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‘डर का माहौल है’: ‘Amnesty इंटरनेशनल इंडिया’ ने भारत से समेटा कारोबार, कर्मचारियों की छुट्टी

अंतरराष्ट्रीय संस्था ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ ने भारत में अपने सभी क्रियाकलापों को रोक दिया है। संस्था ने कहा है कि अब वो भारत में ‘मानवाधिकार की रक्षा’ के सारे क्रियाकलापों को रोक रही है। ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ ने इसके पीछे भारत सरकार की ‘बदले की कार्रवाई’ को जिम्मेदार ठहराया है। उसने कहा है कि भारत सरकार ने उसके सभी बैंक खातों को पूर्णरूपेण सीज कर दिया है, जिसका पता उसे 10 सितम्बर को चला।

‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ ने भारत में अपने सभी कर्मचारियों को मुक्त करने (नौकरी से निकालने) के साथ-साथ अभी अभियान और ‘रिसर्च’ पर भी ताला मार दिया है। संस्था ने दावा किया है कि भारत सरकार द्वारा मानवाधिकार संगठनों के खलाफ ‘विच हंट’ चलाया जा रहा है। उसने अपने ऊपर लगे आरोपों को ‘बेबुनियाद और दुष्प्रेरित’ करार दिया। उसने दावा किया है कि जम्मू कश्मीर और दिल्ली में सुरक्षा बलों द्वारा ‘मानवाधिकार उल्लंघन’ पर आवाज़ उठाने के लिए उसे 2 सालों से प्रताड़ित किया जा रहा है।

अपने बयान में ‘एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया’ ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) के जरिए उसे सताया जा रहा है क्योंकि उसने सरकार के कामकाज में पारदर्शिता के लिए आवाज़ उठाई थी। हालाँकि, उसने भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का सम्मान करने की बात करते हुए कहा कि वो घरेलू रूप से ही अपने कामकाज के लिए फंड्स जुटाती है। उसे दावा किया कि पिछले 1 साल में 1 लाख भारतीयों ने उसे वित्तीय मदद दी और 4 लाख ने उसका समर्थन किया।

उसने कहा कि उसके द्वारा की गई फंडरेजिंग का ‘विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA)’ से कोई लेनादेना नहीं है, लेकिन उसके खिलाफ इन क़ानूनों का इस्तेमाल करना ये बताता है कि सरकार दुर्भावनापूर्ण तरीके से उन मानवाधिकार संगठनों पर कार्रवाई कर रही है क्योंकि वो सरकार की ‘गंभीर निष्क्रियता और ज्यादतियों’ के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं। उसने अपने बयान में आगे कहा:

“एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया और अन्य मुखर मानवाधिकार संगठनों के खिलाफ सरकार की दमनकारी नीति बताती है कि ऐसे संगठनों को आपराधिक समूहों की तरह देखा जा रहा है और विरोध करने वालों को अपराधी बताया जा रहा है, बिना किसी सबूत के। विरोधी आवाज़ों को दबाने के लिए उनमें डर का माहौल बनाने के लिए, उन्हें गिराने के लिए – ये सब किया जा रहा है। जबकि एक वैश्विक शक्ति और UN का सदस्य होने कारण भारत को जवाबदेही और न्याय का स्वागत करना चाहिए। हम नोबेल जीतने वाले अभियान का हिस्सा हैं, उच्च रूप से स्पष्ट स्टैंडर्ड्स का पालन करते हैं।”

उसने भारत के इतिहास की संस्कृति, समरसता, बहुवाद, सहिष्णुता और शांतिपूर्ण विरोध की भावनाओं को भारत के संविधान का हिस्सा बताते हुए कहा कि वो दुनिया भर में मानवाधिकार की रक्षा के लिए इन्हीं भावनाओं के तहत काम करता है। बता दें कि अक्टूबर 25, 2018 को ED ने एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के ठिकानों पर छापेमारी की थी। इसके डायरेक्टर के ठिकाने पर भी रेड डाली गई थी।

संस्था ने दावा किया है कि उस रेड के बाद न सिर्फ उसके बैंक खातों को फ्रीज कर लिया बल्कि उसके कर्मचारियों की संख्या में कटौती करने के लिए भी उस पर दबाव बनाया गया। साथ ही उसने अपने खिलाफ चले रहे ‘दुर्भावनापूर्ण मीडिया ट्रायल’ की भी निंदा हुई। अगस्त 2020 में संस्था ने दिल्ली दंगों की रिपोर्ट के नाम पर जम कर प्रोपेगेंडा फैलाया था और दिल्ली पुलिस के क्रियाकलापों को गलत तरीके से पेश किया था।

हाल ही में भारत और चीन के बीच चल रहे गतिरोध के बीच एमनेस्टी इंडिया के पूर्व प्रमुख आकार पटेल ने ट्विटर पर कहा था कि देश का दुश्मन भाजपा है, ना कि चीन। आकार पटेल ने दावा किया था कि उन्हें जनसंघ या भाजपा के मूल दस्तावेज में चीन का कोई संदर्भ नहीं मिला। उन्होंने कहा था कि उन्हें इसमें भारत के समुदाय विशेष वालों के देश का दुश्मन होने के कई संदर्भ मिले हैं। साथ ही आरोप लगाया था कि भाजपा देश के खास मजहब से घृणा करती है।

आतंकी डेविड हेडली ने शिवसेना के लिए जुटाए थे फंड्स? बाल ठाकरे को कार्यक्रम में बुलाया था? – फैक्ट चेक

एक ट्विटर हैंडल ने सोशल मीडिया पर ‘जनता का रिपोर्टर’ मीडिया पोर्टल की खबर का एक स्क्रीनशॉट शेयर किया, जिसमें दावा किया गया था कि डेविड हेडली ने शिवसेना के लिए फंड्स जुटाने की कोशिश की थी। ‘बीइंग ह्यूमर’ नामक ट्विटर हैंडल ने ये स्क्रीनशॉट शेयर किया। इसमें मीडिया पोर्टल ने खबर प्रकाशित किया था कि आतंकी डेविड हेडली ने शिवसेना के लिए अमेरिका में फंड्स जुटाने का प्रयास किया था। हमने इस दावे का फैक्ट-चेक किया।

जिस ट्विटर हैंडल ने ये स्क्रीनशॉट शेयर किया, वो इससे पहले खुद को ‘सबसे बड़ा दलित नेता’ बताने वाले उदित राज को कॉन्ग्रेस अध्यक्ष बनाने के लिए अभियान चला चुका है। लोगो को संदेह था कि ये खबर सच है भी या नहीं। व्यंग्य के लिए लोकप्रिय इस ट्विटर हैंडल के अभियान के बाद उदित राज को सफाई देनी पड़ी थी कि कुछ लोग उनके और पार्टी आलाकमान के बीच खाई बनाने का काम कर रहे हैं। इसलिए फैक्ट-चेक जरूरी था।

यह खबर सच या झूठ?

दरअसल, ये खबर अक्टूबर 2016 की है, जब डेविड कोलमैन हेडली ने ये स्वीकारोक्ति की थी। पाकिस्तानी-अमेरिकी आतंकी ने कबूल किया था कि उसने अमेरिका में शिवसेना के लिए एक कार्यक्रम के आयोजन की व्यवस्था की थी और इसीलिए फंड्स जुटाए थे। साथ ही उसने उस कार्यक्रम में तत्कालीन शिवसेना सुप्रीमो बाल ठाकरे को भी आमंत्रित करने की योजना बनाई थी। 59 साल का डेविड कोलमैन हेडली 26/11 मुंबई हमले में अप्रूवर बन गया था।

उसने ये बातें अबू जुंदाल के वकील अब्दुल वहाब खान के क्रॉस-एग्जामिनेशन में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए अमेरिकी अदालत में हो रही सुनवाई के दौरान कही थी। अबू जुंदाल 2008 के मुंबई हमले की साजिश रचने वाले आतंकी सरगनाओं में से एक था। उसने कहा कि कार्यक्रम में बालासाहब ठाकरे को आमंत्रित करने की कोई खास योजना तो नहीं थी लेकिन अंततः ऐसा होने वाला था। अब ये खबर फिर से सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है।

लश्कर-ए-तैयबा के सरगना डेविड हेडली ने अपने कबूलनामे में बताया था कि उसने कथित शिवसेना नेता राजाराम रेगे से बातचीत की थी, जिन्होंने कहा था कि बाल ठाकरे अवस्थ होने के कारण इस कार्यक्रम में नहीं आ सकते हैं लेकिन उनके बेटे उद्धव ठाकरे और शिवसेना के अन्य नेता इसमें शामिल हो सकते हैं। उसने फंड्स जुटाने के लिए अपने आतंकी संगठन लश्कर से भी विचार-विमर्श किया था।

जब डेविड हेडली से पूछा गया कि क्या बाल ठाकरे को इस बारे में पता था तो उसने कहा था कि उसे ये सब कैसे पता होगा, उसे तो राजाराम रेगे ने बताया था कि बालासाहब को यात्राएँ न करने को कहा गया है। डेविड हेडली ने बताया था कि वो बचपन से भारत से घृणा करता है और वो भारतीय नागरिकों को हमेशा से नुकसान पहुँचाना चाहता था। उसके आतंकी संगठन ने बाल ठाकरे की हत्या की सजिश भी रची थी लेकिन जिसे ये काम दिया गया था, वो आतंकी गिरफ्तार हो गया।

डेविड हेडली ने सुनवाई के दौरान कहा था कि बाल ठाकरे की हत्या की साजिश के लिए ही उसने ये सब किया था। हालाँकि, राजाराम रेगे ने बताया था कि उनका शिवसेना से कोई लेनादेना नहीं है और वो बतौर सामाजिक कार्यकर्ता पार्टी मुख्यालय गए थे। एक ईमेल भी लीक हुआ था, जिसमें हेडली को लिखे मेल में रेगे खुद को राजनीतिक कनेक्शन वाला व्यक्ति बताते हुए हजारों करोड़ के प्रोजेक्ट्स क्लियर करने का दावा कर रहे थे।

इस पर शिकागो कोर्ट में उन्होंने बताया था कि वो तो बस डेविड हेडली को जाँच रहे थे। उन्होंने बताया कि वो शिवसेना भवन में डेविड हेडली से मिले थे और उन्होंने उसे नज़रअंदाज़ किया था। साथ ही कहा था कि वो शांतिपूर्ण ढंग से जीवन जीने वाले एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति है। उन्होंने खुद के शिवसेना PRO होने की बात से इनकार किया था। इस हिसाब से ये खबर तो सही है लेकिन आतंकी डेविड हेडली के इरादे खतरनाक थे।

‘एक ही ट्रैक्टर को कितनी बार फूँकोगे भाई?’: कॉन्ग्रेस ने जिस ट्रैक्टर को दिल्ली में जलाया, 8 दिन पहले अम्बाला में भी जलाया था

कॉन्ग्रेस पार्टी ने सोमवार (सितम्बर 28, 2020) की सुबह दिल्ली के इंडिया गेट पर जिस ट्रैक्टर को जला कर केंद्र सरकार के कृषि कानूनों का विरोध किया, उसी ट्रैक्टर को 8 दिन पहले 20 सितम्बर को हरियाणा के अम्बाला में भी जलाया गया था। एक ही ट्रैक्टर को दो जगह जलाए जाने की तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं। तस्वीरें में नंबर प्लेट पर उनका नंबर भी समान दिख रहा है – ARK1163.

ये खुलासा ‘न्यूज़ 24’ चैनल की एक खबर में हुआ, जिसमें बताया गया कि दोनों ट्रैक्टरों का नंबर, रंग और तस्वीर एक जैसी ही है, बस जगह बदला हुआ है। खबर में न्यूज़ एंकर ने कहा कि विरोध है, ये तो ठीक है लेकिन एक ही ट्रैक्टर को कितनी बार फूँकोगे? चैनल के रिपोर्टर ने इस बात की भी पुष्टि की है कि इस मामले में जिन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है, वो दिल्ली के इंडिया गेट पर भी मौजूद थे और अम्बाला में भी मौजूद थे।

अम्बाला में जब इस ट्रैक्टर को फूँका गया था, तब कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की भीड़ का नेतृत्व यूथ कॉन्ग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष वीरेंद्र ढिल्लों कर रहे थे। दिल्ली में भी इस भीड़ का नेतृत्व वही कर रहे थे। ये आइसर ट्रैक्टर है, जिसे कॉन्ग्रेस हर जगह ले जाकर फूँक रही है। यहाँ तक कि अब कृषि कानूनों का विरोध कर रही अकाली दल ने भी सवाल पूछना शुरू कर दिया है कि एक ही ट्रैक्टर पर कॉन्ग्रेस कब तक राजनीति करेगी?

इधर दिल्ली पुलिस ने इंडिया गेट के नजदीक राजपथ पर ट्रैक्टर जलाए जाने को सुरक्षा व्यवस्था में सेंध माना है और इस मामले में 7 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। बाकियों की तलाश जारी है। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने इस दौरान पुतले भी जलाए और सोशल मीडिया पे लाइव जाकर इस घटना का सीधा प्रसारण किया। इस मामले में मनजोत सिंह, साहिब, मोहाली के सुमित पाटिल, मनसा के रमन दीप सिंह सिंधु और लुधियाना के राहुल कुमार को गिरफ्तार किया गया है।

ज्ञात हो कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली के इंडिया गेट पहुँचे पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक ट्रैक्टर को पलट कर उसे आग के हवाले कर दिया था। इन नेताओं ने उस ट्रैक्टर को एक ट्रक में डाल कर लाया था, जिसके बाद उसे सड़क पर डाल कर उसमें आग जला दी गई। साथ ही कॉन्ग्रेस कार्यकर्त्ता जलते हुए ट्रैक्टर के पास ‘भगत सिंह अमर रहें’ के नारे भी लगा रहे थे। पीली पगड़ी व दुपट्टे के साथ पहुँचे कॉन्ग्रेस नेताओं ने विरोध प्रदर्शन के दौरान भगत सिंह की तस्वीरें भी लहराईं।

2,50,000 से घट कर अब बस 700… अफगानिस्तान से सिखों और हिंदुओं का पलायन हुआ तेज

इस्लामी आतंक के कारण अफगानिस्तान में सिखों और हिंदुओं की संख्या समय के साथ घटती जा रही है। एक समय में वहाँ अल्पसंख्यकों की गिनती 2,50,000 हुआ करती थी मगर अब ये संख्या 700 पर पहुँच गई है। न चाहते हुए तमाम सिख व हिंदू परिवार भय के कारण अपनी जन्मभूमि छोड़ने को तैयार हैं। 

बता दें कि अफगानिस्तान में बहुसंख्यक आबादी के कारण अल्पसंख्यकों की अनदेखी लंबे समय से होती आ रही है। ऐसे में वहाँ समुदाय के लोगों का कहना है कि यदि उन्हें सरकार से पर्याप्त सरंक्षण नहीं मिलता है तो आईएस के हमलों के कारण उन्हें पूरी तरह पलायन करना पड़ सकता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, अफगानिस्तान का एक अल्पसंख्यक डर के कारण अपना पूरा नाम न बताते हुए कहता है कि अब वह यहाँ और रुकने में समर्थ नहीं है। व्यक्ति ने बताया कि मार्च में उनके समुदाय के धार्मिक स्थल पर हुए हमले में उनके 7 रिश्तेदार मारे गए थे।

इस हमले में 25 सिखों की मौत हो गई थी। उन्होंने कहा कि अपनी मातृभूमि को छोड़कर जाना उतना ही मुश्किल है, जैसे अपनी माँ को छोड़कर जाना। इसके बावजूद वे उस हिंदू-सिख समूह का हिस्सा रहे, जोकि पिछले महीने भारत गया था।

उल्लेखनीय है कि भारत में हम देखते हैं कि सिख और हिंदू धर्म अलग-अलग हैं व इनके धार्मिक स्थान भी अलग हैं। मगर, यही चीज अफगानिस्तान में नहीं हैं। वहाँ पर कम संख्या होने के कारण दोनों समुदाय के लोग एक छोटे से मंदिर में एकत्रित होकर अपने धर्मानुसार उपासना करते हैं। एक व्यक्ति बताते हैं कि उनके समुदाय को रूढ़िवादी देश में हर सरकार अपनी तरह प्रताड़ित करती है।

धार्मिक स्थलों पर हमला और कब्जा

90 के दशक में तालिबानी शासन के दौरान सिखों और हिंदुओं को अफगानिस्तान में पीला बाजूबंद बाँधने को कहा जाता था। हालाँकि वैश्विक निंदा के बाद आज वहाँ यह नियम लागू नहीं है। मगर, तब भी अल्पसंख्यकों के पलायन का एक कारण है कि सिखों से उनके घर, उनके व्यवसाय, धार्मिक स्थान अवैध रूप से सालों पहले जब्त कर लिए गए। इसके अलावा साल 1992-96 के दौरान प्रतिद्वंदी समूहों के बीच चली लड़ाई में हिंदूओं के मंदिर भी तबाह कर दिए गए।

अभी हाल में आईएस हमलावरों ने गत मार्च महीने में देश के जलालाबाद शहर में हमला किया था। इस हमले में 19 लोग घायल हुए थे। इनमें से अधिकाँश सिख थे। साथ ही इनमें एक वह अल्पसंख्यक भी शामिल था, जिसने अफगान संसद के लिए अपना नाम नॉमिनेट किया।

सिख समुदाय से आने वाले चरण सिंह खालसा कहते हैं कि उनके छोटे समुदाय के लिए इतने जान का नुकसान बिलकुल बर्दाश्त योग्य नहीं हैं। खालसा के खुद के भाई की भी काबुल में दो साल पहले अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी। वह कहते हैं कि पिछले तीन साल अफगान में हिंदुओं और सिखों के लिए बेहद घातक रहे हैं। समुदाय के नेता वहाँ की वर्तमान सरकार की नाकामियों पर सवाल भी उठाते हैं।

ज्ञात हो कि साल 2010 में अफगानिस्तान सरकार ने तय किया था कि वह राष्ट्रीय असेंबली की एक सीट अल्पसंख्यकों को देंगे और तब से वहाँ दो सिख प्रतिनिधित्व हैं। हालाँकि खालसा इन दोनों प्रतिनिधियों को प्रतीकात्मक बताते हैं और सरकार की आलोचना करते हुए कहते हैं कि वह अल्पसंख्यकों के धार्मिक स्थल को सुरक्षा प्रदान करने में असफल रहे।

इस मामले पर पिछले महीने राष्ट्रपति अशरफ गनी के प्रवक्ता सेदीक सेदीक्की ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि सिख और हिंदू समुदाय के सदस्य अफगानिस्तान में शांति बहाली के बाद लौट आएँगे। गृह मंत्रालय के प्रवक्ता तारिक अरियन ने कहा था, ”हम लोगों को सुरक्षा देने के लिए सभी संसाधनों का इस्तेमाल करेंगे। हम उनकी (सिख और हिंदू) मानसिक और निजी सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध और जिम्मेदार हैं।” 

गौरतलब हो कि अगस्त में 176 अफगान सिख और हिंदू स्पेशल वीजा पर भारत आए हैं। मार्च से यह दूसरा जत्था था। जुलाई में 11 सदस्य भारत पहुँचे थे। खासला ने कहा कि अफगान, कनाडा और यूरोपीय देशों के हिंदू और सिख अफगान से उन लोगों को निकालने में मदद कर रहे हैं जो एयर टिकट का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं।  

‘कॉन्ग्रेसी राज्य कृषि कानूनों को रद्द करें’ – सोनिया गाँधी का ‘फर्जी’ निर्देश, क्योंकि इसमें है राष्ट्रपति की मंजूरी का पेंच

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने अपनी पार्टी के शासन वाले सभी राज्यों को उन क़ानूनी विकल्पों पर विचार करने को कहा है, जिससे केंद्र सरकार द्वारा लाए गए कृषि क़ानूनों को वहाँ लागू नहीं किया जा सके। देश भर में पार्टी इन कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन में लगी हुई है और पंजाब में उसने सबसे ज्यादा आक्रामक रवैया अख्यितार कर रखा है। मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने इन कृषि कानून के खिलाफ एक दिवसीय धरना भी दिया।

कॉन्ग्रेस अब इसे केंद्र सरकार द्वारा राज्य के अधिकार-क्षेत्र में अतिक्रमण का मुद्दा बनाना चाहती है और इसीलिए सोनिया गाँधी ने अपने शासन वाले सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वो अनुच्छेद 254(2) के तहत ऐसे विकल्पों पर विचार करें, जिससे केंद्र के इन कानूनों को उन राज्यों में रद्द किया जा सके। कॉन्ग्रेस ने इन क़ानूनों को अस्वीकार्य करार देते हुए अपने शासन वाले राज्यों में इसे बाईपास करने को कहा है।

कोंग्रेस पार्टी ने आरोप लगाया है कि केंद्र सरकार ने इन कानूनों के जरिए न सिर्फ ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ को ख़त्म कर दिया है बल्कि ‘कृषि उपज विपणन समिति’ के क्रियाकलापों पर भी रोक लगा दी है। पार्टी ने कहा कि जब वो अपने शासन वाले राज्यों में इसे लागू होने से रोकेगी तो किसानों के साथ हो रहा अन्याय ख़त्म हो जाएगा। जिस अनुच्छेद की सोनिया गाँधी बात कर रही हैं, वो राज्यों को केंद्र के प्रतिकूल कानून बनाने का अधिकार तो देती है, लेकिन इसके लिए राष्ट्रपति की मंजूरी अनिवार्य है।

2015 में भी तत्कालीन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने राज्यों को इसी अनुच्छेद के प्रावधानों के तहत पिछले यूपीए सरकार द्वारा पास किए गए ‘भूमि अधिग्रहण क़ानून’ को लागू न करने की सलाह दी थी। केंद्र सरकार बार-बार कह रही है कि वो अनाज की खरीद पूर्ववत जारी रखेगी लेकिन इन क़ानूनों से किसान सीधे प्राइवेट कंपनियों को अपनी उपज बेच सकेंगे। साथ ही इसका एमएसपी पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा।

हालाँकि, कॉन्ग्रेस के भीतर ही इस बात को लेकर मतभेद है कि इन कृषि क़ानूनों का विरोध कैसे किया जाए। पार्टी के कुछ नेता मानते हैं कि इसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख करना सही नहीं होगा। उसे लगता है कि सुप्रीम कोर्ट इन क़ानूनों को रद्द नहीं करेगी। इसीलिए, इसे ‘केंद्र सरकार द्वारा राज्य सरकारों के अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप करने’ का मुद्दा बनाया जा रहा है। लेकिन, सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में धड़ल्ले से याचिकाएँ जा रही हैं, जिन्हें दायर करने वालों में कुछ कॉन्ग्रेस से जुड़े वकील भी शामिल हैं।

राज्यों को ये निर्देश देने से पहले कॉन्ग्रेस आलाकमान ने वरिष्ठ अधिवक्ता और पार्टी के नेता अभिषेक मनु सिंघवी से विचार-विमर्श किया, जिन्होंने राष्ट्रपति की मंजूरी वाले नियम को इसे लागू करने में बाधा करार दिया। उन्होंने कहा कि अगर गृह मंत्रालय अपनी समीक्षा कर के राष्ट्रपति को इस पर हस्ताक्षर न करने को कहती है तो कॉन्ग्रेस की ये चाल फेल हो जाएगी। ‘TOI’ के सूत्रों का कहना है कि इस निर्देश का उद्देश्य कानून बनाना कम और राजनीतिक माइलेज लेना ज्यादा है।

इधर अमूल नाम से मशहूर गुजरात कॉपरेटिव मिल्क मार्केटिंग फेडरेशन लिमिटेड के मैनेजिंग डॉयरेक्टर आरएस सोढ़ी ने रविवार (सितंबर 27, 2020) को ट्विटर पर किसानों के लिए मुक्त बाजार के फायदे बताए। सोढ़ी ने समझाया कि कैसे कृषि उपज के रूप में दूध की कीमत 8 लाख करोड़ रुपए है। यह गेहूँ, धान और गन्ने के संयुक्त मूल्य से भी अधिक है। उन्होंने बताया कि डेयरी किसान GCMMF से जुड़े हों या नहीं, वे अपनी उपज/ उत्पाद कहीं भी बेचने के लिए स्वतंत्र हैं और खरीदार कहीं से भी उसे खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं।

बिहार चुनाव की वो 40+ सीटें, जहाँ ओवैसी कर सकते हैं खेल: राजनीति की प्रयोगशाला में चलेगा दलित-मुस्लिम कार्ड

#राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाले बिहार में चुनावों का दौर फिर से शुरू हो चुका है। ऐसे में चुनावी अटकलें लगेंगी, आंकलन होंगे, जातियों के आधार पर वोट बैंक के बनने और बिगड़ने की भी बातें होंगी। जो एक बात नहीं होगी, वो होगी मुहम्मडेन राजनीति की चर्चा!

ऐसा इसलिए है क्योंकि आम तौर पर मुहम्मडेनों को एक संगठित वोट बैंक मानकर ही आंकलन किए जाते हैं। बदलते चुनावी परिदृश्य ने एक बार फिर से इस सिस्टम को चुनौती दे दी थी। अफ़सोस कि अभी भी तथाकथित चुनावी विश्लेषक इस एम-फैक्टर पर ध्यान नहीं देते।

जब पिछले लोकसभा चुनावों में असदउद्दीन ओवैसी की हैदराबाद के हिंसक, मजहबी कट्टरपंथी रजाकारों से जन्मी एआईएमआईएम ने बिहार चुनावों में पैर जमाने शुरू किए थे, तभी से इस बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी।

बंगाल और नेपाल की सीमाओं से सटे, बिहार के किशनगंज जिले की ख़ास बात यह है कि ये बिहार का इकलौता मुहम्मडेन बहुल (करीब 68 प्रतिशत) इलाका है। लोक सभा सीट के लिहाज से देखें तो यहाँ से कभी जनसंघ या भाजपा नहीं जीती है। 1952 से ही यहाँ तथाकथित “सेक्युलर” पार्टियों के उम्मीदवार जीतते रहे हैं। इस सीट से 8 बार कॉन्ग्रेस, 3 बार समाजवादी, एक बार जनता दल और 3 बार राजद के अलावा केवल एक बार एक निर्दलीय ने जीत दर्ज की थी।

पिछले उप-चुनावों में जब यहाँ से कॉन्ग्रेस के विधायक मोहम्मद जावेद के लोकसभा जाने की वजह से कॉन्ग्रेस ने जावेद की अम्मा सईदा बानू को उतारा तो उसे लग रहा था कि वही जीतेगी। इस बार उनका मुकाबला असदउद्दीन ओवैसी के उतारे कमरुल होदा से भी था। जब देश का ध्यान महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों पर था, तभी यहाँ से करीब 70000 वोट के साथ एआईएमआईएम के उम्मीदवार ने फतह पाई। कॉन्ग्रेस को केवल 25000 के लगभग वोट मिले थे।

अगर केवल आबादी के लिहाज से देखें तो ओवैसी की सांप्रदायिक पार्टी के लिए यहाँ उपजाऊ जमीन है। किशनगंज (करीब 68%), कटिहार (करीब 45%), अररिया (करीब 43%) और पुर्णिया (करीब 39%) में कम से कम 20 सीटें ऐसी हैं, जहाँ से ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार जीत सकते हैं।

ओवैसी की पार्टी अगर छोटी पार्टियों से गठबंधन करे और अपना दलित-मुस्लिम कार्ड हमेशा की तरह खेले तो उसके उम्मीदवार इन क्षेत्रों में कम से कम 40 सीटों पर स्थापित क्षेत्रीय/राष्ट्रीय पार्टियों को कड़ी टक्कर देंगे। भाजपा के गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के बयानों पर खेल कर उसे और भी फायदा हो सकता है।

हिंदू-मुस्लिम आबादी और रफ्तार

अगर हम इसके साथ जोड़कर आबादियों के बढ़ने का तुलनात्मक अध्ययन करें तो एक चीज़ बहुत स्पष्ट हो जाती है। हिन्दुओं की आबादी बढ़ने की (दशक में) रफ़्तार जहाँ 2001 में 19.92% और 2011 में 16.76% थी, वहीं मुस्लिम आबादी के बढ़ने की रफ़्तार 2001 में 29.52% और 2011 में 24.6% रही।

आबादी के बढ़ने के क्रम में इस बदलाव से युवा वोटरों की संख्या में जो बदलाव हुए होंगे, संभवतः चुनावी विश्लेषक जमातों ने इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया। ऐसा भी हो सकता है कि सेकुलरिज्म का झंडा उठाने के लिए इस तथ्य को दबा दिया गया हो। पक्का कहा नहीं जा सकता।

अंततः इन बदलावों का असर सामाजिक संरचना पर पड़ा, और फिर साथ ही साथ इसका असर स्थानीय राजनीति में भी नजर आने लगा। जो स्थानीय मुद्दे थे, वो धीरे-धीरे बदलने लगे। प्रतिनिधित्व का सवाल भी बदलने लगा।

बदलाव की शुरुआत देखें तो इसके लिए थोड़ा पीछे के भागलपुर दंगों (1989) का दौर देखना होगा। इन दंगों के वक्त बिहार में कॉन्ग्रेस की सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की सरकार थी और भागलपुर से भी कॉन्ग्रेस जीतती थी। इन दंगों के बाद पच्चीस साल तक कॉन्ग्रेस यहाँ से जीत नहीं पाई। आज की तारीख में भी स्थिति बहुत बदली नहीं है। करीब एक पीढ़ी गुजर जाने के बाद भी लोगों को वो दंगे याद हैं।

दंगों के गुजर जाने के काफी वक्त बाद 2006 में नीतीश कुमार की सरकार ने भागलपुर दंगों की जाँच के लिए जस्टिस एनएन सिंह इन्क्वायरी कमीशन का गठन किया। करीब दस साल बाद जब इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी तो दंगों में नाकाम होने का पूरा दोष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की कॉन्ग्रेसी सरकार और स्थानीय प्रशासन की विफलता पर डाला गया। जाहिर है इससे आम लोगों में कोई संतोष की लहर तो नहीं ही दौड़ी।

पिछले चुनावों में बिहार की विधानसभा में कुल 23 मुहम्मडेन विधायक चुनकर पहुँचे थे। अगर आबादी के हिस्से के लिहाज से देखें तो ऐसे ही ये गिनती कम है। ऊपर से बिहार के करीब 56% मुहम्मडेन मतदाता ओबीसी समुदाय के हैं और जीतने वालों में एक बड़ी गिनती (9) शेख, और कुल्हैया (5) की थी।

जाहिर है ऐसे हाल में बिहार का मुहम्मडेन, प्रतिनिधित्व के लिए बाहर की तरफ देखना भी शुरू कर सकता है। ओवैसी का बिहार आना राजनीति की प्रयोगशाला के लिए एक नया प्रयोग होगा।

‘केस वापस ले, वरना ठोक देंगे’: करण जौहर की ‘ड्रग्स पार्टी’ की शिकायत करने वाले सिरसा को पाकिस्तान से धमकी

शिरोमणि अकाली दल (SAD) के नेता मनजिंदर सिंह सिरसा ने पाकिस्तान से धमकी भरा कॉल आने का दावा किया है। धमकी में उन्हें बॉलीवुड फिल्म निर्माता करण जौहर के खिलाफ दर्ज शिकायत वापस लेने या गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी गई है। अकाली दल नेता ने धमकी देने वाले शख्स का नाम और फोन नंबर शेयर करते हुए दिल्ली पुलिस से मामले को संज्ञान में लेने का अनुरोध किया है।

अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर शेयर किए गए एक वीडियो संदेश में सिरसा ने इसकी जानकारी देते हुए कहा, “अभी मेरे पास पाकिस्तान से एक फोन आया। फोन करने वाले ने अपना नाम मोहम्मद वसीम बताया और मुझे धमकी दी कि ‘भाई’ ने कहा है कि बॉलीवुड वाला करण जौहर वाला केस है, उसे 2 दिन में वापस लेकर नौटंकी बंद कर, वरना तेरे को ठोकेंगे। जब मैंने पूछा कि ‘भाई’ कौन है, तो उसने कहा कि तू ‘भाई’ को नहीं जानता। ‘भाई’ को पूरा देश जानता है। क्यों मरना चाहता है। ये नौटंकी बंद करो, वरना ठोक देंगे। उसने मुझे कहा कि जब हम तुम्हें ठोकेंगे तो तुम्हें क्या, तुम्हारे परिवार को भी पता चल जाएगा कि भाई कौन है।”

सिरसा ने कहा कि वे इसकी शिकायत पंजाबी बाग पुलिस स्टेशन के एसएचओ के साथ पश्चिम जिला डीसीपी को दे रहे हैं। वो चाहते हैं कि दिल्ली पुलिस इस पर संज्ञान लेकर जाँच करे। सिरसा ने आगे कहा कि वह इस तरह की धमकियों से डरने वाले नहीं है और बॉलीवुड में नशीली ड्रग्स के खिलाफ लगातार काम करते रहेंगे।

सिरसा ने फोन करने वाले को संबोधित करते हुए कहा, “भाई हम तेरे से डरने वाले नहीं हैं। तुमने बहुत गलत आदमी को धमकी दिलवाई है। तुम्हें बहुत बड़ी गतफहमी है कि मैं तुम्हारे गलतफहमी से डर जाऊँगा। ये सिद्धांत की लड़ाई है और मैं इसे लड़ूँगा। इस धमकी का मुझे एक फायदा हुआ है, अब मैं इस लड़ाई को और भी शिद्दत से लड़ूँगा। और इतनी शिद्दत से लड़ूँगा कि जो लोग मुझे डरा रहे हैं, मुझे जान से मारने की धमकी दे रहे हैं, उन्हें यह गलती पूरी जिंदगी याद रहेगी। उनको इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा। भाई को मैं कहना चाहता हूँ कि तेरे जैसे भाई दरवाजे के बाहर खड़े हैं, गलियों में भीख माँग रहे हैं। तेरे जैसे भाई से हम डरते नहीं है, तू अपने घर पर भाई होगा, मुझे डरा-धमका नहीं सकता।”

गौरतलब है कि सिरसा ने एनसीबी प्रमुख राकेश अस्थाना से 15 सितंबर को मुलाकात की थी, जिसमें करण जौहर, दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, अर्जुन कपूर, विक्की जैसे कई शीर्ष बॉलीवुड नामों के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई थी। 

दरअसल बीते साल करण जौहर के घर एक पार्टी का आयोजन किया गया था। इस पार्टी का एक वीडियो सामने आया था, जिसमें दीपिका पादुकोण, मलाइका अरोड़ा, अर्जुन कपूर, शाहिद कपूर, विक्की कौशल, वरुण धवन सहित अन्य सितारे नजर आ रहे थे। मनजिंदर सिंह सिरसा ने आरोप लगाया कि पार्टी में शामिल होने वाले लोगों ने ड्रग्स का इस्तेमाल किया गया था।

मनजिंदर सिंह सिरसा ने दिल्ली में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो प्रमुख राकेश अस्थाना से मुलाकात कर करण जौहर की पार्टी में शामिल होने वाले स्टार्स के खिलाफ जाँच और कार्रवाई की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि शाहिद कपूर ‘उड़ता पंजाब’ में पूरी दुनिया के सामने सिख युवाओं को नशेड़ी बताते हैं। लेकिन सच्चाई उड़ता बॉलीवुड है।

तिलक लगा, भगवा पहन एंकरिंग करना अपराध है? सुदर्शन न्यूज ने केंद्र के शो-कॉज नोटिस का दिया जवाब

सुदर्शन चैनल ने ‘बिंदास बोल’ कार्यक्रम के लिए जारी किए गए शो-कॉज नोटिस का जवाब दिया है। इस कार्यक्रम में ज़कात फ़ाउंडेशन पर आरोप लगाया गया था कि उसे आतंकवादी संगठनों से आर्थिक मदद मिलती है। इस आर्थिक सहयोग से वह लोक सेवा संबंधी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे मुस्लिम उम्मीदवारों की मदद करता है। यह नोटिस सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी किया गया था। 

चैनल के एडिटर इन चीफ सुरेश चव्हाणके ने ‘यूपीएससी जिहाद’ के संबंध में जारी किए गए नोटिस पर दिए गए जवाब को ट्विटर पर साझा किया है। चव्हाणके ने यह भी बताया कि नोटिस का जवाब कुल 1 हज़ार पन्नों में दिया गया है और जल्द ही इसके अन्य अहम हिस्से साझा किए जाएँगे।

उन्होंने ट्विटर पर लिखा, “आज हमने यूपीएससी जिहाद के संबंध में सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी किए गए नोटिस का जवाब दिया है। उस जवाब के कवर लेटर का 5 पन्ना आप सभी के साथ साझा कर रहा हूँ। आने वाले कुछ दिनों तक हम अपने हज़ार पन्नों के जवाब के कुछ अहम हिस्से साझा करेंगे, बिंदास बोल।”

भारत सरकार को जवाब देते हुए सुरेश चव्हाणके ने अपने ट्वीट में लिखा, “हमसे कुल 13 सवाल पूछे गए थे, लेकिन हम 63 सवालों का जवाब दे रहे हैं। यह सवाल हमसे सर्वोच्च न्यायालय और सोशल मीडिया माध्यमों द्वारा पूछे गए थे। हमें ऐसा लगा कि इन प्रश्नों को संबोधित करना हमारी ज़िम्मेदारी है। हमारी तरफ से इसे एक ईमानदारी भरा प्रयास माना जाए। हमारे खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर साज़िश रही गई है, उसे उजागर करने में भी हमारी मदद की जानी चाहिए।”

गोबेल्स के लॉ ऑफ़ प्रोपोगेंडा का उल्लेख करते हुए उन्होंने अपने ट्वीट में लिखा, “एक झूठ को इतनी बार दोहराया जाए कि वह सच में तब्दील हो जाए।” कवर लेटर में उन प्रयासों का सिलसिलेवार तरीके से ज़िक्र है जब यूपीएससी जिहाद कार्यक्रम को बंद करने की बात हुई। साथ ही लोगों को भड़काने का भी पूरा प्रयास किया गया और सरकारी संस्थानों को इस मुद्दे पर धोखे में रखा गया। 

लेटर में कहा गया है, “इतना कुछ होने के चलते खोजी पत्रकारिता पर आधारित कार्यक्रम कानूनी विवाद में फँस गया। इसके साथ देश की राष्ट्रीय सुरक्षा पर मँडराने वाले एक बड़े खुलासे का पर्दाफ़ाश अधूरा ही रह गया। इस तरह के हालातों का फायदा उठाते हुए साज़िश में शामिल सभी आरोपित सबूत मिटाने की कोशिश में जुट गए हैं। हम इकलौते ऐसे चैनल हैं जिस पर इस तरह की कार्रवाई हुई है, क्योंकि हम पूरी दुनिया की इंसानियत के दुश्मन – कट्टर इस्लामियों की सच्चाई सामने लेकर आ रहे हैं।” 

इसके अलाव सुदर्शन चैनल ने यह भी आरोप लगाए कि विरोधी यूपीएससी जिहाद को बंद करने की लगातार कोशिश कर रहे हैं। यह असल मायनों में ‘बुद्धिजीवी स्लीपर सेल है’ जो ज़कात फ़ाउंडेशन को मिलने वाली फंडिंग के आतंकवादी कनेक्शन से देश का ध्यान हटाना चाहते हैं। सुरेश चव्हाणके ने इस बात पर भी जोर दिया कि कार्यक्रम की ब्रांडिंग ‘मुस्लिम विरोधी’ की तरह इसलिए की गई, क्योंकि उन्होंने लोगों से कार्यक्रम देखने का निवेदन किया। इसके अलावा कार्यक्रम के प्रोमो में कट्टरपंथियों की सतही मानसिकता दिखाई गई थी। 

सुरेश चव्हाणके ने सवाल पूछते हुए लिखा, “हमने कुछ भारतीय संगठन और विदेशी आतंकवादियों के बीच संबंध खोज कर निकाले हैं। अगर वह आतंकवादी मुस्लिम हैं तो क्या यह हमारी गलती है? क्या समाचार प्रस्तोता बन कर तिलक लगान या भगवा वस्त्र पहनना अपराध है? मुझे अपनी पवित्र संस्कृति और पूर्वजों में पूरी आस्था है, क्या इसकी वजह से मैं मुस्लिम विरोधी बन जाता हूँ?”

23 सितंबर को सर्वोच्च न्यायालय ने यूपीएससी जिहाद मामले की सुनवाई को टाल दिया था, क्योंकि सरकार ने अदालत को सूचित किया था कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की तरफ से चैनल को कारण बताओ नोटिस भेजा गया है। नोटिस मूल रूप से इस बात पर आधारित था कि क्या सुदर्शन चैनल ने इस कार्यक्रम में चैनल कोड की अवहेलना की है। यूपीएससी जिहाद मुद्दे पर आधारित इस कार्यक्रम में ज़कात फाउंडेशन (गैर सरकारी संगठन) पर आरोप लगाया गया था कि वह सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहे मुस्लिम उम्मीदवारों को प्रशिक्षण देता है। इसके अलावा उसे तमाम आतंकवादी संगठनों से फंडिंग भी मिलती है।       

16 दिसंबर को बस फूँका, 17 को हिंदुओं पर पथराव: दिल्ली दंगों में ताहिर हुसैन के बयान से नए खुलासे

ऑपइंडिया ने जुलाई 2020 में ताहिर हुसैन के कबूलनामे पर रिपोर्ट प्रकाशित की थी। इसमें ताहिर हुसैन ने बताया था कि कैसे उसने दिल्ली में हिंदू विरोधी दंगों की योजना बनाई थी और कैसे उसने कानून की पकड़ से बचने के लिए झूठा पीसीआर कॉल करके ढोंग रचा ताकि वह पीड़ित लगे।

अब दिल्ली पुलिस ने FIR संख्या 59 से संबंधित आरोप पत्र में ताहिर हुसैन द्वारा किए गए एक और खुलासे का जिक्र किया है। यह बताता है कि दिल्ली के दंगों कि योजना कितने बेहतर तरीके से तैयार की गई थी। बीते साल दिसंबर के मध्य से इस पर अमल शुरू कर दिया गया था।

FIR संख्या 59 से संबंधित अपनी ‘फाइनल रिपोर्ट’ में दिल्ली पुलिस ने अदालत में सप्लीमेंट्री चार्जशीट दाखिल किया है, उससे दिल्ली हिंसा में ताहिर हुसैन की संलिप्तता को लेकर नए खुलासे हुए हैं।

ताहिर हुसैन ने अपने बयान में खुलासा करते हुए बताया कि उसी ने 16 दिसंबर को भजनपुरा में बस में आग लगाने वाली भीड़ को इकट्ठा किया था। 17 दिसंबर को हिंदुओं पर पथराव करने के लिए भीड़ जुटाई थी। 15 दिसंबर को जामिया मिलिया इस्लामिया के विरोध और उसके बाद की पुलिस कार्रवाई के बाद से अपनी भूमिका का उसने खुलासा किया है।

ताहिर हुसैन ने बताया है कि 15 दिसंबर को जामिया के विरोध प्रदर्शन और दंगाइयों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई के बाद वह काफी आक्रोश में आ गया था। उसने अपने क्षेत्र के समुदाय विशेष के लोगों से बात करने का फैसला किया कि कैसे नागरिकता संशोधन अधिनियम खास समुदाय के खिलाफ है, इसकी वजह से समुदाय विशेष के लोग अपनी नागरिकता खो देंगे और फिर उन्हें भारत से भागना पड़ेगा।

16 दिसंबर को उसने अपने क्षेत्र के लोगों से बात करना शुरू किया और उन्हें उस दिन 12 बजे फारुखिया मस्जिद, बृजपुरी पुलिया के पास इकट्ठा होने के लिए कहा। ताहिर हुसैन खुद फारुखिया मस्जिद लगभग 12:30 बजे पहुँचा। उसने बताया कि 1 बजे तक कम से कम 1,000 मजहबी लोग उसकी बात सुनने के लिए इकट्ठा हो गए थे।

उसने बताया है कि जब वह 16 दिसंबर को भीड़ से मुखातिब था तभी वहाँ पर अचानक से पुलिस पहुँच गई। पुलिस को देखते ही कई लोग छिपने के लिए मस्जिद के अंदर चले गए और नमाज पढ़ने का बहाना बनाया। वहीं कुछ लोग पास वाली गलियों में छुप गए।

ताहिर हुसैन ने खुलासा किया है पुलिस के चले जाने के बाद लोग जामा मस्जिद के लेन 10 में इकट्ठा हुए और सीएए के ‘मजहब विरोधी’ होने के बारे में फिर से बैठक शुरू की। इन बैठकों के लिए 50-60 लोग मौजूद थे। ताहिर कहता है कि रात के 8 बजे उन लोगों ने आगे की रूपरेखा तय करने के लिए अल हिंद नर्सिंग होम के डॉ. एमएम अनवर से मिलने का फैसला किया।

एक चौंकाने वाला खुलासा करते हुए उसने बताया कि अपने लोगों से अपनी ‘मौजूदगी दर्ज कराने के लिए’ भजनपुरा में एक बस पर पथराव करने के लिए कहा।

Excerpt from the disclosure statement by Tahir Hussain

‘अपनी मौजूदगी दर्ज कराने’ वाला बयान कई चीजों की ओर इशारा करता है। इसका मतलब यह हो सकता है कि वह इस अवसर का इस्तेमाल ताकत दिखाने के रूप में करना चाहता था, ताकि हिंसा के मास्टरमाइंड उसे गंभीरता से लेंगे। उल्लेखनीय है कि पहले हमने बताया था चार्जशीट में पता चला था कि 18 जनवरी को शाहीन बाग में ताहिर हुसैन, खालिद सैफी और उमर खालिद के बीच एक बैठक हुई थी, जिसमें उमर खालिद ने ताहिर हुसैन को दंगों में समर्थन देने का वादा किया था।

ऐसे में यह पूरी तरह से संभव है कि 16 दिसंबर को हिंसा की स्थिति पैदा करके ताहिर हुसैन ‘अपनी ताकत’ दिखाना चाहता था। इसका मतलब यह भी हो सकता है कि वह योजना के क्रियान्वयन को सुनिश्चित करने के लिए ‘अपनी ताकत दिखाना चाहता था’।

हालाँकि ताहिर हुसैन के इस बयान का निहितार्थ उसके बयान से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

ताहिर हुसैन का कहना है कि 17 दिसंबर को डॉ. अनवर के साथ उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ एक रैली निकालने की योजना बनाई थी। रैली के दौरान, फारुखिया मस्जिद के सामने ताहिर हुसैन ने 70-80 लोगों से बात करते हुए कहा था कि पीएम मोदी और अमित शाह के रहते हुए अगर सीएए पास हो जाता है, तो समुदाय के सभी लोगों को भारत छोड़कर भाग जाना होगा। ताहिर ने उन्हें यह भी बताया कि यदि वे भारत से भागना नहीं चाहते हैं, तो ‘उन्हें (पीएम मोदी-अमित शाह) उनको घुटनों पर लाने के लिए’ तैयार रहना चाहिए।

ताहिर हुसैन ने खुलासा किया कि उस समय फिर से पुलिस के आ जाने से रैली की योजना रद्द कर दी गई। भीड़ को विभिन्न दिशाओं में तितर-बितर कर दिया गया। उसका कहना है कि रैली रद्द होने के कारण, वह काफी गुस्से में था। 17 दिसंबर की शाम लगभग 8 बजे, उसने तिरपाल फैक्ट्री के पास 200-250 लोगों को इकट्ठा किया और बिजली जाने का फायदा उठाते हुए, भीड़ से हिंदुओं पर पथराव शुरू करवा दिया दिया। उसने कबूल किया कि वो लोग 30 मिनट तक हिंदुओं पर हमला करते रहे और तभी पुलिस ने आँसू-गैस भी छोड़ी थी। जब एक बड़ा पुलिस बल मौके पर पहुँचा, तो भीड़ तितर-बितर हो गई और ताहिर हुसैन भाग गया।

दिलचस्प बात यह है कि चार्जशीट में बताया गया है कि ताहिर हुसैन द्वारा स्वीकार की गई दोनों घटनाओं की पुष्टि स्थानीय पुलिस स्टेशन से की गई थी। 16 दिसंबर 2019 और 17 दिसंबर 2019 को इन दोनों घटनाओं से संबंधित एफआईआर दयालपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई है।

1. 16 दिसंबर: एफआईआर नंबर 510/19 दिनांक 16 दिसंबर।

2. 17 दिसंबर: एफआईआर नंबर 512/90 दिनांक 17 दिसंबर।

ताहिर हुसैन द्वारा दिल्ली हिंसा के संबंध में दिए गए बयान के निहितार्थ

ऑपइंडिया शुरुआत से ही ये कहते आ रहा है कि 24 और 25 फरवरी को भड़की हिंसा को अलगाव के रूप में नहीं देखा जा सकता है। दिल्ली के हिंदू विरोधी दंगे दिसंबर के बाद से उमर खालिद, ताहिर हुसैन आदि जैसे लोगों द्वारा सुनियोजित और कैलकुलेटेड तरीके से की गई हिंसा का नतीजा था। ताहिर हुसैन का बयान अब केवल इनकी पुष्टि करता है।

’लिबरल’ बुद्धिजीवियों ने ये नैरेटिव गढ़ने की कोशिश की कि दिल्ली दंगे खास समुदाय के खिलाफ एक योजनाबद्ध “पोग्राम” था। हालाँकि, सामने आए हर डिटेल यही इशारा करता है कि दंगाई हिंदुओं को निशाना बनाने के साथ ही इस ‘सरकार को घुटनों के बल’ लाना चाहते थे।

इसके लिए यह याद रखना भी महत्वपूर्ण है कि ताहिर हुसैन के खिलाफ दिल्ली पुलिस द्वारा दायर पिछली चार्जशीट में क्या आरोप लगाया गया था।

  1. ताहिर हुसैन ने 8 जनवरी को शाहीन बाग में एक बैठक के दौरान उमर खालिद और खालिद सैफी के साथ दंगों की योजना बनाई थी।
  2. शेल कंपनियों से कई लेनदेन थे, जो संदिग्ध थे। चार्जशीट में ताहिर हुसैन के खाते से कई ऐसे लेनदेन का विवरण दिया गया है जो बताता है कि दंगों के लिए उन्हें पैसे मिलने शुरू हो गए थे। कुछ पैसे शेल कंपनियों के माध्यम से भी निकाले गए थे।
  3. उमर खालिद ने ताहिर हुसैन को आश्वासन दिया था कि आर्थिक रूप से, इस्लामी संगठन पीएफआई (पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया) दंगों में मदद करने के लिए तैयार था।
  4. पुलिस का कहना है कि हुसैन ने जनवरी में खजूरी खास पुलिस स्टेशन में 100 राउंड के साथ अपनी लाइसेंसी पिस्टल जमा की थी, उसे 22 फरवरी को ही यानी दंगों से पहले निकाला गया था। आरोप-पत्र में कहा गया है कि जाँच के दौरान हुसैन अपने हथियार को छुड़ाने के संबंध में पुलिस को संतोषजनक जवाब देने में विफल रहा। 
  5. 24 और 25 फरवरी की रात हुसैन ने सुरक्षा का हवाला देते हुए अपने परिवार को मुस्तफाबाद में अपने पैतृक घर में स्थानांतरित कर दिया था, जबकि वह खुद वहीं पर रहा, ताकि अगले वह अगले दिन की आपराधिक साजिश के अनुसार पूरी स्थिति पर नज़र रख सके और हिंदुओं के खिलाफ और समुदाय के साथ खड़ा हो सके।
  6. ताहिर हुसैन ने झूठे पीसीआर कॉल किए, ताकि दंगे में उसकी भागीदारी सामने न आए।
  7. ताहिर हुसैन ने सुनिश्चित किया कि सीसीटीवी कैमरे बंद कर दिए जाएँ ताकि सबूत दर्ज न हों ।

दिसंबर में हुई दंगे की शुरुआत

हिंसा की शुरुआत 15 दिसंबर को हुई जब दंगाइयों ने राष्ट्रीय राजधानी में तोड़फोड़ की। आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक और दिल्ली के सुन्नी वक्फ बोर्ड के प्रमुख अमानतुल्लाह खान को जामिया नगर में हुए दंगों की जगह देखा गया था।

उसी दिन उस इलाके में ‘हिंदुओं से आजादी’ के नारे लगाए गए। उन हिंसक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान बसों में भी आग लगा दी गई। उसी रात, दिल्ली पुलिस ने जामिया मिलिया इस्लामिया के परिसर में घुसकर उपद्रवियों को खदेड़ा।

दो दिन बाद सीलमपुर में बड़े पैमाने पर दंगे भड़क उठे। दिल्ली युद्ध क्षेत्र में बदल गई। एक स्कूल बस पर भी हमला किया गया और आग लगा दी गई। भीड़ ने पुलिसकर्मियों पर भी पथराव किया। 17 दिसंबर को राष्ट्रीय राजधानी में शांति लौट आई, लेकिन यह एक असहज शांति थी। सुरक्षा चिंताओं को देखते हुए पुलिस की उपस्थिति अभी भी काफी अधिक संख्या में थी। 27 दिसंबर को सीलमपुर में फिर से सुरक्षा बढ़ाई गई और निगरानी के लिए ड्रोन तैनात किए गए। इस सब के बीच, शाहीन बाग में प्रदर्शनकारियों द्वारा सड़क को अवरुद्ध किया जाना जारी रहा।

ताहिर हुसैन के बयान से पता चलता है कि कैसे 15 दिसंबर से ही हिंसा को भड़काने की योजना बनाई गई थी और हिंसा के पीछे का उद्देश्य दोतरफा था- पहला, हिंदुओं पर हमला करना और दूसरा, केंद्र सरकार को अपने घुटनों पर लाना।

(नुपूर जे शर्मा द्वारा मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई यह रिपोर्ट यहाँ क्लिक कर पढ़ सकते हैं)

सुब्हानी हाजा ने इराक में IS से ली जिहादी ट्रेनिंग, केरल में जमा किए रासायनिक विस्फोटक: NIA कोर्ट ने सुनाई उम्रकैद

केरल के कोच्चि स्थित एनआईए की विशेष अदालत ने सोमवार (28 सितंबर 2020) को ISIS आतंकी सुब्हानी हाजा मोइदीन को आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई। उस पर 2.10 लाख रुपए का जुर्माना भी लगाया गया। सुब्हानी इस्लामिक स्टेट (आईएस) में भर्ती होने के लिए इराक गया था।

शुक्रवार (25 सितंबर 2020) को अदालत ने मोइदीन को दोषी करार दिया था। उसी दिन अदालत ने सोमवार को सज़ा सुनाने का आदेश जारी किया था। मोइदीन जिहाद के लिए प्रशिक्षण हासिल करने के इरादे से इराक गया था।उस पर गैर कानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था

एनआईए द्वारा जारी की गई प्रेस रिलीज़ में बताया गया है कि वह लगातार आईएसआईएस से संपर्क में था। वहाँ से आदेश मिलने पर उसने रासायनिक विस्फोटक इकट्ठा करना शुरू किया था। मोइदीन को एनआईए ने साल 2016 में गिरफ्तार किया था। साल 2015 के दौरान पेरिस में आतंकवादी हमला हुआ था। मोइदीन पर आरोप है कि उसने हमले के एक आरोपित सालाह अब्देसलाम के साथ मिल कर हथियारों का प्रशिक्षण लिया था।

इस आतंकवादी हमले में कुल 130 लोगों की जान गई थी। मोइदीन उस आतंकवादी हमले का आरोपित था, इसलिए फ्रांस की पुलिस साल 2018 में उसका बयान दर्ज करने के लिए भारत भी आई थी। ख़बरों के मुताबिक़ साल 2015 में मोइदीन तुर्की के ज़रिए इराक पहुँचा था और वहाँ वह आईएस में शामिल हो गया। प्रशिक्षण के बाद उसे मोसुल भेज दिया गया था। लड़ाई के दौरान अपने साथियों को मरते देख उसने देश लौटने का फैसला किया था।  

उसने देश के कई हिस्सों में आतंकवादी हमलों को अंजाम देने के लिए तमिलनाडु के शिवकाशी से रासायनिक विस्फोटक जमा किए थे। केरल के इस आतंकवादी को 26 सितंबर को हुई सुनवाई के दौरान भारतीय दंड संहिता की धारा 120 (बी) (आपराधिक षड्यंत्र), 125, यूएपीए की धारा 20 (आतंकवादी संगठन या गतिविधि में शामिल होना के तहत दोषी पाया गया है। इसके आलावा विशेष अदालत ने उसे भारतीय दंड संहिता की धारा 38 और 39 के तहत दोषी पाया।

पूछताछ में मोइदीन ने इस बात को स्वीकार किया था कि वह आईएसआईएस के साथ मिल कर ईराक के खिलाफ जंग लड़ रहा था। यह एक बड़ा कारण था जिसकी वजह से एनआईए ने उस पर धारा 125 लगाई जो कि बहुत कम मामलों में लगाया जाता है। उसने यह भी बताया था कि भारत लौटने के बाद उसने यहाँ आईएसआईएस के आतंकवादी सेल की ज़िम्मेदारी सँभाल ली थी। इसके तहत देश के कई इलाकों में आतंकवादी हमले अंजाम देने की योजना बनाई गई थी।