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यूपी में लव जिहाद आरोपित जुबराईल की संपत्ति कुर्क: हिंदू लड़की को अगवा कर धर्म परिवर्तन कराने का आरोप

CM योगी के उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में नाबालिग लड़की का अपहरण कर धर्म परिवर्तन कराने के मामले में एसीजेएम कोर्ट ने आरोपित की संपत्ति कुर्क करने का आदेश दे दिया है। आदेश मिलते ही शनिवार (जनवरी 09, 2021) को सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट की उपस्थिति में घर और जमीन को संलग्न किया गया। इससे पहले पुलिस ने शुक्रवार (जनवरी 08, 2021) को उनकी वैन को जब्त कर लिया था।

लड़की को भगा ले जाने का आरोप

मामला तंबौर थाने का हैं। जानकारी के मुताबिक इसी थाना क्षेत्र में बीती 26 नवंबर की रात एक जुबराईल नामक युवक गाँव की ही 19 वर्षीय हिंदू लड़की को अपने साथ भगा ले गया। युवती के गायब होने की जानकारी होने पर पिता ने थाने पर नामजद तहरीर देते हुए कार्यवाई की माँग की। पिता का आरोप है कि उसकी पुत्री अपने साथ जेवरात और नगदी लेकर जुबराईल के साथ गई हैं। 

पिता का आरोप हैं कि जुबराईल अपने साथियों के सहयोग से उनकी बेटी को बहला-फुसलाकर अपरहण कर भगा ले गया है। पिता का यह भी आरोप हैं कि समुदाय विशेष के युवक द्वारा उसकी बेटी का जबरन धर्म परिवर्तन कराकर उसे अपने साथ ले गया हैं लेकिन पुलिस ने इस मामले में लापरवाही बरती है। 

मामला मीडिया के संज्ञान में आने के बाद पुलिस ने पिता के द्वारा लगाए गए आरोपों और दी गई तहरीर के आधार पर धारा 363, 366 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया और पुलिस ने इस पूरे मामले को लेकर 7 लोगों को हिरासत में लिया था, जिसमें आरोपित युवक का साथ देने के आरोप में युवक के बहनोई उस्मान और भाई इजराइल को पुलिस ने जेल भेज दिया।


पुलिस का कहना है कि मुख्य अभियुक्त जुबराइल की गिरफ्तारी के प्रयास किए जा रहे है और जल्द ही उसे गिरफ्तार कर पीड़िता को भी बरामद कर लिया जाएगा। फिलहाल, इस मामले में पुलिस की कार्रवाई जारी है।

मुख्य आरोपित जुबराईल की तलाश में पंजाब, राजस्थान, उत्तराखंड और यूपी में बहराइच, लखनऊ, बदायूँ आदि जिलों में पुलिस दौड़ लगाती रही। लेकिन न अपहृत युवती मिली और न ही पुलिस को जुबराईल मिला। अब स्थानीय स्तर पर आरोपित पर नजर रखी जा रही है। 

इंडोनेशिया में उड़ान भरने के महज 4 मिनट बाद बोइंग 737-500 क्लासिक यात्री विमान लापता: 10000 फ़ीट की ऊँचाई पर टूटा संपर्क

इंडोनेशिया से एक बड़ी खबर आ रही है। इंडोनेशिया में जकार्ता से उड़ान भरने वाला एक Sriwijaya Air का विमान उड़ान भरने के कुछ ही समय बाद लापता हो गया। फ़्लाइट ट्रैकिंग वेबसाइटों फ़्लाइट्रेडार 24 ने बताया कि बोइंग 737-500 क्लासिक विमान उड़ान भरने के 4 मिनट बाद महज एक मिनट से भी कम समय में 10,000 फीट की ऊँचाई से लापता हो गया।

टेक-ऑफ के करीब 4 मिनट बाद Sriwijaya Air का विमान SJ182 रडार स्क्रीन से गायब हो गया। यह फ्लाइट जकार्ता से इंडोनेशिया में ही Pontianak में पश्चिम कलीमांतन शहर जाने के लिए उड़ान भरी थी। इंडोनेशिया परिवहन मंत्रालय ने पुष्टि की है कि विमान ने लोकल समय के मुताबिक 2:20 बजे पर कॉन्टैक्ट खो दिया था।

इंडोनेशिया के परिवहन मंत्रालय की प्रवक्ता अदिता इरावती ने कहा कि वे इस मामले का बासनारस (खोज और बचाव एजेंसी) और KNKT (परिवहन सुरक्षा निकाय) के साथ समन्वय कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विमान के बारे में कुछ पता लगने पर आगे की जानकारी जारी की जाएगी।

कथित तौर पर, विमान में 56 लोग यात्रा कर रहे थे। सोकेनारो-हाट्टो (Soekarno–Hatta) अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के एक अधिकारी के अनुसार, विमान का तंजुंग पसिर पुलौ लांसांग (Tanjung Pasir Pulau Lancang) के पास संपर्क खो गया। आशंका है कि हो सकता है विमान समुद्र में दुर्घटनाग्रस्त हो गया। स्थानीय टीवी रिपोर्टों के अनुसार, इलाके के मछुआरों को संभवत: विमान के केबल के टुकड़े मिले हैं।

इसके अलावा सोशल मीडिया पर कई फोटो सामने आए हैं, जिसमें क्षेत्र में स्थानीय प्राधिकरण को पानी से तारों और अन्य मलबे को बाहर निकालते हुए देखा जा सकता है, जो विमान का हिस्सा हो सकते है।

16 जनवरी से देश में होगी वैक्सीन लगने की शुरुआत: स्वास्थ्यकर्मियों और फ्रंटलाइन वर्कर्स को पहले दिया जाएगा टीका

देश में कोविड-19 वैक्सीन ‘कोविशील्ड’ और ‘कोवैक्सीन’ (Covishield and covaxin) को इमरजेंसी अप्रूवल मिलने के बाद अब भारत सरकार ने टीकाकरण अभियान को लेकर बड़ा ऐलान किया है। केंद्र सरकार ने शनिवार (जनवरी 09,2021) को घोषणा की है कि 16 जनवरी, 2021 से वैक्सीन का टीकारण अभियान शुरू हो जाएगा। 

पहले चरण में वैक्सीन की डोज स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं और अग्रिम पंक्ति के कर्मचारियों को दी जाएगी। ऐसे करीब 3 करोड़ कर्मचारियों का अनुमान लगाया गया है जिन्हें वैक्सीन की डोज दी जाएगी। इसके बाद 50 साल से ऊपर के लोगों और 50 से कम उम्र की ऐसी आबादी को टीका दिया जाएगा जो किसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं। देश भर में ऐसे 27 करोड़ लोगों के होने का अनुमान है।

बता दें कि देश भर में टीकाकरण अभियान को लेकर ये बड़ा ऐलान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ उच्च स्तरीय बैठक में लिया गया। आज पीएम मोदी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से कोरोना वैक्सीन को लेकर राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के साथ उच्च स्तरीय बैठक की। बैठक में पीएम मोदी ने टीकाकरण की तैयारियों की समीक्षा की। इस मीटिंग में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के कैबिनेट सेक्रटरी, हेल्थ सेक्रटरी, प्रिंसिपल सेक्रटरी और अन्य वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे।

11 जनवरी को मुख्यमंत्रियों के साथ पीएम की बैठक

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 11 जनवरी को सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ चर्चा करने वाले हैं, लेकिन उससे पहले ही वैक्सिनेशन की तारीख का एलान कर दिया गया है। इसके अलावा सत्तारूढ़ बीजेपी लोगों के बीच वैक्सीन से जुड़ी आशंकाओं को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर अभियान की तैयारी कर रही है।

गौरतलब है कि देश में भारत बायोटेक की कोवैक्सीन और ऑक्सफोर्ड एस्ट्राजेनेका की कोविशील्ड वैक्सीन को 3 जनवरी को इमरजेंसी इस्तेमाल की मंजूरी मिल चुकी है। कोविशील्ड का उत्पादन सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया कर रही है।

कोविड वैक्सीन रजिस्ट्रेशन के लिए कौन-कौन से दस्तावेज जरूरी

लोगों को कोरोना वैक्सीन रजिस्ट्रेशन के लिए आधार कार्ड, वोडर आईडी कार्ड, डाइविंग लाइसेंस, पैन कार्ड, मनरेगा जॉब कार्ड, केंद्र/राज्य सरकार द्वारा जारी सर्विस आइडेंटिटी कार्ड (फोटो के साथ), पासपोर्ट, आरजीआई द्वारा जारी स्मार्ट कार्ड, फोटो के साथ पेंशन डॉक्यूमेंट, पोस्ट ऑफिस/बैंक द्वारा जारी पासबुक फोटो के साथ और श्रम मंत्रालय की योजना वाले हेल्थ इंश्योरेंस स्मार्ट कार्ड जरूरी होंगे। इनमें से आपके पास अगर एक भी दस्तावेज हैं तो कोरोना टीकाकरण के आप रजिस्ट्रेशन करा पाएँगे। इसके साथ ही एक टोल फ्री हेल्पलाइन नंबर 1075 भी जारी किया गया है।

जो ट्रम्प के साथ हुआ, वो भारत में हिन्दुओं के साथ भी हो सकता है: फेसबुक-ट्विटर को सामानांतर सरकार बनने से रोकिए

अब फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स भी राजनीतिक मामलों में एक पक्ष बनने लगे हैं, लोगों के राजनीतिक और वैचारिक पसंदों और नापसंदों पर मुहर लगाने या नकारने का ठेका लेकर घूम रही हैं और यहाँ तक कि ये भी तय कर रही हैं कि किस नेता के समर्थकों को उनकी सेवाएँ इस्तेमाल करने का अधिकार है और किन्हें नहीं। जो आज अमेरिका में वहाँ के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के साथ हो रहा है, वो कल को भारत में भी उसी स्तर पर हो सकता है।

बल्कि भारत में तो इसकी शुरुआत भी हो चुकी है। विदेशी तकनीकी कंपनियाँ अब भारत में ये तय करने लगी हैं कि किसी दंगे में पीड़ित हिन्दुओं को उनका पक्ष रखने की अनुमति देना है या नहीं, या फिर जम्मू कश्मीर को लेकर भारतीय राष्ट्रवादियों को जगह देनी है या नहीं। आज आम लोगों और छोटे सेलेब्स के साथ खेल रहा ट्विटर या फेसबुक कल को बड़े नेताओं तक पहुँच सकता है और चुनाव से पहले कंटेंट्स के माध्यम से इसे प्रभावित कर सकता है।

अमेरिका के राष्ट्रपति को विश्व का सबसे ताकतवर व्यक्ति माना जाता है। जब उसके साथ सिलिकन वैली की प्राइवेट कंपनियाँ ऐसा कर सकती हैं तो भला दूसरे देशों में उनके लिए ये कौन सा बड़ा काम है? इसके लिए सबसे पहला कदम होता है – जो देश जितना बड़ा और गहरा लोकतंत्र है, उसके लचीलेपन का उतना ही फायदा उठाओ। उदाहरण के लिए मान लीजिए आज चीन फेसबुक को वहाँ अनुमति दे देता है।

इसके बाद फेसबुक चीन के नियम-कानूनों और वहाँ की सत्ताधारी पार्टी के संविधान के हिसाब से चलने लगेगा। लेकिन, यही फेसबुक भारत में यहाँ के नियम-कायदों का फायदा उठा कर अपना वामपंथी एजेंडा चलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा। जुलाई 2009 में शिनजियांग में हुए एक दंगे में फेसबुक पर वहाँ के स्वतंत्रता एक्टिविस्ट का साथ देने का आरोप लगा था, जिसके बाद उसे वहाँ से निकाल बाहर किया गया।

ट्विटर पर भारत में राष्ट्रवादियों और वामपंथी विचारधारा के विरोधियों को शैडो बैन करने के आरोप लगते रहे हैं। कंगना रनौत ने भी ये आरोप लगाया था। इसके तहत लोगों की ट्वीट्स की रीच को कम कर दिया जाता है, जिससे एन्गेजमेन्ट कम हो जाता है। कंगना रनौत की बहन रंगोली चंदेल के हैंडल को सस्पेंड कर दिया गया। वो एसिड अटैक पीड़िता हैं और अक्सर बॉलीवुड के बड़े नामों को एक्सपोज करने के लिए जानी जाती थीं।

जनवरी 2019 में भारत की एक संसदीय समिति ने ट्विटर को समन भी किया था। इस मामले में अधिवक्ता ईशकरण सिंह भंडारी ने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह से मिल कर उन्हें ज्ञापन सौंपा था। उन्होंने ध्यान दिलाया था कि ट्विटर ‘Downranking’ सिस्टम के जरिए एक एल्गोरिदम अपना कर राष्ट्रवादी विचारधारा के ट्वीट्स को नीचे रखता है। वो जिस टॉपिक या ट्रेंड को नापसंद करता है, उसे गायब ही कर दिया जाता है।

अंत में उन एकाउंट्स को सस्पेंड ही कर दिया जाता है, जो ट्विटर की विचारधारा से इत्तिफ़ाक़ नहीं रखते हों। इसी तरह जम्मू कश्मीर में भी भारत के खिलाफ कई हैंडल्स बना कर दुष्प्रचार फैलाया जा रहा था। सरकार के संज्ञान में आने के बाद मजबूरी में ट्विटर को उन हैंडल्स को सस्पेंड करना पड़ा। इनके जरिए न सिर्फ आतंकी विचारधारा फैलाई जा रही थी, बल्कि इस्लामी कट्टरवाद और जिहाद को लेकर पाकिस्तानी एजेंडा चलाया जा रहा था।

हाल ही में हमने देखा था कि कैसे ट्विटर ने अपने लोकेशन में लद्दाख को चीन का हिस्सा बताया था। लोगों ने जब इसे लेकर आपत्ति जताई, तब जाकर इसे ठीक किया गया। अमेरिका में तो कई वर्षों से ये सब हो रहा है। चुनाव से पहले ट्विटर और फेसबुक द्वारा बायडेन के बेटे हंटर को लेकर प्रकाशित एक लेख को सेंसर कर दिया गया था, जिसमें उन पर पोर्न वीडियो और स्ट्रिप क्लब में एक रात में लाखों रुपए खर्च करने के आरोप लगे थे।

इसी तरह विकिपीडिया के एक सीनियर एडिटर ने दिल्ली दंगों के मामले में हिन्दुओं को पीड़ित न दिखाने के लिए उन्हें ही इसके लिए दोषी बता दिया। फ़रवरी 2020 के अंतिम हफ़्तों में दिल्ली में हुए दंगों में इस्लामी कट्टरवाद को छिपाने के लिए बहुसंख्यकों को दोषी बताया गया। विकिपीडिया के इस कदम को लेकर विवाद हुआ तो उस एडिटर को रिटायर कर दिया गया। लेकिन, दुनिया भर में इन दंगों को लेकर उलटा ही नैरेटिव बन गया।

इसी तरह फेसबुक भी इस्लामी कट्टरवाद के खिलाफ कार्रवाई करने में नाकाम रहा है। अकेले अप्रैल से जून के 2020 के बीच में फेसबुक ने 2.25 करोड़ हेट कंटेंट्स होने का दावा किया है, लेकिन वो किस किस्म के थे – इस पर दी गई सफाई अस्पष्ट है। केंद्रीय आईटी मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी इस मामले में फेसबुक को पत्र लिखना पड़ गया था। उन्होंने माना था कि चुनाव से पहले दक्षिणपंथी विचारधारा को जम कर दबाया गया।

उन्होंने फेसबुक पर अफवाहों के जरिए चुनाव को प्रभावित करने के आरोप लगाए थे। इन सबसे यही पता चलता है कि जो सत्ता में है और जिसके हाथ में सारी शक्तियाँ हैं वो भी इन तक जायंट्स के सामने कब बेसहारा हो जाए, कहा नहीं जा सकता। पेटा या एमनेस्टी जैसी संस्थाएँ जो करना चाहती हैं, फेसबुक, ट्विटर और विकिपीडिया वही काम कर रहे हैं। अंतर यही है कि ये कमर्शियल हैं, इनके पास अथाह पैसा है और इनकी पहुँच काफी दूर तक है।

यूपीए काल में स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने के लिए के लिए कोई योजना नहीं बनी और इंस्पेक्टर राज के कारण कंपनी खोलना बड़ा ही दुष्कर कार्य था, जो आज सिंगल विंडो सिस्टम से चलता है। इससे 10 सालों में भारत टेक स्टार्टअप्स के मामले में खासा पीछे चला गया। हाँ, आईटी बूम हुआ ज़रूर, लेकिन यहाँ के प्रतिभाओं ने विदेश जाकर या विदेशी कंपनियों में काम करना चुना, क्योंकि खुद का कुछ करने के लिए देश में वो इकोसिस्टम ही नहीं था।

इसी बीच अमेरिका से निकलते इन कंपनियों ने पूरी दुनिया को एक तरह से अपने वश में करना शुरू कर दिया। शायद ही कोई ऐसा देश हो, जहाँ इन सोशल नेटवर्किंग कम्पनीज पर पक्षपात के आरोप न लगे हों। हाल में हमने देखा कि किस तरह टिक-टॉक ने चीन विरोधी कंटेंट्स को सेंसर किया और इस्लामी कट्टरवाद को बढ़ावा दिया। कमोबेश यही कार्य हेलो एप ने भी किया। फ़िलहाल दोनों ही प्रतिबंधित हैं।

डोनाल्ड ट्रम्प पर शिकंजा कसने में अब तो गूगल भी सामने आ गई है। उसने उस पार्लर एप को प्ले स्टोर से हटा दिया है, जहाँ ट्रम्प समर्थकों ने बहुतायत में अकाउंट बनाए थे। भारत में भी गूगल ने ऐसे प्रयास शुरू कर दिए हैं। इसी गूगल के प्ले स्टोर पर खालिस्तानी एजेंडे वाला ‘रेफेरेंडम 2020’ एप्लिकेशन धड़ल्ले से डाउनलोड हो रहा था। सरकार की आपत्ति के बाद इसे हटाया गया। सीएम अमरिंदर सिंह ने इस एप को लेकर केंद्र से शिकायत की थी।

इन उदाहरणों को देख कर ‘हमाम में सब नंगे’ वाली कहावत फिट बैठती है। ये वही ट्विटर है, जिसके माध्यम से ईरान के मुल्ला-मौलवी से लेकर पाकिस्तानी कट्टरपंथी तक नकारात्मकता फैलाते हैं, लेकिन कभी उन पर कार्रवाई नहीं की गई। ये वही फेसबुक है, जिस पर हिंदू देवी-देवताओं की आपत्तिजनक तस्वीरों के एकाउंट्स बने हुए हैं, लेकिन उन पर कार्रवाई नहीं होती। लेकिन, वामपंथी एजेंडे के खिलाफ इन्हें कुछ भी बर्दाश्त नहीं।

इसीलिए, भारत में लोगों को और सरकार को सावधान रहने की ज़रूरत है। कब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स चुनावों में पक्षपात कर के माहौल बनाने में सफल होने लगें, कहा नहीं जा सकता। ये सब मिल कर कब हिन्दू साधु-संतों की तस्वीरों को कट्टर और वेद-पुराणों के कोट्स को अन्धविश्वास बताने लगे, कहा नहीं जा सकता। कब ये जम्मू कश्मीर को पाकिस्तान और लद्दाख को चीन का हिस्सा बनाने के लिए अभियान चलाने लगें, कहा नहीं जा सकता।

एक विकल्प ये हो सकता है कि इन सभी के भारतीय विकल्पों को बढ़ावा दिया जाए। लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ऐसी माँग करते रहे हैं क्योंकि हर एक योजना और अभियान को जन आंदोलन में तब्दील करने की क्षमता रखने वाले पीएम मोदी जब ऐसे किसी एप पर साइनअप करेंगे तो करोड़ों उनके पीछे जाएँगे। लेकिन, गुणवत्ता और कार्यक्षमता के मामले में ये विश्व स्तरीय होना चाहिए। इसके लिए यहाँ के प्रतिभाओं को उत्साहित किया जाए।

जिस दर से भारत में दक्षिणपंथियों और ज्यादा फॉलोवर्स वाले वामपंथ विरोधियों को निशाना बनाया जा रहा है, उससे साफ़ है कि इन सोशल मीडिया कंपनियों का ये अभियान भारत में भी शुरू हो गया था। ये धीमे जहर की तरह हैं, जो एक बार में एक कदम लेकर आगे बढ़ते जाते हैं और कल को कब ये सामानांतर सरकार की तरह नियम-कानून चलाने लगें, कहा नहीं जा सकता। व्हाट्सप्प भी नई नीति लेकर आया है, लेकिन आधार को लेकर हंगामा करने वाले प्राइवेसी एक्सपर्ट्स शांत हैं।

KHAM, यानी हिंदुओं को बाँटो-मुस्लिमों को पालोः माधव सिंह सोलंकी ने जो बोया, कॉन्ग्रेस को गुजरात में उसी ने चाटा

गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनावों के दौरान ‘खाम (KHAM)’ थ्योरी की खूब चर्चा हुई थी। ‘भूरा बाल साफ करो’ और ‘तिलक, तराजू और तलवार-उनको मारो जूते चार’ जैसे नारों को सुनकर बड़ी हुई पीढ़ी के ज्यादातर लोगों ने उससे पहले इस राजनीतिक फॉर्मूले के बारे में कम ही सुना था। आज यानी 9 जनवरी 2021 को अचानक से फिर से इस फॉर्मूले का यशगान हो रहा है। कारण, इसके जनक माधव सिंह सोलंकी का निधन हो गया है।

माधव सिंह सोलंकी गुजरात के मुख्यमंत्री रहे थे। लंबे समय से बीमार चल रहे थे। नरसिम्हा राव वाली कॉन्ग्रेस सरकार में विदेश मंत्री रहे थे। गुजरात कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी कई मौकों पर सॅंभाल चुके थे। उनके बेटे भरत सिंह सोलंकी भी गुजरात कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष और मनमोहन सिंह की दूसरी सरकार में मंत्री रह चुके हैं।

लंबे समय से राजनीतिक वनवास काट रहे माधव सिंह सोलंकी आखिरी बार चर्चा में तीन साल पहले यानी गुजरात चुनावों के वक्त ही आए थे। लेकिन अपनी राजनीतिक औकात की वजह से नहीं। अतीत में एक समीकरण गढ़कर सत्ता हासिल करने के कारण। असल में नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद राज्य में पहला विधानसभा चुनाव हो रहा था। हार्दिक पटेल की अगुवाई में राज्य में हिंसक आंदोलन हो चुका था। जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर भी अपनी-अपनी जातीय गोटी फिट करके बैठे थे। ऐसे में कॉन्ग्रेस के टुकड़ों पर पलने वाले पूरे लिबरल गैंग ने यह हवा जोर-शोर से चलाई थी कि इन सबके बलबूते चुनावों में कॉन्ग्रेस वही चमत्कार करने जा रही है, जैसा कभी उसके लिए माधव सिंह सोलंकी ने ‘खाम’ का प्रयोग कर किया था।

2017 के चुनावों के नतीजे क्या रहे और कैसे कॉन्ग्रेस का प्रोपेगेंडा ध्वस्त हुआ, ये सब जानते हैं। अब जानते हैं कि ‘खाम’ का मतलब क्या है? KHAM यानी Kshatriya, Harijan, Adivasi and Muslim (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) वोटर। इस समीकरण के बलबूते माधव सिंह सोलंकी के नेतृत्व में 1980 के विधानसभा चुनावों में कॉन्ग्रेस ने 182 में 149 सीटें जीती थी। उस समय भाजपा को केवल 9 सीटें मिली थी।

यह कोई राजनीति का अनूठा प्रयोग नहीं था। कॉन्ग्रेस और तमाम क्षेत्रीय दल हिंदुओं को जाति में बाँट और मुस्लिमों को साध कर अतीत में कई बार सफलता हासिल कर चुके हैं। मसलन, बिहार में कभी लालू प्रसाद यादव ने ‘भूरा बाल (भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, लाला) साफ़ करो’ का नारा दिया था और बाद में स्वजातीय यादव तथा मुस्लिम वोटरों को मिलाकर ‘माय’ नामक जिताऊ समीकरण गढ़ा था।

ये राजनीतिक फॉर्मूले असल में मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की उपज होते हैं। हिंदू घृणा से पैदा होते हैं। इनसे भले तात्कालिक तौर पर राजनीतिक सफलता मिल जाती है, लेकिन ऐसे राजनीतिक प्रयोग हिंदुओं को बड़ा नुकसान पहुँचाने के मकसद से ही किए जाते हैं। लालू-राबड़ी के दौर की जातीय हिंसा इसी का नतीजा थी। इसी तरह माधव सिंह सोलंकी ने ‘खाम’ के बलबूते भले एक चुनाव में प्रचंड बहुमत हासिल कर लिया था, लेकिन उसके बाद गुजरात को भी जातीय हिंसा का दौर देखना पड़ा था। हिंदुओं के खिलाफ समुदाय विशेष की हिंसा तेज हो गई थी। बाद के दौर में जब राज्य में बीजेपी मजबूत हुई, खासकर नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह दौर थमा और गुजरात ने विकास के अपने मॉडल के तौर पर देश और दुनिया में चर्चा हासिल की।

NDTV ने भी सोलंकी को याद किया

यही कारण है कि माधव सिंह सोलंकी को श्रद्धांजलि देते हुए ‘खाम’ का यशगान करने वाले चेहरे वही हैं, जो इस देश में सेकुलरिज्म के नाम पर मुस्लिम तुष्टिकरण के पैरोकार रहे हैं। याद रखिएगा हेडलाइन में यह लिख देने से कि ‘बनाया ऐसा रिकॉर्ड जो मोदी-शाह भी नहीं तोड़ पाए’ किसी माधव सिंह सोलंकी का राजनीतिक कद ऊँचा नहीं हो जाता है। बल्कि यह हमें उन राजनीतिक साजिशों के प्रति आगाह करते हैं, जिनका एक ही मकसद होता है: हिन्दुओं को बाँटो, मुस्लिमों को पालो।

माफिया मुख्तार अंसारी को SC के आदेश पर यूपी लाने में जुटी योगी सरकार: पुलिस टीम पंजाब रवाना

योगी सरकार बाहुबली मुख्तार अंसारी को पंजाब से उत्तर प्रदेश लाने की तैयारी में है। सरकार मुख्तार को लाने के लिए कानूनी विकल्पों का सहारा ले रही है। मुख्तार अंसारी को यूपी लाने के लिए गाजीपुर से 3 पुलिसकर्मियों को चंडीगढ़ रवाना किया गया है। फिलहाल, मुख्तार अंसारी रंगदारी के एक केस में पंजाब की रोपड़ जेल में बंद है।

यूपी पुलिस मुख्तार को किसी भी कीमत पर वापस लाने के लिए प्रतिबद्ध है। उत्तर प्रदेश से कई बार पुलिस टीम पंजाब मुख्तार को लाने गई, लेकिन हर बार मेडिकल रिपोर्ट का हवाला देकर मुख्तार को यूपी पुलिस को नहीं सौंपा गया। जब रोपड़ जेल पर दबाव बनाया गया, तो जेल अधिकारियों ने मुख्तार की मेडिकल रिपोर्ट यूपी पुलिस को दे दी।

आरोप है कि पंजाब सरकार मुख्तार अंसारी को बचाने की कोशिश कर रही है। तमाम कोशिशों के बावजूद जब यूपी सरकार मुख्तार को प्रदेश लाने में विफल रही तो अंत में यूपी सरकार को इस मामले कानूनी विकल्पों का सहारा लेना पड़ा।

रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की याचिका पर सुनवाई के बाद रोपड़ जेल अधीक्षक को 18 दिसंबर 2020 को एक नोटिस जारी किया था। नोटिस को पहले पुलिसकर्मी दिल्ली जाकर वकील गरिमा प्रसाद से लेंगे और फिर रोपड़ रवाना होंगे। प्रदेश सरकार ने नोटिस को रोपड़ जेल अधीक्षक को हैंड डिलीवरी करवाने की योजना बनाई है।

गौरतलब है कि 2019 से मुख्तार रोपड़ जेल में बंद है। लोकसभा चुनाव के पहले मुख्तार अंसारी को बांदा जेल से पंजाब की रोपड़ जेल शिफ्ट कर दिया गया था। कई मामलों में आरोपित मुख्तार को जब पेशी के लिए गाजीपुर और आजमगढ़ पुलिस पंजाब लाने गई, तो तबियत ख़राब होने का हवाला देते हुए वहाँ के अधिकारियों ने उन्हें वापस लौटा दिया।

दरअसल, पहली बार गाजीपुर में फर्जी दस्तावेजों पर असलहे का लाइसेंस लेने के मामले में मुख्तार अंसारी को प्रयागराज स्पेशल कोर्ट में उसे पेश होना था। वहीं दूसरी बार, आजमगढ़ में दर्ज आपराधिक मामले में मुख्‍तार को सेशन कोर्ट ने तलब किया था। मुख्तार को पेश करने के लिए कई बार नोटिस जारी की गई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।

उल्लेखनीय है कि यूपी की योगी सरकार लगातार मुख्तार अंसारी के अवैध धंधे और करीबी रिश्तेदारों पर अपना शिकंजा कस रही हैं। पिछले महीने गाजीपुर में पुलिस ने गजल होटल की जमीन को मुख्तार अंसारी की पत्नी व दोनों पुत्रों के नाम से दर्ज कराने के मामले में आईएस-191 गैंग के दो सहयोगियों जफर अब्बास व सैय्यद सादिक हुसैन को धर-दबोचा था। योगी सरकार उसके कई अवैध निर्माणों को भी ध्वस्त करा चुकी है।

इसके अलावा योगी आदित्यनाथ की सरकार ने दो ऐसे IAS अधिकारियों गुरुदीप सिंह और राजीव शर्मा को हटा कर उन्हें प्रतीक्षारत कर दिया था, जिन पर आरोप था कि उन्होंने विवादास्पद फैसले लिए और ऐसे एक्शन लिए, जिनसे दोनों को फायदा हुआ। इन दोनों IAS अधिकारियों पर मऊ के विधायक मुख़्तार अंसारी और उसके भाई अफजल अंसारी के परिवार को फायदा पहुँचाने का आरोप था।

पैंगोंग झील के दक्षिणी छोर पर भारतीय सीमा में धराया चीनी सैनिक: हिरासत में लेकर हो रही है पूछताछ

पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन उकसावे वाली हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। भारत और चीन के बीच जारी सैन्य तनाव के बीच शुक्रवार (जनवरी 08, 2021) को चीन का एक सैनिक भारतीय सीमा में घुस गया। वो पैंगोंग झील के दक्षिणी किनारे वाले इलाके में घुसा जिसे भारतीय सैनिकों ने हिरासत में ले लिया। 

बताया जा रहा है की चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) का एक सैनिक एलएसी को लाँघकर भारतीय सीमा में पहुँच गया, लेकिन वहाँ तैनात भारतीय सैन्य टुकड़ी ने उसे दबोच लिया। एक अधिकारी ने बताया, “पीएलए सैनिक एलएसी के इस तरफ सीमा पार कर आ गया था। इसके बाद इलाके में तैनात भारतीय सेना ने उसे कस्टडी में ले लिया था।” उन्होंने यह भी बताया कि सैनिक से पूरे नियम और प्रक्रिया के साथ ही पूछताछ की जा रही है। वहीं, इसकी जाँच भी की जा रही कि चीनी सैनिक किन हालातों में भारतीय इलाके में पहुँचा था। चीनी सैनिक को पैंगोंग झील के दक्षिणी छोर से पकड़ा गया है।

गौरतलब है कि इससे पहले अक्टूबर में एक चीनी सैनिक LAC पर भटकता हुआ पहुँच गया था, जिसे भारतीय सेना ने पकड़ लिया था। PLA सैनिक को पूर्वी लद्दाख के चुमार-डेमचोक इलाके में पकड़ा गया था। हालाँकि, पूछताछ करके भारतीय सौनिकों ने उस चीनी सैनिक को चीन को वापस कर दिया। इस दौरान भारतीय सेना ने चीनी सैनिक को ठंडे मौसम से बचाने के लिए मेडिकल मदद के साथ साथ खाना-पीना और गर्म कपड़े भी दिए थे।

बता दें कि एलएसी के दोनों तरफ भारी संख्या में सैनिकों की तैनाती लंबे समय से बरकरार है। अप्रैल महीने में ही कुछ चीनी सैनिकों ने भारतीय सीमा में अतिक्रमण करने की कोशिश की थी जिसका भारत की तरफ से करारा जवाब दिया गया। बाद में 15 जून को गलवान घाटी में चीनी सैनिकों ने धोखे से भारतीय सैनिकों पर गैर-परंपरागत हथियारों से हमला कर दिया जिसमें 20 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हो गए थे जबकि करीब दोगुने तादाद में चीनी सैनिक भी मारे गए।

सीमा पर जारी संघर्ष को खत्म करने के लिए भारत और चीन के बीच सैन्य कमांडर लेवल की कई दौर की बातचीत हो चुकी है। चीन चाहता है कि पहले भारत रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण उन चोटियों से पीछे हट जाए जिन पर दिसंबर महीने में उसका कब्जा हुआ था। वहीं, भारत ने चीन को इसकी पहल करने को कही है।

शाहीनबाग वाली दादी बताने को लेकर कंगना पर किसान दादी ने किया केस, कहा- मेरी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचा

कंगना रनौत एक बार फिर कानूनी दाँवपेंच में फँस गई हैं। दरअसल, किसान आंदोलन को लेकर एक महीने पहले किए गए एक ट्वीट की वजह से उन पर 73 वर्षीय महिला किसान महिन्दर कौर ने मानहानि का मामला दर्ज किया है। ट्वीट में कंगना ने उन्हें गलती से ‘शाहीनबाग वाली दादी’ बता दिया था। हालाँकि बाद में विवाद बढ़ता देख कंगना ने ट्वीट डिलीट कर दिया था। अभिनेत्री के खिलाफ बठिंडा कोर्ट में शिकायत दर्ज कराई गई है।

पंजाब के बहादुरगढ़ जंडिया गाँव की निवासी महिन्दर कौर ने शुक्रवार (8 जनवरी, 2021) को वकील रघबीर सिंह के माध्यम से आईपीसी की धारा 499 (मानहानि) और 500 (मानहानि की सजा) के तहत अभिनेत्री के खिलाफ मुकदमा दायर किया। कौर ने आरोप लगाया कि अभिनेत्री के उसे सोशल मीडिया पोस्ट की वजह से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है, जिसमें उन्हें शाहीनबाग की दादी (बिल्किस बानो) बताया गया था।

बुजुर्ग महिला ने अपनी शिकायत में कहा कि कंगना के ट्वीट की वजह से उन्हें अपने परिवार के सदस्यों, रिश्तेदारों, ग्रामीणों और पब्लिक की नजरों में काफी मानसिक तनाव, पीड़ा, उत्पीड़न, अपमान, प्रतिष्ठा की हानि और मानहानि से जूझना पड़ रहा है। उन्होंने कहा है कि ट्वीट को लेकर कंगना रनौत ने उनसे अभी माफ़ी भी नहीं माँगी है। महिला ने दावा किया कि वह और उनका पूरा परिवार किसान है। वे अपनी आजीविका के लिए कृषि पर निर्भर हैं और इस कारण वे पहले दिन से ही ‘किसानों के विरोध’ का समर्थन कर रहे हैं।

गौरतलब है कि लगभग एक महीने पहले कंगना रनौत ने गलती से किसान आंदोलन में शामिल एक बुजुर्ग महिला को शाहीनबाग विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेनी वाली दादी ‘बिल्किस बानो’ समझ लिया था। उन्होंने ट्विटर पर एक पोस्ट को रिट्वीट किया, जिसमें दावा किया गया कि किसान विरोध-प्रदर्शन में अब बिल्किस बानो दादी भी शामिल हो गई हैं। रनौत ने पोस्ट शेयर करते हुए लिखा था कि दादी को अब किसान विरोध-प्रदर्शन के लिए हायर कर लिया गया है। बाद में विवाद बढ़ता देख कंगना ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया था।

उल्लेखनीय है कि अभिनेत्री के ट्वीट को लेकर चंडीगढ़ के एक वकील हाकम सिंह ने भी उनके खिलाफ मुकदमा दायर किया था। उन्होंने एक बुज़ुर्ग महिला का मजाक उड़ाने का आरोप लगाते हुए उन्हें कानूनी नोटिस भेजा था और सात दिनों के भीतर रनौत से सार्वजनिक माफी माँगने के लिए कहा था।

गौरतलब है कि टाइम पत्रिका 2020 के शीर्ष 100 प्रभावशाली लोगों की सूची में शामिल शाहीनबाग की दादी हाल ही में किसान विरोध प्रदर्शन में शामिल हुईं थी। हालाँकि, उन्हें सिंघु बॉर्डर पर मौजूद पुलिस ने हिरासत में लिया था। पुलिस ने कहा कि कोविड-19 महामारी के बीच दादी को उनकी सुरक्षा के लिए रोका गया, क्योंकि वह वरिष्ठ नागरिक हैं।

‘CAA विरोधी आंदोलन सत्याग्रह नहीं, यह आतंकी गतिविधि के दायरे में’: गुवाहाटी हाईकोर्ट का अखिल गोगोई को बेल देने से इनकार

गुवाहाटी हाई कोर्ट ने गुरुवार (7 जनवरी 2021) को ‘एक्टिविस्ट’ अखिल गोगोई की जमानत याचिका खारिज की दी। वह देशद्रोह और सीएए विरोधी आंदोलन के दौरान हिंसा भड़काने सहित कई आरोपों में दिसंबर 2019 से जेल में बंद है। हाई कोर्ट ने उसकी जमानत याचिका खारिज करते हुए विशेष एनआईए कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। अखिल को असम में ऐंटी सीएए हिंसा में उसकी भूमिका को लेकर राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। 

उच्च न्यायालय ने एनआईए की एक विशेष अदालत के फैसले को बरकरार रखा, जिसमें गोगोई के खिलाफ दर्ज 13 मामलों में से एक मामले में जमानत याचिका खारिज कर दिया गया था। बता दें कि गोगोई को इस मामले के अलावा सभी अन्य मामलो में जमानत मिल चुकी है।

कोर्ट ने कहा कि असम में जो ऐंटी सीएए आंदोलन हुआ था वह सत्याग्रह नहीं था, बल्कि गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में परिभाषित टेररिस्ट ऐक्ट के तहत आता है। जस्टिस कल्याण राय सुराना और अजीत बाठकुर की बेंच ने आदेश में कहा, “हिंसा का इस्तेमाल करते हुए अखिल के नेतृत्व वाली भीड़ ने अहिंसक आंदोलन की अवधारणा को ही खारिज कर दिया था। आंदोलन के जरिए सरकारी मशीनरी को कमजोर करने, आर्थिक नाकेबंदी, समुदायों के बीच नफरत फैलाने और शांति में बाधा उत्पन्न करके सरकार के प्रति अंसतोष पैदा करने की कोशिश की गई थी।” कोर्ट ने कहा कि इस तरह की गतिविधि यूएपीए की धारा 15 के तहत आतंकी कार्य के रूप में परिभाषित है।

गोगोई ने एनआईए द्वारा असम में सीएए के खिलाफ हिंसक विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने के आरोप में दर्ज दो मामलों में से एक में जमानत हासिल करने में कामयाबी हासिल की थी। यह एकमात्र मामला बचा था जहाँ विशेष एनआईए अदालत ने उसकी जमानत याचिका खारिज कर दी थी। गुवाहाटी कोर्ट की एक खंडपीठ ने एनआईए अदालत के फैसले को बरकरार रखा और गोगोई द्वारा दायर जमानत याचिका को खारिज कर दिया।

बता दें कि अखिल गोगोई, कृषक मुक्ति संग्राम परिषद और राइजोर दल का नेता है। संशोधित नागरिकता कानून (CAA) के खिलाफ कथित हिंसक प्रदर्शन के मामले में गोगोई को जोरहाट से दिसंबर 2019 में गिरफ्तार किया गया था और तब से वह गुवाहाटी केंद्रीय कारागार में बंद है।

गौरतलब है कि यह मामला शुरू में गुवाहाटी के चंदमारी पुलिस स्टेशन में दर्ज किया गया था, लेकिन बाद में इसे एनआईए को ट्रांसफर कर दिया गया। गोगोई पर कड़े गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम, राजद्रोह, आपराधिक साजिश, आतंकवादी संगठनों को समर्थन, सहित अन्य आरोप लगाए गए हैं। 

उसे 12 दिसंबर 2019 को CAA के खिलाफ विरोध-प्रदर्शनों में भूमिका के लिए गिरफ्तार किया गया था। केंद्र सरकार द्वारा पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से संबंधित अल्पसंख्यकों को नागरिकता देने के लिए यह कानून पारित किया गया था। उसके तीन साथियों को एक दिन बाद गिरफ्तार किया गया था।

गोगोई को बाद में एनआईए को सौंप दिया गया और एक अदालत ने उसे 17 दिसंबर को एजेंसी की 10 दिन की हिरासत में भेज दिया। उसे पूछताछ के लिए नई दिल्ली भी लाया गया। गोगोई को 25 दिसंबर को वापस गुवाहाटी ले जाया गया और तब से वह न्यायिक हिरासत में है।

सरकार की दो टूक- रद्द नहीं होंगे कृषि कानूनः किसान नेताओं ने दी धमकी तो कहा- सुप्रीम कोर्ट ही करेगा फैसला

कृषि सुधार क़ानूनों का विरोध लगातार दूसरे महीने भी जारी है, जिसमें ज़्यादातर किसान संगठन पंजाब के हैं। जहाँ एक तरफ किसान अपनी माँग पर अड़े हुए हैं कि उन्हें किसी भी तरह का संशोधन स्वीकार नहीं है वहीं दूसरी तरफ सरकार ने भी किसानों के ब्लैकमेलिंग पर समर्पण करने से साफ़ मना कर दिया है। 

सरकार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कृषि सुधार क़ानून वापस नहीं लिए जा सकते हैं बल्कि बेहतर यही होगा कि अब इस मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत फैसला ले। सरकार ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि वह क़ानूनों में संशोधन पर ज़िम्मेदारी ले सकती है या माँगों पर विचार कर सकती है लेकिन क़ानून रद्द करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता है। 

किसान संगठनों के पास ऐसी सूरत में दो ही विकल्प बचते हैं, या तो वह बेहतर सुझाव के साथ आगे आएँ या फिर सुप्रीम कोर्ट को अंतिम फैसला लेने दें। पिछली सुनवाई में इस मुद्दे पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक समिति के गठन की बात कही थी। जिसमें सिर्फ पंजाब, हरियाणा या पश्चिमी यूपी ही नहीं बल्कि देश के अन्य किसान संगठन शामिल हों। सुप्रीम कोर्ट सोमवार को इस मामले से जुड़ी अगली सुनवाई करेगा। 

ज़रूरत पड़ी तो सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ जाएँगे

केंद्र सरकार की तरफ से मिली यह तीखी प्रतिक्रिया प्रदर्शन कर रहे किसान संगठनों के गले नहीं उतरी। उन्होंने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ से दखल दिए जाने की बात पर प्रतिरोध जताया। इस पर महिला किसान अधिकार मंच की कविता कुरुगांती ने कहा, “यह लोकतंत्र के लिए निराशा भरा दिन है। एक चुनी हुई सरकार बातचीत के बीच में सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटा रही है और चाहती है कि न्यायालय इस मुद्दे का हल निकाले।” सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपनी माँग के धुंधले होने के डर से किसान संगठनों ने यह कहना शुरू कर दिया कि उनका आंदोलन जारी रहेगा। अगर सुप्रीम कोर्ट भी उन्हें पीछे हटने के लिए कहता है फिर भी वह पीछे नहीं हटेंगे। 

भारतीय किसान यूनियन एकता उग्रहन के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उग्रहन ने भी वही राग अलापा। टाइम्स ऑफ़ इंडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “हमें इस बैठक से कोई उम्मीद नहीं थी। सरकार इन क़ानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं है लेकिन हम इससे कम कुछ भी स्वीकार नहीं करने वाले हैं।” इसी तरह क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने कहा, “हम अपना मुद्दा सुप्रीम कोर्ट में नहीं रखेंगे। अगर सुप्रीम कोर्ट ने हमें प्रदर्शन रोकने का आदेश दिया तो हम उनकी बात भी नहीं मानेंगे और अपना आंदोलन जारी रखेंगे।” 

किसान संगठनों की दलील ये है कि मुद्दा नीतिगत मामलों से जुड़ा हुआ है इसमें न्यायपालिका के हस्तक्षेप का कोई मतलब नहीं है। जबकि केंद्र सरकार का कहना है कि विरोध उन क़ानूनों का हो रहा है जो संवैधानिक प्रक्रिया के अंतर्गत पारित किए गए हैं। इसलिए इस मुद्दे पर देश की सबसे बड़ी अदालत ही फैसला ले तो बेहतर होगा।       

केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए कृषि सुधार क़ानूनों को लेकर किसानों और भारत सरकार के बीच शुक्रवार (8 जनवरी 2021) को आठवें दौर की बैठक ख़त्म हुई थी। इस बैठक में भी कोई नतीजा निकल कर नहीं आया। एक तरफ किसान अपनी माँग पर अड़े हुए हैं तो दूसरी तरफ केंद्र सरकार ने भी स्पष्ट कर दिया है कि वह कृषि सुधार क़ानून वापस नहीं लेगी। 15 जनवरी 2021 को किसान और सरकार के बीच अगली बैठक होनी है। 

कोई नतीजा निकल कर नहीं आया

वहीं सरकार का पक्ष रखते हुए कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा, “हम एक लोकतांत्रिक देश के नागरिक हैं। लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर कोई क़ानून लोकसभा और राज्यसभा में पारित होता है तो सुप्रीम कोर्ट के पास उसका विश्लेषण करने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट में इस मुद्दे पर सुनवाई हो भी रही है। आज की बैठक भी कृषि सुधार क़ानूनों पर चर्चा हुई है लेकिन उसका कोई परिणाम निकल कर नहीं आया है।”

सरकार का कहना है कि किसान तीनों क़ानूनों को वापस लेने के अलावा कोई और विकल्प दें तो उस पर विचार सम्भव है। लेकिन किसानों ने कोई अन्य विकल्प प्रदान नहीं किया। किसानों के साथ अगली बैठक 15 जनवरी को तय की गई है। वहीं भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के राकेश टिकैत ने कहा, “जब तक सरकार तीनों कृषि क़ानून वापस नहीं लेती है तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा। हम सरकार द्वारा तय की 15 जनवरी की बैठक में शामिल होंगे, हम यहीं हैं। सरकार संशोधन की बता कह रही है लेकिन हमारी सिर्फ एक ही माँग है कि क़ानून रद्द किए जाएँ।”