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सपा नेता इंतजार ने भाई रिजवान के साथ मिलकर किया इंटरनेशनल खिलाड़ी का रेप, जानिए कैसे करता रहा ब्लैकमेल

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में एक अंतरराष्ट्रीय महिला खिलाड़ी के साथ रेप का मामला उजागर हुआ है। महिला ने अपनी शिकायत में अपने रिश्तेदार मोहम्मद जकी, समाजवादी नेता इंतजार त्यागी और उसके भाई रिजवान त्यागी पर रेप का इल्जाम लगाया है। लड़की का कहना है कि रिश्ते में फूफा लगने वाले जकी ने गाँव के पूर्व प्रधान इंतजार और उसके भाई रिजवान के साथ मिलकर उसका रेप किया।

सॉफ्टबॉल खेलने वाली खिलाड़ी ने बताया कि 6 साल पहले वह अपना जन्म प्रमाण पत्र बनवाने के लिए ग्राम प्रधान इंतजार त्यागी के पास गई थी। उस दौरान खिलाड़ी से उसके सारे डॉक्यूमेंट्स लेकर रख लिए गए और बाद में आने को कहा गया। जब वह दोबारा सर्टिफिकेट लेने गई, तब बंदूक की नोक पर सपा नेता और उसके साथियों द्वारा उसका बलात्कार किया गया। इस बीच उसकी अश्लील तस्वीरें भी खींची गईं।

पीड़िता कहती हैं कि इस घटना के बाद से उसकी तस्वीरें वायरल करने की धमकी दे देकर कई बार उसका शारीरिक शोषण हो चुका है। लेकिन अब वह इन सबसे तंग आ गई है। उसने एसएसपी से न्याय की गुहार लगाई है, जिसके बाद समाजवादी नेता इंतजार त्यागी सहित चार लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है।

रिपोर्ट्स की मानें तो एसएसपी के आदेश के बाद सिविल लाइन्स पुलिस ने महिला की शिकायत पर आरोपितों के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 जैसी गम्भीर धाराओं में मुकदमा दर्ज किया है। साथ ही, एक पुलिस टीम तैयार की गई है जो आरोपितों को गिरफ्तार करेगी। पीड़िता ने बताया है कि उसे जान से मारने की धमकी भी दी गई थी।

कुछ खबरों में सिविल लाइन सीओ राजेश द्विवेदी के हवाले से यह भी कहा जा रहा है कि शादी का झाँसा देकर लड़की के साथ रेप की वारदात को अंजाम दिया गया। अब सभी तथ्यों पर जाँच की जा रही है। मुकदमा दर्ज हो गया है। इनमें एक व्यक्ति पीड़िता के परिवार से भी है।

DakPay: भारतीय डाक ने लॉन्च की डिजिटल ऐप, जानिए इसके बारे में

भारतीय डाक विभाग और इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक्स (IPPB) ने एक नया डिजिटिल पेमेंट ऐप डाकपे (DakPay) लॉन्च किया है। इस ऐप की लॉन्चिंग वर्चुअली की गई, जिसमें दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद भी मौजूद थे। इस इवेंट में रविशंकर प्रसाद ने COVID-19 के खिलाफ लड़ाई के दौरान इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक के प्रयासों की भी सराहना की।

केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद ने ट्वीट करके कहा कि इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक ने अपने लॉन्च के 2 साल से भी कम समय में 3 करोड़ अकाउंट का आँकड़ा पार कर लिया है। इसके लिए उन्होंने इंडिया पोस्ट ऑफिस की पूरी टीम को बधाई भी दी है। ऐप लॉन्च करते हुए संचार मंत्रालय ने कहा कि डिजिटल वित्तीय समावेश को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए इस ऐप को लॉन्च किया गया है।

उल्लेखनीय है कि DakPay सिर्फ एक डिजिटल पेमेंट ऐप नहीं है बल्कि इसके जरिए उपभोक्ताओं को संबंधित बैंक और डाक की अन्य सेवाएँ भी मिलेंगी। डाकपे ऐप (DakPay) में भी डिजिटल पेमेंट के लिए QR कोड स्कैन करने की सुविधा है।

यह ऐप बायोमैट्रिक के जरिए कैशलेस इकोसिस्टम तैयार करने में भी मदद करेगी। इससे किसी भी बैंक के ग्राहकों को इंटर-ऑपरेबल बैंकिंग सर्विसेज मिलेंगी और वो बिल पेमेंट भी कर सकेंगे।

DakPay ऐप को गूगल प्ले-स्टोर से मुफ्त में डाउनलोड किया जा सकता है। डाउनलोड करने के बाद नाम, मोबाइल नंबर और पिन कोड के साथ ऐप में प्रोफाइल बनानी होगी। इसके बाद अपने बैंक अकाउंट को ऐप से लिंक कर सकते हैं। ऐप में यूपीआई ऐप की तरह चार अंकों का एक पिन बनाना होगा। इस ऐप से किराना स्टोर से लेकर शॉपिंग मॉल तक हर जगह पेमेंट किया जा सकेगा।

इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक

इंडिया पोस्ट पेमेंट्स बैंक (IPPB) की स्थापना डाक विभाग के तहत की गई है। IPPB को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सितंबर 01, 2018 को लॉन्च किया गया था। बैंक की स्थापना भारत में आम आदमी के लिए सबसे सुलभ, सस्ती और विश्वसनीय बैंक बनाने के लिए की गई है।

 

कोई दूध लेने का कॉन्ट्रैक्ट करता है, तो क्या भैंस लेकर चला जाता है, भ्रम फैलाने वालों को परास्त करेगी जनता: PM मोदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) को गुजरात के कच्छ पहुँचे। यहाँ उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े नवीकरणीय ऊर्जा पार्क (World’s Largest Renewable Energy Park) का शिलान्यास किया। कार्यक्रम के दौरान पीएम मोदी ने किसान आंदोलन का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग राजनीति कर रहे हैं और किसानों के कंधे पर बंदूक रखकर चला रहे हैं। मगर उन्हें देश का किसान परास्त करके रहेगा।

पीएम मोदी ने कहा कि दिल्ली के आसपास आजकल किसानों को डराने की साजिश चल रही है। उन्होंने कहा, “अगर कोई आपसे दूध लेने का कॉन्ट्रैक्ट करता है, तो क्या भैंस लेकर चला जाता है? जैसी आजादी पशुपालकों को मिल रही है, वैसी ही आजादी हम किसानों को दे रहे हैं। कई वर्ष से किसान संगठन इसकी माँग करते थे, विपक्ष आज किसानों को गुमराह कर रहा है लेकिन अपनी सरकार के वक्त ऐसी ही बातें करता था।”

‘किसानों को भ्रमित कर रहा विपक्ष’

पीएम ने कहा कि यही लोग इस कानून की माँग कर रहे थे। आज विपक्ष में बैठकर किसानों को भ्रमित कर रहे हैं। सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाया है ताकि किसानों की आय बढ़े, समस्याएँ कम हों। इस ईमानदार नियम, ईमानदार प्रयास को देश के हर कोने के किसान ने आशीर्वाद दिया है। आशीर्वाद की ताकत, भ्रम फैलाने वालों, राजनीति करने वालों, किसानों के कंधे पर बंदूक रखने वालों को देश के किसान परास्त करके रहेंगे।

‘किसानों की समस्या हल करना सर्वोच्च प्राथमिकता’

पीएम ने कहा, “मैं अपने किसान भाइयों से फिर कह रहा हूँ, बार-बार कह रहा हूँ कि उनकी हर समस्या के समाधान के लिए सरकार 24 घंटे तैयार है। किसानों का हित पहले दिन से सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

परियोजना पर बोलते हुए पीएम ने कहा कि इसका बहुत बड़ा लाभ यहाँ के आदिवासी भाई-बहनों, यहाँ के किसानों-पशुपालकों, सामान्य जनों को होगा। उन्होंने कहा कि इस परियोजना के बाद 5 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड रोकने में मदद होगी। यह 9 करोड़ पेड़ लगाने के बराबर पर्यावरण के लिए लाभकारी होगा।

पीएम मोदी ने कहा कि इस परियोजना से कच्छ के युवाओं को बड़ा फायदा होगा क्योंकि इससे 1 लाख रोजगार उत्पन्न होगा। गुजरात देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने सौर्य ऊर्ज को लेकर सबसे पहले नीतियाँ बनाईं और बढ़ावा दिया।

‘कच्छ की विकास यात्रा में होंगे नए आयाम’

पीएम ने कहा कि कच्छ ने न्यू एज टेक्नोलॉजी और न्यू एज इकोनॉमी, दोनों ही दिशा में बहुत बड़ा कदम उठाया है। चाहे वो खावड़ा का नवीकरणीय ऊर्जा पार्क हो, मांडवी का डिसलाइनेशन प्लांट और अंजार में सरहद डेहरी ऑटोमैटिक प्लांट का शिलान्यास, तीनों ही कच्छ की विकास यात्रा में नए आयाम लिखेंगे।

यह है परियोजना

खावड़ा में विश्व के सबसे बड़े मिश्रित नवीन ऊर्जा पार्क और अरब सागर तट के पास मांडवी में खारे पानी को इस्तेमाल योग्य बनाने वाले एक संयंत्र का डिजिटल तरीके से शिलान्यास किया गया। 30 हजार मेगावाट का मिश्रित नवीन ऊर्जा पार्क में सौर पैनल और पवनचक्की की मदद से ऊर्जा पैदा की जाएगी।

दो साल में पूरा होगा काम

अक्षय ऊर्जा पार्क 72,600 हेक्टेयर में फैला होगा, और इसमें पवन और सौर ऊर्जा भंडारण के लिए समर्पित जोन और साथ ही सोलर एनर्जी स्टोरेज और वाइंड पार्क गतिविधि के लिए एक विशेष जोन होगा। इस प्रॉजेक्ट के लिए गुजरात सरकार ने सितंबर 2020 में अपनी मंजूरी दी थी। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस प्रॉजेक्ट को पूरा करने में दो साल का समय लगेगा। भारत-पाकिस्तान की सीमा पर बंजर जमीन पर बन रहे इस पार्क में सोलर और विंड एनर्जी प्रॉजेक्ट के लिए कई कंपनियों को जमीन आवंटित किया जा चुका है।

इन कंपनियों को जमीन आवंटित

राज्य सरकार ने जिन कंपनियों को प्रॉजेक्ट के लिए जमीन अलॉट की है उनमें अडानी ग्रीन एनर्जी लिमिटेड, सर्जन रियलिटीज लिमिटेड, एनटीपीसी लिमिटेड, गुजरात स्टेट इलेक्ट्रिसिटी कॉर्पोरेशन और गुजरात इंडस्ट्रीज पावर कंपनी लिमिटेड प्रमुख हैं।

‘सत्याग्रह क्षणिक उत्साह नहीं, अनुशासन से होता है’: जब बारदोली में किसान आंदोलन का नेतृत्व कर ‘सरदार’ बने वल्लभभाई पटेल

आज जब पूरे भारत में ‘किसान आंदोलन’ के नाम पर अराजकता फैलाने की कोशिश की जा रही है, हमें ज़रूरत है इतिहास के ऐसे किसान नेताओं को याद करने की, जिन्होंने सचमुच में किसानों के भले के लिए खुद आगे आकर नेतृत्व किया। मोतिहारी के राजकुमार शुक्ल लगातार गाँधीजी के पीछे पड़े रहे, जिससे उन्हें यहाँ आकर निलहे अंग्रेजों से चंपारण को मुक्ति दिलानी पड़ी। इसी तरह गुजरात के किसानों के लिए ‘बारदोली सत्याग्रह’ कर वल्लभभाई पटेल ‘सरदार’ बने।

आज इस ‘किसान आंदोलन’ का क्रेडिट लेने के लिए कॉन्ग्रेस, AAP और अकाली दल आपस में मारामारी कर रहे हैं। किसानों के संगठन आपस में सिर-फुटव्वल कर रहे हैं। वो बता नहीं पा रहे कि किसान हित में लाए गए तीनों कृषि कानूनों में समस्या क्या है। जबकि सरकार ने इसके कई फायदे गिना दिए हैं। खालिस्तानी नारे लग रहे, दिल्ली और भीमा-कोरेगाँव दंगों के आरोपितों का समर्थन हो रहा। सब कुछ किसानों के नाम पर।

इसीलिए, आज हम आपको ‘बारदोली आंदोलन’ की याद दिला रहे हैं। गुजरात के इस आंदोलन को महात्मा गाँधी का भी आशीर्वाद प्राप्त था। हम आगे बात करेंगे कि कैसे ये आंदोलन आज के किसान नेताओं के लिए मिसाल होना चाहिए और किस तरह आज़ाद भारत के इन नेताओं को अंग्रेजों के जुल्मोसितम के बीच हुए इस सत्याग्रह को याद करना चाहिए। ऐसा इसीलिए, क्योंकि आज इन नेताओं के बीच न कोई ‘सरदार’ है, न कोई चौधरी चरण सिंह।

आज की इस अराजकता को कुछ पल भूल कर चलते हैं 1921 में, जब गुजरात में दुर्भिक्ष के कारण किसानों की स्थिति खासी बुरी हो गई थी। खेत सूखे पड़े हुए थे और उत्पादन 20% भी मुश्किल से हो पाया था। अंग्रेजों के अधिकारी उत्पादन के आँकड़ों में हेराफेरी करते रहते थे। आखिर उन्हें ज्यादा लगान की वसूली दिखा कर अपने आकाओं को खुश जो करना था! 3 वर्ष पहले ही खेड़ा में सत्याग्रह हुआ था, उससे ज़रूर किसानों को कुछ हिम्मत मिली थी।

1921 के सूखाग्रस्त वर्ष में सूरत स्थित बारदोली तहसील के किसान लगान भरने में सक्षम नहीं हो पाए थे। अंग्रेजों ने इसे एक ऐसी गुस्ताखी माना, जिसकी ‘सजा’ देने के लिए वो अंदर ही अंदर कुलबुला रहे थे। हालाँकि, तब वो किसानों से कुछ नहीं कह पाए थे। अंग्रेजों की याद्दाश्त देखिए कि 1921 में जो हुआ, उस एक तहसील के किसानों की ये ‘गलती (उनकी नजर में)’ उन्हें 1928 में भी याद थी।

तभी 1928 में लगान को अचानक से 66% बढ़ा दिया गया। बारदोली के किसान मेहनती थे। उन्होंने अपनी लगन और मेहनत से अपनी समृद्धि का रास्ता तय किया गया। भारत माँ की वो जमीन भी खासी उर्वरा थी। वहाँ के कई किसान अफ्रीका भी गए थे, जहाँ से पूँजी लेकर लौटे थे। उनकी काश्तकारी की भी मिसाल दी जाती थी। ऐसे में अंग्रेजों द्वारा अचानक से लगान में इतनी ज्यादा वृद्धि किए जाने से उन्हें धक्का लगा।

ऐसे में इन किसानों ने अत्याचारी अंग्रेजों के सामूहिक प्रतिकार का निर्णय लेते हुए ऐलान किया कि वो लगान नहीं देंगे। महात्मा गाँधी को आंदोलन का नेता नहीं बनाया जा सकता था, क्योंकि वो पूरे देश के सफर में लगे रहते थे और कॉन्ग्रेस के कार्यों में भी व्यस्त रहते थे। ऐसे में आए आए वल्लभभाई पटेल, जिनके पास महात्मा गाँधी के साथ काम करने का अच्छा अनुभव था। किसानों जा जत्था सीधा अहमदाबाद पहुँचा।

वल्लभभाई पटेल के घर पर किसानों का हुजूम उमड़ पड़ा। इनमें कई गरीब किसान भी थे, जिन्होंने उनसे अपील की कि वो इस आंदोलन का नेतृत्व करें। वल्लभभाई पटेल एक सफल अधिवक्ता था। ऐसे में उन्हें पता था कि लोगों का उत्साह कभी भी ठंडा पड़ सकता है। इसीलिए, उन्होंने उन्हें वास्तविकता समझाई। गाँधीजी की पोती (उनके तीसरे बेटे रामदास गाँधी की बेटी) सुमित्रा कुलकर्णी के शब्दों में समझें तो:

“वल्लभभाई पटेल कोई कच्चे खिलाड़ी नहीं थे। ढाई दिन के उत्साह में बेवकूफ बनने वालों में वो नहीं थे। क्षणिक उत्साह वाले लोगों का क्या कहना! आज चाहा तब मूँछ नीची कर के जी-हुजूरी करेंगे और वल्लभभाई पटेल को होली की आग में नारियल के समान होम कर अलग हट जाएँगे। उन्होंने तुरंत सत्याग्रह की कठिनाइयों का वर्णन कर दिया। सत्याग्रह में चक्की पीसनी पड़ती है। जाति-धर्म और आचार-विचार के बंधन तोड़ने होते हैं। पाखाना सफाई तक करनी पड़ती है। असल में पटेल लोगों को वास्तविकता का भान करा समझाना चाहते थे कि सत्याग्रह गंभीर होता है, खिलवाड़ नहीं है। सभी को मर-मिटने के लिए तैयार रहना चाहिए। इसीलिए, उन्होंने अपने शब्द कड़े किए।”

सभी किसानों ने कहा कि वो सत्याग्रह के नियमों का पालन करते हुए जान तक देने के लिए भी तैयार हैं। इस तरह से पटेल ने उन्हें अनुशासन भी सिखाया और अपने हक़ की लड़ाई में उनका नेता बनना भी स्वीकार किया। किसान बारदोली लौटे और एक सूची के साथ आए, जिसमें मर-मिटने का वादा करने वालों का नाम था। इसके बाद किसानों का वो जत्था साबरमती आश्रम पहुँचा। महात्मा गाँधी ने उन्हें सफलता की शुभकामनाएँ दी। तैयारियाँ शुरू हो गई।

यहाँ एक चीज देखिए। जहाँ एक तरफ पटेल ने किसानों को सत्याग्रह का महत्व समझा कर उन्हें देश की आज़ादी की बड़ी लड़ाई के लिए तैयार किया, वहीं दूसरी तरफ जिस तरह से किसान पूरे विचार-विमर्श के बाद ये सूची लेकर आए कि किस घर से किसे मर-मिटने के लिए भेजा जा सकता है – उनकी अपने नेता वल्लभभाई के प्रति श्रद्धा को दिखाता है। आज न कोई ऐसा अनुशासन सिखाने वाले नेता हैं, और न ऐसे संगठन।

आज जब ‘किसान आंदोलन’ में शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे दंगाइयों को छुड़ाने की माँग की जाती है और संगठन उसका समर्थन करता है, तब कोई किसान नेता इस पर आवाज़ नहीं उठाता। महिलाएँ मोदी की मौत की दुआ माँगती है, कोई खालिस्तानी इंदिरा गाँधी की हत्या की याद दिलाते हुए पीएम मोदी को धमकाता है और कोई ‘जय हिंद’ के नारे को नकार देता है – ऐसे दसियों उदाहरण हैं जो इन नेताओं की पोल खोलते हैं।

सरदार पटेल हवा-हवाई नेता नहीं थे। उन्होंने बारदोली आश्रम को ही अपना मुख्य केंद्र बनाया और वहीं से आंदोलन का संचालन शुरू कर दिया। उस ‘स्वराज आश्रम’ में 1922 से कताई-बुनाई का कार्य होता था और उसका नाम ‘स्वराज आश्रम’ रखा गया था, जो एक सुंदर वाटिका की तरह था। रामदास गाँधी इस आश्रम के व्यवस्थापक हुआ करते थे। सत्याग्रह के दौरान 6 महीनों तक पटेल वहीं रहे। उनकी बेटी भी इस दौरान उनके साथ रहीं।

गाँधीजी ने भी महादेव देसाई को अपना प्रतिनिधि बना कर यहाँ भेजा। बारदोली तहसील के एक-एक स्त्री-पुरुष, बच्चे वहाँ पहुँचे। सभी पटेल को देखना चाहते थे। हजारों लोगों ने कुछ इस तरह से अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह का ऐलान किया, जैसे उन्हें मृत्यु का भय ही नहीं हो। लोग ऐसे चले, जैसे ख़ुशी से बरात जा रहे हों। उन्होंने लगान न भरने और अंग्रेजों का अहिंसक प्रतिकार करने का निर्णय लिया। कबीरदास का ये भजन उनका सम्बल बना, जिसे वो दोहराते चलते थे:

सूर संग्राम को देखि भागै नहीं, देखि भागै सोई सूर नाहीं।
काम औ क्रोध मद लोभ से जूझना, मँड़ा घमसान तहँ खेत माहीं॥१॥
सील औ साँच संतोष साही भये, नाम समसेर तहँ खूब बाजै।
कहत कबीर कोइ जूझिहैं सूरमा, कायराँ भीड़ तहँ तुरत भाजै॥२॥

बारदोली का नाम हो गया। गुजरात के समाचारपत्रों में वहाँ के सत्याग्रह की खबरें छपने लगीं और फिर पूरे देश में भी लोगों की नजरें इस पर आकर ठहर गईं। अलग-अलग क्षेत्रों के किसान जो परेशान थे, आशा भरी निगाहों से इस आंदोलन की सफलता की कामना करने लगे, क्योंकि इससे उन्हें भी उत्साह मिलता। सौराष्ट्र के लोकप्रिय कवि फूलचंद दास भी अपनी भजन मंडली के साथ आए और उन्होंने जन-जागरण में पूरा साथ दिया।

कुल 300 स्वयंसेवक पटेल कि सहायता के लिए बारडोली पहुँचे थे। हर गाँव में ऐसे कर्मठ लोगों को लगाया गया, ताकि सभी को इस आंदोलन से जोड़ा जा सके। पटेल ने कई कैंप बनाए। तब बारडोली के 130 गाँवों में 86,000 के आसपास लोग रहा करते थे। सरदार ने इस सत्याग्रह का सुचारु रूप से संचालन किया और कुछ अनुभवी सत्याग्रहियों को इस काम में लगाया। इसके बाद अंग्रेजों का दमन चक्र भी शुरू हुआ।

गुजरात में ‘महाराज’ के नाम से जाने जाने वाले कर्मठ कर्मयोगी रविशंकर को गिरफ्तार कर लिया गया, जिन्हें सम्पूर्ण आंदोलनकारी कहा जाता था। महात्मा गाँधी तक ने भी कहा कि इस आंदोलन की शुरुआत में ही उनके जैसे ‘श्रेष्ठ ब्राह्मण’ को गिरफ्तार किया गया है, सफलता जरूर मिलेगी। किसी का घर सील कर दिया गया, किसी को नजरबंद किया गया, किसी को जेल में डाल दिया गया। अब राष्ट्रीय नेताओं के संदेश भी आने लगे थे।

इन सबकी पूरी डिटेल एक ‘सत्याग्रह-विवरण’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित किया जाता था। मात्र 1 घंटे में इसकी 10,000 प्रतियाँ समाप्त हो जाया करती थीं। ऊपर से पटेल के भाषण ऐसे होते थे, जिन्हें सुन कर लोगों को हिम्मत मिलती थी। अंग्रेजों ने किसानों से अपनी जेलें भर दीं। घर तो दूर की बात, उनके खेत और जानवर तक जब्त किए जाने लगे। कई किसानों की पिटाई हुई। महिलाओं को भी प्रताड़ित किया गया।

जनता झुकी नहीं। रामदास गाँधी को भी मार-मार कर जेल भेज दिया गया। अंत में अंग्रेजों को कोई रास्ता न सूझा तो बंबई के गवर्नर का आदेश आया कि वल्लभभाई पटेल को गिरफ्तार कर लिया जाए। गाँधीजी को जैसे ही इसकी सूचना मिली, उन्होंने तार भेजा कि जहाँ जैसी जरूरत पड़े, वो आने को तैयार हैं। पटेल ने उन्हें जवाब भेजा कि आप आ सकते हैं। गाँधीजी बारदोली पहुँच गए और अंग्रेजों की मुश्किलें और बढ़ गईं।

अंग्रेजों को लगने लगा था कि अब और सत्याग्रहियों को जेल में डालने से ये और भी उग्र हो जाएगा। उन्होंने पटेल को वार्ता के लिए बुलाया। किसानों के प्रतिनिधिमंडल से बातचीत की गई। ऐसी लगान की व्यवस्था की गई, जो दोनों पक्षों की सहमति से हो। महिलाओं ने इस आंदोलन का सफलतापूर्वक संचालन करने वाले वल्लभभाई पटेल को ‘सरदार’ की उपाधि से नवाजा। देश भर के किसानों के बीच उत्साह का संचार हुआ।

संत विनोबा भावे की मानें तो सरदार पटेल के दो कार्यों ने उन्हें अमर बनाया, एक तो बारदोली सत्याग्रह और एक खंड-खंड में बँटे रियासतों को एक करने का। आंध्र के पट्टाभि सीतारमैया ने इसकी तुलना ‘इजराइलियों का मिस्र से बहिर्गमन’ से किया। सरदार पटेल ने आंदोलन शरू होने से पहले शांतिपूर्ण समाधान के लिए बम्बई के गवर्नर को पत्र लिख कर इस लगान व्यवस्था को दोषपूर्ण, हानिकारक और आपत्तिजनक बताया था।

जब कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला तभी उन्होंने आंदोलन में कदम रखा। उन्होंने बारदोली की जनता से कह दिया था कि अगर वो पीछे हटे तो पूरे देश की नाक नीची हो जाएगी, वहीं वो जीते तो संसार भर में देश का मस्तक ऊँचा हो जाएगा। उन्होंने अंग्रेजों की टॉप और बंदूकों के बदले सत्य और दुःख सहने की शक्ति को अपना हथियार बताया। उनका कहना था कि जालिम सत्ता भी एकता से प्रतिकार करने वाली प्रजा के सामने नहीं टिक सकती है।

उन्होंने एक संगठन बना कर अनुशासित तरीके से आंदोलन का संचालन किया। उन्हें पता था कि जनता को तोड़ कर एकता भंग करने का प्रयास किया जाएगा। जब पटेल पर ‘बाहरी व्यक्ति’ होने का आरोप लगाया गया तो उन्होंने अंग्रेजों से पूछा कि इस देश का खून चूसने वाली इस सत्ता में कहाँ के लोग भरे पड़े हैं? मुस्लिमों और पठानों को बरगला कर अंग्रेजों ने फूट डालने की कोशिश की। सरदार पटेल ने सत्ता की तुलना मदोन्मत हाथी से करते हुए एक भाषण में बताया कि मच्छर जब उसके कान में घुसेगा तो वो सूँड पटक कर लोटने लगता है।

इन किसान संगठनों को सरदार वल्लभभाई पटेल के बारदोली सत्याग्रह से सीखना चाहिए कि आंदोलन कैसे होता है। आंदोलन में देश के प्रति श्रद्धा की भावना रखी जाती है, ‘जय हिंद’ को नकारा नहीं जाता। जनता को परेशान नहीं किया जाता है, उसे साथ लिया जाता है। क्रूरतम सत्ता भी जब झुके तो उससे बातचीत की जाती है, ताकि अपने लोग सुरक्षित रहें। यहाँ तो लोकतंत्र है और कृषि कानून भी किसानों के भले के लिए बने हैं।

Source: (Mahatma Gandhi : Mere Pitamah : By Sumitra Gandhi Kulkarni)
(सरदार वल्लभभाई पटेल, व्यक्ति एवं विचार: By NC मेहरोत्रा And डॉ रंजना कपूर)

प्रणब मुखर्जी की किताब The Presidential Memoirs में ऐसा क्या है? बेटा चाहता है न छपे, बेटी कह रहीं – छपने दो

दिवंगत पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के बेटे अभिजीत मुखर्जी ने उनके संस्मरण ‘The Presidential Memoirs’ के प्रकाशन को लेकर आपत्ति जताई है और इस पर कुछ वक्त के लिए रोक लगाने की माँग की है। मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) को उन्होंने पब्लिकेशन हाउस को टैग कर एक साथ कई ट्वीट करके इस किताब को पहले पढ़ने का आग्रह किया और फिर ही इसे प्रकाशित किए जाने की माँग की।

हालाँकि प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा मुखर्जी ने अपने भाई से बेवजह की बाधा उत्पन्न नहीं करने का अनुरोध किया है। संस्मरण को प्रकाशित करने को लेकर भाई-बहन में विरोधाभास की स्थिति हो गई है।

अभिजीत ने कहा कि जारी किए गए अंश ‘मोटिवेटिड’ थे और पूर्व राष्ट्रपति ने इनके लिए मंजूरी नहीं दी होगी। उन्होंने पब्लिकेशन ग्रुप रूपा बुक्स से इस किताब के प्रकाशन को रोकने के लिए कहा है। उन्होंने अपने ट्वीट में माँग की है कि चूँकि वो संस्मरण के लेखक (प्रणब मुखर्जी) के पुत्र हैं, ऐसे में इसे प्रकाशित किए जाने से पहले वो एक बार किताब की सामग्री को देखना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वो चाहते हैं कि किताब को प्रकाशित करने के लिए उनकी लिखित अनुमति ली जाए।

उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक का पुत्र, आपसे आग्रह करता हूँ कि संस्मरण का प्रकाशन रोक दिया जाए, और उन हिस्सों का भी, जो पहले ही चुनिंदा मीडिया प्लेटफॉर्मों पर मेरी लिखित अनुमति के बिना घूम रहे हैं। चूँकि मेरे पिता अब नहीं रहे हैं, तो मैं उनका पुत्र होने के नाते पुस्तक के प्रकाशन से पहले उसकी फाइनल प्रति की सामग्री को पढ़ना चाहता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है कि यदि मेरे पिता जीवित होते, तो उन्होंने भी यही किया होता।”

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “इसलिए, उनका पुत्र होने के नाते मैं आपसे मेरी लिखित अनुमति के बिना इसका प्रकाशन तुरंत रोकने का अनुरोध करता हूँ, जब तक मैं इसकी सामग्री को पढ़ न लूँ। इस संदर्भ में मैंने एक विस्तृत पत्र आपको प्रेषित किया है, जो जल्द ही आपको मिल जाएगा।”

वहीं शर्मिष्ठा ने अपने भाई की बात पर आपत्ति जताते हुए कहा, “मैं, ‘The Presidential Memoirs’ के लेखक की पुत्री अपने भाई अभिजीत मुखर्जी से आग्रह करती हूँ कि वो हमारे पिता द्वारा लिखी गई आखिरी किताब के प्रकाशन में बेवजह की बाधा उत्पन्न न करें। उन्होंने बीमार पड़ने से पहले पांडुलिपि को पूरा कर लिया था।”

शर्मिष्ठा ने आगे लिखा, “अंतिम ड्राफ्ट में मेरे पिता के हाथ से लिखे नोट्स और टिप्पणियाँ हैं, जिनका सख्ती से पालन किया गया है। उनके द्वारा व्यक्त किए गए विचार उनके खुद के हैं और किसी को भी किसी सस्ते प्रचार के लिए प्रकाशित होने से रोकने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। यह हमारे दिवंगत पिता के लिए सबसे बड़ा नुकसान होगा।”

साथ ही उन्होंने एक अन्य ट्वीट में यह भी बताया कि किताब का टाइटल ‘The Presidential Years’ है, न कि ‘The Presidential Memoirs’।

बता दें कि प्रणब मुखर्जी के संस्मरणों की यह किताब जनवरी, 2021 में प्रकाशित हो रही है। उनकी किताब के कुछ अंश पिछले हफ्ते जारी किए गए थे, जिसमें सोनिया गाँधी और मनमोहन सिंह की क्षमता पर सवाल उठाए जाने का जिक्र था। इसे लेकर एक बार फिर सोनिया की क्षमता और मनमोहन सिंह के कार्यकाल पर हमले शुरू हो गए थे। हालाँकि, कॉन्ग्रेस ने इन अंशों पर बिना किताब पढ़े कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया था, लेकिन अब उनके बेटे अभिजीत मुखर्जी ने किताब को प्रकाशित किए जाने से पहले पढ़ने की माँग की है।

प्रणब मुखर्जी ने अपने संस्मरण में लिखा है, “कॉन्ग्रेस के कुछ सदस्यों की सोच थी कि अगर 2004 में मैं प्रधानमंत्री बना होता तो 2014 में पार्टी को जो पराजय देखनी पड़ी, उसे टाला जा सकता था। यद्यपि मैं इस सोच से इत्तेफाक नहीं रखता। लेकिन, मैं ये ज़रूर मानता हूँ कि 2012 में मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद कॉन्ग्रेस पार्टी के आलाकमान ने राजनीतिक फोकस खो दिया।” 

भारत रत्न प्रणब मुखर्जी ने 2018 में संघ के एक कार्यक्रम में बतौर मुख्य अतिथि शिरकत की थी। ‘संघ शिक्षा वर्ग-तृतीय’ नामक यह कार्यक्रम 7 जून 2018 को नागपुर के संघ मुख्यालय में हुआ था। प्रणब मुखर्जी के इस फैसले ने कॉन्ग्रेस को भी असहज कर दिया था। इसको लेकर कॉन्ग्रेस से मतभेद भी हुआ, लेकिन उस दिन देश के प्राचीन इतिहास से लेकर उसकी संस्कृति तक प्रणब मुखर्जी ने जो कुछ कहा, वह बीते कल में भी प्रासंगिक था और आने वाले कल में भी प्रासंगिक रहेगा।  

बता दें कि जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी को देश के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार भारत रत्न से सम्मानित किया गया तो इस मोके पर गाँधी परिवार से किसी सदस्य ने हिस्सा नहीं लिया। इस दौरान कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी और यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी दिखाई नहीं दिए। राहुल गाँधी और सोनिया गाँधी के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी इस समारोह में नहीं दिखाई दिए। वहीं राष्ट्रपति भवन में आयोजित समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह मौजूद थे। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने प्रणब मुखर्जी को भारत के सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से सम्मानित किया।

एक का गैंगरेप, दूसरी पर धर्मांतरण का दबाव: आदिवासी नाबालिगों की आवाज उठाने पर 14 ABVP कार्यकर्ता पहुँचे जेल

छत्तीसगढ़ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP/अभाविप) के सदस्य इन दिनों दो आदिवासी नाबालिग लड़कियों को न्याय दिलाने के लिए लगातार पुलिस प्रशासन के ख़िलाफ़ आवाज उठा रहे हैं। इस चक्कर में छात्र संगठन के कम से कम 14 सदस्यों की गिरफ्तारी भी हुई है। वहीं दर्जन भर को पुलिस ने हिरासत में लिया है। पुलिस का कहना है कि एबीवीपी के प्रदर्शनकारियों ने सामूहिक घेराव करते हुए बैरिकेडिंग तोड़ी थी, इसलिए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई।

पूरा मामला राज्य के कवर्धा जिले का है। छत्तीसगढ़ के एबीवीपी प्रदेश मंत्री शुभम जैसवाल ऑपइंडिया को जानकारी देते बताते हैं कि संगठन का प्रदर्शन 2 मामलों को लेकर था। पहला जिसमें एक 14 साल की आदिवासी लड़की के साथ गैंगरेप हुआ और दूसरा 13 साल की आदिवासी लड़की, जिसे बिना उसकी इच्छा के आंध्र प्रदेश चर्च भेज दिया गया।

14 साल की आदिवासी लड़की का गैंगरेप

शुभम पहले मामले का जिक्र करते हुए कहते हैं कि पिछले दिनों 22 नवंबर 2020 को 14 साल की एक आदिवासी बच्ची का गैंगरेप हुआ था। उस लड़की ने देर रात खून से लथपथ हालत में थाने पहुँचकर एफआईआर करवाई थी, मगर उस शिकायत पर कार्रवाई करने की बजाय ये कह दिया गया कि वह अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ घूमने गई थी।

प्रदेश मंत्री के मुताबिक अस्पताल में इलाज के बाद जब बच्ची को होश आया तो उसने दुष्कर्म करने वाले सभी लोगों को बाहर आजाद घूमते हुए देखा, तब वह दोबारा थाने गई और शिकायत करवाई। मगर, तब तक क्षेत्र के एसपी की ओर से कहा जा चुका था कि ये सब लड़की की साजिश है। वह कहते हैं कि एक 14 साल की आदिवासी लड़की के ऊपर उल्टा इल्जाम लगाने वाले पुलिस अधिकारी और केस की जाँच करने वाले अधिकारी के ख़िलाफ़ कार्रवाई होनी चाहिए।

13 साल की आदिवासी लड़की को चर्च भेजा, बनाया धर्मांतरण का दबाव

अपने प्रदर्शन से जुड़े अन्य मामलों का जिक्र करते हुए जैसवाल जानकारी देते हैं कि एबीवीपी 13 साल की आदिवासी लड़की के लिए भी न्याय की माँग कर रहा है, जिसे पिछले दिनों बहला-फुसला कर उसके माँ-बाप से दूर लाया गया और यकीन दिलाया गया कि उसे शहर के नामी होली क्रॉस स्कूल में पढ़ाएँगे। लेकिन यहाँ से उसे आँध्र प्रदेश के एक चर्च में भेज दिया गया और वहाँ उस पर दबाव बना कि लड़की ईसाई धर्म अपना ले।

नारी के सम्मान में ABVP मैदान में

एबीवीपी का कहना है कि उनकी माँग केवल दो आदिवासी लड़कियों को न्याय दिलाने की थी। उन लोगों ने पुलिस का रवैया ढीला देख कर ही कलेक्टर कार्यालय के बाहर घेराव किया था, जिसके चलते उनकी कई माँग सुनी भी गई, लेकिन कुछ ही दिन में कॉन्ग्रेस नेता मोहम्मद अकबर समेत कई स्थानीय नेताओं का प्रेशर बनना शुरू हुआ और कार्यकर्ताओं के ऊपर गैर जमानती धाराएँ लगाकर उन्हें जेल भेज दिया गया।

एबीवीपी कार्यकर्ता

संगठन ने अपने कार्यकर्ताओं को रिहा कराने के लिए जमानत के लिए दरख्वास्त डाली है लेकिन अभी तक उस पर सुनवाई नहीं हुई है। बता दें कि ऑपइंडिया को इन केसों से संबंधित एफआईआर नहीं मिली है, मगर एबीवीपी के प्रदेश मंत्री से प्राप्त जानकारी के मुताबिक पहले मामले में लड़की का बलात्कार करने वालों में रिजवान खान नाम के लड़के को छोड़ कर बाकी सभी आरोपित नाबालिग हैं, जिन्हें पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। शुभम का आरोप है कि पुलिस की ओर से लड़की की मेडिकल रिपोर्ट और एफआईआर भी पीड़िता के घर वालों को नहीं दी गई है। 

आदिवासी लड़कियों के लिए इंसाफ माँगते एबीवीपी कार्यकर्ता

भाजपा सांसद संतोष पांडे ने भी इस गिरफ्तारी का विरोध किया है। उन्होंने कहा,

“शनिवार को पुलिस एबीवीपी कार्यकर्ताओं को सीधे कार्यालय से उठाकर कोतवाली थाना ले आई। इसके बाद रात को ही उनका मेडिकल कराया व रातों रात जेल भेज दिया। यानि चेहरा देखकर पुलिस ने तेजी से कार्रवाई की है। इसी प्रकार अगर पुलिस दुष्कर्म पीड़िता का मेडिकल उसी दिन 22 नवंबर को रात को करा देती तो आरोपित जल्द पकड़े जाते। लेकिन पुलिस ने पूरे मामले में संदेह पैदा किया। पहले तो एक आरोपित को गिरफ्तार किया, फिर बाद में चार आरोपितों को पकड़ा, जबकि भाजपा द्वारा लगातार इस पूरे मामले में न्यायायिक जाँच की माँग की गई थी, लेकिन ध्यान नहीं दिया।”

जानकारी के मुताबिक इस पूरे केस में एबीवीपी के कई कार्यकर्ताओं पर मुकदमा दर्ज हुआ है। इन लोगों के खिलाफ खिलाफ आईपीसी की धारा 186, 188, 353, 147, 427 और 3 लोक संपत्ति के नुकसान के तहत मामला दर्ज हुआ है। है।

पुलिस का पक्ष

ABVP कार्यकर्ताओं के प्रदर्शन उनकी माँग और संबंधित कार्रवाई को लेकर जब ऑपइंडिया ने पुलिस का पक्ष जानने के लिए अधिकारियों को संपर्क किया तो हमें बताया गया कि पुलिस ने केवल 14 एबीवीपी सदस्यों को गिरफ्तार करके जेल भेजा है।

पुलिस का कहना है कि एबीवीपी के कार्यकर्ताओं ने घेराव के दौरान बैरीकेडिंग तोड़कर कार्यालय में एंट्री की थी, इसलिए उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हुई। वह बताते हैं कि गैंगरेप मामले में 4 आरोपितों को जेल भेज दिया गया है और दूसरे केस में भी गिरफ्तारी की संभावना है।

उल्लेखनीय है कि छत्तीसगढ़ में एबीवीपी सदस्यों की गिरफ्तारी के मद्देनजर धरना प्रदर्शन ने तूल पकड़ा हुआ है। रविवार को एक धरने में 500 से अधिक कार्यकर्ता शामिल हुए थे। इसमें कार्यकर्ताओं को छोड़ने व दुष्कर्म के मामले में दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करने, विवेचना में लापरवाही बरतने वाले के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर ज्ञापन सौंपा गया था।।

Facebook Fuel for India: ₹1.32 से बढ़ कर ₹3.68 लाख होगी प्रति व्यक्ति आय, जकरबर्ग से बोले मुकेश अंबानी

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक ‘फ्यूल फॉर इंडिया 2020’ इंवेंट की मेजबानी कर रहा है। इसमें फेसबुक चीफ मार्क जकरबर्ग और रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन मुकेश अंबानी ने भारत में अवसरों को लेकर चर्चा की। इन दोनों उद्योगपतियों ने भारत की आर्थिक वृद्धि को तेज करने में डिजिटलाइजेशन और छोटे कारोबारियों की भूमिका पर बात की।

दुनिया की टॉप थ्री अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होगा भारत

फेसबुक फ्यूल फॉर इंडिया 2020 इंवेंट में मुकेश अंबानी ने रिलायंस इंडस्ट्रीज को चलाने के अपने प्रमुख पॉलिसी, रचनात्मकता सहानुभूति, बिजनेस रिश्ते पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि भारत कोरोना महामारी में भी बेहतर कर रहा है। भारत दुनिया की टॉप थ्री अर्थव्यवस्थाओं में शामिल होने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि देश एक प्रमुख डिजिटल समाज बन जाएगा, जिसे युवा चलाएँगे। अंबानी ने कहा कि हमारी प्रति व्यक्ति आय 1,800-2,000 अमरीकी डॉलर से बढ़कर 5,000 अमरीकी डॉलर हो जाएगी।

मार्क जकरबर्ग ने की भारत की तारीफ

इस दौरान मार्क जकरबर्ग ने कहा, “हमने पिछले महीने भारत में व्हाट्सएप पे (WhatsApp Pay) लॉन्च किया। यूपीआई सिस्टम और 140 बैंकों के सहयोग से यह संभव हो पाया। भारत इस तरह की पहल करने वाला दुनिया का पहला देश है।”

वहीं अंबानी ने कहा कि महामारी की भयावहता ने भारत में हम सभी को चौंका दिया। लेकिन मुझे लगता है कि भारत के डीएनए में यह बात ही नहीं है कि वह संकट की वजह से आगे बढ़ने से रुक जाए है। इस संकट ने नई वृद्धि के लिए एक अवसर दिया है। भारतीयों ने बहुत ही लचीलापन और संकल्प के साथ COVID-19 संकट का सामना किया। 

मार्क जकरबर्ग से ये बोले मुकेश अंबानी

मुकेश अंबानी ने मार्क जकरबर्ग से कहा कि Jio डिजिटल कनेक्टिविटी लेकर आई है। WhatsApp Pay के साथ WhatsApp चैट का इंक्लूजन होता है, तो इससे डिजिटल कनेक्निविटी बढ़ी है। रिलायंस रिटेल और JioMart भारत में हर किसी को ग्लोबल सर्विस में भाग लेने का मौका दे रहा है। अंबानी ने जकरबर्ग से कहा कि टेक्नोलॉजी अपनाने से भारत को संपत्ति बनाने में हेल्प मिलेगी।

अंबानी ने इस दौरान जकरबर्ग से भारत और रिलायंस जियो में निवेश का कारण भी पूछा। इस पर जकरबर्ग ने कहा कि भारत आर्थिक संभावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए फेसबुक ने भारी निवेश किया है। जकरबर्ग ने इस दौरान कहा कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत की भूमिका की अपनी पहचान है। डिजिटलाइजेशन से व्यक्तियों को मजबूत बनाने में मदद मिलेगी, जिससे भविष्य समृद्ध होगा।

दो दिन तक चलेगा कार्यक्रम

दो दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम की शुरुआत आज (दिसंबर 15, 2020) से हुई है। फेसबुक की चीफ ऑपरेटिंग ऑफिसर शेरिल सैंडबर्ग, इंस्टाग्राम के प्रमुख एडम मोसेरी, WhatsApp के प्रमुख विल कैथकार्ट भी इस कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। इस इवेंट का दूसरा सेशन बुधवार (दिसंबर 16, 2020) यानी कल सुबह 10 बजे से शुरू होगा।

ये है कार्यक्रम का मकसद

फेसबुक इंडिया के मैनेजिंग डायरेक्टर अजित मोहन ने इस इवेंट को लेकर कहा, ”हम भारत में फेसबुक की वास्तविक कहानी शेयर करना चाहते हैं, जिससे लोगों को यह समझने में आसानी होगी कि हमारे प्लेटफॉर्म के यूजर्स और संस्थाओं के जरिए हम क्या करने की कोशिश कर रहे हैं।”

19 दिसंबर को अमित शाह की मौजूदगी में BJP में शामिल होंगे शुभेंदु अधिकारी! 86 सीटों पर बदलेगा गणित

तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी जल्द ही भारतीय जनता पार्टी (BJP) में शामिल होंगे, ऐसा पार्टी नेताओं ने दावा किया है। मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि इस सप्ताह वो अपने राजनीतिक भविष्य की अटकलों पर विराम लगाते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भाजपा में शामिल होंगे। 35 विधानसभा क्षेत्रों में प्रभाव रखने वाले शुभेंदु अधिकारी ने पश्चिम बंगाल सरकार में मंत्री पद से पहले ही इस्तीफा दे रखा है।

पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह इसी सप्ताह के अंत में कोलकाता जाने वाले हैं। उधर तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) ने निर्णय लिया है कि अब वो शुभेंदु अधिकारी का और मान-मनव्वल नहीं करेगी, भले ही वो पार्टी छोड़ कर कहीं और चले जाएँ। भाजपा में शामिल होने से पहले शुभेंदु अधिकारी दिल्ली भी जाने वाले हैं। ‘News 18’ की खबर के अनुसार, उन्हें केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा सुरक्षा भी प्रदान किए जाने की चर्चा चल रही है।

पिछले कई महीनों से शुभेंदु अधिकारी बिना TMC के झंडे के ही रैलियों को सम्बोधित कर रहे हैं और उनके समर्थक बांग्ला में ‘बड़े भाई का अनुयायी’ लिखे बैनर्स लेकर घूम रहे है। वो ममता बनर्जी सरकार में परिवहन एवं सिंचाई मंत्री हुआ करते थे। ईस्ट मिदनापुर के जिस नंदीग्राम आंदोलन की वजह से ममता बनर्जी ने 34 सालों की वामपंथी सत्ता को उखाड़ फेंका था, उसकी पूरी व्यवस्था शुभेंदु अधिकारी ने ही की थी।

TMC ने उन्हें मनाने के लिए सांसद सौगात रॉय को लगाया था, लेकिन जिस तरह से उनसे बातचीत का व्हाट्सप्प चैट सार्वजनिक कर के मीडिया को दे दिया गया, उससे शुभेंदु खासे नाराज हुए। 2019 लोकसभा चुनाव में जिन 13 सीटों पर तृणमूल की हार हुई, उनमें से 9 उनके प्रभाव वाली थी। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि उनके भाजपा में आने से 86 विधानसभा सीटों पर गणित बदलने की सम्भावना है। वो 19 दिसंबर को भाजपा में शामिल होंगे, ऐसा कहा जा रहा है।

‘News 18’ से बातचीत करते हुए भाजपा उपाध्यक्ष मुकुल रॉय ने कहा, ‘शुभेंदु अधिकारी पर फैसला हो गया है। 2 या 4 दिन में पार्टी में शामिल होंगे। सारी बातें लगभग हो चुकी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कितना भी दौरा कर लें, लेकिन वह और टीएमसी जीतेगी नहीं। सीएम कितना भी प्रचार करें, नतीजा जीरो ही रहने वाला है। ये छूटने की कोशिश है, दौरा नहीं है। TMC सुप्रीमो ममता मंगलवार (दिसंबर 15, 2020) को जलपाईगुड़ी के दौरे पर हैं।

इससे पहले अपनी राजनीतिक सेवा के बारे बताते हुए शुभेंदु ने कहा था कि वे अपनी क्षमता के मुताबिक ताउम्र आम लोगों की सेवा करते रहेंगे। बता दें शुभेंदु अधिकारी ने परिवहन मंत्री पद से इस्तीफा दिया है, लेकिन उन्होंने अभी तक टीएमसी के एमएलए व प्राथमिक सदस्यता पद से इस्तीफा नहीं दिया है। इसके बाद बागी टीएमसी नेता के रवैये को देखते हुए तृणमूल कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ से हल्दिया में जुलूस निकाला गया था।

सिंघु बॉर्डर पर RAF तैनात, प्रकाश जावड़ेकर ने कहा- हर मुद्दे पर बातचीत को तैयार सरकार, कानून खत्म करना विकल्प नहीं

नए कृषि कानूनों के विरोध में सिंघु और टिकरी सीमाओं पर किसानों का आंदोलन लगातार 20वें दिन भी जारी है। दोनों पक्षों- कृषि यूनियनों और सरकार, के एक समझौते तक पहुँचने के अभी तक कोई संकेत नहीं हैं। दिल्ली-हरियाणा सिंघु सीमा पर किसानों के आंदोलन को देखते हुए रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) और अतिरिक्त बल तैनात किया गया है।

किसान अपनी माँगों पर अड़े हैं और किसान संगठनों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे कृषि कानूनों को रद्द करने से कम पर आंदोलन वापस नहीं लेंगे। इसे देखते हुए उन्होंने सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को भूख हड़ताल भी की। यही नहीं, आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने भी उनके समर्थन में उपवास किया।

सोमवार को 40 कृषि संघ के नेताओं ने सुबह 8 बजे से शाम 5 बजे तक ‘सरकार को जगाने के लिए’ भूख हड़ताल की, जबकि केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा कि केंद्र चाहता है कि कृषि कानूनों पर चरणबद्ध तरीके से चर्चा हो।

केंद्रीय कृषि मंत्री ने कहा कि केंद्र पहले भी कह चुका है कि कृषि कानूनों पर सरकार आंदोलन कर रहे किसानों से बातचीत के लिए तैयार है। अगर किसानों की तरफ से बातचीत का प्रस्ताव आता है, तो सरकार निश्चित तौर पर उनसे बात करेगी। उन्होंने कहा कि हम चाहते हैं कि कृषि कानूनों पर किसान हमारे प्रस्ताव पर अपनी राय दें तो हम निश्चित रूप से आगे की बातचीत शुरू करेंगे।

केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने प्रदर्शन कर रहे किसानों को संदेश दिया है। उन्होंने कहा कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सिर्फ संवाद से ही मसलों का समाधान किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि सरकार कृषि कानूनों से जुड़े किसानों के हर मुद्दे पर बात करने को तैयार है, पर पूरा कानून खत्म कर देना विकल्प नहीं हो सकता है।

नरेंद्र सिंह तोमर ने कहा, “आज महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, बिहार, केरल और हरियाणा से आए 10 किसान संगठनों ने ऑल इंडिया किसान कॉर्डिनेशन कमेटी के तहत दिल्ली पहुँचकर सरकार को कृषि कानूनों पर अपना समर्थन पत्र सौंपा है। किसान संगठनों के नेताओं ने कहा कि मोदी सरकार किसानों के हित में ये तीनों कृषि कानून लेकर आई है इसलिए वो इसका स्वागत और समर्थन करते हैं।”

वहीं, केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि किसानों को समझना चाहिए कि सरकार उनके साथ है, किसी भी प्रकार का अन्याय नहीं होने दिया जाएगा। इसके अलावा, उन्होंने किसानों को प्रस्ताव दिया कि वे सरकार के साथ आएँ और कानूनों पर चर्चा करें। उन्होंने कहा कि सरकार किसानों के साथ है और अगर किसान कृषि कानूनों के संबंध में कोई सुझाव देना चाहते हैं, तो सरकार इसे स्वीकार करने के लिए तैयार है।

सिंध में हिंदू घरों पर मुस्लिम भीड़ ने किया हमला, वीडियो में पीड़ितों ने कही व्यथा

पाकिस्तानी मानवाधिकार कार्यकर्ता राहत ऑस्टिन ने सोमवार (दिसंबर 14, 2020) को एक वीडियो शेयर करते हुए बताया कि पाकिस्तान के सिंध में भील समुदाय के हिंदुओं के घरों पर इस्लामवादियों ने हमला किया और लूटपाट भी की।

बता दें कि पाकिस्तान में भील समुदाय एकदम हाशिए पर है और सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़ा हुआ है। ऑस्टिन ने बताया कि मोहम्मद असलम ने पड़ोस के कुछ अन्य लोगों के साथ मिलकर उस क्षेत्र में रहने वाले गरीब हिंदुओं पर अत्याचार किया और उन्हें अपने घर छोड़ने के लिए मजबूर किया।

ये सताए हुए हिंदू अब अपने घर लौटने से डर रहे हैं। उन्होंने अब इस संबंध में सत्र न्यायाधीश और पाकिस्तान के एसएसपी पुलिस बाडिन को सुरक्षा के लिए अनुरोध किया है। राहत ऑस्टिन द्वारा शेयर किए गए वीडियो में पीड़ित हिंदुओं को देखा जा सकता है, जो अपने साथ लगातार हो रहे अत्याचारों के खिलाफ नारे लगा रहे हैं।

ये दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ पाकिस्तान में बहुत ही आम हैं। अक्टूबर में, इस्लामवादियों ने हिंदुओं पर धर्म परिवर्तन का दबाव डालने के लिए उनके घरों को जला दिया था। राहत ऑस्टिन ने दावा किया था कि इस्लामवादी इस तरह का अत्याचार करके इस कोशिश में जुटे हुए हैं कि हिंदू लोग धर्म परिवर्तन करके इस्लाम अपना ले या फिर उनके लिए स्लेव बनकर काम करें।

गौरतलब है कि रविवार (सितंबर 20, 2020) को पाकिस्तान के सिंध प्रांत में 171 हिंदुओं को इस्लाम में धर्मांतरित करवाया गया। राहत ऑस्टिन ने सोमवार (सितंबर 21, 2020) को टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि हिंदू पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का धर्म परिवर्तन पाकिस्तान के सिंध प्रांत में मदरसा अहसान-उल-तालीम (Ahsan-ul-Taleem), कराची के संगर में आयोजित एक सामूहिक धर्मान्तरण समारोह में किया गया था। उन्होंने दावा किया कि इस्लामिक आइडियोलॉजी काउंसिल के पूर्व सदस्य नूर अहमद तशर ने उन्हें इस्लाम कबूल करवाया।

इससे पहले जून में, सिंध प्रांत के बाडिन जिले में सौ से अधिक हिंदुओं को इस्लाम में धर्मांतरित किया गया था। कथित तौर पर, एक स्थानीय मंदिर में रखी हिंदू देवताओं की सभी मूर्तियों को नष्ट कर दिया गया और परिसर को एक मस्जिद में बदल दिया गया। 17 मई को सिंध प्रांत में हिंदुओं ने दावा किया था कि तबलीगी जमात के लोगों ने उन्हें प्रताड़ित किया, उनके घरों में तोड़फोड़ की और इस्लाम कबूल नहीं करने पर एक हिंदू लड़के का अपहरण भी कर लिया।

वहीं 15 अगस्त को 204 अल्पसंख्यक हिंदुओं का पाकिस्तान में धर्म परिवर्तन करवाया गया। धर्म परिवर्तन करने वाले अधिकांश हिंदू भील समाज के थे। इनमें से कुछ अभी हाल में धार्मिक वीजा से हिंदुस्तान से लौटे थे। बताया गया था कि 194 हिंदू सादिकाबाद में रहने वाले हैं जबकि 10 (एक ही परिवार के) रहिमयारखान के निवासी हैं। इस धर्मपरिवर्तन की सूचना जोधपुर में रहने वाले लोक संगठन के प्रेमचंद भील ने दी थी। वह लगातार हिंदुओं के संपर्क में हैं और उनके साथ ज्यादतियों को साझा करते रहते हैं।