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अमेठी के DM पर UP सरकार की गिरी गाज, मृतक के भाई और PCS अधिकारी का पकड़ा था कॉलर

उत्तर प्रदेश के अमेठी में कल भाजपा नेता के बेटे सोनू सिंह की हत्या के बाद जिलाधिकारी प्रशांत कुमार का एक वीडियो सामने आया। इस 1 मिनट 2 सेकेंड के वीडियो क्लिप में वे पीसीएस अधिकारी एवं मृतक के भाई सुनील सिंह के साथ दुर्व्यवहार करते नजर आए। देखते ही देखते ये वीडियो वायरल हो गया और मीडिया में डीएम के ख़िलाफ़ खबरें चलने लगीं। सोशल मीडिया पर भी लोग इस वीडियो को शेयर करने लगे।

लगातार आती शिकायतों के बाद क्षेत्र की सांसद स्मृति इरानी ने भी इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने जिलाधिकारी प्रशांत कुमार को ट्वीट कर समझाया, “विनय शील एवं संवेदनशील बनें हम, यही प्रयास होना चाहिए। जनता के हम सेवक है, शासक नहीं।”

हालाँकि थोड़ी देर बाद इस पूरे मामले पर डीएम ने अपनी ओर से मृतक के भाई का एक वीडियो शेयर किया। जिसमें वे मीडिया को संदेश देते नजर आए कि जैसा वायरल वीडियो में दिखाया जा रहा है कि डीएम उनके साथ अभद्रता कर रहे हैं, वैसा बिलकुल भी नहीं है। ये वीडियो एडिटेड है। सुनील वीडियो में कहते सुने जा सकते हैं कि डीएम ने उनकी सभी समस्याओं को ढंग से सुना-देखा और हर संभव मदद करने का आदेश दिया। उन्होंने कहा कि उनके जिलाधिकारी से कई वर्षों से व्यक्तिगत संबंध हैं।

इस वीडियो को डीएम ने ट्वीट कर शेयर किया और सुनील सिंह को धन्यवाद दिया। उन्होंने लिखा- “सुनील सिंह, सच बोलने के लिए शुक्रिया। अमेठी प्रशासन हमेशा आपके साथ है।” इसके बाद उन्होंने इस ट्वीट के नीचे मीडिया के नाम भी अपना संदेश दिया। जिसमें लिखा था कि मीडिया जनतंत्र का एक महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन कुछ शरारती तत्वों द्वारा कभी-कभी मीडिया को भी गलत सूचना मिल सकती है। वीडियो एडिट कर गलत अफवाह उड़ाई जा सकती है।

लेकिन बेचारे डीएम साहब को इतना सब कुछ करने के बाद भी फायदा नहीं मिला। अब ताजा जानकारी के मुताबिक, पीसीएस अधिकारी सुनील सिंह के बयान का डीएम को कोई फायदा नहीं पहुँचा है और सरकार ने उन्हें उनके पद से हटा दिया है। अब जिले के नए डीएम अरुण कुमार होंगे।

बताया जा रहा है कि डीएम पर ये पूरी कार्रवाई योगी आदित्यनाथ द्वारा मामले का संज्ञान लेने के बाद की गई है। जिसमें प्रशांत को उनके पद से हटाकर वेटिंग सूची में डाला गया और अरुण कुमार को वहाँ तैनात कर दिया गया है।

बता दें कि ये पहली बार नहीं है जब प्रशांत कुमार विवादों में आए हों, इससे पहले भी उन पर बीते दिनों कोर्ट की अवमानना करने का आरोप भी लगा था। इसके अलावा इसी साल जनवरी में गलत जानकारी देने के आरोप में उन पर गैर-जमानती वारंट भी जारी हो चुका है।

अपने ही प्रोफेसर को टोकने वाले, प्रिंसिपल के सामने रिकॉर्ड तोड़ने वाले वशिष्ठ नारायण… अब नहीं रहे?

आइंस्टीन की थ्योरी को चुनौती देने वाले प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह का आज देहांत हो गया। बिहार से निकलकर कैलिफॉर्निया में अपनी पीएचडी पूरी कर नासा में सेवा प्रदान करने वाले गणितज्ञ अब हमारे बीच नहीं है। हालाँकि ये सच है कि उनकी उपलब्धियाँ न केवल बिहार बल्कि पूरे भारत को हमेशा गौरवान्वित करेंगी। लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि इतने काबिल शख्सियत होने के बाद भी उन्होंने लंबे समय तक बीमारी के कारण गुमनामी की जिंदगी जी, फिर भी उनका इलाज संभव नहीं हुआ। डॉ वशिष्ठ नारायण की कामयाबियाँ किसी भी व्यक्ति के लिए आदर्शों का प्रतीक हो सकती है, लेकिन उनकी जिंदगी सिर्फ़ विचार का विषय…

बिहार के भोजपुर जिले के बसंतपुर में 2 अप्रैल 1942 को पैदा हुए डॉ वशिष्ठ नारायण सिंह न केवल अपने हुनर से एक महान गणितज्ञ बने, बल्कि वो पूरे विश्व में भी विख्यात हुए। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। करीब 45 साल पहले उन्हें मानसिक बीमारी सिजोफ्रेनिया ने घेर लिया और धीरे-धीरे उनकी स्थिति ये हो गई कि वो एक अपार्टमेंट के भीतर गुमनामी का जीवन बिताने लगे।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार पटना में रहने वाले उनके भाई अयोध्या सिंह ने डॉ वशिष्ठ नारायण के बारे में जानकारी साझा करते हुए बताया था कि जब वह अमेरिका से लौटे थे, तो करीब 10 बक्से किताबें लाए थे। जिन्हें वे बीमार होने के बाद भी पढ़ते रहे। इसके अलावा उनके भाई ने ये भी बताया था कि लंबे समय से बीमार होने के बावजूद भी उनका आखिर तक किताब, कॉपी और पेंसिल से मोह नहीं छूटा। स्थिति ये थी उनके लिए किसी छोटे बच्चे की तरह हर 3-4 दिन में एक बार कॉपी पेंसिल खरीदनी पड़ती थी।

मशहूर गणितज्ञ भले ही आज हमारे बीच से चले गए। लेकिन शायद ही कोई ऐसा शख्स हो जो इस बात को भूल पाए कि उन्होंने महान वैज्ञानिक आइंस्टीन के सापेक्ष सिद्धांत को खुली चुनौती दे दी थी। इतना ही नहीं, उन्हें लेकर ये किस्सा भी बहुत मशहूर है कि नासा में एक बार अपोलो की लॉन्चिंग से ठीक पहले 31 कंप्यूटर कुछ देर के लिए बंद हो गए थे, ऐसे में उनके द्वारा किया गया सारा कैल्कुलेशन और कंप्यूटर्स के ठीक होने के बाद किया गया कैल्कुलेशन बिलकुल एक था।

वो कहावत है न कि पूत के पाँव पालने में ही दिख जाते हैं। डॉ वशिष्ठ नारायण का जीवन बिलकुल ऐसा ही था। बताया जाता है कि जब वे पटना साइंस कॉलेज में पढ़ते थे, तब अपने गणित के अध्यापक को अक्सर टोक देते थे। इसका मालूम जब कॉलेज के प्रिंसिपल को चला तो उनकी अलग से परीक्षा से ली गई। नतीजा जब आया तो वशिष्ठ नारायण सारे अकादमिक रिकॉर्ड तोड़ चुके थे।

नाकामयाब होने के पीछे अक्सर लोगों को कहते सुनते हैं कि घर की हालत के कारण वो आगे नहीं बढ़ पाए, लेकिन डॉ वशिष्ठ नारायण ऐसे उदाहरण थे, जिनसे हर किसी को सीख लेनी चाहिए। पाँच भाई-बहनों के उनके परिवार में हमेशा आर्थिक तंगी रहती थी, लेकिन फिर भी वो स्थितियों से जूझे और अपनी प्रतिभा पर कभी आँच नहीं आने दिया।

साल 1965 में पटना कॉलेज ऑफ साइंस में पढ़ने के दौरान जब कैलिफोर्निया के प्रोफेसर जॉन कैली की नजर उन पर पड़ी, तो वह उनकी प्रतिभा देखकर अचंभित रह गए। वे नारायण वशिष्ठ से इतने प्रभावित हुए कि अपने साथ कैलिफोर्निया लेकर चले गए। वहाँ 1969 तक उन्होंने अपनी पीएचडी की और कुछ दिन बाद वॉशिंगटन विश्वविद्यालय में एसोसिएट प्रोफेसर बन गए। उन्होंने इस बीच नासा में भी काम किया, लेकिन मन उनका भारत में लगा रहा।

1971 में वे भारत लौट आए और पहले आईआईटी कानपुर, फिर आईआईटी बंबई और फिर आईएसआई कोलकाता में अपनी सेवाएँ प्रदान कीं। साल 1973 में उन्होंने वंदना रानी सिंह नाम की महिला से शादी की। जिसके बाद ही उनके आसामान्य व्यवहार के बारे में लोगों को पता चलना शुरू हुआ।

उनके घरवाले बताते हैं कि वे छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाते थे, पूरा घर सिर पर उठा लेते थे, कमरा बंद करके सिर्फ़ पढ़ते रहते थे, रात भर जगते थे। इसके अलावा वह कुछ दवाइयाँ भी खाते थे, लेकिन जब उनसे सवाल किया जाता था कि ये किस चीज की है तो वह उस बात को टाल देते थे।

धीरे-धीरे उनकी पत्नी वंदना उनसे परेशान हो गईं और उन्हें तलाक दे दिया। डॉ वशिष्ठ नारायण के जीवन में यह बहुत बड़ा झटका था। क्योंकि इसी दौरान वह आईएसआई कोलकाता में अपने सहयोगियों के बर्ताव से भी परेशान थे।

वशिष्ठ नारायण सिंह के भाई अय़ोध्या सिंह ने इस बात को बताया कि उनके साथी प्रोफेसर्स ने उनके शोध को अपने नाम से छपवा लिया था, जिसे सोच-सोच कर उन्हें बहुत दिक्कत होती थी। उनकी स्थिति दिन पर दिन बिगड़ती जा रही थी। 1974 में उन्हें पहला दौरा पड़ा। जिसके बाद उनका इलाज शुरू हुआ। जब बहुत दिन तक उपचार से उनमें सुधार नहीं दिखा तो 1976 में उन्हें राँची में भर्ती करवा दिया गया।

परिवार गरीबी से लाचार था और सरकार की तरफ से मदद बहुत कम मिल रही थी। नतीजतन 1987 में वह अपने गाँव लौट आए और 1989 में अचानक गायब हो गए। करीब चार साल बाद 1993 में बेहद दयनीय हालत में डोरीगंज, सारण में पाए गए। धीरे-धीरे उनका परिवार उनके इलाज को लेकर नाउम्मीद हो गया और वह गुमनामी में जीवन बिताने लगे।

अभी कुछ समय पहले खबर आई थी कि वह पीएमसीएच के आईसीयू वार्ड में भी भर्ती थे, जहाँ से ठीक होने के बाद उन्हें 10 अक्टूबर को ही छुट्टी मिली थी। लेकिन करीब एक महीने बाद ही आज उनके देहांत की दुखद खबर आ गई।

आज 14 नवंबर बाल दिवस के अवसर पर एक महान गणितज्ञ, भारत के गौरव, कइयों के आदर्श अपनी देह त्याग कर जा चुके हैं। अब उनके पीछे रह गई है तो सिर्फ उनकी किताबें, उनके बक्से, उनकी कलम। जो रह-रह कर उनके घरवालों को डरा रहे होंगे कि क्या अब ये सब रद्दी हो जाएगा? असल मायने में डर तो खैर उस विज्ञान-जगत को लगना चाहिए, जिसने वशिष्ठ बाबू की मौत से काफी पहले काफी कुछ खो दिया था – उनके इलाज के लिए सामूहिक प्रयास न करके, उनको उनके हाल पर छोड़ देने के लिए!

राफ़ेल पर राहुल गाँधी को चेतावनी, विपक्ष और स्वघोषित ‘डिफेंस-एक्सपर्ट’ लोगों को SC से करारा झटका

सुप्रीम कोर्ट ने राफ़ेल विमान सौदे को लेकर उछल-कूद मचा रहे विपक्ष और स्वघोषित डिफेंस-एक्सपर्ट लोगों को करारा झटका दिया है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अगुवाई वाली बेंच ने राफेल मामले में दायर की गईं सभी पुनर्विचार याचिकाओं को ख़ारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर फ़ैसला सुनाते हुए याचिकाकर्ताओं के द्वारा सौदे की प्रक्रिया में गड़बड़ी की दलीलें को ख़ारिज कर दिया।

राफेल संबंधी एक अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कॉन्ग्रेस नेता राहुल गाँधी को नसीहत देते हुए कहा कि प्रधानमंत्री मोदी पर उनके बयान दुर्भाग्यपूर्ण थे। लेकिन राहुल गाँधी के लिए राहत की बात यह रही कि सुप्रीम कोर्ट ने उनके ख़िलाफ़ अवमानना नोटिस को निरस्त कर दिया, लेकिन चेतावनी के साथ। कोर्ट ने राहुल गाँधी को चेतावनी दी है कि उन्हें भविष्य में कोर्ट के फ़़ैसलों से संबंधी बातों पर ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है। आपको बता दें कि ‘चौकीदार चोर है’ बयान पर राहुल ने माफी माँग ली थी।

इससे पहले राफ़ेल डील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 14 दिसंबर, 2018 को दिए अपने फ़ैसले में केंद्र सरकार को क्लीन चिट दे दी थी। हालाँकि, इस फ़ैसले की समीक्षा के लिए अदालत में कई याचिकाएँ दायर की गईं और 10 मई, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इन याचिकाओं पर अपना फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। 

फ्रांस से 36 राफ़ेल फाइटर जेट के भारत के सौदे को चुनौती देने वाली जिन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की, उनमें पूर्व मंत्री अरुण शौरी, यशवंत सिन्हा, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण और आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह की याचिकाएँ शामिल थीं। सभी याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से उसके पिछले साल के फ़ैसले की समीक्षा करने की अपील की थी। 

कोर्ट में दायर याचिका में राफ़ेल डील में भ्रष्टाचार के आरोप लगाए गए थे। साथ ही ‘लीक’ दस्तावेज़ों के हवाले से आरोप लगाया गया था कि डील में PMO ने रक्षा मंत्रालय को बगैर भरोसे में लिए अपनी ओर से बातचीत की थी। कोर्ट में विमान डील की क़ीमत को लेकर भी याचिका डाली गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फ़ैसले में कहा था कि बिना ठोस सबूतों के वह रक्षा सौदे में कोई भी दखल नहीं देगा।

ग़ौरतलब है कि चीफ जस्टिस ऑफ़ इंडिया रंजन गोगोई 17 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं, उससे पहले उनकी बेंच को कई बड़े फ़ैसले करने हैं।


सबरीमाला पर सुप्रीम कोर्ट में नहीं बनी सहमति: 3-2 में बँट गए जज, अब 7 जजों की पीठ करेगी फैसला

केरल के सबरीमाला मंदिर मामले में सुप्रीम कोर्ट निर्णायक फैसला नहीं सुना पाया। 5 जजों की पीठ में से 3 जज इस मामले को बड़ी पीठ के पास भेजे जाने के पक्ष में रहे जबकि 2 जजों ने इससे संबंधित याचिका पर ही सवाल उठा दिए।

सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के अवाला जस्टिस खानविलकर और जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने इस मामले को बड़ी बेंच के पास भेजने के पक्ष में अपना मत सुनाया। जबकि पीठ में मौजूद जस्टिस चंद्रचूड़ और जस्टिस नरीमन ने सबरीमाला समीक्षा याचिका पर असंतोष व्यक्त किया।

अंततः पीठ ने सबरीमाला मामले में फैसला सुनाने के लिए बड़ी पीठ (7 जजों की बेंच) को प्रेषित किया है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में इस पुनर्विचार याचिका को देखने वाली 5 जजों की बेंच में दो जजों की असहमति के बाद मामला बड़ी बेंच को भेजा गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल 28 सितंबर को केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को लिंग आधारित भेदभाव ठहराते हुए रद्द किया था। हालाँकि, ये फैसला 4-1 के बहुमत से था। जिसमें जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बहुमत से असहमति जताई थी। लेकिन फैसला आने के बाद अयप्पा अनुयायी इस फैसले का भारी विरोध करने लगे। नतीजतन इसके ख़िलाफ़ 55 पुनर्विचार याचिकाओं सहित कुल 65 याचिकाएँ कोर्ट में दर्ज हुईं। जिस पर सुनवाई करते हुए बीती 6 फरवरी को CJI गोगोई, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​ने 45 से अधिक समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

इस मामले से जुड़ीं भूमाता ब्रिगेड की प्रमुख तृप्ति देसाई ने कहा कि अब समय आ गया है कि पुराने रिवाज़ों को बदला जाए। महिलाओं पर पाबंदी लगाना असंवैधानिक है, गलत परंपरा को जारी नहीं रख सकते हैं। यह महिलाओं के अधिकार की बात है। 21वीं सदी में हम पितृसत्ता की पद्धति को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्होंने उम्मीद जताई थी कि महिला को पूजा करने और समानता के अधिकार के तहत सुप्रीम कोर्ट अपने फ़ैसले पर क़ायम रहेगा।

इससे पहले केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन की वामपंथी सरकार ने सबरीमाला के मुद्दे पर एक बार फिर से यू-टर्न लेते हुए कहा था कि उनकी सबरीमाला के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को लागू करने के लिए नीति निर्माण करेगी जिसके तहत सभी उम्र की महिलाएँ सबरीमाला मंदिर में प्रवेश करेंगी और वहाँ की मान्यता के अनुसार घुसकर उसे अपवित्र कर देंगी।

सबरीमाला के भक्तों पर अत्याचार करने के बाद केरल के वामपंथियों ने जून 2019 में केंद्र सरकार से सबरीमाला के रीति-रिवाज़ो की रक्षा करता एक कानून बनाने को कहा था। जबकि यू-टर्न ले लेने के बाद अब वही वामपंथी कह रहे हैं कि हम सुप्रीम कोर्ट 2018 का फैसला मानेंगे। बता दें कि सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले में कहा गया था की सभी महिलाओं को अय्यप्पा भगवान के मंदिर में प्रवेश दिया जाना चाहिए।

‘राम मंदिर की स्थापना तक नहीं पहनूँगा चप्पल’ – 18 साल से ‘तपस्या’ कर रहे बिहार के राम भक्त की कहानी

सदियों से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (9 नवंबर) को ऐतिहासिक फ़ैसला सुनाते हुए विवादित भूमि राम लला के हक़ में दिया। इस फ़ैसले पर वर्षों से राम भक्तों की नज़र टिकी हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले ने देश के कई राम भक्तों को सुकून पहुँचाने का काम किया। बिहार के किशनगंज में ऐसे ही एक राम भक्त हैं, जिन्होंने 18 साल पहले यह प्रण लिया था कि जब तक अयोध्या में राम मंदिर नहीं बन जाता तब तक वो नंगे पाँव रहेंगे।

समाचार एजेंसी ANI की एक रिपोर्ट के अनुसार, देव दास ने कहा,

“जब मैंने अयोध्या में भगवान राम को बिना चप्पल के देखा तो मैंने भी चप्पल नहीं पहनने का संकल्प लिया। शुरुआती दौर में नंगे पाँव चलना विशेष रूप से गर्मी के मौसम में बहुत मुश्किल था, लेकिन भगवान राम ने मुझे अपना संकल्प पूरा करने का साहस दिया।”

दिलचस्प बात यह है कि दास किशनगंज में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के ज़िला कार्यकारी होने के साथ ही एक किराने की दुकान भी चलाते हैं।

छात्रों को संबोधित करते राम भक्त देव दास (तस्वीर सौजन्य: न्यूज़-18)

दास ने कहा, “भगवान राम में मेरी असीम आस्था के कारण, सड़कों पर पड़े काँच के एक भी टुकड़े या कंकड़-पत्थर ने मुझे कभी चोट नहीं पहुँचाई। मेरा संकल्प तब पूरा होगा जब अयोध्या में राम मंदिर की स्थापना होगी। मैं ऐसा करने के बाद ही चप्पल पहनूँगा।”

एक अन्य निवासी, अमितेश कुमार साह ने ANI को बताया, “हम उन्हें बचपन के दिनों से देख रहे हैं। वह मेरे शिक्षक थे। हमें पता चला कि उन्होंने अयोध्या में राम मंदिर बनने तक चप्पल नहीं पहनने का संकल्प लिया था। वह बहुत अच्छे इंसान हैं।”

इतना ही नहीं देव दास अब तक 1800 से अधिक लोगों के दाह-संस्कार में शामिल हो कर ख़ुद काम करते हैं। शहर हो या गाँव उन्हें जब भी किसी की मृत्यु की ख़बर मिलती है तो वो ख़ुद उनके घर पहुँच जाते हैं और अंतिम संस्कार में लग जाते हैं। केवल इतना ही नहीं, ज़िले में किसी अज्ञात शव मिलने पर वे उनके दाह संस्कार कर रीति-रिवाज़ के साथ उनके अंतिम संस्कार की क्रिया भी ख़ुद ही सम्पन्न करवाते हैं। किशनगंज ज़िला मुख्यालय से लेकर सातों प्रखंड के एक-एक गाँव में बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक देव दास उर्फ़ देबू को देबु दा के नाम से जानते हैं।

ख़बर के अनुसार, देबु दा की का पूरे इलाक़े में लोग काफ़ी सम्मान करते हैं। लोगों को रक्तदान के प्रति जागरूरता करने के साथ-साथ वो ख़ुद भी रक्तदान करते हैं। उन्हें जिस परिवार से शादी-विवाह, जन्मदिन आदि का न्योता मिलता है, वो उस परिवार के सदस्यों से कम से कम पाँच पौधे लगवाने का प्रयास करते हैं। इसके अलावा वो अनाथाश्रम में बच्चों को योग आदि भी सिखाते हैं।

छात्रों के साथ देव दास उर्फ़ देबु दा (तस्वीर सौजन्य: upvartanews.com)

समाज सेवा को अपना धर्म मानने वाले 36 वर्षीय देव दास ब्रह्मचारी का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। साल 2001 में इंटर की परीक्षा पास करने के बाद उन्होंने संकल्प लिया था कि जब तक राम मंदिर का कार्य प्रशस्त नहीं हो जाता, जब तक वे चप्पल नहीं पहनेंगे। सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम लला के हक़ में फ़ैसला सुनाए जाने से उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं है, अपनी इसी ख़ुशी को बयाँ करते हुए उन्होंने कहा कि अब उनका संकल्प पूरा हो गया है।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था, वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

‘मोदी कर रहे भय और प्रतिशोध की राजनीति’ – पाकिस्तानी पापा की जानकारी छुपाने वाले पत्रकार ने उगला जहर

पत्रकार और लेखक आतिश तासीर, जिनकी भारतीय विदेशी नागरिकता (OCI) का दर्जा पिछले सप्ताह निरस्त कर दिया गया था, उन्होंने कहा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ऐसे रास्ते पर भारत का नेतृत्व कर रहे हैं जो भय, राजनीतिक प्रतिशोध और अल्पसंख्यक विरोधी वातावरण की ओर ले जा रहा है।

आतिश तासीर ने न्यूयॉर्क से इंडिया टुडे को दिए साक्षात्कार में कहा, “वो (PM मोदी) इसके वास्तुकार हैं और वो इसके जवाबदेह हैं।”

इंडिया टुडे के टीवी कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई से बात करते हुए, आतिश तासीर ने भारत के लोकतंत्र पर भी सवाल खड़े किए। बता दें कि टाइम्स मैगजीन की कवर स्टोरी लिखने वाले तासीर ने PM मोदी को डिवाइडर-इन-चीफ़ कहा था।

दरअसल, भारतीय गृह मंत्रालय ने ज़रूरी सूचनाएँ छिपाने के कारण आतिश का OCI स्टेटस समाप्त कर दिया था, क्योंकि उसने आवेदन दाखिल करते समय अपने पिता की पाकिस्तानी राष्ट्रीयता की जानकारी छिपाई थी। आतीश ने इस क़दम को एक राजनीतिक प्रतिशोध करार दिया।

आतिश तासीर ने कहा कि इस बात को प्रमाणित करने के लिए उनके पास एक ऐसा शख़्स है जो सरकार में काम करता है और उसने बताया कि उसकी नागरिकता स्टेटस को एक ऐसे व्यक्ति ने ख़त्म किया है जो PM मोदी को ख़ुश करना चाहता था।

आतिश तासीर ने कहा कि हालाँकि लेख का शीर्षक [डिवाइड-इन-चीफ़] पत्रिका द्वारा नहीं बल्कि ख़ुद उसके द्वारा चुना गया था, लेकिन यह सच था कि सरकार प्रतिशोध की राजनीति कर रही है और यह बात व्यवस्थित रूप से लेखकों और पत्रकारों के माध्यम से बाद सामने आ रही है।

इस सन्दर्भ में विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने इस बात से इनकार किया था कि सरकार टाइम पत्रिका में आलेख लिखने के बाद से आतीश तासीर के OCI कार्ड को रद्द करने पर विचार कर रही थी। इस आलेख में प्रधानमंत्री मोदी की आलोचना की गई थी। 

न्यूयॉर्क स्थित लेखक ने मोदी सरकार के इस दावे को ख़ारिज कर दिया कि उसके OCI दर्जे को निरस्त करने के पीछे कोई राजनीतिक कारण नहीं था और यह पूरी तरह से वैधानिक रूप से किया गया था, क्योंकि उसने अपने पिता के बारे में यह तथ्य छिपाया था कि वो पाकिस्तानी थे।

उसने कहा,

“मेरे दस्तावेज़ो को 2000 में मेरी माँ द्वारा दायर किया गया था। उन्होंने भारत में कई वर्षों तक मेरी परवरिश एकल माँ के रूप में की। मेरे माता-पिता की शादी नहीं हुई थी। कोई भी सभ्य सरकार जो प्रतिशोध नहीं लेना चाहती थी, वो आगे आ सकती थी और लापता दस्तावेज़ों या किसी विसंगति के बारे में स्पष्टीकरण माँग सकती थी।”

आतिश तासीर की माँ, तवलीन सिंह, एक प्रसिद्ध भारतीय लेखक और पत्रकार हैं। तासीर के पिता सलमान तासीर एक पाकिस्तानी लेखक और राजनीतिज्ञ थे।

आतीश तासीर ने कहा,

“मैं मोदी जी से अपील करूँगा कि वे प्रतिशोध की इस राजनीति को प्रोत्साहित न करें और यह देखने के लिए कहूँगा कि मैंने कुछ नहीं छिपाया है बल्कि मैं भारतीय मुद्दों में डूबा हुआ लेखक हूँ। और उनसे (PM मोदी) से यह विचार करने के लिए कहूँगा कि मेरी जैसी स्थिति के हर शख़्स को नागरिकता दी जानी चाहिए।” 

ग़ौरतलब है कि नागरिकता अधिनियम के तहत, अगर किसी व्यक्ति ने धोखे से, फ़र्ज़ीवाड़ा कर या तथ्य छुपा कर OCI कार्ड प्राप्त किया है तो OCI कार्ड धारक के रूप में उसका पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा और उसे ब्लैक लिस्ट में डाल दिया जाएगा। साथ ही, भविष्य में उसके भारत में प्रवेश करने पर भी रोक लग जाएगी।

182 कन्सेंट्रेशन कैंप, 209 जेल, 74 लेबर कैंप, 10 लाख+ हिरासत में: चीन में उइगर मुस्लिमों की स्थिति

चीन में उइगर मुस्लिमों पर होते अत्याचारों की सच्चाई अब किसी से छिपी नहीं हैं। हालिया जानकारी के अनुसार बीते दिनों उइगर कार्यकर्ताओं ने दावा किया है कि उन्होंने जातीय समूह को हिरासत में लेने के लिए चीन द्वारा चलाए जा रहे करीब 500 शिविर और जेल देखे हैं।

कार्यकर्ताओं ने यह आरोप लगाया कि अभी तक चीन में हिरासत में रह रहे लोगों की संख्या 10 लाख बताई जाती रही है लेकिन यह आँकड़ा इससे कहीं ज्यादा हो सकता है।

कार्यकर्ताओं के अनुसार चीन के मुस्लिम क्षेत्र शिनजियांग के लिए आजादी की माँग करने वाले वॉशिंगटन स्थित समूह ‘द ईस्ट तुर्किस्तान नेशनल अवेकनिंग मूवमेंट’ ने 182 संदिग्ध ‘‘हिरासत शिविरों’’ के बारे में संकेत दिए हैं, जहाँ उइगरों पर उनकी संस्कृति छोड़ने के लिए कथित तौर पर दबाव बनाया जाता है।

इसके अलावा समूह ने गूगल अर्थ पर मौजूद ताजा तस्वीरों का आकलन करने के बाद कहा है कि उसने मंगलवार को 209 संदिग्ध जेल और 74 संदिग्ध श्रम शिविर देखे, जिनके संबंध में वह बाद में जानकारियाँ साझा करेगा।

वहीं, मूवमेंट के अभियान निदेशक कायले ओल्बर्ट ने भी इन स्थानों के बारे में जानकारी दी है। उन्होंने कहा, ‘‘बड़े हिस्से में पहले इनकी पहचान नहीं की गई है, इसलिए हम कहीं अधिक संख्या में लोगों को हिरासत में लिए जाने की बात कह सकते हैं।’’

कायले ओल्बर्ट ने इस दौरान उइगर मुस्लिमों पर अपनी चिंता जाहिर करते हुए कहा कि इस तरह के और केंद्र हो सकते हैं, जिनकी हम अभी पहचान नहीं कर पाए। वहीं, अमेरिका के खुफिया विभाग में काम कर चुके और समूह को सलाह देने वाले एंडर्स कोर ने बताया कि करीब 40% स्थानों के बारे में उन्हें पहले जानकारी नहीं दी गई थी।

एशिया संबंधी मामलों के लिए पेंटागन के शीर्ष अधिकारी रैंडल श्राइवर ने भी इस बारे में कहा कि हिरासत में लिए गए लोगों का आँकड़ा मई में ही 30 लाख था, जो बताए गए आँकड़े से कहीं अधिक है।

उल्लेखनीय है कि चीन में उइगर मुस्लिमों पर होते अत्याचारों के मद्देनजर इससे पहले 22 देशों के राजदूतों ने चीन की नीतियों की आलोचना करते हुए संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को एक पत्र लिखा था। जिसमें विशेषज्ञों का मानना था की पाकिस्तान इस मामले में अपनी आँखे मूँदे बैठा है। इसके अलावा ईरान और सऊदी अरब जैसे भी ऐसे इस्लामिक देश हैं जिन्होंने कथित अत्याचारों पर चुप्पी साधी हुई है। जिसका कारण शायद चीन का इन देशों में भारी निवेश हैं।

यहाँ बता दें कि बीते कुछ समय से चीन में उइगर मुस्लिमों पर न केवल अत्याचार हो रहा है बल्कि उनके लिए रोज नए-नियम कानून बनाए जा रहे हैं। वहाँ इस्लामी टोपी लगा कर घूमने पर पाबन्दी है, नमाज भी पुलिस की निगरानी में अनुमति लेकर ही पढ़ी जा सकती है और इस्लामिक रीति-रिवाजों पर प्रतिबन्ध है चीन के शिनजियांग प्रान्त में ख़ास करके उइगर मुस्लिमों को डिटेंशन कैम्प में रखा गया है, जहाँ उनका ‘चीनीकरण’ किया जा रहा है।

‘BJP में शामिल होंगे कॉन्ग्रेस-JDS के अयोग्य करार दिए गए सभी 17 विधायक’

सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक विधानसभा में अयोग्य करार दिए गए 17 विधायकों पर फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में विधानसभा स्पीकर द्वारा कॉन्ग्रेस-जेडीएस विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने को जायज़ ठहराया है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक स्पीकर रमेश कुमार के उस आदेश को जायज़ ठहराया है, जिसमें इन 17 विधायकों को निलंबित करने का आदेश दिया गया था। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन सभी विधायकों के आगामी उप-चुनाव लड़ने के लिए योग्य करार देकर उन्हें राहत प्रदान की है।

निलम्बित विधायकों में से एक रमेश जर्किहोली ने बताया कि सभी 17 विधायक गुरुवार को भाजपा के मुख्यालय में 14 नवंबर की सुबह करीब 10:30 बजे भारतीय जनता पार्टी ज्वाइन करेंगे।

एक रिपोर्ट के मुताबिक इससे पूर्व भी इन विधायकों के भाजपा में जाने की चर्चा हुई थी। कर्नाटक के उप-मुख्यमंत्री सीएन अश्वथ नारायण ने कहा था कि भाजपा में आने पर उनका स्वागत है।

नारायण ने कहा था, “उन्होंने (विधायकों ने) भाजपा में आने की इच्छा जताई थी और पार्टी के बड़े नेताओं से बात भी की थी। हमारी पार्टी में उन सभी का स्वागत है।”

यह वही 17 विधायक हैं, जिनके चलते कर्नाटक की कॉन्ग्रेस-जनता दल(सेकुलर) की सरकार गिर गई थी। गौरतलब है कि कर्नाटक की सरकार में मची खींचतान में कॉन्ग्रेस के 14, जनता दल (सेकुलर) के तीन विधायकों ने इस्तीफ़ा दे दिया था। इसी वाकये के बाद सूबे में गठबंधन वाली कुमारस्वामी की सरकार गिर गई थी और बीएस येदयुरप्पा एक बार फिर सत्ता में आ गए थे।

‘कमरे में हुई बात को सार्वजनिक करूँ, यह मेरी पार्टी का संस्कार नहीं, संख्या है तो आज ही बना लो सरकार’

महाराष्ट्र में चल रहे सियासी संकट के बीच भाजपा अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह ने शिवसेना और भाजपा के अलग होने के बाद अपना पहला बयान दिया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक एक साक्षात्कार में शाह ने बताया कि यह सार्वजानिक था कि उनके और शिवसेना के गठबंधन की जीत पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ही बनेंगे।

शाह बोले कि हम शिवसेना के साथ सरकार बनाने के लिए तैयार बैठे थे। चुनाव से पहले कई सभाओं में मैंने और पीएम मोदी ने खुद यह बात कही थी कि अगर भाजपा-शिवसेना गठबंधन की जीत होगी तो मुख्यमंत्री फडणवीस ही होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि अब शिवसेना जो नई माँग लेकर अड़ी है, हम उसे स्वीकार नहीं कर सकते।

भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि अगर किसी भी दल के पास सरकार बनाने के लिए ज़रूरी संख्या है तो उसे सीधे राज्यपाल से संपर्क करना चाहिए, राज्यपाल ने किसी भी दल को सरकार बनाने से मना नहीं किया है।

भाजपा पर सरकार न बनाने का दोष मढ़ने वाले कपिल सिब्बल का नाम लेकर अमित शाह ने कहा कि उनके जैसा विद्वान वकील ऐसी बात कैसे कर सकता है कि हमें मौका नहीं दिया गया। उन्होंने सिब्बल की बात को एक बचकानी दलील बताया।

दरअसल 288 सीटों वाली महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों में किसी भी दल को सरकार बनाने के लिए स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है। इसके बाद से ही शिवसेना और भाजपा के बीच गठबंधन टूटने के कयास लगाए जा रहे थे।

बता दें कि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने भाजपा, शिवसेना और उसके बाद एनसीपी- तीनों दलों को सरकार बनाने का न्योता दिया था मगर पर्याप्त बहुमत न होने के कारण सभी दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं थे।

इसके बाद 7 नवम्बर को सूबे में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। महाराष्ट्र में इसे लगाए जाने को लेकर भी विपक्षी दलों ने खूब हंगामा मचाया था। इस पर बोलते हुए अमित शाह ने कहा कि इस बात को मुद्दा बनाकर विपक्ष राजनीति कर रहा है। उन्होंने कहा, “एक संवैधानिक पद को इस तरह से राजनीति में घसीटना मैं नहीं मानता लोकतंत्र के लिए स्वस्थ परंपरा है।”

राम मंदिर पर आपका फैसला ‘हिन्दू राष्ट्र में योगदान’: PM मोदी ने लिखा CJI को लेटर? – Fact Check

अयोध्या के श्री राम जन्मभूमि मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को लेकर गत शनिवार को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ इंटरनेट पर ज़ोर-शोर से दुष्प्रचार जारी है। इसे लेकर न केवल प्रोपेगेंडा किया जा रहा है और न्यायपालिका की शुचिता पर सवाल हो रहे हैं, बल्कि सीधे-सीधे झूठ भी फैलाया जा रहा रहा है। ऐसा ही एक झूठ यह है कि मोदी ने रिटायर होने जा रहे मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखकर अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में फैसला देने और ‘हिन्दू राष्ट्र में योगदान’ देने के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया है।

दरअसल इंटरनेट पर बहुत जगह एक कथित पत्र की स्कैन्ड कॉपी वायरल की जा रही है, जिसके कंटेंट में प्रेषक (कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) की ओर से प्राप्तकर्ता सीजेआई रंजन गोगोई से कहा गया है कि उन्होंने और फैसला सुनाने वाली पाँच जजों की संविधान पीठ ने ‘हिन्दू राष्ट्र में योगदान’ दिया है। इसके लिए उन्हें धन्यवाद दिया गया है, कहा गया है कि इसे हिन्दू राष्ट्र के लिए एक नया इतिहास बनेगा और ऐसे ‘नाज़ुक समय पर समर्थन’ के लिए भी उनका शुक्रिया अदा किया गया है।

इसको लेकर ऑल इंडिया रेडियो ने पत्र की अंग्रेजी और बांग्ला प्रतियाँ ट्वीट करते हुए दावा किया है कि ढाका स्थित भारतीय हाई कमीशन ने बांग्लादेश के न्यूज़ मीडिया में बँट रहे एक फेक पत्र के बारे में लोगों को सतर्क किया है।

बिना किसी तरह की पड़ताल किए (या फिर शायद जान बूझकर गुस्सा, असंतोष और अंततः हिंसा भड़काने के लिए) बहुत सी वेबसाइट्स, वॉट्सऍप ग्रुप्स, इंडिविजुअल यूज़र्स इसे वायरल कर रहे हैं। ऐसी ही एक वेबसाइट कश्मीर मीडिया सर्विस है जो कह रही है कि मोदी के इशारे पर “हिन्दू चरमपंथियों को तुष्टीकृत किया गया है।” इसमें “कम्यूनल फ़ेस ऑफ़ द इंडियन जूडिशरी” कहते हुए न्यायपालिका पर अनर्गल आरोप लगाए हैं।

ऐसे तत्व न केवल सामाजिक सौहार्द के लिए खतरा हैं बल्कि इनके ऐसे कृत्यों से हिंसा भड़कने का खतरा रहता है।