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UP: प्रियंका ने की योगी सरकार को ट्रोल करने की कोशिश, 12 पुलिस थानों ने दिए सटीक जवाब

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने आज, मंगलवार (अगस्त 25, 2020) उत्तर प्रदेश के बलिया में पत्रकार की हत्या समेत अन्य वारदातों का हवाला देते हुए योगी सरकार पर कटाक्ष किया और उत्तर प्रदेश के ‘अपराध मीटर’ का एक पोस्टर ट्वीट कर अपने दिन की शुरुआत की।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने अपने इस ट्वीट में लिखा, “यूपी के सीएम सरकार की स्पीड बताते हैं और अपराध का मीटर उससे दोगुनी स्पीड से भागने लगता है। प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्। ये यूपी में केवल दो दिनों का अपराध का मीटर है। यूपी सरकार बार-बार अपराध की घटनाओं पर पर्दा डालती है मगर अपराध चिंघाड़ते हुए प्रदेश की सड़कों पर तांडव कर रहा है।”

लेकिन प्रियंका गाँधी ने शायद ही इन अपराधों को सामने रखते वक़्त इस बात पर ध्यान दिया होगा कि उत्तर प्रदेश पुलिस इन सभी मामलों पर कार्रवाई कर चुकी है, जिनमें आधे से अधिक में आरोपित गिरफ्तार भी कर लिए गए हैं जबकि कुछ मामले आत्महत्या और पड़ोसियों के आपसी विवाद को लेकर थे।

प्रियंका गाँधी वाड्रा ने उत्तर प्रदेश में घटित रविवार को 9 और सोमवार को हुई 12 वारदातों का जिक्र करते हुए कहा कि यूपी में केवल दो दिनों का अपराध का मीटर है। प्रियंका गाँधी ने उत्तर प्रदेश पुलिस के जिस-जिस थाना क्षेत्र के अपराध का इस पोस्टर में जिक्र किया था उन सभी ने अपने अपने थानान्तर्गत हुए इन अपराधों का विवरण देकर प्रियंका गाँधी वाड्रा की चिंता (चिंताओं) का बड़े रोचक तरीके से समाधान किया।

उत्तर प्रदेश पुलिस ने इन अपराधों का विवरण ट्वीट के जरिए दिया –

4599 मंदिर, 31250 हिंदू घर-दुकान को कट्टरपंथियों ने किया ध्वस्त… ‘बाबरी’ की आड़ में मीडिया छुपाता है ये आँकड़े

हिंदुओं द्वारा अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि पर एक बार फिर अपना अधिकार प्राप्त कर लेने के बाद वामपंथी मीडिया और इस्लामिक विचारधारा समर्थक गिरोह हिंदुओं के खिलाफ युद्ध के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। मार्क्सिस्ट-लेफ्टिस्ट मीडिया ने इस झूठ को स्थापित करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ी कि यहाँ पर श्रीराम मंदिर था ही नहीं। ऑल इंडिया बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता सैय्यद शाहबुद्दीन ने वर्ष 1990 में एक बार कहा था कि अगर वहाँ पर राम मंदिर के अवशेष मिले तो वो बाबरी को बड़े हथौड़े से गिरा देंगे।

अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि स्थल के इतिहास को लेकर वर्ष 1989 तक कोई सवाल नहीं किया गया था। सभी लिखित स्रोत, चाहे हिंदू, मुस्लिम या यूरोपीय हों, सभी उस स्थल पर पहले से श्रीराम मंदिर के अस्तित्व को लेकर सहमत थे। एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका, वर्ष 1989 संस्करण में ‘अयोध्या’ चैप्टर के अनुसार, “अयोध्या में राम के जन्मस्थान पर एक मस्जिद बनाई गई। जिसे मुगल सम्राट बाबर द्वारा 1528 में पहले से निर्मित मंदिर की ज़मीन पर बनाया गया।”

बेल्जियम के विश्व प्रसिद्ध विद्वान डॉ कोनराड एल्स्ट (1959-) ने लिखा है:

“दिसंबर 1990 में, चंद्रशेखर की सरकार ने इस मामले की ऐतिहासिक सच्चाई पर चर्चा के लिए विद्वानों के एक दल को शामिल करने के लिए विश्व हिंदू परिषद और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी (BMAC) में शामिल दो समूहों को आमंत्रित किया। BMAC के पदाधिकारी यह सोचकर बिना किसी तैयारी के उस चर्चा में पहुँचे कि हिंदुओं द्वारा किए जा रहे दावे काल्पनिक हैं। लेकिन जब वीएचपी टीम ने श्रीराम मंदिर जन्मभूमि मामले का समर्थन करते हुए दर्जनों दस्तावेज पेश किए तो वे दंग रह गए।”

BMAC ने तब मार्क्सवादी प्रोफेसर आरएस शर्मा की अध्यक्षता में इतिहासकारों की एक टीम को आमंत्रित किया। शर्मा इस माँग के साथ अगली बैठक में पहुँचे कि उन्हें ‘स्वतंत्र विद्वानों’ के रूप में मान्यता दी गई है, जो विवादित फैसले में शामिल होने जा रहे थे यानी, बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के आकाओं और VHP विरोधियों के बीच एक निर्णय पारित करने के लिए शामिल होने जा रहे थे। सरकार के प्रतिनिधियों ने इस हास्यास्पद माँग को मंजूरी नहीं दी।

अगली बैठक में, मार्क्सवादी इतिहासकारों ने घोषणा की कि उन्होंने अभी तक सबूतों का अध्ययन नहीं किया है और उन्हें छह और हफ्तों की ज़रूरत है। उनके द्वारा दिया गया यह बयान बहुत ही अजीब था। इन्हीं लोगों ने मंदिर के अस्तित्व को नकार देने वाली याचिका पर हस्ताक्षर करने में 42 शिक्षाविदों का नेतृत्व किया था। जनवरी 24, 1991 को होने वाली इस बैठक में वे मौजूद ही नहीं थे।

1990-91 के विद्वानों की बहस में हिंदू पक्ष की शानदार जीत हुई थी। इससे यह भी पता चला कि वामपंथी इतिहासकार केवल भोले, अनजान दर्शकों या ऐसे दर्शकों से झूठ बोल सकते हैं, जो उनका विश्वास करते हैं और वही सुनना चाहते हैं, जो वो कहते हैं। वास्तविक विद्वानों के तथ्यों के सामने उनके तर्क कहीं नहीं टिकते।

हमने ये सभी चीजें सुप्रिया वर्मा जैसे लोगों के मामले में भी देखा, जो कि अक्सर नकारने के ही भाव में रहा करते हैं। सुप्रिया वर्मा ने अपने लेखों और प्रकाशनों में, एएसआई की रिपोर्ट का खंडन करते हुए किसी भी मंदिर के अस्तित्व होने से इनकार किया। फिर जब अदालत ने पूछताछ कि तो उन्होंने स्वीकार किया कि वे राम मंदिर साइट पर कभी नहीं गई थी और उन्होंने जो कहा वह केवल उनकी ‘राय‘ थी।

दिसंबर 1990 – जनवरी 1991 में हिंदू पक्ष द्वारा प्रस्तुत प्रमाणों के साथ जब विद्वानों की बहस में यह तथ्य साबित हो गया कि बाबरी मस्जिद वास्तव में एक मंदिर को ध्वस्त करने के बाद बनाई गई थी, तब सैयद शहाबुद्दीन और मुस्लिम पक्ष अवाक रह गए और सभी ने यू-टर्न ले लिया।

बाद में, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने 2003 में अदालत के आदेशों पर खुदाई की थी। खुदाई करने वाले मजदूरों में कई संप्रदाय विशेष के भी शामिल थे। इन संप्रदाय विशेष के मजदूरों को जानबूझकर मुस्लिम पक्ष की माँग के अनुसार काम पर रखा गया था। वहीं, एएसआई की रिपोर्ट के 20 लेखकों में से 4 लेखक भी संप्रदाय विशेष के थे। उन्हें भी मुस्लिम पक्ष की माँग पर रखा गया था। उन्होंने भी इस बात को स्वीकार किया था कि वहाँ खुदाई के दौरान मंदिर के अवशेष पाए गए थे।

एएसआई की खुदाई में संप्रदाय विशेष के मजदूरों और संप्रदाय विशेष के लेखकों को शामिल किए जाने और मंदिर बनने के साक्ष्य मिलने और उनकी सभी माँगों के बावजूद, मुस्लिम पक्ष ने इस सच्चाई को स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि इस स्थान पर मंदिर पहले से मौजूद था और उन्होंने अपने दावे को वापस नहीं लिया।

1989 के बाद सभी मार्क्सवादियों और संप्रदाय विशेष के लोगों ने दावा किया था कि उस जमीन पर बाबरी मस्जिद बनाई गई थी। बाद में जब एक संरचना (स्पष्ट रूप से मंदिर) का अस्तित्व सिद्ध हुआ, तो उनमें से कुछ ने दावा करना शुरू कर दिया कि पहले से मौजूद संरचना बौद्ध सम्प्रदाय की थी, न कि किसी मंदिर की! वहीं सुप्रिया वर्मा जैसों ने यह भी कह दिया था कि ये संरचनाएँ पुरानी मस्जिदों की ही थीं।

फिर कथित तौर पर ‘खाली जमीन पर बनी बाबरी’ के उनके दावे का क्या मतलब हुआ? संक्षेप में, दुनिया में मौजूद कोई भी सबूत इन लोगों को दे दिया जाए, तब भी वे कभी यह स्वीकार नहीं करेंगे कि बाबरी मस्जिद का निर्माण उस स्थल पर एक मंदिर को ध्वस्त करने के बाद किया गया था। जिसका सबूत एएसआई की रिपोर्ट के लेखकों सहित, विशिष्ट साहित्यिक साक्ष्य, निर्णायक पुरातात्विक साक्ष्य और संप्रदाय विशेष के लोगों सहित मजदूरों ने खुदाई के बाद दिए हैं।

डॉ कोनराड एल्स्ट ने अपनी पुस्तक ‘बीजेपी विस-अ-विस हिन्दू रेसर्जेंस’ (BJP vis-à-vis Hindu Resurgence) (वॉयस ऑफ इंडिया, 1997) में भी लिखा है :

आप इसका अनुमान उनके पॉलिश की हुई कॉन्वेंट-स्कूल की अंग्रेजी, उनकी फैशनेबल शब्दावली या उनके दूसरों से ऊपर होने के भाव से नहीं लगा सकते हैं, लेकिन रोमिला थापर, इरफ़ान हबीब या ज्ञानेंद्र पांडे [हमारी टिप्पणी: भारत में मार्क्सवादी इतिहासकारों ने इस्लामी शासकों के अपराधों को नकारने में आनाकानी की है, और इस बात से इनकार किया है कि विवादित ढाँचे के स्थान पर एक मंदिर मौजूद था] जैसे शख्स हमेशा हिंदुओं के विरोध में रहे हैं। अयोध्या विध्वंस के बाद संप्रदाय विशेष के लोगों द्वारा की गई हिंसा को विशेषज्ञों द्वारा समाज से छिपाया गया था।

इन्हीं लोगों ने इस बात से इनकार किया कि विवादित इमारत [हमारी टिप्पणी: बाबरी मस्जिद] हिंसक बुतशिकनों के इतिहास का हिस्सा था [हमारी टिप्पणी: अर्थात एक मंदिर को ध्वस्त करने के बाद बनाया गया था] और आरोप लगाया कि हिंदुओं ने ‘पाक मस्जिद’ पर हमला कर मनगढ़ंत इतिहास रचा है।

इनके दुष्प्रचार ने इस्लामी आतंकवादियों को बदला लेने, हिंदुओं के खिलाफ अभियान चलाने और हिंसा के कृत्यों के लिए संप्रदाय विशेष के सभ्य लोगों को भड़काने का काम किया है। अगर इन लोगों ने अयोध्या में इस्लाम द्वारा किए गए अपराध के बारे में बताया होता, या संप्रदाय विशेष ने सच्चाई को जाना होता, तो वे कभी हिंसा नहीं करते।

वहीं, अब एक और खतरा हमारे सामने है कि छद्म धर्मनिरपेक्षता, बाबरी विध्वंस का विरोध और अयोध्या राममंदिर भूमिपूजन के विरोध में पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदुओं पर अधिक हमले किए जाएँगे। जैसा कि अतीत में वे भारत में कर चुके हैं। इसलिए 6 दिसंबर 1992 में बाबरी विध्वंस से पहले और बाद में, बांग्लादेश, पाकिस्तान और कश्मीर में हिंदू घरों और 5000 मंदिरों को इस्लामिक विचारधारा के समर्थकों द्वारा ध्वस्त की गई घटनाओं को उजागर करने की तत्काल आवश्यकता है।

बांग्लादेश में हिंदुओं की लूटपाट और हत्याएँ, मुंबई, चेन्नई, अन्य स्थानों पर बम विस्फोट जैसी घटनाओं पर संज्ञान लेना चाहिए। एक तथ्य यह भी है कि अयोध्या में अलग जगह पर एक मस्जिद का फिर से निर्माण होने जा रहा है।

अयोध्या में बाबरी मस्जिद के अवैध ढाँचे को ढहाने से पहले लगभग 100 मंदिर कश्मीर में और बांग्लादेश में 400 मंदिर ध्वस्त किए गए थे। बांग्लादेश में वर्ष 1989 में अयोध्या आंदोलन को देखते हुए लगभग 400 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। जिसमें 9 नवंबर 1989 के शिलान्यास के बाद अक्टूबर-नवंबर 1989 में लगभग 200 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। हजारों हिंदू घरों और व्यवसायों को नष्ट कर दिया गया था। हिन्दुओं की कई दुकानों को लूट लिया गया और जला दिया गया था।

वहीं 30 अक्टूबर और 2 नवंबर 1990 को कारसेवा के संदर्भ में बांग्लादेश में 1990 में कम से कम 45 मंदिरों को ध्वस्त कर दिया गया था। जिसमें ढाका जिले में कम से कम 34 और चटगाँव जिले में कम से कम 11 मंदिर थे। इस हिंसा में बांग्लादेश में हिंदू दुकानों और सैकड़ों घर भी (550 से ज्यादा) लूटे गए या जला दिए गए थे।

चूँकि ये हमले बांग्लादेश में इतने बड़े पैमाने पर वर्ष 1989 और 1990 में हुए थे, इसलिए यह पूरी तरह से निश्चित है कि इस तरह की हिंदू-विरोधी हिंसा पाकिस्तान में भी हुई होगी। हालाँकि, लेखक इस बात का पता नहीं लगा पाए कि 1989 या 1990 में पाकिस्तान में ध्वस्त किए गए मंदिरों और हिंदुओं पर किए गए हमलों का सही आँकड़ा क्या था। उन्होंने एक रिपोर्ट में पाया कि पाकिस्तान में नवंबर 1990 में कम से कम एक हिंदू की मौत हो गई थी और 4 मंदिर क्षतिग्रस्त हो गए थे।

वहीं 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद, यह बताया गया था कि पाकिस्तान में कम से कम 245 मंदिरों को तोड़ दिया गया था, और 3600 मंदिरों को बांग्लादेश में ध्वस्त कर दिया गया था। 1992 में बाबरी मामले के बाद बांग्लादेश में हुए हिंदुओं के नरसंहार में, 28000 गैर-इस्लामी घरों को नष्ट कर दिया गया था। इसके अलावा 2,700 हिंदू व्यवसाय और 3,600 मंदिर और अन्य पूजा स्थल ध्वस्त कर दिए गए थे।

बांग्लादेश करेंसी के अनुसार, कुल नुकसान का अनुमान 2 बिलियन (200 करोड़) लगाया गया था। कश्मीर में सौ से अधिक मंदिरों को भी ध्वस्त कर दिया गया था। साथ ही, भारत के कुछ अन्य स्थानों, जैसे – भोपाल, असम में भी मंदिरों को तोड़ दिया गया।

1990 से 95% पाकिस्तान के सभी हिंदू मंदिरों को नष्ट कर दिया गया या उन्हें मस्जिद या फिर किसी अन्य स्वरूप में तब्दील कर दिया गया। ऑल पाकिस्तान हिंदू राइट्स मूवमेंट (APHRM) की 2014 की सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार, 1990 के बाद देश में कुल 428 अल्पसंख्यक पूजा स्थलों में से, 408 मंदिरों को खिलौने की दुकान, रेस्तराँ, सरकारी कार्यालयों और स्कूलों में परिवर्तित कर दिया गया है। वहाँ अब केवल 20 हिंदू मंदिर ही शेष हैं।

यह संभव है कि 6 दिसंबर 1992 के बाद बांग्लादेश की तुलना में पाकिस्तान में कम संख्या में मंदिरों पर हमला किया गया था। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि पाकिस्तान अधिक सहिष्णु था, बल्कि इसका कारण यह था कि 1992 तक वहाँ मौजूद मंदिरों की संख्या कम थी। 1947 में पाकिस्तान के अस्तित्व में आने के तुरंत बाद ही हजारों मंदिरों को पहले ही उस समय तक नष्ट कर दिया गया था।

सिखों के धर्मस्थल को भी पाकिस्तान में तोड़ा गया

बता दें कि सिर्फ हिंदू ही नहीं, पाकिस्तान द्वारा सिखों के भी कई धार्मिक स्थलों को नष्ट कर दिया गया। उनमें से सबसे प्रमुख सिख धार्मिक स्थल गुरुद्वारा गली था, जिसे ऐबोटाबाद (Abbottabad) में एक कपड़े की दुकान में परिवर्तित कर दिया गया है। पाकिस्तान में लगभग 171 गुरुद्वारे या तो नष्ट हो गए या फिर ढहने के करीब हैं। वहीं, कुछ गुरुद्वारों को मस्जिदों (या स्कूलों, पुलिस स्टेशनों, आदि) में भी बदल दिया गया, या फिर उन्हें घरों के निर्माण के लिए ध्वस्त कर दिया गया।

जम्मू और कश्मीर सरकार ने आधिकारिक तौर पर 2012 में कहा था कि 1990 के दशक की शुरुआत से 20 वर्षों में कश्मीर में 208 मंदिरों को नष्ट कर दिया गया। लेकिन इसकी सही संख्या कहीं अधिक हो सकती है। कश्मीरी पंडित संगठन कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति (KPSS) के अनुसार, नष्ट मंदिरों की वास्तविक संख्या लगभग 550 है।

जम्मू और कश्मीर की सरकार ने स्वीकार किया कि उसकी ग्रीष्मकालीन राजधानी श्रीनगर में सबसे ज्यादा मंदिरों को ध्वस्त किया गया है। जहाँ नष्ट किए गए मंदिरों की संख्या 57 है। हालाँकि, इस बर्बरता में कोई भी मस्जिद नष्ट नहीं हुई। इनमें से कई मंदिर अब मस्जिदों में परिवर्तित हो गए हैं।

गौरतलब है कि इस लेख में बाबरी विध्वंस के बाद सिर्फ 1 दिन में पाकिस्तान में हुई घटनाओं का ही जिक्र है। पाकिस्तानियों ने 30 हिंदू मंदिरों पर हमला किया। उसके बाद भी बहुत कुछ घटित हुआ। मंदिरों पर हमला होने पर पुलिसबलों ने हस्तक्षेप नहीं किया, न ही तब कार्रवाई की, जब एयर इंडिया के दफ्तर पर भीड़ ने धावा बोल दिया था। सड़कों पर फर्नीचर फेंक कर तोड़ दिया गया था। साथ ही, ऑफिस में भी आग लगा दी गई थी।

15 दिसंबर 1992 को ‘द डलास मॉर्निंग न्यूज़’ की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम 24 लोग (ज्यादातर हिंदू) पाकिस्तान में मारे गए और कम से कम 100 मंदिरों पर संप्रदाय विशेष के लोगों ने हमला किया। पाकिस्तानी पत्रकार रीमा अब्बासी और फ़ोटोग्राफर मदीहा ऐज़ाज़ ने पूरे पाकिस्तान की यात्रा कर पाकिस्तान में मौजूद हिंदू मंदिरों को लेकर डॉक्यूमेंट तैयार किया था। जिस पर रीमा ने ‘हिस्टोरिक टेम्पल्स इन पाकिस्तान: ए कॉल टू कॉन्शियस’ नामक एक पुस्तक लिखी।

रीमा ने लिखा कि पाकिस्तान में हिंसा के दौरान लगभग 1000 हिन्दू मंदिरों को निशाना बनाया गया था, जो कि 1990 के दशक की शुरुआत में बाबरी मस्जिद के विनाश के बाद ध्वस्त हुए थे। वहीं एक वेबसाइट द्वारा भी 1,000 मंदिरों पर हमले के बारे में बताया गया है। यह जानकारी पाकिस्तान के हिंदुओं के संबंध में दी गई है।

बांग्लादेश में संप्रदाय विशेष के लोगों द्वारा मंदिरों को नष्ट किए जाने और हिन्दू-विरोधी हिंसा पर 31 अक्टूबर 1990 को एसोसिएटेड प्रेस की एक रिपोर्ट पढ़ें :-

“गवाहों ने कहा, चटगाँव, बांग्लादेश में संप्रदाय विशेष के एक गैंग ने, जिसमें कई चाकू और हथियारों से लैस हैं, उन लोगों ने हिंदू मंदिरों पर हमला किया, मूर्तियों को तोड़ा और भारत में हुए विवाद के जवाब में सैकड़ों घरों में आग लगा दी। भारत में हिंदुओं द्वारा एक मस्जिद पर कब्जा करने और इसे अयोध्या में एक मंदिर से बदलने की कोशिश की खबर सुनकर गुस्साए लोग मंगलवार देर रात सड़कों पर उतर गए। इस विवाद में भारत के 150 से अधिक लोग मारे गए हैं। लगभग 100 लोगों की भीड़ ने आज सुबह एक हिंदू मंदिर में हमला कर दिया। अधिकारियों और गवाहों के अनुसार, मंगलवार से अब तक कम से कम 11 मंदिरों में तोड़फोड़ की गई है। चटगाँव के सबसे बड़े मंदिर स्थल कैबलाधाम में सबसे ज्यादा बबर्बरतापूर्ण हमला किया गया। प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा कि चाकू और लोहे की छड़ों के साथ 2,000 लोगों ने आधी रात को मंदिर के आसपास एक आवासीय जिले में तोड़फोड़ की और कम से कम 300 घरों को जला दिया। पुलिस ने इलाके में आग लगाने वाली हिंसक एक भीड़ को हटाने के लिए हवा में फायरिंग की। 500 विस्थापितों में से एक सुशील गोश (जिन्होंने मंदिर के ऊपर एक पहाड़ी पर एक शिविर स्थापित किया था) ने कहा कि इस दौरान चार लोग गायब हो गए थे। पुलिस ने रिएजुद्दीन बाजार और चटगाँव मेडिकल कॉलेज में भी फायरिंग की। जब 200 से अधिक लोग मंदिरों को उड़ाने और हिंदू स्वामित्व वाले दुकानों को जलाने की कोशिश कर रहे थे। एक समूह ने लगभग 50 झोपड़पट्टी वाले घरों को नष्ट कर दिया, जो निम्न-जाति के हिंदुओं द्वारा बसाए गए थे। जिनमें मुख्य रूप से मछुआरे थे। एक अन्य समूह ने एक हिंदू के स्वामित्व वाले गैरेज पर हमला किया और पाँच वाहनों को नुकसान पहुँचया। पुलिस ने कहा कि सेंट्रल चौकबाजार जिले में लगभग 1,500 हिंदू मछुआरे रात के हमले के दौरान अपने घरों से भाग गए, लेकिन सुबह जब स्थिति को नियंत्रण में लाया गया तो वे वापस लौट आए थे।”

यदि मीडिया ने बार-बार हिंदुओं पर किए गए हमलों (24 लोगों की हत्या, ज्यादातर हिंदू, पाकिस्तान में), बाबरी विध्वंस के पहले और बाद में हजारों मंदिरों को नष्ट करने, हजारों हिंदू घरों को नष्ट करने, 6 दिसंबर 1992 के बाद 200 करोड़ की हिंदुओं की संपत्ति को हुए नुकसान का उल्लेख किया होता, तो यह बहुत संभव है कि मार्च 1993 के मुंबई और कोलकाता के बम विस्फोटों और आतंकवादी कृत्यों से बचा जा सकता था।

पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मीर में हिंदू विरोधी हिंसा के बाद, मुंबई में 1993 के घातक बम धमाके हुए, जिसमें 257 लोग मारे गए, 1400 घायल हुए और 100 करोड़ रुपए से अधिक की संपत्ति का नुकसान हुआ। वहीं, कोलकाता में भी संप्रदाय विशेष द्वारा किए बम विस्फोट में 69 लोगों की जानें गईं थीं।

इसके बाद अगस्त 1993 में चेन्नई के आरएसएस कार्यालय में संप्रदाय विशेष के आतंकियों द्वारा बम विस्फोट किया गया। जिसमें 6 उच्च-स्तरीय प्रचारक सहित 11 लोग मारे गए थे। फिर 6 दिसंबर 1993 को विभिन्न ट्रेनों में विस्फोट हुए। 6 दिसंबर 1997 को तमिलनाडु में ट्रेनों में फिर से विस्फोट हुए जिसमें 10 लोग मारे गए और 70 घायल हो गए थे।

लेकिन भारतीय मीडिया ने मंदिरों को ध्वस्त करने, साथ ही साथ भारत में इस्लामिक कट्टरपंथी द्वारा किए गए इन बम विस्फोटों (1993 के मुंबई विस्फोटों को छोड़कर) को प्राथमिकता देना उचित नहीं समझा और अपना ध्यान सिर्फ बाबरी मस्जिद पर ही केंद्रित किया। इस तथ्य को भी अनदेखा किया कि यह मंदिर के विध्वंस के बाद बनाया गया था। जो कि हिंदुओं (भगवान राम की जन्मभूमि) के लिए बहुत पवित्र स्थल है। उल्लेखनीय है कि मंदिर को ध्वस्त करने से पहले वर्ष 1528 में बाबर के सैनिकों द्वारा उस स्थान पर सैकड़ों हिंदुओं का वध किया गया था।

इसके अलावा, यह भी स्पष्ट है कि पवित्र स्थल (अयोध्या) हिंदुओं का है। चाहे कोई धर्म हो, पश्चिमी या पूर्वी एशियाई या संप्रदाय विशेष ही क्यों न हो, कभी भी अपने पवित्र स्थलों को दूसरों को देने के लिए सहमत नहीं होगा। अयोध्या में दर्जनों मस्जिदें हैं। मंदिरों को भूल जाओ, मक्का और मदीना में तो गैर-इस्लामी लोगों की प्रवेश तक की अनुमति भी नहीं है।

अगर देखा जाए, तो हमने हजारों मंदिरों के विध्वंस के ऐतिहासिक संदर्भ पर कभी विचार तक नहीं किया है। जिनमें सोमनाथ, पुरी आदि पवित्र मंदिरों के साथ ही मध्यकालीन भारत में लाखों हिंदुओं का किया गया वध भी शामिल है। वहीं, 6 दिसंबर 1992 के पहले और बाद के इस्लामिक आक्रान्ताओं की क्रूरता को देखा जाए, तो अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण इस्लामिक विचारधारा के कृत्यों के लिए एक बहुत ही छोटा प्रायश्चित है।

इन घटनाओं में 1990 में अयोध्या कारसेवकों के बलिदान को भी भूला नहीं जा सकता है। साथ ही, 1992 में अयोध्या आए कारसेवक और 27 फरवरी 2002 के गोधरा नरसंहार में अपनी जान गँवाने वाले कारसेवकों पर किए गए अत्याचार को भी भुलाया नहीं जा सकता। अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण इस्लामिक आक्रांताओं की बर्बरता और हैवानियत के सामने एक बहुत ही छोटा सा उपहार नजर आता है।

कोनराड एल्स्ट के अनुसार, अगर वास्तव में देखा जाए तो संप्रदाय विशेष इस सच्चाई को जानते तो बाबरी मस्जिद के विध्वंश में आक्रोशित होने जैसा कुछ भी नहीं था। यह सिर्फ संप्रदाय विशेष के लोगों की घुसपैठ थी। लेकिन यहाँ की मीडिया ने संप्रदाय विशेष के लोगों को भड़काने का काम किया है। इसके अलावा, उनके द्वारा की गई गलत और भ्रामक रिपोर्टिंग के चलते संप्रदाय विशेष के लोगों द्वारा किए गए कृत्यों के लिए भी वही लोग दोषी हैं।

ऐसा नहीं है कि आक्रोश की कोई भावना ही नहीं होती। क्योंकि आतंकी हमला करने वाले और लोगों को मारने वाले आतंकवादी यही सोचते हैं कि सभी गैर-इस्लामी लोगों को मारना उनका कर्तव्य है। और विशेष रूप से उनका यह मानना ​​है कि मूर्तियों की पूजा और एक से अधिक भगवान होना यानी, बहुदेववाद अक्षम्य पाप है। इस विचारधारा के अनुसार, जो हिंदू मूर्तिपूजक और बहुदेववादी हैं, उनका बुरी तरह से दमन कर दिया जाना चाहिए।

पूर्व IAS अधिकारी भूरे लाल, जिन्होंने सेना में विजिलेंस कमीशन में भी सेवा की, ने अपनी पुस्तक ‘आईएसआई का राक्षसी चेहरा’ (1999 के कारगिल युद्ध के ठीक बाद वर्ष 2000 में प्रकाशित) के पेज क्रमांक 44-45 में लिखा है:

आईएसआई निम्न बातों का समर्थन करता है :

5 – घुसपैठ और बड़े पैमाने पर मीडिया पर कब्जा करने और इस्लाम-समर्थक समाचार पत्रों की पहचान कर उन्हें पाकिस्तान-समर्थक और इस्लाम-समर्थक लेख लिखने को कहना।

6 – मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार फैलाना, जिसका शिकार भारतीय संप्रदाय विशेष के लोग होते हैं।

7 – बांग्लादेशी मुस्लिम वोट बैंक पर राज करने वाले भारतीय राजनेताओं को चिन्हित करना, ताकि उन्हें पुलिस और अन्य प्रशासनिक कार्रवाई से बचाया जा सके।

12 – एजेंसी ने भारत को बदनाम करने के लिए एक ‘डिसइंफोर्मेशन’ सेल स्थापित किया और भारत को बदनाम करने के लिए कहानियाँ तैयार कीं। आईएसआई समाचारों में हेरफेर करने के लिए फंड भी देता है।

15 – आईएसआई ने हजारों एजेंटों को नौकरी पर रखा है, जिनमें हर दूसरे किसी न किसी अखबार के रिपोर्टर के तौर पर काम कर रहे हैं।

तो बार-बार संप्रदाय विशेष के लोगों को पीड़ित और प्रताड़ित के रूप में दर्शाने का काम कौन करते हैं? मीडिया उनकी कहानियों को घुमा-फिरा कर दिखाकर उन्हें मजबूर होने का एहसास कराते हैं। यह सीमा के पार बैठे हमारे दुश्मन और देश मे रह रहे इस्लामी कट्टरपंथियों की ही मदद करता है।

हमें अयोध्या श्रीराम जन्मभूमि मुद्दे और बाबरी मस्जिद के विध्वंस पर पीड़ितों के रूप में चित्रित किए जा रहे संप्रदाय विशेष के लोगों और पाकिस्तान, बांग्लादेश, कश्मीर के मामलों में की जा रही हिंसा के साथ-साथ अन्य सभी हिंदू-विरोधी कृत्यों में उनके के अपराध को उजागर करते हुए उन्हें बेनकाब करना होगा।

1993 के मुंबई बम धमाकों, 1993 के कोलकाता विस्फोटों, 1993 के RSS चेन्नई कार्यालय विस्फोटों, 1997 के तमिलनाडु ट्रेन विस्फोटों आदि मामलों पर संप्रदाय विशेष को उनके अपराधों की याद दिलाते रहनी होगी। यह इसलिए याद दिलाते रहा जाना चाहिए, ताकि बाबरी के विध्वंश को श्रीराम जन्मभूमि के साथ सदियों तक हुए अन्याय के सामने कहीं बड़ा दिखाने के उनके कारनामे सफल ना हो सकें।

पुलवामा हमले में NIA ने दायर की 13500 पन्नों की चार्जशीट: मसूद अजहर मास्टरमाइंड, 29 आरोपितों में से 12 कश्मीरी

पुलवामा में हुए आतंकी हमले के मामले में राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने मंगलवार (अगस्त 25, 2020) को चार्जशीट दायर की। पाकिस्तान समर्थित आतंकियों के नेटवर्क द्वारा किए गए इस हमले में सीआरपीएफ के 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। 13,500 पन्नों की ये चार्जशीट जम्मू की एक विशेष अदालत में दायर की गई। इसमें आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के सबसे बड़े सरगना मसूद अजहर को मुख्य आरोपित बनाया गया है। साथ ही उसके भाई अब्दुल रउफ अशर का भी नाम है, जिसने पूरी साजिश रची।

पाकिस्तानी आतंकियों ने किस तरह से एक बड़ी साजिश के तहत पुलवामा में हुए इस आत्मघाती हमले को अंजाम दिया, NIA की चार्जशीट में इसका पूरा कच्चा चिट्ठा खोला गया। इस हमले को सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया था। बता दें कि आतंकी संगठन जैश ने एक वीडियो जारी कर के इस हमले की जिम्मेदारी ली थी। पुलिस महानिरीक्षक सोनिया नारंग और पुलिस अधीक्षक राकेश बलवाल की एक टीम ने गहन जाँच-पड़ताल के बाद इस मामले में सबूत जुटाए।

जाँच में वैज्ञानिक और डिजिटल तथ्यों का सहारा लिया गया। कुल 18 महीने तक चले इंवेस्टिगेशन में पाकिस्तानी नेटवर्क और भारत में उन्हें मिली मदद को लेकर पड़ताल हुई। पुलवामा हमलों पर NIA की चार्जशीट में कुल 29 लोगों को आरोपित बनाया गया है, जिनमें 12 कश्मीरी हैं। आत्मघाती हमलावर आबिद अहमद डार के अलावा इसमें पाकिस्तान के आतंकी शामिल हैं। अब तक इस मामले में 6 लोगों को गिरफ्तार किया जा चुका है, जिनके नाम इस चार्जशीट में शामिल हैं।

याद दिलाते चलें कि इस हमलें में सीआरपीएफ के 40 जवान वीरगति को प्राप्त हो गए थे। भारत ने इस हमले का 14 दिनों के भीतर बदला ले लिया था। 14 फरवरी को भारतीय वायुसेना ने पुलवामा में हुए आतंकवादी हमले के बाद 26 फरवरी को पाकिस्तान के बालाकोट में स्थित जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर 1000 किलो का बम बरसाया था, जिससे करीब 200-300 आतंकी मारे गए थे।

अज़हर, अशगर, उसका संबंधी फारूकी (जो मारा जा चुका है) सहित उन 6 को NIA की जम्मू में स्थित विशेष अदालत में दायर चार्जशीट में आरोपित बनाया गया है। इसमें पाकिस्तान का रोल हाइलाइट करने के लिए कॉल डिटेल्स का सहारा लिया गया है। जैश ने कैसे रुपयों का अवैध ट्रांजैक्शन किया, इसके भी पूरे डिटेल्स खँगाले गए। मोहम्मद इकबाल राथर को इस मामले में गिरफ्तार किया गया था। इंशा जान और उसके पिता तारिक अहमद का भी इसमें नाम है।

ये दोनों पुत्री और पिता जैश के जमीनी आतंकी के रूप में काम कर रहे थे। इकबाल को जुलाई 2020 में ही गिरफ्तार किया गया था। उसने आतंकी उमर फारूक को पाकिस्तान से भारत में घुसपैठ कराने में मदद की थी। इसके अलावा भी जो हैं वो सब जैश के जमीनी आतंकी थे। NIA की चार्जशीट से अभी और डिटेल्स सामने आना बाकी है, जिसके आधार पर अदालत आतंकियों के खिलाफ सुनवाई करेगी और उन्हें सजा सुनाएगी। इसमें मुख्य मास्टरमाइंड मसूद अजहर ही था।

कॉन्ग्रेस के 76,000 कार्यकर्ताओं ने थामा BJP का दामन: सिंधिया के इलाके में मात्र 3 दिन में मिली बड़ी सफलता

मध्य प्रदेश में 27 विधानसभा सीटों पर चुनाव होना है, ऐसे में ज्योतिरादित्य सिंधिया का कॉन्ग्रेस छोड़ कर भाजपा में आने से पार्टी को बड़ा फायदा होता हुआ दिख रहा है। मध्य प्रदेश भाजपा ने एक आँकड़ा जारी कर के बताया है कि अकेले ग्वालियर-चम्बल संभाग में कॉन्ग्रेस के 76,361 कार्यकर्ताओं ने भाजपा का दामन थामा है। इसे ज्योतिरादित्य सिंधिया इफ़ेक्ट के रूप में देखा जा रहा है, जिससे भाजपा को फायदा होना तय माना जा रहा है।

पार्टी द्वारा जारी किए गए आँकड़ों के अनुसार, ग्वालियर, मुरैना, गुना और भिंड से इतनी बड़ी संख्या में कॉन्ग्रेस के कार्यकर्ताओं ने भाजपा का दामन थामा है। ग्वालियर और गुना शुरू से ही सिंधिया परिवार का गढ़ रहा है, जहाँ से इस परिवार के लोग जीतते रहे हैं। मध्य प्रदेश में पार्टी के हैंडल ने कहा है कि इन सभी कार्यकर्ताओं का आत्मीय अभिनन्दन है। प्रदेश अध्यक्ष वीडी शर्मा ने कहा कि हम सभी एकाकार होकर मध्यप्रदेश को नई ऊँचाई तक ले जाएँगे, यह मेरा अटल विश्वास है।

क्षेत्रभाजपा ज्वाइन करने वाले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं की संख्या
ग्वालियर 18,334
मुरैना 24,989
गुना 19,563
भिंड 13,475
कुल संख्या76,361
भाजपा में बड़ी संख्या में शामिल हुए कॉन्ग्रेसी

सबसे बड़ी बात ये है कि ये आँकड़े केवल 3 दिन के हैं, जब पार्टी ने मेगा सदस्यता अभियान चलाया। वहीं कॉन्ग्रेस ने भाजपा के इन दावों को सफ़ेद झूठ करार दिया है। ग्वालियर में 22 अगस्त से जारी मेगा सदस्यता अभियान के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चैहान, राज्यसभा सांसद ज्योतिरादित्य सिंधिया और केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर सहित कई नेताओं ने प्रचार अभियान के लिए डेरा डाला हुआ था।

वहीं ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा है कि वो इस आँकड़े के लिए जनता के समक्ष नतमस्तक हैं। उन्होंने विश्वास दिलाया कि उनके लिए कार्यकर्ताओं का सम्मान सर्वोपरि है और कहा कि उनके खून का एक-एक कतरा उन्हीं कार्यकर्ताओं को समर्पित है। चम्बल बेल्ट को इसीलिए भी सबसे प्रमुख माना जा रहा है क्योंकि जिन 27 विधानसभा सीटों पर चुनाव होने हैं, उनमें से 16 इसी क्षेत्र में आते हैं।

भाजपा ने जानबूझ कर ज्योतिरादित्य सिंधिया के गढ़ में मेगा सदस्यता अभियान चलाया, ताकि कॉन्ग्रेस पार्टी पर चुनाव से ऐन पहले मानिसक दबाव बनाया जा सके। साथ ही अगले विधानसभा चुनाव में भी पार्टी इसका पूरा फायदा उठाना चाहेगी। इसीलिए, आयोजन कर-कर के कॉन्ग्रेस के सदस्यों को भूतपूर्व कॉन्ग्रेसी बनाया जा रहा है और उन्हें भाजपाई में तब्दील किया जा रहा है। सिंधिया के साथ आए विधायकों का भी इसके लिए सहारा लिया गया।

वहीं राज्य की विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस इन आँकड़ों को फर्जी करार दे रही है। पार्टी ने अजोबोग़रीब दावा किया है कि भाजपा अपने ही पार्टी के कार्यकर्ताओं को सदस्यता दिलवा कर उन्हें पूर्व कॉन्ग्रेसी बता दे रही है। लेकिन, भाजपा ने कहा है कि वो ज़रूरत पड़ने पर आँकड़े पूरी सूची के साथ भी सार्वजनिक कर सकती है। बता दें कि इन चुनावों पर सीएम शिवराज का राजनीतिक भविष्य टिका हुआ है।

‘दिल्ली दंगा- 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ किताब अब तमिल में भी, फुटप्रिंट्स प्रकाशन का ऐलान

गरुड़ प्रकाशन के बाद चेन्नई की फुटप्रिंट्स पब्लिकेशन ने दिल्ली दंगों पर आधारित मोनिका अरोड़ा की किताब प्रकाशित करने का निर्णय लिया है। इसकी घोषणा पब्लिकेशन हाउस ने अपने ट्विटर हैंडल पर की है।

उनके अलावा किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा ने भी इस खबर की पुष्टि की है। फुटप्रिंट्स प्रकाशन की ओर से यह किताब तमिल में आएगी। इसका नाम “Delhi Riots 2020: The Untold Story in Tamil” होगा।

लेखिका मोनिका अरोड़ा ने फुटप्रिंट्स पब्लिकेशन की इस घोषणा को रीट्वीट करते हुए अपनी खुशी जाहिर की। उन्होंने लिखा कि किताब के तमिल में प्रकाशन की बात जानकर वह सम्मानित महसूस कर रही हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले ब्लूम्सबरी (Bloomsbury) प्रकाशन समूह दिल्ली दंगों पर आधारित किताब Delhi Riots 2020: The Untold Story को प्रकाशित करने वाला था। लेकिन इस्लामी और वामपंथियों के दबाव में आकर उसने किताब का प्रकाशन रोक दिया। जिसके बाद इस किताब को गरुड़ प्रकाशन समूह ने प्रकाशित करने का ऐलान किया। इस किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितालकर और प्रेरणा मल्होत्रा हैं।

गरुड़ प्रकाशन से किताब आने की घोषणा होने के बाद तमिलनाडू के भाजपा प्रवक्ता एसजी सूर्य ने फुटप्रिंट्स पब्लिकेशन से इस किताब को तमिल में लाने का प्रस्ताव उनके सामने रखा। जिसे गरुड़ प्रकाशन के निदेशक संक्रांत सानु ने स्वीकार कर लिया। अपने ट्वीट में उन्होंने इस किताब को स्थानीय भाषा में लाने के प्रस्ताव को मानते हुए कहा कि हर भारतीय भाषा में इंडिक किताबों के अनुवाद और वितरण के लिए नेटवर्क होना चाहिए।

बता दें कि बीते दिन (22 अगस्त 2020) इस किताब के वर्चुअल विमोचन के दौरान ब्लूम्सबरी यूके मुख्यालय से दबाव बनाया गया और प्रकाशन समूह ने अचानक ही किताब प्रकाशित करने से मना कर दिया था। किताब की लेखिका मोनिका अरोड़ा ने इस बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोगों की भावना देखते हुए उन्होंने फैसला किया है कि गरुड़ प्रकाशन समूह के साथ जाएँगे। यह फ़िलहाल स्टार्टअप की तरह चल रहा है।

लेखिका ने ब्लूम्सबरी प्रकाशन समूह को इस संबंध में मेल भी किया था। लेकिन वहाँ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उन्होंने यह फैसला किया। मेल में उन्होंने साफ़ तौर पर पूछा कि क्या वह इस किताब का प्रकाशन रोक रहे हैं? वह इस बात को लिखित में दें लेकिन ब्लूम्सबरी ने फोन पर ही इस बात की जानकारी दी। यानी समझौता ख़त्म करने के लिए कोई लिखित कार्रवाई नहीं की गई।

मौत के कुछ घंटे बाद ही किचन में खाना बना रहे थे फ्लैटमेट्स, जैसे कहीं कुछ हुआ ही नहीं: सुशांत सिंह राजपूत का परिवार

बॉलीवुड एक्टर सुशांत सिंह राजपूत कथित सुसाइड केस में सीबीआई जाँच कर रही है। सीबीआई ने सुशांत सिंह के करीबियों के बयान लेने से लेकर उनके फ्लैट से कई आवश्यक सामान भी इकट्ठे किए हैं। महाराष्ट्र पुलिस से केस ट्रांसफर किए जाने के बाद अब सीबीआई की टीम जाँच के लिए कई बार सुशांत के घर पर भी गई।

सुशांत की फैमिली से जुड़े सूत्रों ने दावा किया है कि जिस दिन सुशांत का निधन हुआ था, उसके बाद उनके फ्लैटमेट्स किचन में खाना बना रहे थे। टाइम्स नाऊ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सुशांत की फैमिली से जुड़े कुछ सूत्रों ने बताया है कि 14 जून को सुशांत के निधन के बाद जब उनकी फैमिली रात को उनके फ्लैट पर पहुँची थी तो वहाँ मौजूद सभी लोग बेहद सामान्य नजर आ रहे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, सुशांत के सभी फ्लैटमेट्स रात को किचन में खाना बना रहे थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। परिजनों ने बताया कि वो रात के 11:00-11:30 के आस-पास फ्लैट पर पहुँचे थे, जहाँ पर दोपहर में तकरीबन 1 बजे एक्टर को मृत पाया गया था।

जब सुशांत का परिवार वहाँ पहुँचा तो उन्होंने कुक को किचेन में खाना बनाते देखा। अन्य फ्लैटमेट्स भी काफी सामान्य दिख रहे थे। वो बाकी दिनों की तरह ही अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे। कोई खाना खा रहा था, तो कोई सफाई कर रहा था। परिवार के लोगों का कहना है कि आखिर सुशांत की मौत के कुछ घंटों बाद ही घर में मौजूद चारों लोग इतना सामान्य व्यवहार कैसे कर सकते हैं। शायद इसीलिए सीबीआई लगातार पिछले 5 दिनों से कुक नीरज और सिद्धार्थ पिठानी से पूछताछ कर रही है। इसके अलावा सीबीआई लगातार सुशांत के स्टाफ दीपेश सावंत और केशव से भी पूछताछ कर रही है।

सवाल उठ रहे हैं कि मुंबई पुलिस ने इस एंगल की जाँच क्यों नहीं की? पड़ोसियों का दावा है कि सुशांत सिंह राजपूत के फ्लैट में रोशनी जल्दी बंद हो गई थी और कुछ असामान्य था। तो क्या 13 जून को ही सुशांत सिंह राजपूत की हत्या हुई थी?

गौरतलब है कि जिस मकान में सुशांत सिंह राजपूत का 14 जून को शव लटका हुआ मिला था, वहाँ पर पड़ोसी ने बड़ा खुलासा करते हुए कहा था कि 13 जून की रात करीब 10.30-10.45 के बीच सुशांत राजपूत के कमरे की सभी लाइट्स बंद हो गई थी। सिर्फ किचन की लाइट जल रही थी।

उन्‍होंने कहा, “सुशांत के घर की लाइट 13 जून की रात को 10.30-10.45 बजे अचानक बंद हो गई थी। ऐसा अमूमन नहीं होता था, क्‍योंकि वह देर तक जागते थे। लेकिन उस दिन किचन की लाइट को छोड़कर बाकी सारी लाइट्स जल्‍दी बंद हो गई थीं।” पड़ोसी ने यह भी बताया था कि उस रात सुशांत सिंह के घर में किसी तरह की कोई पार्टी नहीं हुई थी। पड़ोसी महिला का कहना था कि लाइट्स का बंद होना जरूर मामले में संदेह पैदा करता है कि ऐसा क्‍यों हुआ था।

82 वर्षीय सास को बेहरमी से मारने वाली महिला हुई गिरफ्तार, Video वायरल होने के बाद उठी थी कार्रवाई की माँग

सोशल मीडिया पर पिछले दिनों इंसानियत को शर्मसार करती एक वीडियो वायरल हुई। इस वीडियो में एक बुजुर्ग महिला को दूसरी औरत डस्टपैन से मारती देखी गई। वीडियो को लेकर दावा किया गया कि वह औरत वृद्धा की बहु है। इस बर्बरता को देख सोशल मीडिया पर बहु की गिरफ्तारी की माँग उठने लगी। अब ताजा खबर है कि हरियाणा पुलिस ने आखिरकार इस महिला को गिरफ्तार कर लिया है।

अपनी 82 वर्षीय सास को प्रताड़ित करने वाली इस बहु का नाम सरोज है और ये सारी घटना हरियाणा के सोनिपत सेक्टर 23 की है। महिला के अलावा उसकी माँ को भी गिरफ्तार किया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, इस संबंध में महिला के पति ने ही अपनी माँ को प्रताड़ित करने के आरोप में उसके ख़िलाफ़ शिकायत करवाई थी। इसके बाद इस मामले को कई आईपीसी धाराओं के तहत दर्ज किया गया।

मीडिया सूत्रों से यह पता चला है कि महिला ककरोई रोड पर बनी एक डिस्पेंसरी में एएनएम के तौर पर काम करती है। अपनी सास को पीटते हुए उसकी यह वीडियो उसके बच्चे ने मोबाइल फोन पर बनाई थी और बाद में इसे उसने अपने पिता को भेज दिया।

कई जानी-मानी हस्तियों ने इस मामले पर संज्ञान लिया। भाजपा नेता तजिंदर पाल सिंह बग्गा ने भी इसे अपने ट्विटर पर शेयर किया और इस पर अधिक जानकारी माँगी। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने भी इस वीडियो को शेयर करते हुए प्रताड़ित महिला की मदद करने का आश्वासन दिया।

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट वकील प्रतीक सोम ने भी इस मामले को उठाया है। सरोज की गिरफ्तारी के बाद उन्होंने इस संबंध में ट्वीट भी किया। उन्होंने बताया कि यह वीडियो सरोज के बच्चे ने एक्सीडेंटली बना ली थी।

गौरतलब है कि इस वीडियो के सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद लोगों की तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ आई थी। यूजर्स ने इस महिला को जेल में डालकर वृद्धा की मदद और पुनर्वास की गुहार लगाई थी।

लोगों का कहना है कि जो महिला घर में बुजुर्गों का स्वास्थ्य नहीं देख पा रही, वो स्वास्थ्य विभाग में बैठी है। इसी तरह एक महिला लिखतीं हैं कि ऐसी महिलाएँ समाज में यातनाओं को जन्म देती हैं, अगली पीढी भी इनके दिखाए कदमों पर ही चलेगी। बुढापे में अकेलापन ऐसी यातना और घुटन से बहुत बेहतर हैं।

प्रशांत भूषण के पास 30 मिनट का और समय, अपनी टिप्पणी के जवाब में जो बयान दिया, वह ज्यादा अपमानजनक: SC

अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने आज प्रशांत भूषण को लेकर कहा कि उन्हें चेतावनी देकर छोड़ दिया जाना चाहिए और उन्हें सजा नहीं दी जानी चाहिए। इसके जवाब में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रशांत भूषण ने अपनी टिप्पणी के जवाब में जो बयान दिया है, वह ज्यादा अपमानजनक है। बता दें कि प्रशांत भूषण ने भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे पर सुप्रीम कोर्ट में अपने ट्वीट्स के लिए माफी माँगने से इनकार कर दिया है।

ज्ञात हो कि पिछली सुनवाई में प्रशांत भूषण ने वर्ष 2009 में दिए अपने बयान पर खेद जताया था लेकिन बिना शर्त माफ़ी नहीं माँगी थी। उन्होंने कहा था कि तब मेरे कहने का तात्पर्य भ्रष्टाचार कहना नहीं था, बल्कि सही तरीक़े से कर्तव्य न निभाने की बात थी। दरअसल, वर्ष 2009 में एक इंटरव्यू में वकील भूषण ने सुप्रीम कोर्ट के 8 पूर्व चीफ़ जस्टिस को भ्रष्ट कहा था।

सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल ने कहा कि न्यायपालिका में करप्शन को लेकर कई पूर्व जज बोल चुके हैं। इस लिहाज से प्रशांत भूषण को भी एक चेतावनी देकर छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि ऐसे बयान सिर्फ कोर्ट को ये बताने के लिए दिए जाते हैं कि आप अस्पष्ट दिख रहे हैं और आप में भी सुधार की जरूरत है। सरकारी वकील ने कहा कि उन्हें सिर्फ ऐसे बयान दोबारा नहीं देने की चेतावनी देकर छोड़ देना चाहिए।

अटॉर्नी जनरल के सुझाव पर प्रतिक्रिया देते हुए, न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा, “लेकिन वह यह नहीं सोचते कि उन्होंने जो भी किया, वह गलत था। उन्होंने माफी नहीं माँगी… लोग गलती करते हैं, कभी-कभी तो गलती से भी गलती हो जाती है। यह मत सोचो कि उसने कुछ गलत किया है। क्या करें जब कोई यह नहीं सोचता कि उन्होंने कुछ गलत किया है?”

जस्टिस मिश्रा के सवाल पर केके वेणुगोपाल ने जवाब दिया, “मैं खुद प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना ​​दायर करना चाहता था, जब दो सीबीआई अधिकारी लड़ रहे थे, और उन्होंने कहा कि मैंने दस्तावेजों से छेड़खानी की है। लेकिन बाद में उन्होंने खेद व्यक्त किया, तो मैं पीछे हट गया। ऐसे में लोकतंत्र का पालन कर उन्हें फ्री स्पीच के नाम पर छोड़ दिया जाना चाहिए।”

जस्टिस मिश्रा ने इसके जवाब में कहा कि जब वो यही नहीं मानते हैं कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो फिर ऐसे में चेतावनी देने का भी क्या औचित्य रह जाता है? जस्टिस मिश्रा ने कहा कि कोर्ट प्रशांत भूषण और उनके वकील धवन को 30 मिनट का और समय देती है ताकि वो इस पर ‘विचार’ करें।

ठेले पर बेचना पड़ा समोसा-चाट तो सुहैल और शोएब ने दरगाह के पास ऑफिस वाले बाबू को मारी गोली

बेंगलुरु में केआर पुरम पुलिस ने शनिवार (अगस्त 22, 2020) रात एक उद्योगपति पर गोली चलाने वाले दो आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया। इनकी पहचान मोहम्मद सुहैल पाशा (23) और शोएब (19) के रूप में हुई। इन पर आरोप है कि इन्होंने बाबू नाम के व्यक्ति पर देशी कट्टे से गोली दागी और धारधार हथियार से उन पर हमला बोला।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पुलिस ने इन दोनों की गिरफ्तारी के बाद हमले में इस्तेमाल किए गए हथियार बरामद कर लिए हैं। इसके साथ ही इनके पास से एक कार भी मिली है। दोनों केआर पुरम के रहने वाले हैं। उद्योगपति से विवाद के बाद इन्होंने उस पर हमला बोला था।

पुलिस ने बताया कि सुहैल और उसका साथी मिर्जा केआर पुरम में दरगाह के पास अरुधंती कॉलनी में समोसे चाट चाय की दुकान चलाते थे। वहीं बाबू का पास में ऑफिस था। एक दिन इन दोनों ने बहुत देर तक अपनी दुकान खोले रखी और ग्राहकों के वाहनों के कारण बाबू के दफ्तर का रास्ता ब्लाक हो गया। जिससे उसे गुस्सा आया और उसकी मिर्जा से बहस हो गई। इस बीच पुलिस ने दोनों पक्षों को झगड़ा न करने की सलाह दी और चेतावनी देकर छोड़ दिया।

बाबू ने इस बहस के बाद बिल्डिंग के मालिक को शिकायत की, जिसकी वजह से मिर्जा के व्यवसाय पर फर्क पड़ा। दोनों से वह दुकान खाली करवा दी गई और सुहैल को फुटपाथ पर ठेला में चाट समोसे बेचने पड़े। बाबू ने यह देखकर उनका मजाक भी उड़ाया। इसके कारण फिर दोनों पक्षों में जोरदार झगड़ा हुए।

अब सोहेल ने मिर्जा के साथ मिलकर बदला लेने का प्लान बनाया। सुहैल ने अपने साथी शोएब के साथ पूरे प्लान तैयार किया और मौका देखते ही शनिवार रात बाबू पर हमला बोल दिया। घटना में बाबू का बायां हाथ जख्मी हो गया। बाद में उन्हें निजी अस्पताल में भर्ती करवाया गया। अब उनकी स्थिति खतरे से बाहर है।

दोनों की गिरफ्तारी चामराजनगर जिले के कोल्लेगल के पास एक गाँव से हुई। पुलिस अब पूरे मामले में मिर्जा की खोजबीन करने में लगी हुई है। इसके साथ ही ये भी पता लगाया जा रहा है कि क्या इस हमले में कोई और भी शामिल था और साथ ही ये जानने की कोशिश हो रही है कि आरोपितों ने बंदूक का इंतजाम कहाँ से किया।

दूसरे राज्यों से आए नेताओं से नहीं मिलते हैं सोनिया-राहुल: लाल बहादुर शास्त्री के बेटे ने कहा- प्रियंका बनें अध्यक्ष

कॉन्ग्रेस में बढ़ती कलह के बीच अब पार्टी के वरिष्ठ नेता और दिवंगत प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के बेटे अनिल शास्त्री ने अपनी बात रखते हुए कहा है कि पार्टी नेतृत्व में कुछ कमी है। उन्होंने कहा कि सोनिया गाँधी और राहुल गाँधी पार्टी नेताओं से नहीं मिलते हैं। उन्होंने सलाह दी कि अगर सोनिया-राहुल नेताओं से मिलना-जुलना शुरू कर दें तो आधी समस्या अपने-आप हल हो जाएगी। अनिल शास्त्री कॉन्ग्रेस के हिंदी विभाग के अध्यक्ष हैं।

हालाँकि, उन्होंने ये भी कहा कि प्रियंका गाँधी या राहुल गाँधी में से किसी एक को पार्टी अध्यक्ष बनना चाहिए। उन्होंने गाँधी परिवार से ही किसी को अध्यक्ष बनाए जाने की वकालत की। उन्होंने कहा कि कुछ चीजें हैं, जो पार्टी नेतृत्व में कमी की ओर इशारा करती है और नेताओं के बीच बैठकें ही नहीं होती हैं। उन्होंने कहा कि जब दूसरे राज्यों से कोई नेता दिल्ली आता है, तो राहुल-सोनिया से उनका मिलना मुश्किल हो जाता है।

अनिल शास्त्री का बयान ऐसे समय में आया है, जब वर्किंग कमिटी की बैठक में सोनिया गाँधी के अध्यक्ष बने रहने का फैसला किया गया और कॉन्ग्रेस का अधिवेशन होने तक उनकी मदद के लिए नेताओं की एक टीम गठित करने की बात कही गई। बैठक में उन नेताओं के प्रति नाराजगी जताई गई, जिन्होंने पत्र लिख कर पार्टी में सुधार की माँग की थी। कॉन्ग्रेस अधिवेशन में राहुल गाँधी के फिर से अध्यक्ष बनने की बात तय मानी जा रही है।

अनिल शास्त्री दिल्ली, बरेली, इंदौर और प्रयागराज में लाल बहादुर शास्त्री के नाम पर स्थापित शिक्षण संस्थानों के अध्यक्ष हैं। वो काफी समय से राजनीति में सक्रिय हैं। 1989 में उन्होंने वाराणसी से लोकसभा का चुनाव जीता था, जिसके बाद वो केंद्रीय मंत्री भी बने थे। उन्होंने कहा है कि कॉन्ग्रेस में एक सिंडिकेट उभर रहा है, ऐसे में प्रियंका गाँधी को अध्यक्ष बनाना सबसे अच्छा विकल्प हो सकता है।

उन्होंने कहा कि प्रियंका गाँधी की पूरे कॉन्ग्रेस कैडर में गजब की स्वीकार्यता है और वो पहले ही साबित कर चुकी हैं कि वो एक परिपक्व नेता हैं। उन्होंने 23 नेताओं पर निशाना साधते हुए कहा कि पत्र लिख कर उसे सार्वजनिक करना मतलब पार्टी को मजबूत करना नहीं है। उन्होंने कहा कि राहुल गाँधी की वापसी से डरे लोग उन्हें रोकने के लिए ऐसा कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि गाँधी परिवार के बिना कॉन्ग्रेस अस्तित्व में ही नहीं रहेगी।

कॉन्ग्रेस में कलह पर अनिल शास्त्री ने रखी अपनी बात

ज्ञात हो कि बगावत के ये तेवर जो आज दिख रहे हैं, इसकी नींव 5 महीने पहले ही पड़ गई थी। कॉन्ग्रेस में रिफॉर्म की माँग के लिए एजेंडा शशि थरूर द्वारा आयोजित एक डिनर पार्टी में ही तैयार कर लिया गया था, जिसमें कई कॉन्ग्रेस नेता शामिल हुए थे। इसका ही परिणाम सोनिया गाँधी को पत्र भेजे जाने के रूप में सामने आया। थरूर के डिनर में इस बात पर चर्चा हुई थी कि पार्टी का जीर्णोद्धार कैसे किया जाए और इसकी सेक्युलर विचारधारा की तरफ कैसे लौटा जाए।