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लिट्टे ख़त्म हो गया तो गाँधी परिवार को खतरा कैसा, SPG सुरक्षा हटाना सही निर्णय: स्वामी

राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने पर कॉन्ग्रेस नेताओं को करारा जवाब दिया है। कॉन्ग्रेस नेताओं ने बुधवार को राज्यसभा में एक सुर में आलोचना करते हुए कहा कि सरकार राजनीतिक रंजिश के कारण गाँधी परिवार की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही है। इसके बाद भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साफ़ कर दिया है कि यह निर्णय किसी राजनेता का नहीं बल्कि गृह मंत्रालय का है और नियमानुसार ही हुआ है। नड्डा ने कहा कि किसी भी नेता के ‘थ्रेट परसेप्शन’ को देखते हुए मंत्रालय तय प्रोटोकॉल के तहत निर्णय लेता है।

स्वामी ने कहा कि राजीव गाँधी की हत्या के बाद गाँधी परिवार को लिट्टे से ख़तरा था। अब लिट्टे ख़त्म हो गया है और इसलिए गाँधी परिवार को भी कोई ख़तरा नहीं है। बता दें कि मई 2009 में श्रीलंका ने प्रभाकरण को मार गिराया था। वह लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) का संस्थापक था। तमिल कट्टरवादी संगठन लिट्टे ने ही राजीव गाँधी की हत्या की साज़िश रची थी। लिट्टे के ख़िलाफ़ लड़ाई में राजीव ने श्रीलंका सरकार की मदद की थी, जिससे वह ख़फ़ा था। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि लिट्टे के खात्मे के बाद गाँधी परिवार को एसपीजी सिक्योरिटी की कोई ज़रूरत नहीं है।

बता दें कि गाँधी परिवार ने राजीव गाँधी के हत्यारों की सज़ा कम करने की माँग की थी। स्वामी ने जब इस मामले को सदन में उठाया तो हँगामा मच गया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने स्वामी के इस बयान की आलोचना करते हुए शोर-शराबा किया। राजीव गाँधी के दोनों हत्यारे पेरारिवलन और नलिनी जेल में बंद हैं। प्रियंका गाँधी और सोनिया गाँधी अक्सर उनकी सज़ा कम करने की बात कहते हैं। कई लोगों का ये भी कहना है कि उस आत्मघाती हमले में कई और लोग भी मारे गए थे और उन सबकी तरफ़ से हत्यारों को क्षमादान देने का गाँधी परिवार को कोई अधिकार नहीं है।

स्वामी के बयान के बाद राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी कहा कि वो राजीव गाँधी के हत्यारों की सज़ा कम किए जाने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ये एसपीजी सुरक्षा कवर हटाने से अलग मुद्दा है, लेकिन वे भी नहीं चाहते हैं कि नलिनी और पेरारिवलन की सज़ा कम की जाए। वहीं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष आनंद शर्मा ने कहा कि सुरक्षा के मामलों में राजनीति से हैट कर काम किया जाना चाहिए।

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समुदाय विशेष, ईसाइयों पर आंध्र सरकार मेहरबान: हज और यरुशलम जाने के लिए मिलेगा ज्यादा पैसा

हज पर जाने वाले समुदाय विशेष को दी जाने वाली आर्थिक मदद में आंध्र प्रदेश की सरकार ने वृद्धि की है। यरुशलम और बाइबल में उल्लेखित स्थानों की यात्रा करने वाले ईसाइयों को भी अब सरकार ज्यादा आर्थिक मदद देगी। हज यात्रियों को दी जाने वाली आर्थिक मदद जारी करने को लेकर राज्य सरकार ने एक फाइनेंशियल ऑर्डर जारी किया है।

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक मंगलवार को सरकार ने बताया, “तीन लाख रुपए से कम की सालाना आय वाले लोगों को हज के लिए 60 हजार रुपए की मदद दी जाएगी। जिनकी सालाना आय तीन लाख रुपए से ज्यादा होगी उन्हें 30 हजार रुपए मिलेंगे।” इसके अलावा आंध्र प्रदेश हज कमेटी हज कैंप में रिपोर्ट करने से लेकर उनकी रवानगी तक उनके रहने और खाने का भी इंतजाम करेगी।

इसी तरह की मदद ईसाइयों को भी यरुशलम की यात्रा के लिए मिलेगी। सरकार की ओर से जारी आदेश के मुताबिक तीन लाख रुपए से कम की सालाना आय वाले ईसाइयों को यरुशलम, बेथलेहम, नाज़रेथ, जॉर्डन नदी, मृत सागर और गैलिली सागर की यात्रा करने के लिए अब 60,000 रुपए की मदद दी जाएगी।

राज्य के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेट्री मोहम्मद इलियास रिजवी ने मंगलवार को इस संबंध में आदेश जारी किया। रिपोर्ट्स के अनुसार ये फैसला आँध्र प्रदेश के सीएम जगन मोहन रेड्डी का वादा था, जो उन्होंने ईसाई समुदाय के लोगों से पिछले साल अपनी 3,648 किमी की पदयात्रा में किया था।

इससे पहले 40,000 रुपए की मदद दी जाती थी जिसकी घोषणा 2016 में चंद्र बाबू नायडू की सरकार ने की थी। अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रधान सचिव मोहम्मद इलियास रिज़वी की ओर से जारी आदेश के मुताबिक जिनकी आय तीन लाख रुपए से अधिक है उन्हें अब 20,000 के बजाय 30,000 रुपए की मदद दी जाएगी। इस योजना की शुरुआत 2013 में एकीकृत आंध्रप्रदेश में हुई थी। तब यरुशलम की धार्मिक यात्रा करने पर सरकार 20,000 रुपए की आर्थिक मदद देती थी।

उल्लेखनीय है कि भारत में धार्मिक यात्राओं के मद्देनजर ईसाइयों और मुस्लिमों को सरकार की ओर से अनुदान या सहायता राशि दी जाती है। लेकिन हिंदू समुदाय के लिए किसी भी धार्मिक यात्रा पर सरकार कोई अनुदान या सहायता राशि नहीं देती। साल 2012 में ही सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को साल 2022 तक चरणबद्ध तरीके से हज सब्सिडी ख़त्म करने का निर्देश दिया था। लेकिन ये फैसला कितना कार्यन्वित किया जाएगा, ये देखना बाकी है।

हम सब के PM हैं नरेंद्र मोदी, उनसे मिलने का मतलब ये थोड़े है कि खिचड़ी पक रही: शिवसेना सांसद संजय राउत

शिवसेना सांसद संजय राउत ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और एनसीपी के मुखिया शरद पवार की बुधवार (नवंबर 20, 2019) को होने वाली बैठक को लेकर अपनी प्रतिक्रिया दी है। मीडिया ने संजय राउत से पूछा कि पीएम मोदी और पवार की बैठक के क्या मायने हैं? जवाब देते हुए राउत ने सवाल दागा कि अगर प्रधानमंत्री से कोई मिलता है तो इसका मतलब खिचड़ी पकती है क्या? राउत ने इस दौरान किसानों की स्थिति का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी पूरे देश के प्रधानमंत्री हैं। साथ ही उन्होंने जोड़ा कि उद्धव ठाकरे और शरद पवार हमेशा से किसानों को लेकर चिन्तित रहे हैं।

संजय राउत ने कहा कि संसद के बाहर या भीतर, कोई भी प्रधानमंत्री से मुलाक़ात कर सकता है और इसका ग़लत अर्थ नहीं लगाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूर्व केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार को कृषि क्षेत्र में अभूतपूर्व कार्य करने के लिए जाना जाता है। बकौल शिवसेना सांसद संजय राउत, पवार महाराष्ट्र की स्थिति को अच्छी तरह जानते और समझते हैं। राउत ने आगे कहा:

“मान लीजिए शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे दिल्ली आते हैं और सभी सांसदों के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करते हैं। तो क्या इसका मतलब कोई खिचड़ी पकती है क्या? हमनें भी शरद पवार से निवेदन किया है कि वो किसानों के मुद्दे को प्रधानमंत्री के सामने रखें।”

शिवसेना मुखपत्र ‘सामना’ के एग्जीक्यूटिव एडिटर संजय राउत ने कहा कि महाराष्ट्र के सभी सांसद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात करेंगे। उन्होंने कहा कि ये सांसद भले ही किसी भी राजनीतिक पार्टी के हों, वे पीएम मोदी से मुलाक़ात कर राज्य में किसानों की स्थिति की चर्चा करेंगे। राउत ने कहा कि शिवसेना यह सुनिश्चित करना चाहती है कि महाराष्ट्र के किसानों को हरसंभव सहायता मिले। बुधवार को ही ‘सामना’ में किसानों की आत्महत्या का मामला उठा कर भाजपा पर निशाना साधा गया है।

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा कि इसके लिए अब ज्यादा इतंजार करने की ज़रूरत नहीं है, बस 5-6 दिन और लगेंगे। उन्होंने स्वीकार किया कि पिछले 10-15 दिनों में राज्य में सरकार गठन के रास्ते में कई समस्याएँ आई हैं। साथ ही उन्होंने दावा किया कि एक सप्ताह के भीतर सरकार बना लिया जाएगा। राउत ने दावा किया कि महाराष्ट्र को एक मजबूत और लोकप्रिय सरकार मिलने जा रही है।

संजय राउत ने सरकार गठन की राह में आ रही समस्याओं के ख़त्म होने का समय भी बता दिया। उन्होंने कहा कि गुरुवार (नवंबर 21, 2019) को दोपहर 12 बजे तक ये सारी रुकावटें चली जाएँगी। राउत ने कहा कि गुरुवार दोपहर 12 बजे महाराष्ट्र में तस्वीर साफ़ हो जाएगी।

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जुनैद ने रची सांसद की हत्या की साजिश: फेसबुक पर वीडियो पोस्ट कर कहा- इसे जहन्नुम भेजना है

हॉलैंड की अदालत ने डच सांसद ग्रीट विल्डर्स को मारने की साजिश रचने के आरोप में एक पाकिस्तानी युवक को 10 साल की सजा सुनाई। पाकिस्तानी की पहचान 27 वर्षीय जुनैद के रूप में हुई। वह धुर दक्षिणपंथी सांसद गीर्ट विल्डर्स की हत्या करना चाहता था। इसके लिए उसने पिछले साल एक वीडियो भी जारी किया था। लेकिन उसके मंसूबों को भाँपते हुए अगस्त 2018 में उसे द हेग के एक रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार कर लिया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विल्डर्स ने इस्लाम में पैगंबर माने जाने वाले मुहम्मद साहब पर कॉर्टून प्रतियोगिता आयोजित करने का ऐलान किया था। हालाँकि बाद में वह इससे पीछे हट गए थे। लेकिन जुनैद के जहन में ये बात बस गई। उसने विल्डर्स को मारने के इरादे से फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट की थी और कहा था कि वह विल्डर्स को जहन्नुम में भेजना चाहता हैं। इसके बाद उसने डच सासंद को मारने के लिए दूसरे लोगों से भी मदद माँगी थी। माना जाता है कि वह फ्रांस से हॉलैंड भी इसी कारन से पहुँचा था।

अदालत ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए जुनैद को ‘आतंकी मकसद के साथ हत्या की योजना बनाने व एक आतंकवादी कृत्य के लिए उकसाने’ का दोषी बताया। इसके अलावा अदालत ने ये भी पाया कि आरोपित ने एक से अधिक बार यह कहा था कि विल्डर्स की मौत एक ‘अच्छी’ बात होगी। वह चाहता था कि वह यह हत्या संसदीय भवन में करे।

हालाँकि बता दें कि मामले की सुनवाई के दौरान जुनैद ने अपने ऊपर लगे आरोपों से साफ मना किया है और खुद को ‘शांतिप्रिय’ बताया है। खुद के फ्रांस आने के पीछे उसने कहा कि वह हालैंड केवल विल्डर्स की कॉर्टून प्रतियोगिता का विरोध करने के लिए आया था।

25 नवंबर को महाराष्ट्र में बन जाएगी सरकार! मोदी से मिलेंगे शरद पवार

शिवसेना विधायक अब्दुल सत्तार ने दावा किया है कि उनकी पार्टी 25 नवम्बर के आसपास सरकार बना लेगी। शिवसेना ने अपने सभी विधायकों को 5 दिनों के कपड़े और आधार कार्ड के साथ मुंबई आने को कहा है। मीडिया में चल रही ख़बरों के अनुसार, शिवसेना सरकार गठन के प्रयास में जोर-शोर से लग गई है। अब्दुल सत्तार महारष्ट्र की कॉन्ग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं और उन्होंने इस वर्ष लोकसभा चुनाव से ऐन पहले उद्धव ठाकरे की मौजूदगी में शिवसेना ज्वाइन की थी।

शिवसेना सांसद संजय राउत ने भी कहा है कि दिसंबर से पहले सरकार गठन का काम पूरा हो जाएगा, क्योंकि एनसीपी और कॉन्ग्रेस से बातचीत एकदम सही रास्ते पर है। बुधवार (अक्टूबर 20, 2019) को कॉन्ग्रेस और एनसीपी के बीच बैठक भी होने वाली है। ये बैठक पहले मंगलवार को ही होनी थी, लेकिन कॉन्ग्रेस नेताओं के इंदिरा गाँधी के जयंती कार्यक्रमों में व्यस्त रहने के कारण यह संभव नहीं हो सका। कॉन्ग्रेस ने अहमद पटेल, एके एंटोनी, वेणुगोपाल राव और मल्लिकार्जुन खड़गे को शिवसेना के साथ मिल कर सरकार गठन की दिशा में बातचीत करने का टास्क सौंपा है।

कॉन्ग्रेस पूर्ण आश्वासन चाहती है कि शिवसेना अपना हिंदुत्व वाला रुख त्याग दे। यही कारण है कि उद्धव ठाकरे ने अपना प्रस्तावित अयोध्या दौरा भी रद्द कर दिया। इस बात को लेकर भी चर्चा चल रही है कि शिवसेना को पूरे 5 वर्षों के लिए मुख्यमंत्री का पद दिया जाना चाहिए या नहीं। महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के कई नेता दिल्ली में कैम्प कर रहे हैं।उधर शिवसेना ने भी अपने मुखपत्र ‘सामना’ के जरिए भाजपा पर निशाना साधा। शिवसेना ने महाराष्ट्र में पिछले कुछ महीनों में किसानों द्वारा की गई आत्महत्या के आँकड़े गिनाते हुए फडणवीस सरकार पर निशाना साधा। शिवसेना ने दावा किया कि पिछले 1 महीने में राज्य में 68 किसानों ने आत्महत्या की है।

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उधर संसद में एनसीपी के मुखिया शरद पवार की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी बैठक तय हो गई है। बुधवार को दोनों नेता मुलाक़ात करेंगे। एनसीपी ने कहा है कि ये बैठक किसानों के मुद्दे पर होगी। आज राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लगाने की रिपोर्ट भी सदन के टेबल पर रखेंगे। महाराष्ट्र में फ़िलहाल राष्ट्रपति शासन लगा हुआ है। अब देखना यह है कि दिल्ली में एनसीपी और कॉन्ग्रेस के नेताओं के बीच होने वाली बैठक में क्या नतीजा निकलता है?

इन सियासी हलचलों के बीच राउत ने कहा है कि अगले 5-6 दिन में सरकार बन जाएगी। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में जो भी समस्याएँ आई हैं, वो सभी अगले कुछ दिनों में ख़त्म हो जाएँगी।

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जलियाँवाला बाग़ ट्रस्ट अब कॉन्ग्रेस की बपौती नहीं, शहीदों के परिजनों को भी मिलेगी जगह

पंजाब के अमृतसर स्थित ऐतिहासिक जालियॉंवाला बाग के प्रबंधन से संबंधित ट्रस्ट अब कान्ग्रेस की बपौती नहीं रही। राज्यसभा ने मंगलवार को जालियॉंवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक-2019 को मंजूरी दी। लोकसभा में यह पहले ही पास हो चुका है। इस संशोधन के बाद ट्रस्ट में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के होने की अनिवार्यता समाप्त हो गई है। अब इसकी जगह लोकसभा में विपक्ष के नेता या सबसे बड़े दल के नेता को सदस्य बनाया जाएगा। सरकार ने बताया है कि 2023 में मौजूदा न्यास का कार्यकाल समाप्त होने पर नए सदस्यों में शहीदों के परिजन भी होंगे।

राज्यसभा में इसे ध्वनिमत से पारित किया गया। विपक्ष ने इस संशोधन पर आपत्ति जताते हुए सरकार पर इतिहास को नए सिरे से लिखने का आरोप लगाया। विधेयक में एक संशोधन भी कॉन्ग्रेस के एस रेड्डी की ओर से लाया गया था। हालॉंकि बाद में उन्होंने इसे वापस ले लिया। सरकार ने विपक्ष के आरोपों को यह कहते हुए नकार दिया कि आजादी की साझा लड़ाई पर किसी एक दल का अधिकार नहीं हो सकता है।

संस्कृति मंत्रालय ने एक बयान जारी कर कहा है कि इस बिल का मकसद जालियाँवाला बाग़ प्रबंधक ट्रस्ट को राजनीति से दूर रखना है। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने कहा कि ट्रस्ट का राजनीतिकरण हो गया था जो इस विधेयक से ख़त्म हो गया है।

कॉन्ग्रेस पर तंज कसते हुए पटेल ने कहा कि विपक्षी नेताओं को इस बिल से कोई ऐतराज नहीं है। पटेल ने पूछा कि आज तक कॉन्ग्रेस पार्टी ने ‘जलियाँवाला बाग़ मेमोरियल ट्रस्ट’ को कितने रुपए दिए हैं? पटेल ने कहा कि ट्रस्ट में उन्हीं लोगों को स्थान मिलना चाहिए, जिन्हें जनता ने चुना है। वहीं कम्युनिस्ट पार्टी ने सरकार के इस क़दम का विरोध किया। सीपीआई नेता विनय विश्वम ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में महात्मा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। दोनों ही कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे थे। सीपीआई ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार इतिहास को फिर से ग़लत तरीके से लिखने का प्रयास कर रही है। कॉन्ग्रेस नेता प्रताप सिंह बाजवा ने कहा कि केंद्र सरकार को उदारता दिखाते हुए स्वतंत्रता संग्राम में कॉन्ग्रेस के योगदान का सम्मान करना चाहिए।

जालियाँवाला बाग़ ट्रस्ट बिल पर राज्यसभा में केंद्रीय संस्कृति मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल का बयान

गौरतलब है कि अप्रैल 13, 2019 को जलियाँवाला बाग़ में जनरल डायर के आदेश पर निर्दोष लोगों पर ताबड़तोड़ गोलीबारी की गई थी। इस नृशंस नरसंहार में सैकड़ों लोग मारे गए थे। इनमें कई बच्चे भी थे। मारे जाने वालों में वृद्ध और महिलाएँ भी शामिल थीं। ख़ुद डायर ने स्वीकार किया था कि उनकी पलटन ने 1700 राउंड फायरिंग की थी। बलिदानियों की याद में बाग का प्रबंधन देखने के लिए ट्रस्ट की स्थापना 1921 में की गई थी। आजादी के बाद 1951 में नए ट्रस्ट का गठन किया गया था।

मैकाले-मैक्समूलर के जले हिन्दू को ‘फिरोज खान’ फूँक-फूँक कर पीना चाहिए

बीएचयू में धर्मशास्त्र के मुस्लिम टीचर के मामले की गंभीरता को बहुत सारे हिंदूवादी भी नहीं समझ पा रहे हैं। गलती उनकी नहीं है। गलती हमारी शिक्षा व्यवस्था की है, जिसने हमें ज्ञान तो बहुत दिया लेकिन संदर्भों से काट दिया। हिंदुओं में जाति व्यवस्था जैसी ढेरों बुराइयों की जड़ में यही असली कारण है। इसे समझने के लिए हमें नीचे के बिंदुओं को ध्यान से पढ़ना होगा:

  • 1832 में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में संस्कृत की चेयर शुरू की गई थी। इसमें मैक्समूलर को संस्कृत ग्रन्थों खास तौर पर वेदों के अनुवाद का काम सौंपा गया।
  • जब यह खबर महर्षि दयानंद तक पहुंची तो उन्होंने इसका विरोध करते हुए लिखा- “यस्मिन् देशे द्रुमो नास्ति तत्रैरण्डोऽपि द्रुमायते” यानी जिन देशों में विशाल वृक्ष नहीं होते, वहां के लोग अरंड (Castor) की झाड़ियों को ही पेड़ समझते हैं।
  • तब के महान क्रांतिकारी और वकील श्यामजी कृष्ण वर्मा ने भी इसका विरोध किया था। मोदी जी अक्सर श्यामजी कृष्ण वर्मा का जिक्र करते रहते हैं।
  • विरोध का कोई नतीजा नहीं हुआ। वेदों से लेकर मनुस्मृति तक के कई श्लोकों का अनुवाद ब्रिटिश और जर्मन लोगों ने किया।
  • उनकी जितनी समझ थी उन्होंने हमारे धर्मग्रंथों को वैसा ही समझा और फिर वही अधकचरा ज्ञान हमें स्कूलों-कॉलेजों के जरिए पिला दिया गया।
  • इन अंग्रेज विद्वानों ने जो सबसे बड़ा झूठ गढ़ा वो ये कि संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा है। संस्कृत की जड़ में डाला गया ये वो मट्ठा था, जिसका नतीजा है कि यह भाषा लुप्त होने की कगार पर है।
  • यह झूठ भी मैक्समूलर ने गढ़ा था कि वेद सुनने वाले ‘निम्न जाति’ के लोगों के कानों में पिघला शीशा डालने को कहा गया है। अगर ऐसा है तो वाल्मीकि, द्वैपायन व्यास जैसे लोग महाऋषि कैसे बन गए?
  • अंग्रेज विद्वानों ने संदर्भ समझे बिना अधकचरे अनुवादों से साबित कर दिया कि संस्कृत धर्मग्रंथों में दलितों का बहुत अपमान किया गया है।
  • मैक्समूलर जैसे विद्वान समझ ही नहीं पाए कि उपनिषदों में जिस ‘ब्रह्म’ की बात की गई है वो और ब्राह्मण अलग-अलग हैं।
  • ईशवास्य उपनिषद में तो कर्मकांडी ब्राह्मणों को असुर तक कहा गया है। तो क्या उपनिषदों को ब्राह्मणों का विरोधी कहा जाए?
  • मैक्समूलर ने कई जगहों पर लिखा है कि “वेद प्राचीन भारतीय गड़रियों के गीत हैं”। हमने उसे वैसा ही मान लिया।
  • वेदों, उपनिषदों का यही अधकचरा अनुवाद आर्य और द्रविड़ के बँटवारे का आधार बना।
  • भारतीय संस्कृति के खिलाफ मैक्समूलर और मैकाले का ये खेल जिन दिनों चल रहा था उन्हीं दिनों के महामना मदन मोहन मालवीय ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय की कल्पना की थी।
  • उन्हें पता था कि प्राचीन भारतीय ज्ञान पर मौलिक शोध जरूरी है, इसलिए उन्होंने इस काम के लिए जो फैकल्टी बनाई उसमें गैर-सनातन धर्मों के लोगों के प्रवेश पर भी पाबंदी लगा दी।
  • कई लोगों के मुताबिक अगर मालवीय जी धर्मांध या Bigot होते तो यही पाबंदी वो पूरे बीएचयू में लगा सकते थे।
  • अगर किसी फिरोज खान को हिंदू धर्म की शिक्षा देने की जिम्मेदारी दी जा रही है तो क्या यह पूछा नहीं जाना चाहिए कि मालवीय जी के आदेश का क्या होगा?
  • फिरोज खान जिस धर्म से ताल्लुक रखते हैं वो हिंदुओं को काफिर और वाजिबुल कत्ल मानता है। अगर वो इससे सहमत नहीं हैं तो घर वापसी कर लें।
  • अगर वो इस्लाम में बने रहते हुए हिंदुओं को धर्म सिखाएंगे तो क्या गारंटी है कि उनकी शिक्षा में पूर्वाग्रह और मिलावट नहीं होगी?

हिंदू धर्म मैकाले और मैक्समूलर का जला है इसलिए फिरोज खान को फूँक-फूँक कर पीना चाहिए। इस विषय में विस्तार से जानकारी के लिए राजीव मल्होत्रा की पुस्तक ‘द बैटल फॉर संस्कृत’ पढ़ें। आँखें खुल जाएँगी कि एक समाज के तौर पर हम कितने बड़े सांस्कृतिक हमले के बीच में हैं।

(यह लेख चंद्र प्रकाश जी के फेसबुक पोस्ट से ली गई है)

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पवार क्या कहते हैं यह समझने के लिए 100 जन्म लेने पड़ेंगे: शिवसेना

महाराष्ट्र में भाजपा से गठबंधन तोड़ने के बाद सरकार बनाने के लिए एनसीपी का मुँह ताक रही शिवसेना के नेता संजय राउत ने शरद पवार को लेकर एक बड़ा बयान दिया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक शिवसेना से राज्यसभा सांसद संजय राउत ने दिल्ली स्थित अपने आवास पर मीडिया से बातचीत करते हुए कहा था कि “पवार क्या कहते हैं यह समझने के लिए 100 जन्म लेने पड़ेंगे।”

दरअसल राउत ने ऐसा तब कहा जब उनसे महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर शरद पवार के यू-टर्न लेने पर सवाल पूछा गया। बता दें कि महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए शिवसेना के एनसीपी से गठबंधन की भी खबर सामने आई थी। मगर इस पर एनसीपी ने खुद सोनिया गाँधी और उनकी पार्टी का मुँह ताकना शुरू कर दिया।

राउत ने आगे कहा, “आपको पवार और हमारे गठबंधन को लेकर चिंता करने की जरूरत नहीं। दिसंबर की शुरुआत में महाराष्ट्र में शिवसेना की एक स्थिर सरकार बनेगी। उन्होंने कहा कि सरकार गठन को लेकर शिवसेना को किसी भी तरह का कोई संदेह नहीं है, उलटे उन्होंने मीडिया पर ही संदेह पैदा करने का आरोप लगाया। राउत ने बातचीत के दौरान यह भी बताया कि महाराष्ट्र के किसानों के मुद्दों पर एनसीपी अध्यक्ष से उनकी चर्चा भी हुई थी। वहीं नरेंद्र मोदी और पवार को लेकर राउत ने कहा, “क्या गलत है कि अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पवार की तारीफ कर दी? इससे पहले मोदी ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि पवार उनके राजनीतिक गुरु हैं। इसलिए इसमें कोई राजनीति न देखें।”

सोमवार को एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से मिलने पहुँचे थे। दोनों पार्टियों के अध्यक्षों की इस मुलाक़ात की बाद महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर अटकलें तेज़ हो गई थीं। मगर इसके बावजूद उन्होने राज्य में शिवसेना को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने जैसी किसी भी बात को लेकर कुछ कहा तक नहीं।

बता दें कि 288 सीट वाली महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में 105 सीट के साथ भाजपा ने सबसे बड़े दल के रूप जीत दर्ज की थी मगर सरकार बनाने के लिए ज़रूरी बहुमत नहीं जुटा पाई थी। वहीं भाजपा के साथ चुनाव पूर्व गठबंधन के साथ इस चुनाव में उतरी शिवसेना को कुल 56 सीटें मिली थीं। जबकि एनसीपी को 44 और कॉन्ग्रेस को कुल 4 सीट मिली थीं। इसके बाद भाजपा और शिवसेना के बीच उद्धव ठाकरे के 50-50 प्लान पर मतभेद गहरा गए थे।इसके बाद ही शिवसेना ने भाजपा को समर्थन न देने का ऐलान कर दिया था।

‘BHU में स्नातक के इतिहास के कोर्स से रामायण, महाभारत और वैदिक काल हटा’; PRO ने कहा अफवाह है

बीएचयू यानी बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के प्रशासन ने इतिहास के कोर्स से रामायण और महाभारत को बाहर कर दिया है। हाल ही में संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में उठे विवाद से बीएचयू अभी निकल भी नहीं पाया है कि एक बार फिर से बीएचयू में हंगामा खड़ा हो गया है। दरअसल बीचयू के इतिहास विभाग ने बीए कोर्स से रामायण, महाभारत और वैदिक काल के अध्याय को हटा दिया है। इस फैसले के बाद से ही छात्रों में विश्वविद्यालय प्रशासन और वाईसचांसलर के खिलाफ काफी रोष है। इस मामले को लेकर उन्होंने विभागाध्यक्ष से भी आपत्ति दर्ज कराई है।

शाम में कुछ मीडिया में ऐसी खबरें आ रही थीं कि यूनिवर्सिटी में रामायण और महाभारत से जुड़े अध्यायों को हटाया जा रहा है। विश्वविद्यालय के पब्लिक रिलेशन ऑफिसर ने कहा है कि यह कोरी अफवाह है। उन्होंने आगे बताया कि कोर्स में किसी भी तरह का बदलाव एकेडमिक काउंसिल करती है, और ऐसा अभी कुछ नहीं हुआ है। उनके अनुसार यह सब विश्वविद्यालय को बदनाम करने की साजिश है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक छात्रों द्वारा इस मुद्दे पर आपत्ति जताने के बाद, इस विषय को लेकर बैठक शुरू हो गई है। इस सब के बीच विश्वविद्यालय परिसर पहले से ही एक प्रोफेसर फिरोज खान की नियुक्ति को लेकर काफी अशांत है। डॉ फ़िरोज़ खान की नियुक्ति के विरोध में धरना जारी है और विश्वविद्यालय प्रशासन अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुँच सका है।

वहीं इस विवाद पर छात्रों का भी गुस्सा जमकर फूटा है। फ़िरोज़ खान की नियुक्ति पर उपजे इस विवाद के चलते संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय पर पिछले 13 दिन से ताला लटका हुआ है। सम्भावना जताई जा रही है कि अगर बीएचयू में इतिहास के कोर्स से रामायण, महाभारत और वैदिक इतिहास को हटाने के मामले में अगर विवाद बढ़ता है तो आने वाले वक़्त में प्रशासन और छात्र एक बार फिर आमने-सामने होंगे।

कल ही में बीएचयू परिसर इससे पहले भी एक अन्य घटना के चलते सुर्ख़ियों में था। जब स्वतंत्रता संग्राम सेनानी सावरकर की तस्वीर को किसी उत्पाती ने उखाड़ कर फेंक दिया था। इस घटना के सर्वप्रथम एमए में पढ़ने वाले छात्रों का ध्यान इसकी ओर गया था। बाद में इस मामले की शिकायत की गई और जाँच के लिए तीन सदस्यीय कमिटी का गठन भी किया गया है।

नोट: इस रिपोर्ट को नई सूचनाओं के आलोक में अपडेट किया गया है।

‘द-हिन्दू’ के साथ मिलकर प्रधानमंत्री मातृत्व योजना के खिलाफ ‘फेक न्यूज’ फैला रहे हैं ज्याँ द्रेज़: झूठ उजागर

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मातृ वंदना योजना को लेकर द हिन्दू अख़बार में आज एक ओपेड ‘द मदर ऑफ़ ऑल इश्यूज’ छपा। इस आर्टिकल में बताई गई जानकारी, ग्राफ से लेकर इसकी हेडलाइन तक संदिग्ध है। जब द हिन्दू में छपे इस लेख की जाँच विस्तार से की गई तो मालूम चला कि इसमें बहुत कुछ भ्रामक कहा गया है, इनके द्वारा दी गई जानकारी पर नज़र डालें तो भारत में बच्चों के पैदा होने की सालाना दर 270 लाख है, जिनमें आधे से भी कम केस वह हैं जहाँ कोई स्त्री पहली बार माँ बनी है। इस तरह के लोगों की तादाद 123 लाख यानी 1.2 करोड़ बताई गई है। इसका मतलब यह है कि आर्टिकल के अनुसार इस साल देश में करीब 1.2 करोड़ महिलाएँ पहली बार माँ बनी हैं। इस लिहाज़ से उन सभी को पीएम की मातृ वंदना योजना यानी पीएमएमवीवाई से लाभ पहुँचना चाहिए।

मगर इन 1.2 करोड़ महिलाओं के बीच सिर्फ 60 लाख ही ऐसी हैं जिन तक यह मदद पहुँच सकी है, रिपोर्ट के मुताबिक इन 60 लाख में भी सिर्फ 38 लाख ऐसी महिलाएँ हैं जिन्हें इस स्कीम के तहत पूरा पैसा मिल सका है। यह संख्या कुल महिलाओं की सिर्फ 31 फीसदी हैं।

दरअसल इस लेख को लिखने वाले और कोई नहीं बल्कि सोनिया गाँधी के करीबी ज्यां द्रेज़ हैं। ज्यां 2010 से लेकर 2014 तक मनमोहन सिंह के नेतृत्त्व वाली यूपीए सरकार में एनएसी के सदस्य भी रह चुके हैं।

एक मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इन भ्रामक तथ्यों का खंडन किया जाना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि इस आर्टिकल को लिखने वाले से लेकर एडिट कर छपने भेजने वाले तक के पास यह ज्ञान भी नहीं था कि इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए सभी 1.2 करोड़ महिलाओं में नियमानुसार सब इसका फायदा उठाने के लिए अधिकृत नहीं हैं। इस बात को जानकर एक बड़ा सवाल भी खड़ा होता है कि ज्यां द्रेज़ और उनकी बात पर हामी भरने वाले लोग आखिर क्यों चाहते हैं कि भारत सरकार उन महिलाओं को 6000 रूपए दे जो अपने बल पर अच्छी स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ उठाने में सक्षम हैं।

इससे यह साफ हो जाता है कि इस लेख को लिखने वाले द्रेज़ को इस योजना के बारे में ज्यादा कुछ जानकारी नहीं है। दरअसल यह स्कीम गरीब और निर्धन परिवारों के लिए ही केन्द्रित है। इसके तहत सरकार उन्हें 6000 रुपए की मदद मुहैय्या कराती है। इस दौरान उन्हें 2000 रूपए की तीन इनस्टॉलमेंट दी जाती है।

यह रकम माँ बनने वाली स्त्री के लिए यह उस समय हुए नुकसान की भरपाई होती है जब वह गर्भवती होती है। इस अवस्था में उसे आराम की सख्त ज़रूरत होती है। यही वजह है कि इस दौरान गरीब परिवार की कामकाजी महिलाएँ घर से बाहर निकलकर पैसा कमाने के लिए शारीरिक रूप से सक्षम नहीं होतीं। इसके नियमानुसार महिला बच्चे को जन्म देने के पहले और बाद में आराम कर सकती है। इस योजना के लिए जिन 90 फीसदी महिलाओं ने आवेदन किया उन्हें पहली इनस्टॉलमेंट दी जा चुकी है। वहीं आवेदन करने वाली 60 फीसद महिलाएँ ऐसी हैं जिन्हें सारी तीन इनस्टॉलमेंट मिल चुकी हैं।

इससे साफ़ पता चलता है कि ज्यां द्रेज़ ने इन सभी बिन्दुओं पर ध्यान ही नहीं दिया है। अपने इस लेख में द्रेज़ ने सरकार की एक योजना को गलत ढंग से पेश किया है ताकि नरेंद्र मोदी सरकार को बदनाम किया जा सके। हैरानी इस बात पर होती है कि द हिन्दू अखबार ने झूठ और संदिग्ध तथ्यों से भरे इस लेख को लिखने वाले ज्यां द्रेज़ को रिसर्चर और डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट यानी विकासशील अर्थशास्त्री की संज्ञा तक दे डाली।

पीएम की मातृ वंदना योजना के प्रावधान को सुनकर कई लोगों के मन में यह सवाल उठाना वाजिब है कि क्या 6000 रुपए की धनराशि एक गर्भवती स्त्री के लिए पर्याप्त मदद है। बता दें कि गर्भवती स्त्रियों की मदद के लिए सिर्फ इतना ही प्रावधान भर नहीं है। इस सम्बन्ध में भारत सरकार की एक अन्य योजना संचालित होती है। इस योजना का नाम ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’ है। इस योजना के तहत नियमित रूपसे हर महीने की 9 तारीख को गर्भवती महिला की देखभाल की जाती है। सबसे ख़ास बात तो यह है कि इस योजना के तहत गर्भवती स्त्री को मिलने वाली सभी सुविधाओं के लिए कोई पैसा नहीं खर्चा करना पड़ता।

ज्यां द्रेज़ को इस बात से शिकायत है कि इस योजना के लिए लाभार्थी को फॉर्म भरने से लेकर आधार डिटेल जैसी फॉर्मेलिटी को पूरी करना पड़ता है। यह सब कहते वक़्त ज्यां इस बात को भूल गए कि आधार को लिंक कर देने के बाद से किसी भी योजना में अब घपले की गुंजाईश नहीं बची है। सरकार के इस कदम के बाद ज़रुरतमंद का हक मारकर अपनी दुकान चलाने वाले बिचौलियों का भी सफाया हो चुका है। बता दें कि आधार के लागू होने के बाद से किसी भी सरकारी योजना से मिलने वाला लाभ सीधे लाभार्थी तक पहुँचता है। यही वजह कि सरकार ने आधार को लगभग हर क्षेत्र में अनिवार्य कर दिया है।