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‘हाँ, मैंने माल के बारे में पूछा, हम सिगरेट को माल कहते हैं; वीड मतलब मोटी सिगरेट-हैश मतलब पतली’

मोटी सिगरेट मतलब वीड
पतली सिगरेट मतलब हैश

अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने कथित तौर पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) को पूछताछ के दौरान यह बात बताई। उनकी मैनेजर करिश्मा प्रकाश ने भी यही बात दोहराई। यह दावा न्यूज चैनल आजतक ने अपनी रिपोर्ट में किया है।

रिपोर्ट के मुताबिक दीपिका ने एजेंसी को बताया कि सिगरेट के लिए वे लोग कोड भाषा के तौर पर ‘माल’ का इस्तेमाल करती हैं। पिछले दिनों कुछ ड्रग चैट सामने आए थे जिसमें ‘K’ से ‘D’ माल का डिमांड कर रही थी। इस चैट में वीड और हैश का भी जिक्र था। बाद में यह दावा किया गया कि ‘D’ का मतलब दीपिका पादुकोण और ‘K’ का मतलब उनकी मैनेजर करिश्मा से है।

यह बात भी सामने आई थी कि ड्रग्स चैट वाले व्हाट्सग्रुप की दीपिका एडमिन थीं और अपने दो नंबरों का इस्तेमाल कर रही थीं। शनिवार (सितंबर 26, 2020) को इस संबंध में उनसे और करिश्मा से पूछताछ की गई थी। इस दौरान दोनों ने चैट की बात कबूली थी, लेकिन ड्रग्स का सेवन करने से इनकार कर दिया था।

दिलचस्प यह है कि इसी तरह के जवाब रकुल प्रीत सिंह, सारा अली खान और श्रद्धा कपूर ने भी दिए थे। एनसीबी सूत्रों ने बताया कि चारों अभिनेत्रियों ने पूछताछ के दौरान दावा किया कि ‘हैश ड्रग नहीं है’। इस तरह से एक ही जैसे जवाब देकर उनलोगों ने खुद को ‘गंभीर परेशानी’ में डाल लिया है। सूत्रों के अनुसार दीपिका, सारा, श्रद्धा और रकुल को ये पता है कि वो कठिन परिस्थितियों में फँस सकते हैं, इसलिए उन्होंने एक ही तरह का बयान दिया। सूत्रों ने कहा कि NCB उन्हें आगे की जाँच के लिए फिर से तलब करेगी। बताया जा रहा है कि एजेंसी ने बहुत सारे ‘अन्य साक्ष्य’ जुटा लिए हैं, जिन्हें अभी तक जारी नहीं किया गया है।

28 अक्टूबर 2017 को हुई ड्रग्स चैट की बातचीत इस प्रकार है:

10:03AM (+91-992——-) D(D मतलब दीपिका माना जा रहा है):K।।तुम्हारे पास माल है?

10:05 AM (+91-961——-) ‘K’: मेरे पास है लेकिन घर पर है। मैं बांद्रा में हूँ। मैं अमित से पूछ सकती हूँ अगर आपको चाहिए।

10:07, दीपिका:हाँ!! प्लीज

10:08, K: अमित के पास है, वो इसे ला रहा है।

10:12, दीपिका: हैश न?

10:12, दीपिका: वीड नहीं।

10:14, K: आप कोको किस समय आ रहे हो?

10:15: दीपिका: 11:30/12:00

10:15: दीपिका: शाल किस समय तक है वहाँ?

K: मुझे लगता है कि उसने 11:30 तक कहा है, क्योंकि उसे 12 बजे कहीं और जाना है

दीपिका, सारा, श्रद्धा और रकुल… सबने NCB को दिए एक जैसे जवाब, बताया- हैश ड्रग नहीं है

नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ने ड्रग्स मामले में शनिवार (सितंबर 26, 2020) को अभिनेत्री दीपिका पादुकोण, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर से पूछताछ की। उससे पहले रकुल प्रीत सिंह से पूछताछ हुई थी। मीडिया रिपोर्टों में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि इस दौरान चारों ने सवालों के एक जैसे ही जवाब दिए।

सुशांत सिंह राजपूत की मौत से जुड़े मामले में एनसीबी ड्रग्स एंगल की पड़ताल कर रही है। रिया चकवर्ती सहित कई को एजेंसी गिरफ्तार कर चुकी है। बॉलीवुड के कई बड़े सितारे एजेंसी की रडार पर हैं।

एनसीबी सूत्रों ने बताया कि चारों अभिनेत्रियों ने पूछताछ के दौरान दावा किया कि ‘हैश ड्रग नहीं है’। इस तरह से एक ही जैसे जवाब देकर उनलोगों ने खुद को ‘गंभीर परेशानी’ में डाल लिया है। सूत्रों के अनुसार दीपिका, सारा, श्रद्धा और रकुल को ये पता है कि वो कठिन परिस्थितियों में फँस सकते हैं, इसलिए उन्होंने एक ही तरह का बयान दिया। सूत्रों ने कहा कि NCB उन्हें आगे की जाँच के लिए फिर से तलब करेगी। बताया जा रहा है कि एजेंसी ने बहुत सारे ‘अन्य साक्ष्य’ जुटा लिए हैं, जिन्हें अभी तक जारी नहीं किया गया है।

वहीं मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इन चारों अभिनेत्रियों से पूछताछ के बाद अब एनसीबी की जाँच में ‘बड़े और अधिक प्रभावशाली’ नामों के जल्द ही बाहर हो जाने की संभावना है। जाँच का आगामी चरण एक महीने तक चलने की संभावना है और इसमें बॉलीवुड के सबसे बड़े नाम शामिल होंगे। बताया जा रहा है कि इसमें सिर्फ बॉलीवुड के ही नहीं, मीडिया से जुड़े लोगों के नाम भी सामने आने की संभावना है।

इसके अलावा रिपब्लिक मीडिया नेटवर्क को सूत्रों ने बताया कि एनसीबी द्वारा पूछताछ के दौरान इन चार अभिनेत्रियों में से दो बॉलीवुड हस्तियों ने दावा किया है कि एजेंसी ‘बॉलीवुड अंग्रेजी’ को नहीं समझती है। इसलिए उन्होंने उनकी बातचीत के लिए इस्तेमाल की जाने वाली आम भाषा को गलत समझा।

क्षितिज ने 3 महीने में एक दर्जन बार खरीदा गांजा

रिया चक्रवर्ती और सुशांत के साथ जुड़े अन्य लोगों को 6 अक्टूबर तक एनसीबी की हिरासत में भेज दिया है और वर्तमान में वे भायखला जेल में बंद हैं। करण जौहर की धर्मा प्रोडक्शन से जुड़े क्षितिज रवि प्रसाद 3 अक्टूबर तक एनसीबी की हिरासत में हैं। एनसीबी के सूत्रों ने बताया कि क्षितिज ने तीन महीने की अवधि में कम से कम एक दर्जन बार ‘गांजा’ खरीदा और हर पेडलर को 50 ग्राम के लिए 3500 रुपए दिए।

इस बीच, मुंबई में एनसीबी डीजी राकेश अस्थाना के आगमन और अधिकारियों समीर वानखेड़े और उप निदेशक केपीएस मल्होत्रा के साथ उनकी मुलाकात ने जाँच को नया आयाम दिया है। चार्जशीट दाखिल करने के लिए छ: महीने का समय दिया गया है।

इसी बीच सूत्रों से पता चला कि NCB के अधिकारी ‘ड्रग डोजियर’ एजेंसी चीफ राकेश अस्थाना को सौंप देंगे। सूत्रों के अनुसार, इस ड्रग डोजियर में ड्रग्स की खरीद में कथित तौर पर ‘शामिल शीर्ष बॉलीवुड सितारों’ की लिस्ट है। बॉलीवुड अभिनेताओं और ड्रग्स पेडलर्स के बीच ‘ड्रग चैट’ की एक विस्तृत रिपोर्ट भी शामिल है।

वहीं KWAN टैलेंट मैनेजर करिश्मा प्रकाश, श्रुति मोदी और डिजाइनर सिमोन खंबट्टा सहित अन्य लोगों के बयान भी शामिल हैं। इसके साथ ही ड्रग डोजियर में KWAN टैलेंट मैनजमेंट एजेंसी के वित्तीय डीलिंग और स्वामित्व के साथ KWAN सदस्यों के बयान और ड्रग पेडलर्स के लिंक के बारे में भी जानकारी है।

गौरतलब है कि बॉलीवुड अभिनेत्री दीपिका पादुकोण ने शनिवार (सितंबर 26, 2020) को नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) की पूछताछ के दौरान अपनी मैनेजर करिश्मा प्रकाश के साथ ड्रग्स को लेकर चैट करने की बात कबूल कर ली थी। जाँच एजेंसी ने दीपिका पादुकोण और करिश्मा प्रकाश को आमने-सामने बैठाकर 2017 में की गई चैट के बारे में पूछताछ की। सूत्रों ने बताया कि इस दौरान अभिनेत्री ने चैट की बात स्वीकार कर ली।

जब दीपिका-करिश्मा को आमने-सामने बिठाकर ड्रग्स चैट को लेकर सवाल पूछा गया तो दोनों ने कहा कि ड्रग्स नहीं लेते हैं। NCB ने पूछा कि फिर चैट में ये वीड/हैश किसके लिए मँगवा रही हैं। इस पर दोनों ने गोल-गोल जवाब दिए थे, जिससे एनसीबी असंतुष्ट थी।

मथुरा: श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति को लेकर दाखिल याचिका पर 30 सितंबर को सुनवाई

मथुरा श्रीकृष्ण जन्मभूमि के मालिकाना हक को लेकर दाखिल याचिका पर सीनियर सिविल जज छाया शर्मा की अदालत ने सुनवाई के लिए 30 सितंबर की तारीख निर्धारित की है। सोमवार (सितंबर 28, 2020) को इस याचिका पर सुनवाई होनी थी, लेकिन याचिकाकर्ता अदालत नहीं पहुँचे, जिसकी वजह से तारीख आगे बढ़ाई गई।

सुप्रीम कोर्ट के वकील हरीशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन और रंजना अग्निहोत्री ने मथुरा कोर्ट में यह याचिका दायर की है। याचिका ‘श्रीकृष्ण विराजमान’ पक्ष की ओर से दाखिल की गई है। इसमें शाही ईदगाह मस्जिद को हटा कर श्रीकृष्ण जन्मभूमि की मथुरा स्थित पूरी भूमि को खाली कराने की माँग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा है कि मुगल शासक औरंगजेब ने अपने शासन के दौरान मथुरा में कृष्ण मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। कटरा केशव देव में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान पर खड़ा मंदिर 1669-70 में ध्वस्त कर दिया गया था। मौजूदा ईदगाह कृष्ण जन्मभूमि स्थान पर बनाई गई थी। याचिकाकर्ताओं ने अदालत से 13.37 एकड़ जमीन का स्वामित्व ‘श्रीकृष्ण विराजमान’ को हस्तांतरित करने की अपील की है।

पाँच दशक पहले, श्रीकृष्ण जन्मस्थान सेवा संस्थान और शाही ईदगाह प्रबंधन समिति ने इस बात पर सहमति जताई थी कि मस्जिद विवादित भूमि पर रहेगी। इस समझौते को अवैध करार देते हुए मस्जिद हटाने की माँग की गई है।

अगस्त में ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि निर्माण न्यास’ का गठन कर इसे मुक्त कराने की दिशा में प्रयास तेज किया गया था। 14 राज्यों से 80 संतों ने साथ आकर इस अभियान के लिए एकता जताई थी, जिनमें 11 वृन्दावन के संत थे। हालाँकि, इस्लामी आक्रांताओं द्वारा किए गए ऐसे अतिक्रमण की राह में ‘प्लेसेज़ ऑफ़ वर्शिप (स्पेशल प्रोविज़न) एक्ट, 1991’ की बाधा है। इसके तहत धार्मिक स्थलों पर यथास्थिति बरक़रार रखी गई है।

जब पीवी नरसिम्हा राव भारत के प्रधानमंत्री थे, तो पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 पारित किया गया था। पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 कानून किसी भी धर्म के पूजा स्थल को एक आस्था से दूसरे धर्म में परिवर्तित करने और किसी स्मारक के धार्मिक आधार पर रख-रखाव पर रोक लगाता है।

सितम्बर के पहले सप्ताह में ही अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी की अध्यक्षता में हुई बैठक में माँग की गई थी कि अयोध्या में श्री राम जन्मभूमि मंदिर निर्माण के लिए भूमिपूजन होने के बाद काशी में बाबा विश्वनाथ और मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के मंदिर को मुक्त कराने की ओर प्रयास किया जाए। काशी-मथुरा को मुक्त कराने के लिए प्रस्ताव पारित करते हुए अखाड़ा परिषद ने इस कार्य में विश्व हिन्दू परिषद का भी सहयोग माँगा गया था।

कहीं देवी-देवताओं की मूर्ति पर हथौड़े से वार, कहीं आग में जलता रथ: आंध्र प्रदेश में मंदिरों पर हुए हालिया हमले

पिछले कुछ समय से लगातार आंध्र प्रदेश में हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएँ सामने आ रही हैं। कहीं मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है, तो कहीं रथों को आग में जलाकर राख किया जा रहा है। हम ऐसे 5 मामले लेकर आए हैं जिनमें आंध्र प्रदेश में हाल में मंदिरों को निशाना बनाया गया है।

चित्तूर में नंदी की मूर्ति तोड़ी

27 सितंबर 2020 यानी कल गंगाधारा नेल्लोर पुलिस स्टेशन को एक शिव मंदिर पर हमले की खबर मिली। यह घटना चित्तूर जिले के गंगाधारा नेल्लोर मंडल में अगारा मंगलम गाँव में घटी। रिपोर्टों के अनुसार, मंदिर में नंदी की मूर्ति को 26 और 27 सितंबर की रात कुछ बदमाशों ने तोड़ा। मूर्ति के टुकड़े पास रखी कुर्सी पर बिखरे हुए पाए गए। इस घटना की शिकायत होने के बाद पुलिस ने फिलहाल मामला दर्ज कर लिया है और यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि हमले के पीछे कौन था।

कृष्णा में काशी विश्वेश्वर स्वामी मंदिर पर हमला

चित्तूर से पहले 16 सितंबर को कुछ बदमाशों ने प्रदेश के कृष्णा जिले के मक्कापेटा गाँव में काशी विश्वेश्वर स्वामी मंदिर पर हमला किया था। रिपोर्टों के अनुसार, इस हमले में हमलावरों ने 12 वीं शताब्दी से मंदिर में स्थापित नंदी की मूर्ति के एक हिस्से को क्षतिग्रस्त कर दिया था। इस घटना के बारे में मंदिर के केयरटेकर को भी 17 सितंबर की सुबह पता चला, वो भी तब जब उन्होंने मंदिर में दर्शन के लिए दरवाजे खोले।

पुलिस ने इस घटना की सूचना पाते ही सीआरपीसी की धारा 427, 457 और 153 (ए) के तहत मामला दर्ज किया था और मामले में जाँच शुरू कर दी थी। इस मंदिर को लेकर मान्यता है कि काकतीय शासकों ने 12 वीं शताब्दी में मंदिर में वीरभद्र स्वामी की मूर्ति स्थापित की थी।

इसी घटना के एक दिन बाद येलश्वरम के एक मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति को तोड़ दिया गया था। वहीं विजयवाड़ा में कनक दुर्गा मंदिर के रथ से उच्च मूल्य की चाँदी की मूर्तियाँ चोरी हो गईं थी। उन मूर्तियों का वजन 3.3 किलोग्राम था।

अंतरवेदी में श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर

6 सितंबर 2020 को अंतरवेदी में श्री लक्ष्मी नरसिम्हा स्वामी मंदिर में एक सदी से भी पुराना रथ जलकर राख हो गया था। इस घटना पर कई लोगों ने संदेह जताया था कि रथ में लगी आग एक साजिश का परिणाम थी। हालाँकि, प्रदेश सरकार ने लोगों की नाराजगी देखने के बाद मंदिर के कार्यकारी अधिकारी (ईओ) को निलंबित कर दिया था। साथ ही नया रथ बनाने के लिए 95 लाख रुपए की मँजूरी दी थी। इस घटना के बाद वहाँ कुछ साम्प्रदायिक हिंसा के भी मामले आए थे। मंदिर से जुड़े लोगों ने आरोप लगाया था कि जब वे विरोध कर रहे थे, तब कुछ बाहरी लोगों ने पथराव किया जिससे तनाव पैदा हुआ।

नेल्लोर में श्री प्रसन्ना वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर का रथ

14 फरवरी 2020 को नेल्लोर में श्री प्रसन्ना वेंकटेश्वर स्वामी मंदिर के रथ को कुछ उपद्रवियों ने देर रात जलाया। मगर, तभी स्थानीय लोगों ने जलते रथ को देख लिया और अधिकारियों को तुरंत बुलाया। हालाँकि, फिर भी आग बुझाते-बुझाते रथ कोयले के टुकड़ों में बदल चुका था। इस मामले को भी शुरू में दुर्घटना बताने का प्रयास हुआ किंतु स्थानीय लोगों ने बात मानने से इनकार कर दिया। मामले के तूल पकड़ने पर जाँच शुरू हुई।

पूर्वी गोदावरी जिले में मूर्तियाँ क्षतिग्रस्त

21 जनवरी 2020 को कुछ उपद्रवियों ने पूर्वी गोदावरी जिले के पीथापुरम शहर में देवी-देवताओं की मूर्तियों और बैनरों को क्षतिग्रस्त कर दिया था। रिपोर्ट्स में बताया गया कि हमलवारों ने हथौड़ों का इस्तेमाल कर भगवान गणेश, हनुमान जी, साईबाबा, दुर्गा माता की मूर्ति को मंदिर में तोड़ा। यह मंदिर अग्रहरम के सुरवरपु सड़क (Suravarapu street ) पर खुले में बना था। इसके साथ हमलावरों ने भगवानों की तस्वीर वाले बैनर को भी नष्ट कर दिया था। पुलिस ने मामले की सूचना पाकर केस को दर्ज किया था और आस-पास के इलाकों से सीसीटीवी फुटेज एकत्र किए थे।

‘अनुराग कश्यप को जेल भेजो’: गिरफ्तारी के लिए मुंबई पुलिस को आठवले ने दिया 7 दिन का अल्टीमेटम

अभिनेत्री पायल घोष ने अनुराग कश्यप पर यौन शोषण का आरोप लगाया था। इस संबंध में आज (28 सितंबर 2020) उन्होंने आरपीआई नेता रामदास आठवले के साथ प्रेस वार्ता की। प्रेस वार्ता में दोनों ने अनुराग कश्यप को गिरफ्तार करने की माँग उठाई। आठवले ने कहा कि पायल घोष ने पुलिस महकमे पर भरोसा करके अनुराग कश्यप के विरुद्ध मामला दर्ज कराया है। इस बात को मद्देनज़र रखते हुए पुलिस की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह पायल को न्याय दिलाए। 

आठवले ने कहा, “मैं पायल घोष से मिला। उन्होंने बताया कि कई साल पहले जब वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनी थीं, तब उनके साथ शोषण की घटना हुई थी। इस मामले में मेरी एक सीनियर पुलिस अधिकारी से भी बात हुई है। मुझे पता चला है कि अभी तक अनुराग कश्यप को नहीं बुलाया गया है। पुलिस कह रही है कि मामले की जाँच चल रही है। हम पुलिस पर विश्वास करते हैं। पायल ने अनुराग कश्यप के विरुद्ध शिकायत दर्ज कराने की हिम्मत की है, तमाम लोग उसका समर्थन कर रहे हैं। अगर अनुराग कश्यप को 7 दिन में गिरफ्तार नहीं किया जाता तो हम धरने पर बैठेंगे।” 

उन्होंने कहा, “सामान्य मामलों में पुलिस जल्द से जल्द कार्रवाई करती है। अनुराग कश्यप मुंबई में हैं फिर भी अभी तक इस मामले में कुछ नहीं हुआ है। पायल घोष असुरक्षित महसूस कर रही हैं। उन्होंने पुलिस से सुरक्षा की माँग की है। मैं खुद सुनिश्चित करूँगा कि पायल को सुरक्षा मिले। इन बातों का एक और मतलब स्पष्ट है कि पायल के साथ कुछ भी गलत होता है तो उसके लिए मुंबई पुलिस जिम्मेदार होगी।” उन्होंने इस संबंध में गृहमंत्री अमित शाह को पत्र लिखने और आवश्यकता पड़ने अपनी पार्टी की तरफ से पायल को सुरक्षा मुहैया कराने की बात भी कही।

दिशा सालियान मामले में आठवले ने कहा, “दिशा सालियान मामले की सीबीआई जाँच होनी चाहिए। पुलिस ने उसकी लाश देखी थी और उसके शरीर पर कपड़े नहीं थे। यानी उसके साथ कुछ न कुछ गलत ज़रूर हुआ। पुलिस इस मामले में लापरवाह रवैया अपना रही है, हमें इस बात पर संदेह है कि सुशांत सिंह और दिशा सालियान का मामला संबंधित है। हम चाहते हैं कि पुलिस इस मामले में सक्रियता से काम करे, जिससे सच सामने आए।”

वहीं पायल घोष ने कहा, “मैंने यौन शोषण की शिकायत कर अपना करियर दाँव पर लगाया है। मैं केवल इतना चाहती हूॅं कि जो मेरे साथ हुआ वह किसी और के साथ न हो। इस तरह की बात कहने के लिए हिम्मत चाहिए, मैं सभी से निवेदन करती हूँ कि उन्हें डरने की ज़रूरत नहीं है। सभी को इस मुद्दे पर आगे आकर बोलना होगा तभी ऐसी घटनाएँ रुकेंगी।” अनुराग कश्यप की गिरफ्तारी नहीं होने पर उन्होंने अनशन पर बैठने की बात कही।

अभिनेत्री पायल घोष ने हाल ही में आरोप लगाया था कि फिल्म निर्माता अनुराग कश्यप द्वारा उनका यौन उत्पीड़न किया गया था। उन्होंने बताया था कि अनुराग कश्यप ने उन्हें सहज करने के लिए उनसे कहा था कि इंडस्ट्री में फिल्म निर्माताओं और अभिनेत्रियों के बीच शारीरिक संबंध आम बात है। पायल घोष ने आगे कहा कि ऐसा आदमी अब महिलाओं की स्वतंत्रता के लिए बोल रहा है, वह एक ‘f***ing hypocrite’ है। इसके बाद पायल घोष ने मशहूर निर्देशक अनुराग कश्यप पर यौन शोषण मामले में एफआईआर दर्ज करवाई थी। 

गायत्री मंत्र जपते थे भगत सिंह, आर्य समाजी था परिवार, सावरकर के थे प्रशंसक: स्वीकार करेंगे आज के वामपंथी?

अमर क्रांतिकारी भगत सिंह को वामपंथी अक्सर अपने गुट का दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं। उन्हें ऐसे चित्रित किया जाता है, जैसे वो वामपंथ के अनुयायी रहे हों और वो वही वामपंथ है, जो आज जेएनयू में कुछ ‘छात्रों’ द्वारा और देश के कई हिस्सों में नक्सलियों द्वारा फॉलो किया जाता है। देश के लिए बलिदान देने वाले एक राष्ट्रवादी को इस तरह से एक संकीर्ण विचारधारा के भीतर बाँधना वामपंथियों की एक चाल है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भगत सिंह को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि वो न सिर्फ टीम वर्क और साहस के सबसे सटीक प्रतीक हैं, बल्कि वो विद्वान और चिंतक भी थे। जैसा कि हम जानते हैं, भगत सिंह मात्र 23 वर्ष की उम्र में भारत माता के लिए शूली पर चढ़ गए थे। इतने कम उम्र में क्रांतिकारी, विद्वान और चिंतक होने का अर्थ है कि उन्होंने काफी कम समय में देश-दुनिया की कई विचारधाराओं को पढ़ा और कई क्रांतिकारियों का अध्ययन किया।

भगत सिंह के नास्तिक होने की बात को ऐसे प्रचारित किया जाता है, जैसे वे हिन्दू धर्म से और देवी-देवताओं से घृणा करते हों। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। वामपंथी स्वतंत्रता सेनानियों में भी विचाधारा के हिसाब से बँटवारा करते हैं। वीर सावरकर उनके लिए मजाक का विषय हैं और उन्हें ‘माफ़ी माँगने वाला’ बताया जाता है। यहाँ हम इस प्रपंच पर बात करेंगे, लेकिन उससे पहले कुछेक घटनाओं को देखते हैं।

शुरुआत उसी संगठन के मैनिफेस्टो से क्यों न करें, जिसके भगत सिंह अहम सदस्य थे? हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के मैनिफेस्टो में ही लिखा हुआ था कि वे भारत के समृद्ध इतिहास के महान ऋषियों के नक्शेकदम पर चलेंगे। इसमें कहा गया था कि कमजोर, डरपोक और शक्तिहीन व्यक्ति न तो अपने लिए और न ही देश के लिए कुछ कर सकता है। क्या वामपंथी इस संगठन को भी गाली देंगे, जिसके तहत भगत सिंह काम करते थे?

वीर सावरकर से काफी प्रभावित थे भगत सिंह

अंग्रेजों ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम को ‘सिपाही विद्रोह’ साबित करने की भरसक कोशिश की, लेकिन वीर सावरकर ने ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ नामक पुस्तक के जरिए इस धारणा को तोड़ दिया। इसकी चर्चा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी अक्टूबर 2019 में वाराणसी के एक कार्यक्रम में की थी। क्या आपको पता है कि इस पुस्तक का एक संस्करण भगत सिंह के क्रन्तिकारी दल ने भी प्रकाशित किया था?

उनके सहयोगी राजाराम शास्त्री ने कहा था कि वीर सावरकर की इस पुस्तक ने भगत सिंह को काफी प्रभावित किया था। उन्होंने राजाराम शास्त्री को भी ये पुस्तक पढ़ने के लिए दी और फिर प्रकाशन के लिए योजना बनाई। उन्होंने ही प्रेस का प्रबंध किया और रात को प्रूफ रीडिंग के लिए शास्त्री के पास वो पन्ने भेजते और सुबह ले जाते। सुखदेव ने भी इस काम में बखूबी साथ दिया था। राजर्षि टंडन ने इसकी पहली प्रति खरीदी।

यहाँ तक कि 1929-30 में भगत सिंह और उनके साथियों की गिरफ़्तारी के समय भी अंग्रेजों को उनके पास से वीर सावरकर की पुस्तक की काफी प्रतियाँ मिलीं। लेकिन, आज के वामपंथी भगत सिंह को तो गले लगाते हैं, लेकिन वीर सावरकर के बारे में क्या सोचते हैं, ये किसी से छिपा नहीं है। जब भाजपा ने महाराष्ट्र चुनाव से पहले उन्हें भारत रत्न देने का वादा किया तो सीपीआई इसका विरोध करने वाली पहली पार्टी थी।

सीपीआई ने कहा था कि एक मिथक बना दिया गया है कि सावरकर एक महान स्वतंत्रता सेनानी थे और राष्ट्रवादी थे। पार्टी ने आरोप लगाया था कि एक साजिश के तहत सावरकर जैसे ‘सांप्रदायिक व्यक्ति’ को आइकॉन बनाया जा रहा है। उन्हें ‘डरपोक’ लिखा गया। कॉन्ग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने जब सावरकर के योगदानों पर चर्चा की तो सीपीआई ने उन पर भी निशाना साधा। अब जब यही वामपंथी भगत सिंह को गले लगाने का नाटक करें तो इसे क्या कहा जाए?

अर्थात, वामपंथी कहते हैं कि सावरकर ‘सांप्रदायिक हिंदुत्ववादी’ हैं, लेकिन भगत सिंह ने वीर सावरकर की पुस्तकों को न सिर्फ छपवाया बल्कि वो इससे काफी प्रभावित भी थे- इस पर वो कन्नी काट जाते हैं। ड्रामेबाज वामपंथियों का ये दोहरा रवैया बताता है कि भगत सिंह को ‘टुकड़े-टुकड़े’ गैंग का हिस्सा बताने के लिए वो पागल हो रहे हैं। जिनकी श्रद्धा भारत से ज्यादा चीन के लिए है, वो देश के बलिदानियों पर भला क्यों गर्व करें?

लाला लाजपत राय के बारे में क्या सोचते हैं वामपंथी?

भगत सिंह ने ब्रिटिश एएसपी जॉन सॉन्डर्स का वध क्यों किया था? भारत की राजनीतिक स्थिति की समीक्षा के लिए लंदन से साइमन कमीशन को भेजा गया। भारत में ‘पंजाब केसरी’ लाला लाजपत राय ने इसका प्रचंड विरोध किया। लाहौर में इसके विरोध के दौरान उन्हें लाठी लगी। इसके कुछ ही दिनों बाद उनकी मृत्यु हो गई। इसने भगत सिंह सहित ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ के सभी क्रांतिकारियों को आक्रोशित कर दिया।

लाला लाजपत राय की मृत्यु का बदला लेने के लिए ही भगत सिंह और उनके साथियों ने अपनी जान को दाँव पर लगाया था। लाला लाजपत राय की मृत्यु के ठीक 1 महीने बाद भगत सिंह ने अपना बदला पूरा किया और आर्य समाज के नेता रहे लालाजी को अपनी तरफ से श्रद्धांजलि दी। दिवंगत पत्रकार कुलदीप नैयर ने अपनी पुस्तक ‘शहीद भगत सिंह- क्रांति में एक प्रयोग’ में लिखा है कि भगत सिंह, लाला लाजपत राय के समर्पण और देशसेवा के सामने अपना सिर झुकाते थे।

उन्होंने लिखा है कि कैसे जब भगत सिंह ने उस प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय को अंग्रेजों की लाठी खा कर जमीन पर गिरता हुआ देखा तो उनके अंदर जालियाँवाला बाग़ नरसंहार के बाद जो गुस्सा भर गया था वो और धधक उठा। उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ कि गोरे एक भलेमानुष के साथ ऐसा व्यवहार कर सकते हैं। उनकी मृत्यु के बाद इन क्रांतिकारियों की जो बैठक हुई, उसमें ऐसा गम का माहौल था जैसे उनके घर के किसी बुजुर्ग की हत्या कर दी गई हो।

अब वापस उन वामपंथियों पर आते हैं, जो भगत सिंह को तो अपना मानने का नाटक करते हैं, लेकिन उन्होंने किसके लिए बलिदान दिया- इससे वो अनजान बन कर रहना चाहते हैं और लोगों को भी अनजान रखना चाहते हैं। लेकिन, वो लोग लाला लाजपत राय के बारे में क्या सोचते हैं, जरा वो देखिए। इतिहासकार विपिन चंद्रा ने अपनी पुस्तक ‘India’s Struggle for Independence, 1857-1947‘ में उन्हें लिबरल और मॉडरेट कम्युनिस्ट साबित करने का प्रयास किया है।

लाला लाजपत राय एक राष्ट्रवादी थे और हिंदुत्व को लेकर उनकी श्रद्धा अगाध थी। वो आर्य समाजी थे। भारत में हिंदुत्व भावना को पुनर्जीवित कर लोगों में अपने प्राचीन इतिहास के प्रति गौरव जगाने वालों में तिलक और लाला लाजपत राय का नाम आता है। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और छत्रपति शिवाजी का चरित्र लिखा। लाला लाजपत राय वेदों को हिन्दू धर्म की रीढ़ मानते थे। वो कहते थे कि विश्व के सभी धर्मों में हिन्दू धर्म सबसे ज्यादा सहिष्णु है।

जबकि आज के वामपंथी असहिष्णुता की ढपली बजाते हैं। भगत सिंह के गुरु लाला लाजपत राय जिस हिन्दू धर्म को विश्व को सबसे ज्यादा सहिष्णु बताते थे, वामपंथी उसे गाली देते हैं। जिन वेदों को भी हिंदू धर्म की रीढ़ मानते थे, उन्हें वामपंथी ब्राह्मणों का ‘प्रोपेगेंडा’ कहते हैं। जब गुरु के लिए वामपंथियों के मन में कोई सम्मान नहीं है तो उसके शिष्य के लिए कैसे हो सकता है? क्यों न इसे ड्रामा माना जाए?

जनेऊधारी आजाद और भगत सिंह

महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की तस्वीरों में आपने उन्हें नंगे बदन मूँछों पर ताव देते हुए और जनेऊ व धोती पहने हुए देखा होगा। वो ब्राह्मण थे। वो वाराणसी में संस्कृत के छात्र थे और उन्होंने इस भाषा के ज्ञान के कारण हिन्दू ग्रंथों का भी अध्ययन किया। भगत सिंह का उनके साथ अच्छा सम्बन्ध था। देश के लिए दोनों ने साथ मिल कर काम भी किया। लेकिन कभी भगत सिंह को इससे दिक्कत नहीं हुई।

वहीं आज के वामपंथी जनेऊ के बारे में क्या सोचते हैं? आज यही वामपंथी यज्ञोपवीत को अत्याचार का प्रतीक मानते हैं। वो कहते हैं कि ये ब्राह्मणों के खुद को श्रेष्ठ दिखाने की निशानी है। क्या भगत सिंह ने कभी चंद्रशेखर आजाद से ऐसा कहा होगा? बिलकुल नहीं। फिर किस मुँह से ये वामपंथी खुद की विचारधारा के भीतर भगत सिंह को बाँधने की कोशिश करते हैं? वीर सावरकर, लाला लाजपत राय और चंद्रशेखर आजाद के विचारों का ये सम्मान क्यों नहीं करते?

जबकि इन तीनों के प्रति ही भगत सिंह की अपार श्रद्धा थी। भगत सिंह के पार्थिव शरीर को जलाने की अंग्रेजों ने कोशिश की थी, गुपचुप तरीके थे। लेकिन, बाद में परिवार ने पूरे वैदिक तौर-तरीके से रावी नदी के किनारे उनके शरीर को मुखाग्नि दी। क्या ये वामपंथी भगत सिंह के परिवार को भी कोसेंगे? उनका परिवार को स्वामी दयानन्द सरस्वती के आर्य समाज आंदोलन से काफी ज्यादा प्रभावित था।

आज वाले वामपंथी नहीं थे भगत सिंह, उनके कुछ सवाल थे

भगत सिंह के दादा सरदार अर्जुन सिंह ने दयानन्द सरस्वती को सुना था और वो उनसे खासे प्रभावित थे। वो माँस-शराब का सेवन नहीं करते थे, संध्या वंदन करते थे और यज्ञोपवीत धारण करते थे। उन्होंने एक पुस्तक लिख कर दिखाया कि कैसे सिख गुरु भी वेदों की शिक्षाओं को मानते थे। ‘ईश्वर की उपस्थिति’ और भारत के बड़े-बड़े संतों ने चर्चा की है और इसका मतलब ये नहीं हो जाता कि वे सारे वामपंथी हैं।

भगत सिंह का वामपंथ टुकड़े-टुकड़े वाला नहीं था। 1962 के युद्ध में चीन का समर्थन करने वाले और हालिया भारत-चीन तनाव के दौरान चीन की निंदा तो दूर, अपनी ही सरकार के स्टैंड का विरोध करने वाले वामपंथियों को समझना चाहिए कि भगत सिंह ने ईश्वर के अस्तित्व पर चिंतन किया था और अपने अध्ययन और विचारों के हिसाब से लेख लिखे, जिनके आधार पर उन्हें वामपंथी ठहराना सही नहीं है।

भगत सिंह ने कभी ऐसा नहीं लिखा कि वो हिन्दू धर्म को नहीं मानते या फिर वो हिन्दू देवी-देवताओं से घृणा करते हैं। उनके पास बस कुछ सवाल थे, जो उनके लेख ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ में सामने आता है। उनके विचार था कि फाँसी के बाद उनकी ज़िंदगी जब समाप्त होगी, उसके बाद कुछ नहीं है। वो पूर्ण विराम होगा। वे पुनर्जन्म को नहीं मानते थे। वो प्राचीन काल में ईश्वर पर सवाल उठाने वाले चार्वाक की भी चर्चा करते थे। उन्होंने लिखा है:

“मेरे बाबा, जिनके प्रभाव में मैं बड़ा हुआ, एक रूढ़िवादी आर्य समाजी हैं। एक आर्य समाजी और कुछ भी हो, नास्तिक नहीं होता। अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने के बाद मैंने डीएवी स्कूल, लाहौर में प्रवेश लिया और पूरे एक साल उसके छात्रावास में रहा। वहाँ सुबह और शाम की प्रार्थना के अतिरिक्त मैं घण्टों गायत्री मंत्र जपा करता था। उन दिनों मैं पूरा भक्त था। बाद में मैंने अपने पिता के साथ रहना शुरू किया। जहाँ तक धार्मिक रूढ़िवादिता का प्रश्न है, वह एक उदारवादी व्यक्ति हैं। उन्हीं की शिक्षा से मुझे स्वतन्त्रता के ध्येय के लिए अपने जीवन को समर्पित करने की प्रेरणा मिली। किन्तु वे नास्तिक नहीं हैं। उनका ईश्वर में दृढ़ विश्वास है। वे मुझे प्रतिदिन पूजा-प्रार्थना के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। इस प्रकार से मेरा पालन-पोषण हुआ।”

ऊपर की पंक्तियों को देख कर और भगत सिंह के इस लेख को पढ़ कर स्पष्ट होता है कि कुछ रूढ़िवादी चीजें थीं, जिनसे उन्हें दिक्कतें थीं। वो ये मानने को तैयार नहीं थे कि मनुष्य अपने पुनर्जन्म के पापों की सज़ा इस जन्म में भोग रहा है। उनके सवाल थे कि राजा के विरुद्ध जाना हर धर्म में पाप क्यों है? उनके सारे धर्मों के बारे में एक ही विचार थे। वे दो समुदाय के लोगों के बीच धर्म को लेकर होने वाले तनाव के खिलाफ थे।

आज का वामपंथ, आज के वामपंथी, और भगत सिंह

स्वतंत्रता सेनानियों में सिर्फ बाल गंगाधर तिलक और लाला लाजपत राय ही नहीं थे, जो हिन्दू धर्म के पुनरुत्थान में विश्व रखते हुए धर्म और राष्ट्र को एक साथ देखते थे, बल्कि क्रांतिकारियों में भी कई ऐसे थे जो कर्मकांड करते थे, प्रखर हिंदूवादी थे। ‘बिस्मिल’ खुद आर्यसमाजी थे। बटुकेश्वर दत्त पूजन-वंदन किया करते थे। पंडित मदन मोहन मालवीय हिन्दू धर्म की शिक्षा को महत्ता देते थे। इन सबके बारे में भगत सिंह के क्या ख्याल हैं?

असल में आज का वामपंथ देश को खंडित करने वाला, चिकेन्स नेक को काट कर चीन को भारत पर हमला करने का मौके देने वाला और ‘नरेंद्र मोदी भ@वा है’ का नारा लगाने वाला है। जबकि भगत सिंह की विचारधारा क्रांति की थी। वो रूस के क्रांतिकारियों से इसीलिए प्रभावित थे, क्योंकि उन्हें उनलोगों से क्रान्ति के तौर-तरीकों की सीख मिलती थी। वो उन्हें अध्ययन कर के भारत के परिप्रेक्ष्य में आजमाने के तरीके ढूँढ़ते थे।

आज वामपंथियों में इतनी हिम्मत नहीं है कि वे अपने देश की सेना का सम्मान कर सकें, तो फिर वो देश के लिए बलिदान देने वाले को अपनी विचारधारा का व्यक्ति कैसे बता सकते हैं? अरुंधति रॉय जैसे लोग तो विदेश में जाकर भारतीय सेना को अपने ही लोगों पर ‘अत्याचार करने वाला’ बताते हैं, क्या भगत सिंह किसी भी कीमत पर इस चीज को बर्दाश्त करते? देश के खिलाफ बोलने वालों के लिए क्रांति सिर्फ अपने ही देश के लोगों को मारना है।

आज नक्सली झारखण्ड से लेकर महाराष्ट्र तक सरकारी कर्मचारियों को मारते हैं, अपने ही देश के लोगों का खून बहाते हैं और संविधान को नहीं मानते हैं। क्या भगत सिंह को अपना बनाने का नाटक करने वाले वामपंथी वामपंथ के इस हिस्से की निंदा करने का भी साहस जुटा पाते हैं? नहीं। आज का वामपंथ चीनपरस्ती का वामपंथ है, जो अपने ही देश के इतिहास और संस्कृति से घृणा करता है, भगत सिंह का नाम भी लेने का इन्हें कोई अधिकार नहीं।

और हाँ, यज्ञोपवीत को ब्राह्मणों का आडम्बर और अत्याचार का प्रतीक बताने वाले वामपंथियों को ये बात भी पसंद नहीं आएगी कि भगत सिंह का भी यज्ञोपवीत संस्कार हुआ था। एक पत्र में उन्होंने अपने पिता को याद दिलाया है कि वे जब बहुत छोटे थे, तभी बापू जी (दादाजी) ने उनके जनेऊ संस्कार के समय ऐलान किया था कि उन्हें वतन की सेवा के लिए वक़्फ़ (दान) कर दिया गया है।

आज के वामपंथी ये जान कर अच्छा महसूस नहीं करेंगे कि भगत सिंह ने देशसेवा का जो वचन निभाया, वो उनके यज्ञोपवीत संस्कार से उनके ही पूर्वजों ने दिया था। वामपंथ ने नहीं। किसी एक बलिदानी स्वतंत्रता सेनानी का नाम अपने निहित स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करना कर उसके प्रेरकों को गाली देना, ये भगत सिंह का अपमान नहीं तो और क्या है? अखंड भारत के लिए लड़ने वाला ‘टुकड़े-टुकड़े’ के नारे लगाने वालों का आइडल कैसे हो सकता है?

हरामखोर का मतलब नॉटी है तो फिर नॉटी का मतलब क्या है? संजय राउत से बॉम्बे HC ने पूछा

महाराष्ट्र सरकार और बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत के बीच बढ़े विवाद पर आज (सितंबर 28, 2020) बॉम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। कोर्ट ने इसी बीच संजय राउत से उनकी विवादित टिप्पणी पर जवाब माँगा और पूछा कि शिवसेना नेता ने ‘हरामखोर’ शब्द किसके लिए कहा था।

इससे पहले कोर्ट की ओर से इस टिप्पणी के ऊपर सबूत पेश करने को कहा गया था। इस पर कंगना के वकील ने अदालत में संजय राउत की रिकॉर्डिंग चलाई, जिस पर संजय राउत के वकील ने कहा कि उनके क्लायंट ने किसी का नाम नहीं लिया है। इसके बाद कोर्ट ने उनके इस बयान को रिकॉर्ड करने के बारे में पूछा। मगर, राउत की ओर से कल इस पर एफिडेविट फाइल करने की बात कही गई।

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए चल रही सुनवाई में बेंच ने कंगना को हरामखोर कहे जाने पर संजय राउत के भाषाई ज्ञान पर सवाल उठाया। कंगना के वकील ने जब कहा कि संजय राउत ने इंटरव्यू में हरामखोर का मतलब नॉटी बताया था, तो जस्टिस कथावाला ने कहा, “हमारे पास भी डिक्शनरी है, अगर इसका मतलब नॉटी है तो फिर नॉटी का मतलब क्या है।”

कंगना के वकील बिरेंद्र सराफ ने सुनवाई में कहा कि पूरे मामले में कंगना के साथ जो हुआ, वह गलत है। कंगना के वकील ने कहा कि इससे उनकी क्लायंट को 2 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ है। उन्होंने कोर्ट से किसी को भेजकर नुकसान का जायजा लेने का आग्रह भी किया।

इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा, “मुझे संजय राउत की और बीएमसी के अफसर दी याचिका को देखने का मौका ही नहीं मिला तो कृपया मुझे उसका जवाब बाद में देने की अनुमति दी जाए।” उनकी बात को सुनने के बाद जस्टिस कथावाला ने बताया कि बीएमसी की फाइल्स अभी तक आई ही नहीं है।

गौरतलब है कि इससे पहले कोर्ट ने कंगना रनौत के वकील को बीएमसी की कार्रवाई से जुड़ी फाइल और संजय राउत के दोनों इंटरव्यू के क्लिप लाने को कहा था। वहीं, बीएमसी के वकील ने कहा था, “कंगना कहती हैं कि यह सब उनके 5 सितंबर वाले ट्वीट की वजह से हुआ तो वह ट्वीट क्या था, कोर्ट के सामने पेश किया जाए ताकि टाइमिंग का पता लग सके।”

इस पर कोर्ट को कंगना की ओर से कहा गया था कि उनकी ओर से 30 अगस्त से अब तक के सभी ट्वीट पेश कर दिए गए हैं। बाकी वह संजय राउत का पूरा इंटरव्यू नहीं ढूँढ पाए हैं। सिर्फ एक क्लिप ही है, जो पब्लिक डोमेन में उपलब्ध है। वह पूरा विडियो ट्रेस करने के प्रयास कर रहे हैं।

आजमगढ़ में ठेले पर सब्जी बेच रहे हैं ‘बालिका वधू’ के डायरेक्टर, कहा- संतुष्ट हूँ, यही काम सबसे बेहतर लगा

कोरोना वायरस महामारी ने कई व्यक्तियों के जीवन को बदल दिया है। ऐसा ही एक मामला टीवी सीरियल ‘बालिका वधू’ के निर्देशक का है। निर्देशक रामवृक्ष गौड़ अपने गृहनगर उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में इन दिनों सब्जी बेच रहे हैं।

मीडिया से बात करते हुए, उन्होंने कहा कि वह एक फिल्म के लिए जिले में आए थे। महामारी से पहले वह एक भोजपुरी फिल्म और फिर हिंदी सिनेमा में काम करने वाले थे, मगर कोरोना वायरस महामारी के मद्देनजर लगाए गए लॉकडाउन के बाद उनके लिए मुंबई लौटना संभव नहीं हो सका। उन्होंने कहा, “जिस प्रोजेक्ट पर हम काम कर रहे थे वह बंद हो गया और प्रोड्यूसर ने कहा कि काम पर वापस आने में एक साल या उससे अधिक समय लगेगा।”

इसके बाद उन्होंने अपने पिता के ठेले पर सब्जी बेचने का कारोबार करना शुरू कर दिया। वो कहते हैं, “मैं इस कारोबार से भलीभाँति परिचित हूँ और मुझे इसका कोई पछतावा नहीं है।” बचपन में भी वे अपने पिता के साथ सब्जी के कारोबार में मदद करते थे, इसलिए यह काम उन्हें सबसे बेहतर लगा, वे अपने काम से संतुष्ट हैं।

आगे उन्होंने उम्मीद जताते हुए कहा कि वह एक दिन वापस मुंबई जरूर लौटेंगे। उन्होंने कहा, “मेरा मुंबई में अपना घर है और मुझे पूरा विश्वास है कि मैं एक दिन लौटूँगा। तब तक मैं यहाँ वही कर रहा हूँ जो मैं कर सकता हूँ।”

आजमगढ़ जिले के निजामाबाद कस्बे के फरहाबाद निवासी रामवृक्ष 2002 में अपने मित्र साहित्यकार शाहनवाज खान की मदद से मुंबई पहुँचे थे। इन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में खुद को स्थापित करने के लिए काफी मेहनत की। पहले लाइट विभाग में काम किया, इसके बाद टीवी प्रोडक्शन में किस्मत आजमाया।

उन्होंने बताया, “मैंने पहले लाइट डिपार्टमेंट में और फिर टीवी धारावाहिकों के प्रोडक्शन डिपार्टमेंट में काम किया। मैं पहले कई धारावाहिकों के प्रोडक्शन में असिसटेंट डायरेक्टर बना, फिर बालिका वधू के लिए एपिसोड डायरेक्टर और यूनिट डायरेक्टर के रूप में काम किया।”

बताया जा रहा है कि रामवृक्ष गौड़ ने रणदीप हुड्डा, सुनील शेट्टी, यशपाल शर्मा और राजपाल यादव जैसे अभिनेताओं की कई फिल्मों में सहायक निर्देशक के रूप में भी काम किया है।

कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री ने आग लगाने का किया बचाव, कहा – ‘हमारे पास ट्रैक्टर है, हम उसे आग लगाना चाहते हैं तो क्या परेशानी है’

आज ही (28 सितंबर 2020) लगभग कुछ घंटे पहले पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस के कई कार्यकर्ताओं ने कृषि सुधार बिल को लेकर विरोध प्रदर्शन किया। राजधानी दिल्ली में हुए इस प्रदर्शन के दौरान इंडिया गेट के पास ट्रैक्टर भी जलाए गए।

इस घटना पर पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इस हरकत का बचाव करते हुए बयान दिया कि अगर कोई अपना ट्रैक्टर जला रहा है तो इसमें क्या परेशानी है? पंजाब CM अमरिंदर सिंह ने बयान देते हुए कहा, “अगर मेरे पास ट्रैक्टर है और मैं उसे आग के हवाले कर दे रहा हूँ। इस बात से कोई दूसरा या तीसरा व्यक्ति क्यों परेशान हो रहा है।”

उन्होंने मोदी सरकार द्वारा लाए गए कृषि सुधार विधेयक का शुरुआत से ही विरोध किया था। इसके बाद उन्होंने कहा कि ज़रूरत पड़ी तो राज्य सरकार इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगी। 

यह भी उल्लेखनीय है कि मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह संसद सत्र के दौरान तीनों कृषि विधेयकों के विरोध में धरने-प्रदर्शन पर भी बैठे थे। जब से मोदी सरकार ने इन तीनों विधयकों में संसद के दोनों सदनों से पारित करवाया है और राष्ट्रपति ने इस पर मोहर लगाई है, तब से कॉन्ग्रेस लगातार इस मामले में झूठी और भ्रामक ख़बरें फैला रही है। 

आज ही विरोध प्रदर्शन के नाम पर दिल्ली के इंडिया गेट पहुँचे पंजाब यूथ कॉन्ग्रेस के नेताओं ने एक ट्रैक्टर पलटा और आग के हवाले कर दिया था। इन नेताओं ने उस छोटे ट्रैक्टर को एक ट्रक में डाल कर लाया था, जिसके बाद उसे सड़क पर डाल कर उसमें आग जला दी गई। साथ ही कॉन्ग्रेस कार्यकर्त्ता जलते हुए ट्रैक्टर के पास ‘भगत सिंह अमर रहें’ के नारे भी लगा रहे थे। 

पीली पगड़ी व दुपट्टे के साथ पहुँचे कॉन्ग्रेस नेताओं ने विरोध प्रदर्शन के दौरान भगत सिंह की तस्वीरें भी लहराईं। जैसे ही ट्रैक्टर जलाने की सूचना मिली, पुलिस की एक टीम को घटनास्थल पर रवाना किया गया। साथ ही फायर ब्रिगेड की टीम भी मौके पर पहुँची, जिसने आग को बुझाने में सफलता पाई।

ये घटना राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा तीनों कृषि बिलों को मंजूरी देने के 1 दिन बाद हुई। 18 विपक्षी पार्टियों ने राष्ट्रपति को उन बिलों पर हस्ताक्षर न करने की अपील की थी। मोदी सरकार ने विपक्ष के शोरगुल के बीच सितम्बर 20, 2020 को राज्यसभा में इन्हें पास कराया था। इंडिया गेट पर ट्रैक्टर जलाने के दौरान वहाँ 20 से अधिक कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता मौजूद थे। ये घटना सोमवार (सितम्बर 28, 2020) की सुबह हुई थी।

रमजान में रोजा भी नहीं रख सकते उइगर, जबरन खाना खिलाता है चीन; मजहबी नामों पर भी बैन

चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगरों पर अत्याचार छिपे नहीं हैं। आए दिन उनके साथ बर्बरता की खबरें मीडिया में आती हैं। हाल में इस मामले पर विश्व उइगर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष, डॉल्कन ईसा ने एक वेबिनार में चर्चा की। उन्होंने बताया कि शिनजियांग में उइगरों की आबादी को रमजान में रोजा रखने तक की अनुमति नहीं हैं। इसके लिए उन्हें उन दिनों सामुदायिक रसोई से जबरदस्ती खाना खिलाया जाता है।

डॉल्कन ईसा ने तिरुवनंतपुरम स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी एंड डेवलपमेंट स्टडीज द्वारा आयोजित एक वेबिनार ‘उइगर और चीन द्वारा उनके मानवाधिकारों के उल्लंघन’ पर अपनी बात रखते हुए बताया कि चीन के शिनजियांग प्रांत में उइगर अपने मजहब के हिसाब से अपने बच्चों का नाम भी नहीं रख सकते। वहीं, जो एक्टिविस्ट दूर देश में बैठकर उन पर सवाल उठाते हैं, उनके बारे में वे अपने खुफिया सूत्रों से पता लगा लेते हैं।

उन्होंने कहा कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने उइगरों के मानवाधिकारों को खारिज कर दिया है। सत्ताधारी पार्टी उइगर एक्टिविस्टों का शोषण करती है, चाहे वह दूसरे देशों में ही क्यों न हों। उन कार्यकर्ताओं को खुफिया एजेंसी ट्रैक करती हैं और उनकी आवाज दबाती हैं।

चीन के साथ व्यापार खत्म करने के फैसले का समर्थन करते हुए ईसा कहते हैं, “अगर विश्व ने चीन के सामनों और उनके बिजनेस को ब्लॉक नहीं किया तो लोकतंत्र और मानवाधिकार इतिहास की बातें हो जाएँगी।”

इस बीच वाशिंगटन के रुशन अब्बास और ‘कैम्पेन फॉर उइगर’ के अध्यक्ष ने चीनी सरकार को उइगरों और तिब्बतियों से गुलामी करवाने और उनका नरसंहार करने का आरोपित बताया। उन्होंने इस मुद्दे पर बोलते हुए अपनी बहन व पेशे से डॉक्टर गुलशन अब्बास के बारे में बात की, जिसके अपहरण का इल्जाम कथित तौर पर चीनी सरकार पर था और बाद में उसे चीन के शिविरों में धकेल दिया गया।

अब्बास का कहना है कि यूएस ने पहले ही चीन के ख़िलाफ़ इकोनॉमिक ब्लॉकेड शुरू कर दिया है। साथ ही सत्तारूढ़ चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में अल्पसंख्यक उइगरों पर किए जा रहे नरसंहार और गुलामी के खिलाफ समुदाय विशेष की दुनिया को सक्रिय होने का आह्वान किया।

सेंटर फॉर चाइना एनालिसिस एंड स्ट्रेटजी के अध्यक्ष और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बोर्ड के सदस्य जयदेव रानाडे ने भी इस विषय पर अपनी राय रखी। उन्होंने बताया कि भारत ने चीन के खिलाफ न केवल LAC पर, बल्कि देश में चीनी उत्पादों को प्रतिबंधित करके भी अपना पक्ष रखा है। रानाडे ने इन बातों पर गौर करवाया कि कैसे चीन के साथ व्यापार बंद कर भारत सरकार ने उसको आर्थिक नुकसान पहुँचाया है।

गौरतलब है कि 26 सितंबर को शी जिनपिंग ने शिनजियांग प्रांत में अपने देश की नीति को उचित ठहराया था। साथ ही यह भी कहा था कि वर्तमान नीति को लंबे समय तक चलाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक चीन के शिनजियांग प्रांत के पश्चिमी इलाके में रहने वाले सभी जातीय समूहों का लगातार विकास चल रहा है और चीन की सरकार वहाँ के निवासियों को अपने देश को लेकर ‘सही’ शिक्षा देती रहेगी।

यहाँ बता दें कि उइगरों पर होते अत्याचार के क्रम में पिछले दिनों ऑस्ट्रेलिया के थिंक टैंक ASPI ने दावा किया था कि साल 2017 से लेकर अब तक चीन की सरकार ने शिनजियांग प्रांत में लगभग 16,000 मस्जिदों को नष्ट किया है। इनमें से करीब 8500 मस्जिद पूर्ण रूप से ध्वस्त किए गए हैं, जिनकी जमीनें अभी तक खाली पड़ी हैं। 

थिंक टैंक ने दावा किया था कि प्रांत में करीब 28% मस्जिदों को क्षतिग्रस्त किया गया है या उन्हें किसी और चीज में तब्दील कर दिया गया। वहीं, मजहबी मार्ग, इबादतगाहों और कब्रिस्तानों सहित 30% महत्वपूर्ण इस्लामी स्थलों का शिनजियांग में समूल विनाश किया गया है। अनुमान के मुताबिक साल 2017 के बाद प्रांत में हर तीन मस्जिदों में से एक को ध्वस्त किया गया।