

2014 में प्रधानमंत्री बनने से लेकर अब तक पीएम नरेंद्र मोदी का यह 27वाँ अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। अपनी आधिकारिक यात्रा के आखिरी चरण में नामीबिया पहुँचे पीएम मोदी ने नामीबिया की संसद को भी संबोधित किया।

पीएम मोदी ने कहा “यह मेरे लिए गर्व की बात है कि मैं इस लोकतंत्र के मंदिर में बोल रहा हूँ। मैं भारत की 140 करोड़ जनता की ओर से शुभकामनाएँ और स्नेह लेकर आया हूँ।”

उन्होंने कहा “भारत और नामीबिया दोनों ने औपनिवेशिक शासकों से स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी। आज हम समानता, स्वतंत्रता और न्याय के मार्ग पर साथ चल रहे हैं।”

नामीबिया की राष्ट्रपति डॉ. नेटुम्बो नंदी-नदैतवाह ने पीएम मोदी को राजधानी विंडहोक स्थित स्टेट हाउस में यह सम्मान दिया। पीएम ने अपने संबोधन में कहा “मैं सर्वोच्च नागरिक सम्मान लेते हुए बहुत गर्व महसूस कर रहा हूँ। नामीबिया के मजबूत और सुंदर पौधों की तरह हमारी दोस्ती समय की कसौटी पर खरी उतरी है। यहाँ के राष्ट्रीय पौधे वेल्वित्शिया मिराबिलिस की तरह यह समय और उम्र के साथ और भी मजबूत होगी।”

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 2 जुलाई से शुरू हुई आधिकारिक यात्रा 10 जुलाई तक 5 देशों- घाना, त्रिनिदाद एंड टोबैगो, अर्जेंटीना, ब्राजील और नामीबिया का दौरे के साथ समाप्त हुई। इस यात्रा में उन्हें पिछले 7 दिनों में 4 देशों ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से सम्मानित किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत के संविधान का उदाहरण देते हुए कहा कि कुछ महीने पहले नामीबिया ने अपनी पहली महिला राष्ट्रपति चुनी। हम आपके गर्व और खुशी को समझते हैं, क्योंकि भारत में हम भी राष्ट्रपति को गर्व से मैडम प्रेसिडेंट कहते हैं। यह भारत के संविधान की शक्ति है कि एक गरीब आदिवासी परिवार की बेटी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रपति है।”

प्रधानमंत्री ने नामीबिया और भारत के व्यापार के मुद्दे को लेकर कहा “भारत कैंसर के इलाज के लिए नामीबिया को भाभाट्रॉन रेडियोथेरेपी मशीन देने के लिए तैयार है। भारत में विकसित इस मशीन का उपयोग 15 देशों में किया जा चुका है। इसने विभिन्न देशों में लगभग पाँच लाख गंभीर कैंसर रोगियों की मदद की है। हम नामीबिया को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाओं तक पहुँच के लिए जन औषधि कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भी आमंत्रित करते हैं”।

इसके साथ ही पीएम ने कहा “नामीबिया भारत की UPI तकनीक अपनाने वाला पहला देश बन गया है। हमारा द्विपक्षीय व्यापार 80 करोड़ डॉलर (6,680 करोड़ रुपए) को पार कर गया है। लेकिन क्रिकेट के मैदान की तरह, हम अभी तैयारी कर रहे हैं। हम तेजी से और ज्यादा रन बनाएँगे।”

बता दें कि नामीबिया में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह पहली और किसी भारतीय प्रधानमंत्री की तीसरी यात्रा है। आज से 27 साल पहले 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी नामीबिया गए थे। वहीं उनसे पहले 1990 में प्रधानमंत्री वीपी सिंह, पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के साथ नामीबिया के पहले स्वतंत्रता दिवस पर वहाँ पहुँचे थे।

अमेरिका ने ब्राजील पर ठोका 50% का टैरिफ, राष्ट्रपति लूला बोले-अब हम भी लेंगे बदला: अल्जीरिया, इराक, लीबिया पर भी 30% का भार; ट्रंप मानते हैं BRICS को यूएस के लिए नुकसान

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में व्यापार असंतुलन को ठीक करने के नाम पर कई देशों पर नए और भारी टैरिफ (आयात शुल्क) लगाने की घोषणा की है। इन फैसलों से ग्लोबल ट्रेड में तनाव बढ़ने की आशंका है।

नए टैरिफ की घोषणा और प्रभावित देश

ब्राजील पर सबसे ज्यादा असर- ट्रंप ने बुधवार (9 जुलाई 2025) को ब्राजील से आयात होने वाले सामानों पर 50% का भारी टैरिफ लगाने की घोषणा की है। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर इसे लेकर एक पत्र साझा किया।

ट्रंप ने इस कदम को ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो पर चल रहे मुकदमे का बदला भी बताया, जिसे उन्होंने ‘अंतर्राष्ट्रीय शर्मिंदगी’ और ‘विच हंट‘ करार दिया। यह नया चार्ज 1 अगस्त 2025 से लागू होगा।

ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज़ इनासियो लूला दा सिल्वा ने भी टैरिफ पर अपना जवाब दिया है। राष्ट्रपति ने कहा कि यदि राष्ट्रपति ट्रम्प 50% टैरिफ लगाते हैं तो वे इसका जवाब देने के लिए तैयार हैं।

अन्य 7 देशों पर टैरिफ– ब्राजील के अलावा, बुधवार (9 जुलाई 2025) को 7 और देशों, जिसमें अल्जीरिया, ब्रुनेई, इराक, लीबिया, मोल्दोवा, फिलीपींस और श्रीलंका पर नए टैरिफ लगाने की घोषणा की गई।

अल्जीरिया, इराक, लीबिया और श्रीलंका पर 30% टैरिफ, ब्रुनेई और मोल्दोवा पर 25% टैरिफ और फिलीपींस पर 20% टैरिफ लगाने की घोषणा की गई है। ये सभी टैरिफ भी 1 अगस्त 2025 से ही लागू होंगे।

पहले के टैरिफ

सोमवार (7 जुलाई 2025) को ट्रंप ने दक्षिण कोरिया और जापान सहित 14 अन्य देशों पर भी टैरिफ लगाने का ऐलान किया था। इन देशों में म्यांमार, लाओस, दक्षिण अफ्रीका, कजाकिस्तान, मलेशिया, ट्यूनीशिया, इंडोनेशिया, बोस्निया और हर्जेगोविना, बांग्लादेश, सर्बिया, कंबोडिया और थाईलैंड शामिल हैं।

कुछ देशों पर 25% चार्ज लगाया गया, जबकि कुछ को 30% से 40% तक का भारी चार्ज देना पड़ सकता है।

ट्रंप का तर्क और BRICS देश

व्यापार असंतुलन- ट्रंप का मानना है कि यह टैरिफ कई सालों से चला आ रहा है। इसमें अमेरिका तो दूसरे देशों से बहुत सारा सामान खरीदता है, लेकिन दूसरे देश अमेरिका से उतना सामान नहीं खरीदते। इसलिए ट्रंप ने इसे ‘व्यापार असंतुलन’ बताते हुए ठीक करने के लिए कहा है।

BRICS देश भी निशाने पर- ट्रंप ने BRICS (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) समझौता पर भी हमला बोला। ट्रंप ने दावा किया कि BRICS अमेरिका को नुकसान पहुँचाने के लिए बनाया गया है।

ट्रंप ने मंगलवार (8 जुलाई 2025) को घोषणा की कि BRICS देशों पर भी जल्द ही 10% का टैरिफ लगाया जाएगा। इसमें भारत भी शामिल है। ट्रंप का मानना है कि BRICS देश डॉलर को विश्व की स्टैंडर्ड करेंसी के रूप में कमजोर करने की कोशिश कर रहे हैं।

व्यापार समझौते और चेतावनी

अमेरिका में प्रोडक्शन को बढ़ावा- ट्रंप ने इंटरनेशनल मैन्युफैक्चरर को यह भी भरोसा दिया कि यदि वे अपनी प्रोडक्शन यूनिट्स को अमेरिका में ट्रांसफर्ड करते हैं तो उन्हें नए टैरिफ से छूट मिलेगी।

जवाबी कार्रवाई की चेतावनी- ट्रंप ने चेतावनी दी है कि यदि कोई देश इन टैरिफ के जवाब में जवाबी कार्रवाई करता है तो वाशिंगटन के जरिए और टैरिफ बढ़ाए जाएँगे।

भारत के साथ व्यापार समझौता- ट्रंप ने भारत के साथ व्यापार समझौते की संभावना पर भी बात की। यह समझौता इस महीने (जुलाई 2025) या उनकी भारत यात्रा के दौरान हो सकता है।

इसका लक्ष्य 2030 तक दोनों देशों के बीच व्यापार को 500 अरब डॉलर तक पहुँचाना है। हालाँकि, इसमें कृषि और डेयरी जैसे संवेदनशील क्षेत्र शामिल नहीं होंगे।

ट्रंप के इन फैसलों से वैश्विक व्यापार संबंधों में काफी उथल-पुथल मचने की संभावना है, क्योंकि 1 अगस्त 2025 से ये टैरिफ लागू होंगे।

BRICS में घुसने का तुर्की का सपना भारत-चीन ने तोड़ा, ‘खलीफा’ बनने के सपने हुए चूर: पाकिस्तान से गलबहियाँ-उइगर का समर्थन बना कारण

विश्व की बड़ी अर्थव्यस्थाओं के समूह BRICS (ब्रिक्स) की 2025 की शिखर बैठक 6-7 जुलाई को ब्राजील के रियो डी जनेरियो शहर में आयोजित हुई। इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के साथ-साथ नए शामिल हुए सदस्य देशों ने भी हिस्सा लिया। भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी इस बैठक में शामिल हुए।

इस बार की बैठक में जहाँ आंतकवाद समेत तमाम मुद्दों पर बात हुई, वहीं तुर्की की सदस्यता पर फैसला नहीं हो पाया। तुर्की ने पिछले साल BRICS का सदस्य बनने के लिए आधिकारिक रूप से आवेदन किया था। हालाँकि, उस समय उसे केवल ‘पार्टनर देश’ का दर्जा दिया गया था। इसे सदस्य बनने की दिशा में पहला कदम माना जाता है।

उम्मीद की जा रही थी कि 2025 की शिखर बैठक में तुर्की को पूर्ण सदस्य का दर्जा प्राप्त हो जाएगा। लेकिन इस आवेदन पर कोई बड़ा फैसला नहीं लिया गया और उसकी हैसियत बस पार्टनर देश तक ही सीमित रखी गई। इसका मतलब है कि तुर्की को अभी और इंतजार करना होगा। हालाँकि, इस बार तुर्की की सदस्यता पर चर्चा हुई है।

बताया गया कि तुर्की के सदस्य ना बन पाने के पीछे भारत और चीन थे। तुर्की को BRICS सदस्य बनाने के पक्ष में वर्तमान में भारत और चीन नहीं है। दोनों देशों की आपत्तियाँ अलग-अलग हैं। चीन तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध इसलिए कर रहा है क्योंकि उसके आपसी रिश्तों में कुछ मतभेद मौजूद हैं।

BRICS का विस्तार धीरे-धीरे हो रहा है, और नए सदस्य जोड़ने से पहले सभी मौजूदा सदस्य देशों की सहमति जरूरी होती है। चीन और भारत BRICS के संस्थापक सदस्य हैं। यदि वह सहमत नहीं होते तो तुर्की को कभी भी इसकी सदस्यता नहीं मिल सकती।

भारत ने तुर्की के BRICS में आने पर क्यों लगाया वीटो?

भारत और तुर्की के रिश्ते हालिया सालों में कोई विशेष अच्छे नहीं रहे हैं। भारत, तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध इसीलिए कर रहा है क्योंकि वह लगातर पाकिस्तान के पक्ष में खडा खड़ा रहा है। हाल ही में हुए ऑपरेशन सिंदूर के दौरान तुर्की ने खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था।

तुर्की ने पहलगाम आतंकी हमले की निंदा भी नहीं की थी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तानी मंत्री शाहबाज शरीफ और आर्दोआन की मुलाक़ात भी हुई थी, जहाँ दोनों ने एक दूसरे के लिए काफी मीठी मीठी बातें की थी। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी तुर्की ने पाकिस्तान को मजबूत किया था।

पाकिस्तान ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत के खिलाफ जो ड्रोन इस्तेमाल किए थे, वह तुर्की के ही थे। इसने भारत के लिए सुरक्षा खतरे भी खड़े किए थे। इसके अलावा कश्मीर मुद्दे पर भी तुर्की हमेशा पाकिस्तान के ही पक्ष में खड़ा रहा है। राष्ट्रपति एर्दोआन ने कई बार भारत के खिलाफ बयान दिए हैं।

भारत ने न केवल तुर्की की BRICS सदस्यता का विरोध किया है, बल्कि देश में तुर्की कंपनियों के खिलाफ सख्त कदम भी उठाए हैं, जैसे एयरपोर्ट सेवाएं देने वाली तुर्की की कंपनी के सुरक्षा मंजूरी को रद्द कर दिया। वही भारत में तुर्की के सामानों का बहिष्कार भी किया जा रहा है।

चीन क्यों कर रहा है विरोध?

BRICS में तुर्की की एंट्री पर भारत के अलावा दूसरा वीटो चीन का रहा। दरअसल, चीन से तुर्की का दूसरा विवाद है तुर्की में उइगर मुसलमानों की बड़ी आबादी रहती है और तुर्की सरकार ने कई बार चीन के शिनजियांग प्रांत में रहने वाले उइगरों के मानवाधिकारों के उल्लंघन पर चिंता जताई है।

तुर्की ने सार्वजनिक रूप से चीन द्वारा उइगरों के साथ किए जा रहे कथित दुर्व्यवहार की आलोचना की है। इससे चीन को यह लगता है कि तुर्की उसकी आंतरिक नीतियों में हस्तक्षेप कर रहा है। चीन यह भी मानता है कि तुर्की उइगर अलगाववादियों को समर्थन देता है, जो उसकी एकता और सुरक्षा के लिए खतरा है।

तुर्की ने 2019 और 2021 में संयुक्त राष्ट्र मंच पर भी चीन की नीतियों की आलोचना की थी और उइगरों के अधिकारों की रक्षा की माँग की थी। तुर्की के कुछ मीडिया चैनल और राजनीतिक नेता चीन की नीतियों को ‘नस्लीय दमन’ तक कह चुके हैं। इसके साथ ही, तुर्की ने कई बार उइगर प्रवासियों को अपने देश में शरण भी दी है।

इस रुख से चीन लगातार तुर्की के खिलाफ रहा है और उसे अपने साथ मंच साझा नहीं करने देना चाहता है। इसके अलावा, तुर्की सैन्य गठबंधन NATO का हिस्सा है जो अमेरिकी अगुवाई वाला है। चीन यह कतई बर्दाश्त नहीं कर सकता कि कोई NATO सदस्य उसके बराबर शक्ति किसी संगठन में पाए।

तुर्की क्यों बनना चाहता है BRICS का हिस्सा?

अब यहाँ सवाल उठते हैं कि तुर्की BRICS का हिस्सा बनना ही क्यों चाहता है। तुर्की स्वयं NATO का सदस्य है और उसके संबंध यूरोप तथा अमेरिका से अधिक हैं। जबकि BRICS को मोटे तौर पर अमेरिकी अगुवाई वाले G-7 के विकल्प के तौर पर देखा जाता है।

दरअसल, इसके पीछे तुर्की और और उसके नेता आर्दोआन की ग्लोबल महत्वाकांक्षा है। तुर्की वैश्विक स्तर पर बड़ा नेता बनना चाहता है। इसलिए वह हर उस संगठन में शामिल होना चाहता है, जो वैश्विक राजनीतिक पर असर डालता हो। इसके अलावा BRICS कोई सैन्य गठबंधन नहीं है, जिससे अमेरिकी हितों को नुकसान पहुँचे।

ऐसे में NATO का सदस्य होने के बावजूद वह BRICS में घुसना चाहता है। इसके अलावा एक कारण और है। दरअसल, BRICS में सऊदी अरब भी सदस्य बनने के रास्ते में है। सऊदी अरब इस्लामी नेता माना जाता है और तुर्की उससे यह तमगा लेना चाहता है। ऐसे में वह भी यहाँ आना चाहता है। हालाँकि, जब तक वह भारत और चीन से अपने रिश्ते ठीक नहीं करता, उसकी BRICS सदस्यता की इच्छा पूरी नहीं होने वाली।