विमान दुर्घटना जांच ब्यूरो (एएआईबी) ने अपनी प्रारंभिक रिपोर्ट में खुलासा किया है कि 12 जून को अहमदाबाद में हुई एयर इंडिया दुर्घटना की कॉकपिट वॉयस रिकॉर्डिंग में इंजन फेल होने के दौरान दोनों पायलटों के बीच छोटी लेकिन अहम बातचीत रिकॉर्ड हुई है।
कॉकपिट की बातचीत में अहम खुलासा
15 पन्नों की रिपोर्ट में बताया गया है कि कॉकपिट में एक पायलट ने दूसरे से कहा, “आपने ईंधन क्यों बंद कर दिया?” जिस पर दूसरे ने जवाब दिया, “मैंने ऐसा नहीं किया।” यह बातचीत उस समय हुई जब दोनों इंजन ईंधन कटऑफ स्विच 13:38:42 IST (08:08:42 UTC) पर ‘रन’ से ‘कटऑफ’ में बदल गए। इस वक्त बोइंग 787-8 ड्रीमलाइनर 180 नॉट्स की तेज रफ्तार में पहुँच चुका था।
Air India acknowledges receipt of the preliminary report released by the Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) today, 12 July 2025. It is working closely with stakeholders, including regulators and continues to fully cooperate with the AAIB and other authorities as their… pic.twitter.com/WpoFbMhYrd
रिपोर्ट में कहा गया है कि इंजन 1 का स्विच 13:38:52 IST (08:08:52 UTC) पर वापस ‘रन’ पर चला गया। उसके बाद इंजन 2 का स्विच 13:38:56 IST (08:08:56 UTC) पर चला। इंजन और एयरक्राफ्ट फ़्लाइट रिकॉर्डर (EAFR) ने दोनों इंजनों के एग्जॉस्ट गैस तापमान (EGT) में वृद्धि के के संकेत दिए।
इंजन 1 का कोर रुक गया और फिर उसमें गति आने लगी। हालाँकि बार-बार ईंधन1 बंद और चल रहा था। वहीं इंजन 2 बंद होने के बाद चल नहीं पाया। दोनों इंजनों के काम नहीं करने पर विमान नीचे गिर गया।
MAY DAY का कॉल पायलट की तरफ से 08:09:05 UTC पर आया यानी दुर्घटना के चंद सैकेंड पहले। हालाँकि विमान नॉर्मल टेकऑफ की तरह की उड़ान भरा था लेकिन चंद सेकेंड के बाद ही उसमें गड़बड़ी आ गयी।
बोइंग के खिलाफ कार्रवाई नहीं होगी अभी
प्रारंभिक रिपोर्ट में फिलहाल बोइंग कंपनी और इंजन बनाने वाली इलेक्ट्रिक जनरल यानी जेई के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश नहीं की गई है । सुरक्षा जाँच में अभी गड़बड़ी के संकेत नहीं मिले हैं। हालाँकि रिपोर्ट में आगे कहा गया है, ” सबूत माँगे जा रहे हैं और उनकी जाँच की जाएगी।”
एएआईबी ने कहा, “दोनों इंजनों को मलबे वाली जगह से बरामद कर लिया गया था जिसे अलग से जाँच के लिए रखा गया है। इसके अलावा विमान के अहम कलपुर्जे की पहचान करके आगे की जाँच के लिए अलग रखा गया है।”
एएआईबी ने आगे बताया कि ड्रोन फोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी सहित मलबे वाली जगह पर जाँच का काम पूरा हो गया है और मलबे को एक सुरक्षित स्थान पर ले जाया गया है।
तकनीकी पहलू की जाँच की गई
रिपोर्ट में उन तकनीकी चीजों का सिलसिलेवार तरीके से ज़िक्र किया गया है जो विमान के उड़ान के बाद कुछ सेकेंड में घटित हुईं। ये विमान अहमदाबाद से लंदन गैटविक के लिए अहमदाबाद हवाई अड्डे से उड़ान भरा था लेकिन कुछ सेकेंड बाद ही बी जे मेडिकल कॉलेज के होस्टल पर गिर गया। इस दुर्घटना में 260 लोग मारे गए।
इनमें 241 यात्री और चालक दल के सदस्य शामिल हैं जबकि हॉस्टल में मेडिकल कॉलेज के कई छात्रों समेत 19 अन्य लोग भी अपनी जान गँवा बैठे। इस हादसे में एक यात्री की जान बच गई। ये विमान हादसा भारत की सबसे भयानक विमान दुर्घटनाओं में एक माना जाता है।
इस फ्लाइट के दो पायलट कैप्टन सुमीत सभरवाल और क्लाइव कुंदर थे। 56 वर्षीय कैप्टन सभरवाल एक बेहद अनुभवी पायलट थे, जिनके पास 15,600 घंटों से ज़्यादा उड़ान भरने का अनुभव था।
वहीं 32 वर्षीय कुंदर के पास 3,400 से ज़्यादा घंटों तक उड़ान भरने का अनुभव था । दोनों के पास बोइंग 787 उड़ाने का लाइसेंस और योग्यता दोनों था।
12 जून, 2025 को गुजरात के अहमदाबाद में हुए एअर इंडिया विमान हादसे का दोष पायलटों पर डालने का प्रयास चालू हो गया है। जाँच रिपोर्ट सामने आने से पहले ही AI 171 फ्लाइट हादसे का आधार पायलट की कथित गलती को विदेशी मीडिया ने बना दिया। जबकि जाँच रिपोर्ट में यह बात स्पष्ट रूप से नहीं कही गई।
इस मामले में मीडिया ने विमान निर्माता कंपनी बोइंग को भी क्लीन चिट देने का प्रयास है, जिसका बनाया 787-8 ड्रीमलाइनर 242 लोगों के साथ क्रैश हुआ था। यह कोई पहला मौका नहीं है जब किसी विमान हादसे के बाद बोइंग ने पायलटों के सिर पर दोष मढ़ने का प्रयास किया हो।
वॉल स्ट्रीट जनरल ने पायलटों को बनाया ‘विलेन’
अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जनरल ने गुरुवार (10 जुलाई,2025) को इसी संबंध में एक खबर प्रकाशित की है। इस खबर में दावा किया गया है कि जाँचकर्ता अब एअर इंडिया हादसे की जाँच इंजन या अन्य फेलियर के एंगल से नहीं परंतु पायलटों की ‘भूल’ के एंगल से कर रहे हैं।
वॉल स्ट्रीट जनरल ने यह रिपोर्ट अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से लिखी है, जिनका नाम नहीं दिया गया है। पायलटों को कठघरे में खड़े करने वाली यह रिपोर्ट पूरी तरह से ‘सूत्रों के हवाले से’ लिखी गई है। इसमें ना किसी अमेरिकी और ना ही एअर इंडिया के अधिकारियों का नाम दिया गया है।
वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट कहती है कि जाँच का दायरा काल कवलित हुई फ्लाइट के पायलटों कैप्टन सुमीत सभरवाल और फर्स्ट ऑफिसर क्लाइव कुंदर के कथित तौर पर विमान के दोनों इंजनों के फ्यूल स्विच एक साथ बंद किए जाने को लेकर है। रिपोर्ट में दावा है कि इनके बंद होने से विमान उठ नहीं पाया और उड़ान भरते ही एक इमारत से जा टकराया।
वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट में कहा गया है, “इन लोगों ने बताया कि उड़ान के दौरान ये स्विच सामान्यतः चालू रहते हैं, और यह स्पष्ट नहीं है कि इन्हें कैसे या क्यों बंद किया गया। लोगों ने यह भी बताया कि यह स्पष्ट नहीं है कि यह गलती से हुआ था या जानबूझकर, या इन्हें वापस चालू करने की कोशिश की गई थी।”
इस रिपोर्ट में सधे शब्दों के साथ यह स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है कि विमान असल में पायलट की ही भूल के चलते हादसे का शिकार हुए है। रिपोर्ट के पहले हिस्से में ही यह दावा कर दिया गया है कि बोइंग का 787 ड्रीमलाइनर एकदम सुरक्षित है और उसको लेकर जाँच की कोई तलवार नहीं लटक रही।
जबकि AAIB की रिपोर्ट में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि इंजन फ्यूल स्विच बंद हुए थे और कुछ सेकंड के बीच चालू भी हो गए थे। इस बीच पायलटों के बीच बातचीत भी हुई थी। जिसमे दूसरे पायलट ने पहले से इनकार किया था कि उसने इस स्विच के साथ कोई छेड़छाड़ की है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि स्विच वापस ऑन करने के बाद भी एक ही इंजन चालू हुआ था। दूसरा तब भी नहीं चालू हो पाया। संभव है किसी तकनीकी सस्या की वजह से फ्यूल स्विच बंद हुए हों।
विदेशी मीडिया में एक साथ सामने आए दावे
वॉल स्ट्रीट जनरल की यह रिपोर्ट भारत में विमान हादसे की जाँच कर रही एजेंसी AAIB (एयरक्राफ्ट एक्सीडेंट इन्वेस्टीगेशन ब्यूरो) की रिपोर्ट के सामने आने से पहले आई है। AAIB के इस मामले में रिपोर्ट सार्वजनिक करने की तारीख शुक्रवार (11 जुलाई 2025) बताई गई थी। इसे 12 जुलाई की सुबह रिलीज किया गया।
एअर इंडिया की फ्लाइट AI 171 हादसे को लेकर केवल वॉल स्ट्रीट जनरल ने ही ऐसी रिपोर्ट नहीं प्रकाशित की है। AAIB की रिपोर्ट आने के कुछ दिनों पहले से संगठित रूप से वही मीडिया पोर्टल ऐसे दावे कर रहे हैं, जो लगातार भारत विरोधी प्रोपेगेंडा करते पकड़े गए हैं।
वॉल स्ट्रीट जनरल के अलावा ब्लूमबर्ग, रॉयटर्स, ABC न्यूज और विमानन पर रिपोर्ट करने वाली वेबसाइट एयर करेंट ने भी विमान हादसे का कारण इंजन को ईंधन पहुंचाने वाले फ्यूल स्विच के गलती से बंद होना बताने का प्रयास किया है। इन सभी मीडिया पोर्टल में यह खबरें 8 जुलाई से 10 जुलाई के बीच प्रकाशित हुई हैं।
विदेशी मीडिया में एक साथ ‘पायलट की गलती’ की बात को रेखांकित किया गया है
इनमें से एयर करेंट वेबसाइट ने तो विमान निर्माता बोइंग और उसके विमान 787 ड्रीमलाइनर के साथ ही उसके इंजन को भी बचाना चालू कर दिया है। एयर करेंट ने इस विमान के लिए इंजन सप्लाई करने वाले जनरल इलेक्ट्रिक के इंजन मॉडल को भी दोषमुक्त करार दे दिया है।
बोइंग को ‘बचाने’ के हो रहे प्रयास?
एअर इंडिया हादसे को लेकर विदेशी मीडिया में एक साथ खबरें आना असमान्य सा लगता है। यह बात अगर किसी जाँच रिपोर्ट के हवाले से कही जाती तो मानी भी जा सकती थी। जाँच रिपोर्ट में कहीं स्पष्ट रूप से नहीं लिखा कि पायलटों ने स्विच बंद किया था। उसमे केवल स्विच बंद होने की बात है।
इससे प्रश्न उठता है कि कहीं बोइंग इस मामले में पायलटों को दोषी ठहरा अपनी जिम्मेदारी से बचना तो नहीं चाह रही और इसी के लिए एक साथ ऐसी खबरें सामने आई हों। यह आशंका निराधार भी नहीं है, इससे पहले बोइंग कई हादसों में पायलटों के ऊपर दोष डाल चुकी है।
बाद में हुई जाँच में बोइंग की ही गड़बड़ियां सामने आई हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण वर्ष 2019 और 2020 में हुए 737 मैक्स विमान के हादसे हैं। यह हादसे इंडोनेशिया की लायन एयर और इथियोपिया की इथियोपियन एयरलाइंस के विमानों के साथ हुए थे।
इथियोपियन एयर का 737 मैक्स उड़ने के कुछ ही मिनटों के बाद क्रैश हो गया था (फोटो साभार: UPI)
इन हादसों में 346 लोग मारे गए थे। इन हादसों के बाद न्यू यॉर्क टाइम्स के साथ एक बातचीत में बोइंग के CEO डेविड कोल्हान ने कहा था,”वहाँ (एशिया और अफ्रीका) के पायलटों का अनुभव, अमेरिकी पायलटों के मुकाबले कहीं नहीं ठहरता।”
उन्होंने सीधे तौर पर पायलटों को कम अनुभव वाला और हादसे के लिए जिम्मेदार ठहराने का प्रयास किया था। इन्हीं हादसों को लेकर डेविड कोल्हान से पहले बोइंग के CEO रहे डेनिस मुलिनबर्ग ने भी ऐसी ही टिप्पणी की थी।
उन्होंने हादसों के बाद अमेरिकी संसद के सामने कहा था कि उनके विमान (737 मैक्स) एकदम ठीक थे लेकिन पायलटों ने सारे कदम नहीं उठाए, जिसके चलते विमान हादसे का शिकार हो गए। इन दोनों की बातें आगे चलकर एकदम झूठ साबित हुई थीं।
यह दोनों विमान हादसे बोइंग की ही एक गलती के चलते हुए थे। बोइंग ने अपने 737 मैक्स में MCAS नाम का एक सॉफ्टवेयर लगाया था जो विमान के आगे के हिस्से को अधिक ऊपर उठने से रोकता था। इसके विषय में बोइंग ने पायलटों को नहीं बताया था। यह सॉफ्टवेयर खुद ही काम करता था।
बोइंग के पायलटों को इस विषय में ना बताने के पीछे कारण था कि यह विमान खरीदने वाली एयरलाइंस को उन्हें ट्रेनिंग देनी पड़ती जो बड़ा खर्च होता। इसके अलावा इस सिस्टम का प्रमाणन भी बोइंग को करवाना पड़ता, यह भी एक खर्चीली प्रक्रिया है।
बोइंग की बेइमानी का परिणाम यह हुआ कि यह दोनों हादसे हो गए। इन दोनों हादसे में विमान के उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद वह नीचे की तरफ गोते खाने लगा और अंत में जाकर क्रैश हो गया। इसके पीछे कारण था कि MCAS सॉफ्टवेयर लगातार इन दोनों में विमानों को नीचे की तरफ दबाता रहा और पायलट चाह कर भी कुछ नहीं कर पाए।
बोइंग ने पहले तो अपनी गलती स्वीकार ही नहीं की और इन दोनों एयरलाइंस के पायलट पर ही दोष मढ़ दिया। बाद में हुई जाँच में सच्चाई खुली और बोइंग को लगभग ₹20 हजार करोड़ का जुर्माना झेलना पड़ा था और MCAS में गड़बड़ी की बात भी स्वीकार करनी पड़ी थी।
इससे पहले भी पायलटों को बदनाम कर चुकी बोइंग
737 मैक्स से जुड़े हादसों के अलावा इससे पहले भी बोइंग का यह रवैया रहा है कि खुद को बचाने के लिए तुरंत पायलटों को निशाना बनाओ। वर्ष 2009 में टर्किश एयरलाइन का एक विमान भी ऐसे ही हादसे का शिकार बना था, जब बोइंग ने पायलटों को निशाना बनाया था।
25 फरवरी, 2009 को टर्किश एयरलाइन का एक विमान एम्स्टर्डम एयरपोर्ट पर उतरते समय हादसे का शिकार हो गया था और इसमें 9 लोगों की मौत हो गई थी। हादसे में 120 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह हादसा बोइंग के बनाए 737-800 विमान के साथ हुआ था।
एम्सटर्डम के रनवे पर तुर्की का विमान हादसे का शिकार हुआ था (फोटो साभार: FAA US Gov)
हादसे की जाँच में सामने आया था कि इस विमान को ऊँचाई का डाटा देने वाला उपकरण (अल्टीमीटर) गड़बड़ कर गया था। इसने विमान के 2000 फीट ऊंचाई पर होने के बावजूद सिस्टम को यह डेटा दिया कि वह नीचे उतर चुका है और लैंडिंग के आखिरी चरणों में हैं।
इसके चलते विमान के ऑटो थ्रोटल सिस्टम ने उसके इंजन को लगभग बंद कर दिया। हालांकि विमान तब भी ठीकठाक ऊंचाई पर था। इस गड़बड़ी के चलते विमान सीधा एयरपोर्ट पर आकर गिरा और कई टुकड़ों में बंट गया। बाद में सामने आया कि यह गड़बड़ी बोइंग के सिस्टम की थी और कॉकपिट में मौजूद पायलटों को इस गड़बड़ी को पहचानने में देरी हो गई थी।
इस मामले में भी पश्चिमी देशों की प्रेस ने यही खबरें चलाई थीं कि पायलटों को भूल से ही यह हादसा हुआ है। हालांकि बाद में हुई जाँच में असल कारण सामने आए थे और बोइंग को इसके बाद एक्शन भी लेना पड़ा था। इसी तरह की कहानी जुलाई 2013 सैन फ्रांसिस्को के एक विमान हादसे में हुई थी।
दक्षिण कोरिया की एशियाना एयरलाइन का एक बोइंग 777 विमान इस एयरपोर्ट पर हादसे का शिकार हो गया था। यह विमान कम स्पीड के चलते एक दीवाल में जा टकराया था और इसका बड़ा हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था। इस हादसे में तीन लोगों की मौत हुई थी।
जाँच में सामने आया था कि इसमें भी विमान की लैंडिंग के समय स्पीड घट गई थी। पायलटों ने इस पर ध्यान नहीं दिया था। बोइंग ने यह कह कर बचने का प्रयास किया था कि पायलट सही से सीखे नहीं हुए थे। जबकि असल बात यह थी कि विमान के तकनीक इतनी ज्यादा थी कि पायलट कुछ समझ नहीं पाए। एयरलाइन ने भी तकनीक में गड़बड़ी को समस्या बताया था।
पुरानी स्क्रिप्ट फिर चलाई जा रही
स्पष्ट है कि बोइंग कभी भी बिना दबाव के अपनी गलती मानने को तैयार नहीं हुई है। एअर इंडिया हादसे के मामले में भी कुछ ऐसा ही प्रयास चल रहा है। इस मामले में पायलटों को दोषी ठहराना और भी आसान है क्योंकि दुखद तौर पर वह अपनी सफाई पेश करने के लिए इस संसार में मौजूद ही नहीं हैं।
बोइंग अपने आप को इसलिए भी बचा रही है कि अगर उसकी गलती इस मामले में निकली तो एक तो 787 ड्रीमलाइनर का अब तक का सुरक्षित विमान होने का रिकॉर्ड टूट जाएगा और दुनिया भर में उसके व्यापार पर बड़ा फर्क पड़ेगा।
इसके अलावा उसका दोष निकलने पर उसे बड़ी मात्रा में मुआवजे तक देने पड़ सकते हैं। ऐसे में वह पहले ही पायलटों के खिलाफ दुष्प्रचार अभियान चला कर अपने को बचाने के प्रयास कर रही हो, यह आशंका है। अमेरिकी और पश्चिमी देशों की मीडिया एजेंसी में एक जैसी खबरें आना इसी का संकेत लगती हैं।
पायलटों को दोषी ठहराने के अलावा भी बोइंग कोई दूध की धुली नहीं है और उसके खिलाफ गड़बड़ी का बड़ा इतिहास है। चाहे अमेरिकी वायु सेना के लिए टैंकर डील हो या फिर एयरबस से प्रतियोगिता, वह हर बार अपने प्रभाव का इस्तेमाल करती आई है।
अब इस मामले में AAIB और बाकी जाँच एजेंसियों की रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा कि हादसे की असल वजह क्या थी और इसके लिए बोइंग दोषी है या पायलटों की चूक वाली बात ऐसे ही फैलाई जा रही है।
अहमदाबाद हादसे में क्या हुआ
12 जून, 2025 को अहमदाबाद से लंदन के लिए उड़ी एअर इंडिया की फ्लाइट AI 171 हादसे का शिकार हो गई थी। यह हादसा बोइंग निर्मित 787-8 ड्रीमलाइनर विमान के साथ हुआ था। इस हादसे में विमान में सवार 241 लोग मारे गए थे, जिनमें दोनों पायलट और क्रू भी शामिल थे।
अहमदाबाद में क्रैश हुआ एअर इंडिया का विमान एक होस्टल में जा घुसा था (फोटो साभार: Narendra Modi/X)
यह हादसा दोपहर लगभग 1:40 मिनट पर हुआ था। यह विमान उड़ान भरने के साथ ही हादसे का शिकार हो गया था। यह विमान जहां टकराया था वहां भी लोग मारे गए थे। हादसे के बाद घटनास्थल का दौरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी किया था।
एंटी-टेररिस्ट स्क्वॉड (ATS) की गिरफ्त में आए जलालुद्दीन उर्फ छांगुर पीर के मंसूबे बहुत खतरनाक थे। जाँच में पता चला है कि छांगुर पीर अवैध धर्मांतरण के लिए ईसाई मिशनरियों की मदद लेता था। इसके अलावा छांगुर पीर के ISI कनेक्शन भी सामने आए है।
मिशनरियों से मदद
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, छांगुर पीर ने अवैध धर्मांतरण के लिए एक पूरा नेटवर्क बना रखा था। छांगुर पीर के संबंध नेपाल सीमा से सटे 7 जिलों में सक्रिय कुछ ईसाई मिशनरियों से थे।
इन मिशनरियों के वालंटियरों को छांगुर पीर पैसे देता था। बदले में वालंटियर छांगुर पीर को गरीब और कमजोर परिवारों की जानकारी देते थे।
छांगुर पीर फिर इन परिवारों को निशाना बनाकर और उन्हें आर्थिक मदद देकर अपने प्रभाव में लेता था। इसके बाद वह उनका धर्म परिवर्तन करवाता था।
इस धर्मांतरण में होने वाले खर्च का पूरा हिसाब नसरीन (नीतू) रखती थी, जो कथित तौर पर छांगुर पीर की पत्नी है। छांगुर पीर पुलिस और स्थानीय प्रशासन को मैनेज करता था ताकि काम चलता रहे।
मिशनरियों का नेटवर्क
सुरक्षा एजेंसियों के अनुसार, देवीपाटन मंडल में मिशनरियों ने एक मजबूत नेटवर्क बनाया था। मिशनरियों ने हर वर्ग के लिए अलग-अलग प्रचारक नियुक्त किए थे। प्रचारक, पास्टर और पादरी इस नेटवर्क की मुख्य कड़ी थे।
मिशनरियों के इन नेटवर्क के पास दलित, वंचित, बीमार और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की पूरी जानकारी होती थी। छांगुर पीर समय-समय पर पैसे देकर यह जानकारी लेता था। फिर वह इन परिवारों को धर्मांतरण के लिए राजी करता था।
जानकारी के अनुसार, छांगुर पीर का संबंध कई अन्य संगठनों से भी रहा है। जाँच में पता चला है कि उसका जुड़ाव सऊदी अरब इस्लामिक डेवलपमेंट बैंक, मुस्लिम वर्ल्ड लीग, दावत-ए-इस्लाम और इस्लामिक संघ ऑफ नेपाल जैसे संगठनों से था।
विदेशी फंडिंग और ISI कनेक्शन
खुफिया एजेंसियों के अनुसार, छांगुर पीर ‘मिशन आबाद’ का हिस्सा था। धर्मांतरण के बदले छांगुर पीर को विदेश से पैसा मिलता था। पूर्व IB अधिकारी ने बताया कि इसकी रिपोर्ट गृह मंत्रालय को भी भेजी गई थी। अब इस मामले में कड़ी कार्रवाई हो रही है।
जाँच में यह भी सामने आया है कि छांगुर पीर के पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी ISI से कनेक्शन थे। छांगुर पीर हाल ही में काठमांडू में हुए एक कार्यक्रम में शामिल हुआ था।
यह कार्यक्रम काठमांडू स्थित पाकिस्तान दूतावास में हुआ था। इसमें पाकिस्तान की नेशनल डिफेंस यूनिवर्सिटी और ISI के अधिकारी भी मौजूद थे। इस कार्यक्रम के बाद पाकिस्तानी दल ने भारत सीमा का दौरा किया था। छांगुर पीर ने तब ISI के साथ कनेक्शन में आया।
प्रभावित करने की रणनीति और प्रचार
छांगुर पीर खुद का और नसरीन का उदाहरण देकर हिंदू परिवारों को धर्मांतरण के लिए राजी करवाता था। छांगुर पीर बताता था कि वे दोनों पहले सिंधी थे। इस्लाम कबूल करने के बाद उनकी जिंदगी में बदलाव आया।
छांगुर पीर लोगों को दिखाता था कि अब उनके पास पैसे, आलीशान घर और महंगी गाड़ियाँ हैं। छांगुर पीर दावा करता था कि अगर वे भी इस्लाम अपना लेंगे तो उनकी भी जिंदगी में बदलाव आएगा।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने एक कार्यक्रम में कुछ ऐसा कहा, जिसे विपक्ष ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने का बहाना बना लिया। बात ये है कि भागवत जी ने 75 साल की उम्र पूरी होने पर लोगों को साइड हो जाने और दूसरों को मौका देने की बात कही। अब चूँकि पीएम मोदी इस साल 17 सितंबर को 75 साल के हो जाएँगे, तो कॉन्ग्रेस और शिवसेना जैसे विपक्षी दल चिल्ला रहे हैं कि ये बयान मोदी जी को रिटायरमेंट का संदेश है। लेकिन क्या वाकई ऐसा है? आइए, इस पूरे मामले की असलियत को समझते हैं, बिना किसी लाग-लपेट मिलावट के।
सबसे पहले तो जानते हैं कि मोहन भागवत ने क्या कहा और किस संदर्भ में। ये बात 9 जुलाई 2025 को नागपुर में हुई। वहाँ एक किताब का विमोचन था – नाम है ‘मोरोपंत पिंगले: द आर्किटेक्ट ऑफ हिंदू रिसर्जेंस’। ये किताब आरएसएस के दिवंगत नेता मोरोपंत पिंगले पर लिखी गई है, जो राम जन्मभूमि आंदोलन के बड़े प्रेरक थे। कार्यक्रम में भागवत ने पिंगले की विनम्रता, दूरदर्शिता और राष्ट्र निर्माण में उनके योगदान की तारीफ की। उन्होंने एक पुराना किस्सा सुनाया।
मोहन भागवत बोले, “मोरोपंत पिंगले जी 75 साल के हो गए थे। उस वक्त हम सब वृंदावन में एक बैठक में थे। शेषाद्री जी ने कहा कि आज मोरोपंत जी के 75 साल पूरे हुए हैं और उन्हें शॉल पहनाई गई। फिर उनसे बोलने को कहा गया। पिंगले जी ने मजाक में कहा कि मेरी मुश्किल ये है कि मैं खड़ा होता हूँ तो लोग हँसते हैं, बोलता हूँ तो भी हँसते हैं। लगता है लोग मुझे गंभीरता से नहीं लेते। मैं जब मर जाऊँगा, तब लोग पत्थर मारकर चेक करेंगे कि सच में मरा हूँ या नहीं।” फिर पिंगले जी ने आगे कहा, “75 साल पर शॉल पहनाने का मतलब मैं जानता हूँ। इसका अर्थ है कि अब आपकी उम्र हो गई, जरा साइड हो जाओ, हमें करने दो।”
देखिए, ये पूरा बयान मोरोपंत पिंगले की याद में था। मोहन भागवत उन्हें निस्वार्थता की मिसाल बता रहे थे। पिंगले ने कभी अपनी तारीफ नहीं सुनी, हमेशा काम किया। यहाँ तक कि राम जन्मभूमि आंदोलन में उन्होंने अशोक सिंघल को आगे रखा, खुद बैकग्राउंड में रहे। भागवत का मकसद था ये बताना कि सच्चे नेता कैसे होते हैं – जो काम करते हैं, लेकिन सत्ता से चिपकते नहीं। उन्होंने ये भी कहा कि पिंगले उम्र के आखिरी दिनों में भी सक्रिय थे, सलाह देते थे, चिंतन करते थे।
तो बयान का संदर्भ था मोरोपंत पिंगले की जिंदगी और उनकी ह्यूमर वाली बातें, न कि किसी आज के नेता पर तंज। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के सरसंघचालक मोहर भागवत ने करीब दो घंटे की स्पीच में पिंगले जी की प्रशंसा की, उनकी सादगी को याद किया। ये कोई नई पॉलिसी या संदेश नहीं था, बल्कि एक पुरानी स्टोरी थी, जो हल्के मूड में सुनाई गई।
अब आते हैं विवाद पर। जैसे ही ये बयान वायरल हुआ, विपक्ष ने इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जोड़ दिया। कॉन्ग्रेस के जयराम रमेश ने ट्वीट किया, “बेचारे पुरस्कार विजेता प्रधानमंत्री! घर वापसी पर सरसंघचालक ने याद दिला दिया कि 17 सितंबर 2025 को वे 75 साल के हो जाएँगे। लेकिन पीएम सरसंघचालक से कह सकते हैं कि वे खुद 11 सितंबर को 75 के हो जाएँगे! एक तीर, दो निशाने!”
बेचारे अवार्ड-जीवी प्रधानमंत्री! कैसी घर वापसी है ये- लौटते ही सरसंघचालक के द्वारा याद दिला दिया गया कि 17 सितंबर 2025 को वे 75 साल के हो जाएंगे।
लेकिन प्रधानमंत्री सरसंघचालक से भी कह सकते हैं कि -वे भी तो 11 सितंबर 2025 को 75 के हो जाएंगे!
शिवसेना (यूबीटी) के संजय राउत ने कहा, “पीएम मोदी ने आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, जसवंत सिंह जैसे बड़े नेताओं को जबरन रिटायर कराया। अब देखते हैं, क्या खुद पालन करेंगे?”
ये लोग कह रहे हैं कि आरएसएस नरेंद्र मोदी को रिटायरमेंट का हिंट दे रहा है। सोशल मीडिया पर भी मीम्स और पोस्ट्स की बाढ़ आ गई। एक इंस्टाग्राम पोस्ट में लिखा, “आरएसएस चीफ का 75 पर रिटायर होने का बयान, क्या मोदी को मैसेज?”
लेकिन असलियत क्या है? ये पूरा विवाद बिना वजह का है। दरअसल, मोहन भागवत का बयान किसी आज के नेता पर नहीं था। ये तो मोरोपंत पिंगले के 75 साल के होने के मौके की पुरानी स्टोरी थी, जो 1980-90 के दशक की है। पिंगले खुद 75 के बाद भी सक्रिय रहे – बाबरी मस्जिद ध्वंस के वक्त उनकी उम्र 74 थी और वे 6 दशक से ज्यादा काम करते रहे।
मोहन भागवत ने स्पीच में जीवनभर सक्रिय रहने का संदेश दिया, न कि रिटायर होने का। उन्होंने कहा कि अगर स्वास्थ्य और दिमाग ठीक है, तो काम जारी रखो। पीएम नरेंद्र मोदी और आरएसएस चीफ मोहन भागवत दोनों का पूरा जीवन सार्वजनिक सेवा को समर्पित है। पीएम मोदी तो 75 की उम्र में भी रैलियाँ करते हैं, अंतरराष्ट्रीय दौरों पर जाते हैं, बैठकें लेते हैं – उनकी एनर्जी युवाओं को मात देती है।
आरएसएस और बीजेपी के इतिहास को देखें तो 75 साल की उम्र पर मार्गदर्शक मंडल में भेजने की परंपरा रही है। जैसे लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी को 2014-15 में साइड किया गया। लेकिन ये कोई सख्त नियम नहीं है। अमित शाह ने 2023 में कहा था कि बीजेपी के संविधान में रिटायरमेंट क्लॉज नहीं है, मोदी जी 2029 तक लीड करेंगे। राजनाथ सिंह ने भी यही दोहराया। तो ये विपक्ष की राजनीति है – जो चुनाव में पीएम मोदी को हरा नहीं पा रहे, वो ऐसे बयानों से अफवाह फैला रहे हैं। जबकि हकीकत ये है कि भागवत का बयान नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव पर है।
देखिए, समस्या ये है कि आजकल हर बयान को मोदी-बीजेपी से जोड़कर देखा जाता है। भागवत आरएसएस के चीफ हैं, उनका फोकस संगठन और विचारधारा पर है, न कि राजनीतिक सत्ता पर। उन्होंने हमेशा कहा है कि आरएसएस राजनीति से अलग है, लेकिन सहयोग करता है। इस बयान में भी कोई छिपा संदेश नहीं… बल्कि ये तो मोरोपंत पिंगले पर आधारित किताब की लॉन्चिंग पर उनकी यादें थीं। विपक्ष को लगता है कि इससे पीएम मोदी की इमेज खराब होगी, लेकिन जनता समझदार है। पीएम मोदी की लोकप्रियता उनकी मेहनत से है, न कि उम्र से। वे 2014 से अब तक तीन बार पीएम बने और 2024 में भी एनडीए की जीत हुई।
अगर हम गहराई से सोचें, तो 75 साल पर रिटायरमेंट का आईडिया बुरा नहीं है – ये युवाओं को मौका देता है। लेकिन ये हर किसी पर लागू नहीं होना चाहिए। अगर कोई नेता फिट है, अनुभवी है और लोग उसे चाहते हैं, तो क्यों रिटायर कराएँ? अमेरिका में जो बाइडेन 81 साल के हैं, फिर भी प्रेसिडेंट बने रहना चाहते थे। भारत में भी कई नेता 80 पार करके काम करते रहे, जैसे अटल बिहारी वाजपेयी। लेकिन मोदी जी का केस अलग है – उनकी फिटनेस और वर्क एथिक्स कमाल की है। वे योग करते हैं, लंबे घंटे काम करते हैं। भागवत जी खुद भी 75 होने वाले हैं, लेकिन आरएसएस में सर्संघचालक लाइफटाइम पोस्ट है, उम्र से नहीं हटते।
निष्कर्ष में कहूँ तो ये विवाद विपक्ष की हताशा का नतीजा है। वे मोदी जी को हराने के लिए कुछ भी जोड़-तोड़ करते हैं। असलियत ये है कि भागवत जी का बयान मोरोपंत पिंगले की याद में था, उनकी विनम्रता और सक्रियता पर। ये कोई रिटायरमेंट का फरमान नहीं। दोनों नेता – पीएम मोदी और भागवत जी, खुद तय करेंगे कब क्या करना है। उनका सक्रिय रहना देश के लिए अच्छा है।
विपक्ष को अनर्गल बातें बंद करके असली मुद्दों पर फोकस करना चाहिए, जैसे महँगाई, रोजगार। वहीं, फिलहाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को एक ऐसे बैट्समैन की तरह देखें, जो विपक्षियों से आउट ही नहीं हो रहा। ऐसे में वो उनके रिटायर्ड हर्ट की ‘दुआएँ’ माँग रहे हैं, जो ‘वीरता’ नहीं बल्कि ‘कायरता’ है। और कॉन्ग्रेस पार्टी, विपक्षी दल जितनी जल्दी ये कायरता छोड़ देंगे, देश के लिए उतना ही अच्छा होगा।
पंजाब के सीएम भगवंत मान ने पीएम मोदी की विदेश यात्राओं पर बेहद शर्मनाक बयान दिया है। ये बयान पीएम मोदी से ज्यादा देश की विदेश नीति पर है इसलिए विदेश मंत्रालय को भी इस पर संज्ञान लेना पड़ा है। विदेश मंत्रालय ने मान की टिप्पणी को गैर जिम्मेदाराना करार देते हुए कड़ी निंदा की है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का भारत के मित्र देशों के साथ भारत के संबंधों के बारे में की गई टिप्पणियाँ निराशाजनक और गैर जिम्मेदाराना है, ऐसे बयान किसी प्रदेश के मुखिया को शोभा नहीं देती। भारत सरकार ऐसे अनुचित बयानबाजी से खुद को अलग करती है।”
भगवंत मान ने कहा था, “पीएम कहाँ गए हैं? मुझे लगता है कि वह घाना गए हैं। वह वापस आएँगे, उनका स्वागत है। भगवान ही जानें वह किन-किन देशों में जाते रहते हैं, मैग्नेशिया, गैल्विसा, टार्विसिया। 140 करोड़ वाले देश के नेता वहाँ जा रहे हैं जहाँ 10 हजार लोग रहते हैं और वहाँ सर्वोच्च सम्मान पाते हैं। हमारे यहाँ तो 10 हजार लोग जेसीबी देखने इकट्ठा हो जाते हैं।”
भगवंत मान के बयान के बाद विदेश नीति के बारे थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी आश्चर्यचकित रह गया है। क्योंकि अपने बयान से मान ने अपनी ‘समझ’ की पोल खोल दी है। राजनीति में आलोचना विपक्ष करता ही रहता है। लेकिन जब ये टिप्पणी देश की कूटनीति और प्रधानमंत्री के विदेशी यात्राओं से जुड़ी हो, तो ये राजनीति अंदरुनी नहीं आत्मघाती हो जाती है।
पीएम मोदी का दौरा वैश्विक स्थिति, रणनीतिक भागीदार, निवेश की संभावनाओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसी तमाम पहलुओं से जुड़ी होती है। ये भारत के विदेश नीति का चेहरा बनती हैं और इसके दम पर देश की आन बान और शान की रक्षा होती है।
UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन
भारत यूएनएससी में स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान सभी 5 देशों ने भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। इसका काफी महत्व है। ब्राजील में हुई ब्रिक्स सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर भारत को बड़ी सफलता मिली और सदस्य देशों ने यूएनएससी के विस्तार और भारत की दावेदारी का समर्थन किया। इससे पहले क्वार्ड देशों ने भी यूएनएससी विस्तार का समर्थन किया।
पीएम मोदी ने हाल में जिन 5 देशों की यात्राएँ की हैं। उनमें दो दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील, अर्जेंटीना है वहीं तीन अफ्रीकी देश त्रिनिदाद एंड टोबैगो, नामीबिया और घाना है। इन पाँच देशों में से 4 देशों ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा।
पीएम मोदी को मिल चुके हैं 27 देशों के सर्वोच्च सम्मान
अफ्रीकन देश घाना में ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना’ और त्रिनिदाद और टोबैगो में ‘ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया, जहाँ उन्होंने उनकी संसद को संबोधित किया। वे 20 से अधिक वर्षों में इन कैरेबियाई राष्ट्र की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। ये छोटे- छोटे देश ग्लोबल साउथ की रीढ़ हैं। भारत लगातार ग्लोबल साउथ के साथ संबंध मजबूत कर रहा है और इंटरनेशनल मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।
Interacted with MPs from Namibia after my address to their Parliament. Their positivity towards India is clearly visible! pic.twitter.com/Bxa8pR6bey
पीएम मोदी को अब तक 27 देशों ने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है। सिर्फ 2025 में ही अब तक पीएम मोदी को 7 देशों ने सम्मानित किया। 27 देशों में से 8 मुस्लिम देश हैं।
आर्थिक मोर्चे पर चीन से टक्कर के लिए जरूरी
पाँच देशों की यात्रा का महत्व आर्थिक दृष्टि से भी काफी अहम है। घाना, नामीबिया, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना और ब्राज़ील की यात्रा ने दुनिया का ध्यान खींचा। चीन से मुकाबला करने के एक रणनीतिक विकल्प, आतंकवाद के खिलाफ एक ज़िम्मेदार आवाज और ग्लोबल साउथ के एक विकास साझेदार के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करना था।
दरअसल इन देशों का चीन के साथ कई मुद्दों पर मतभेद है। चीन छोटे देशों को आर्थिक गुलाम बनाना चाहता है जबकि भारत इन्हें अहम साझीदार के दौर पर देखता है। इसलिए चीन को संतुलित करने के अपने प्रयासों में एकजुट हैं और इसलिए वे भारत के साथ काम करना चाहते हैं।
नामीबिया के खनिज में भारत का निवेश
प्रधानमंत्री मोदी की सबसे हालिया यात्रा नामीबिया की थी। वह लगभग 30 वर्षों में वहाँ जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे। गौरतलब है कि भारत लाए गए आठ चीते नामीबिया के रेगिस्तान से आए थे। नामीबिया अफ्रीका में एक स्थिर लोकतंत्र है जहाँ प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। रेयर मिनर्ल्स, खनिज, यूरेनियम, कोबाल्ट, लिथियम और समुद्री हीरे शामिल हैं, और ये सभी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए खनन उद्योग में भारतीय कंपनियों ने यहाँ पहले ही 80 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। नामीबिया भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकता है, जिससे चीन पर भारत की निर्भरता कम होगी।
प्रधानमंत्री मोदी की घाना यात्रा पिछले 30 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। साझा लोकतांत्रिक सिद्धांत और आतंकवाद की दोनों देशों को चिंता है। अफ्रीका में सोने का सबसे बड़ा उत्पादक देश घाना है जहाँ लिथियम का भी भंडार है। ऐसे में भारत की इलेक्ट्रिक वाहन की जरूरत यहाँ से पूरी हो सकती है। चीन ने हाल ही में इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।
यूपीआई, रक्षा सहयोग, एआई में भारत करेगा मदद
भारत के यूपीआई को ये देश अपनाने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा भारत ने साइबर सुरक्षा सहायता, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग की दिशा में अहम भागीदार साबित होगा।
प्रधानमंत्री मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा में इतिहास याद आ गई जब गिरमिटिया के रूप भारतीय इस देश का विकास करने गए थे। यही वजह है कि बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय अभी यहाँ रहते हैं।
इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंधों को मजबूती मिली। त्रिनिदाद कैरेबियाई क्षेत्र में UPI लागू करने वाला पहला देश बन गया।
अर्जेंटीना के ऊर्जा से भारत की जरूरत होगी पूरी
अर्जेंटीना की यात्रा का समय इससे बेहतर नहीं हो सकता था। भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ सतत ऊर्जा की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव कर रहा है और यह दक्षिण अमेरिकी देश तांबा और लिथियम जैसे जरूरी खनिजों के लिए मशहूर है। दुनिया में दूसरे सबसे बड़े शेल गैस और चौथे सबसे बड़े शेल तेल भंडारों वाला अर्जेंटीना ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का अहम साझीदार बन सकता है।
महत्वपूर्ण खनिज, यूपीआई का इस्तेमाल, रक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोध, फार्मास्यूटिकल्स और प्रवासी भारतीयों से संपर्क, प्रधानमंत्री मोदी के दोनों महाद्वीपों के दौरे के प्रमुख विषय रहे। इस दौरान मिले राजकीय सम्मान ने वैश्विक मंच पर भारत को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में पेश किया।
मान जी बोलें, लेकिन जरा जुबान संभाल के
प्रधानमंत्री मोदी का राजनयिक दौरा निश्चित रूप से देश को हर मोर्च में मजबूत बनाने वाला रहा। फिर भी, मान की कूटनीतिक नासमझी इसे पहचानने में विफल रही। आम आदमी पार्टी वैसे भी विदेश नीति के मामले में सिफर मानी जाती है। मान ने अपने बयान से इसे सच साबित कर दिया।
अरे भाई…राजनीति करो, लेकिन देश की कूटनीति पर हमला मत करो। तुम जैसे लोग सिर्फ वोट के लिए कुछ भी बोलते हो, लेकिन समझो कि पीएम के दौरे भारत को मजबूत बनाते हैं। अगली बार मुँह खोलने से पहले विदेश नीति पढ़ लो, समझ लो या फिर चुप ही रहो। ऐसे में पंजाब को संभालो, जहाँ किसान परेशान हैं, नशा फैला है, हर तरफ बर्बादी है। क्योंकि वैश्विक कूटनीति तुम्हारे बस की नहीं।
बिहार में लोगों के लिए अच्छी खबर है। रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सोमवार (7 जुलाई 2025) को समस्तीपुर में जाकर कई बड़ी रेल परियोजनाओं की घोषणा की। उन्होंने बताया कि बिहार में दो नई रेल लाइनें बनेंगी, जिससे यात्रा आसान हो जाएगी और इलाके का विकास होगा।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहली लाइन लहेरियासराय से सहरसा तक 110 किलोमीटर की होगी, जिस पर करीब 2376 करोड़ रुपए खर्च होंगे। इस लाइन पर कोशी नदी पर एक बड़ा पुल बनेगा, साथ ही 14 बड़े पुल, 41 छोटे पुल और 72 अंडरपास भी तैयार किए जाएँगे। इससे ट्रेनें तेज चल सकेंगी और हैवी ट्रैफिक की समस्या कम होगी। दूसरी लाइन लहेरियासराय से मुजफ्फरपुर तक 67 किलोमीटर की होगी, जिसकी लागत 1213 करोड़ रुपए है। इस पर 4 नए स्टेशन और 3 हॉल्ट बनेंगे।
रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने दरभंगा एम्स के पास एक नया स्टेशन बनाने की भी बात कही। ये स्टेशन एम्स आने-जाने वाले मरीजों और यात्रियों के लिए बहुत फायदेमंद होगा। कुल मिलाकर इन दोनों लाइनों पर 14 नए स्टेशन बनेंगे, जिसमें से 10 स्टेशन लहेरियासराय-सहरसा लाइन पर होंगे। दरभंगा संसदीय क्षेत्र में 70 किलोमीटर का हिस्सा आएगा, जो स्थानीय लोगों को रोजगार और बेहतर कनेक्टिविटी देगा।
इसके अलावा कर्पूरीग्राम स्टेशन को विश्वस्तरीय बनाने के लिए 18.33 करोड़ रुपए की योजनाओं का शिलान्यास किया गया। अब ये स्टेशन आधुनिक सुविधाओं से लैस होगा, जैसे बेहतर प्लेटफॉर्म, वेटिंग रूम और पार्किंग।
बैठक के बाद रेल मंत्री ने दो नई अमृत भारत ट्रेनें चलाने की घोषणा की। एक ट्रेन दरभंगा से लखनऊ जाएगी और दूसरी अमृतसर से सहरसा होकर चलेगी। ये ट्रेनें आरामदायक होंगी और कम किराए में सफर कराएँगी। साथ ही, 6.16 करोड़ रुपए से बने लहेरियासराय लो-कॉस्ट ओवरब्रिज को चालू कर दिया गया। ये ओवरब्रिज लहेरियासराय से बेनीपुर और कुशेश्वरस्थान जाने वालों के लिए बड़ा राहत है। इससे दरभंगा-मुजफ्फरपुर की दूरी 24 किलोमीटर कम हो जाएगी और यात्रा का समय दो घंटे से घटकर सिर्फ डेढ़ घंटा रह जाएगा।
समस्तीपुर रेलवे मंडल को विश्वस्तरीय बनाने की योजना पर भी चर्चा हुई। रेल मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि काम तेजी से पूरा करें और गुणवत्ता पर ध्यान दें। उन्होंने वर्तमान परियोजनाओं की प्रगति की समीक्षा की और जरूरी निर्देश दिए। ये सब योजनाएँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अमृत भारत स्टेशन योजना का हिस्सा हैं, जिससे रेलवे को आधुनिक बनाया जा रहा है। बिहार के लोग खुश हैं क्योंकि इससे न सिर्फ यात्रा सुगम होगी, बल्कि अर्थव्यवस्था भी मजबूत होगी। रोजगार बढ़ेंगे और पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। रेल मंत्री ने कहा कि बिहार रेलवे के विकास में आगे रहेगा।
भारतीय सेना ने आतंक के आकाओं को करारा जवाब देते हुए 7 मई 2025 की रात पाकिस्तान और POK में स्थित 9 आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर डाला था। इस पूरे अभियान को मात्र 23 मिनट में अंजाम दिया गया था और भारत को जरा सा भी नुकसान नहीं हुआ था।
यह था ‘ऑपरेशन सिंदूर’, जिसने आतंक के खिलाफ भारत की निर्णायक शक्ति और सटीक मारक क्षमता को पूरी दुनिया के सामने लाकर रख दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल ने इस पूरे अभियान की जानकारी IIT मद्रास के 62वें दीक्षांत समारोह में दी।
अजीत डोभाल ने गर्व के साथ कहा कि इस ऑपरेशन में पूरी तरह स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया और भारत ने सीमापार जाकर सिर्फ आतंकी ठिकानों को नेस्तनाबूद किया।
डोभाल ने ललकारते हुए कहा, “एक भी फोटो दिखा दो जिसमें भारत को नुकसान हुआ हो, यहाँ तक कि एक गिलास भी टूटा हो तो बताओ!” डोभाल ने यह भी कहा कि भारत ने पहले ही तय कर लिया था कि किन-किन ठिकानों पर हमला करना है और सभी पर सटीक निशाना साधा गया।
#WATCH | Chennai, Tamil Nadu | Speaking on Operation Sindoor, at IIT Madras, NSA Ajit Doval slams the foreign media for their reportage on the operation.
"Foreign press said that Pakistan did that and this…You tell me one photograph, one image, which shows any damage to any… pic.twitter.com/v13Pr8RuRf
उन्होंने बताया कि यह हमला सीमा पार आतंकी शिविरों पर किया गया, न कि सीमावर्ती इलाकों में। यह साफ दर्शाता है कि भारत अब सिर्फ प्रतिक्रिया नहीं देता, बल्कि आतंकवाद को जड़ से खत्म करने की रणनीति पर काम कर रहा है।
विदेशी मीडिया और पाकिस्तान को फटकार लगाते हुए डोभाल ने कहा, “वे लोग झूठ फैला रहे हैं। कहते हैं कि पाकिस्तान ने ये कर दिया, वो कर दिया… अगर ऐसा कुछ हुआ होता तो कोई एक सबूत दिखाते। हमने सैटेलाइट तस्वीरें देखीं, 10 मई से पहले और बाद की, पाकिस्तान के सारे 13 एयरबेस तबाह हुए हैं।”
उन्होंने पाकिस्तान के नाम लेते हुए सरगोधा, रहीम यार खान, चकलाला जैसे एयरबेस के बारे में बताया और साफ किया कि भारत की कार्रवाई सटीक, सीमित और पूरी तरह सफल से सफल रही है।
बता दें कि 22 अप्रैल 2025 को पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद यह कार्रवाई की गई थी। पाकिस्तान ने भारत की कार्रवाई से घबराकर जवाबी हमला करने की कोशिश की, लेकिन भारतीय डिफेंस सिस्टम ने उनकी हर चाल को नाकाम कर दिया।
राजस्थान के जैसलमेर जिले के बासनपीर गाँव में ऐतिहासिक छतरियों (स्मारक) के निर्माण को लेकर तनाव बना हुआ है। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को इस्लामी कट्टरपंथी गुट ने निर्माण कार्य का विरोध करते हुए महिलाओं और बच्चों को आगे करके पत्थराव करवाया। शुक्रवार (11 जुलाई 2025) को भी स्थिति तनावपूर्ण बनी हुई है।
विवाद पर बीजेपी विधायक छोटू सिंह भाटी ने कहा है कि जैसलमेर के गौरव का अपमान बर्दाश्त नहीं करेंगे।
— Chhotu Singh Bhati (@mla_chhotusingh) July 10, 2025
इस मामले का एक वीडियो भी वायरल हुआ। वीडियों में देखा जा सकता है कि पुलिसबल निर्माण कार्य के पास मौजूद है और कुछ कट्टरपंथी लोग पत्थराव कर रहे हैं। पत्थराव करने वालों में सबसे ज्यादा महिलाएँ शामिल है। इनके हाथों में पत्थर देखें जा सकते हैं। ये महिलाएँ पुलिस को कुछ कहती है और उन पर पत्थर फेंकना शुरू कर देती हैं।
#WATCH | Rajasthan | Two groups clashed over the construction of a 'chhatri' (cenotaph) in a pond in Basantpeer village of Jaisalmer today. During the clash, stones were pelted at police personnel and construction workers. Case registered against those involved in stone pelting.… https://t.co/XGNNavfE3Fpic.twitter.com/3vEm4sc93L
जानकारी के मुताबिक, जैसलमेर में बनी छतरियाँ दो बहादुर लोगों की याद में हैं: झुंझार रामचंद्र सिंह सोढ़ा और झुंझार पालीवाल जी।
झुंझार रामचंद्र सिंह सोढ़ा एक बहादुर योद्धा थे। वे 1828 में जैसलमेर और बीकानेर के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए थे। उनकी बहादुरी की याद में यह छतरी (स्मारक) बनाई गई थी।
हदूद जी पालीवाल ने गाँव में एक तालाब बनवाया था। लोगों को पानी मिल सके, इसलिए उन्होंने यह अच्छा काम किया। उनकी याद में दूसरी छतरी बनाई गई थी।
इन छतरियों को 1835 में महारावल गज सिंह ने बनवाया था। ये छतरियाँ गौरव का प्रतीक मानी जाती हैं।
छतरियों से जुड़ा विवाद- यह विवाद नया नहीं है, बल्कि 2019 से चला आ रहा है। 2019 में एक शिक्षक से सफाई के दौरान एक छतरी टूट गई थी। इसके बाद झुंझार धरोहर बचाओ संघर्ष समिति और हिंदू संगठनों ने इसका विरोध किया।
जब प्रशासन ने इन छतरियों को दोबारा बनाने की मंजूरी दी, तो मुस्लिम समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया। 2021 में प्रशासन की कोशिश से काम शुरू हुआ, लेकिन दो दिन बाद तनाव के कारण इसे फिर रोकना पड़ा था।
क्या हुआ था?
राजस्थान के जैसलमेर जिले के बासनपीर गाँव में दो ऐतिहासिक छतरियों को लेकर विवाद चल रहा है। यह विवाद इन छतरियों के दोबारा बनने को लेकर है। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को निर्माण कार्य शुरू हुआ।
दूसरे समुदाय के लोगों ने इसका विरोध किया और पत्थरबाजी की। कुछ कट्टरपंथियों ने महिलाओं और बच्चों को आगे करके लोगों पर और पुलिसबल पर पथराव करवाया। इसमें पुलिसकर्मी समेत चार लोग घायल हो गए।
Jaisalmer, Rajasthan: A clash over chhatri construction in Basanpeer turned violent as a community allegedly pelted stones, injuring activist Ganpat Singh and a police officer. Several vehicles were damaged. Heavy police deployment followed
कोविड-19 महामारी के दौरान जब देश संकट से जूझ रहा था, उस समय पत्रकार राणा अय्यूब ने राहत कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपये का फंड जुटाया। लेकिन इस पैसे का उपयोग राहत कार्यों से ज्यादा उन्होंने निजी कामों के लिए किया। इसके खुलासा मुंबई स्थित आयकर अपीलीय न्यायाधिकरण (ITAT) ने किया है।
ITAT का कहना है कि इस फंड का कुछ हिस्सा निजी उपयोग में लाने के साथ साथ विदेशी फंडिंग के नियमों का भी उल्लंघन किया गया है। ITAT ने राणा अय्यूब को पूरे फंड पर टैक्स जमा करने का आदेश दिया है।
राणा अय्यूब ने कोरोना महामारी के समय ‘केट्टो’ प्लेटफॉर्म पर तीन क्राउडफंडिंग अभियानों के जरिए कुल ₹2.69 करोड़ जुटाए थे। इस रकम में से ₹80.49 लाख की फंडिंग विदेश से मिली था, जो FCRA, 2010 का उल्लंघन था।
COVID-19 महामारी के दौरान राणा अय्यूब द्वारा जुटाई गई धनराशि का स्क्रीनग्रैब
राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत कार्यों के लिए जुटाई गई रकम में से ₹1.60 करोड़ अपने पिता मोहम्मद अय्यूब शेख और ₹37.15 लाख अपनी बहन इफ़्फ़त शेख के बैंक खातों में जमा किए। उन्होंने आयकर विभाग को बताया कि उनका पैन कार्ड नहीं मिल रहा था, इसलिए केट्टो से फंड निकालने के लिए उन्होंने अपने पिता और बहन के पैन कार्ड का इस्तेमाल किया।
बाद में राणा अय्यूब ने अपने पिता के खाते से ₹84.40 लाख और बहन के खाते से ₹36.40 लाख अपने निजी खाते में ट्रांसफर कर लिए। इस तरह उनके खाते में कुल ₹1.20 करोड़ से ज्यादा की राशि ट्रान्सफर।
अप्रैल 2022 में उन्होंने इस बड़ी रकम के गबन को सिर्फ 20,000 डॉलर की छोटी राशि’ बताकर गंभीरता को कम करने की कोशिश की, जबकि असल में मामला ₹2.69 करोड़ (करीब 3.14 लाख डॉलर) का था।
राणा अय्यूब द्वारा अपने पिता और बहन के खाते से अपने निजी बैंक खाते में स्थानांतरित किया गया धन
ITAT ने कहा कि एक साल बाद भी क्राउडफंडिंग से जुटाए गए लगभग ₹2.4 करोड़ का उपयोग राहत कार्यों के लिए नहीं हुआ। पैसा राणा अय्यूब और उनके परिवार के व्यक्तिगत बचत खातों में जमा किया गया था। राहत कार्य करने के बजाय, राणा अय्यूब ने अपने नाम पर चालू खाता खोला, FD में निवेश किया और उसी खाते से निजी खर्च भी किए।
राणा अय्यूब द्वारा धन के दुरुपयोग का मामला उजागर
ITAT ने पत्रकार राणा अय्यूब के खिलाफ यह टिप्पणी की है कि उन्होंने COVID-19 राहत कार्यों और व्यक्तिगत जरूरतों के लिए क्राउडफंडिंग से जुटाई गई राशि के लिए अलग-अलग बैंक खाते नहीं खोले।
ITAT के अनुसार, ये पैसा उनके पिता और उनकी बहन के व्यक्तिगत खातों में भेजा गया पहले और दूसरे क्राउडफंडिंग अभियान के दौरान उनके परिवार के सदस्यों के खातों में और तीसरे अभियान के दौरान सीधे उनके अपने खाते में।
राणा अय्यूब ने दावा किया कि वह इन पैसों का इस्तेमाल खुद के लिए नहीं किया हैं, लेकिन ITAT ने कहा कि यह साबित नहीं किया जा सकता क्योंकि उन्होंने धन को निजी खातों में मिलाकर रखा और कोई अलग खाता नहीं बनाया।
उन्होंने यह भी कहा कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर लाभार्थी की पहचान स्पष्ट थी, लेकिन चूंकि पैसा सीधे उनके और उनके परिवार के खातों में गया, यह दलील भी स्वीकार नहीं की गई। ITAT ने यह भी बताया कि जब आयकर विभाग ने इस पर सवाल उठाए, तो राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से प्राप्त पूरी राशि को ‘अन्य स्रोतों से आय’ के रूप में घोषित कर दिया।
उन्होंने यह स्वीकार किया कि 2.69 करोड़ रुपये में से केवल 28 लाख रुपये ही राहत कार्यों जैसे कि प्रवासी मजदूरों की मदद, राशन, अस्पताल में भर्ती, परिवहन और पश्चिम बंगाल में बाढ़ पीड़ितों के लिए तिरपाल खरीदने में खर्च किए गए।
ITAT की जाँच में यह भी सामने आया कि राणा अय्यूब ने क्राउडफंडिंग से मिले पैसों में से 19 लाख रुपए का इस्तेमाल अपने निजी खर्चों के लिए किया है। इसके अलावा, 50 लाख रुपए की राशि को अपने नाम से व्यक्तिगत फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में डाल दिया।
ITAT ने इस पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर उनकी मंशा वास्तव में राहत कार्यों की थी, तो उन्होंने अपने नाम से इतनी बड़ी FD क्यों करवाई? ITAT ने यह भी बताया कि केट्टो प्लेटफॉर्म पर पहले क्राउडफंडिंग अभियान से राणा अय्यूब को 1.23 करोड़ रुपए मिले थे, लेकिन उसमें से सिर्फ 18 लाख ही राहत कार्यों में खर्च किए गए।
उन्होंने यह तर्क दिया कि बची हुई रकम अस्पताल निर्माण के लिए रखी गई थी, जबकि फंडरेज़िंग के दौरान इसकी कोई जानकारी नहीं दी गई थी। इसके अलावा, जब उन्हें टैक्स संबंधी कार्रवाई का डर हुआ, तब उन्होंने विदेशी स्रोतों से मिले कुछ धन को वापस लौटा दिया।
लेकिन पहले क्राउडफंडिंग अभियान के एक साल बाद तक वे केवल 18 लाख रुपए के खर्च का ही सबूत दे पाईं। ITAT ने इस आधार पर उनके दावों पर संदेह जताया और कई वित्तीय अनियमितताओं को उजागर किया।
FCRA नियमों का उल्लंघन
ITAT ने यह भी कहा कि राणा अय्यूब ने FCRA, 2010 का उल्लंघन किया है। ITAT के अनुसार, अय्यूब ने खुद को वाशिंगटन पोस्ट के लिए पत्रकार बताया था और FCRA की धारा 3(1)(H) के तहत पत्रकारों को विदेशी दान सीधे अपने खाते में प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। ट्रिब्यूनल ने साफ कहा कि पत्रकार होने के नाते राणा अय्यूब को विदेशी फंड सीधे प्राप्त नहीं करने चाहिए थे, इसलिए यह कानून का उल्लंघन माना गया।
धर्मार्थ गतिविधियों के लिए एकत्रित धनराशि अप्रमाणित: आईटीएटी
ITAT ने बताया कि राणा अय्यूब ने कोविड-19 राहत, झुग्गी-झोपड़ियों में रहने वालों और किसानों की मदद के नाम पर धन इकट्ठा किया था, लेकिन यह पूरा दान उनके और उनके परिवार के सदस्यों के निजी बैंक खातों में जमा किया गया।
उन्होंने कोई अलग खाता नहीं खोला और इस धन का इस्तेमाल निजी खर्चों और फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) में निवेश के लिए किया गया। बड़ी राशि लंबे समय तक बिना उपयोग के पड़ी रही। ITAT के अनुसार राणा अय्यूब का यह दावा कि यह धन धर्मार्थ कार्यों के लिए इस्तेमाल किया गया, साबित नहीं हो सका है।
जिस तरह से फंड एकत्र किया गया और उसे उनके रिश्तेदारों के खातों में जमा किया गया, इस बात का भी कोई ठोस सबूत नहीं है। ट्रिब्यूनल ने निष्कर्ष निकाला कि यह क्राउडफंडिंग की गई राशि ‘कर छूट’ (tax free) के योग्य नहीं है और इसे उनकी आय माना गया है, जिस पर आकलन वर्ष 2021-22 और 2022-23 में कर लगाया गया है।
राजस्थान के उदयपुर में दर्जी कन्हैयालाल की हत्या पर आधारित फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स: कन्हैयालाल टेलर मर्डर’ फिल्म की रिलीज पर दिल्ली हाई कोर्ट ने रोक लगा दी है। ये फिल्म शुक्रवार (11 जुलाई 2025) को रिलीज होनी थी।
इस फिल्म पर रोक लगाने के लिए जमीयत उलेमा-ए-हिंद के मुखिया अरशद मदनी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। गुरुवार (10 जुलाई 2025) को दिल्ली हाई कोर्ट की बेंच में चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय और जस्टिस अनीश दयाल ने जमीयत उलेमा-ए-हिंद को केंद्र सरकार के पास जाकर फिल्म के सीन और उसके सर्टिफिकेशन में बदलाव करने की बात कही है।
केंद्र के पास सिनेमेटोग्राफी एक्ट के सेक्शन-6 के तहत फिल्म में बदलाव करने का अधिकार होता है। कोर्ट ने उलेमा-ए-हिंद को जरूरी बदलाव करने के लिए 10 जुलाई 2025 तक का समय दिया था। कोर्ट ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया है कि जमीयत उलेमा-ए-हिंद के बदलाव किए जाने वाली याचिका पर जब तक निर्णय नहीं ले लिया जाता तब तक फिल्म को रिलीज नहीं की जाएगी।
कोर्ट ने कहा, “क्योंकि हम याचिकाकर्ता को बदलाव करने के लिए कह रहे हैं तो ऐसे में जब तक सरकार उस पर निर्णय नहीं देती, तब तक फिल्म के रिलीज पर रोक बनी रहेगी। अदालत में आगे कहा कि ऐसा नहीं है कि इस कोर्ट में असाधारण अधिकार का प्रयोग नहीं किया जा सकता, लेकिन इस मामले के तथ्यों और अधिनियम को ध्यान में रखते हुए हमारा मानना है कि याचिकाकर्ता को धारा-6 के तहत केंद्र सरकार से संपर्क करना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट जाएँगे फिल्म के निर्माता
उदयपुर फाइल्स के निर्माता अमित जानी ने कहा है कि वह इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट का रुख करेंगे।
अपनी घोषणा ने अमित ने कहा, “हमने इस फिल्म की स्क्रीनिंग उनके वकील कपिल सिब्बल के लिए की थी लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इस फिल्म का विरोध किया क्योंकि उन्हें इसके लिए ही फीस मिली है। हाई कोर्ट ने भी इस फिल्म पर आज रोक लगा दी है। इसे चुनौती देने के लिए हम सुप्रीम कोर्ट जाएँगे। जमीयत उलेमा-ए-हिंद को केंद्र सरकार के पास जाने को कहा गया है और सरकार 7 दिनों के अंदर यह फैसला लेगी की फिल्म सही है या गलत।”
जमीयत उलेमा-ए-हिंद की याचिका
जमीयत उलेमा-ए-हिंद का इतिहास आतंकियों को इसी तरह से बचाने और पनाह देने का रहा है। 28 जून 2022 को हुए कन्हैयालाल के मर्डर पर बनी उदयपुर फाइल्स फिल्म की भी रिलीज पर इसी संगठन ने आपत्ति जताई है। यह हत्या इस्लामी आतंकियों मुहम्मद रियाज अत्तारी और मुहम्मद गौस ने की थी।
संगठन ने दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र के हाई कोर्ट में याचिकाएँ दायर कर फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की माँग की है। याचिका में कहा गया कि 2022 में कन्हैया लाल की हत्या की कहानी बताने का दावा करने वाली ये फिल्म यह फिल्म असल में कोर्ट की कार्यवाही, एक पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री के दिए बयान और बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विवादास्पद बयान को लेकर बनी है। इससे सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी और इसके कारण कन्हैया लाल की निर्मम हत्या हुई।
याचिका में कहा गया कि 2022 में कन्हैया लाल की हत्या की कहानी बताने का दावा करने वाली ये फिल्म यह फिल्म असल में कोर्ट की कार्यवाही, एक पार्टी के वर्तमान मुख्यमंत्री के दिए बयान और बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा के विवादास्पद बयान को लेकर बनी है। इससे सांप्रदायिक हिंसा बढ़ी और इसके कारण कन्हैया लाल की निर्मम हत्या हुई।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अर्शद मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के बारे में लिखा। उन्होंने फिल्म निर्माताओं के खिलाफ बयान देते हुए इसे पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा की बात तक कह दी। उन्होंने दावा किया कि फिल्म में पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की गई हैं।
मदनी ने यह भी कहा कि अगर फिल्म रिलीज होती है तो देशभर में मुस्लिमों पर हिंसा और कानून-व्यवस्था पर संकट खड़ा हो सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि फिल्म मुस्लिम समुदाय को बदनाम करती है और घृणा फैलाने का काम करेगी। अपनी शिकायत में उन्होंने कहा कि फिल्म में विवादित ज्ञानवापी मस्जिद का उल्लेख भी किया गया है। बता दें कि ये मस्जिद विश्वेश्वर मंदिर पर अवैध रूप से बनाई गई है।
फिल्म पर रोक लगी तो अरशद मदनी ने किया फैसले का स्वागत
10 जुलाई 2025 मदनी ने ट्वीट साझा कर दिल्ली हाई कोर्ट के फिल्म पर रोक लगाने के फैसले का स्वागत किया। अपनी पोस्ट में उन्होंने दावा किया, “फिल्म की स्क्रीनिंग पर रोक ने संविधान की सर्वोच्चता को मजबूत किया है। यह एक स्पष्ट संदेश देता है कि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई भी व्यक्ति संवैधानिक और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता।”
उन्होंने आगे लिखा, “हाल के वर्षों में कुछ और आपत्तिजनक फिल्में भी बनी हैं, लेकिन वे इतनी घिनौनी नहीं थीं। इस फिल्म में एक हत्या की घटना की आड़ में एक पूरे समुदाय को इस तरह कठघरे में खड़ा किया गया है मानो वे अपराधी हों। इसीलिए हमने इस मामले को अदालत में ले जाने का फ़ैसला किया। हमें खुशी है कि हमारी कोशिशें कामयाब रहीं, और हमें पूरा विश्वास है कि इंशाल्लाह अंतिम फ़ैसला भी हमारे पक्ष में ही होगा।”
मदनी इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने उसके आगे लिखा,”यह फैसला सिर्फ़ फ़िल्म पर रोक नहीं है, बल्कि सांप्रदायिक तत्वों के इरादों और एजेंडे पर एक रोक है।”
Udaipur Files “फिल्म की स्क्रीनिंग पर स्टे और अदालत के अन्य आदेशों ने संविधान की सर्वोच्चता को मज़बूत किया है। यह एक स्पष्ट संदेश भी देता है कि कला और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कोई भी व्यक्ति संवैधानिक और नैतिक सीमाओं का उल्लंघन नहीं कर सकता।” हाल के वर्षों में कुछ और…
क्या है ‘उदयपुर फाइल्स: कन्हैया लाल टेलर मर्डर’ की कहानी
फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स: कन्हैया लाल टेलर मर्डर’ 11 जुलाई 2025 को बड़े पर्दे पर रिलीज होने वाली थी। फिल्म में अभिनेता विजय राज मुख्य भूमिका में नजर आएँगे। इसके अलावा रजनीश दुग्गल, प्रीति झंगियानी, कमलेश सावंत, काँची सिंह और मुश्ताक खान जैसे कलाकार भी फिल्म का हिस्सा हैं।
इस फिल्म का निर्देशन और लेखन भारत एस. श्रीनेत ने किया है, जबकि फिल्म के निर्माता अमित जानी हैं। वहीं फिल्म का वितरण रिलायंस एंटरटेनमेंट द्वारा किया जा रहा है।
जमीयत उलमा-ए-हिंद और आतंकवादियों का बचाने का उसका इतिहास
जमीयत उलमा-ए-हिंद का आतंकियों को इसी तरह से बचाने और पनाह देने का इतिहास रहा है। इसी के तहत जमीयत उलमा-ए-हिंद (JUH) ने 2007 में अपने नेता अरशद मदनी के नेतृत्व में एक लीगल सेल (कानूनी प्रकोष्ठ) शुरू किया था, इसका मकसद आतंकवाद में गिरफ्तार हुए मुस्लिम लड़कों को कानूनी मदद देना।
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने अब तक 700 आरोपितों के बचाव किया है। दुखद पहलू ये है कि 2007 से अब तक 192 आरोपियों को बरी कराया जा चुका है।
जमीयत उलेमा-ए-हिंद (JUH) की अपनी आधिकारिक वेबसाइट पर उन आरोपित मुस्लिमों के लिए कानूनी लड़ाई को लेकर सूची भी प्रकाशित है जिन पर आतंकवाद से जुड़े मामले चल रहे हैं।
वर्ष 2013 में संगठन ने भारतीय मुजाहिदीन के आतंकवादी मिर्जा हिमायत बेग को मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान की थी। हिमायत बेग पर जर्मन बेकरी बम विस्फोट मामले में आरोप लगाए गए थे। इस विस्फोट में कई निर्दोष लोगों की जान गई थी। 18 अप्रैल 2013 को पुणे की एक अदालत ने मिर्जा हिमायत बेग और उसके सह-आरोपित यासीन भटकल को दोषी ठहराया गया था और को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी।
कुछ अन्य मामले जिनमें संगठन ने आरोपितों की मदद की-
लश्कर कनेक्शन मामला (अब्दुल रहमान बनाम राज्य विशेष अनुमति याचिका)
ISIS षड्यंत्र मामला, कोच्चि (केरल राज्य बनाम अर्शी कुरैशी और अन्य)
ISIS षड्यंत्र मामला मुंबई (अर्शी कुरैशी और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य)
ISIS षड्यंत्र मामला (राजस्थान राज्य बनाम सिराजुद्दीन)
26/11 मुंबई हमला मामला (सैयद जबीउद्दीन बनाम महाराष्ट्र राज्य)
जंगली महाराज रोड पुणे बम विस्फोट मामला (ATS बनाम असद खान और अन्य)
इंडियन मुजाहिदीन मामला (महाराष्ट्र बनाम अफजल उस्मानी और अन्य)
जावेरी बाजार सीरियल ब्लास्ट (राज्य बनाम एज़ाज शेख और अन्य)
सिमी षड्यंत्र मामला (मध्य प्रदेश राज्य बनाम इरफान मुचाले और अन्य)
जामा मस्जिद विस्फोट मामला (दिल्ली राज्य बनाम कातिल सिद्दीकी अन्य)
इंडियन मुजाहिदीन षड्यंत्र मामला (राज्य बनाम यासीन भटकल व अन्य)
अहमदाबाद सीरियल ब्लास्ट मामला 2008 (राज्य बनाम जाहिद व अन्य)
आतंकवाद के आरोपितों का समर्थन करने के अलावा जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने लखनऊ में हिंदू नेता कमलेश तिवारी की उनके कार्यालय में बेरहमी से हत्या करने वाले आरोपितों कानूनी और वित्तीय सहायता देने के लिए भी विवादों में आया था।
देवबंद स्थित जमीयत उलेमा-ए-हिंद संगठन ने जून 2021 में उत्तर प्रदेश में कथित अल-कायदा आतंकवादियों के बचाव में अपने वकील लगाए थे। संगठन ने यह घोषणा भी की थी कि वह आतंकवाद के दोनों संदिग्धों को कानूनी सहायता देगा।
इसके बाद फरवरी 2022 में जमीयत ने उन 49 आतंकवादियों की मदद की जिन्हें अहमदाबाद में 21 बम धमाकों की योजना बनाने और उन्हें अंजाम देने के आरोप में दोषी ठहराया गया था। इन धमाकों में लगभग 56 निर्दोष लोगों की जान गई थी।
भले ही जमीयत उलेमा-ए-हिंद को यह अधिकार मिला हो कि वह उन दोषियों और आरोपियों की कानूनी रक्षा करे जिन्हें वह झूठे आरोपों में फँसा हुआ मानता हो, लेकिन जब आतंकवाद के आरोपितों के खिलाफ ठोस और पुख्ता सबूत होने के बाद भी संगठन उन मामलों में भी हस्तक्षेप करता है तब ये लोगों को ये बताने की कोशिश कर रहा होता है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, संगठन उनकी हिमायत में खड़ा रहेगा।