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महाकाल क्षेत्र के पास बने तकिया मस्जिद के अवैध हिस्से को किया गया ध्वस्त, 500 मीटर में तैनात थे 630 पुलिसकर्मी

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा गुंडों और भू-माफियाओं के खिलाफ लगातार कार्रवाई जारी है। इसी के तहत पुलिस और प्रशासन ने नगर निगम के साथ मिलकर आज (10 दिसंबर, 2020) उज्जैन के महाकाल क्षेत्र में रुद्रसागर के समीप तकिया मस्जिद के अवैध हिस्से पर बुलडोजर चलवा दिया। वहीं मस्जिद के ध्वस्त होने के बाद इलाके में हड़कंप मच गया।

मस्जिद के ध्वस्तीकरण करने पहुँचे प्रशासन ने पहले ही क्षेत्र के 500 मीटर दायरे में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया था ताकि किसी भी प्रकार की अनहोनी न हो पाए। इतना ही नहीं बैरिकेड लगाकर रुद्रसागर की ओर आने वाले सभी रास्ते भी रोक दिए गए थे।

रिपोर्ट्स के अनुसार, यह कार्रवाई आज सुबह 11 बजे तक चली। इस दौरान 630 से भी अधिक पुलिसकर्मी 500 मीटर के दायरे के अंदर अलर्ट पर खड़े थे। पुलिस की सख्ती के कारण इस कार्रवाई के ख़िलाफ़ न किसी ने विरोध प्रदर्शन किया और न ही किसी भी प्रकार की तनाव की स्थिति उत्पन्न हुई।

एडीएम नरेंद्र सूर्यवंशी और एएसपी अमरेंद्र सिंह ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर महाकाल क्षेत्र के 500 मीटर दायरे में आने वाले अतिक्रमण को हटाए जाने की कार्रवाई आगे भी जारी रहेगी।

बता दें दो दिन पहले संभाग स्तर पर अतिक्रमण अभियान को लेकर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने स्वयं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए इसकी समीक्षा की थी। यहीं नहीं सीएम ने भूमाफियों के खिलाफ कार्रवाई और अतिक्रमण अभियान को लेकर अधिकारियों की सुस्ती पर नाराजगी भी जाहिर की थी।

सीएम के फटकार के बाद ही शांतिपूर्ण और गोपनीयता के साथ तकिया मस्जिद के अवैध हिस्से को ध्वस्त करने की कार्रवाई की गई। मस्जिद का मामला देखते हुए जिला और पुलिस प्रशासन के अधिकारियों ने आपात बैठकों के जरिए पूरे मामले की प्लानिंग की थी।

रिपोर्ट में यह भी बात सामने आई है कि गोपनीयता का स्तर इस कदर था कि सभी अधिकारियों को भी इसकी जानकारी नहीं दी गई थी। मामले में शामिल पुलिसकर्मियों को सिर्फ बुधवार रात 12 बजे सिर्फ यह आदेश दिया गया कि सुबह चार बजे पुलिस लाइन में हाजिर रहे। वहीं आगे की जानकारी पुलिस लाइन में ही देने की बात बोली गई थी।

विरोध कृषि कानूनों का, पैदावार नफरत की: किसानों की आड़ में उमर खालिद और शरजील को समर्थन के मायने

एक तरफ दिल्ली की सीमाओं पर बैठे किसानों से केंद्र सरकार लगातार संवाद कर रही है, दूसरी ओर इस ‘आंदोलन’ से लगातार ऐसी तस्वीर सामने आ रही हैं जो इसके असल मंशा पर लगातार सवाल उठाते रहे हैं। चाहे वह खालिस्तानी ताकतों की घुसपैठ हो या फिर उमर खालिद और शरजील इमाम के लिए ताजा-ताजा दिखा समर्थन।

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में किसानों के नाम पर क्या हो रहा है? ये किसी से नहीं छिपा है। कुछ ऐसा ही ठीक एक साल पहले हुआ था। पिछले साल शाहीन बाग में सीएए विरोध के नाम पर इसी तरह समुदाय विशेष के लोगों का जमावड़ा हुआ था। तब भी दिल्ली की सड़कों को लोकतंत्र के नाम पर ब्लॉक किया गया था और इस बार भी हाल कुछ यही है।

अंतर यदि है तो बस ये कि पिछले साल दिल्ली में हुए प्रदर्शन कट्टरपंथ की जमीन पर भड़के थे। मगर, इस बार सारा खेल राजनैतिक पार्टियों का है। ‘मासूम’ किसानों को ऐसे कानून के ऊपर विपक्षी पार्टियों द्वारा बरगलाया जा रहा है जिसमें निहित प्रावधानों को लागू करने की घोषणाएँ वह एक समय में खुद कर चुके हैं। स्थिति ये है कि धरने पर बैठा कोई शख्स सरकार की सुनने को बिलकुल राजी नहीं है, वह सिर्फ एक माँग पर अड़े हैं कि कानून को निरस्त किया जाए। 

मगर अब धीरे-धीरे यह प्रदर्शन राजनीति से प्रेरित लगने से ज्यादा खतरे की घंटी नजर आने लगा है। वही खतरे की घंटे जिसे शाहीन बाग के दौरान हम नजरअंदाज करते रहे और अंत में उसका भीषण रूप हमें उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के रूप में देखने को मिला।

आज किसानों के प्रोटेस्ट में प्रदर्शनकारियों के हाथ में शरजील इमाम और उमर खालिद जैसे तमाम आरोपितों की तस्वीर थी। जाहिर है किसानों के इस प्रदर्शन से इनका कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन तब भी इन पोस्टरों के साथ आई प्रदर्शन की तस्वीर इस ओर इशारा करती है कि शाहीन बाग का वामपंथी-कट्टरपंथी गिरोह सक्रिय है।

प्रश्न उठता है कि बिना वजह आखिर कोई किसान महिला अपने प्रदर्शन में उस शरजील इमाम को रिहा क्यों करवाना चाहेगी जो अपने भाषण में असम को भारत से काटने की बात कह रहा था? इन महिलाओं को क्या मतलब है उस उमर खालिद से जो ट्रंप के आने पर दिल्ली में दंगे करवाना चाहता था और उसके लिए पहले से गुपचुप ढंग से बैठकें कर रहा था?  जाकिर नाइक से मिलने वाले खालिद सैफी से आखिर किसान प्रदर्शन का क्या लेना-देना? अर्बन नक्सलियों से कृषि कानून का क्या संबंध?

आज सामने आई तस्वीर ने साफ कर दिया कि पिछले दिनों इस प्रदर्शन की मंशा पर उठे सवाल निराधार नहीं थे। खालिस्तानियों का समर्थन पाकर भी इस पर कोई स्पष्टीकरण न देने वाले किसान नेता अब रेलवे ट्रैक्स को ब्लॉक करने की धमकियाँ तक दे चुके हैं। पिछले दिनों इसी प्रोटेस्ट के मंच से युवराज सिंह के पिता योगराज सिंह ने हिंदुओं के ख़िलाफ़ जहर उगला था।

योगराज ने खुलेआम कहा था, “जिस सरकार की आप बात कर रहे हैं केंद्र की, आपको पता है कि ये कौन हैं? ये वही हैं, जो अपनी बेटियों की डोली हाथ जोड़ कर मुगलों के हवाले कर देते थे।” योगराज के शब्द थे:

“मैं इन्हें आपलोगों से ज्यादा जानता हूँ। ये माँ-बेटियों की कसमें खा कर भी पलट जाते हैं। मैं आपको बधाई देता हूँ कि जब अमित शाह ने कहा कि निरंकारी ग्राउंड आ जाओ तो आपलोग नहीं गए। इनकी किसी बात का विश्वास नहीं करना। एक बात और कहना चाहता हूँ जब इनकी औरतों को अहमद शाह दुर्रानी ले जाता और वहाँ टके-टके की बिकती थी, तो पंजाबियों ने बचाया।”

इसके अलावा हमारे तथाकथित अन्नदाताओं ने अपनी माँगे मनवाने के लिए खुलेआम पिछले दिनों मीडिया के सामने ये तक कह दिया था कि इंदिरा को ठोका, मोदी को भी ठोक देंगे

क्या संवैधानिक ढंग से हो रहे किसी प्रदर्शन में ऐसी बातें निकल कर सामने आती हैं? योगराज के हिंदू घृणा से भरे बयान पर कोई स्पष्टीकरण नहीं आया। इंदिरा ठोक दी वाले बयान पर किसी ने मलाल नहीं किया। इसके बदले सरकार को अलग से धमकाया जा रहा है कि ट्रैक ब्लॉक होंगे।

आजादी संग्राम में सिखों के बलिदान को आज कोई नहीं भुला रहा, कोई इस बात से इंकार नहीं कर रहा कि हिंदुओं के परेशानी के समय में सिख हमेशा उनके साथ रहे, कोई उनकी बहादुरी को नहीं ललकार रहा, लेकिन आप अपने विवेक पर फैसला कीजिए कि आखिर आज प्रदर्शन में शामिल किसान यूनियन के लोग सरकार की बातें सुनने को तैयार नहीं है। क्यों जिद पर अड़े हैं। क्यों बताया जा रहा है कि पहले से वह लोग 4 महीने का राशन लेकर आए हैं?

किसान आंदोलन में उमर खालिद और शरजील इमाम के पोस्टर का पहुँचना बताता है कि मुद्दों के नाम दिल्ली वालों को एक बार फिर भटकाया जा रहा है। शाहीन बाग के छद्म एजेंडे के बेनकाब होने के बाद अब वही ताकतें कृषि कानून के विरोध नाम रोटी सेंकने की कोशिश में हैं। प्रदर्शनों पर, गुरुद्वारों पर नमाज पढ़ने के लिए समुदाय विशेष को जगह देख कर नया प्रोपेगेंडा फैलाया जा रहा है।

शरद पवार के UPA अध्यक्ष बनने की अटकलों को NCP ने किया खारिज, कहा- किसान आंदोलन से ध्यान भटकाने की चाल

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के सुप्रीमो शरद पवार यूपीए के अध्यक्ष नहीं बनेंगे। यह घोषणा एनसीपी प्रवक्ता महेश तापसे ने मीडिया के सामने की है। तापसे के बयान देने से पहले सुबह से ये अटकलें लग रही थीं कि शरद पवार यूपीए के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं। मीडिया में हर जगह इस पर चर्चा थी। ऐसे में एनसीपी ने शाम को इन खबरों पर संज्ञान लेते हुए इसका खंडन किया।

राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता महेश तापसे ने न्यूज़ एजेंसी एएनआई से कहा, “मीडिया के कुछ सेक्शन में इस तरह की खबर चल रही है कि शरद पवार को यूपीए चेयरपर्सन की जिम्मेदारी दी जाएगी। राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी स्पष्ट करना चाहेगी कि इस तरह के किसी प्रस्ताव के बारे में यूपीए के सहयोगियों के भीतर कोई चर्चा नहीं हुई है।”

महेश तापसे (Mahesh Tapase) ने सभी अटकलों को बेबुनियाद बताते हुए कहा यह बातें ऐसे वक्त में जानबूझकर उठाई गई है, ताकि जो किसानों का आंदोलन चल रहा है, उसके बीच में कन्फ्यूजन पैदा किया जाए। उन्होंने कहा, “ऐसी अटकलों वाली मीडिया रिपोर्ट्स जानबूझ कर बनाई गई है। जिससे किसान आंदोलन (farmers agitation) से लोगों का ध्यान भटकाया जा सके।”

गौरतलब है कि आज सुबह से मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि पवार द्वारा यूपीए अध्यक्ष की जिम्मेदारी सँभाली जा सकती है। साथ ही इन रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया था कि इस संबंध में शुरुआती बातचीत हो चुकी है।

अब दिलचस्प बात यह है कि मीडिया में ये कयान लगने ऐसे वक्त में शुरू हुए जब कॉन्ग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। बिहार विधानसभा और हैदराबाद निकाय चुनावों में करारी शिकस्त को लेकर पिछले दिनों कई वरिष्ठ नेता नेतृत्व पर सवाल उठा चुके हैं। कुछ पार्टी अध्यक्ष के तौर पर राहुल गाँधी की वापसी चाहते हैं तो कॉन्ग्रेस के दूसरे खेमे को उनकी क्षमताओं पर भरोसा तक नहीं है।

बता दें कि वर्तमान में यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गाँधी हैं। उनके पास यह पद साल 2004 है। यूपीए का गठन उसी साल आम चुनावों के बाद तब हुआ जब कॉन्ग्रेस ने वामदलों के समर्थन से मनमोहन सिंह के नेतृत्व में सरकार का गठन किया था। यह भी कहा जाता है कि 10 साल तक मनमोहन सिंह भले सरकार का चेहरा रहे, लेकिन पर्दे के पीछे से उसे सोनिया ही चला रही थीं।

2017 में कॉन्ग्रेस में औपचारिक तौर पर राहुल ने उनकी जगह ले ली थी, लेकिन 2019 के आम चुनावों में हार के बाद उन्होंने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया था। काफी मान-मनौव्वल के बावजूद जब राहुल दोबारा जिम्मेदारी सॅंभालने को राजी नहीं हुए तो पार्टी ने सोनिया को अंतरिम अध्यक्ष बनाया था।

ये कॉन्ग्रेस की आखिरी सरकार, इसका लंबा भविष्य नहीं: राजस्थान के गाँवों में छाने के बाद BJP प्रदेश अध्यक्ष का दावा

मध्य प्रदेश में कमलनाथ सरकार के पतन के बाद से ही राजस्थान में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली कॉन्ग्रेस सरकार के भविष्य को लेकर अटकलें लगती रहती है। राज्य में जिला परिषद और पंचायत समिति चुनाव के नतीजों के बाद बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनिया ने ऑपइंडिया से बातचीत में दावा किया है कि यह राज्य में कॉन्ग्रेस की आखिरी सरकार है और इसका लंबा भविष्य नहीं है।

उन्होंने कहा, “हमने कभी अधिकृत तौर पर नहीं कहा कि कॉन्ग्रेस की सरकार को गिराएँगे। ये जरूर कहा था कि ये सरकार अपने कर्मों से गिरेगी। कर्मों का कारण कॉन्ग्रेस पार्टी खुद है। अशोक गहलोत अपना घर खुद सँभाल नहीं पाए।”

उन्होंने कहा कि कॉन्ग्रेस में हुई महत्वाकांक्षा की लड़ाई से केवल कॉन्ग्रेस को ही नुकसान नहीं हुआ, बल्कि इससे राजस्थान को भी नुकसान हुआ। सचिन पायलट की नाराजगी का हवाला देते हुए कहा, “प्रदेश सरकार और कॉन्ग्रेस दोनों नैतिक रूप से कमजोर हो चुकी है। उनका मनोबल गिर चुका है। मुख्यमंत्री की भाषा देखें, उनकी कार्यशैली देखें, वे हमेशा विचलित दिखाई पड़ते हैं।” पूनिया ने कोरोना के कारण पैदा हुए संकट को कॉन्ग्रेस के लिए अवसर के समान बताते हुए कहा कि यदि सामान्य हालात होते तो राज्य की जो स्थिति है उसमें यह सरकार आंदोलन से ही गिर गई होती।

सतीश पूनिया के साथ ऑपइंडिया की पूरी बातचीत आप नीचे सुन सकते हैं;

गौरतलब है कि राजस्थान में अमूमन पंचायत और जिला परिषद चुनाव में सत्ताधारी दल की जीत होती रही है। इस बार बीजेपी की जीत ने इस मिथक को तोड़ने का काम किया है। राज्य के 21 जिलों में से 20 में जिला प्रमुख चुन लिए गए हैं। इनमें से 12 में बीजेपी का प्रमुख चुना गया है। प्रदेश की सत्ताधारी कॉन्ग्रेस के खाते में 5 तो निर्दलीयों के हिस्से में 3 जिलों में प्रमुख की कुर्सी आई है। जिला परिषदों की कुल 636 सीटों में से 353 पर बीजेपी को तो 252 कॉन्ग्रेस को सफलता मिली है। वहीं पंचायत समिति में भाजपा ने 1989 और कॉन्ग्रेस ने 1852 सीटें जीती हैं। अन्य को 525 सीटों पर सफलता मिली है।

बीजेपी की यह जीत इसलिए भी चौंकाने वाली है क्योंकि ये नतीजे किसान आंदोलन की पृष्ठभूमि में आए हैं। ग्रामीण इलाकों के इन चुनावों में किसान वोटर प्रभावशाली माने जाते हैं। पूनिया ने इस जीत का श्रेय केंद्र की मोदी सरकार द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में किए गए बुनियादी विकास के काम को दिया है।

हालाँकि जानकार इन नतीजों को पूनिया की सांग​ठनिक क्षमताओं की परिणति बता रहे हैं। असल में पूनिया को प्रदेश बीजेपी की जिम्मेदारी सँभाले करीब एक साल हुआ है। लेकिन, उन्होंने इस दौरान संगठन को सक्रिय करने के लिए संभाग, जिला और मंडल स्तर तक प्रभारी और सह प्रभारी लगाए। नगर निगम चुनाव से लेकर और पंचायतीराज चुनाव तक प्रभारी और सह प्रभारी की जिम्मेदारी ज्यादातर उन लोगों को दी गई जो 30 से 50 वर्ष के बीच के थे।

संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले पूनिया का यह सांगठनिक कौशल ही है कि वसुंधरा राजे, गजेंद्र सिंह शेखावत, गुलाबचंद कटारिया जैसे नेताओं के बीच बँटी प्रदेश बीजेपी को न केवल वे एक साथ लेकर चलने में कामयाब रहे, बल्कि पार्टी को एक ऐसे चुनाव में सफलता दिलवाई जिसका अतीत प्रदेश की विपक्षी दल की हार को तय बताते हैं।

व्यंग्य: अरे भई! वो अन्नदाता है, वो भला बिल क्यों पढ़ेगा!

कसमों में सबसे बड़ी कसम कही गई है ‘कसम पैदा करने वाले की’। किसान भी पैदा करते हैं, अनाज, सब्जी, दलहन, तिलहन और आज कल आंदोलन। किसानों को अन्नदाता भी कहा जा रहा है और उनके इस पर्यायवाची शब्द को वो लोग भाजपा समर्थकों और आंदोलन विरोधियों पर मार रहे हैं, जो हमेशा यह कहते हैं कि ‘बॉर्डर पर जवान मर रहे हैं’ कह कर आप उन्हें चुप नहीं करा सकते, उन पर लोकतंत्र में सवाल पूछे जाएँगे।

लेकिन किसानों से आप सवाल नहीं पूछ सकते, खास कर उनसे तो बिलकुल नहीं जो आंदोलन करने के लिए किसान बने हैं। आप बात को समझिए कि ‘अन्नदाता’ सड़क पर आ गए हैं। इसके साथ एक और वामपंथी तत्वज्ञान समझिए कि ‘इतने लोग आए हैं, कुछ तो सही बात होगी’। ऐसी ही ‘कुछ तो बात होगी’ वाली दलील शाहीन बाग वालों ने दी थी, बाद में पता चला कि कुछ नहीं बहुत बातें थीं, और 53 लाशें दिल्ली के हिन्दू-विरोधी दंगों में गिर गई।

साथ ही, इन्हें क्या पता कि आप एक बुजुर्ग युवा नेता को, जो कभी मुँह पर करुआ तेल लगा कर गरीब दिखने की कोशिश करता है, तो कभी सर पर घुँघराले बाल बना कर कंधे पर कंप्यूटर ढो कर लाने वाले पिता की तरह बनना चाहता है, लगातार पप्पू बना कर चिढ़ाएँगे तो क्या वो बदला नहीं लेगा? पप्पू को पास होना है, पप्पू को मौका मिला है, पप्पू को पप्पा बनना है, लेकिन पप्पू जगह छोड़-छोड़ कर फटी जेब लिए ‘यहाँ वहाँ जहाँ तहाँ मत पूछो कहाँ कहाँ’ आता जाता रहता है, तो वो क्यों नहीं बिना बोले पिछवाड़े से समर्थन देगा?

अन्नदाता हैं भाई, मामूली चीज थोड़े ही है। आपने क्या दिया है देश को? अन्न दिया है? कोई दुष्ट यह कह देगा कि अन्न जब तक फ्री में नहीं दे रहे, तब तक काहे के अन्नदाता! ऐसे ही लोगों ने तीसरी कक्षा में ‘नहीं हुआ है अभी सवेरा सूरज की लाली पहचान, चिड़ियों के जगने से पहले खाट छोड़ उठ चला किसान’ ध्यान से नहीं पढ़ा। कितनी भावुक कविता है। मुझे तो लगता है कि सीनियर क्लास में यही कविता पढ़ाई जाती तो अगली पंक्तियाँ यह होती कि ‘कानूनों को पढ़ने से पहले, आंदोलन करने चला किसान’।

देश का कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि आज किसानों को सड़क पर, इस सर्दी में बैठना पड़ रहा है। क्या माँगा है उन्होंने? बस यही न कि तीनों बिल जो 27 करोड़ वयस्कों द्वारा चुने हुए सांसदों ने, काफी गहन विचार के बाद पास किया, उसे सरकार वापस ले ले क्योंकि 32 संगठन कह रहे हैं। अब आप ही बताइए कि चुने हुए 305 सांसद ज्यादा हैं, या फिर 32 संगठनों में शामिल सैकड़ों किसान? आप ही बताइए कि क्या सांसद अब किसानों के लिए कानून बनाएँगे?

आप कह देंगे कि अजीत जी, कानून बनाने का काम तो सांसद का ही है लोकतंत्र में। आपकी बात सही है, लेकिन कोई काम लम्बे समय से होता आ रहा हो, तो जरूरी नहीं कि वो सही ही हो। जैसे कि पहले के किसान इस सीजन में खेती करते थे, अब नहीं करते। पहले के किसान खेती की बेहतरी की माँग करते थे, अब वाले अर्बन नक्सलों, दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगों को भड़काने वाले दंगाइयों की रिहाई की बात कर रहे हैं। पहले किसान ट्रैक्टर से खेती करते थे, अब ट्रैक्टर में आग लगाते हैं।

इसलिए, पहले सांसद कानून बनाते थे, तो अभी भी वही बनाएँगे, ये कहीं से भी उचित नहीं है। अच्छी बात तो यह होगी कि किसान अपने कानून स्वयं बनाए, आतंकी UAPA में संशोधन करे, डॉक्टर निजी प्रैक्टिस पर बिल बनाएँ। चुन कर आने का मतलब यह थोड़े ही है कि आपको खेती भी आती है। नेता लोग को क्या आता है? मोदी ने कभी कुदाल चलाई है? अमित शाह ने कभी धनिया बोया है? सॉरी, उन्होंने तो काफी धनिया बोया है पिछले साल, लेकिन आप शब्दों पर मत जाइए, भाव पर ध्यान दीजिए।

किसान का मतलब यह नहीं होता कि फटी हुई गंजी पहने हुए, दरारों वाले धान के खेत में, सर पर हाथ रखे, चिलचिलाती धूप में सूरज को ताकता रहे। किसान का मतलब है अन्नदाता, किसान का मतलब है कि वो सड़कें बंद करा सकता है, रेल रोक सकता है, और जरूरत पड़े तो सड़क पर प्रोजेक्टर लगा कर सलीमा देखते हुए इन्ज्वॉय कर सकता है।

कुछ लोग एक तस्वीर घुमा रहे हैं कि देखो प्रोजेक्टर और स्क्रीन लगा कर सिनेमा चल रहा है। मतलब, क्या चाहते हैं आप लोग? किसान रिलेक्स न करे? जब हरी पगड़ी वाले अन्नदाता भाई चार महीने का राशन ले कर आ गए हैं, कुछ के बच्चे वहीं ऑनलाइन क्लास करते हैं और फिर बाकी टाइम बाप के लिए वो भगत सिंह बन जाते हैं, वो थोड़े ‘लेज़ी लम्हे’ न गुजारें? मैं तो कहता हूँ कि वहीं जेसीबी से बीच सड़क में एक छोटा सा पूल खोद दो, पानी भर दो और स्वीमिंग पूल का भी आनंद लो।

पहले तो जोश-जोश में साइन करा लिया कि अम्बानी और अडानी का कुछ भी इस्तेमाल नहीं करेंगे। इसमें ‘जियो’ कम्पनी का सिम भी था। आप ही बताइए कि डेढ़ जीबी डेटा वाला सिस्टम भी हटा दिया आत्मसम्मान में, और आत्मनिर्भरता को सुचारु बनाने वाले इंटरनेट के कुछ साइटों को पहले ही संघी, फासीवादी सरकार ने बंद करा रखा है, फिर आदमी प्रोजक्टर पर सिनेमा भी न देखे? चाहते क्या हैं लोग?

नहीं, आप लोगों को चाहिए कि सोते-जागते ये किसान नारेबाजी क्यों नहीं कर रहे हैं। ये क्या तरीका है? आंदोलन का ये मतलब थोड़े ही है कि नारेबाजी किए जा रहे हैं, गला फाड़ा दिया। अरे टीवी वाले आएँगे तो दस-बीस आदमी लगा देंगे नारा। बाकी लोगों को बस भीड़ में दिखना चाहिए। ऐसा भी क्या काम करना कि जो टीवी पर दिखे ही नहीं। आप लोग यह चाहते हैं कि बेचारे किसान, जो कि अन्नदाता होते हैं, बिना कैमरे के फर्जी का हल्ला करते रहे? ये किस तरह की घटिया सोच है? आप क्यों चाहते हैं कि कोई व्यक्ति ऐसा काम करे जिसका कोई परिणाम ही न हो?

‘आंदोलन कर रहे हैं तो सिनेमा क्यों देख रहे हैं, बिरयानी क्यों खा रहे हैं’ जैसी बातें करना सीधे तौर पर अन्नदाताओं को नीचा दिखाने की कोशिश है। जब कोई व्यक्ति राशन-पानी ले कर किसी मिशन पर निकल गया है, तो उसे नारा लगाने और हल्ला करने के अलावा खाना बनाना, रिलेक्स करना, गीत गाना, ट्वीट करना, मोदी को ठोकने की बात सोचना, खालिस्तानी पोस्टर और नारे लगाना आदि भी तो करना ही होगा न! अंग्रेजी में कहावत है कि ‘वरायटी इज़ द स्पाइस ऑफ लाइफ’। तो इधर वरायटी-वरायटी के काम हुए, उधर जीवन में मसाला मिल गया, शाहीन बाग वाला मुल्ला मुर्गा ले आया, मसाला लगा कर मैरिनेट कर दिया…

यह भी पाया गया कि कुछ लोग कह रहे हैं कि किसानों ने कानून ही नहीं पढ़ा है। आप ही बताइए कि अन्नदाता अन्न उपजाएगा, उसे मंडी में 8.5% टैक्स और ट्रकों की एंट्री फीस दे कर आढ़तियों को बेचेगा, या फिर वो बिल पढ़ने के झंझट में रहेगा? पढ़ना होता तो वो आंदोलन क्यों करते? शाहीन बाग वालों ने क्या CAA वाला कानून पढ़ा था? आंदोलन करें कि कानून को पढ़ने के चक्कर में रहें?

कानून का कागज अगर गलती से पढ़ लेंगे, तो यह भी तो समस्या है कि कहीं उन्हें यह लग जाए कि कानून में तो पहले की सारी बातें हैं ही, और किसानों को नए विकल्प दिए गए हैं, तो वो आंदोलन कर पाएँगे? अंग्रेज़ी में एक कहावत है (दूसरी कहावत, आज तो मैं ‘ऑन फायर’ हूँ) कि ‘इग्नरेंस इज़ ब्लिस’। कोई पगड़ी वाला किसान अगर सड़क पर ब्लिस का अनुभव करना चाहता है, तो वो इतनी भीड़ में क्या करेगा? उसको तो इग्नरेंस से ही ब्लिस मिल सकेगा तत्काल में। इसलिए, कानून को पढ़ने का तो कोई तुक ही नहीं बनता। जो भी लोग यह कह रहे हैं कि किसानों को एक बार बिल पढ़ लेना चाहिए, वो अन्नदाता के दुश्मन हैं, और उन्हें लानत है।

आप सोचिए कि 32 संगठन के लोग हैं वहाँ, और यह कह रहे हैं कि पाँच सौ संगठन के किसानों की बात है यह तो क्या आप यह कहेंगे कि कहाँ हैं बाकी के किसान? आप यह कहेंगे कि बिहारी किसान कहाँ है, यूपी वाला क्यों नहीं आ रहा? क्या आपको नहीं पता कि बिहार और यूपी वाला खेतों में खरीफ सीजन की तैयारी कर रहा है? किसान किसान होता है, क्या बिहारी, क्या पंजाबी। आप क्या अन्नदाता के नाम पर, उनकी बातों पर विश्वास नहीं कर सकते कि पूरे देश के किसान उनके साथ हैं? शर्म कीजिए कि आपकी थाली में जो रोटी है, वो यही अन्नदाता देता है। ठीक है कि आप पैसे देते हैं लेकिन पैसों से क्या होता है, कोई अनाज उपजा रहा है आपके लिए, क्या यह कम बात है।

यह भी लोग कह रहे हैं कि मैं खबरदाता हूँ, वो चिकित्सादाता है, वो मनोरंजनदाता है, वो शिक्षादाता है, रवीश फेकन्यूज और प्रपंचदाता है, सब लोग कुछ न कुछ दे ही रहे हैं, तो सब अपने नाम में ‘दाता’ लगा कर इमोशनल ब्लैकमेल करने लगें? कोई कहेगा कि मैं चिकित्सा न करूँ तो तुम मर जाओगे, कोई कहेगा कि मैं मनोरंजन न करूँ तो तुम बोर हो जाओगे, कोई कहेगा कि मैं खबर न दूँ तो तुम्हें पता ही नहीं चलेगा कि दुनिया में क्या चल रहा है, रवीश कहेगा कि वो फेकन्यूज और प्रोपेगेंडा न करे तो वामपंथियों को ऑर्गेज्म ही नहीं मिलेगा…

लेकिन, आप ही सोचिए कि क्या ये सब किसान के आगे कुछ भी हैं? इलाजदाता डॉक्टर चिकित्सा न दें तो आदमी मर जाएगा। तो भाई मेरे, जब वो मर ही गया तो उसे क्या पता चलेगा कि चिकित्सा का क्या महत्व है। लेकिन अन्नदाता अगर अन्न न दें तो आप जीवित नहीं रह पाएँगे। दोनों बातों में अंतर है। एक के न मिलने पर आदमी मर जाता है, दूसरे के न मिलने पर आदमी जीवित नहीं रह पाता। इसलिए उसका वैल्यू अधिक है। मरने पर आदमी मर ही जाता है, लेकिन जीवित न रहने पर आदमी महसूस करता है कि वो जीवित नहीं रह पा रहा है। फिलॉसफी वाली बात है, आपको समझ में नहीं आएगी।

इसलिए ये सब मत कहा कीजिए कि शिक्षादाता कल आंदोलन कर के कहेगा कि हम न पढ़ाएँ तो तुम पढ़ ही नहीं पाओगे। ठीक है, नहीं पढ़ पाएँगे। कम से कम एक फायदा तो होगा कि किसान आंदोलन या शाहीन बाग टाइप कुछ करेंगे तो ये तो नहीं कह पाएगा कोई कि तुमने तो बिल पढ़ा ही नहीं। है कि नहीं? सारे ‘दाता’ एक नहीं होते, और दाताओं में ‘अन्नदाता’ का विशेष महत्व है क्योंकि वो आंदोलनदाता बने हुए हैं।

तत्काल प्रभाव से सरकार को चाहिए कि किसानों के सारे कानून वो निरस्त करे और उन्हें नए संसद भवन के भूमिपूजन की ईंट के बगल में बिठा कर, उनसे पूछ कर, नए कानून बनवाए। साथ ही, एक संशोधन यह भी करे कि अगर 370 हटाना हो तो कश्मीरी आतंकियों से राय ली जाए, रामजन्मभूमि पर मंदिर बनाना है तो कोर्ट न जा कर बाबर की औलादों से निर्णय लिखवाए जाएँ, और सांसद बनने का सिस्टम खतम हो।

आप ही सोचिए कि क्या मतलब है सांसद का या प्रधानमंत्री का? उसको हर चीज आती है क्या? फिर वही आदमी किसान पर भी कानून बनाता है, इसरो में रॉकेट का फंड भी देता है, सर्जिकल स्ट्राइक का भी निर्णय लेता है, कोरोना में लॉकडाउन की भी बात करता है… सब काम बस दस-बीस लोग मिल कर तय कर लेते हैं! ये कोई तरीका है? किसने भेजा है उनको अपना प्रतिनिधि बना कर…

नए संसद भवन के भूमिपूजन से भड़की कॉन्ग्रेस, कहा- यह अंतिम संस्कार में DJ बजाने जैसा

नए संसद भवन को लेकर कॉन्ग्रेस सहित विपक्षी पार्टी बौखलाए हुए हैं। तरह-तरह की बयानबाजी कर वे सरकार को घेरने की कोशिश कर रहे हैं। कॉन्ग्रेस ने एक तरफ जहाँ इस मुद्दे को देशी और स्वदेशी से जोड़ दिया। वहीं पार्टी के प्रवक्ता ने यह कह दिया कि नया संसद भवन बनाना, अंतिम संस्कार के वक्त डीजे बजाने के बराबर है।

कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने ट्वीट कर अपनी अपनी भड़ास निकाली है। उन्होंने कहा, “ब्रिट्स द्वारा निर्मित मौजूदा संसद भवन मध्य प्रदेश के मुरैना में चौसठ योगिनी मंदिर से एक उल्लेखनीय समानता रखता है, जबकि नई ‘आत्मानिर्भर’ संसद भवन वाशिंगटन डीसी में पेंटागन से शानदार समानता रखती है।”

जयराम रमेश ने पुराने संसद भवन और नए संसद भवन की डिजाइन के साथ-साथ चौसठ योगिनी मंदिर और पेंटागन की तस्वीरें भी साझा की हैं।

वहीं कॉन्ग्रेस प्रवक्ता जयवीर शेरगिल का कहना है, “नई इमारत की आधारशिला रखने का निर्णय हृदयहीन, संवेदनहीन और बेशर्मी से भरा है। खास कर ऐसे समय में जब देश आर्थिक मंदी के दौर से गुजर रहा है। बीजेपी लोगों को राहत देने के बजाय फालतू जुलूस निकाल रही है।”

उन्होंने आगे कहा, “सरकार का यह कदम अंतिम संस्कार के वक्त डीजे बजाने के बराबर है। काले कृषि कानूनों के माध्यम से भाजपा ने किसानों की आजीविका पर बुलडोजर चला दिया, दूसरी तरफ वह जनता का पैसा भवन निर्माण पर खर्च कर रही है आज जिस चीज की जरूरत नहीं थी उसे बीजेपी कर रही है। अहंकार को संतुष्ट करने के लिए।”

शेरगिल ने दावा किया, “महत्वाकांक्षी सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के हिस्से के रूप में नए संसद भवन की आधारशिला रखने का काम ‘किसानों से रोटी छीनने के बाद केक की दुकान खोलने’ जैसा है।”

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज नए संसद भवन का भूमि पूजन किया, जिसे लगभग 971 करोड़ रुपए की लागत से बनाया जाना है। मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक, सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट के तहत राष्ट्रपति भवन और इंडिया गेट के बीच की जगह का पुनर्विकास शामिल है। हिन्दू रीति-रिवाज़ों के अंतर्गत भूमि पूजन का कार्यक्रम आयोजित किया गया।

बता दें भूमिपूजन के बाद से ही टीएमसी सहित कई विपक्षी पार्टी इसके विरोध में जुट गए हैं।

इमरान खान के मंत्री ने ‘किसान’ आंदोलन का किया समर्थन, POk के एक्टिविस्ट ने कहा- पहले पाकिस्तान सँभाल ले

हाल ही में पाकिस्तान के विज्ञान और तकनीक मंत्री फ़वाद चौधरी ने भारत में हो रहे किसान आंदोलन का समर्थन किया था। इस पर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) कार्यकर्ता डॉ अमजद अयूब मिर्ज़ा की तरफ से प्रतिक्रिया आई है। उन्होंने पाकिस्तानी मंत्री को नसीहत देते हुए बुधवार (9 दिसंबर 2020) को कहा कि उन्हें इसके बदले पाकिस्तान पर ध्यान देना चाहिए। उल्लेखनीय है कि 13 दिसंबर को लाहौर में पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (PDM) द्वारा सरकार विरोधी रैली का आयोजन किया जाएगा। 

पीओके कार्यकर्ता ने पाकिस्तान सरकार पर आरोप भी लगाया कि वह किसान आंदोलन को भारत के खिलाफ़ इस्तेमाल करने का प्रयास कर रहे हैं। अमजद अयूब मिर्ज़ा ने अपने बयान में कहा, “यह नाटक किसी और को दिखाइए। मेरा चौधरी साहब ने निवेदन है कि पहले वह अपने गिरेबान में झाँक कर देख लें जहाँ एक बड़ा सरकार विरोधी आंदोलन होने वाला है।” बता दें फवाद चौधरी ने बीते सोमवार को किए गए अपने ट्वीट में भारत सरकार को बिना बिना दिल का (Heartless) कहा था। 

इसके अलावा पाकिस्तानी मंत्री ने यह भी कहा था कि उनका दिल सरहद पार आंदोलन कर रहे पंजाबी किसान भाईयों में लगा हुआ है। इस ट्वीट की आलोचना करते हुए पीओके कार्यकर्ता ने कहा था इस्लामाबाद के पास सरकार विरोधी आंदोलन को रोकने की कोई योजना नहीं है।

अमजद अयूब मिर्ज़ा ने पाकिस्तान सरकार की आलोचना करते हुए कहा था, “तुम्हारी (इमरान खान) सरकार खुद काँप रही है और अंदाज़ा नहीं है कि आगे क्या करना है। पाकिस्तान सरकार के लिए स्थिति ऐसी हो गई है कि उन्हें इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि छुपना कहाँ है।” 

पीओके कार्यकर्ता ने पाकिस्तानी मंत्री के पुलवामा हमले को इमरान खान सरकार की उपलब्धि बताने वाले बयान का भी उल्लेख किया। इस बयान पर पाकिस्तानी मंत्री की आलोचना करते हुए अमजद अयूब मिर्ज़ा ने कहा, “यह वही व्यक्ति है जिसने नेशनल असेंबली में खड़े होकर स्वीकार किया था कि हमने (पाकिस्तान) वह हमला (पुलवामा) करवाया था। पाकिस्तान के लोगों को इस बात के लिए पाकिस्तान की इमरान सरकार पर गर्व करना चाहिए। इस मामले में दखल देकर यह लोग (पाकिस्तानी सरकार) भारत को नुकसान पहुँचाना चाहते हैं। सभी देख सकते हैं कि अमेरिका से लेकर लंदन तक हर जगह खालिस्तानी समर्थकों के झंडे नज़र आ रहे हैं।”

अंत में पीओके कार्यकर्ता ने वहाँ की पीड़ित आबादी का उल्लेख करते हुए पाकिस्तानी मंत्री से सवाल किया कि वह पीओके के लोगों के लिए भी यही भावना रखते हैं। उन्होंने कहा, “क्या आप लोगों को गिलगिट बाल्टिस्तान के लोगों का दर्द महसूस नहीं होता है? यहाँ के शहरों में पानी तक नहीं है, क्या आप उन 100 सरकारी कर्मचारियों का दर्द महसूस करते हैं जिन्हें आपने अपनी सरकार बनने के बाद नौकरी से निकाला।”       

तैमूर पर बड़ी कंट्रोवर्सी हुई, इस बार आखिरी मिनट में दूँगी सरप्राइज: होने वाले बच्चे के नाम पर करीना कपूर

बॉलीवुड अभिनेत्री करीना कपूर बहुत जल्द अपने दूसरे बच्चे को जन्म देने वाली हैं। पिछली बार की तरह इस बार भी वह अपनी प्रेगनेंसी को लेकर हर जगह खुल कर बात कर रही हैं। अभी हाल में उन्होंने What Women Want के एपिसोड में नेहा धूपिया से बातचीत में दूसरे बच्चे के नाम को लेकर चर्चा करते हुए कहा कि इस बार वह सबको सरप्राइज देंगी।

इस शो में नेहा धूपिया ने जब करीना कपूर ने पूछा कि परिवार या दोस्तों में से उन्हें अपने दूसरे बच्चे के नाम के लिए क्या सजेशन मिलते हैं? तब करीना ने तैमूर के समय हुए विवाद का मुद्दा उठाया। करीना ने कहा कि अभी तक सैफ या उन्होंने इस पर सोचा नहीं है, क्योंकि उन्हें तैमूर के नाम पर हुआ विवाद अच्छे से याद है।

करीना कपूर खान ने इस शो में कहा, “तैमूर को लेकर उठे विवाद के बाद मैंने और सैफ ने इस बारे में नहीं सोचा है। हम इसे आखिर तक छोड़ना चाहते हैं और बिलकुल अंत में सरप्राइज देंगे।”

इसके बाद नेहा धूपिया ने करीना से मजाक में बच्चे के नाम पर पोल कराने को भी कहा, मगर करीना ने ऐसा तरीका चुनने से मना कर दिया। इस शो में दोनों अभिनेत्रियों ने मुख्यत: माँ बनने के बाद सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की, लेकिन बातों के बीच में छिड़े इस मुद्दे ने पूरी बातचीत को कहीं और पहुँचा दिया। फिल्मी मिर्ची के यूट्यूब चैनल पर अपलोड इस वीडियो में 11 मिनट 40 सेकेंड से शुरू बातचीत में हम करीना के इस वर्जन को सुन सकते हैं।

याद दिला दें कि साल 2017 में करीना कपूर और सैफ अली खान के पहले बच्चे के नामकरण के बाद सोशल मीडिया पर ‘तैमूर’ नाम को लेकर बहस छिड़ गई थी। लोगों का कहना था कि यह नाम एक आक्रांता का है जबकि सैफ अली खान और करीना कपूर खान का मत था कि फारसी में इसका IRON होता है।

साल 2018 के एक इंटरव्यू में करीना कपूर ने इस नाम पर खुल कर बात की थी। उनका कहना था कि डिलिवरी के लिए अस्पताल जाने से एक दिन पहले सैफ अली खान ने बेटे का नाम फैज रखने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि यह नाम काफी अच्छा है और रोमांटिक है। मगर करीना ने इससे मना किया। उनका मत था कि तैमूर का मतलब लोहा होता है और वह चाहती हैं कि वो जिस बच्चे को जन्म दें, वह फाइटर हो। वह एक आयरन मैन पैदा करना चाहती थी।

‘हम अल्टीमेटम दे रहे हैं, कानून वापस लो, वरना घेरेंगे रेलवे ट्रैक’: किसान नेताओं की PM मोदी को धमकी

दिल्ली में कृषि कानूनों को निरस्त कराने के लिए प्रदर्शन पर बैठे किसानों की ओर से अब धमकियाँ आने लगी हैं। पिछले दिनों सरकार का विरोध करने के लिए इनकी ओर से तीन चरण तय किए गए थे। अब कहा गया है कि यदि माँग नहीं सुनी गई तो रेलवे ट्रैक ब्लॉक किए जाएँगे।

समाचार एजेंसी एएनआई के अनुसार किसानों के नेता बूता सिंह ने कहा, “हमने 10 दिसंबर तक का अल्टीमेटम दिया हुआ है। अगर पीएम हमारी सुनवाई नहीं करते और कानून निरस्त नहीं करते, तो हम रेलवे ट्रैक्स को ब्लॉक करेंगे। ये निर्णय आज की मीटिंग में लिया गया है कि अब भारत के सभी लोग पटरियों पर उतरेंगे। संयुक्त किसान मंच इसकी तारीख तय करेगा और घोषणा होगी।”

इसके बाद भारतीय किसान यूनियन के बलबीर सिंह ने मीडिया से कहा कि केंद्र सरकार मान चुकी है कि उन्होंने ट्रेडर्स के लिए कानून बनाए। अगर कृषि राज्य के अधिकार क्षेत्र में आता है तो उन्हें इस विषय पर कानून बनाने का अधिकार नहीं है।

उल्लेखनीय है कि किसानों के इस फैसले से पूर्व उन्होंने अपने आंदोलन को नया रूप देने का फैसला किया था और तीन चरण तय किए थे। किसानों की ओर से 4 दिसंबर को ऐलान किया गया था कि वह 5 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पुतला फूँकेंगे, 7 दिसंबर को अवॉर्ड वापसी करेंगे और 8 दिसंबर को भारत बंद करेंगे। हालाँकि, इनमें से भारत बंद का प्लॉन 8 दिसंबर को बुरी तरह विफल दिखा और हर जगह हर काम सुचारू रूप से होता दिखा।

यह भी बता दें कि किसान यूनियन के नेता की ओर से जो कृषि को राज्य सरकार का अधिकार बताया जा रहा है, उस बिंदु पर केंद्रीय मंत्री नरेंद्र तोमर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में विस्तार से चर्चा की। नरेंद्र सिंह तोमर ने सरकार की ओर से ऐसे प्रश्नों का जवाब देते हुए कहा कि किसानों को बता दिया गया है कि व्यापार पर कानून बनाने के अधिकार केंद्र सरकार रखती है।

इसके अलावा कृषि मंत्री ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार किसानों की हर समस्या का समाधान करना चाहती है। लेकिन किसान एक ही बात पर अड़े हैं कि सिर्फ कानून को निरस्त किया जाए, जबकि यह कानून किसानों को मंडी की बेड़ियों से आजाद करने के लिए था, ताकि वह अपनी उपज देश में कहीं भी किसी को भी बेच सकें।

हिरासत में तृप्ति देसाई: ‘सभ्य’ तरीके से कपड़े पहनने को कहा तो साईबाबा मंदिर की बोर्ड उखाड़ने लगी

साईबाबा मंदिर न्यास ने हाल ही में स्थानीय लोगों और अन्य भक्तों की शिकायतों के बाद मंदिर परिसर के बाहर एक बोर्ड लगाकर श्रद्धालुओं से भारतीय संस्कृति के मुताबिक ‘सभ्य’ तरीके से कपड़े पहननें की अपील की थी। जिसपर तिलमिला कर खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताने वाली तृप्ति देसाई और उनके संगठन के अन्य सदस्यों ने इसका विरोध करने और पोस्टर को उतारने का फैसला किया।

हालाँकि, ट्रस्ट के मुख्य कार्यकारी अधिकारी कान्हुराज बागटे ने स्पष्ट किया था कि उन्होंने श्रद्धालुओं पर कोई ड्रेस कोड लागू नहीं किया है और यह संदेश केवल एक अपील है। लेकिन तृप्ति ने मामले को जानबूझकर तूल देने और व्यर्थ में इसका विरोध करने का फैसला कर लिया। जबकि यह बात सब जानते है कि ज्यादातर भक्त मंदिर में सहज कपड़े पहनकर ही प्रवेश करते है।

वहीं यह खबर सामने आई है कि महाराष्ट्र के अहमदनगर में पुलिस ने तृप्ति देसाई और उनके संगठन के अन्य सदस्यों को शिरडी जाते समय रास्ते में हिरासत में ले लिया है। बता दें वह मंदिर के अंदर अपने कुछ भी कपड़े पहनने के अधिकार की माँग करने के लिए जा रही थी।

वहीं यह भी बताया जा रहा है कि तृप्ति देसाई को हिरासत में लिए जाने के बाद विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं ने पटाखे फोड़कर जश्न मनाया है।

गौरतलब है कि महाराष्ट्र सब डिविजनल ऑफिस ने सामाजिक कार्यकर्ता तृप्ति देसाई को मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को नोटिस जारी किया था। सब डिविजनल ऑफिस, शिरडी ने कार्यकर्ता तृप्ति देसाई को नोटिस जारी करते हुए उन्हें 8 दिसंबर से 11 दिसंबर के बीच शिरडी में प्रवेश नहीं करने के लिए कहा था। कार्यालय ने कहा है कि उनके यहाँ आने से कानून और व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है। यदि वह आदेश का उल्लंघन करती है तो उसे 188 आईपीसी के अनुसार दंडित किया जाएगा।

बहरहाल, नोटिस की अवहेलना करते हुए देसाई अपनी संगठन ‘भूमाता ब्रिगेड’ के 10 सदस्यों के साथ गुरुवार को शिरडी जाने के लिए पुणे से रवाना हुईं थी। अहमदनगर के पुलिस अधीक्षक मनोज पाटिल ने कहा, ‘‘पुलिस ने बंबई पुलिस कानून की धारा 68 के तहत देसाई और संगठन के 15-16 अन्य सदस्यों को हिरासत में लिया है।’’