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हलाल मीट हिंदू-सिख के लिए वर्जित, होटलों-मीट की दुकानों को लगाना होगा बोर्ड: SDMC का प्रस्ताव पास

मीट या चिकन आप हलाल खा रहे हैं या झटका? होटलों में शायद ही पता चलता है। लेकिन अब नहीं! दिल्ली के ऐसे होटल या मीट की दुकान जो SDMC (दक्षिण दिल्ली म्युनिशपल कॉर्पोरेशन) के अंतर्गत आते हैं, उन्हें अब हलाल या झटका बोर्ड टाँग कर रखना जरूरी होगा।

SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी ने यह प्रस्ताव गुरुवार (24 दिसंबर 2020) को पास कर दिया। इस प्रस्ताव में यह भी लिखा है कि हिंदू और सिख के लिए हलाल मीट खाना वर्जित है। पास हुआ यह प्रस्ताव अब SDMC सभा में जाएगा, जहाँ भाजपा का बहुमत है।

SDMC की सिविक बॉडी की स्टैंडिंग कमिटी के अध्यक्ष राजदत्त गहलोत ने बताया कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य ग्राहकों को जानकारी उपलब्ध कराना है कि वो जो खा रहे हैं, वो क्या है। साथ ही उन्होंने कहा, “अभी समस्या यह है कि लाइसेंस किसी और चीज के लिए दिया जाता है और बेचा कुछ और ही जाता है।”

आपको बता दें कि इसके संबंध में छतरपुर काउंसिलर अनिता तँवर ने प्रस्ताव रखा था, जिसे मेडिकल रिलीफ ऐंड पब्लिक हेल्थ पैनल ने 9 नवंबर 2020 को स्टैंडिंग कमिटी के सामने प्रस्तावित किया था।

ईसाइयों ने किया हलाल माँस का विरोध

क्रिसमस से ठीक पहले ईसाइयों ने हलाल माँस का बहिष्कार करने का फैसला किया है। ईसाई समुदाय के इस फैसले को हिंदू समूहों ने भी अपना समर्थन दिया है। उनका कहना है कि राज्य में हिंदू धर्म के लोग हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर हैं। क्रिश्चियन एसोसिएशन CASA ने ईसाइयों से अपील की है कि हलाल भोजन को अब उनकी खाने की टेबल पर नहीं लाया जाना चाहिए।

ईसाई समुदाय का कहना है कि ईसा मसीह के जन्मदिन पर हलाल माँस क्यों खाना चाहिए? इस विवाद पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। हिंदू समूहों का दावा है कि ईसाई और हिंदू दोनों को हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर किया जाता है।

हलाल मतलब जिहाद और आतंक

किसी भी भोज्य पदार्थ, चाहे वे आलू के चिप्स क्यों न हों, को ‘हलाल’ तभी माना जा सकता है जब उसकी कमाई में से एक हिस्सा ‘ज़कात’ में जाए- जिसे वे जिहादी आतंकवाद को पैसा देने के ही बराबर मानते हैं, क्योंकि हमारे पास यह जानने का कोई ज़रिया नहीं है कि ज़कात के नाम पर गया पैसा ज़कात में ही जा रहा है या जिहाद में। और जिहाद काफ़िर के खिलाफ ही होता है- जब तक यह इस्लाम स्वीकार न कर ले!

यानी जब कोई गैर-मुस्लिम हलाल वाला भोजन खरीदता है, तो वह उसका एक हिस्सा अपने ही खिलाफ होने जा रहे जिहाद को आर्थिक सहायता देने में खर्च करता है। इसे वह ‘हलालो-नॉमिक्स’ यानी हलाल का अर्थशास्त्र कहते हैं। “हलालो-नॉमिक्स का अर्थ है आप अपनी सुपारी खुद दे रहे हैं।”

फुटबॉलर से जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी बना आमिर सिराज एक पाकिस्तानी आतंकी के साथ ढेर, जुलाई से ही था लापता

सुरक्षा बलों ने बृहस्पतिवार (दिसंबर 24, 2020) को उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले में आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के दो आतंकवादियों को मार गिराया। जहाँ एक मारे गए आतंकवादी की पहचान पाकिस्तानी के रूप में हुई है, वहीं दूसरा आतंकी कॉलेज में पढ़ रहा एक छात्र अमीर सिराज नाम का फुटबॉलर था। आमिर सिराज जुलाई 02, 2020 से ही लापता बताया जा रहा था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, सोपोर में एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि आमिर 6 महीने पहले लापता हो गया था। उन्होंने बताया कि आमिर फुटबॉल खेलने के लिए सोपोर के आदिपोरा में अपने मामा के घर से जाने के बाद गायब हो गया था और उसके बाद कभी घर नहीं लौटा। बाद में उन्हें पता चला कि वह जैश-ए-मोहम्मद में शामिल हो गया था।

वर्ष 2020 में सुरक्षा बल दर्जनों स्थानीय युवाओं को सफलतापूर्वक आतंकवादी शिविरों से वापस लाने और उन्हें मनाने में कामयाब रहे हैं। सुरक्षाबलों ने इसी तरह का अवसर आमिर सिराज को भी दिया, लेकिन उसने स्पष्ट इंकार कर दिया।

जिस ऑपरेशन में आमिर सिराज मारा गया था, वह जम्मू-कश्मीर के बारामुला जिले के वानीगम क्रीरी इलाके में आतंकवादियों की मौजूदगी के संबंध में एक विशिष्ट इनपुट पर कार्रवाई करते हुए बारामूला पुलिस, 29RR और 176Bn CRPF द्वारा संयुक्त कॉर्डन और सर्च ऑपरेशन के तहत किया गया था।

जब सुरक्षाबलों को पता चला कि आतंकवादी एक घर के अंदर छिपे हुए हैं, तो उन्होंने उन्हें आत्मसमर्पण करने का भी मौका दिया। लेकिन आतंकवादियों ने आत्मसमर्पण के बजाय संयुक्त खोज दल पर अंधाधुंध गोलियाँ बरसानी शुरू कर दी। जवाबी कार्रवाई के साथ ही मुठभेड़ शुरू हो गई। कई घंटे तक चली मुठभेड़ में सुरक्षाबलों को दो आतंकियों को मार गिराने में सफलता मिली।

मारे गए जैश-ए-मोहम्मद के आतंकियों में एक शीर्ष कमांडर भी शामिल है। मारे गए आतंकियों की पहचान पाकिस्तान के अबरार उर्फ लंगू और सोपोर के आमिर सिराज के रूप में हुई। अधिकारियों ने बताया कि दोनों आतंकवादी इस क्षेत्र में हुई कई आतंकवादी घटनाओं में शामिल थे।

सेक्स पार्टी के लिए पादरियों को बच्चों की सप्लाई करती थीं नन, रेप के बदले देते थे पैसे: पीड़ित ने जर्मनी की कोर्ट में खोली पोल

जर्मनी के एक ‘चिल्ड्रेन्स होम’ में काम करने वाली ईसाई नन पर ईसाई पादरियों, राजनेताओं और व्यापारियों को सेक्स पार्टी में बलात्कार करने के लिए बच्चे सप्लाई करने का आरोप लगा है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, जर्मनी के डार्मस्टैड में एक सोशल वेलफेयर कोर्ट (Social Welfare Court, Darmstadt) ने 63 साल के एक व्यक्ति को इस मामले में मुआवजा दिया है। उस व्यक्ति ने ही खुलासा किया कि किस तरह से ईसाई नन द्वारा उन्हें पार्टियों में पादरी और प्रभावशाली लोगों द्वारा यौन दुर्व्यवहार का शिकार बनाया गया। तब उनकी उम्र मात्र पाँच साल थी। पीड़ित ने बताया कि युवा लड़कों के साथ सेक्स करने की अनुमति देने के लिए इन प्रभावशाली पादरियों द्वारा ननों का भुगतान किया जाता था।

पीड़ित ने अपनी पहचान छिपाते हुए ने कहा कि 1960 और 70 के दशक में घर में अन्य लड़कों के साथ रहने के दौरान उसके साथ लगभग 1,000 बार बलात्कार किया गया था।

स्पीयर (Speyer) के बिशप, कार्ल-हेंज वीसमन (Karl-Heinz Wiesemann) ने भी सार्वजनिक रूप से बिशप रुडोल्फ मोत्ज़ेनबैकर (Bishop Rudolf Motzenbäcker), जिनकी 1998 में मृत्यु हो गई, का नाम लेते हुए उन्हें भी ऐसे जघन्य अपराध में शामिल बताया था। बिशप ने कहा कि इसके बाद से तीन और पीड़ित आगे आ चुके हैं।

पादरियों के लिए युवा लड़कों की ‘सेक्स पार्टी’ में दलाली करती थी नन्स

पीड़िता का शोषण पाँच साल की उम्र में तब किया गया, जब वह मार्च, 1963 में जर्मन शहर स्पीयर में ‘ऑर्डर ऑफ़ सिस्टर्स’ द्वारा चलाए जा रहे ‘द डिवाइन सेवियर’होम में शामिल हुए थे। पीड़ित ने कहा कि वह ननों द्वारा बिशप मोत्ज़ेनबैकर के अपार्टमेंट में यौन शोषण के लिए भेजे गए थे और इसका विरोध करने पर ईसाई पादरी उसे पीटते थे।

पीड़ित, जो स्पीयर कैथेड्रल में एक पादरी के सहायक थे, ने कहा कि उसे कंफ़ेसर के रूप में प्रीस्ट की भूमिका सौंपी गई। पीड़ित ने कहा कि चर्च में नन ‘दलाल’ की तरह काम करती थीं और और 07 से 14 साल के युवाओं को पादरी, स्थानीय राजनेताओं और व्यवसायियों के पास भेजा करते थे।

पीड़ित ने अपनी गवाही में अदालत से कहा, “एक कमरा था, जहाँ नन पुरुषों को ड्रिंक और खाना देती थीं और दूसरे कोने में बच्चों के साथ बलात्कार किया जाता था।” उन्होंने कहा कि ननों ने पैसा कमाया क्योंकि वहाँ मौजूद पुरुषों ने जमकर पैसा लुटाया।

पीड़ित ने अदालत के समक्ष कहा कि घरों पर बच्चों के साथ दुर्व्यवहार में नन्स की महत्वपूर्ण भूमिका थी, यहाँ तक ​​कि ‘सिस्टर्स’ खुद भी छोटे बच्चों का यौन शोषण करती थीं। वर्ष 2000 में ‘चिल्ड्रेन्स होम’ बंद कर दिया गया।

‘चर्च के आदेशों की अवहेलना करने पर होता था कई बार बलात्कार’

पीड़ित के अनुसार, अगर उनमें से कोई भी लड़का चर्च के आदेशों की अवहेलना करता, तो उन्हें लाठी से पीटा जाता या उनके सिर को दीवार पर पटक दिया जाता। उन्होंने कहा कि एक ही समय में तीन पादरियों द्वारा उनके साथ बलात्कार किया गया था।

पादरी के सहायक रहे पीड़ित ने अपनी व्यथा सुनते हुए कहा, “कभी-कभी मैं खून से सने कपड़ों में घर वापस चला जाता था, खून मेरे पैरों से टपक रहा होता था। सितंबर, 1972 में मेरे जाने से पहले, मेरे साथ एक हजार बार यौन दुर्व्यवहार किया गया था।”

कैथोलिक चर्च ने पीड़ित को 15,000 यूरो मुआवजे के साथ 10,000 यूरो थैरेपी का मूल्य पीड़ितों की पेंशन के रूप में भुगतान किया। डार्मस्टैड सामाजिक न्यायालय (Darmstadt Social Court) के न्यायाधीश एंड्रिया हेरमैन ने कहा, “दुर्व्यवहार के शिकार लोगों के लिए, कानूनी कार्रवाई करना काफी मनोवैज्ञानिक तनाव से जुड़ा हुआ है।”

हालाँकि, पीड़ित ने सवाल किया कि इस तरह के पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर और अवसाद से पीड़ित होने के बाद इस पैसे का क्या उपयोग है। उन्होंने पूछा, “मेरी शादी टूट गई है और मेरी हड्डियाँ, यकृत और गुर्दे भी।”

2010 के बाद से, कैथोलिक चर्च में यौन शोषण के कई मामले सामने आए हैं। वर्ष 2018 में यौन दुर्व्यवहारों की आंतरिक जाँच में 1946 और 2014 के बीच 1,670 पादरियों और 3,677 पीड़ितों के साथ दुर्व्यवहार का खुलासा हुआ था।

दुनिया भर के चर्चों में बलात्कार और अन्य अपमानजनक घटनाओं के बार-बार होने वाले मामलों की एक खतरनाक प्रवृत्ति रही है। दुर्भाग्य से, भारत में इस ‘महामारी’ को लेकर कोई समाधान नहीं मिल सका है। ईसाई पादरी और चर्च, दुनिया भर के अधिकांश मामलों की तरह, गरीबों को निशाना बना रहे हैं, लेकिन मामले किसी का ध्यान नहीं जाते हैं।

इको-फ्रेंडली क्रिसमस मनाओ, धरती बचाओ | Ajeet Bharti speaks for #EcoFriendlyChristmas

पेड़ काटना, जीवों की निर्मम हत्या, भोजन की बर्बादी, प्लास्टिक का इस्तेमाल, अत्यधिक आतिशबाज़ी, लाइट पॉलुशन, पेपर की बर्बादी… इसके हर आयाम में पर्यावरण विरोध दिखता है

पूरा वीडियो यहाँ देखें

कॉन्ग्रेस हमेशा से किसान विरोधी, राहुल गाँधी को उनकी पार्टी के लोग भी गंभीरता से नहीं लेते: केंद्रीय कृषि मंत्री

केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गॉंधी पर करारा निशाना साधा है। उन्होंने गुरुवार (24 दिसंबर, 2020) को कहा कि जो कुछ भी राहुल गाँधी बोलते है उसे कॉन्ग्रेस भी गंभीरता से नहीं लेती है। उन्होंने कॉन्ग्रेस को किसान विरोधी भी करार दिया है।

एएनआई ने केंद्रीय कृषि मंत्री के हवाले से कहा, “राहुल गाँधी जो कुछ भी कहते हैं, उनकी बातों को खुद कॉन्ग्रेस भी गंभीरता से नहीं लेती। आज जब वे हस्ताक्षरों के साथ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए राष्ट्रपति के पास गए, तो इन किसानों ने मुझसे कहा कि कॉन्ग्रेस का कोई भी नेता हमारे हस्ताक्षर लेने के लिए नहीं आया था।”

उन्होंने कहा, “अगर राहुल गाँधी इतने ही चिंतित हैं तो उन्हें किसानों के लिए कुछ करना चाहिए था जब उनकी सरकार सत्ता में थी। कॉन्ग्रेस हमेशा किसान विरोधी रही है।”

किसान आंदोलन की आड़ में अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकने के लिए कॉन्ग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लेते हुए तोमर ने कहा कि कॉन्ग्रेस हमेशा से किसान विरोधी रही है। जिस बिल का आज कॉन्ग्रेस द्वारा विरोध किया जा रहा वह स्वयं पार्टी ने ही 2019 चुनाव के दौरान अपने मेनिफेस्टो में डाल रखा था।

तोमर ने पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष से पूछा कि वह इस वक्त झूठ बोल रहे या 2019 चुनाव को मद्देनजर लोगों को धोखा देने का काम कर रहे थे। वहीं लोकतंत्र की बात करने वाले राहुल गाँधी पर कटाक्ष करते हुए कृषि मंत्री ने कहा कि ‘आपातकाल लगाने वाले आज लोकतंत्र की बात कर रहे हैं।’

कृषि बिल के समर्थन में आए किसानों के बारे बताते हुए तोमर ने कहा, “बागपत से आए किसानों ने केंद्र के नए कृषि कानूनों के समर्थन में मुझे पत्र सौंपा। उन्होंने मुझसे कहा कि सरकार को किसी के दबाव में आकर कृषि कानूनों में संशोधन नहीं करना चाहिए।” किसान मजदूर संघ से जुड़े बागपत के 60 किसानों के एक प्रतिनिधिमंडल ने कृषि भवन में केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर से मुलाकात की थी।

कृषि कानूनों के खिलाफ प्रदर्शन को देखते हुए तोमर ने पिछले कुछ दिनों में कई किसान नेताओं के प्रतिनिधिमंडल से मिलकर बातचीत की है और उन्होंने दावा किया है कि ये लोग सुधार के पक्ष में हैं।

इस बीच सरकार की ओर से किसानों को एक और चिट्ठी लिखी गई है। कृषि मंत्रालय द्वारा लिखी गई चिट्ठी में कहा गया है कि सरकार किसानों की हर माँग पर चर्चा करने के लिए तैयार है। सरकार ने साफ तौर पर कहा है कि अभी भी बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं। इसके अलावा सरकार ने आंदोलनकारी किसानों को लिखे पत्र में किसानों से बातचीत के अगले दौर के लिए तारीख और समय खुद तय करने को कहा है।

पंडित राहुल शास्त्री बनकर लोगों को चूना लगाता था हारून मियाँ, दिल्ली पुलिस ने मेरठ से पिता-पुत्र को पकड़ा

दिल्ली पुलिस ने ग्रह शांति के नाम पर ठगी करने वाले जालसाज हारून मियाँ उर्फ शाहजी बंगाली को अरेस्ट किया है। पंडित राहुल शास्त्री नाम से पुजारी बनकर आरोपित हारून लोगों को अंधविश्वास में फँसाता और उनसे पैसे हड़पता था। मेरठ के ज़ाकिर नगर के रहने वाले हारून ने गूगल व ट्रू कॉलर एप पर भी मियाँ शाहजी बंगाली के नाम से खुद को पंजीकृत कर रखा था। इसके जरिए वह लोगों को ठगने का काम करता था।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हारून के खिलाफ हत्या और दंगों के कई मामले दर्ज हैं। सिर्फ हारून ही नहीं बल्कि उसका बेटा आरिफ भी धोखाधड़ी के धंधे में शामिल था।

दिल्ली पुलिस ने एक महिला की शिकायत के बाद कार्रवाई करते हुए इस ऑनलाइन तांत्रिक को गिरफ्तार किया। केशवपुरम में रहने वाली एक युवती के पास एक अनजान नंबर से फोन आया था। फोन करने वाले ने खुद को पंडित राहुल शास्त्री बताते हुए कहा कि वह उसके घर में चल रही परेशानियों को दूर कर सकता है।

पंडित बने ठग हारून ने महिला से घर में शांति कराने के नाम पर 85,000 रुपए उसके खाते में ट्रांसफर करने के लिए कहा। पीड़ित महिला को शक तब हुआ जब आरोपित ने उससे से 55 हजार रुपए और जमा कराने को कहा।

इसके बाद पुलिस ने महिला की शिकायत पर हारून के खिलाफ मामला दर्ज किया और एसएचओ संजय रावत के नेतृत्व में पुलिस की एक टीम ने मामले की तफ्तीश शुरू की। पुलिस ने पीड़िता के फोन पर आए कॉल के माध्यम से हारून का पता लगाया और मेरठ से उसे गिरफ्तार कर लिया। साथ ही उसके बेटे आरिफ को भी पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस अब इस बात की जाँच कर रही है कि आरोपित कितने लोगों के साथ ठगी कर चुका है।

गौरतलब है कि इस साल अक्टूबर में भी इसी तरह की एक घटना का वीडियो वायरल हुआ था। इसमें तीन मुस्लिम युवक को साधुओं की वेशभूषा में अपनी पहचान छिपाते देखा गया था। इन लोगों की असली पहचान तब सामने आई जब एक व्यक्ति द्वारा उनका नाम पूछा गया। जिस दौरान उन्होंने अपना नाम सुड्डू, दीवान और अली हुसैन बताया।

वीडियो में तीनों ने कबूल किया कि वे मुसलमान हैं। साथ ही एक मुस्लिम व्यक्ति ने यह भी कहा कि उन्होंने कोई अपराध नहीं किया या कोई चोरी नहीं की है। हो सकता है कि इनकी बातें सच हो लेकिन भगवा वस्त्र की आड़ में अमूमन इसी तरह साधुओं को बदनाम करने का काम किया जाता है।

कर्नाटक: इस्लाम कबूलने के लिए हिंदू लड़की पर दबाव डालने वाला सोयूब गिरफ्तार, इंस्टाग्राम पर भेजता था गंदे मैसेज

सोशल मीडिया पर एक हिंदू लड़की को अश्लील मैसेज भेजने, प्रताड़ित करने और इस्लाम कबूलने के लिए मजबूर करने के आरोप में पुलिस ने कर्नाटक के सावनूर में एक मुस्लिम युवक को गिरफ्तार किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दक्षिण कन्नड़ जिला पुलिस ने मंगलवार (22 दिसंबर, 2020) को मंगलौर इलेक्ट्रिसिटी सप्लाई लिमिटेड कंपनी में सोयूब कोतवाल नाम के एक कर्मचारी को गिरफ्तार किया है। आरोपित सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर लड़की को परेशान करता था और उसे जबरन बार-बार तोहफे स्वीकारने और इस्लाम धर्म कबूलने के लिए मजबूर करता था।

लड़के की हरकतों से परेशान होकर लड़की ने इसकी शिकायत अपने परिजनों से की। परिजनों की तहरीर पर बेलारे थाना पुलिस ने आरोपित के खिलाफ POCSO अधिनियम की धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज किया है। एफआईआर के अनुसार, सोयूब बार-बार दक्षिण कन्नड़ के सावनूर के पास पेरियाडका गाँव से पीयूसी (प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज) में पढ़ने वाली लड़की को इंस्टाग्राम पर रिक्वेस्ट भेजता था।

पीड़िता ने आरोप लगाया है कि आरोपित ने उसे कई बार अश्लील मैसेज भेजे और उसे प्रपोज भी किया था। इसके अलावा सोयूब ने कई बार उसे तोहफे भी दिए, जिसे लेने के लिए वह उसे मजबूर करता था। बाद में मुस्लिम युवक उसे धर्म बदलने के लिए भी मजबूर करने लगा था। बता दें पुलिस ने मामले को संज्ञान में लेते हुए आरोपित युवक को गिरफ्तार कर लिया है।

गौरतलब है कि इस घटना को लेकर हिंदू जागरण वेदिके इकाई ने कहा कि लव जिहाद के ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ हिंदू लड़कियों को फँसाने की कोशिश की जाती है और जब लड़कियाँ फँस जाती हैं तो उन्हें धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया जाता है। वेदिके ने हिंदू महिलाओं से इन परिस्थितियों के मद्देनजर सतर्क रहने का आग्रह किया है। साथ ही हिंदू जागरण वेदिके के सदस्यों ने पीड़िता के घर पहुँच कर परिजनों से मामले के बारे में बातचीत भी की।

दंगा पीड़ितों को झूठ बोलने पर मजबूर करता था SC का वकील महमूद प्राचा, दफ्तर पर दिल्ली पुलिस का छापा

दिल्ली पुलिस की एक विशेष सेल ने अदालत से वारंट लेकर आज बृहस्पतिवार (दिसंबर 24, 2020) को दिल्ली दंगों के मामले के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय के अधिवक्ता और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य महमूद प्राचा के ऑफिस की तलाशी ली।

पत्रकार राज शेखर ने आज ट्वीट किया कि अदालत ने पहले प्राचा के खिलाफ एक प्राथमिकी दर्ज करने का आदेश दिया था। महमूद प्राचा पर हलफनामें से छेड़छाड़ करने और दिल्ली दंगा पीड़ितों को झूठे बयान देने के लिए मजबूर करने का आरोप है।

इसके अलावा महमूद प्राचा पर एक आरोप ये भी है कि उसने एक अन्य वकील के हस्ताक्षर वाला शपथ पत्र (हलफनामा) आगे बढ़ाया था, जबकि वो वकील तीन साल पहले ही मर चुका था।

पत्रकार आदित्य मेनन के मुताबिक, पुलिस ने दावा किया है कि वो महमूद प्राचा के लॉ फर्म की आधिकारिक ईमेल आईडी के आउटकमिंग दस्तावेजों और मेटा डेटा की खोज कर रही है।

अदालत द्वारा इस मामले में दिल्ली पुलिस को आदेश दिए जाने के बाद ही पुलिस ने इस मामले में जाँच शुरू की। अदालत ने दिल्ली पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि एडवोकेट प्राचा के खिलाफ लगे तमाम आरोपों की जाँच के लिए स्पेशल सेल या अपराध शाखा को निर्देश जारी किए जाएँ।

सर्च वारंट के अनुसार, वकील प्राचा पर आईपीसी की धारा 182, 193, 420, 468, 471, 472, 473, 120B के तहत मामला दर्ज किया गया है। इसमें धारा 471 का प्रयोग कूटरचित दस्तावेज का असली की तरह इस्तेमाल करने पर किया जाता है।

महमूद प्राचा के खिलाफ सांप्रदायिक घृणा भड़काने के लिए हुई थी FIR

इसी साल, जुलाई माह में प्राचा और शिया धर्मगुरु मौलाना कल्बे जवाद, दोनों पर एफआईआर दर्ज की गई थी। दोनों ने ही एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुस्लिमों और दलितों को ‘आत्म-रक्षा के अधिकार’ और बन्दूक और लाइसेंस आवेदन करने को लेकर बयान दिए थे।

हालाँकि, FIR के बावजूद, महमूद प्रचा को लखनऊ मस्जिद के अंदर एक शिविर में देखा गया था, जहाँ वह मुस्लिम समुदाय के लोगों को प्रशिक्षण दे रहा था कि लाइसेंस के लिए किस तरह आवेदन कर आग्नेयास्त्रों को कैसे हासिल कर सकते हैं। महमूद प्राचा ने इस साल अगस्त के महीने में CAA विरोधी प्रदर्शन फिर से शुरू करने की बात भी कही थी।

पत्रकार डेनियल पर्ल के हत्यारे आतंकी उमर शेख की तत्काल रिहाई का आदेश, कंधार प्लेन हाइजैक से भी जुड़ा है नाम

पाकिस्तान के सिंध हाई कोर्ट ने 2002 में पत्रकार डेनियल पर्ल की क्रूरतम हत्या में शामिल आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। पर्ल द वॉल स्ट्रीट जर्नल के एशिया ब्यूरो प्रमुख थे। आतंकियों ने अगवा कर उनकी हत्या उस समय की थी जब इस्लामिक चरमपंथ पर शोध कर रहे थे।

सिंध हाईकोर्ट ने ने अहमद उमर शेख, फहद नसीम, शेख आदिल और सलमान साकिब की हिरासत को अमान्य करार दिया। अहमद उमर सईद शेख, फहद नसीम, ​​शेख आदिल और सलमान साकिब को अमान्य (null and void) घोषित कर दिया है। आदेश सुनाते हुए एक जज ने कहा, “ये लोग 18 साल से बिना किसी जुर्म के जेल में सड़ रहे हैं।” साथ ही HC ने कहा कि उनके नाम नो-फ्लाई लिस्ट में डाले जाएँ।

बता दें कि पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर में डेनियल पर्ल की हत्या के मुख्य आरोपित आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख की रिहाई पर रोक लगा दी थी। सुप्रीम कोर्ट में अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी को बरी करने के सिंध हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी।

सिंध सरकार के वकील फारूक नाइक ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया था कि मजिस्ट्रेट के सामने पहचान परेड कानून के मुताबिक 21 अन्य गवाहों के अलावा टैक्सी चालक नासिर अब्बास, रिसेप्शनिस्ट अमीर अफजल द्वारा अभियुक्त की पहचान की गई थी। कथित तौर पर आतंकवादी नाम बदलकर बशीर नाम से अकबर इंटरनेशनल होटल में पत्रकार डेनियल पर्ल से मिला था।

गौरतलब है कि इस साल अप्रैल में, सिंध उच्च न्यायालय ने अहमद उमर सईद शेख की मौत की सजा को पलटते हुए 7 साल जेल की सजा सुनाई थी। आतंकवादी के वकील ने बताया कि अपहरण के आरोप में उसकी सजा को घटाकर सात साल कर दिया गया। वहीं मामले में आजीवन कारावास की सजा भुगत रहे तीन अन्य लोगों को सिंध उच्च न्यायालय ने रिहा कर दिया था। उच्च न्यायालय ने आतंकवाद विरोधी अदालत के फैसले को भी दरकिनार कर दिया था।

बता दें उमर सईद शेख उन आतंकियों में से एक था जिसे भारत द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अजहर और आतंकवादी मुश्ताक अहमद ज़रगर के साथ भारतीय एयरलाइंस IC-814 के यात्रियों के बदले में मुक्त किया गया था। इस फ्लाइट को पाकिस्तानी आतंकवादियों के एक समूह ने दिसंबर 1999 में काठमांडू से कंधार में अपहरण कर लिया था।

विश्वभारती की जमीन पर कब्जा करने वालों में अमर्त्य सेन भी, कइयों ने लीज की जमीन बाहरियों को बेची

नोबल पुरस्कार विजेता और वामपंथी ‘बुद्धिजीवी’ अमर्त्य सेन का नाम ऐसे लोगों की सूची में है, जिन्होंने पश्चिम बंगाल स्थित विश्वभारती विश्वविद्यालय की ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी कब्जा जमा रखा है। विश्वविद्यालय प्रशासन ने पश्चिम बंगाल की प्रदेश सरकार को लिखा है कि उनकी कई संपत्ति ऐसी हैं, जिन्हें गलत तरीके से निजी पार्टियों के नाम पर दर्ज किया गया है। विश्वविद्यालय द्वारा जारी की गई ग़ैरक़ानूनी तरीके से कब्ज़ा ज़माने वालों की सूची में अमर्त्य सेन का नाम भी शामिल है। 

जिन सम्पत्तियों पर ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा है, उनमें गर्ल्स हॉस्टल, अकादमिक विभाग, कार्यालय और कुलपति का बंगला शामिल है। विश्वविद्यालय ने आरोप लगाया है कि सरकार के राइट-टू-रिकॉर्ड (right to record) के तहत जिनके नाम पर संपत्ति गलत तरीके से दर्ज की गई है, विश्वविद्यालय की ज़मीन उनके नाम कर दी गई है और उन्होंने उस पर रेस्टोरेंट, स्कूल और अन्य व्यवसाय स्थापित कर लिए हैं। 

बंगाल पर बढ़ रहा है केंद्र सरकार का नियंत्रण: अमर्त्य सेन     

सेन ने अवैध तरीके से 13 डेसीमल (decimals) ज़मीन पर कब्ज़ा किया है, जबकि उनके पास 125 डेसीमल ज़मीन पहले से ही मौजूद है जो कि उनके दिवंगत पिता को क़ानूनी रूप से पट्टे (लीज़) पर दी गई थी। 

इन आरोपों का जवाब देते हुए अमर्त्य सेन ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया से कहा, “विश्वविद्यालय की जिस ज़मीन पर मेरा घर बना हुआ है, वह काफी लम्बे समय तक के लिए लीज़ पर है। मैंने देखा कि विश्वभारती के कुलपति बिद्युत चक्रवर्ती ने उन लोगों की सूची में मेरा नाम भी दे रखा है जिनका विश्वविद्यालय की ज़मीन पर ग़ैरक़ानूनी कब्ज़ा है। विश्वभारती की जिस ज़मीन पर मेरा घर है वह काफी समय के लिए लीज़ पर है। कुलपति इस बारे में सिर्फ सपना देख सकते हैं कि वह किसी का अधिकार ख़त्म कर सकते हैं।”

‘प्रख्यात अर्थशास्त्री’ ने केंद्र सरकार को निशाना बनाते हुए आरोप लगाया कि प्रदेश में केंद्र सरकार का नियंत्रण लगातार बढ़ रहा है। इसके बाद उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि कुलपति को उन पर कार्रवाई करने के लिए केंद्र सरकार की तरफ से निर्देश मिला है। उन्होंने कहा, “शांति निकेतन में पले-बढ़े होने के नाते मैं शांति निकेतन और संस्कृति के बीच बढ़ते दायरे और केंद्र सरकार समर्थित कुलपति पर टिप्पणी कर सकता हूँ। आखिर प्रदेश में केंद्र सरकार का प्रभाव लगातार बढ़ता जा रहा है।” 

बाहरियों को जमीन बेची

विश्वविद्यालय एस्टेट कार्यालय के मुताबिक़ 1980 से 1990 के बीच अनियमित दस्तावेज़ तैयार किए गए थे। ज़मीन का एक बड़ा हिस्सा रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा विश्वविद्यालय के लिए खरीदा गया था। वह शांतिनिकेतन के पूर्वपल्ली क्षेत्र में स्थित है जो कि आश्रम और विश्व भारती से जुड़े मशहूर लोगों और परिवारों का आवासीय क्षेत्र है। विश्वविद्यालय के पास मौजूद दस्तावेज़ों से स्पष्ट होता है कि 1990 के दौरान वहाँ की ज़मीन पर किस हद तक अतिक्रमण किया गया था। यह दस्तावेज़ शिक्षा मंत्रालय और कैग (Comptroller and Auditor General of India) को भी भेजे गए हैं। 

साल 2006 में सेन ने तत्कालीन कुलपति से निवेदन किया था कि 99 साल पुरानी लीज़ की ज़मीन उनके नाम कर दी जाए। जिसे एग्जीक्यूटिव काउंसिल द्वारा स्वीकृति दे दी गई थी और अतिरिक्त ज़मीन विश्वविद्यालय को कभी वापस नहीं लौटाई गई। टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुताबिक़ विश्वविद्यालय के एस्टेट कार्यालय द्वारा जुलाई 2020 में कई विभागों को एक रिपोर्ट भेजी गई थी, जिसके अंतर्गत कुल 77 प्लॉट के आधिपत्य का निस्तारण होना था। 

उस रिपोर्ट के मुताबिक़ हाई प्रोफाइल लोगों ने पूर्वपल्ली, दक्षिणपल्ली और श्रीपल्ली क्षेत्र की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था। एक एस्टेट अधिकारी का यहाँ तक कहना था कि अमर्त्य सेन को इस बात की पूरी जानकारी थी और उनके परिवार को परिसर के नज़दीक स्थित ज़मीन बेचे जाने की वजह से फ़ायदा हुआ था। दिसंबर 2016 में एक अस्थायी सूची जारी की गई थी जिनका ज़मीन पर अवैध कब्ज़ा था जिसमें कहा गया था कि लोगों ने अपनी लीज़ वाली ज़मीन बाहरियों को बेच दी है।