Sunday, July 25, 2021
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चुनाव में नकारे दलों, वामपंथियों की साजिश है ‘किसान आंदोलन’: लोकतंत्र को भीड़तंत्र से बचाना जरूरी

भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है। यहाँ मिथ्या प्रचार कर के, बहला-फुसलाकर, बरगला कर, भड़का कर, भय दिखा कर अथवा लालच देकर कुछ हजार लोगों को इकट्ठा करना कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। तो क्या, अगर कुछ हजार लोग इकट्ठे हो जाएँ तो उन्हें किसी विषय पर वीटो का अधिकार दिया जा सकता है?

बुधवार (जनवरी 06, 2021) को अमेरिकी संसद के बाहर वॉशिंगटन में जो हुआ वह भीड़ तंत्र का भयानक नजारा था। एक उकसाई गई भीड़ जोर जबरदस्ती करते हुए अमेरिकी संसद कैपिटल हिल में घुस गई और उसने नई चुनी हुई सरकार के निर्वाचन की अंतिम प्रक्रिया को रोकने की भोंडी कोशिश की।

कुछ सौ हुड़दंगी लोगों ने धक्काशाही करके नवनिर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडन के नाम पर सीनेट की मुहर लगाने से रोकने का प्रयास किया। ये लोग राष्ट्रपति ट्रम्प के समर्थक थे, जो चुनाव हार चुके हैं।

लोकतंत्र में आस्था रखने वाले दुनिया भर के लोगों के लिए यह एक भूल जाने वाला दिन था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जाते-जाते अपना नाम उन नेताओं की सूची में लिखा गए जिन्हें कोई याद नहीं रखना चाहेगा। अमेरिकी चुनावों में धाँधली हुई कि नहीं हमें नहीं मालूम। लेकिन जब चुनाव सत्यापन के लिए अमरीकी संसद बैठ रही थी तो धौंसपट्टी से संसद के काम में बाधा डालने से गैर लोकतांत्रिक काम नहीं हो सकता।

यह भीड़तंत्र का एक नमूना था। यह भीड़तंत्र अब दुनिया भर के लोकतंत्रों के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है। यह उस खतरे से भी बड़ा है जो चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के निरंकुश, अतिवादी और तानाशाही नेतृत्व ने दुनिया के सामने खड़ा किया है।

चीन की अधिनायकवादी कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा पैदा संकट तो बाहरी खतरा है। जिसकी काट लोकतान्त्रिक व्यवस्थाएँ निकाल ही लेंगी। भीड़तंत्र की ये चुनौती घुन की तरह है जो भीतर ही भीतर लोकतंत्र को खोखला कर देगी। इसकी जितनी निंदा की जाए उतनी कम है।

चुनाव में कभी न जीत सकने वाली या सत्ता गँवा देने वाली ताकतें इस सुनियोजित अराजकता के पीछे सक्रिय हो रही हैं। इनका मिथ्या प्रचार आगे बढ़ाने में ये सोशल मीडिया का चालाकीपूर्ण उपयोग भी ये लोग कर रहे हैं। शत्रुता रखने वाले देश भी इस आग में घी डाल कर अपना शत्रुधर्म निभा रहे हैं। लोकतान्त्रिक समाजों का खुलापन ही, ऐसा लगता है कि उनकी बड़ी कमजोरी बन गया है।

ऐसी ताकतें लोगों को बरगला कर अराजकता का माहौल पैदा कर रही है। इनका मकसद हिंसा का सहारा लेकर चुनी हुई सरकारों को काम करने से रोकना है। इनका आखिरी लक्ष्य अंततोगत्वा लोकतंत्र को बदनाम कर उसे खत्म करने का ही है। इनकी आस्था लोकतान्त्रिक मूल्यों और व्यवस्था में कतई नहीं हैं। लोकतान्त्रिक अधिकारों का इस्तेमाल वे तो उसे उखाड़ने के लिए कर रहे हैं।

एक बात तो तय है कि लोकतंत्र में फैसले सड़कों पर नहीं हो सकते। इसके लिए लोकतांत्रिक समाजों ने कई संस्थाएँ बनाई है। जनता अपने प्रतिनिधियों को चुनकर विधायिकाओं में भेजती है, जिनका काम है कानून बनाना और उनका पालन करवाना। और यदि किसी चुनी हुई सरकार का काम जनता को पसंद नहीं आता है तो जनता उनको बाहर का रास्ता दिखा देती है।

सरकार बदलने का अधिकार भारत में जनता को हर 5 वर्ष में मिलता है। देखा जाए तो जनता अपने इस अधिकार का उपयोग राज्यों के चुनावों में भी करती है। स्थानीय चुनाव भी होते हैं जिनमें लगातार जनता अपने अभिमत को दर्ज़ कराती रहती है। इसके अलावा न्यायपालिका भी इन समाजों में अपनी प्रभावी भूमिका निभाती है।

भारत एक बड़ी जनसंख्या वाला देश है। यहाँ मिथ्या प्रचार कर के, बहला-फुसलाकर, बरगला कर, भड़का कर, भय दिखा कर अथवा लालच देकर कुछ हजार लोगों को इकट्ठा करना कोई ज्यादा मुश्किल काम नहीं है। तो क्या, अगर कुछ हजार लोग इकट्ठे हो जाएँ तो उन्हें किसी विषय पर वीटो का अधिकार दिया जा सकता है? ऐसा हुआ तो फिर लोकतान्त्रिक व्यवस्था जिन्दा नहीं रह सकती। वामपंथी और अराजकतावादी दोनों ही ऐसा करना चाहते हैं।

अमेरिका में भीड़ ने जो किया वह अत्यंत निंदनीय है। लेकिन देखा जाए तो क्या भारत में पिछले 2 साल से किसी न किसी मुद्दे को लेकर से भीड़ को इकट्ठा करके ऐसा ही करने का उपक्रम क्या नहीं चल रहा? इसके पीछे वही लोग हैं जिन्हें बार-बार लोग चुनाव में नकार चुके हैं।

तर्क और मुद्दा हर बार अलग होता है पर तरीका एक ही है। किसी संवेदनशील मुद्दे पर आक्रोश पैदा करो और भीड़ को इकठ्ठा कर सरकार की विश्वश्नीयता और नीयत पर सवाल खड़े करो। साथ ही बड़े जतन से बनाई गई संस्थाओं और व्यवस्थाओं को लाँछित करो।

याद कीजिए, पिछली सर्दियों में दिल्ली की सड़कों पर सीएए यानी नागरिकता कानून का विरोध करने के नाम पर आम जनजीवन ठप्प कर दिया गया था। अब कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर दिल्ली की सड़कों पर कुछ लोग जमे हुए हैं। वे कहते हैं कि या तो कृषि कानूनों को वापस लो या फिर वह दिल्ली को चलने नहीं देंगे।

इतना ही नहीं, अब तो धमकी देश की शान समझी जाने वाली गणतंत्र दिवस की परेड को भी एक तरह से रोकने की भी है। गणतंत्र दिवस की परेड भारत के सैन्य बल, तकनीकी क्षमता, विकास, गतिशीलता, स्वाभिमान और राष्ट्रीय गौरव का नमूना होती है। इसे दलगत राजनीतिक स्वार्थों में घसीटना अगर एक स्पष्ट राष्ट्रविरोधी नहीं तो अराष्ट्रीय काम तो है ही।

कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर इस बार देश की गणतंत्र दिवस परेड के समानांतर एक अलग परेड आयोजित करने की कुत्सित चेष्टा की जा रही है। ऐसा अराष्ट्रीय कार्य पहली बार नहीं हो रहा है। जनवरी 2014 में भी आम आदमी पार्टी ने भी गणतंत्र दिवस परेड के विरोध में बोट क्लब के पास धरना दिया था। जब देश में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। तब भी कड़ाके की ठंड में फुटपाथ पर सोने का नेरेटिव चलाया गया था।

गौर करने की बात है कि आज भी कृषि कानूनों का विरोध करने वाले कई चेहरे वही हैं जिन्हें देश की जनता चुनावों में बार बार नकार चुकी है। किसानों का नेतृत्व करने वाले एक प्रमुख नेता है हन्नान मुल्लाह। मुल्लाह अपने को किसान नेता कहते हैं। पर असल में तो वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम की पोलित ब्यूरो के वरिष्ठ सदस्य है।

पश्चिम बंगाल की उलूबेरिया लोकसभा सीट से 8 बार सीपीएम के टिकट पर लोकसभा का चुनाव जीत चुके हैं। पश्चिम बंगाल की जनता द्वारा चुनावों में धूल चटाए जाने के बाद वे और उनकी पार्टी के बाद अब किसानों के नेता बन गए हैं। किसान यूनियनें भारत सरकार से समझौता करना भी चाहें पर ये किसानधारी नेता कहते हैं कि किसान कानून वापस लिए जाने से कम कोई समझौता नहीं होगा।

कृषि कानूनों का विरोध करने वाले अधिकतर लोग वामपंथी एक्टिविस्ट और अराजकतावादी तत्व हैं। उनके साथ अन्य विरोधी दल बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। 2014 और 2019 दोनों के चुनावों में हार चुके लोग अब एक चुनी हुई सरकार को कृषि बिलों के नाम पर मात देना चाहते हैं।

माना जा सकता है कि कृषि कानूनों में परिवर्तन किए जाने की गुंजाइश है। अपना देश इतना बड़ा है कि हर प्रदेश के किसान एक कानून से खुश नहीं हो सकते। देश के अलग-अलग प्रदेशों में अलग-अलग फसलें उगाई जाती हैं। इसलिए अलग-अलग किसानों की अलग-अलग परेशानियाँ हो सकती हैं। पंजाब और हरियाणा के मुख्यतः धान और गेहूँ पैदा करने वाले किसानों की कुछ जायज माँगे हो सकती हैं।

इन्हें नए कानूनों में शामिल किया जाना चाहिए। यह आमने सामने बैठकर और बातचीत में लचीलापन अपनाकर ही हो सकता है। लेकिन अड़ियल होकर यह रट लगाना कि ‘कानून वापसी तक घर वापसी नहीं’, एक नितांत अनुचित माँग है। वीटो का ये अधिकार देश में किसी को नहीं है।

हम इसे एक और तरह से देख सकते हैं। पिछले करीब एक साल से पूरी दुनिया कोविड की महामारी से जूझ रही है। भारत में भी अब तक 1 करोड़ 4 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो चुके हैं। 1,50,000 से ज़्यादा भारतीय कोरोना से जान गँवा चुके है। देश का शायद ही कोई परिवार ऐसा होगा जिस पर कोरोना की मार न पड़ी हो। कारखाने बंद हो गए हैं, छोटे बड़े सभी दुकानदारों को परेशानी है, कामकाज ठप्प हुए हैं, पढ़ाई लिखाई नहीं हो पा रही है, गाँव -गाँव शहर-शहर परेशानियों और तक़लीफ़ों का अंबार है।

लाखों नौजवान रोजगार खो चुके हैं। इससे एक स्वाभाविक दुःख और गुस्सा अंदरखाने लोगों में है। कोरोना की तक़लीफ़ों से पैदा हुए इस दर्द का लाभ उठाकर लोगों में आक्रोश पैदा करने का काम कई स्वार्थी तत्व कर रहे हैं। ये घाव पर मरहम की जगह नमक छिड़कने जैसा है।

और तो और, कृषि कानूनों के बहाने ऐसे तत्त्व किसानों और उद्योगों के बीच एक कृत्रिम दीवार खड़ी करने का काम कर रहे है। सब जानते हैं कि कृषि और उद्योग एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक नदी के दो किनारों की तरह हैं। देश के विकास की गाड़ी को उन्नत कृषि और आधुनिक उद्योग – दोनों ही पहिए चाहिए।

किसानों को भड़का कर ये मूलतः विकास विरोधी दल उद्योगों को कृषि के सामने खड़ा करना चाहते हैं। यह कैसा विचित्र तर्क है कि जो उद्योग के लिए सही है वह कृषि के लिए गलत है? देश को उद्योग भी चाहिए क्योंकि उन्हीं से रोजगार मिलेगा और कृषि भी चाहिए क्योंकि वही से पेट भरता है।

इन दोनों में कोई द्वंद और विरोधाभास नहीं है। लेकिन कुछ अतिवादी लोग इस देश में उद्योगों के खिलाफ माहौल बना रहे हैं। ये वही लोग हैं जिन्होंने पश्चिम बंगाल को एक अच्छे खासे खुशहाल तथा उन्नत, विकासमान और संपन्न राज्य से अपने शासन में एकदम पिछड़ा राज्य बना दिया। ऐसा वे अब पंजाब में भी करने पर आमादा है।

कृषि कानूनों के विरोध के नाम पर चल रहा प्रदर्शन भीड़तंत्र का ही एक नमूना है। याद कीजिए जब नागरिकता कानून का मामला आया था तब भी कुछ लोगों ने सार्वजनिक तौर पर भाषण देकर कहा था अब तो फैसला सड़कों पर ही होगा। भीड़ को उकसाने की कार्यवाही तब भी हो रही थी और भीड़ को उकसाकर जनता को बरगलाने की कार्यवाही अभी हो रही है। यह बेहद खतरनाक प्रवृत्ति है।

इस नाते ट्रंप समर्थकों ने लोकतंत्र पर जो हमला किया उसमें और भारत में जो चुनी हुई सरकार के खिलाफ हो रहा है, दोनों में बुनियादी सोच के तौर पर कोई ज्यादा फर्क नहीं है। लोगों के दर्द का इस्तेमाल कर उन्हें इकट्ठा करके अराजकता और असंतोष पैदा करना लोकतंत्र नहीं भीड़तंत्र है।

ध्यान देने की बात है कि इनमें से ज़्यादातर तत्व चीन की निरंकुश व्यवस्था को अपना आदर्श और वहाँ की कम्युनिस्ट पार्टी को अपना आका मानते हैं। इसलिए भारत सहित दुनिया के लोकतंत्रों को सबसे बड़ा खतरा इस समय चीन की अधिनायकवादी व्यवस्था से नहीं बल्कि अपने ही भीतर बसे इन तत्वों से है जो सड़कों पर आकर को भीड़ की लाठी से देश को हाँकना चाहते हैं। इस आंदोलन का नतीजा कुछ भी हो नुक्सान हम सबका ही होने वाला है। ये भीड़तंत्र लोकतंत्र का दुश्मन है।

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