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दंगाइयों ने दंगाइयों को मारा, मुआवजा देने का सवाल ही नहीं: CAA विरोधी हिंसा पर CM योगी सख्त

CAA के ख़िलाफ आए दिन सड़कों पर उतर कर हिंसा करने वालों के खिलाफ उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रुख अख्तियार दिखाया है। विधानसभा में एक सवाल के लिखित जवाब में उन्होंने कहा कि यूपी में मारे गए 21 दंगाइयों में से किसी की भी मौत पुलिस की गोली लगने से नहीं हुई है। इसलिए मारे गए दंगाइयों के परिजनों को मुआवजा देने का कोई प्रावधान नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक समाजवादी पार्टी के विधायक राकेश प्रताप सिंह द्वारा विधानसभा में पूछे गए एक सवाल के लिखित जवाब में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने कहा कि राज्य के खिलाफ सड़कों पर उपद्रव करने वाले लोगों को राहत देने के लिए राज्य सरकार का ऐसा कोई प्रावधान नहीं हैं, जिससे पिछले 6 महीने में दंगे में मरने वाले लोगों के परिवारों को मुआवजा दिया जा सके। उन्होंने आगे कहा कि मुआवजा देने का कोई सवाल ही नहीं है। 

सीएम योगी आदित्यनाथ ने यह भी बताया कि पिछले महीनों में सीएए के ख़िलाफ हुए विरोध-प्रदर्शनों में दंगाइयों की पत्थरबाजी से 400 पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि 61 पुलिसवालों को गोलियाँ लगी। 19-20 दिसंबर को सीएए के ख़िलाफ हुए राज्य में हुए विरोध-प्रदर्शनों के दौरान भीड़ की हिंसा में 21 लोग मारे गए थे। लेकिन इनमें से किसी की भी मौत पुलिस की गोली से नहीं हुई है। सीएम योगी ने पिछले हफ्ते कहा था कि दंगाइयों की मौत दंगाइयों के हाथों ही हुई है।

इससे पहले भी योगी ने दंगाइयों से निपटने के लिए कड़े कदम उठाने बात की थी। हिंसा के दौरान सार्वजनिक संपत्ति को हुए नुकसान की भरपाई के लिए दंगाइयों की संपत्ति जब्त करने की बात कही थी। इतना ही नहीं इसे अमल में लाने और दंगाइयों को सबक सिखाने के लिए यूपी सरकार ने करीब 498 लोगों की संपत्तियों को जब्त करने के लिए चिन्हित किया था। गौरतलब है कि बुलंदशहर के मुस्लिमों ने जिला मजिस्ट्रेट को 6 लाख रुपए का भुगतान किया था।

दरअसल सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह ने विधानसभा में पिछले 6 महीने में दंगे से जुड़ी घटनाओं में मारे गए लोगों की संख्या को लेकर सवाल किया था। उन्होंने यह भी पूछा था कि क्या सरकार पीड़ित परिवारों को मुआवजा देने के लिए कोई प्रावधान बनाएगी।

अगर कोई मरने के लिए आ ही रहा है तो वह जिंदा कैसे हो जाएगा: CAA विरोधी हिंसा पर CM योगी

दंगाइयों पर काबू पाने के लिए दिल्ली पुलिस को खुली छूट, PM मोदी को हालात से अवगत कराएँगे डोवाल

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में भड़की हिंसा में मरने वालों की संख्या बढ़कर 18 हो गई है। घायलों की संख्या 250 पार है। प्रभावित इलाकों में हालात अब भी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हालाँकि, एएनआई द्वारा आज सुबह जारी की गई हिंसा प्रभावित इलाकों की तस्वीरें, कुछ राहत देने वाली हैं।

इन तस्वीरों में सुरक्षाबल की तैनाती से हालात काबू में दिख रहे हैं। वहीं जाफराबाद में सीएए के ख़िलाफ़ चल रहा विरोध-प्रदर्शन खत्म हो गया है। इसके अलावा एनएसए डोवाल के देर रात दौरे के बाद उपद्रवियों के ख़िलाफ़ सुरक्षाबल को सख्त एक्शन लेने के भी निर्देश हैं।

इस पूरे मामले की कमान अब राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजील डोवाल को दे दी गई है। उन्होंने इससे पहले कल रात में हिंसा प्रभावित इलाकों का जायजा लिया था। आला अधिकारियों से बात की थी। उन्हें सुरक्षा संबंधी निर्देश दिए थे। इस दौरान पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक और स्पेशल सीपी एसएन श्रीवास्तव भी उनके साथ मौजूद थे।

आज एनएसए डोवाल इसी संबंध में प्रधानमंत्री और उनके कैबिनेट सहयोगियों को हालात से अवगत कराएँगे।

बता दें, मीडिया से बातचीत में एनएसए ने स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय राजधानी में अराजकता नहीं भड़कने दी जाएगी और पर्याप्त संख्या में पुलिस बल और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया है। स्थिति को नियंत्रण में लाने के लिए पुलिस को खुली छूट है।

वहीं, चांदबाग के एडिशनल डीसीपी डीके गुप्ता का भी बयान आया है। उन्होंने बताया है कि चांद बाग में 4 शव और 20 घायलों को अस्पताल में भर्ती कराया गया है। अब वे उन्हें हाइकोर्ट के आदेशानुसार दूसरे अस्पताल में भर्ती करेंगे। सभी पीड़ितों को दूसरे अस्पतालों में भी भर्ती करवाया जाएगा, ताकि उन्हें उचित उपचार मिले।

बालाकोट एयरस्ट्राइक के 1 साल: ‘हमने उन्हें बता दिया, कहीं भी रहो घुसकर मारेंगे’

बालाकोट एयरस्ट्राइक को आज (फरवरी 26, 2020) पूरे एक साल हो चुके हैं। पुलवामा हमले के 12 दिन बाद पाकिस्तान के बालाकोट स्थित आतंकी कैंपों पर भारत द्वारा की गई ये कार्रवाई पाकिस्तान के लिए एक ऐसा सबक थी जिसे सोचकर आज भी पड़ोसी मुल्क की हालत खराब है। पुलवामा हमले के ठीक 12 दिन बाद भारतीय वायुसेना ने 12 मिराज विमान भेजकर बालाकोट को तबाह कर दिया था। इस हमले में 350 से ज्यादा आतंकी मारे गए थे।

इसी दिन को याद करते हुए बुधवार को पूर्व एयरफोर्स चीफ बीएस धनोआ ने कहा कि आज एक साल बीत गए हैं और हम इसे संतुष्टि के साथ देखते हैं। उनके अनुसार उन्होंने इस स्ट्राइक के बाद काफी कुछ सीखा, बालाकोट ऑपरेशन के बाद कई चीजें लागू की गई। उन्होंने आगे कहा कि हम संदेश देना चाहते थे कि हम ‘घुसकर मारेंगे’ चाहे आप कहीं भी हों। अन्यथा, हम उनपर अपने क्षेत्र से भी हमला कर सकते थे। 

पूर्व वायुसेना ने इस मौक़े पर कहा कि बालाकोट एयरस्ट्राइक के बाद भारतीय चुनावों के दौरान कोई बड़ा आतंकी हमला नहीं हुआ, क्योंकि वे (पाकिस्तान) डर चुके थे। उन्हें डर था कि हम दोबारा उसी तरीके से या उससे भी जोरदार तरीके से जवाब देंगे।

पूर्व वायु सेना प्रमुख बीएस धनोआ ने आगे कहा कि मूल रूप से यह हमारे ऑपरेशन करने के तरीके में एक बदलाव है। दूसरे पक्ष ने कभी नहीं माना कि हम पाकिस्तान के अंदर एक आतंकी प्रशिक्षण शिविर को तबाह करने के लिए एयरस्ट्राइक कर सकते हैं जिसे हमने सफलतापूर्वक अंजाम दिया।

गौरतलब है कि आज से ठीक एक साल पहले भारत ने पाकिस्तान से पुलवामा हमले में शहीद हुए 40 जवानों की शहादत का बदला 26 फरवरी 2019 के दिन तड़के 3.30 बजे बालाकोट में एयरस्ट्राइक कर लिया था। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के बालाकोट पर 26 फरवरी को 2019 को एयर स्ट्राइक कर आतंकी ठिकानों को ध्वस्त कर दिया था। इसमें कई आतंकी मारे गए। भारतीय वायुसेना के लड़ाकू विमानों ने बालाकोट में घुसकर आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ठिकानों को नष्ट कर दिया था।

दिल्ली दंगों में अब तक 17 मौतें: NSA ने सँभाला मोर्चा, एक्शन में हिज्बुल का सफाया करने वाला IPS भी

उत्तर-पूर्वी दिल्ली में 3 दिन की भीषण हिंसा के बाद कल (फरवरी 25,2020) देर रात एनएसए अजित डोवाल ने मोर्चा सँभाला। उन्होंने देर रात हिंसा प्रभावित इलाकों का जायजा लिया। पुलिस के आला अधिकारियों से बात की। गृह मंत्री अमित शाह ने भी दिल्ली की स्थिति को देखते हुए 24 घंटे के भीतर तीसरी बैठक रात में बुलाई और हिंसा रोकने के लिए अहम फैसले लिए। हाई कोर्ट ने हिंसा में घायलों को उचित इलाज मुहैया कराने के लिए देर रात एक अपील पर सुनवाई की। पुलिस को आदेश दिया कि सुरक्षा के बीच घायलों को जीटीबी या किसी अन्य बड़े हॉस्पिटल में शिफ्ट किया जाए।

गौरतलब है कि भारी तनाव के बीच कल रात भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोवाल ने सीलमपुर में स्थिति का जायजा लिया और पुलिस के कई आला अफसरों के साथ बैठक की। डोवाल रात करीब साढ़े 11 बजे सीलमपुर डीसीपी ऑफिस पहुँचे और साढ़े 12 बजे तक बैठक के बाद करीब 8 किलोमीटर का सफर करते हुए तनावपूर्ण इलाकों में गए। उन्होंने भजनपुरा, यमुना विहार और मौजपुर समेत कई इलाकों का जायजा लिया। उनके साथ इस दौरान पुलिस कमिश्‍नर अमूल्‍य पटनायक भी मौजूद रहे।  

गृह मंत्री अमित शाह भी इस हिंसा को जल्द से जल्द रोकने के लिए एक्शन में आ गए। दिल्ली के बिगड़ी स्थिति को देखते हुए अमित शाह ने 24 घंटे के भीतर कल रात एक बार फिर तीसरी बैठक की। उन्होंने स्थिति को देखते हुए अपना त्रिवेंद्रम दौरे को भी रद्द कर दिया। साथ ही सीआरपीएफ के डीजी ट्रेनिंग IPS एसएन श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से दिल्ली पुलिस में विशेष आयुक्त (कानून और व्यवस्था) के रूप में नियुक्त किया। एसएन श्रीवास्तव को घाटी में हिज्बुल के सफाए के लिए जाना जाता है।

हिंसा के बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने कहा कि उपद्रवियों को बख्शा नहीं जाएगा, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। पर्याप्त पुलिस बल, सीएपीएफ और वरिष्ठ अधिकारी उत्तर पूर्वी दिल्ली में तैनात हैं। कुछ इलाकों में धारा 144 लागू है। राष्ट्रीय राजधानी में होने के कारण दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा कड़ी कर दी है। दंगाइयों को गोली मारने के आदेश हैं।

इस हिंसा में अब तक 17 लोगों की मौत होने की खबर हैं, जबकि 250 से ज्यादा लोगों के घायल होने की सूचना है, घायल लोगों में 56 से अधिक पुलिस के जवान हैं। इसके अतिरिक्त बाबरपुर, मौजपुर, जाफराबाद, करावल नगर इलाकों में कर्फ्यू जैसे हालात हैं। क्षतिग्रस्त इलाकों में भारी संख्या में पुलिस की तैनाती की गई है। हिंसा को रोकने के लिए अर्धसैनिक बलों की मदद और शांति बहाली के लिए स्थानीय शांति समितियों की मदद ली जा रही है। जाफराबाद में सीएए के विरोध प्रदर्शनस्थल को खाली करवा दिया गया है। सभी मेट्रो की सेवाएँ शुरू हो गई हैं।

हिंसा प्रभावित इलाकों में गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस के साथ-साथ सीमा सशस्त्र बल (एसएसबी) और भारत तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के जवान भी तैनात किए हैं। रैपिड एक्शन फोर्स (आरएएफ) के भी जवान हर घटनाक्रम पर नजर रखे हुए हैं।

वीर सावरकर: वह लेखक, जिसकी किताब बेच बंदूकें खरीदते थे आज़ादी के परवाने

न ही भाजपा-संघ वाले स्वतंत्रता सेनानी वीर सावरकर के बारे में बात करते थकते हैं और न ही कॉन्ग्रेस वाले हिन्दू महासभा के नेता रहे विनायक दामोदर सावरकर में नुक्स निकालते। इन दोनों राजनीतिक ध्रुवों के बीच जो खो जाता है, वह है लेखक, इतिहासकार, विचारक सावरकर- जिसने शायद एक व्यक्ति या नेता से आगे जाकर भारत में ब्रिटिश शासन की जड़ें खोद दीं। जिसने दशकों बाद पहली बार भारत-भूमि को याद दिलाया कि 1857 में महज कुछ दिशाहीन, अनुशासन-विहीन सैनिकों की हिंसा नहीं, स्वतंत्रता का पहला संग्राम हुआ था। जिसके ‘मास्टर-प्लान’ पर काम करते हुए बारीन्द्र घोष, शचीन्द्रनाथ सान्याल, रासबिहारी बोस आदि ने अपनी उम्र झुलसा दी और बिस्मिल, बाघा जतीन, राजेन्द्र लाहिड़ी आदि अनगिनत वीरों ने प्राणोत्सर्ग किया। जिसकी प्रेरणा से अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद कॉन्ग्रेस में हाशिये पर धकेल दिए गए सुभाष चन्द्र बोस आज़ाद हिन्द फ़ौज के ‘नेताजी’ बनने नजरबंदी से भाग निकले। जिसकी किताबें इतनी लोकप्रिय थीं कि भगत सिंह उसकी प्रतियाँ बेचकर बंदूकें खरीदने का पैसा जुटा सकते थे!

‘1857 दोहरा कर ही मिलेगी आज़ादी’

1857 के विद्रोह को दबाने में अंग्रेजों ने जो क्रूरता और निर्ममता दिखाई थी, वह अनायास या अकारण ही नहीं थी। पूरी ब्रिटिश शासन व्यवस्था ब्रिटिश सेना के संरक्षण पर टिकी थी और ब्रिटिश सेना (चाहे वह ईस्ट इंडिया कम्पनी की हो या बाद में ब्रिटिश क्राउन की) में केवल मुट्ठी-भर अंग्रेज अफ़सर होते थे- भारतीयों को विदेशियों का गुलाम बना कर रखने वाली असली ताकत भारतीय सैनिक ही थे; उन राजाओं की सेनाओं के, जिनकी कम्पनी बहादुर या ब्रिटेन के राजपरिवार के साथ संधि हुई थी, या सीधे ब्रिटेन की गुलामी में पड़े हुए भू-भाग की ब्रिटिश इंडियन आर्मी के सैनिक। अतः 1857 को क्रूरता से कुचलना अंग्रेजों के लिए ज़रूरी था, ताकि आने वाली पीढ़ियों तक किसी सैनिक के दिमाग में अपने गोरे मालिकों पर बंदूक तानने की जुर्रत न आए। इसीलिए उन्होंने न केवल लोमहर्षक निर्ममता के साथ इस संग्राम को कुचला (किवदंतियाँ हैं कि मंगल पाण्डे के घर वालों की पहचान करने में नाकाम रहने पर उन्होंने कानपुर से बैरकपुर तक के हर गाँव के हर पाण्डे उपनाम वाले बच्चे-बूढ़े-औरत को गाँवों के पेड़ों से फाँसी पर लटका दिया था), बल्कि इतिहास में इसे अधिक महत्व न देते हुए महज़ एक अनुशासनहीन विद्रोह के रूप में दिखाया। वह सावरकर ही थे जिन्होंने पहले मराठी और फिर अंग्रेजी में प्रकाशित ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’/The Indian War of Independence के ज़रिए इस लड़ाई के असली रूप को जनचेतना में पुनर्जीवित किया।

1909 में प्रकाशित इस किताब में उन्होंने न केवल इस विद्रोह की राजनीतिक चेतना को रेखांकित किया बल्कि इसके राष्ट्रीय स्वरूप के पक्ष में भी तर्क रखे। यही नहीं, उन्होंने यह भी अनुमानित कर लिया था कि अगर भारत को ब्रिटिश शासन के चंगुल से मुक्त होना है तो अंततः यही रास्ता फिर से पकड़ना होगा। ब्रिटिश सेना को पुनः राष्ट्रवादी, देशभक्त सैनिकों से भरना होगा जो वर्षों तक चुपचाप सेना में अपनी पैठ बनाएँ, प्रभुत्व स्थापित करें, अन्य सैनिकों की निष्ठा विदेशी शासन से इस देश की जनता की ओर मोड़ें। अंत में जब संख्याबल आदि सभी प्रकार से मजबूत हो जाएँ तो अपने नेता के इशारे पर, सही समय पर विद्रोह कर दें। महत्वपूर्ण रणनीतिक संसाधनों, हथियारों, रसद, आपूर्ति मार्गों आदि पर कब्ज़ा कर अंग्रेजों की व्यवस्था को घुटने पर ले आएँ।

सारे जहाँ में प्रतिबंधित

बौखलाए अंग्रेजों ने किताब और सावरकर पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। लंदन के सभी प्रकाशकों को इस किताब के अंग्रेजी अनुवाद/संस्करण के प्रकाशन के खिलाफ़ आगाह कर दिया गया। फ़्रांस ने भी अंग्रेज़ी दबाव में घुटने टेक दिए। अंततः किताब का अंग्रेज़ी संस्करण हॉलैंड (अब नीदरलैंड) में प्रकाशित हुआ- वह भी इसलिए कि ‘काली’ और ‘भूरी’ दुनिया को गुलाम बनाने में इंग्लैण्ड और हॉलैंड में ऐतिहासिक दौड़ मची थी। दोनों एक-दूसरे के औपनिवेशिक शासन को कमजोर करना चाहते थे। इस किताब को भारत में बाँटे जाने के लिए ब्रिटिश साहित्य के पन्नों में छिपा कर, या उसकी जिल्द चढ़ाकर लाया जाता था।

पीटर होपकिर्क अपनी किताब On Secret Service East of Constantinople में लिखते हैं कि इसके बाद अंग्रेजों ने सावरकर की किताब को ब्रिटिश लाइब्रेरी की सूची तक में जगह नहीं दी, ताकि भारतीय छात्रों को इसके बारे में पता न चल जाए। इसी किताब में वह यह भी बताते हैं कि सावरकर की किताब को ‘तस्करी’ कर भारत में लाने के लिए चार्ल्स डिकेंस का मशहूर उपन्यास ‘पिकविक पेपर्स’ काफ़ी इस्तेमाल हुआ है।

भगत सिंह

भगत सिंह ने न केवल सावरकर के साहित्य का खुद गहन अध्ययन किया (उनकी जेल डायरियों और लेखन में सावरकर से अधिक उद्धृत केवल एक लेखक हैं), बल्कि कई इतिहासकारों की राय है कि वे अपने क्रांतिकारी संगठन में भी सावरकर के अध्ययन को प्रोत्साहित करते थे। यही नहीं, सावरकर की ‘1857 का स्वातंत्र्य समर’ और इसके अंग्रेजी संस्करण की आमजन के बीच भारी माँग और प्रतिबंध के चलते आपूर्ति में किल्लत को देखते हुए भगत सिंह के इसकी व्यवसायिक पैमाने पर तस्करी करने के भी उद्धरण इतिहास में मिलते हैं। इस किताब को ऊँचे दामों पर बेचकर उनका संगठन अंग्रेजों के खिलाफ़ क्रांति के लिए हथियार खरीदने का धन उगाहता था। इस किताब का दूसरा संस्करण प्रकाशित करवाने में भगत सिंह की भूमिका का ज़िक्र विक्रम सम्पत द्वारा लिखित सावरकर की जीवनी में है। यही नहीं, भगत सिंह ने सावरकर की केवल इस किताब ही नहीं, ‘हिन्दू पदपादशाही’ का भी ज़िक्र अपने लेखन में किया है।

सावरकर भी भगत सिंह का काफी सम्मान करते थे। इसकी एक बानगी यह है कि सावरकर की मृत्यु के उपरांत 1970 में प्रकाशित उनकी जीवनी ‘आत्माहुति’ का विमोचन भगत सिंह की माता माताजी विद्यावती देवी के हाथों हुआ। इस समारोह में उनके छोटे भाई भी शरीक हुए थे।

आज यह कतई ज़रूरी नहीं है कि जो कुछ सावरकर ने लिखा है, वह सही ही हो। बहुत कुछ ऐसा भी हो सकता है जो उस समय भले सही रहा हो, लेकिन आज प्रासंगिक न हो। सावरकर के जीवनकाल में ही ‘हिंदुत्व’ और हिंदूवादी राजनीति की उनसे अलग परिभाषाएँ रहीं हैं। ऐसा माना जाता है कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के हिन्दू महासभा छोड़ने के पीछे एक महती कारण पाकिस्तान को लेकर उनमें और सावरकर में पाकिस्तान के अस्तित्व को स्वीकार कर लेने (डॉ. मुखर्जी का मत) बनाम पुनः एक दिन अखण्ड हिंदुस्तान की सावरकर की परिकल्पना का गंभीर मतभेद था। ‘हिंदुत्व’ शब्द सावरकर के पहले भी था और सरसंघचालक मोहन भागवत ने यह कई बार साफ़ किया है कि आज का राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोलवलकर-सावरकर से आगे बढ़ चुका है। ऐसे में यदि सावरकर को यदि जीवित रखना है तो उनके प्रशंसकों, उनके अनुयायियों को उन्हें दोबारा पढ़ना होगा, उन्हें दोबारा ‘खोजना’ होगा।

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मस्जिद पर भगवा ध्वज: राणा अयूब ने गिरफ़्तारी के डर से डिलीट किया वीडियो, फिर से किया ट्वीट

ख़ुद को पत्रकार बताने वाली राणा अयूब ने एक वीडियो शेयर कर के दिल्ली में चल रही हिंसा रूपी आग में प्रपंची घी डालने का प्रयास किया। आम तौर पर एक जिम्मेदार पत्रकार ऐसे वीडियो आदि के सही होने पर भी शेयर नहीं करते क्योंकि हिंसा भड़कने के आसार होते हैं। लेकिन राणा अयूब से ऐसी उम्मीद मूर्खता है। वीडियो के आने पर कई लोगों ने बताया कि ये पुरानी है, और उस पर केस की धमकी दी, तो उन्होंने उस वीडियो को तुरंत अपने ट्विटर प्रोफाइल से हटा दिया और डिलीट कर दिया। अफवाह फैलाने, झूठे वीडियो शेयर करने और लोगों को भड़काने के लिए झूठ बोलना लिबरल पत्रकारों के गिरोह का पुराना पेशा रहा है। जब पोल खुल जाती है तो वो चुपके से अपना ट्वीट डिलीट कर देते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि तब तक काफ़ी लोग उसे पढ़ने या देख चुके होते हैं।

कुछ ऐसा ही राणा अयूब ने भी किया। उन्होंने एक ऐसा वीडियो शेयर किया, जिसमें प्रतीत हो रहा है कि मस्जिद को जलाया जा रहा है। अयूब ने इस वीडियो को दिल्ली का बता कर पेश किया। इसके बाद गिरोह विशेष के अन्य लोगों ने भी राणा अयूब का साथ देते हुए कहा कि ये दिल्ली के अशोक नगर का वीडियो है। वीडियो देखने पर ऐसा लग रहा है कि कुछ लोग मस्जिद के ऊपर चढ़कर उसपर लगे स्पीकर नीचे फेंक रहे हैं और उस पर कोई झंडा फहरा रहे हैं। राणा अयूब ने वीडियो ट्वीट किया, डिलीट किया और फिर दोबारा ट्वीट किया।

कुछ लोगों का दावा है कि ये वीडियो पुराना है। लेकिन, राणा अयूब ने वीडियो को डिलीट करने के बाद उसे फिर से पोस्ट कर दिया। अगर वो सही था तो डिलीट क्यों किया और अगर अब वो पुष्टि करने का दावा कर रही हैं तो पहले बिना पुष्टि के क्यों ट्वीट किया? राणा अयूब को हाल ही में एक अवॉर्ड भी मिला है। उनको ‘साहसी पत्रकार’ का 2020 McGill मैडल मिला है। अयूब दावा करती हैं कि उन्हें ये अवॉर्ड इसीलिए मिला है क्योंकि वो सच्चाई का युद्ध लड़ रही हैं। अगर ऐसा होता तो उन्हें झूठा वीडियो शेयर नहीं करना पड़ता।

राणा अयूब ने शेयर किया पुराना वीडियो, गिरफ़्तारी के डर से किया डिलीट, फिर वापस किया ट्वीट

उधर प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक सिद्धार्थ वरदराजन ने भी अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित इस ख़बर को शेयर किया। वरदराजन और ‘द वायर’ ने दावा किया कि मस्जिद के स्पीकरों को नीचे फेंक कर उस पर हनुमानजी का झंडा फहरा दिया गया।

‘द वायर’ ने शेयर किया फेक न्यूज़, मुसलमानो को भड़काया

उधर एक अन्य प्रोपेगंडा पोर्टल ‘स्क्रॉल’ भी पीछे नहीं रहा और उसने भी ते ख़बर चलाई। ‘स्क्रॉल’ ने दावा किया कि लोगों ने ‘जय श्री राम’ और ‘हिन्दुओं का हिंदुस्तान’ नारा लगाते हुए मस्जिद को जला डाला और उसके ऊपर हनुमान का ध्वज फहरा दिया। ‘स्क्रॉल’ ने सेफ खेलने के लिए इस ख़बर को ‘द वायर’ के हवाले से बना दिया और राणा अयूब द्वारा ट्वीट डिलीट करने के साथ ही दोनों की भद्द पिट गई। हालाँकि, राणा अयूब ने फिर से वीडियो ट्वीट कर दिया, जिसके बाद दोनों ने राहत की साँस ली होगी।

‘स्क्रॉल’ ने शेयर की फर्जी ख़बर: ‘द वायर’ के हवाले से फैलाया झूठ

दिल्ली में लिबरल गिरोह लगातार हिंसा भड़काने वालों के समर्थन में हुआ है। सोशल मीडिया पर लगातार ऐसा माहौल बनाया जा रहा है, जैसे कपिल मिश्रा ने ही सब कराया हो। हालाँकि, मोहम्मद शाहरुख़ को लेकर सब ने चुप्पी साध रखी है। वही शाहरुख़, जिसे पुलिस ने अब गिरफ़्तार कर लिया है और जो सोमवार (फरवरी 24, 2020) को दिन भर फायरिंग करता हुआ घूम रहा था। इसी तरह मस्जिद को हिन्दुओं द्वारा जलाने का वीडियो ट्वीट किया गया, ताकि माहौल और खराब हो। उनकी पूरी कोशिश है कि दिल्ली में इतनी हिंसा हो कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि धूमिल हो।

IPS श्रीवास्तव दिल्ली पुलिस के स्पेशल कमिश्नर नियुक्त; दंगाइयों को देखते ही गोली मरने के आदेश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की भारत यात्रा से पूर्व रविवार शाम से दिल्ली में भड़के दंगों के बाद दिल्ली में हालात तनावपूर्ण हैं। इसी बीच IPS एसएन श्रीवास्तव को तत्काल प्रभाव से दिल्ली पुलिस का स्पेशल कमिश्नर (कानून और व्यवस्था) नियुक्त किया गया है।

बताया जा रहा है कि आईपीएस एसएन श्रीवास्तव जम्मू-कश्मीर में एडीजी पश्चिम क्षेत्र (सीआरपीएफ) रह चुके हैं और गृह युद्ध जैसी स्थिति से निपटने में सक्षम हैं। दिल्ली में भड़की हिंसा में अब तक कुल 10 लोगों की मौत हो चुकी है। उत्तरी-पूर्वी दिल्ली में धारा 144 लागू है और अतिरिक्त पुलिसबलों की तैनाती की गई है।

अर्धसैनिक बल के जवानों की मदद ली जा रही है। अधिकारियों ने बताया कि पुलिसकर्मी सौहार्द बहाल करने के लिए स्थानीय शांति समितियों की मदद ले रहे हैं। वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि असामाजिक तत्वों से मौके पर ही कड़ाई से निपटा जा रहा है। अभी तक इस संबंध में किसी को गिरफ्तार नहीं किया गया है।

इसी बीच मीडिया रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि नॉर्थ ईस्ट दिल्ली में देखते ही गोली मारने के आदेश जारी कर दिए गए हैं। दिल्ली में सोमवार (फरवरी 24, 2020) को दिन भर दंगाइयों का तांडव चला और आज मंगलवार को भी यही क्रम जारी रहा। जफराबाद, मौजपुर, बाबरपुर, गोकुलपुरी, करावल नगर, भजनपुरा सौर घोड़ा से लेकर चाँदबाग़ तक, अताताइयों ने किसी भी जगह को शांत नहीं रहने दिया। जम कर आगजनी की गई।

दंगों में हिन्दुओं के घरों को जलाने की ख़बरें आई हैं। लेकिन, सबसे ज्यादा दुखद रहा हेड कॉन्स्टेबल रतनलाल का बलिदान होना। दंगाइयों ने एक भरे-पूरे परिवार को बर्बाद कर दिया। सीएए विरोध के नाम पर हिंसा करने वाले इन लोगों को इस बात का एहसास होना चाहिए कि उन्होंने इस देश को कितनी बड़ी क्षति पहुँचाई है।

‘गो बैक केजरीवाल’: बलिदानी रतन लाल के परिवार से मिलने पहुँचे CM को जनता ने गरिया कर भगाया

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल गोकुलपुरी थाने के वीरगति को प्राप्त हेड कॉन्स्टेबल ऑफ पुलिस रतन लाल के यहाँ पीड़ित परिवार से मिलने गए थे, जहाँ से उन्हें भगा दिया गया। जनता ने दिल्ली के मुखिया के विरुद्ध जम कर नारेबाजी की और उन्हें पीड़ित परिवार से मिले बिना ही वापस जाना पड़ा। बता दें कि केजरीवाल दिल्ली में हिंसा भड़कने के बाद ही तरह-तरह से ड्रामे करने में लगे हुए हैं और कभी राजघाट पर मौन धरना दे रहे हैं तो कभी प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के गृह मंत्रालय से एक्शन लेने की अपील कर रहे हैं। ऐसे में, लोग अरविन्द केजरीवाल से नाराज़ हैं और उसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा।

ज्ञात हो कि नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली में सीएए विरोधी दंगाइयों ने सोमवार (फरवरी 24, 2020) को रतन लाल को मार डाला था। वो एक जाँबाज पुलिस अधिकारी थे, जो कोई भी कठिन टास्क आने पर उसे तुरंत लपक लेते थे और निकल पड़ते थे। उन्होंने ही 2013 में दो आदिवासी महिलाओं के साथ हुए बलात्कार के मुख्य आरोपित को धर दबोचा था। रतन लाल की पत्नी छोटे-छोटे बच्चे हैं, जो पूछ रहे हैं कि उनके पापा का क्या कसूर था कि उन्हें मार डाला गया? उन्होंने अपनी माँ से वादा किया था कि वो अबकी होली राजस्थान के सीकर स्थित अपने गाँव फतेहपुर तिहावली में पूरे परिवार के साथ मनाएँगे। उनका ये वादा अधूरा ही रह गया।

अरविन्द केजरीवाल और दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया वीरगति को प्राप्त रतन लाल के परिवार से मिलने जैसे ही पहुँचे, आक्रोशित लोगों ने ‘केजरीवाल, वापस जाओ’ और ‘गो बैक केजरीवाल’ के नारे लगाने शुरू कर दिए। साथ ही, कुछ अश्लील गालियाँ भी दीं। नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे केजरीवाल को लोगों के विरोध के कारण सिसोदिया के साथ उलटे पाँव वापस लौटना पड़ा:

रतन लाल के छोटे भाई ने बताया कि रतन शुरू से ही पुलिस की वर्दी पहनना चाहते थे। उनके भीतर धैर्य की अद्भुत क्षमता थी। उनके भाई बताते हैं कि उन्होंने कभी रतनलाल को आपा खोते या किसी पर चिल्लाते नहीं देखा था। क़रीब एक महीने पहले पूरा परिवार मिला था, जब एक रिश्तेदार की मौत हो गई थी। उनके छोटे भाई दिनेश कहते हैं कि आज उन्होंने अपने भाई को खोया है, कल को उनकी जगह कोई और हो सकता है।

दिल्ली में अर्धसैनिक बल के जवानों पर ‘एसिड’ से हमला, स्थानीय हिंदुओं ने की पीड़ितों की मदद

दिल्ली में दंगाइयों का उत्पात बढ़ता ही जा रहा है। अर्धसैनिक बलों के जवानों पर एसिड से हमला किया गया है। ‘टाइम्स नाउ’ की ख़बर के अनुसार, ये करवाल नगर की घटना है। ख़बर के अनुसार, अर्धसैनिक बल के जवान वहाँ स्थिति को नियंत्रण में करने के लिए करावल नगर के मुहल्लों में गए थे, तभी उन पर एसिड या एसिड की तरह किसी केमिकल से हमला किया गया। उसके तुरंत बाद उन्हें जीटीबी हॉस्पिटल में ले जाया गया। दंगाई हथियारों से लैस थे और उन्होंने पूरी साज़िश के तहत हमला किया।

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली के कई इलाक़ों में हिंसा अभी भी जारी है। चाँदबाग़ इलाक़े में हिंसा भड़कने के बाद फिर अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है। करावल नगर में जवानों पर एसिड फेंके जाने के बाद स्थानीय लोगों ने घरेलू तरीकों से उनका उपचार करने का प्रयास किया। उसके बाद जवानों को हॉस्पिटल में शिफ्ट किया गया।

नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कैसे एसिड अटैक से पीड़ित सुरक्षा बलों के जवानों की स्थानीय हिन्दू मदद कर रहे हैं:

दिल्ली पुलिस ने भी स्पष्ट किया है कि उनके पास पुलिस बलों के जवानों की कमी नहीं है और गृह मंत्रालय से उन्हें पूर्ण समर्थन मिल रहा है। दिल्ली विभिन्न इलाक़ों में धारा-144 लागू किया गया है। पुलिस ने कर्फ्यू लागू करने की बात नकार दी है। अभी तक 11 लोगों की मौत और पुलिसकर्मियों सहित 186 लोगों के घायल होने की ख़बर है। गृह मंत्री अमित शाह ने सुबह ही बैठक कर के स्थिति की समीक्षा की थी।

NDTV ने फैलाया झूठ, कहा पुलिस के पास पर्याप्त लोग नहीं; कमिश्नर ने कहा- झूठ मत फैलाओ

दिल्ली में दंगाई लगातार अपनी ख़तरनाक गतिविधियाँ बढ़ाते जा रहे हैं। पुलिस कमिश्नर अमूल्य पटनायक ने बताया है कि राज्य में पर्याप्त पुलिस बलों की तैनाती की है। उन्होंने कहा कि कुछ समाचार एजेंसियों ने ख़बर चलाई थी कि दिल्ली पुलिस को गृह मंत्रालय से पर्याप्त बल नहीं मिला है, जो कि ग़लत है। इनमें से NDTV का नाम प्रमुख है। उन्होंने बताया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय लगातार दिल्ली पुलिस की सहायता कर रहा है और उनके पास पर्याप्त बल उपलब्ध कराए गए हैं। पटनायक ने आश्वासन दिया कि उपद्रवियों को बख्शा नहीं जाएगा। दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एमएस रंधावा ने कहा कि पुलिस की पहली प्राथमिकता स्थिति को नियंत्रित करने की थी, जो हो गई है।

रंधावा ने बताया कि जितने भी एफआईआर रजिस्टर किए गए हैं, उन सभी के अंतर्गत जाँच होगी और इस दंगे के मुख्य साज़िशकर्ता को पकड़ा जाएगा। वहीं उधर एमनेस्टी इंडिया ने कहा है कि कुछ नेतागण घृणा फैला रहे हैं, जिन पर रोक लगनी चाहिए। गाज़ियाबाद शहर में भी धारा-144 लगा दिया गया है और साथ ही सारे शराब की दुकानों को बंद कर दिया गया है। मुस्तफाबाद में एक क्षेत्र में आगजनी की गई, जिसके बाद वहाँ से SOS संदेश भेजा गया। वहाँ फायर ब्रिगेड, पुलिस और मीडिया से मदद माँगी गई है।

करावल नगर, मौजपुर, चाँदपुर और बाबरपुर- दिल्ली के इन चार थाना क्षेत्रों में धारा-144 लगा दिया गया है। उधर लखनऊ में भी सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। साथ ही अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है। अलीगढ़ में क़ानून-व्यवस्था पहले से ही तगड़ी रखी गई है। उधर सीएए दंगाइयों की हिंसा के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए पुलिस कॉन्स्टेबल रतन लाल के पार्थिव शरीर को उनके बुरारी स्थित निवास पर लाया गया। दिल्ली के चाँदबाग़ इलाक़े में भी फिर से हिंसा भड़कने की ख़बर है। वहाँ पुलिस को स्थिति नियंत्रित करने के लिए आँसू गैस के गोले दागने पड़े।

सबसे ज्यादा स्थिति नार्थ-ईस्ट दिल्ली में ख़राब है। ड्रोन कैमरों के जरिए निगरानी रखी जा रही है। दिल्ली पुलिस ने बताया है कि अब तक उसके 56 जवान घायल हुए हैं, वहीं 130 नागरिक भी घायलों की सूची में शामिल हैं। स्पेशल सीपी सतीश गोलछा ने कहा कि खजूरी ख़ास इलाक़े में हिंसा भड़काने वालों को जल्द शिकंजे में लिया जाएगा। पुलिस ने दोषियों के ख़िलाफ़ लीगल एक्शन लेने की बात कही है। भजनपुरा क्षेत्र में धारा-144 लगने के बाद से स्थिति नियंत्रण में है।

दिल्ली के खजूरी ख़ास में पुलिस और रैपिड एक्शन फोर्स ने मिल कर फ्लैग मार्च भी किया। कॉन्ग्रेस पार्टी ने हिंसा पर चर्चा के लिए अपनी वर्किंग कमिटी की बैठक बुलाई है। दिल्ली के एलजी अनिल बैजल ने भी शांति व्यवस्था बनाए रखने की अपील की है। जीटीबी अस्पताल में एक और व्यक्ति की मौत के बाद अब तक हिंसा में मरने वालों की संख्या 11 हो गई है।