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कश्मीरी पत्रकारों को पीटा: The Wire का आतंकवाद के खिलाफ मुखर IPS अधिकारी के खिलाफ प्रोपेगंडा

लिबरल मीडिया गिरोह अक्सर उसके पीछे पड़ जाता है, जो उनकी विचारधारा से इत्तिफ़ाक़ न रखता हो। ऐसे लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जाता है और अगर उसका कोई पूर्वज 100 वर्ष पहले साइकिल से भी गिरा हो, तो उसे भी चीख-चीख कर बताया जाता है। प्रोपेगंडा पोर्टल ‘दी वायर’ (The Wire) में खबर आई कि जम्मू कश्मीर के पत्रकारों ने IPS अधिकारी संदीप चौधरी पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है।

उनका आरोप है कि शारीरिक रूप से और फिर सोशल मीडिया पर, दोनों ही माध्यमों से पुलिस अधिकारी ने मीडियाकर्मियों को निशाना बनाया। संदीप चौधरी फ़िलहाल अनंतनाग के SSP हैं। मुदासीर कादरी और फयाज अहमद नाम के पत्रकारों के हवाले से ‘The Wire’ की खबर में दावा किया गया कि प्रदेश में चल रहे DDC चुनाव के मतदान के दौरान ही पुलिस अधिकारी ने पत्रकारों की पोलिंग बूथ पर ही पिटाई की।

साथ ही, पत्रकारों के उपकरण छीन लेने का भी आरोप लगाया गया। पत्रकारों का कहना है कि उन्हें पुलिस थाने ले जाकर कुछ घंटे हिरासत में रखा गया, जहाँ अहमद की तबीयत खराब होने के बाद उसे अस्पताल भेजना पड़ा। पीरजादा आशिक नामक एक पत्रकार ने आरोप लगा दिया कि एक खबर लिखने के कारण उसके खिलाफ भी FIR करवा दी गई थी। एक बशरत मसूद नामक पत्रकार ने कहा कि पत्रकारों को क्या लिखना है, ये पुलिस अधिकारी नहीं तय करेंगे।

‘The Wire’ तो यहाँ तक दावा कर बैठा कि SSP संदीप चौधरी का पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार करने का पुराना इतिहास रहा है। अनुराधा भसीन के बयानों के आधार पर कई दावे किए गए। जबकि ये वही पत्रकार हैं, जिनके संस्थान ‘कश्मीर टाइम्स’ का दफ्तर ही अवैध रूप से कब्जाए गए भवन में चल रहा था। कश्मीर प्रेस क्लब के अध्यक्ष के हवाले से दावे किए गए। बाद में इसे कश्मीर में ‘पत्रकारों की दुर्दशा’ से जोड़ा गया।

‘कश्मीर टाइम्स’ के संस्थापक वेद भसीन को एक प्लॉट दिया गया था, जिसका अधिकार अब वापस ले लिया गया है। इन्हें दो संपत्तियाँ दी गई थीं – एक दफ्तर के लिए और एक दिवंगत वेद भसीन के निवास के लिए। इन्हें खाली करने के लिए पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका था। 90 के दशक में ही इस बिल्डिंग को ‘कश्मीर टाइम्स’ को दिया गया था। आज यही संदीप चौधरी के खिलाफ बयानबाजी कर रही हैं।

‘The Wire’ में IPS अधिकारी संदीप चौधरी के खिलाफ लेख

हमने जब IPS अधिकारी संदीप चौधरी के बारे में थोड़ा और खँगाला तो पता चला कि वो ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द प्रिंट’ जैसे मीडिया संस्थानों में लेख भी लिखते हैं, जिसके माध्यम से वो आतंकवाद और उसकी पैरवी करने वालों पर करारा प्रहार करते हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख के माध्यम से उन्होंने बताया था कि कैसे अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के बाद से प्रदेश में आतंकी घटनाओं में कमी आई है।

इसके लिए उन्होंने स्थानीय कश्मीरी जनता का ही उदाहरण दिया था। संदीप चौधरी ने बताया था कि कैसे रियाज नाइकू जैसे आतंकियों का महिमामंडन किया गया। बता दें कि मीडिया का एक वर्ग रियाज नाइकू को गणित का शिक्षक बताते हुए उसके महिमामंडन में जुटा हुआ था। पत्रकार कुरतुलुद्दीन रहबर ने सोपियाँ के तुर्कवंगम से नवंबर 4, 2020 को एक स्टोरी की थी, जिसमें दो लड़कों के जन्मदिन और उनमें से एक के नाम में उन्होंने गलती की थी।

ये वही पत्रकार हैं, जिन्होंने ‘The Wire’ में IPS संदीप चौधरी के ‘पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार’ को लेकर लेख लिखा है। संदीप चौधरी ने असल में पत्रकार की इन गलतियों की तरफ ध्यान दिलाया था। उसने अपने लेख में जब की घटना का जिक्र किया है, एचएम कमांडर आमिर खान के गाँव लिवर में भारी पत्थरबाजी हो रही थी और तीन पत्रकारों का एक समूह लड़कों को कह रहा था कि वो एक खास राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं को पोलिंग बूथ पर न आने दें।

जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा था, उन्होंने पुलिस से शिकायत की, जिसके बाद पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने को मजबूर होना पड़ा और उक्त पत्रकारों से भी कह दिया गया कि वो लड़कों को न भड़काएँ। पुलिस के बार-बार निवेदन के बावजूद वो नहीं माने तो उन्हें दछिनिपोरा क्षेत्र के उस संवेदनशील गाँव से हटाना पड़ा और इस प्रक्रिया में किसी भी पत्रकार को नुकसान नहीं पहुँचाया गया।

कुछ लोगों का कहना है कि जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ संदीप चौधरी खुल कर आवाज़ उठाते रहे हैं। मई 2019 में हुए एक एनकाउंटर को लेकर ‘The Wire’ में रघु कर्नाड ने एक लेख लिखा था, जिसमें PDP प्रवक्ता ने कहा था कि चुनाव से पहले एनकाउंटर का अर्थ है लोकतांत्रिक प्रक्रिया की हत्या। ये एनकाउंटर शोपियाँ में हुआ था। बुरहान वानी का पिट्ठू लतीफ़ टाइगर नामक आतंकी इस एनकाउंटर में मार गिराया गया था।

आतंकियों के लिए ‘Gunmen’ शब्द का प्रयोग

IPS संदीप चौधरी ने इस भ्रामक खबर को लेकर आपत्ति जताई थी। वो सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे तत्वों पर नजर रखते हैं, इसीलिए भी ये मीडिया गिरोह चिढ़े रहते हैं। जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने आतंकियों के लिए ‘बंदूकधारी’ शब्द का प्रयोग किया, तब भी उन्होंने आपत्ति जताई थी। 27 नवंबर 2020 की इस खबर में बाद में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ‘Gunmen’ की जगह ‘मिलिटेंट्स’ लिख दिया। इससे साफ़ है कि जब भी इस तरह की गलत खबरों पर कोई आपत्ति जताता है, ‘The Wire’ उस अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत खुन्नस के साथ रिपोर्टिंग करता है।

उन्होंने ‘The Print’ के लिए लिखे गए एक लेख में बताया था कि कैसे पश्चिमी मीडिया रियाज नाइकू को हीरो की तरह पेश कर रहा है। उन्होंने अपना अनुभव साझा किया था कि जब वो 2008-19 तक शोपियाँ में पदस्थापित थे, तब उन्होंने कई क्रूरतम हत्याएँ देखी थीं और उनके पीछे मीडिया के इसी ‘गणित के शिक्षक’ का हाथ था। उन्होंने पूछा था कि इन आतंकियों की मौत पर हंगामा मचाने वाले तब क्यों शांत रहते हैं, जब उनके द्वारा अनगिनत हत्याएँ की जाती हैं?

पीरजादा आशिक ने दावा किया था कि आतंकियों की लाशें कब्र से निकाली जाएँगी

उन्होंने कहा कि पीरजादा आशिक ने भी समाचार पत्र ‘The Hindu’ में एक फेक न्यूज़ प्रकशित की थी, जिसके बाद उसे पूछताछ के लिए अनंतनाग बुलाया गया था। इस खबर में पीरजादा ने आरोप लगाया था कि तीन आतंकियों की लाशें कब्र से निकाली जा सकती हैं। इस खबर से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की संभावना थी। इस लेख में एक अधिकारी के माफ़ी माँगने की बात भी थी, लेकिन वो कौन है, उसने किससे माफ़ी माँगी – कोई डिटेल नहीं दिया गया।

इससे साफ़ है कि ‘The Wire’ ने आईपीएस संदीप चौधरी को इसीलिए निशाना बनाया है, क्योंकि वो आतंकी को आतंकी कहने की वकालत करते हैं और मीडिया में आतंकियों के महिमामंडन के खिलाफ रहे हैं। पत्रकारों पर युवकों को उकसा कर पत्थरबाजी कराने और एक विशेष राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने का आरोप लगा तो उलटा पुलिस अधिकारी के खिलाफ ही लेख लिख दिया गया। ये लोग जम्मू कश्मीर को शांत नहीं देख सकते।

आपको याद होगा कि ‘द वायर’ ने रियाज नायकू की मौत की खबर तो प्रकाशित की थी, लेकिन कहीं भी यह जिक्र नहीं किया कि वह एक आतंकवादी था, जिसका पहला लक्ष्य भी हर दूसरे आतंकी की तरह ही जिहाद था। घाटी में मौजूद आतंकवादियों का महिमामंडन और उन्हें पीड़ित, बेचारा, आदि-आदि साबित करने का यह अभियान बरखा दत्त जैसे कथित पत्रकारों से शुरू हुआ था। इस कतार में फिर ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को एक ‘आदर्श पिता’ की तरह पेश करने वाले ‘द क्विंट’ आदि भी शामिल होते रहे।

‘किसान’ आन्दोलन को भारत-पाक का आपसी मामला बताने वाले बोरिस जॉनसन होंगे गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि, स्वीकारा निमंत्रण

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। जॉनसन को यह निमंत्रण स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी ने दिया था। 1993 में जॉन मेजर के बाद जॉनसन इस कार्यक्रम में भाग लेने के वाले ब्रिटेन के दूसरे प्रधानमंत्री होंगे। इस निमंत्रण को स्वीकार करने के साथ ही बोरिस जॉनसन ने भारत को अगले वर्ष यूके के G-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है।

यह जानकारी ब्रिटेन के विदेश मंत्री डोमिनिक राब ने दी है। भारत यात्रा पर आए ब्रिटिश विदेश मंत्री ने कहा कि गणतंत्र दिवस के मौके पर जॉनसन भारत आएँगे। रिपोर्ट्स के अनुसार पीएम मोदी ने 27 नवंबर को टेलीफोन पर बातचीत के दौरान जॉनसन को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। इसके बाद कथित तौर पर पीएम को जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया गया था, जिसका आयोजन अगले साल ब्रिटेन में होगा।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की यह प्रस्तावित यात्रा ब्रेक्जिट के मद्देनजर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। साथ ही ब्रिटेन भारत जैसी अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

गौरतलब है कि पिछले माह ही भारत ने ब्रिटेन के साथ ‘ब्रेक्जिट एन्हांस्ड ट्रेड पार्टनरशिप’ की दिशा में प्रगति की समीक्षा करने के लिए वर्चुअल मीटिंग की थी, जिससे भविष्य में ‘फ्री ट्रेड एग्रीमेंट’ हो सकता है। वार्ता के दौरान दोनों पक्षों ने व्यापार संबंधों के में तेजी लाने पर सहमति व्यक्त की।

बोरिस जॉनसन ने हाल ही में किसान आंदोलनों को बता दिया था भारत-पाक का आपसी मामला

उल्लेखनीय है कि हाल ही में ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने संसद में भारत के किसान मुद्दे पर लेबर पार्टी के सांसद के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे भारत और पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बता दिया था। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को कोई भी विवाद द्विपक्षीय रूप से निपटाना चाहिए। उनका यह बयान लोगों के बीच बहस का विषय भी बन गया था।

कुछ लोगों ने अनुमान लगाए कि शायद बोरिस जॉनसन को इस विषय की जानकारी नहीं थी या फिर वह कन्फ्यूज हो गए। मगर वास्तविकता क्या है, यह सिर्फ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ही जानते होंगे।

केरल: ईसाइयों ने किया हलाल माँस का विरोध, हिन्दुओं को भी किया जाता है बेचने को मजबूर

केरल में अब एक नया विवाद छिड़ गया है। दरअसल ईसाईयों के त्योहार क्रिसमस से ठीक पहले ईसाइयों ने हलाल माँस का बहिष्कार करने का फैसला किया है। समाचार पोर्टल ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईसाई समुदाय के इस फैसले को हिंदू समूहों ने भी अपना समर्थन दिया है। उनका कहना है कि राज्य में हिंदू धर्म के लोग हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर हैं। क्रिश्चियन एसोसिएशन CASA ने ईसाइयों से अपील की है कि हलाल भोजन को अब उनकी खाने की टेबल पर नहीं लाया जाना चाहिए।

ईसाई समुदाय का कहना है कि ईसा मसीह के जन्मदिन पर हलाल माँस क्यों खाना चाहिए? इस विवाद पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। हिंदू समूहों का दावा है कि ईसाई और हिंदू दोनों को हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर किया जाता है। वहीं आईयूएमएल ने इसे राज्य में मुस्लिम माँस की दुकानों का बहिष्कार करने के लिए उठाया गया एक कदम बताया।

उल्लेखनीय है कि ‘झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी’ के चेयरमैन रवि रंजन सिंह बताते हैं कि ‘झटका‘ विधि हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट, हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

इसके अलावा, मारे जाते समय जानवर को खास समुदाय के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल माँस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यानी कि यह काम सिर्फ एक समुदाय विशेष का सदस्य ही कर सकता है।

इसमें जानवर/पक्षी को काटने से लेकर, पैकेजिंग तक में सिर्फ और सिर्फ खास समुदाय वाला ही शामिल हो सकते हैं। मतलब, इस पूरी प्रक्रिया में, पूरी इंडस्ट्री में एक भी नौकरी अन्य धर्मों के लिए नहीं है। यह पूरा कॉन्सेप्ट ही हर नागरिक को रोजगार के समान अवसर देने की अवधारणा के खिलाफ है। बता दें कि आज McDonald’s और Licious जैसी कंपनियाँ सिर्फ हलाल माँस बेचती है।

जब कार रोक फिरौती के लिए उठा लिए गए अडानी: 22 साल पुरानी कहानी जो आप शायद ही जानते हो

अहमदाबाद की एक अदालत ने दो गैंगस्टर्स फैज़लुर रहमान उर्फ़ फैजु और भोगीलाल दर्जी उर्फ़ मामा को एक 22 साल पुराने एक मामले में दो साल पहले अर्थात 2018 में अपराधमुक्त कर दिया था। ये मामला जुड़ा है 27.5 बिलियन डॉलर (2.025 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति वाले उद्योगपति के फिरौती के लिए अपहरण करने से, वो उद्योगपति आज दुनिया का 155वाँ और भारत का 5वाँ सबसे अमीर व्यक्ति है, जिसका नाम है – गौतम अडानी, गुजरात के बड़े कारोबारी। चूँकि, उनका नाम चर्चा में है तो आपको उस अपहरण कांड के बारे में बताते हैं कि क्या हुआ था उस समय।

अडानी, आज इस नाम से भारत में शायद ही कोई ऐसा हो, जो परिचित न हो। फैज़लुर रहमान के खिलाफ पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन पर सुनवाई चल रही है। उसे फ़िलहाल अहमदाबाद के साबरमती सेंट्रेल जेल में रखा गया है, जबकि दर्जी जमानत पर बाहर चल रहा है। दोनों के वकील कुणाल एन शाह ने बताया कि एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज डीपी पटेल ने उनके दोनों क्लाइंट्स को इस मामले में दोषमुक्त करार दिया।

उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ये साबित करने में नाकाम रहा कि फिरौती के लिए अपहरण हुआ था और उसमें इन दोनों का कोई रोल था। उन्होंने बताया कि कई बार समन दिए जाने के बावजूद गौतम अडानी या कोई भी पीड़ित अभिसाक्ष्य या बयान दर्ज कराने के लिए नहीं पहुँचा, जिसके बाद कोर्ट को ये निर्णय लेना पड़ा। गौतम अडानी को 2 बार समन भेजा गया। शाह ने दावा किया कि गवाह और पुलिस अधिकारी घटना का ठीक से विवरण नहीं दे पाए कि आखिर हुआ क्या था।

ये घटना जनवरी 1, 1998 की है, जब मोहम्मदपुरा से कार से जाते समय गौतम अडानी और शांतिलाल पटेल को कथित तौर पर फिरौती के लिए अपहृत कर लिया गया था। आरोप है कि सामने एक स्कूटर को खड़ा कर के कार को रोका गया और फिर कुछ लोग आए, जिन्होंने दोनों का अपहरण किया। तब सरखेज थाना के सब-इंस्पेक्टर रहे आरके पटेल ने FIR दर्ज की थी, जिसमें 9 अभियुक्तों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

इसमें रहमान दर्जी, मोहम्मद उर्फ़ राजा जावेद, जयेश रतिलाल दर्जी, रियाज और अकील नामक अपराधी शामिल थे। आरोप है कि गौतम अडानी और शांतिलाल पटेल को छोड़ने के लिए 15 करोड़ रुपए की रकम माँगी गई थी और जब अपराधियों को रुपए मिल गए, तब उन्होंने गौतम अडानी को छोड़ दिया। 2009 में चार्जशीट फाइल की गई और इस मामले में 2014 में आरोप तय किए गए। आईपीसी की धारा-365 (अपहरण), 144 (गैर-कानूनी तरीके से भीड़ जुटाना) और आर्म्स एक्ट के तहत मामले दर्ज हुए थे।

लगभग 50-60 के बीच के उम्र वाला फैज़लुर रहमान मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसे एक जमाने में दाऊद इब्राहिम के टक्कर का रंगदार और गैंगस्टर माना जाता था। फिरौती, अपहरण, लूट और हत्या के मामलों में आरोपित फैज़लुर से तब कारोबारी काँपा करते थे। वो 90 के दशक में और 2000 की शुरुआत में सक्रिय था। हालाँकि, अब वो जेल में बैठ कर विभिन्न थानों में कई मामलों का सामना कर रहा है।

हाल ही में रवीश कुमार ने दावा किया था कि भारत सरकार ने अडानी को फायदा पहुँचाने के लिए कृषि कानून बनने से ठीक पहले ही अन्न भण्डारण करने के साइलोस गोदाम बना लिए थे। तीसरे फार्म बिल को सितंबर 22, 2020 को मंजूरी दे दी गई जबकि रवीश कुमार के दावे के विपरीत अडानी समूह वर्ष 2007 से ही साइलोस तैयार करता आ रहा है। कृषि सुधार बिलों के खिलाफ किसान विरोध प्रदर्शनों में नाम उछाले जाने के बाद खुद अडानी समूह ने कहा है कि वो न तो किसानों से खाद्यान्न खरीदता है और न ही खाद्यान्न का मूल्य तय करता है।

CPI के अखबार का दावा- किसानों के समर्थन में सेना के 25,000 सैनिकों ने लौटाए अपने शौर्य चक्र: Fact Check

वामपंथियों द्वारा किसान आंदोलन को हाईजैक किए जाने की बातें सामने आने के बाद अब खबर आई है कि वामपंथियों का मीडिया समूह सैनिकों का नाम लेकर झूठ फैला रहा है। दावा किया जा रहा है कि किसान आंदोलन के समर्थन में 25000 सैनिकों ने अपने शौर्य चक्र मेडल वापस कर दिए हैं। जबकि हकीकत ये है कि अभी तक इतने सैनिकों को शौर्य चक्र से सम्मानित ही नहीं किया गया।

पीआईबी फैक्ट चेक के अनुसार, प्रजाशक्ति नाम के अखबार में यह दावा किया गया है। इस अखबार की एक खबर में लिखा है कि 25,000 भारतीय सैनिकों ने किसान आंदोलन के समर्थन में अपने शौर्य चक्र को वापस किया। अब इसी दावे का फैक्ट चेक करते हुए पीआईबी ने इसे फर्जी घोषित किया है।

अपने ट्वीट में पीआईबी ने कहा, “प्रजाशक्ति अखबार का दावा है कि किसानों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए  25000 सैनिकों ने शौर्य चक्र लौटाए।  लेकिन यह खबर फर्जी है। 1956 से 2019 तक में केवल 2048 शौर्य चक्र दिए गए हैं।”

बता दें कि प्रजाशक्ति अखबार कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शुरू किया गया तेलुगु अखबार है। इसकी स्थापना 1981 में हुई थी। विकिपीडिया के मुताबिक कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की ओर से यह प्रकाशित होता है और इसका स्वामित्व भी मार्क्सवादी पार्टी पर है।

ऐसी फर्जी जानकारी पर प्रोपगेंडा का भंडाफोड़ होने के बाद लोगों का कहना है कि आखिर प्रजाशक्ति जैसे अखबार झूठी खबर बिना तथ्य जाँजे क्यों प्रकाशित करते हैं। आखिर इनके ऊपर कार्रवाई कब होगी?

विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी

बता दें कि इससे पहले सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार को नकारात्मक दिखाने के लिए एक वीडियो में कहा गया था कि दिल्ली में किसानों के प्रदर्शन को देखते हुए, सेना को बुलाया गया है। हालाँकि एजेंसी ने इस झूठ की भी पोल खोली थी और बताया था कि दावा गलत है। यह सैनिकों की नियमित आवाजाही का एक वीडियो था और किसान प्रदर्शन के साथ इसका कोई भी सम्बन्ध दुर्भावनापूर्ण और गलत है।

सपा नेता इंतजार ने भाई रिजवान के साथ मिलकर किया इंटरनेशनल खिलाड़ी का रेप, जानिए कैसे करता रहा ब्लैकमेल

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एक अंतरराष्ट्रीय महिला खिलाड़ी के साथ रेप का मामला उजागर हुआ है। महिला ने अपनी शिकायत में अपने रिश्तेदार मोहम्मद जकी, समाजवादी नेता इंतजार त्यागी और उसके भाई रिजवान त्यागी पर रेप का इल्जाम लगाया है। लड़की का कहना है कि रिश्ते में फूफा लगने वाले जकी ने गाँव के पूर्व प्रधान इंतजार और उसके भाई रिजवान के साथ मिलकर उसका रेप किया

सॉफ्टबॉल खेलने वाली खिलाड़ी ने बताया कि 6 साल पहले वह अपना जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए ग्राम प्रधान इंतजार त्यागी के पास गई थी। उस दौरान खिलाड़ी से उसके सारे डॉक्यूमेंट्स लेकर रख लिए गए और बाद में आने को कहा गया। जब वह दोबारा सर्टिफिकेट लेने गई, तब बंदूक की नोक पर सपा नेता और उसके साथियों द्वारा उसका बलात्कार किया गया। इस बीच उसकी अश्लील तस्वीरें भी खींची गईं

पीड़िता कहती हैं कि इस घटना के बाद से उसकी तस्वीरें वायरल करने की धमकी दे देकर कई बार उसका शारीरिक शोषण हो चुका है। लेकिन अब वह इन सबसे तंग आ गई है। उसने एसएसपी से न्याय की गुहार लगाई है, जिसके बाद समाजवादी नेता इंतजार त्यागी सहित चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट्स की मानें तो एसएसपी के आदेश के बाद सिविल लाइन्स पुलिस ने महिला की शिकायत पर आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 जैसी गम्भीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। साथ ही, एक पुलिस टीम तैयार की गई है जो आरोपितों को गिरफ्तार करेगी। पीड़िता ने बताया है कि उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई थी।

कुछ खबरों में सिविल लाइन सीओ राजेश द्विवेदी के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि शादी का झाँसा देकर लड़की के साथ रेप की वारदात को अंजाम दिया गया। अब सभी तथ्यों पर जाँच की जा रही है। मुकदमा दर्ज हो गया है। इनमें एक व्यक्ति पीड़िता के परिवार से भी है।

DakPay: भारतीय डाक ने लॉन्च की डिजिटल ऐप, जानिए इसके बारे में

भारतीय डाक विभाग और इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक्स (IPPB) ने एक नया डिजिटिल पेमेंट ऐप डाकपे (DakPay) लॉन्च किया है। इस ऐप की लॉन्चिंग वर्चुअली की गई, जिसमें दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद भी मौजूद थे। इस इवेंट में रविशंकर प्रसाद ने COVID-19 के खिलाफ लड़ाई के दौरान इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक के प्रयासों की भी सराहना की।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्वीट करके कहा कि इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक ने अपने लॉन्च के 2 साल से भी कम समय में 3 करोड़ अकाउंट का आँकड़ा पार कर लिया है। इसके लिए उन्होंने इंडिया पोस्ट ऑफिस की पूरी टीम को बधाई भी दी है। ऐप लॉन्च करते हुए संचार मंत्रालय ने कहा कि डिजिटल वित्तीय समावेश को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए इस ऐप को लॉन्च किया गया है।

उल्लेखनीय है कि DakPay सिर्फ एक डिजिटल पेमेंट ऐप नहीं है बल्कि इसके जरिए उपभोक्ताओं को संबंधित बैंक और डाक की अन्य सेवाएँ भी मिलेंगी। डाकपे ऐप (DakPay) में भी डिजिटल पेमेंट के लिए QR कोड स्कैन करने की सुविधा है।

यह ऐप बायोमैट्रिक के जरिए कैशलेस इकोसिस्टम तैयार करने में भी मदद करेगी। इससे किसी भी बैंक के ग्राहकों को इंटर-ऑपरेबल बैंकिंग सर्विसेज मिलेंगी और वो बिल पेमेंट भी कर सकेंगे।

DakPay ऐप को गूगल प्ले-स्टोर से मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है। डाउनलोड करने के बाद नाम, मोबाइल नंबर और पिन कोड के साथ ऐप में प्रोफाइल बनानी होगी। इसके बाद अपने बैंक अकाउंट को ऐप से लिंक कर सकते हैं। ऐप में यूपीआई ऐप की तरह चार अंकों का एक पिन बनाना होगा। इस ऐप से किराना स्टोर से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह पेमेंट किया जा सकेगा।

इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक

इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (IPPB) की स्थापना डाक विभाग के तहत की गई है। IPPB को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सितंबर 01, 2018 को लॉन्च किया गया था। बैंक की स्थापना भारत में आम आदमी के लिए सबसे सुलभ, सस्ती और विश्वसनीय बैंक बनाने के लिए की गई है।

 

कोई दूध लेने का कॉन्ट्रैक्ट करता है, तो क्या भैंस लेकर चला जाता है, भ्रम फैलाने वालों को परास्त करेगी जनता: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) को गुजरात के कच्छ पहुँचे। यहाँ उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क (World’s Largest Renewable Energy Park) का शिलान्यास किया। कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने किसान आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग राजनीति कर रहे हैं और किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं। मगर उन्हें देश का किसान परास्त करके रहेगा।

पीएम मोदी ने कहा कि दिल्ली के आसपास आजकल किसानों को डराने की साजिश चल रही है। उन्होंने कहा, “अगर कोई आपसे दूध लेने का कॉन्ट्रैक्ट करता है, तो क्या भैंस लेकर चला जाता है? जैसी आजादी पशुपालकों को मिल रही है, वैसी ही आजादी हम किसानों को दे रहे हैं। कई वर्ष से किसान संगठन इसकी माँग करते थे, विपक्ष आज किसानों को गुमराह कर रहा है लेकिन अपनी सरकार के वक्त ऐसी ही बातें करता था।”

‘किसानों को भ्रमित कर रहा विपक्ष’

पीएम ने कहा कि यही लोग इस कानून की माँग कर रहे थे। आज विपक्ष में बैठकर किसानों को भ्रमित कर रहे हैं। सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया है ताकि किसानों की आय बढ़े, समस्याएँ कम हों। इस ईमानदार नियम, ईमानदार प्रयास को देश के हर कोने के किसान ने आशीर्वाद दिया है। आशीर्वाद की ताकत, भ्रम फैलाने वालों, राजनीति करने वालों, किसानों के कंधे पर बंदूक रखने वालों को देश के किसान परास्त करके रहेंगे।

‘किसानों की समस्या हल करना सर्वोच्च प्राथमिकता’

पीएम ने कहा, “मैं अपने किसान भाइयों से फिर कह रहा हूँ, बार-बार कह रहा हूँ कि उनकी हर समस्या के समाधान के लिए सरकार 24 घंटे तैयार है। किसानों का हित पहले दिन से सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

परियोजना पर बोलते हुए पीएम ने कहा कि इसका बहुत बड़ा लाभ यहाँ के आदिवासी भाई-बहनों, यहाँ के किसानों-पशुपालकों, सामान्य जनों को होगा। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के बाद 5 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड रोकने में मदद होगी। यह 9 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा।

पीएम मोदी ने कहा कि इस परियोजना से कच्छ के युवाओं को बड़ा फायदा होगा क्योंकि इससे 1 लाख रोजगार उत्पन्न होगा। गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने सौर्य ऊर्ज को लेकर सबसे पहले नीतियाँ बनाईं और बढ़ावा दिया।

‘कच्छ की विकास यात्रा में होंगे नए आयाम’

पीएम ने कहा कि कच्छ ने न्यू एज टेक्नोलॉजी और न्यू एज इकोनॉमी, दोनों ही दिशा में बहुत बड़ा कदम उठाया है। चाहे वो खावड़ा का नवीकरणीय ऊर्जा पार्क हो, मांडवी का डिसलाइनेशन प्लांट और अंजार में सरहद डेहरी ऑटोमैटिक प्लांट का शिलान्यास, तीनों ही कच्छ की विकास यात्रा में नए आयाम लिखेंगे।

यह है परियोजना

खावड़ा में विश्व के सबसे बड़े मिश्रित नवीन ऊर्जा पार्क और अरब सागर तट के पास मांडवी में खारे पानी को इस्तेमाल योग्य बनाने वाले एक संयंत्र का डिजिटल तरीके से शिलान्यास किया गया। 30 हजार मेगावाट का मिश्रित नवीन ऊर्जा पार्क में सौर पैनल और पवनचक्की की मदद से ऊर्जा पैदा की जाएगी।

दो साल में पूरा होगा काम

अक्षय ऊर्जा पार्क 72,600 हेक्टेयर में फैला होगा, और इसमें पवन और सौर ऊर्जा भंडारण के लिए समर्पित जोन और साथ ही सोलर एनर्जी स्टोरेज और वाइंड पार्क गतिविधि के लिए एक विशेष जोन होगा। इस प्रॉजेक्ट के लिए गुजरात सरकार ने सितंबर 2020 में अपनी मंजूरी दी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रॉजेक्ट को पूरा करने में दो साल का समय लगेगा। भारत-पाकिस्तान की सीमा पर बंजर जमीन पर बन रहे इस पार्क में सोलर और विंड एनर्जी प्रॉजेक्ट के लिए कई कंपनियों को जमीन आवंटित किया जा चुका है।

इन कंपनियों को जमीन आवंटित

राज्य सरकार ने जिन कंपनियों को प्रॉजेक्ट के लिए जमीन अलॉट की है उनमें अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, सर्जन रियलिटीज लिमिटेड, एनटीपीसी लिमिटेड, गुजरात स्टेट इलेक्ट्रिसिटी कॉर्पोरेशन और गुजरात इंडस्ट्रीज पावर कंपनी लिमिटेड प्रमुख हैं।

‘सत्याग्रह क्षणिक उत्साह नहीं, अनुशासन से होता है’: जब बारदोली में किसान आंदोलन का नेतृत्व कर ‘सरदार’ बने वल्लभभाई पटेल

आज जब पूरे भारत में ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है, हमें ज़रूरत है इतिहास के ऐसे किसान नेताओं को याद करने की, जिन्होंने सचमुच में किसानों के भले के लिए खुद आगे आकर नेतृत्व किया। मोतिहारी के राजकुमार शुक्ल लगातार गाँधीजी के पीछे पड़े रहे, जिससे उन्हें यहाँ आकर निलहे अंग्रेजों से चंपारण को मुक्ति दिलानी पड़ी। इसी तरह गुजरात के किसानों के लिए ‘बारदोली सत्याग्रह’ कर वल्लभभाई पटेल ‘सरदार’ बने।

आज इस ‘किसान आंदोलन’ का क्रेडिट लेने के लिए कॉन्ग्रेस, AAP और अकाली दल आपस में मारामारी कर रहे हैं। किसानों के संगठन आपस में सिर-फुटव्वल कर रहे हैं। वो बता नहीं पा रहे कि किसान हित में लाए गए तीनों कृषि कानूनों में समस्या क्या है। जबकि सरकार ने इसके कई फायदे गिना दिए हैं। खालिस्तानी नारे लग रहे, दिल्ली और भीमा-कोरेगाँव दंगों के आरोपितों का समर्थन हो रहा। सब कुछ किसानों के नाम पर।

इसीलिए, आज हम आपको ‘बारदोली आंदोलन’ की याद दिला रहे हैं। गुजरात के इस आंदोलन को महात्मा गाँधी का भी आशीर्वाद प्राप्त था। हम आगे बात करेंगे कि कैसे ये आंदोलन आज के किसान नेताओं के लिए मिसाल होना चाहिए और किस तरह आज़ाद भारत के इन नेताओं को अंग्रेजों के जुल्मोसितम के बीच हुए इस सत्याग्रह को याद करना चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि आज इन नेताओं के बीच न कोई ‘सरदार’ है, न कोई चौधरी चरण सिंह।

आज की इस अराजकता को कुछ पल भूल कर चलते हैं 1921 में, जब गुजरात में दुर्भिक्ष के कारण किसानों की स्थिति खासी बुरी हो गई थी। खेत सूखे पड़े हुए थे और उत्पादन 20% भी मुश्किल से हो पाया था। अंग्रेजों के अधिकारी उत्पादन के आँकड़ों में हेराफेरी करते रहते थे। आखिर उन्हें ज्यादा लगान की वसूली दिखा कर अपने आकाओं को खुश जो करना था! 3 वर्ष पहले ही खेड़ा में सत्याग्रह हुआ था, उससे ज़रूर किसानों को कुछ हिम्मत मिली थी।

1921 के सूखाग्रस्त वर्ष में सूरत स्थित बारदोली तहसील के किसान लगान भरने में सक्षम नहीं हो पाए थे। अंग्रेजों ने इसे एक ऐसी गुस्ताखी माना, जिसकी ‘सजा’ देने के लिए वो अंदर ही अंदर कुलबुला रहे थे। हालाँकि, तब वो किसानों से कुछ नहीं कह पाए थे। अंग्रेजों की याद्दाश्त देखिए कि 1921 में जो हुआ, उस एक तहसील के किसानों की ये ‘गलती (उनकी नजर में)’ उन्हें 1928 में भी याद थी।

तभी 1928 में लगान को अचानक से 66% बढ़ा दिया गया। बारदोली के किसान मेहनती थे। उन्होंने अपनी लगन और मेहनत से अपनी समृद्धि का रास्ता तय किया गया। भारत माँ की वो जमीन भी खासी उर्वरा थी। वहाँ के कई किसान अफ्रीका भी गए थे, जहाँ से पूँजी लेकर लौटे थे। उनकी काश्तकारी की भी मिसाल दी जाती थी। ऐसे में अंग्रेजों द्वारा अचानक से लगान में इतनी ज्यादा वृद्धि किए जाने से उन्हें धक्का लगा।

ऐसे में इन किसानों ने अत्याचारी अंग्रेजों के सामूहिक प्रतिकार का निर्णय लेते हुए ऐलान किया कि वो लगान नहीं देंगे। महात्मा गाँधी को आंदोलन का नेता नहीं बनाया जा सकता था, क्योंकि वो पूरे देश के सफर में लगे रहते थे और कॉन्ग्रेस के कार्यों में भी व्यस्त रहते थे। ऐसे में आए आए वल्लभभाई पटेल, जिनके पास महात्मा गाँधी के साथ काम करने का अच्छा अनुभव था। किसानों जा जत्था सीधा अहमदाबाद पहुँचा।

वल्लभभाई पटेल के घर पर किसानों का हुजूम उमड़ पड़ा। इनमें कई गरीब किसान भी थे, जिन्होंने उनसे अपील की कि वो इस आंदोलन का नेतृत्व करें। वल्लभभाई पटेल एक सफल अधिवक्ता था। ऐसे में उन्हें पता था कि लोगों का उत्साह कभी भी ठंडा पड़ सकता है। इसीलिए, उन्होंने उन्हें वास्तविकता समझाई। गाँधीजी की पोती (उनके तीसरे बेटे रामदास गाँधी की बेटी) सुमित्रा कुलकर्णी के शब्दों में समझें तो:

“वल्लभभाई पटेल कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। ढाई दिन के उत्साह में बेवकूफ बनने वालों में वो नहीं थे। क्षणिक उत्साह वाले लोगों का क्या कहना! आज चाहा तब मूँछ नीची कर के जी-हुजूरी करेंगे और वल्लभभाई पटेल को होली की आग में नारियल के समान होम कर अलग हट जाएँगे। उन्होंने तुरंत सत्याग्रह की कठिनाइयों का वर्णन कर दिया। सत्याग्रह में चक्की पीसनी पड़ती है। जाति-धर्म और आचार-विचार के बंधन तोड़ने होते हैं। पाखाना सफाई तक करनी पड़ती है। असल में पटेल लोगों को वास्तविकता का भान करा समझाना चाहते थे कि सत्याग्रह गंभीर होता है, खिलवाड़ नहीं है। सभी को मर-मिटने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसीलिए, उन्होंने अपने शब्द कड़े किए।”

सभी किसानों ने कहा कि वो सत्याग्रह के नियमों का पालन करते हुए जान तक देने के लिए भी तैयार हैं। इस तरह से पटेल ने उन्हें अनुशासन भी सिखाया और अपने हक़ की लड़ाई में उनका नेता बनना भी स्वीकार किया। किसान बारदोली लौटे और एक सूची के साथ आए, जिसमें मर-मिटने का वादा करने वालों का नाम था। इसके बाद किसानों का वो जत्था साबरमती आश्रम पहुँचा। महात्मा गाँधी ने उन्हें सफलता की शुभकामनाएँ दी। तैयारियाँ शुरू हो गई।

यहाँ एक चीज देखिए। जहाँ एक तरफ पटेल ने किसानों को सत्याग्रह का महत्व समझा कर उन्हें देश की आज़ादी की बड़ी लड़ाई के लिए तैयार किया, वहीं दूसरी तरफ जिस तरह से किसान पूरे विचार-विमर्श के बाद ये सूची लेकर आए कि किस घर से किसे मर-मिटने के लिए भेजा जा सकता है – उनकी अपने नेता वल्लभभाई के प्रति श्रद्धा को दिखाता है। आज न कोई ऐसा अनुशासन सिखाने वाले नेता हैं, और न ऐसे संगठन।

आज जब ‘किसान आंदोलन’ में शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे दंगाइयों को छुड़ाने की माँग की जाती है और संगठन उसका समर्थन करता है, तब कोई किसान नेता इस पर आवाज़ नहीं उठाता। महिलाएँ मोदी की मौत की दुआ माँगती है, कोई खालिस्तानी इंदिरा गाँधी की हत्या की याद दिलाते हुए पीएम मोदी को धमकाता है और कोई ‘जय हिंद’ के नारे को नकार देता है – ऐसे दसियों उदाहरण हैं जो इन नेताओं की पोल खोलते हैं।

सरदार पटेल हवा-हवाई नेता नहीं थे। उन्होंने बारदोली आश्रम को ही अपना मुख्य केंद्र बनाया और वहीं से आंदोलन का संचालन शुरू कर दिया। उस ‘स्वराज आश्रम’ में 1922 से कताई-बुनाई का कार्य होता था और उसका नाम ‘स्वराज आश्रम’ रखा गया था, जो एक सुंदर वाटिका की तरह था। रामदास गाँधी इस आश्रम के व्यवस्थापक हुआ करते थे। सत्याग्रह के दौरान 6 महीनों तक पटेल वहीं रहे। उनकी बेटी भी इस दौरान उनके साथ रहीं।

गाँधीजी ने भी महादेव देसाई को अपना प्रतिनिधि बना कर यहाँ भेजा। बारदोली तहसील के एक-एक स्त्री-पुरुष, बच्चे वहाँ पहुँचे। सभी पटेल को देखना चाहते थे। हजारों लोगों ने कुछ इस तरह से अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह का ऐलान किया, जैसे उन्हें मृत्यु का भय ही नहीं हो। लोग ऐसे चले, जैसे ख़ुशी से बरात जा रहे हों। उन्होंने लगान न भरने और अंग्रेजों का अहिंसक प्रतिकार करने का निर्णय लिया। कबीरदास का ये भजन उनका सम्बल बना, जिसे वो दोहराते चलते थे:

सूर संग्राम को देखि भागै नहीं, देखि भागै सोई सूर नाहीं।
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना, मँड़ा घमसान तहँ खेत माहीं॥१॥
सील औ साँच संतोष साही भये, नाम समसेर तहँ खूब बाजै।
कहत कबीर कोइ जूझिहैं सूरमा, कायराँ भीड़ तहँ तुरत भाजै॥२॥

बारदोली का नाम हो गया। गुजरात के समाचारपत्रों में वहाँ के सत्याग्रह की खबरें छपने लगीं और फिर पूरे देश में भी लोगों की नजरें इस पर आकर ठहर गईं। अलग-अलग क्षेत्रों के किसान जो परेशान थे, आशा भरी निगाहों से इस आंदोलन की सफलता की कामना करने लगे, क्योंकि इससे उन्हें भी उत्साह मिलता। सौराष्ट्र के लोकप्रिय कवि फूलचंद दास भी अपनी भजन मंडली के साथ आए और उन्होंने जन-जागरण में पूरा साथ दिया।

कुल 300 स्वयंसेवक पटेल कि सहायता के लिए बारडोली पहुँचे थे। हर गाँव में ऐसे कर्मठ लोगों को लगाया गया, ताकि सभी को इस आंदोलन से जोड़ा जा सके। पटेल ने कई कैंप बनाए। तब बारडोली के 130 गाँवों में 86,000 के आसपास लोग रहा करते थे। सरदार ने इस सत्याग्रह का सुचारु रूप से संचालन किया और कुछ अनुभवी सत्याग्रहियों को इस काम में लगाया। इसके बाद अंग्रेजों का दमन चक्र भी शुरू हुआ।

गुजरात में ‘महाराज’ के नाम से जाने जाने वाले कर्मठ कर्मयोगी रविशंकर को गिरफ्तार कर लिया गया, जिन्हें सम्पूर्ण आंदोलनकारी कहा जाता था। महात्मा गाँधी तक ने भी कहा कि इस आंदोलन की शुरुआत में ही उनके जैसे ‘श्रेष्ठ ब्राह्मण’ को गिरफ्तार किया गया है, सफलता जरूर मिलेगी। किसी का घर सील कर दिया गया, किसी को नजरबंद किया गया, किसी को जेल में डाल दिया गया। अब राष्ट्रीय नेताओं के संदेश भी आने लगे थे।

इन सबकी पूरी डिटेल एक ‘सत्याग्रह-विवरण’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित किया जाता था। मात्र 1 घंटे में इसकी 10,000 प्रतियाँ समाप्त हो जाया करती थीं। ऊपर से पटेल के भाषण ऐसे होते थे, जिन्हें सुन कर लोगों को हिम्मत मिलती थी। अंग्रेजों ने किसानों से अपनी जेलें भर दीं। घर तो दूर की बात, उनके खेत और जानवर तक जब्त किए जाने लगे। कई किसानों की पिटाई हुई। महिलाओं को भी प्रताड़ित किया गया।

जनता झुकी नहीं। रामदास गाँधी को भी मार-मार कर जेल भेज दिया गया। अंत में अंग्रेजों को कोई रास्ता न सूझा तो बंबई के गवर्नर का आदेश आया कि वल्लभभाई पटेल को गिरफ्तार कर लिया जाए। गाँधीजी को जैसे ही इसकी सूचना मिली, उन्होंने तार भेजा कि जहाँ जैसी जरूरत पड़े, वो आने को तैयार हैं। पटेल ने उन्हें जवाब भेजा कि आप आ सकते हैं। गाँधीजी बारदोली पहुँच गए और अंग्रेजों की मुश्किलें और बढ़ गईं।

अंग्रेजों को लगने लगा था कि अब और सत्याग्रहियों को जेल में डालने से ये और भी उग्र हो जाएगा। उन्होंने पटेल को वार्ता के लिए बुलाया। किसानों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की गई। ऐसी लगान की व्यवस्था की गई, जो दोनों पक्षों की सहमति से हो। महिलाओं ने इस आंदोलन का सफलतापूर्वक संचालन करने वाले वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा। देश भर के किसानों के बीच उत्साह का संचार हुआ।

संत विनोबा भावे की मानें तो सरदार पटेल के दो कार्यों ने उन्हें अमर बनाया, एक तो बारदोली सत्याग्रह और एक खंड-खंड में बँटे रियासतों को एक करने का। आंध्र के पट्टाभि सीतारमैया ने इसकी तुलना ‘इजराइलियों का मिस्र से बहिर्गमन’ से किया। सरदार पटेल ने आंदोलन शरू होने से पहले शांतिपूर्ण समाधान के लिए बम्बई के गवर्नर को पत्र लिख कर इस लगान व्यवस्था को दोषपूर्ण, हानिकारक और आपत्तिजनक बताया था।

जब कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तभी उन्होंने आंदोलन में कदम रखा। उन्होंने बारदोली की जनता से कह दिया था कि अगर वो पीछे हटे तो पूरे देश की नाक नीची हो जाएगी, वहीं वो जीते तो संसार भर में देश का मस्तक ऊँचा हो जाएगा। उन्होंने अंग्रेजों की टॉप और बंदूकों के बदले सत्य और दुःख सहने की शक्ति को अपना हथियार बताया। उनका कहना था कि जालिम सत्ता भी एकता से प्रतिकार करने वाली प्रजा के सामने नहीं टिक सकती है।

उन्होंने एक संगठन बना कर अनुशासित तरीके से आंदोलन का संचालन किया। उन्हें पता था कि जनता को तोड़ कर एकता भंग करने का प्रयास किया जाएगा। जब पटेल पर ‘बाहरी व्यक्ति’ होने का आरोप लगाया गया तो उन्होंने अंग्रेजों से पूछा कि इस देश का खून चूसने वाली इस सत्ता में कहाँ के लोग भरे पड़े हैं? मुस्लिमों और पठानों को बरगला कर अंग्रेजों ने फूट डालने की कोशिश की। सरदार पटेल ने सत्ता की तुलना मदोन्मत हाथी से करते हुए एक भाषण में बताया कि मच्छर जब उसके कान में घुसेगा तो वो सूँड पटक कर लोटने लगता है।

इन किसान संगठनों को सरदार वल्लभभाई पटेल के बारदोली सत्याग्रह से सीखना चाहिए कि आंदोलन कैसे होता है। आंदोलन में देश के प्रति श्रद्धा की भावना रखी जाती है, ‘जय हिंद’ को नकारा नहीं जाता। जनता को परेशान नहीं किया जाता है, उसे साथ लिया जाता है। क्रूरतम सत्ता भी जब झुके तो उससे बातचीत की जाती है, ताकि अपने लोग सुरक्षित रहें। यहाँ तो लोकतंत्र है और कृषि कानून भी किसानों के भले के लिए बने हैं।

Source: (Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : By Sumitra Gandhi Kulkarni)
(सरदार वल्लभभाई पटेल, व्यक्ति एवं विचार: By NC मेहरोत्रा And डॉ रंजना कपूर)

प्रणब मुखर्जी की किताब The Presidential Memoirs में ऐसा क्या है? बेटा चाहता है न छपे, बेटी कह रहीं – छपने दो

दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने उनके संस्मरण ‘The Presidential Memoirs’ के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताई है और इस पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाने की माँग की है। मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) को उन्होंने पब्लिकेशन हाउस को टैग कर एक साथ कई ट्वीट करके इस किताब को पहले पढ़ने का आग्रह किया और फिर ही इसे प्रकाशित किए जाने की माँग की।

हालाँकि प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने भाई से बेवजह की बाधा उत्पन्न नहीं करने का अनुरोध किया है। संस्मरण को प्रकाशित करने को लेकर भाई-बहन में विरोधाभास की स्थिति हो गई है।

अभिजीत ने कहा कि जारी किए गए अंश ‘मोटिवेटिड’ थे और पूर्व राष्ट्रपति ने इनके लिए मंजूरी नहीं दी होगी। उन्होंने पब्लिकेशन ग्रुप रूपा बुक्स से इस किताब के प्रकाशन को रोकने के लिए कहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में माँग की है कि चूँकि वो संस्मरण के लेखक (प्रणब मुखर्जी) के पुत्र हैं, ऐसे में इसे प्रकाशित किए जाने से पहले वो एक बार किताब की सामग्री को देखना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि किताब को प्रकाशित करने के लिए उनकी लिखित अनुमति ली जाए।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक का पुत्र, आपसे आग्रह करता हूँ कि संस्मरण का प्रकाशन रोक दिया जाए, और उन हिस्सों का भी, जो पहले ही चुनिंदा मीडिया प्लेटफॉर्मों पर मेरी लिखित अनुमति के बिना घूम रहे हैं। चूँकि मेरे पिता अब नहीं रहे हैं, तो मैं उनका पुत्र होने के नाते पुस्तक के प्रकाशन से पहले उसकी फाइनल प्रति की सामग्री को पढ़ना चाहता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि यदि मेरे पिता जीवित होते, तो उन्होंने भी यही किया होता।”

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “इसलिए, उनका पुत्र होने के नाते मैं आपसे मेरी लिखित अनुमति के बिना इसका प्रकाशन तुरंत रोकने का अनुरोध करता हूँ, जब तक मैं इसकी सामग्री को पढ़ न लूँ। इस संदर्भ में मैंने एक विस्तृत पत्र आपको प्रेषित किया है, जो जल्द ही आपको मिल जाएगा।”

वहीं शर्मिष्ठा ने अपने भाई की बात पर आपत्ति जताते हुए कहा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक की पुत्री अपने भाई अभिजीत मुखर्जी से आग्रह करती हूँ कि वो हमारे पिता द्वारा लिखी गई आखिरी किताब के प्रकाशन में बेवजह की बाधा उत्पन्न न करें। उन्होंने बीमार पड़ने से पहले पांडुलिपि को पूरा कर लिया था।”

शर्मिष्ठा ने आगे लिखा, “अंतिम ड्राफ्ट में मेरे पिता के हाथ से लिखे नोट्स और टिप्पणियाँ हैं, जिनका सख्ती से पालन किया गया है। उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को भी किसी सस्ते प्रचार के लिए प्रकाशित होने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह हमारे दिवंगत पिता के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।”

साथ ही उन्होंने एक अन्य ट्वीट में यह भी बताया कि किताब का टाइटल ‘The Presidential Years’ है, न कि ‘The Presidential Memoirs’।

बता दें कि प्रणब मुखर्जी के संस्मरणों की यह किताब जनवरी, 2021 में प्रकाशित हो रही है। उनकी किताब के कुछ अंश पिछले हफ्ते जारी किए गए थे, जिसमें सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह की क्षमता पर सवाल उठाए जाने का जिक्र था। इसे लेकर एक बार फिर सोनिया की क्षमता और मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर हमले शुरू हो गए थे। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने इन अंशों पर बिना किताब पढ़े कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया था, लेकिन अब उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी ने किताब को प्रकाशित किए जाने से पहले पढ़ने की माँग की है।

प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में लिखा है, “कॉन्ग्रेस के कुछ सदस्यों की सोच थी कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बना होता तो 2014 में पार्टी को जो पराजय देखनी पड़ी, उसे टाला जा सकता था। यद्यपि मैं इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखता। लेकिन, मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि 2012 में मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के आलाकमान ने राजनीतिक फोकस खो दिया।” 

भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने 2018 में संघ के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। ‘संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय’ नामक यह कार्यक्रम 7 जून 2018 को नागपुर के संघ मुख्यालय में हुआ था। प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को भी असहज कर दिया था। इसको लेकर कॉन्ग्रेस से मतभेद भी हुआ, लेकिन उस दिन देश के प्राचीन इतिहास से लेकर उसकी संस्कृति तक प्रणब मुखर्जी ने जो कुछ कहा, वह बीते कल में भी प्रासंगिक था और आने वाले कल में भी प्रासंगिक रहेगा।  

बता दें कि जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया तो इस मोके पर गाँधी परिवार से किसी सदस्य ने हिस्सा नहीं लिया। इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी दिखाई नहीं दिए। राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस समारोह में नहीं दिखाई दिए। वहीं राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह मौजूद थे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रणब मुखर्जी को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से सम्मानित किया।