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किशनगंज में 1 महीने में आते थे 25 हजार आवेदन, अब 1 सप्ताह में ही आए 1.27 लाख: क्या घुसपैठियों को बचाने के लिए बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का विरोध कर रही RJD-कॉन्ग्रेस

बिहार में आगामी 4-5 महीनों में चुनाव होने वाले हैं। इससे पहले चुनाव आयोग तैयारियों में लगा हुआ है। चुनाव आयोग इसी कड़ी में वोटर लिस्ट का निरीक्षण कर रहा है। सभी मतदाताओं से कागज माँगे जा रहे हैं ताकि उनका नाम वोटर लिस्ट में फिर से शामिल किया जा सके। जैसे ही यह प्रक्रिया चालू हुई है, बिहार के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज में निवास प्रमाण पत्र के लिए आवेदन की संख्या 5-6 गुना बढ़ गई है। किशनगंज में इस बढ़त ने जिले में घुसपैठ और डेमोग्राफी चेंज के सवाल दोबारा खड़े कर दिए हैं।

किशनगंज में 5 गुना बढ़े निवास प्रमाण पत्र के आवेदन: डिप्टी CM सम्राट चौधरी

बिहार के उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया है कि 2025 में जनवरी से मई तक हर महीने औसतन 26 हजार से लेकर 28 हजार आवेदन निवास प्रमाण पत्र के लिए किशनगंज में आ रहे थे। उन्होंने बताया कि जैसे ही चुनाव आयोग की यह प्रक्रिया चालू हुई यह संख्या तेजी से बढ़ गई।

उपमुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने बताया कि जुलाई के 6 दिनों में ही निवास प्रमाण पत्र बनवाने के लिए 1.28 लाख से अधिक आवेदन किशनगंज में आ गए। उन्होंने कहा कि इससे पता चलता है कि किशनगंज में घुसपैठिए बड़ी संख्या में मौजूद हैं।

सम्राट चौधरी ने यह भी बताया कि पैन कार्ड, आधार कार्ड और पासपोर्ट जैसे दस्तावेजों में समय और प्रमाण लगते हैं जबकि निवास प्रमाण पत्र आसानी से बन जाता है। उन्होंने इस मामले को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ा है। उनका यह बयान अब वायरल हो रहा है।

उनकी यह चिंताएँ जायज भी हैं क्योंकि किशनगंज बिहार का अकेला ऐसा जिला है जहाँ मुस्लिम आबादी 60% से अधिक है और यहाँ डेमोग्राफी बदलाव तेजी से हुआ है। किशनगंज में घुसपैठ भी बड़े स्तर पर हुई है।

क्यों जायज हैं सम्राट चौधरी की चिंताएँ?

घुसपैठियों और आवेदन में एक दम तेजी आने की बात अकारण ही सम्राट चौधरी नहीं कर रहे। इसके पीछे किशनगंज का इतिहास है। किशनगंज बिहार का अकेला ऐसा जिला है जहाँ लगभग 70% आबादी मुस्लिम है। यह बात कागजों में दर्ज है।

देश की आजादी के समय किशनगंज हिन्दू बहुल इलाका था। लेकिन बीते कुछ दशकों में यहाँ की डेमोग्राफी काफी तेजी से बदली है। अब यहाँ हिन्दू अब एक तिहाई भी नहीं रह गए हैं। यहाँ हिन्दू बीते कुछ दशक में अल्पसंख्यक हो चुके हैं। इस बदलाव की सबसे बड़ी वजह घुसपैठ मानी जाती है।

यह जिला पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा हुआ है। यहाँ से लगातार बांग्लादेशी घुसपैठिए और रोहिंग्या गिरफ्तार हुए हैं। बीते माह ही यहाँ 9 बांग्लादेशी धराए थे। यहाँ अलग-अलग मौकों पर यह घुसपैठिए पकड़े जाते रहे हैं। इसी किशनगंज की सीमा नेपाल से सटी हुई है।

किशनगंज में ही फर्जी आधार और पैन जैसे दस्तावेज बनाने वाले पकड़े गए हैं। यानी यहाँ बांग्लादेशी और रोहिंग्या को मदद करने वाले भी मौजूद हैं। इसके अलावा, यहाँ बड़ी संख्या में बंगाली बोलने वाले हैं जो इन घुसपैठियों को आम जनसंख्या में मिलने का मौक़ा देता है।

इस जिले की जनसंख्या वृद्धि रफ़्तार देश के भीतर सबस तेज रही है। इस जिले में 2001 से 2011 के बीच 3% की दर से आबादी बढ़ी है जो राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यही नहीं, किशनगंज में लगातार बच्चे भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा तेजी से पैदा हो रहे हैं।

किशनगंज में TFR राष्ट्रीय औसत से 2.5 गुनी है। रायटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, किशनगंज का TFR लगभग 4.9 है जबकि पूरे देश का यह औसत 2.0 रहा है। कोई 15-49 वर्ष की महिला जितने बच्चों को इन वर्षों के दौरान जन्म देती है, वह उसका TFR कहा जाता है।

यदि किसी देश का औसत TFR 2.1 हो तो जनसंख्या बराबर बनी रहती है जबकि इससे कम होने पर जनसंख्या घटती है। पूरे देश में अब जनसंख्या घट रही है जबकि किशनगंज में दुगनी तेजी से बढ़ रही है।

16% बढ़ी सीमांचल में मुस्लिम आबादी

किशनगंज बिहार के सीमांचल क्षेत्र का हिस्सा है। दैनिक जागरण की एक रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 1951 से 2011 के बीच देश की कुल आबादी में मुस्लिम आबादी का हिस्सा 4% बढ़ा लेकिन इन सीमांचल के जिलों में यह हिस्सा 16% बढ़ा है और यह सभी जिलों का औसत है। किशनगंज ही नहीं बल्कि इससे सटे पूर्णिया, खगड़िया, अररिया और कटिहार जैसे जिलों में असामान्य तरीके से मुस्लिमों की आबादी बढ़ी है। इसका असर सामाजिक ढाँचे पर भी दिखा है।

CAA-NRC का भी किशनगंज में हुआ था खूब विरोध

किशनगंज में CAA-NRC का भी खूब विरोध हुआ था। तब भी देश भर में कागज नहीं दिखाने के प्रोपेगेंडा को हवा दी गई थी। गौरतलब है कि इस बार भी चुनाव आयोग सत्यापन के लिए कुछ दस्तावेज माँग रहा है। राजद और कॉन्ग्रेस जैसी विपक्षी पार्टियाँ इस मामले में फिर मुस्लिमों को भड़काने में जुटी हुई हैं। चुनाव आयोग की प्रक्रिया को CAA-NRC का नाम दिया जा रहा है। 9 जुलाई को इस मामले में बिहार बंद तक करवाया गया।

चीन ने दुनिया भर में राफेल को बदनाम करने के लिए काम पर लगाए थे अपने राजदूत, लेकिन भारत में पहले ही राहुल गाँधी-वामपंथी मीडिया ने नहीं छोड़ी थी कोई कसर: जानिए कैसे चलता रहा प्रोपेगेंडा

फ्रांस की खुफिया एजेंसियों ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। फ्रांस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने दुनिया भर में राफेल को लेकर भ्रामक खबरें फैलाईं ताकि डसॉल्ट एविएशन के राफेल लड़ाकू विमानों की छवि को नुकसान पहुँचाया जा सके।

यह सब मई 2025 में हुए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के बाद शुरू हुआ। इस ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना ने राफेल का सफलतापूर्वक उपयोग किया था। इसके बाद राफेल की विश्वसनीयता और माँग में तेजी आने की संभावना थी।

फ्रांस का कहना है कि चीन ने अपने राजनयिक दूतावासों और रक्षा अधिकारियों के जरिए यह अभियान चलाया। इसका मकसद एशिया और अफ्रीका जैसे देशों को राफेल खरीदने या पहले से किए गए सौदों को रद्द करने के लिए भ्रमित करना था।

उदाहरण के लिए, इंडोनेशिया, जिसने पहले ही राफेल की खरीद के लिए समझौता किया था, उस पर दबाव डाला गया कि वह फ्रांसीसी जेट्स की बजाय चीन के बनाए विमानों को खरीदे।

वहीं पाकिस्तान ने भी चीन के साथ मिलकर यह प्रचार किया कि ऑपरेशन सिंदूर में राफेल विमानों को भारी नुकसान हुआ, जबकि भारत ने इसकी कोई पुष्टि नहीं की है। दरअसल, ये एक चाल थी, जिससे पाकिस्तान अपनी नाकामी को छुपा सके और चीन अपनी रक्षा प्रणाली की विफलता से ध्यान भटका सके।

जहाँ एक तरफ चीन यह अभियान विदेशी दूतावासों के जरिए चला रहा था, दूसरी ओर कुछ राजनीतिक दल और वामपंथी मीडिया भी लंबे समय से राफेल के खिलाफ इसी तरह की बातें फैलाते आ रहे हैं। इसके पीछे केवल एक ही उद्देश्य रहा, वह था राफेल की विश्वसनीयता पर शक पैदा करना, चीन के सैन्य सामान को बढ़ावा देना और भारत की सैन्य ताकत को कमजोर दिखाना।

विपक्ष और वामपंथी मीडिया ने चलाया राफेल विरोधी अभियान

आज जब चीन राफेल लड़ाकू विमानों के खिलाफ दुनिया भर में दुष्प्रचार कर रहा है, तब ये भी याद रखना जरूरी है कि भारत में भी कॉन्ग्रेस पार्टी और वामपंथी मीडिया पहले ही इंडो-फ्रेंच राफेल सौदे को बदनाम करने की कोशिश कर चुके हैं।

भारत ने 2020 में फ्रांस से 36 राफेल लड़ाकू विमान खरीदे थे। यह सौदा भारतीय वायुसेना के लिए बेहद अहम साबित हुआ। इससे भारत को न सिर्फ अपनी हवाई ताकत बढ़ाने में मदद मिली, बल्कि पाकिस्तान के F-16 जेट्स पर बढ़त भी मिली।

रिपोर्ट्स के अनुसार, मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर में भारत के राफेल विमानों ने पाकिस्तानी सीमा से 100 किलोमीटर अंदर बहावलपुर को निशाना बनाया। ये हमले SCALP मिसाइलों से किए गए और खास बात ये रही कि हमला करने के लिए इन्हें पाकिस्तानी सीमा में घुसने की जरूरत भी नहीं पड़ी।

इस सौदे को लेकर 2018 में एक बड़ा राजनीतिक विवाद तब खड़ा हुआ जब फ्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद ने कहा कि मोदी सरकार ने डसॉल्ट एविएशन को रिलायंस डिफेंस के साथ साझेदारी करने के लिए कहा था। असल में भारत की रक्षा खरीद नीति के तहत विदेशी कंपनियों को सौदे के कम से कम 30% मूल्य का निवेश भारत में करना होता है, जिसे ‘ऑफसेट पॉलिसी’ कहा जाता है।

इस बयान को आधार बनाकर कॉन्ग्रेस पार्टी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर आरोप लगाए कि उन्होंने कारोबारी अनिल अंबानी को फायदा पहुँचाने के लिए सौदे में हस्तक्षेप किया और इसे ‘क्रोनी कैपिटलिज्म’ (अपने खास और करीबी उद्योगपतियों को लाभ पहुँचाना) बताया।

बीजेपी सरकार ने शुरू से इन आरोपों को खारिज किया। बीजेपी ने हमेशा ये स्पष्ट किया कि यह सौदा वायुसेना की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए हुआ था।

2019 के लोकसभा चुनावों में राहुल गाँधी ने इस मुद्दे को एक बड़ा चुनावी हथियार बनाया और राफेल सौदे को ‘घोटाला’ बताया। हालाँकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी को फटकार लगाई और कहा गया कि उन्होंने कोर्ट के नाम का गलत इस्तेमाल किया और राजनीतिक लाभ के लिए झूठ फैलाया।

रायबरेली से लोकसभा सांसद राहुल गाँधी ने एक बार प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए नारा दिया था ‘चौकीदार चोर है’। उन्होंने यह बात राफेल सौदे को लेकर कही थी और दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट ने भी इस पर टिप्पणी की है।

हालाँकि ये बयान सुप्रीम कोर्ट के फैसले को गलत तरीके से पेश करने के चलते विवाद में आ गया। इसके खिलाफ पूर्व केंद्रीय मंत्री मीनाक्षी लेखी ने सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका भी दायर की। राहुल गाँधी ने एक सुनवाई में इसके लिए माफी भी माँग ली थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट उनके हलफनामे से संतुष्ट नहीं था, इसलिए उनसे लिखित माफी माँगी गई।

इस मामले में आप सांसद संजय सिंह, TMC नेता यशवंत सिन्हा और अन्य नेताओं ने भी सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर राफेल डील की खरीद फरोख्त की प्रक्रिया में गड़बड़ी का आरोप लगाया और न्यायालय की निगरानी में जाँच की माँग की। 14 दिसंबर 2018 को सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह माँग खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि ऑफसेट पार्टनर के चयन में कोई गड़बड़ी नहीं पाई गई।

इसके बावजूद कॉन्ग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर भ्रष्टाचार और क्रोनी कैपिटलिज्म के आरोप लगाते हुए बेबुनियादी अभियान चलाया। इस अभियान में प्रोपेगेंडा मीडिया संस्थानों जैसे ‘द वायर’  और वामपंथी मीडिया हाउस ‘द हिंदू’  ने भी साथ दिया और बार-बार सौदे की कीमत और पारदर्शिता पर सवाल उठाने का प्रयास किया। लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट ने इन आरोपों को सही माना और न ही जनता ने। 2019 के लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने राहुल गाँधी के आरोपों को पूरी तरह नकारते हुए नरेंद्र मोदी की सरकार को ऐतिहासिक जीत दिलाई।

ऑपइंडिया ने अपनी रिपोर्ट में पहले भी खुलासा किया था कि ‘द हिन्दू’ अखबार के प्रकाशक और कस्तूरी एंड सन्स लिमिटेड के चेयरमैन एन. राम ने 2019 में राफेल सौदे को एक ‘रक्षा घोटाले’ के रूप में पेश करने की कोशिश की थी ताकि प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ नकारात्मक माहौल बनाया जा सके।

8 फरवरी 2019 को द हिन्दू ने एक रिपोर्ट छापी जिसमें रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी के नोट का हवाला दिया गया था। इसमें अधिकारी ने प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) राफेल सौदे की प्रगति के बारे में जानकारी लेने पर आपत्ति जताई थी।

द हिन्दू ने इस रिपोर्ट के जरिए यह दिखाने की कोशिश की कि रक्षा मंत्रालय खुद भी इस सौदे के खिलाफ था। लेकिन सच्चाई यह थी कि वह अधिकारी सौदे की बातचीत (negotiation) का हिस्सा ही नहीं था और उसकी आपत्ति का कोई ठोस आधार भी नहीं मिला।

सबसे अहम बात यह है कि उसी दस्तावेज में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर का एक नोट भी था। इसमें उन्होंने साफ लिखा था कि वह अधिकारी जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दे रहा है। उन्होंने बताया कि जैसा कि अंतरराष्ट्रीय रक्षा सौदों में होता है, सिर्फ प्रधानमंत्री कार्यालय तथा फ्रांस के राष्ट्रपति कार्यालय को ही सौदे की प्रगति के बारे में पूरी जानकारी थी।

अपने झूठे नैरेटिव को आगे बढ़ानेक के चक्कर में द हिन्दू ने जानबूझकर इस हिस्से को अपनी रिपोर्ट से हटा दिया। द हिन्दू अखबार की राफेल सौदे पर भ्रामक रिपोर्ट के तुरंत बाद ANI न्यूज एजेंसी ने पूरा दस्तावेज प्रकाशित किया। इसके बाद यह बात सबके सामने आ गई कि एन. राम ने रिपोर्ट को काट-छाँट कर प्रकाशित किया था।

ANI की रिपोर्ट के लगभग 10 दिन बाद द हिंदू ने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि उसने रिपोर्ट में कोई छेड़छाड़ नहीं की है। अपने कॉलम रीडर्स एडिटर में अखबार ने दावा किया कि उसके द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट एक पुराना संस्करण था, जिसमें रक्षा मंत्री का नोट शामिल नहीं था।

इसके सबूत के तौर पर द हिंदू ने उल्लेख किया कि ANI द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट में प्रत्येक नोट पर सीरियल नंबर थे, जबकि हिंदू द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट पर कोई सीरियल नंबर नहीं था।

बाद में जाँच के दौरान सामने आया कि द हिन्दू ने न सिर्फ दस्तावेज को दो जगह से काटा था, बल्कि उसमें मौजूद रक्षा मंत्री पर्रिकर की टिप्पणी छुपाने के लिए डिजिटल तरीके से एक स्टैंप का हिस्सा भी मिटा दिया था।

जाँच में यह भी साबित हुआ कि रक्षा सचिव के नोट से पहले मौजूद तारीख के स्टांप को भी जानबूझकर हटाया गया था। पूरा मामला यह दिखाता है कि राफेल सौदे को लेकर द हिन्दू  और उसकी पत्रिका ‘फ्रॉंटलाइन’ ने बार-बार सरकार पर झूठे आरोप लगाने की कोशिश की।

फ्रांस की एक मीडिया वेबसाइट मीडियापार्ट ने फर्जी बिल वाले रिपोर्ट्स प्रकाशित किए हैं। इसमें बताया गया है कि ये रिपोर्ट्स भारत और फ्रांस के बीच हुई राफेल लड़ाकू विमान डील में घोटाले का संकेत देते हैं। मीडियापार्ट ने बताया कि इन फर्जी बिलों की मानें तो डसॉल्ट कंपनी का भारत सरकार के साथ 36 राफेल जेट का सौदा हुआ था।

इन रिपोर्ट्स को भारत के कुछ वामपंथी रुझान रखने वाले मीडिया प्लेटफॉर्म जैसे कि द वायर, द हिंदू और न्यूज लाउंड्री ने बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया। विपक्ष के नेताओं ने भी इन्हीं रिपोर्ट्स को आधार बनाकर मोदी सरकार पर आरोप लगाए और राफेल डील की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) से जाँच की माँग की।

हालाँकि सच्चाई यह है कि जिन तथाकथित ‘फर्जी बिलों’ की बात की जा रही थी, वे उस समय के हैं जब UPA सरकार सत्ता में थी। इन बिलों के अनुसार करीब 11 मिलियन यूरो (लगभग 90 करोड़ रुपये) एक सिंगापुर स्थित कंपनी को दिए गए थे। ये भुगतान उस राफेल सौदे से जुड़े थे जिसे UPA सरकार अंतिम रूप देने की कोशिश कर रही थी।

बाद में जब NDA सरकार सत्ता में आई तो उसने UPA का प्रस्तावित सौदा रद्द कर दिया। और मोदी सरकार ने राफेल खरीदने के लिए फ्रांस से G2G स्तर पर नया समझौता किया। साल 2021 में विपक्ष ने इन मीडिया रिपोर्ट्स का सहारा लेकर संसद में भारी हंगामा किया और संसद सत्रों को भी बाधित किया। वहीं इन झूठे और भ्रामक रिपोर्ट्स को जारी करने की टाइमिंग पर भी सवाल उठे, क्योंकि माडियापार्ट ने संसद सत्र से ठीक दो हफ्ते पहले ये रिपोर्ट प्रकाशित की थी।

गौरतलब है कि राफेल डील पर जिस NGO ने शिकायत दर्ज करवाई थी , वह असल में मोदी विरोधी गुट के लिए काम करने वाले जॉर्ज सोरोस की संस्था ओपन सोसाइटी, मिजेरेओर और ऑक्सफैम जैसी संस्थाओं का साझेदार था।

यहाँ तक कि हाल ही में जब प्रोपेगेंडा पोर्टल द वायर ने ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारतीय वायुसेना के विमान को क्षति पहुँचने और वायुसेना के एक अधिकारी के बयान को तोड़-मरोड़कर पेश कर मोदी सरकार पर निशाना साधने की कोशिश की तो पोर्टल को भारत में बंद कर दिया गया था।

पाकिस्तान ने भारत विरोधी हथकंडे और चाल चलने के लिए हरसंभव प्रयास किए। इसमें द वायर ने चीन और पाकिस्तान की ओर से बैटिंग की। इसके बाद जब सरकार ने वेबसाइट को ब्लॉक कर दिया तो द वायर ने अपनी उस रिपोर्ट को हटा दिया।

इसमें कोई चौंकने वाली बात नहीं कि कॉन्ग्रेस और वामपंथी मीडिया पोर्टलों की ओर से चलाए जा रहे नैरेटिव ज्यादातर चीन के नैरेटिव से मेल खाता दिखता है। इनमें एक न्यूजक्लिक नाम का पोर्टल भी शामिल है जिसे 2023 में एंटी-राफेल जैसे मुद्दे को हवा देने और चीन से फंडिंग मिलने के मुद्दे पर बेनकाब किया गया था।

कॉन्ग्रेस और राहुल गाँधी का चीन के प्रति अटूट प्रेम

कॉन्ग्रेस और उसके युवराज राहुल गाँधी चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी (CCP) के साथ काफी गहरा और अटूट रिश्ता कायम करते हैं। राहुल गाँधी ने कई मौकों पर चीन की प्रशंसा के पुल बाँधे हैं।

मार्च 2023 में कैम्ब्रिज जज पब्लिक स्कूल में एक विवादास्पद बयान दिया। इसमें उन्होंने चीन को ‘उभरती हुई महाशक्ति’ बताया था। उन्होंने ये भी दावा किया था कि चीन में सामाजिक समरसता है।

2022 में द प्रिंट की कॉलमिस्ट श्रुति कपिला के साथ बातचीत के दौरान राहुल गाँधी ने चीन के विवादास्पद वेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव (BRI) के भी कसीदे पढ़े थे। इसे उन्होंने ‘समृद्धि’ कहा जबकि चीन की ये पहल कई देशों को कर्ज के जाल में फँसाने के लिए बदनाम है।

2023 में लद्दाख का दौरा करने के दौरान राहुल गाँधी ने दावा किया था कि चीन ने लद्दाख में भारत की चरागाह भूमि पर कब्जा कर लिया है। इससे पहले मई 2022 में अपने यूके दौरे के दौरान उन्होंने कहा था कि “लद्दाख चीन के लिए वही है जो यूक्रेन, रूस के लिए है।”

राहुल गाँधी ने पहले भी विदेशी शक्तियों को भारत के आंतरिक मामलों में दखल देने की बात कही है। 2020 में राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) के वित्तीय मामले उभरल कर सामने आए।

ऑपइंडिया ने पहले भी एक रिपोर्ट प्रकाशित की जिसमें ये बात सामने आई थी कि RGF को 2006 के बाद से चीन की सरकार की ओर से 1 करोड़ रुपए से भी अधिक की राशि भेजी गई।

2008 में UPA की सरकार के दौरान चीनी कम्यूनिस्ट पार्टी (CPC) और कॉन्ग्रेस सरकार ने उच्च स्तरीय जानकारी और साझेदारी के लिए एक समझौता भी किया था। इसमें दोनों देशों के बीच अहम द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों से सबंधित विकास पर बातचीत की बात शामिल थी।

ये बात गौरतलब है कि राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी वाड्रा इस राजीव गाँधी फाउंडेशन के 2005 से ही ट्रस्टी हैं और सोनिया गाँधी इस फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं। अब ये देखना काफी दिलचस्प है कि बदलते समय के साथ राजनीतिक लाभ के लिए साझेदार भी अपना पलड़ा बदल लेते हैं।

2017 में भी डोकलाम विवाद के दौरान भी राहुल गाँधी ने चीनी राजदूत लुओ झाओहुई से भारत में गुपचुप मुलाकात की थी। सितंबर 2018 में कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान भी उन्होंने चीन के मंत्रियों से गुप्त मुलाकात की थी।

इससे पहले 8 जुलाई 2017 को राहुल गाँधी और लुओ झाओहुई की एक निजी बैठक हुई। कॉन्ग्रेस ने उस समय इस बैठक पर मीडिया रिपोर्ट्स को फर्जी कहा। हालाँकि बाद में चीनी दूतावास ने अपनी वेबसाइट पर ही बैठक की पुष्टि कर दी। इसके बाद राहुल गाँधी को भी इश मुलाकात की पुष्टि करनी पड़ी।

फरवरी 2025 में राहुल गाँधी के करीबी और इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने चीन के खतरे को कमतर दिखाने की कोशिश की और कहा कि चीन ‘हमारा दुश्मन नहीं’ है।

IANS न्यूज एजेंसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि चीन से क्या खतरा है। मुझे लगता है कि इस विषय को अक्सर बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है।”

सैम पित्रोदा ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह चीन के खिलाफ नकारात्मक धारणा बनाता है। साथ ही भारत पर भी इस बात का दोष मढ़ना नहीं भूले कि भारत कम्युनिस्ट शासन के प्रति टकराव की मानसिकता रखता है।

उन्होंने कहा, “यह मान लेना कि चीन शुरू से ही दुश्मन है, ये सही नहीं है। अब समय आ गया है कि हम बातचीत बढ़ाएँ, सहयोग करें, और एकसाथ मिलकर विकास करें। चीन हमारे आस-पास है और वह विकास कर रहा है।”

कॉन्ग्रेस की चीन के प्रति यह रुचि महज राफेल सौदे के विरोध या समझौतों पर हस्ताक्षर और RGF को चीनी फंडिंग तक ही सीमित नहीं है। राहुल गाँधी ने भारतीय संसद में भी चीन की सैन्य प्रणाली पर खास रुचि दिखलाई है।

2021 में राहुल गाँधी ने लोकसभा में सवाल किया था कि भारतीय सुरक्षा बल चीन के सर्विलांस (निगरानी) ड्रोन का इस्तेमाल क्यों नहीं करते। साथ ही वह लद्दाख गतिरोध के दौरान PLA की रणनीति की प्रशंसा करना नहीं भूले।

2023 में यूके के दौरे में उन्होंने दावा किया कि चीन ‘टेकनोलॉजी रेस’ में काफी आगे है। साथ ही भारत को चीनी सैन्य नवाचार और विशेष तौर पर ड्रोन युद्ध से सीखने की सलाह भी दे डाली।

फरवरी 2025 में संसद में अपने 45 मिनट के भाषण के दौरान राहुल गाँधी ने चीन का लगभग 34 बार नाम लिया। इसमें उन्होंने चीन के मैनुफैक्चरिंग सेक्टर और तकनीकी प्रगति के बारे में कई बातें कहीं।

इसी वर्ष फरवरी में राहुल गाँधी ने एक प्रतिबंधित चीनी ड्रोन को सोशल मीडिया पर साझा किया। उनकी ये पोस्ट चीन की ओर से प्रायोजित विज्ञापन के जैसे लग रही थी। इसमें वे कहते नजर आए कि भारत को सिर्फ बातों के बजाय ड्रोन निर्माण के लिए ‘उत्पादन के लिए मजबीत बेस’ चाहिए।

चीन की रक्षा प्रणाली को बेहतर दिखाने के चक्कर में राहुल गाँधी ने भारतीय ड्रोन उद्योग को नीचा दिखाने की कोशिश की। कहा जा सकता है कि शायद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में स्वदेशी ड्रोन की सफलता से राहुल गाँधी कुछ असहज हो गए।

राहुल गाँधी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, “ड्रोन केवल एक तकनीक नहीं हैं, वे एक मजबूत औद्योगिक प्रणाली से उत्पन्न नवाचार हैं। दुर्भाग्य से, पीएम मोदी इसे समझने में विफल रहे हैं। जब वे टेलीप्रॉम्प्टर का सहारा लेकर AI पर भाषण दे रहे होते हैं तो उस समय हमारे प्रतिस्पर्धी नई तकनीकों में महारत हासिल कर रहे हैं। भारत को केवल शब्दों की नहीं, एक मजबूत उत्पादन आधार की जरूरत है।”

इस साल जून में राहुल गाँधी ने तथ्यों और आँकड़ों को ताक पर रखते हुए ये दावा किया कि मोदी सरकार की ‘मेक इनइंडिया’ पहल असल में सिर्फ ‘असेम्बल इन इंडिया’ है और चीन मैनुफैक्चरिंग सेक्टर में भारत से काफी आगे है। हालाँकि ऑपइंडिया ने गाँधी के चीनी प्रेम पर आधारित दावों का आँकड़ों के जरिए खंडन भी छापा।

निष्कर्ष

ये बात तो साफ है कि BJP सरकार का विरोध करने के चक्कर में विपक्षी दलों और वामपंथी मीडिया ने चीनी प्रोपेगेंडा को बढ़ावा देने, राष्ट्रीय सुरक्षा विमर्श को कमतर करने और यहाँ तक कि राफेल सौदे के लिए भी अनर्गल बात करने में पीछा नहीं रहे।

विपक्ष और वामपंथी मीडिया इस तरह लगातार चीन की पैरवी करने और चीनी के प्रोपेगेंडा को दोहराकर भारत सरकार पर हमला बोलने से भी नहीं चूकते। अपने ही देश के राष्ट्रीय हितों के साथ ये एक विश्वासघात ही है।

इस खबर को मूल रूप से अंग्रेजी में श्रद्धा पांडे ने लिखा है। मूल कॉपी को पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें। इसका अनुवाद किया है सौम्या सिंह ने

उन लड़कियों को भूल गईं स्वरा भास्कर जिन्हें नंगा कर प्राइवेट पार्ट में मारी गोली, जिनके शवों तक से हुआ रेप: हमास आतंकियों से ‘हमदर्दी’ में इजरायली बंधकों से बर्बरता को बता रही ‘अफवाह’

इजरायल पर हमास आतंकियों के हमले के 2 साल होने वाले हैं। अभी भी हमास की कैद में करीब 50 इजरायली हैं, जिसमें से माना जा रहा है कि 28 लोगों की मौत हो चुकी है। इस बीच, हमास की कैद से छूटे एक इजरायली ने अपनी आपबीती बताते हुए हमास के आतंकियों की बर्बरता को बयान किया है।

टाइम्स ऑफ इजरायल पर कीथ सीगल की आपबीती छपी है। कीथ सीगल एक अमेरिकी-इजरायली हैं, जिन्हें 7 अक्टूबर 2023 को किबुत्ज कफर आजा से हमास ने अगवा कर लिया था। उन्होंने बताया कि वहाँ एक महिला बंधक को बहुत बुरी तरह सताया गया। उसे माथे पर नुकीली रॉड और सिर पर बंदूक रखी गई। कीथ को फरवरी 2025 में रिहा किया गया, लेकिन वो अभी भी सदमे में हैं। उन्होंने बताया कि मटान अंगरेस्ट नाम के सैनिक के साथ वो कैद में थे, जो 7 अक्टूबर को बुरी तरह जख्मी हो गया था। मटान को सांस लेने में दिक्कत थी और उसे बचाने के लिए हमास ने उसे सुरंग से बाहर निकाला।

कीथ सीगल ने अपनी कैद के बारे में बताया। उसने कहा कि उसने एक महिला बंधक को भयानक यातनाएँ झेलते देखा। आतंकियों ने उसके माथे पर नुकीली रॉड रखी और सिर पर बंदूक तानी। कीथ ने बताया कि उसे और अन्य बंधकों को बार-बार मारने की धमकी दी जाती थी।

ऐसी ही एक और गवाही लिशाय मिरान-लवी की है, जिनके पति ओमरी मिरान अभी भी बंधक हैं। उन्होंने बताया कि उनके पति को हर मिनट यातनाएँ दी जा रही हैं। हमास ने यौन हिंसा को एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया, जैसा कि पहले आईएसआईएस और बोको हरम जैसे आतंकी संगठन कर चुके हैं। कई पीड़ितों के शव बिना कपड़ों के, हाथ बंधे हुए और अंग-भंग की हालत में मिले। इजरायल ने हमास को युद्ध में यौन अपराधों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया।

लंदन के अखबार द टाइम्स की एक जाँच रिपोर्ट में 15 रिहा हुए बंधकों, एक रेप से बची महिला और 17 प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों का जिक्र है। इन गवाहों ने बताया कि हमास ने कम से कम 6 अलग-अलग जगहों पर रेप और गैंगरेप किए। कई पीड़ितों के शव बिना कपड़ों के मिले, उनके हाथ बंधे थे और प्राइवेट पार्ट्स तक को विकृत (काटा गया, गोली मारी गई) किया गया था।

हमास की हैवानियत: 7 अक्टूबर की वह काली तारीख

हमास ने 7 अक्टूबर 2023 को इजरायल पर अचानक हमला बोला। यह हमला इतना सुनियोजित और क्रूर था कि पूरी दुनिया स्तब्ध रह गई। आतंकियों ने जमीन, पानी और हवा… तीनों रास्तों से इजरायल में घुसपैठ की। उन्होंने नागरिक इलाकों में घुसकर औरतों, बच्चों और बूढ़ों को निशाना बनाया। इस हमले में 1200 से ज्यादा लोग मारे गए, 2200 से ज्यादा घायल हुए और 251 लोग बंधक बनाए गए। आज भी 50 बंधक हमास की कैद में हैं, जिनमें से 28 की मौत की पुष्टि हो चुकी है।

हमास की क्रूरता का सबसे बड़ा निशाना दक्षिणी इजरायल में चल रहा एक म्यूजिक फेस्टिवल बना। इस फेस्टिवल में 3000 से ज्यादा लोग मौजूद थे, ज्यादातर युवा। आतंकियों ने पहले इलाके को घेरा, फिर अंधाधुंध गोलियाँ बरसाईं। इस हमले में 260 से ज्यादा लोगों की हत्या हुई।

जर्मन नागरिक शानी लौक भी इसी फेस्टिवल में थीं। हमास के आतंकियों ने उनकी हत्या की, उनके शव को नग्न करके पिकअप ट्रक में लादा और फिलिस्तीन में परेड निकाली। भीड़ ने उनके शव पर थूका और नारे लगाए। शानी की माँ ने बाद में अपील की कि कम से कम उनकी बेटी का शव वापस कर दिया जाए। यही नहीं, शानी के इंटग्रास अकाउंट तक पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने उसकी मौत का जश्न मनाया और घटिया कमेंट्स किए।

ऐसी ही एक और महिला नोआ को भी हमास ने अगवा किया। वीडियो में दिखता है कि आतंकी ‘अल्लाहु अकबर’ के नारे लगाते हुए औरतों को गाड़ियों में भर रहे हैं। कई औरतों के साथ रेप की खबरें सामने आईं। एक इजरायली शख्स योनी आशेर ने बताया कि उन्होंने एक वायरल वीडियो में अपनी पत्नी और बेटी को देखा, जिन्हें हमास के आतंकी ट्रक में लादकर ले गए। योनी आशेर ने अपनी पत्नी के फोन को ट्रैक किया, जो गाजा में मिला।

हमास की बर्बरता: रेप, अंग-भंग और लाशों के साथ हैवानियत

हमास की क्रूरता सिर्फ हत्याओं तक सीमित नहीं थी। प्रत्यक्षदर्शियों और रिहा हुए बंधकों ने जो बताया, वो रोंगटे खड़े करने वाला है। आतंकियों ने औरतों के साथ रेप किया, गैंगरेप किया, उनके स्तन काटे, प्राइवेट पार्ट्स में गोली मारी। कई मामलों में लाशों के साथ भी रेप किया गया। द टाइम्स की रिपोर्ट में एक सह-लेखक शारोन जगागी ने बताया कि कई गवाहों ने देखा कि हमास ने पीड़ितों को गोली मारने के बाद उनके शवों के साथ रेप की कोशिश की।

हमास की करतूत की निंदा हर तरफ हुई। संयुक्त राष्ट्र से लेकर कई देशों ने इस हमले को आतंकवादी करार दिया और यौन हिंसा को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। लेकिन भारत में स्वरा भास्कर जैसे कुछ लोग और इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ सहानुभूति रखने वाले हमास को क्लीन चिट देने की कोशिश कर रहे हैं। यह शर्मनाक है कि ऐसे लोग तथ्यों को नजरअंदाज करके आतंकवाद का समर्थन करते हैं।

दरअसल, पार्ट टाइम हिरोइन और फुल टाइम एक्टिविस्ट स्वरा भास्कर चाहती है कि इन सब पर बात न हो। वो हमास की बर्बरता को अफवाह बताती है और वो चाहती है कि इस पर बात न हो।

ये पूरी दुनिया जानती है कि 7 अक्टूबर 2023 को हमास के इजरायल पर हमले के दौरान क्या-क्या हुआ और अभी पूरी दुनिया हमास की उस क्रूरता के बारे में बात कर रही है। लेकिन स्वरा ने अपने ट्वीट में उल्टा इजरायल पर इल्ज़ाम लगाए। यही नहीं, उसने कहा कि हमास ने कोई भी यौन उत्पीड़न नहीं किया। इसके साथ ही उसने कहा कि इजरायल दशकों से फिलिस्तीनी कैदियों के खिलाफ रेप और यौन उत्पीड़न का इस्तेमाल कर रहा है। स्वरा ने बीबीसी की रिपोर्ट को खारिज करते हुए सारा दोष इजरायल पर ही मढ़ दिया। वैसे, ये काम वो पहले भी कर चुकी है और उसका गैंग भी।

यह ट्वीट स्वरा की उस पुरानी आदत को दिखाता है, जिसमें वो बिना पूरी तस्वीर देखे, एकतरफा दावे करती हैं। हमास की बर्बरता के सामने, जिसे दुनिया ने वीडियो, गवाहों और पीड़ितों के बयानों से देखा, स्वरा का यह दावा न सिर्फ गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि आतंकवाद को सफेद चादर ओढ़ाने की कोशिश भी लगता है।

स्वरा की इस नौटंकी का मकसद सिर्फ हेडलाइन बनाना और अपने फॉलोअर्स को खुश करना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वो सचमुच उन तस्वीरों और वीडियो को नजरअंदाज कर सकती हैं, जहाँ हमास के आतंकियों ने औरतों, बच्चों और बूढ़ों के साथ हैवानियत की सारी हदें पार कीं?

स्वरा के दावे कि हारेत्ज़ और अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने हमास की क्रूरता को खारिज किया, पूरी तरह बेबुनियाद हैं। हारेत्ज़ ने कभी ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं छापी। उल्टा संयुक्त राष्ट्र और कई मानवाधिकार संगठनों ने हमास की बर्बरता की पुष्टि की है। स्वरा की इस हरकत से साफ है कि वो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर एक खास नैरेटिव चलाना चाहती हैं, जिसमें हमास को पीड़ित और इजरायल को खलनायक दिखाया जाए। ऐसी सोच न सिर्फ खतरनाक है, बल्कि उन पीड़ितों का अपमान भी है, जिन्होंने हमास की क्रूरता को झेला।

स्वरा जैसे लोगों की मानसिकता ही घटिया

हमास की बर्बरता को नजरअंदाज करने वाले स्वरा भास्कर और उसके जैसे तथाकथित सेकुलर लोगों की मानसिकता पर सवाल उठता है। ये लोग आतंकवाद को जायज ठहराने की कोशिश करते हैं, क्योंकि ये उनके नैरेटिव को सूट करता है। स्वरा को शानी लौक का अपहरण, उसकी हत्या और शव की परेड ड्रामा लगती है, क्योंकि वो खुद कैमरे के सामने नौटंकी करने में माहिर हैं। लेकिन क्या वो उन माँओं का दर्द समझ सकती हैं, जिनकी बेटियों को हमास ने नग्न करके सड़कों पर घसीटा? क्या वो उन बच्चों का दुख समझ सकती हैं, जिनके सामने उनकी माँओं के साथ रेप हुआ?

स्वरा और उनके जैसे लोग सिर्फ हेडलाइन बेचने के लिए ऐसी बातें करते हैं। इनका कोई वास्तविक स्टैंड नहीं है, बस हर बार वो उस तरफ खड़े हो जाते हैं, जो उनके लिए सुर्खियाँ लाए। इनके लिए लानतें ही भेजी जा सकती हैं, क्योंकि ये सच को दबाकर झूठ को चमकाने की कोशिश करते हैं। भारत जैसे देश में जहाँ लोग शांति और इंसानियत की बात करते हैं, ऐसे लोग समाज के लिए खतरा हैं।

सच को दबाने की कोशिश बेकार है स्वरा

स्वरा भास्कर का ट्वीट और उनकी सोच उन लोगों का प्रतिनिधित्व करती है, जो सच को तोड़-मरोड़ कर अपने एजेंडे को चमकाना चाहते हैं। लेकिन हमास की हैवानियत को कोई नहीं छिपा सकता। 7 अक्टूबर 2023 की घटनाएँ, शानी लौक, नोआ, और सैकड़ों अन्य पीड़ितों की कहानियाँ और रिहा हुए बंधकों के बयान इस बात का सबूत हैं कि हमास ने इंसानियत को शर्मसार किया। दुनिया को अब एकजुट होकर ऐसी बर्बरता के खिलाफ खड़ा होना होगा और स्वरा जैसे लोगों को उनकी नौटंकी के लिए जवाबदेह बनाना होगा।

30 KG के X-गॉर्ड डिकॉय को राफेल समझ मिसाइल चलाता रहा पाकिस्तान, ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भारत ने AI तकनीक से बनाया बेवकूफ: रक्षा विशेषज्ञ ने कहा- ये बेस्ट स्पूफ सिस्टम

‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जिस तरह भारतीय सेना ने पाकिस्तान की फ़ौज के ठिकानों को तबाह किया, उसकी कहानियाँ अब भी सामने आ रही हैं। वायु सेना हो या थल सेना, उनकी रणनीतियाँ अब रक्षा विशेषज्ञों की चर्चा का विषय बन रही हैं।

अब इस मामले में खुलासा हुआ है कि इस दिन के ऑपरेशन के दौरान के दौरान भारतीय वायुसेना ने राफेल लड़ाकू विमानों के साथ ‘X-गार्ड’ नाम का आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर बना टो डिकॉय सिस्टम का इस्तेमाल किया।

X-गार्ड एक हल्का (लगभग 30 किलो का) AI से चलने वाला डिकॉय सिस्टम है। इसे राफेल एडवांस्ड डिफेन्स सिस्टम्स ने विकसित किया है। यह सिस्टम 100 मीटर लंबे फाइबर-ऑप्टिक वायर से विमान के पीछे चलता है और 500 वॉट का 360-डिग्री जैमिंग सिग्नल पैदा करता है।

यह सिग्नल रडार और मिसाइल सिस्टम को असली विमान की तरह दिख का धोखा देता है। इसमें रडार इमिशन और डॉपलर इफेक्ट जैसी विशेषताएँ होती हैं। यानी दुश्मन को यह कोई विमान जैसा जैसा दिखता है जबकि असल में यह एक अलग सिस्टम होता है। पूर्व F-16 पायलट रयान बोडनहाइमर ने इसे आधुनिक हवाई लड़ाई में एक बड़ा मोड़ बताया है।

उन्होंने X-गार्ड को ‘अब तक का सबसे बेहतरीन स्पूफिंग और धोखा देने वाला सिस्टम’ कहा। उनका मानना है कि इस तकनीक ने इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के नियम ही बदल दिए हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारतीय राफेल को निशाना बनाने के लिए पाकिस्तान ने चीनी PL-15E एयर-टू-एयर मिसाइलें और J-10C फाइटर जेट्स तैनात किए थे।

लेकिन X-गार्ड ने इन मिसाइलों और रडार सिस्टम को धोखा देकर उन्हें असली विमान के बजाय डिकॉय पर निशाना लगाने पर मजबूर कर दिया। PL-15E मिसाइल, जो कि चीन की PL-15 का एक निर्यात वर्जन है, उसमें अत्याधुनिक स्पूफिंग रेजिस्टेंस नहीं है। यानी वह ऐसी तकनीकों को चकमा नहीं दे सकती।

इसलिए वह X-गार्ड के नकली सिग्नल से भ्रमित हो गई। संभवतः J-10C के KLJ-7A AESA रडार को भी यह लगा कि उन्होंने असली राफेल को लॉक किया है, जबकि वह डिकॉय था।

पाकिस्तान की सेना ने जिन डिकॉय सिस्टम को गिराया, उन्हें असली राफेल मान लिया और खूब शोर मचाया कि उन्होंने 4-5 भारतीय फाइटर जेट मार गिराए। लेकिन जब उनसे सबूत माँगे गए तो पाकिस्तानी रक्षा मंत्री का जवाब था, ‘ये सब सोशल मीडिया पर है।’

एक्स-गार्ड के अलावा भारतीय डिकॉय ड्रोन ने भी अहम भूमिका निभाई। ये ड्रोन ऐसे हीट सिग्नेचर (गर्मी के निशान) बनाते हैं जैसे कि असली फाइटर जेट बनाते हैं। इससे पाकिस्तानी एयर डिफेंस सिस्टम और भी ज्यादा भ्रमित हो गया।

‘रेपिस्ट मोनोजित मिश्रा को बचा रहा TMC का MLA, FIR से भी हुई छेड़छाड़’: BJP की फैक्ट फाइंडिंग टीम ने कोलकाता लॉ कॉलेज रेप केस में JP नड्डा को सौंपी रिपोर्ट, कहा- केन्द्रीय एजेंसी करे जाँच

कोलकाता गैंगरेप केस में बीजेपी की फैक्ट-फाइंडिंग टीम ने अपनी रिपोर्ट पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को सौंप दी है। टीम ने इस मामले में केंद्रीय एजेंसी से जाँच कराने की सिफारिश की है।

बीजेपी का कहना है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था की स्थिति खराब है और पुलिस की भूमिका संदिग्ध है।

बीजेपी के आरोप

बीजेपी की फैक्ट-फाइंडिंग टीम में पूर्व केंद्रीय मंत्री सत्य पाल सिंह, मीनाक्षी लेखी, राज्यसभा सांसद मनन कुमार मिश्रा और लोकसभा सांसद बिप्लव कुमार देब शामिल थे। टीम ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर आरोप लगाए हैं।

FIR में छेड़छाड़- बीजेपी का आरोप है कि पीड़ित छात्रा की हाथ से लिखी शिकायत में आरोपितों के नाम मिटा दिए गए और उनकी जगह कुछ अक्षर (J, G, S, M) लिख दिए गए।

TMC पर आरोप- BJP ने कलकत्ता लॉ कॉलेज के वाइस प्रिंसिपल और TMC विधायक अशोक देब पर बलात्कार के आरोपितों को बचाने का आरोप लगाया है।

पुलिस की भूमिका- बीजेपी का कहना है कि पुलिस पीड़ित के परिवार को छिपा रही है और चौथे आरोपित सुरक्षा गार्ड से किसी को मिलने नहीं दे रही।

कानून व्यवस्था- बीजेपी नेताओं ने पश्चिम बंगाल में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराधों और पुलिस की निष्क्रियता पर चिंता जताई है। पुलिस से जब पूछा कि आरोपितों के नाम क्यों मिटाए तो उन्होंने टालमटोल किया।

जेपी नड्डा ने कहा कि यह रिपोर्ट पश्चिम बंगाल में अराजकता और महिला सुरक्षा के प्रति राज्य सरकार की संवेदनशीलता की कमी को उजागर करती है।

लोकसभा सांसद बिप्लव कुमार देब ने कहा है कि ममता बनर्जी इस घटना की नैतिक जिम्मेदारी लें या फिर इस्तीफा दें।

कोर्ट का रुख

कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस मामले में तीन जनहित याचिकाओं पर पश्चिम बंगाल सरकार से जवाब माँगा है। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि कॉलेज की गवर्निंग बॉडी को इस मामले में शामिल क्यों नहीं किया गया।

मामला क्या था?

पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता के कसबा इलाके के साउथ कलकत्ता लॉ कॉलेज में 25 जून 2025 को एक लॉ की छात्रा से कथित तौर पर गैंगरेप हुआ था।

30 जून 2025 को कोलकाता पुलिस ने बताया कि इस मामले के तीन मुख्य आरोपितों को 12 घंटे से भी कम समय में गिरफ्तार कर लिया गया है।

पुलिस ने 4 जुलाई 2025 को आरोपितों को कॉलेज ले जाकर क्राइम सीन रीकंस्ट्रक्ट भी किया।

शाहीन बाग़, राकेश टिकैत, विनेश-बजरंग… क्या ‘डीप स्टेट’ का नया मोहरा है प्रशांत किशोर? नॉर्वे की राजदूत से मुलाक़ात के बाद उठे सवाल: क्या बिहार में ‘क्रान्ति’ की साजिश?

बिहार में प्रशांत किशोर और नॉर्वे के राजनयिक की गुप्त बैठक के बाद एक बार फिर डीप स्टेट टुलकिट की चर्चा होने लगी है। कई देशों को अस्थिर कर चुका ये टुलकिट भारत में कई बार अपना हाथ आजमा चुका है। किसान आंदोलन, पहलवान आंदोलन, अन्ना आंदोलन और उसके बाद केजरीवाल की मदद कर चुका है। सीसीए के खिलाफ देशभर में हुए विरोध प्रदर्शन और सबसे बड़ा शाहीन बाग आंदोलन ऐसे टुलकिट के जरिए मिले विदेशी फंडिंग के दम पर फले-फूले।

बिहार में नार्वे की दिलचस्पी क्यों?

भारत में नॉर्वे की राजदूत एलिन स्टेनर ने राजनीतिक रणनीतिकार से राजनेता बने प्रशांत किशोर से पटना में उनके आवास पर बैठक की है। देखने में यह एक सामान्य कूटनीतिक मुलाकात लग सकती है। लेकिन नॉर्वे के इतिहास और बिहार के लिए प्रशांत किशोर की महत्वाकांक्षा को देखते हुए कई राजनीतिक जानकार इस मुलाकात की जाँच कराने की माँग कर रहे हैं।

अलग-अलग राजनीतिक दलों के लिए चुनावी रणनीतियाँ बनाने वाले प्रशांत किशोर अब जन सुराज पार्टी बना कर बिहार के चुनावी राजनीति में पैर जमाने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ये मुलाकात कहीं बिहार से संबंधित तो नहीं है? क्या किसी इंटरनेशनल संगठन की बिहार में विशेष रुचि हैं? ये भारत की अस्थिर करने की साजिश तो नहीं? या बिहार में निवेश को लेकर प्रशांत किशोर गंभीर हो रहे हैं, हालाँकि उन्होंने पहले ही कह दिया है कि बिहार को किसी बड़े कारखाने की जरूरत ही नहीं है। इस दौरान उन्होंने नार्वे के विकास की बात भी कही थी।

तो क्या निवेश और पर्यावरण के नाम पर अब प्रशांत किशोर को नार्वे अपने एजेंडे के तहत सेट कर रहा है? प्रशांत किशोर को बिहार का अभिजात्य वर्ग भी पसंद कर रहा है। ऐसे में प्रशांत किशोर के सहारे अनौपचारिक किंगमेकर बनने की कोशिश नार्वे कर सकता है, ताकि भारत के संघीय ढाँचे को नुकसान पहुँचाया जा सके। कई लोग तो प्रशांत किशोर और उनकी पार्टी की विदेशी फंडिंग की जाँच की माँग भी कर रहे हैं।

रामलीला मैदान से शाहीन बाग तक हुई विदेशी फंडिंग

ये पहली बार नहीं है जब विदेशी फंडिंग को लेकर चर्चा हो रही है। दिल्ली के रामलीला मैदान में हुआ अन्ना आंदोलन और उससे निकलने वाली आम आदमी पार्टी और पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल के विदेशी फंडिंग की जाँच सरकार कर रही है। ED ने आम आदमी पार्टी को 2014 से 2022 के बीच 7.08 करोड़ रुपए का विदेशी फंड मिलने की जानकारी गृहमंत्रालय को दी थी। इसमें अमेरिका,कनाडा, सऊदी अरब, यूएई से लेकर कई यूरोपीय देश शामिल हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि अब केजरीवाल का ग्राफ नीचे जाते ही प्रशांत किशोर विदेशियों के लिए नए विकल्प के रूप में सामने आ रहे हैं।

इससे पहले सीएए के खिलाफ देशभर में हुई हिंसा और शाहीन बाग आंदोलन में विदेशी ताकतों का हाथ होने की बात सामने आई। ईडी ने साफ तौर पर पीएफआई की फंडिंग की बात की थी। इतना ही नहीं पीएफआई से कॉन्ग्रेस और आम आदमी पार्टी के संपर्क की बात भी ईडी ने कही थी।

किसान आंदोलन में विदेशी फंडिंग की जाँच

यही हाल किसान आंदोलन और महिला पहलवानों के विरोध का भी रहा। केन्द्र सरकार ने अमेरिकन अरबपति जॉज सोरोस के नेतृत्व वाला ऑपन सोसाइटी फाउंडेशन पर आंदोलन को आर्थिक मदद करने का आरोप लगाया था। आंदोलन का मकसद भारत की आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करना और देश को अस्थिर करना था। किसान आंदोलन का नेतृत्व करने वाले राकेश टिकैत पर खुद उनके सहयोगियों ने भी विदेशी फंडिंग का आरोप लगाया था।

भारत के आंतरिक मामलों में दिलचस्पी

नॉर्वे ने भारत-पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर खुद को ‘तटस्थ’ बताते हुए मध्यस्थता का प्रस्ताव दिया था। लेकिन भारत ने इसे सिरे से खारिज कर दिया क्योंकि कश्मीर मामले में ‘बाहरी हस्तक्षेप’ हमें कभी कबूल नहीं रहा। अब बिहार के बहाने भारत में फिर से दिलचस्पी लेना एक पूर्वनियोजित रणनीति का हिस्सा लगता है।

क्या है डीप स्टेट?

डीप स्टेट खुफिया तंत्रों सीआईए, एफबीआई जैसे अमेरिकन इंटेलिजेंस एजेंसी का नेटवर्क है। इनमें दुनिया के सरकारी और गैर सरकारी अभिजात्य वर्ग शामिल हैं, जो लोकत्रांतिक रूप से चुनी गई सरकार से ज्यादा ताकतवर है। ये दुनिया के किसी भी कोने में सरकारों को बनाने- गिराने का माद्दा रखती है।

ओस्लो का डीप स्टेट के साथ रिश्ता काफी गहरा है। नाटो के साथ उसका ऐतिहासिक समझौता है और डीप स्टेट का सेंटर ऑस्लो में है। दुनिया का सबसे बड़ा हथियार निर्यातक देश नॉर्वे हर हाल में सीआईए को भी सूट करता है।

डीप स्टेट का टूलकिट

नॉर्वे की सोच और उसका ‘इंटरनेशनल लगाव’ जगजाहिर है। खास पैटर्न को अपनाते हुए ये लोग पहले उन क्षेत्रों की पहचान करते हैं जिन्हें पहले से ही अस्थिर या असफल माना जाता है, जैसे- लीबिया, इथियोपिया, कोलंबिया या बिहार, भारत। एक बार लक्ष्य तय होने के बाद ये अपनी ‘ऑयल फंड’ का इस्तेमाल करते हैं। इसके लिए गैर-सरकारी संगठनों, खास दलों और विदेशी सहायता से कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं ताकि स्थानीय स्तर पर प्रभाव बढ़ाया जा सके।

नॉर्वे रहा है टूलकिट का हिस्सा

नॉर्वे प्रगतिशील और निष्पक्ष, मानवाधिकार की बात करने वाले देश होने की बात करता है लेकिन इसकी विदेश नीति लोकतंत्र को बढ़ावा देने की आड़ में बार-बार संप्रभु राष्ट्रों को अस्थिर करने की रही है। श्रीलंका में लिट्टे जैसे संगठन का समर्थन कर सालों तक देश को अस्थिर रखा गया। वही हाल लीबिया, इथियोपिया, सीरिया, कोलंबिया जैसे देशों का हुआ।

लीबिया में हस्तक्षेप की बात नॉर्वेजियन अधिकारियों ने खुद स्वीकार किया है। 2011 में गद्दाफी को हटाने के लिए नाटो अभियान में नॉर्वे शामिल हुआ। उसने 596 हमले किए और 588 बम गिराए। इसका नतीजा ये रहा कि आतंकवाद और अराजकता से घिरा एक ऐसे राष्ट्र के रूप में लीबिया सामने आया जहाँ की स्थिति बद से बदत्तर होती चली गई। खुद नार्वे ने माना कि “गर्व करने लायक फैसला नहीं था”।

नॉर्वे के विदेशी कारनामे किसी से छिपे नहीं हैं। ओस्लो में “डीप स्टेट” मशीनरी का इस्तेमाल कर इसे आसान बनाया जाता है। इस मशीनरी में नाटो, अमेरिकी खुफिया विभाग और ऑपरेशन ग्लैडियो जैसे खुफिया नेटवर्क शामिल हैं।

नॉर्वे दुनिया का सबसे बड़े हथियार निर्यातक देशों में शामिल है और उसने हाल के युद्धों में अमेरिका और इज़राइल को छोड़कर बाकी सभी देशों से ज्यादा हिस्सा लिया है।

तेल का हथियार के रूप में इस्तेमाल

नॉर्वे का 1.4 ट्रिलियन डॉलर का सॉवरेन ऑयल फंड उसे मजबूत बना रहा है। ये मुनाफा रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान यूरोप के ऊर्जा संकट से हुए रिकॉर्ड “युद्ध मुनाफ़े” पर आधारित है। क्योंकि कई देशों ने रूस से ऑयल खरीदना बंद कर दिया था। इसका फायदा नॉर्वे को मिला।

सॉवरेन ऑयल फंड की वैल्यू दुनिया में दखलंदाजी के लिए काफी है। इसने क्लिंटन फाउंडेशन, बिल गेट्स की परियोजनाओं और नाटो से जुड़े दुनिया के कई देशों में शासन बदलने की कोशिशों में लगे संगठनों को मदद करता है। यही वजह है कि अर्थशास्त्री अब नॉर्वे से आग्रह कर रहे हैं कि वह इस फंड का उपयोग यूक्रेन की आर्थिक मदद के लिए करे।

प्रशांत के बहाने बिहार आएगा ‘ऑयल फंड’

दिल्ली में केजरीवाल सरकार का जाना, आम आदमी पार्टी का कमजोर पड़ना और शाहीन बाग- किसान विरोध जैसे आंदोलन के नहीं चलने के बाद अब डीप स्टेट टूलकिट के जद में प्रशांत किशोर आ गए हैं। ये टूलकिट ऐसे लोगों की तलाश करते हैं जो महत्वाकांक्षी हो, जमीन पर दिख रहा हो और जिसे मिला कर ‘अनौपचारिक किंगमेकर’ बन सकें।

खास बात ये हैं कि ये टूलकिट ऐसे प्रयासों को किसी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं मानते बल्कि लोकतंत्र या मानवीयता के लिए ‘जरूरी’ मानते हैं। इस सोची-समझी रणनीति का खुलासा नॉर्वे के पूर्व प्रधानमंत्री जेन्स स्टोलटेनबर्ग (अब नाटो महासचिव) ने लीबिया के संबंध में किया था- “नॉर्वे लीबिया पर हमले में शामिल हुआ क्योंकि ‘यह नॉर्वेजियन वायु सेना के लिए एक अच्छा अभ्यास होगा’।”

प्रशांत किशोर और नार्वे के राजदूत के बीच बैठक महज कूटनीतिक नहीं है। ये भारत को अस्थिर करने की रणनीति का हिस्सा है। इसके लिए तरह- तरह से फंडिंग कर चुनाव को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश किए जाने का अंदेशा है। इसलिए भारत को सभी गैर-सरकारी संगठनों को होने वाली फंडिंग का ऑडिट करना चाहिए।

बिहार का भविष्य बिहारियों द्वारा तय किया जाना चाहिए। एक खरब डॉलर वाले डीप टूलकिट स्टेट इसको तय नहीं कर सकते। नॉर्वे आर्कटिक तेल के भंडार का खनन करते हुए भारत को जलवायु परिवर्तन पर उपदेश दे रहा है। इसकी संपत्ति उन्हीं जीवाश्म ईंधनों से आती है जिसको बचाने और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए दुनिया को वह ‘सचेत’ कर रहा है।

कन्हैया लाल का गला कैमरे पर रेत कर पूरी दुनिया को दिखाया, अब कह रहे उस पर बनी ‘उदयपुर फाइल्स’ मत दिखलाओ: जानिए क्या है मामला, सुप्रीम कोर्ट ने क्यों कबूल नहीं की याचिका

सुप्रीम कोर्ट ने कन्हैयालाल की हत्या पर बनी फिल्म ‘उदयपुर फाइल्स’ की रिलीज के खिलाफ याचिका सुनने से इनकार कर दिया है। यह फिल्म 11 जुलाई, 2025 को रिलीज होनी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसे रिलीज हो जाने दिया जाए। वहीं इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट ने भी सुनवाई की है।

बुधवार (9 जून, 2025) को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में दायर एक याचिका की सुनवाई की। सुप्रीम कोर्ट में यह याचिका कन्हैयालाल की हत्या में शामिल जावेद ने दायर की थी। जावेद का दावा था कि अगर या फिल्म रिलीज हुई तो उसे ‘निष्पक्ष सुनवाई‘ का मौक़ा नहीं मिलेगा।

इस याचिका को लेकर सुनवाई कर रही जस्टिस सुधांशु धूलिया और जस्टिस जॉयमलय बागची की बेंच ने जावेद से कहा कि वह मामले की तत्काल सुनवाई नहीं करेंगे। बेंच ने इस मामले में पेश हुए वकील से कहा कि वह याचिका को 14 जुलाई को बेंच के सामने पेश करें। वहीं जावेद के वकील ने दावा किया कि तब तक फिल्म रिलीज हो जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कहा, “तो इसे रिलीज हो जाने दो।”

दिल्ली हाई कोर्ट अब करेगा फिल्म की स्क्रीनिंग

दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले में जमीयत-उलेमा-ए-हिन्द ने याचिका दायर की थी। हाई कोर्ट ने 9 जुलाई को इस मामले में सुनवाई की है। हाई कोर्ट ने जमीयत की तरफ से कपिल सिब्बल पेश हुए हैं। कपिल सिब्बल ने दिल्ली हाई कोर्ट के सामने दावा किया है कि इस फिल्म के रिलीज होने से ‘मजहबी तनाव’ फ़ैल सकता है।

कपिल सिब्बल ने दिल्ली हाई कोर्ट के सामने दावा किया कि फिल्म का उद्देश्य मजहबी तनाव फैलाना और सार्वजनिक व्यवस्था को खतरे में डालना है। हालाँकि, केंद्र सरकार ने बताया कि इस फिल्म में पहले ही 40 से अधिक कट्स लगाए जा चुके हैं। सिब्बल इस पर भी तैयार नहीं हुए।

सिब्बल ने कोर्ट से कहा कि वह फिल्म देख ले। इस मामले में फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग 9 जुलाई, 2025 दिल्ली हाई कोर्ट में की जाएगी। इसके बाद इस पर फैसला आएगा। गौरतलब है कि जमीयत ने दिल्ली हाई कोर्ट के अलावा और भी कई हाई कोर्ट में याचिका इस फिल्म की रिलीज रोकने को रखी है।

जमीयत के मुखिया अरशद मदनी ने दावा किया था कि इससे देश का मुस्लिम आक्रोशित हो जाएगा। ध्यान देने वाली बात है कि उदयपुर में जून, 2022 में हुई कन्हैयालाल की हत्या मोहम्मद गौस और मोहम्मद रियाज ने की थी और इसे रिकॉर्ड भी किया था।

इन दोनों हिन्दुओं में डर भरने के लिए यह वीडियो वायरल की थी और वह चाकू तक दिखाया था जिससे हत्या हुई थी। कायदा तो ये था कि जमीयत इन इस्लामी कट्टरपंथियों के खिलाफ खड़ी होती और कोर्ट जाती। लेकिन वह इस बात पर कोर्ट पहुँच रही है कि कहीं यह फिल्म न रिलीज हो जाए और इस हत्याकांड की कहानी दुनिया को पता चल जाए।

इस्लामी कट्टरपंथ पर पर्दा डालने की यह कहानी कोई नहीं है। इससे पहले कश्मीरी हिन्दुओं को इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा मार भगाए जाने पर बनी फिल्म कश्मीर फाइल्स का भी ऐसा ही विरोध इस जमात ने किया था। हालाँकि, कोर्ट ने उन्हें अब कोई राहत नहीं मिलनी।

बिहार बंद में सड़क पर लोटते रह गए कार्यकर्ता, फोटो-भाषणबाजी कर गायब हुए राहुल गाँधी-तेजस्वी यादव: चुनाव आयोग के अधिकारी करते रहे इंतजार, नहीं बताया वोटर लिस्ट वेरिफिकेशन में क्या है आपत्ति

बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर बवाल मचा हुआ है। हर तरफ प्रदर्शन हो रहे हैं। सड़कें, रेल बंद हैं। लेकिन नेता लोग अपना भाषण देकर गायब हो गए। वहीं, अब भी कार्यकर्ता सड़कों पर लोट रहे हैं।

दरअसल, विपक्षी महागठबंधन ने इसे बीजेपी और चुनाव आयोग की साजिश बताकर बुधवार (9 जुलाई 2025) को ‘बिहार बंद’ बुलाया। सुबह से ही सड़कों पर हंगामा शुरू हो गया। पटना से लेकर दरभंगा, आरा, कटिहार तक महागठबंधन के कार्यकर्ताओं ने चक्का जाम कर दिया।

कहीं ट्रेनें रोकी गईं, कहीं हाईवे जाम किए गए। पटना के आयकर गोलंबर पर तो कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता सड़क पर चादर बिछाकर लेट गए, बोले – “गाड़ी भी चढ़ जाए, हम नहीं उठेंगे!” वैशाली में RJD के लोग भैंस लेकर प्रदर्शन करने पहुँच गए। कोई रेलवे ट्रैक पर लेटा, तो कोई गाँधी सेतु पर आगजनी करता दिखा। पूरे बिहार में बाजार बंद, बस-ट्रेन ठप, जनता परेशान।

इधर, तेजस्वी यादव और राहुल गाँधी ने पटना में खुले ट्रक पर चढ़कर जोरदार भाषण दिए। तेजस्वी ने कहा, “ये बीजेपी की चाल है, गरीबों-दलितों का वोट छीनने की।” राहुल ने महाराष्ट्र के ‘वोट चोरी’ वाले आरोप को बिहार से जोड़ते हुए आयोग पर निशाना साधा।

राहुल गाँधी हो या तेजस्वी यादव, दोनों ने कार्यकर्ताओं को भड़काया और मार्च की शुरुआत की, लेकिन शहीद स्मारक के पास पुलिस ने रोक लिया। भाषण खत्म, फोटो खिंचवाए और दोनों नेता गायब। राहुल दिल्ली लौट गए, तेजस्वी घर। चुनाव आयोग के दफ्तर में अफसर इंतजार करते रह गए कि शायद कोई प्रतिनिधिमंडल आए, उनकी शिकायत सुने। लेकिन कोई नहीं पहुँचा।

नेताओं के आने का इंतजार करते चुनाव आयोग के अधिकारी (फोटो साभार: Live Hindustan)

विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची के लिए माँगे गए 11 दस्तावेजों में आधार कार्ड जैसी चीजें शामिल नहीं, जिससे गरीबों के नाम कट सकते हैं। तेजस्वी ने सवाल उठाया, “आयोग को ये हक किसने दिया?” उधर, आयोग का कहना है कि ये काम संविधान और कानून के तहत हो रहा है। ईसी का कहना है कि “किसी वैध वोटर का नाम नहीं कटेगा, सिर्फ घुसपैठियों और फर्जी नाम हटाए जाएँगे।” सुप्रीम कोर्ट में इस मसले पर 10 जुलाई को सुनवाई है, लेकिन उससे पहले बिहार की सड़कों पर सियासत गरमा गई।

बंद की वजह से आम लोग खासे परेशान दिखे। एक ऑटो ड्राइवर ने कहा, “नेता तो भाषण देकर चले गए, हमारी कमाई का क्या?” स्कूल-कॉलेज बंद, दुकानें सूनी, मरीज अस्पताल नहीं पहुँच पाए। विपक्ष का दावा है कि ये ‘लोकतंत्र बचाने’ की लड़ाई है, लेकिन सड़क पर भैंस और चादर लेकर प्रदर्शन देख जनता भी हैरान है। अब सवाल ये कि क्या ये बंद वाकई गरीबों की आवाज उठा रहा है या सिर्फ सियासी ड्रामा?

तेजस्वी, सागरिका, मनोज झा… बिहार में चुनावी प्रक्रिया पर झूठ फैलाते पकड़े गए विपक्षी नेता : ECI ने किया फैक्ट चेक, बताया- काम में तो 47 हजार RJD कार्यकर्ता भी जुटे

बिहार में वोटर लिस्ट के रिवीजन को लेकर विपक्ष का बवाल चालू है। RJD नेता तेजस्वी यादव से लेकर TMC की सागरिका घोष तक लगातार चुनाव प्रक्रिया को लेकर फर्जी दावर दावे कर रही हैं। चुनाव आयोग ने अब उनका फैक्ट चेक किया है।

तेजस्वी यादव की खोली EC ने पोल

राजद सुप्रीमो लालू यादव के बेटे तेजस्वी यादव ने बिहार में चुनाव आयोग की वोटर लिस्ट सही करने की प्रक्रिया को ‘चीरहरण’ करार दिया। तेजस्वी यादव ने दावा किया कि पुनरीक्षण प्रक्रिया में बिना दस्तावेज और सत्यापन के फर्जी फॉर्म भरवाए जा रहे हैं।

तेजस्वी यादव ने यह भी दावा किया कि बिना पूरी जानकारी के मौखिक निर्देश दिए गए। उन्होंने कहा कि फर्जी हस्ताक्षर और निरक्षर बताकर किसी भी कर्मचारी से अंगूठा लगावाया जा रहा है। उन्होंने वोटर लिस्ट में बिना वोटर को बताए जानकारी अपलोड करने का दावा भी किया।

तेजस्वी यादव ने यह भी दावा किया कि BLO से एक-एक दिन में 10 हजार फॉर्म तक भरवाए जा रहे हैं। चुनाव आयोग ने तेजस्वी यादव के इन दावों का फैक्ट चेक कर दिया।

चुनाव आयोग ने बताया कि तेजस्वी की पोस्ट में किए दावे ‘भ्रामक’ हैं। आयोग ने बताया, “राष्ट्रीय जनता दल ने स्वयं SIR के काम के लिए 47,504 बूथ लेवल एजेंट्स अप्वॉइंट किए हैं, जो कि SIR के लिए जमीनी स्तर पर तत्परता से कार्य कर रहे हैं। SIR सुचारू रूप से चल रहा है, कुल 4 करोड़ (50%) के करीब फॉर्म अभी तक कलेक्ट किए जा चुके हैं।”

सागरिका घोष ने चलाया ‘गरीब’ वाला प्रोपेगेंडा

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) सांसद सागरिका घोष ने भी चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया पर भ्रामक जानकारी दी। सागरिका घोष ने दावा किया कि बिहार में चुनाव आयोग ‘गरीबों’ का वोट छीन रहा है। उनकी पार्टी ने भी इस चुनावी प्रक्रिया का विरोध किया।

पार्टी ने माँग की कि पुनरीक्षण प्रक्रिया 2003 के बजाए 2024 के आधार पर की जाए। टीएमसी ने इसमें बीजेपी को घसीटा। पार्टी ने कहा, “विपक्ष शासित राज्यों की व्यवस्था में हेराफेरी करने के लिए चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं का आदतन दुरुपयोग किया जाता है। हम लोकतंत्र को बीजेपी का खिलौना नहीं बनने देंगे।”

लेकिन इस दावे को भी चुनाव आयोग ने सिरे से खारिज कर दिया। चुनाव आयोग ने गरीबों से वोट छीनने के अधिकार वाले दावे को भ्रामक करार दिया। चुनाव आयोग ने फैक्ट-चेक में TMC और सागरिका घोष को तथ्यों की जानकारी दी।

चुनाव आयोग ने बताया कि SIR निर्देशों में पहले पन्ने के दूसरे पैराग्राफ के अनुसार, किसी भी योग्य नागरिक (RPA, 1950 की धारा 16 और 19 के साथ भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 के अनुसार) को नहीं छोड़ा जाएगा। 8 जुलाई 2025 तक, 47% के करीब और 3.70 करोड़ से अधिक लोग गणना प्रपत्र फॉर्म सबमिट कर भी चुके हैं।

RJD सांसद मजोज मनोज झा भी हुआ फैक्ट चेक

RJD के राज्यसभा MP मनोज कुमार झा ने भी चुनाव आयोग पर कई आरोप लगाए। उन्होंने दावा किया कि आयोग उन्हें मिलने का समय नहीं दे रहा है। इसका फैक्ट चेक चुनाव आयोग ने पूरी प्रक्रिया बताते हुए कर दिया।

चुनाव आयोग ने बताया कि वह अब तक 9 पार्टियों से इस मामले में संवाद कर चुका है। उसने यह भी बताया कि राजद की तरफ से ही मनोज झा को अधिकृत नहीं किया गया है।

चुनाव आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि 2 जुलाई 2025 को राजद ने मनोज झा को बैठक में भेजा था, जिसमें उनकी चुनाव आयोग से बातचीत भी हुई थी।

RJD ने वॉयस रिकॉर्डिंग से फैलाया भ्रम

नेताओं के अलावा RJD ने भी चुनाव आयोग की प्रक्रिया को लेकर एक ट्वीट किया। इसमें एक जिलाधिकारी की कथित वॉयस रिकॉर्डिंग सुनाई गई, जिसमे कई दावे किए गए। इस रिकॉर्डिंग में चुनावी प्रक्रिया से जुड़े कुछ निर्देश कथित तौर पर दिए जा रहे थे। RJD ने दावा किया कि सारी प्रक्रिया गड़बड़ की जा रही है।

इस दावे बिहार के बिहार के मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने भ्रामक करार दिया। फैक्ट-चेक में बताया गया कि डीएम की कथित वॉइस रिकॉर्डिंग में जो बातें कही गई हैं, यह सारी बातें पहले से ही SIR में शामिल हैं। इसके लिए कोई भी नए निर्देश नहीं दिए गए हैं।

फरहाज ने कोल्ड ड्रिंक पिलाकर किया रेप, वीडियो बनाकर दी इस्लाम कबूलने की धमकी: हिंदू महिला को सिगरेट से दागा-मारपीट की, लखनऊ के लुलु मॉल की घटना

लखनऊ के लुलु मॉल की एक हिंदू महिला कर्मचारी ने अपने मैनेजर पर रेप, ब्लैकमेलिंग और जबरन धर्म परिवर्तन का दबाव डालने का आरोप लगाया है। पुलिस ने आरोपित मैनेजर फरहाज उर्फ फराज को गिरफ्तार कर लिया है।

पीड़िता ने आरोप लगाया है कि आरोपित फरहाज उर्फ फराज ने उसे कोल्ड ड्रिंक में नशीला पदार्थ मिलाकर दिया और फिर उसके साथ दुष्कर्म किया। आरोपित ने दुष्कर्म का वीडियो भी बना लिया, जिसका इस्तेमाल वह महिला को ब्लैकमेल करने और पैसे ऐंठने के लिए कर रहा था।

जब महिला ने इसका विरोध किया तो उसे सिगरेट से जलाया गया, गालियाँ दी गईं और मारपीट की गई।

धर्म परिवर्तन का दबाव

शिकायत में यह भी बताया गया है कि फरहाज लगातार महिला पर इस्लाम कबूल करने का दबाव डाल रहा था। वह कहता था कि अगर उसे मॉल में नौकरी करनी है तो उसे इस्लाम कबूल करना होगा।

उसने कई बार हिंदू धर्म और देवी-देवताओं का अपमान भी किया, जिससे पीड़िता की आस्था को ठेस पहुँची।

धर्मांतरण नेटवर्क

शुरुआती जाँच से पता चला है कि आरोपित फरहाज के संबंध कुछ संदिग्ध सोशल मीडिया अकाउंट्स और कथित धर्मांतरण नेटवर्क से हो सकते हैं।

पुलिस अब इस मामले की साइबर फॉरेंसिक जाँच कर रही है ताकि यह पता चल सके कि आरोपित किसी बड़े नेटवर्क का हिस्सा तो नहीं है। पुलिस मॉल के अन्य कर्मचारियों से भी पूछताछ कर रही है।

पुलिस कार्रवाई

पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपित फरहाज को गिरफ्तार कर लिया है। डीसीपी नॉर्थ ने बताया कि आरोपित पर बलात्कार, जान से मारने की धमकी और जबरन धर्म परिवर्तन की कोशिश सहित कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया गया है। उसे कोर्ट में पेश कर रिमांड पर भेज दिया गया है।

लुलु मॉल प्रबंधन की ओर से अभी तक इस घटना पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है।