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J&K में 500+ अधिकारियों की जाएगी नौकरी: भारत के प्रति फैला रहे थे घृणा, शामिल थे देशद्रोही गतिविधियों में

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के खत्म होने के 1 वर्ष पूरे हो गए हैं और इसके साथ ही प्रदेश के 500+ ऐसे अधिकारियों पर सरकार की नज़र है, जो राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में संलिप्त हैं। इन सभी की नौकरी जाने वाली है।

जम्मू कश्मीर की सरकार ने पिछले ही सप्ताह एक कमिटी गठित की थी, जिसने इस संबंध में जाँच कर के अनुशंसा की थी। कमिटी ने इन सभी के पिछले रिकार्ड्स की छानबीन करने के बाद इन्हें बर्खास्त करने की अनुशंसा की थी

इए कमिटी की अध्यक्षता जम्मू कश्मीर के मुख्य सचिव ने की थी। इसमें डीजीपी और सीआईडी के ADGP भी मौजूद थे। इससे पहले सरकार ने अनुच्छेद 311(2)C को लागू कर दिया था, जिससे सरकार को वहाँ के अधिकारियों को विभिन्न कारणों से बर्खास्त करने का अधिकार मिल गया। इसमें देश विरोधी गतिविधियों में संलिप्त अधिकारियों पर भी कार्रवाई का प्रावधान है। इस अनुच्छेद के प्रावधान पहले कम्मू कश्मीर में लागू नहीं होते थे क्योंकि इसे विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त था।

इस अनुच्छेद के लागू होने के बाद वहाँ के प्रशासनिक विभागों को अधिकार मिल गया कि वो इस प्रकार के मामलों को गृह मंत्रालय को भेज सके, जो जाँच समिति की रिपोर्ट के बाद उचित कार्रवाई करेगा। यहाँ तक कि IAS और IPS अधिकारियों को भी इसमें छूट नहीं दी गई है।

दोषी पाए जाने पर इन दोनों कैडर (IAS और IPS) के अधिकारियों पर भी कार्रवाई की जा सकती है। जिन अधिकारियों पर कार्रवाई हुई है, वो ऐसे कार्यों में लिप्त थे, जिनसे देश की सुरक्षा और अखंडता को खतरा था

अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने के बाद ऐसा पहली बार हो रहा है, जब जम्मू कश्मीर में किसी अधिकारी को बर्खास्त किया गया हो। कमिटी ने पाया कि ये अधिकारी सोशल मीडिया सहित विभिन्न माध्यमों से राजनेताओं को धमकी दे रहे थे और अगस्त 5, 2019 को सरकार द्वारा लिए गए निर्णय के आलोक में देश के प्रति घृणा फैला रहे थे। इस मामले में गठित कमिटी ने इन अधिकारियों से पूछताछ भी की थी। अब 500 अधिकारियों को बर्खास्त किया जाएगा।

‘बाबरी मस्जिद थी और हमेशा रहेगी… परिस्थति हमेशा ऐसी नहीं होगी’ – भूमिपूजन से ठीक पहले मुस्लिम लॉ बोर्ड की धमकी

अयोध्या में श्रीराम मंदिर के भूमिपूजन समारोह से कुछ ही घंटों पहले, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाते हुए धमकी भरा सन्देश जारी किया है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एक ट्वीट में लिखा है कि दुखी होने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि कोई भी परिस्थिति हमेशा नहीं रहती।

इस ट्वीट में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने लिखा है –

“बाबरी मस्जिद थी, और हमेशा एक मस्जिद रहेगी। हागिया सोफिया हमारे लिए एक बेहतरीन उदाहरण है। अन्यायपूर्ण, दमनकारी, शर्मनाक और बहुसंख्यक तुष्टिकरण वाले फैसले से भूमि का पुनर्निमाण इसे बदल नहीं सकता है। दुखी होने की जरूरत नहीं है। परिस्थति हमेशा के लिए नहीं रहती है।”

आज, 05 अगस्त 2020 को अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भूमिपूजन को लेकर देशवासियों में उत्साह का माहौल है। ऐसे में AIMPLB का यह धमकी भरा सन्देश स्पष्ट करता है कि उच्चतम न्यायलय के फैसले के बावजूद भी श्रीराम मंदिर निर्माण के फैसले को लेकर सेक्युलर समाज पूरी तरह से खुश नहीं है।

चर्च और संग्रहालय के बाद दोबारा मस्जिद में तब्दील हुई है हागिया सोफिया

हागिया सोफिया दुनिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक रहा है। हागिया सोफिया तुर्की में एक ऐतिहासिक संरचना है, जो कई वर्षों से एक संग्रहालय था। ग्रीक ऑर्थोडॉक्स कैथेड्रल के रूप में 1500 से अधिक साल पहले निर्मित यह गुंबदाकार संरचना एक लोकप्रिय पर्यटन स्थल के साथ-साथ एक ऐतिहासिक स्थल रहा है।

1953 में संग्रहालय बनने से पहले 1453 में ओटोमन विजय के बाद इसे एक मस्जिद में बदल दिया गया था। यह यूनेस्को का विश्व धरोहर स्थल है। गत जुलाई माह की शुरुआत में ही, तुर्की की एक अदालत ने हागिया सोफिया के संग्रहालय की चली आ रही स्थिति को रद्द करते हुए कट्टरपंथी मुस्लिमों को खुश करने के लिए इसे वापस एक मस्जिद में बदल दिया। इस मस्जिद में अब नमाज शुरू हो गई है।

AIMPLB के ट्वीट में एक प्रेस बयान भी शामिल है। AIMPLB उन वादियों में शामिल था, जिन्होंने पिछले साल नवंबर में अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ समीक्षा याचिका दायर की थी। कोर्ट ने केंद्र सरकार को अयोध्या में एक मस्जिद के निर्माण के लिए पाँच एकड़ जमीन आवंटित करने का भी निर्देश दिया था।

शीर्ष अदालत ने पिछले साल 9 नवंबर को केंद्र सरकार को अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए स्थल सौंपने का निर्देश दिया था। अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए 5 फरवरी को श्रीराम जन्मभूमि तीर्थक्षेत्र ट्रस्ट के गठन की घोषणा की गई थी और श्रीराम मंदिर के निर्माण की देखरेख के लिए केंद्र सरकार द्वारा ट्रस्ट को अनिवार्य किया गया है।

हालाँकि, कोर्ट के फैसले के खिलाफ AIMPLB ने कहा कि वह वैकल्पिक पाँच एकड़ जमीन को स्वीकार नहीं करेगा। एक अन्य मुस्लिम निकाय, जमीयत उलमा-ए-हिंद (JUH) ने कहा था कि वो सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का विरोध करते हैं।

‘बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी… इशांअल्लाह’ – भूमि पूजन के दिन सुबह-सुबह ओवैसी ने उगला जहर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (5 अगस्त 2020) अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए भूमि पूजन करने वाले हैं। इसी बीच AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने एक आज सुबह-सुबह एक ट्वीट किया है। इस ट्वीट में उन्होंने लिखा है, “बाबरी मस्जिद थी, है और रहेगी। इशांअल्लाह।” इस ट्वीट के साथ ओवैसी ने दो तस्वीरें भी शेयर की हैं। एक तस्वीर में मस्जिद खड़ा नजर आ रहा है और दूसरे में उसके विध्वंस की घटना है।

ओवैसी के इस ट्वीट पर कई यूजर्स की प्रतिक्रियाएँ आई हैं। इनमें से अधिकांश समुदाय विशेष के हैं। इनका भी ओवैसी की तरह यही कहना है कि बाबरी मस्जिद थी और रहेगी।

एक यूजर तौसिफ रजा अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखता है, “मंदिर चाहे जितना बड़ा बन जाए। मगर हम अपनी 7 पुश्तों को बताएँगे कि पहले यहाँ बाबरी मस्जिद थी, जिसको भारतीय न्यायपालिका द्वारा तोड़कर यहाँ मंदिर बनाई गई। मस्जिद थी, ये बात भारत की न्यायपालिका ने भी माना था और बार-बार दोहराया भी था।”

वह आगे लिखता है, “अंत में भारत की न्यायपालिका ने भी अपना धर्म बदल कर हिंदुत्व अपना लिया था। हम अगर मर भी गए तो ये बताकर और नसीहत देकर जाऊँगा, ये बात अपने पुश्तों को बताऊँगा कि हम पर ज़ुल्म होते रहे, बर्बरता की सारी हदें पार हो गई हमारे ऊपर लेकिन हमें भारतीय न्यायालयों से इंसाफ़ नहीं मिला।”

वहीं, आकिफ मिर्जा नाम का दूसरा यूजर कामना करते हुए लिखता कि वक्फ बोर्ड को इस मामले में रीअपील करनी चाहिए थी। लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। अगर, वक्फ बोर्ड ऐसा करता तो शायद इस फैसले पर रोक लग जाती।

आलमगीर नाम का यूजर इस मामले पर निराशा जताते हुए कहता है, “वास्तव में यह समुदाय के दुनिया भर के लोगों के लिए अपमान की सदी है! यहाँ तक ​​कि दुनिया में 1.8 अरब के साथ एक देश में 200 मिलियन मजहबी आबादी एक मस्जिद की रक्षा के लिए असहाय हैं।”

बता दें कि गत वर्ष 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवादित जमीन को लेकर अपना फैसला सुनाया था। अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विवादित जमीन राम लला को सौंप दिया था। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को आदेश दिया था कि मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में 5 एकड़ की जमीन दी जाए।

इस फैसले के बाद से कट्टरपंथियों में रोष उमड़ गया था। एक ओर जहाँ फैसले से पहले हर कोई शांति की अपील कर रहा था। वहीं दूसरी ओर फैसले के बाद उसकी निष्पक्षता पर सवाल उठा दिए गए थे। ऐसे में जब राम मंदिर के भूमि पूजन की तारीख नजदीक आई तो ये परेशानी और बढ़ गई। नतीजतन ओवैसी जैसे लोग खुलकर इस फैसले के कारण हर पार्टी का विरोध करने लगे।

आजतक से बातचीत में ओवैसी ने कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा, “कॉन्ग्रेस हमेशा खामोशी से हिंदुत्व की राजनीति करती आई है। कॉन्ग्रेस को खुलकर कह देना चाहिए कि वह हिंदुत्व की विचारधारा को मानती है। कॉन्ग्रेस पहले भी मिली हुई थी। अब उनको यह तय करना है कि वो टीम हिंदुत्व का साथ देंगे या टीम इंडिया का जो धर्मनिरपेक्षता पर विश्वास रखती है।”

इसी प्रकार उन्होंने मुलायम सिंह यादव को भी आड़े हाथों लिया और कहा, “मुलायम सिंह यादव ने भी अपनी सियासी रोटी हमारे खून पर सेकी है। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद जब दोबारा मुलायम सिंह यादव यूपी के मुख्यमंत्री बने तो वो इस मामले में सोते रहे। उन्होंने केस में कोई नोटिफिकेशन जारी नहीं किया। जिन लोगों को हमने रक्षक समझा, उन्हीं लोगों ने हमें नुकसान पहुँचाया है।”

इसके अलावा ओवैसी ने प्रियंका गाँधी के एक ट्वीट पर टिप्पणी करते हुए लिखा, “खुशी है कि वे अब और नाटक नहीं कर रहे हैं। यह अच्छी बात है कि वो भी अतिवादी विचारधार को गले से लगा रही हैं। लेकिन भाईचारे के मुद्दे पर वो खोखली बातें क्यों करती हैं। शर्म मत कीजिए, आप इस बात पर गर्व महसूस करिए कि किस तरह से आपकी पार्टी ने उस आंदोलन में योगदान दिया, जिसकी वजह से हमारे बाबरी मस्जिद को ध्वस्त कर दिया गया।”

जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है नई अधिवास नीति, आतंकी सोच पर चोट के लिए नियम हो और सरल

भारतवासियों और भारत की केंद्र सरकार के लिए जम्मू-कश्मीर आजादी के बाद से ही चर्चा और चिंता का विषय रहा है। आजादी के तुरंत बाद जम्मू-कश्मीर के भारतीय संघ में विलयन के समय कुछ ‘अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधान’ संविधान में किए गए थे। इन प्रावधानों को अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए के नाम से जाना जाता रहा है।

इन विशेष प्रावधानों के अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य को अन्य राज्यों की तुलना में ‘अस्थायी रूप से कुछ अधिक स्वायत्तता’ प्रदान की गई थी। जम्मू-कश्मीर राज्य विदेश, रक्षा और दूरसंचार जैसे तीन विषयों के सन्दर्भ में भारत पर निर्भर होने के अतिरिक्त अपना नीति-नियामक स्वयं था। यहाँ तक कि उसका दंड विधान भी भारतीय दंड विधान से पृथक ‘रणवीर पीनल कोड’ के नाम से जाना जाता था।

वहाँ की विधानसभा का कार्यकाल भी अन्य राज्य विधानसभाओं से अलग 6 वर्ष का था। जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने सबसे पहले और सबसे जोरदार ढंग से जम्मू-कश्मीर को अलगाने वाले इन विशेष प्रावधानों का संसद से लेकर सड़क तक और दिल्ली से लेकर श्रीनगर तक विरोध किया।

जम्मू-कश्मीर के भारत में पूर्ण-विलयन और राष्ट्रीय एकीकरण को सुनिश्चित करने के लिए दिया गया उनका नारा – “एक देश में दो विधान, दो प्रधान और दो निशान नहीं चलेंगे!” बहुचर्चित है। ऐतिहासिक तथ्य है कि भारत के एकीकरण और जम्मू-कश्मीर राज्य के भारत में पूर्ण-विलयन की लड़ाई लड़ते हुए ही जून 23, 1953 को श्रीनगर के निकट निशात बाग़ में नज़रबंदी के दौरान उनकी रहस्यमयी परिस्थितियों में असामयिक मृत्यु हुई।

डॉ मुखर्जी के बलिदान के बाद से अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाने का मुद्दा लगातार जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण विचारधारात्मक और भावनात्मक रहा है। इसी वैचारिक प्रतिबद्धता के परिणामस्वरूप अगस्त 05, 2019 को भारतीय जनता पार्टी की नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने इन दोनों अस्थायी और संक्रमणकालीन प्रावधानों को हटाकर जम्मू-कश्मीर का भारतीय संघ में पूर्ण विलय कर दिया।

जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम-2019 को संसद के दोनों सदनों में पारित करते हुए जम्मू-कश्मीर राज्य के दो केंद्रशासित प्रदेश – जम्मू-कश्मीर और लद्दाख बना दिए गए। लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाने की मूल वजह वहाँ के निवासियों की ऐसी माँग थी, जिसका आधार जम्मू-कश्मीर राज्य के शासन-प्रशासन द्वारा लम्बे समय तक लद्दाखवासियों के साथ किया गया भेदभाव और उपेक्षा थी। हालाँकि, आजादी से लेकर जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन तक इस भेदभाव और उपेक्षा के शिकार जम्मू संभाग के लोग भी रहे हैं।

मार्च 31, 2020 को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (राज्य विधि का अनुकूलन) आदेश-2020 अधिसूचित किया था। इस आदेश के तहत राज्य में पूर्व-प्रचलित 129 कानूनों में आंशिक संशोधन किया है और 29 कानूनों को पूर्ण रूपेण निरस्त किया गया है। इसी आदेश में जम्मू-कश्मीर प्रशासनिक सेवा (विकेंद्रीकरण और भर्ती) अधिनियम-2010 के खंड 2 में आंशिक बदलाव करते हुए ‘स्थायी निवासी’ शब्द के स्थान पर ‘अधिवासी’ शब्द जोड़ा गया है।

इसी संशोधित अधिनियम के खंड 3 ए के अंतर्गत ‘अधिवासी’ शब्द का स्पष्टीकरण करते हुए उसे परिभाषित किया गया है। इस परिभाषा के अनुसार कम-से-कम 15 वर्ष या उससे अधिक समय तक जम्मू-कश्मीर केंद्रशासित प्रदेश में रहने वाले व्यक्ति ‘अधिवासी’ माने जाएँगे। इसके अलावा, केन्द्रशासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों से अपनी 10 वीं/12 वीं की पढ़ाई को मिलाकर कम-से-कम 7 वर्ष तक शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र-छात्राएँ भी अधिवासी माने जाएँगे।

कम-से-कम 10 वर्ष तक जम्मू-कश्मीर में सेवा देने वाले केन्द्रीय सेवाओं, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों/अन्य उपक्रमों, केन्द्रीय विश्वविद्यालयों और अन्य केन्द्रीय स्वायत्तशासी निकायों आदि के कर्मचारी/अधिकारी और उनके बच्चे भी अधिवासी माने जाएँगे।

इसके साथ ही, जम्मू-कश्मीर के राहत एवं पुनर्वास आयुक्त कार्यालय में पंजीकृत विस्थापित भी अधिवासी माने जाएँगे। इस अधिवासन नीति का परिणाम यह होगा कि उपरोक्त श्रेणियों के सभी व्यक्ति निर्धारित प्रक्रिया को पूरा करके अपना अधिवास प्रमाण-पत्र प्राप्त कर सकेंगे। तहसीलदार कार्यालय द्वारा आवेदन के 15 दिन के अंदर अधिवास प्रमाण-पत्र जारी करना अनिवार्य है।

आवेदन को नामंजूर करने की स्थिति में भी 15 दिन में कारण बताने की बाध्यता होगी। ये सभी अधिवासी जम्मू-कश्मीर राज्य के नागरिकों के लिए निर्धारित सभी सुविधाओं के पात्र होंगे। वे जम्मू-कश्मीर के शिक्षण-संस्थानों में प्रवेश, सभी प्रकार की सेवाओं/नौकरियों में भागीदारी कर सकेंगे और घर, जमीन–जायदाद खरीद सकेंगे।

हालिया लागू की गई इस नई अधिवासन नीति से लम्बे समय से वंचित/उपेक्षित बहुत से तबकों को लाभ होगा। इन तबकों में वाल्मीकी समुदाय के ऐसे लाखों लोग हैं, जिन्हें सन 1957 में पंजाब से लाकर जम्मू-कश्मीर में बसाया गया था। तत्कालीन सरकार द्वारा यहाँ के सफाईकर्मियों की लम्बे समय से जारी हड़ताल को तुड़वाने के लिए ऐसा किया गया था। लेकिन सन 1957 से मार्च 31, 2020 तक किसी ने अपना घर–द्वार छोड़कर आए इस अभागे दलित समुदाय की सुधि नहीं ली।

इसी प्रकार इस नई नीति से पश्चिमी पाकिस्तान से खदेड़े गए शरणार्थियों को भी उनके मानव अधिकार और नागरिक अधिकार मिल सकेंगे। यह नीति सन 1990 में कश्मीर घाटी से भगाए गए कश्मीरी पंडितों के जख्मों पर भी कुछ मरहम लगा सकेगी।

कश्मीरी पंडितों का उनके घर में किया गया कत्लेआम और फिर क्रूर विस्थापन स्वातंत्र्योत्तर भारत का अपराधबोध है। इस पाप का परिमार्जन अतिआवश्यक है। यह नीति इसका अवसर देती है। इसी प्रकार यह नीति जम्मू-कश्मीर से बाहर विवाह करने वाली लड़कियों और उनके बच्चों के अधिकारों का संरक्षण भी सुनिश्चित करती है। इससे पहले उन्हें उनके  नागरिक अधिकारों से वंचित कर दिया जाता था, लेकिन अब ऐसा नहीं हो सकेगा।   

जम्मू-कश्मीर केन्द्रित राजनीति करने वाले कई राजनीतिक दलों, मसलन- नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और पैंथर्स पार्टी आदि ने केंद्र सरकार की नई अधिवास नीति का विरोध किया है। वास्तव में, ये दल तो अनुच्छेद 370 और धारा 35 ए को हटाए जाने और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख को पृथक केन्द्रशासित प्रदेश बनाए जाने का भी विरोध कर रहे हैं।

परन्तु यह विरोध वैधानिक और सत्य प्रेरित न होकर राजनीतिक और स्वार्थ प्रेरित है। वे साधनों, संसाधनों और शासन-प्रशासन में अपना विशेषाधिकार और वर्चस्व बनाए रखना चाहते हैं। उनका तर्क यह है कि इस नीति से जम्मू-कश्मीर की जनसांख्यिकी बदल जाएगी, बाहर के लोग यहाँ आकर बस जाएँगे और यहाँ के साधनों-संसाधनों को हड़प लेंगे और बाहरी लोगों के आने और बसने से न सिर्फ जम्मू-कश्मीर की विशिष्ट संस्कृति और जीवन-शैली संकट ग्रस्त हो जाएगी बल्कि अपराध भी बढ़ जाएँगे।

वस्तुतः उपरोक्त सभी तर्क खाली और खोखले हैं। भारत में संघीय व्यवस्था है। एक राज्य के नागरिकों को कहीं भी बसने, जमीन-जायदाद खरीदने, नौकरी-व्यवसाय करने की आज़ादी और अधिकार संविधान-प्रदत्त हैं। अपने ही देश के नागरिक ‘बाहरी’ कैसे हो जाते हैं, किनके लिए और क्यों हो जाते हैं, यह विचारणीय प्रश्न है।

उल्लेखनीय है कि जिस प्रकार 1957 में वाल्मीकी समुदाय ने पंजाब से आकर जम्मू-कश्मीर की सेवा की थी, उसी प्रकार आज भारत के कोने-कोने से आकर लोग जम्मू-कश्मीर की सेवा कर रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में घरेलू कामगारों, ढाँचागत निर्माण मजदूरों और कृषि मजदूरों की बहुत बड़ी तादाद उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश आदि के प्रवासियों की है। बल्कि, बहुत से उद्योग और निर्माण कार्य पूरी तरह उनके ऊपर ही निर्भर हैं।

कोरोना काल के आँकड़े निकालकर देखे जाने जरूरी हैं कि जम्मू-कश्मीर में/से भी कितने प्रवासियों की आवाजाही हुई है। जो अपने जीवन का सर्वोत्तम जहाँ लगा रहे हैं, अगर वे वहाँ अपने अधिकार नहीं माँगेंगे तो और कहाँ माँगेंगे? क्या जम्मू-कश्मीर के नागरिक दिल्ली, बम्बई, बंगलौर में नौकरी और व्यवसाय नहीं करते?

क्या वे भारत के अन्यान्य शहरों में जमीन-जायदाद नहीं खरीदते? क्या देश के किसी भी कोने में उनके बसने, काम करने पर पाबंदी या प्रतिबन्ध है? यदि अन्य राज्य भी अपनी-अपनी सीमाओं पर अपनी-अपनी लौह-दीवारें खड़ी कर दें, तो फिर एक राष्ट्र और राष्ट्रीयता का क्या अर्थ रह जाएगा? एक राष्ट्र में छोटे-छोटे स्वार्थों और सहूलियतों संबंधी किलेबंदी की नीति और राजनीति अब अतीत का अध्याय है।

युवा पीढ़ी अवसर चाहती है, प्रतिस्पर्धा चाहती है, शिक्षा और रोजगार के लिए पूँजी निवेश चाहती है और नई संभावनाएँ चाहती है। इन चाहतों को पूरा करने के लिए हमें ‘बाहरियों’ का स्वागत करने की मनोभूमि बनानी पड़ेगी।

जम्मू-कश्मीर की नई अधिवासन नीति वस्तुतः जम्मू-कश्मीर के नव-निर्माण का दस्तावेज है। यह नीति जम्मू-कश्मीर की महत्वाकाँक्षी निर्माण परियोजना में अपना श्रम, कौशल, प्रतिभा और पूँजी लगाने वाले भारतीयों का स्वागत-द्वार है। आज राज्य को सुविधाओं और विशेषाधिकारों की सुरक्षित चहारदीवारियों से घेरकर न राज्य के नागरिकों का भला किया जा सकता है और न ही देशहित किया जा सकता।

संभवतः, वर्षों से चले आ रहे राजनीतिक प्रोपेगेंडा और स्थायीभाव बन चुके तुष्टिकरण के दबाव में ही केंद्र सरकार ने अधिवासन की पात्रता के इतने कठिन नियम बनाए हैं। अन्यथा, उसे अन्य राज्यों जैसे ही अधिवासन के सरल नियम बनाकर जम्मू-कश्मीर के विलयन की प्रक्रिया पर पूर्ण-विराम लगाना चाहिए था।

इस अधिवासन नीति में कम-से-कम कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी को बदलने की दिशा में भी साहसिक निर्णय लेने की आवश्यकता थी। यह कश्मीर घाटी की जनसांख्यिकी ही थी, जिसने जनवरी 1990 में 3000 से अधिक निर्दोष कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम किया और लाखों को घर-द्वार और जड़-जमीन से बेदख़ल और विस्थापित किया।

कश्मीर घाटी में न सिर्फ कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की कोई ज़मीनी योजना बनाई जाए, बल्कि जम्मू-कश्मीर में एक दिन भी सेवा करने वाले भारतीय सेना और अर्ध सैन्य बलों के सेवानिवृत्त अधिकारियों और सैनिकों को कश्मीर घाटी में बसने पर तत्काल अधिवासन अधिकार दिए जाएँ, ताकि आतंकवाद और आतंकी मानसिकता की जनसांख्यिकी को संतुलित किया जा सके।

राम मंदिर के लिए कॉन्ग्रेस के समर्थन के बाद केरल में सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने बुलाई आपातकालीन बैठक

इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने राम मंदिर के पक्ष में कई कॉन्ग्रेस नेताओं के बयानों के बारे में जानने के बाद बुधवार (अगस्त 5, 2020) को अपने शीर्ष अधिकारियों की एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। बता दें कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग केरल में कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाले UDF का दूसरा सबसे बड़ा घटक है।

पार्टी महासचिव प्रियंका गाँधी सहित कॉन्ग्रेस के शीर्ष नेताओं ने समारोह के पक्ष में बयान जारी किए हैं। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने अपने घर पर हनुमान चालीसा का आयोजन किया। प्रियंका गाँधी ने अपने बयान में कहा कि कार्यक्रम भगवान राम के आशीर्वाद से हो रहा है। उन्होंने आगे कहा, “भगवान राम की कृपा से यह कार्यक्रम उनके संदेश को प्रसारित करने वाला राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का कार्यक्रम बने।”

कॉन्ग्रेस नेताओं के इस तरह के बयान से इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के नेताओं के बीच असंतोष पैदा हो गया है। वरिष्ठ सांसद पीके कुन्हालीकुट्टी और पार्टी सुप्रीमो पणक्कड़ हैदराली शिहाब थंगल उन नेताओं में शामिल हैं जो आपात बैठक में भाग लेने जा रहे हैं। बुधवार को अयोध्या में भूमि पूजन के समापन तक बैठक का परिणाम सामने आ जाएगा।

केरल में कॉन्ग्रेस और IUML का गठबंधन

कॉन्ग्रेस ने केरल में मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के रोड शो में वायनाड में बड़ी संख्या में मुस्लिम लीग (IUML) के झंडे देखे गए। सोशल मीडिया पर कई वीडियो सामने आए थे, जहाँ आईयूएमएल के झंडे लहराते हुए देखे गए थे। कॉन्ग्रेस पार्टी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन में है, जो जमात-ए-इस्लामी और सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ़ इंडिया (SDPI) के साथ गठबंधन में है। बता दें कि इन दोनों ही पार्टी पर राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने केरल में कट्टरपंथ फैलाने का आरोप लगाया है।

राहुल गाँधी जब अपना नामांकन दाखिल करने के लिए वायनाड गए थे तो इस दौरान IUML के सदस्यों ने नरेंद्र मोदी को गाली देते हुए रैलियाँ निकालीं थी। वायनाड यात्रा के दौरान IUML के सदस्यों को “S*ala K*tta नरेंद्र मोदी” चिल्लाते हुए सुना गया।

IUML की पृष्ठभूमि

बता दें कि इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML), जो 1948 में भारतीय स्वतंत्रता के बाद अस्तित्व में आने का दावा करती है, वह वास्तव में पाकिस्तान के संस्थापक और इस्लामवादी मोहम्मद अली जिन्ना की ऑल इंडिया मुस्लिम लीग (AIML) की एक उपशाखा है

ऑल इंडिया मुस्लिम लीग को पाकिस्तान में मुस्लिम लीग और भारत में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग द्वारा सफल बनाया गया था। अपनी वेबसाइट में, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) का दावा है कि इसका आदर्श वाक्य धर्मनिरपेक्षता और सांप्रदायिक सद्भाव है, मगर अक्सर इन्हें अपने आदर्श वाक्य के विपरीत काम करते हुए देखा गया है। मुस्लिम लीग ने मुस्लिम बहुल राष्ट्र-राज्य की स्थापना की पुरजोर वकालत की थी।

दिल्ली दंगों को लेकर DU प्रोफेसर अपूर्वानंद से स्पेशल सेल ने 5 घंटे पूछताछ के बाद मोबाइल किया ज़ब्त

दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अपूर्वानंद (Apoorvanand) से सोमवार (अगस्त 03, 2020) को दिल्ली पुलिस ने इस साल फरवरी में राजधानी में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों के सिलसिले में पूछताछ की और उनका मोबाइल फोन भी जब्त कर लिया गया है।

एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी ने इस बात की पुष्टि की है। दिल्ली दंगों की साजिश के मामले में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने हिंसा के पीछे की बड़ी साजिश का पता लगाने के लिए UAPA यानी, गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम कानून के तहत केस दर्ज किया है।

अपूर्वानंद दिल्ली यूनिवर्सिटी में हिंदी पढ़ाते हैं और टीवी चैनलों पर वह अक्सर राजनीतिक विश्लेषक भी भूमिका में भी नजर आते रहे हैं। उन्होंने CAA और NRC के विरोध में बयान दिया था।

ट्विटर पर शेयर किए गए एक बयान में, DU के प्रोफेसर अपूर्वानंद ने कहा कि यह देखना दुखद है कि नागरिकता अधिनियम विरोध प्रदर्शन के समर्थकों को हिंसा का स्रोत माना जा रहा है और उम्मीद करते हैं कि पुलिस निष्पक्ष होकर इस मामले की जाँच करेगी।

टि्वटर पर मंगलवार (अगस्त 02, 2020) को जारी अपूर्वानंद के बयान के अनुसार, “सोमवार को दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने मुझे एफआईआर संख्या-59/20 की जाँच के सम्बन्ध में हाजिर होने के लिए कहा था। यह शिकायत उत्तरी दिल्ली में इसी साल फरवरी में हुई हिंसा से जुड़ी थी। मैंने वहाँ पाँच घंटे बिताए। दिल्ली पुलिस को जाँच के लिए मेरा फोन जब्त करना भी ठीक लगा, सो उन्होंने किया।”

फरवरी माह में दिल्ली में हुए हिन्दू-विरोधी दंगों को लेकर स्पेशल सेल ने हाल ही में जेएनयू के पूर्व छात्र उमर खालिद से भी लगभग 5 घंटे पूछताछ की थी, जिसके बाद उमर खालिद का मोबाइल फोन जब्त कर लिया गया था।

उमर खालिद का नाम दिल्ली दंगों की जाँच कर रही क्राइम ब्रांच की जाँच में भी सामने आया था। क्राइम ब्रांच ने दिल्ली दंगों को लेकर दायर चार्जशीट में ये बात लिखी थी कि उमर खालिद, खालिद सैफ़ी और ताहिर हुसैन की दिल्ली दंगों को लेकर शाहीन बाग में मुलाकात हुई थी। ज्ञात हो कि दिल्ली हिंसा में कम से कम 53 लोगों की मौत हुई थी, जबकि 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।

बाबर रोड का नाम बदलकर किया जाए ‘5 अगस्त मार्ग’, BJP नेता विजय गोयल ने की गृह मंत्रालय से माँग

दिल्ली के पूर्व बीजेपी अध्यक्ष विजय गोयल ने मंगलवार (अगस्त 4, 2020) को गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर दिल्ली स्थित बाबर रोड का नाम बदलकर ‘5 अगस्त मार्ग’ करने की माँग की है। साथ ही, भाजपा नेता विजय गोयल ने यह भी कहा है कि बाबर रोड का नाम बदलकर उसकी जगह किसी भी महापुरुष का नाम रखा जा सकता है।

पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री विजय गोयल ने कहा कि ‘5 अगस्त’ नाम सिर्फ एक सुझाव है। उन्होंने कहा कि गृह मंत्रालय और एनडीएमसी को अगर किसी दूसरे का भी नाम अच्छा लगता है तो उसे रखा जाना चाहिए। उनका यह दावा है कि ट्रेडर एसोसिएशन मार्केट एसोसिएशन इस बात पर राजी है कि इस रोड का नाम बदला जाना चाहिए।

विजय गोयल ने मंगलवार को बाबर रोड के साइन बोर्ड पर ‘5 अगस्त मार्ग’ का साइनबोर्ड लगा दिया। तस्वीर में देखा जा सकता है कि ‘बाबर रोड’ पर काली स्याही से क्रॉस का चिन्ह लगा दिया है। विजय गोयल ने ट्वीट किया, “दिल्ली के बंगाली मार्किट में ‘बाबर रोड’ का नाम बदलकर ‘5 अगस्त मार्ग’ रखा जाए। बाबर विदेशी आक्रांता था, उसने अयोध्या में राम मंदिर का विध्वंस करवाया। कल 5 अगस्त को अयोध्या में श्री राम के भव्य मंदिर का शिलान्यास प्रधानमंत्री करेंगे ऐसे में NDMC को बाबर रोड का नाम बदलना चाहिए।”

उन्होंने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “मैंने सरकार से माँग रखी है कि बाबर एक विदेशी आक्रांता था। जिसने प्राचीन राम मंदिर का विध्वंस करवाया था। इसलिए दिल्ली के बंगाली मार्केट में बाबर रोड का नाम बदल कर 5 अगस्त मार्ग रखा जाना चाहिए।”

विजय गोयल ने दिल्ली में बाबर रोड का नाम बदलने का प्रस्ताव ऐसे समय रखा है जब अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण के लिए 5 अगस्त को भूमि पूजन का कार्यक्रम होने वाला है। अयोध्या में श्री राम के भव्य मंदिर का शिलान्यास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी करेंगे।

बता दें कि पिछले साल सितंबर में सेंट्रल दिल्ली के मंडी हाउस इलाके के पास स्थित बाबर रोड के साइनबोर्ड पर कालिख पोत दी थी। बंगाली मार्केट में बाबर रोड के साइनबोर्ड पर हिंदू सेना से जुड़े लोगों पर कालिख पोतने का आरोप लगा था। दरअसल दक्षिणपंथी संगठन मुगल शासक बाबर के नाम पर बने इस रोड के नाम को बदलने की लंबे समय से माँग कर रहे हैं।

गौरतलब है कि साल 2015 में दिल्ली के औरंगजेब रोड का नाम बदलकर पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर कर दिया गया। इसके बाद से बाबर रोड के नाम को भी बदलने की माँग उठती रही है।

मुगल वंशज प्रिंस तुसी ने ओवैसी को ‘जोकर’ कहते हुए जताई श्रीराम मंदिर निर्माण देखने की इच्छा

मुगल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के परपोते याकूब हबीबुद्दीन तुसी (Yakub Habeebuddin Tucy) उर्फ, प्रिंस तुसी ने समाचार चैनल ‘News X’ के साथ एक इंटरव्यू में AIMIM नेता ओवैसी को जोकर बताते हुए कहा कि उनके परिवार की अयोध्या में बने राम मंदिर को देखने की इच्छा है।

अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन का स्वागत करते हुए, प्रिंस तुसी ने कहा कि उनके परिवार इस बात से उत्साहित हैं कि मीर बाक़ी द्वारा किए गए ऐतिहासिक गलत काम को समाप्त किया जाएगा।

तुसी ने इस बात पर भी जोर दिया कि यह उनके पूर्वज, मुगल सम्राट बाबर नहीं थे, बल्कि उनके सहयोगी मीर बाकी थे, जिन्होंने अयोध्या में 15वीं शताब्दी में निर्मित मंदिर को नष्ट कर दिया था।

जब प्रिंस तुसी से असदुद्दीन ओवैसी और अन्य विपक्षी नेताओं जैसे आलोचकों, जिन्होंने अयोध्या में समारोह के लिए प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा पर सवाल उठाए थे, के बारे में सवाल किया गया तो उन्होंने कहा कि वह एक जोकर है और पीएम मोदी की यात्रा पर उसकी आपत्ति पर विचार नहीं किया जाना चाहिए।

प्रिंस तुसी ने आगे कहा, “पीएम मोदी सभी समुदायों के प्रधानमंत्री हैं। पिछली बार, उन्होंने बोहरा समुदाय के कार्यक्रम का दौरा किया। इस बार वह हिंदुओं के एक समारोह में शामिल होंगे। जैसा कि मैंने पहले कहा था कि असदुद्दीन ओवैसी एक जोकर है। वह पंडित वंश के हैं, जो इस्लाम में परिवर्तित हो गए। ओवैसी केवल अपने विरोध प्रदर्शनों के साथ सस्ते पब्लिसिटी की कोशिश कर रहे हैं।”

बता दें कि खुद को बहादुर शाह जफर का वंशज कहने वाले याकूब हबीबुद्दीन तुसी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के लिए 1.8 करोड़ रुपए की सोने की ईंट भी दान कर रहे हैं। अपने दान के बारे में बात करते हुए, तुसी ने कहा कि वह यह दान बहुलवाद और भाईचारे को लेकर धर्मनिरपेक्षता का संदेश देने के लिए कर रहे हैं।

तुसी ने कहा, “इस्लाम हमें सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाता है। बाबर को लेकर एक खेल खेला गया था और उसकी कोई गलती नहीं थी। उसने मंदिर को ध्वस्त नहीं किया। मेरे सहित सभी मुगल धर्मनिरपेक्ष थे। मैं क्रॉस-कम्युनिटी एकता और भाईचारे के संदेश के रूप में एक सोने की ईंट भेज रहा हूँ।”

गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अयोध्या विवाद पर सुनाए गए फैसले का याकूब हबीबुद्दीन उर्फ़ प्रिंस तुसी ने भी स्वागत किया था। इसके साथ ही, उन्होंने कहा था कि मंदिर निर्माण के लिए वे सोने की ईंट भी ट्रस्ट को देंगे।

प्रिंस तुसी ने फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए कहा था कि जिस तरह से देश में 26 जनवरी और 15 अगस्त को खुशियाँ मनाई जाती है, उसी तरह से आज के दिन को भी राष्ट्रीय पर्व के रूप में मनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस फैसले को सभी हिन्दू और समुदाय के भाइयों को कबूल करना चाहिए।

कॉन्ग्रेस नेताओं के भूमि पूजन से पहले सॉफ्ट हिंदुत्व दिखाने से भड़के उदारवादी, कहा- वाह रे नेहरूवादी सेकुलरिज्म

कॉन्ग्रेस के कुछ नेता, जो अब तक अल्पसंख्यकों को खुश करने के लिए जाने जाते थे, उन्होंने हिंदू कॉन्ग्रेसियों को लुभाने के लिए अयोध्या में राम मंदिर भूमि पूजन के शुभ अवसर को चुना।

भगवान राम के अस्तित्व को नकारने वाली पार्टी, गाँधी परिवार और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी की बहन प्रियंका गाँधी ने राम मंदिर का स्वागत करते हुए एक बयान जारी किया।

प्रियंका गाँधी के अलावा मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ और केंद्रीय पूर्व मंत्री मनीष तिवारी ने भी ट्विटर के जरिए अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के समर्थन का दिखावा किया है।

गाँधी परिवार और यूपी के महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा ने अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन समारोह के लिए अपना समर्थन दिया। उन्होंने कार्यक्रम पर एक बयान जारी किया, जिसमें दावा किया गया कि यह राष्ट्रीय एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक समागम का कारण है।

प्रियंका गाँधी ने अपने ट्वीट में लिखा, “सरलता, साहस, संयम, त्याग, वचनवद्धता, दीनबंधु राम नाम का सार है। राम सबमें हैं, राम सबके साथ हैं। भगवान राम और माता सीता के संदेश और उनकी कृपा के साथ रामलला के मंदिर के भूमि पूजन का कार्यक्रम राष्ट्रीय एकता, बंधुत्व और सांस्कृतिक समागम का अवसर बनें।”

प्रियंका गाँधी द्वारा राम मंदिर के निर्माण पर अपना रुख स्पष्ट किए जाने के बाद सोशल मीडिया लिबरलों ने उन्हें निशाने पर लेना शुरू कर दिया। उनमें से एक ने सवाल किया कि क्या राम मंदिर का निर्माण राष्ट्रीय एकता का कारण है।

प्रियंका गाँधी के राम मंदिर के समर्थन पर ट्विटर यूजर ने उठाए सवाल

एक अन्य ट्विटर यूजर ने कॉन्ग्रेस पार्टी के प्रति अपनी नाराजगी व्यक्त की। उसने दावा किया कि पंडित नेहरू कॉन्ग्रेस पार्टी से निराश होंगे। यूजर ने लिखा, “हमारा प्यारा देश अब दहलीज पार कर चुका है और बिना किसी वापसी के मुकाम पर पहुँच गया है। न्याय की धीमी मौत, कानून के नियम और धर्मनिरपेक्षता…”

प्रियंका गाँधी के राम मंदिर के समर्थन से नाराज ट्विटर यूजर

मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल ने एक ट्वीट पोस्ट किया जिसमें उनके प्रोफ़ाइल तस्वीर में बदलाव के बारे में बताया गया। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर कॉन्ग्रेस के प्रतीक के बजाय, ‘श्री हनुमान चालीसा पाठ’ के साथ भगवान हनुमान की तस्वीर और पूर्व सीएम कमलनाथ की तस्वीर है।

हालाँकि, उत्साही कॉन्ग्रेस समर्थकों और लिबरलों को मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस का ट्विटर प्रोफाइल पिक्चर रास नहीं आया। प्रोफाइल पिक्चर बदलने के तुरंत बाद ही उन्हें ट्रिगर करना शुरू कर दिया।

असंतुष्ट सोशल मीडिया यूजर्स में से एक ने टिप्पणी करते हुए कॉन्ग्रेस के धर्मनिरपेक्ष परिचय पत्र पर चुटकी लेते हुए लिखा, “वाह रे नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता।”

एमपी कॉन्ग्रेस के ट्वीट पर ट्विटर यूजर

लिबरल का ढोंग करने वाले मोहम्मद आसिफ खान ने कहा कि “सेकुलर कॉन्ग्रेस” अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का जश्न मना रही है। उन्होंने दोहराया कि कुछ समय के लिए कॉन्ग्रेस पर जो आरोप लगाए कि वो दूसरे मजहब वालों को द्वितीय श्रेणी के नागरिक मानते हैं, अभी वो ऐसा ही कर रहे हैं।

एमपी कॉन्ग्रेस के ट्वीट पर ट्विटर यूजर

विनय अरविंद के नाम से जाने जाने वाले एक ट्विटर यूजर ने कहा कि कॉन्ग्रेस अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण का जश्न मना रही है। मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के ट्वीट का हवाला देते हुए उन्होंने कहा, “यह अव्यवहारिक रूप से दयनीय है।”

एमपी कॉन्ग्रेस के ट्वीट पर ट्विटर यूजर

एक अन्य वरिष्ठ कॉन्ग्रेसी नेता ने अपने ट्विटर अकाउंट पर भगवान राम को समर्पित एक भक्ति गीत पोस्ट किया, जिसमें हिंदुओं और दूसरे मजहब वालों के विरोध और विरोध प्रदर्शनों पर प्रकाश डाला गया।

जहाँ अयोध्या में राम मंदिर के भूमि पूजन समारोह में पूर्व केंद्रीय मंत्री की सूक्ष्म स्वीकृति से दूसरे समुदाय को निराशा हुई, वहीं भक्ति गीत के बोल गलत होने के कारण हिन्दू काफी क्षुब्ध हो गए।

तिवारी के भक्तिपूर्ण हिंदू भजन के ट्विटर पोस्ट से भड़के हुए एक व्यक्ति ने भगवान राम के चरित्र पर उनकी पत्नी सीता की शुद्धता पर संदेह किए जाने पर ऊँगली उठाया।

मनीष तिवारी के पोस्ट पर इस्लामी ने हिंदू भगवान पर किया हमला

हिंदुओं ने भी मनीष तिवारी पर चर्चित हिंदू भजन के मिलावटी संस्करण पोस्ट करने के लिए हमला किया। ट्विटर यूजर्स में से एक ने भक्ति गीत के वास्तविक संस्करण को एक तस्वीर के साथ पोस्ट किया, जिसने वास्तविक गीत के बोल और “गाँधीवादी” गीत के बीच के अंतर को उजागर किया।

कई अन्य लोगों ने भी यह बताया कि मनीष तिवारी द्वारा पोस्ट किया गया संस्करण सही संस्करण नहीं था बल्कि एक विकृत था।

ट्विटर यूजर ने मनीष तिवारी के भजन को सही किया

एक ट्विटर यूजर विशेष रूप से प्रार्थना के विकृत संस्करण को पोस्ट करने के लिए तिवारी के खिलाफ आंदोलित था। उन्होंने तिवारी को सुझाव दिया कि “राम” को नमाज में शामिल करें और उसी के प्रभाव को देखें।

ट्विटर यूजर ने भजन को विकृत करने के लिए मनीष तिवारी को गाली दी

बता दें कि 5 अगस्त, 2020 को राम मंदिर के निर्माण के लिए ऐतिहासिक भूमि पूजन के लिए अयोध्या में तैयारी चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 5 अगस्त को समारोह के लिए अयोध्या जाएँगे। इस समारोह में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित कई अन्य आमंत्रित लोग शामिल होंगे। कोरोना वायरस दिशानिर्देशों के अनुसार, समारोह में 200 से अधिक लोग शामिल नहीं होंगे।

370 का बदला: पाकिस्तान ने नया ‘ऐतिहासिक नक्शा’ जारी कर सियाचिन, J&K के साथ गुजरात के हिस्सों पर भी जताया अपना दावा

भारत को उकसाने और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए पाकिस्तान ने एकबार फिर भारत की सीमा को अपने नक़्शे में दिखाया है लेकिन इस बार पाकिस्तान ने सिर्फ जम्मू-कश्मीर ही नहीं बल्कि गुजरात के एक हिस्से पर भी अपना अधिकार जताया है। नेपाल द्वारा भारतीय क्षेत्र को अपने राजनीतिक मानचित्र में शामिल करने के कारनामे के कुछ ही हफ्तों बाद पाकिस्तान ने ये कारनामा किया है।

पाकिस्तान सरकार ने अपने राजनीतिक मानचित्र को अपडेट करते हुए केंद्र शासित प्रदेशों जम्मू और कश्मीर और लद्दाख को अपनी सीमाओं में शामिल किया। इसके साथ ही, पाकिस्तान ने अपने नए नक्शे में गुजरात के जूनागढ़ और सर क्रीक को पाकिस्तानी इलाकों के रूप में दिखाया है।

पाकिस्तान का नया राजनीतिक नक्शा:

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने कैबिनेट की बैठक के बाद अपने देश का नया पॉलिटिकल मैप जारी किया है। इस मैप में सियाचिन को पाकिस्तान का हिस्सा बताया गया है। पाकिस्तान का कहना है कि भारत ने इस जगह पर अवैध तरीके से निर्माण कर रखा है।

सर क्रीक को भी विवादित बताते हुए पाकिस्तान ने इस इलाके को भी अपने नक्शे में शामिल कर लिया है। इस नक़्शे को ऐतिहासिक बताते हुए इमरान खान ने कहा कि ऐसा इतिहास में पहली बार हुआ है कि कश्मीर सहित पूरे जम्मू कश्मीर क्षेत्र को ही पाकिस्तान की सीमा के भीतर बताया गया है। इमरान खान ने कहा कि यह नया आधिकारिक नक्शा देश भर में पाठ्यक्रम में इस्तेमाल किया जाएगा।

इमरान खान ने कहा, “आज एक ऐतिहासिक दिन है, हमने पाकिस्तान का एक नया राजनीतिक मानचित्र लॉन्च किया है, जो पूरे देश के साथ-साथ कश्मीर के लोगों की उम्मीदों के अनुसार है। यह नक्शा पिछले साल 5 अगस्त को भारत सरकार के अवैध कृत्य का भी विरोध करता है।”

गौरतलब है कि ठीक एक साल पहले 5 अगस्त के दिन भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सदियों से चले आ रहे अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त कर इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया था।

इमरान खान ने कहा कि कश्मीर विवाद का समाधान केवल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों में निहित है और पाकिस्तान कश्मीर के लोगों के लिए प्रयास करना जारी रखेगा। इमरान खान ने कहा- “हमारा मानना ​​है कि कश्मीर विवाद केवल राजनीतिक माध्यम से हल किया जा सकता है, सैन्य माध्यम से नहीं। हम यूएन को याद दिलाते रहेंगे कि उन्होंने हमसे एक वादा किया था।”