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‘केजरीवाल ने भेजा है’: 1-1 केला देने पर AAP नेता को प्रदर्शनकारियों ने धक्का देकर बाहर निकाला, देखें वीडियो

सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें कृषि कानूनों का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारी को एक आम आदमी पार्टी (AAP) नेता/कार्यकर्ता को धिक्कारते और वहाँ से बाहर निकालते हुए देखा जा सकता है। दरअसल, AAP कार्यकर्ता ने प्रति व्यक्ति एक केला देकर कहा था कि ये केजरीवाल सरकार ने दिया है। जिसके बाद भड़के प्रदर्शनकारियों ने उसे बाहर निकाल दिया। बीजेपी नेता प्रीति गाँधी और कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता गौरव पाँधी ने इसका वीडियो ट्विटर पर शेयर किया था।

वायरल वीडियो में एक प्रदर्शनकारी कहता है, “तुमने मुझे एक केला दिया और कहा कि ये केजरीवाल सरकार ने दिया है। क्या सरकार एक केला देगी?” प्रदर्शनकारियों ने AAP कार्यकर्ता को घेर लिया अपने पार्टी प्रमुख को प्रमोट करने के लिए उसे आड़े हाथों लिया। जिसके बाद उसने डरी हुई आवाज में कहा, “नहीं, सरकार ने एक केला नहीं दिया। यहाँ कई लोग हैं।”

इसने कृषि विरोधी कानून के प्रदर्शनकारी को और अधिक उत्तेजित कर दिया। उन्होंने गुस्से भरे लहजे में पूछा, “क्या तू हमें एक केला देकर वोट हासिल करने की कोशिश कर रहा है? तेरी हिम्मत कैसे हुई यहाँ आने की?” AAP कार्यकर्ता ने स्थिति को शांत करने के प्रयास करते हुए यह समझाने की कोशिश की कि वह वोट नहीं माँग रहा है। इसके बाद प्रदर्शनकारी ने उसे वहाँ से बाहर निकलने के लिए कहा और पास में खड़े कुछ प्रदर्शनकारियों ने उसे धक्का देकर बाहर निकाल दिया।

वायरल वीडियो पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएँ

इस वीडियो को शेयर करते हुए बीजेपी नेता प्रीति गाँधी ने ट्वीट किया, “खुद देखें कि आम आदमी पार्टी के स्वयंसेवक प्रदर्शनकारी किसानों के साथ भिखारियों की तरह व्यवहार कर रहे हैं।”

कॉन्ग्रेस पार्टी के गौरव पाँधी ने लिखा, “डिअर अरविंद केजरीवाल, किसानों के पास आपके और आपकी घिनौनी राजनीति के लिए ये एक संदेश है। AAP कार्यकर्ताओं द्वारा विरोध स्थलों पर उपहास किया जा रहा है, लेकिन फिर से, मीडिया ने आपको यह नहीं दिखाया क्योंकि केजरीवाल ने उन्हें विज्ञापन राजस्व खिलाया है।”

हालाँकि, AAP सुप्रीमो और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने हाल ही में कृषि विरोधी प्रदर्शनकारियों के लिए अपना समर्थन दिखाया है। यहाँ तक कि वे पंजाब के किसानों के साथ ‘एकजुटता’ में धरने पर बैठ गए थे। जबकि उनके साथी पार्टी कार्यकर्ता को प्रदर्शन स्थल पर प्रदर्शनकारियों के विरोध का सामना करना पड़ा।

AAP सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने किसानों के साथ ‘एकजुटता’ व्यक्त की

इससे पहले अरविंद केजरीवाल ने एक दिन के उपवास पर जाने का फैसला किया था। उन्होंने AAP कार्यकर्ताओं और समर्थकों को एक दिन का उपवास करने के लिए कहा था और साथ ही जनता से आग्रह किया था कि वे ‘किसानों के समर्थन’ में एक दिन के लिए उपवास करें। अरविंद केजरीवाल और उनकी पार्टी के नेता पंजाब के किसानों के विरोध प्रदर्शन को समर्थन देने में लगे हुए हैं, जबकि दिल्ली में उनकी सरकार ने कृषि कानूनों में से एक को अधिसूचित किया था।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और उनके विधायक जहाँ पंजाब से आए ‘किसान आंदोलनकारियों’ के समर्थन में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ दिल्ली भाजपा के पूर्व अध्यक्ष मनोज तिवारी ने खुलासा किया है कि AAP सरकार ने तो मोदी सरकार द्वारा पारित कराए गए 3 कृषि कानूनों में से एक कानून को सोमवार (नवंबर 23, 2020) को ही प्रदेश में लागू कर दिया है। उन्होंने ‘दिल्ली राजपत्र’ के दस्तावेज की तस्वीरें शेयर कर सबूत भी दिखाया।

इस दस्तावेज के अनुसार, संविधान के अनुच्छेद-123 के खंड (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में, भारत के राष्ट्रपति ने ‘कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन एवं सुविधा)’ नामक अध्यादेश, 2020 प्रख्यापित किया है, जिसे विधि एवं न्याय मंत्रालय, भारत सरकार का राजपत्र असाधारण भाग-2, खंड-1 में प्रकाशित किया गया है।

आगे लिखा है कि यह किसी भी राज्य की APMC अधिनियम या अन्य कानून के लागू होने के समय प्रवृत्त या प्रलेख के प्रभाव में आने वाले समय में लागू होगा। इस राजपत्र का गौर करने लायक हिस्सा वो है, जिसमें लिखा है, “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली की विधानसभा ने ‘दिल्ली कृषि उपज विपणन अधिनियम, 1998’ (1999 का दिल्ली अधिनियम, संख्या-7) को अधिनियमित किया है, जो जून 2, 1999 से लागू है।”

अयोध्या में राम भक्तों के सहयोग से बनेगा भव्य मंदिर, धन जुटाने के लिए देश भर में अभियान चलाएगा ट्रस्ट

5 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा नींव की ईंट रखे जाने के बाद से अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण कार्य में तेजी आई है। भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए सभी रामभक्तों की मदद लेने का फैसला किया गया है। श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट (Ram Janmbhoomi Teerth Kshetra) ने अयोध्या में बनने जा रहे भव्य राम मंदिर के निर्माण के लिए एक देशव्यापी जन संपर्क और योगदान अभियान शुरू करने की योजना बनाई है। इस दौरान लोगों को जन्मभूमि आंदोलन के ऐतिहासिक महत्व से भी अवगत कराया जाएगा।

श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ने अपने आधिकारिक बयान में कहा कि ट्रस्ट ने इस बात पर विचार किया है कि जिस तरह श्री राम जन्मभूमि के निर्माण के लिए करोड़ों रामभक्तों ने योगदान दिया, उसी तरह मंदिर भी करोड़ों श्री रामभक्तों के स्वैच्छिक योगदान से बनाया जाएगा। उन्होंने कहा कि यह अभियान पूरे देश में चलाया जाएगा। जनसंपर्क अभियान मकर संक्रांति से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक जारी रहेगा। इस अभियान के तहत अरुणांचल प्रदेश, नागालैंड, अंडमान निकोबार और त्रिपुरा जैसे सुदूर के राज्यों तक में श्रीराम मंदिर की ऐतिहासिकता से रामभक्तों को अवगत कराया जाएगा।

धनसंग्रह के लिए कूपन तैयार

ट्रस्ट ने ट्वीट कर बताया कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र सभी राम भक्तों से इस ऐतिहासिक अभियान में अपना योगदान देने का आह्वान करता है। उन्होंने बताया कि यह दान पूरी तरह स्वैच्छिक होगा, यानी कि जो व्यक्ति अपनी इच्छा से दान देना चाहे, वह दे सकता है। इसके लिए 10 रुपए, 100 रुपए और 1,000 रुपए के कूपन भी उपलब्ध कराए जाएँगे।

ट्रस्ट ने दान करने के लिए राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के बैंक खातों और दान करने की प्रक्रिया की भी जानकारी दी है। अपनी जानकारी में उन्होंने यह भी बताया है कि ट्रस्ट को दिया जाने वाला दान आयकर कानून के तहत करमुक्त है। ट्रस्ट ने कहा कि इस अभियान के जरिए करोड़ों घरों तक श्री रामजन्मभूमि मंदिर के प्रस्तावित नए मॉडल की फोटो भी पहुँचाई जाएगी।

नृपेन्द्र मिश्र की अध्यक्षता में गठित राम जन्मभूमि मन्दिर निर्माण समिति ने अयोध्या में श्रीराम मंदिर के लिए नींव डिजाइन की समीक्षा और सिफारिशों के लिए संबंधित क्षेत्र में प्रतिष्ठित इंजीनियरों की एक विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। इस समिति के गठन का उद्देश्य मन्दिर निर्माण हेतु विभिन्न स्रोतों से आए सभी विभिन्न भू-तकनीकी सुझावों को ध्यान में रखते हुए उच्चतम गुणवत्ता और दीर्घायु के साथ मंदिर का निर्माण करना है।

ट्रस्ट ने लोगों से माँगे थे सुझाव

ज्ञात हो कि इससे पहले पिछले महीने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अयोध्या (Ayodhya) में राम मंदिर के आसपास 70 एकड़ का कैंपस बनाने के लिए लोगों से सुझाव और विचार माँगे थे। विशेषज्ञ सलाहकारों द्वारा डिजाइन की गई मंदिर का मुख्य ढाँचा पारंपरिक नागर शैली में तैयार किया जा रहा है। 70 एकड़ का कैंपस मंदिर के आसपास की सुविधाओं के लिए होगा।

पिता जेल में, माँ ने जिसे छोड़ा बेसहारा.. उसे योगी की पुलिस ने दिया सहारा: जानिए 10 साल के अंकित के साथ क्या हुआ

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में एक बच्चे की कुत्ते के साथ फुटपाथ पर सोते हुए तस्वीर वायरल होने के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने उसे सहारा दिया है। 10 साल के अंकित के पिता जेल में हैं और उसकी माँ उसे छोड़कर चली गई थी।

समाचार पत्र ‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ की एक रिपोर्ट के अनुसार, अंकित मेहनत कर खुद अपना पेट तो पालता ही है, साथ में उस कुत्ते के भी खाने-पीने का पूरा इंतजाम करता है। ये कुत्ता अंकित के साथ दिनभर रहता है और अंकित ने ही उसे ‘डैनी’ नाम दिया है। एसएसपी अभिषेक यादव के निर्देश पर पुलिस ने अंकित को गत सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को ढूँढ निकाला और अब अंकित उत्तर प्रदेश पुलिस के संरक्ष्ण में है।

बताया जा रहा है कि अंकित नाम के इस बच्चे को ये भी याद नहीं है कि वो कहाँ का रहने वाला है। उसको बस इतना याद है कि उसका पिता जेल में हैं और उसकी माँ ने उन्हें छोड़ दिया है। अंकित अपने गुजारे के लिए गुब्बारे बेचता है या चाय की दुकानों पर काम करता है। अंकित अपने एकमात्र दोस्त, ‘डैनी’ कुत्ते के साथ फुटपाथ पर सोता है। दस साल के मासूम का जीवन पिछले कई सालों से ऐसा ही था।

कुछ ही दिन पहले, किसी व्यक्ति ने एक बंद दुकान के बाहर रात में एक कंबल में सोते हुए अंकित और उसके ‘दोस्त डैनी’, दोनों की तस्वीर क्लिक की और यह वायरल हो गई। तभी से उत्तर प्रदेश प्रशासन बच्चे का पता लगाने की कोशिश कर रहा था। आखिरकार सोमवार सुबह बच्चा पुलिस को मिल ही गया।

मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक यादव ने कई दिनों पहले पुलिस टीम पर दबाव डाला था जिसके बाद 9-10 साल का दिखने वाला अंकित अब जिला पुलिस की देखरेख में है। टी स्टाल के मालिक के अनुसार, अंकित का कुत्ता कभी भी उसका साथ नहीं छोड़ता है।

उनका कहना है कि जब तक लड़का दुकान में काम करता, कुत्ता एक कोने में बैठा रहता था। समाचार पत्र TOI के अनुसार, उन्होंने बताया कि अंकित बहुत ही स्वाभिमानी है और कभी भी मुफ्त में कुछ नहीं लेता, यहाँ तक कि अपने कुत्ते के लिए दूध भी नहीं।

मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक यादव ने कहा, “अब वह मुजफ्फरनगर पुलिस की देखरेख में है। हम उनके सम्बन्धियों का पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं और उनकी तस्वीरें आसपास के जिलों के विभिन्न पुलिस थानों में भेजी गई हैं। हमने जिला महिला और बाल कल्याण विभाग को भी सूचित किया है।”

एसएचओ अनिल कापरवान के मुताबिक, अंकित एक स्थानीय महिला शीला देवी के साथ रहता है, लड़का उससे परिचित है और उसे ‘बी’ कहता है, और जब तक उसका ठिकाना नहीं मिल जाता, वह एक निजी स्कूल में पढ़ेगा। स्थानीय पुलिस द्वारा स्कूल प्रबंधन से अनुरोध करने के बाद स्कूल उसे मुफ्त शिक्षा देने के लिए सहमत हो गया है।

राहुल तुम ‘नेहरू-दा’ हो, ‘नेरूदा’ मत बनो: अम्बानी को एक लाख करोड़ का ठेका तो यूपीए ने भी दिया था

पाब्लो नेरूदा लिखते हैं, “मैं तुम्हारे साथ वही करना चाहता हूँ, जो बसंत चेरी के पेड़ों के साथ करता है’। पूरी कविता में प्रकृति के अवयवों बिम्ब नायक के प्रेम की अनुभूति को अभिव्यक्त करते हैं। नेरुदा को साहित्य का नोबेल मिला था। वहीं, अपनी जीवन की एकमात्र उपलब्धि, किसी विशेष परिवार में, किसी विशेष समय-काल में पैदा हो कर, उसी के सहारे अपने पूरे व्यक्तित्व को दो बैलों के पाले को अकेले ही खींच कर ले जाने वाले राहुल गाँधी भी कविता करते रहते हैं। ये बात और है कि नेरूदा की ही तरह उनकी कविताएँ भी विलक्षण ही हैं, कारण भले ही अलग हों।

राहुल गाँधी की एक कविता देखिए: मोदी सरकार के लिए: अलग विचार रखने वाले विद्यार्थी देशद्रोही हैं। चिंतित नागरिक अर्बन नक्सल हैं। प्रवासी श्रमिक कोरोनावाहक हैं। बलात्कार पीड़िताएँ अनाम हैं। आंदोलनरत किसान खालिस्तानी हैं। और, क्रोनी कैपिटलिस्ट सबसे अच्छे मित्र हैं।”

‘ला बेले डेम सॉन्स मेर्सी’ लिखने वाले कवि जॉन कीट्स कहते हैं कि कविता अगर इतनी ही सहजता से न आए जैसे पत्ते पेड़ों पर आते हैं, तो अच्छा है कि वो न लिखी जाए। राहुल गाँधी की सहजता और बहाव ही उन्हें विलक्षण बनाता है। उन्हें किसी भी बात पर कविता आ जाती है। हैं तो कॉन्ग्रेसी लेकिन वामपंथी चिरकुटों वाले शब्दों के प्रयोग से वो कभी पीछे नहीं हटते क्योंकि उन्हें पता है अगर आप किसी ट्वीट में किसान, मजदूर, छात्र, लड़की, नागरिक आदि लिख दो तो साल में सत्रह नोबेल मिल सकते हैं।

कविताओं को ले कर फेसबुक के मित्र राजीव मिश्रा लिखते हैं, “‘किसान अन्न उपजा रहा है तो खाने को मिल रहा है, वेनेजुएला में किसानों ने अन्न उपजाना बन्द कर दिया तो लोग भूखे मर रहे हैं’ लिखना सेंटिमेंटल बात है, पर निष्कर्ष गलत है। एक कोमल हृदय कवि आपके दर्द पर पिघल कर बहुत ही मार्मिक कविता लिख देगा, पर उससे आपकी बीमारी ठीक नहीं हो जाएगी। एक निष्ठुर, कठोर हृदय डॉक्टर भी अगर तार्किक होगा, तो आपकी बीमारी और उसका इलाज बता सकेगा।”

बाकी, आपको पता ही है कि दस साल के समाजवाद ने वेनेजुएला की तेल आधारित अर्थव्यवस्था से नागरिकों को फ्री खाने की आदत लगाई और सारे उद्योग-सेवाएँ ऐसी बर्बाद हो गईं कि अब वहाँ 90-95% जनता गरीबी से जूझ रही है। कविता करने वाले नेता लोग यही चाहते हैं। उन्हें अचानक उन किसानों से प्रेम हो जाएगा जिनके घरों से सैकड़ों लोग, उनकी ही बनाई नीतियों के कारण आत्महत्या करते रहे हैं।

राहुल गाँधी ने पाँच पंक्तियों में मोदी सरकार का पंचनामा किया है जिसमें ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ कहने को मतभिन्नता कहा गया है; प्रधानमंत्री की हत्या की साजिश रचने वाले, भीमा कोरेगाँव में हिंसा करने वाले, दलित आंदोलन के नाम पर चौदह लाशें गिराने वाले ‘चिंतित नागरिक’ हैं जो नक्सलियों द्वारा सैकड़ों जवानों की घेर कर की गई हत्या पर जश्न मनाते हैं; श्रमिकों को पूरे देश से एक से दूसरे जगह ले जाने को विवश करने के बाद, सरकार द्वारा कोरोना संक्रमण की चिंता जताने पर उन्हें कोरोनावाहक कहने का झूठा आरोप लादा गया; राजस्थान में बलात्कार के आँकड़ों की अनदेखी करते हुए, हाथरस को उछालने की कोशिश करने वालों को पीड़िताओं का हितैषी बताया गया है; फुट मसाज, पिज्जा, सिनेमा का आनंद लेते हुए ‘मोदी मर जा तू‘ गाने वालों को किसान बताया है; जिन कंपनियों ने करोड़ों के घर में चूल्हा जला रखा है, रोजगार दिया है, वो क्रोनी कैपिटलिस्ट हैं।

वो राहुल बाबा है, वो कुछ भी कह सकता है कि तर्ज पर, हाल ही में अर्थशास्त्री और युद्ध मामलों के जानकार बने प्रधानमंत्री बनने के लिए ही अवतरित हुए बुजुर्ग युवा फिलहाल किसान आंदोलन को ले कर चिंतित पाए गए हैं। लेकिन, जैसा कि ऊपर लिखा गया है कि कविता कहने से वस्तुस्थिति नहीं बदलती, न ही प्रेम पर सुंदर पुस्तक लिखने वाला अपनी पत्नी को प्रेम करता है, ऐसा जरूरी है, तो राहुल गाँधी भी ऐसे शब्द अवश्य लिख सकते हैं, या पैसे हों तो लिखवा सकते हैं, लेकिन ‘थोथा चना, बाजे घना’ वाली बात हो जाती है।

किसानों को ले कर चिंतित क्यों हैं राहुल गाँधी?

किसानों की चिंता करना अनुचित नहीं है। नेताओं के लिए तो किसान और उसके मुद्दे अत्यंत ही आवश्यक चीजें हैं। लेकिन समस्या यह है कि ट्विटर से ही देश बदल देने वाले राहुल और मीम से चुनाव जीतने की आशा रखने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी किसानों को ले कर तो छोड़िए, अपनी पार्टी को ले कर भी कभी चिंतित नहीं रहे। अगर होते तो दस नवम्बर को बिहार में पृष्ठ भाग का बंदरछाप बन जाने के बाद दो दिन का स्वावलोकन और मंथन शिविर लगाते। ये बात और है कि वहाँ दो-चार-दस नेता हार की जिम्मेदारी सर पर ले लेते और राहुल-सोनिया को अपना माई-बाप घोषित कर के चले आते।

बिलों को ले कर राहुल गाँधी की ब्रह्मांड हिलाने वाली ‘न्याय’ स्कीम के सूत्रधार, सलाहकार वाले नोबेल विजेता अभिजीत बनर्जी ने गजब की गूढ़ बात कर दी। उन्होंने कहा कि किसानों को ले कर बने कानूनों में कोई समस्या नहीं है, समस्या यह है कि किसानों में सरकार को ले कर विश्वास नहीं है। साथ ही, उन्होंने यह भी कहा कि महामारी के समय में इन कानूनों सो लाने का कोई औचित्य नहीं है।

नोबेल विजेता हैं तो वो ऐसे कुतर्क कह सकते हैं, लोग सुन भी लेते हैं। लेकिन, बनर्जी को यह बताना चाहिए कि जब कानून सही हैं, तो फिर किसानों में अविश्वास क्यों है? क्या सरकार ने इन कानूनों के बारे में ठीक से चर्चा नहीं की, किसी तय व्यवस्था को दरकिनार करते हुए कानून पास करा लिए, या फिर लोगों के पास इसके प्रावधानों की जानकारी नहीं है? जी नहीं, सरकार ने अपने कई मंत्रियों के द्वारा, मीडिया चैनलों के द्वारा, किसानों के द्वारा इन कानूनों का खूब प्रचार किया है।

रवीश जैसे लोग जितना नाच लें कि अध्यादेश ले आई सरकार, लेकिन संसद ने इन विधेयकों को पास किया है। बनर्जी जितना अविश्वास के गीत गा लें लेकिन सरकार ने इसके हर प्रावधान को ले कर खूब चर्चा भी की है। अब, अगर किसी को पिज्जा खाने और मसाज करवाने में मजा आने लगा हो, तो वो कानून के प्रावधानों को क्यों पढ़ेगा? जिसे पता हो कि वो ‘आंदोलन’ में नहीं, आंदोलन ‘करने’ के लिए आया है, तो वो किसी भी बात को क्यों मानेगा?

संसद द्वारा पास किए गए कानूनों को हटाने की बात हो रही है जैसे कि संसद में जनप्रतिनिधि नहीं, कंपनियों के मालिक बैठे हुए हैं। MSP की गारंटी की बात की जा रही है, जबकि कोई यह देखने को तैयार नहीं कि सरकार MSP पर जब खरीदती है तो उसके चक्कर में होने वाले सरकारी घाटे को किसके द्वारा दिए गए टैक्स से पूरा किया जाता है। लोगों को यह नहीं जानना कि किसानों से हर साल लाखों टन अनाज आदि खरीदने के बाद सरकार उसे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेच भी नहीं पाती, क्योंकि उसे कम दाम में बेचने पर दोबारा घाटा लगेगा। इस कारण भी गोदामों में अनाज की बोरियाँ सड़ती हुई दिखती हैं।

एक बात और, अगर हर खरीदार MSP पर ही खरीदने को बाध्य हो जाएगा, तब जब सामानों का दाम बढ़ेगा तो महँगाई बढ़ने पर किसको घेरा जाएगा? समाजवाद की व्यवस्था, जहाँ नागरिकों को भी सामान सस्ता मिले और किसानों को भी ज्यादा पैसे, वहाँ संभव है जहाँ बजट सरप्लस में होता है। यहाँ हम हमेशा एक तरह की सब्सिडी को बढ़ाने के लिए दूसरी को घटाने में लगे रहते हैं। पूरी जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आधारभूत आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर पा रहा, इसलिए सरकार को उन्हें भी देखना है और दूसरों को भी।

ऐसे में समाजवादी सपने देखना सुहाना अवश्य लगता है, परंतु उसके दुष्परिणामों की चिंता किसी को नहीं। सरकार एक संतुलन बना कर चल रही है कि मंडी की व्यवस्था भी रहे और किसान उन चीजों का भी भंडारण कर सकें जो पहले सरकारी नियंत्रण में थीं, ताकि उन्हें बाद में खुले बाजार में बेच सकें। कॉन्ट्रेक्ट पर खेती का मतलब यह है कि किसान के पास एक और विकल्प है कि वो स्वयं खेती करना चाहता है या फिर, अपनी लागत के हिसाब से कंपनियों/संस्थाओं से अनुबंध कर के बाद के होने वाले आकस्मिक नुकसानों से बचना चाहता है।

अगर सरकार बजट का एक बड़ा हिस्सा इस कार्य में लगा दे जहाँ उसे हर सीजन में घाटा होना तय है, तो हो सकता है कि उसी किसान के घर में सिलिंडर की, बीमा की, आयुष्मान योजना की, पेंशन की, सम्मान निधि आदि की सब्सिडी नहीं पहुँच पाएगी। सरकारें पैसे नहीं छापती, बल्कि हमारे द्वारा दिए गए टैक्स से जमा हुए पैसों को अलग-अलग तरीके से खर्च करती है।

विकासशील देश संतुलन ही बना कर चल सकते हैं क्योंकि सब-कुछ मुफ्त में या बिलकुल ही कम मूल्य पर देने का मतलब है कि घूम-फिर कर वह चोट भी सामान्य नागरिकों की ही जेब पर लगेगी। राहुल गाँधी यह नहीं समझते क्योंकि नोटबंदी के समय में, जो दो हजार का नोट उन्होंने निकाला था, उनका काम उतने से ही चल रहा है, आम नागरिक का काम उतने से नहीं चलता।

राहुल गाँधी को राहुल गाँधी होने की लग्जरी है। उन्हें लगातार मिलती हारों के बाद भी ‘आप ही अध्यक्ष बन जाइए’ सुनने की अनसुनी लग्जरी है। उन्हें इस बात की लग्जरी है कि वो सड़कों पर लोगों को उतार कर दस हजार लोगों पर पैसे खर्च सकें ताकि उनके राजनैतिक विरोधियों को अराजकता के दम पर झुकाया जा सके। उन्हें इस बात की लग्जरी है कि वो ट्वीट में भावुक बातें लिख कर वामी-कामी मीडिया के ललना बन सकते हैं।

उन्हें इस बात की भी लग्जरी है कि वो उन्हीं बड़ी कम्पनियों को गरिया सकते हैं जिसके कारण देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ है।

क्रोनी कैपिटलिज्म बनाम नेहरूवियन सोशलिज्म

राहुल गाँधी और उनके ‘आंदोलनकारी’ किसानों की विचित्रता देखिए (अगर उनकी यह बात मान भी लें कि अडानी-अम्बानी कृषि के क्षेत्र में आ रहे हैं) कि इसी देश की संस्थाएँ अगर किसानों से कॉन्ट्रैक्ट फॉर्मिंग समेत अन्य तरीकों से अपनी जगह बनाना चाहती है तो उसे क्रोनी कैपिटलिज्म कहते हैं, लेकिन 1991 में देश की अर्थव्यवस्था को खोलने वाली नीति के लिए क्रेडिट लेना आज भी नहीं बंद करते।

वैश्विक संदर्भ में देश की अर्थव्यवस्था को खोलना समय की माँग थी, लेकिन कॉन्ग्रेस अगर कैपिटलिज्म, यानी पूँजीवादी व्यवस्था से इतना सशंकित है, तो फिर वो इसका क्रेडिट क्यों लेता है? कोका कोला और पेप्सी ने देश के पेय पदार्थों के बाजार पर क्या डुओपॉली नहीं बना रखी है? एमेजॉन, ऊबर, फेसबुक, गूगल, सैमसंग, शाओमी, नेस्ले, होंडा, ह्यूंडाय आदि कहाँ की संस्थाएँ हैं? ये क्या अपना विशुद्ध लाभ भारत में रहने दे रही हैं?

जब आपके देश की सबसे पुरानी पार्टी को विदेशी संस्थाओं द्वारा बाजारों पर एकतरफा कब्जा करना सही लगता है, और पतंजलि, अडानी, अम्बानी का आगे आना बुरा, तब आपकी सोच के गुणसूत्रों में समस्या है। कुछ विदेशी कम्पनियाँ तो पहले से ही भारत के कृषि क्षेत्र में घुसी हुई हैं, तब किसी ने आंदोलन नहीं किया। नेस्ले और पेप्सी जैसे उद्योग सॉस, नूडल्स, चिप्स, मसाले आदि कहाँ से बनाते हैं? उनको किस नीति के तहत और किस सरकार ने बुलाया, और तब कैपिटलिज्म की याद क्यों नहीं आई?

अपनी प्रासंगिकता खोता एक पत्रकार बकैत रवीश एक दिन फेक न्यूज चला देता है कि अडानी ने सरकार के लिए गोदाम बनाए हैं, और फिर उसके हिसाब से कृषि बिल बना दिए गए। जबकि सत्य यह है कि अडानी की कम्पनी यूपीए के समय में भी FCI को भाड़े पर गोदाम (सायलोज़) उपलब्ध कराती थी। उसी तरह, हर बात पर अम्बानी को घेर लिया जाता है कि वो सरकार को जेब में रख कर चलते हैं।

अगर अम्बानी सरकार को जेब में रख कर चलते थे उन पर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और ईडी के मामले नहीं चल रहे होते। एक और आँकड़ा देख लेते हैं कि 2004 में रिलायंस के एक शेयर की कीमत जहाँ ₹84 थी, वही 2014 में ₹558 हो गई। मोदी के आने के बाद यह आँकड़ा अभी ₹1973 का है। यूपीए के दस सालों में रिलायंस 6.6 गुणा बढ़ा, और मोदी के समय में छः सालों में इसकी वृद्धि साढ़े तीन गुणा की है। हर साल का भी औसत निकालेंगे तो यूपीए के समय में रिलायंस ने बेहतर वृद्धि पाई है।

हमारे देश में यह विसंगति है कि लोगों को बड़ी कम्पनियों से, या वेल्थ क्रिएटर्स से समस्या है। हम चीजों को वैसे ही देखना चाहते हैं जैसे हमारी फिल्मों में दिखाया जाता है। किसान शब्द सुनाई पड़ते ही हमें गरीब किसान याद आता है, लाला सुनते ही हमें कंगन रख कर सूद देने वाला बनिया नजर आता है, ब्राह्मण सुनते ही हमें व्यभिचारी और लालची, ढोंगी व्यक्ति की याद आती है, उद्योगपति सुनते ही हमें खून चूसने वाला और ऐश करने वाला इंसान दिखता है।

ये सारी कंडिशनिंग वामपंथियों ने कर रखी है। वामपंथियों की प्रकृति ही रही है कि वो अराजकतावादी होते हैं। सर्वहारा की बातें करने वालों ने कितनी बार सर्वहारा को सत्ता दी है, वो इतिहास जानता है। वामपंथी अपनी सफलता या आंदोलन की सफलता के लिए समाज के हर ताने-बाने को पहले बिलकुल बर्बाद कर देना चाहता है ताकि वो स्वयं को एक विकल्प के रूप में स्थापित कर सके।

जहाँ भी वामपंथी सत्ता में गए हैं, इतिहास देख लीजिए कि वहाँ का समाज किस स्थिति में पहुँच चुका था। साथ ही, उनके सत्ता में आने के बाद उनकी अपनी विचारधारा कैसी विकृत हो जाती है, वो चीन में दिखता है। विश्व के किस राष्ट्र में वामपंथ ने सामाजिक बेहतरी की है, और वो राष्ट्र वैश्विक परिदृश्य में क्या हैसियत रखता है, यह भी पता कीजिए।

वही नीच निगाह भारत पर भी है। चाहे वो इस्लामी गजवा-ए-हिंद हो, ईसाई कन्वर्जन वाले मिशनरी हों या फिर वामपंथी विचारधारा, भारत इन सबका ‘फायनल फ्रंटियर’ रहा है जहाँ ये उस तरह से कभी भी सफल नहीं हो पाए, जैसे वो अन्य जगहों पर हुए हैं। इसीलिए, राजनैतिक रूप से अलग होने के बाद भी, ये तीनों तरह के परजीवी आपको राष्ट्रवादियों के विरोध में इकट्ठा मोर्चा लिए खड़े मिलते हैं।

भारत में गरीबी ज्यादा है, और इसलिए हर पार्टी चाहती है कि हर तरह के कमज़ोर लोगों को एक दुश्मन दिखा दिया जाए। गरीबों के लिए उद्योगपतियों को राक्षस की तरह दिखाया जाता है, मुसलमानों के लिए हिन्दुओं को दुश्मन की तरह दिखाया जाता है, दलितों के लिए ब्राह्मणों को दुश्मन के तौर पर खड़ा कर दिया जाता है। वही ब्राह्मण जो गरीब है, वो दलितों के लिए दुश्मन है, भले ही दोनों की सामाजिक परिस्थिति बिलकुल एक ही है। वही हिन्दू जो दलित है, मुसलमानों की एक भीड़ के लिए काफिर बन जाता है जबकि दोनों की सामाजिक स्थिति एक-सी ही है।

ऐसे में दुश्मन तैयार करने में नेता लोग आगे रहते हैं। जिनका राजनैतिक करियर लगातार खत्म होता जा रहा है, और जो जानते हैं कि निकट भविष्य में वो सत्ता में आ ही नहीं सकते, वो कभी बेरोज़गारी भत्ते की बात करते हैं, तो कभी ‘न्याय योजना’ की। वो कभी अडानी और अम्बानी का बहिष्कार करवाते हैं, तो कभी उसी पतंजलि का जिसने हजारों कृषकों को एक नए बाजार से जोड़ा है।

आम आदमी कभी-कभी अपनी मूर्खता में वास्तविकता से इतनी दूर हो जाता है कि उसे यह भी ध्यान नहीं रहता कि एलोवेरा का जूस हो या फिर दाँत साफ करने का पेस्ट, उन सबके आधार में कृषि ही है न कि पतंजलि वाले तपस्या करते हैं और उनके च्यवनप्राश का डब्बा च्यवन ऋषि स्वर्ग से फेंक देते हैं।

किसान नहीं हैं ये, ये खराब गुणवत्ता के नुक्कड़ नाटक कलाकार हैं

‘इंदिरा को ठोका था, मोदी को भी ठोक देंगे’ से शुरु हुए आंदोलन से किसान के मुद्दे गायब हो चुके हैं और अब यह ‘हाय-हाय मोदी मर जा तू‘ तक पहुँचा है। शाहीन बाग की आंशिक सफलता के बाद इन्होंने आंदोलन के नाम पर सड़कों पर अस्थाई टाउनशिप बनाने की योजना को परफैक्ट कर लिया है। अब यहाँ फुट मसाज से ले कर सिनेमा प्रोजेक्टर और प्रोटीन शेक तथा पिज्जा मिल रहा है।

कुछ दिनों में यहाँ से भी कहानियाँ आएँगी कि सड़क पर ही आंदोलन करते हुए ‘मोदी तू मरता क्यों नी’ का रैप बनाने वाले बंटी से गाल पर ‘फक हिन्दू राष्ट्रा’ लिखवा कर घूमने वाली बबली को लव एट फर्स्ट साइट हो गया। शाहीन बाग की तर्ज पर, इस ठंढ में एक दो नवजात शिशुओं की बलि दी जाएगी ताकि अंतरराष्ट्रीय खबर बने कि क्रूर मोदी के राज में सड़कों पर ‘विरोध प्रदर्शन’ करता नवजात मर गया।

अंततः, सवाल तो यही है कि विपक्ष ने जिस बिल को अपने मैनिफेस्टो का हिस्सा बनाया था, उसी का विरोध क्यों कर रहा है? उत्तर यही है कि बिल कोई भी हो, मोदी पर फाड़ दो और विरोध में जुट जाओ। फंडिंग आ ही रही है, पिज्जा बन ही रहा है, बाबाजी के तलवों में खालिस्तानी लोग मशीनों से मालिश कर ही रहे हैं। चूँकि, पंजाब के लोग हैं तो मैं लगभग आश्वस्त हूँ कि यूट्यूब पर दिसंबर के अंत तक किसान आंदोलन का एक अल्बम जारी हो जाएगा।

ये आंदोलन कम और आयोजन ज्यादा है। भारत ही ऐसा देश है जहाँ टेंट गाड़ कर उन कानूनों के नाम पर आंदोलन होता है जिसका भारत के नागरिकों से कोई लेना-देना है ही नहीं। यहाँ एक राज्य के उन्हीं किसानों की बात को सच माना जाता है जो सरकार के विरोध में खड़े हैं लेकिन सरकार को समर्थन देने वाले भले ही संख्या में ज्यादा हैं, वो किसान होने के बाद भी गलत बताए जाते हैं।

राशन ले कर आंदोलन पर आने वाले लोग आंदोलन करने नहीं आते। उन्हें यह कैसे पता कि उन्हें चार महीने बैठना पड़ेगा? क्या उनके पास पहले का कोई उदाहरण है जहाँ ऐसा हुआ हो कि सरकार ने चार महीने तक बात ही न की हो? ऐसा उदाहरण नहीं है। शाहीन बाग बनते-बनते बन गया और सारी फंडिंग आते-आते आ गई। यहाँ शाहीन बाग का अनुभव है, इसलिए शुरुआती तौर पर चार महीने की तैयारी है, तब तक अगले चार महीने की भी हो जाएगी।

राशन ले कर आना बताता है कि चाहे सरकार तुम्हारी माँग मान भी ले, हटना नहीं है। इनकी माँग में शाहीन बाग के दंगाइयों और नक्सलियों की रिहाई की बात क्यों है? क्योंकि वो जानते हैं कि एक बार को किसानों के मुद्दे पर सरकार कुछ संशोधन कर भी दे, लेकिन रिहाई की बात तो मानेगी नहीं। साथ ही, इन्होंने संशोधन की भी माँग नहीं की है, इन्होंने सीधे तीन कानूनों को वापस लेने की बात की है जिसका विरोध भारत के बाकी 27 प्रदेशों का किसान नहीं कर रहा।

स्पष्ट है कि आपको माँग ही ऐसी रखनी है कि मानी ही न जाए, तो आंदोलन जीवित रहेगा। जैसे कि फरवरी 2020 में भीम आर्मी और सीएए विरोधी इस्लामी संगठनों ने जान-बूझ कर पुलिस से अपने पदयात्रा की अनुमति नहीं ली ताकि उन्हें ज्योंहि रोका जाएगा, वो ये कहने लगें कि मोदी की पुलिस छात्रों को आगे बढ़ने से रोक रही है।

इसलिए राशन के साथ आए लोग मुझे आंदोलनकारी नहीं लगते। भले ही उनके पास खेत हो, और वो कृषि भी करते हों, पर मेरी सहानुभूति उनके साथ नहीं है। वह इसलिए नहीं है क्योंकि मुझे उनकी मंशा पर गहन संदेह है। जब राहुल गाँधी जैसे लोग इसमें कूदते हैं, और भावुकता से भरी कविता करने लगते हैं, तब सब कुछ स्पष्ट हो जाता है।

हमारे सामने वो विचारधारा है जो तब तक लड़ने की बात रखती है जब तक जीत न जाए। उसे एक राजनैतिक पार्टी का समर्थन हासिल है जिसका नेता एक नरगधी है, लेकिन उसके पास परिवार के पुराने विकसित तंत्रों के कारण फंडिंग की क्षमता है। इस विचारधारा का मूल लक्ष्य ही बर्बादी है, सड़कों पर लोगों की अराजकता का नंगा नाच है ताकि वो जलते हुए बाजार के बीच खड़ा हो कर कह सके कि ‘देखो, इन पार्टियों ने तुम्हें क्या दिया? लोकतंत्र ने तुम्हें कहाँ पहुँचाया… इन उद्योगपतियों के घर देखो, और अपना घर देखो, इन्होंने तुमसे ही तो लूट कर यह घर बनाया है! हम तो कब से कहते थे कि सर्वहारा ही सर्वोच्च है, उसका ही राज होना चाहिए…’

बेस्ट फ्रेंड होना आवश्यक है

आज भले ही चीन से लड़ाई हो लेकिन आप शाओमी की फैक्ट्रियों में आग नहीं लगा सकते क्योंकि उसकी फैक्ट्री में भारतीय लोग काम करते हैं, उनका घर चलता है। विरोध और बेवकूफी में अंतर होता है। विदेशी निवेश भी आवश्यक है क्योंकि आपके घर में जिनके पास पैसा है, आवश्यक नहीं कि उनके पास आइफोन बनाने की क्षमता भी हो। इसलिए, कई मामलों में विदेशी निवेश से अपने देश के लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार, कच्चे माल के इस्तेमाल की आवश्यकता के जरिए अपने लोगों के लिए परोक्ष रोजगार, टैक्स के रूप में राजस्व में वृद्धि होती है।

विदेशों में ऐसे लोगों को आदर्श की तरह देखा जाता है। ऐसा नहीं है कि अम्बानी ने जियो बनाया और सबके फोन से बैंकिंग एप्प में सेंध मार कर पैसे बनाए जा रहा है। आपको किसी ने जबरन तो नहीं कहा कि जियो का सिम ले लो और रिलायंस फ्रेश से ही सब्ज़ियाँ खरीदना? अडानी ने तो जबरदस्ती नहीं की आपके साथ? टाटा ने यह तो नहीं कहा कि मेरी कार नहीं लोगे तो मोदी को बता देंगे?

क्या इन कम्पनियों ने आप पर विकल्पहीनता की भी स्थिति लाई? या सरकार ने कहीं भी कहा कि सिम तो जियो का ही लेना होगा और बिजली तो अडानी ही देगा? या फिर, सरकारी परियोजनाओं में इन कम्पनियों के होने का कारण एक बिडिंग प्रक्रिया है जो सारी कम्पनियों को उपलब्ध है? हाल ही में सुब्रमण्यम स्वामी ने पूछ दिया कि टाटा को कैसे दे दिया संसद भवन का काम? जबकि टाटा ने लार्सन एंड टूब्रो से कम पैसों की बिडिंग करके ये ठेका जीता था।

बात वही है कि जिन लोगों ने आधुनिक भारत को आकार देने में अहम योगदान दिया है, उन्हें बड़ी ही आसानी से गुंडा और लुटेरा बना कर दिखा दिया जाता है। अगर क्रोनी कैपिटलिज्म ही चल रही है तो फिर कॉन्ग्रेस पार्टी रैनबैक्सी, बिरला, टाटा, वीडियोकॉन, वेदांता, जिंदल आदि कम्पनियों से चंदा क्यों लेती रही है? आखिर यूपीए के दस सालों में एक लाख करोड़ के कॉन्ट्रैक्ट अम्बानी समूह को क्यों दिए गए?

जब ये लोग इतने घृणित हैं तो तुम्हारी पार्टी के शीर्ष नेता इनके कोर्ट केस क्यों लड़ते हैं? कहाँ चली जाती है विचारधारा? तब तुम्हें याद आएगा कि सरकारी प्रक्रिया के तहत रिलायंस ग्रुप को ठेके मिले, चंदा तो सारी पार्टियाँ लेती हैं, कोर्ट केस तो पार्टी नेता के तौर पर नहीं, एक वकील के तौर पर लड़े जाते हैं। सारा ज्ञान तभी बाहर आने लगता है।

अगर टैक्स का हेर-फेर हुआ है, किसी कम्पनी ने कहीं डाका डाल दिया, कुछ गलत किया तो उस पर सबका ध्यान खींचना आवश्यक है, लेकिन सिर्फ उस कम्पनी का बड़ा होना, उसके उत्पादों की सामाजिक स्वीकृति, उसके प्रोडक्ट्स का सफल होना कोई अपराध नहीं है। अपराध है एक पार्टी का डूबते ही जाना और शीर्षस्थ नेतृत्व का गोवा में, थायलैंड में या कोलंबिया में होना। अपराध है कि पार्टी चलाना आपका मुख्य कार्य है और आपके बड़े नेता बार-बार चिट्ठियाँ लिख रहे हैं, और आपको फर्क नहीं पड़ रहा।

ऐसा करना अपने कार्यकर्ताओं को ठगना है और राष्ट्र को एक सशक्त विपक्ष की जगह सियारों और लकड़बग्घों की एक अशक्त सेना दे देना है। राहुल गाँधी अपने मूल कार्य में असफल रहे हैं और उनके जैसे लोगों का संसद में होना सुनिश्चित करता है कि कॉन्ग्रेस ‘आँख मारे वो लड़का आँख मारे’ से ले कर ‘हँसे तो दो गालों में भँवर पड़ा करते थे’ में ही प्रसन्नचित्त है। जो पार्टी इस तरह की खुमारी में जीती हो, उसका नेता अपने आपको सेमुअल टेलर कॉलरिज और अपने ट्वीट को ‘कुबला खान’ जैसी अप्रतिम रचना नहीं मानेगा तो क्या करेगा!

गोवध रोकने वाले बिल पर फिर कॉन्ग्रेस का हंगामा: सदन में ही स्पीकर को कुर्सी से खींचा, देखें वीडियो

कर्नाटक विधान परिषद में सदन की मर्यादा उस समय तार-तार हो गई, जब कॉन्ग्रेस एमएलसी ने जबरदस्ती विधान परिषद के अध्यक्ष को कुर्सी से उतार दिया। इस मामले में कॉन्ग्रेस एमएलसी प्रकाश राठौड़ ने कहा कि बीजेपी और जेडीएस ने अध्यक्ष को गैरकानूनी तरीके से चेयरमैन बना दिया, जब सदन ऑर्डर में नहीं था। उन्होंने कहा कि बीजेपी के द्वारा यह असंवैधानिक काम करना दुर्भाग्यपूर्ण है।

उन्होंने आगे कहा कि कॉन्ग्रेस ने उन्हें चेयर से नीचे उतरने को कहा। हमें उन्हें कुर्सी से उतारना पड़ा, क्योंकि यह अवैध था। इस घटना के बाद सदन की कार्यवाही को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया। इसका वीडियो भी सामने आया है। वीडियो में स्पष्ट तौर पर देखा जा सकता है कि कुछ पार्षद उन्हें कुर्सी की तरफ घसीट रहे हैं और बाकी उन्हें नीचे उतार रहे हैं।

बीजेपी एमएलसी लहर सिंह सिरोया ने कहा, “कॉन्ग्रेस MLCs ने गुंडों की तरह व्यवहार किया और वाइस चेयरमैन को कुर्सी से नीचे घसीट लिया। उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। हमने काउंसिल के इतिहास में इससे शर्मनाक दिन नहीं देखा है। मुझे खुद शर्म महसूस हो रही है कि जनता हमारे बारे में क्या सोच रही होगी।”

गौरतलब है कि कर्नाटक विधानसभा में बुधवार (9 दिसंबर, 2020) को गोवंश वध रोकथाम और मवेशी संरक्षण विधेयक 2020 को पारित कर दिया गया। इस दौरान भी कॉन्ग्रेस ने काफी हंगामा किया। इस बिल में गाय की तस्करी, अवैध ढुलाई, अत्याचार एवं गो-हत्या में लिप्त पाए जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान भी है। बिल पेश होने के बाद भी जमकर हंगामा हुआ था। विपक्ष के नेता सिद्धारमैया आसन के पास आ गए थे।

विधान परिषद में जब गोरक्षा विधेयक पेश किया गया तो इसके खिलाफ वोटिंग के लिए कॉन्ग्रेस ने व्हिप जारी किया। कार्यवाही शुरू हुई तो चेयर पर डेप्युटी चेयरमैन थे जिसे देखकर कॉन्ग्रेस एमएलसी भड़क गए। कॉन्ग्रेस सदस्यों ने डेप्युटी चेयरमैन अश्वथनारायण को खींचकर चेयर से हटा दिया। कर्नाटक के गृह मंत्री ने कहा कि सदन में जो कुछ भी हुआ वह बर्दाश्त के काबिल नहीं है। सर्वदलीय बैठक में डेप्युटी चेयरमैन के द्वारा सदन चलाए जाने पर सहमति बनी थी। उन्होंने कहा कि कानून पास कराने के लिए कोर्ट का रास्ता खुला है। वह गवर्नर से भी इस बाबत मुलाकात करेंगे।

चिक्कमंगलुरु के विधायक गो-हत्या का विरोध और इसके खिलाफ सख्त कानून की माँग रखते हुए ट्वीट किया था, “मैंने पशुपालन मंत्री श्री प्रभु चव्हाण से कहा है कि कर्नाटक पशु वध संरक्षण और मवेशी संरक्षण विधेयक कैबिनेट में पारित हो और आगामी विधानसभा सत्र में भी पेश किया जाए।”

कश्मीरी पत्रकारों को पीटा: The Wire का आतंकवाद के खिलाफ मुखर IPS अधिकारी के खिलाफ प्रोपेगंडा

लिबरल मीडिया गिरोह अक्सर उसके पीछे पड़ जाता है, जो उनकी विचारधारा से इत्तिफ़ाक़ न रखता हो। ऐसे लोगों को चुन-चुन कर निशाना बनाया जाता है और अगर उसका कोई पूर्वज 100 वर्ष पहले साइकिल से भी गिरा हो, तो उसे भी चीख-चीख कर बताया जाता है। प्रोपेगंडा पोर्टल ‘दी वायर’ (The Wire) में खबर आई कि जम्मू कश्मीर के पत्रकारों ने IPS अधिकारी संदीप चौधरी पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है।

उनका आरोप है कि शारीरिक रूप से और फिर सोशल मीडिया पर, दोनों ही माध्यमों से पुलिस अधिकारी ने मीडियाकर्मियों को निशाना बनाया। संदीप चौधरी फ़िलहाल अनंतनाग के SSP हैं। मुदासीर कादरी और फयाज अहमद नाम के पत्रकारों के हवाले से ‘The Wire’ की खबर में दावा किया गया कि प्रदेश में चल रहे DDC चुनाव के मतदान के दौरान ही पुलिस अधिकारी ने पत्रकारों की पोलिंग बूथ पर ही पिटाई की।

साथ ही, पत्रकारों के उपकरण छीन लेने का भी आरोप लगाया गया। पत्रकारों का कहना है कि उन्हें पुलिस थाने ले जाकर कुछ घंटे हिरासत में रखा गया, जहाँ अहमद की तबीयत खराब होने के बाद उसे अस्पताल भेजना पड़ा। पीरजादा आशिक नामक एक पत्रकार ने आरोप लगा दिया कि एक खबर लिखने के कारण उसके खिलाफ भी FIR करवा दी गई थी। एक बशरत मसूद नामक पत्रकार ने कहा कि पत्रकारों को क्या लिखना है, ये पुलिस अधिकारी नहीं तय करेंगे।

‘The Wire’ तो यहाँ तक दावा कर बैठा कि SSP संदीप चौधरी का पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार करने का पुराना इतिहास रहा है। अनुराधा भसीन के बयानों के आधार पर कई दावे किए गए। जबकि ये वही पत्रकार हैं, जिनके संस्थान ‘कश्मीर टाइम्स’ का दफ्तर ही अवैध रूप से कब्जाए गए भवन में चल रहा था। कश्मीर प्रेस क्लब के अध्यक्ष के हवाले से दावे किए गए। बाद में इसे कश्मीर में ‘पत्रकारों की दुर्दशा’ से जोड़ा गया।

‘कश्मीर टाइम्स’ के संस्थापक वेद भसीन को एक प्लॉट दिया गया था, जिसका अधिकार अब वापस ले लिया गया है। इन्हें दो संपत्तियाँ दी गई थीं – एक दफ्तर के लिए और एक दिवंगत वेद भसीन के निवास के लिए। इन्हें खाली करने के लिए पहले ही नोटिस जारी किया जा चुका था। 90 के दशक में ही इस बिल्डिंग को ‘कश्मीर टाइम्स’ को दिया गया था। आज यही संदीप चौधरी के खिलाफ बयानबाजी कर रही हैं।

‘The Wire’ में IPS अधिकारी संदीप चौधरी के खिलाफ लेख

हमने जब IPS अधिकारी संदीप चौधरी के बारे में थोड़ा और खँगाला तो पता चला कि वो ‘इंडियन एक्सप्रेस’ और ‘द प्रिंट’ जैसे मीडिया संस्थानों में लेख भी लिखते हैं, जिसके माध्यम से वो आतंकवाद और उसकी पैरवी करने वालों पर करारा प्रहार करते हैं। ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख के माध्यम से उन्होंने बताया था कि कैसे अनुच्छेद-370 को निरस्त किए जाने के बाद से प्रदेश में आतंकी घटनाओं में कमी आई है।

इसके लिए उन्होंने स्थानीय कश्मीरी जनता का ही उदाहरण दिया था। संदीप चौधरी ने बताया था कि कैसे रियाज नाइकू जैसे आतंकियों का महिमामंडन किया गया। बता दें कि मीडिया का एक वर्ग रियाज नाइकू को गणित का शिक्षक बताते हुए उसके महिमामंडन में जुटा हुआ था। पत्रकार कुरतुलुद्दीन रहबर ने सोपियाँ के तुर्कवंगम से नवंबर 4, 2020 को एक स्टोरी की थी, जिसमें दो लड़कों के जन्मदिन और उनमें से एक के नाम में उन्होंने गलती की थी।

ये वही पत्रकार हैं, जिन्होंने ‘The Wire’ में IPS संदीप चौधरी के ‘पत्रकारों के साथ दुर्व्यवहार’ को लेकर लेख लिखा है। संदीप चौधरी ने असल में पत्रकार की इन गलतियों की तरफ ध्यान दिलाया था। उसने अपने लेख में जब की घटना का जिक्र किया है, एचएम कमांडर आमिर खान के गाँव लिवर में भारी पत्थरबाजी हो रही थी और तीन पत्रकारों का एक समूह लड़कों को कह रहा था कि वो एक खास राजनीतिक पार्टी के कार्यकर्ताओं को पोलिंग बूथ पर न आने दें।

जिन राजनीतिक कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किया जा रहा था, उन्होंने पुलिस से शिकायत की, जिसके बाद पुलिस को भीड़ को तितर-बितर करने को मजबूर होना पड़ा और उक्त पत्रकारों से भी कह दिया गया कि वो लड़कों को न भड़काएँ। पुलिस के बार-बार निवेदन के बावजूद वो नहीं माने तो उन्हें दछिनिपोरा क्षेत्र के उस संवेदनशील गाँव से हटाना पड़ा और इस प्रक्रिया में किसी भी पत्रकार को नुकसान नहीं पहुँचाया गया।

कुछ लोगों का कहना है कि जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद के खिलाफ संदीप चौधरी खुल कर आवाज़ उठाते रहे हैं। मई 2019 में हुए एक एनकाउंटर को लेकर ‘The Wire’ में रघु कर्नाड ने एक लेख लिखा था, जिसमें PDP प्रवक्ता ने कहा था कि चुनाव से पहले एनकाउंटर का अर्थ है लोकतांत्रिक प्रक्रिया की हत्या। ये एनकाउंटर शोपियाँ में हुआ था। बुरहान वानी का पिट्ठू लतीफ़ टाइगर नामक आतंकी इस एनकाउंटर में मार गिराया गया था।

आतंकियों के लिए ‘Gunmen’ शब्द का प्रयोग

IPS संदीप चौधरी ने इस भ्रामक खबर को लेकर आपत्ति जताई थी। वो सोशल मीडिया के माध्यम से ऐसे तत्वों पर नजर रखते हैं, इसीलिए भी ये मीडिया गिरोह चिढ़े रहते हैं। जब ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने आतंकियों के लिए ‘बंदूकधारी’ शब्द का प्रयोग किया, तब भी उन्होंने आपत्ति जताई थी। 27 नवंबर 2020 की इस खबर में बाद में ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ‘Gunmen’ की जगह ‘मिलिटेंट्स’ लिख दिया। इससे साफ़ है कि जब भी इस तरह की गलत खबरों पर कोई आपत्ति जताता है, ‘The Wire’ उस अधिकारी के खिलाफ व्यक्तिगत खुन्नस के साथ रिपोर्टिंग करता है।

उन्होंने ‘The Print’ के लिए लिखे गए एक लेख में बताया था कि कैसे पश्चिमी मीडिया रियाज नाइकू को हीरो की तरह पेश कर रहा है। उन्होंने अपना अनुभव साझा किया था कि जब वो 2008-19 तक शोपियाँ में पदस्थापित थे, तब उन्होंने कई क्रूरतम हत्याएँ देखी थीं और उनके पीछे मीडिया के इसी ‘गणित के शिक्षक’ का हाथ था। उन्होंने पूछा था कि इन आतंकियों की मौत पर हंगामा मचाने वाले तब क्यों शांत रहते हैं, जब उनके द्वारा अनगिनत हत्याएँ की जाती हैं?

पीरजादा आशिक ने दावा किया था कि आतंकियों की लाशें कब्र से निकाली जाएँगी

उन्होंने कहा कि पीरजादा आशिक ने भी समाचार पत्र ‘The Hindu’ में एक फेक न्यूज़ प्रकशित की थी, जिसके बाद उसे पूछताछ के लिए अनंतनाग बुलाया गया था। इस खबर में पीरजादा ने आरोप लगाया था कि तीन आतंकियों की लाशें कब्र से निकाली जा सकती हैं। इस खबर से कानून-व्यवस्था की समस्या उत्पन्न होने की संभावना थी। इस लेख में एक अधिकारी के माफ़ी माँगने की बात भी थी, लेकिन वो कौन है, उसने किससे माफ़ी माँगी – कोई डिटेल नहीं दिया गया।

इससे साफ़ है कि ‘The Wire’ ने आईपीएस संदीप चौधरी को इसीलिए निशाना बनाया है, क्योंकि वो आतंकी को आतंकी कहने की वकालत करते हैं और मीडिया में आतंकियों के महिमामंडन के खिलाफ रहे हैं। पत्रकारों पर युवकों को उकसा कर पत्थरबाजी कराने और एक विशेष राजनीतिक दल के कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित करने का आरोप लगा तो उलटा पुलिस अधिकारी के खिलाफ ही लेख लिख दिया गया। ये लोग जम्मू कश्मीर को शांत नहीं देख सकते।

आपको याद होगा कि ‘द वायर’ ने रियाज नायकू की मौत की खबर तो प्रकाशित की थी, लेकिन कहीं भी यह जिक्र नहीं किया कि वह एक आतंकवादी था, जिसका पहला लक्ष्य भी हर दूसरे आतंकी की तरह ही जिहाद था। घाटी में मौजूद आतंकवादियों का महिमामंडन और उन्हें पीड़ित, बेचारा, आदि-आदि साबित करने का यह अभियान बरखा दत्त जैसे कथित पत्रकारों से शुरू हुआ था। इस कतार में फिर ओसामा बिन लादेन जैसे आतंकवादियों को एक ‘आदर्श पिता’ की तरह पेश करने वाले ‘द क्विंट’ आदि भी शामिल होते रहे।

‘किसान’ आन्दोलन को भारत-पाक का आपसी मामला बताने वाले बोरिस जॉनसन होंगे गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि, स्वीकारा निमंत्रण

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत के निमंत्रण को स्वीकार कर लिया है। जॉनसन को यह निमंत्रण स्वयं पीएम नरेंद्र मोदी ने दिया था। 1993 में जॉन मेजर के बाद जॉनसन इस कार्यक्रम में भाग लेने के वाले ब्रिटेन के दूसरे प्रधानमंत्री होंगे। इस निमंत्रण को स्वीकार करने के साथ ही बोरिस जॉनसन ने भारत को अगले वर्ष यूके के G-7 शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया है।

यह जानकारी ब्रिटेन के विदेश मंत्री डोमिनिक राब ने दी है। भारत यात्रा पर आए ब्रिटिश विदेश मंत्री ने कहा कि गणतंत्र दिवस के मौके पर जॉनसन भारत आएँगे। रिपोर्ट्स के अनुसार पीएम मोदी ने 27 नवंबर को टेलीफोन पर बातचीत के दौरान जॉनसन को औपचारिक रूप से आमंत्रित किया था। इसके बाद कथित तौर पर पीएम को जी-7 शिखर सम्मेलन के लिए आमंत्रित किया गया था, जिसका आयोजन अगले साल ब्रिटेन में होगा।

ब्रिटेन के प्रधानमंत्री की यह प्रस्तावित यात्रा ब्रेक्जिट के मद्देनजर महत्वपूर्ण मानी जा रही है। साथ ही ब्रिटेन भारत जैसी अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के साथ व्यापार संबंध मजबूत करने की कोशिश कर रहा है।

गौरतलब है कि पिछले माह ही भारत ने ब्रिटेन के साथ ‘ब्रेक्जिट एन्हांस्ड ट्रेड पार्टनरशिप’ की दिशा में प्रगति की समीक्षा करने के लिए वर्चुअल मीटिंग की थी, जिससे भविष्य में ‘फ्री ट्रेड एग्रीमेंट’ हो सकता है। वार्ता के दौरान दोनों पक्षों ने व्यापार संबंधों के में तेजी लाने पर सहमति व्यक्त की।

बोरिस जॉनसन ने हाल ही में किसान आंदोलनों को बता दिया था भारत-पाक का आपसी मामला

उल्लेखनीय है कि हाल ही में ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने संसद में भारत के किसान मुद्दे पर लेबर पार्टी के सांसद के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए इसे भारत और पाकिस्तान के बीच का मुद्दा बता दिया था। उन्होंने कहा कि दोनों देशों को कोई भी विवाद द्विपक्षीय रूप से निपटाना चाहिए। उनका यह बयान लोगों के बीच बहस का विषय भी बन गया था।

कुछ लोगों ने अनुमान लगाए कि शायद बोरिस जॉनसन को इस विषय की जानकारी नहीं थी या फिर वह कन्फ्यूज हो गए। मगर वास्तविकता क्या है, यह सिर्फ ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ही जानते होंगे।

केरल: ईसाइयों ने किया हलाल माँस का विरोध, हिन्दुओं को भी किया जाता है बेचने को मजबूर

केरल में अब एक नया विवाद छिड़ गया है। दरअसल ईसाईयों के त्योहार क्रिसमस से ठीक पहले ईसाइयों ने हलाल माँस का बहिष्कार करने का फैसला किया है। समाचार पोर्टल ‘टाइम्स नाउ’ की रिपोर्ट के मुताबिक, ईसाई समुदाय के इस फैसले को हिंदू समूहों ने भी अपना समर्थन दिया है। उनका कहना है कि राज्य में हिंदू धर्म के लोग हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर हैं। क्रिश्चियन एसोसिएशन CASA ने ईसाइयों से अपील की है कि हलाल भोजन को अब उनकी खाने की टेबल पर नहीं लाया जाना चाहिए।

ईसाई समुदाय का कहना है कि ईसा मसीह के जन्मदिन पर हलाल माँस क्यों खाना चाहिए? इस विवाद पर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं। हिंदू समूहों का दावा है कि ईसाई और हिंदू दोनों को हलाल माँस बेचने के लिए मजबूर किया जाता है। वहीं आईयूएमएल ने इसे राज्य में मुस्लिम माँस की दुकानों का बहिष्कार करने के लिए उठाया गया एक कदम बताया।

उल्लेखनीय है कि ‘झटका सर्टिफिकेशन अथाॅरिटी’ के चेयरमैन रवि रंजन सिंह बताते हैं कि ‘झटका‘ विधि हिन्दुओं, सिखों आदि भारतीय, धार्मिक परम्पराओं में ‘बलि/बलिदान’ देने की पारम्परिक पद्धति है। इसमें जानवर की गर्दन पर एक झटके में वार कर रीढ़ की नस और दिमाग का सम्पर्क काट दिया जाता है, जिससे जानवर को मरते समय दर्द न्यूनतम होता है। इसके उलट, हलाल में जानवर की गले की नस में चीरा लगाकर छोड़ दिया जाता है, और जानवर खून बहने से तड़प-तड़प कर मरता है।

इसके अलावा, मारे जाते समय जानवर को खास समुदाय के पवित्र स्थल मक्का की तरफ़ ही चेहरा करना होगा। लेकिन सबसे आपत्तिजनक शर्तों में से एक है कि हलाल माँस के काम में ‘काफ़िरों’ (‘बुतपरस्त’, जैसे हिन्दू) को रोज़गार नहीं मिलेगा। यानी कि यह काम सिर्फ एक समुदाय विशेष का सदस्य ही कर सकता है।

इसमें जानवर/पक्षी को काटने से लेकर, पैकेजिंग तक में सिर्फ और सिर्फ खास समुदाय वाला ही शामिल हो सकते हैं। मतलब, इस पूरी प्रक्रिया में, पूरी इंडस्ट्री में एक भी नौकरी अन्य धर्मों के लिए नहीं है। यह पूरा कॉन्सेप्ट ही हर नागरिक को रोजगार के समान अवसर देने की अवधारणा के खिलाफ है। बता दें कि आज McDonald’s और Licious जैसी कंपनियाँ सिर्फ हलाल माँस बेचती है।

जब कार रोक फिरौती के लिए उठा लिए गए अडानी: 22 साल पुरानी कहानी जो आप शायद ही जानते हो

अहमदाबाद की एक अदालत ने दो गैंगस्टर्स फैज़लुर रहमान उर्फ़ फैजु और भोगीलाल दर्जी उर्फ़ मामा को एक 22 साल पुराने एक मामले में दो साल पहले अर्थात 2018 में अपराधमुक्त कर दिया था। ये मामला जुड़ा है 27.5 बिलियन डॉलर (2.025 लाख करोड़ रुपए) की संपत्ति वाले उद्योगपति के फिरौती के लिए अपहरण करने से, वो उद्योगपति आज दुनिया का 155वाँ और भारत का 5वाँ सबसे अमीर व्यक्ति है, जिसका नाम है – गौतम अडानी, गुजरात के बड़े कारोबारी। चूँकि, उनका नाम चर्चा में है तो आपको उस अपहरण कांड के बारे में बताते हैं कि क्या हुआ था उस समय।

अडानी, आज इस नाम से भारत में शायद ही कोई ऐसा हो, जो परिचित न हो। फैज़लुर रहमान के खिलाफ पहले से ही कई आपराधिक मामले दर्ज हैं और उन पर सुनवाई चल रही है। उसे फ़िलहाल अहमदाबाद के साबरमती सेंट्रेल जेल में रखा गया है, जबकि दर्जी जमानत पर बाहर चल रहा है। दोनों के वकील कुणाल एन शाह ने बताया कि एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज डीपी पटेल ने उनके दोनों क्लाइंट्स को इस मामले में दोषमुक्त करार दिया।

उन्होंने कहा कि अभियोजन पक्ष ये साबित करने में नाकाम रहा कि फिरौती के लिए अपहरण हुआ था और उसमें इन दोनों का कोई रोल था। उन्होंने बताया कि कई बार समन दिए जाने के बावजूद गौतम अडानी या कोई भी पीड़ित अभिसाक्ष्य या बयान दर्ज कराने के लिए नहीं पहुँचा, जिसके बाद कोर्ट को ये निर्णय लेना पड़ा। गौतम अडानी को 2 बार समन भेजा गया। शाह ने दावा किया कि गवाह और पुलिस अधिकारी घटना का ठीक से विवरण नहीं दे पाए कि आखिर हुआ क्या था।

ये घटना जनवरी 1, 1998 की है, जब मोहम्मदपुरा से कार से जाते समय गौतम अडानी और शांतिलाल पटेल को कथित तौर पर फिरौती के लिए अपहृत कर लिया गया था। आरोप है कि सामने एक स्कूटर को खड़ा कर के कार को रोका गया और फिर कुछ लोग आए, जिन्होंने दोनों का अपहरण किया। तब सरखेज थाना के सब-इंस्पेक्टर रहे आरके पटेल ने FIR दर्ज की थी, जिसमें 9 अभियुक्तों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

इसमें रहमान दर्जी, मोहम्मद उर्फ़ राजा जावेद, जयेश रतिलाल दर्जी, रियाज और अकील नामक अपराधी शामिल थे। आरोप है कि गौतम अडानी और शांतिलाल पटेल को छोड़ने के लिए 15 करोड़ रुपए की रकम माँगी गई थी और जब अपराधियों को रुपए मिल गए, तब उन्होंने गौतम अडानी को छोड़ दिया। 2009 में चार्जशीट फाइल की गई और इस मामले में 2014 में आरोप तय किए गए। आईपीसी की धारा-365 (अपहरण), 144 (गैर-कानूनी तरीके से भीड़ जुटाना) और आर्म्स एक्ट के तहत मामले दर्ज हुए थे।

लगभग 50-60 के बीच के उम्र वाला फैज़लुर रहमान मूल रूप से बिहार का रहने वाला है। उसे एक जमाने में दाऊद इब्राहिम के टक्कर का रंगदार और गैंगस्टर माना जाता था। फिरौती, अपहरण, लूट और हत्या के मामलों में आरोपित फैज़लुर से तब कारोबारी काँपा करते थे। वो 90 के दशक में और 2000 की शुरुआत में सक्रिय था। हालाँकि, अब वो जेल में बैठ कर विभिन्न थानों में कई मामलों का सामना कर रहा है।

हाल ही में रवीश कुमार ने दावा किया था कि भारत सरकार ने अडानी को फायदा पहुँचाने के लिए कृषि कानून बनने से ठीक पहले ही अन्न भण्डारण करने के साइलोस गोदाम बना लिए थे। तीसरे फार्म बिल को सितंबर 22, 2020 को मंजूरी दे दी गई जबकि रवीश कुमार के दावे के विपरीत अडानी समूह वर्ष 2007 से ही साइलोस तैयार करता आ रहा है। कृषि सुधार बिलों के खिलाफ किसान विरोध प्रदर्शनों में नाम उछाले जाने के बाद खुद अडानी समूह ने कहा है कि वो न तो किसानों से खाद्यान्न खरीदता है और न ही खाद्यान्न का मूल्य तय करता है।

CPI के अखबार का दावा- किसानों के समर्थन में सेना के 25,000 सैनिकों ने लौटाए अपने शौर्य चक्र: Fact Check

वामपंथियों द्वारा किसान आंदोलन को हाईजैक किए जाने की बातें सामने आने के बाद अब खबर आई है कि वामपंथियों का मीडिया समूह सैनिकों का नाम लेकर झूठ फैला रहा है। दावा किया जा रहा है कि किसान आंदोलन के समर्थन में 25000 सैनिकों ने अपने शौर्य चक्र मेडल वापस कर दिए हैं। जबकि हकीकत ये है कि अभी तक इतने सैनिकों को शौर्य चक्र से सम्मानित ही नहीं किया गया।

पीआईबी फैक्ट चेक के अनुसार, प्रजाशक्ति नाम के अखबार में यह दावा किया गया है। इस अखबार की एक खबर में लिखा है कि 25,000 भारतीय सैनिकों ने किसान आंदोलन के समर्थन में अपने शौर्य चक्र को वापस किया। अब इसी दावे का फैक्ट चेक करते हुए पीआईबी ने इसे फर्जी घोषित किया है।

अपने ट्वीट में पीआईबी ने कहा, “प्रजाशक्ति अखबार का दावा है कि किसानों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए  25000 सैनिकों ने शौर्य चक्र लौटाए।  लेकिन यह खबर फर्जी है। 1956 से 2019 तक में केवल 2048 शौर्य चक्र दिए गए हैं।”

बता दें कि प्रजाशक्ति अखबार कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा शुरू किया गया तेलुगु अखबार है। इसकी स्थापना 1981 में हुई थी। विकिपीडिया के मुताबिक कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया की ओर से यह प्रकाशित होता है और इसका स्वामित्व भी मार्क्सवादी पार्टी पर है।

ऐसी फर्जी जानकारी पर प्रोपगेंडा का भंडाफोड़ होने के बाद लोगों का कहना है कि आखिर प्रजाशक्ति जैसे अखबार झूठी खबर बिना तथ्य जाँजे क्यों प्रकाशित करते हैं। आखिर इनके ऊपर कार्रवाई कब होगी?

विकिपीडिया पर मौजूद जानकारी

बता दें कि इससे पहले सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार को नकारात्मक दिखाने के लिए एक वीडियो में कहा गया था कि दिल्ली में किसानों के प्रदर्शन को देखते हुए, सेना को बुलाया गया है। हालाँकि एजेंसी ने इस झूठ की भी पोल खोली थी और बताया था कि दावा गलत है। यह सैनिकों की नियमित आवाजाही का एक वीडियो था और किसान प्रदर्शन के साथ इसका कोई भी सम्बन्ध दुर्भावनापूर्ण और गलत है।