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क्यों मिलता है किसी गिलानी को ‘निशान-ए-पाकिस्तान’: कश्मीरियत को ‘पत्थरबाजी’ बनाने का यूँ रचा खेल

स्वतंत्र भारत के इतिहास में जम्मू-कश्मीर सर्वाधिक चर्चित और चिंताजनक अध्याय रहा है। इस चर्चा और चिंता का मूल कारण भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए रहे हैं। स्वतंत्रता के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलय के समय संविधान में कुछ ‘अस्थाई और संक्रमणकालीन प्रावधान’ किए गए थे। इन प्रावधानों को अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए के नाम से जाना जाता रहा है।

इन विशेष प्रावधानों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों की तुलना में ‘अस्थाई रूप से कुछ अधिक स्वायत्तता’ प्रदान की गई थी। जम्मू-कश्मीर राज्य विदेश, रक्षा और दूरसंचार जैसे तीन विषयों के सन्दर्भ में भारत पर निर्भर होने के अतिरिक्त अपना नीति-नियन्ता स्वयं था। यहाँ तक कि उसका दंड विधान भी भारतीय दंड विधान से पृथक रणवीर पीनल कोड के नाम से जाना जाता था। वहाँ की विधानसभा का कार्यकाल भी अन्य राज्य विधानसभाओं से अलग 6 वर्ष का था।

जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले और सबसे जोरदार ढंग से जम्मू-कश्मीर को अलग करने वाले इन विशेष प्रावधानों का संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक विरोध किया। उन्होंने पंडित नेहरू की तुष्टिकरण की नीति और शेख अब्दुल्ला को शह देने की राजनीति का लगातार विरोध किया।

उन्होंने शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा शासन-प्रशासन की विविध योजनाओं, सुविधाओं-संसाधनों के वितरण और सरकारी सेवाओं में भागीदारी में जम्मू सम्भाग की उपेक्षा के खिलाफ आन्दोलनरत प्रेमनाथ डोगरा और प्रजा परिषद् का भी साथ दिया।

जम्मू-कश्मीर राज्य में जहाँ कश्मीर घाटी को वरीयता और बढ़ावा दिया जा रहा था, वहीं, जम्मू और लद्दाख क्षेत्र की घनघोर उपेक्षा की जा रही थी। शेख अब्दुल्ला की इस विभाजनकारी और भेदभावपूर्ण नीति को प्रधानमन्त्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का पूर्ण प्रश्रय था।

पंडित नेहरू की यह नीति न सिर्फ जम्मू-कश्मीर के आंतरिक एकीकरण की बाधा थी बल्कि जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में पूर्ण विलयन में भी सबसे बड़ी अड़चन थी। स्वाधीनता आन्दोलन की पृष्ठभूमि और गाँधी जी के उत्तराधिकारी होने के कारण स्वतन्त्रताप्राप्ति के समय देश का राजनीतिक आकाश कॉन्ग्रेस और नेहरू जी से आच्छादित और आक्रांत था।

स्वाधीनता बेला में विपक्ष नाममात्र का ही था। संसद में उसकी स्थिति नक्कारखाने में तूती की आवाज जैसी ही थी। लेकिन डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने इस सबकी परवाह न करते हुए भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता  की लड़ाई लड़ी। जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण-विलयन और राष्ट्रीय एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया उनका नारा, “एक देश में दो विधान,दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!” बहुचर्चित रहा है।

ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के एकीकरण और जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण-विलयन की लड़ाई लड़ते हुए ही 23 जून, 1953 को श्रीनगर के निकट निशात बाग़ में नज़रबंदी के दौरान उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु हुई।

डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के बलिदान-दिवस से लेकर 5 अगस्त, 2019 तक “जहाँ हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है!” और “ कश्मीर हो या गोहाटी, अपना देश अपनी माटी” जैसे नारों ने भारत के राष्ट्रवादी नौजवानों को लगातार आंदोलित किया है।

डॉ. मुखर्जी के बलिदान के बाद से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाने का मुद्दा लगातार जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारात्मक और भावनात्मक मुद्दा रहा है। जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के अधिवेशन और चुनावी घोषणा-पत्र इसकी पुष्टि करते हैं।

इसी वैचारिक प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप 5 अगस्त, 2019 को भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली प्रचंड बहुमत की केंद्र सरकार ने इन दोनों “अस्थाई और संक्रमणकालीन” प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में पूर्ण विलय कर दिया।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 को संसद के दोनों सदनों में पारित करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेश- जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बना दिए गए। लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की मूल वजह वहाँ के निवासियों द्वारा लगातार की जा रही माँग थी।

इस माँग का आधार जम्मू-कश्मीर राज्य के शासन-प्रशासन द्वारा लम्बे समय तक लद्दाखवासियों के साथ किया गया भेदभाव और उपेक्षा थी। हालाँकि, आजादी से लेकर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन तक इस भेदभाव और उपेक्षा के शिकार जम्मू संभाग के लोग भी रहे हैं।

कश्मीर के लोग ‘शासक भाव’ और श्रेष्ठता ग्रंथि के शिकार रहे हैं। उनमें जम्मू और लद्दाखवासियों के प्रति उनके दिलोदिमाग में हीनता और हिकारत का स्थाई भाव रहा है। परन्तु अब नई बनती हुई व्यवस्था में उनके साथ भी भेदभाव की समाप्ति और न्याय की शुरुआत हो चुकी है।

अमीर खुसरो ने ‘गर फिरदौस बर-रूए-ज़मीन अस्त! हमीं अस्त! हमीं अस्तो! हमीं अस्त!’ कहकर जम्मू-कश्मीर प्रदेश के प्राकृतिक सौन्दर्य और सांस्कृतिक समृद्धि की ओर संकेत किया था। कश्मीर भारत की समृद्ध ज्ञान-परम्परा की आदिभूमि और भामह, मम्मट, रुद्रट, कुंतक, वामन, भट्टनायक, क्षेमेन्द्र आनंदवर्धन, अभिनवगुप्त, चरक, कल्हण, विष्णु शर्मा, कालिदास और लालेश्वरी जैसे प्रख्यात और प्रकांड विद्वानों की कर्मभूमि रही है।

ज्ञान-विज्ञान और दर्शन की अनुसन्धान भूमि और भारत माता का सिरमौर कश्मीर कालांतर में राजनीतिक दुर्घटना का शिकार हो गया। निहित स्वार्थ के वशीभूत स्थानीय नेताओं और पड़ोसी पाकिस्तान ने अलगाववाद और आतंकवाद को हवा दी। कश्मीरी नौजवानों को जन्नत के सब्जबाग दिखाकर दिग्भ्रमित कर दिया गया और उनमें से कुछ के हाथ में कलम और किताब की जगह गोला-बारूद और बन्दूक पकड़ा दी।

‘पत्थरबाजी’ को ही उनका भविष्य बना डाला गया। धरना-प्रदर्शन, बंद और तोड़-फोड़, दंगा-फ़साद और खून-ख़राबे का यह प्रायोजित खूनी खेल कई दशक तक जम्मू-कश्मीर में चलता रहा। मुट्ठीभर लोगों ने कश्मीर और कश्मीरियत को ‘हाइजैक’ कर लिया। इनके द्वारा गढ़ी गई कश्मीर की परिभाषा और इनके ही द्वारा अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर दिया गया उसका परिचय उसके अतीत से मेल नहीं खाता।

इसमें बाजारू और बिकाऊ मीडिया खासकर अन्तरराष्ट्रीय मीडिया की भी बड़ी नकारात्मक भूमिका रही। उसने खबरों को मसालेदार बनाकर बेचा। यहाँ तक कि ‘कश्मीर की आजादी’ तक की बात की जाने लगी। आज़ाद कश्मीर का नारा पड़ोसी पाकिस्तान के उकसावे और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठन के अतिमहत्वाकांक्षी सरगनाओं की सत्ता-लालसा से पैदा हुआ विषवृक्ष था।

निःसंदेह, पाकिस्तान पोषित इस विषवृक्ष का बीज “अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए का अस्थाई और संक्रमणकालीन” प्रावधान ही था। 5अगस्त, 2019 को इस विषवृक्ष को समूल नष्ट कर दिया गया। भारत की प्रचंड बहुमत और उससे भी प्रचंड संकल्प वाली केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए इन दोनों अस्थाई प्रावधानों को निष्प्रभावी करके उपरोक्त विध्वंसक मानसिकता और राष्ट्रद्रोही कारस्तानियों का स्थायी बंदोबस्त कर दिया।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने यह निर्णय लेकर भारतीय संघ की शक्ति और संकल्प का ऐतिहासिक उद्घोष किया। गृहमंत्री अमित शाह ने दूरदर्शिता का परिचय देते हुए ऐसे सभी अलगाववादी तत्वों और निर्दोष कश्मीरी नागरिकों को पत्थरबाजी, तोड़-फोड़ और हिंसा के लिए भड़का सकने वाले राजनेताओं को एहतियातन गिरफ़्तार या नज़रबंद करवा दिया।

ऐसे नेताओं में पीडीपी की अध्यक्षा और पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती, नेशनल कॉन्फ्रेस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूख अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला, कॉन्ग्रेस के नेता सैफुद्दीन सोज, जम्मू-कश्मीर पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन के अलावा अलगाववादी संगठन हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के अनेक धड़ों के नेता शामिल थे। निश्चय ही अपनी नज़रबंदी के दौरान इन नेताओं ने डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की नज़रबंदी और बलिदान को याद करते हुए पश्चाताप किया होगा।

पाकिस्तानी सेना और आईएसआई की ओर से जम्मू-कश्मीर में छद्म-युद्ध (प्रॉक्सी-वॉर) लड़ रहे आतंकवादी संगठनों ने यह सुनिश्चित किया था कि कोई भी राष्ट्रवादी या भारतीयतावादी पत्रकार कश्मीर घाटी में न टिक पाए ताकि उनके द्वारा ‘मैन्युफैक्चर्ड एंड मैन्युपुलेटेड’ ख़बरें ही प्रचारित और प्रसारित हों।

इन प्रायोजित पत्रकारों और उनकी झूठी-सच्ची ख़बरों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत विरोधी नैरेटिव गढ़ा। पिछले दिनों भारत विरोधी प्रायोजित खबरें लिखने वाले तथाकथित पत्रकारों की भी खबर ली गई है। हाल ही में जम्मू-कश्मीर में लागू की गई मीडिया नीति और आचार-संहिता ने पत्रकारिता और पत्रकारों को अधिक जिम्मेदार और जवाबदेह बनाया है।

अब मनगढ़ंत, भड़काऊ और भारतविरोधी ख़बरों के प्रचार-प्रसार को आपराधिक कृत्य माना जाएगा। लोगों को उकसाकर उपद्रव करवाने वाले स्वयंभू नेताओं की नज़रबंदी के अलावा अस्थाई रूप से इन्टरनेट पर भी रोक लगाई गई, ताकि सोशल मीडिया (व्हाट्सएप्प, फेसबुक, इन्स्टाग्राम, ट्विटर आदि) के माध्यम से अफवाहें और प्रायोजित खबरें फैलाकर शांति और सौहार्द को बिगाड़ने की नापाक कोशिश न की जा सके।

अनुभवी और सक्षम कमांडरों के नेतृत्व में सभी संवेदशील स्थानों पर सुरक्षा बलों की पर्याप्त और मुस्तैद उपस्थिति भी सुनिश्चित की गई। इन सब सचेत उपायों से लगभग स्थाई बन चुके अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए की विदाई संभव हुई।

ये प्रावधान अस्थाई और संक्रमणकालीन होते हुए भी राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण इतने स्थाई बन चुके थे कि माननीय उच्चतम न्यायालय तक को 2018 में यह कहना पड़ा था कि “अस्थाई प्रावधान अनुच्छेद 370 ने बहुत लम्बे समय (लगभग 75 साल) से होने के कारण इतना स्थायित्व प्राप्त कर लिया है कि अब इसकी समाप्ति असम्भव-सी है।” बहरहाल, भारत सरकार ने इस असंभव को सम्भव करते हुए जम्मू-कश्मीर और भारत की जनभावना का सम्मान किया।

पिछला एक साल जम्मू-कश्मीर के लिए निर्णायक रहा है। अब यहाँ जमीनी बदलाव की आधारभूमि तैयार हो चुकी है। पिछले एक साल में आतंकवादी और हिंसक घटनाओं में उल्लेखनीय कमी हुई है। हालाँकि, आतंकवादी संगठन और उनके आका पुरजोर कोशिश कर रहे हैं कि हिंसा और दहशतगर्दी करके माहौल को बिगाड़ा जा सके और अन्तरराष्ट्रीय मंचों पर यह प्रचारित किया जा सके कि अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को निष्प्रभावी किए जाने से जम्मू-कश्मीर के बाशिंदे परेशान हैं और प्रतिक्रियास्वरूप इस प्रकार की वारदातों को अंजाम दे रहे हैं।

हालाँकि, सुरक्षा-बलों और पुलिस की मुस्तैदी की वजह से उनके मंसूबे पूरे नहीं हो पा रहे हैं। पिछले एक साल में मिली नाकमयाबी की वजह से तमाम आतंकवादी संगठनों और उनके आकाओं में हताशा है। ऐसा लगता है कि वे अपने अस्तित्व की निर्णायक और अंतिम लड़ाई लड़ रहे हैं।

इन आतंकवादी संगठनों और हुर्रियत कॉन्फ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों की बाहरी और अवैध फंडिंग को भी बहुत हद तक नियंत्रित किया जा चुका है। मुफ्तखोरी के आदी ये अलगाववादी नेता और आतंकवादी संगठन फंडिंग न हो पाने से अब ‘जल बिनु मछली’ की तरह तड़प रहे हैं।

उल्लेखनीय है कि कश्मीर की आज़ादी का राग अलापने वाले इन तथाकथित नेताओं की फाइव स्टार जीवन-शैली, विदेशी सैर-सपाटे और बीवी-बच्चों का विदेश प्रवास और शिक्षा-दीक्षा, सब हवाला फंडिंग का प्रतिफल था। अब उन्हें आटे -दाल का सही भाव पता चलने लगा है।

पाकिस्तान पोषित इन राष्ट्र-द्रोहियों को इनके “सेवाकार्यों” के लिए पैसे और अन्यान्य प्रलोभनों के अलावा तरह-तरह के पुरस्कार भी दिए जाते रहे हैं। हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के पूर्व-अध्यक्ष सैय्यद अली शाह गिलानी को पिछले दिनों दिया गया ‘निशान-ए-पाकिस्तान’ इसका उदाहरण है। अब आतंकवाद और अलगाववाद की दुकानों का क्रमिक ‘लॉकडाउन’ हो रहा है।

सैन्य बल जहाँ आतंकवादियों की अच्छी आवभगत कर रहे हैं, वहीं, पुलिस-प्रशासन द्वारा तथाकथित पत्रकारों,बुद्धिजीवियों, स्वयंसेवी संगठनों के झोलाछापों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की भारत विरोधी गतिविधियों और आय के अवैध श्रोतों पर शिकंजा कसा जा रहा है। इन राष्ट्रद्रोही ‘लाउडस्पीकरों’ की बिजली कट जाने से वातावरण में लम्बे समय से व्याप्त नकारात्मकता, निराशा और नफ़रत की धुंध छँट रही है।

शेख अब्दुल्ला और मुफ़्ती मोहम्मद सईद खानदान की वंशवादी राजनीति से भी जम्मू-कश्मीर का आम नागरिक त्रस्त रहा है। आजकल दोनों ही खानदानों की तीसरी पीढ़ी (शेख अब्दुल्ला के पौत्र उमर अब्दुल्ला और मुफ़्ती मोहम्मद सईद की नातिन इल्तिजा मुफ़्ती) राजनीति कर रही है।

विकल्पहीनता के कारण यहाँ विकास और बदलाव के स्थान पर खाने-पीने की राजनीति का बोलबाला रहा है। अभी तक केंद्र सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद का कोई लेखा-जोखा (ऑडिट) नहीं होता था। इसलिए पैसा जनकल्याण और आधारभूत ढाँचे के निर्माण में लगने के स्थान पर सीधे मुट्ठीभर लोगों की जेब में चला जाता था।

इसका एक प्रमाण यह है कि केन्द्रशासित प्रदेश बनने के कारण ऑडिट के दायरे में आते ही पिछले एक साल में अनेक सरकारी कार्यालयों में आगजनी हुई और ‘दुर्घटनावश’ अनेक फाइलें जलकर राख हो गईं। ज़मीनी विकास न होने से स्थानीय निवासियों में और ज्यादा असंतोष और अलगाव बढ़ता था।

अब राज्य-स्तरीय कराधान से अर्जित और केंद्र से प्राप्त धनराशि विकास-योजनाओं, आधारभूत ढाँचे के निर्माण और बदलाव-कार्यों में लगने से नई संभावनाओं का सूर्योदय हो रहा है। भ्रष्टाचार और अव्यवस्था काफी हद तक कम हुई है। शासन-प्रशासन में संवेदनशीलता, जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ी है। इसी का परिणाम है कि नागरिकों में सरकार और सरकारी-तंत्र के प्रति विश्वास-बहाली हो रही है।

31 मार्च, 2020 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य विधि का अनुकूलन) आदेश-2020 अधिसूचित किया था। इस आदेश के तहत राज्य में पूर्व-प्रचलित 129 कानूनों में आंशिक संशोधन किया है और 29 कानूनों को पूर्ण रूपेण निरस्त किया गया है।

इसी आदेश में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (विकेंद्रीकरण और भर्ती) अधिनियम-2010 के खंड 2 में आंशिक बदलाव करते “स्थाई निवासी” शब्द के स्थान पर “अधिवासी” शब्द जोड़ा गया है। इसी संशोधित अधिनियम के खंड 3 ए के अंतर्गत “अधिवासी” शब्द का स्पष्टीकरण करते हुए उसे परिभाषित किया गया है।

इस परिभाषा के अनुसार कम-से-कम 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित  प्रदेश में रहने वाले व्यक्ति “अधिवासी” माने जाएँगे। इसके अलावा केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों से अपनी 10 वीं/12 वीं की पढ़ाई को मिलाकर कम-से-कम 7 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राएं भी अधिवासी माने जाएँगे।

कम-से-कम 10 वर्ष तक जम्मू-कश्मीर में सेवा देने वाले केन्द्रीय सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों/अन्य उपक्रमों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केन्द्रीय स्वायत्तशासी निकायों आदि के कर्मचारी/अधिकारी और उनके बच्चे भी अधिवासी माने जाएँगे। इसके साथ ही,जम्मू-कश्मीर के राहत एवं पुनर्वास आयुक्त कार्यालय में पंजीकृत विस्थापित भी अधिवासी माने जाएँगे।

संभवतः, वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और  स्थायीभाव बन चुके तुष्टिकरण के दबाव  में ही केंद्र सरकार ने अधिवासन की पात्रता के इतने कठिन नियम बनाए हैं अन्यथा उसे अन्य राज्यों जैसे ही अधिवासन के सरल नियम बनाकर जम्मू-कश्मीर के विलयन की प्रक्रिया पर पूर्ण-विराम लगाना चाहिए था।

संभवतः सामान्य भारतीय नागरिकों के लिए 8 वर्ष की निवास-अवधि के बाद, जम्मू-कश्मीर में कार्यरत केन्द्रीय कर्मियों और उनके बच्चों को 5 वर्ष की निवास-अवधि के बाद अधिवास प्रमाण-पत्र निर्गत करने की नीति अधिक न्यायपूर्ण, तार्किक और समावेशी होती।

इस अधिवासन नीति में कम-से-कम कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की दिशा में भी साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता थी। यह कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी ही थी जिसने 19 जनवरी, 1990 की बर्फ़ीली रात में 3 हजार से अधिक निर्दोष कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया और 3 लाख से अधिक को घर-द्वार और जड़-जमीन से बेदख़ल और विस्थापित किया।

कश्मीर घाटी में न सिर्फ कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की कोई ज़मीनी योजना बनाई जानी चाहिए बल्कि जम्मू-कश्मीर में एक दिन भी सेवा करने वाले भारतीय सेना और अर्ध सैन्य बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों और सैनिकों को कश्मीर घाटी में बसने पर तत्काल अधिवासन अधिकार दिए जाएँ ताकि आतंकवाद और आतंकी मानसिकता की जनसांख्यिकी को संतुलित किया जा सके।

नई अधिवास नीति के लागू हो जाने के बाद जम्मू-कश्मीर में पूँजी निवेश की अपार संभावनाएँ हैं। जिस प्रकार सन 1991 के बजट के बाद भारतीय अर्थ-व्यवस्था में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए थे, ठीक उसी प्रकार के परिवर्तन के मुहाने पर अभी जम्मू-कश्मीर है। पूँजी-निवेश और आर्थिक-पुनर्नियोजन के लिए उसके द्वार खुल चुके हैं।

यह सचमुच एक ऐतिहासिक परिघटना है। पर्यटन, सीमेंट, बिजली, औषधिक सम्पदा, ऊनी वस्त्र, चावल, केसर, फल, मेवा, शहद और दुग्ध-उत्पाद आदि से सम्बंधित यहाँ के उधोग-धंधे और व्यापार आवश्यक पूँजी-निवेश और नयी श्रम-शक्ति, कौशल और प्रतिभा से कई गुना विकसित होने की संभावना है। अगर ये उद्योग-धंधे और व्यापार अपनी पूर्ण-क्षमतानुसार विकसित होते हैं तो इससे स्थानीय युवाओं को रोजगार के अधिकाधिक अवसर मिलेंगे।

एक बार फिर उनके हाथ में पत्थर और बंदूक की जगह कलम-किताब और इलेक्ट्रॉनिक गजट होंगे। लगभग 6 महीने से 2G इन्टरनेट की सुविधा बहाल हो गई है। जल्दी ही 4G इन्टरनेट शुरू होने की भी प्रबल संभावना है। जम्मू-कश्मीर ज्ञान-विज्ञान की उर्वर भूमि रही है। शांति-बहाली होते ही यहाँ अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षण-संस्थान खुलने लगेंगे।

यहाँ वैष्णो देवी और अमरनाथ धाम जैसे अनेक सर्वमान्य तीर्थस्थल हैं। यहाँ का वातावरण प्रदुषण-मुक्त है और श्रेष्ठतम शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के अनुकूल हैय़ इसलिए यहाँ प्राकृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य पर्यटन के विकास की अपरिमित संभावनाएँ हैं।

उल्लेखनीय है कि अभी तक जम्मू संभाग के लोक-कलाओं और पर्यटन-स्थलों के विकास एवं प्रचार-प्रसार के प्रति भी सायास उदासीनता बरती गई है। अब इन संभावनाओं का सुनियोजित विकास और सतत दोहन करने की आवश्यकता है। जम्मू-कश्मीर के नौजवानों को देश की मुख्यधारा में शामिल करके और विकास-योजनाओं में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करके ही पाकिस्तान पोषित आतंकवाद को मात दी जा सकती है।

अनुच्छेद 370 और धारा 35ए की समाप्ति करके भारत ने अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में अपनी सामर्थ्य और स्वीकार्यता का भी परचम फहराया है। पिछले एक साल में बार-बार इस मुद्दे को तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिशों के बावजूद पाकिस्तान को  सफलता नहीं मिली है।

संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर मुस्लिम राष्ट्रों के मंच तक पर उसे मुँह की खानी पड़ी है। विश्व के सर्वाधिक सशक्त लोकतंत्र अमेरिका से लेकर यूरोप के अनेक लोकतान्त्रिक राष्ट्रों ने भारत के पक्ष का समर्थन किया है। इससे पाकिस्तान की खिसियाहट और बढ़ गयी है।

जम्मू-कश्मीर के पूर्ण-विलय के बाद पाक अधिकृत जम्मू-कश्मीर (POJK) पर भी भारत की दावेदारी बढ़ गई है। गिलगिट, बाल्टिस्तान आदि क्षेत्रों में नागरिक आन्दोलन चल रहे हैं। वहाँ के निवासी पाकिस्तानी जुल्मोसितम के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद कर रहे हैं और सशक्त और संकल्पशील भारत की ओर आशाभरी नज़र से देख रहे हैं।

जम्मू-कश्मीर की राज्य विधान-सभा में क्षेत्रीय असंतुलन रहा है। इसलिए चुनाव आयोग विधान-सभा चुनाव कराने  से पहले वहाँ विधान-सभा क्षेत्रों का परिसीमन करा रहा है। यह परिसीमन कार्य इस वर्ष के अंत तक होने की सम्भावना है। परिसीमन प्रक्रिया के पूर्ण हो जाने के बाद लोकतान्त्रिक व्यवस्था और विकास-प्रक्रिया में सभी क्षेत्रों और समुदायों का समुचित प्रतिनिधित्व और भागीदारी सुनिश्चित हो सकेगी।

शासन-प्रशासन की कश्मीर केन्द्रित नीति भी संतुलित हो सकेगी और अन्य क्षेत्रों के साथ होने वाले भेदभाव और उपेक्षा की भी समाप्ति हो जाएगी। लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में सभी नागरिकों की विश्वासबहाली और भागीदारी सुनिश्चित करना किसी भी राज्य का सर्वप्रमुख कर्तव्य है और यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। आज केंद्र-शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर इस कर्तव्य को पूरा करने की चुनौती स्वीकार करने की दिशा में अग्रसर है।

सुशांत की बहन ने PM मोदी को दिया धन्यवाद, CBI जाँच को बताया- ‘राखी गिफ्ट’

फिल्म अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की आत्महत्या मामले की जाँच अब सीबीआई करेगी। बहन श्वेता सिंह कीर्ति खुश हैं कि अब उनके भाई को न्याय मिलेगाl साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आभार भी व्यक्त किया हैl 

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (अगस्त 5, 2020) को कहा कि सुशांत सिंह राजपूत की मौत के पीछे की सच्चाई सामने आनी चाहिए। न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय की पीठ ने महाराष्ट्र, बिहार और सुशांत सिंह राजपूत के पिता कृष्ण किशोर सिंह को बॉलीवुड अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती की याचिका पर तीन दिनों के भीतर जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।

बता दें कि रिया चक्रवर्ती पर सुशांत सिंह राजपूत को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप है। उनके खिलाफ सुशांत के पिता ने पटना में एफआईआर दर्ज करवाया है। रिया ने कोर्ट में याचिका डालकर के मामले को पटना से मुंबई शिफ्ट करने की माँग कर रही है।

सुशांत मौत मामले की जाँच सीबीआई को सौंपे जाने पर उनकी बहन श्वेता सिंह कीर्ति ने प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने इसके लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्यवाद दिया है।

इसके साथ ही उन्होंने इंस्टाग्राम पर एक तस्वीर शेयर की है, जिस पर लिखा हुआ है- ‘BREAKING… सुशांत सिंह केस- केंद्र सरकार ने बिहार सरकार की CBI जाँच की सिफारिश स्वीकार की।’ इस पोस्ट में उन्होंने ‘रक्षाबंधन गिफ्ट’ का हैशटैग भी इस्तेमाल किया है। सुशांत की एक्स गर्लफ्रेंड और अभिनेत्री अंकिता लोखंडे ने भी इस बड़ी खबर को अपने इंस्टाग्राम पर शेयर किया।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पुष्टि की कि सीबीआई ने बिहार सरकार के अनुरोध को स्वीकार कर लिया है। सुशांत के परिवार के वकील ने मुंबई पुलिस पर इस मामले में सबूत नष्ट करने का आरोप लगाया और मामले में किसी और तरह की देरी न हो, इसके लिए अपील की। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने बिहार IPS अधिकारी की जाँच को रोकने का भी सवाल उठाया, जिन्हें जाँच का नेतृत्व करने के लिए बुलाया गया था।

इससे पहले श्वेता सिंह कीर्ति ने एक ट्वीट करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इस मामले में न्याय की गुहार लगाई थी। इसके अलावा उन्होंने प्रधानमंत्री के नाम एक ओपन लेटर भी लिखा था।

गौरतलब है कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आदेश पर राजीव नगर थाना कांड संख्या 241/ 20 की सीबीआई जाँच की सिफारिश मंगलवार (अगस्त, 04, 2020) को केन्द्र सरकार को भेज दी गई थी। इससे पहले राज्य पुलिस मुख्यालय ने इसका प्रस्ताव तैयार किया। जल्द ही सीबीआई इस मामले में नई एफआईआर दर्ज कर पड़ताल शुरू कर सकती है।

अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में हर दिन नए खुलासे सामने आए हैं। इसमें उनकी गर्लफ्रेंड रिया चक्रवर्ती के साथ उनके संबंधों से लेकर उनके मानसिक स्वास्थ्य, बैंक अकाउंट से लेकर उनकी मैनेजर रही दिशा सालियान की मौत से जुड़े कई सवाल सामने आए हैं।

क्या कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद के विध्वंस में नरसिम्हा राव की मिलीभगत थी? उनके निजी डॉक्टर ने बताया- क्या है सच

जब राम जन्मभूमि आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, तो एक इंसान की भूमिका हमेशा एक पहेली बनी रहेगी। हम बात कर रहे हैं पीवी नरसिम्हा राव की। पीवी नरसिम्हा राव को परिस्थिति की माँग के मुताबिक चीजों को लागू करने के लिए जाना जाता है।

पीवी नरसिम्हा राव को भारत में आर्थिक सुधार के युग की शुरुआत के लिए भी जाना जाता है। हालाँकि, 6 दिस्बर 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव राम जन्मभूमि पर कारसेवकों द्वारा बाबरी मस्जिद को गिराते हुए चुपचाप देखते रहे।

इस बात को लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी के भीतर उनके आलोचकों ने आरोप लगाया कि उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में आरोपित प्रमुख षड्यंत्रकारियों के साथ हाथ मिलाया था। यह आरोप लगाया जाता है कि वो पूरे घटनाक्रम से वाकिफ थे, उन्हें पता था कि क्या होने वाला है, इसके बावजूद उन्होंने चुप्पी साधे रखी और चीजों को होने दिया।

यह सच है कि जीवन के आखिरी चरण और उनके मरने के बाद भी पीवी नरसिम्हा राव को अपनी पार्टी से ज्यादा विपक्षी पार्टी के राजनेताओं का समर्थन मिला। राम मंदिर भूमि पूजन के साथ हमें बाबरी मस्जिद के विनाश के घातक दिन पर उनके कार्यों का मूल्यांकन करना चाहिए।

बता दें कि जिन दिनों विध्वंस होने वाला था, उन दिनों उन्होंने राज्य में भाजपा सरकार को खारिज करने पर विचार किया था। अपनी पुस्तक ‘अयोध्या: 6 दिसंबर 1992’ में नरसिम्हा राव का कहना है कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति हाथ से बाहर निकलने पर हस्तक्षेप के लिए केंद्र सरकार को सूचित करना राज्यपाल का विशेषाधिकार है।

इसके साथ नरसिम्हा राव ने लिखा कि हाल ही में अंतिम विध्वंस से पाँच दिन पहले, तब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल सत्यनारायण रेड्डी ने केंद्र से सामान्य कानून और व्यवस्था की स्थिति के लिए संवाद किया था। इस दौरान चीजों के सांप्रदायिक पहलू पर विशेष तौर से बात की गई। यह वास्तव में संतोषजनक था। राज्यपाल की रिपोर्ट में कहा गया कि यद्यपि कारसेवक अयोध्या में बड़ी संख्या में एकत्रित हो रहे थे, मगर वे शांतिपूर्वक थे।

रिपोर्ट में कहा गया था, “ऐसी खबरें हैं कि बड़ी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुँच रहे हैं, लेकिन वे शांतिपूर्ण हैं। मेरी राय में, इस समय यूपी सरकार की बर्खास्तगी या राज्य विधानसभा को भंग करने या राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाने जैसे कठोर कदम उठाने का समय नहीं है।”

नरसिम्हा राव ने अप्रत्यक्ष रूप से सुप्रीम कोर्ट पर कुछ दोषारोपण करते हुए कहा था, “अयोध्या में विवादित ढाँचे को पर्याप्त सुरक्षा देने के सीमित और विशिष्ट उद्देश्य के लिए केंद्र सरकार को रिसीवर बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट का इनकार भी एक सार्थक संकेत है।”

नरसिम्हा राव ने राजीव गाँधी पर भी उँगली उठाई। उन्होंने कहा, “अयोध्या के विकास के लिए इंदिरा गाँधी की कई योजनाएँ थीं। इस भावनात्मक मुद्दे की राजनीतिक तनाव का असर इंदिरा गाँधी पर नहीं पड़ी। मगर उनकी मृत्यु के बाद, उनके बेटे ने प्रधानमंत्री का पदभार संभाला और तब से, विनाशकारी चरणों की एक शृंखला शुरू हुई।”

इस तरह, राव के अनुसार, वह संवैधानिक मानदंडों और ऐतिहासिक मिसाल से बँधे थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने अपने निजी सचिव से कहा था, “लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकार को बिना किसी वैध कारण के एहतियात के तौर पर कैसे बर्खास्त किया जा सकता है? क्या यह संवैधानिक होगा? क्या हम एक असंवैधानिक रूप से असंवैधानिक कृत्य का सहारा ले रहे हैं?”

नरसिम्हा राव के पर्सनल फिजिशियन के श्रीनाथ रेड्डी का मानना है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के दिन नरसिम्हा वास्तव में व्यथित थे। के श्रीनाथ रेड्डी ने उन दिनों को याद करते हुए बताया कि जब उन्होंने बाबरी मस्जिद को नीचे गिरते हुए देखा था, तो नरसिम्हा राव से मिलने पहुँचे थे। वो प्रधानमंत्री को लेकर चिंतित थे, जो कि दिल की बीमारी से पीड़ित थे।

रेड्डी ने बताया, “जैसा कि मुझे उम्मीद था, उनका दिल तेजी से धड़क रहा था … नाड़ी काफी तेज़ थी … बीपी बढ़ गया था। उनका चेहरा लाल हो रहा था, वे उत्तेजित थे।”

उन्होंने आगे कहा, “मैं एक डॉक्टर के रूप में काफी आश्वस्त हूँ कि विध्वंस के लिए उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया सच्ची व्याकुलता थी। यह उस व्यक्ति का नहीं था, जिसने इसकी योजना बनाई होगी या इसमें उनकी कोई संलिप्तता होगी।”

यदि उनके डॉक्टर की तत्कालीन स्वास्थ्य स्थिति का विवरण सटीक है, तो यह साबित होता है कि नरसिम्हा राव को यह पता नहीं था कि क्या होने वाला था। यह ज्ञात है कि वह व्यक्तिगत रूप से समाधान निकालकर दोनों पक्षों के बीच मध्यस्थता स्थापित करने की कोशिश कर रहे थे और हिंदू संगठन के नेताओं से यह आश्वासन लेने का प्रयास कर रहे थे कि मस्जिद क्षतिग्रस्त नहीं होगी।

ऐसा कहा जाता है कि नरसिम्हा राव ने 1992 के नवंबर का अधिकांश समय भाजपा के नेताओं के साथ गुप्त वार्ता में बिताया। इन वार्ताओं में क्या चर्चा हुई, यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। हालाँकि उनके आलोचको का मानना है कि 6 दिसंबर 1992 को जो हुआ, उसमें वह भी शामिल थे।

राम जन्मभूमि के साथ कई और प्रकरण जुड़े हुए हैं। वैसे बाबरी विध्वंस में राव की भूमिका भी संभवतः आने वाले लंबे समय तक या फिर शायद, अनंत काल के लिए एक पहेली बनी रहेगी।

जख्म-ए -लिबरल: शेखर गुप्ता को याद आया 1992 का समय, बाबरी विध्वंस को ‘राष्ट्रीय कलंक’ बताने पर बंद करनी पड़ी थी मैगजीन

अयोध्या में पवित्र श्रीराम मंदिर के ऐतिहासिक भूमिपूजन के अवसर पर पूरा देश उत्सव के मूड में है, लेकिन देश के कुछ चुनिन्दा इस्लामिक और सेक्युलर विचारकों ने आज इस शुभ दिन पर हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलने का अपना पारम्परिक व्यवसाय जारी रखते हुए खुदको प्रासंगिक बनाए रखा है।

लिबरल जमात का यह मानसिक आघात सिर्फ भूमिपूजन के दिन ही शुरू नहीं हुआ बल्कि पिछले काफी समय से वो इस ‘बुरे दौर’ से गुजर रहे थे और आज उनका यह दुःख बरबस फूट रहा है। यही वजह है कि कुछ ही दिन पहले ट्विटर पर ‘कहीं पूजन, कहीं सूजन’ जैसे दुखद हैशटैग ट्रेंड कर रहे थे।

आज के दिन की शुरुआत में ही सबसे पहले जहाँ ओवैसी और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के एक जहरीले बयान से हुई, वहीं यह क्रम पूरे दिन जारी रहा और इस्लामिक प्रपंचकारी राणा अयूब से लेकर आरफ़ा खानम रह-रहकर अपना दर्द ट्विटर पर उगलते रहे।

इस्लामिक विचारधारा समर्थक राना अयूब तो इस बात से भी खफ़ा हैं कि कॉन्ग्रेसी नेता भी राम मंदिर के जश्न में हिन्दुओं के साथ अपनी उपास्थिति दर्ज कराने के लिए मरे जा रहे हैं।

दरअसल, पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने ट्वीट में लिखा- “अयोध्या में राम मंदिर की ऐतिहासिक नींव रखने पर भारत के लोगों को मेरी हार्दिक बधाई, जो कि हर भारतीय की लम्बे समय से इच्छा थी। भगवान राम के धर्म का सार्वभौमिक संदेश न केवल भारत के लिए, बल्कि दुनिया के लिए मार्गदर्शक बना हुआ है।”

इस से राना अयूब अपने भीतर के ज्वालामुखी को रोक नहीं सकीं और उन्होंने इस ट्वीट को शेयर करते हुए लिखा – “भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस अपना असली चेहरा दिखाते हुए।”

2002 के गुजरात दंगों की काल्पनिक कहनियों को अपनी पत्रकारिता बताने वाली राना ने इससे पहले एक अन्य ट्वीट में लिखा – “हम हैरान क्यों हैं? यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जिसने मुस्लिमों का नरसंहार किया और उसके लिए उसे सत्ता मिली। वह शख्स, जिसने उन्हें हिंदू भारत का सपना बेचा था और अब इसे पूरा कर रहा है। यह नाटक बंद करो।”

वहीं, जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद ने राम मंदिर पर कोई विशेष टिप्पणी ना करते हुए बस पीएम मोदी की दाढ़ी और नए लुक पर सवाल किया कि आखिर मोदी जी ‘एर्तुग्रुल दाढ़ी’ क्यों रख रहे हैं?

शेहला के इस ट्वीट के जवाब में कई तरह की प्रतिक्रियाएँ देखने को मिलीं, जिनमें से कुछ लोगों ने भाषा की मर्यादा का ध्यान ना रखते हुए पीएम मोदी की दाढ़ी की तुलना छत्रपति शिवाजी महाराज के साथ भी की।

शीला भट्ट ने द प्रिंट के संस्थापक शेखर गुप्ता से जुड़े एक किस्से को याद दिलाते हुए ‘इंडिया टुडे’ मैगजीन की कवर फोटो शेयर किया जिसमें अयोध्या बाबरी विध्वंस का जिक्र करते हुए मुख्य पन्ने पर लिखा था- “राष्ट्रीय कलंक।”

इस फोटो के साथ शीला भट्ट ने लिखा है – “दिसंबर 1992 में, इंडिया टुडे के गुजराती संस्करण, (तब, मैं वरिष्ठ संपादक थी और शेखर गुप्ता इसके संपादक थे) ने इसके कवर पर लिखा था ‘राष्ट्र नु कलंक।’ गुजरात का तब तक इतना भगवाकरण कर दिया गया था कि पाठकों ने गुजराती इंडिया टुडे के खिलाफ कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। आखिरकार गुजराती संस्करण बंद हो गया।”

इसके जवाब में शेखर गुप्ता ने अपने दर्द का स्मरण करते हुए लिखा है – “हमने अक्टूबर 1992 में गुजराती संस्करण का शुभारंभ किया था। 6 सप्ताह के भीतर, हम 75 हजार तक बढ़ गए थे। इसके बाद अयोध्या के शीर्षक और कवरेज में विरोध की बाढ़ आई। अगले 4 हफ्तों में, हम 25 हजार तक गिर गए। संस्करण हमारे मार्केटिंग हेड के कहे अनुसार ही डूब गया।”

‘द प्रिंट’ की ही जर्नलिस्ट जैनाब सिकंदर ने ट्वीट किया है – “मुझे अयोध्या में सैंटा की मौजूदगी महसूस हो रही है।”

इसके जवाब में उन्हें ट्विटर यूजर ने कई क्रिएटिव जवाब दिए –

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण का भूमिपूजन किए जाने पर असदुद्दीन ओवैसी ने कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष (सेक्युलर) देश है और पीएम मोदी ने राम मंदिर की आधारशिला रखकर प्रधानमंत्री कार्यालय की शपथ का उल्लंघन किया है। ओवैसी ने कहा कि यह लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की हार और हिंदुत्व की सफलता का दिन है।

इसके अलावा आईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने अपना दर्द शेयर करते हुए कहा, ”प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मैं भावुक हूँ। मैं कहना चाहता हूँ कि मैं भी उतना ही भावुक हूँ क्योंकि मैं सह-अस्तित्व और नागरिकता की समानता में विश्वास करता हूँ। प्रधानमंत्री, मैं भावुक हूँ क्योंकि एक मस्जिद 450 साल से वहाँ खड़ी थी।”

लेबनान की राजधानी बेरूत में जोरदार धमाका: 100 से ज्यादा लोगों की मौत, 4000 लोग घायल, 2 लाख से ज्यादा लोग बेघर

लेबनान की राजधानी बेरूत में कल (4 अगस्त,2020) अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। लोग कुछ समझते इससे पहले 15 मिनट के अंदर इस धमाके ने जबरदस्त भयानक रूप ले लिया। यह जोरदार धमाका किसी भूकंप से कम नहीं था। धमाके में कम से कम 100 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। वहीं, कुल करीब 4000 लोगों के घायल होने की भी खबर है। हालाँकि, धमाके की भयावहता देखकर लगता है कि मृतकों और घायलों की संख्या बढ़ सकती है।

लेबनान के राष्ट्रपति ने बेरूत में दो हफ्ते के लिए इमरजेंसी लगा दिया है। राष्ट्रपति ने बुधवार को कैबिनेट की आपात बैठक भी बुलाई है। लेबनान के प्रधानमंत्री हसन दियाब ने बताया है कि यह विस्फोट बंदरगाह पर 2700 टन अमोनियम नाइट्रेट से हुआ है।

बेरूत के शहर के गवर्नर मारवान अबाउद ने कहा कि 200,000 से 250,000 लोगों ने अपने घर खो दिए हैं और यहाँ की ऑथोरिटी उन्हें भोजन, पानी और आश्रय प्रदान करने का काम कर रही हैं। उन्होंने आगे जानकारी दी कि, इस धमाके में बेरूत फायर ब्रिगेड के 10 सदस्यों की भी मौत हुई है। इसके अलावा 3 से 5 बिलियन डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ है।

बता दें, धमाका इतना तेज था कि आस-पास सब तरफ आग लग गई, कारें पलट गईं और लोगों के घरों में खिड़की-दरवाजों के शीशे टूट गए। लेबनान की न्यूज एजेंसी एनएनए और सुरक्षा सूत्रों ने कहा कि यह विस्फोट शहर के बंदरगाह क्षेत्र में हुआ। इस मामले की जानकारी रखने वाले एक मीडिया सूत्र ने कहा कि इस क्षेत्र में केमिकल रखे गए थे। सोशल मीडिया पर लोगों द्वारा साझा वीडियो फुटेज में बंदरगाह से धुआं निकलता दिख रहा, जिसके बाद एक बड़ा धमाका हुआ।

वहीं लेबनान के कस्टम विभाग ने घटना के लिए सीधे तौर पर पोर्ट चीफ को जिम्मेदार ठहराया। कस्टम हेड बादरी दहेर ने कहा- मेरा डिपार्टमेंट अमोनियम नाइट्रेट रखने के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। धमाका इससे ही हुआ। इस घटना के लिए पोर्ट चीफ हसन कोरेटेम जिम्मेदार हैं। इस बारे में पोर्ट चीफ ने अब तक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेरूत में हुए धमाके पर दुख जताया। बुधवार सुबह एक ट्वीट में मोदी ने कहा- बेरूत में हुए धमाके की खबर सुनकर दुखी हूँ। कई लोगों ने जान गँवाई और प्रॉपर्टी का भी नुकसान हुआ। ब्लास्ट में मारे गए और घायल हुए लोगों के प्रति हमारी सम्वेदनाएँ हैं।

बेरूत में धमाके के बाद लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की गई है। वहीं, भारतीय एंबेसी ने बेरूत में फँसे लोगों के लिए हेल्पलाइन नंबर जारी किया है। बेरूत में हुए धमाकों को लेकर भारतीय दूतावास की तरफ से कहा गया है कि सभी संयम बनाए रखें। साथ ही अगर किसी भी भारतीय को मदद की जरूरत हो तो वो दूतावास के हेल्पलाइन नंबर 01741270, 01735922, 01738478 पर संपर्क कर सकते हैं।

30 साल की मेहनत के बाद संकल्पपूर्ति का आनंद मिला, हमें मन की अयोध्या को सजाना होगा: संघ प्रमुख भागवत

500 साल बाद आज रामलला के लिए दोबारा भव्य मंदिर बनने जा रहा है। इस अवसर पर उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, संघ प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक साथ एक मंच पर मौजूद रहे। प्रदेश मुख्यमंत्री ने जहाँ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए पीएम मोदी और संघ प्रमुख समेत सभी धर्माचार्यों व संतगणों का आभार व्यक्त किया। वहीं संघ प्रमुख ने भी इस अवसर पर अपनी खुशी व्यक्त की। उन्होंने उस संकल्प को याद किया जिसका आह्वान उन्होंने 30 वर्ष पहले किया था। इसके अलावा उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी, अशोक सिंघल और रामचंद्रदास को भी याद किया।

भूमि पूजन के इस शुभ अवसर पर कार्यक्रम में मौजूद सभी लोगों को संबोधित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि उनके लिए यह बहुत प्रकार से आनंद का क्षण है। उन्होंने कुछ समय पहले एक संकल्प लिया था। उस वक्त संघ के संचालक बाला साहेब देवरस ने उन्हें इस दिशा में कोई कदम आगे बढ़ाने से पहले याद दिलाया था कि इस काम में बहुत साल लगेंगे।

संघ प्रमुख कहते हैं कि बाला साहेब देवरस ने उन्हें पहले ही कहा था कि इस काम के लिए करीब 20-30 साल लगकर मेहनत करनी पड़ेगी, तब जाकर ये काम होगा। मोहन भागवत कहते हैं कि आज 20-30 साल की मेहनत के बाद 30वें साल के आरंभ में उन्हें उनके संकल्पपूर्ति का आनंद मिला।

उन्होंने अपने संबोधन में उन लोगों के प्रयासों और बलिदानों का प्रमुखता से जिक्र किया और कहा कि वह लोग अब हमारे बीच प्रत्यक्ष रूप से मौजूद नहीं है। लेकिन आज कार्यक्रम में वह सभी सूक्ष्म रूप में उपस्थित हैं। उन्होंने उन लोगों को भी याद किया जो जीवित तो हैं लेकिन कार्यक्रम में शामिल नहीं हो सके। 

संघ प्रमुख ने रथ यात्रा निकालकर राम मंदिर के आंदोलन को नया रूप देने वाले लाल कृष्ण आडवाणी को याद किया और कहा कि आज वह भी अपने घर में बैठकर यह देख रहे हैं। ये सब परिस्थिति है कि लोग आना चाहते हैं मगर परिस्थितियाँ ऐसी नहीं हैं कि उन्हें बुलाया जा सके।

उन्होंने इस मौके पर आनंदित लोगों की खुशी को सदियों से अधूरी आस को पूरी होने का नतीजा बताया। साथ ही भारत को आत्मनिर्भर बनाने का जिक्र भी किया। उन्होंने कहा, भारत को आत्मनिर्भर बनाने के लिए जिस आत्मविश्वास और आत्मभान की आवश्यकता थी उसका सगुण अधिष्ठान का शुभांरभ आज हो रहा है।

उन्होंने कहा कि संसार में अभी मंथन चल रहा है और ऐसे समय में भारत ही उसका नेतृत्व करेगा। भारत में यह क्षमता है। भागवत ने कहा कि सारा संसार अंतर्मुख हो गया है। सारा संसार विचार कर रहा है कि कहाँ गलती हो गई। हम उसका हल निकालेंगे, हम उसपर विचार करेंगे, हम शुरू करेंगे, तो हो जाएगा। आज इसके लिए संकल्प करने का दिन है।

भागवत ने श्रीराम के प्रति लोगों की आस्था पर कहा कि सभी भारतवासियों को उनसे प्रेरणा मिलती है कोई अपवाद नहीं, सबके राम हैं सब राम के हैं, इसलिए मंदिर बनेगा। उन्होंने कहा कि मंदिर निर्माण के लिए सबमें दायित्व बाँटे गए हैं और जिम्मेदार लोग अपना काम कर रहे हैं लेकिन इसके साथ ही हमें भी अपना दायित्व पूरा करना है।

भागवत ने कहा, “जिनका जो काम है वो करेंगे, अब हमको अयोध्या को सजाना-सँवारना है। संपूर्ण विश्व को सुख शांति देने वाले भारत को हम खड़ा कर सकें, इसलिए हमें योद्धा बनना है। इस मंदिर के पूर्ण होने से पहले हमारा मन मंदिर बनकर तैयार रहना चाहिए, इसकी सबसे ज्यादा जरूरत है।” भागवत बोले कि हमारे हृदय में भी राम का बसेरा होना चाहिए।

उन्होंने कहा, “हम सबको अपने मन की अयोध्या को सजाना है। प्रभु राम जिस धर्म के विग्रह माने जाते हैं, वो सबकी उन्नति करने वाला, सबको अपना मानने वाला धर्म है, हमें अपने मन में भी ऐसी ही अयोध्या बनानी है। मंदिर बनने से पहले मन का मंदिर सज जाना चाहिए। हमारा हृदय भी राम का बसेरा होना चाहिए। हृदय से सब प्रकार के दोषों को मिटाकर बस देशवासियों को ही नहीं, पूरे विश्व को अपनाने, एक साथ लाने का प्रतीक है यह मंदिर, इसकी स्थापना बहुत ही सक्षम हाथों से हुई है।” 

अपने संबोधन में आरएसएस प्रमुख ने अशोक सिंघल को याद किया। भागवत ने कहा, “आज अगर अशोक जी होते तो कितना अच्छा होता। रामचंद्र दास जी होते तो और अच्छा होता, लेकिन मेरा विश्वास है शरीर से जो नहीं हैं वह सूक्ष्म रूप से आनंद उठा रहे होंगे।”

उन्होंने अपनी बात रखते हुए संबोधन में भारतीयों की मिलनसार प्रवृति और वसुदेव कुटुंब के मंत्र को दोहराया। उन्होंने कहा कि अयोध्या में अब मंदिर बन कर रहेगा। वे बोले, “हम वसुधैव कुटुंबकम में विश्वास रखने वाले लोग हैं। यह एक नए भारत की शुरुआत है।”

मैं समस्त भारतवासियों और चर-अचर जीवों का… शांति एवं कल्याण के लिए पूजन करूँगा: PM मोदी का संकल्प

अयोध्या में राम मंदिर के लिए हुए भूमिपूजन में बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उपस्थित अतिथियों को संबोधित करते हुए जो भी कहा, वो पूरे मीडिया है। लेकिन, साथ ही उन्होंने पूजा से पहले जो संकल्प लिया, उसे भी आपको जानने की जरूरत है। यजमान के रूप में बैठे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर भूमिपूजन के दौरान लिए गए संकल्प के रूप में क्या कुछ कहा, वो नीचे उनके ही शब्दों में पढ़ें:

“आज …….. गोत्र में उत्पन्न मैं नरेन्द्र दामोदर दास मोदी नाम वाला यजमान अपने राष्ट्र का प्रतिनिधि, समस्त चर अचर जीवों का, भारत के वासियों का, विश्व के समस्त प्राणियों का, सकल अशुभ एवं दुःखों के नाश के लिए सभी की सुख शान्ति एवं कल्याण के लिए अनन्त ब्रह्माण्ड के नायक भगवान् श्रीसीताराम का अनुग्रह प्राप्त करने के लिए, बनाए जाने वाले इस नूतन मन्दिर की आधार शिला का पूजन सभी के साथ करूँगा। इसी पूजन के अन्तर्गत गणपति का स्मरण करते हुए भूमि आदि पूजन को यथा क्रम मैं करूँगा।”

अयोध्या राम मंदिर पूजन एवं संकल्प के बाद पुरोहित ने पीएम मोदी से ‘दक्षिणा’ की माँग करते हुए कहा कि किसी भी यज्ञ में दक्षिणा महत्वपूर्ण होती है। उन्होंने कहा कि दक्षिणा तो आज इतनी दे दी गई कि आज सैकड़ों करोड़ आशीर्वाद प्राप्त हो रहे हैं। भारत तो हमारा ही है, उससे ऊपर और कुछ दें। उन्होंने कहा, “कुछ समस्याएँ हैं, उन समस्याओं को दूर करने का संकल्प तो लिए हुए हैं, 5 अगस्त में कुछ और जुड़ जाए तो भगवान की कृपा होगी।”

वहीं अपने सम्बोधन में पीएम मोदी ने कहा कि जिनके त्याग, बलिदान और संघर्ष से आज ये स्वप्न साकार हो रहा है, जिनकी तपस्या राममंदिर में नींव की तरह जुड़ी हुई है, को उन सबको नमन करते हैं। उन्होंने याद दिलाया कि राम हमारे मन में गढ़े हुए हैं, हमारे भीतर घुल-मिल गए हैं। उन्होंने कहा कि आप भगवान राम की अद्भुत शक्ति देखिए, इमारतें नष्ट कर दी गईं, अस्तित्व मिटाने का प्रयास भी बहुत हुआ, लेकिन राम आज भी हमारे मन में बसे हैं, हमारी संस्कृति का आधार हैं।

विधायकों पर निगरानी के लिए CM गहलोत ने लगाए 700 पुलिसकर्मी, CID: अकेले में फोन पर बात करने पर प्रतिबंध

इधर पूरा देश राम मंदिर भूमिपूजन के जोश में डूबा हुआ है, उधर राजस्थान में अशोक गहलोत अलग ही खेल में लगे हुए हैं। फ़िलहाल तो वो अपने विधायकों को लेकर जैसलमेर के होटलों में भागे हुए हैं। अब खबर आई है कि सभी विधायकों को वहाँ तनोट मातेश्वरी मंदिर में ले जाया गया है। वहीं 3 विधायकों के सचिन पायलट से संपर्क में होने की सूचना के बाद विधायकों के अकेले में फोन पर बात करने को भी प्रतिबंधित कर दिया गया है।

उक्त मंदिर 1200 वर्ष पुराना है। 80-90 विधायकों को वहाँ लेकर जाया जा रहा है। हालाँकि, कोरोना काल में मंदिर को बंद रखा गया था लेकिन मुख्यमंत्री की इस योजना के बाद मंदिर को खुलवाया गया है। सचिन पायलट के 3 करीबी विधायकों ने कहा है कि वो सीएम के तानाशाही रवैये से परेशान हैं और वो अपने सम्मान के लिए जरूर लड़ेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि वो अशोक गहलोत के नेतृत्व में काम नहीं कर सकते।

खबरों के अनुसार, गहलोत सरकार को सीआईडी ने सूचित किया है कि उनके खेमे के 3 विधायकों से सचिन पायलट गुट ने संपर्क साधा है। उन विधायकों के परिजनों के माध्यम से संपर्क साधने की खुफिया जानकारी मिलने के बाद होटल में पहरेदारी और बढ़ा दी गई है। साथ ही विधायक अब फोन पर अकेले बात भी नहीं कर सकते। साथ ही सीआईडी में विश्वस्त कर्मियों की टीम को भी लगाया गया है, जो जैसलमेर जाएगी।

होटल के घेरे में 700 पुलिस अधिकारियों के अलावा अब सीआईडी को भी तैनात किया जाएगा। विधायकों को कह दिया गया है कि अगर उन्हें फोन पर किसी से बात करनी भी है तो वो अपने साथियों के बीच ही ऐसा करें, कहीं अकेले में जाकर नहीं। होटल के बाहर बैरिकेडिंग भी की गई है। कॉन्ग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला भी जैसलमेर में ही जाकर बैठे हुए हैं और बागियों को भाजपा से नाता तोड़ने की सलाह दे रहे हैं।

सचिन पायलट के करीबी विधायक वेद प्रकाश सोलंकी ने कहा कि पार्टी को फिर से खड़ा करने के लिए पायलट ने पंचायत से लेकर जिला स्तर तक काफी मेहनत की, लेकिन उन्हें ही सरकार में अलग-थलग करने का प्रयास होता रहा जिससे कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता आहत हुए। विधायक इंद्राज सिंह ने आरोप लगाया कि गहलोत ने किसानों की कर्जमाफी और युवाओं के लिए रोजगार जैसे मुद्दे उठाने नहीं दिया।

इधर राजस्व खुफिया निदेशालय (DRI) ने राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत के बड़े भाई और उर्वरक घोटाले में आरोपित अग्रसेन गहलोत पर ‘स्मगलिंग सिंडिकेट का भी हिस्सा होने का आरोप लगाया है। डीआरआई और कस्टम अधिकारियों द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की गई एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में यह आरोप लगाए गए थे। कस्टम ऑथोरिटी द्वारा जुलाई की शुरुआत में अग्रसेन गहलोत से जुड़े मामले की शिकायत दर्ज की गई थी।

सदियों से ईद की मुबारकबाद लेने वाले क्या श्रीराम मंदिर के जश्न में आपके साथ हैं?

सदियों के इन्तजार और संघर्ष के बाद आखिरकार अगस्त 05, 2020 का दिन हिन्दुओं की आस्था और उनके सांस्कृतिक गौरव के लिए ऐतिहासिक दिन है। मुझे बचपन से ही याद है जब दादाजी दूरदर्शन पर समाचार देखते हुए हमें बताते थे कि अयोध्या में कुछ हो रहा है, आडवाणी जी रथयात्रा कर रहे हैं।

तब हम बस यही सवाल पूछा करते थे कि भारत में श्रीराम जन्मभूमि पर उनके मंदिर के लिए जनजागरण की आवश्यकता क्या है? यहाँ तो हर किसी की आत्मप्रेरणा को यही कहना चाहिए कि वहाँ श्रीराम मंदिर बने, जहाँ भारतीय हिन्दू राम मंदिर बनाना चाहते हैं।

समय के साथ समझ बढ़ती गई तो यह भी देखने को मिला कि 2002 में श्रद्धालुओं से भरी साबरमती ट्रेन को कुछ कट्टरपंथियों ने जला दिया और इसे मुस्लिमों पर हुआ अत्याचार साबित कर दिया गया।

हम संचार और मीडिया की भाषा में उलझते हुए फिर भी सद्भाव प्रकट करते गए कि मुस्लिमों के साथ कुछ हुआ है, जो नहीं होना चाहिए था। धीरे-धीरे यह भाषा भारत का भविष्य बनते चली गई और देखते ही देखते हिन्दुओं को अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक साबित कर दिया गया।

हिन्दुओं को जब-जब पीड़ित किया गया, उनके साथ संवेदनाओं की कमी देखी गई। उनके प्रतीकों को लज्जित किया जाता रहा और उनकी संस्कृति का अपमान किया गया। यह कभी योग तो कभी आयुर्वेद, कभी गाय और कभी श्रीराम को अपमानित कर खूब होता रहा।

अब सवाल यह था कि यदि भारत का हिन्दू अपने ही देश में दोयम दर्जे का नागरिक है, तो फिर वह अपने लिए किस देश जाकर न्याय माँगे? उसके संविधान में धर्म और उपासना की स्वतन्त्रता का जिक्र तो कर दिया गया था, लेकिन उसे सार्वजानिक जगहों पर तिलक लगाने के कारण उपहास का पात्र बनना पड़ा। उसके यज्ञोपवित पर भद्दे चुटकुले उसे उसी के देश में रहते टीवी से लेकर सड़कों तक पर सुनाई देने लगे।

इसमें सबसे बुरा दौर तब आया जब धूर्त कम्युनिस्टों ने कॉन्ग्रेस की शरण में मुस्लिम कट्टरपंथियों के सहारे युवाओं की एक नई पौध तैयार की, जो अपने सहपाठियों और सहकर्मियों को इस बात के लिए लज्जित करते कि वह ‘रिग्रेसिव’ है क्योंकि वह हिन्दू है और उसके माथे पर तिलक लगा है।

हालाँकि, हिन्दुओं का उपहास करने वाले यही लोग मुस्लिमों को उनके ईद और अन्य त्योहारों पर उन्हें जमकर बधाई और मुबारकबाद देते। कहते कि आज उन्होंने अपने मुस्लिम मित्र के घर सेवईंयाँ खाई।

फिर सोशल मीडिया पर नव-विचारकों का उद्भव हुआ और यह बातें कुछ ‘उदारवादी’ नजर आने वाले ‘स्तम्भकार’ जमकर लिखने लगे। वो दीपावली के दिन रंगीन लिबास में अपनी तस्वीरें तो शेयर करते देखे गए लेकिन किसी को पूरा मुँह खोलकर बधाई नहीं देते थे।

यह उदारवादी जन ईद और मुस्लिमों के हर पर्व पर रात के 12 बजने का इन्तजार करते और सहिष्णुता में डूबे हुए भाई-चारे वाले लेख लिखते। MNC और कॉरपोरेट ऑफिस में यह बहुत लोकप्रिय चलन देखा जाता है।

हम अपने मुस्लिम दोस्तों को उनके हर त्यौहार की बधाई देते लेकिन वो हमारे हर त्यौहार पर किसी रूठी हुई महबूबा की तरह खामोश नजर आए। तब हमें यह यकीन होना शुरू हुआ कि श्रीराम ‘भारत’ के विचार में तो हैं, लेकिन यह जनमानस की मूलभावना का हिस्सा अभी तक भी नहीं हैं।

हिन्दुओं ने खुद को हर बार अपने ही देश में रहकर उपेक्षित महसूस किया है और उन्हें ऐसा महसूस करने के लिए मजबूर भी किया जाता रहा। भारत के मन को समझने में भारत के नागरिकों ने बड़ी भूल की। खासकर उन लोगों ने, जो मुस्लिमों के त्योहारों पर खूब उत्साहित नजर आते रहे, उनके साथ बीफ पार्टी में उनके सहयोगी बने और आज जब सदियों से विवादित बताए गए हिन्दुओं की आस्था के सबसे बड़े प्रतीक के जश्न का दिन आया है, तब इस उदारवादी बिरादरी में मातम का माहौल है।

भारत के सेक्युलरिज्म के मुखौटे को नंगा करने के लिए यही तथ्य काफी है कि एकमात्र श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन पर उच्चतम न्यायलय के फैसले के बावजूद मुस्लिम लॉ बोर्ड, और मुस्लिमों के तथाकथित नायक ओवैसी बंधुओं ने इस फैसले को ही मानने से मना करते हुए कहा है कि यह बाबरी मस्जिद ही था, है और रहेगा।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने तो भूमिपूजन के ठीक पहले यह धमकी तक दे डाली है कि परिस्थितियाँ हमेशा यही नहीं रहेंगी। यह वही जुबान है, जिसे लेकर गजनवी भारत आया था, यह वही जुबान है, जिन मुस्लिम आक्रान्ताओं ने हिन्दुओं के मंदिरों को तहस-नहस कर, उन्हें लूटकर खुद को बुतशिकन की उपाधि देने वालों ने इस्तेमाल की थी।

इस संदेश का सिर्फ एक ही अर्थ है; इस देश में मुस्लिम सिर्फ तभी तक सेक्युलर हैं, जब तक उनके हितों का समर्थन कॉन्ग्रेस जैसी सत्ताओं के संरक्षण में होता रहे। और जिस दिन भारत का हिन्दू अपने अधिकारों की माँग करेगा, उस दिन मुस्लिम उन्हें याद दिलाएगा कि इतिहास में बाबर और औरंगजेब ने क्या किया था।

जिसे आप सेक्युलर कहते रहे, वहाँ 7वीं सदी से लेकर आज तक कुछ भी नहीं बदला है। जबकि हिन्दू हर बात पर उदार रहने के बावजूद भी कट्टर और ‘हेट मोंगर’ कहलाए। इतिहास गवाह है कि मुस्लिम हमेशा सिर्फ एक मुस्लिम रहा है, उसके शब्दकोश में कट्टर शब्द ही नहीं है क्योंकि मुस्लिम मजहबी कट्टरता का ही पर्याय है। जबकि, एक हिन्दू, हिन्दू होने के अलावा सब कुछ रहा।

वह सेक्युलर रहा, वह नास्तिक रहा, वह लज्जित हिन्दू रहा, उपेक्षित हिन्दू रहा और अब वह सेक्युलरिज्म का धोखा खाया हुआ हिन्दू है। आज हमारे उत्सव का समय है, इसे जाने नहीं दिया जाना चाहिए। आज खुद को श्रीराम से अलग बताने का समय नहीं है। आज आत्मविश्लेषण करते हुए यह सवाल खुद से पूछने का समय है कि आज आपकी ख़ुशी के इस अवसर में आपके कितने मुस्लिम और सेक्युलर मित्र आपके साथ खुश हैं?

‘लिंच करके तुमसे जय श्री राम बुलवाएगा, तब यह ट्वीट भी नहीं बचाएगा’ – मो. कैफ ने किया राम मंदिर का समर्थन, पड़ी गाली

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए आज (अगस्त 5, 2020) भूमि पूजन पूरा हो गया है। भूमि पूजन कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्य पूजा की और इस ऐतिहासिक कार्य की आज अयोध्या साक्षी बनी है। करोड़ों रामभक्तों का सालों का इंतजार आज पूरा हो गया, जब राम मंदिर की आधारशिला रख दी गई और विधिवत रूप से राम मंदिर के निर्माण का कार्य शुरू हो गया है।

सभी रामभक्तों ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया दी। इस पर सेलिब्रिटीज ने भी प्रतिक्रिया जाहिर की। इसी कड़ी में पूर्व भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद कैफ ने भी एक ट्वीट किया है। कैफ का यह ट्वीट ना केवल सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है बल्कि हर कोई इसकी तारीफ भी कर रहा है। मगर कट्टरपंथियों को मोहम्मद कैफ का ये ट्वीट पसंद नहीं आ रहा है।

बता दें कि मोहम्मद कैफ ने भूमि पूजन के बाद ट्वीट करते हुए लिखा, “गंगा-जमुना संस्कृति वाले शहर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में बड़े होते हुए, मुझे करुणा, क्षमा, सम्मान और प्रतिष्ठा की कहानी रामलीला देखना काफी पसंद था। राम ने सभी में अच्छाई देखी और हमारे आचरण में उनकी विरासत को प्रतिबिंबित करना चाहिए। इससे नफरत के एजेंट प्यार और एकता के रास्ते में नहीं आ सकते।”

कैफ को लेकर नफरत का असर ऊपर के ट्वीट में देखिए। उन्हें यूपी का बिना इज्जत वाला मजहबी बता दिया गया। और तो और, शब्दों के साथ खेलते हुए उनके मरने की कामना भी कर ली गई।

एक ट्विटर यूजर ने इस पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा, “मजहब के सरकारी लोग गुजरात दंगों को भूल जाते हैं। याद है जिन्ना, वो सही थे। वह हमसे बेहतर हिंदुओं को जानते थे। पुरानी गंगा जमुनी संस्कृति सिर्फ मिथक है, यह संस्कृति सबसे खराब संस्कृति में से एक है, जो सबसे खराब संस्कृति है।”

इम्तियाज नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “चापलूसी ने इस मुकाम पर पहुँचा दिया कि चंद सिक्के पर जमीर बेचने लगे। खैर तुम अपना धर्मोपदेश अपने पास रखो। सबको तुम्हारी औकात पता है।”

एक ने लिखा, “लंबे समय से तू BCCI में अच्छी नौकरी के लिए बीजेपी और मोदी को चमकाने में लगा है, लेकिन तुम्हें ये नहीं मिलेगा भाई।”

एक यूजर ने लिखा कि कितने पैसे मिले हैं दलाली के।

एक अन्य यूजर ने लिखा, “अभी कोई आएगा और लिंच करके तुमसे जय श्री राम बुलवाएगा। तब फोन खोल कर ये ट्वीट भी दिखलाओ तो भी कुछ नहीं होगा।”

वहीं एक यूजर ने उनके ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “शर्म आनी चाहिए।”

गौरतलब है कि पूर्व अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटर मोहम्मद कैफ अपने मजहब के लोगों के निशाने पर आ ही जाते हैं। पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर योग करती तस्वीर शेयर करने पर उन्हें गालियाँ पड़ी थी।

इससे पहले प्रधानमंत्री के आह्वान पर कोरोना के अंधकार को मिटाकर एक नई सुबह की आस में कैफ ने अपनी पत्नी के साथ 9 मिनट के लिए मोमबत्ती जलाया। जिसके बाद कट्टरपंथी  कैफ को मजहब का पाठ पढ़ाने लगे और ऐसा करने के लिए उन्हें दुत्कारने लगे। उनके लिए अपशब्द बोलने लगे।