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एक हफ्ते के भीतर राम मंदिर को बम से उड़ाना चाहता था आतंकी युसूफ, खुद के तैयार किए बम का कर चुका था टेस्ट

दिल्ली में गिरफ्तार किए गए ISIS के आतंकी अबू युसूफ खान के ठिकानों और उससे जुड़े लोगों की तलाश के लिए दिल्ली पुलिस और यूपी एटीएफ बलरामपुर पहुँची हुई है, जहाँ उसका निवास स्थान है। सभी टीमें उतरौला कोतवाली क्षेत्र के बढ़या भैसाही ग्राम में उसके साथी आतंकी युसूफ के घर में तलाशी अभियान चला रही है। आरोपित की निशानदेही पर उसके घर के पास स्थित तालाब से मानव बम में प्रयोग किए जाने वाले दो जैकेट जब्त किए गए हैं।

साथ ही उसके घर से विस्फोटक व आपत्तिजनक साहित्य भी बरामद किए गए हैं, जिनकी जाँच की जा रही है। एक और बड़ा खुलासा हुआ है कि ISIS आतंकी अबू युसूफ खान अयोध्या में राम मंदिर स्थल को बम से उड़ाना चाहता था, जहाँ हाल ही में भूमिपूजन का कार्यक्रम संपन्न हुआ है। बलरामपुर पुलिस की इस बात को लेकर आलोचना हो रही है कि उनके इलाक़े के आतंकी की भनक उसे ही नहीं लगी।

शनिवार (अगस्त 22, 2020) की सुबह 11 बजे पुलिस की टीमें बलरामपुर पहुँची। इसके उतरौला कोतवाली के बढ़या भैसाही ग्राम को चारों ओर से सील कर के स्थानीय पुलिस ने तलाशी अभियान शुरू किया। गाँव में आने-जाने पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। यहाँ तक कि मीडियाकर्मियों को भी वहाँ प्रवेश की अनुमति नहीं दी गई। आतंकी मुस्तकीन शुक्रवार की सुबह ही घर से भाग खड़ा हुआ था, ऐसा पता चला है।

लगभग 10 बजे उसने परिजनों को फोन करके बताया कि वह लखनऊ निवासी अपने मामा के यहाँ गया है, जहाँ उसका ममेरा भाई बीमार है। इसके बाद उसका मोबाइल फोन बंद हो गया। साथ ही वह अपने मामा के यहाँ भी नहीं पहुँचा। लखनऊ में उसके पहुँचने के बाद परिजन रात भर उसे फोन करते रहे। इसके बाद थाने में उसकी गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई गई। इसके बाद पुलिस सक्रिय हुई।

उसके पिता ने कहा है कि अबु युसुफ की रीढ़ की हड्डी खिसकी हुई है, जिसका 2 साल से लखनऊ में इलाज चल रहा है। वो शुक्रवार को लखनऊ में अपने मामा के बेटे की किडनी के इलाज के लिए गया था। उसने अपनी बहन को बताया कि वो उसके घर पर रुकेगा पर वहाँ पहुँचा नहीं और उसका फोन बंद आने लगा। उसके भाई आकिब ने कहा कि उसे ISIS के झंडे की पहचान नहीं है पर रात को झंडा देखा। काले रंग के झंडे पर सफेद रंग से अरबी में ‘अल्लाह हू अकबर ला इलाहा इल्लल्लाह मुहम्मदुन रसूलुल्लाह‘ लिखा था। वो सऊदी और अन्य जगहों पर रहे थे।

वहीं ISIS आतंकी अबू युसूफ खान के घर से दो मानव बम जैकेट, विस्फोटक और भड़काऊ साहित्य के अलावा पत्नी तथा चार बच्चों के पासपोर्ट बरामद करने में पुलिस ने सफलता पाई है। बलरामपुर में तलाशी के बाद देर रात दिल्ली पुलिस आतंकी को लेकर वापस राष्ट्रीय राजधानी के लिए निकल गई। उससे जुड़े 3 लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है। पूरी यूपी अलर्ट पर है। राम मंदिर को लेकर गुस्से में आतंकी उसे एक हफ्ते के भीतर विस्फोट करना चाहते थे।

उसने अपने आकाओं के आदेश पर खुद बम तैयार किया था, जिसमें बस टाइमर लगाने की देरी थी। उसने दिसंबर 2019 में अपने गाँव के कब्रिस्तान में छोटी डिवाइस के साथ बम का टेस्ट भी किया था। पुलिस उससे पूछताछ कर पता लगा रही है कि वाकई में उसने बम खुद ही तैयार किए थे या फिर उसे किसी और ने ये दिए थे।

ज्ञात हो कि ISIS आतंकी अबू युसूफ खान को दिल्ली के करोलबाग और धौलाकुआँ के बीच रिज रोड इलाके से गिरफ्तार किया गया था। उसने पुलिस पर फायरिंग भी की थी। पुलिस ने उस पिस्टल को भी जब्त कर लिया है, जिसका इस्तेमाल कर उसने गोली चलाई थी। गिरफ्तार करने से पहले पुलिस और आतंकी के बीच कुछ देर तक शूटआउट भी चला। उसे आधी रात 12 बजे के करीब गिरफ्तार किया गया। 

7 लोगों ने किया गैंगरेप और वीडियो कर दिया वायरल: एक महीने बाद वीडियो के कारण ही 6 गिरफ्तार

बिहार के पटना के गौरीचक थाना क्षेत्र में एक 45 वर्षीय विधवा महिला के साथ सात लोगों ने सामूहिक बलात्कार किया। पुलिस ने इस मामले में सात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है और छह आरोपितों को गिरफ्तार किया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, आरोपितों ने न केवल महिला के साथ सामूहिक बलात्कार किया बल्कि इस दरिंदगी का वीडियो भी रिकॉर्ड कर लिया। इसके बाद उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो को वायरल भी कर दिया। सोशल मीडिया पर बलात्कार का वीडियो सामने आने के बाद पटना गौरीचक पुलिस स्टेशन ने शुक्रवार देर रात मामले को संज्ञान में लेते हुए केस दर्ज किया।

पुलिस अधिकारियों ने इसके बाद गौरीचक पुलिस थाना क्षेत्र के पास एक गाँव से पीड़िता को खोज निकाला। उनका बयान दर्ज करने के बाद पुलिस आरोपितों की गिरफ्तारी में जुट गई।

कथित तौर पर, महिला गाँव से बाहर काम करने जाती थीं। काम कर वह अपने गाँव वापस लौट रही थीं, जिस दौरान यह घटना घटित हुई। पीड़िता एक ऑटो-रिक्शा पर सवार थी। तभी एक आरोपित मोटरसाइकिल से उनके पास आया और उन्हें घर छोड़ने के लिए कहा।

इसके बाद आरोपित महिला को घर छोड़ने की जगह एक सुनसान इलाके में ले गया और अपनी मोटरसाइकिल को एक अलग जगह पर खड़ा कर दिया। जिसके बाद वहाँ पर छह युवक और आ गए। उन दरिन्दों ने महिला के साथ बलात्कार किया और पूरी घटना के वीडियो को मोबाइल में रिकॉर्ड कर लिया।

बाद में, उन्होंने पीड़िता को उनके घर के पास छोड़ दिया और घटना के बारे में किसी को बताने पर उनके परिवार के सदस्यों को जान से मारने की धमकी दी। पुलिस को दिए गए बयान में महिला ने कहा है कि आरोपी नशे में थे और यहाँ तक ​​कि उसे भी शराब पीने के लिए मजबूर कर रहे थे।

गैंगरेप मामले के बारे में जानकारी देते हुए एसएसपी उपेंद्र शर्मा ने कहा, ”घटना एक महीने पहले हुई थी। पीड़ित की उम्र लगभग 45 वर्ष है और वह विधवा है।” पीड़िता ने कहा कि वह समाज के डर से शिकायत के लिए पुलिस के पास नहीं गई।

‘मेरी किताब अब ब्लूम्सबरी से नहीं छपेगी’ – लेखकों ने रद्द किया कॉन्ट्रैक्ट, दिल्ली दंगों पर ‘सच्ची किताब’ सेंसर मामला

जैसे ही प्रकाशन संस्था ब्लूम्सबरी ने दिल्ली दंगों की सच्चाई बताने वाली पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन रोकने का फैसला किया, भारत के कई लेखकों ने उसके साथ अपने करार को ख़त्म कर दिया। लेखकों ने इस निर्णय के विरोध प्रदर्शन के रूप में अपनी आने वाली पुस्तकों के लिए ब्लूम्सबरी को प्रकाशक के रूप में हटा दिया। कई लेखकों ने प्रकाशन संस्था की इस मनमानी का विरोध किया है।

बता दें कि ब्लूम्सबरी ने इस्लामी कट्टरवादी और वामपंथी लॉबी के आगे झुकते हुए ये फैसला लिया। जेएनयू के प्रोफेसर और वैज्ञानिक आनंद रंगनाथन को ब्लूम्सबरी ने एडवांस में रुपए दिए हैं, ताकि वो उनकी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार पा सके। रंगनाथन ने घोषणा की है कि अगर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन रोकने का फैसला वापस नहीं लिया जाता है वो और उनके सह-लेखक उस धनराशि को वापस लौटा देंगे और अपनी आगामी पुस्तक का प्रकाशन अधिकार भी उससे छीन लेंगे

उन्होंने कहा कि कम्पनी ने जिस तरह से वामपंथी और इस्लामी लॉबी के आगे घुटने टेके हैं, इससे वो चकित हैं। उन्होंने कहा कि फासिस्ट ताकतों के दबाव में ब्लूम्सबरी द्वारा लिए गए इस निर्णय का हर एक लेखक और पाठक को विरोध करना चाहिए। ब्लूम्सबरी की वेबसाइट के अनुसार, आनंद और शीतल रंगनाथन की पुस्तक ‘फॉरगॉटन हीरोज ऑफ़ इंडियन साइंस’ जुलाई 2021 में रिलीज होने वाली है।

इससे पहले कम्पनी ने इन्हीं लेखक (आनंद रंगनाथन) के उपन्यास ‘द रैट ईटर’ को प्रकाशित किया था। लेखक संदीप देव ने भी घोषणा की है कि वो इस प्रकाशन संस्था से वो सारी किताबों के प्रकाशन अधिकार वापस ले रहे हैं, जो भविष्य में आने वाली थी। उन्होंने कम्पनी की ताज़ा हरकत को विचारों की हत्या करार देते हुए कहा कि उसने वामपंथी लॉबी के दबाव में आकर दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगाई है।

संदीप देव की अब तक 6 पुस्तकें ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित की जा चुकी है और आगे 9 ऐसी पुस्तकें आने वाली थीं, जिनका प्रकाशन उक्त कम्पनी को ही करना है। उन्होंने उन सभी 9 किताबों के प्रकाशन का अधिकार ब्लूम्सबरी से छीन लिया है। उन्होंने घोषणा की है कि वो इस कम्पनी के साथ अब भविष्य में कभी काम नहीं करेंगे। वो अंग्रेजी, हिंदी, पंजाबी और मराठी में कई पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं।

आईएएस अधिकारी संजय दीक्षित ने भी Nullifying Article 370और Enacting CAA नामक पुस्तकों को ब्लूम्सबरी से प्रकाशित न कराने का फैसला लिया है। ये पुस्तकें 20 सितम्बर को ही रिलीज होने वाली थी। उन्होंने प्रकाशन संस्था के सेंसरशिप को अस्वीकार्य करार देते हुए कहा कि वो उनके साथ अपने संबंधों को ख़त्म कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि कम्पनी को भी दर्द होना चाहिए, इसीलिए वो पब्लिशिंग हटाने वाला पत्र उसे लिख रहे हैं।

संजय दीक्षित ने तो उसके द्वारा प्रकाशित की जाने वाली हैरी पॉटर सीरीज की किताबों का भी सम्पूर्ण बहिष्कार करने की अपील की। उन्होंने कहा कि रोज के 10-15 करोड़ रुपए तो कम्पनी इसी टाइटल से कमा लेती है, इसीलिए हमें इन किताबों को न खरीदने का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने एक यूजर की सलाह पर ये भी कहा कि अगर कम्पनी अगले कुछ दिनों में इस निर्णय को वापस नहीं लेती है तो हैरी पॉटर सीरीज की पुस्तकों को सार्वजनिक रूप से जलाया जाना चाहिए।

अर्थशास्त्री संजीव सान्याल ने घोषणा की है कि वो ब्लूम्सबरी से अपनी किसी भी पुस्तक का प्रकाशन नहीं कराएँगे। उन्होंने कहा कि प्रकाशन जगत में चंद लोगों का बड़ा प्रभाव और एक लॉबी के एकाधिकार को लेकर उन्होंने पहले भी आवाज़ उठाई है। उन्होंने इसे वैचारिक सेंसरशिप करार दिया। हरसद मधुसूदन ने भी ऐसा ही ऐलान किया है। इस बीच गरुड़ प्रकाशन ब्लूम्सबरी से हटाई गई पुस्तकों के प्रकाशन के लिए आगे आया है।

वहीं फाइनेंस प्रोफेशनल और संस्कृत विशेषज्ञ नित्यानंद मिश्रा ने भी ऐलान किया है कि उन्होंने ‘सुनामा: ब्यूटिफुल संस्कृत नेम्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन ब्लूम्सबरी से न कराने का फैसला लिया है। इससे पहले इसका प्रकाशन वही करने वाली थी। उन्होंने कहा एक संगठित लॉबी एक विचारधारा के विरुद्ध है और दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक के लेखकों के प्रति समर्थन जताते हुए वो ये निर्णय ले रहे हैं।

वो अब तक ब्लूम्सबरी के साथ 5 पुस्तकें प्रकाशित कर चुके हैं और छठी आने वाली थी। उन्होंने कहा कि इसके अलावा भी कई अन्य पुस्तकों को लेकर बातचीत चल रही थी, जो अब उक्त प्रकाशन संस्था के साथ नहीं आएगी। हालाँकि, इस कारण उनकी अगली पुस्तक कुछ हफ़्तों बाद रिलीज हो सकेगी। उन्होंने दूसरे पब्लिशरों को उनसे संपर्क करने को कहा है और पाठकों से देरी के लिए माफ़ी माँगी है।

इधर आतिश तासीर ने मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक को सत्ता का प्रोपेगेंडा करार देते हुए कहा कि विलियम डेलरिम्पल ने इसके प्रकाशन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि स्कॉटिश लेखक के बिना ये संभव नहीं हो पाता। मोनिका अरोड़ा की इस पुस्तक में जाँच और इंटरव्यूज के हवाले से दिल्ली दंगों का विश्लेषण किया गया है।

अंकित शर्मा की हत्या के लिए ताहिर हुसैन जिम्मेदार, घर और मस्जिद से किया दंगाइयों का नेतृत्व: अदालत

दिल्ली की एक अदालत ने शुक्रवार (21 अगस्त, 2020) को फरवरी में हुए हिंदू विरोधी दंगों में शामिल AAP के पूर्व नेता ताहिर हुसैन के खिलाफ दायर चार्जशीट पर संज्ञान लेते हुए कहा कि ताहिर हुसैन के उकसावे पर संप्रदाय विशेष के लोग हिंसक हो गए और हिंदू समुदाय पर पथराव शुरू कर दिया था।

रिपोर्ट्स के अनुसार, अदालत ने फरवरी में उत्तर-पूर्व दिल्ली में हुए हिंदु विरोधी दंगों के दौरान खुफिया (आईबी) अधिकारी अंकित शर्मा की हत्या से संबंधित मामले और दंगों को भड़काने में हुसैन की भूमिका के खिलाफ दायर आरोपपत्र का संज्ञान लेते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने आरोपितों के खिलाफ प्रोडक्शन वारंट भी जारी किया और उन्हें 28 अगस्त को वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए पेश करने का निर्देश दिया।

हालाँकि, पुलिस ने बताया कि उन्हें हुसैन और अन्य सह-अभियुक्तों से इस मामले में संबंधित अधिकारियों से राजद्रोह के मामले में चार्ज लेने की मंजूरी मिलनी बाकी है।

मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट पुरुषोत्तम पाठक ने कहा कि हालाँकि मंजूरी प्राप्त करने के लिए कोई समय सीमा निर्धारित नहीं है और मामले में किसी देरी से वह मकसद पूरा नहीं होगा, जिसके लिए दंगा मामलों की सुनवाई की खातिर विशेष अदालतें बनाई गई हैं।

न्यायाधीश ने अपने आदेश में कहा, ”मेरा विचार है कि आरोपितों द्वारा किए गए अपराधों का संज्ञान लेने के लिए रिकॉर्ड में पर्याप्त सामग्री है।”

दिल्ली पुलिस द्वारा दायर आरोप-पत्र का संज्ञान लेते हुए, अदालत ने कहा कि दिल्ली में हिंदू-विरोध दंगे एक “सुनियोजित तरीके” से हुए और इसके लिए “अच्छी तरह से साजिश रची गई।” और भीड़ के नेता ताहिर हुसैन और अन्य सह-आरोपियों द्वारा कथित तौर पर इसे बढ़ावा दिया गया।

अदालत ने कहा, “आरोपी ताहिर हुसैन ने उन्हें अपनी इमारत की छत पर जाने की सुविधा दी और अन्य सहायता प्रदान की ताकि बड़े पैमाने पर दंगे हो सकें और दूसरे समुदाय के जानमाल और संपत्ति का नुकसान हो।”

अदालत ने कहा, ”प्रथम दृष्टया आरोपी ताहिर हुसैन अपने घर से और 24 तथा 25 फरवरी को चांद बाग पुलिया के पास मस्जिद से भी भीड़ का नेतृत्व कर रहे थे। अदालत ने कहा कि साजिश के तहत हसीन, नाजिम, कासिम, समीर खान, अनस, फिरोज, जावेद, गुलफाम और शोएब आलम के साथ गैरकानूनी भीड़ को इकट्ठा करने में ताहिर की महत्वपूर्ण भूमिका थी।

कोर्ट ने कहा, “उन्होंने हिंदुओं और संप्रदाय विशेष के लोगों के बीच धर्म के आधार पर दुश्मनी को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दूसरे समुदाय के खिलाफ अपने समुदाय को उकसाया, जिसमें ताहिर ने दावा किया कि हिंदू लोगों ने संप्रदाय विशेष के कई लोगों को मार दिया है और उनकी दुकानों को शेरपुर चौक पर आग लगा दी गई है और उन्हें किसी भी हिंदू को छोड़ना नहीं चाहिए।”

“उसके उकसाने और भड़काने पर, संप्रदाय विशेष के लोग हिंसक हो गए।और 24.02.2020 और 25.02.2020 को वे हिंसक हो गए और हिंदू समुदाय पर जलते हुए पेट्रोल बमों और पत्थरों को फेकना शुरू कर दिया। वहीं उस इलाके में स्थित हिंदु घरों को भी निशाना बनाया।”

कोर्ट ने कहा “तत्पश्चात, अनियंत्रित भीड़ दंगाइयों में बदल गई और अंकित शर्मा को निशाना बनाते हुए पकड़ लिया और घसीटते हुए चांद बाग पुलिया ले जाकर उस पर हमला कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई। अंकित की धारदार हथियारों से क्रूर तरीके हत्या की गई थी। और सबूत मिटाने के लिए उसके शव को नाले में फेंक दिया था।”

कोर्ट आर्डर (साभार: पत्रकार जितेंद्र शर्मा)

चार्जशीट में नौ अन्य लोगों के साथ हुसैन को मुख्य आरोपी में नामित किया गया है। अन्य आरोपियों में अनस, फिरोज, जावेद, गुलफाम, शोएब आलम, सलमान, नजीम, कासिम, समीर खान शामिल हैं।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में कहा गया था कि संप्रदाय विशेष की भीड़ ने अंकित शर्मा की धारदार वस्तुओं से हत्या कर दी थी। शर्मा के शरीर पर 51 चोट के निशान पाए गए थे। चार्जशीट में कहा गया है कि शर्मा की हत्या दंगाइयों ने की थी, जिसने लोगों को दहला दिया और क्षेत्र के निवासियों के मन में एक डर पैदा कर दिया था।

आम आदमी पार्टी (आप) पार्षद ताहिर हुसैन, मुख्य रुप से दिल्ली दंगों की साजिश रचने में शामिल थे। दिल्ली पुलिस और विशेष प्रकोष्ठ द्वारा दायर आरोपपत्रों में यह बात सामने आई है कि ताहिर हुसैन ने ‘इंडिया अगेंस्ट हेट’ समूह के उमर खालिद और खालिद सैफी से मुलाकात कर दिल्ली दंगों की साजिश रची और 8 जनवरी को वापस आया। यह बैठक शाहीन बाग में आयोजित की गई थी जहाँ सीएए का विरोध हो रहा था।

चार्जशीट में यह भी कहा गया है कि ताहिर हुसैन को शेल कंपनियों से इन दंगों को आयोजित करने के लिए पैसे मिलते थे। एक अन्य खुलासे में यह बताया गया कि दिल्ली दंगों के लिए धन इकट्ठा करने के लिए खालिद सैफी इस्लामवादी जाकिर नाइक से मिलने के लिए मलेशिया भी गया था।

ताहिर हुसैन ने बताया कि कैसे उन्होंने हिंदुओं से बदला लेने के लिए उसने दंगों का आयोजन किया और ‘काफ़िरों ’को सबक सिखाया। वह दंगों के बीच पीसीआर को कॉल भी करता था, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि वह दोषी नहीं है। इसके अलावा, उसने यह भी खुलासा किया कि दंगों को अंजाम देने के लिए उन्होंने चांद बाग इलाके में संप्रदाय विशेष के हजारों लोगों को किस तरह इकट्ठा किया था।

जिसने दिल्ली दंगों की सच्चाई बताने वाली पुस्तक का प्रकाशन रुकवा दिया… वो विदेशी है, वामपंथी है लेकिन रहता दिल्ली में है

दिल्ली दंगा मामले में अधिवक्ता मोनिका अरोड़ा की पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ का प्रकाशन ब्लूम्सबरी ने वापस ले लिया है। प्रकाशन संस्थान ने इस्लामी कट्टरपंथियों और वामपंथी लॉबी के दबाव में आकर ऐसा किया। अब इस्लामी कट्टरवादी आतिश तासीर ने खुलासा किया है कि स्कॉटिश इतिहासकार और लेखक विलियम डेलरिम्पल ही वो व्यक्ति है, जिसने इस पुस्तक के प्रकाशन पर रोक लगवाई है।

आतिश तासीर ने मोनिका अरोड़ा की दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक को सत्ता का प्रोपेगेंडा करार देते हुए कहा कि विलियम डेलरिम्पल ने इसके प्रकाशन पर रोक लगाने में अहम भूमिका निभाई है, जिसके लिए वो उनके आभारी हैं। उन्होंने तो यहाँ तक कहा कि स्कॉटिश लेखक के बिना ये संभव नहीं हो पाता। मोनिका अरोड़ा की इस पुस्तक में जाँच और इंटरव्यूज के हवाले से दिल्ली दंगों का विश्लेषण किया गया है।

साथ ही उन्होंने (आतिश तासीर) इस पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने के लिए ब्लूम्सबरी इंडिया का धन्यवाद भी किया। उन्होंने कहा कि सत्ताधारी पार्टी और इसके हिंसक लोगों द्वारा इतिहास को बदलने का प्रयास बलपूर्वक किया जा रहा है, इसीलिए इस पुस्तक को वापस लिया ही जाना था। बता दें कि अगस्त 21, 2020 को भी विलियम डेलरिम्पल ने घोषणा की थी कि वो दिल्ली दंगों पर आने वाली पुस्तक का प्रकाशन रोकने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

कॉन्ग्रेस ट्रोल साकेत ने स्कॉटिश इतिहासकार से ऐसा करने के लिए निवेदन किया था, जिसके जवाब में उन्होंने कहा था कि वो इस काम में लगे हुए हैं, ठीक उसी तरह जैसे ब्लूम्सबरी के लिए लिखने वाले अन्य लेखक इस काम में लगे हैं। उन्होंने एक अन्य ट्विटर यूजर को भी जवाब दिया था कि वो इस पर प्रयासरत हैं। उन्होंने कई अन्य वामपंथी लेखकों को भी टैग क्या था, ताकि वो सब प्रकाशन संस्था पर दबाव बना कर इसकी पब्लिशिंग पर रोक लगा सकें।

बता दें कि इस पुस्तक की लेखिका मोनिका अरोड़ा, सोनाली चितलकर और प्रेरणा मल्होत्रा हैं। यह फैक्ट्स पर आधारित किताब है। लेखकों ने फील्ड में घूम कर, कई लोगों से इंटरव्यू लेकर और पुलिस जाँच के आधार पर इसे लिखा और संपादित किया गया है। इसे सितम्बर में ही रिलीज किया जाना था। लेखक और अतिथिगण वर्चुअल बैठक के जरिए इसकी रिलीज के लिए बैठक कर रहे थे, बावजूद इसके इस पर रोक लगा दिया गया है।

पुस्तक के प्रकाशन को वापस लेने का निर्णय सोशल मीडिया पर प्रमुख ’बुद्धिजीवियों’ के नेतृत्व वाली वामपंथी उग्र भीड़ के विरोध के बाद आया, जिसने पब्लिकेशन हाउस पर ऐसा निर्णय लेने के लिए पर दबाव डाला था। आक्रोशित वामपंथी भीड़ में विवादास्पद अभिनेत्री स्वरा भास्कर और अन्य प्रख्यात ‘पत्रकारों’ और ‘बुद्धिजीवियों’ जैसे कई व्यक्तित्व शामिल थे। दक्षिण एशिया सॉलिडैरिटी इनिशिएटिव ने भी ब्लूम्सबरी इंडिया को पुस्तक का प्रकाशन वापस लेने के लिए धमकी दी थी।

किसानों को MSP से भी ज्यादा कीमत… लेकिन ‘गैंग’ बना रहा भय का माहौल, कर रहा खेतिहरों का नुकसान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार किसानों से जुड़े तीन अध्यादेश जून 2020 में लेकर आई, जिन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई है। कृषि उपज, वाणिज्य और व्यापार (संवर्धन व सुविधा) अध्यादेश, दूसरा मूल्य आश्वासन एवं कृषि समझौता अध्यादेश और तीसरा आवश्यक वस्तु (संशोधन) अध्यादेश।

पहला अध्यादेश किसानों को मंडी व्यवस्था से अलग फसल बेचने की वैकल्पिक व्यवस्था देगी। जिसकी माँग लंबे अर्से से किसान संगठन कर रहे थे। किसानों की माँग थी कि उन्हें अपनी फसल अपनी मर्जी के भाव बेचने की आजादी मिलनी चाहिए। दूसरे में किसान कम्पनियों के साथ कॉन्ट्रैक्ट कर सकेंगे। ताकि मुनाफा देने वाली फसलों की खेती की जा सके और तीसरे में खेती उत्पादों के 1955 के एक्ट को सुधारा गया है। जिसमें खेती उत्पाद को संग्रह नहीं करने के कठोर नियम थे, उनमें छूट दी गई है। हालाँकि इस छूट लेकर जमाखोरी और कालाबाजारी की चिंता जाहिर की जा रही है।

दरअसल खेती में सबसे ज्यादा मुश्किल उसकी मार्केटिंग में आती है। खेत में कुछ भी उगाना उतना मुश्किल नहीं होता। मुश्किल होता है, उस फसल का बढ़िया दाम मिलना। दाम नहीं मिलने की स्थिति में किसान अपनी फसलों को विरोध स्वरूप सड़कों तक पर डाल देते थे।

इस बढ़िया दाम को लेकर राजनीति ज्यादा होती रही है, दामों की असल चिंता कम होती है। या यूँ कह सकते हैं कि किसानों को उनकी फसलों का उचित दाम कैसे मिल सकता है, इसको लेकर गंभीरता से विचार-विमर्श कम होता है। खैर, इन अध्यादेशों से एक उम्मीद बढ़ी है कि खेती उत्पादों के बिक्री और खरीद में इजाफा होगा और किसानों की खुशहाली का रास्ता खुलेगा।

इन अध्यादेशों का विरोध करने वालों का आरोप है कि ये तीनों अध्यादेश मंडी व्यवस्था को खत्म कर देंगे। पर तीनों अध्यादेश पढ़कर ऐसा कहीं से नहीं लगता। उनकी इस शंका का कोई ठोस आधार नजर नहीं आता, बल्कि विरोध तथ्यात्मक होने के बजाय विचाराधारा से प्रेरित नजर आ रहा है।

दूसरे जब मंडी व्यवस्था जारी रहेगी तो MSP का सवाल भी बेमानी लगता है, क्योंकि मंडी व्यवस्था में एमएसपी ऐसे ही लागू रहेगा। हैरानी इस बात से होती है कि जो संगठन अब तक मंडी व्यवस्था को शोषण का केंद्र मानती थी, वही संगठन अब मंडी व्यवस्था के गुणगान में लगे हुए हैं।

कुछ जगह यह भी विरोध उभरकर सामने आया है कि कंपनियाँ किसानों को बढ़िया कीमत देने से मुकर जाएँगी। जबकि अध्यादेश में साफ है कि सभी कमिटमेंट (समझौते) लिखित रूप में होंगे। जिसका उद्देश्य यह है कि किसान अपने कृषि उत्पादों को स्पॉन्सर्स को आसानी से बेच सकें।

स्पॉन्सर में व्यक्ति, पार्टनरशिप फर्म्स, कंपनियाँ, लिमिटेड लायबिलिटी ग्रुप्स और सोसाइटियाँ कोई भी शामिल हो सकते हैं। ये समझौते निम्नलिखित के बीच हो सकते हैं:

1. किसान और स्पॉन्सर

2. किसान, स्पॉन्सर और तीसरा पक्ष

तीसरे पक्ष में एग्रीगेटर भी शामिल हैं। जबकि एग्रीगेटर वे होते हैं, जो एग्रीगेशन से संबंधित सेवाएँ प्रदान करने के लिए किसान और स्पॉन्सर के बीच बिचौलिए का काम करते हैं। राज्य सरकार कृषि समझौते की इलेक्ट्रॉनिक रजिस्ट्री के लिए एक रजिस्ट्रेशन अथॉरिटी स्थापित करेगी।

कृषि समझौते में उनकी भूमिका और सेवाओं का स्पष्ट रूप से उल्लेख होगा। समझौते में दोनों पक्ष मिलकर कृषि उत्पाद की सप्लाई, गुणवत्ता, मानदंड और मूल्य से संबंधित नियमों और शर्तों तथा कृषि सेवाओं की सप्लाई से संबंधित नियमों का उल्लेख कर सकते हैं।

ये नियम और शर्तें खेती और पालन की प्रक्रिया के दौरान, या डिलीवरी के समय निरीक्षण और सर्टिफिकेशन का विषय हो सकते हैं। ये समझौता एक फसल से लेकर अधिकतम पाँच साल के लिए होगा।

एक चिंता यह भी जताई जा रही है कि कंपनियाँ या खरीदार खरीदते वक्त किसानों से पहले से तय मूल्य देने से मुकर सकते हैं। जबकि इसमें साफ है कि मूल्य पहले से निर्धारित होंगे और लिखित में होंगे। मूल्य में बदलाव की स्थिति में समझौते में निम्नलिखित चीजें शामिल होनी चाहिए:

1. ऐसे उत्पाद के लिए गारंटीशुदा मूल्य

2. गारंटीशुदा मूल्य के अतिरिक्त राशि, जैसे बोनस या प्रीमियम का स्पष्ट संदर्भ

यह संदर्भ मौजूदा मूल्यों या दूसरे निर्धारित मूल्यों से संबंधित हो सकता है। गारंटीशुदा मूल्य सहित किसी अन्य मूल्य के निर्धारण के तरीके और अतिरिक्त राशि का उल्लेख भी कृषि समझैते में होगा।

सबसे बड़ी चिंता यह जाहिर की जा रही है कि किसान कोर्ट में अपना केस नहीं ले जा सकते, जबकि किसान और कंपनियाँ दोनों ही के बीच उठे विवाद को निपटाने के लिए एक प्रक्रिया जरूर निर्धारित की गई है। विवाद निपटारे के लिए कन्सीलिएशन बोर्ड और सुलह की प्रक्रिया के लिए कृषि समझौता प्रदान किया है।

अगर तीस दिनों में बोर्ड विवाद का निपटारा नहीं कर पाता, तो पक्ष समाधान के लिए सब डिविजनल मेजिस्ट्रेट (SDM) से संपर्क कर सकते हैं। उनके पास यह अधिकार होगा कि मेजिस्ट्रेट के फैसले के खिलाफ अपीलीय अथॉरिटी (कलेक्टर या एडिशनल कलेक्टड की अध्यक्षता वाली) में अपील कर सकते हैं।

मेजिस्ट्रेट और अपीलीय अथॉरिटी को आवेदन प्राप्त होने के तीस दिनों के भीतर विवाद का निपटारा करना होगा। मेजिस्ट्रेट या अपीलीय अथॉरिटी समझौते का उल्लंघन करने वाले पक्ष पर जुर्माना लगा सकते हैं। हालाँकि किसी बकाए की वसूली के लिए किसान की खेती की जमीन के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।

बाकी फिलहाल तो अध्यादेश किसान और कंपनियों दोनों के लिए फायदे का ही सौदा लग रहा है। बाकी अमल में आने के बाद की समस्याओं को लेकर अभी से भय खड़ा करना किसानों को डरा सकता है। जिसके कारण किसान इस दिशा में आगे बढ़ने से पीछे हट सकते हैं। इसलिए किसानों के भीतर भय का माहौल बनाकर किसानों का नुकसान नहीं करना चाहिए।

खेती में उत्पादन की अधिकता ने इसके अर्थशास्त्र को बिगाड़ा हुआ है। विविधता इसमें अप्रत्याशित सुधार ला सकती है। मंडी व्यवस्था इसे ऑपन मार्केट बनाने में बड़ी बाधक थी, जिसे अध्यादेश के जरिए वैकल्पिक बनाया गया है।

अब यह किसान पर निर्भर करता है कि वह मंडी में सरकार द्वारा निर्धारित एमएसपी पर बेचते हैं या खुले बाजार में बेहतर भाव पर बेचते हैं। उसके सामने ये दो विकल्प खुल गए हैं। दूसरा वैकल्पिक व्यवस्था से सरकार के बजट पर अतिरिक्त बोझ कम होगा और जो युवा खेती से जुड़े क्षेत्रों में बिजनेस करना चाहते हैं, उनके लिए अपार संभावनाएँ खुलेंगी।

छोटे और मझले किसान खेती में रिस्क लेने की हालत में नहीं होते और न उनके पास ज्यादा बजट की खेती करने के लिए बजट होता है। ऐसे में कंपनियाँ रिस्क उठाने और पैसा लगाने में नहीं हिचकेंगी। एक सवाल यह आ रहा है कि किसान तो पहले भी मंडी से बाहर बेच देते थे। अब क्या बदल जाएगा? पहले किसान व्यक्तिगत तौर पर बेच देते थे, पर कंपनियाँ कानूनी तौर पर खरीद सकेंगी और उन्हें मार्केट में अपने अनुसार उतार सकेंगी। संग्रह कर सकेंगी। जिसकी कानूनी मान्यता अब मिली है। जो मंडी व्यवस्था उन्हें देती थी।

The Farmers (Empowerment and protection) agreement on price Assurance and Farm services ordinance, 2020

यह अध्यादेश मूलतः किसानों और व्यापारियों के बीच कृषि उत्पादों के व्यापार को लेकर बनाया गया है, क्योंकि खेती में उत्पादन से बड़ी समस्या इसकी मार्केटिंग में आती है। इस अध्यादेशों से जुड़े उन बिंदुओं पर विस्तार से चर्चा करेंगे, जिन्हें लेकर किसानों में अनर्गल भय का वातावरण क्रिएट किया जा रहा है। इसे आप पहले जो ‘भय का माहौल’ है कहा जाता है, का अगला चरण भी कह सकते हैं।

तथाकथित विद्वानों द्वारा कहा जा रहा है कि इससे केवल व्यापारियों का फायदा होगा और किसान तो केवल मजदूर भर बनकर रह जाएँगे। जबकि अध्यादेश का सेक्शन 3.3 के अनुसार, “इस लिखित समझौते की अवधि एक फसल चक्र से लेकर अधिक से अधिक 5 साल तक ही हो सकती है।” सेक्शन 4 के मुताबिक- दोनो पार्टी यानी किसान और व्यापारी आपस में मिलकर समझौते का पत्र तैयार करेंगे।

जिसमें हर चीज़ के बारे में साफ-साफ उत्पाद की क्वालिटी, ग्रेड और स्टैंर्ड के बारे में लिखा होगा। जहाँ समझौता होगा। वहाँ की मिट्टी व मौसम आदि को ध्यान में रखकर ही समझौते होंगे। इसमें सरकार या सरकारी एजेंसी की मदद ली जा सकती है। इस समझौते में दोनों पार्टी कौन-से पेस्टिसाइड का प्रयोग करेंगे और उनकी क्या मात्रा व गुणवत्ता होगी, सुरक्षा क्या होगी। ये सभी लिखित रूप में होंगे।

दोनो पार्टियाँ आपस में मिलकर किसी भी तीसरी पार्टी से बुआई से लेकर फसल पकने तक और बीच-बीच में मुआयना करवा सकती हैं। फसल पकने के बाद व्यापारी फसल की डिलीवरी के लिए बाध्य होगा।

एक बात जो बहुत जोर देकर विरोध में कही जा रही है कि कंपनियाँ फसल पकने के बाद किसान को कम दाम देने के लिए बाध्य करेंगी और इस तरह किसान का शोषण होगा। जबकि फसल का क्या भाव होगा, ये सब पहले से ही लिखित रूप में होगा।

जैसे ही उत्पाद व्यापारी के पास पहुँचेगा, उसी समय भुगतान पूरा हो जाएगा। अगर बीज-उत्पाद के लिए अगर समझौता हुआ है तो 2/3rd भुगतान डिलीवरी के टाइम और बाकी 1/3rd 30 दिन के अंदर-अंदर होगा। किसान पर स्टॉक लिमिट का कोई कानून लागू नहीं होगा। सिर्फ उन फसलों पर जिन पर समझौता किया गया है।

इसी अध्यादेश के सेक्शन 8 के अनुसार- “फसल समझौते के सिवाय, किसान और व्यापारी में किसान की जमीन की खरीद-फरोख्त, लिज या गिरवी जैसा कोई और समझौता नहीं हो सकता। व्यापारी संस्था किसान की जमीन पर कोई भी ढाँचा या कुछ भी ऐसा चेंज नहीं कर सकती, जिसे समझौता खत्म होने पर ठीक ना किया जा सके। ये व्यापारी की जिम्मेदारी होगी कि जैसी जमीन उसे मिली उसी अवस्था मे उसे वापस करे।”

सेक्शन 11 के अनुसार- किसान और व्यापारी किसी भी समय आंतरिक समझौते को रद्द कर सकते हैं।

सेक्शन 14 के अनुसार: कोई भी विवाद सबसे पहले एसडीएम के द्वारा बनाई गई कमिटी करेगी, जिसे यह विवाद 30 दिन में खत्म करना होगा।

अगर किसान दोषी मिलता है, तो उससे सिर्फ उतना ही पैसा लिया जाएगा, जो उस पर देय होगा। लेकिन अगर व्यापारी दोषी मिलता है तो उस पर 50% तक अधिक जुर्माना वसूला जा सकता है। इसके साथ-साथ अगर व्यापारी चालाकी से अध्यादेश से अलग नियमों पर समझौता करता है तो किसान से किसी तरह की भी उगाही नहीं होगी। इसके अलावा अगर किसान की फ़सल बाढ़, आग या किसी भी प्राकृतिक आपदा से नष्ट हो जाती है, तो समझौते के तहत उस पर कोई कार्यवाही नहीं होगी और ना ही पैसों की उगाही होगी।

सेक्शन 15 के अनुसार- अगर किसान डिफॉल्टर होता है और समझौते की शर्तें पूरी नहीं करता, तब भी किसी भी सिचुएशन में किसान की जमीन से उगाही नहीं हो सकती। यानी जमीन किसान की ही रहनी है।

इस अध्यादेश को किन नियमों व रेगुलशन के तहत चलाएँगे, यह सरकार लोकसभा और राज्यसभा में विचार-विमर्श करने के बाद तय करेंगे।

The farmers produce trade and commerce (promotion and facilitation) ordinance, 2020

मुख्य तौर पर यह अध्यादेश पहले वाले अध्यादेश का ही एक हिस्सा है। इसका जो मुख्य मकसद है “एक देश एक मार्केट”

इसके तहत कोई भी किसान अपनी फसल अपने प्रदेश में या दूसरे प्रदेश में बेच सकता है। उसी तरीके से कोई भी व्यापारी अपने प्रदेश के किसानों से या दूसरे प्रदेश के किसानों से व्यापार कर सकता है। इसे राज्य से बाहर और राज्य के भीतर किसान-व्यापारी समझौता कह सकते हैं। ये इस चीज को मद्देनजर रख कर बनाया गया है कि मार्केट में जितनी प्रतिस्पर्धा होगी, अच्छे किसान और अच्छे व्यापारी को उतनी ही अच्छी क़ीमत मिल सकती है।


इस अध्यादेश के सेक्शन 4 के अनुसार– कोई भी व्यापारी या किसान किसी भी प्रदेश के व्यापारी के साथ व्यापार कर सकते हैं। हर वो व्यक्ति जिसके पास PAN कार्ड नम्बर है, वो भी व्यापार कर सकता है। एकाध जगह किसानों के पेन कार्ड को लेकर ही विरोध किया जा रहा है।

सेक्शन 4.3 के अनुसार- जो भी व्यापारी किसान से उसका उत्पाद खरीदेगा, वो डिलीवरी के टाइम पूरा पेमेंट करेगा या फिर अधिक से अधिक 3 दिन के अंदर किसान को पूरा पैसा देना पड़ेगा।

सेक्शन 5 के अनुसार- “कोई भी संगठन, एग्रीकल्चर कोऑपरेटिव सोसायटी, राज्य के भीतर या राज्य के बाहर या इलैक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग कर सकते हैं। इसके लिए वो क्या प्रोसीजर अपनाएँगे, क्या फीस होगी, कौन-सी तकनीक या सॉफ्टवेयर इस्तेमाल करेंगे, कैसे किसान को पेमेंट करेंगे, किसानों के लिए क्या गाइड लाइन होगी, वो भी साफ-साफ कैसे किसान तक पहुँचेगी, ये सब व्यापारी को पहले से ही तैयार रखना होगा और इस पर सरकार की नजर रहेगी।”

सेक्शन 6 के अनुसार- “जो व्यापारी और किसान (जो अलग-अलग प्रदेश से हैं) व्यापार करेंगे उन पर कोई भी प्रदेश की मार्किट फीस, टैक्स कर वगैरह नहीं लगेगा।”

केंद्रीय सरकार किसानों के लिए एक सेंटरलाइज प्राइस इनफोर्मेशन और मार्किट इनटेलिजेंस सिस्टम बनाएगी, ताकि किसान और व्यापारी के पास अलग-अलग किस्म की फसलों के दामों का ब्यौरा रहे और व्यापार में पारदर्शिता रहे।

किसी भी विवाद का उसी तरह से समाधान होगा जैसा कि पहले वाले अध्यादेश में जिसकी चर्चा की गई है। अगर कोई व्यापारी कानून के तहत नहीं चलता तो उस पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाया जा सकता है।

एसडीम के बाद, केस एग्रीकल्चर मार्किटिंग एडवाइजर से होते हुए, जॉइंट सेक्रेटरी तक जा सकता है। कुल मिला कर किसी भी विवाद का फैसला 30 दिन से 90 दिन (अधिकतम) में देना होगा।

सेक्शन 11 के अनुसार- “जो भी व्यापारी सेक्शन 4 के रूल के तहत काम नहीं करेगा, उस पर 25000-5,00,000 तक जुर्माना किया जा सकता है। उसी तरह जो व्यापारी इलैक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग करेगा और सेक्शन 5 ओर 7 के बनाए नियम को तोड़ेगा, या धोखाधड़ी करेगा, तो उस पर 50,000 से 10 लाख तक जुर्माना हो सकता है। साथ ही साथ व्यापार पर प्रतिबंध भी लग सकता है।”

इस अध्यादेश को किन नियमों और रेगुलेशन के तहत चलाएँगे। इन सभी नियमों को सरकार लोकसभा और राज्यसभा में विचार-विमर्श के बाद तय करेगी।

अगर दोनों अध्यादेशों का सूक्ष्म अध्ययन करने पर एक बात तो साफ है कि इसमें कुछ भी किसान विरोधी नहीं है, बल्कि किसानों के प्रोटेक्शन का विशेष ध्यान रखा गया है। बल्कि सरकार ने किसानों को इन अध्यादेशों के माध्यम से एक वैकल्पिक व्यवस्था मुहैया कराई है। ताकि किसान अपनी फसल मंडी व्यवस्था या ऑपन मार्केट जहाँ मन करे और जहाँ ज्यादा मुनाफा मिले बेच सकता है।

ऐसा भी नहीं है कि इससे पहले इस तरह की कॉन्ट्रेक्ट फार्मिंग या राज्य के भीतर व बाहर एग्रीकल्चर व्यापार नहीं होता था। बस फर्क यह है कि अबकी बार सरकार सीधे तौर पर किसान और व्यापारी के साथ खड़ी होकर इस व्यवसाय को मोनिटर कर सकेगी। जो प्रगतिशील किसान हैं, जो डिमांड के अनुसार फसलों को पैदा करने में दिलचस्पी लेते हैं। उनको अब कानून के तहत काम करना पड़ेगा और दोनों तरफ के लोगों यानी किसान और व्यापारी दोनों पर पारदर्शिता का दवाब बना रहेगा।

कुछ संगठनों ने यह भी आरोप लगाया है कि इससे एमएसपी खत्म होगा। लेकिन किसी ने भी ये नहीं बताया कि कैसे खत्म होगा? इसलिए उनके कहे में सच कम और राजनीतिक अंध विरोध ज्यादा है। एक तपका यह भी आवाज उठा रहा है कि ऑपन मार्केट से किसानों को उनकी फसल के रेट कम मिलेंगे। जबकि बहुत से किसान प्राइवेट व्यापारियों से व्यापार करेंगे तो सरकार पर आर्थिक बोझ कम होगा। सरकार का अतिरिक्त बोझ कम होगा तो सरकार भी किसानों को बढ़िया रेट (एमएसपी) देने के लिए बाध्य होगी।

हालाँकि इन अध्यादेशों का एमएसपी से सीधा कोई संबंध नहीं है, क्योंकि यह सभी किसानों पर लागू नहीं होगा। जो किसान स्वैच्छिक तौर पर वैकल्पिक व्यवस्था का हिस्सा बनना चाहते हैं। उनके लिए ही ये अध्यादेश लाए गए हैं। अब यह तो किसानों को तय करना है कि वह अपनी फसल सरकार को बेचता है या व्यापारी या कंपनी को।

दरअसल ये अध्यादेश पारंपरिक तरीके से खेती करने वालों के लिए नहीं बल्कि उन प्रगतिशील किसानों के लिए है, जो जोखिम उठाते हैं और प्रयोगिक खेती के माध्यम से इसे सफल व्यवसाय में बदलने का जुनून रखते हैं। ऐसे किसान अभी तक बिना किसी सरकारी सरंक्षण या ढाल के यह काम कर रहे थे, उन्हें अब सरकारी संरक्षण देने का काम ये अध्यादेश करेंगे।

किसान और व्यापारी के बीच डील में किसानों के ठगे जाने के डर को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। जो कि वाजिब भी हैं। परंतु इन समझौतों में अगर जागरूक संस्थाएँ या गाँव के प्रतिनिधि अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगे तो लिखित समझौतों में किसानों के साथ होने वाले किसी भी प्रकार के छल से उन्हें बचाया जा सकता है।

पानीपत लव जिहाद: निजामुद्दीन ने जाँघ पर चाकू से वार कर महिला से की जबरन किया निकाह, गर्भवती होने पर घर से निकला

हरियाणा के पानीपत में 25 साल की विधवा के साथ लव जिहाद, मारपीट और गर्भवती होने के बाद घर से बाहर निकलने का मामला सामने आया है। महिला को कदम-कदम पर दरिंदगी झेलनी पड़ी। पीड़ित महिला ने मॉडल टाउन की एक महिला की मदद से पुलिस में आरोपित शौहर के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है।

पीड़ित महिला मूलरूप से रायबरेली उत्तरप्रदेश की रहने वाली है। शादी के बाद वह पानीपत के एकता कॉलोनी रहती है। पुलिस ने बताया कि महिला एक साल पहले गोल्डी नाम के युवक से मिली थी। जिसने बहला फुसला कर युवती को अपने झाँसे में ले लिया। गोल्डी का असली नाम निजामुद्दीन है। जिसका पता चलने के बाद महिला ने उसका विरोध किया तो उसने जबरन उससे निकाह कर ली। फिर गर्भवती होने के बाद उसे घर से निकल दिया।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट के अनुसार महिला ने अपने एफआईआर बताया कि 15 साल की उम्र में उसकी शादी जिस युवक से हुई थी, उसकी सात साल पहले एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। जिसके बाद वह अपने ससुराल पानीपत में घर के आस-पास के इलाकों में जाकर साफ-सफाई का काम करने लगी। जिस दौरान उसकी मुलाकात गोल्डी नाम के युवक से हुई। जो अक्सर काम पर जाते वक्त उसके साथ छेड़खानी करता था। जिससे पीछे छुटाने के लिए वह ससुराल छोड़ मायके चली गई। लेकिन वहाँ भी गोल्डी (निजामुद्दीन) पहुँच गया और वही हरकतें दोहराने लगा।

वह प्यार मोहब्बत की बातें कर उसे वापस पानीपत ले आया। महिला को इस बात की भनक लग गई थी कि गोल्डी दूसरे धर्म का है तो उसने इसका विरोध किया और शादी करने से इनकार कर दिया। जिस पर गुस्सा हुए निजामुद्दीन ने उसके जाँघ पर चाकू से हमला कर दिया। उसने महिला को गाला रेतने और जान से मारने की धमकी भी दी। निजामुद्दीन के परिजनों ने उसे डरा धमका कर जनवरी 2020 में मदरसे में इस्लाम धर्म के अनुसार निक़ाह करवा दिया।

महिला ने बताया कि शादी के बाद निजामुद्दीन के परिजन उसे डंडे और तवे से मारने पीटने लगे। आरोपित उसके चरित्र को लेकर भद्दी टिप्पणी करता था। उसका संबंध ससुर और पड़ोसियों के साथ भी जोड़ने लगा। परिवार वाले मिलकर उस पर अत्याचार करते थे और उसे कमरे में बंद कर देते थे। इतना ही नहीं आरोपित परिवार महिला के हाथ पैर बाँध कर उसे नदी में फेंकने और उसे तेजाब से जलाने की धमकी भी देने लगे थे।

अपनी आपबीती बताते हुए महिला ने इस बात का भी खुलासा किया कि निजामुद्दीन ने कई बार उसे जान से मारने के लिए उसका गला भी दबाया। और पैसों के लिए अपने दोस्तों के साथ शारीरिक संबंध बनाने के लिए दबाव भी बनाने लगा था। गर्भवती होने के बावजूद परिवार वाले उस पर लगातार अत्याचार करते रहते थे। महिला ने बताया कि वह पाँच माह की गर्भवती है। और ऐसी हालत में परिजनों ने उसे घर से निकाल दिया है।

महिला ने अपने बारे में बताया कि पहली शादी से उसके तीन बच्चे है। जिन्हें वह नाना-नानी और पहले पति सचिन की माँ के पास छोड़ आई थी। निजामुद्दीन और उसके घरवालों ने कभी उसे बच्चों से मिलने नहीं दिया। शादी के समय भी उन्होंने महिला के परिवारवालों को नहीं बुलाया गया था।

पुलिस ने महिला की शिकायत पर आरोपित पति, सास और ससुर के खिलाफ केस दर्ज कर लिया है। वहीं पानीपत मॉडल टाउन थाना प्रभारी सुनील कुमार ने बताया कि आरोपितों के खिलाफ दुष्कर्म और दहेज प्रताड़ना सहित विभिन्न धाराओं के तहत के दर्ज कर लिया है। जल्द ही आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।

तमिलनाडु: सब इंस्पेक्टर एंथनी माइकल की पिटाई से आहत साधु ने की आत्महत्या, आरोपित के खिलाफ अभी तक FIR नहीं

तमिलनाडु में पुलिस सब इंस्पेक्टर एंथनी माइकल के हाथों यातना और अपमान सहन करने के बाद 42 वर्षीय साधु सरवनन ने आत्महत्या कर ली। साधु ने अपने दोस्तों को भेजे वीडियो में कहा है कि उप-निरीक्षक एंथनी माइकल उनके ‘डिप्रेशन’ के लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने उन्हें अपमानित किया था। उन्होंने यह वीडियो सोशल मीडिया पर भी पोस्ट किया था।

सरवनन के परिवार में उनकी पत्नी, एक बेटी और बेटा है। उन्होंने वीडियो में कहा कि वह गंभीर अवसाद में थे क्योंकि माइकल ने उन्हें बुरी तरह पीटा था। उन्होंने आगे कहा कि उनकी मौत का जिम्मेदार सिर्फ और सिर्फ एंथनी माइकल है। साधु ने यह भी कहा कि उनके मरने के बाद उनकी आत्मा पुलिस सब इंस्पेक्टर एंथनी माइकल से बदला लेगी।

यह दिल दहला देने वाली घटना तमिलनाडु के सलेम जिले के संकागिरी तालुक के कुंदंगल कादु में हुई। साधु सरवनन अपने भक्तों को उनकी चिंताओं और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से मुक्त करने के लिए अमावस्या की रात में विशेष पूजा करते थे। इस दौरान भक्त उनके पास भूतों की शिकायत लेकर आया करते थे, जिनका वह निदान करते थे।

इसके लिए वह अपने घर के पास ही पानी की टंकी के निर्माण के लिए खोदे गए गड्ढे के पास बैठ गए थे। 14 अगस्त को दो महिलाएँ उनके पास आई थी। वह उनकी शिकायत सुन ही रहे थे कि थेवुर पुलिस स्टेशन के पुलिसकर्मियों का एक समूह उस स्थान पर उतरा और उनके साथ मारपीट की।

अगली सुबह सरवनन लापता हो गए। जब उनकी तलाश शुरू की गई, तो उनके दोस्तों ने व्हाट्सएप पर उनका वीडियो प्राप्त किया, जिसमें उन्होंने कहा था कि पुलिस की पिटाई से वो अत्यधिक डिप्रेशन में थे। 

साधु ने आरोप लगाया, “सब-इंस्पेक्टर एंथनी माइकल ने मुझे यह सोचकर पीटा कि उसे जो पावर मिली, उससे वह कुछ भी कर सकता है।” सरवनन का शव शुक्रवार (अगस्त 21, 2020) को विघटित अवस्था में उनके आवास के पास एक वन क्षेत्र में चट्टानों के बीच पाया गया था। पुलिस को शव के पास एक मोबाइल मिला। जिसकी जाँच करने पर यह वीडियो मिला।

जानकारी के मुताबिक सरवनन के बच्चों ने पुलिस द्वारा उनके पिता की पिटाई देखी थी, जबकि उनकी पत्नी ने कहा है कि उन्होंने सब-इंस्पेक्टर के खिलाफ शिकायत नहीं की क्योंकि पुलिस ने उन्हें धमकी दी थी। 

NewsJ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पीड़ित सरवनन के बेटे और बेटी ने मीडिया को बताया कि उन्होंने पुलिस सब इंस्पेक्टर को अपने पिता पर बेरहमी से हमला करते हुए देखा था। उन्होंने बताया, “पिताजी अपने परिवार के सामने हमला किए जाने से परेशान थे और हमसे बात नहीं की और शनिवार (अगस्त 15, 2020) सुबह घर से निकल गए। उनका शव एक वन क्षेत्र में पाया गया।”

उन्होंने अधिकारियों से एसआई एंथनी के खिलाफ कार्रवाई करने का अनुरोध किया है। बता दें कि पुलिस ने अभी तक एंथनी के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की है। इधर हिंदू मक्कल काची ने कहा है कि सरवनन को न्याय दिलाने के लिए तमिलनाडु भर में विरोध प्रदर्शन की योजना बनाई जा रही है।

ब्लूम्सबरी ने किया ताहिर हुसैन को निर्दोष साबित करने वाले लेखक के किताब को प्रोमोट, दिल्ली दंगों के सच को पब्लिश से इनकार

पब्लिशिंग हाउस ब्लूम्सबरी ने ‘दिल्ली दंगों 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ नामक पुस्तक को लेफ्ट लिबरल्स के दबाव की वजह से पब्लिश नहीं किया। उसी पब्लिशिंग हाउस ने पहले सीएए के विरोध को बढ़ावा देते हुए ऐसे व्यक्ति द्वारा लिखित एक किताब को पब्लिश और प्रोमोट किया था जिसने दिल्ली दंगों के मुख्य आरोपित ताहिर हुसैन निर्दोष बताया था।

ब्लूम्सबरी इंडिया ने ज़िया उस सलाम (Ziya Us Salam) और उज़मा औसफ़ (Uzma Ausaf) द्वारा लिखित पुस्तक “शाहीन बाग: फ्रॉम ए प्रोटेस्ट टू ए मूवमेंट” प्रकाशित की है। उस किताब में शाहीनबाग के पूरे घटनाक्रम का उल्लेख किया गया है। पुस्तक में पिछले साल नागरिकता संशोधन अधिनियम के खिलाफ संप्रदाय विशेष की महिलाओं के नेतृत्व में किए गए विरोध प्रदर्शन के बारे में बताया गया है। जिसका समापन इस साल फरवरी में दिल्ली के दंगों के रूप में हुआ था।

महिलाओं ने संशोधन को वापस लेने की माँग को लेकर महीनों तक एक आवश्यक सड़क को जाम रखा था। पुस्तक के दोनों लेखक शाहीन बाग विरोध के साथ निकटता से जुड़े थे। पुस्तक में यह तर्क दिया गया है कि शाहीनबाग का विरोध भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना थी।

गौरतलब है कि किताब के अनुसार नवंबर से फरवरी तक देश भर में सीएए के विरोध में हुए दंगे भारत को गौरवान्वित करते है। इसे “सभी नागरिकों के लिए समान अधिकारों के लिए एक आधुनिक गाँधीवादी आंदोलन” कहा गया हैं। बता दें, ये विरोध प्रदर्शन गाँधीवादी नहीं थे, क्योंकि यह कई राज्यों में लगातार हो रही हिंसा का दिल्ली के दंगों के साथ समापन था। वहीं इसका नागरिकों के लिए समान अधिकारों से कोई लेना-देना नहीं है। क्योंकि सीएए भारतीय नागरिकों के लिए लागू नहीं किया गया है।

इस साल 23 से 27 तारीख के बीच दिल्ली में हुए हिंसा का मास्टरमाइंड आम आदमी पार्टी का नेता ताहिर हुसैन था। दंगों के ठीक बाद, सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ था। जिसमें हिंदुओं पर हमला करने के लिए ताहिर की इमारत के छत पर संप्रदाय विशेष की भीड़ को देखा गया था। इसके साथ ही उन्हें दंगाइयों को निर्देश देते हुए भी देखा गया था। वहीं दंगों में इस्तेमाल किए गए एसिड, ईंधन, पत्थर, पेट्रोल बम आदि को दंगे के बाद उनके घर से बरामद किया गया था।

लेकिन ब्लूम्सबरी द्वारा प्रकाशित पुस्तक की लेखक जिया उल सलाम ने 28 फरवरी को ताहिर हुसैन को निर्दोष करार दिया था। उन्होंने यह भी दावा किया कि भीड़ ने उनकी अनुपस्थिति में उनके घर को लूट लिया और नष्ट कर दिया। बता दें उस समय तक, ताहिर हुसैन को दंगों के पीछे के मास्टरमाइंडों में से एक घोषित किया जा चुका था। इसके अलावा, संप्रदाय विशेष के दंगाइयों द्वारा मारे गए आईबी अधिकारी अंकित शर्मा के परिवार ने पहले ही आरोप लगाया था, कि ताहिर हुसैन अंकित की हत्या का जिम्मेदार है, और उन्होंने उसका नाम एफआईआर में लिया था।

दिल्ली पुलिस ने दिल्ली दंगों के मामले में कई चार्जशीट दायर किए हैं। इसके साथ ही ताहिर हुसैन को दंगों के पीछे महत्वपूर्ण साजिशकर्ता के रूप में भी नामित किया गया है। चार्जशीट में उनका कॉन्फेशन भी शामिल है, जहाँ उन्होंने बताया है कि कैसे उन्होंने दंगों के लिए योजना बनाई और व्यवस्था की थी। अंकित शर्मा मामले में चार्जशीट भी उनका नाम है।

जिया उल सलाम का यह भी दावा है कि दिल्ली में कोई दंगे नहीं हुए थे, और यह सिर्फ संप्रदाय विशेष के लोगों और मस्जिदों पर हमला करने की योजना थी। उन्होंने यह दावे इस तथ्य के बावजूद किए कि इन दंगों में सबसे ज्यादा हिंदुओं को नुकसान हुआ था। और उन्हें पहले निशाना बनाया गया था। जबकि संप्रदाय विशेष के लोगों को हिंदुओं द्वारा किए गए जवाबी हमलों में निशाना बनाया गया था। चार्जशीट के अनुसार संप्रदाय विशेष के लोगों द्वारा राष्ट्रपति ट्रम्प की भारत यात्रा के दौरान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस मामले को उजागर करने के लिए एक बड़ी योजना बनाई गई थी।

हालाँकि, ज़िया उस सलाम और उज़मा औसफ़ द्वारा कथित किताब जुलाई में प्रकाशित की गई थी, लेकिन उन्होंने उस किताब को आज (22 अगस्त, 2020) प्रोमोट किया है। उन्होंने ट्विटर पर एक ट्वीट पोस्ट किया, जिसमें शाहीन बाग के विरोध को दर्शाते हुए किताब का प्रचार किया गया।

उनके द्वारा किताब को आज प्रोमोट करने का फैसला मोनिका अरोड़ा, सोनाली चीतलकर और प्रेरणा मल्होत्रा ​​द्वारा लिखित पुस्तक ‘दिल्ली रायट्स 2020: द अनटोल्ड स्टोरी’ को वापस लेने बाद आया है।

दिल्ली दंगों को लेकर लिखी गई यह किताब तथ्यों के अनुसार लेखकों द्वारा की गई जाँच और साक्षात्कार पर आधारित है। असल में यह सितंबर में रिलीज़ होनी थी। पुस्तक को लॉन्च करने के लिए वीडियो कॉन्फ्रेंस के माध्यम से लेखक घटना में शामिल हो रहे थे उसके बावजूद उन्होंने पुस्तक को वापस ले लिया।

पुस्तक की घोषणा के बाद इसे वाम-उदारवादियों द्वारा टारगेट किया गया था। इस किताब को आज भाजपा के कपिल मिश्रा, फिल्म निर्माता विवेक अग्निहोत्री और ऑपइंडिया की संपादक नूपुर शर्मा की उपस्थिति में लॉन्च किया जाना था।

दिल्ली दंगों के सच को बयाँ करने वाली किताब को वापस लेने और ज़िया उस सलाम और उज़मा औसफ़ द्वारा लिखित पुस्तक को प्रोमोट करने जोकि दंगों के पीछे के मुख्य आरोपित को बचा रहा है, ब्लूम्सबरी ने स्पष्ट रूप से दंगों को लेकर उनका पक्ष लिया है।

फेसबुक के कर्मचारियों ने ‘इस्लाम विरोधी कंटेंट’ पर की शिकायत: भारतीय मीडिया समूह ने छुपाई उनकी पहचान

फेसबुक के संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों ने उनके समुदाय के प्रति सोशल नेटवर्किंग साईट की चुप्पी पर विरोध जताया है। संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों ने फेसबुक के ‘इस्लाम विरोधी’ होने की शीर्ष अधिकारियों से शिकायत की है। बता दें कि भारत में फेसबुक पिछले कुछ समय से काफी विवादों से घिरा हुआ है।

फेसबुक की वरिष्ठ अधिकारी अंखी दास पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने भाजपा के तमाम नेताओं पर हेट स्पीच के नियम लागू नहीं किए थे। आरोपों के मुताबिक उन्होंने ऐसा इसलिए किया जिससे भारत में उनका काम प्रभावित न हो।   

फेसबुक के अधिकारियों को लिखे गए पत्र में संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों ने कई बातों का उल्लेख किया। उन्होंने लिखा बीते कुछ समय में जिस तरह की घटनाएँ सामने आई हैं उन्हें देख निराश और दुखी न होना बहुत मुश्किल है। हम इस पूरी प्रक्रिया में अकेले नहीं हैं, समूह के तमाम कर्मचारी इस मुद्दे पर ऐसे ही विचार रखते हैं। इसके बाद उस पत्र में लिखा था कि फेसबुक में काम करने वाले संप्रदाय विशेष के कर्मचारी यह जानना चाहते हैं। जो कुछ हो रहा है क्या यह सही है? 

फेसबुक में काम करने वाले संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों के इस समूह का नाम Muslim@ है। इसमें भारत और खाड़ी के देशों के तमाम संप्रदाय विशेष के लोग शामिल हैं। इसके बाद पत्र में लिखा था, “हम में से अधिकांश लोगों का मानना है। संस्थान का ढाँचा ही ऐसा बना हुआ है कि कंटेंट पॉलिसी और सरकारी मामलों में एक साथ रखना गलत है। इस बात का कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं था कि ऐसे कंटेंट को अनुमति देकर फेसबुक ने ग़लती की हो।”

पत्र के मुताबिक़ फेसबुक पर इस तरह का संप्रदाय विशेष विरोधी कंटेंट का मौजूद होना निराश करता है। यह दिखाता है कि दुनिया के सबसे बड़े संस्थान की संप्रदाय विशेष के लोगों के प्रति सहानुभूति ही नहीं है। इसके बाद फेसबुक ने भी इस मुद्दे पर अपना पक्ष रखा। फेसबुक ने इसे खुली और स्वतंत्र संस्कृति का उदाहरण बताया। फेसबुक की तरफ से जारी किए गए बयान में कई अहम बातें थीं। बयान में सबसे पहले कहा गया कि फेसबुक इस तरह की खरी प्रतिक्रिया की सराहना करता है।   

इसके बाद फेसबुक ने अपने बयान में कहा कि वो संप्रदाय विशेष के प्रति फैलाई जाने वाली नफ़रत का विरोध करते हैं। साथ ही इस मुद्दे पर विमर्श शुरू करने का स्वागत करते हैं। पत्र के अंत में यह भी लिखा हुआ था कि भारत में ऐसा एक भी गैर-इस्लामिक संगठन नहीं है, जिसे खतरनाक संगठन की श्रेणी में रखा गया हो। इस मामले का एक और हैरान कर देने वाला पक्ष था।   

जिसके मुताबिक़ भारत के कई मीडिया समूहों ने यह बात छिपाई कि शिकायत फेसबुक के संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों द्वारा की गई है। रॉयटर्स ने यह दावा किया था कि उसके पास यह पत्र है। उसके मुताबिक़ पत्र फेसबुक के एक कर्मचारी समूह ने लिखा है। यानी रॉयटर्स ने यह बात छिपाए रखी कि शिकायत फेसबुक के संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों ने की थी।       

साभार – रॉयटर्स

हिंदुस्तान टाइम्स ने भी कुछ ऐसा ही किया है। उन्होंने भी अपनी ख़बर में इस बात का ज़िक्र कही नहीं किया कि यह पत्र फेसबुक के संप्रदाय विशेष के कर्मचारियों द्वारा लिखा गया है।   

साभार – हिन्दुस्तान टाइम्स

इस तरह करने वालों में सबसे ज़्यादा हैरान करने वाली बात न्यूज़ क्लिक की ख़बर में सामने आई। न्यूज़ क्लिक ने अपनी ख़बर में वॉल स्ट्रीट जर्नल का हवाला दिया है, लेकिन संप्रदाय विशेष का ज़िक्र कही नहीं किया है। जबकि वॉल स्ट्रीट जर्नल की ख़बर में यह साफ तौर पर लिखा है कि शिकायत फेसबुक में काम करने वाले संप्रदाय विशेष समूह ने की थी।   

साभार – न्यूज़ क्लिक

दरअसल, 14 अगस्त 2020 को वॉल स्ट्रीट जर्नल में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी। जिसमें यह आरोप लगाया गया था कि भारत में फेसबुक के बड़े अधिकारी धार्मिक और राजनीतिक मुद्दों पर की जाने टिप्पणी को लेकर पक्षपात कर रहे हैं। इसके बाद रिपोर्ट में कहा गया कि फेसबुक ऐसे एकाउंट्स पर कार्रवाई नहीं कर रहा है जो भारतीय जनता पार्टी से संबंधित हैं। इसके बाद विरोधी दलों को केंद्र की भाजपा सरकार का विरोध करने का मौक़ा मिल गया। 

इसके चलते एनडीटीवी की पूर्व पत्रकार निधि राजदान समेत कुछ कई लोगों ने फेसबुक छोड़ दिया था। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा था कि वह इस मुद्दे को संसदीय समिति के सामने उठाएँगे। उन्होंने कहा था कि संसदीय समिति “आम नागरिकों की सुरक्षा, सोशल और ऑनलाइन मीडिया पर अधिकार और दुरुपयोग से बचाव” के मुद्दे पर मंथन ज़रूर करेगी। इस मामले में पहले भी फेसबुक को समन किया जा चुका है। इसके कुछ ही समय बाद राहुल गाँधी ने भी अंखी दास की आलोचना की थी। जिसके बाद अंखी दास को तमाम तरह की धमकियाँ मिलने लगी थीं। इस मामले में शिकायत भी दर्ज कराई गई थी।