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वीडियो: ग्लास-कैरी बैग पर ‘अली’ लिखा होने से मुस्लिम भीड़ का हंगामा, कहा- ‘इस्लाम को लेकर ऐसी हरकतें, बर्दाश्त नहीं करेंगे’

कानपुर में एक कैफे है, जिसका नाम है- ‘अली-कैफे’। इसने खाना पैक करके ले जाने के लिए जो कैरी बैग और ग्लास बनाया उस पर भी उसने ‘अली-कैफे’ लिखवाया। जिसके बाद मुस्लिमों की भीड़ ने रेस्टोरेंट में जाकर जमकर हंगामा किया। सोशल मीडिया पर इसका वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है। 

वीडियो में साफ तौर पर देखा जा सकता है कि मुस्लिमों की भीड़ कैफे के स्टाफ पर इस बात को लेकर भड़क रहा है। मौलाना को कहते हुए सुना जा सकता है, “हम अपने बुजुर्गों की शान में की गई गुस्ताखी को कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। ये यहाँ पर रखा क्यों गया है? 10 लाख- 15 लाख, जितने भी रुपए का है ये, हम तत्काल देंगें, यहीं पर। आप लोग इस्लाम को लेकर इस तरह की हरकतें कर रहे हैं, हम इसे कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। आप लोग भी इंसान हो, आप ही बताओ, लोग इसे खाकर फेकेंगे तो ये पैर के नीचे आएगा या नहीं। हम जात की बात बर्दाश्त कर लेंगे, लेकिन हमारे बुजुर्गों की शान में कोई गुस्ताखी करेगा, हम कतई कम्प्रोमाइज नहीं करेंगे।”

मौलाना आगे कहता है, “जब मामूर साहब ने, शाह काजी साहब ने आपसे कह दिया था तो आपको रखना ही नहीं चाहिए। इसको तत्काल में ठंडा कराना चाहिए था। एक मिनट में मोबाइल ग्रुप में चलने लगता है। किसी ने यहाँ से फोटो खींच कर इसे व्हाट्सएप पर डाल दिया है और वह चल रहा है। किस तरीके के आप लोग इनसान हैं? आप बताइए ये गलत है कि नहीं है?”

इस बीच मौलाना के साथ आए एक अन्य शख्स सारे पैकेट को लेकर साथ जाने की बीत कही। उसने यह भी कहा कि इसका जितना भी बिल होगा वो अभी के अभी यहीं पर भर देंगे। चाहे वो 50 लाख ही क्यों न हो। इसके बाद उन लोगों ने डस्टबिन में पड़े पैकेट का भी वीडियो बनाया। हमने कैफे के मालिक से बात करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया।

इस वीडियो को ट्विटर पर शेयर करते हुए कालीचरण महाराज ने लिखा, “हिंदू देवी देवताओं के नाम पर लक्ष्मी बम, अगरबती, बीड़ी, सिगरेट, तंबाकू से लेकर न जाने क्या-क्या बिकते रहे हैं पर हिंदू कभी भी अपने देवी देवता के अपमान पर इन मुस्लिमो की तरह एकता नहीं दिखाते। ‘अली’ नाम लिखे हुए ग्लास और पैकेट को देख गुस्से में आए मौलाना।”

इस वीडियो पर तमाम लोगों ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दी। एक सोशल मीडिया यूजर ने लिखा, “यही तो सोचने वाली बात महाराज कि ग्लास, थैली पर अली का नाम लिखने पर ये लोग मारने-मरने पर उतारू हो जाते है और एक हिंदू हैं जिनके आराध्य का कभी अमेज़न वाले, कभी वेब सीरीज बनाने वाले मजाक बनाते हैं फिर भी आँखें नही खुलती है। तो कहीं न कहीं दोष तो हिंदू का ही है।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “ये लोग ट्विटर पर ही नही सड़कों पर उतर आते हैं अपने धर्म के लिए और हिन्दू ट्विटर पर हिन्दू धर्म, देवी देवताओं के अपमान की पोस्ट डाल कर लाइक ओर RT खेलते है, फॉलोवर्स बढ़ाते है। कुछ नही हो सकता।”

रक्षा विशेषज्ञ के तिब्बत पर दिए सुझाव से बौखलाया चीन: सिक्किम और कश्मीर के मुद्दे पर दी भारत को ‘गीदड़भभकी’

भारत के मशहूर रक्षा विशेषज्ञ ब्रह्मा चलानी ने तिब्बत पर भारत सरकार को सुझाव दिया था। चीन उस सुझाव से बौखलाया हुआ नज़र आ रहा है, चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स में भारत को कश्मीर और सिक्किम को लेकर धमकी दी गई है। ग्लोबल टाइम्स में चीनी विशेषज्ञ का हवाला देते हुए ऐसा कहा गया है कि अगर भारत ने तिब्बत को लेकर अपनी यथास्थिति में बदलाव किया, तो चीन सिक्किम को भारत का हिस्सा मानने से इंकार कर देगा। इसके अलावा चीन कश्मीर के मुद्दे पर भी अपना कथित तटस्थ रवैया बरकरार नहीं रखेगा। 

दरअसल टाइम्स ऑफ़ इंडिया में रक्षा मामलों के जानकार ब्रह्मा चेलानी का एक लेख प्रकाशित हुआ था। इस लेख के भीतर ब्रह्मा चेलानी ने भारत को सुझाव दिया था, जिसके मुताबिक़ अमेरिका ने तिब्बत को लेकर क़ानून बनाया था। भारत को इस क़ानून का चीन के खिलाफ़ उपयोग करना चाहिए जिसे भारत ने पहले खो दिया था। ‘तिब्बत’ चीन का संवेदनशील पहलू है, अगर भारत चीन के इस असंवेदनशील रवैये का लाभ नहीं लेना चाहता है तो कम से कम तिब्बत को लेकर चीन की नीतियों का समर्थन करना बंद कर ही सकता है। 

यह सुझाव चीन की सरकार को गुस्से की आग में झोंकने के लिए पर्याप्त था। ग्लोबल टाइम्स ने अपनी ख़बर में चीनी विशेषज्ञ लांग शिंगचुन के हवाले से बताया कि चेलानी शुरुआत से ही ‘चीन विरोधी’ रहे हैं और हमें इस बात पर शक है कि वो अमेरिका के गैरआधिकारिक प्रवक्ता हैं।

चेलानी अमेरिका के हितों को ध्यान में रखते हुए दावे कर रहे हैं और भारत के राजनियक नीतियों को अमेरिकी नीतियों की तर्ज पर आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। कुल मिला कर चेलानी द्वारा लिखा गया लेख भारत के हितों को नहीं लेकिन अमेरिका के हित में ज़रूर मददगार साबित होगा। 

चीनी विशेषज्ञ शिंगचुन का कहना था कि इस तरह के सुझावों से सिर्फ भारत और चीन के रिश्तों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। इससे किसी भी सूरत में भारत का हित सुनिश्चित नहीं होता है। अमेरिकी क़ानून का ज़िक्र करते हुए आगे कहा गया कि अमेरिका चीन के हितों को प्रभावित करने का लगातार प्रयास कर रहा है।

भारत तिब्बत के मुद्दे पर अमेरिकी क़ानून में शामिल नीतियों का पालन नहीं करेगा। भारत और चीन पड़ोसी मुल्क हैं और भारत की अपनी कमजोरी है। अमेरिका सिर्फ चीन को नीचा दिखाने की कोशिश कर रहा है, तिब्बत को चीन से अलग नहीं किया जा सकता है। अगर अमेरिका ऐसा नहीं कर पाया तो भारत यह कैसे कर सकता है।      

जानिए कौन है जो बायडेन की टीम में इस्लामी संगठन से जुड़ी महिला और CIA का वो डायरेक्टर जिसे हिन्दुओं से है परेशानी

जो बायडेन ने कश्मीरी मूल की समीरा फ़ज़ीली को नेशनल इकनॉमिक काउंसिल (National Economic Council) का डिप्टी डायरेक्टर नियुक्त किया है। इसके पहले समीरा फ़ेडरल रिज़र्व बैंक ऑफ़ अटलांटा (Federal Reserve Bank of Atlanta) के इंगेजमेंट फॉर कम्युनिटी एंड इकनॉमिक डेवलपमेंट (Engagement for Community and Economic Development) की डायरेक्टर रह चुकी हैं। 

इस मुद्दे पर चिंता का पहलू ये है कि समीरा कश्मीरी अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले इस्लामी संगठन स्टैंड विथ कश्मीर (SWK) की कथित तौर पर सदस्य हैं। अगस्त 2019 के दौरान जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद काउंसिल ऑफ़ अमेरिकन इस्लामिक रिलेशन (CAIR) ने समीरा का परिचय SWK की सदस्य के रूप में कराया था। 

समीरा ने अपने बयान में कहा था, “हम लोगों से निवेदन करना चाहते हैं कि वह कश्मीर की जनता के समर्थन में आगे आएँ और उनके लिए एकजुटता दिखाएँ। क्योंकि भारत और अमेरिका से लेकर यूरोप तक इस्लामोफ़ोबिया और तानाशाही बढ़ती जा रही है। आप सभी आगे आइए: मानवाधिकार, अंतरराष्ट्रीय क़ानून और लोकतंत्र का समर्थन करिए।” 

‘स्टैंड विथ कश्मीर’, “कश्मीरी प्रवासियों द्वारा चलाया जाने वाला स्वतंत्र वैश्विक नागरिक समूह है, जो कश्मीरी लोगों के समर्थन में खड़े रहने और उनकी पहचान अलग स्वरूप में स्थापित करने के लिए प्रतिबद्ध है।” संगठन का मानना है, “कोई भी प्रस्तावित संकल्प कश्मीरी आकांक्षाओं को ख़त्म कर सकता है। हम इस्लामोफ़ोबिया का इस्तेमाल करके कश्मीरी आवाम की आज़ादी को खतरे में डालने की निंदा करते हैं।” संगठन के मुताबिक़ भारतीय सेना की घाटी में मौजूदगी ‘कब्ज़ा’ है। ऐसे अफ़वाहें भी सामने आई थीं कि ये संगठन पाकिस्तान समर्थित हो सकता है। 

SWK ने हाल ही में रियाज़ नाईकू की एनकाउंटर में हुई मृत्यु पर ट्वीट किया था जबकि ट्वीट में इस बात का ज़िक्र नहीं किया गया था कि वो हिजबुल मुजाहिद्दीन का सीनियर कमांडर था। SWK आसिया अंद्राबी को ‘सामाजिक राजनीति एक्टिविस्ट’ कहता है जबकि आतंकवादियों से उसके संबंध जगजाहिर हैं। इतना ही नहीं आतंकवादियों के समर्थन का इनका इतिहास पुराना है, इसमें यासीन मलिक भी शामिल है जो कि इस्लामी आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैय्यबा से जुड़ा हुआ था जिस पर अमेरिका ने भी प्रतिबंध लगाया है। 

जो बायडेन द्वारा की गई एक और नियुक्ति पर भारत में काफी सवाल उठ रहे हैं, जो कि चिंता का विषय भी हो सकता है और वो है सीआईए डायरेक्टर। कार्नेजी एंडोमेंट (Carnegie Endowment) के अध्यक्ष विलियम जे बर्न्स को सीआईए का मुखिया चुना गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कश्मीर पर उसके विचारों को एक बार ज़रूर समझा जाना चाहिए।

हाल ही में फरवरी 2020 के दौरान विलियम ने द अटलांटिक के लिए एक लेख लिखा था, “बीते वसंत में एक शानदार चुनावों के बाद नरेन्द्र मोदी को पिछले तीन दशक की सबसे भीषण आर्थिक मंदी का सामना करना पड़ रहा है। अर्थव्यवस्था के लिए एक प्रभावी रणनीति की गैर मौजूदगी में उन्होंने कुछ मुद्दों पर सबसे ज़्यादा ध्यान दिया है। जिस पर भाजपा की दृष्टि हमेशा से स्पष्ट थी: हिन्दू बहुसंख्यकवाद! संवैधानिक सीमाओं को ताक पर रखते हुए पूरी ताकत के साथ, मोदी सरकार अपनी अंधराष्ट्रभक्ति का प्रदर्शन कर रही है।” 

लेख के अगले हिस्से में लिखा था, “मोदी सरकार एक नया नागरिकता क़ानून लेकर आई है जो कि मुस्लिम शरणार्थियों के साथ भेदभाव करता है और विवादित धार्मिक स्थलों को लेकर भी विवाद बढ़ा है। आलोचना करने वाले पत्रकारों और शिक्षाविदों पर भी दबाव बनाया जा रहा है। भाजपा को राज्य और स्थानीय चुनावों में चुनौतियों का सामना करना पड़ा था लेकिन उसका राष्ट्रीय विपक्ष ‘कॉन्ग्रेस’ अपनी पुरानी छवि का आवरण बन कर रह गई है। न्यायालय और सिविल सोसाइटीज़ भी नर्म रवैया बरत रही हैं। भारत की संकल्पना के विचारों की लड़ाई अभी चल रही है जो कि संविधान में पक्का विश्वास रखने वालों और कट्टर हिन्दूवादियों के बीच है।”

2019 नवंबर महीने में भी विलियम ने बयान देते हुए कहा था कि भारत को जम्मू कश्मीर के बारे में वाशिंगटन से संबंधित चिंताओं पर ध्यान देना चाहिए।  

पालघर नागा साधु मॉब लिंचिंग केस में कोर्ट ने गिरफ्तार 89 आरोपितों को दी जमानत: बताई ये वजह

पालघर भीड़ हिंसा (मॉब लिंचिंग) मामले में गिरफ्तार किए गए 89 लोगों को ठाणे की एक अदालत ने शनिवार (जनवरी 16, 2021) को जमानत दे दी। अदालत ने सभी 89 लोगों पर जमानत के लिए 15 हजार रुपए की राशि जमा कराने का निर्देश दिया है। अदालत ने इन्हें इस आधार पर जमानत दी कि ये लोग केवल घटनास्थल पर मौजूद थे। 

गौरतलब है कि 16 अप्रैल 2020 को जूना अखाड़े से जुड़े दो साधु 70 वर्षीय कल्पवृक्ष गिरि महाराज और 35 वर्षीय सुशील गिरि महाराज अपने ड्राइवर 30 वर्षीय नीलेश तेलगेडे के साथ एक अन्य साधु के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए मुंबई से गुजरात जा रहे थे। इसी बीच पालघर जिले के गढ़चिंचले गाँव के 200 से अधिक लोगों की भीड़ ने इकठ्ठा होकर साधुओं पर हमला किर दिया था। इस दौरान भीड़ ने दोनों साधुओं के साथ उनके एक ड्राइवर की पीट-पीटकर हत्या कर दी थी।

इस मामले की जाँच के लिए एक स्वतंत्र फैक्ट-फाइंडिंग कमिटी का गठन किया गया था। कमिटी ने साधुओं की मॉब लिंचिंग को लेकर चौंकाने वाला दावा करते हुए कहा है कि इसके पीछे गहरी साजिश थी। साथ ही इस घटना के तार नक्सलियों से भी जुड़ रहे हैं। कमिटी ने यह भी पाया है कि वहाँ उपस्थित पुलिसकर्मी अगर चाहते तो इस हत्याकांड को रोक सकते थे लेकिन उन्होंने हिंसा की साजिश में शामिल होने का रास्ता चुना।

फैक्ट-फाइंडिंग पैनल के सदस्य संतोष जनाठे (Santosh Jnathe) ने दावा किया था कि एक एनसीपी नेता को उस भीड़ के बीच देखा गया था, जो पालघर में साधुओं की लिंचिंग की घटना में शामिल थे। फैक्ट फाइंडिंग टीम ने जिस NCP नेता को इस भीड़ हिंसा के बीच पाया है, उसका नाम काशीनाथ चौधरी बताया गया।

काशीनाथ चौधरी शरद पवार की ‘नेशनलिस्ट कॉन्ग्रेस पार्टी’ का जिला सदस्य हैं। उन पर आरोप लगे कि साधुओं की लिंचिंग कर उनकी निर्मम हत्या करने वाली भीड़ में वामपंथी पार्टी सीपीएम के पंचायत सदस्य व उसके साथ विष्णु पातरा, सुभाष भावर और धर्मा भावर भी शामिल थे।

फैक्ट फाइंडिंग समिति पहले भी इस निष्कर्ष पर पहुँच चुकी है कि क्षेत्र में काम करने वाले वामपंथी संगठन आदिवासियों के मन में सरकार और हिंदू धर्म गुरुओं, साधुओं और सन्यासियों के खिलाफ नफरत पैदा कर रहे हैं।

तब अलर्ट हो जाती निधि राजदान तो आज हार्वर्ड पर नहीं पड़ता रोना

आज खुद को ‘फिशिंग अटैक’ की पीड़ित बता रहीं निधि राजदान का पत्रकारिता का पूरा करियर प्रोपेगेंडा के इर्द-गिर्द रचा रहा है। वे उस लिबरल गैंग की प्रमुख सदस्य हैं, जो खुद के विचार से इत्तेफाक नहीं रखने वालों को ‘उपदेश’ देने का कोई मौका नहीं छोड़ते। 2014 के बाद हर मौके पर वह सरकार को कोसती नजर आईं हैं। एनडीटीवी में रहीं निधि कश्मीर पर पाकिस्तानी सुर अलापने के लिए भी विख्यात रही हैं।

यही कारण है कि शुक्रवार (जनवरी 15, 2021) को जब उन्होंने ट्वीट कर अपने साथ हुए गंभीर ऑनलाइन फर्जीवाड़े का खुलासा किया तो सोशल मीडिया में कई लोगों ने उनकी मंशा पर शक जाहिर किया। इस ट्वीट में उन्होंने बताया था कि हार्वर्ड से मिला ऑफर फेक था।

राजदान के अनुसार उन्हें हाल ही में पता चला कि उन्हें हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पत्रकारिता पढ़ाने का जो ऑफर दिया गया था, वह फर्जी है। उन्होंने पिछले साल NDTV में अपने 21 साल के करियर को अलविदा कह दिया था, ताकि वे हार्वर्ड (Harvard University)में जाकर अध्यापन कार्य कर सकें।

निधि ने फरवरी 2018 में भी ऑनलाइन फर्जीवाड़े को लेकर एक ट्वीट किया था। इसमें उन्होंने बताया कि उनका इनकम टैक्स डिटेल हैक कर लिया गया और उनके सारे डिटेल्स को भारत सरकार के पोर्टल पर बदल दिया गया। उनका कहना था कि उनके रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर पर भी इसका कोई अलर्ट का मैसेज नहीं आया। उस समय उन्होंने सरकार से सवाल किया था, “हमें कैसे विश्वास करना चाहिए कि हमारा डेटा सुरक्षित है?”

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी मामले के सामने आने के बाद निधि का 2018 का ये पुराना ट्वीट वायरल हो रहा है। लोग इस पर काफी प्रतिक्रिया दे रहे हैं। लोगों का कहना है कि अगर मान भी लिया जाए कि यह सही बोल रही हैं तो ये किस तरह की पत्रकार हैं, जो असली हार्वर्ड और नकली हार्वर्ड के मेल को नहीं पहचान सकी। ऐसे में उनकी पत्रकारिता की क्या विश्वसनीयता है। वो फेक सोर्स पर भी विश्वास कर सकती हैं, जो कि पहले भी दिख चुका है।

एक यूजर ने लिखा कि सामान्य नागरिक ऐसी परिस्थिति में एफआईआर दर्ज करवाते हैं, आईटी विभाग के पास शिकायत दर्ज करवाते हैं लेकिन हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर सिर्फ ट्वीट करते हैं और गरीबों को अपना सारा काम बंद करके मैडम के पास जाना पड़ता है।

बता दें कि निधि द्वारा यह खुलासा किए जाने के बाद कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई थी, हार्वर्ड ने बताया है कि उसके कैम्पस में न तो पत्रकारिता का कोई विभाग और न ही कोई कॉलेज है। यहाँ तक कि पत्रकारिता के एक भी प्रोफेसर नहीं हैं।

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी स्थित नीमन फाउंडेशन के जर्नलिज्म लैब के सीनियर डायरेक्टर और पूर्व डायरेक्टर जोशुआ बेंटन ने ये खुलासा किया है। उन्होंने ये भी बताया कि हार्वर्ड में जर्नलिज्म पर फोकस रख कर सिर्फ मास्टर्स ऑफ लिबरल आर्ट्स नामक डिग्री की पढ़ाई होती है, जिसे कार्यरत पत्रकारों द्वारा ही पढ़ाया जाता है।

‘ICU में भर्ती मेरे पिता को बचा लीजिए, मुंबई पुलिस ने दी घोर प्रताड़ना’: पूर्व BARC सीईओ की बेटी ने PM से लगाई गुहार

जेल में बंद ‘Broadcast Audience Research Council (BARC India)’ के पूर्व सीईओ पार्थो दासगुप्ता की बेटी प्रत्यूषा ने एक पत्र के माध्यम से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गुहार लगाई है। उन्होंने इस पत्र में अपने पिता की ज़िंदगी बचाने की अपील की है। प्रत्यूषा का कहना है कि उनके पिता शुक्रवार (जनवरी 15, 2021) से ही बेहोशी की अवस्था में एक अस्पताल में भर्ती हैं। वो फ़िलहाल TRP स्कैम में दिसंबर 24, 2020 से जुडिशल कस्टडी में हैं।

प्रत्यूषा ने लिखा कि उनकी माँ को अचानक से एक फोन कॉल कर के बताया गया कि पार्थो दासगुप्ता को जेजे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया है और वो जल्दी से वहाँ पहुँचें। उन्होंने बताया कि परिजनों के वहाँ पहुँचने पर डॉक्टर पूछने लगे कि पिछले 12 घंटों से पार्थो के अस्पताल में होने के बावजूद आखिर उनके परिवार का कोई व्यक्ति उनकी सुध लेने क्यों नहीं आया? उन्हें तलोजा जेल से अस्पताल में ले जाया गया था।

प्रत्यूषा का कहना है कि जनवरी 15, 2021 को दोपहर 1 बजे उन्हें अस्पताल लेकर जाया गया और अगले दिन 3 बजे दोपहर को परिजनों को इसकी सूचना दी गई, अर्थात 14 घंटे तक इस बात को छिपा कर रखा गया। प्रत्यूषा के अनुसार, उन्हें पुलिसवालों ने बताया कि वो परिजनों को सूचना इसीलिए नहीं दे पाए क्योंकि उनके पास किसी का फोन नंबर नहीं था। पुलिसकर्मियों ने बताया कि पार्थो दासगुप्ता ने होश में आकर नंबर दिया, तब परिजनों को सूचित किया गया।

प्रत्यूषा दासगुप्ता ने बताया कि उन्होंने और उनके परिवार ने अपने पिता से बात करने के लिए तलोजा जेल को कई ईमेल लिखे हैं और उन सबमें उनका फोन नंबर भी दिया हुआ है, इन सबके बावजूद पुलिसकर्मियों ने ये बहाना बनाया। उन्होंने बताया कि जब वो अस्पताल पहुँचीं तो उनके पिता इमरजेंसी रूम में पड़े हुए थे और उन्हें ओढ़ाने के लिए एक बेडसीट तक नहीं था। अस्पताल लाए जाने के 16 घंटे बाद शाम के 5 बजे उन्हें ICU में भर्ती कराया गया।

‘BARC India’ के पूर्व सीईओ की बेटी ने कहा कि उनके पिता अब भी ICU में हैं और परिजनों का उनसे कोई संपर्क नहीं हो पा रहा है। जब परिजन अस्पताल पहुँचे तो वो आधी बेहोशी की ही अवस्था में थे। प्रत्यूषा ने सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर किए गए पत्र में लिखा है कि उनके पिता कुछ कहना चाहते थे और बातें करना चाहते थे, लेकिन वो कुछ बोल नहीं पा रहे थे। पत्र में प्रत्यूषा ने आगे लिखा है:

“उनका शुगर लेवल भी काफी उच्च स्तर (516) पर पहुँच गया था। डायबिटीज, हाइपरटेंशन और एंकिलॉजिंग स्पॉन्डिलाइटिस नामक एक ऑटो इम्यून डिसऑर्डर जैसी बीमारियों से वो कई सालों से पीड़ित हैं। उनके स्वास्थ्य को लेकर हम पहले से चिंतित थे और इसीलिए पिछले 2 सप्ताह से जेल प्रशासन के माध्यम से उनसे संपर्क करने के प्रयास में लगे हुए थे। उनकी स्थिति देख कर लगता है कि उनके साथ ठीक व्यवहार नहीं किया गया। उन्हें जेल में शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना दी गई है। वो काफी डरे हुए थे।”

प्रत्यूषा दासगुप्ता ने लिखा है कि वो अपने पिता के जीवन को लेकर खासी चिंतित हैं। उन्होंने लिखा कि उनका परिवार कानून का पालन करने वाले नागरिकों का है और कानूनसम्मत कार्यवाही के पक्ष में है, लेकिन जो हो रहा है वो चिंताजनक है। अपने पिता के लिए उचित इलाज की माँग करते हुए प्रत्यूषा ने कहा कि अदालती प्रक्रिया के तहत फैसला होना चाहिए। उन्होंने आशंका जताई कि बिना उच्च-स्तरीय हस्तक्षेप के ये चिंता और डर बना रहेगा।

याद हो कि मुंबई पुलिस ने आरोप लगाया था कि BARC के पूर्व सीईओ पार्थो दासगुप्ता के कार्यकाल के दौरान TRP का फर्जीवाड़ा किया गया और अन्य इंग्लिश टीवी समाचार चैनलों की रेटिंग जानबूझकर नीचे गिरा कर रिपब्लिक टीवी को नंबर 1 बनाया गया। पुलिस का कहना है कि BARC ने टाइम्स नाउ की रेटिंग को नीचे लाने के लिए व्यूअरशिप और टीआरपी डेटा में हेरफेर किया, जो कि पहले एक नंबर वन अंग्रेजी न्यूज चैनल था, जब अर्णब गोस्वामी इसे हेड कर रहे थे।

घोटालेबाज, खालिस्तान समर्थक, चीनी कंपनियों का पैरोकार: नवदीप बैंस के चेहरे कई

इस हफ्ते की शुरुआत में भारतीय मूल के हाई-प्रोफाइल कनाडाई सिख मंत्री नवदीप बैंस (Navdeep Bains) ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। ‘व्यक्तिगत कारणों’ का हवाला देते हुए उन्होंने राजनीति भी छोड़ दी है।

रिपोर्टों के अनुसार नवदीप बैंस जो कि खालिस्तान आंदोलन के एक प्रबल समर्थक माने जाते हैं ने नवाचार, विज्ञान एवं उद्योग मंत्री के पद से इसलिए इस्तीफा दिया, क्योंकि वह अपने परिवार के साथ अधिक समय बिताना चाहते थे।

हालाँकि नवदीप बैंस ने 2013 के बाद से जस्टिन ट्रूडो के पहले कार्यकाल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। लेकिन कनाडा में बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार उजागर होने के बाद कैबिनेट से इस्तीफा देने के लिए उन्हें मजबूर किया गया था। बैंस के इस्तीफे को सत्तारूढ़ लिबरल पार्टी को भ्रष्टाचार के आरोपों से लगातार हो रही शर्मिंदगी से बचाने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।

नवंबर 2018 में, कनाडा स्थित एक मीडिया आउटलेट ने नवदीप बैंस से जुड़े भ्रष्टाचार को उजागर किया था। रिपोर्ट के अनुसार, नवदीप बैंस और एक अन्य लिबरल सांसद राज ग्रेवाल के बीच 20 एकड़ की जमीन के संबंध में अनियमितता हुई थी। घोटाले में सांसदों के शामिल होने के खुलासे से सभी चौंक गए थे। इसके बाद, स्थानीय अधिकारियों ने मामले की तृतीय-पक्ष जाँच का आदेश दिया था और इसकी जानकारी रॉयल कैनेडियन माउंटेड पुलिस (RCMP) को भेजी थी।

भूमि सौदे में भ्रष्टाचार का मामला अपने आप में दिलचस्प है, जो बताया गया है कि कैसे दो लिबरल सांसद भ्रष्टाचार के कार्य में लिप्त हो गए। खालिस्तान समर्थक नवदीप बैंस और एक अन्य लिबरल सांसद ने ओंटारियो प्रांत से उस भूमि को खरीदा था और फिर ब्रैमटन शहर को काफी अधिक कीमत पर बेच दिया।

जिस शहर को 3.3 मिलियन डॉलर की राशि में खरीदने की योजना थी, बैंस ने उसे सरकारी खजाने के हिसाब से $ 4.4 मिलियन यानी अतिरिक्त $ 1.1 मिलियन में बेच दिया। दिलचस्प बात यह है कि भूमि सौदे में शामिल कंपनी गोरवे हेवेन और उसके एक निदेशक भगवान ग्रेवाल थे, जो 2018 में प्रधानमंत्री ट्रूडो की भारत यात्रा के दौरान उनके साथ थे। इसके अलावा, इसके लगभग आधे निदेशक लिबरल पार्टी को भरपूर दान देने वाले हैं।

खालिस्तान समर्थक और विश्व सिख संगठन के सदस्य नवदीप बैंस

कथित तौर पर, नवदीप बैंस को कनाडा सरकार के भीतर खालिस्तानी हमदर्दों में से एक माना जाता है। खालिस्तानी कट्टरपंथी संगठन वर्ल्ड सिख ऑर्गनाइजेशन (WSO) द्वारा बैंस को आगे बढ़ाया गया है, जिस पर सिख समुदाय को कट्टरपंथी बनाने और उसे विभाजित करने के प्रयासों का आरोप है।

ऑपरेशन ब्लूस्टार के बाद जुलाई 1984 में गठित कनाडा स्थित विश्व सिख संगठन (डब्ल्यूएसओ) खुलकर खालिस्तान की माँग उठाती रही है। वास्तव में, कनाडा के सिख प्रवासी ने खुद को WSO के चरमपंथी संगठन के रूप में चिह्नित किया है।

केवल कनाडा में ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तरी अमेरिका और यूरोप में, WSO से संबंधित कट्टरपंथी सिख तत्वों ने अपने-अपने देशों में अपनी विचारधारा के लिए राजनीतिक समर्थन आधार बनाने के लिए राजनीतिक माहौल का इस्तेमाल किया है। खालिस्तान समर्थक एक अन्य आतंकी गुट सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) के साथ-साथ विश्व सिख संगठन और सिख फॉर जस्टिस खालिस्तान आंदोलन को वित्त पोषित करते रहे हैं और खालिस्तान को पुनर्जीवित करने के लिए सोशल मीडिया पर प्रचार भी करते हैं।

नवदीप बैंस के पिता भी डब्ल्यूएसओ के एक प्रमुख नेता हैं और डिक्सी गुरुद्वारा से भी जुड़े हुए हैं- जो भारत विरोधी गतिविधियों का केंद्र है। बैंस का खालिस्तान आतंकवादियों से भी सीधा संबंध है, क्योंकि 1985 के एयर इंडिया बम विस्फोट मामले की जाँच के लिए उनके ससुर दर्शन सिंह सैनी को कनाडा के अधिकारियों ने गवाह के रूप में सूचीबद्ध किया था।

वास्तव में, फरवरी 2007 में हाउस ऑफ कॉमन्स में आतंकवाद विरोधी कानून पर एक बहस के दौरान, तत्कालीन कनाडाई पीएम स्टीफन हार्पर ने एयर इंडिया के बम के साथ बैंस के ससुर के संबंध पर प्रकाश डाला, जिसमें 329 लोग मारे गए थे। इसमें ब्रिटिश, कनाडा और भारत के नागरिक शामिल थे।

तत्कालीन पीएम हार्पर ने कहा था कि बैंस द्वारा आतंकवाद विरोधी कानून का विरोध आरसीएमपी के समक्ष अपने ससुर को पेश करने से रोकने के लिए एक रणनीति थी, क्योंकि कंजरवेटिव्स ने एयर इंडिया मामले की जाँच के लिए कानून का इस्तेमाल करने का समर्थन किया था। इससे पहले, वैंकूवर सन ने बताया था कि बैंस के ससुर बम विस्फोट मामले में संभावित गवाहों की सूची में थे।

बैंस को पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भी निशाना बनाया था। कनाडा के रक्षा मंत्री हरजीत सिंह सज्जन और पूर्व सिख सांसद राज ग्रेवाल के अलावा, पंजाब के सीएम ने भी नवदीप बैंस को 2018 में खालिस्तानी हमदर्द के रूप में संदर्भित किया था।

भारत से अवैध इमीग्रेशन में शामिल है बैंस 

खालिस्तानी आतंकी नेटवर्क को प्रायोजित करने के अलावा, बैंस कई अन्य कथित भ्रष्ट सौदों में शामिल है। नवदीप बैंस का नाम पिछले साल कुख्यात फोर्ट एरी गुरुद्वारा घोटाले में भी सामने आया था। गुरुद्वारे ने भारत के तीन धार्मिक प्रचारकों को स्पॉन्सर किया और उन्हें ओटावा प्रशासन से विशेष वीजा दिलवाया।

बाद में यह पता चला कि गुरुद्वारा सक्रिय नहीं था और भारत से कनाडा में अवैध रूप से प्रवासियों में घुसने के लिए बैंस और उनके सहयोगियों द्वारा कवर के रूप में इस्तेमाल किया गया था। तब से, कनाडाई अधिकारियों को नवदीप बैंस द्वारा स्पॉन्सर किए गए तीन भारतीय पुजारियों के बारे में कुछ भी पता नहीं चल पाया है, क्योंकि वे कनाडा में उतरने के बाद गायब हो गए।

स्थानीय लोगों के अनुसार, बैंस ने धार्मिक गतिविधियों की आड़ में अवैध रूप से प्रवासियों को लाने के लिए कागजों पर एक गुरुद्वारे का जाली विवरण दर्ज करवाया था, इसके बदले में उनने भारी मुनाफा कमाया। गुरुद्वारे को बैंस ने अपने पिता बलविंदर बैंस के माध्यम से नियंत्रित किया और अब वह परिवार के लिए एक पैसा बनाने वाली मशीन है। 

लिबरल नेता अपने लाभ के लिए सिख समुदाय के अन्य संस्थागत ढाँचे का भी उपयोग करते रहे हैं। गुरुद्वारे के प्रशासन पर अपनी मजबूत पकड़ रखने वाले बैंस के पिता ने फोर्ट एरी गुरुद्वारे के निदेशकों के रूप में उनके करीबियों को नियुक्त किया था। यह गुरुद्वारा बैंस के प्रतिनिधित्व वाले निर्वाचन क्षेत्र में आता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात, बैंस परिवार कथित रूप से कनाडा में सिख संस्थानों में भ्रष्टाचार के माध्यम से बड़े पैमाने पर पैसे कमा रहा है। आरोप है कि बैंस ने पैसे कमाने के लिए गुरुद्वारे को भी नहीं बख्शा। स्थानीय लोगों का कहना है कि बैंस और उनके पिता भारत में आईईएलटीएस कोचिंग सेंटर और कनाडा में गुरुद्वारों से संबंधित एक इमीग्रेशन नेक्सस चलाते हैं। पिता-पुत्र की जोड़ी इन संस्थानों में छात्रों को सीट की पेशकश करके अवैध इमिग्रेशन की सुविधा प्रदान करती थी, जिनमें से अधिकांश केवल कागज पर मौजूद हैं।

टेलीकॉम लॉबी और चीनी कंपनियों का पक्ष लेने का आरोप

बैंस पर कनाडा के नागरिक समाज समूहों द्वारा मंत्री के रूप में सेवा करते हुए कुछ दूरसंचार समूहों का पक्ष लेने का भी आरोप है। वह इंटरनेट की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए दूरसंचार कंपनियों के पक्ष में आरोपों का सामना कर रहे हैं। बैंस पर बड़ी टेलीकॉम कंपनियों के साथ निचली थोक दरों के लिए अपील करने का भी आरोप है।

ट्रूडो की सरकार में मंत्री के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान, नवदीप बैंस ने उचित राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा के बिना, CCP को डार्क ट्रैक रिकॉर्ड और कनेक्शन के साथ कई चीनी कंपनियों को हरी झंडी दी थी। माना जाता है कि चीनी दूरसंचार कंपनी Hytera को उचित राष्ट्रीय सुरक्षा समीक्षा के बिना कनाडा में प्रवेश करने की अनुमति देने से पहले से ही बैंस सपोर्ट कर रहे थे।

इसके अलावा, कनाडाई नेता सार्वजनिक सामानों की खरीद में कथित तौर पर भ्रष्टाचार में भी शामिल रहे हैं। बैंस पर 200 मिलियन डॉलर की सार्वजनिक खरीद अनियमितता का आरोप है। बैंस को एक ऐसी कंपनी को टेंडर प्रदान करने के आरोपों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें निर्माण की सुविधा नहीं थी।

खालिस्तानी समर्थक कनाडा के नेता नवदीप बैंस ने भारत में भी प्रदर्शनकारियों के साथ एकजुटता व्यक्त की थी, जिन्होंने अब मोदी सरकार द्वारा शुरू किए गए कृषि सुधारों का विरोध करने के लिए दिल्ली की सड़कों पर डेरा डाल दिया है। बता दें कि तथाकथित ‘किसान’ प्रदर्शनकारियों को खालिस्तानी तत्वों द्वारा हाइजैक कर लिया गया है, जो प्रदर्शनकारियों को भारत सरकार के खिलाफ लड़ने के लिए उकसाने की कोशिश कर रहे हैं।

हिन्दू देवी-देवताओं के सिर पर लात मारने वाले पादरी को HDFC ने बताया था हीरो, CID ने की गिरफ़्तारी तो वीडियो हटाया

प्रवीण चक्रवर्ती नामक एक कुख्यात ईसाई पादरी ने हिन्दू देवी-देवताओं के खिलाफ अपमाजनक टिप्पणी की थी और साथ ही हिन्दू देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को ‘लात मारने’ व विकृत करने की भी धमकी दी थी। ईसाई पादरी ने इसके बदले ‘क्राइस्ट गाँवों’ की स्थापना की बात कही थी। अब ‘हाउसिंग डेवलपमेंट फाइनेंस कॉर्पोरेशन (HDFC)’ बैंक ने उसका नाम ‘नेबरहुड हीरोज’ की सूची में से हटा दिया है। बैंक ने उसे ‘हीरो’ बताया था।

धार्मिक स्थल पर आपत्तिजनक कार्य करने और विभिन्न धार्मिक समुदायों के बीच दुर्भावना फैलाने के आरोप में उसे पुलिस ने गिरफ्तार किया है, जिसके बाद HDFC बैंक ने ये कदम उठाया। आंध्र प्रदेश की क्रिमिनल इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट (CID) ने 2013 में आए एक वीडियो के आधार पर ये कार्रवाई की है। उसे काकीनाडा से मंगलवार (जनवरी 12, 2021) को गिरफ्तार किया गया। उसे गुंटूर लाकर अगले ही दिन कोर्ट में पेश किया गया।

CID के कोस्टल सुप्रीटेंडेंट ऑफ पुलिस (SP) आर विजय पॉल ने कहा कि ये स्वतः संज्ञान का मामला नहीं है और जब कोई व्यक्ति किसी मामले के बारे में शिकायत दर्ज कराता है, तो फिर उस मामले में कार्रवाई की जाती है। जब CID ने ईसाई पादरी प्रवीण चक्रवर्ती से पूछताछ की तो उसने बताया कि वीडियो में उसकी ही आवाज़ थी। पुलिस अधिकारियों ने माना कि ये वीडियो भड़काऊ है और वैमनस्य फैलाने वाला है।

अब CID उस पादरी के वित्तीय लेनदेन और बैंक खाते सहित अन्य विवरणों की जाँच कर रही है। साथ ही ये भी खँगाला जा रहा है कि इस तरह के और कितने वीडियोज बनाए गए हैं। अगस्त 2020 में HDFC बैंक ने एक वीडियो में ईसाई पादरी को ‘नेबरहुड हीरो’ बताया था। दरअसल, ये HDFC बैंक का एक अभियान है जिसके तहत वो देश भर के नायकों को पहचान देने और उन्हें सेलिब्रेट करने का दावा करता है।

बैंक के अनुसार, इसमें ऐसे लोगों के नाम होते हैं जिन्होंने हर तरह से ज़रूरतमंद लोगों की मदद की है। लेकिन NGO लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम (LRPF) की शिकायत के बाद बैंक ने तुरंत इस वीडियो को हटा लिया। बैंक का दावा है कि पादरी ने 500 गरीबों की मदद की और वो ‘सीलोम ब्लाइंड सेंटर’ का अध्यक्ष भी है। ये वीडियो HDFC बैंक ने अगस्त 28, 2020 को अपलोड किया था। उसने लिखा था कि प्रवीण चक्रवर्ती ने एक साहस भरे क्षण से ‘सामान्य को हीरोइक बना दिया।’

हालाँकि, ये पहली बार नहीं है जब HDFC बैंक ने किसी ऐसे विवादित व्यक्ति को ‘हीरो’ बताया हो। कुछ ही सप्ताह पहले उसने लुधियाना के अशोक सिंह गरचा को गरीबों को भोजन मुहैया कराने वाला बताते हुए ‘नेबरहुड हीरो’ के अवॉर्ड से नवाजा था। बाद में पता चला कि वो ‘अब्राहमिक एंड इंडो अब्राहमिक एसोसिएशन (AIAC)’ का अध्यक्ष है। वो यहूदी-ईसाई-मुस्लिम-सिख एकता का दावा करते हुए उपदेश देता है।

HDFC बैंक ने डिलीट किया पादरी प्रवीण चक्रवर्ती का वीडियो

एनजीओ LRPF ने गृह मंत्रालय और विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA) विभाग के समक्ष इसकी शिकायत की थी। जबरन ईसाई धर्मांतरण के आरोप लगाते हुए प्रवीण चक्रवर्ती और उसके NGO ‘सीलोम ब्लाइंड सेंटर’ की भी मान्यता रद्द करने की भी माँग की गई थी। संस्था के FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) लाइसेंस को रद्द करने की माँग करते हुए कहा गया था कि उसके सारे बैंक खाते जब्त करके अन्य गतिविधियों पर भी लगाम लगाई जाए।

ईसाई पादरी प्रवीण चक्रवर्ती के इंडियन पैनल कोड (IPC) की खिलाफ धारा-153 ए (अवैध बातें करके किसी व्यक्ति को द्वेषभाव या बेहूदगी से निशाना बनाना, उपद्रव जैसे हालात पैदा करना), 153 बी (लिखित या मौखिक रूप से तनाव जैसे हालात पैदा करना), (धार्मिक कार्य में लगे जनसमूह को भड़काना), (पवित्र धार्मिक वस्तुओं को नुकसान पहुँचाना), 124 ए (देश की एकता-अखंडता को ठेस पहुँचाना) और धारा-115 के तहत आरोप तय किए गए हैं।

वीडियो में प्रवीण चक्रवर्ती को तेलुगु में कहते सुना जा सकता है कि वो ‘पत्थरों के भगवान’ को लात से मारेगा और पेड़ों (नीम, पीपल और तुलसी जैसे पवित्र पेड़-पौधे) को भी लात मारेगा। उसने उस वीडियो में पूरे गाँव को ईसाई बनाने को लेकर बातें की थीं। उसने दावा किया था कि बाइबिल पढ़ा कर गाँवों को ‘क्राइस्ट विलेजेज’ बनाया जाता है। उसने दावा किया कि वो खुद कई बार देवी-देवताओं की प्रतिमाओं को लात मार चुका है और अपनी इस हरकत पर वो खुश है।

‘सीलोम ब्लाइंड सेंटर’ की स्थापना 1989 में हुई थी। संस्था अनाथों, बुजुर्गों और विधवाओं की मदद करने का दावा करती है। उनके लिए शिक्षा, घर, दवा और कपड़े उपलब्ध कराने का दावा करती है। संस्था पर 2012 में 15000, 2013 में 37000, 2014 में 2.92 लाख और 2015 में 6 लाख ईसाई धर्मांतरण कराने के आरोप लगे हैं। यूएस का लाइफपॉइंट चर्च मिशनरी इस संस्था को अपना ब्रांच बताता है।

शिकायत में यह भी कहा गया कि सेंटर कभी भी किसी मामले में संबंधित अधिकारियों को सूचित नहीं करता था और बाल श्रम करवाने वाले आरोपितों को बिना सजा दिलवाए जाने देता थे। इसमें लिखा है कि इस एनजीओ के विरुद्ध कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि इसने भारत को ऐसा दर्शाया है जैसे यहाँ पर अधिकांश मात्रा में गुलाम जनसंख्या रहती हो। इसके अलावा इस एनजीओ ने लॉकडाउन नियमों का भी पालन नहीं किया जिसके कारण 318 बच्चे कोविड पॉजिटिव पाए गए।

मंच पर माँ सरस्वती की तस्वीर से भड़का मराठी कवि, हटाई नहीं तो ठुकराया अवॉर्ड

एक मराठी कवि ने पुरस्कार लेने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि सम्मान समारोह के मंच पर देवी सरस्वती की तस्वीर रखी हुई थी। यह सम्मान समारोह महाराष्ट्र के नागपुर में आयोजित किया गया था। मराठी कवि यशवंत मनोहर का कहना था कि उन्होंने सम्मान समारोह के मंच पर रखी गई सरस्वती की तस्वीर पर आपत्ति जताई थी। फिर भी तस्वीर नहीं हटाई गई थी इसलिए उन्होंने पुरस्कार लेने से मना कर दिया। यशवंत मनोहर पहले भी इस कारण के चलते कई पुरस्कार लौटा चुके हैं। 

दरअसल, महाराष्ट्र की चर्चित साहित्य संस्था ‘विदर्भ साहित्य संघ’ ने यशवंत मनोहर को लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार से सम्मानित करने के लिए बुलाया था। यह सम्मान समारोह गुरुवार (14 जनवरी 2021) को रंग शारदा हॉल में आयोजित किया गया था। मराठी कवि को इस कार्यक्रम की जानकारी देते हुए यह भी बताया गया था कि इसमें सरस्वती पूजन भी होगा। इस बात पर उन्होंने कड़ी आपत्ति जताई। 

यशवंत मनोहर के अनुसार, “देवी सरस्वती की मूर्ति उस शोषक मानसिकता का प्रतीक है जिसकी वजह से महिला और शूद्र शिक्षा-ज्ञान प्राप्त करने से दूर रहे।” हालाँकि, आयोजकों ने मराठी कवि की इस बात को स्वीकार नहीं किया और कहा कि कार्यक्रम का प्रारूप नहीं बदला जा सकता है। अंततः यशवंत सम्मान समारोह में शामिल नहीं हुए और उन्होंने विदर्भ साहित्य संघ को मराठी में एक चिट्ठी लिखी। 

उन्होंने अपनी चिट्ठी में लिखा, “मैं आशा कर रहा था कि विदर्भ साहित्य संघ मेरे विचारों और सिद्धांतों पर मंथन करेगा लेकिन आयोजकों का कहना है कि मंच पर देवी सरस्वती की पूजा होगी। मैं साहित्य में धर्म का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं कर सकता हूँ इसलिए मैं इस सम्मान को अस्वीकार करता हूँ। मैंने पहले भी कई पुरस्कार सिर्फ इस वजह से ही अस्वीकार किए हैं।” 

विदर्भ साहित्य संघ की स्थापना 1923 में मराठी साहित्य के विस्तार के लिए हुई थी। यह महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र में साहित्य से जुड़े काम करने वाली सबसे व्यापक संस्था है। यह संस्था हर वर्ष मराठी साहित्यकारों को सम्मानित करने के लिए ऐसे आयोजन करवाती है। संस्था हर दो वर्ष के अंतराल पर लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड भी देती है और इस वर्ष यशवंत मनोहर को इसके लिए चुना गया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक़ सम्मान समारोह में सरस्वती देवी की पूजा की परम्परा लगभग 9 दशकों से निभाई जा रही है। इस परम्परा को किसी भी सूरत में बदला नहीं जा सकता है।  

हार्वर्ड ने लालू यादव की बेटी के झूठ की जब खोली पोल, फुस्स हो गया था मीसा भारती का ‘स्पीकर’ वाला दावा

एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार निधि राजदान ने जब से खुद को ‘फिशिंग अटैक’ का शिकार बताया है, हार्वर्ड यूनिवर्सिटी सुर्खियों में है। यह प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी इसी तरह कुछ साल पहले तब भी खूब चर्चा में रहा था, जब लालू प्रसाद यादव की सांसद बेटी मीसा भारती ने खुद को वहाँ स्पीकर के तौर पर बुलाए जाने का दावा किया था।

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की बेटी मीसा ने यह दावा साल 2015 में किया था। उन्होंने कहा था कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के कॉन्फ्रेंस में उन्हें बतौर ‘वक्ता’ बुलाया गया था। इस ख़बर के सामने आने पर हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने उनके दावों को सिरे से खारिज किया था और कहा था कि वे बतौर ‘ऑडियंस’ शामिल हुई थीं।

दरअसल, राज्यसभा सांसद मीसा भारती ने 7 मार्च 2015 को अपने फेसबुक पेज पर एक तस्वीर साझा की थी। तस्वीर में वह मंच पर खड़े होकर संबोधन करने की मुद्रा में थी। तस्वीर के साथ हिन्दी में कैप्शन भी लिखा हुआ था, “हार्वर्ड में युवाओं की भूमिका पर भाषण देते हुए।” इसके बाद मीडिया ने जोरशोर से यह खबर चलाई कि मीसा भारती ने अमेरिका के मशहूर विश्वविद्यालय में भाषण दिया है। यह कॉन्फ्रेंस 7 और 8 मार्च (साल 2015) को हुई थी। दावा किया गया था कि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने मीसा को महिलाओं के विषय पर भाषण देने के लिए बुलाया था।

इसके बाद हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने एक बयान में कहा था, “मीसा भारती को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में हुई कॉन्फ्रेंस में बतौर वक्ता नहीं बल्कि प्रतिभागी के रूप में बुलाया गया था। बतौर प्रतिभागी उनकी मौजूदगी की पुष्टि इस बात से की जा सकती है कि उन्होंने जो टिकट खरीदा था वह ‘ऑडियंस’ का था। उन्हें किसी भी तरह का भाषण देने के लिए नहीं बुलाया गया था।” 

इस मामले की जानकारी सामने आते ही हार्वर्ड कैनेडी स्कूल कम्युनिकेशन विभाग (Kennedy School Communications Department) ने प्रकरण का संज्ञान लिया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक़ मीसा भारती कॉन्फ्रेंस के बाद मंच पर गई थीं और वहीं उन्होंने तस्वीरें खिंचवाई। फिर वह तस्वीरें अखबारों में भी प्रकाशित हुई थीं।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय ने साफ़ किया था कि मीसा भारती ने कोई भाषण नहीं दिया था इसलिए किसी भी अमेरिकी समाचार पत्र में यह ख़बर प्रकाशित नहीं हुई थी। अगर मीसा भारती ने कोई भाषण दिया होता तो उनकी तस्वीर या वीडियो विश्वविद्यालय के पास ज़रूर होता।

इस मुद्दे पर विवाद बढ़ने के बाद मीसा भारती ने सफाई देते हुए कहा था,

“मैं राजनीतिक पृष्ठभूमि से आती हूँ इसलिए जो कुछ करती हूँ वह ख़बर बन जाती है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी ने मुझे उस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए बुलाया था। उस कायर्क्रम में देश के और भी मशहूर लोगों को बुलाया गया था। क्या आपको लगता है एक मशहूर चेहरा होने के बाद मैं लोगों में भ्रम में रखने की कोशिश करूँगी? मैंने उस कार्यक्रम की कुछ तस्वीरें साझा की थीं, जिसमें एक तस्वीर उस मशहूर जगह की थी। जिसे तमाम समर्थकों/रिपोर्टर्स ने यह समझ कर प्रकाशित करवा दिया था कि मैं वहाँ वक्ता के रूप में गई थी। जैसे ही मुझे इस विवाद की जानकारी मिली, मैंने वह पोस्ट हटा दिया था। वहाँ पर भाषण देने की बात पार्टी के कार्यकर्ता या समर्थक द्वारा कही गई थी।”

गौरतलब है कि कुछ महीने पहले निधि ने बताया था की मैसाचुसेट्स के कैम्ब्रिज स्थित हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में उन्होंने बतौर एसोसिएट प्रोफेसर (जर्नलिज्म) का ऑफर मिला है। शुक्रवार (15 जनवरी 2021) को उन्होंने कहा कि वे ‘फिशिंग अटैक’ का शिकार हुईं और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जो ऑफर मिला था, वह फेक था।