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रेप के दोषियों को बना दिया जाएगा नामर्द: पाकिस्तान में नया कानून, कोर्ट की सुनवाई सिर्फ 4 महीने में करनी होगी पूरी

पाकिस्तान में रेप जैसे अपराध से निपटने के लिए एक नया कानून लाया गया है। इस कानून के तहत रेप के दोषी को नपुंसक बनाने का प्रावधान किया गया है। पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी ने इस कानून को मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) को मंजूरी दी। रेप विरोधी अध्यादेश 2020 (Anti-Rape Ordinance 2020) पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर किए जाने के बाद कहा गया कि इसके लिए पाकिस्तान में स्पेशल कोर्ट बनाए जाएँगे।

इससे पहले इस कानून को पाकिस्तान कैबिनेट की मंजूरी मिली थी। नए कानून में दोषियों को या लगातार यौन अपराध करने वालों को दवाई देकर नपुंसक बनाने का प्रावधान किया गया है। यह कार्य नोटिफाइड बोर्ड के मार्गदर्शन में होगा।

कानून के अंतर्गत एंटी रेप सेल को घटना की रिपोर्ट होने के 6 घंटे के भीतर पीड़िता की जाँच करवानी होगी और आरोपितों को पीड़िता से बातचीत करने की अनुमति नहीं दी जाएगी। पीड़िता से बात सिर्फ न्यायाधीश और आरोपित की ओर से पेश होने वाले वकील ही कर पाएँगे।

इसके अनुसार, नेशनल डेटाबेस एंड रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी (NADRA) के जरिए यौन अपराधियों की देश भर में लिस्ट तैयार की जाएगी। पुलिसकर्मियों या सरकारी अधिकारियों ने किसी मामले की जाँच में लापरवाही बरती तो उन्हें तीन साल की जेल होने का भी प्रावधान इस नए कानून में किया गया है। इसके अलावा लापरवाही करने पर उन पर जुर्माना भी लग सकता है। जाँच से संबधी झूठ बोलने पर दंड देने की बात भी कही गई है।

इस कानून के तहत पाकिस्तान में विशेष अदालतों का गठन होगा और महिलाओं व बच्चों के ख़िलाफ़ दुष्कर्म संबंधी मामलों पर त्वरित कार्रवाई भी होगी, जिसके कारण अदालत की सुनवाई 4 महीने में पूरी हो जाएगी।

राष्ट्रपति भवन की ओर से जारी बयान के अनुसार पीड़ितों की पहचान का खुलासा नहीं किया जाएगा और खुलासा एक दंडनीय अपराध होगा। इमरान खान सरकार की ओर से इन सबके लिए फंड बनाया जाएगा और इसके पैसों का इस्तेमाल करके स्पेशल कोर्ट का गठन होगा। इस काम के लिए संघीय व प्रांतीय सरकारों की ओर से भी फंड जारी किया जाएगा। इसके अतिरिक्त इस काम में गैर-सरकारी संगठनों, आम लोगों के साथ लोकल, नेशनल और इंटरनेशनल एजेंसियों से भी मदद ली जाएगी।

उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान में यह कानून मोटर-वे गैंगरेप के कुछ महीने बाद लाया गया है। इस घटना के बाद से लगातार रेप घटनाओं के ख़िलाफ़ कदम उठाने की माँग सरकार से की जा रही थी। बता दें कि गत सितंबर में कुछ लोगों ने बच्चों के साथ जा रही एक विदेशी महिला की कार हाईवे पर खराब होने के बाद उसका गैंगरेप किया था। इसके अलावा सिंध के काशमोर जिले में महिला और उसकी नाबालिग बेटी के साथ रेप की घटना के बाद प्रधानमंत्री इमरान खान ने नवंबर में घोषणा की थी कि उनकी सरकार एंटी रेप ऑर्डिनेंस लाएगी।

‘मैं पहले भारतीय हूँ, फिर बंगाली’: शुभेंदु अधिकारी ने TMC को चेताया, समर्थकों ने चालू की दफ्तरों की भगवा पुताई

जहाँ भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष मुकुल रॉय ने कह दिया है कि पश्चिम बंगाल के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी शनिवार (दिसंबर 19, 2020) को पार्टी में शामिल होने वाले हैं, वहीं दूसरी तरफ समर्थकों के व्यवहार से भी लग रहा है कि वो भाजपा कैडर बनने के लिए तैयार हैं। शुभेंदु अधिकारी के दफ्तरों को, जहाँ से पहले तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का कामकाज देखा जाता था, अब उन्हें समर्थकों द्वारा भगवा रंग से रंगा जाना शुरू कर दिया गया है।

कुछ ही सप्ताह पहले तक ममता बनर्जी की सरकार में परिवहन, सिंचाई और जल मंत्रालय संभालने वाले शुभेंदु अधिकारी ने हुगली रिवर ब्रिज कमिशन के अध्यक्ष पद से भी इस्तीफा देकर TMC सरकार से नाता तोड़ लिया था। अब उन्होंने कहा है कि वो सबसे पहले एक भारतीय हैं, उसके बाद बंगाली। उन्होंने TMC द्वारा भाजपा नेताओं को बाहरी बताए जाने पर जवाब देते हुए कहा कि बंगाल सहित अन्य राज्य भी इसी देश का हिस्सा हैं।

उन्होंने कहा कि TMC में चंद लोगों को संगठन से भी ज्यादा भाव दिया जाता है। पूर्वी मेदिनीपुर के हल्दिया में स्वतंत्रता सेनानी सतीश चंद्र समांता के जयंती समरोह में जनता को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा कि पश्चिम बंगाल पूरी तरह भारत का ही हिस्सा है और अन्य राज्यों से आने वाले लोगों को बाहरी नहीं कहा जा सकता। उन्होंने कहा कि न तो तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू ने सतीश चंद्र को नॉन-हिंदीभाषी सांसद के रूप में ब्रांडिंग की, न ही सतीश चंद्र ने नेहरू को बाहरी बताया।

बंगाल इंजीनियरिंग कॉलेज की शिक्षा बीच में ही छोड़ कर स्वतंत्रता संग्राम में कूदे सतीश चंद्र ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान ‘ताम्रलिप्ता राष्ट्रीय सरकार’ के गठन में बड़ी भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता के बाद वो 3 दशकों तक सांसद रहे। शुभेंदु अधिकारी ने पूछा कि पश्चिम बंगाल में आखिर ‘पार्टी का, पार्टी के लिए और पार्टी द्वारा’ वाला शासन क्यों चल रहा है? उन्होंने याद दिलाया कि ये लोकतंत्र है और यहाँ पार्टी की जगह जनता होनी चाहिए।

उन्होंने कहा, “मैं किसी भी पद का लालची नहीं हूँ। मैंने जीवन भर जनता के लिए काम किया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि मैंने पद की लालसा से ये सब किया है। 2021 विधानसभा चुनाव में जनता उन्हें करारा जवाब देगी। नंदीग्राम आंदोलन जनता का था। न तो कोई राजनीतिक दल, न ही किसी खास व्यक्ति को इसका फायदा लेने की कोशिश करनी चाहिए।” 49 वर्षीय नेता के इस रुख से तृणमूल खेमे में बेचैनी दिख रही है।

उधर पश्चिम बंगाल के 3 जिलों में प्रखंड स्तर पर स्थित शुभेंदु अधिकारी के दफ्तरों को उनके समर्थकों ने भगवा रंग से रंगना चालू कर दिया है। पहले इन्हीं दफ्तरों से तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) का कामकाज देखा जाता था। कुछ गाँवों में स्थित उनके दफ्तरों की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, जिन्हें भगवा रंग से रंगा हुआ देखा जा सकता है। ‘दादा का अनुयायी’ पोस्टर लहराते हुए समर्थकों ने मार्च भी निकाला।

उन्होंने एक और बड़ा दावा किया कि हाल के समय में उन पर 11 बार हमले किए गए, लेकिन वो ऐसा करने वालों को चेताना चाहते हैं कि उन्हें कोई रोक नहीं पाएगा। उन्होंने कहा, “मैं आलोचकों को बताना चाहता हूँ कि मेरे साथ जनता है, जिसका मेरे साथ कनेक्शन है। मेरा परिवार 7 लोगों का नहीं है, बंगाल के हर गाँव में पाँत-भात खाने वाला मेरा परिवार है। इंतजार कीजिए, जल्द ही बड़ी घोषणा करूँगा और अपना रुख साफ़ करूँगा।”

पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इसी सप्ताह के अंत में कोलकाता जाने वाले हैं। उधर तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने निर्णय लिया है कि अब वो शुभेंदु अधिकारी का और मान-मनव्वल नहीं करेगी, भले ही वो पार्टी छोड़ कर कहीं और चले जाएँ।

भाजपा में शामिल होने से पहले शुभेंदु अधिकारी दिल्ली भी जाने वाले हैं। उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा भी प्रदान किए जाने की चर्चा चल रही है। TMC ने उन्हें मनाने के लिए सांसद सौगात रॉय को लगाया था, लेकिन जिस तरह से उनसे बातचीत का व्हाट्सप्प चैट सार्वजनिक कर के मीडिया को दे दिया गया, उससे शुभेंदु खासे नाराज हुए।

कर्नाटक की iPhone फैक्ट्री में लूट: कौन हैं वो बाहरी 2000 लोग, जिन पर किया गया FIR, चीन ले रहा दिलचस्पी

भारत में आईफोन (iPhone) बनाने वाली कंपनी ‘Wistron Corporation’ की फैक्ट्री में शनिवार (दिसंबर 12, 2020) को जम कर हंगामा और तोड़फोड़ हुआ। कर्मचारियों और मजदूरों द्वारा हुए इस हंगामे के कारण कंपनी को 437.4 करोड़ रुपए की हानि हुई। इसमें वामपंथी ऐंगल भी सामने आ रहा है और चीन की इसमें दिलचस्पी लेने के कारण उसके हाथ से भी इनकार नहीं किया जा सकता। ये फैक्ट्री कर्नाटक के कोलार में स्थित है।

फैक्ट्री में अचानक से हंगामा और तोड़फोड़ शुरू कर दिया गया, जब सुबह के 6:30 बजे शिफ्ट चेंज किया जा रहा था। कई iPhone लूट लिए गए। पत्थरबाजी की गई, शीशे फोड़ डाले गए और फर्नीचर व गाड़ियों को जम कर नुकसान पहुँचाया गया। ऑफिस में रखे गई उपकरणों को नुकसान पहुँचाया गया। हालाँकि, कर्नाटक की सरकार ने स्पष्ट किया है कि वो कंपनी को जरूरी सुरक्षा मुहैरा कराएँगे। उप-मुख्यमंत्री सीएन अश्वनाथ नारायण ने स्थिति की समीक्षा की।

दरअसल, इस पूरे तोड़फोड़ का कारण कर्मचारियों को वेतन समय पर न देने को बताया गया और यही आरोप लगा कर ‘Wistron Corporation’ की फैक्ट्री में इस घटना को अंजाम दिया गया। ये कंपनी Apple की वैश्विक निर्माता कॉन्ट्रैक्टर्स में से एक है। ये iPhone 7 के साथ-साथ SE के सेकेण्ड जनरेशन के फोन्स का निर्माण करती है। इस तोड़फोड़ के दौरान 1.5 करोड़ रुपए के तो सिर्फ स्मार्टफोन्स ही लूट लिए गए।

इस मामले में कुल 7000 लोगों के खिलाफ कंपनी ने मामला दर्ज कराया है। इनमें से 5000 कंपनी में काम करते हैं और 2000 ऐसे हैं, जो बाहर से आए थे। 2021 के अंत तक कंपनी 25,000 लोगों को हायर करने वाली थी, लेकिन अब ऐसा होता हुआ नहीं दिख रहा है। फिलहाल उसके 12,000 कर्मचारी हैं, जिनमें से 2000 स्थायी हैं। Apple अपने कर्मचारियों को सुरक्षित माहौल और उचित सम्मान देने की बात करती है, इसीलिए उसने जाँच समिति गठित कर दी है।

इस पूरे मामले में वामपंथी एंगल भी सामने या रहा है। ‘ऑल इंडिया ट्रैड यूनियन कॉन्ग्रेस’ के सदस्य कृष्णा सिद्दी का कहना है कि ये मामला कई महीनों से चल रहा था और 3 शिफ्ट्स को 12-12 घंटे की दो शिफ्ट्स में बदल दिया गया था और कुछ घंटे ओवरटाइम भी हो जाते थे। उनका आरोप है कि कंपनी ओवरटाइम के रुपए नहीं दे रही थी और साथ ही उसने शिफ्ट की सैलरी भी घटा दी थी। ये संगठन CPI से ताल्लुक रखता है।

AITUC के महासचिव एमडी हरिगोविंद ने इस पूरी हिंसा को जायज ठहराते हुए कहा कि ‘Wistron Corporation’ ने मजदूरों का शोषण शुरू कर दिया था और उनके लिए एकदम बुरा माहौल बना दिया था, इसीलिए ये घटना हुई। उन्होंने राज्य की भाजपा सरकार पर आरोप लगाया कि उसने ही कंपनी को ऐसा करने की अनुमति दी थी। पिछले महीने बिदाई स्थित टोयोटा किर्लोस्कर फैक्ट्री में भी कुछ कर्मचारियों के दुर्व्यवहार के कारण उसे बंद किया गया था।

हालाँकि, लेबर कमिश्नर अकरम पाशा के बयान CPI से जुड़े संगठन के आरोपों की तस्दीक नहीं करते। उन्होंने आँकड़ों के हवाले से बताया कि कर्मचारियों को वेतन देने में कंपनी ने मात्र 4 दिनों की देरी की थी और नियमित रूप से उन्हें सैलरी दी जाती थी। इस मामले में अब तक 150 की गिरफ़्तारी हुई है। अब वेतन नियमित रूप से मिलने के बावजूद हिंसा क्यों हुई, लेबर कमिश्नर का कहना है कि इसकी जाँच पुलिस ही कर सकती है।

इस पूरे मामले में चीन जम कर दिलचस्पी ले रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ‘ग्लोबल टाइम्स’ की चीफ रिपोर्टर क्विंगकिंग चेन ने इस खबर पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि चीन में बाजार को सपोर्ट करने का एक स्थिर सिस्टम है, इसीलिए वहाँ से बाहर अपनी फैक्ट्रियों को ले जाने वाली कम्पनियाँ रिस्क उठा रही हैं। उन्होंने ‘Foxconn’ से पूछा कि क्या वो भी iPhone बनाने की फैक्ट्री भारत ले जाकर अब पछता रहा है?

हाल ही में कई कंपनियों ने अपने दफ्तर व फैक्ट्रियों को चीन से भारत स्थानांतरित करने का फैसला लिया है। ऊपर से भारत में कई चाइनीज एप्स प्रतिबंधित किए जाने से भी चीन को झटका लगा है। हाल ही में योगी कैबिनेट की बैठक में 4825 करोड़ रुपए की लागत वाले सैमसंग डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग यूनिट को मँजूरी दे दी गई, जो चीन से यहाँ आ रही है। अब OLED तकनीक से निर्मित होने वाले मोबाइल डिस्प्ले उत्पादों का निर्माण करने वाले दुनिया का तीसरा देश होगा।

बॉलीवुड का हीरो सलमान जाफरी पुलिस ऑफिसर की ड्रेस पहन ठगता था लोगों को: फिल्मी स्टाइल में करता था चोरी, हुआ अरेस्ट

मुंबई फिल्म और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री में एक आदमी काम करता है। नाम है सलमान, सलमान जाफरी (Salman jaffery)! शायद कभी पुलिस वाले का रोल भी किया हो! लेकिन रील लाइफ से निकल कर रियल लाइफ में वो पुलिस वाला बन गया और लोगों से ठगी करने लगा।

मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने 40 साल के अभिनेता सलमान जाफरी को गिरफ्तार कर लिया है। सलमान पर पुलिस ऑफिसर की ड्रेस पहन कर लोगों को ठगने का आरोप है।

सलमान जाफरी का ठगी स्टाइल भी बॉलीवुड फिल्मों की तरह का है। वो देहरादून, चंडीगढ़ या अन्य शहरों में हवाई जहाज से जाता था और क्राइम करने के बाद मुंबई वापस आ जाता था। अभी तक उसने ज्यादातर उत्तराखंड और चंडीगढ़ में लोगों को अपना शिकार बनाया है।

कैसे पकड़ाया सलमान

मुंबई पुलिस को देहरादून पुलिस ने सूचना दी कि एक बुजुर्ग महिला से आरोपित ने ठगते हुए 5 लाख रुपए के गहने चुरा लिए। देहरादून पुलिस ने बताया कि तकनीक और सर्विलांस की मदद से आरोपित को मुंबई के ओशिवारा में होने का पता चला।

इसके बाद मुंबई पुलिस हरकत में आई। देहरादून पुलिस से जो सूचना मिली थी, उसके आधार पर मुंबई पुलिस ने आरोपित को उसके घर से गिरफ्तार किया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आरोपित ने पूछताछ के दौरान पुलिस ड्रेस पहन कर ठगी करने की बात स्वीकार कर ली है।

जब अम्बानी को कॉन्ग्रेस ने 1 लाख करोड़ का ठेका दिया था | Ajeet Bharti talks about Rahul Gandhi’s jibe on Adani-Ambani

आपको किसी ने जबरन तो नहीं कहा कि जियो का सिम ले लो और रिलायंस फ्रेश से ही सब्ज़ियाँ खरीदना? अडानी ने तो जबरदस्ती नहीं की आपके साथ? टाटा ने यह तो नहीं कहा कि मेरी कार नहीं लोगे तो मोदी को बता देंगे?

पूरा वीडियो यहाँ क्लिक कर के देखें।

‘केजरीवाल ने भेजा है’: 1-1 केला देने पर AAP नेता को प्रदर्शनकारियों ने धक्का देकर बाहर निकाला, देखें वीडियो

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें कृषि कानूनों का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी को एक आम आदमी पार्टी (AAP) नेता/कार्यकर्ता को धिक्कारते और वहाँ से बाहर निकालते हुए देखा जा सकता है। दरअसल, AAP कार्यकर्ता ने प्रति व्यक्ति एक केला देकर कहा था कि ये केजरीवाल सरकार ने दिया है। जिसके बाद भड़के प्रदर्शनकारियों ने उसे बाहर निकाल दिया। बीजेपी नेता प्रीति गाँधी और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता गौरव पाँधी ने इसका वीडियो ट्विटर पर शेयर किया था।

वायरल वीडियो में एक प्रदर्शनकारी कहता है, “तुमने मुझे एक केला दिया और कहा कि ये केजरीवाल सरकार ने दिया है। क्या सरकार एक केला देगी?” प्रदर्शनकारियों ने AAP कार्यकर्ता को घेर लिया अपने पार्टी प्रमुख को प्रमोट करने के लिए उसे आड़े हाथों लिया। जिसके बाद उसने डरी हुई आवाज में कहा, “नहीं, सरकार ने एक केला नहीं दिया। यहाँ कई लोग हैं।”

इसने कृषि विरोधी कानून के प्रदर्शनकारी को और अधिक उत्तेजित कर दिया। उन्होंने गुस्से भरे लहजे में पूछा, “क्या तू हमें एक केला देकर वोट हासिल करने की कोशिश कर रहा है? तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?” AAP कार्यकर्ता ने स्थिति को शांत करने के प्रयास करते हुए यह समझाने की कोशिश की कि वह वोट नहीं माँग रहा है। इसके बाद प्रदर्शनकारी ने उसे वहाँ से बाहर निकलने के लिए कहा और पास में खड़े कुछ प्रदर्शनकारियों ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया।

वायरल वीडियो पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

इस वीडियो को शेयर करते हुए बीजेपी नेता प्रीति गाँधी ने ट्वीट किया, “खुद देखें कि आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवक प्रदर्शनकारी किसानों के साथ भिखारियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।”

कॉन्ग्रेस पार्टी के गौरव पाँधी ने लिखा, “डिअर अरविंद केजरीवाल, किसानों के पास आपके और आपकी घिनौनी राजनीति के लिए ये एक संदेश है। AAP कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध स्थलों पर उपहास किया जा रहा है, लेकिन फिर से, मीडिया ने आपको यह नहीं दिखाया क्योंकि केजरीवाल ने उन्हें विज्ञापन राजस्व खिलाया है।”

हालाँकि, AAP सुप्रीमो और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में कृषि विरोधी प्रदर्शनकारियों के लिए अपना समर्थन दिखाया है। यहाँ तक कि वे पंजाब के किसानों के साथ ‘एकजुटता’ में धरने पर बैठ गए थे। जबकि उनके साथी पार्टी कार्यकर्ता को प्रदर्शन स्थल पर प्रदर्शनकारियों के विरोध का सामना करना पड़ा।

AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने किसानों के साथ ‘एकजुटता’ व्यक्त की

इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने एक दिन के उपवास पर जाने का फैसला किया था। उन्होंने AAP कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एक दिन का उपवास करने के लिए कहा था और साथ ही जनता से आग्रह किया था कि वे ‘किसानों के समर्थन’ में एक दिन के लिए उपवास करें। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेता पंजाब के किसानों के विरोध प्रदर्शन को समर्थन देने में लगे हुए हैं, जबकि दिल्ली में उनकी सरकार ने कृषि कानूनों में से एक को अधिसूचित किया था।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके विधायक जहाँ पंजाब से आए ‘किसान आंदोलनकारियों’ के समर्थन में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी ने खुलासा किया है कि AAP सरकार ने तो मोदी सरकार द्वारा पारित कराए गए 3 कृषि कानूनों में से एक कानून को सोमवार (नवंबर 23, 2020) को ही प्रदेश में लागू कर दिया है। उन्होंने ‘दिल्ली राजपत्र’ के दस्तावेज की तस्वीरें शेयर कर सबूत भी दिखाया।

इस दस्तावेज के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद-123 के खंड (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में, भारत के राष्ट्रपति ने ‘कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा)’ नामक अध्यादेश, 2020 प्रख्यापित किया है, जिसे विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत सरकार का राजपत्र असाधारण भाग-2, खंड-1 में प्रकाशित किया गया है।

आगे लिखा है कि यह किसी भी राज्य की APMC अधिनियम या अन्य कानून के लागू होने के समय प्रवृत्त या प्रलेख के प्रभाव में आने वाले समय में लागू होगा। इस राजपत्र का गौर करने लायक हिस्सा वो है, जिसमें लिखा है, “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली की विधानसभा ने ‘दिल्ली कृषि उपज विपणन अधिनियम, 1998’ (1999 का दिल्ली अधिनियम, संख्या-7) को अधिनियमित किया है, जो जून 2, 1999 से लागू है।”

अयोध्या में राम भक्तों के सहयोग से बनेगा भव्य मंदिर, धन जुटाने के लिए देश भर में अभियान चलाएगा ट्रस्ट

5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नींव की ईंट रखे जाने के बाद से अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण कार्य में तेजी आई है। भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी रामभक्तों की मदद लेने का फैसला किया गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (Ram Janmbhoomi Teerth Kshetra) ने अयोध्या में बनने जा रहे भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए एक देशव्यापी जन संपर्क और योगदान अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। इस दौरान लोगों को जन्मभूमि आंदोलन के ऐतिहासिक महत्व से भी अवगत कराया जाएगा।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ट्रस्ट ने इस बात पर विचार किया है कि जिस तरह श्री राम जन्मभूमि के निर्माण के लिए करोड़ों रामभक्तों ने योगदान दिया, उसी तरह मंदिर भी करोड़ों श्री रामभक्तों के स्वैच्छिक योगदान से बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह अभियान पूरे देश में चलाया जाएगा। जनसंपर्क अभियान मकर संक्रांति से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक जारी रहेगा। इस अभियान के तहत अरुणांचल प्रदेश, नागालैंड, अंडमान निकोबार और त्रिपुरा जैसे सुदूर के राज्यों तक में श्रीराम मंदिर की ऐतिहासिकता से रामभक्तों को अवगत कराया जाएगा।

धनसंग्रह के लिए कूपन तैयार

ट्रस्ट ने ट्वीट कर बताया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र सभी राम भक्तों से इस ऐतिहासिक अभियान में अपना योगदान देने का आह्वान करता है। उन्होंने बताया कि यह दान पूरी तरह स्वैच्छिक होगा, यानी कि जो व्यक्ति अपनी इच्छा से दान देना चाहे, वह दे सकता है। इसके लिए 10 रुपए, 100 रुपए और 1,000 रुपए के कूपन भी उपलब्ध कराए जाएँगे।

ट्रस्ट ने दान करने के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के बैंक खातों और दान करने की प्रक्रिया की भी जानकारी दी है। अपनी जानकारी में उन्होंने यह भी बताया है कि ट्रस्ट को दिया जाने वाला दान आयकर कानून के तहत करमुक्त है। ट्रस्ट ने कहा कि इस अभियान के जरिए करोड़ों घरों तक श्री रामजन्मभूमि मंदिर के प्रस्तावित नए मॉडल की फोटो भी पहुँचाई जाएगी।

नृपेन्द्र मिश्र की अध्यक्षता में गठित राम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण समिति ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए नींव डिजाइन की समीक्षा और सिफारिशों के लिए संबंधित क्षेत्र में प्रतिष्ठित इंजीनियरों की एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति के गठन का उद्देश्य मन्दिर निर्माण हेतु विभिन्न स्रोतों से आए सभी विभिन्न भू-तकनीकी सुझावों को ध्यान में रखते हुए उच्चतम गुणवत्ता और दीर्घायु के साथ मंदिर का निर्माण करना है।

ट्रस्ट ने लोगों से माँगे थे सुझाव

ज्ञात हो कि इससे पहले पिछले महीने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अयोध्या (Ayodhya) में राम मंदिर के आसपास 70 एकड़ का कैंपस बनाने के लिए लोगों से सुझाव और विचार माँगे थे। विशेषज्ञ सलाहकारों द्वारा डिजाइन की गई मंदिर का मुख्य ढाँचा पारंपरिक नागर शैली में तैयार किया जा रहा है। 70 एकड़ का कैंपस मंदिर के आसपास की सुविधाओं के लिए होगा।

पिता जेल में, माँ ने जिसे छोड़ा बेसहारा.. उसे योगी की पुलिस ने दिया सहारा: जानिए 10 साल के अंकित के साथ क्या हुआ

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक बच्चे की कुत्ते के साथ फुटपाथ पर सोते हुए तस्वीर वायरल होने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसे सहारा दिया है। 10 साल के अंकित के पिता जेल में हैं और उसकी माँ उसे छोड़कर चली गई थी।

समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंकित मेहनत कर खुद अपना पेट तो पालता ही है, साथ में उस कुत्ते के भी खाने-पीने का पूरा इंतजाम करता है। ये कुत्ता अंकित के साथ दिनभर रहता है और अंकित ने ही उसे ‘डैनी’ नाम दिया है। एसएसपी अभिषेक यादव के निर्देश पर पुलिस ने अंकित को गत सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को ढूँढ निकाला और अब अंकित उत्तर प्रदेश पुलिस के संरक्ष्ण में है।

बताया जा रहा है कि अंकित नाम के इस बच्चे को ये भी याद नहीं है कि वो कहाँ का रहने वाला है। उसको बस इतना याद है कि उसका पिता जेल में हैं और उसकी माँ ने उन्हें छोड़ दिया है। अंकित अपने गुजारे के लिए गुब्बारे बेचता है या चाय की दुकानों पर काम करता है। अंकित अपने एकमात्र दोस्त, ‘डैनी’ कुत्ते के साथ फुटपाथ पर सोता है। दस साल के मासूम का जीवन पिछले कई सालों से ऐसा ही था।

कुछ ही दिन पहले, किसी व्यक्ति ने एक बंद दुकान के बाहर रात में एक कंबल में सोते हुए अंकित और उसके ‘दोस्त डैनी’, दोनों की तस्वीर क्लिक की और यह वायरल हो गई। तभी से उत्तर प्रदेश प्रशासन बच्चे का पता लगाने की कोशिश कर रहा था। आखिरकार सोमवार सुबह बच्चा पुलिस को मिल ही गया।

मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक यादव ने कई दिनों पहले पुलिस टीम पर दबाव डाला था जिसके बाद 9-10 साल का दिखने वाला अंकित अब जिला पुलिस की देखरेख में है। टी स्टाल के मालिक के अनुसार, अंकित का कुत्ता कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ता है।

उनका कहना है कि जब तक लड़का दुकान में काम करता, कुत्ता एक कोने में बैठा रहता था। समाचार पत्र TOI के अनुसार, उन्होंने बताया कि अंकित बहुत ही स्वाभिमानी है और कभी भी मुफ्त में कुछ नहीं लेता, यहाँ तक कि अपने कुत्ते के लिए दूध भी नहीं।

मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक यादव ने कहा, “अब वह मुजफ्फरनगर पुलिस की देखरेख में है। हम उनके सम्बन्धियों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी तस्वीरें आसपास के जिलों के विभिन्न पुलिस थानों में भेजी गई हैं। हमने जिला महिला और बाल कल्याण विभाग को भी सूचित किया है।”

एसएचओ अनिल कापरवान के मुताबिक, अंकित एक स्थानीय महिला शीला देवी के साथ रहता है, लड़का उससे परिचित है और उसे ‘बी’ कहता है, और जब तक उसका ठिकाना नहीं मिल जाता, वह एक निजी स्कूल में पढ़ेगा। स्थानीय पुलिस द्वारा स्कूल प्रबंधन से अनुरोध करने के बाद स्कूल उसे मुफ्त शिक्षा देने के लिए सहमत हो गया है।

राहुल तुम ‘नेहरू-दा’ हो, ‘नेरूदा’ मत बनो: अम्बानी को एक लाख करोड़ का ठेका तो यूपीए ने भी दिया था

पाब्लो नेरूदा लिखते हैं, “मैं तुम्हारे साथ वही करना चाहता हूँ, जो बसंत चेरी के पेड़ों के साथ करता है’। पूरी कविता में प्रकृति के अवयवों बिम्ब नायक के प्रेम की अनुभूति को अभिव्यक्त करते हैं। नेरुदा को साहित्य का नोबेल मिला था। वहीं, अपनी जीवन की एकमात्र उपलब्धि, किसी विशेष परिवार में, किसी विशेष समय-काल में पैदा हो कर, उसी के सहारे अपने पूरे व्यक्तित्व को दो बैलों के पाले को अकेले ही खींच कर ले जाने वाले राहुल गाँधी भी कविता करते रहते हैं। ये बात और है कि नेरूदा की ही तरह उनकी कविताएँ भी विलक्षण ही हैं, कारण भले ही अलग हों।

राहुल गाँधी की एक कविता देखिए: मोदी सरकार के लिए: अलग विचार रखने वाले विद्यार्थी देशद्रोही हैं। चिंतित नागरिक अर्बन नक्सल हैं। प्रवासी श्रमिक कोरोनावाहक हैं। बलात्कार पीड़िताएँ अनाम हैं। आंदोलनरत किसान खालिस्तानी हैं। और, क्रोनी कैपिटलिस्ट सबसे अच्छे मित्र हैं।”

‘ला बेले डेम सॉन्स मेर्सी’ लिखने वाले कवि जॉन कीट्स कहते हैं कि कविता अगर इतनी ही सहजता से न आए जैसे पत्ते पेड़ों पर आते हैं, तो अच्छा है कि वो न लिखी जाए। राहुल गाँधी की सहजता और बहाव ही उन्हें विलक्षण बनाता है। उन्हें किसी भी बात पर कविता आ जाती है। हैं तो कॉन्ग्रेसी लेकिन वामपंथी चिरकुटों वाले शब्दों के प्रयोग से वो कभी पीछे नहीं हटते क्योंकि उन्हें पता है अगर आप किसी ट्वीट में किसान, मजदूर, छात्र, लड़की, नागरिक आदि लिख दो तो साल में सत्रह नोबेल मिल सकते हैं।

कविताओं को ले कर फेसबुक के मित्र राजीव मिश्रा लिखते हैं, “‘किसान अन्न उपजा रहा है तो खाने को मिल रहा है, वेनेजुएला में किसानों ने अन्न उपजाना बन्द कर दिया तो लोग भूखे मर रहे हैं’ लिखना सेंटिमेंटल बात है, पर निष्कर्ष गलत है। एक कोमल हृदय कवि आपके दर्द पर पिघल कर बहुत ही मार्मिक कविता लिख देगा, पर उससे आपकी बीमारी ठीक नहीं हो जाएगी। एक निष्ठुर, कठोर हृदय डॉक्टर भी अगर तार्किक होगा, तो आपकी बीमारी और उसका इलाज बता सकेगा।”

बाकी, आपको पता ही है कि दस साल के समाजवाद ने वेनेजुएला की तेल आधारित अर्थव्यवस्था से नागरिकों को फ्री खाने की आदत लगाई और सारे उद्योग-सेवाएँ ऐसी बर्बाद हो गईं कि अब वहाँ 90-95% जनता गरीबी से जूझ रही है। कविता करने वाले नेता लोग यही चाहते हैं। उन्हें अचानक उन किसानों से प्रेम हो जाएगा जिनके घरों से सैकड़ों लोग, उनकी ही बनाई नीतियों के कारण आत्महत्या करते रहे हैं।

राहुल गाँधी ने पाँच पंक्तियों में मोदी सरकार का पंचनामा किया है जिसमें ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ कहने को मतभिन्नता कहा गया है; प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वाले, भीमा कोरेगाँव में हिंसा करने वाले, दलित आंदोलन के नाम पर चौदह लाशें गिराने वाले ‘चिंतित नागरिक’ हैं जो नक्सलियों द्वारा सैकड़ों जवानों की घेर कर की गई हत्या पर जश्न मनाते हैं; श्रमिकों को पूरे देश से एक से दूसरे जगह ले जाने को विवश करने के बाद, सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण की चिंता जताने पर उन्हें कोरोनावाहक कहने का झूठा आरोप लादा गया; राजस्थान में बलात्कार के आँकड़ों की अनदेखी करते हुए, हाथरस को उछालने की कोशिश करने वालों को पीड़िताओं का हितैषी बताया गया है; फुट मसाज, पिज्जा, सिनेमा का आनंद लेते हुए ‘मोदी मर जा तू‘ गाने वालों को किसान बताया है; जिन कंपनियों ने करोड़ों के घर में चूल्हा जला रखा है, रोजगार दिया है, वो क्रोनी कैपिटलिस्ट हैं।

वो राहुल बाबा है, वो कुछ भी कह सकता है कि तर्ज पर, हाल ही में अर्थशास्त्री और युद्ध मामलों के जानकार बने प्रधानमंत्री बनने के लिए ही अवतरित हुए बुजुर्ग युवा फिलहाल किसान आंदोलन को ले कर चिंतित पाए गए हैं। लेकिन, जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि कविता कहने से वस्तुस्थिति नहीं बदलती, न ही प्रेम पर सुंदर पुस्तक लिखने वाला अपनी पत्नी को प्रेम करता है, ऐसा जरूरी है, तो राहुल गाँधी भी ऐसे शब्द अवश्य लिख सकते हैं, या पैसे हों तो लिखवा सकते हैं, लेकिन ‘थोथा चना, बाजे घना’ वाली बात हो जाती है।

किसानों को ले कर चिंतित क्यों हैं राहुल गाँधी?

किसानों की चिंता करना अनुचित नहीं है। नेताओं के लिए तो किसान और उसके मुद्दे अत्यंत ही आवश्यक चीजें हैं। लेकिन समस्या यह है कि ट्विटर से ही देश बदल देने वाले राहुल और मीम से चुनाव जीतने की आशा रखने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी किसानों को ले कर तो छोड़िए, अपनी पार्टी को ले कर भी कभी चिंतित नहीं रहे। अगर होते तो दस नवम्बर को बिहार में पृष्ठ भाग का बंदरछाप बन जाने के बाद दो दिन का स्वावलोकन और मंथन शिविर लगाते। ये बात और है कि वहाँ दो-चार-दस नेता हार की जिम्मेदारी सर पर ले लेते और राहुल-सोनिया को अपना माई-बाप घोषित कर के चले आते।

बिलों को ले कर राहुल गाँधी की ब्रह्मांड हिलाने वाली ‘न्याय’ स्कीम के सूत्रधार, सलाहकार वाले नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी ने गजब की गूढ़ बात कर दी। उन्होंने कहा कि किसानों को ले कर बने कानूनों में कोई समस्या नहीं है, समस्या यह है कि किसानों में सरकार को ले कर विश्वास नहीं है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि महामारी के समय में इन कानूनों सो लाने का कोई औचित्य नहीं है।

नोबेल विजेता हैं तो वो ऐसे कुतर्क कह सकते हैं, लोग सुन भी लेते हैं। लेकिन, बनर्जी को यह बताना चाहिए कि जब कानून सही हैं, तो फिर किसानों में अविश्वास क्यों है? क्या सरकार ने इन कानूनों के बारे में ठीक से चर्चा नहीं की, किसी तय व्यवस्था को दरकिनार करते हुए कानून पास करा लिए, या फिर लोगों के पास इसके प्रावधानों की जानकारी नहीं है? जी नहीं, सरकार ने अपने कई मंत्रियों के द्वारा, मीडिया चैनलों के द्वारा, किसानों के द्वारा इन कानूनों का खूब प्रचार किया है।

रवीश जैसे लोग जितना नाच लें कि अध्यादेश ले आई सरकार, लेकिन संसद ने इन विधेयकों को पास किया है। बनर्जी जितना अविश्वास के गीत गा लें लेकिन सरकार ने इसके हर प्रावधान को ले कर खूब चर्चा भी की है। अब, अगर किसी को पिज्जा खाने और मसाज करवाने में मजा आने लगा हो, तो वो कानून के प्रावधानों को क्यों पढ़ेगा? जिसे पता हो कि वो ‘आंदोलन’ में नहीं, आंदोलन ‘करने’ के लिए आया है, तो वो किसी भी बात को क्यों मानेगा?

संसद द्वारा पास किए गए कानूनों को हटाने की बात हो रही है जैसे कि संसद में जनप्रतिनिधि नहीं, कंपनियों के मालिक बैठे हुए हैं। MSP की गारंटी की बात की जा रही है, जबकि कोई यह देखने को तैयार नहीं कि सरकार MSP पर जब खरीदती है तो उसके चक्कर में होने वाले सरकारी घाटे को किसके द्वारा दिए गए टैक्स से पूरा किया जाता है। लोगों को यह नहीं जानना कि किसानों से हर साल लाखों टन अनाज आदि खरीदने के बाद सरकार उसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेच भी नहीं पाती, क्योंकि उसे कम दाम में बेचने पर दोबारा घाटा लगेगा। इस कारण भी गोदामों में अनाज की बोरियाँ सड़ती हुई दिखती हैं।

एक बात और, अगर हर खरीदार MSP पर ही खरीदने को बाध्य हो जाएगा, तब जब सामानों का दाम बढ़ेगा तो महँगाई बढ़ने पर किसको घेरा जाएगा? समाजवाद की व्यवस्था, जहाँ नागरिकों को भी सामान सस्ता मिले और किसानों को भी ज्यादा पैसे, वहाँ संभव है जहाँ बजट सरप्लस में होता है। यहाँ हम हमेशा एक तरह की सब्सिडी को बढ़ाने के लिए दूसरी को घटाने में लगे रहते हैं। पूरी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पा रहा, इसलिए सरकार को उन्हें भी देखना है और दूसरों को भी।

ऐसे में समाजवादी सपने देखना सुहाना अवश्य लगता है, परंतु उसके दुष्परिणामों की चिंता किसी को नहीं। सरकार एक संतुलन बना कर चल रही है कि मंडी की व्यवस्था भी रहे और किसान उन चीजों का भी भंडारण कर सकें जो पहले सरकारी नियंत्रण में थीं, ताकि उन्हें बाद में खुले बाजार में बेच सकें। कॉन्ट्रेक्ट पर खेती का मतलब यह है कि किसान के पास एक और विकल्प है कि वो स्वयं खेती करना चाहता है या फिर, अपनी लागत के हिसाब से कंपनियों/संस्थाओं से अनुबंध कर के बाद के होने वाले आकस्मिक नुकसानों से बचना चाहता है।

अगर सरकार बजट का एक बड़ा हिस्सा इस कार्य में लगा दे जहाँ उसे हर सीजन में घाटा होना तय है, तो हो सकता है कि उसी किसान के घर में सिलिंडर की, बीमा की, आयुष्मान योजना की, पेंशन की, सम्मान निधि आदि की सब्सिडी नहीं पहुँच पाएगी। सरकारें पैसे नहीं छापती, बल्कि हमारे द्वारा दिए गए टैक्स से जमा हुए पैसों को अलग-अलग तरीके से खर्च करती है।

विकासशील देश संतुलन ही बना कर चल सकते हैं क्योंकि सब-कुछ मुफ्त में या बिलकुल ही कम मूल्य पर देने का मतलब है कि घूम-फिर कर वह चोट भी सामान्य नागरिकों की ही जेब पर लगेगी। राहुल गाँधी यह नहीं समझते क्योंकि नोटबंदी के समय में, जो दो हजार का नोट उन्होंने निकाला था, उनका काम उतने से ही चल रहा है, आम नागरिक का काम उतने से नहीं चलता।

राहुल गाँधी को राहुल गाँधी होने की लग्जरी है। उन्हें लगातार मिलती हारों के बाद भी ‘आप ही अध्यक्ष बन जाइए’ सुनने की अनसुनी लग्जरी है। उन्हें इस बात की लग्जरी है कि वो सड़कों पर लोगों को उतार कर दस हजार लोगों पर पैसे खर्च सकें ताकि उनके राजनैतिक विरोधियों को अराजकता के दम पर झुकाया जा सके। उन्हें इस बात की लग्जरी है कि वो ट्वीट में भावुक बातें लिख कर वामी-कामी मीडिया के ललना बन सकते हैं।

उन्हें इस बात की भी लग्जरी है कि वो उन्हीं बड़ी कम्पनियों को गरिया सकते हैं जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है।

क्रोनी कैपिटलिज्म बनाम नेहरूवियन सोशलिज्म

राहुल गाँधी और उनके ‘आंदोलनकारी’ किसानों की विचित्रता देखिए (अगर उनकी यह बात मान भी लें कि अडानी-अम्बानी कृषि के क्षेत्र में आ रहे हैं) कि इसी देश की संस्थाएँ अगर किसानों से कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग समेत अन्य तरीकों से अपनी जगह बनाना चाहती है तो उसे क्रोनी कैपिटलिज्म कहते हैं, लेकिन 1991 में देश की अर्थव्यवस्था को खोलने वाली नीति के लिए क्रेडिट लेना आज भी नहीं बंद करते।

वैश्विक संदर्भ में देश की अर्थव्यवस्था को खोलना समय की माँग थी, लेकिन कॉन्ग्रेस अगर कैपिटलिज्म, यानी पूँजीवादी व्यवस्था से इतना सशंकित है, तो फिर वो इसका क्रेडिट क्यों लेता है? कोका कोला और पेप्सी ने देश के पेय पदार्थों के बाजार पर क्या डुओपॉली नहीं बना रखी है? एमेजॉन, ऊबर, फेसबुक, गूगल, सैमसंग, शाओमी, नेस्ले, होंडा, ह्यूंडाय आदि कहाँ की संस्थाएँ हैं? ये क्या अपना विशुद्ध लाभ भारत में रहने दे रही हैं?

जब आपके देश की सबसे पुरानी पार्टी को विदेशी संस्थाओं द्वारा बाजारों पर एकतरफा कब्जा करना सही लगता है, और पतंजलि, अडानी, अम्बानी का आगे आना बुरा, तब आपकी सोच के गुणसूत्रों में समस्या है। कुछ विदेशी कम्पनियाँ तो पहले से ही भारत के कृषि क्षेत्र में घुसी हुई हैं, तब किसी ने आंदोलन नहीं किया। नेस्ले और पेप्सी जैसे उद्योग सॉस, नूडल्स, चिप्स, मसाले आदि कहाँ से बनाते हैं? उनको किस नीति के तहत और किस सरकार ने बुलाया, और तब कैपिटलिज्म की याद क्यों नहीं आई?

अपनी प्रासंगिकता खोता एक पत्रकार बकैत रवीश एक दिन फेक न्यूज चला देता है कि अडानी ने सरकार के लिए गोदाम बनाए हैं, और फिर उसके हिसाब से कृषि बिल बना दिए गए। जबकि सत्य यह है कि अडानी की कम्पनी यूपीए के समय में भी FCI को भाड़े पर गोदाम (सायलोज़) उपलब्ध कराती थी। उसी तरह, हर बात पर अम्बानी को घेर लिया जाता है कि वो सरकार को जेब में रख कर चलते हैं।

अगर अम्बानी सरकार को जेब में रख कर चलते थे उन पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और ईडी के मामले नहीं चल रहे होते। एक और आँकड़ा देख लेते हैं कि 2004 में रिलायंस के एक शेयर की कीमत जहाँ ₹84 थी, वही 2014 में ₹558 हो गई। मोदी के आने के बाद यह आँकड़ा अभी ₹1973 का है। यूपीए के दस सालों में रिलायंस 6.6 गुणा बढ़ा, और मोदी के समय में छः सालों में इसकी वृद्धि साढ़े तीन गुणा की है। हर साल का भी औसत निकालेंगे तो यूपीए के समय में रिलायंस ने बेहतर वृद्धि पाई है।

हमारे देश में यह विसंगति है कि लोगों को बड़ी कम्पनियों से, या वेल्थ क्रिएटर्स से समस्या है। हम चीजों को वैसे ही देखना चाहते हैं जैसे हमारी फिल्मों में दिखाया जाता है। किसान शब्द सुनाई पड़ते ही हमें गरीब किसान याद आता है, लाला सुनते ही हमें कंगन रख कर सूद देने वाला बनिया नजर आता है, ब्राह्मण सुनते ही हमें व्यभिचारी और लालची, ढोंगी व्यक्ति की याद आती है, उद्योगपति सुनते ही हमें खून चूसने वाला और ऐश करने वाला इंसान दिखता है।

ये सारी कंडिशनिंग वामपंथियों ने कर रखी है। वामपंथियों की प्रकृति ही रही है कि वो अराजकतावादी होते हैं। सर्वहारा की बातें करने वालों ने कितनी बार सर्वहारा को सत्ता दी है, वो इतिहास जानता है। वामपंथी अपनी सफलता या आंदोलन की सफलता के लिए समाज के हर ताने-बाने को पहले बिलकुल बर्बाद कर देना चाहता है ताकि वो स्वयं को एक विकल्प के रूप में स्थापित कर सके।

जहाँ भी वामपंथी सत्ता में गए हैं, इतिहास देख लीजिए कि वहाँ का समाज किस स्थिति में पहुँच चुका था। साथ ही, उनके सत्ता में आने के बाद उनकी अपनी विचारधारा कैसी विकृत हो जाती है, वो चीन में दिखता है। विश्व के किस राष्ट्र में वामपंथ ने सामाजिक बेहतरी की है, और वो राष्ट्र वैश्विक परिदृश्य में क्या हैसियत रखता है, यह भी पता कीजिए।

वही नीच निगाह भारत पर भी है। चाहे वो इस्लामी गजवा-ए-हिंद हो, ईसाई कन्वर्जन वाले मिशनरी हों या फिर वामपंथी विचारधारा, भारत इन सबका ‘फायनल फ्रंटियर’ रहा है जहाँ ये उस तरह से कभी भी सफल नहीं हो पाए, जैसे वो अन्य जगहों पर हुए हैं। इसीलिए, राजनैतिक रूप से अलग होने के बाद भी, ये तीनों तरह के परजीवी आपको राष्ट्रवादियों के विरोध में इकट्ठा मोर्चा लिए खड़े मिलते हैं।

भारत में गरीबी ज्यादा है, और इसलिए हर पार्टी चाहती है कि हर तरह के कमज़ोर लोगों को एक दुश्मन दिखा दिया जाए। गरीबों के लिए उद्योगपतियों को राक्षस की तरह दिखाया जाता है, मुसलमानों के लिए हिन्दुओं को दुश्मन की तरह दिखाया जाता है, दलितों के लिए ब्राह्मणों को दुश्मन के तौर पर खड़ा कर दिया जाता है। वही ब्राह्मण जो गरीब है, वो दलितों के लिए दुश्मन है, भले ही दोनों की सामाजिक परिस्थिति बिलकुल एक ही है। वही हिन्दू जो दलित है, मुसलमानों की एक भीड़ के लिए काफिर बन जाता है जबकि दोनों की सामाजिक स्थिति एक-सी ही है।

ऐसे में दुश्मन तैयार करने में नेता लोग आगे रहते हैं। जिनका राजनैतिक करियर लगातार खत्म होता जा रहा है, और जो जानते हैं कि निकट भविष्य में वो सत्ता में आ ही नहीं सकते, वो कभी बेरोज़गारी भत्ते की बात करते हैं, तो कभी ‘न्याय योजना’ की। वो कभी अडानी और अम्बानी का बहिष्कार करवाते हैं, तो कभी उसी पतंजलि का जिसने हजारों कृषकों को एक नए बाजार से जोड़ा है।

आम आदमी कभी-कभी अपनी मूर्खता में वास्तविकता से इतनी दूर हो जाता है कि उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि एलोवेरा का जूस हो या फिर दाँत साफ करने का पेस्ट, उन सबके आधार में कृषि ही है न कि पतंजलि वाले तपस्या करते हैं और उनके च्यवनप्राश का डब्बा च्यवन ऋषि स्वर्ग से फेंक देते हैं।

किसान नहीं हैं ये, ये खराब गुणवत्ता के नुक्कड़ नाटक कलाकार हैं

‘इंदिरा को ठोका था, मोदी को भी ठोक देंगे’ से शुरु हुए आंदोलन से किसान के मुद्दे गायब हो चुके हैं और अब यह ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू‘ तक पहुँचा है। शाहीन बाग की आंशिक सफलता के बाद इन्होंने आंदोलन के नाम पर सड़कों पर अस्थाई टाउनशिप बनाने की योजना को परफैक्ट कर लिया है। अब यहाँ फुट मसाज से ले कर सिनेमा प्रोजेक्टर और प्रोटीन शेक तथा पिज्जा मिल रहा है।

कुछ दिनों में यहाँ से भी कहानियाँ आएँगी कि सड़क पर ही आंदोलन करते हुए ‘मोदी तू मरता क्यों नी’ का रैप बनाने वाले बंटी से गाल पर ‘फक हिन्दू राष्ट्रा’ लिखवा कर घूमने वाली बबली को लव एट फर्स्ट साइट हो गया। शाहीन बाग की तर्ज पर, इस ठंढ में एक दो नवजात शिशुओं की बलि दी जाएगी ताकि अंतरराष्ट्रीय खबर बने कि क्रूर मोदी के राज में सड़कों पर ‘विरोध प्रदर्शन’ करता नवजात मर गया।

अंततः, सवाल तो यही है कि विपक्ष ने जिस बिल को अपने मैनिफेस्टो का हिस्सा बनाया था, उसी का विरोध क्यों कर रहा है? उत्तर यही है कि बिल कोई भी हो, मोदी पर फाड़ दो और विरोध में जुट जाओ। फंडिंग आ ही रही है, पिज्जा बन ही रहा है, बाबाजी के तलवों में खालिस्तानी लोग मशीनों से मालिश कर ही रहे हैं। चूँकि, पंजाब के लोग हैं तो मैं लगभग आश्वस्त हूँ कि यूट्यूब पर दिसंबर के अंत तक किसान आंदोलन का एक अल्बम जारी हो जाएगा।

ये आंदोलन कम और आयोजन ज्यादा है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ टेंट गाड़ कर उन कानूनों के नाम पर आंदोलन होता है जिसका भारत के नागरिकों से कोई लेना-देना है ही नहीं। यहाँ एक राज्य के उन्हीं किसानों की बात को सच माना जाता है जो सरकार के विरोध में खड़े हैं लेकिन सरकार को समर्थन देने वाले भले ही संख्या में ज्यादा हैं, वो किसान होने के बाद भी गलत बताए जाते हैं।

राशन ले कर आंदोलन पर आने वाले लोग आंदोलन करने नहीं आते। उन्हें यह कैसे पता कि उन्हें चार महीने बैठना पड़ेगा? क्या उनके पास पहले का कोई उदाहरण है जहाँ ऐसा हुआ हो कि सरकार ने चार महीने तक बात ही न की हो? ऐसा उदाहरण नहीं है। शाहीन बाग बनते-बनते बन गया और सारी फंडिंग आते-आते आ गई। यहाँ शाहीन बाग का अनुभव है, इसलिए शुरुआती तौर पर चार महीने की तैयारी है, तब तक अगले चार महीने की भी हो जाएगी।

राशन ले कर आना बताता है कि चाहे सरकार तुम्हारी माँग मान भी ले, हटना नहीं है। इनकी माँग में शाहीन बाग के दंगाइयों और नक्सलियों की रिहाई की बात क्यों है? क्योंकि वो जानते हैं कि एक बार को किसानों के मुद्दे पर सरकार कुछ संशोधन कर भी दे, लेकिन रिहाई की बात तो मानेगी नहीं। साथ ही, इन्होंने संशोधन की भी माँग नहीं की है, इन्होंने सीधे तीन कानूनों को वापस लेने की बात की है जिसका विरोध भारत के बाकी 27 प्रदेशों का किसान नहीं कर रहा।

स्पष्ट है कि आपको माँग ही ऐसी रखनी है कि मानी ही न जाए, तो आंदोलन जीवित रहेगा। जैसे कि फरवरी 2020 में भीम आर्मी और सीएए विरोधी इस्लामी संगठनों ने जान-बूझ कर पुलिस से अपने पदयात्रा की अनुमति नहीं ली ताकि उन्हें ज्योंहि रोका जाएगा, वो ये कहने लगें कि मोदी की पुलिस छात्रों को आगे बढ़ने से रोक रही है।

इसलिए राशन के साथ आए लोग मुझे आंदोलनकारी नहीं लगते। भले ही उनके पास खेत हो, और वो कृषि भी करते हों, पर मेरी सहानुभूति उनके साथ नहीं है। वह इसलिए नहीं है क्योंकि मुझे उनकी मंशा पर गहन संदेह है। जब राहुल गाँधी जैसे लोग इसमें कूदते हैं, और भावुकता से भरी कविता करने लगते हैं, तब सब कुछ स्पष्ट हो जाता है।

हमारे सामने वो विचारधारा है जो तब तक लड़ने की बात रखती है जब तक जीत न जाए। उसे एक राजनैतिक पार्टी का समर्थन हासिल है जिसका नेता एक नरगधी है, लेकिन उसके पास परिवार के पुराने विकसित तंत्रों के कारण फंडिंग की क्षमता है। इस विचारधारा का मूल लक्ष्य ही बर्बादी है, सड़कों पर लोगों की अराजकता का नंगा नाच है ताकि वो जलते हुए बाजार के बीच खड़ा हो कर कह सके कि ‘देखो, इन पार्टियों ने तुम्हें क्या दिया? लोकतंत्र ने तुम्हें कहाँ पहुँचाया… इन उद्योगपतियों के घर देखो, और अपना घर देखो, इन्होंने तुमसे ही तो लूट कर यह घर बनाया है! हम तो कब से कहते थे कि सर्वहारा ही सर्वोच्च है, उसका ही राज होना चाहिए…’

बेस्ट फ्रेंड होना आवश्यक है

आज भले ही चीन से लड़ाई हो लेकिन आप शाओमी की फैक्ट्रियों में आग नहीं लगा सकते क्योंकि उसकी फैक्ट्री में भारतीय लोग काम करते हैं, उनका घर चलता है। विरोध और बेवकूफी में अंतर होता है। विदेशी निवेश भी आवश्यक है क्योंकि आपके घर में जिनके पास पैसा है, आवश्यक नहीं कि उनके पास आइफोन बनाने की क्षमता भी हो। इसलिए, कई मामलों में विदेशी निवेश से अपने देश के लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार, कच्चे माल के इस्तेमाल की आवश्यकता के जरिए अपने लोगों के लिए परोक्ष रोजगार, टैक्स के रूप में राजस्व में वृद्धि होती है।

विदेशों में ऐसे लोगों को आदर्श की तरह देखा जाता है। ऐसा नहीं है कि अम्बानी ने जियो बनाया और सबके फोन से बैंकिंग एप्प में सेंध मार कर पैसे बनाए जा रहा है। आपको किसी ने जबरन तो नहीं कहा कि जियो का सिम ले लो और रिलायंस फ्रेश से ही सब्ज़ियाँ खरीदना? अडानी ने तो जबरदस्ती नहीं की आपके साथ? टाटा ने यह तो नहीं कहा कि मेरी कार नहीं लोगे तो मोदी को बता देंगे?

क्या इन कम्पनियों ने आप पर विकल्पहीनता की भी स्थिति लाई? या सरकार ने कहीं भी कहा कि सिम तो जियो का ही लेना होगा और बिजली तो अडानी ही देगा? या फिर, सरकारी परियोजनाओं में इन कम्पनियों के होने का कारण एक बिडिंग प्रक्रिया है जो सारी कम्पनियों को उपलब्ध है? हाल ही में सुब्रमण्यम स्वामी ने पूछ दिया कि टाटा को कैसे दे दिया संसद भवन का काम? जबकि टाटा ने लार्सन एंड टूब्रो से कम पैसों की बिडिंग करके ये ठेका जीता था।

बात वही है कि जिन लोगों ने आधुनिक भारत को आकार देने में अहम योगदान दिया है, उन्हें बड़ी ही आसानी से गुंडा और लुटेरा बना कर दिखा दिया जाता है। अगर क्रोनी कैपिटलिज्म ही चल रही है तो फिर कॉन्ग्रेस पार्टी रैनबैक्सी, बिरला, टाटा, वीडियोकॉन, वेदांता, जिंदल आदि कम्पनियों से चंदा क्यों लेती रही है? आखिर यूपीए के दस सालों में एक लाख करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट अम्बानी समूह को क्यों दिए गए?

जब ये लोग इतने घृणित हैं तो तुम्हारी पार्टी के शीर्ष नेता इनके कोर्ट केस क्यों लड़ते हैं? कहाँ चली जाती है विचारधारा? तब तुम्हें याद आएगा कि सरकारी प्रक्रिया के तहत रिलायंस ग्रुप को ठेके मिले, चंदा तो सारी पार्टियाँ लेती हैं, कोर्ट केस तो पार्टी नेता के तौर पर नहीं, एक वकील के तौर पर लड़े जाते हैं। सारा ज्ञान तभी बाहर आने लगता है।

अगर टैक्स का हेर-फेर हुआ है, किसी कम्पनी ने कहीं डाका डाल दिया, कुछ गलत किया तो उस पर सबका ध्यान खींचना आवश्यक है, लेकिन सिर्फ उस कम्पनी का बड़ा होना, उसके उत्पादों की सामाजिक स्वीकृति, उसके प्रोडक्ट्स का सफल होना कोई अपराध नहीं है। अपराध है एक पार्टी का डूबते ही जाना और शीर्षस्थ नेतृत्व का गोवा में, थायलैंड में या कोलंबिया में होना। अपराध है कि पार्टी चलाना आपका मुख्य कार्य है और आपके बड़े नेता बार-बार चिट्ठियाँ लिख रहे हैं, और आपको फर्क नहीं पड़ रहा।

ऐसा करना अपने कार्यकर्ताओं को ठगना है और राष्ट्र को एक सशक्त विपक्ष की जगह सियारों और लकड़बग्घों की एक अशक्त सेना दे देना है। राहुल गाँधी अपने मूल कार्य में असफल रहे हैं और उनके जैसे लोगों का संसद में होना सुनिश्चित करता है कि कॉन्ग्रेस ‘आँख मारे वो लड़का आँख मारे’ से ले कर ‘हँसे तो दो गालों में भँवर पड़ा करते थे’ में ही प्रसन्नचित्त है। जो पार्टी इस तरह की खुमारी में जीती हो, उसका नेता अपने आपको सेमुअल टेलर कॉलरिज और अपने ट्वीट को ‘कुबला खान’ जैसी अप्रतिम रचना नहीं मानेगा तो क्या करेगा!

गोवध रोकने वाले बिल पर फिर कॉन्ग्रेस का हंगामा: सदन में ही स्पीकर को कुर्सी से खींचा, देखें वीडियो

कर्नाटक विधान परिषद में सदन की मर्यादा उस समय तार-तार हो गई, जब कॉन्ग्रेस एमएलसी ने जबरदस्ती विधान परिषद के अध्यक्ष को कुर्सी से उतार दिया। इस मामले में कॉन्ग्रेस एमएलसी प्रकाश राठौड़ ने कहा कि बीजेपी और जेडीएस ने अध्यक्ष को गैरकानूनी तरीके से चेयरमैन बना दिया, जब सदन ऑर्डर में नहीं था। उन्होंने कहा कि बीजेपी के द्वारा यह असंवैधानिक काम करना दुर्भाग्यपूर्ण है।

उन्होंने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस ने उन्हें चेयर से नीचे उतरने को कहा। हमें उन्हें कुर्सी से उतारना पड़ा, क्योंकि यह अवैध था। इस घटना के बाद सदन की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इसका वीडियो भी सामने आया है। वीडियो में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि कुछ पार्षद उन्हें कुर्सी की तरफ घसीट रहे हैं और बाकी उन्हें नीचे उतार रहे हैं।

बीजेपी एमएलसी लहर सिंह सिरोया ने कहा, “कॉन्ग्रेस MLCs ने गुंडों की तरह व्यवहार किया और वाइस चेयरमैन को कुर्सी से नीचे घसीट लिया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। हमने काउंसिल के इतिहास में इससे शर्मनाक दिन नहीं देखा है। मुझे खुद शर्म महसूस हो रही है कि जनता हमारे बारे में क्या सोच रही होगी।”

गौरतलब है कि कर्नाटक विधानसभा में बुधवार (9 दिसंबर, 2020) को गोवंश वध रोकथाम और मवेशी संरक्षण विधेयक 2020 को पारित कर दिया गया। इस दौरान भी कॉन्ग्रेस ने काफी हंगामा किया। इस बिल में गाय की तस्करी, अवैध ढुलाई, अत्याचार एवं गो-हत्या में लिप्त पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान भी है। बिल पेश होने के बाद भी जमकर हंगामा हुआ था। विपक्ष के नेता सिद्धारमैया आसन के पास आ गए थे।

विधान परिषद में जब गोरक्षा विधेयक पेश किया गया तो इसके खिलाफ वोटिंग के लिए कॉन्ग्रेस ने व्हिप जारी किया। कार्यवाही शुरू हुई तो चेयर पर डेप्युटी चेयरमैन थे जिसे देखकर कॉन्ग्रेस एमएलसी भड़क गए। कॉन्ग्रेस सदस्यों ने डेप्युटी चेयरमैन अश्वथनारायण को खींचकर चेयर से हटा दिया। कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा कि सदन में जो कुछ भी हुआ वह बर्दाश्त के काबिल नहीं है। सर्वदलीय बैठक में डेप्युटी चेयरमैन के द्वारा सदन चलाए जाने पर सहमति बनी थी। उन्होंने कहा कि कानून पास कराने के लिए कोर्ट का रास्ता खुला है। वह गवर्नर से भी इस बाबत मुलाकात करेंगे।

चिक्कमंगलुरु के विधायक गो-हत्या का विरोध और इसके खिलाफ सख्त कानून की माँग रखते हुए ट्वीट किया था, “मैंने पशुपालन मंत्री श्री प्रभु चव्हाण से कहा है कि कर्नाटक पशु वध संरक्षण और मवेशी संरक्षण विधेयक कैबिनेट में पारित हो और आगामी विधानसभा सत्र में भी पेश किया जाए।”