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सुदर्शन ‘UPSC जिहाद’ मामला: ऑपइंडिया, इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट और UpWord ने सुप्रीम कोर्ट में दायर की ‘हस्तक्षेप याचिका’

‘सुदर्शन न्यूज़’ के शो ‘यूपीएससी जिहाद’ के प्रसारण का मसला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। चैनल ने इसके प्रसारण पर लगी रोक हटाने की माँग की है। अब इस मामले में ऑपइंडिया, इंडिक कलेक्टिव ट्रस्ट और अपवर्ड ने ‘इंटरवेंशन एप्लीकेशन’ (हस्तक्षेप याचिका) दायर की है। ‘फ़िरोज़ इक़बाल खान बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ मामले में अनुमति-योग्य फ्री स्पीच को लेकर रिट पेटिशन दायर की गई है।

‘हस्तक्षेप याचिका’ में कहा गया है, “सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचार के लिए जो मुद्दे आए हैं, जाहिर है कि उसके परिणामस्वरूप फ्री स्पीच की पैरवी करने वालों पर प्रकट प्रभाव पड़ेगा। साथ ही ऐसी संस्थाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा, जो जनता के लिए सार्वजनिक कंटेंट्स का प्रसारण करते हैं। इसलिए याचिकाकर्ता की ओर से ये निवेदन है कि इन्हें भी इस मामले में एक पक्ष बनाया जाए। इस प्रक्रिया में एक पक्ष बना कर भाग लेने की अनुमति दी जाए।”

रिट याचिका में अब तक दिए गए आदेशों की बात करते हुए बड़े ही विस्तृत रूप से कई मुद्दों को रखा गया है। अब तक उठाए गए मुद्दों, आए फैसलों और राहत प्रदान करने वाले निर्णयों को ध्यान में रखते हुए इसमें बातें रखी गई हैं। साथ ही इसमें न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार की बात करते हुए सवाल उठाए गए हैं कि क्या प्रशासन की जाँच के दौरान ही कंटेंट्स को प्रसारण के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है या नहीं।

साथ ही एक और महत्वपूर्ण मुद्दा ये उठाया गया है कि आगे स्थानीय प्रशासन या फिर सम्बद्ध अथॉरिटी को इस कंटेंट में कुछ गलत नहीं मिलता है और वो प्रसारण की अनुमति दे देते हैं, तो क्या कोर्ट स्वयं ही प्रशासन का किरदार निभाते हुए इसे प्रतिबंधित कर सकता है? साथ ही इस बात पर भी प्रकाश डाला गया है कि कंटेंट्स को देखने-सुनने का अधिकार जनता को है, क्या इस पर विचार किए बिना ही निर्णय लिया जा सकता है?

साथ ही न्यायिक रूप से ऐसे कंटेंट्स को लेकर भी बात की गई है, जिन्हें ‘हेट स्पीच’ के दायरे में रखा जाए। साथ ही पूछा गया है कि हाल की वस्तुस्थिति को विस्तृत रूप से देखे बिना ‘हेट स्पीच’ के अंदर आने वाली सामग्रियों को लेकर क़ानून बनाया जा सकता है या नहीं। हाल के दिनों में मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा ‘फ्री स्पीच’ के माध्यम से काफी बार बहुत कुछ किया गया है। साथ ही ऑपइंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट भी पेश करने की अनुमति माँगी है।

इस रिपोर्ट का टाइटल है- ‘A Study on Contemporary Standards in Religious Reporting by Mass Media’, जिसमें 100 ऐसी घटनाओं का जिक्र है, जब मुख्यधारा के मीडिया संस्थानों ने विभिन्न घटनाओं को लेकर गलत रिपोर्टिंग की जो उनके पहुँच को देखते हुए पाठकों के मन में संशय पैदा करता है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि कैसे हिन्दुओं के खिलाफ नैरेटिव बनाया जाता है।

साथ ही कैसे मीडिया के एक बड़े वर्ग द्वारा एक मजहब विशेष के दोषियों को बचाने के लिए उनके अपराध को कम कर के दिखाया जाता है या फिर ह्वाइटवॉश कर दिया जाता है। इसलिए, नैतिकता का मापदंड सिर्फ एक किसी घटना को लेकर लागू नहीं की जा सकती, सेलेक्टिव रूप से कार्रवाई नहीं हो सकती। इस रिपोर्ट में हिन्दूफोबिया की कई घटनाओं को उद्धृत किया गया है।

फैक्ट्स के साथ छेड़छाड़ करना, विवरणों को सेलेक्टिव रूप से साझा करना, चित्रों के जरिए नैरेटिव बनाना, फेक न्यूज़ और ओपिनियन बनाना- इन सबके जरिए ये बताने की कोशिश की गई है कि कैसे मुख्यधारा की मीडिया ने ही एक ट्रेंड सेट किया है, जो अब तक चला आ रहा है। इससे कोर्ट को इस मामले में निर्णय लेने में आसानी होगी। दिल्ली दंगे, मुस्लिमों से जबरन ‘जय श्री राम’ कहलवाना और ‘सैफ्रॉन टेरर’ से जुड़े ऐसे लेखों को उद्धृत किया गया है।

रविवार (सितंबर 20, 2020) को ही सुप्रीम कोर्ट में दिए एक हलफनामे में सुदर्शन न्यूज ने कहा था कि चैनल अपने “बिंदास बोल” शो के “यूपीएससी जिहाद” कार्यक्रम के शेष एपिसोड प्रसारित करते हुए कानूनों का कड़ाई से पालन करेगा। चैनल की तरफ से यह भी कहा गया था कि वह सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा निर्धारित प्रोग्राम कोड का पालन करेगा। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चैनल की तरफ से हलफनामा प्रस्तुत किया गया था।

प्रेगनेंसी टेस्ट की तरह कोरोना जाँच: भारत का ₹500 वाला ‘फेलूदा’ 30 मिनट में बताएगा संक्रमण है या नहीं

दिल्ली की टाटा CSIR लैब ने भारत की सबसे सस्ती कोरोना टेस्ट किट विकसित की है। इसका नाम ‘फेलूदा’ रखा गया है। इससे मात्र 30 मिनट के भीतर संक्रमण का पता चल सकेगा। 

CSIR और टाटा ग्रुप ने यह किट डॉ. देबोज्योति चक्रवर्ती और सौविक मैत्री के नेतृत्व में तैयार की है। इस टेस्ट की कीमत मात्र 500 रुपए बताई गई है। इतने कम दाम वाले इस टेस्ट किट के कर्मिशयल इस्तेमाल की अनुमति ड्रग्स कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया ने दे दी है।

कंपनी ने कहा कि यह जाँच सटीक परिणाम देने में पारंपरिक RT-PCR टेस्ट के बराबर है। इसके अलावा यह सस्ता और कम समय में परिणाम देता है। इस प्रणाली का प्रयोग भविष्य में अन्य महामारियों के परीक्षण में भी किया जा सकेगा।

कंपनी ने बताया कि TATA CRISPR (Clustered Regularly Interspaced Short Palindromic Repeats ) टेस्ट CAS9 प्रोटीन का इस्तेमाल करने वाला विश्व का पहला ऐसा टेस्ट है, जो सफलतापूर्वक कोरोना महामारी फैलाने वाले वायरस की पहचान कर लेता है। 

बता दें, इस किट के बारे में जानकारी CSIR के डीजी एस मांडे ने रविवार को दी। उन्होंने बताया कि दिल्ली स्थित CSIR लैब में CRISPR-Cas इम्युनिटी पर शोध किया जा रहा है। मांडे ने बताया कि रिसर्चर्स की टीम इस खास क्षेत्र में पहले से शोध कर रही हैं।

उन्होंने कहा कि CSIR लैब ने ‘फेलूदा’ नाम से पेपर आधारित टेस्टिंग किट विकसित किया है। उन्हें इसके लिए डीजीसीए से औपचारिक स्वीकृति भी मिल चुकी है। मांडे ने बताया कि यह RT-PCR से काफी अलग है और सस्ता भी है।

उनके अलावा स्वास्थ्य मंत्रालय के दावे में इस किट के लिए कहा गया है कि टाटा समूह ने CSIR-IGIB और ICMR के साथ मिलकर ‘मेड इन इंडिया’ उत्पाद विकसित किया है, जो सुरक्षित, विश्वसनीय, सस्ती और सुलभ है।

टाटा मेडिकल एंड डायग्नॉस्टिक लिमिटिड के सीईओ गिरीश कृष्णमूर्ति, ने इस संबंध में कहा, “COVID-19 के लिए Tata CRISPR टेस्ट के लिए स्वीकृति वैश्विक महामारी से लड़ने में देश के प्रयासों को बढ़ावा देगी। Tata CRISPR टेस्ट का व्यावसायीकरण देश में जबरदस्त R&D प्रतिभा को दर्शाता है, जो वैश्विक स्वास्थ्य सेवा और वैज्ञानिक अनुसंधान जगत में भारत के योगदान को बदलने में सहयोग कर सकता है।”

टेस्ट का नाम फेलूदा कहाँ से पड़ा है?

‘फेलूदा’ नाम मशहूर लेखक और फिल्‍म डायरेक्‍टर सत्‍यजीत रे के काल्‍पनिक बंगाली जासूसी उपन्‍यास के एक कैरेक्‍टर फेलू ‘दा’ से प्रेरित है। मगर, तकनीकी रूप से बात करें तो फेलूदा FNCAS9 Editor Linked Uniform Detection Assay का शॉर्टफॉर्म है। यह स्वदेशी सीआरआईएसपीआर जीन-एडिटिंग टेक्नोलॉजी पर आधारित है। यह कोरोनावायरस SARS-CoV2 के जेनेटिक मटेरियल को पहचानता है और उसे ही टारगेट करता है।

कोरोना के पारंपरिक टेस्ट RT-PCR और फेलूदा में अंतर

वैसे तो फेलूदा आरटी-पीसीआर जितना ही सटीक है। मगर आरटी-पीसीआर टेस्ट को ही कोविड-19 के डायग्नोसिस में गोल्ड स्टैंडर्ड समझा जा रहा है। इनमें अंतर यह है कि फेलूदा के नतीजे जल्दी आते हैं। इसमें इस्तेमाल होने वाला डिवाइस सस्ता भी है। CSIR की मानें तो फेलूदा टेस्ट नोवल कोरोनावायरस की पहचान करने में 96% सेंसिटिव और 98% स्पेसिफिक रहा है।

फेलूदा टेस्ट प्रेग्नेंसी स्ट्रिप टेस्ट की तरह है यानी यदि संक्रमण होगा तो स्ट्रिप का कलर बदल जाएगा। इसका इस्तेमाल पैथ लैब में भी किया जा सकता है। डॉ. देबोज्योति चक्रवर्ती के मुताबिक Cas9 प्रोटीन को बारकोड किया गया है ताकि वह मरीज के जेनेटिक मटेरियल में कोरोनावायरस सीक्वेंस का पता लगा सकें।

इसके बाद Cas9-SARS-CoV2 कॉम्प्लेक्स को पेपर स्ट्रिप पर रखा जाता है, जहाँ दो लाइन (एक कंट्रोल, एक टेस्ट) बताती है कि मरीज को कोरोना है या नहीं। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, इसे करवाने में मात्र 500 रुपए का खर्चा आता है। वहीं पारंपरिक परीक्षण में व्यक्ति को 1,500 से 2,000 खर्च करने पड़ते हैं।

बिहार में कुछ अच्छा हो, कोई अच्छा काम करे… और वो मोदी से जुड़ा हो तो ‘चुड़ैल मीडिया’ भला क्यों दिखाए?

जब बड़ी-बड़ी घोषणाएँ हो रही हों तो लोगों का ध्यान किस पर जाता है? पक्षकार लिखने-कहने लगेंगे कि ये तो चुनावों की तैयारी है जी! इस नीति से तो नुकसान ही होता दिखता है जी! जनता को धोखा दिया जा रहा है जी!

मोटे तौर पर ये “प्रतिक्रियावादी” लोग होते हैं। इनका काम होता है किसी भी किस्म के बदलाव का विरोध करना। आसान शब्दों में प्रतिक्रियावादी को आप मिथकों वाली चुड़ैल से समझ सकते हैं। मिथकों की ये चुड़ैल देखने में आकर्षक होती है ताकि अपने शिकार को लुभा सके, लेकिन इसकी एक विशेषता और भी होती है।

कहते हैं कि चुड़ैल के पैर उल्टे होते हैं। यानी ये देखेगी तो आगे की तरफ लेकिन चलेगी उल्टा, पीछे की तरफ। अतीत को पकड़े बैठे रहने की ये जिद, मिथकों की चुड़ैल को तो मुक्ति से दूर रखती ही है, साथ ही उसके चंगुल में फँसे लोगों को भी पीछे ले जाती है।

इसका एक अच्छा नमूना पर्यावरण सम्बन्धी चर्चाओं में दिखेगा। हाल में जब लॉकडाउन हुआ और गाड़ियाँ, फैक्ट्री सभी बंद हो गए तो धुएँ के कम होते ही लोगों को एक अनोखा मंजर दिखा। उनके घर से जो दो सौ किलोमीटर दूर का हिमालय था, वो अचानक नजर आने लगा था। चकित हुए लोगों ने इस पर बात की मगर “प्रतिक्रियावादी”?

वो इस मुद्दे पर कैसे बोलते? अगर वो स्वीकारते कि लॉकडाउन से प्रकृति को, पर्यावरण को कोई फायदा हुआ है, तो फिर तो वो सरकार का समर्थन हो जाता और ऐसा करने वाले गिरोह से लतिया कर निकाल दिए जाते। एक तथ्य ये भी था कि जैसे भीख माँगने वाले गिरोह बच्चों को भूखा रखकर दयनीय दिखाते हैं, ताकि ज्यादा भीख ली जा सके, वैसे ही चंदा तो बुरा हाल दिखाने पर आता! ऐसे में अच्छा हो रहा है, ये दिखाना कहीं से भी फायदे का सौदा नहीं था।

इस लॉकडाउन का असर नदियों पर भी पड़ा होगा। गंगा, जिसे फिर से स्वच्छ करने के लिए लम्बी कवायद चल रही है, उस पर भी कुछ ना कुछ असर तो हुआ ही होगा। फ़िलहाल स्थिति ये है कि 34 स्थलों से संग्रहित गंगा जल की जाँच में उसे जलीय जीवन के अनुरूप पाया गया है लेकिन मल-जल व सीवेज के पानी के कारण गंगा जल पीने या नहाने लायक नहीं है।

पर्यावरण की दृष्टि से गंगा का महत्व एक और कारण से भी बढ़ जाता है। नदी में रहने वाली डॉलफिन, जिसे अक्सर गंगेटिक डॉलफिन, और स्थानीय भाषा में सोइंस आदि नामों से भी जानते हैं, वो बिहार के क्षेत्र में गंगा और उसकी सहायक नदियों (कोसी आदि) में पाई जाती है। पिछले वर्ष (2018-19 में) जब सर्वेक्षण हुआ था तो पूरे देश में 3031 डॉलफिन थीं, जिसमें से करीब आधी (1455) केवल बिहार में हैं।

थोड़े समय पहले सुल्तानगंज-कहलगाँव के 60 किलोमीटर के क्षेत्र को “विक्रमशिला गांगेय डॉलफिन सैंक्चुअरी” घोषित किया जा चुका है। इस काम को और एक कदम आगे ले जाते हुए गंगा के किनारे 57 ऐसे उद्योगों की पहचान की गई है, जो सबसे ज्यादा प्रदूषण फैला रहे हैं। इन जगहों पर लिक्विड डिस्चार्ज ट्रीटमेंट और इफ्लूएंट ट्रीटमेंट प्लांट की स्थापना का काम चल रहा है। जल्दी ही औद्योगिक कचरा इन जगहों से भी सीधा गंगा में जाना बंद हो जाएगा।

सुधार के तौर पर इसे और आगे बढ़ाकर पटना जैसे शहरों से निकलने वाले शहरी कचरे को भी परिशोधित करने का काम किया जा सकता है। प्रधानमंत्री मोदी के बिहार से जुड़ी घोषणाओं में शुरुआत में ही पटना विश्वविद्यालय के 2 एकड़ परिसर में 30.52 करोड़ रुपए की लागत से एशिया का पहला डॉलफिन रिसर्च सेंटर की स्थापना किए जाने की घोषणा आ गई थी।

इस खबर पर सोशल मीडिया में बहसें ना दिखने के दो प्रमुख कारण हो सकते हैं। एक संभावित कारण तो ये है कि डॉलफिन ना तो खुद वोट देती है, ना ही उसके नाम पर वोटों की फसल काटी जा सकती है। ऐसे में आयातित विचारधारा के टुकड़ाखोर गिरोहों को डॉलफिन पर चर्चा करना जरूरी नहीं लगता। फिर इसमें सरकार कुछ कर रही है, ये पर्यावरण में रूचि रखने वाले लोगों को पता चल जाता, जो कि उनके “चंदे” के लिए नुकसानदायक हो सकता था।

दूसरा संभावित कारण उनका क्षेत्रवाद और बिहार से द्वेष हो सकता है। बिहार में कुछ अच्छा हो और तथाकथित बुद्धिपिशाच अनदेखी या विरोध ना करें, ऐसा कैसे होगा? फेंकी गई बोटियों के बदले उन्हें बिहार के बारे में नकारात्मकता फ़ैलाने की आदत है और भारत के डॉलफिन मैन कहलाने वाले पद्मश्री प्रोफेसर रविन्द्र कुमार सिन्हा, बिहार के हैं! बिहार के किसी का नाम, किसी अच्छे काम के लिए ना लेना पड़े, इसलिए भी इस मुद्दे पर चुप्पी साधना जरूरी था।

बाकी चुनावों के बीच पर्यावरण और जीव-जंतुओं सम्बन्धी इस फैसले का स्वागत डॉलफिन भले ना कर पाएँ लेकिन कुछ लोग तो कर ही लेंगे। क्या है कि गरमा-गर्म बहसें हों ना हों, लोग अपने काम की ख़बरें तो ढूँढ ही लेते हैं ना?

8.5% कमीशन आढ़तिया और राज्य सरकार का…ऐसे लूटा जाता है किसान की उपज को, फिर भी घड़ियाली आँसू बहा रहा विपक्ष

संसद में पारित हुए किसानों से सम्बंधित 3 विधेयकों ने कोरोना काल में घरों में सिमटी-सिकुड़ी राजनीति को सड़कों पर ला खड़ा किया है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक, कृषक (सशक्तिकरण और सरंक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं हेतु अनुबंध विधेयक और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक नामक तीनों विधेयकों का जन्म 5 जून, 2020 को अधिनियमों के रूप में हुआ था। तब से लेकर पिछले सप्ताह संसद में लाए जाने तक किसी भी राजनीतिक दल, किसान संगठन अथवा राज्य सरकार द्वारा कहीं कोई विरोध नहीं जताया गया।

तमाम विपक्षी दलों की सरकारों से लेकर पंजाब की कॉन्ग्रेस सरकार और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल अकाली दल (बादल) और जननायक जनता पार्टी जैसे सहयोगी दलों तक; सब-के-सब इन अध्यादेशों/विधेयकों के पक्ष में थे।

निहित स्वार्थ-प्रेरित आढ़तिया लॉबी द्वारा भरमाए और भड़काए गए किसानों के सड़क पर उतर आने के बाद अब अलग-अलग राजनेताओं और राजनीतिक दलों में इन विधेयकों का विरोध करते हुए किसान हितैषी दिखने की होड़ मच गई है।

अकेले पंजाब में 28000 आढ़तिया हैं। उनकी पहुँच और प्रभाव न सिर्फ़ किसानों तक सीमित है, बल्कि राजनीतिक दलों में भी उनकी अच्छी पैठ है। यह आढ़तिया लॉबी द्वारा प्रायोजित और ‘वोट बैंक की राजनीति’ से प्रेरित विरोध है।

इसीलिए महाराष्ट्र के दो बड़े किसान नेताओं राजू शेट्टी (स्वाभिमान पक्ष) और अनिल घनावत (शेतकारी संगठना) ने इन विधेयकों का स्वागत किया है। यहाँ तक कि दो बार लोकसभा सदस्य रहे राजू शेट्टी ने तो इन विधेयकों को ‘किसानों की वित्तीय स्वतंत्रता के लिए उठाया गया पहला कदम’ करार दिया है।

वास्तव में, इन तीनों विधेयकों की सही और पूरी जानकारी किसानों तक पहुँच नहीं पाई है।

यह सरकार की विफलता ही मानी जाएगी कि किसानों की कल्याण-कामना से प्रेरित होकर इतने महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाले बदलाव करते हुए भी केंद्र सरकार ‘वास्तविक लाभार्थियों’ को सही समय पर जरूरी जानकारी देकर जागरूकता पैदा नहीं कर पाई। यदि केंद्र सरकार ने ऐसा किया होता तो आज विपक्षी दलों को अन्नदाता के भविष्य को दाँव पर लगाकर अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने का अवसर न मिलता।

ग्रामीण समाज ख़ासकर किसानों की अशिक्षा और पराश्रितता का लाभ उठाकर यह आग भड़काई गई है। देर-सबेर जब किसानों को वास्तविकता का ज्ञान होगा तो इन दलों का ‘वोट बैंक का गुणा-गणित’ गड़बड़ा जाएगा। वास्तव में, ये विधेयक कृषि-उपज की विक्रय-व्यवस्था को व्यापारियों/आढ़तियों से मुक्त कराने का मार्ग प्रशस्त करेंगे। साथ ही, बाजार के उतार-चढ़ावों से भी किसानों को सुरक्षा-कवच प्रदान करेंगे। 

इन विधेयकों में सबसे ज्यादा और तीखा विरोध कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक को लेकर किया जा रहा है। इस विधेयक के सम्बन्ध में सबसे बड़ी अफ़वाह यह फैलाई जा रही है कि यह किसान की उपज के लिए सरकार द्वारा साल-दर-साल घोषित होने वाली ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था’ की समाप्ति करने वाला है, जबकि वास्तविकता कुछ और ही है। कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक के माध्यम से केंद्र सरकार किसानों को बिचौलियों के चंगुल से मुक्त कराना चाहती है।

उल्लेखनीय है कि कृषि उपज विपणन समिति (सरकार द्वारा अभी तक कृषि उत्पादों के क्रय-विक्रय हेतु अधिकृत मंडी) के नीति-नियंता आढ़तियों को पश्चिमी उत्तर प्रदेश, राजस्थान आदि जगहों पर सामान्य बोलचाल में दलाल कहा जाता है। ये आढ़तिया कमीशन-एजेंट होते हैं।

मंडी में अपनी मोनोपॉली का फायदा उठाकर न सिर्फ़ कृषि उपज की बिक्री पर मोटा कमीशन खाते हैं, बल्कि माप-तोल में भी कटौती, घटतौली आदि गड़बड़ घोटाला करते हैं। किसानों को मोटी ब्याज पर पैसा देते हैं। किसान की बाध्यता होती है कि वह अपनी उपज को उसी आढ़तिया के पास लेकर जाएगा, जिससे ब्याज पर पैसा ले रखा है। दरअसल, यह विधेयक इन बिचौलियों के शिकंजे से अन्नदाता की मुक्ति का मार्ग है।  

यह विधेयक किसानों को उनकी खून-पसीने से कमाई गई फसल का न्यायसंगत और प्रतिस्पर्धी मूल्य दिलाएगा। इससे मंडियों में व्याप्त लाइसेंस-परमिट राज समाप्त होगा और वहाँ व्याप्त भ्रष्टाचार से भी किसान को निजात मिलेगी।

किसान और छोटे-मोटे व्यापारी अपनी उपज को कहीं भी, किसी को भी अच्छे दाम पर बेचने के लिए स्वतंत्र होंगे। बाहर या खुले बाजार में अच्छा मूल्य न मिलने की स्थिति में वे अपनी उपज को पहले की तरह कृषि उपज विपणन समिति में बेचने के लिए भी स्वतंत्र होंगे।

इस विधेयक में पुराने विक्रय प्लेटफ़ॉर्म की समाप्ति की बात न करके एक कमीशनमुक्त और सर्वसुलभ प्लेटफ़ॉर्म मुहैया कराने का प्रस्ताव है। यह ‘एक देश,एक बाज़ार’ की अबाध व्यवस्था है। इस वैकल्पिक व्यवस्था के अस्तित्व में आने से पुरानी शोषणकारी व्यवस्था में भी सुधार की शुरुआत हो जाएगी। 

कुछ राज्य सरकारें परेशान होकर इन विधेयकों का विरोध कर रही हैं, क्योंकि इससे उन्हें राजस्व की हानि होगी। दरअसल, किसान जब अपनी उपज बेचने राज्य सरकार द्वारा संचालित/अधिकृत  कृषि उपज विपणन समिति (सरकारी मंडी) में जाता है तो उसकी उपज की बिक्री में से न सिर्फ आढ़तिया कमीशन खाता है, बल्कि राज्य सरकारें भी कमीशन खाती है। यह उसकी कमाई का बड़ा जरिया है।

उदाहरणस्वरूप, पंजाब जैसे कृषक प्रधान राज्य में किसान से उसके उपज-मूल्य का लगभग 8.5 प्रतिशत कमीशन वसूला जाता है, जिसमें से 3 प्रतिशत बाजार शुल्क, 3 प्रतिशत ग्रामीण विकास शुल्क और 2.5 प्रतिशत ‘आढ़तिया विकास शुल्क’ होता है।

नई व्यवस्था लागू होने से इस 8.5 प्रतिशत कमीशन/शुल्क की सीधी बचत किसान को होगी, जोकि काफी बड़ी रकम होगी। इसके अलावा उपज की मंडी तक ढुलाई में होने वाले खर्च की भी बचत होगी।

सोचने और पूछने की बात यह है कि जब राज्य सरकारों को होने वाली तथाकथित राजस्व की हानि अंततः उत्पादक किसान के हाथ में जा रही है; फिर किसानों की हमदर्द और हितैषी होने का स्वांग भरने वाली सरकारों द्वारा इस विधेयक का विरोध क्यों किया जा रहा है?

विपक्षी दलों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम से किसान का आशंकित होना अस्वाभाविक या अकारण नहीं है। आखिर उन्हें पिछले दशकों में अनेक बार छला गया है। इसीलिए आज उनकी ऐसी दुर्दशा है। इसलिए सरकार को आगे आकर 3-4 बिंदुओं पर पूरी स्पष्टता के साथ युद्ध स्तर पर अपनी बात किसानों के बीच रखनी चाहिए।

एक तो, किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य और सरकारी खरीद व्यवस्था के यथावत जारी रखने के बारे में आश्वस्त करना अनिवार्य है। दूसरे, उन्हें यह भी समझाने की आवश्यकता है कि यह विधेयक पुरानी विक्रय व्यवस्था की समाप्ति न करके उसके बरक्स एक और अधिक सुविधाजनक, किसान हितैषी और बंधनमुक्त व्यवस्था का विकल्प प्रदान करेगा।

उन्हें इन दोनों व्यवस्थाओं में से जब जिसे चाहें, अपनी सुविधानुसार चुनने की स्वतंत्रता होगी। इसके अलावा किसानों की एक बड़ी चिंता किसी विवाद की स्थिति में न्यायालय जाने के विकल्प का प्रावधान न होने को लेकर भी है।

कृषक उपज व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्द्धन और सुविधाकरण) विधेयक में किसान और व्यापारी के पारस्परिक विवाद की स्थिति में एक ‘समझौता मंडल’ के माध्यम से विवाद के निपटान का प्रावधान है। इस प्रकार के समझौता मंडल की शक्ति, वैधता और निष्पक्षता न्यायालय जैसी नहीं हो सकती। अतः समझौता मंडल के निर्णय से असंतुष्ट होने की स्थिति में न्यायालय जाने का विकल्प भी खुला रखना चाहिए।

निश्चय ही, सरकार ने समझौता मंडल का प्रावधान इस विधेयक में इसलिए किया है, क्योंकि न्यायालय की प्रक्रिया बहुत लंबी, जटिल और खर्चीली होती है। किसान का मुकदमेबाजी में फँसना उसके लिए आत्मघाती हो सकता है। 

जो गाँव से और किसानी पृष्ठभूमि से हैं, वे तो जानते ही हैं, उनके अलावा अन्य सचेत और पढ़े-लिखे नागरिक जानते हैं कि भारत में अनेक बार किसानों को फसल विशेष का ज्यादा उत्पादन होने की स्थिति में उसे लगभग मुफ्त में (दो-चार रुपए किलो तक) बेचना पड़ता है या कभी-कभी तो फेंकना तक पड़ता है। आलू, प्याज आदि की फसलों के साथ तो अक्सर ऐसा होता है। इसकी बड़ी वजह उत्पादन और खपत का संतुलन न होना है।

आपूर्ति और माँग का असंतुलन इस प्रकार की पीड़ादायक स्थितियाँ पैदा करता है, जब बच्चे की तरह पाल-पोसकर तैयार की गई फसल किसान को खेत में ही जलानी, गलानी या फेंकनी पड़ती है। किसान के लिए ख़ासकर छोटे किसान के लिए उत्पादन और खपत, आपूर्ति और माँग का आकलन और अनुमान मुश्किल काम है। पेशेवर लोगों के आगे आने से ऐसा करना संभव हो सकेगा।

कृषक (सशक्तिकरण और सरंक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवाओं हेतु अनुबंध विधेयक इसी चिंता से प्रेरित है। इसके माध्यम से किसान बाज़ार के गुणा-गणित से पैदा होने वाली असुरक्षा और अस्थिरता से मुक्ति पा सकेगा। फसल विशेष के ज्यादा उत्पादन की स्थिति में भी अपनी उपज को नगण्य मूल्य पर बेचने या फेंकने की विवशता से वह बच सकेगा।

यह विधेयक किसान को बाजार के उतार-चढ़ाव की असुरक्षा के प्रति कवच प्रदान करेगा। इस विधेयक में प्रावधान है कि व्यापारी, निर्यातक अथवा खाद्य-प्रसंस्करणकर्ता फसल की बुआई के समय ही फसल का मूल्य-निर्धारण करके किसान के साथ अनुबंध कर सकेगा।

‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ कृषि क्षेत्र की ओर युवा उद्यमियों और निजी निवेश को भी आकर्षित करेगी। अनुबंध के समय किसान को जुताई, बुआई, सिंचाई, मढ़ाई, नई तकनीक और उन्नत बीज आदि जरूरतों के लिए अग्रिम राशि भी मिल सकेगी।

इससे न सिर्फ वह आढ़तियों, साहूकारों आदि से मोटी सूद पर कर्ज लेने से बच सकेगा बल्कि बाज़ार पर उसकी प्रत्यक्ष निर्भरता भी कम हो जाएगी। हालाँकि, इस तरह का अनुबंध न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर न करने का प्रावधान भी किया जाना चाहिए। ऐसा प्रावधान करके ही किसान के हितों का समुचित संरक्षण सुनिश्चित किया जा सकेगा और किसान ‘मत्स्य-न्याय’ का शिकार नहीं होगा।  

इन विधेयकों को किसान-विरोधी बताने वाले लोग सबसे बड़े किसान विरोधी और बिचौलियों के हमदर्द हैं। वे किसानों के जीवन में खुशहाली और सम्पदा लाने वाले इन विधेयकों को किसानों के लिए ‘आपदा’ बता रहे हैं। उनका दावा है कि इससे पूरा कृषि उद्योग निजीकरण का शिकार हो जाएगा। विपक्ष के ये दावे भावनात्मक और भ्रमात्मक हैं, और सत्य से कोसों दूर हैं।

उल्लेखनीय है कि किसानों और कृषि क्षेत्र की चिंताजनक दशा को सुधारने के लिए सन् 2006 में स्वामीनाथन समिति द्वारा दी गई रिपोर्ट में भी ऐसे प्रावधानों का उल्लेख है। उस समय और उसके बाद सन् 2014 तक केंद्र में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले यूपीए की गठबंधन सरकार थी। पर उसे न तो तब किसानों की सुधि आई, न स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करना उसकी प्राथमिकता थी।

किसानों की कर्जमाफी जैसी लोक-लुभावन और वोट खरीदू योजना तो उसने लागू की, पर हर साल आत्महत्या करने वाले किसानों की दशा सुधारने हेतु स्थायी बंदोबस्त करने की दिशा में कोई पहलकदमी नहीं की। परिणामस्वरूप, किसान और कृषि-व्यवसाय क्रमशः उजड़ते चले गए।

वर्तमान सरकार द्वारा पारित किए गए तीनों विधेयक किसानों की दशा सुधारने की दिशा में उठाए गए दूरगामी और सुचिंतित कदम हैं। गौरतलब यह भी है कि कॉन्ग्रेस के चुनावी घोषणा-पत्र में भी इस प्रकार के विधेयक बनाने की बात की गई थी।

सन् 1991 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव ने भारतीय अर्थ-व्यवस्था का उदारीकरण किया था। उसका लाभ समाज के अधिकांश तबकों को न्यूनाधिक हुआ था और हो रहा है। ये तीन विधेयक किसान और कृषि-व्यवस्था की पहुँच उदारीकृत और मुक्त अर्थव्यवस्था तक सुनिश्चित करके उसे भी उसके फल चखने का अवसर प्रदान करेंगे।

हालाँकि, किसी भी कानून का घोषित उद्देश्य कितना भी पवित्र और लोकमंगलकारी क्यों न हो, उसका वास्तविक परीक्षण उसके जमीनी कार्यान्वयन के समय ही होता है।

वर्षों से पढ़ा और सुना है कि भारत के किसान और कृषि-व्यवस्था की बदहाली की सबसे बड़ी वजह बिचौलिए हैं। वे किसान की उपज का सही और समुचित मूल्य उस तक नहीं पहुँचने देते। कृषि उपज के वास्तविक मूल्य का बड़ा हिस्सा वे हड़प जाते हैं। इसलिए समय-समय पर इन बिचौलियों को रास्ते से हटाकर किसान को बाज़ार या उपभोक्ता से जोड़ने की माँग उठती रही है।

इन विधेयकों के माध्यम से कृषि-व्यवस्था की सबसे आधारभूत किन्तु सबसे कमजोर कड़ी किसान को मजबूत बनाने और उसकी खून-पसीने की कमाई बिचौलियों के जबड़े से निकाल कर उसकी मुट्ठी तक पहुँचाने की चिंता की गई है। अब तक बनिया/व्यापारियों की पार्टी मानी जाने भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा किसानों के हित में उठाया गया यह कदम निश्चय ही साहसिक और सराहनीय है।

ड्रग्स मामले में श्रद्धा कपूर पर भी NCB की नजर, सारा अली के साथ इसी हफ्ते भेज सकती है समन

सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो (NCB) ड्रग्स एंगल की जाँच कर रही है। एनसीबी अब अभिनेत्री सारा अली खान और श्रद्धा कपूर को समन भेजने की तैयारी कर रही है। दोनों सुशांत के साथ फिल्में कर चुकी हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि सारा और श्रद्धा को एनडीपीएस एक्ट की धारा 67 के तहत इसी हफ्ते समन भेजा जाएगा। इनके साथ सिमोन खंबाटा और रकुलप्रीत का नाम भी आ रहा है। एनसीबी ने श्रुति मोदी और जया शाह को आज नोटिस भेज दिया है

इससे पहले बोटमैन जगदीश दास ने एनसीबी को बताया था कि सुशांत अपने लोनावला फार्म हाउस में आकर पार्टी किया करते थे। उनका दावा था कि एक्टर के लिए वह पार्टी डेस्टिनेशन था। उनकी टीम और बॉलीवुड के दोस्त रिया चक्रवर्ती, सारा अली खान, श्रद्धा कपूर और ड्रग तस्कर जैद विलात्रा भी वहाँ उनके साथ आते थे। बोटमैन का कहना था कि गांजा और शराब ऐसी पार्टियों में दिखना बेहद आम बात थी।

इससे पहले रिया चक्रवर्ती ने भी कथित तौर पर पूछताछ में स्वीकार किया था कि उन्होंने सारा अली खान, श्रद्धा कपूर और रकुलप्रीत सिंह और सुशांत के साथ लोनावला में पार्टी की थी। फिलहाल, रिया चक्रवर्ती भायखला जेल में बंद हैं। इस मामले में एनसीबी रिया और उनके भाई शौविक समेत करीब 10 लोगों को अब तक गिरफ्तार कर चुकी है।

सुशांत मामले की सीबीआई भी जाँच कर रही है। इसके अलावा ईडी भी मनी लॉन्ड्रिंग एंगल की जाँच कर रही है। अभी तक एनसीबी इस केस में मुंबई और गोवा समेत कई जगहों पर ताबड़तोड़ कार्रवाई कर कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है।

एनसीबी ने गिरफ्तार करने के बाद रिया चक्रवर्ती से 3 दिनों तक पूछताछ की थी। इसमें उन्होंने कथित तौर पर ड्रग्स की खरीद के सिलसिले में सुशांत की सह-कलाकार सारा अली खान और श्रद्धा कपूर का नाम लिया था। उन्होंने ड्रग्स खरीदने और उसका सेवन करने की भी बात कबूली थी।

बता दें कि बॉलीवुड अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत 14 जून को अपने मुंबई स्थित घर में मृत पाए गए थे। आत्महत्या की जाँच शुरू होने के बाद अभिनेता के परिवार ने सुशांत की गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती पर पैसे के लिए उनका शोषण करने का आरोप लगाया था। परिवार द्वारा रिया पर ड्रग्स देने का भी आरोप लगाया गया था। इसके बाद रिया की चैट में कई ऐसे सबूत सामने आए थे, जिससे ड्रग्स मामले का खुलासा हुआ और कई नाम सामने आए।

क्या कंगना रनौत ने प्रदर्शनकारी किसानों को आतंकी कहा? TOI की खबर में किए गए दावे का सच

संसद में पारित हुए कृषि बिलों को लेकर कॉन्ग्रेस सहित उसके पूरे इकोसिस्टम द्वारा भ्रम फैलाने की कोशिश जारी है। किसानों को लगातार भड़काया जा रहा है। सोशल मीडिया के जरिए भी अफवाहों का बाजार गर्म है। इसी बीच कंगना रनौत ने इस बिल को लेकर भ्रम फैला रहे लोगों का विरोध किया, जिसके बाद ‘टाइम्स ऑफ इंडिया (TOI)’ ने दावा किया कि उन्होंने प्रदर्शनकारी किसानों को ‘आतंकी’ कहा है।

देश के सबसे बड़े न्यूज़ नेटवर्क में से एक TOI ने कंगना रनौत के बयान को तोड़-मरोड़ कर पेश किया। उसने लिखा कि अभिनेत्री कंगना रनौत ने राज्यसभा में पास हुए एग्री-मार्केटिंग बिल्स को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों पर निशाना साधते हुए उन्हें ‘आतंकी’ कहा। TOI ने कंगना रनौत के उस ट्वीट का जिक्र करते हुए ये ख़बर प्रकाशित की, जिसमें उन्होंने पीएम मोदी की ट्वीट को रिप्लाई दिया था।

दरअसल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को आश्वासन दिया कि वो पहले भी कह चुके हैं और अब भी कह रहे हैं कि किसानों के लिए ‘मिनिमम सपोर्ट प्राइस (MSP)’ की व्यवस्था जारी रहेगी और सरकारी खरीद होती रहेगी। उन्होंने लिखा, “हम यहाँ अपने किसानों की सेवा के लिए हैं। हम अन्नदाताओं की सहायता के लिए हरसंभव प्रयास करेंगे और उनकी आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर जीवन सुनिश्चित करेंगे।

कंगना रनौत ने इस ट्वीट को कोट करते हुए लिखा कि अगर कोई सो रहा हो उसे जगाया जा सकता है। जिसे ग़लतफ़हमी हो उसे समझाया जा सकता है। मगर जो सोने की एक्टिंग करे, ना समझने की एक्टिंग करे उसे आपके समझाने से क्या फ़र्क़ पड़ेगा? उन्होंने लिखा, “ये वही आतंकी हैं, CAA से एक भी इंसान की सिटीजनशिप नहीं गई मगर इन्होंने ख़ून की नदियाँ बहा दीं।” TOI ने इस बयान को गलत संदर्भ में पेश किया।

यहाँ कंगना रनौत ने सीएए के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन के दौरान लोगों की जान लेने वाले और दंगा करने वालों को ‘आतंकी’ कहा है। न तो उनकी ट्वीट में कहीं किसानों की चर्चा है और यहाँ तक कि प्रदर्शनकारियों को लेकर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा है। कंगना रनौत ने सीएए विरोधी दंगाइयों के लिए ‘आतंकी’ शब्द का प्रयोग किया है। स्पष्ट है कि जिन्होंने ‘खून की नदियाँ’ बहाईं, कंगना ने इस ट्वीट में उनकी आलोचना की है, किसानों की नहीं।

‘कंगना रनौत ने किसानों को आतंकी कहा’: कितना सही है TOI का ये दावा?

बावजूद इसके TOI ने अंग्रेजी में इसे भ्रामक तरीके से ऐसे प्रकाशित किया और साथ ही ये दावा कर दिया कि कंगना रनौत ने किसानों के लिए ‘आतंकी’ शब्द का प्रयोग किया है। उन्होंने सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्वीट के जवाब में बस पूछा भर था कि नासमझ होने की एक्टिंग करने वालों को कैसे समझाया जा सकता है? इसके बाद उन्होंने सीएए विरोधी दंगों में गई जानों को याद करते हुए दंगाइयों के लिए इस शब्द का प्रयोग किया।

ज्ञात हो कि विपक्षी सांसदों के जोरदार हंगामे के बीच राज्‍यसभा ने विवार (सितंबर 20, 2020) को कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्द्धन और सरलीकरण) विधेयक-2020, कृषक (सशक्तिकरण एवं संरक्षण) कीमत आश्वासन समझौता और कृषि सेवा पर करार विधेयक-2020 को ध्वनिमत से पास कर दिया।  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि सुधार संबंधी विधेयकों को ‘ऐतिहासिक’ करार दिया है। 

गुरुद्वारा श्री पंजा साहिब के ग्रंथी की 17 साल की बेटी का 2 मुस्लिम लड़कों ने किया अपहरण, 15 दिन से Pak प्रशासन सुस्त

पाकिस्तान में बहुसंख्यक आबादी के अत्याचार और मनमानी की एक और घटना सामने आई है। हाल में वहाँ गुरुद्वारा श्री पंजा साहिब के ग्रंथी एस प्रीतम सिंह की 17 साल की बेटी बलबीर कौर (बदला हुआ नाम) का अपहरण किया गया। इससे पहले ननकाना साहिब गुरुद्वारे के ग्रंथी की बेटी जगजीत कौर के अपहरण, धर्म परिवर्तन और निकाह की बात पाकिस्तान से सामने आई थी।

जानकारी के अनुसार, हाल की घटना में बलबीर कौर का अपहरण दो मुस्लिम युवकों ने किया है। इस वारदात के बाद वहाँ के सिखों में भारी रोष व्याप्त है। कहा जा रहा है कि प्रशासन आरोपितों का पता लगाने में अब तक असफल है।

मामले की सूचना होने के बाद दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (डीएसजीपीसी) के अध्यक्ष मनजिंदर सिंह सिरसा ने शनिवार को केंद्रीय विदेश मंत्री एस जयशंकर से उनके दफ्तर में मुलाकात कर इस मामले की जानकारी देते हुए एक शिकायत पत्र भी सौंपा।

सिरसा ने विदेश मंत्री को एक सूची भी दी, जिसमें 55 हिंदू-सिख लड़कियों के नाम दर्ज हैं, जिन्हें बीते कुछ वर्षों में अगवा कर उनका धर्म परिवर्तन करवाया गया। बाद में उनकी शादी मुस्लिम युवकों के साथ की गई।

मनजिंदर सिंह सिरसा ने एक वीडियो जारी करते हुए कहा, “गुरुद्वारा ननकाना साहिब के ग्रंथी की बेटी जगजीत कौर का पहले अपहरण किया गया। उनका धर्म परिवर्तन करके निकाह किया गया और अब पंजा साहिब की ग्रंथी सरदार प्रीतम की बेटी बलबीर कौर, 17 साल की बच्ची को 1 सितंबर को दो मुस्लिम लोगों ने अगवा कर लिया। उसके बाद से सरदार प्रीतम का रो-रो कर बुरा हाल है। उनका दर्द उनकी वीडियो-ऑडियो से छलक रहा है। वो कह रहे हैं कि मेरी बच्ची को इन जालिमों से बचा लो। मैं सारी संगत से अपील करता हूँ, मेरी बच्ची को बचा लो। मेरी बच्ची के लिए पाठ करो। उसे जालिमों ने अगवा कर लिया है।”

अकाली दल नेता आगे कहते हैं, “बड़ी शर्म की बात है कि पाकिस्तान अब औरंगजेब के राज से भी खतरनाक हो गया है, जब लोगों के जबरदस्ती धर्म बदले जा रहे थे। आज पाकिस्तान के कट्टर लोग यह साबित करने पर उतरे हुए हैं कि सिख कौम के ग्रंथियों की लड़कियों को भी नहीं छोड़ेंगे। उन्हें जबरन अगवा किया जा रहा है। उनका धर्म परिवर्तन किया जा रहा है।”

सिरसा कहते हैं, “मुझे जैसे ही इस संबंध में जानकारी मिली, मैंने सबसे पहले विदेश मंत्रालय से बात की। फिर विदेश मंत्रालय ने पाकिस्तान को समन किया और टाइम दिया। मगर, तब भी कुछ नहीं हुआ। इसलिए वह विदेश मंत्रालय के अंदर जो पाकिस्तान के इंचार्ज हैं, जेपी सिंह उनसे मिल रहे हैं।”

वह सारी कौम से कहते हैं कि पाकिस्तान का यह जुल्म सिर्फ बढ़ेगा, रुकेगा नहीं। इसलिए उन्हें आवाज उठानी होगी। उन्होंने बच्चियों के ख़िलाफ हो रहे अत्याचार की निंदा की और विरोध दर्ज कराने की बात की। साथ ही पाकिस्तान की इमरान सरकार से कहा कि वह बलबीर कौर को लौटा दें वरना उन्हें हाईकमीशन पहुँचना पड़ेगा।

इसके अलावा सिरसा ने विदेश मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि पाकिस्तान में बसे सिखों को अलग-थलग करने की साजिश रची जा रही है। भारतीय सिख पाकिस्तान में बसे अपनों की मदद करने में असहाय हैं।

पाकिस्तान का समाज ऐसी घटनाओं पर कभी भी अपनी प्रतिक्रिया नहीं देता है। सिरसा ने विदेश मंत्री से अपील की है कि वह इस मामले को पाकिस्तान की सरकार के सामने उठाएँ और बलबीर कौर सुरक्षित अपने घर लौटे। पाकिस्तान में बसे सिखों की जान-माल की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।

गौरतलब है कि पिछले साल गुरुद्वारा ननकाना साहिब के मुख्य ग्रंथी की बेटी जगजीत कौर का मोहम्मद हसन नाम के एक लड़के ने अपहरण कर लिया था। हसन के तार हाफिज सईद के आतंकी संगठन से जुड़े पाए गए थे।

पाकिस्तान समेत भारत के कई सिखों ने इस पर विरोध व्यक्त किया था, जिससे यह मामला अदालत पहुँचा। हालाँकि, वहाँ जगजीत कौर से यह कहलवा कर कि उसने खुद इस्लाम कबूला है, उसे हसन के पास वापस भेज दिया गया था।

गाड़ी हिंदू या मुस्लिम की? जलाने से पहले ‘इ-वाहन’ पर चेक किया जाता: Tech के इस्तेमाल से दिल्ली दंगों के 2655 आरोपित धराए

दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में पुलिस द्वारा दायर की गई चार्जशीट न सिर्फ वॉल्यूम के मामले में सबसे बड़ी है बल्कि जाँच के दौरान प्रयोग में लाए गए नए वैज्ञानिक तकनीकों के कारण भी इसे खास माना जा रहा है। इस मामले की संवेदनशीलता और इसके पेचीदा होने के कारण दिल्ली दंगों की जाँच के दौरान पुलिस द्वारा कॉल डिटेल्स विवरण के अलावा कई अन्य तरह की तकनीक का भी इस्तेमाल किया गया।

पश्चिमी देशों में आपराधिक मामलों की जाँच के दौरान ‘इंटरनेट प्रोटोकॉल्स डिटेल्स रिकॉर्ड्स’ तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। दिल्ली हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में भी पुलिस ने इसे आजमाया। इसके तहत स्मार्टफोन्स में इंटरनेट ट्रैफिक का विवरण जुटाया जाता है। इससे VoIP कॉल्स के दौरान बनाए गए कनेक्शंस का अध्ययन करने में आसानी होती है। चूँकि अधिकतर आरोपित व्हाट्सएप्प और टेलीग्राम जैसे एप्स के माध्यम से सम्पर्क में थे, पुलिस को इस तकनीक से खासी सहायता मिली।

कई ऐसे पीड़ित भी थे, जो जल गए थे और उनकी पहचान ज़रूरी थी। ऐसे मृतकों के चेहरे को फिर से तैयार करने के लिए उनके फोटोग्राफ्स से उनकी खोपड़ी को ‘Superimpose’ किया गया और इससे ‘फेसिअल रिकंस्ट्रक्शन’ में मदद मिली। यहाँ तक कि इस मामले में फंडिंग और ‘मनी ट्रेल’ के लिए भी तकनीक का सहारा लिया गया। ‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ में राज शेखर झा की रिपोर्ट में ये बातें सामने आई हैं।

इस मामले में ‘फण्ड फ्लो एनालिसिस’ के लिए भी तकनीक का सहारा लिया गया। आरोपितों द्वारा किए गए वित्तीय लेनदेन के पैटर्न की जाँच के लिए एक सॉफ्टवेयर का प्रयोग किया गया। बता दें कि दिल्ली दंगों के दौरान रुपयों का खूब लेनदेन हुआ था औ दंगाइयों तक वित्तीय मदद पहुँचाई गई थी। वाहनों को जलाने से पहले दंगाइयों ने ‘इ-वाहन’ को मैसेज भेज के उसके मालिकों की पहचान जुटाई थी।

इसके लिए टेक्स मैसेजों की जाँच की गई। सरकारी डाटाबेस से उन नंबरों को जुटाया गया, जिनके द्वारा ‘इ-वाहन’ को टेक्स्ट मैसेज भेजे गए थे। दंगों के दिन भेजे गए इन मैसेजों का ब्यौरा जुटाया गया। क्राइम ब्रांच की स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम द्वारा अन्य दंगों की जाँच के लिए भी ये तरीका आजमाया जा रहा है। इसके अलावा ‘Geo-लोकेशन’ के जरिए गूगल मैप्स का इस्तेमाल कर आरोपितों के मूवमेंट के बारे में पुलिस ने सारी जानकारी जुटाई।

फ़रवरी 24 को शाम 5:50 बजे मार डाले गए राहुल सोलंकी का मामले में जियो-टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल काफी काम आया। सड़क पर लगे सीसीटीवी कैमरों, मीडिया कैमरों और फोन कैमरों से शूट किए गए 950 वीडियो फुटेज जुटाए गए, जिनमें ‘फेसिअल रिकग्निशन सिस्टम’ का इस्तेमाल कर के 2655 आरोपितों की पहचान की गई। इसके लिए एनालिटिक्स टूल्स का भी इस्तेमाल किया गया। ये तकनीकें मृतकों की पहचान के लिए भी काम आई।

इन सबसे जो फोटोग्राफ्स मिले, उन्हें कई सारे डेटाबेस से मैच कराया गया। दिल्ली पुलिस क्रिमिनल डोजियर सहित अन्य सरकारी डेटाबेस से उन्हें मैच कराया गया। इससे 2655 आरोपितों की पहचान हुई और उनके खिलाफ सबूत होने के कारण उन पर कार्रवाई करने में आसानी हुई। मोबाइल फॉरेन्सिक्स और क्लोनिंग जैसी तकनीकों से आरोपितों के पास से जब्त मोबाइल फोन्स की जाँच की गई।

वीडियो और कॉल्स के रिकॉर्डेड ऑडियो के माध्यम से आरोपितों के खिलाफ सबूत इकट्ठा करने में आसानी हुई। दिल्ली पुलिस कमिश्नर एसएन श्रीवास्तव ने TOI को बताया कि इस केस के ‘सब-जुडिस (न्यायलय में चल रहा)’ होने के कारण इससे जुड़ी जानकारियाँ साझा नहीं की जा सकतीं। हालाँकि, उन्होंने स्वीकारा कि दिल्ली पुलिस की जाँच काफी हद तक वैज्ञानिक और तकनीकी माध्यमों और तौर-तरीकों पर आधारित रही है।

ज्ञात हो कि हाल ही में सितम्बर 14 को उमर खालिद को दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के मामले में यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया गया। आम आदमी पार्टी के पार्षद रहे ताहिर हुसैन को दिल्ली दंगों की चार्जशीट में मुख्य अभियुक्त बनाया गया है और उसने पूछताछ में कबूला भी है कि वो हिन्दुओं को सबक सिखाना चाहता था। साथ ही ‘पिंजड़ा तोड़’ जैसे संगठनों के कई ‘एक्टिविस्ट्स’ पर भी शिकंजा कसा गया।

‘जेल’ से लालू यादव रोज करते हैं बात, मँगाते हैं फोटो: RJD नेता का खुलासा, तेज प्रताप ने खुद दिया है आशीर्वाद

चारा घोटाला मामले में सजायाफ्ता बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव की राँची जेल में मौज है – ये खुलासा किसी और ने नहीं बल्कि राजद के ही स्वघोषित विधायक प्रत्याशी ने किया है। गया के टेकारी विधानसभा के राजद नेता कमलेश शर्मा ने कहा है कि राँची में लालू यादव जब चाहते हैं, तब अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं से फोन पर बात करते हैं और और प्रत्याशियों तक से भी लगातार संपर्क में रहते हैं।

कमलेश शर्मा जदयू छोड़ कर राजद में आए हैं और उनकी हनक ऐसी है कि तेज प्रताप यादव भी कह चुके हैं कि उनका आशीर्वाद कमलेश शर्मा के साथ है। उन्होंने दावा किया कि राजद सुप्रीमो लालू यादव उनसे रोज फोन पर बात करते हैं और चुनावी तैयारियों का जायजा लेते हैं। उन्होंने कहा कि लालू से उनकी रोज बात होती है। कमलेश गया में युवा जदयू के जिलाध्यक्ष भी रह चुके हैं। उन्होंने 5 सितम्बर को ही राजद की सदस्यता ली है।

लालू यादव के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव ने ही उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई थी। जदयू नेता अजय आलोक ने इस बयान को आधार बनाते हुए राजद पर हमला बोला और कहा कि लालू यादव राँची जेल में एक-दो नहीं बल्कि चार-चार मोबाइल फोन का प्रयोग करते हैं। सफाई में जहाँ राजद प्रवक्ता मृत्युंजय तिवारी ने कमलेश शर्मा को ‘राह चलता आदमी’ करार दिया, वहीं शक्ति सिंह यादव ने कहा कि अति-उत्साह में लोग कुछ भी बोल देते हैं।

जदयू नेता नीरज सिंह ने लालू को ‘420’ और आदतन अपराधी करार दिया। मंत्री नीरज ने कहा कि जिस व्यक्ति से उनकी बातचीत का मामला सामने आया है, वो एक बड़ा ठेकेदार है। उन्होंने दावा किया कि झारखण्ड की हेमंत सोरेन सरकार ने लालू यादव को जेल की जगह ‘ऐशगाह’ में रखा हुआ है, जहाँ उन्हें तमाम सुविधाएँ दी जा रही हैं। उन्होंने इसे हेमंत सरकार की निर्लज्जता की हद करार दिया।

वहीं अजय आलोक ने सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में संज्ञान लेने की माँग की है। सफाई में शक्ति सिंह यादव ने कहा कि जब लालू यादव से बड़े-बड़े नेता नहीं मिल पा रहे हैं, ऐसे में कमलेश ऐसा कैसे बोल सकते हैं। बिहार में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले इसे लेकर राजनीति गरमा गई है। कमलेश शर्मा ने ये भी कहा कि फोन पर लालू यादव पार्टी कार्यक्रमों की तस्वीरें मँगाते रहते हैं, जो उन्हें भेजी जाती हैं।

बता दें कि लालू यादव को रिम्स से निदेशक के बंगले में शिफ्ट किया गया है और हेमंत सोरेन ने बताया है कि उनका स्वास्थ्य पहले से बेहतर है। नीरज कुमार ने आरोप लगाया था कि हेमंत सोरेन लालू के दर पर फ़रियाद लेकर गए थे। जहाँ लालू यादव रुके हुए हैं, वहाँ लगातार नेताओं का जमावड़ा लगा हुआ है और बिहार से टिकट के दावेदार एक-एक कर के पहुँच रहे हैं। हेमंत सोरेन ने उनसे मुलाकात के बाद बिहार में साथ चुनाव लड़ने की घोषणा की थी।

एंबुलेंस ड्राइवर नौफल ने कोरोना संक्रमित लड़की का किया था रेप: पीड़िता ने लगाई फाँसी, गेट तोड़ बचाया गया

केरल के पतनमिट्टा से पिछले दिनों एक कोरोना पीड़िता के साथ बलात्कार की घटना सामने आई थी। अब खबर है कि उसी पीड़िता ने कोट्टयम के एक सरकारी मेडिकल कॉलेज में सुसाइड करने की कोशिश की है।

डेक्कन क्रॉनिकल की खबर के अनुसार, पीड़िता अपने आइसोलेशन वार्ड के बाथरूम में फँदे पर लटकने जा रही थी, तभी अस्पताल प्रशासन ने बाथरूम का गेट तोड़ कर उसे बचा लिया। फिलहाल लड़की की स्थिति स्थिर है और उसे निगरानी में रखा गया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों केरल के पतनमतिट्टा जिले में कोरोना संक्रमित लड़की के साथ बलात्कार की घटना सामने आई थी। आरोपित की पहचान नौफ़ल नामक एक एंबुलेंस चालक के रूप में हुई थी। नौफ़ल ने घटना को अंजाम रविवार (6 सितंबर 2020) देर रात करीब 1 बजे दिया था। मामला उजागर होने के बाद पुलिस ने नौफ़ल की गिरफ्तारी की थी।

पड़ताल में मालूम हुआ था कि कोरोना संक्रमित के साथ बलात्कार करने वाला नौफ़ल अलाप्पुझा (Alappuzha) जिले का रहने वाला था और राज्य सरकार के 108 एंबुलेंस सर्विस विभाग से जुड़ा हुआ था।

20 वर्षीय लड़की के साथ बलात्कार की घटना उस वक्त हुई थी, जब उसे एंबुलेंस के जरिए पतनमतिट्टा से कोज़ेनचेरी स्थित कोविड स्वास्थ्य केंद्र ले जाया जा रहा था। ख़बरों के मुताबिक एंबुलेंस में दो मरीज थे। स्वास्थ्य अधिकारियों ने एक को कोज़ेनचेरी जिला अस्पताल लेकर जाने के लिए कहा और दूसरी को कोविड स्वास्थ्य केंद्र। इसके बाद नौफ़ल ने एक मरीज को जिला अस्पताल पहुँचाया और दूसरी को कोविड स्वास्थ्य केंद्र की तरफ लेकर गया।

कोविड स्वास्थ्य केंद्र जाने से पहले उसने एर्नामुला हवाई अड्डे के पास लड़की के साथ बलात्कार किया। पीड़िता ने स्वास्थ्य केंद्र पहुँचने के बाद वहाँ मौजूद कर्मचारियों को पूरी घटना की जानकारी दी। इसके बाद कर्मचारियों ने मामले की जानकारी पुलिस को दी। उसी वक्त पीड़िता ने अपना बयान भी दर्ज कराया और पुलिस ने आरोपित एम्बुलेंस चालक नौफ़ल को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को जाँच में पता चला कि आरोपित पर एक हत्या का मामला भी दर्ज है।

वहीं, पीड़िता के साथ हुई घटना की जानकारी होने के बाद उसे सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया। लेकिन मेंटल ट्रॉमा से गुजरने के कारण उसे काउंसलिंग की आवश्यकता थी इसलिए उसे कोट्टयम मेडिकल कॉलेज में भर्ती करवाना पड़ा, जहाँ स्थानीय मीडिया के अनुसार उसने हाल में फाँसी लगाने की कोशिश की।