Home Blog Page 311

जिस लाल सागर में हूती विद्रोहियों ने जहाज डुबोया, उससे आता है भारत का तेल-गैस: जानिए क्यों दुनिया भर के लिए महत्वपूर्ण है ‘खारा पानी’ का ये इलाका

यमन के हूती विद्रोहियों ने 6 जुलाई, 2025 को लाल सागर में मैजिक सीज नाम के एक बड़े जहाज को निशाना बनाया। इसके बाद उन्होंने एटरनिटी जहाज को भी निशाना बनाया। हूती विद्रोहियों ने इसका वीडियो भी जारी किया है। सामने आया है कि दोनों जहाज इन हमलों के बाद डूब गए।

हूतियों ने इसकी जिम्मेदारी लेते हुए कहा कि जहाज मैजिक सीज इजरायल पर लगाई गई उनकी नाकाबंदी का उल्लंघन कर रहा था। हूतियों ने जहाज पर ड्रोन, मिसाइल, रॉकेट-लॉन्चर आदि से हमला किया था, यही वजह है कि थोड़ी ही देर में एक भीषण धमाके के बाद जहाज दो टुकड़ों में टूट गया और जल्दी ही पूरी तरह से डूब गया। यूरोपियन यूनियन के नौसैनिक मिशन ‘ऑपरेशन एस्पाइड्स’ के अनुसार इस हमले में 3 नाविकों की मौत हुई है और दो लोग घायल हुए हैं। बाकियों की तलाश जारी है। 

हूतियों के इस हमले के बाद लाल सागर के महत्व और इस पर नियंत्रण को लेकर बहस तेज हो गई है। लाल सागर इजरायल और हमास के बीच संघर्ष चालू होने के बाद से विवाद का केंद्र बिंदु रहा है और यहाँ होने वाली कोई भी घटना पूरे विश्व के तेल बाजार को प्रभावित करती है।

लाल सागर : हिंद महासागर का समुद्री प्रवेश द्वार

लाल सागर को एरिथ्रियन सागर के नाम से भी जाना जाता है। यह अफ्रीका और एशिया के बीच में स्थित है। यह हिंद महासागर का समुद्री प्रवेश द्वार है। लाल सागर, स्वेज नहर के जरिए यूरोप के भूमध्य सागर से जुड़ता है। इसी रास्ते से यूरोप और एशिया के देशों के बीच समुद्र के जरिए व्यापार भी होता है।

इसके एक तरफ अफ्रीका के मिस्र, सूडान, इरिट्रिया और जिबूती देश हैं, वहीं दूसरी तरफ एशिया के सऊदी अरब और यमन देश स्थित हैं। जानकारी के अनुसार इसे विश्व का सबसे खारा सागर माना जाता है, क्योंकि अन्य समुद्र और महासागरों के मुकाबले इसमें सबसे अधिक नमक पाया जाता है। यहाँ

बहुत अधिक गर्मी की वजह से लाल सागर का पानी लगातार उड़ता रहता है इसलिए इसमें नमक की मात्रा अधिक ही रहती है। रिपोर्ट्स का मानें तो जहाँ विश्व के अन्य महासागरों में अधिकतम 35 फीसदी नमक होता है, वहीं लाल सागर में नमक की मात्रा 40 फीसदी होती है।

व्यापारिक दृष्टि से भी अहम लाल सागर

रेड सी (लाल सागर) क्षेत्र में चल रहे भू-राजनीतिक तनाव का असर पूरी दुनिया के व्यापार पर पड़ रहा है। यह इलाका पहले भी कई बार अस्थिरता और संकट का केंद्र रहा है, इसलिए संभव है कि भविष्य में भी यहाँ से व्यापार में रुकावटें आती रहेंगी।

लाल सागर, गल्फ ऑफ एडन और स्वेज नहर के बीच का रास्ता एशिया और यूरोप को जोड़ने वाला एक अहम समुद्री मार्ग है। आज के समय में इसी रास्ते से होकर करीब 12% वैश्विक व्यापार और दुनिया के लगभग 30% कंटेनर जहाज गुजरते हैं। यदि इस सागर में कोई व्यवधान पैदा होता है तो दुनिया भर का व्यापार प्रभावित होता है।

जब भी इस मार्ग में कोई परेशानी आती है, चाहे वह युद्ध हो, राजनीतिक तनाव, प्राकृतिक आपदा या कोई और वजह तो उसका सीधा असर दुनियाभर की आपूर्ति व्यवस्था पर पड़ता है। केवल रोजमर्रा की चीजें ही नहीं, बल्कि तेल और LNG जैसी जरूरी ऊर्जा सामग्री का निर्यात भी इससे बुरी तरह प्रभावित होता है।

लाल सागर का व्यापार में महत्व कोई नया नहीं है। प्राचीन मिस्र के समय से यह क्षेत्र व्यापार, संस्कृति और राजनीति के लिए एक अहम केंद्र रहा है। अफ्रीकी, इस्लामी, ओटोमन और यूरोपीय ताकतों ने कई पीढ़ियों तक इस रास्ते को नियंत्रित कर व्यापार और विस्तार के लिए इस्तेमाल किया है।

यही वजह है कि रेड सी आज भी दुनिया के सबसे रणनीतिक और संवेदनशील व्यापारिक मार्गों में से एक माना जाता है। हर बार व्यापार में रुकावट का कारण युद्ध या संघर्ष ही नहीं होता। साल 2021 में इसका एक बड़ा उदाहरण देखने को मिला।

उस समय स्वेज नहर में रोजाना औसतन 55 से ज्यादा जहाज गुजरते थे और हर दिन लगभग 11 से 16 बार आवाजाही होती थी। उसी साल एक बड़ा कंटेनर जहाज ‘एवर गिवन’ नहर में तिरछा फँस गया था, जिससे पूरे मार्ग का ट्रैफिक छह दिनों तक पूरी तरह रुक गया। इसके चलते शिपिंग कम्पनियों को भारी नुकसान हुआ है।

इस घटना ने यह साफ दिखा दिया कि स्वेज नहर वैश्विक व्यापार और शिपिंग के लिए कितनी जरूरी है। जब भी इस तरह की रुकावटें आती हैं, तो इसका असर सिर्फ शिपिंग कंपनियों पर नहीं बल्कि आम लोगों और दुनियाभर के व्यापार पर भी पड़ता है।

खासकर उन लोगों के लिए जो सामान का निर्यात करते हैं, इसका असर तुरंत दिखने लगता है। आज भी कई जहाजों को स्वेज नहर की जगह अफ्रीका के चक्कर लगाकर या किसी और रास्ते से भेजा जा रहा है, जिससे समय और लागत दोनों बढ़ रहे हैं।

भारत के लिए क्यों अहम है लाल सागर?

लाल सागर भारतीय व्यापार के लिए भी एक महत्वपूर्ण मार्ग की भूमिका निभाता है। भारत के लगभग 50% निर्यात इसी के रास्ते होते हैं। यूरोप को जाने वाला 80% सामान लाल सागर के रास्ते ही जाता है। इसी से अमेरिका को सामान पहुँचाया जाता है।

इसके अलावा भारत को आने वाला लगभग तेल और गैस इसी के रास्ते आता है। इसकी कीमत लगभग ₹2 लाख करोड़ से अधिक है। ऐसे में यह भारत के लिए व्यापारिक और रणनीतिक, दोनों तरीके से जरूरी है। इसके अलावा भारत से जाने वाला माल इस रास्ते के बंद होने से देरी होती है। इससे लगभग 15% तक किराया भी बढ़ता है।

इसके अलावा, लाल सागर भारतीय नौसेना के गश्ती क्षेत्र से कोई विशेष दूर नहीं है। 2024 में भारतीय नौसेना ने ऐसे एक जहाज से क्रू को बचाया था, जिस पर हूतियों ने मिसाइल हमला किया था। इस रास्ते से निकलने वाले भारतीय जहाजों को भी हूती निशाना बना सकते हैं, ऐसे में भारत के लिए सुरक्षा चिंताएँ भी हैं।

कैसे रुकेंगे हूतियों के हमले?

हूतियों के यह हमले बीते लगभग 2 वर्षों से जारी हैं। उनका कहना है कि यह हमले वह हमास के समर्थन में कर रहे हैं। हूतियों को ईरान हथियार सप्लाई करता है। ईरान लाल सागर में अपना दबदबा बनाए रखना चाहता है और इसीलिए वह हूतियों पर अपना प्रभाव जमाए हुए हैं।

हूतियों को रोकने के लिए अमेरिका और इजरायल लगातार हवाई हमले कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता में आने के बाद हूतियों पर हवाई हमले और भी तेज हुए हैं। इजरायल लगातार यमन के भीतर हूतियों के ठिकानों को निशाना बना रहा है। इजरायल ने इस जहाज पर हमले के बाद भी हूतियों को निशाना बनाया है।

इन हमलों के बाद भी हूती यमन में अपना कब्जा जमाए हुए हैं। उनके खिलाफ जमीन पर वर्तमान में कोई बड़ी लड़ाई नहीं चल रही है, इसके चलते उन्हें यमन की सत्ता से नहीं हटाया जा सकता है। यमन में इससे पहले एक बार जमीन पर सेना भेजने का प्रयास भी फेल हो चुका है।



चढ़ावा हड़प लो, सोना पिघला दो, ब्याज छीन लो… तमिलनाडु में ‘विकास’ के नाम पर राज्य सरकार ऐंठ रही मंदिर की कमाई, मस्जिद-चर्च की आय पूछने वाला कोई नहीं

तमिलनाडु सरकार के मंदिरों के पैसों से कॉलेज खोलने की योजना पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। ‌अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (AIADMK) के महासचिव एडप्पादी के. पलानिस्वामी ने राज्य सरकार पर आरोप लगाया है कि हिंदू रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडोमेंट्स (Hindu Religious & Charitable Endowments) विभाग की ओर से मंदिरों में आने वाले दान को कॉलेजों के निर्माण में खर्च कर किया जा रहा है।

AIADMK महासचिव ने इसे धार्मिक निधि का दुरुपयोग बताते हुए सवाल किया कि क्या सरकार के पास खुद खर्च के लिए फंड नहीं हैं। इस मामले पर द्रविड़ मुन्नेत्र कड़गम (DMK) सरकार का कहना है कि ये कदम शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए और जनता के हित में उपयोग किया जा रहा है।

इस मामले पर बहस नई नहीं है। मंदिरों के प्रशासन पर सरकार का नियंत्रण और निधि का उपयोग एक लंबे समय से बहस का विषय रहा है। ये मामला नवंबर 2021 से शुरू हुआ था। DMK सरकार ने मंदिरों में चढ़ने वाले पैसे और सोना समेत हर तरह के दान की निधि से 4 कला और विज्ञान कॉलेज खोलने की योजना बनाई थी। विपक्षी दलों में इस पर तब भी विरोध किया था।

हालाँकि इस पर मद्रास हाई कोर्ट ने ये कहकर अंतरिम रोक लगा दी थी कि मंदिर का धन श्रद्धालुओं की ओर से धार्मिक आस्था के कारण दिया जाता है। साथ ही इसका उपयोग मंदिर के ट्रस्टियों की अनुमति के बिना भी नहीं किया जा सकता।

इसके बाद ताजा विवाद जुलाई 2025 में फिर सामने आया। AIADMK ने फिर आरोप लगाया कि तमिलनाडु सरकार मंदिरों के चढ़ावे को कालेजों के निर्माण में कर रही है। ये विवाद तब और सुलग गया जब अप्रैल 2025 को करुणानिधि स्मारक पर श्रीविल्लिपुत्तूर मंदिर के गोपुरम (मंदिर का ऊपरी हिस्सा) की छवि बनाई गई। BJP ने इसे हिंदू आस्था पर हमला कहा।

तमिलनाडु भाजपा के उपाध्यक्ष नारायणन तिरुपति ने सोशल मीडिया पर स्मारक की तस्वीर साझा की और लिखा कि यह अहंकार और मूर्खता की पराकाष्ठा है। हालाँकि इस पर भी DMK ने सफाई दी कि ये धार्मिक बयान के बजाय तमिलनाडु के राज्य प्रतीक का हिस्सा है। इस प्रतीक को 1949 में तत्कालीन सीएम ओमांदुर रामास्वामी रेड्डी के कार्यकाल में अपनाया गया था।

देश के सिर्फ 10 राज्यों में सरकार के नियंत्रण में 1,10,000 हिंदू मंदिर हैं। तमिलनाडु में मंदिरों के 4.78 लाख एकड़ भूमि, 36,425 मंदिर और 56 मठ सरकार के नियंत्रण में हैं। HR&CE विभाग 35,000 से अधिक मंदिरों का रखरखाव करता है। इन मंदिरों से मिलने वाली निधि का उपयोग अस्पतालों, अनाथालयों, शैक्षणिक संस्थानों और अन्य सामाजिक संस्थाओं के निर्माण और रखरखाव में किया जाता है।

इसी साल अप्रैल में रिपोर्ट्स सामने आईं कि सरकार की ओर से तमिलनाडु के 21 मंदिरों में श्रद्धालुओं द्वारा चढ़ाए गए सोने को पिघलाकर 24 कैरेट की छड़ों के रूप में बदलकर इन्हें बैंक में जमा कर दिया गया है। इसके जरिए निवेश से मिले ब्याज का उपयोग विकास कार्यों के लिए किया जाता है। इस निवेश से सरकार को हर साल लगभग 17.81 करोड़ रुपए का ब्याज मिल रहा है।

HR&CE ने विधानसभा में पेश एक नोट में कहा कि सरकार की इस योजना से मंदिरों को आर्थिक लाभ मिला है। इस विभाग को मिले फायदों को इस तरह से भी जाना जा सकता है कि जब जुलाई 2025 में AIADMK महासचिव ने मंदिर निधि के दुरुपयोग पर सवाल उठाए तो DMK के मंत्री पीके शेखरबाबू ने उन पर निशाना तो साधा ही पर साथ में ये भी बताया कि विभाग ने मंदिर धन का उपयोग करके 25 स्कूल, 9 कॉलेज और 1 पॉलिटेक्निक संस्थान स्थापित किया जा चुका है। इसके अलावा 19 अस्पताल भी स्थापित किए गए।

मंदिर और शिक्षण संस्थानों का इतिहास

अगर इतिहास की बात करें तो भारत में मंदिर केवल पूजा के लिहाज से ही अहम नहीं थे बल्कि शिक्षा और चिकित्सा का केंद्र हुआ करते थे। मंदिरों में ही गुरुकुल और शोध केंद्रों की भी स्थापना थी। बदलते समय के साथ मंदिरों का सरकारी नियंत्रण में रखरखाव किया जाने लगा और उनकी संपत्ति, भूमि और आय पर भी आधिपत्य कर दिया। इसके साथ ही मंदिरों को सिर्फ धार्मिक प्रयोजनों तक के लिए सीमित कर दिया गया।

अगर सरकारी तंत्र की बात की जाए तो इस बात को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि सिर्फ मंदिर ही सरकार के अधीन रखे गए हैं। किसी मस्जिद या चर्च को या उनकी संपत्ति को सरकार के न तो अधीन रखा गया और न ही सरकार का उन पर किसी भी तरह का नियंत्रण है।

मंदिर को ही सरकारी तंत्र में शामिल कर श्रद्धालुओं की ओर से धर्म के नाम पर दिए गए दान को सार्वजनिक उपयोग के लिए किया जा रहा है। इस लिहाज से ये धार्मिक असंतुलन के साथ हिंदुओं की आस्था के साथ भी दोगलापन है।

इस तरह के नीतिगत पक्षपात के लिए न केवल आवाज उठाना सही है बल्कि मंदिर के साथ सभी धार्मिक संस्थाओं के साथ एक जैसा व्यवहार सुनिश्चित करना भी जरूरी है।

अवैध ढाँचों के बाद ढोंगियों पर सख्त हुई उत्तराखंड की सरकार, ‘ऑपरेशन कालनेमि’ का CM पुष्कर सिंह धामी ने किया ऐलान: कहा- पहचान छिपा साधु-संत बन ठगने वालों पर होगी कार्रवाई

उत्तराखंड में अब सनातन के नाम पर ठगने वालों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान उत्तराखंड की सरकार चलाएगी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह विशेष अभियान चलाने का ऐलान किया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक एक्स (10 जुलाई, 2025) को एक ट्वीट में बताया, ” देवभूमि उत्तराखंड में सनातन धर्म की आड़ में लोगों को ठगने और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले छद्म भेषधारियों के खिलाफ ऑपरेशन कालनेमि शुरू करने के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।”

उन्होंने कहा, “प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ असामाजिक तत्व साधु-संतों का भेष धारण कर लोगों, विशेषकर महिलाओं को ठगने का कार्य कर रहे हैं। इससे न सिर्फ लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सनातन परंपरा की छवि को भी नुकसान पहुँच रहा है।”

CM धामी ने कहा है कि किसी भी धर्म का व्यक्ति यदि ऐसे कृत्य करता हुआ मिलता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार असुर कालनेमि ने साधु का भेष धारण कर भ्रमित करने का प्रयास किया था, उसी तरह आज भी कई कालनेमि सक्रिय हैं।

उत्तराखंड में इस अभियान के सहारे उन लोगों को तलाशा जाएगा जो साधु-संत या धर्मगुरु बन कर लोगों को ठगते हैं। कई मामलों में ऐसे लोग दूसरे मजहबों से भी होते हैं। अब उत्तराखंड में इनकी पकड़-धकड़ के लिए विशेष अभियान चलेगा।

CM धामी ने इससे पहले ऑपइंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम वो सब काम कर रहे है जो सनातन के लिए जरूरी हैं। उन्होंने इस दौरान बताया था कि राज्य में अब तक 6500 एकड़ की जमीन अवैध अतिक्रमण से मुक्त करवा चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया था कि राज्य के भीतर 500 से अधिक मजारों पर भी एक्शन लिया जाएगा।

ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह राज्य की डेमोग्राफी नहीं बदलने देंगे। इसी कड़ी में अब उन्होंने ऑपरेशन कालनेमि चालू किया है।

कालनेमि रामायण में वर्णित एक राक्षस था। उसे रावण ने बजरंग बली को मारने का काम सौंपा था। शक्ति बाण से मूर्क्षित लक्ष्मण को बचाने के लिए जिस समय बजरंग बली संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरि पर्वत जा रहे थे, तब हनुमान को रोकने के लिए रावण ने कालनेमि को भेजा था।

जिसके बाद कालनेमि ने एक मायावी साधु का वेश धारण कर बजरंग बली को भ्रमित करने की कोशिश की थी, हालाँकि भगवान हनुमान ने वहीं उसका वध कर दिया था।

देवबंद में मस्जिद के पास DJ बजाते हुए निकली दलित की बारात, मुस्लिम भीड़ ने लाठी-डंडे और धारदार हथियार से किया वार: कई बाराती घायल, असदज- इसरार-फहीम समेत 5 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के देवबंद इलाके में रविवार (6 जुलाई 2025) की रात दलित की बारात पर हमला किया गया। यह घटना तब हुई जब बारात एक मस्जिद के पास से डीजे बजाते हुए गुजर रही थी।

पुलिस के अनुसार, गाँव निवासी माँगे राम (कुछ रिपोर्ट के अनुसार नाम-नाथी राम) की दो बेटियों की शादी थी। एक बारात साधारणपुर गाँव से अमरपुर गढ़ी गाँव जा रही थी। रास्ते में मस्जिद के पास मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने डीजे की तेज आवाज का विरोध किया और कहा कि नमाज का समय है, इसलिए डीजे बंद किया जाए।

बारात वालों ने डीजे बंद करने से इनकार किया, जिसके बाद दोनों पक्षों में बहस हुई और मामला हिंसक हो गया। आरोप है कि मुस्लिम समुदाय के कुछ लोगों ने डीजे के उपकरण तोड़ दिए और बारातियों पर लाठी-डंडों और धारदार हथियारों से हमला कर दिया।

इस हमले में कई लोग घायल हुए, जिनमें पंकज और वंश नामक दो दलित युवक गंभीर रूप से जख्मी हो गए। उन्हें पहले देवबंद में प्राथमिक उपचार दिया गया, फिर मेरठ के अस्पताल में भर्ती कराया गया। पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

घटना के बाद दुल्हन के पिता माँगे राम ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने BNS की धाराओं 191(2), 115(2), 352, 189(4) और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है।

कार्रवाई करते हुए पुलिस ने पाँच आरोपितों मोहम्मद अबुजर, असजद, इसरार, सादिक और फहीम को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। चूँकि मामला दो समुदायों के बीच विवाद से जुड़ा है, इसलिए गाँव में तनाव की स्थिति को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया है।

किसी भी तरह की हिंसा को रोकने के लिए इलाके में नियमित गश्त की जा रही है। वरिष्ठ प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी मौके पर मौजूद हैं और स्थिति पर कड़ी नजर बनाए हुए हैं।

उन्होंने दोनों समुदायों से शांति और संयम बनाए रखने की अपील की है। अधिकारियों ने साफ किया है कि कानून-व्यवस्था में बाधा डालने या अफवाह फैलाने की किसी भी कोशिश पर सख्त कार्रवाई की जाएगी।

गाँ$ में बाँस कर देंगे, भूरा बाल साफ करो… बिहार में लौटा ‘लालू के जंगलराज’ वाला नारा, क्या चुनाव से पहले जातीय नरसंहारों की साजिश रच रही RJD?

बिहार में विधानसभा चुनाव को कुछ ही महीने शेष हैं। 2025 का अंत होते-होते नई सरकार बिहार में बन चुकी होगी। इस चुनाव की तैयारियाँ राजनीतिक दलों के साथ ही चुनाव आयोग तेजी से कर रहा है। इसी कड़ी में चुनाव आयोग वोटर लिस्ट को भी दुरुस्त कर रहा है।

विपक्षी पार्टियों को यह रास नहीं आया है। उन्होंने इसके विरोध में 9 जुलाई, 2025 को बिहार बंद बुलाया था। लेकिन चुनाव आयोग का यह विरोध RJD के गुंडाराज-जंगलराज की तैयारी और ‘भूरा बाल साफ़ करों’ जैसी धमकियों में बदल गया है।

बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया को राजद और कॉन्ग्रेस जैसी पार्टियों ने मुद्दा बनाया जबकि आमजन को कोई परेशानी नहीं थी। जब आम लोग चुनाव आयोग के खिलाफ नहीं हुए तो यह बीड़ा उन्होंने खुद ही उठा लिया और 9 जुलाई के बंद के दौरान हिंसा और धमकियों का दौर चालू कर दिया।

कहीं RJD कार्यकर्ताओं ने एम्बुलेंस रोकी तो कहीं खुले मंच से नरसंहार वाले नारों की धमकियाँ चालू कर दीं। राजद के गुंडों की यह हरकतें वापस जंगलराज की यादें ले आई और साथ ही वह डर भी ले आई, जिसने 40 सालों से बिहारियों के मन में घर बनाया हुआ है।

मंच से ऐलान- भूरा बाल साफ़ करो

इसी 9 जुलाई, 2025 को बिहार में गया जिले में वह नारा गूंजा, जिसने 1990 के दशक में जनता को भयाक्रांत रखा था। यह नारा है- भूरा बाल साफ़ करो। इसमें भू का मतलब भूमिहार, रा का मतलब राजपूत और बा का मतलब ब्राह्मण तथा ल का मतलब लाला (कायस्थ) था। इस नारे का अर्थ था कि इन जातियों के लोगों को खत्म कर दिया जाए।

बिहार के गया जिले में 9 जुलाई, 2025 को ही अतरी विधानसभा क्षेत्र में विधायक रंजीत यादव की मौजूदगी में मुनारिक यादव ने ‘भूरा बाल साफ़ करो’ का नारा बुलंद किया। मुनारिक यादव बोला, “शुरू में हमारे लालू जी बोले थे भूरा बाल साफ़ करो की बात किए थे।”

मुनारिक यादव ने इस नारे को दोहराने की बात की। इस दौरान मंच पर मौजूद नेता खीसें निपोरते रहे। यानी उन्हें इस नारे या उसके वापस आने से कोई दिक्कत नहीं थी। ना मुनारिक यादव को यह बोलने से रोका गया और ना ही इसका कोई खंडन किया गया। यानी कहीं ना कहीं वहाँ की जनता इस बात से राजी थी।

भूरा बाल साफ करो के इस नारे के मंच से ऐलान करना RJD कार्यकर्ताओं के बुलंद हौसलों और उनकी मनोस्थिति बताती है कि वह सत्ता पाकर क्या करना चाहते हैं।

एम्बुलेंस पर बोले- गा@ में बाँस कर देंगे

इसी 9 जुलाई के बंद में दरभंगा के धोई घाट में RJD कार्यकर्ताओं ने सड़क जाम की और एक एम्बुलेंस का रास्ता ब्लॉक कर दिया। RJD के कार्यकर्ताओं की गुंडई इस दौरान तब चरम पर दिखी जब उन्होंने एम्बुलेंस जाने देने की विनती पर धमकियाँ चालू कर दीं।

RJD के गुंडों ने एम्बुलेंस जाने देने की धमकी पर लड़ाई-झगड़ा किया और कैमरे पर हाथ मारा। एक गुंडे ने कहा, “गाँ#@ में बाँस कर देंगे, 90 वाला लहर आएगा तो नीचे पटक देंगे।” यानी RJD कार्यकर्ताओं को चुनाव चालू होने से पहले ही जंगलराज वाली खुमारी वापस चढ़ गई।

जनता को कीड़ा-मकोड़ा समझना और कुछ कहने पर धमकियाँ देना गुंडई की पहली निशानी है। RJD वालों ने यह साफ़ कर दिया कि उनकी सत्ता में लोगों का नीचे पटका जाना तय है। यह सब गुंडई चुनाव से महीनों पहले हो रही है और कैमरे के सामने हो रही है।

यानी RJD के लोग अगर साथ में हैं तो उन्हें ना क़ानून का डर है और ना ही उन्हें आमजन के साथ सिम्पथी है। अगर उनके राजनीतिक मास्टर ने एजेंडा दे दिया है तो चाहे एम्बुलेंस फँसे या फिर जातीय नरसंहार हो। उनका एजेंडा पूरा होना चाहिए।

मुहर्रम हिंसा भी इसी राजनीति का हिस्सा

बिहार में कटिहार, भागलपुर, दरभंगा समेत कई जगह पर मुहर्रम में हिंसा हुई। हिन्दू घरों और मंदिरों को निशाना बनाया गया। लेकिन यह हिंसा ऐसे समय में हुई जब लगभग 10 दिन पहले ही बिहार में एक रैली का आयोजन राजद और बाकी विपक्षी पार्टियों ने की थी। यह रैली वक्फ कानून का विरोध करने के नाम पर आयोजित की गई थी।

इस रैली में तेजस्वी यादव, पप्पू यादव समेत कॉन्ग्रेस और RJD के कई नेता शामिल हुए थे। इस रैली के दौरान भड़काऊ भाषण दिए गए थे। तेजस्वी यादव ने कहा था कि उनकी सरकार बनी तो वह वक्फ कानून कूड़े में फेंक देंगे और संसद, अदालत से लेकर सड़क तक मुस्लिमों के लिए उतरेंगे।

इस रैली के बहाने कवायद तो वोट बढ़ाने की थी लेकिन हौसलाअफजाई का रिजल्ट 10 दिन बाद ही दिखा और बिहार के कई जिले हिंसा की आग में झुलसे। इस पर भी राजद ने चुप्पी साध ली। ध्यान देने वाली बात है कि यह सब हिंसा चुनाव से ठीक पहले हो रही है।

ये गुंडई कोई खोखली हरकत नहीं

RJD के गुंडों की यह हरकतें कोई शक्ति प्रदर्शन भर नहीं है। भूरा बाल साफ़ करो का आह्वान दिखाता है कि वह भविष्य में क्या करने की इच्छा रखते हैं। इसी भूरा बाल साफ़ करो के नारे ने बिहार को 1980 और 1990 में जातीय हिंसा के नरक में झोक दिया था।

जब बिहार में 1980 और 1990 के दशक में भूरा बाल साफ़ करो का नारा गूंजा था तो बारां, डालेचक और सेनारी जैसे नरसंहार हुए थे। इन नरसंहारों में भूमिहार और राजपूत जातियों के 100 से अधिक लोग मार दिए गए थे। हत्यारे वो नक्सली थे जो कथित ‘सामाजिक न्याय’ चाहते थे।

तब ये सब कुछ भूरा बाल साफ़ करो के नाम पर हुआ था। आज वही नारा बिहार में वापस लगा है और कहा गया है कि ये वापस दुहराया जाएगा। भूरा बाल साफ़ करो के ऐलान और मुहर्रम में हुई हिंसा एक और बात बताती है। यह बताती है कि RJD के समीकरण का का कोर वोटर MY आजकल उत्तेजित है।

और इतिहास रहा है कि जब ये वोटर उत्तेजित हुआ है तो बिहार जंगलराज के दलदल में घुसा है। और जंगलराज अपने साथ पलायन, गरीबी और कुव्यवस्था का दौर लाता है।

भाजपा बोली- जनता हो जाए सावधान

ऑपइंडिया ने बिहार बंद के दौरान जातीय हिंसा के लिए लगाए जाने वाले नारों और जनता को परेशान करने की घटनाओं पर भाजपा OBC मोर्चा के राष्ट्रीय महामंत्री निखिल आनंद से बात की। उन्होंने कहा, “आरजेडी का चाल- चरित्र- चेहरा जगजाहिर है। धार्मिक तुष्टिकरण की आड़ में घोर मुस्लिमपरस्ती और जातिवादी कुंठा की अभिव्यक्ति करना ही राजद का मूल राजनीतिक चरित्र है।”

उन्होंने कहा, “बिहार बंद की आड़ में राजद ने जो विभिन्न जगहों पर तांडव किया, महिलाओं को अपमानित किया, बीमार लोगों की आवाजाही पर रोक लगाई और जातिगत आधार पर लोगों के साथ दबंगई और मारपीट की घटना को अंजाम दिया, उससे बिहार की जनता को सावधान होने की जरूरत है।”

महामंत्री निखिल आनंद ने कहा कि जब राजद का सत्ता के बाहर यह हाल है तो अगर ऐसे लोगों के हाथ में सत्ता आएगी तो किस तरीके से कानून व्यवस्था को ताक पर रखकर इनकी गुंडागर्दी चलेगी, यह समझा जा सकता है।

क्या चुनाव में ज्यादा हिंसा होगी इसका परिणाम?

बिहार ने 1990 से लेकर 2005 तक का वह दौर देखा है जब चुनाव का मतलब हिंसा हो गया था। तब बैलट बॉक्स लूटना, उसमे स्याही डाल देना, लाठी-डंडे और गोलियाँ चलना सामान्य बात सी हो गई थी। लालू प्रसाद यादव इसे ‘बोतल से जिन्न निकलने’ का नाम देते थे।

बिहार में चुनावी धांधली का यह हाल था कि 2005 आते-आते चुनाव आयोग को यहाँ शुचितापूर्ण चुनाव करवाने के लिए विशेष पर्यवेक्षक KJ राव को भेजना पड़ा था। इसके बाद चुनावी हिंसा पर लगाम लग पाई थी। और जैसे ही यह चुनावी हिंसा बंद हुई, वैसे ही बिहार में RJD का बोरिया बिस्तर भी बंध गया था।

तब से कुछ वर्ष को छोड़ दिया जाए तो RJD सत्ता में आने को तरस गई है। लोगों को वही भूरा बाल साफ़ करो और जंगलराज वाले दिन याद आते हैं। अब जब फिर से RJD नेताओं ने यही चालू किया है तो आगामी चुनाव में भी हिंसा के बादल मंडराने लगे हैं।

संभवतः इस बार के चुनाव फिर से एक हिंसक हों। बूथ पर लोगों को जाने ना देने, उनमें डर फ़ैलाने से लेकर कई ऐसी हरकतें हो सकती हैं जो चुनाव प्रभावित करें। चुनाव आयोग को इस बार फिर सतर्क रहना होगा।

जमीन पर लिटा ओढ़ा देते हैं कंबल, फिर गोली मार दिल के उड़ा देते हैं चिथड़े… क्या ऐसे ही निमिषा प्रिया को ‘मौत की सजा’ देगा यमन: क्या है केरल की नर्स का मामला, क्या होता है ‘ब्लड मनी’

केरल की नर्स निमिषा प्रिया को 16 जुलाई 2025 को यमन में मौत की सजा दी जाएगी। उन पर यमनी नागरिक तलाल अब्दो महदी की हत्या का आरोप है।

इस मामले में केंद्र सरकार से राजनयिक हस्तक्षेप की माँग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है। कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई के लिए 14 जुलाई 2025 की तारीख तय की है। निमिषा प्रिया इस समय यमन की राजधानी सना की सेंट्रल जेल में बंद हैं।

यमन में ‘मौत की सजा’ कैसे दी जाती है?

यमन में मौत की सजा गोली मारकर दी जाती है। यह तरीका सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसमें जिस व्यक्ति को सजा दी जानी होती है, उसे जमीन पर पेट के बल लेटाया जाता है और फिर कंबल से ढक दिया जाता है।

एक डॉक्टर पीछे से दिल के चारों ओर निशाना बनाता है, जहाँ गोली मारी जाती है। इसके बाद एक व्यक्ति ऑटोमैटिक राइफल से दिल में तीन-चार गोलियाँ मारता है।

यमन में मौत की सजा खुले में या निजी तौर पर भी दी जा सकती है। हालाँकि, पथराव या सिर कलम करने जैसे पुराने तरीके अब यमन में इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं।

‘ब्लड मनी’ क्या है?

इस्लामी कानून के मुताबिक, हत्या के मामलों में सजा के 2 विकल्प हैं- किसास और दिया। किसास का मतलब ‘जान के बदले जान’ और दिया यानी ब्लड मनी। इस्लामी कानून में ‘दिया’ यानी ब्लड मनी ऐसा प्रावधान है जो सुलह का अवसर प्रदान करता है।

शरिया कानून के अनुसार, हत्या के मामलों में पीड़ित परिवार को यह तय करने का अधिकार होता है कि वे हत्यारे को माफ करेंगे या सजा दिलाएँगे। कुरान के अनुसार, माफी और ब्लड मनी को न्याय और दया का माध्यम बताया गया है।

कुरान की सूरह अल-बकरा, आयत 178 में उल्लेख है: “मगर यदि हत्यारे को पीड़ित के संरक्षक द्वारा क्षमा कर दिया जाए, तो ब्लड मनी को न्यायपूर्वक तय किया जाए और सम्मानपूर्वक भुगतान किया जाए। यह तुम्हारे पालनहार की ओर से एक दया और सुविधा है।”

निमिषा प्रिया के मामले में ‘ब्लड मनी’ पर सहमति क्यों नहीं बनी

यमन और कई अन्य इस्लामी देशों में ब्लड मनी का भुगतान परिवारों के बीच आपसी सहमति से तय होता है। निमिषा प्रिया को बचाने के लिए उनके परिवार और कुछ संगठन ब्लड मनी इकट्ठा कर रहे हैं। वे मृतक तलाल के परिवार को पैसा देकर निमिषा को माफ करवाने की कोशिश कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, ब्लड मनी कारगर नहीं हो पा रही है क्योंकि, मृतक तलाल के परिवार ने अभी तक पैसा लेने पर सहमति नहीं जताई है। बता दें, कि बल्ड मनी की रकम 8 करोड़ हैं।

रकम के साथ मृतक तलाल के परिवार को एजुकेशन, मेडिकल के साथ कई अन्य सहयोग देने का भरोसा जताया है। लेकिन पीड़ित के परिवार ने पेशकश ठुकरा दी है।

निमिषा प्रिया का मामला

निमिषा प्रिया पर आरोप है कि उन्होंने 2017 में एक यमनी नागरिक ‘तलाल अब्दो महदी’ को नशीला इंजेक्शन दिया, जिससे उसकी मौत हो गई।

हालाँकि, निमिषा का कहना है कि तलाल के पास उनका पासपोर्ट था, जो वापस लेना चाहती थीं और उन्होंने उसे सिर्फ बेहोश करने की कोशिश की थी, मारने की नहीं।

मृतक तलाल के शव को टुकड़े-टुकड़े करके पानी की टंकी में डालने का भी आरोप है।

यमन की कोर्ट ने निमिषा को 2020 में मौत की सजा सुनाई थी। निमिषा प्रिया की आखिरी अपील को 2023 में यमन की सबसे बड़ी अदालत ने भी खारिज कर दिया था।

इसके बाद, जनवरी 2024 में यमन के हूती विद्रोहियों की सुप्रीम पॉलिटिकल काउंसिल ने भी उन्हें मौत की सजा देने की मंजूरी दे दी है।

बिहार पर सुप्रीम कोर्ट में ‘गैंग’ ने मुँह की खाई, वोटर वेरिफिकेशन पर रोक लगाने से इनकार: चुनाव आयोग से कहा- आधार, राशन कार्ड और वोटर ID को भी पहचान का प्रमाण मानें

बिहार में चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट रिवीजन प्रक्रिया को रोकने से इनकार कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह करना चुनाव आयोग का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया की टाइमिंग को लेकर प्रश्न उठाए हैं और कहा है कि वह आधार कार्ड और राशन कार्ड को भी दस्तावेज के तौर पर शामिल करने पर विचार करे।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमलय बांग्ला की एक बेंच ने गुरुवार (10 जुलाई, 2025) को इस मामले में दायर याचिकाओं की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के इस दावे को सिरे से खारिज किया कि चुनाव आयोग यह प्रक्रिया नहीं कर सकता है और उसके पास यह अधिकार नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोटर लिस्ट का रिवीजन करना चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ इस पूरी प्रक्रिया के खिलाफ कोई भी अंतरिम रोक लगाने से मना कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह इस मामले को 28 जुलाई को सुनेगा और तब तक चुनाव आयोग इस मामले में और जानकारियाँ कोर्ट के सामने रखे।

सुप्रीम कोर्ट ने इसी सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से कहा कि वह यह पूरी प्रक्रिया चुनाव से कुछ ही महीने पहले क्यों कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इसके अलावा चुनाव आयोग के आधार कार्ड के दस्तावेज के रूप में स्वीकार ना करने के फैसले पर भी प्रश्न उठाए हैं।

चुनाव आयोग से सुप्रीम कोर्ट ने पहचान के प्रमाण के रूप में आधार और राशन कार्ड को लेने पर विचार करने को कहा है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने तीन बातों पर चुनाव आयोग से जवाब दाखिल करने को कहा है। चुनाव आयोग की प्रक्रिया इस बीच चलती रहेगी।

गौरतलब है कि जून, 2024 से चुनाव आयोग ने बिहार के अंदर वोटर लिस्ट रिवाइज करने की कार्यवाही चालू की थी। इसे चुनाव आयोग ने SIR का नाम दिया था। चुनाव आयोग ने इसे 25 जुलाई तक पूरा करने का लक्ष्य रखा है।

इस फैसले को विपक्षी पार्टियों ने अघोषित NRC-CAA जैसा बताया है और दावा किया है कि इससे मुस्लिम वोट काटे जाने का प्रयास है। ADR, RJD और योगेन्द्र यादव समेत कई लोगों ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर यह प्रक्रिया रोकने को कहा था, इससे सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया है।

शशि थरूर ने दिलाई इमरजेंसी की याद, इंदिरा गाँधी को ‘तानाशाह’ बताते हुए कहा – लोकतंत्र को रौंदा गया: संजय गाँधी की क्रूरता पर भी लिखा, आज के भारत को बताया मजबूत

कॉन्ग्रेस सांसद शशि थरूर ने हाल ही में एक ओपिनियन लेख लिखा है, जिसमें उन्होंने इमरजेंसी के दौर और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की नीतियों की जमकर आलोचना की है। यह लेख प्रोजेक्ट सिंडिकेट में छपा है और इमरजेंसी की 50वीं वर्षगांठ पर आधारित है।

तिरुवनंतपुरम से कॉन्ग्रेस सांसद थरूर ने इस लेख में बताया है कि कैसे 1975 में लगाई गई इमरजेंसी ने भारत की लोकतंत्र की नींव हिला दी थी। उन्होंने इसे स्वतंत्रता के क्षरण का उदाहरण बताया और कहा कि आज का भारत 1975 वाले भारत से बहुत अलग है। लेकिन इमरजेंसी के सबक हमें हमेशा याद रखने चाहिए।

लेख की शुरुआत में थरूर ने 25 जून 1975 की उस रात का जिक्र किया, जब इमरजेंसी घोषित की गई थी। उन्होंने लिखा कि रेडियो पर सरकारी ऐलान आया और पूरे देश में मौलिक अधिकारों को निलंबित कर दिया गया। प्रेस पर सेंसरशिप लग गई, राजनीतिक विरोधियों को जेल में डाल दिया गया और असहमति की आवाजों को दबा दिया गया। थरूर खुद उस समय भारत में थे, लेकिन बाद में अमेरिका चले गए और वहाँ से इस दौर को देखते रहे। उन्होंने कहा कि इंदिरा गाँधी ने दावा किया था कि इमरजेंसी आंतरिक अव्यवस्था, बाहरी खतरों से निपटने और देश में अनुशासन लाने के लिए जरूरी थी। लेकिन हकीकत में यह लोकतंत्र पर हमला था।

थरूर ने न्यायपालिका की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने लिखा कि सुप्रीम कोर्ट ने दबाव में आकर हाबेअस कोर्पस के अधिकार को मान लिया, जिससे नागरिकों की स्वतंत्रता छिन गई। पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और विपक्षी नेताओं को जेल भेजा गया। उन्होंने अपने लेख में मानवाधिकारों के उल्लंघन की भयावह कहानियाँ बताई हैं। उन्होंने जेल में यातनाओं, गैर-कानूनी हत्याओं का उल्लेख किया, जो उस समय ज्यादा प्रचारित नहीं हुईं।

शशि थरूर के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

शशि थरूर ने लिखा है कि इमरजेंसी के नाम पर अनुशासन लाने की कोशिश में क्रूरता की हद पार हो गई। जैसे संजय गाँधी की अगुवाई में जबरदस्ती नसबंदी अभियान चलाया गया। यह गरीब और ग्रामीण इलाकों में ज्यादा केंद्रित था, जहाँ लक्ष्य पूरा करने के लिए हिंसा और दबाव का इस्तेमाल किया गया। शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों को बेरहमी से उजाड़ा गया, हजारों लोग बेघर हो गए। थरूर ने कहा कि ये सब ‘अतिरेक’ के रूप में बाद में खारिज किए गए, लेकिन ये अनियंत्रित सत्ता की तानाशाही के परिणाम थे।

उन्होंने आगे लिखा कि इमरजेंसी के दौरान कुछ समय के लिए व्यवस्था लगी दिखी, लेकिन यह लोकतंत्र की आत्मा की कीमत पर थी। असहमति को चुप कराना, बोलने, लिखने और एकत्र होने के अधिकारों को कुचलना और संवैधानिक मानदंडों की अवहेलना ने भारत की राजनीति पर गहरा घाव छोड़ा। न्यायपालिका ने बाद में खुद को सुधारा, लेकिन शुरुआती कमजोरी को भुलाया नहीं जा सकता। इमरजेंसी के बाद 1977 के चुनावों में जनता ने इंदिरा गाँधी और कॉन्ग्रेस को सत्ता से बाहर कर दिया, जो प्रभावित लोगों के गुस्से का नतीजा था।

थरूर ने इमरजेंसी से सीखने वाली बातें गिनाईं-

  • पहली – सूचना की स्वतंत्रता और स्वतंत्र प्रेस का महत्व। जब मीडिया दबाव में आता है, तो जनता नेताओं को जवाबदेह बनाने से वंचित रह जाती है।
  • दूसरी – न्यायपालिका की स्वतंत्रता जरूरी है, जो कार्यकारी शाखा के अतिरेक को रोक सके।
  • तीसरी और सबसे मौजूदा समय के लिए प्रासंगिक बात- एक ताकतवर कार्यकारी शाखा, जो बहुमत पर टिकी हो, लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती है, खासकर जब वह खुद को अचूक मानती हो और जाँच-पड़ताल की प्रक्रियाओं से बेचैन हो।

थरूर ने जोर दिया कि आज का भारत ज्यादा आत्मविश्वासी, समृद्ध और मजबूत लोकतंत्र है। लेकिन इमरजेंसी के सबक अभी भी प्रासंगिक हैं। हमें लोकतांत्रिक मूल्यों के सूक्ष्म क्षरण पर नजर रखनी चाहिए। क्या हम तानाशाही को पहचान और विरोध कर सकते हैं? थरूर ने अंत में कहा कि इमरजेंसी को सिर्फ इतिहास के काले अध्याय के रूप में नहीं, बल्कि सबक के रूप में याद रखें। लोकतंत्र को हल्के में न लें, इसे लगातार पोषित और बचाया जाना चाहिए।

यह लेख ऐसे समय आया है जब थरूर और कॉन्ग्रेस नेतृत्व के बीच मतभेद बढ़ रहे हैं। उन्होंने सरकारी नीतियों का कई बार समर्थन किया है, जो पार्टी लाइन से अलग है। बीजेपी ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि शशि थरूर ने कॉन्ग्रेस के इमरजेंसी का बचाव करने वाले यू-टर्न को समझ लिया है।

अब पूरी तरह से एंटी कॉन्ग्रेस हो गए थरूर?

बता दें कि जब भी कोई कॉन्ग्रेस नेता प्रो-इंडिया की बात करता है, जैसे शशि थरूर ने देश हित में दुनिया के कई देशों को ‘ऑपरेशन सिंदूर’ की जानकारी देने वाले सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया, तो कॉन्ग्रेस पार्टी में उन पर उँगलियाँ उठी। और अब उन्होंने इमरजेंसी की आलोचना करके लोकतंत्र की रक्षा पर जोर दिया है। ऐसे में ये सब कुछ ऑटोमैटिकली एंटी-कॉन्ग्रेस हो जाता है। क्योंकि पार्टी का इतिहास और वर्तमान नेतृत्व अक्सर पुरानी गलतियों का बचाव करता है, जबकि देशहित में बोलने वाले को विद्रोही ठहराया जाता है। यह दिखाता है कि पार्टी में सच्ची लोकतांत्रिक बहस की कमी है।

पूरे देश में ‘बिहार मॉडल’ लागू करेगा चुनाव आयोग, हर एक घुसपैठिया वोटर लिस्ट से होगा बाहर: बोले मुख्य चुनाव आयुक्त- असम-बंगाल में भी 11 दस्तावेजों से होगी जाँच

बिहार में वोटर्स की लिस्ट की जाँच के बाद, अब यही काम पश्चिम बंगाल और असम में होगा। मुख्य चुनाव आयोग यहाँ के मतदाता सूची की लिस्ट को बहुत ध्यान से देखेगा। मुख्य चुनाव आयोग इस अभियान के जरिए यह सुनिश्चित करना चाहता है कि कोई भी गैर-भारतीय मतदाता सूची में शामिल न हो।

यह कदम ऐसे समय में उठाया जा रहा है, जब इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी पर पहले से ही राजनीति गरमाई हुई है।

घर-घर जाकर होगी जाँच

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि मतदाता सूची की यह गहन समीक्षा देश के हर राज्य में की जाएगी। इसमें घर-घर जाकर मतदाताओं की पुष्टि की जाएगी।

बिहार में चुनाव के बाद, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुद्दुचेरी में यह अभियान चलाया जाएगा, जहाँ 2026 में विधानसभा चुनाव होने हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले सभी राज्यों की मतदाता सूचियों की विशेष गहन समीक्षा पूरी करने की योजना है।

हालाँकि, विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नागरिकता तय करना सरकार का काम है, ना कि चुनाव आयोग का।

विपक्षी दल यह भी तर्क दे रहे हैं कि बिहार में ज्यादातर लोगों के पास आधार या राशन कार्ड जैसे दस्तावेज ही हैं। लेकिन चुनाव आयोग ने 11 विशिष्ट दस्तावेजों की सूची जारी की है, जिनमें ये शामिल नहीं हैं।

सुप्रीम कोर्ट में भी इस अभियान के खिलाफ याचिकाएँ दाखिल की गई हैं।

क्यों खास हैं बंगाल और असम?

यह अभियान पश्चिम बंगाल और असम में खास तौर पर महत्वपूर्ण है। इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी को लेकर लंबे समय से राजनीतिक विवाद रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि इन राज्यों में मतदाता सूची में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शामिल हो सकते हैं जो भारतीय नागरिक नहीं हैं।

चुनाव आयोग का यह अभियान घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करने में मदद कर सकता है।

आधार कार्ड और नागरिकता का सवाल

चुनाव आयोग ने मतदाता सूची की समीक्षा के लिए 11 दस्तावेजों की सूची जारी की है, लेकिन इसमें आधार कार्ड, पैन और ड्राइविंग लाइसेंस शामिल नहीं हैं।

इसका कारण यह है कि ये दस्तावेज पहचान का प्रमाण तो हैं, लेकिन नागरिकता का नहीं।

हालाँकि, फॉर्म 6 (नए वोटर बनने के लिए) में आधार का इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे यह सवाल उठता है कि अगर आधार नागरिकता का प्रमाण नहीं है तो इसे क्यों स्वीकार किया जाता है।

पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि आधार का इस्तेमाल गैर-नागरिकों को मतदाता सूची में शामिल होने का मौका दे सकता है।

आगे की राह

वोटर लिस्ट का गहन रिवीजन जरूरी है ताकि मतदान के लिए पहले से रजिस्टर्ड लोगों की प्रामाणिकता की पुष्टि की जा सके। भारत जैसे देश में अवैध इमीग्रेशन एक बड़ी समस्या है। इसलिए वोटर रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया में ढिलाई नहीं बरती जा सकती।

विशेषज्ञों का मानना है कि पहली बार मतदाता बनने वालों के लिए सिर्फ घोषणा ही नहीं, बल्कि नागरिकता का प्रमाण भी अनिवार्य होना चाहिए।

कोरोना वैक्सीन का हार्ट अटैक से कोई लेना-देना नहीं… रिसर्च में खुलासा, वामपंथी मीडिया ‘द प्रिंट’ ने झूठ फैलाया: मौतों के पैटर्न पर दे रहे थे ज्ञान, फैक्ट चेक में पोल खुली

द प्रिंट ने मंगलवार (8 जुलाई 2025) को रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें दावा किया गया कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) और INCLEN इंटरनेशनल मिलकर 45 वर्ष से कम उम्र के लोगों में कोविड-19 महामारी के पश्चात अचानक मौतों में किसी पैटर्न की जाँच कर रहे हैं।

इस खबर में बताया गया कि यह राष्ट्रीय स्तर पर एक सामुदायिक अध्ययन होगा, जिसका उद्देश्य अचानक हो रही मौतों की जानकारी रखना और उनके जोखिम के कारकों के बारे में पता करना था।

द प्रिंट द्वारा प्रकाशित समाचार लेख का स्क्रीनशॉट

हालाँकि, द प्रिंट की यह रिपोर्ट पूरी तरह झूठी निकली। PIB ने सरकार की ओर से जारी की गई जानकारी में इस तरह के किसी भी अध्ययन से इंकार कर दिया। इसमें कहा गया कि ICMR और AIIMS ने विस्तृत रूप से डेटा के आधार पर अध्ययन किया है। इसमें पाया गया है कि कोविड-19 टीकाकरण युवाओं में अचानक मौतों का जोखिम नहीं बढ़ाता बल्कि जोखिम को कम करता है।

जानकारी में ये बात भी शामिल की गई कि हार्ट अटैक और अचानक होने वाली मौतों के असली कारणों में जन्मजात बीमारियाँ, निष्क्रिय जीवनशैली और हृदय-रोग जैसे प्राकृतिक कारक शामिल हैं, न कि कोविड-19 के बचाव में लगाई गई वैक्सीन।

PIB ने द प्रिंट के झूठ को सोशल मीडिया पर भी उजागर किया। उसका खबर को एक्स प्लेटफॉर्म पर साझा कर PIB ने खबर को भ्रामक कहा है।

PIB ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर पोस्ट करते हुए कहा, “@ThePrintIndia की खबर में दावा किया गया है कि केंद्र सरकार ने देशभर में अचानक हो रही मौतों के पैटर्न का आकलन करने के लिए एक राष्ट्रीय स्तर का अध्ययन शुरू किया है, लेकिन यह दावा गलत है। न तो केंद्र सरकार और न ही @DeptHealthRes (DHR) ने ऐसा कोई सर्वे शुरू किया है।”

अचानक हुई मौतों को कोविड वैक्सीन से जोड़ने का दावा

कोरोना महामारी आने के बाद उसके बचाव में टीकाकरण अभियान चलाया गया। हालाँकि इसके बाद कुछ वर्षों से सोशल मीडिया पर यह दावा किया जा रहा है कि दिल के दौरे से होने वाली अचानक मौतें कोविड-19 वैक्सीन की वजह से हो रही हैं। लेकिन केंद्र सरकार ने हाल ही में ऐसे सभी दावों को गलत बताया है।

सरकार ने यह बात ICMR और AIIMS द्वारा किए गए दो बड़े अध्ययनों के आधार पर कही है। इन अध्ययनों में साफ तौर पर पाया गया कि कोविड-19 टीके और दिल के दौरे से होने वाली अचानक मौतों के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है।

इसके अलावा ICMR और NCDC (राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र) द्वारा किए गए अध्ययन में यह भी साबित हुआ कि भारत में कोविड-19 के टीके सुरक्षित और असरदार हैं। गंभीर साइड इफेक्ट्स के मामले बहुत ही कम हैं।

ICMR और NCDC ने 18 से 45 साल की उम्र के लोगों में अचानक होने वाली मौतों को समझने के लिए 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 47 बड़े अस्पतालों में एक अध्ययन किया।

इसके साथ ही AIIMS ने ICMR के सहयोग से एक और अध्ययन किया जिसमें पाया गया कि अचानक दिल से जुड़ी मौतों के पीछे जेनेटिक कारण है, साथ ही पहले से मौजूद बीमारियाँ और खराब जीवनशैली जैसे कारण भी हैं, न कि कोविड-19 वैक्सीन। विशेषज्ञों का कहना है कि वैक्सीन को इन मौतों से जोड़ना गलत और भ्रामक है।

प्रोपेगेंडा को फैलाकर भले ही द प्रिंट ने अपनी खबर को बेचने की कोशिश की हो लेकिन वह गलत साबित हो गया। हालाँकि इन भ्रामक खबरों से सबसे अधिक नुकसान आम लोगों का होता है क्योंकि वे इस तरह की खबरों पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं।