राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) के सुप्रीमो शरद पवार संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) के चेयरपर्सन हो सकते हैं। फिलहाल यह जिम्मेदारी कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी के पास है। यह दावा रिपब्लिक टीवी ने सूत्रों के हवाले से किया है। दिलचस्प यह है कि 1999 में सोनिया के इटली मूल को मुद्दा बनाकर पवार कॉन्ग्रेस से अलग हुए थे। बाद में 2018 में पवार ने बताया था कि उन्होंने कॉन्ग्रेस इसलिए छोड़ी क्योंकि सोनिया प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं।
रिपोर्ट के अनुसार पवार जल्द यूपीए अध्यक्ष की जिम्मेदारी सँभालेंगे। इस संबंध में शुरुआती बातचीत हो चुकी है। यह खबर ऐसे वक्त में आई है जब कॉन्ग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। बिहार विधानसभा और हैदराबाद निकाय चुनावों में करारी शिकस्त को लेकर कई वरिष्ठ नेता नेतृत्व पर सवाल उठा चुके हैं। कुछ पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल गाँधी की वापसी चाहते हैं तो एक खेमे को उनकी क्षमताओं पर भरोसा नहीं है।
सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि राहुल गाँधी ने पार्टी के साथ-साथ यूपीए की जिम्मेदारी सँभालने से भी इनकार कर दिया है। ऐसी स्थिति में तय किया गया है कि राहुल गाँधी यूपीए के चेहरे होंगे, वहीं चेयमैन की जिम्मेदारी पवार सँभालेंगे जो गठबंधन के सबसे वरिष्ठ नेता हैं।
बुधवार (9 दिसंबर 2020) को जब विपक्ष के नेताओं ने किसानों के आंदोलन को लेकर राष्ट्रपति से मुलाकात की थी तब उनका नेतृत्व पवार ने ही किया था। इस प्रतिनिधिमंडल में राहुल गाँधी भी शामिल थे। इससे पहले पवार ने राहुल की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाते हुए कहा था कि एक राष्ट्रीय नेता के रूप में कुछ हद तक उनमें ‘निरंतरता’ की कमी लगती है। उससे पहले चीन को लेकर राहुल गाँधी की बयानबाजी पर सवाल उठाते हुए पवार ने कहा था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर राजनीति नहीं की जानी चाहिए। बिहार के चुनावी नतीजों के बाद सहयोगी राजद के नेता ने भी राहुल पर सवाल उठाए थे।
गौरतलब है कि कॉन्ग्रेस से अलग होकर अलग पार्टी बनाने के बावजूद पवार की एनसीपी ज्यादातर समय उसके साथ गठबंधन में रही है। यूपीए की दोनों सरकारों में खुद पवार भी मंत्री थे। महाराष्ट्र में भी दोनों दल सरकार चला चुके हैं। शिवसेना के नेतृत्व वाली मौजूदा महाविकास अघाड़ी में भी दोनों दल शामिल हैं।
वहीं सोनिया गाँधी 2004 से ही यूपीए की चेयरपर्सन हैं। यूपीए का गठन उसी साल आम चुनावों के बाद तब हुआ जब कॉन्ग्रेस ने वामदलों के समर्थन से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार का गठन किया था। यह भी कहा जाता है कि 10 साल तक मनमोहन सिंह भले सरकार का चेहरा रहे, लेकिन पर्दे के पीछे से उसे सोनिया ही चला रही थीं। 2017 में कॉन्ग्रेस में औपचारिक तौर पर राहुल ने उनकी जगह ले ली थी, लेकिन 2019 के आम चुनावों में हार के बाद उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। काफी मान-मनौव्वल के बावजूद जब राहुल दोबारा जिम्मेदारी सॅंभालने को राजी नहीं हुए तो पार्टी ने सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया था।
उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति को अपने फेसबुक कमेंट (टिप्पणी) की वजह से नौकरी से हाथ धोना पड़ा। विजयपाल सिंह कजरी निरंजनपुर स्थित निजी स्कूल अकाल एकेडमी में बतौर उपप्रधानाचार्य (वाईस प्रिंसिपल) कार्यरत थे। किसान आंदोलन से संबंधित एक वायरल वीडियो पर टिप्पणी करने के बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
समाचार समूह ‘यूपी तक’ से बात करते हुए विजयपाल सिंह ने पूरी घटना की विस्तार से जानकारी दी। उनके द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक़ 30 नवंबर को उन्होंने एक वीडियो देखा जिसमें ऐसा कहा गया था कि जो हाल इंदिरा गाँधी का हुआ था वही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भी होगा। इस वीडियो पर टिप्पणी करते हुए विजयपाल ने चेतावनी दी कि इस तरह हत्या की सार्वजनिक धमकी देना सही नहीं है। लेकिन उनकी इस टिप्पणी की बिलकुल विपरीत प्रतिक्रिया आई। तमाम उपद्रवी और स्थानीय तत्व उन्हें प्रताड़ित करने लगे और उन्हें धमकी भरे कॉल्स आने लगे।
विजयपाल पूरणपुर के रहने वाले हैं और इस स्कूल के विभिन्न पदों पर काम कर चुके हैं। उनका कहना है कि समुदाय विशेष के लोग इस स्कूल को संचालित करते हैं। उनका आरोप है कि हिन्दू होने की वजह से उन्हें इस तरह प्रताड़ित किया गया। समुदाय विशेष के लोग उन्हें स्कूल लेकर गए और वहाँ उनसे जबरन माफ़ी मँगवाई। वहाँ मौजूद कई लोगों ने इस घटना का वीडियो भी बनाया और इसे सोशल मीडिया पर साझा कर दिया। इसके बाद उन्होंने विजयपाल सिंह का फोन छीन कर माफ़ी वाला पोस्ट लिखा और विजयपाल के एकाउंट से ही साझा कर दिया।
कई घंटों तक बनाए रखा बंधक और बनाया इस्तीफ़ा देने का दबाव
मामला माफ़ी माँगने पर ही नहीं रुका, उन्हें घंटों तक बंधक बना कर रखा गया और उन पर अत्याचार भी किया गया। इसके बाद उनसे इस्तीफ़ा भी लिखवाया गया। विजयपाल ने बताया कि इसके बाद उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नंबर से धमकी भरे कॉल आने शुरू हो गए। उन्होंने पूरी बात का ज़िक्र करते हुए कहा, “मैं बहुत ज्यादा डरा हुआ हूँ, कहीं मुझे अपना घर न छोड़ना पड़ जाए। मैंने पिछले 18 सालों में पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ काम किया है। मैं खुद को इस समुदाय (सिख) का हिस्सा मानता हूँ।” उन्होंने स्कूल में तब भी काम किया था जब महामारी के दौरान वेतन तक नहीं मिल रहा था। यह नौकरी छूट जाने के बाद उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती रोज़ी रोटी की है।
मेरी जान को ख़तरा है: विजयपाल सिंह
उन्होंने कहा, “मैं इस बात से डरा हुआ हूँ कि कहीं मेरे साथ कोई अप्रिय घटना न हो जाए। मैंने उनके धर्म को अपने धर्म से कभी अलग नहीं समझा। मैं उनके धर्म के लिए समर्पित रहा और बदले में मुझे यह मिला। मुझे अपनी ज़िंदगी को लेकर भय सता रहा है अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरे बच्चों का गुज़ारा कैसे होगा? मेरी एक बेटी है जो अपनी किशोरावस्था में है और मेरी माँ को डायबटीज़ की परेशानी है।
जब से मुझे धमकी भरे कॉल आना शुरू हुए हैं तब से न तो मैं कुछ खा पा रहा हूँ और न ही मेरी माँ। मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं कैसे जियूँ? क्या हिन्दू होना अपराध है? वह अक्सर इस बात की ओर इशारा करते हैं कि मैं अलग समुदाय से आता हूँ।”
इस घटना की जानकारी देते हुए विजयपाल फूट-फूट कर रो रहे थे। उनका कहना है कि यह सिलसिला जारी रहा तो उनके पास आत्महत्या के अलावा कोई और विकल्प नहीं बचेगा। विजयपाल के मुताबिक़ उन्हें दोषी ठहराया जा रहा है जबकि इंदिरा गाँधी की हत्या की बात कोई और कर रहा है। इसके लिए अधिक से अधिक उन्हें निकाले जाने की जगह पर निलंबित भी किया जा सकता था।
फ़िलहाल पुलिस ने इस मामले में जाँच शुरू कर दी है। पूरणपुर के सीओ प्रदीप कुमार का कहना है कि पीड़ित की शिकायत के आधार पर इस घटना के संबंध में मामला दर्ज किया जा चुका है। पर्याप्त सबूत इकट्ठा होने के बाद उचित कार्रवाई की जाएगी।
देश की सबसे बड़ी अदालत ने बुधवार (9 दिसंबर 2020) को एक आदेश जारी किया। जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) को निर्देश दिया है कि 18 साल के एक छात्र को इंजीनियरिंग (engineering) में अंतरिम दाखिला (Interim Admission) प्रदान करें। दरअसल, उस छात्र ने दाखिले की ऑनलाइन प्रक्रिया के दौरान गलत लिंक पर क्लिक कर दिया था, जिसकी वजह से उसका प्रवेश रद्द कर दिया गया था।
आगरा के रहने वाले सिद्धांत बत्रा ने आईआईटी बॉम्बे के बी. टेक (B.Tech) इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग (Electrical Engineering) में ऑनलाइन दाखिले की प्रक्रिया के दौरान अनजाने में एक गलत लिंक पर क्लिक कर दिया था। जिस लिंक पर सिद्धांत ने क्लिक किया वह अपना दाखिला वापस लेने के लिए था। सिद्धांत बत्रा की जेईई (JEE) 2020 में ऑल इंडिया रैंक 270 थी। न्यायाधीश एसके कौल की अगुवाई वाली पीठ ने छात्रों के वकील प्रह्लाद परंजे की तरफ से दायर की गई याचिका का संज्ञान लेते हुए आईआईटी बॉम्बे को निर्देश दिया कि सिद्धांत बत्रा को ‘प्रोविज़नल दाखिला’ प्रदान किया जाए।
परंजे ने यह भी कहा था कि संस्थान में छात्र की याचिका के बाद संस्थान में प्रवेश न्यायालय के निर्णय के अधीन होगा। न्यायाधीश दिनेश माहेश्वरी और ह्रषिकेश रॉय भी इस पीठ का हिस्सा थे, जिन्होंने आईआईटी बॉम्बे को इस संबंध में नोटिस भेज दिया है। इसके अलावा पीठ ने शीतकालीन अवकाश के बाद सिद्धांत की याचिका पर सुनवाई तय की है। पहले यह याचिका बॉम्बे हाईकोर्ट में दायर की गई थी जिसे न्यायालय ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि जब सारी सीटें भर चुकी हैं। ऐसे में न्यायालय इस संबंध में दखल नहीं दे सकता है, दाखिले की प्रक्रिया से संबंधित नियमों का पालन करना होगा।
हाईकोर्ट ने शुरुआत में आईआईटी बॉम्बे को निर्देश दिया था कि सिद्धांत की याचिका पर संज्ञान लिया जाए और इस संबंध में उचित आदेश दे। सिद्धांत ने अपनी याचिका में कहा था कि उसने अनजाने में गलत लिंक पर क्लिक कर दिया था जिसकी वजह से उसकी सीट चली गई थी। 23 नवंबर को बॉम्बे हाईकोर्ट की खंड पीठ ने याचिका को खारिज कर दिया था। इसके बाद सिद्धांत ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में उसने सुप्रीम कोर्ट से निवेदन करते हुए कहा था कि उसका नुकसान हुआ है। इसे मद्देनज़र रखते हुए मानवीय आधार पर आईआईटी बॉम्बे एक नई सीट बनाए और दाखिल प्रदान करे।
सिद्धांत आगरा में अपने दादा-दादी के साथ रहता है, उसके माता-पिता नहीं है। याचिका में अपना पक्ष रखते हुए उसने कहा कि तमाम परेशानियों के बावजूद उसने बड़ी मुश्किल से आईआईटी जेईई की परीक्षा पास की थी। बचपन में ही उसके पिता की मृत्यु हो गई थी, जिसके बाद उसकी माँ ने उसे पाल पोस कर बड़ा किया। 2018 में सिद्धांत की माँ का भी निधन हो गया था। याचिका के अनुसार दाखिले का फॉर्म भरते हुए पेज पर ‘फ्रीज़’ (freeze) ऑप्शन नज़र आया। जिसे देख कर सिद्धांत को यह लगा कि इसका मतलब है अपनी सीट कन्फर्म करना और दाखिले की प्रक्रिया पूरी करना।
याचिका में यह भी लिखा गया था, “31 अक्टूबर 2020 को आईआईटी पोर्टल पर सर्फिंग के दौरान सिद्धांत ने एक लिंक पर क्लिक किया। जिसके बाद एक डिकलेरेशन नज़र आई, जिसमें ऐसा कहा गया था कि मैं JoSAA (जॉइंट सीट अलोकेशन अथॉरिटी) की सीट वितरण प्रक्रिया से पीछे हटना चाहता हूँ।” इसके बाद नवंबर 2020 को आईआईटी बॉम्बे ने छात्रों के नाम की अंतिम सूची जारी की थी जिसमें सिद्धांत का नाम शामिल नहीं था। आईआईटी बॉम्बे का इस संबंध में कहना था कि नाम वापस लेने की कार्रवाई पूरी तरह संज्ञेय (conscious) था क्योंकि यह ‘टू स्टेप प्रोसेस’ होता है। जो छात्र अंतिम राउंड के पहले अपना नाम वापस लेना चाहते हैं वह ऐसा कर सकते हैं और उनकी फीस वापस कर दी जाती है। जैसे ही छात्र अपना नाम वापस लेता है वैसे ही उसकी सीट रद्द कर दी जाती है।
वर्ष 2014 से ही हम देखते आए हैं कि विषय चाहे जो भी रहा हो, ऐसा सम्भव ही नहीं है कि देश का वामपंथी और स्वघोषित उदारवादी वर्ग उसमें ‘अम्बानी-अडानी’ का जिक्र करने से चूक जाए। भ्रामक तथ्यों के जरिए लोगों को गुमराह करने की कला में माहिर वाम-उदारवादी वर्ग के ध्वजवाहक और सीरियल फेक न्यूज़ प्रकाशित करने वाले टीवी चैनल एनडीटीवी के पत्रकार रवीश कुमार ने कथित किसान आन्दोलन के बीच एक बार फिरसे अम्बानी-अडानी का जिक्र लाकर बहस को नई दिशा दी है। मजे की बात यह है कि उनके दावे ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ पर किए जाने वाले आम दावों से भिन्न नहीं हैं।
रवीश कुमार का नया दावा है कि भारत सरकार ने अडानी को फायदा पहुँचाने के लिए कृषि कानून बनने से ठीक पहले ही अन्न भण्डारण करने के साइलोस गोदाम बना लिए थे। रवीश कुमार ने सिर्फ अपने प्राइम टाइम ही नहीं बल्कि अपने फेसबुक पोस्ट के माध्यम से भी यह भ्रामक दावे बेचे और लोगों को गुमराह करने का प्रयास किया। इन दावों का निष्कर्ष यह निकलता है कि नए कृषि कानून इसीलिए बनाए गए हैं ताकि सरकार के इशारे पर अडानी-अम्बानी किसानों का सारा अनाज खरीद के स्टोर कर लेंगे और फिर मनमाने दाम पे बेचेंगे।
गत 07 दिसंबर को अपने प्राइम टाइम में रवीश कुमार ने इस बात का जिक्र किया कि कटिहार के माईलबासा में एक स्टोरेज वर्ष 2019 में बनाया गया है, जिसे अडानी ग्रुप की तरफ से बनाए जा रहे हैं। रवीश कुमार यह कहना नहीं भूले कि उन्हें इसके बारे में ‘इकाॅनॉमिक टाइम्स’ में वर्ष 2019 में प्रकाशित एक खबर से इस बारे में पता चला।
रवीश कुमार के इस प्राइम टाइम वीडियो के फर्जी दावे को आप यहाँ पर दी गए वीडियो में 19.04 से 20.00 तक देख सकते हैं –
रवीश अपने वीडियो में बताते हैं कि इस खबर के अनुसार फ़ूड कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया ने अडानी ग्रुप से करार किया है। 80 करोड़ की लागत से पंजाब और हरियाणा में दो साइलोस बनाने का जिक्र है, जिसमें 75 हजार टन गेंहू का भण्डारण किया जाएगा। इसके साथ ही रवीश अपनी इस रिपोर्ट में बताते हैं कि इसी रिपोर्ट में यह भी जिक्र है कि इसका स्वामित्व एफसीआई के पास रहेगा।
अब रवीश की वास्तविक चिंता यहाँ से शुरू होती है। उनकी चिंता का विषय यह है कि इन साइलोस को चलाने, संभालने और रखरखाव का जिम्मा अडानी ग्रुप का है और बदले में सरकार 30 साल तक किराए की गारंटी देगी। रवीश ने तुरंत अपने वीडियो में कहा कि भंडारण का लाभ किसानों को कैसे मिलेगा जब वहाँ के किसानों को MSP नहीं मिल रहा है?
यहाँ पर रवीश द्वारा फैलाई गई सबसे पहली फेक न्यूज़ और भ्रामक तथ्य तो यही है कि केंद्र सरकार MSP नहीं देने वाली। जबकि सरकार निरंतर ही आन्दोलनरत किसानों यह आश्वासन दे रही है कि एमएसपी पर खरीद बंद नहीं होगी। बुधवार (दिसंबर 09, 2020) को ही केंद्र सरकार ने किसानों को इसका लिखित आश्वासन तक देने की बात कही जिसे कि किसान नेताओं द्वारा आंदोलन जारी रखने के लिए ठुकरा दिया गया।
दूसरा भ्रम रवीश कुमार द्वारा जो फैलाया गया है वह अडानी के साइलोस गोदामों को लेकर है।
प्राइम टाइम की खराफ़ात को रवीश कुमार ने अपने फेसबुक पेज पर और व्यापक रूप देते हुए लिखा- “…इस बात की जानकारी सामने आनी चाहिए कि भंडारण के लिए पहले प्राइवेट पार्टी को प्रवेश दिया जाता है और फिर एक साल बाद क़ानून बदल कर प्राइवेट कंपनियों को स्टॉक लिमिट से छूट दी जाती है। ऐसा क्यों किया गया? क्या इसलिए कि पहले अडानी ग्रुप को किरायेदार बना कर लाओ और फिर मकान ही दे दो!”
हिंदी पत्रकारिता में जिस कूड़े की बात रवीश करते हैं, वह कूड़ा खुद रवीश ने फैलाया है
रवीश कुमार की धूर्तता का पता इसी बात से चलता है कि उसने बेहद सावधानी से 2019 की एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए कहा कि हमें इस खबर से पता चला। जबकि अडानी द्वारा सितम्बर माह में नए कृषि कानूनों से ठीक पहले (इन्टरनेट पर किए गए दावों के अनुसार- कानून बनाने के तुरंत बाद) में साइलोस बनाने की फर्जी ख़बरों का फैक्ट चेक 25 सितम्बर को ही कई समाचार पोर्टल्स कर चुके हैं। यहाँ पर रवीश कुमार की मक्कारी यह है कि उन्होंने जानबूझकर अपनी रिपोर्ट में इस तथ्य का जिक्र नहीं किया कि कानून बनने से पहले या बाद में अडानी समूह को यह साइलोस बनाने की मंजूरी दे दी गई। फेसबुक पोस्ट में भी इसकी आधी जानकारी ही दी गई और अपने वीडियो में रवीश ने इसका जिक्र भ्रामक तरीके से कर के छोड़ दिया।
कृषि बिलों के आते ही सोशल मीडिया पर यह दावे काफी प्रचलित रहे कि अडानी लॉजिस्टिक लिमिटेड ने संसद में तीन कृषि संबंधी बिल पास होने के ठीक बाद एक फूड साइलोस की स्थापना की है।
उल्लेखनीय है कि तीसरे फार्म बिल को सितंबर 22, 2020 को मंजूरी दे दी गई जबकि रवीश कुमार के दावे के विपरीत अडानी समूह वर्ष 2007 से ही साइलोस तैयार करता आ रहा है। ‘फाइनेंसियल एक्सप्रेस’ की 2008 की एक खबर में इसका जिक्र देखा जा सकता है।
इस पायलट प्रोजेक्ट में, एफसीआई ने वर्ष 2005 में पंजाब के मोगा और हरियाणा के कैथल में दो साइलोस स्थापित करने के लिए AAL के साथ 20 साल के लिए एक ‘BOO समझौता – Build, Own and Operate’ किया था।
कृषि सुधार बिलों के खिलाफ किसान विरोध प्रदर्शनों में नाम उठाए जाने के बाद खुद अडानी समूह ने कहा है कि वो न तो किसानों से खाद्यान्न खरीदता है और न ही खाद्यान्न का मूल्य तय करता है। अडानी समूह ने कहा कि यह केवल फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के लिए अनाज साइलोस तैयार करता है और उनका रखरखाव करता है।
अडानी समूह ने अपने ट्विटर हैंडल पर पोस्ट किए गए एक बयान में कहा, “कंपनी की भंडारण की मात्रा तय करने के साथ-साथ अनाज के मूल्य निर्धारण में भी इसकी कोई भूमिका नहीं है क्योंकि यह केवल FCI के लिए एक सेवा/बुनियादी ढाँचा प्रदाता है।”
Our statement in response to the misleading video posted by the Loktantra TV YouTube channel that is leveraging the ongoing farmer crisis in order to malign our reputation and misguide public opinion. #FakeNewspic.twitter.com/k4eeEGTpHa
ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्या रवीश कुमार अब तथ्यों के बजाए खुद ही उस ‘व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी’ के आधार पर प्राइम टाइम करने लगे हैं? क्या वह किसान आन्दोलन, जिसमें कि खालिस्तानी समर्थकों के हस्तक्षेप की आशंका भी लगाईं जा रही है, को फेक न्यूज़ के माध्यम से भड़काने का प्रयास कर रहे हैं? अगर वर्ष 2007 से ही अडानी समूह के वेयरहाउस उन जगहों पर थे तो क्या उसी तर्क एक आधार पर रवीश यह कह सकेंगे कि UPA सरकार किसानों का अनाज बेचकर अडानी समूह को फायदा पहुँचाना चाहती थी?
अडानी के गोदामों का महत्व
सामान्य भाषा में देखें तो अडानी समूह ने स्पष्ट कहा है कि हम अपने गोदाम और साइलोस FCI को किराए पर देते हैं और FCI हमारे साइलोस में अपना अनाज रखती है, जिसके बदले उन्हें किराया अदा किया जाता है।
अडानी समूह के अनुसार, उन्होंने गोदाम और अनाज के रखरखाव का काम 2005 में ही शुरू कर दिया था और बाकायदा भारत सरकार से पारदर्शी कंपीटिटिव बिडिंग टेंडर प्रक्रिया से ये ठेके हासिल किए।
इसके अलावा, जहाँ भी ये गोदाम बनाए गए हैं, वहाँ तक अनाज पहुँचाने और उठाने के लिए सड़कें और रेल लाइन भी बनाई गई हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, FCI के इस अनाज को ढोने और देश के कोने कोने में सुरक्षित और तीव्र गति से पहुँचाने के लिए अडानी समूह के पास अपनी निजी मालगाड़ियाँ और आधुनिक वेगंस भी हैं।
भारत मे अन्न की बर्बादी का रोना हम हमेशा रोते आए हैं। इन आधुनिक अन्न भण्डारण के साइलोस गोदामों में अन्न को आधुनिक ऑटोमेटिक मशीनों से सुखाया, साफ किया जाता है और हवा-पानी, नमी, कीड़े-मकोड़ों से सुरक्षित रखा जाता है। अन्न भंडारण के लिए बोरी या गनी बैग्स की ज़रूरत नही होती। ऐसे में, अन्न न सड़ता है न खराब होता न ही उसमें घुन या कीड़े लगते ।
इन साइलोस से अन्न चोरी नहीं हो सकता क्योंकि FCI आधुनिक तकनीक से इसकी रियल टाइम मोनिटरिंग करती है और अन्नदाताओं के दाने-दाने का हिसाब रखती है। ये ‘अडानी के साइलोस’ पुराने गोदामों की तुलना में सिर्फ 1/3 जमीन घेरते हैं और जहाँ पुराने सिस्टम में अनाज भंडारण व्यवस्था के जिस काम मे 2 -3 दिन लग जाते थे वो काम अब सिर्फ 2 घंटे में हो जाता है। क्या ये व्यवस्था FCI और किसान, दोनों के लिए लाभकारी नहीं है?
क्या रवीश कुमार ‘अडानी के साइलोस’ पर अपनी ही भ्रामक शैली में आँखें बड़ी कर के लोगों को इन तथ्यों को बता सकते हैं? इसका जवाब हम सब जानते हैं। इसका जवाब फर्जी और भ्रामक तथ्यों के जरिए सत्ता के खिलाफ प्रपंच स्थापित करना मात्र होता है।
‘फैक्ट चेकर फेसबुक’ का मौन
रवीश के झूठ पर एक और बड़ी बात यह है कि जहाँ सोशल मीडिया और खासकर फेसबुक दक्षिणपंथी समाचार चैनल्स या विचारों को फेक साबित करने, उन्हें छुपाने, दबाने में कोई कसर नहीं छोड़ता, वहीं रवीश कुमार के अडानी समूह को लेकर किए गए भ्रामक और फर्जी दावे तीन दिन बाद भी ‘तथ्य’ बनकर जस के तस मौजूद हैं। यह पूरी लॉबी है, जो किसानों के साथ खड़े होने का दावा तो करती है लेकिन इसके मूल में क्या होता है, यह शाहीनबाग़ जैसे शर्मनाक अध्यायों के जरिए समय-समय पर बाहर आता रहा है।
कॉन्ग्रेस चाहती है कि मैडम सोनिया गाँधी के बारे में देश के बच्चे जानें-पढ़ें। नेहरू-इंदिरा को पढ़ने वाले बच्चे सोनिया गाँधी के बारे में नहीं जानेंगे तो उनका नुकसान होगा।
सोनिया गाँधी की जीवनी को बच्चों की किताब में शामिल करने को लेकर देश की सबसे पुरानी पार्टी बहुत सीरियस है। इतनी सीरियस कि वो तेलंगाना के मुख्यमंत्री से इसके लिए गुजारिश भी कर गए।
Telangana: AICC spokesperson Sravan Dasoju requests Telangana Chief Minister K Chandrashekhar Rao to include Congress president Sonia Gandhi's biography in the state school syllabus on the occasion of her 74th birthday yesterday
ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी (AICC) के प्रवक्ता डॉ श्रवण दसोजू ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव से अनुरोध किया कि वे राज्य के स्कूल सिलेबस में उनकी जीवनी को शामिल करें। डॉ दसोजू ने तेलंगाना के मुख्यमंत्री को याद दिलाया कि उन्होंने राज्य विधानसभा में एक आधिकारिक बयान दिया था, जिसमें कहा था – “सोनिया गाँधी के बिना तेलंगाना नहीं बनता।”
इसी को याद दिलाते हुए कॉन्ग्रेस प्रवक्ता डॉ श्रवण दसोजू ने कहा, “इस महान योगदान और प्रतिबद्धता के लिए सोनिया गाँधी को एक यादगार उपहार देना हम सभी की जिम्मेदारी है। तेलंगाना बनने का सपना सच हो चुका है, लेकिन 6 साल बाद भी राज्य सरकार ने बदले में कुछ नहीं किया।”
कॉन्ग्रेस में सोनिया गाँधी की भक्ति
9 दिसंबर 1946 को पैदा हुईं सोनिया गाँधी अब 74 वर्ष की हो गई हैं। कॉन्ग्रेस में उनकी भक्ति का आलम यह है लोग उन्हें देवी का रूप भी मान लेते हैं।
मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता डॉक्टर टीके नवरात्रि के दौरान ‘देवी’ के रूप में सोनिया गाँधी की पूजा-अर्चना करते हैं। उन्हें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष पर उतना ही विश्वास है, जितना भगवान में। इतना ही नहीं उन्होंने यह तक क़सम खाई हुई है कि सोनिया गाँधी जब तक भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन जातीं, तब तक वो अपना सिर मुंडवाए रखेंगे।
और कुछ हैं जो सदा मैडम सोनिया जी के चरणों में पड़े रहना चाहते हैं!
PM मोदी कहाँ गए थे, कब गए थे, कैसे गए थे और किस-किस रूट से गए थे – RTI करके एक शख्स ने यह जानकारी माँगी थी। आश्चर्य की बात यह है कि यह RTI एक ऐसे शख्स ने डाली थी, जो खुद भारतीय वायुसेना के कोमोडोर रह चुके हैं, नाम है – लोकेश के बत्रा।
कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा ने PM मोदी के अलावे पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे में भी यह सब जानकारी माँगी थी – 2013 से लेकर अब तक जब RTI डाली गई थी, उस तिथि तक)। आश्चर्य यह कि केंद्रीय सूचना आयोग (CIC) ने 8 जुलाई 2020 को भारतीय वायु सेना को यह जानकारी देने के लिए निर्देश भी जारी कर दिया।
अब भारतीय वायु सेना ने CIC के इस निर्देश के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका दायर की है। भारतीय वायु सेना का कहना है कि प्रधानमंत्री से लेकर पूर्व प्रधानमंत्री की हवाई यात्रा से संबंधित जानकारी साझा नहीं की जा सकती है। वायु सेना ने इसे ‘सेंसिटिव डिटेल’ की कैटेगिरी में बताया है।
भारतीय वायु सेना ने कोर्ट को बताया कि प्रधानमंत्री के साथ चलने वाले SPG ग्रुप के जवान और पूरी यात्रा डिटेल को सार्वजनिक करने से न सिर्फ प्रधानमंत्री की सुरक्षा खतरे में पड़ेगी बल्कि देश की अखंडता और संप्रभुता पर भी खतरा बन सकता है।
कोमोडोर (रिटायर्ड) लोकेश के बत्रा ने PM मोदी और पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के बारे इस तरह की जानकारी के लिए जून 2018 में RTI डाली थी। भारतीय वायु सेना ने कोर्ट को यह बताया कि RTI एक्ट के तहत इस तरह की जानकारी को निषेध बताया गया है। अपने तर्क में वायु सेना ने कहा कि CIC ने निर्देश देने में भयंकर चूक की है क्योंकि SPG को RTI एक्ट के तहत छूट दी गई है।
RTI एक्टिविस्ट और सुप्रीम कोर्ट
दिसंबर 2019 में मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे ने प्रशांत भूषण को उनकी एक याचिका के लिए फटकार लगाई। यह याचिका प्रशांत भूषण की ही एक पुरानी याचिका के बारे में थी। उस पुरानी याचिका को दायर कर प्रशांत भूषण ने आरटीआई एक्ट के संबंध में राज्यों के सूचना आयुक्तों की नियुक्ति के बारे में सवाल उठाए थे।
इसके जवाब में सीजेआई ने माना था कि आरटीआई को लेकर कुछ गंभीर चिंताएँ अवश्य जायज़ हैं, लेकिन उन्होंने यह भी कहा कि ऐसे लोग सूचनाएँ माँग रहे हैं, जिनका मामले से कोई लेना-देना ही नहीं है। उन्होंने भूषण को लेकर नाराज़गी जताते हुए कहा, “कुछ लोग खुद को ‘आरटीआई एक्टिविस्ट’ कहते हैं। मुझे बताइए, ये कोई व्यवसाय है क्या?”
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने UPA के कार्यकाल के दौरान एम्ब्रेयर (Embraer) विमान की खरीद में कथित रिश्वतखोरी के संबंध में रक्षा डीलर विपिन खन्ना के खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग के सम्बन्ध में एक आरोप पत्र दायर किया है, जिसमें दावा किया गया है कि उन्हें रिश्वत के रूप में 25 करोड़ रूपए मिले। विपिन खन्ना मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली पहली यूपीए सरकार में विदेश मंत्री और कॉन्ग्रेस के कद्दावर नेता कुँवर नटवर सिंह के करीबी सहयोगी हैं।
ब्राजील की विमान निर्माता कंपनी एम्ब्रेयर से विमान खरीद यूपीए के तहत किया गया तीसरा रक्षा सौदा है, जिसकी जाँच परवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा की जा रही है। एंटी मनी लॉन्ड्रिंग एजेंसी भी इटली से अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों और स्विट्जरलैंड से 75 पिलाटस विमानों की खरीद में कथित तौर पर घूसखोरी की जाँच कर रही है। एम्ब्रेयर खरीद मामले में, ईडी ने भारतीय एजेंटों को मिली 26 करोड़ रूपए की रिश्वत के कथित लेनदेन के मिलने के बाद 16 करोड़ रूपए की संपत्ति अटैच की है।
उल्लेखनीय है कि वर्ष 2008 में, भारत ने DRDO के एयरबोर्न रडार सिस्टम के लिए ब्राजील के एम्ब्रेयर से तीन विमान खरीदे थे। ब्राजील के निर्माता पर 210 मिलियन डॉलर के सौदे में 5 मिलियन डॉलर से अधिक का कमीशन देने का आरोप है। कथित अदायगी पंजाब के संगरूर के एक प्रमुख चावल निर्यातक, केआरबीएल के खातों का इस्तेमाल कर प्राप्त की गई थी, जहाँ से रक्षा डीलर विपिन खन्ना का बेटा कभी कॉन्ग्रेस का विधायक चुना गया था। केआरबीएल लिमिटेड (KRBL Ltd) इंडिया गेट बासमती चावल की निर्माता कंपनी है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईडी ने अपनी चार्जशीट में दावा किया है कि धनशोधन निरोधक अधिनियम (पीएमएलए) के तहत जाँच से पता चला है कि ब्राजील विमान निर्माता कम्पनी एम्ब्रेयर एसए ने 210 मिलियन डॉलर में भारतीय वायु सेना को एयरक्राफ्ट की आपूर्ति का कॉन्ट्रेक्ट हासिल किया और इस कॉन्ट्रेक्ट को अपने पक्ष में प्रभावित करने के लिए विपिन खन्ना नाम के एक बिचौलिए को 5.76 मिलियन डॉलर का कमीशन दिया।
भारत के रक्षा खरीद नियमों के अनुसार, रक्षा सौदों में बिचौलियों को रोकने के कठोर प्रावधान हैं। ब्राजील के एक समाचार पत्र की रिपोर्ट में आरोप लगाया गया था कि कंपनी (एम्ब्रेयर) ने सऊदी अरब और भारत में सौदों के लिए बिचौलियों की सहायता ली थीं।
प्रवर्तन निदेशालय ने स्पष्ट किया कि रिश्वत को कथित रूप से एम्ब्रेयर ने अपनी सहायक कंपनियों के माध्यम से इंटरदेव एविएशन सर्विसेज पीटीई लिमिटेड (आईएएसपीएल), सिंगापुर को एक ‘फर्जी समझौते’ के रूप में भेजा था।
झारखंड के दुमका जिले में सामूहिक दुष्कर्म का हैरान कर देने वाला मामला सामने आया है। 5 बच्चों की माँ के साथ कुल 17 लोगों ने बलात्कार की घटना को अंजाम दिया है। वारदात के दौरान आरोपितों ने पीड़िता के पति को बंधक बना लिया था। घटना की जानकारी मिलने के बाद पुलिस ने 17 लोगों पर मामला दर्ज कर लिया है।
अभी तक इस मामले में 1 आरोपित को गिरफ्तार किया जा चुका है। इस घटना पर डीआईजी सुदर्शन मंडल ने मीडिया कर्मियों से बात करते हुए कहा कि पुलिस ने इस मामले की जाँच शुरू कर दी है। घटना के आरोपितों की गिरफ्तारी के लिए कार्रवाई शुरू कर दी गई है।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हर मंगलवार दुमका जिले के मुफ्फसिल थाना क्षेत्र के अंतर्गत उनके गाँव में साप्ताहिक हाट (बाज़ार) लगता है। रात के 8 बजे पीड़िता और उनका पति हाट से घर की तरफ लौट रहे थे। थोड़ी दूर आगे बढ़ने के बाद 17 लड़कों ने दोनों को घेर लिया, जिसमें सभी युवक नशे में धुत थे। इसके बाद लगभग 5 लड़कों ने पीड़िता के पति को और 2 ने पीड़िता को पकड़ लिया। वह पीड़िता को झाड़ियों की तरफ ले गए और रात के 12 बजे तक सभी ने उनके साथ बलात्कार किया।
आरोपितों ने पीड़िता और उसके पति को घटना की जानकारी किसी और को देने पर जान से मारने की धमकी भी दी। वारदात के बाद पीड़िता ने बुधवार (9 दिसंबर 2020) की सुबह पुलिस को मामले की जानकारी देते हुए बताया कि एक आरोपित (राम मोहली) को पहचानती है। इसके अलावा उसने किसी भी अन्य आरोपित को पहचानने से इनकार किया है।
सामूहिक दुष्कर्म की जानकारी मिलने के बाद डीआईजी और एसपी अंबर लकड़ा ने पीड़िता से मुलाक़ात की। पीड़िता के बयान के आधार पर उन्होंने त्वरित जाँच और आरोपितों की गिरफ्तारी के निर्देश दिए हैं।
Jharkhand: A 35-year-old woman was allegedly gang-raped by 17 men in Mufassil area of Dumka on Tuesday evening. “The incident allegedly took place when she was returning to her home from a market. She has been sent for a medical check-up,” says DIG Sudarshan Mandal. (09.12) pic.twitter.com/7Rx3AOhLwg
इसके बाद एसडीओपी विजय कुमार मुफ्फसिल थाना प्रभारी नवल किशोर सिंह मामले की जाँच में जुट गए हैं। इस मामले में अभी तक 1 आरोपित को गिरफ्तार किया जा चुका है और उससे पूछताछ जारी है और पीड़िता को मेडिकल परीक्षण के लिए भेज दिया गया है। वहीं डीआईजी सुदर्शन मंडल का कहना है कि वारदात के आरोपितों की पहचान की जा रही है। पीड़िता का मेडिकल करा दिया गया है, रिपोर्ट आने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
पिछले कुछ समय से झारखंड में इस तरह की तमाम घटनाएँ सामने आई हैं, लिहाज़ा इस घटना के सुर्ख़ियों में आने के बाद झारखंड की राज्य सरकार पर तमाम सवाल खड़े किए जा रहे हैं। इसी कड़ी में भाजपा प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने सामूहिक दुष्कर्म की इस घिनौनी वारदात पर झारखंड सरकार आलोचना की।
उन्होंने कहा, “इसे जंगलराज नहीं कहेंगे तो और क्या कहेंगे? प्रदेश के भीतर बहू-बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। उनके साथ लगातार इस तरह की वारदात अंजाम दी जाती है, दरिंदगी की सारी सीमाएँ पार की जाती हैं। इस तरह की घटनाओं को अंजाम देने वालों के मन से क़ानून-व्यवस्था का भय ख़त्म होता जा रहा है। इसके लिए आखिर कौन जिम्मेदार होगा?”
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) द्वारा दायर चार्जशीट में एक चौंकाने वाली बात सामने आई है कि अमेरिका आधारित ‘सिख फॉर जस्टिस’ (SFJ/Sikh for Justice), जो कि एक खालिस्तान समर्थक संगठन है, भारतीय सेना में शामिल सिख समुदाय के भीतर भारत-विरोधी भावनाओं को भरने का प्रयास करता रहा है। इस खुलासे में पता चला है कि SFJ इन सिख सैनिकों को देश के खिलाफ विद्रोह करने के लिए भी उकसा कर देश की सुरक्षा को खतरे में डालने की कोशिश करता रहा है।
NIA के अनुसार, “SFJ भारतीय सेना में शामिल सिख सैनिकों को उकसाने के साथ-साथ कश्मीर के युवाओं को कट्टरपंथी बनाने और भारत के लिए कश्मीर के अलगाव को खुले तौर पर समर्थन देने की कोशिश कर रहा है।”
SFJ नेता और आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू, खालिस्तान टाइगर फोर्स के प्रमुख हरदीप सिंह निज्जर और बब्बर खालसा इंटरनेशनल के प्रमुख परमजीत सिंह उर्फ पम्मा सहित 16 आरोपितों के नाम वाली चार्जशीट में यह भी दावा किया गया है कि SFJ कश्मीरी युवाओं को कट्टरपंथी बनाने की कोशिश कर रहा है और खुले तौर पर कश्मीर के अलगाव को समर्थन दे रहा है।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, एनआईए के प्रवक्ता ने बताया कि जाँच एजेंसी, और अन्य केंद्रीय एजेंसियों द्वारा सौंपे गए डोजियर के आधार पर, एसएफजे के मुख्य संरक्षक – गुरपतवंत सिंह पन्नु, हरदीप सिंह निज्जर और परमजीत सिंह उर्फ पम्मा को गैर-कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत ‘आतंकवादी’ के रूप में नामित किया गया है।
प्रवक्ता के अनुसार, फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप, यू-ट्यूब और कई अन्य वेबसाइटों पर अनेकों सोशल मीडिया अकाउंट लॉन्च किए गए थे जिनका उपयोग युवाओं को कट्टरपंथी बनाने, शांति और सद्भाव को बिगाड़ने और आतंकवादी गतिविधियों के लिए धन जुटाने के लिए किया जा रहा था।
केंद्रीय जाँच एजेंसी ने बुधवार (दिसंबर 08, 2020) को यूएपीए के तहत संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम और कनाडा के 16 लोगों के खिलाफ चार्जशीट दायर की, जो कथित रूप से भारत में धर्म और क्षेत्र के बहाने देशद्रोही गतिविधियों और शत्रुतापूर्ण दुश्मनी में शामिल थे।
एनआईए के एक अधिकारी के अनुसार, मामले की जाँच से पता चला है कि मानवाधिकारों की वकालत करने वाले समूह के नाम पर शुरू किया गया एसएफजे पाकिस्तान सहित विदेशी धरती से संचालित होने वाले ‘खालिस्तानी आतंकवादी समूहों’ का फ्रंटल ऑर्गनाइजेशन है।
अधिकारी ने कहा, “यह अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे विभिन्न देशों में ‘मानवाधिकार सुरक्षा समूह’ की आड़ में अपने कार्यालय चलाने वाला एक अलगाववादी संगठन था।”
स्वर्ण मंदिर पर सेना की कार्रवाई से नाराज 574 भगौड़े सिख सैनिक हुए थे गिरफ्तार- न्यूयॉर्क टाइम्स
SFJ संगठन को लेकर NIA का खुलासा न्यूयॉर्क टाइम्स की एक खबर को पुख्ता करता है। जून 12, 1984 के दिन अमेरिकी समाचार पत्र ‘न्यूयॉर्क टाइम्स’ में प्रकाशित एक खबर के अनुसार, भारतीय सेना ने ऐसे 574 सिखों को गिरफ्तार किया था, जो खालिस्तानी चरमपंथी भिंडरावाले के कब्जे से स्वर्ण मंदिर को आजाद कराने के लिए चलाए गए ऑपरेशन से नाराज होकर भारतीय सेना से भाग निकले थे। सम्भव है कि यह SFJ संगठन के षड्यंत्रों का ही नतीजा था जो भारत को अपने जाँबाज सिख सैनिकों को खोना पड़ा।
इस रिपोर्ट के अनुसार, पूर्वोत्तर भारत में सेना छोड़कर गए 500 से 600 सिख सैनिकों को तीन स्थानों पर गिरफ्तार किया गया, जिनमें एक एनकाउंटर में 26 सिख चरमपंथी मारे गए थे। उसी समय, उत्तर में और पश्चिम में, बॉम्बे (अब मुंबई) के पास भी ऐस घटनाएँ सामने आई थीं। इस रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ ने रामगढ़ और नई दिल्ली के बीच कई जगहों पर 574 गिरफ्तारियों की सूचना दी।
न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, “ये वो भगौड़े सिख सैनिक थे जो सिख धर्म के सबसे पवित्र स्थल, पंजाब के अमृतसर में स्वर्ण मंदिर पर पिछले मंगलवार और बुधवार को भारतीय सेना के हमले के बाद गुस्से में बिहार राज्य के रामगढ़ चले गए थे। ये सैनिक भारत भर से अमृतसर जा रहे अन्य सिखों में शामिल हो गए।”
गौरतलब है की यह रिपोर्ट जिस घटना का जिक्र करती है वह भारतीय सेना द्वारा खालिस्तानी चरमपंथियों से स्वर्ण मंदिर को आजाद करने को लेकर चलाए गए ऑपरेशन ब्लू स्टार है जिसे लेकर सिख समुदाय के एक वर्ग के भीतर सत्ता पख के प्रति जबरदस्त आक्रोश भी रहा और इसके चलते तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को अक्टूबर 31, 1984 उन्हीं के सिख सुरक्षाकर्मियों ने गोली मारकर हत्या कर दी।
भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार, इस ऑपरेशन में 83 सैनिक तथा 493 आम नागरिक व चरमपंथी मारे गए। इस कार्यवाही में 86 से अधिक नागरिक, 249 सैनिक घायल हो गए जबकि 1592 को गिरफ्तार किया गया।
सन् 1920 की बात है। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में असहयोग आंदोलन छिड़ चुका था। हर ओर अंग्रेजों के बहिष्कार के लिए मुहीम चल रही थी। जनमानस की जागृति हेतु हर संभव प्रयास हो रहे थे। ब्रिटिश सरकार के प्रभुत्व को खारिज करने के लिए गाँधी चाहते थे कि हर हाल में भारतीय लोग ब्रिटिश सरकार को अपना सहयोग देना बंद करें।
उनके इस अभियान का उद्देश्य था कि चाहे बात सरकारी निकाय में काम करने वाले भारतीय अधिकारियों की हो या फिर अंग्रेजों द्वारा संचालित स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहे छात्र-छात्राओं की, हर कोई उन चीजों का बहिष्कार करे, जिससे ब्रिटिश अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही थी। इसके अलावा इस आंदोलन के पीछे उनका एक और महत्तवपूर्ण मकसद था, जो देश में राष्ट्रीय स्कूलों और कॉलेजों की स्थापना करके पूरा होना था।
अब चूँकि गाँधी के असहयोग आंदोलन में कई मुस्लिम नेता बढ़-चढ़ कर शामिल हुए थे, तो गाँधी समेत इन सबके लिए राष्ट्रीयता के नाम पर मुस्लिमों के लिए शैक्षणिक संस्थान खोलना एक ड्रीम प्रोजेक्ट था। नतीजा, इसी सपने को आधार बना कर सन् 1920 में 26 अक्टूबर को अलीगढ़ में जामिया की स्थापना एक संस्थान के रूप में हुई।
जामिया मिलिया इस्लामिया की आधारशिला मौलाना महमूद हसम ने रखी थी। लेकिन इसके संस्थापकों में एक ऐसे शख्स का नाम शामिल था, जिसके बारे में कहा जाता है कि उनका सपना हिंदुस्तान को दारुल इस्लाम बनाना था और जिसने 1923 में भरी सभा में खड़े होकर सबके बीच वंदे मातरम का विरोध कर दिया था।
मोहम्मद अली जौहर, जामिया के पहले कुलपति
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं मोहम्मद अली जौहर की। जौहर, भारत के इतिहास में एक ऐसे मजहबी नेता थे, जिन्होंने साल 1930 में मुस्लिम लीग की ओर से लंदन में हुए गोल मेज सम्मेलन में, ब्रिटिश हुकूमत के सामने गुलाम भारत में मरने तक से मना कर दिया था। उन्होंने उस सम्मेलन में बात रखते हुए कहा था कि या तो भारत को आजादी दी जाए या फिर लंदन में उन्हें कब्र के लिए जमीन दी जाए। सम्मेलन में वह कह चुके थे कि वो गुलाम भारत में वापस नहीं जाना चाहते। इसलिए उन्हें वहीं कब्र मिले।
आज मुहम्मद अली जौहर का जन्मदिवस है। उनका जन्म 10 दिसंबर 1878 में यूपी के रामपुर में हुआ था। अलीगढ़ के देवबंद से तालीम पाने वाले जौहर उच्च शिक्षा के लिए ऑक्सफॉर्ड तक पहुँचे। उन्होंने वहाँ लिंकन कॉलेज से 1898-1902 में मॉर्डन हिस्ट्री की पढ़ाई की लेकिन ICS परीक्षा में असफल होने के कारण ब्रिटिश सरकार की सिविल सर्विस का हिस्सा नहीं बन पाए। तत्पश्चात उन्होंने रामपुर और बडोरा में सेवा दी। इसी बीच उनकी करीबियाँ मुस्लिम लीग से बढ़ने लगीं।
सन् 1911 में कलकत्ता से अंग्रेजी साप्ताहिक ‘कामरेड’ और 1913 में दिल्ली से ‘हमदर्द’ जैसी पत्रिकाएँ निकाल कर इस्लामी प्रोपगेंडा को हवा देने वाले जौहर पर धर्मांतरण का समर्थन करने के इल्जाम लगते रहे हैं। कहते हैं कि उन्होंने यही सब करके ‘मौलाना’ की उपाधि प्राप्त की थी। 1918 में वह मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बन चुके थे और 1919 में खिलाफत आंदोलन का आगाज करने वाले सबसे प्रमुख नेता।
खिलाफत आंदोलन से चमके मोहम्मद अली जौहर
कुछ लोगों को आज भी लगता है कि आजादी के संग्राम में ‘खिलाफत आंदोलन’ मात्र भारत की स्वतंत्रता के लिए चलाया गया एक अभियान था। लेकिन नहीं! वास्तविकता में यह एक ऐसा आंदोलन था, जिसकी नींव तुर्की में खलीफा का शासन बरकरार रखने के लिए पड़ी थी।
दरअसल विश्व युद्ध के दौरान जब तुर्की ने जर्मनी का साथ दे दिया था तो ब्रिटिश आग बबूला हो उठे। उन्होंने तुर्की को विभाजित किया, जिससे खलीफा शासन कमजोर हो गया और विश्व के अन्य मुसलमान क्रोधित हो गए। भारत में वही गुस्सा जौहर अली और शौकत अली में भी दिखने को मिला और इन्होंने ब्रिटिशों के ख़िलाफ़ खिलाफत आंदोलन की शुरुआत की। उस समय चूँकि महात्मा गाँधी मुसलमानों को आजादी की लड़ाई में हिस्सेदार बनाना चाहते थे तो उन्होंने व इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस ने मोहम्मद अली जौहर के साथ समझौता कर लिया।
वंदे मातरम का विरोध करने वाले मोहम्मद अली जौहर
मोहम्मद अली जौहर को लेकर एक और किस्सा जो बेहद प्रचलित है, वो यह कि उन्होंने 1923 में आंध्र प्रदेश के काकीनाड़ा में कॉन्ग्रेस के अधिवेशन के समय मंच से उतर कर वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी बता दिया था। उस समय के मशहूर गायक विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने उन्हें समझाया भी था कि यह कॉन्ग्रेस का मंच है न कि कोई मस्जिद। मगर, जौहर ने नहीं सुनी तो नहीं सुनी। उनकी मुखालफत का ही परिणाम है कि आज भी कई कट्टरपंथी वंदे मातरम को इस्लाम विरोधी बता देते हैं।
जौहर की इस हरकत से पहले कॉन्ग्रेस के सभी सत्र और बैठकें वंदे मातरम से प्रारंभ होती थीं, लेकिन उस दिन एक मजहबी नेता ने पूरा माहौल बिगाड़ दिया। हालाँकि उनके मंच छोड़ने के बाद हर किसी ने वंदे मातरम दोबारा मन से गाया। देशघाती कई नीतियों और मजहबी झुकाव के कारण कॉन्ग्रेस में बाद में उनका विरोध हुआ और अंतत: वह फिर मुस्लिम लीग के नेता बने।
मुस्लिम लीग में शामिल होने के बाद 1924 में अधिवेशन के दौरान उन्होंने सिंध से पश्चिम का सारा क्षेत्र अफगानिस्तान में मिलाने की माँग की। लोगों के बीच दांडी यात्रा से प्रसिद्ध हुए महात्मा गाँधी के लिए जौहर ने सार्वजनिक रूप से जहर उगलते हुए कहा था कि गाँधी से अच्छा तो व्यभिचारी मुसलमान है।
मोहम्मद अली जौहर का जामिया प्रेम
जौहर पर चर्चा करने की और भी बहुत सी वजहे हैं लेकिन इन सबमें जो आज सबसे अधिक प्रासंगिक है, वो जामिया मिलिया इस्लामिया के प्रति इनका प्रेम। गुलाम हैदर, मौलाना को जामिया की बीज बोने वाला बताते हैं। उन्होंने भले ही जामिया को ज्यादा समय नहीं दिया मगर इस्लामी शिक्षा के प्रचार-प्रसार में उनकी संलिप्ता ने उन्हें अपने समुदाय की एक बड़ी पहचान दिलाई।
लंदन में अली जौहर की मृत्यु के बाद एक ओर जहाँ उन्हें उनकी इच्छानुसार भारत न भेज कर येरुशरम में दफनाया गया, वहीं उनकी बीवी अमजदी बेगम ने उनकी सारी एकेडमिक संबंधी चीजें जामिया को दे दीं। यानी जीते जी और मरने के बाद भी जामिया के लिए मौलाना एक महत्वपूर्ण शख्सियत थे।
साभार:जामिया मिलिया इस्लामिया की वेबसाइट
1 मार्च 1935 को इस यूनिवर्सिटी को दिल्ली के कनॉट प्लेस से ओखला में लाया गया और उसके बाद 1936 में इसे नए कैंपस में शिफ्ट किया गया, जहाँ जामिया के सभी संस्थान आए। जामिया को दिसंबर 1988 में भारतीय संसद में एक एक्ट के तहत संस्थान से यूर्निवर्सिटी का दर्जा मिला और तब यह सेंट्रल यूनिवर्सिटी में तबदील हो गई।
इस यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर आज इसका बखान आपको हर सेक्शन में पढ़ने को मिल जाएगा। यहाँ से आपको ये भी पता चलेगा कि पिछले कुछ सालों में यूनिवर्सिटी ने कितनी उपलब्धियाँ हासिल की हैं। वेबसाइट से लिए गए स्क्रीनशॉट में आप विश्वविद्यालय द्वारा अर्जित कामयाबी को पढ़ सकते हैं। इसे लिखने वाली स्वयं इस यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर प्रोफेसर नज्मा अख्तर हैं।
साभार:जामिया मिलिया इस्लामिया की वेबसाइट
मगर, ये सब पढ़ते हुए यह ध्यान रहे कि पिछले कुछ सालों में जामिया यूनिवर्सिटी केवल अपनी शैक्षिक उपलब्धियों के कारण चर्चा का विषय नहीं बनी। इस यूनिवर्सिटी, जिसका बीज मोहम्मद अली जौहर ने बोया था, आज उन्हीं के विचारों का अनुसरण करने वालों छात्रों के कारण भी चर्चा में रही है।
जामिया मिलिया इस्लामिया क्यों बनी रही चर्चा में?
साल 2008 में बाटला हाउस एनकाउंटर के बाद मोहम्मद अली जौहर का यह जामिया चर्चा में आया था। हैरानी इस बात की नहीं थी कि दिल्ली को धमाकों से दहलाने वाले आतंकी उसी इलाके में छिपे थे। आश्चर्य इसका था कि आतंकियों के समर्थन में ऐसा ममतामयी माहौल तैयार किया जा चुका था कि संदिग्ध आतंकी एक न्यूज चैनल में घुस कर खुली चुनौती दे रहा था और तत्कालीन वीसी मुशीरुल हसन ने बाटला हाउस से गिरफ्तार आतंकियों को कानूनी मदद की घोषणा कर दी थी। हालाँकि बाद में जब दिल्ली पुलिस के तत्कालीन संयुक्त आयुक्त कर्नल सिंह ने मुशीरुल हसन के सामने सारे तथ्य रखे, तो वे चुप हो गए। इस बाटला हाउस एनकाउंटर में मोहन चंद्र शर्मा वीरगति को प्राप्त हुए थे।
इसके बाद जामिया मिलिया इस्लामिया को लेकर विवाद साल 2019 में बढ़ा और पूरे देश ने एक विश्वविद्यालय के रूप में राष्ट्रीय राजधानी में फलता-फूलता एक इस्लामी संगठन देखा। याद करिए, पिछले दिसंबर की शुरुआत में एंटी सीएए प्रोटेस्ट भड़कने से पहले एक ‘जामिया का छात्र’ नामक संगठन सामने आया था, जिसने एक पोस्टर जारी करके मजहब विशेष के लोगों से राजनीतिक रूप से अल्लाह के कानून द्वारा ‘शासन स्थापित करने’ के लिए संगठित होने का आह्वान किया था। इस पोस्टर में लिखा था ‘अल्लाह की आज्ञा हर कानून से सबसे ऊपर है।’
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के छात्रों द्वारा नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ उग्र प्रदर्शन शुरू हुए। स्थिति इतनी बिगड़ गई की पुलिस को छात्रों को टाँगकर वहाँ से हटाना पड़ा। कुछ समय में वहाँ पत्थरबाजी की खबरें आनी शुरू हो गईं। बाद में वीडियोज से पता चला कि जामिया के ‘छात्रों’ ने हिंदुओं से आजादी के नारे भी लगाए हैं। छात्रों ने बुलंद आवाज में कहा था कि वह हिंदुओं से आजादी लेकर रहेंगे।
माहौल को बिगड़ता देख उस दौरान दिल्ली पुलिस ने बल का प्रयोग जरूर किया था और अराजक तत्वों पर कैंपस में घुस कर एक्शन लिया था, लेकिन हालातों को आँकिए तो शायद समय की वही माँग थी। बाद में पूरे मामले की जाँच में पता चला थ कि जामिया से 750 फेक आईडी कार्ड मिले, जिसने साफ कर दिया कि पूरी हिंसा एंटी सीएए प्रोटेस्ट के कारण नहीं भड़की बल्कि उसकी तैयारी बहुत पहले से चल रही थी।
विचार करने वाली बात है कि आखिर एक शैक्षणिक संस्थान में ‘तेरा-मेरा रिश्ता क्या? ला इलाहा इल्लल्लाह’ और ‘आज़ादी कौन दिलाएगा? जैसे नारे कौन लगाता है। कौन नारा-ए-तकबीर चिल्लाता है या कौन हिंदू राष्ट्र के नाम पर हिंदुओं पर हमला करता है? शायद एक लोकतांत्रिक देश में कोई भी नहीं। लेकिन अफसोस! जामिया के दिमाग में उस समय यही चल रहा था। उन्होंने आयशा व लदीदा जैसी कट्टरपंथी लड़कियों को पूरे प्रोटेस्ट की पोस्टर गर्ल बना दिया था और उनकी आड़ में अपनी आवाज उठा रहे थे।
धीरे-धीरे जब जामिया हिंसा शांत हुई और मामले की जाँच शुरू हुई तो हिंसा में शामिल प्रमुख चेहरों की हकीकत खुलने के साथ, दिल्ली पुलिस को पूरी हिंसा में पीएफआई की भूमिका भी मिली। पुलिस ने बताया कि कैसे हिंसा से दो दिन पहले 13 दिसंबर 2019 को कट्टरपंथी इस्लामी संगठन PFI के लगभग 150 सदस्यों ने विभिन्न राज्यों से दिल्ली में प्रवेश किया था और इन्हीं अराजक तत्वों द्वारा पथराव और आगजनी की शुरुआत हुई थी। पुलिस ने ये भी कहा था कि सिर्फ दिल्ली में हुई हिंसा के लिए ही नहीं बल्कि लखनऊ की हिंसा के पीछे भी पीएफआई का हाथ था।
सोचिए, एक समय था जब देश के राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने इस जामिया के लिए कटोरा लेकर भीख माँगने की बात कह दी थी और एक पिछले साल का जामिया था, जिसके छात्र पुलिस प्रशासन पर पत्थर फेंकने से नहीं चूके और न ही पीएफआई जैसे कट्टरपंथी संगठनों के साथ हाथ मिलाने से गुरेज किया। शायद वह जौहर के आदर्शों का परिणाम था कि जामिया में मजहब को आधार बना कर उपद्रव मचाने वाले लोग शाहीन बाग से लेकर दिल्ली में हुए उत्तर-पूर्वी दिल्ली के दंगों तक में सक्रिय भूमिका में पाए गए।