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‘जामिया से वाल्मीकि समुदाय के 23 कर्मचारियों को निकाला, खाने तक के पैसे नहीं’: वीडियो में भावुक अपील

साउथ-ईस्ट दिल्ली के ओखला में स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी एक बार फिर से विवादों में है। राजेश कुमार वाल्मीकि नामक एक व्यक्ति ने वीडियो बना कर दावा किया है कि यूनिवर्सिटी से वाल्मीकि समुदाय के 23 स्वच्छता कर्मचारियों (Sanitation Workers) को निकाल दिया गया है। उन्होंने स्वच्छता दफ्तर से वीडियो बनाते हुए कहा कि उन्हें अधिकारियों ने बताया है कि मंत्रालय से 132 स्वच्छता कर्मचारियों में से 23 को निकालने का आदेश आया है।

उन्होंने कहा, “केवल हमारे वाल्मीकि समाज के ही सारे कर्मचारियों को हटाया गया है। हम 15-20 वर्षों से जामिया में काम कर रहे हैं। कोरोना के कठिन काल में भी हमने पूरी मेहनत से यहाँ पर काम किया है। नालियों की सफाई से लेकर सब कुछ किया। लेकिन, जब हटाने की बारी आती है तो सबसे पहला नाम हम लोगों का है यहाँ। हमारे साथ यहाँ भेदभाव हो रहा है। जामिया में हम बहुत परेशान हैं।”

वाल्मीकि समुदाय से आने वाले राजेश ने आगे कहा कि वो लोग यहाँ के ‘Sweeper Man’ हैं उन्हें झाड़ू लगाने का काम दिया गया है। उन्होंने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए बताया कि वो खुद 10वीं कक्षा उत्तीर्ण हैं और कई कर्मचारी ऐसे भी हैं, जिन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई कर रखी है। उन्होंने वीडियो में ये लिस्ट भी दिखाई और कहा कि उनके वरिष्ठ अधिकारी कह रहे हैं कि ये सूची मानव संसाधन मंत्रालय से आई है।

राजेश ने दावा किया कि विभाग में 16 आदमी केवल चपरासी-प्यून के पदों पर बैठे हुए हैं। साथ ही कहा कि मलेरिया की रोकथाम के लिए भी कर्मचारी हैं, जिनका कुछ ही महीनों का सीजनल काम ही होता है। राजेश ने कहा, “लेकिन हमलोग यहाँ नियमित हैं। हमें 3-4 महीनों से वेतन नहीं मिला है। हम में से कई किराए के घर में रहते हैं। बच्चों के खाने तक के पैसे नहीं हैं। फोन कैसे रिचार्ज कराएँ? ये है जामिया का हाल।”

बता दें कि जामिया का विवादों से पुराना नाता रहा है। जामिया मिलिया इस्लामिया की आधारशिला मौलाना महमूद हसम ने रखी थी। लेकिन इसके संस्थापकों में मोहम्मद अली जौहर का भी नाम शामिल था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उनका सपना हिंदुस्तान को दारुल इस्लाम बनाना था और जिसने 1923 में भरी सभा में खड़े होकर सबके बीच वंदे मातरम का विरोध कर दिया था। CAA विरोधी प्रदर्शनों और हिंसा में भी जामिया के छात्रों का रोल सामने आया था।

‘2000+50 मुस्लिमों के हत्यारे PM मोदी का ट्विटर हैंडल सस्पेंड करो’ – कट्टरपंथी इस्लामी और वामपंथियों ने चलाया ट्रेंड

अमेरिका में जिस तरह से फेसबुक, ट्विटर और गूगल ने वहाँ के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के खिलाफ कार्रवाई की है, उसके बाद से ही वामपंथियों के एक धड़े में खासा उत्साह है। अब वो चाहते हैं कि ट्विटर इसके बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हैंडल को हमेशा के लिए सस्पेंड कर दे। ऑस्ट्रेलिया के लेखक सीजे वर्लमन (CJ Werleman) से लेकर प्रोफेसर खालिद बेयदौन जैसों ने ‘मोदी नेक्स्ट’ ट्वीट के साथ जैक से पीएम मोदी का हैंडल सस्पेंड करने की माँग की।

दुनिया भर में मुस्लिमों पर तथाकथित अत्याचार को लेकर आवाज़ उठाने का दावा करने वाले सीजे वर्लमन ने लिखा कि नरेंद्र मोदी को ट्विटर से प्रतिबंधित करना एकदम जायज है। उन्होंने दावा किया कि 2002 में मोदी ने ही गुजरात में 2000 मुस्लिमों के नरसंहार के लिए भड़काया था। साथ ही दिल्ली में 2019 में ’50 मुस्लिमों की हत्या’ का आरोप भी उन पर मढ़ा। उन्होंने पीएम मोदी पर भारतीय समाज को कट्टरवादी बनाने का आरोप लगाया।

उधर प्रोफेसर खालिद बेयदौन ने लिखा कि ट्विटर के CEO जैक डॉर्सी को अब नरेंद्र मोदी का हैंडल सस्पेंड कर देना चाहिए, क्योंकि ये तार्किक है और अगला कदम यही उठाया जाना चाहिए। तथाकथित इस्लामोफोबिया को लेकर रिसर्च करने वाले प्रोफेसर के अनुसार, किसी देश के मुखिया द्वारा सत्तावादी ढंग से लोगों को भड़काने का काम सिर्फ अमेरिका में ही नहीं हो रहा है। उन्होंने ‘मोदी नेक्स्ट’ ट्वीट करने की भी अपील की।

इसी तरह कई मुस्लिमों ने भी ऐसा ट्रेंड चलाया। राना सरफराज नामक यूजर ने ट्विटर को ‘मानवता और शांति’ के लिए ऐसा करने की अपील की। हामजा ज़फर ने आरोप लगाया कि भारत में पीएम मोदी और ‘RSS के शासन’ के अंतर्गत मुस्लिमों के खिलाफ अत्याचार में वृद्धि हुई है। उसने जम्मू कश्मीर के लोगों और भारतीय मुस्लिमों के लिए पीएम मोदी को खतरा करार दिया। रमील खान और राहील शरीफ नामक यूजर ने भी इससे सहमति जताई।

तंजीम मोहम्मद नामक वामपंथी ने आइडिया दिया कि अगले लोकसभा चुनाव से पहले पीएम मोदी को बैन कर दिया जाए। हालाँकि, इस दौरान भारत के कई लोग प्रधानमंत्री के समर्थन में भी आए और कहा कि जिस दिन ट्विटर ने नरेंद्र मोदी के हैंडल को सस्पेंड किया या उनके हैंडल के साथ कुछ भी किया, तो वो तुरंत ही इस प्लेटफॉर्म को छोड़ देंगे। कुछ लोगों ने कहा कि ऐसी स्थिति में हिन्दू ट्विटर का संपूर्ण बहिष्कार करेंगे।

बता दें कि ट्विटर और फेसबुक के बाद गूगल और एप्पल ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प पर शिकंजा कसा है। गूगल ने सोशल नेटवर्किंग एप्लीकेशन पार्लर (Parler) को प्ले स्टोर से हटा दिया और आरोप लगाया कि वो भड़काऊ कंटेंट्स को अपने प्लेटफॉर्म से हटाने में असफल रहा। एप्पल ने भी नोटिस थमाया। डोनाल्ड ट्रम्प और उनके समर्थकों ने भी सोशल मीडिया से प्रतिबंधित किए जाने के बाद ‘Parler’ को ही अपनी बात रखने का जरिया बनाया था।

618% का फायदा: दुनिया के सबसे अमीर आदमी ने किया एक ट्वीट… और एक कंपनी हो गई मालामाल

वॉट्सऐप की प्राइवेसी में बदलाव किए जाने के बाद दुनिया के सबसे अमीर व्यक्ति और टेस्ला के सीईओ इलॉन मस्क ने गुरुवार (7 जनवरी, 2021) को अपने फॉलोवर्स को वॉट्सऐप छोड़ कर सिग्नल ऐप यूज करने का आग्रह किया। बता दें कि व्हाट्सऐप की ही तरह सिग्नल एक मैसेजिंग ऐप है। हालाँकि उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि उनके इस ट्वीट की वजह से सिग्नल नाम के ही एक दूसरी कंपनी (जिसका सिग्नल मैसेजिंग ऐप से कोई संबंध भी नहीं है) के स्टॉक की बड़े पैमाने पर खरीदारी शुरू हो जाएगी।

जैसे ही मस्क ने अपने फॉलोवर्स को ओपन-सोर्स ऐप सिग्नल का उपयोग करने के लिए कहा, उसी नाम से एक अस्पष्ट और अपेक्षाकृत अज्ञात कंपनी “सिग्नल एडवांस” के शेयर्स की कीमत पर भारी उछाल देखने को मिला। गुरुवार को इस अज्ञात कंपनी के शेयर्स में 527 प्रतिशत की भारी वृद्धि देखी गई, तो वहीं शुक्रवार को कंपनी की 91 प्रतिशत की वृद्धि हुई। दो दिनों के अंदर, सिग्नल एडवांस का शेयर मूल्य, जो पहले 60 प्रतिशत के आसपास था, वह बढ़कर 7.19 डॉलर हो गया।

बता दें कि मस्क लोगों से सिग्नल मैसेजिंग ऐप का इस्तेमाल करने की बात कह रहे थे, जोकि एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन द्वारा संचालित किया जाता है। यह व्हाट्सएप, फेसबुक मैसेंजर, टेलीग्राम जैसे अन्य टेक्सटिंग ऐप के विकल्प के रूप में कार्य करता है। हालाँकि मस्क की ओर से Signal ऐप के इस्तेमाल की सलाह के बाद लोग इस ऐप पर रजिस्ट्रेशन के लिए टूट पड़े, जिसके चलते Signal app का रेजिस्ट्रेशन सिस्टम ही क्रैश हो गया।

एक अज्ञात कंपनी के स्टॉक की खरीदारी और सिग्नल ऐप के सर्वर का क्रैश मस्क द्वारा किए गए ट्वीट के बाद से शुरू हुआ, जोकि टेस्ला सीईओ के बढ़ते प्रभाव को रेखांकित करता है। दिलचस्प बात यह है कि इलेक्ट्रिक कार निर्माता टेस्ला (Tesla) के CEO इलॉन मस्क गुरुवार को दुनिया के सबसे अमीर शख्स बन गए। वहीं शुक्रवार को टेस्ला अमेरिका की पाँचवीं सबसे मूल्यवान कंपनी बन गई है।

गौरतलब है कि सिग्नल एडवांस के शेयर की कीमत में अभूतपूर्व उछाल को देखते हुए सिग्नल मैसेजिंग ऐप ने एक ट्वीट पोस्ट करते हुए लोगों को जानकारी दी कि उनका सिग्नल एडवांस कंपनी से कोई लेना-देना नहीं है।

बता दें कि सिग्नल एक क्रॉस-प्लेटफ़ॉर्म और एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग सेवा है, जिसे सिग्नल फाउंडेशन और सिग्नल मैसेंजर एलएलसी द्वारा विकसित किया गया है। न्यू यॉर्कर में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, सिग्नल पूरी तरह से डोनेशन पर चलता है। चूँकि सिग्नल फाउंडेशन एक नॉन प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन है, इसलिए यह स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टेड भी नहीं है।

दूसरी ओर, सिग्नल एडवांस, जो अमेरिकी शेयर बाजार में पिछले दो दिनों से काफी बढ़त बनाए हुए है, को टेक्सास में 1992 में बायोडाइन नाम से स्थापित किया गया था। यह चिकित्सा और कानूनी श्रमिकों के लिए सेवा प्रदान करती है। इस कंपनी ने बाद में स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र में और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में खुद को स्थानांतरित कर दिया और अपना नाम बदलकर सिग्नल एडवांस कर दिया। कंपनी ने 2014 में अपने शेयर बाजार की शुरुआत की थी।

पंजाब के ‘किसान’ आंदोलन ने ली एक और जान: प्रदर्शनकारी अमरिंदर सिंह ने जहर खाकर की आत्महत्या

दिल्ली की सीमाओं पर 45 दिन से चल रहे किसानों के विरोध के बीच शनिवार (9 दिसंबर, 2021) को एक और किसान ने आत्महत्या कर ली है। खबर है कि पंजाब के फतेहगढ़ साहिब से आए करीब 40 वर्षीय के अमरिंदर सिंह ने सिंघु बॉर्डर पर लगे एक मंच के पीछे जहर खा कर अपनी जान दे दी।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, अमरिंदर सिंह कृषि कानूनों को लेकर केंद्र सरकार के रुख से नाराज थे और इसी के चलते उन्होंने इतना बड़ा कदम उठा लिया। दरअसल, शनिवार देर शाम सिंघु बॉर्डर पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के बीच एक मंच पर वक्ताओं का कार्यक्रम चल रहा था। उसी दौरान मंच के पीछे से सल्फास खाए हुए अमरिंदर चिल्लाते हुए मंच के सामने आए और कुछ देर बाद ही उन्होंने अपना दम तोड़ दिया।

कहा जा रहा है कि अमरिंदर सिंह कुछ बोलने का प्रयास कर रहे थे, हालाँकि जब तक वह बोलते उनके मुँह से झाग निकलना शुरू हो गया और वे बेहोश होकर गिर पड़े। वहाँ मौजूद लोगों ने तुरंत उन्हें नजदीकी फ्रैंक इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज अस्पताल में भर्ती कराया। लेकिन इलाज के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।

किसान की मौत पर संयुक्त किसान मोर्चा ने अपना दु:ख जताया है। उन्होंने जानकारी दी कि अमरिंदर इलाज के दौरान शाम करीब साढ़े सात बजे अपना दम तोड़ दिया। वहीं जैसे ही बॉर्डर पर किसानों को यह बात पता चली, उन्होंने जमकर केंद्र सरकार के खिलाफ नारेबाजी की और इसके लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराया। हालाँकि मौके से अभी तक कोई सुसाइड नोट नहीं बरामद हुआ है।

गौरतलब है कि यह पहली बार नहीं है जब किसी किसान ने इस तरह आत्महत्या की हो। इससे पहले भी प्रदर्शन स्थल पर कृषि कानून का विरोध करने वाले एक संत और एक किसान ने आत्महत्या की थी।

बता दें सिंघु बार्डर पर किसानों के धरने में शामिल संत राम सिंह ने खुद को कथित तौर पर गोली मार ली थी। जिससे उनकी मौत हो गई थी। बाबा राम सिंह करनाल के रहने वाले थे। उन्होंने पंजाबी में लिखा एक सुसाइड नोट भी छोड़ा था। संत बाबा राम सिंह हरियाणा एसजीपीसी के नेता थे।

वहीं मरने के बाद सोशल मीडिया पर संत राम सिंह की आत्महत्या की खबरों के साथ-साथ एक नर्स की ऑडियो वायरल था। इसमें नर्स एक पंजाबी न्यूज चैनल को बता रही थी कि वह लंबे समय से बाबा संत राम से जुड़ी हुई थीं। नर्स ने बाबा के खुद को गोली मारने की खबर को गलत बताया।

उन्होंने कहा कि बाबा खुद को गोली मार ही नहीं सकते। इसके अलावा जो बाबा के नाम पर सुसाइड नोट जारी किया गया है, वह उनका नहीं है। यह उनकी हैंडराइटिंग नहीं है। वह कहती हैं कि जो शख्स सब को डटे रहने की सलाह देता हो, वो खुद को मार ही नहीं सकता।

वहीं किसान आंदोलन के 38वें दिन में गाजीपुर बॉर्डर पर एक 75 वर्षीय किसान ने शौचालय में आत्महत्या कर ली थी। मृतक किसान की पहचान कश्मीर सिंह के रूप में हुई थी। आत्महत्या करने वाले किसान का एक कथित सुसाइड नोट भी बरामद हुआ था, जिसमें उन्होंने लिखा था कि उनकी शहादत बेकार ना जाए। कश्मीर सिंह ने यह भी लिखा था कि उनका अंतिम संस्कार दिल्ली यूपी की सीमा पर ही किया जाए।

अपील के बाद भी किसानों के आंदोलन में न आने से भड़के योगेंद्र यादव, दिखाया 20 साल का डर: देखें वीडियो

कृषि कानूनों के विरोध के बहाने उपद्रव मचाने और प्रदर्शनकारियों को भड़काने के लिए सड़कों पर उतरे इच्छाधारी प्रदर्शनकारी और पाखंडी राजनीतिज्ञ योगेंद्र यादव ने शनिवार (9 जनवरी, 2021) को हरियाणा और राजस्थान के स्थानीय ग्रामीणों को मोदी सरकार के खिलाफ तथाकथित विरोध में शामिल होने के लिए उकसाने का प्रयास किया।

केंद्र सरकार का विरोध करने के लिए वर्तमान में किसान की भूमिका निभा रहे योगेंद्र यादव ने दक्षिण हरियाणा और पूर्वी राजस्थान के क्षेत्रों में रहने वाले ग्रामीणों को मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के खिलाफ हो रहे आंदोलन में शामिल होने के लिए भड़काने की कोशिश की है।

अब तक विरोध प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए निर्दोष किसानों की खिल्ली उड़ाते हुए यादव ने ग्रामीणों को यह कहकर उकसाने का प्रयास किया कि अगर उन्होंने राष्ट्रीय राजमार्गों के साथ दिल्ली की ओर जा रहे सड़क को ब्लॉक नहीं किया, किसान आंदोलन में शामिल नहीं हुए तो आने वाली पीढियाँ हमेशा उनके साथ कठोरता से पेश आएगी।

दिल्ली की सीमाओं पर डेरा डाले हुए योगेंद्र यादव ने एक वीडियो साझा करते हुए कहा कि उनके पास हरियाणा और राजस्थान के ग्रामीणों के लिए एक चेतावनी, शिकायत और अपील है। अपने तथाकथित विरोध के घटते समर्थन पर चिंता व्यक्त करते हुए यादव ने झूठ बोलकर आंदोलन में भीड़ खींचने का प्रयास किया और कहा कि किसान सरकार के खिलाफ गुस्से में हैं। उन्होंने यह दावा भी किया कि अगर सरकार ने उनकी बात नहीं मानी तो अगले 20 सालों तक कोई भी उनकी शिकायतों को नहीं सुनेगा।

योगेंद्र यादव ने निर्दोष किसानों को उकसाने की कोशिश में दावा किया, “मेरे पास आपके खिलाफ शिकायत है। मैं स्थानीय क्षेत्रों के किसानों को विरोध प्रदर्शनों में शामिल नहीं होते हुए देख रहा हूँ। इतिहास याद रखेगा कि स्थानीय इलाकों (हरियाणा और राजस्थान) के किसान तब सो रहे थे जब देश के बाकी हिस्सों के किसान विरोध कर रहे थे।”

घुमा फिरा कर हरियाणा और राजस्थान के किसानों को धमकी देने वाले योगेंद्र यादव ने बेशर्मी से उन्हीं किसानों को फल, सब्जियाँ, दूध और छाछ आदि प्रदान करने के लिए कहा।

गौरतलब है कि कुछ दिन पहले ही ‘इच्छाधारी प्रदर्शनकारी’ योगेंद्र यादव ने धमकी दी थी कि यदि तथाकथित ‘किसान प्रदर्शनकारियों’ की माँग पूरी नहीं की जाती है तो वे गणतंत्र दिवस को निशाना बनाएँगे। क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने भी जनवरी 02, 2021 को यही घोषणा की थी।

योगेंद्र यादव ने कहा था, “अगर हमारी माँगें 26 जनवरी तक पूरी नहीं होती हैं, तो किसान दिल्ली में ‘किसान गणतंत्र परेड’ करेंगे। हम राष्ट्रीय राजधानी के निकटवर्ती क्षेत्रों के किसानों से अपील करते हैं कि वे तैयार रहें और देश के हर किसान परिवार से अनुरोध करें कि यदि संभव हो तो एक सदस्य को दिल्ली भेजें।”

बता दें किसान आंदोलन के दौरान योगेंद्र यादव लगातार सरकार को धमकी देते रहे हैं। हालाँकि, यह स्पष्ट नहीं है कि वह कब किसान नेता बन गए। सरकार का कहना है कि वह किसान नहीं है और उन्हें सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच वार्ता में भाग लेने की अनुमति नहीं दी गई।

उल्लेखनीय है कि किसान आंदोलन में भी सीएए विरोध प्रदर्शन वाली ही रणनीति अपनाई जा रही है। इससे पहले नागरिकता कानून के खिलाफ हो रहे विरोध प्रदर्शन स्थलों पर पहुँच कर योगेंद्र यादव ने ही दिसंबर 2019 में CAA विरोधी आन्दोलनों को भी भड़काया था। उमर खालिद और शरजील इमाम के साथ मिल कर प्रदर्शन स्थलों का दौरा किया था। उमर खालिद ने ही शरजील इमाम से उनका परिचय कराया था। जामिया, DU और JNU के छात्रों को मोबिलाइज करने की चर्चा इन तीनों के बीच हुई थी।

तीनों की बैठक में ये रणनीति बनाई गई थी कि चक्का जाम के लिए मुस्लिमों को सोशल मीडिया के माध्यम से भड़काया जाएगा। इसी तरह ‘पिंजरा तोड़’ की गिरफ्तार एक्टिविस्ट्स नताशा नरवाल और देवांगना कलिता ने खुलासा किया था कि उन्हें योगेंद्र यादव की तरफ से दिशा-निर्देश दिए गए थे। दिल्ली दंगों की चार्जशीट में भी बताया गया है कि कैसे योगेंद्र यादव ने CAA विरोधी आन्दोलनों को हवा दी, जो बाद में हिंसा में बदल गया।

चुनाव में नकारे दलों, वामपंथियों की साजिश है ‘किसान आंदोलन’: लोकतंत्र को भीड़तंत्र से बचाना जरूरी

बुधवार (जनवरी 06, 2021) को अमेरिकी संसद के बाहर वॉशिंगटन में जो हुआ वह भीड़ तंत्र का भयानक नजारा था। एक उकसाई गई भीड़ जोर जबरदस्ती करते हुए अमेरिकी संसद कैपिटल हिल में घुस गई और उसने नई चुनी हुई सरकार के निर्वाचन की अंतिम प्रक्रिया को रोकने की भोंडी कोशिश की।

कुछ सौ हुड़दंगी लोगों ने धक्काशाही करके नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के नाम पर सीनेट की मुहर लगाने से रोकने का प्रयास किया। ये लोग राष्ट्रपति ट्रम्प के समर्थक थे, जो चुनाव हार चुके हैं।

लोकतंत्र में आस्था रखने वाले दुनिया भर के लोगों के लिए यह एक भूल जाने वाला दिन था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जाते-जाते अपना नाम उन नेताओं की सूची में लिखा गए जिन्हें कोई याद नहीं रखना चाहेगा। अमेरिकी चुनावों में धाँधली हुई कि नहीं हमें नहीं मालूम। लेकिन जब चुनाव सत्यापन के लिए अमरीकी संसद बैठ रही थी तो धौंसपट्टी से संसद के काम में बाधा डालने से गैर लोकतांत्रिक काम नहीं हो सकता।

यह भीड़तंत्र का एक नमूना था। यह भीड़तंत्र अब दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। यह उस खतरे से भी बड़ा है जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के निरंकुश, अतिवादी और तानाशाही नेतृत्व ने दुनिया के सामने खड़ा किया है।

चीन की अधिनायकवादी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पैदा संकट तो बाहरी खतरा है। जिसकी काट लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएँ निकाल ही लेंगी। भीड़तंत्र की ये चुनौती घुन की तरह है जो भीतर ही भीतर लोकतंत्र को खोखला कर देगी। इसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है।

चुनाव में कभी न जीत सकने वाली या सत्ता गँवा देने वाली ताकतें इस सुनियोजित अराजकता के पीछे सक्रिय हो रही हैं। इनका मिथ्या प्रचार आगे बढ़ाने में ये सोशल मीडिया का चालाकीपूर्ण उपयोग भी ये लोग कर रहे हैं। शत्रुता रखने वाले देश भी इस आग में घी डाल कर अपना शत्रुधर्म निभा रहे हैं। लोकतान्त्रिक समाजों का खुलापन ही, ऐसा लगता है कि उनकी बड़ी कमजोरी बन गया है।

ऐसी ताकतें लोगों को बरगला कर अराजकता का माहौल पैदा कर रही है। इनका मकसद हिंसा का सहारा लेकर चुनी हुई सरकारों को काम करने से रोकना है। इनका आखिरी लक्ष्य अंततोगत्वा लोकतंत्र को बदनाम कर उसे खत्म करने का ही है। इनकी आस्था लोकतान्त्रिक मूल्यों और व्यवस्था में कतई नहीं हैं। लोकतान्त्रिक अधिकारों का इस्तेमाल वे तो उसे उखाड़ने के लिए कर रहे हैं।

एक बात तो तय है कि लोकतंत्र में फैसले सड़कों पर नहीं हो सकते। इसके लिए लोकतांत्रिक समाजों ने कई संस्थाएँ बनाई है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर विधायिकाओं में भेजती है, जिनका काम है कानून बनाना और उनका पालन करवाना। और यदि किसी चुनी हुई सरकार का काम जनता को पसंद नहीं आता है तो जनता उनको बाहर का रास्ता दिखा देती है।

सरकार बदलने का अधिकार भारत में जनता को हर 5 वर्ष में मिलता है। देखा जाए तो जनता अपने इस अधिकार का उपयोग राज्यों के चुनावों में भी करती है। स्थानीय चुनाव भी होते हैं जिनमें लगातार जनता अपने अभिमत को दर्ज़ कराती रहती है। इसके अलावा न्यायपालिका भी इन समाजों में अपनी प्रभावी भूमिका निभाती है।

भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है। यहाँ मिथ्या प्रचार कर के, बहला-फुसलाकर, बरगला कर, भड़का कर, भय दिखा कर अथवा लालच देकर कुछ हजार लोगों को इकट्ठा करना कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। तो क्या, अगर कुछ हजार लोग इकट्ठे हो जाएँ तो उन्हें किसी विषय पर वीटो का अधिकार दिया जा सकता है? ऐसा हुआ तो फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था जिन्दा नहीं रह सकती। वामपंथी और अराजकतावादी दोनों ही ऐसा करना चाहते हैं।

अमेरिका में भीड़ ने जो किया वह अत्यंत निंदनीय है। लेकिन देखा जाए तो क्या भारत में पिछले 2 साल से किसी न किसी मुद्दे को लेकर से भीड़ को इकट्ठा करके ऐसा ही करने का उपक्रम क्या नहीं चल रहा? इसके पीछे वही लोग हैं जिन्हें बार-बार लोग चुनाव में नकार चुके हैं।

तर्क और मुद्दा हर बार अलग होता है पर तरीका एक ही है। किसी संवेदनशील मुद्दे पर आक्रोश पैदा करो और भीड़ को इकठ्ठा कर सरकार की विश्वश्नीयता और नीयत पर सवाल खड़े करो। साथ ही बड़े जतन से बनाई गई संस्थाओं और व्यवस्थाओं को लाँछित करो।

याद कीजिए, पिछली सर्दियों में दिल्ली की सड़कों पर सीएए यानी नागरिकता कानून का विरोध करने के नाम पर आम जनजीवन ठप्प कर दिया गया था। अब कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर कुछ लोग जमे हुए हैं। वे कहते हैं कि या तो कृषि कानूनों को वापस लो या फिर वह दिल्ली को चलने नहीं देंगे।

इतना ही नहीं, अब तो धमकी देश की शान समझी जाने वाली गणतंत्र दिवस की परेड को भी एक तरह से रोकने की भी है। गणतंत्र दिवस की परेड भारत के सैन्य बल, तकनीकी क्षमता, विकास, गतिशीलता, स्वाभिमान और राष्ट्रीय गौरव का नमूना होती है। इसे दलगत राजनीतिक स्वार्थों में घसीटना अगर एक स्पष्ट राष्ट्रविरोधी नहीं तो अराष्ट्रीय काम तो है ही।

कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर इस बार देश की गणतंत्र दिवस परेड के समानांतर एक अलग परेड आयोजित करने की कुत्सित चेष्टा की जा रही है। ऐसा अराष्ट्रीय कार्य पहली बार नहीं हो रहा है। जनवरी 2014 में भी आम आदमी पार्टी ने भी गणतंत्र दिवस परेड के विरोध में बोट क्लब के पास धरना दिया था। जब देश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। तब भी कड़ाके की ठंड में फुटपाथ पर सोने का नेरेटिव चलाया गया था।

गौर करने की बात है कि आज भी कृषि कानूनों का विरोध करने वाले कई चेहरे वही हैं जिन्हें देश की जनता चुनावों में बार बार नकार चुकी है। किसानों का नेतृत्व करने वाले एक प्रमुख नेता है हन्नान मुल्लाह। मुल्लाह अपने को किसान नेता कहते हैं। पर असल में तो वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम की पोलित ब्यूरो के वरिष्ठ सदस्य है।

पश्चिम बंगाल की उलूबेरिया लोकसभा सीट से 8 बार सीपीएम के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। पश्चिम बंगाल की जनता द्वारा चुनावों में धूल चटाए जाने के बाद वे और उनकी पार्टी के बाद अब किसानों के नेता बन गए हैं। किसान यूनियनें भारत सरकार से समझौता करना भी चाहें पर ये किसानधारी नेता कहते हैं कि किसान कानून वापस लिए जाने से कम कोई समझौता नहीं होगा।

कृषि कानूनों का विरोध करने वाले अधिकतर लोग वामपंथी एक्टिविस्ट और अराजकतावादी तत्व हैं। उनके साथ अन्य विरोधी दल बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। 2014 और 2019 दोनों के चुनावों में हार चुके लोग अब एक चुनी हुई सरकार को कृषि बिलों के नाम पर मात देना चाहते हैं।

माना जा सकता है कि कृषि कानूनों में परिवर्तन किए जाने की गुंजाइश है। अपना देश इतना बड़ा है कि हर प्रदेश के किसान एक कानून से खुश नहीं हो सकते। देश के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। इसलिए अलग-अलग किसानों की अलग-अलग परेशानियाँ हो सकती हैं। पंजाब और हरियाणा के मुख्यतः धान और गेहूँ पैदा करने वाले किसानों की कुछ जायज माँगे हो सकती हैं।

इन्हें नए कानूनों में शामिल किया जाना चाहिए। यह आमने सामने बैठकर और बातचीत में लचीलापन अपनाकर ही हो सकता है। लेकिन अड़ियल होकर यह रट लगाना कि ‘कानून वापसी तक घर वापसी नहीं’, एक नितांत अनुचित माँग है। वीटो का ये अधिकार देश में किसी को नहीं है।

हम इसे एक और तरह से देख सकते हैं। पिछले करीब एक साल से पूरी दुनिया कोविड की महामारी से जूझ रही है। भारत में भी अब तक 1 करोड़ 4 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं। 1,50,000 से ज़्यादा भारतीय कोरोना से जान गँवा चुके है। देश का शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा जिस पर कोरोना की मार न पड़ी हो। कारखाने बंद हो गए हैं, छोटे बड़े सभी दुकानदारों को परेशानी है, कामकाज ठप्प हुए हैं, पढ़ाई लिखाई नहीं हो पा रही है, गाँव -गाँव शहर-शहर परेशानियों और तक़लीफ़ों का अंबार है।

लाखों नौजवान रोजगार खो चुके हैं। इससे एक स्वाभाविक दुःख और गुस्सा अंदरखाने लोगों में है। कोरोना की तक़लीफ़ों से पैदा हुए इस दर्द का लाभ उठाकर लोगों में आक्रोश पैदा करने का काम कई स्वार्थी तत्व कर रहे हैं। ये घाव पर मरहम की जगह नमक छिड़कने जैसा है।

और तो और, कृषि कानूनों के बहाने ऐसे तत्त्व किसानों और उद्योगों के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी करने का काम कर रहे है। सब जानते हैं कि कृषि और उद्योग एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक नदी के दो किनारों की तरह हैं। देश के विकास की गाड़ी को उन्नत कृषि और आधुनिक उद्योग – दोनों ही पहिए चाहिए।

किसानों को भड़का कर ये मूलतः विकास विरोधी दल उद्योगों को कृषि के सामने खड़ा करना चाहते हैं। यह कैसा विचित्र तर्क है कि जो उद्योग के लिए सही है वह कृषि के लिए गलत है? देश को उद्योग भी चाहिए क्योंकि उन्हीं से रोजगार मिलेगा और कृषि भी चाहिए क्योंकि वही से पेट भरता है।

इन दोनों में कोई द्वंद और विरोधाभास नहीं है। लेकिन कुछ अतिवादी लोग इस देश में उद्योगों के खिलाफ माहौल बना रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने पश्चिम बंगाल को एक अच्छे खासे खुशहाल तथा उन्नत, विकासमान और संपन्न राज्य से अपने शासन में एकदम पिछड़ा राज्य बना दिया। ऐसा वे अब पंजाब में भी करने पर आमादा है।

कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर चल रहा प्रदर्शन भीड़तंत्र का ही एक नमूना है। याद कीजिए जब नागरिकता कानून का मामला आया था तब भी कुछ लोगों ने सार्वजनिक तौर पर भाषण देकर कहा था अब तो फैसला सड़कों पर ही होगा। भीड़ को उकसाने की कार्यवाही तब भी हो रही थी और भीड़ को उकसाकर जनता को बरगलाने की कार्यवाही अभी हो रही है। यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।

इस नाते ट्रंप समर्थकों ने लोकतंत्र पर जो हमला किया उसमें और भारत में जो चुनी हुई सरकार के खिलाफ हो रहा है, दोनों में बुनियादी सोच के तौर पर कोई ज्यादा फर्क नहीं है। लोगों के दर्द का इस्तेमाल कर उन्हें इकट्ठा करके अराजकता और असंतोष पैदा करना लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र है।

ध्यान देने की बात है कि इनमें से ज़्यादातर तत्व चीन की निरंकुश व्यवस्था को अपना आदर्श और वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी को अपना आका मानते हैं। इसलिए भारत सहित दुनिया के लोकतंत्रों को सबसे बड़ा खतरा इस समय चीन की अधिनायकवादी व्यवस्था से नहीं बल्कि अपने ही भीतर बसे इन तत्वों से है जो सड़कों पर आकर को भीड़ की लाठी से देश को हाँकना चाहते हैं। इस आंदोलन का नतीजा कुछ भी हो नुक्सान हम सबका ही होने वाला है। ये भीड़तंत्र लोकतंत्र का दुश्मन है।

प्रदर्शनकारी किसानों ने इमरान खान की तारीफ में पढ़े कसीदे, PM मोदी को कहा- ‘कुत्ता’; देखें वीडियो

हाल ही में यूट्यूब चैनल ‘नेशनल दस्तक’ (‘National Dastak’) ने एक वीडियो पोस्ट किया। यूट्यूब चैनल द्वारा पोस्ट किया गया वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो गया है। इस वीडियों में प्रदर्शनकारी किसानों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ जहरीले बोल बोलते हुए देखा जा सकता है। उनके ये जहरीले बोल पीएम मोदी के प्रति उनके मन में व्याप्त घृणा को दर्शाता है।

इतनी ही नहीं, इन प्रदर्शनकारियों में से एक को तो पीएम मोदी निंदा करते हुए पाकिस्तान के पीएम इमरान खान की तारीफों के पुल बाँधते देखा जा सकता है। बता दें कि इसके YouTube चैनल के प्लेटफॉर्म पर 4 मिलियन से अधिक सब्सक्राइबर्स हैं।

वीडियो की शुरुआत में, पारंपरिक सिख के कपड़ों में एक आदमी कहता है कि इमरान खान अपनी क्षमता के आधार पर प्रधानमंत्री बने हैं, जबकि नरेंद्र मोदी जूठे चाय के कप धो कर भारतीय प्रधानमंत्री बन गए हैं। वह यह भी कहता हैं कि इमरान खान उनके लिए बहुत अच्छे रहे हैं। उन्होंने इमरान खान को गुरुद्वारा करतारपुर साहिब खोलने का भी श्रेय दिया, जो कि गलत है।

वह शख्स यह भी कहता है कि पीएम अपनी मौत के बाद स्वर्ग या नर्क में नहीं जाएँगे बल्कि धरती पर (भूत के रूप में) दुबक कर रहेंगे। एक अन्य शख्स का कहना है कि ईवीएम हैक कर नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने हैं। बता दें कि ईवीएम को लेकर इस तरह की साजिशों का आरोप पहले भी विपक्षी नेता, खास कर कॉन्ग्रेस द्वारा लगाया जा चुका है।

प्रदर्शनकारियों ने एक गधे का पुतला भी बनाया और उसके चेहरे पर पीएम मोदी की तस्वीर चिपका दी थी। वहीं इसके शरीर पर मुकेश अंबानी और अडाणी की तस्वीरें लगाई गई थी। प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री ‘कुत्ता’ भी कहते हैं। वीडियो सिंघू बॉर्डर पर कैप्चर किया गया और 6 जनवरी को यूट्यूब पर अपलोड किया गया।

प्रधानमंत्री के प्रति ऐसी घृणा पहले भी देखी जा चुकी है। पिछले दिनों वाम मोर्चे की किसान शाखा को एक गीत गाते हुए प्रधानमंत्री के मरने की दुआ करते देखा गया। महिलाओं को गाते हुए सुना गया, “मोदी मर जा तू, शिक्षा बेच के खा गया रे मोदी, मर जा तू। रेल बेचकर खा गया रे मोदी, मर जा तू। देश बेच के खा गया रे मोदी, मर जा तू। किसानों को धोखा दे गए रे मोदी, मर जा तू।” वहीं सामने बैठी महिला बार-बार ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू’ दोहरा रही थी।

वहीं शुक्रवार (जनवरी 08, 2021) को इंडिया टुडे की एडिटर प्रीति चौधरी ने दावा किया कि प्रदर्शनस्थल पर मौजूद ‘कुछ प्रदर्शनकारी’ रिपोर्टरों (पत्रकारों) का यौन उत्पीड़न भी करने लगे हैं, वहीं वहाँ मौजूद अन्य लोग ये सब होने दे रहे हैं। प्रीति चौधरी ने दावा किया कि ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट करने के लिए उनकी खुद की टीम के पास कई ऐसे वाकये हैं, जब रिपोर्टर को यौन उत्पीड़न झेलना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनके नितंबों पर चुटकी काटी गई।

‘बुर्काधारी महिलाओं ने दिल्ली दंगों में किया था पुलिस पर हमला’: कोर्ट ने आरोपित तबस्सुम को जमानत देने से किया इनकार

दिल्ली की एक अदालत ने पिछले साल दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों के दौरान हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या के मामले में एक आरोपित द्वारा दायर जमानत याचिका को शुक्रवार (जनवरी 08, 2021) को रद्द कर दिया

रिपोर्टों के अनुसार, अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विनोद यादव ने दिल्ली के चाँद बाग इलाके की निवासी तबस्सुम की जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि उसके कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDRs) से पता चला है कि वह दिल्ली दंगों के कई सह-अभियुक्तों के साथ लगातार संपर्क में थी। न्यायाधीश ने आगे कहा कि आवेदक के खिलाफ लगाए गए आरोप गंभीर थे।

न्यायाधीश ने कहा, “अपराध के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, मुझे आवेदक को जमानत देने के लायक मामला नहीं लगता। इसलिए जमानत की अर्जी खारिज कर दी गई है।”

दिल्ली की अदालत के फैसले से यह साबित होता है कि संसद द्वारा नागरिकता संशोधन अधिनियम पारित किए जाने के बाद दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगे न सिर्फ भारत को अस्थिर करने के लिए था, बल्कि हिंदू आबादी को निशाना बनाने के लिए पहले से रची गई साजिश थी।

दंगा-अभियुक्तों की जमानत को खारिज करते हुए न्यायाधीश ने कहा कि यह साफ तौर पर स्पष्ट है कि प्रदर्शनकारियों और आयोजकों ने भीड़ में व्यक्तियों को प्रेरित किया था और कुछ असामाजिक तत्वों ने अपराध स्थल को घेर लिया था। और वो पत्थर, लाठी, धारदार हथियार एवं दूसरे तरह के हथियारों से लैस थे।

न्यायाधीश ने तीखी टिप्पणी की, “यहाँ तक कि बुर्का पहने महिलाएँ स्पष्ट रूप से पुलिस पार्टी पर हाथों में लाठी और अन्य सामग्री से हमला करती हुई दिखाई देती हैं। यह भी रिकॉर्ड में आया है कि भीड़ में से कुछ लोगों ने 25 फूटा रोड पर ऊँची इमारतों की छतों पर कब्जा कर लिया था, जिनके पास बंदूक आदि कई अन्य दंगा करने का सामान था।”

हिंदू-विरोधी दंगे एक अच्छी तरह से रची गई साजिश थी: दिल्ली कोर्ट

न्यायमूर्ति यादव ने उल्लेख किया कि यह सब प्रथम दृष्टया इंगित करता है कि सब कुछ एक अच्छी तरह से रची साजिश के तहत किया जा रहा था। उन्होंने कहा कि वज़ीराबाद रोड को अवरुद्ध कर दिया गया था और पुलिस द्वारा विरोध करने पर बल का प्रयोग कर किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार थे।

दिल्ली पुलिस ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए आरोप लगाया है कि तबस्सुम सरकार के खिलाफ मुस्लिम भीड़ को उकसाने के लिए अन्य दंगाइयों के साथ मंच साझा करती थी जिसके कारण 24 फरवरी, 2020 को हिंसा हुई, जिसके परिणामस्वरूप दिल्ली के उत्तर पूर्वी जिले में हेड कांस्टेबल रतन लाल समेत 50 से अधिक लोग मारे गए।

पुलिस ने यह भी कहा कि भीड़ के हमले के दौरान भीड़ ने दिल्ली पुलिस के अधिकारियों पर हमला किया, जिसके कारण पुलिस उपायुक्त (डीसीपी) शाहदरा, अमित शर्मा, अनुज कुमार, एसीपी गोकलपुरी और 51 अन्य पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हो गए। दो वरिष्ठ अधिकारियों अमित शर्मा, अनुज कुमार को गंभीर चोटें आईं, जबकि कांस्टेबल रतन लाल को उन्मादी भीड़ ने मार डाला।

अपने आवेदन में, आरोपित तबस्सुम ने कबूल किया कि उसने विरोध प्रदर्शन में भाग लिया था, हालाँकि, दावा किया कि कुछ कानूनों का विरोध करना उसका ‘कानूनी और मौलिक अधिकार’ था, जिसे उससे दूर नहीं किया जा सकता था। उसका कहना था कि नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2019 (सीएए) और नागरिकों के लिए राष्ट्रीय रजिस्टर (एनआरसी) एक विशेष धर्म के खिलाफ थे।

दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों के दौरान रतन लाल की हत्या

फरवरी में पूर्वोत्तर दिल्ली में भड़की हिंसा के दौरान हेड कांस्टेबल रतन लाल की हत्या के संबंध में दायर चार्जशीट में कहा गया है कि रतन लाल की हत्या राष्ट्रीय राजधानी में सांप्रदायिक दंगों को बढ़ाने के लिए एक गहरी साजिश का हिस्सा थी। पुलिस ने इस मामले में 1100 पन्नों की चार्जशीट दायर की।

पुलिस ने चार्जशीट में खुलासा किया कि इससे 2 दिन पहले 22 फ़रवरी को ही 50 लोगों के एक समूह ने बैठक की थी, जहाँ हिंसा की पूरी साज़िश रची गई। दंगाइयों ने अपने घर के बच्चों व बुजुर्गों को पहले ही घर के भीतर रहने को बोल दिया था और ख़ुद हथियार लेकर निकले।

पुलिस की चार्जशीट में ये भी कहा गया कि रतनलाल की हत्या एक गहरी साजिश का हिस्सा थी। 24 फरवरी को मौजपुर क्रॉसिंग के पास हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीच झड़प से दोपहर 12 बजे के क़रीब हिंसा भड़क उठी थी। एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि 5000 लोग वहाँ जुट गए थे और पत्थरबाजी भी हो रही थी। 1 बजे एक बड़ी भीड़ ने चाँदबाग में डीसीपी और अन्य पुलिस अधिकारियों पर हमला बोल दिया, जिसमें महिलाएँ और बच्चे भी शामिल थे।

दिल्ली पुलिस की मानें तो चाँदबाग में जिस तरह से सीएए विरोधी प्रदर्शन में लोगों को भड़काया गया और धरने पर बिठाया गया, उसका दंगे फैलाने में अहम रोल था। रतन लाल की हत्या भी साज़िश का हिस्सा थी।

ये लोग 23 फरवरी को भी हंगामे के लिए निकले थे, लेकिन उस दिन ज्यादा कुछ नहीं किया गया और ये सभी वापस आ गए। 24 फरवरी को सारे उपद्रवी एक बार फिर से घर से बाहर निकले और हिंसा शुरू कर दी। शाहदरा के डीसीपी अमित शर्मा, एसपी अनुज शर्मा और हेड कांस्टेबल रतनलाल गंभीर रूप से घायल हो गए थे। बाद में इलाज के दौरान रतनलाल की मौत हो गई थी।

बंगाल में एंट्री की तैयारी कर रहे ओवैसी को लगा झटका: TMC में शामिल हुए AIMIM के कार्यकारी अध्यक्ष सहित कई सदस्य

पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनाव करीब आते आते राजनीतिक परिदृश्य में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। कौन कब किस पार्टी का दामन थाम ले इसे लेकर कुछ भी कहा नहीं जा सकता। हाल ही में जहाँ तृणमूल कॉन्ग्रेस के कई दिग्गजों ने पार्टी से नाता तोड़कर बीजेपी में शामिल हो गए।

वहीं अब खबर आ रही है कि शनिवार (9 जनवरी, 2021) को असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के कई सदस्यों ने टीएमसी का दामन थाम लिया हैं, जिसमें पश्चिम बंगाल इकाई के अध्यक्ष एसके अब्दुल कलाम और संयोजक शेख अनवर हुसैन पाशा भी शामिल है। AIMIM नेता और उनके समर्थक पार्टी के वरिष्ठ नेता और राज्य मंत्री चंद्रिमा भट्टाचार्य की उपस्थिति में TMC में शामिल हुए।

कोलकाता टीएमसी मुख्यालय में पार्टी में शामिल होने के बाद कलाम ने कहा कि पश्चिम बंगाल में कई वर्षों से शांति और अमन का माहौल है। उन्होंने ‘जहरीली हवा’ को दूर रखने के पार्टी बदली है। पत्रकारों से बातचीत करते हुए एसके अब्दुल कलाम ने कहा, “हमने देखा है कि पश्चिम बंगाल शांति का नजारा हुआ करता था। लेकिन देर से ही सही यहाँ की हवा जहरीली हो गई है और इसे ठीक करना है। इसीलिए मैंने तृणमूल कॉन्ग्रेस में शामिल होने का फैसला किया।”

एआईएमआईएम के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी पर हमला करते हुए एआईएमआईएम के पश्चिम बंगाल संयोजक शेख अनवर हुसैन पाशा ने कहा कि पश्चिम बंगाल में यह समय पॉलिटिकल एंट्री के लिए ठीक नहीं है। उन्होंने दावा किया किअसदुद्दीन ओवैसी की पार्टी भाजपा को सिर्फ वोटों का ध्रुवीकरण करने में मदद करेगी।

गौरतलब है कि बिहार में पाँच सीटें जीतने और कुछ सीटों पर स्पॉइलर खेलने के बाद कयास लगाए जा रहे थे कि पश्चिम बंगाल में एआईएमआईएम के आगामी विधानसभा चुनावी समर में उतरने से यहाँ के समीकरण बदल सकते हैं।

वहीं मुस्लिम वोटर्स का समीकरण बिखरने की चिंता को लेकर टीएमसी प्रमुख ममता ने ओवैसी पर निशाना साधते हुए कहा था कि पश्चिम बंगाल में साम्प्रदायक सौहार्द बिगाड़ने और अल्पसंख्यकों के वोट का ध्रुवीकरण करने के लिए भाजपा एआईएमआईएम को लेकर आई है। भाजपा मुस्लिम वोट बाँटने के लिए हैदराबाद से एक पार्टी लाने के लिए करोड़ों खर्च कर रही है।

ममता बनर्जी के इस बयान का जवाब देते हुए असदुद्दीन ओवैसी ने कहा था, “मुझे पैसों से खरीदने वाला आज तक कोई पैदा नहीं हुआ। ममता बनर्जी के आरोप निराधार हैं, उन्हें अपने घर के बारे में फिक्र होनी चाहिए। उनकी पार्टी के कई लोग बीजेपी में जाना शुरू कर चुके हैं। उन्होंने बिहार के मतदाताओं और हमारे लिए वोट करने वाले लोगों का अपमान किया है।”

ओवैसी ने कहा कि मुस्लिम वोटर्स ममता बनर्जी की जागीर नहीं हैं। इसके अलावा ओवैसी का कहना था कि ममता को ऐसे मुस्लिम नहीं पसंद हैं, जो खुद के लिए सोच और बोल सकते हैं।

पंचायत चुनाव से रायबरेली में सोनिया गाँधी को लगा झटका: 35 प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी के सदस्यों ने दिया इस्तीफा

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली से बड़ी बगावत सामने आई है। पार्टी के मजबूत नेता के रूप में जाने जाने वाले पूर्व कॉन्ग्रेस के प्रदेश सचिव और मौजूदा प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी (PCC) के सदस्य शिव कुमार पाण्डेय समेत 35 अन्य पदाधिकारियों ने सोनिया गाँधी को अपना इस्तीफा दे दिया है। बता दें कॉन्ग्रेस जिलाध्यक्ष के द्वारा नई कार्यकारिणी का हाल ही में गठन किया गया है।

प्रदेश सचिव कॉन्ग्रेस कमेटी सदस्य शिव कुमार पांडेय ने कहा, “हमारे निष्ठावान कॉन्ग्रेसी वर्षों से निरंतर पार्टी की सेवा करते चले आ रहे हैं। पार्टी को कमजोर करने के लिए जिलाध्यक्ष और अन्य जिलास्तरीय पदाधिकारी कार्य कर रहे है। हाल ही में गठित ब्लॉक की नई कार्यकारिणी में पुराने कार्यकर्ताओं को तवज्जो न देकर अन्य पार्टी से आए लोगों को महत्वपूर्ण पद पर बैठा दिया गया है।”

गौरतलब है कि 26 दिसंबर को ही केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अमेठी के गौरीगंज स्थित नवोदय विद्यालय में मीडिया से कहा था, “2024 में रायबरेली में भी बीजेपी का कमल खिलेगा।” उसके ठीक 13वें दिन कॉन्ग्रेस में इस तरह की बगावत ने राजनैतिक सरगर्मियाँ बढ़ा दी हैं। वहीं ईरानी का बयान भी अब चर्चा का विषय बन गया है।”

शिव कुमार ने पार्टी के भितरघात का जिक्र करते हुए यह भी कहा, “इनमें कई अनुभवहीन हैं, एक साल पहले तक जो पार्टी में सदस्य भी नहीं थे, उन्हें जिम्मेदारी दे दी जा रही है। लगातार निष्काम भाव से 30 सालों से पार्टी में सेवा देते रहे हैं, उन्हें पार्टी से निष्कासित किया जा रहा है। जिससे पार्टी की नींव कमजोर हो रही है।”

कॉन्ग्रेस नेता ने कहा, “जैसे अमेठी में सांसद की कुर्सी कॉन्ग्रेस से छिन गई है, वैसी ही दशा इस जिले में होती जा रही है।” इसको लेकर सांसद और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी को पत्र लिखा गया है। इसके अलावा शिव कुमार दावा किया कि आलाकमान की ओर से ध्यान नहीं दिया गया तो इस्तीफा देनेवाले कार्यकर्ताओं का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।

रिपोर्ट के अनुसार, पार्टी आलाकमान को इस्तीफा देने वालों में कॉन्ग्रेस पीसीसी सदस्य शिवकुमार पांडेय, ऊँचाहार के किसान संघ के ब्लॉक अध्यक्ष अनुज सिंह, पूर्व जिला महासचिव यूथ कॉन्ग्रेस रायबरेली साधना सिंह, महासचिव ब्लाक रोहनिया रमेश कुमार पाण्डेय, ब्लाक रोहनिया सचिव छैलबिहारी, रोहनिया ब्लाक महिला ब्लाक अध्यक्ष रामश्री पटेल, जिला सचिव महिला रानू देवी, शुभम, रामबहादुर पटेल, तारावती, सजनलाल मौर्य, लवप्रकाश, वेदप्रकाश, निरंजन सिंह, ब्रज बहादुर सिंह, मुकेश, नागेन्द्र बहादुर सिंह, देवतादीन, संदीप पासी, इंन्द्रजीत रैदास, रामखेलावन पासी, शिवकुमारी सिंह, शहीद अहमद, रामपाल सिंह, रामसुख पटेल, दिनेश कुमार नाई आदि हैं।

हालाँकि, अभी तक किसी का भी इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है। इतने इस्तीफे एक साथ सामने आने के बाद भी जिला के पदाधिकारी इस मामले पर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं।