कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के बीच असम से एक बड़ी खबर आई है। यहाँ ऑल इंडिया यूनाइटिड डेमोक्रेटिक फ्रंट के नेता अमिनुल इस्लाम को गिरफ्तार किया गया है। इस्लाम पर आरोप है कि उसने क्वारंटाइन सेंटर के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी की और उसे डिटेंशन सेंटर बताया।
दरअसल, ढिंग से विपक्षी विधायक अमिनुल इस्लाम ने क्वारंटाइन सेंटर्स को लेकर गैर-जिम्मेदाराना बयान दिया और उसे न केवल डिटेंशन सेंटर बताया बल्कि ये भी कहा कि वहाँ इंजेक्शन देकर लोगों को मारा जाता है।
पुलिस महानिदेशक भास्कर ज्योति महंत ने पीटीआई को बताया कि सोमवार को विधायक को हिरासत में लेकर पूछताछ करने के बाद उसे आज सुबह गिरफ्तार किया गया। पुलिस ने ये कार्रवाई AIUDF विधायक की विवादस्पद टिप्पणी पर की, जिसमें उसने क्वारंटाइन सेंटर्स को लेकर भ्रम फैलाया। महंत ने कहा कि अमीनुल इस्लाम पर भारतीय दंड संहिता की कई धाराओं के तहत आपराधिक साजिश रचने और समुदायों के बीच अप्रभाव फैलाने का मामला दर्ज हुआ है। इसके अलावा उसकी गिरफ्तारी की सूचना असम स्पीकर को दे दी गई है।
Probably #AminulIslam Dhing MLA of #Assam will be First MLA in India to be arrested under #DisasterManagementAct. He gave a telephonic interview where he is alleged to have said that #COVID19 Quarantine centres are actually detention centre & conspiracy to kill thru injection. pic.twitter.com/acNIh7gv9s
कहा जा रहा है कि नगाँव पुलिस को टेलीफोन पर हुई बातचीत की एक ऑडियो क्लिप मिली थी। जिसमें इस्लाम अपने परिजनों के कोरोना पॉजिटिव पाए जाने के बाद इस पूरे मामले को साम्प्रदायिक रूप देने की कोशिश कर रहा था। उसने कोरोना वायरस के चलते असम सरकार पर मुसलमानों के ख़िलाफ़ साजिश रचने का भी आरोप लगाया था।
जानकारी के मुताबिक, पुलिस के पास पहुँची ऑडियो क्लिप में विधायक दावा कर रहा है कि क्वारंटाइन सेंटर्स में लोग मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे हैं, जबकि वास्तविकता में वे बिलकुल फिट और स्वस्थ हैं। इस्लाम का कहना है कि क्वारंटाइन सेंटर में निजामुद्दीन से लौटे लोगों का मेडिकल स्टाफ शोषण करता है। वे वहाँ स्वस्थ लोगों को इंजेक्शन देते हैं, ताकि वो बीमार हो जाएँ और कोरोना मरीज बन जाएँ।
यहाँ बता दें कि इससे पहले ढिंग विधायक ने निजामुद्दीन मरकज़ का भी बचाव किया था। इस दौरान इस्लाम का कहना था कि मरकज़ में कोई भी संक्रमित नहीं पाया गया है और इस बीमारी के फैलने के पीछे मरकज़ का हाथ नहीं है। विवादित टिप्पणी करने पर AIUDF विधायक ने मीडिया पर भी आरोप लगाया था कि निजामुद्दीन मरकज़ पर झूठी खबरें फैलाई जा रही हैं। इससे पहले एक फेसबुक पोस्ट में उनका ये भी दावा था कि असम में आया पहला केस दिल्ली के मरकज़ भी नहीं गया था।
कोरोना के कारण पूरे देश में इस समय लॉकडाउन है। कई राज्यों में और कई इलाकों में स्थिति को देखते हुए धारा 144 लगी है। इस बीच ग्वालियर से खबर आई है कि वहाँ मरकज़ से लौटे 17 लोगों की शिनाख्त हुई है। इनमें से 6 जमाती तो जंगल के अंदर एक दावलपीर नामक दरगाह में छिपकर मुर्गा पार्टी कर रहे थे। जिसकी सूचना मिलने के बाद पुलिस ने इन्हें 144 का उल्लंघन करने पर पकड़ लिया। बाद में इन्हें एंबुलेंस बुलाकर अस्पताल भेजा गया। वहाँ इन छह के साथ 11 अन्य जमातियों के भी सैंपल लिए गए। ये सभी 18 मार्च को ग्वालियर आए थे।
रविवार की दोपहर दरगाह में बैठकर मुर्गा खाने वाले आरोपितों की पहचान सैय्यद रियाजुद्दीन जाफरिन, नबाव, सकील, नईम, निखिल और इसाव के रूप में हुई है। जानकारी के अनुसार, इनकी सूचना मिलते ही एसडीओपी गीता भारद्वाज, टीआई राजू रजक, नायब तहसीलदार मोहिनी साहू और डॉ. हेमंत मंडेलिया एंबुलेंस को लेकर मौक़ास्थल पर पहुँचे। वहाँ डॉ. मंडेलिया ने बारी-बारी से सभी छह लोगों के नाम लिखे फिर एंबुलेंस से सीधे अस्पताल ले जाकर कोरोना सैंपल लिए। फिर इन सभी को होम क्वारंटाइन कर दिया गया।
गौरतलब है कि एक ओर जहाँ देश के अलग-अलग राज्यों से जमातियों द्वारा की जा रही बदसलूकी की खबरों ने सबके मन में इनके प्रति सवाल खड़ा कर दिया है। वही ये लोग स्थिति बिगड़ने के बाद भी अपनी हरकतों से बाज आने का नाम नहीं ले रहे। मरकज़ मामला गर्माने के बावजूद दरगाह में बैठकर पार्टी करना इनकी लापरवाही पर सवाल उठाता है और पुलिस को पर्याप्त अधिकार देता है कि वे इनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करें।
बता दें कि इस बीच ग्वालियर से एक दूसरी खबर भी आई है। जहाँ कुछ लोग लॉकडाउन के बीच इकट्ठा होकर बर्थडे पार्टी कर रहे थे। मगर जब तहसीलदार कुलदीप दुबे को इसकी जानकारी हुई तो उन्होंने इस पर आपत्ति जताई और फिर उन्हें समझाने लगे। लेकिन जन्मदिन मना रहे एकत्रित लोगों ने इसका विरोध कर दिया और फिर दोनों पक्षों में विवाद हो गया।
घर में एकत्रित लोगों ने उनपर पत्थरों और लाठियों से हमला कर दिया। इस हमले में तहसीलदार कुलदीप दुबे सहित उनके साथ गए अन्य कर्मचारी घायल हो गए। घटना की खबर मिलते ही पुलिस बल मौके पर पहुँच गया और इस मामले में आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया है। पुलिस ने इस घटना में 5 लोगों को नामजद और कुछ अज्ञात लोगों के विरुद्ध प्रकरण दर्ज किया गया है।
दिल्ली के निजामुद्दीन में तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल अधिकांश लोगों में कोरोना के लक्षण पाए जाने के बाद जमात के लोग पुलिस, प्रशासन और मीडिया के निशाने पर हैं। हर जगह सभी लोगों से इनकी सूचना देने की बात की जा रही है और इनसे दूर रहने की सलाह दी जा रही है। अब इसी बीच इन जमातियों की लापरवाही और उनका समर्थन करने वालों पर भी सवाल उठ रहे हैं। जिसके कारण जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। जमीयत ने मीडिया के एक वर्ग पर जमात के कार्यक्रम को लेकर सांप्रदायिक नफरत फैलाने का आरोप लगाया है।
जानकारी के अनुसार, इस याचिका को जमीयत उलेमा-ए-हिंद और उसके कानूनी प्रकोष्ठ के सचिव की ओर से दायर किया गया है। इस याचिका में जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने कोर्ट से केंद्र सरकार को दुष्प्रचार रोकने और इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का निर्देश देने की अपील की है।
याचिका में कहा गया है कि तबलीगी जमात की दुर्भाग्यपूर्ण घटना का इस्तेमाल पूरे मुस्लिम समुदाय को दोष देने में किया जा रहा है। न्यूज एजेंसी पीटीआई के मुताबिक याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम समाज के लोगों को गलत तरीके से पेश करने की वजह से मुस्लिमों की जिंदगी और उनकी आजादी को गंभीर खतरा पैदा हो गया है। इस वजह से संविधान की धारा-21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का उल्लंघन हो रहा है।
गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में शामिल होने आए जमातियों ने बचाव की पर्याप्त कोशिश नहीं की थी, जिसके कारण देश में कोविड-19 का प्रकोप बढ़ा। वकील एजाज मकबूल के जरिए दायर अर्जी में कहा गया है कि मीडिया में आ रही खबरों की वजह से पूरे मुस्लिम समुदाय को लेकर घृणा का वातावरण बन रहा है। तमाम फर्जी वीडियो, फोटो और खबरें जनता के बीच लाई जा रही हैं। इन्हें तत्काल रोका जाए।
यहाँ बता दें कि एक ओर जहाँ पूरे देश में कोरोना वायरस के कुल 4 हजार से अधिक मामले आए हैं, उनमें से 1445 मामले केवल तबलीगी जमात के कार्यक्रम में शामिल हुए लोगों से जुडे़ हैं। ऐसे में इन लोगों की मंशा पर और इस कार्यक्रम पर सवाल उठना वाजिब है। सोशल मीडिया की बात करें तो वहाँ अधिकतर समुदाय विशेष के लोग जमातियों के समर्थन में दिखाई देते हैं। इसलिए मीडिया समुदाय विशेष के लोगों को चिह्नित करके उनसे व्यक्तिगत रूप से सवाल नहीं करता, बल्कि वे केवल उस पूरे समूह से सवाल पूछता है कि आखिर जब जमातियों के कारण देश में कोरोना फैला है तो उनका समर्थन क्यों किया जा रहा है और आखिर क्यों उन्हें बचाने का प्रयास हो रहा है?
यहाँ याद दिला दें कि दिल्ली के निजामुद्दीन मरकज़ पर तबलीगी जमात के कार्यक्रम पर इकट्ठा हुई भीड़ का नतीजा आज पूरा देश भुगत रहा है। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से सब जानते हैं कि भारत में समय से उपयुक्त कदम उठाए जाने के बाद भी स्थिति कैसे बिगड़ी। सबको मालूम है कि अगर मरकज़ से निकलकर जमाती थोड़ी भी सावधानी बरतते या समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते तो आज देश को व देश की राष्ट्रीय राजधानी को कोरोना से लड़ने की जगह सिर्फ उसे रोकने के इंतजाम करने पड़ते। मगर, आज सिर्फ़ इन्हीं जमातियों के कारण हर जगह स्थिति गंभीर है और स्वास्थ्यकर्मी से लेकर सुरक्षाकर्मी तक इससे जूझ रहे हैं क्योंकि पकड़े गए जमाती न केवल उनके क्वारंटाइन सेंटर्स और अस्पताल में अपनी मनमानी कर रहे हैं बल्कि बदसलूकी भी कर रहे हैं और जो अभी नहीं पकड़े गए वो खुद को छिपाने का प्रयास कर रहे हैं।
बिहार के मधुबनी के बिस्फी विधान सभा अंतर्गत रहिका प्रखंड के सतलखा मानी दास टोल में रविवार (अप्रैल 5, 2020) रात को दीप जलाने को लेकर हुए हिन्दू-मुस्लिम विवाद में कैली देवी की मुस्लिम परिवारों ने मिलकर हत्या कर दी। कैली देवी की हत्या करने वालों में सुलेमान नदाफ, खलील नदाफ, मलील नदाफ, जलिल नदाफ आदि शामिल थे। इन लोगों ने हिन्दू महिला को गला दबाकर मार दिया।
परिवार के सदस्यों ने हत्या आरोपितों को स्थानीय विधायक फैयाज अहमद का करीबी बताया है। जिसके बाद यह आशंका जाहिर की जा रही है कि मामले को अलग रूप देकर दोषी को बचाया जाएगा। स्थानीय लोगों ने इंसाफ की माँग करते हुए कहा कि उनके परिवार के लिए त्वरित स्तर पर प्रशासन से 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए तथा हत्यारे की गिरफ्तारी के साथ फाँसी हो।
मृतका के पुत्र द्वारा पुलिस से की गई शिकायत
दो समुदायों के बीच हुई इस घटना को लेकर क्षेत्र में आक्रोश है। एहतियात के तौर पर पुलिस बल लगाया गया है। मृत 70 वर्षीय महिला के पुत्र ने आरोपितों पर हत्या का आरोप लगाया है।
मामला जिले के रहिका क्षेत्र के सतलखा गाँव का है। प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर रविवार रात को गाँव में लाइट बंद करके दीप जलाए गए। इस दौरान पड़ोसी द्वारा बल्ब जलाए रखने पर मना करने पर विवाद हो गया। आस-पड़ोस के लोगों ने बल्ब बंद कर दीप जलाने का आग्रह किया। लेकिन दूसरे समुदाय के पड़ोसी ने बिजली बंद करने और दीप जलाने से इनकार कर दिया। इस पर दोनों परिवारों में विवाद हो गया।
मृतक महिला काला (कैली )देवी
विवाद मारपीट में बदल गया। इस दौरान आवेश में आकर सुलेमान नदाफ, खलील नदाफ, मलील नदाफ, जलिल नदाफ आदि ने 70 वर्षीय कैली देवी की गला दबाकर हत्या कर दी। मृतका के पुत्र सुरेन्द्र मंडल ने पड़ोसी पर अपनी माँ की हत्या का आरोप लगाया है। बुजुर्ग महिला को गंभीर हालत में अस्पताल ले जाया गया। जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने शव का पोस्टमॉर्टम कराया है। इसकी रिपोर्ट आने के बाद वृद्धा की मौत के कारणों का खुलासा हो सकेगा। मृतक महिला के पुत्र सुरेन्द्र मंडल ने सभी आरोपितों के खिलाफ हत्या की प्राथमिकी दर्ज करवाई है। घटना से गाँव के लोगों का आक्रोश है। सभी स्तब्ध हैं।
वहीं मधुबनी के विधानपार्षद सुमन महासेठ ने इस घटना की जानकारी देते हुए कहा कि सतलखा गाँव में जहाँ पर यह घटना हुई है, वहाँ पर कुछ घर इस्लाम धर्म को मानने वाले हैं। जब हिंदू परिवारों ने उनसे लाइट बंद कर दीप जलाने के लिए कहा, तो वो गाली-गलौज करने लगे। इसी बीच कैली देवी उनको मना करने गईं कि गाली-गलौज क्यों करते हो, ये सब मत करो। तभी उन लोगों उनका गला पकड़कर धक्का दे दिया। वो गिर पड़ी और उनकी मौत हो गई।
मुखिया जय प्रकाश चौधरी ने घटना को दुखद बताते हुए ग्रामीणों से प्रशासन को घटना की वास्तविकता का पता लगाने में सहयोग करने की अपील की। साथ ही शांति बनाए रखने का आग्रह किया। थानाध्यक्ष राहुल कुमार ने बताया कि महिला के पुत्र के आवेदन पर हत्या की प्राथमिकी दर्ज की गई है। शव का पोस्टमॉर्टम करा दिया गया है। वहीं मधुबनी के एसपी डॉ सत्य प्रकाश ने कहा कि यह घटना आपसी विवाद की वजह से हुई है। मामले की जाँच की जा रही है। दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी।
निजामुद्दीन मरकज़ से निकलकर देश के अनेक राज्यों में पहुँचे जमातियों की हरकतें अब प्रशासन के लिए बर्दाशत से बाहर होती जा रही हैं। स्वास्थ्यकर्मियों पर थूकने से लेकर महिला कर्मचारियों पर फब्तियाँ कसने तक के मामले जगह-जगह से सामने आ रहे हैं। अब ताजा खबर की यदि बात करें तो इन्होंने घिनौनेपन की हर हद पार कर दी है। बताया जा रहा है कि नरेला के क्वारंटाइन सेंटर में जहाँ कई जमातियों को कोरोना संदिग्ध होने पर रखा गया था, उनमें से 2 जमातियों ने अपने कमरे के बाहर ही शौच कर दिया और जब सफाईकर्मी वहाँ पहुँचे तो ये लोग उनसे भी बदसलूकी करने लगे।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जब सफाईकर्मी ने इसकी सूचना अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी, तो सब हैरान हो गए। इस हरकत की खबर फौरन नरेला इंडस्ट्रियल थाना पुलिस को दी गई और पुलिस ने बाराबंकी निवासी मो. फहद और अदनान जहीर के खिलाफ सरकारी आदेश का उल्लंघन समेत अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया। अब पूरे मामले की छानबीन की जा रही है।
Markaz returnees Mohammad Fahad and Adnan Zahir created ruckus at Narela quarantine station, excreted in the corridor. FIR registered. Camp incharge says they are jeopardizing all containment measures. #TablighiJamaat
जानकारी के मुताबिक, शनिवार की रात जमातियों की इस हरकत का खुलासा उस समय हुआ, जब हाउस कीपिंग स्टाफ क्वारंटाइन सेंटर की दूसरी मंजिल स्थित कमरा नंबर-212 के बाहर पहुँचा। वहाँ उनमें से एक कर्मचारी ने देखा कि कमरे के बाहर शौच पड़ी हुई थी। पूछताछ करने पर सभी लोग आना-कानी करने लगे।
मगर, जब इस संबंध में कमरा नंबर-212 में क्वारंटाइन फहद और अदनान से पूछा गया तो वह बदसलूकी करने लगे। अंत में तंग आकर मामले की सूचना वरिष्ठ अधिकारियों के पुलिस को दी गई। पुलिस ने छानबीन के बाद दोनों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया। अब पुलिस दोनों से पूछताछ कर रही है।
पुलिस का कहना है कि 31 मार्च को हजरत निजाामुद्दीन स्थित मरकज से बड़ी संख्या में जमातियों को निकालकर अलग-अलग क्वारंटाइन सेंटर में लाया गया था। इन लोगों को कोरोना का संदिग्ध मानकर क्वारंटाइन रहने के लिए कहा गया है। लेकिन यह लोग लगातार किसी न किसी तरह स्टॉफ को परेशान कर रहे हैं। जिसकी खबर कई नगरों से आ चुकी है।
बता दें कि दिल्ली के नरेला में बनाये गए क्वारंटाइन सेंटर पर तबलीगी जमात के मरकज से निकाले गए 1200 जमातियों को रखा गया है।
मध्य प्रदेश में इंदौर के बाद अब भोपाल मेंं भी लॉकडाउन के बीच पुलिस पर हमले की खबर आई है। घटना तलैया थाना क्षेत्र में इस्लामपुरा इलाके की है। यहाँ विशेष समुदाय की भीड़ ने पुलिस पर धारधार हथियारों से हमला बोला और हमले में 2 से 3 पुलिसकर्मियों को घायल कर दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस्लामपुरा में लॉकडाउन के बावजूद लोग एकट्ठा हो रहे थे। इन्हें एक जगह एकत्रित होने से रोकने के लिए पुलिस मौके पर पहुँची और इन लोगों को बाहर घूमने से मना किया। इसके बाद रात के करीब साढ़े दस बजे एक बदमाश ने अपने दर्जन भर साथियों के साथ मिलकर छह पुलिस कर्मियों पर हमला किया और 2 पर चाकू चला दिया। इस हमले में एक पुलिसकर्मी के हाथ में और दूसरे पुलिसकर्मी के कंधे में चोट आई। वारदात के बाद बदमाश मौके से फरार हो गए। जबकि घायल पुलिसकर्मियों को हमीदिया अस्पताल में भर्ती कराया गया।
तलैया थाना टीआई डीपी सिंह के अनुसार शाहिदिया स्कूल के पीछे रात में 15 से 20 लोग समूह में घूम रहे थे। इस दौरान आरक्षक लक्ष्मण यादव और सतीश सिंह ने उनको घर जाने के लिए बोला। जिस पर यह लोग पुलिस से विवाद करने लगे। तभी शाहिद कबूतर, मजिद मामू और मोहसिन कचौड़ी ने मिलकर दोनों पुलिस कर्मियों पर हमला कर दिया। जब तक बाकी पुलिस कर्मी उनके पास मदद करने पहुँचते, आरोपित हमला कर भागने में कामयाब हो गए। पुलिस का कहना है कि तीनों आरोपित बदमाश हैं। उनका पुराना अपराधिक रिकॉर्ड भी है। अब उनके साथ घूम रहे 15 लोगों की तलाश की जा रही है।
बता दें कि थाना टीआई का कहना है कि जहाँ पुलिस कर्मियों पर हमला किया गया है, वह इलाका कंटेनमेंट एरिया घोषित किया गया है क्योंकि एक जमाती यहाँ कोरोना संक्रमित मिला था।
गौरतलब है कि इससे पहले लॉकडाउन के बीच इंदौर में भी समुदाय विशेष के हंगामा मचाया था। इस दौरान उन्होंने कोरोना संदिग्ध की जाँच के लिए गई स्वास्थ्य विभाग की टीम पर पथराव किया था। उनसे बदसलूकी की थी। स्थिति इतनी गंभीर हो गई थी कि स्वास्थ्यकर्मी किसी तरह अपनी जान बचाकर भागे थे। इस दौरान उपद्रवियों ने सुरक्षा लिहाज से लगाए बैरिकेड्स भी तोड़ दिए थे। बाद में सूचना मिलते ही पुलिस ने इनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा का केस दर्ज किया था और 13 आरोपितों को गिरफ्तारी हुई थी।
ऐसा प्रतीत होता है कि कोरोना वायरस संक्रमण के मामलों और उसके कारण होती मौतों के संदर्भ में पश्चिम बंगाल एक विचित्र विरोधाभास की झलक प्रस्तुत कर रहा है। राज्य सरकार ने एक एक्सपर्ट कमेटी का भी गठन किया है जो कोरोना महामारी के कारण होने वाली मौतों का ‘ऑडिट’ करेगी। एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम में जब 2 अप्रैल को एक एक्सपर्ट कमेटी ने घोषणा की कि वुहान कोरोना वायरस के कारण बंगाल में 7 मौते हो चुकी हैं, राज्य के मुख्य सचिव ने तुरंत एक ‘स्पष्टीकरण’ देते हुए कोरोना से मरने वालों की संख्या को 7 की जगह 3 करार दिया।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार सिन्हा ने कहा था, “एक्सपर्ट कमेटी ने बताया है कि कुल COVID-19 मामलों की संख्या राज्य में 53 है। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि इन 53 में से 3 कोरोना निगेटिव टेस्ट हुए और अपने घर जा चुके हैं। इस तरह यह संख्या अब 50 बचती है। इन 50 में से 9 मामलों में दूसरे टेस्ट के नतीजे निगेटिव आए। इस प्रकार कोरोना संक्रमण के कुल मरीज हुए 41, इन 41 में से कुछ को किडनी और हार्ट की समस्या थी। उन में से कुछ की मृत्यु हो गई, एक्टिव नोवेल कोरोना संक्रमित मरीजों की संख्या अभी राज्य में 34 है, राज्य में कोरोना के कारण मरने वालों की संख्या 3 है।”
राज्य में हुई मौतों के विषय में सिंह ने दावा किया, “उन्हें दूसरे मर्ज भी थे इसीलिए वो अस्पताल में भर्ती हुए थे, इसलिए ही हम कह रहे हैं कि बाकी मामले COVID-19 से जुड़े हुए नहीं हैं। जल्दबाजी में उन्हें COVID-19 से होने वाली मौतों से जोड़ देना राज्य में आतंक पैदा कर देगी।”
राज्य में एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई जा चुकी है जो इस बात की जाँच करेगी कि जिनकी मृत्यु कोरोना संक्रमित पाए जाने के बाद हुई है क्या वाकई उनकी मौत का कारण कोरोना संक्रमण ही है। पश्चिम बंगाल राज्य सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग ने 3 अप्रैल को एक आदेश निकाला जिसके अनुसार, “कमेटी ऐसे मरीजों की मौत के कारण का पता लगाएगी जो कोरोना संक्रमित थे और इसके लिए गठित एक्सपर्ट कमेटी बीएचटी रिपोर्ट, उपचार हिस्ट्री, लैब टेस्ट्स रिपोर्ट्स, मृत्यु प्रमाणपत्र और अन्य जरूरी दस्तावेजों का परीक्षण करेगी।” मजेदार बात यह है कि राज्य के मुख्य सचिव द्वारा कोरोना से होने वाली मौतों का आँकड़ा 7 से 3 पर लाने के अगले दिन ही इस एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया गया।
पश्चिम बंगाल सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा जारी आदेश (स्रोत : अमित मालवीय /ट्विटर )
इसके अतिरिक्त शनिवार रात और रविवार की सुबह के बीच बंगाल के अस्पतालों में 4 और लोगों की ‘सह रुग्णता’ (यानी जिन्हें एक से ज्यादा मर्ज थे) के कारण मृत्यु हो गई। इस तरह अब तक ऐसे 11 लोगों की मौत बंगाल में हो चुकी है जो कोरोना से संक्रमित पाए गए थे, लेकिन कोरोना के चलते हुई मौतों का आधिकारिक आँकड़ा राज्य में अभी तक 3 पर ही अटका हुआ है।
इसके साथ-साथ कुछ और आयाम भी हैं जो बंगाल के लिए बेहद चिंता का कारण हैं। 5 अप्रैल को आईएएनएस ने रिपोर्ट किया कि शिबपुर में स्थानीय लोगों और पुलिस के बीच भिड़ंत हो गई जब एजेसी बोस बॉटनिक गार्डन के पास लोगों ने कब्रिस्तान की तरफ एक शव को पर्सनल प्रोटेक्शन इक्विपमेंट्स पहने कुछ लोगों द्वारा दफनाते देखा। यह देख आतंकित हुए स्थानीय लोगों ने सवाल किए कि शव को पीपीई पहने हुए लोग क्यों दफना रहे?
जल्दी ही बवाल बढ़ गया और पुलिस को स्थिति पर काबू पाने के लिए अधिक संख्या में पुलिस फोर्स वहाँ भेजनी पड़ी। पुलिस ने बताया कि मृत्यु प्रमाणपत्र में मृत्यु का कारण कार्डियक अरेस्ट बताया गया है लेकिन चूँकि मृतक को बुखार और साँस लेने में परेशानी जैसे लक्षण भी थे इसलिए अधिकारियों ने सभी तरह के एहतियात बरतने जरूरी समझे। इसी दौरान चीफ मिनिस्टर ममता बनर्जी ने दावा किया कि 6 अप्रैल 12 बजे तक राज्य में कोरोना संक्रमण के सक्रिय मामलों की संख्या केवल 61 है जिसमें 55 मरीज 7 परिवारों से संबंधित हैं। हालाँकि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मन्त्रालय के अनुसार राज्य में कोरोना के कुल सक्रिय मामले 67 हैं, जिसमें कोरोना के चलते होने वाली 3 मौतों और 10 स्वस्थ हुए मरीजों की गिनती शामिल नहीं है।
उत्तराखंड के डीजीपी अनिल के रतूड़ी की चेतावनी का अब असर दिखा है। तबलीगी जमात से जुड़े लोग सामने आने लगे हैं। ये लोग अब डीजीपी की चेतावनी के बाद प्रशासन को अपने बारे में जानकारी दे रहे हैं। इन लोगों को होम क्वारंटाइन किया जाएगा और आइसोलेशन में रखा जाएगा। उत्तराखंड के ही रुड़की में 16 जमातियों को होम क्वारंटाइन किया गया। रुद्रपुर के एसपी सिटी देवेंद्र पिंचा ने जानकारी दी है कि जिले में 15 जमाती खुद सामने आए हैं। इन सभी का मेडिकल करवा कर क्वारंटाइन किया जा रहा है।
देहरादून में संक्रमित मरीजों को सुद्धोवाला स्थित क्वारंटीन सेंटर और दून अस्पताल में रखा गया है। प्रदेश में अब तक आए मरीजों में से पाँच मरीज अपने घर ठीक होकर लौट चुके हैं। प्रदेश में अब तक 1141 लोगों के सैंपलों की जाँच हो चुकी है, जिनमें से 31 केस पॉजिटिव आए हैं। करीब 144 सैंपल की रिपोर्ट अभी आनी बाकी है।
हरिद्वार में जमातियों की तलाश के लिए पुलिस टीम गठित की गई है। देहरादून के डोईवाला में केशवपुरी और झबरावाला बस्ती को सील कर दिया गया है। यहाँ दो जमाती कोरोना पॉजिटिव पाए गए। जो 64 जमाती प्रशासन के सामने आए हैं, वो तबलीगी जमात से जुड़े हैं। साथ ही दिल्ली से आए चार जमातियों के संपर्क में भी आए थे। ये चारों जमाती दिल्ली में क्वारंटाइन किए गए हैं। जिनमें से दो में कोरोना की पुष्टि हुई है।
People who had attended Tablighi Jamaat event should come forward and disclose the information within 24 hours, otherwise, FIR will be registered against them under sections of murder and attempt to murder: Uttarakhand DGP Anil Raturi (file pic) #Coronaviruspic.twitter.com/QsswQPlvow
जहाँ तक उत्तराखंड की बात है, यहाँ अब तक कोरोना वायरस के 31 मामले सामने आए हैं। इनमें से 27 सक्रिय मामले हैं। 4 लोग इलाज के बाद ठीक होकर घर जा चुके हैं, वहीं राहत की बात ये है कि पहाड़ी राज्य में किसी की भी मृत्यु नहीं हुई है। पुलिस महानिदेशक ने चेतावनी जारी की है कि छिपे हुए जमातियों के पास सोमवार तक पुलिस के सामने आने का आखिरी मौका है। यदि उसके बाद कोई पकड़ा जाता है तो उस पर हत्या के प्रयास का मुकदमा दर्ज किया जाएगा।
कोरोना वायरस के बहाने ही सही लेकिन देशवासियों के साथ ही सरकारी मशीनरी का ध्यान भी आखिरकार इस्लामिक मिशनरियों के वैश्विक संगठन, तबलीगी जमात की ओर चला ही गया। दिल्ली स्थित निजामुद्दीन के मरकज में इन जमातियों के शामिल होने के बाद देश-विदेश के विभिन्न हिस्सों में फैलने के कारण अचानक से भारत में कोरोना वायरस (COVID-19) के आँकड़ों में वृद्धि पाई गई।
इस घटना के बाद तबलीगी जमात की गतिविधियों पर गृह मंत्रालय ने फौरन संज्ञान लेते हुए पाया कि करीब 960 ऐसे जमाती टूरिस्ट वीजा के नाम पर भारत आकर ‘मजहबी गतिविधियों’ में शामिल रहते थे। फिलहाल इनके वीज़ा को निरस्त कर काफी लोगों को ब्लैक-लिस्टेड कर दिया गया है।
लेकिन दुनिया में कुछ ऐसे भी देश हैं जिन्होंने तबलीगी जमात के ‘मूल’ और उनकी आतंकवादी संगठनों से प्रत्यक्ष सम्बन्ध को पहचानकर उनकी मजहब से जुड़ी संदिग्ध गतिविधियों के मद्देनजर, उन्हें बहुत पहले ही ब्लैक-लिस्ट कर देश में घुसने पर रोक लगा दी थी। हालाँकि ‘दी वायर’ की पत्रकार आरफा खानम जैसे लोग निरंतर यही दावा करते नजर आ रहे हैं कि तबलीगी जमात के सदस्य भाई-चारे की मिशाल हैं और वो डॉक्टर्स पर थूकने, पत्थरबाजी से लेकर नर्स से बदसलूकी जैसी किसी प्रकार की भी अन्यथा गतिविधि में संलिप्त सिर्फ उन्हें बदनाम करने के लिए बताए जा रहे हैं। लेकिन तबलीगी जमात का इतिहास शायद आरफा खानम जैसे कट्टरपंथियों को निराश कर सकता है।
तबलीगी जमात को लेकर भारत देश शायद जरा देर से सक्रीय हुआ है। जबकि इसके इतिहास पर थोड़ा सा रिसर्च करने पर पता चलता है कि न्यूयॉर्क टाइम्स, विकीलीक्स से लेकर भारत के ही कुछ पूर्व R&AW, आईबी अधिकारियों ने तबलीगी जमात की आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने की बात से पर्दा उठाया था।
यह हैरानी की बात है कि अमेरिका की सितंबर 11, 2001 की घटना से लेकर, कांधार विमान अपहरण, 2002 में साबरमती एक्सप्रेस में 59 कारसेवकों को जलाने और अब कोरोना के संक्रमण के पीछे भी आश्चर्यजनक रूप से इस तबलीगी जमात के लोग पाए गए हैं। बावजूद इसके आज भी ये लोग पर्यटक वीजा के नाम पर दुनियाभर में यात्रा करते हैं और इसी की आड़ में मजहबी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।
तबलीगी जमात के इतिहास पर एक नजर
तबलीगी जमात, जो भारत में COVID-19 संक्रमण का सबसे बड़ा वाहक बन चुका है, का पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकी संगठनों जैसे हरकत-उल-मुजाहिदीन (HuM) के साथ एक लंबे समय तक संबंध रहा है। भारतीय ख़ुफ़िया विभाग (IB) के एक पूर्व अधिकारी और कुछ पाकिस्तानी विश्लेषकों के मुताबिक हरकत-उल-मुजाहिदीन के मूल संस्थापक तबलीगी जमात के ही सदस्य थे।
अफगानिस्तान के खिलाफ पाकिस्तानी जिहाद में तबलीगीयों की भूमिका
1985 में हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी (HuJI) के एक बड़े समूह के रूप में, HuM ने अफगानिस्तान में USSR- गठबंधन शासन को उखाड़ फेंकने के लिए सोवियत सेना के खिलाफ पाकिस्तान द्वारा समर्थित जिहाद में भाग लिया। खुफिया विभागों के अनुसार, इस काम के लिए पाकिस्तान में HuM के आतंकी शिविरों में 6,000 से अधिक तबलीगियों को प्रशिक्षित किया गया था।
कश्मीर में HuM का आतंक
अफगानिस्तान में सोवियत संघ की हार के बाद कश्मीर में संचालित HuM और HuJI, दोनों आतंकवादी समूहों ने सैकड़ों लोगों का नरसंहार किया।
कांधार कांड में भूमिका, और जैश-ए-मोहम्मद में भर्ती
यही HuM कैडर आखिर में मसूद अजहर द्वारा स्थापित जैश-ए-मोहम्मद आतंकी संगठन में शामिल हो गया, जिसे दिसम्बर 1999 को आईसी 814 यात्रियों (कांधार कांड) के बदले में भारत ने रिहा कर दिया था।
1999 में इंडियन एयरलाइंस फ़्लाइट आईसी 814 के अपहरण के लिए जाना जाने वाला आतंकी समूह हरकत-उल-मुजाहिदीन (HuM) के मुख्य संस्थापक पाकिस्तानी सुरक्षा विश्लेषकों और भारतीय पर्यवेक्षकों के अनुसार, तबलीगी जमात के ही सदस्य थे।
वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर 9/11 हमले के संदिग्ध छुपे थे भारत की निजामुद्दीन मरकज बिल्डिंग में
विकीलीक्स के दस्तावेजों के अनुसार, गुआंतानामो बे (Guantanamo Bay)में अमेरिका द्वारा हिरासत में लिए गए 9/11 आतंकवादी हमले में आरोपित अल-कायदा के कुछ संदिग्ध कई साल पहले नई दिल्ली के निजामुद्दीन पश्चिम में तब्लीगी जमात के परिसरमें रुके थे।
यही वो समय था जब तबलीगी जमात अमेरिकी जाँच के दायरे में भी आई थी। अमेरिका में हुए 9/11 के आतंकी हमले के बाद अमेरिकी जाँच एजेंसियों ने तबलीगी जमात में रुचि दिखाई थी। इस पर संदेह जताया गया था कि इसी संगठन के जरिए आतंकवादी संगठन अलकायदा में भर्ती की जाती थीं।
न्यूयॉर्क टाइम्स में जुलाई 14, 2003 को प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, FBI की अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद टीम के उपप्रमुख माइकल जे हेइम्बच (Michael J. Heimbach) ने कहा, “हमने अमेरिका में तबलीगी जमात की बड़े स्तर पर मौजूदगी पाई है और हमने यह भी पाया है कि आतंकी संगठन अलकायदा भर्ती के लिए इनका इस्तेमाल करता है।”
न्यूयॉर्क टाइम्स की इस रिपोर्ट में बताया गया था कि 75 साल पहले (2003 की रिपोर्ट के अनुसार) ग्रामीण भारत में स्थापित, तबलीगी जमात दुनिया में सबसे व्यापक और रूढ़िवादी इस्लामी आंदोलनों में से एक है। यह खुद को एक गैर-राजनीतिक और अहिंसक बताता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य समुदाय के लोगों को इस्लाम में वापस लाने के अलावा और कुछ भी नहीं है।
लेकिन, सितंबर 11, 2001 को अमेरिका पर हुए आतंकवादी हमले के बाद जमातियों के इस समूह को लेकर दुनियाभर में एक समुदाय विशेष में खूब रूचि देखी गई और इसका जमकर प्रसार हुआ। यही नहीं, इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि कम से कम चार बड़ी आतंकवादी घटनाओं में भी इस समूह के लोगों की संलिप्तता पाई गई। बताया गया है कि इस समूह को बिना किसी की निगाह में आए, अपने प्रसार करने में इसलिए सहूलियत मिलती रही क्योंकि यह खुद को राजनैतिक की बजाए इस्लाम के धार्मिक चर्चा पर आधारित लोगों की महफ़िल होने का दिखावा कर देश-विदेशों में आयोजन करता है।
तब तक भी अमेरिकी अधिकारियों का कहना था कि हालाँकि, इस समूह के प्रमुख यही दावा करते आए हैं कि वो किसी भी सदस्य को किसी आतंकवादी घटना में शामिल होने की प्रेरणा नहीं देते और ऐसा होने की स्थिति में वो उन्हें बेदखल भी कर देते हैं। इसके बावजूद अमेरिकी अधिकारी माइकल हेइम्बच ने इस संगठन को लेकर सचेत रहने के निर्देश दिए थे।
गोधरा, 2002 में कारसेवकों को ट्रेन में जिंदा जलाने में तबलीगी जमात की भूमिका
तबलीगी जमात की गतिविधियों से पर्दा उठने के बाद सोशल मीडिया पर एक बड़े वर्ग ने इस बात पर आपत्ति जताई कि इस समूह को बदनाम करने का प्रयास किया जा रहा है। इनमें से एक लेफ्ट-लिबरल गिरोह की प्रोपेगैंडा वेबसाइट ‘दी वायर’ की पत्रकार आरफा खानम भी थीं। लेकिन हक़ीक़त यह है कि इसी तबलीगी जमात पर भी 2002 में गोधरा ट्रेन में गुजरात में 59 हिंदू कार सेवकों को जलाने में शामिल होने का संदेह था। उल्लेखनीय है कि हिंदुओं को ट्रेन में जिंदा जलाने की इस घटना के कारण गुजरात में सांप्रदायिक दंगे भड़के थे, जिसमें कई लोगों की जान चली गई।
भारत के खुफिया अधिकारी (R&AW) और सुरक्षा विशेषज्ञ स्वर्गीय बी रमन द्वारा लिखे गए एक लेख में बताया गया था कि चूँकि तबलीगी जमात के लाखों अनुयाई और इस्लाम का प्रचार करने वाले दुनियाभर में यात्रा करते हैं, इन्होंने कट्टरपंथी वहाबी-सलाफी विचारधारा की तर्ज पर, रूस के चेचन्या, दागेस्तान, सोमालिया और कुछ अन्य अफ्रीकी देशों में बड़े पैमाने पर अपने मजहब का विकास किया।
बी रमन ने अपने लेख में लिखा, “इन सभी देशों की खुफिया एजेंसियों को संदेह था कि पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठन विभिन्न देशों के मजहबी समुदायों में स्लीपर सेल बनाने के लिए धार्मिक उपदेश के ‘आवरण’ का इस्तेमाल कर रहे थे।” उन्होंने खुलासा किया था कि इसी संदेह के नतीजतन, तबलीगी जमात को इन्हीं कुछ देशों में ब्लैक-लिस्टेड किया गया और इसके प्रचारकों को वीजा से वंचित कर दिया गया।
1990 के दशक के पाकिस्तानी अखबार की खबरों का हवाला देते हुए, R&AW प्रमुख रमन ने बताया कि HuD जैसे जिहादी आतंकवादी संगठनों के प्रशिक्षित कैडरों ने तबलीगी जमात के ‘शिक्षकों’ ने ‘प्रचारकों’ के रूप में वीजा प्राप्त किया और मजहब के युवा वर्ग को पाकिस्तान में आतंकी प्रशिक्षण के लिए भर्ती करने के उद्देश्य से विदेश यात्राएँ करने गए।
भारतीय गृह मंत्रालय ने अब तबलीगी जमात की मरकज में शामिल लोगों पर विस्तृत जाँच का फैसला लिया है। कल ही एक समाचार में बताया गया है कि निजामुद्दीन स्थित अवैध तबलीगी मरकज बिल्डिंग ढहाने का फैसला लिया जा रहा है। स्थानीय लोगों ने बताया कि कभी यह एक छोटे से परिसर में सिर्फ नमाज पढ़ने की जगह हुआ करती थी, जिसे समय के साथ धीरे-धीरे पहले मस्जिद और बाद में सात मंजिला (+ 2 मंजिला बेसमेंट) मरकज में तब्दील कर दिया गया।
पूर्व कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने आरोप लगाया था कि भारत सरकार ने एन-95 मास्क के निर्यात पर रोक लगाने में देरी कर दी। अब भाजपा आईटी सेल के अध्यक्ष अमित मालवीय ने उनके आरोपों का जवाब देते हुए बताया कि ये फ़ैसला 31 जनवरी को ही ले लिया गया था, जब ‘वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाईजेशन’ ने कोई एडवाइजरी भी नहीं जारी की थी। सरकार ने न सिर्फ़ एन-95 मास्क बल्कि 2-3 प्लाई मास्कों के निर्यात पर भी रोक लगाने का निर्णय जनवरी में ही ले लिया था।
इसी बीच चीन ने भी भारत को कई ‘पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट्स’ गिफ्ट किए हैं। चीन ने भारत को 1.70 लाख PPEs डोनेट किया है। सभी हॉस्पिटलों में अभी 1.9 लाख कवरऑल दिए जा चुके हैं, जिसमें से 20,000 तो सिर्फ़ डोमेस्टिक सप्लाई है। सरकार ने बताया है कि अभी भारत के हॉस्पिटलों में 3,87,473 PPEs हैं जो पहले से ही मौजूद हैं। सरकार अब तक 2.94 लाख PPEs हॉस्पिटलों को सप्लाई कर चुकी है। इसके अलावा 2 लाख मास्क भी इन हॉस्पिटलों को भेजे जा रहे हैं, जिन्हें घरेलू स्तर पर ही बनाया गया है।
अब तक सरकार 20 लाख एन-95 मास्क्स को विभिन्न अस्पतालों में मुहैया करा चुकी है। इस हिसाब से अभी फ़िलहाल देश में 16 लाख एन-95 मास्क उपलब्ध होने की बात सरकार ने बताई है। जिन राज्यों में कोरोना वायरस के मामले ज्यादा हैं, उन्हें इन चीजों की ज्यादा सप्लाई दी जा रही है, जैसे तमिलनाडु, महाराष्ट्र, दिल्ली, केरल, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और राजस्थान। देश के कुछ बड़े अस्पतालों को भी बड़े पैमाने पर उपकरण मुहैया कराए गए हैं। विदेश से भी सप्लाई शुरू हो गई है, जो सरकार के लिए राहत की बात है।
2 lakh domestically produced N95 masks are being sent to hospitals. Including these, over 20 lakh N95 masks have been supplied by Govt. About 16 lakh N95 masks are presently available in country&this figure will increase with the fresh supply of 2 lakh masks: Government of India https://t.co/wEuEwM5ZBK
11 अप्रैल के बाद से और भी सप्लाई आएगी। सिंगापुर की एक कम्पनी को 80 लाख कम्प्लीट PPEs के लिए पहले ही ऑर्डर दिया जा चुका है। 11 अप्रैल के बाद वाले सप्ताह में 2 लाख PPEs आएँगे और उसके अगले सप्ताह 8 लाख की सप्लाई आएगी। एक चाइनीज कम्पनी से भी 60 लाख PPEs के लिए बात चल रहा है, जो अंतिम स्टेज में है। कुछ विदेशी कंपनियों को प्रोटेक्टिव गॉगल्स के लिए भी ऑर्डर किया गया है। डीआरडीओ और भारतीय रेलवे भी लगातार उत्पादन में लगा हुआ है।