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पत्रकारिता के अंतिम पैगंबर रवीश जी के अंतरात्मा की आवाज: सुप्रीम कोर्ट बेवफा है!

रवीश जी को कौन नहीं जानता! पत्रकारिता की जगत का चमचमाता सितारा हैं, या कहिए कि सूर्य हैं। आप उन्हीं से पूछिए, वो बता देंगे आपको कि पत्रकारिता में उनको छोड़ कर अब कोई बचा नहीं है। ऐसा वो बार-बार कहते हैं, क्योंकि मूढ़ जनता मानने को तैयार ही नहीं होती है कि वो अंतिम पैगम्बर हैं पत्रकारिता के।

रवीश जी एक निर्मोही व्यक्ति हैं, कहते हैं कि टीवी फोड़ दो, स्क्रीन मत देखो। ऐसा संन्यासी व्यक्तित्व आखिर कहाँ मिलेगा जो हर रोज मनमोहक मुस्कान के साथ आपसे कहता है कि टीवी मत देखिए, और स्वयं हर रात्रि टीवी पर आ जाता है। बहुत लोग उपहास करते हैं इस बात का, लेकिन ‘खिचड़ी सम्मेलन’ में जुटने वाले नवोदित और ‘पके चावल’ टाइप पत्रकारों ने शोध में यह पाया है कि एनडीटीवी की माया इतनी विशिष्ट है कि हर दिन कोई नया व्यक्ति रवीश जी के नयनाभिराम मुखारविन्दों से प्रस्फुटित होने वाले विलक्षण शब्दपुष्पों की अलौकिक महक सूँघता बरबस रिमोट उठा कर टीवी चला ही देता है। और रवीश जी, बस अपना लोकधर्म निभाते हुए, उसे ही बताने आते हैं कि तात्, आज तो आप आ गए, भविष्य में मत आना, टीवी पर बस कूड़ा-करकट होता है।

रवीश जी को मैंने संन्यासी क्यों कहा? क्योंकि महर्षि रवीशानंद मोह-माय से परे, निष्पाप हो कर, इस धरातल से ऊपर, परमहंस की अवस्था पा चुके हैं क्योंकि सर्वोच्च न्यायालय की अवमानना करने की जगह उन्होंने कहा कि अंतरात्मा से पूछिए कि बोझ डाल गया या मुक्त कर गया। देखिए, आपको लगेगा कि ये व्यक्ति संतुष्ट नहीं है फैसले से, लेकिन रवीशानंद जी महाराज को समझते हेतु, आपको विवेकशील होना पड़ेगा, उन्हीं के स्तर तक उठना पड़ेगा जहाँ आपको समझ में आएगा कि जब न्यायालय आपके अनुरूप निर्णय देती है, तो ठीक है, वरना अंतरात्मा की आवाज तो है ही!

अंतारत्मा की बात करते हुए रवीश जी आध्यात्म की ओर प्रस्थान कर जाते हैं। अब आप कहेंगे कि ‘अंतरात्मा’ लिख देने भर से कोई आध्यात्मिक कैसे हो जाएगा! फिर तो आप यह भी कह देंगे कि ‘अफगान जलेबी’ सूफी गीत नहीं है, जबकि उसमें ‘ख्वाजा जी के पास तेरी चुगली करूँगा’ का प्रयोग हुआ है। आप यह भी कह देंगे कि सुश्री सनी लियोनी जी ‘बेबी डॉल मैं सोणे दी’ एक दार्शनिक भाव वाला गीत नहीं है। एक स्त्री सोने के पिंजड़े में बंद हो कर, पितृसत्तात्मकता के पिंजड़े में बंद हो कर दुनिया को पीतल की तरह नकली कहते हुए, स्वयं को कुंदन सदृश पवित्र कहती है, और आप कहेंगे इसमें दर्शन कहाँ है!

ख़ैर, रवीश जी के मित्रों से जब हमने बात की तो पता चला कि सेक्स रैकेट पांडे की बात पर उनकी अतंरात्मा गरीब ‘जे सुशील’ के चंदा वाले बुलेट पर बैठ कर खिचड़ी खाने जाती है। अंतरात्मा को भी तो ब्रेक चाहिए होता होगा, है कि नहीं। रवीश जी की अंतरात्मा न तो प्राइवेट जेट पर उनके साथ होती है, न ही मायावती वाले मंच पर। ऐसे खास मौकों पर श्रीयुत रवीश जी महाराज अंतरात्मा की आवाज को म्यूट मोड डाल देते हैं क्योंकि मैंने सुना है बोलती बहुत है!

रवीश जी और सर्वोच्च न्यायालय का प्रेम प्रसंग

रवीश जी को भारतीय सर्वोच्च न्यायालय से लड़कपन में ही प्यार हो गया था। तब वो उसे पुष्प भेंट किया करते थे, और नई दुल्हन की तरह ‘सेलिब्रेटिंग हनीमून विद हबी एंड पिछत्तीस अदर्स’ वाले ब्लॉग लिखा करते थे कि उनकी सहगामिनी ने लोकतंत्र की रक्षा कर दी है। एक समय था जब रवीश जी सुप्रीम कोर्ट के लिए इतने चिंतित होते थे कि ‘मेले बाबू ने थाना थाया’ भी पूछा करते थे क्योंकि जब लोकतंत्र को बचा दिया जाता होगा, तो कितनी मेहनत लगती होगी, इस पर वार्तालाप तो आवश्यक कार्य है!

फिर समय बदला और रवीश जी ने महबूबा को ‘तुम कितने बदल गए हो’ कहना शुरू कर दिया। जस्टिस लोया की मौत हो, या फिर अमित शाह के पुत्र जय शाह वाला मामला, अजित डोभाल के पुत्र शौर्य डोभाल वाला मसला, राफ़ेल, सबरीमाला और राम जन्मभूमि तक प्रेमिका ने रवीश कुमार के साथ धोखे के बाद धोखा किया। अगर एकता कपूर प्राइम टाइम की निर्देशक होतीं तो नाटकीय संगीत के साथ हर धोखे पर तीन बार गर्दन मुड़वाते हुए जूम इन-जूम आउट करते हुए, रवीश की गर्दन तुड़वा देतीं!

एक ही जीवन में इतने धोखे! ‘याकूब’ को भी फाँसी दे दी! हा-हा प्रियतमे! ऐसा तुम्हारे बारे में तो न सोचा था। कहाँ अपने दोस्त यारों से कैबिनेट के मंत्री तय करवाते थे, और कहाँ तुमने मुझे ‘जाँच कराने में क्या जाता है’ की रट लगाने पर मजबूर कर दिया! और जब जाँच किया भी तो फैसला रकीबों के पक्ष में! ऐसी हालत में श्री रवीश जी के मनोमस्तिष्क पर सुकोमल उँगलियों जैसी मालिश का सुख तो सिर्फ और सिर्फ श्री अगम कुमार निगम जी की ‘फिर बेवफाई’ की स्वरलहरियों से ही हो सकता है जहाँ वो कहते हैं कि ‘वो किसी और, किसी और से मिल के आ रहे हैं, फिर भी यारों हम इंतजार कर रहे हैं, एक बेवफा से हम, कितना प्यार कर रहे हैं…’

रवीश कुमार ने चाहा था कि वो अपनी इस प्रेमिका की गोद में सर डाल कर कहते, “बेबी, रामजन्मभूमि शांतिप्रियों को दे दो न, बेचारों में डर का माहौल है,” और सुप्रीम कोर्ट कहती, “अहो! अहो! प्रिये! पूरी अयोध्या ही दे देती हूँ, मुझे तो बस तुम्हारी खुशी चाहिए!” मगर ये हो न सका और आज ये आलम है… कि अंतरात्मा को बुलाना पड़ रहा है इस खेल में। प्रेमिका पर सीधा लांछन भी नहीं लगा सकते, जगहँसाई का भय है, इसलिए हर व्यक्ति को रवीश जी ने परोक्ष रूप से कहा है कि सत्तर साल से चल रहे मामले के निपटारे के बाद आप इस निर्णय को न मानें, आप अपने मन में बैठे जज को पुकारें और देखें कि वो क्या कहता है।

रवीश जी की इस पोस्ट पर आने वाले कमेंट को पढ़ कर सही प्रतीत हुआ कि बेवफा ने सही फैसला दिया था क्योंकि रवीश की अंतरात्मा को छोड़ कर किसी पर कोई भार नहीं पड़ता दिखा। कहाँ रवीश जी ‘चिगी-विगी’ करना चाह रहे थे, और कहाँ ये कोमल अंगों पर दुलत्ती मार कर भागती दिख रही है। गोगोई जी जालिम आदमी हैं, बेंच पर जगह नहीं थी, तो नीचे ही बिठा लेते, लेकिन लोकतंत्र में रवीश जी की भी आवाज सुन लेते तो क्या जाता! यही तो संविधान में लिखा है कि भारत प्रजातांत्रिक राष्ट्र है और यहाँ जज लोग फैसला सुना रहे हैं।

राफेल, राहुल और रवीश का रिरियाना

पाँच साल के शासन में बेदाग मोदी सरकार पर जब कॉन्ग्रेस ने जनेऊधारी, रामभक्त, शिवभक्त, रामावतार, कृष्णावतार, गंगापुत्री के भ्राता, दूरद्रष्टा, त्रिकालदर्शी राहुल गाँधी नामक प्रक्षेपास्त्र के प्रयोग से राफेल में घोटाला बताना शुरू किया तो रवीश जी भी हरमुनिया ले कर स्टूडियो में आने लगे। हर प्राइम टाइम और फेसबुक पोस्ट में ‘गाइए राफेल जगवंदन’ की धुन बजने लगी, राग मालकौंस में बजने लगा कि ‘मन तड़पत राफेल जाँच को आज…’, और उसी राग में राहुल वंदना करते हुए रवीश जी गा देते थे कि ‘राहुल रे! हे सोनियानंदन, हे दुखभंजन, परमनिरंजन… राहुले रे…’

राहुल गाँधी में अचानक उम्मीद का इंजेक्शन लगा दिया गया जिसमें कॉन्ग्रेसियों की उम्मीद का अंश कम और उनके चाटुकारों की उम्मीद ज्यादा थी। राहुल जी के व्यक्तित्व को देख कर सबको पता है कि राहुल जी किस तरह का इंजेक्शन लेना पसंद करते हैं, लेकिन राष्ट्र सेवा का भार क्या नहीं करवा देता है! इंजेक्शन दे दिया गया और फिर फील्डिंग सजा कर चरणवंदना करते हुए उनके झूठों को तथ्य मान कर प्रपंच की पैदावार होने लगी।

रवीश जी ने पुराना कैसेट निकाला, जो कि जस्टिस लोया वाले टाइम से ही पिछले पॉकेट में लिए घूमते थे, जिसको आप बिना टेप के भी चलाइए तो आवाज आएगी, “जाँच करा लीजिए, जाँच कराने में क्या जाता है।” जाता तो कुछ नहीं है रवीश जी, लेकिन आपको अब तक समझ में आ जाना चाहिए कि क्रश की फोटो देख कर फैमिली प्लानिंग और स्कूल के पास घर नहीं खरीदा जाता। सुप्रीम कोर्ट आपकी क्रश थी, अनुरक्त प्रेमिका नहीं कि आप ब्लैकमेल करके कुछ भी करवा लें।

आज राफेल पर पुनर्विचार याचिका खारिज हो गई और रवीश जी के लिए उम्मीद की किरण, राहुल गाँधी को, न्यायालय ने शरारती अल्पवयस्क बालक समझ कर सिर्फ डाँटते हुए छोड़ दिया कि उनके पास और भी काम हैं। हो सकता है रवीश जी रात वाले शो में बताएँ कि सुप्रीम कोर्ट बेवफा तो है ही, बल्कि ऐसा प्रतीत होता है कि ‘जैगुआर वाले लौंडे के साथ ‘जिन्नी मर्जी उतना पियार लैने’ चली गई।

लोकतंत्र बर्बाद हो चुका है, खम्भे बिक गए हैं

रवीश रिरियाते रहे, क्रश ने बेरहमी से क्रश कर दिया, लेकिन रवीश जी ऐसे हारने वाले प्रेमी नहीं हैं। अंग्रेजी के अखबारों में शीर्षक आते हैं कि ‘जिल्टेड लवर थ्रोज़ एसिड ऑन गर्ल’। रवीश जी की एसिड आप फेसबुक पर हर दिन फैलते देखेंगे, जब वो कहेंगे कि कैसे तर्क के मानदंडों पर सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला सही नहीं लगता।

हो सकता है कि वो ‘हें हें हें’ की चिरपरिचित हँसी के साथ, कार्यक्रम के अंत में यह भी कह दें कि ‘आज कल तो रिटायर होने के बाद भी सरकारें जजों को पद-प्रतिष्ठा देती है। मने, कह रहे हैं!’ ऐसा कहने की कला सिर्फ रवीश में ही है जहाँ वो ‘मने कह रहे हैं’ के नाम पर अपनी कातिल मुस्कान के साथ अपने भक्तों के सीने में ‘मजा तो तब है कि सीने के आर-पार चले’ वाला तीर मार देते हैं। रवीश के चेले उस तीर-ए-पुर-सितम को ‘जो दिल निकले तो दम निकले’ स्टाइल में लिए सोशल मीडिया के दीवारों पर विचरते हुए छाती पीटते रहते हैं कि ‘ये दुख साला खतम क्यों नहीं होता बे!’

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई जी ने तीन फैसले ऐसे दिए हैं जिससे वामपंथियों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष और पाक अकुपाइड पत्रकारों के कई एजेंडे धाराशायी हो गए हैं। इतिहास 1528 से पीछे का भी देखा गया कि अयोध्या में मंदिर था, जहाँ बाबरी बना दी गई। राफेल पर राष्ट्र की सुरक्षा से समझौता नहीं हुआ। सबरीमाला में सात जजों की बेंच को निर्णय करने के लिए आगे बढ़ाने से यही साबित होता है कि जो फैसला आया था, उस पर सहमति नहीं है।

इस कारण, आने वाले दिनों में विषवमन ज्यादा होगा, रवीश जी ज्यादा लिखेंगे, ज्यादा बोलेंगे और अंतरात्मा को बार-बार बुलाएँगे। जब कुछ साबित नहीं हो पाएगा तो लोकसभा चुनावों के परिणाम वाले दिन की तरह, कंधे झुका कर, फीकी हँसी हँसते हुए, ‘देश के लोगों ने भाजपा में विश्वास दिखाया है’ की तर्ज पर कहेंगे कि ‘शीर्ष अदालत तो यही मानती है कि घोटाला नहीं हुआ, हम-आप क्या चीज हैं’। शास्त्रों में इसे काइयाँपन कहा गया है।

अब वायर, क्विंट, स्क्रॉल, बीबीसी, एनडीटीवी आदि गिरोह एकजुट हो कर ऐसे लेख लिखेगा, और स्वतंत्र पत्रकारों से लिखवाएगा जिसमें ऐसा बताया जाएगा कि न्यायपालिका अब सरकार की गोद में बैठ गई है। अब शायद ब्यूरोक्रेसी को भड़काने की कोशिश होगी क्योंकि मीडिया में इनके प्रपंच उस तरह से नहीं चल रहे कि ज्यादा लोग इकट्ठे हों। लगातार लहर बनाई जाएगी कि मोदी ने जजों के मन में भय बैठा दिया है कि रिटायर होने के बाद तो यहीं रहना है।

लेकिन, आप इन धूर्तों को टीवी पर देखा कीजिए, इनके लेख पढ़ा कीजिए ताकि आपको पता चलता रहे कि नैरेटिव बनता कैसे है, उसे कैसे बढ़ाया जाता है, उसे कैसे सोशल मीडिया के जरिए आप तक ढकेला जाता है।

अंत में रवीश जी के लिए कुछ गीतों के मुखड़े छोड़े जा रहा हूँ, जो सुन कर उन्हें चैन आएगा:

दिल मेरा तोड़ दिया उसने, बुरा क्यों मानूँ
अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का
मोरा पिया मो से बोलत नाहीं, द्वार जिया के खोलत नाहीं
ऐतबार नहीं करना, इंतजार नहीं करना, हद से भी ज्यादा तुम किसी से प्यार नहीं करना
एक ऐसी लड़की थी जिसे मैं प्यार करता था
टूटा हो दिल किसी का तो हैरत की बात क्या
वो किसी और, किसी और, से मिल के आ रहे हैं
इश्क न करना, इश्क न करना, इश्क न करना, इश्क न करना
ऐ मेरे दिल बता क्या बुरा कह दिया, बेवफा को अगर बेवफा कह दिया

तेज प्रताप यादव के BMW से ड्राइवर निकला और ऑटो वाले को खूब मारा, माँग रहा था ₹180000

बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव के बेटे और राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेज प्रताप यादव एक अजीब सी घटना के लिए एक बार फिर से सुर्ख़ियों में आ गए हैं। इस बार उनका नाम उनके ड्राइवर द्वारा हर्ज़ाने की माँग को लेकर सुर्ख़ियों में आया है। दरअसल, इन दिनों वो वृंदावन में हैं और उनको लेने के लिए बिहार से होकर रोहनिया के रास्ते उनकी BMW कार गुज़र रही थी, तभी अचानक एक ऑटो चालक से पीछे से उनकी कार में टक्कर हो गई। इसके बाद गाड़ी स्टार्ट न हो पाने की स्थिति में सड़क पर आने-जाने वालों को काफ़ी दिक़्क़तों का सामना करना पड़ा।

दरअसल, यह घटना आज (14 नवंबर) सुबह 6:30 बजे की है। इन दिनों तेज प्रताप यादव वृंदावन में हैं और उनको लेने के लिए सुबह करीब 6:30 बजे उनकी BMW कार बिहार से होकर रोहनिया के रास्‍ते से गुज़र रही थी कि तभी अचानक पीछे से एक ऑटो से उसमें टक्‍कर लग गई। घटना के दौरान तेज प्रताप के ड्राइवर, जयपाल और ऑटो चालक के बीच काफ़ी बहस शुरू हो गई। इस बीच, यह बात सामने आई कि ऑटो चालक से हर्ज़ाने के तौर पर 1,80,000 रुपए की माँग की गई।

इतनी बड़ी रक़म सुनते ही ऑटो चालक ने कहा कि वो इतनी राशि का भुगतान नहीं कर सकता। इतना सुनने के बाद ऑटो चालक को तेज प्रताप के ड्राइवर ने जमकर पीटा और उसे साथ में चल रही एस्कॉर्ट गाड़ी में जबरन बैठा लिया। बीच सड़क पर वीआईपी गाड़ी के ड्राइवर द्वारा ऑटो चालक के साथ की गई मारपीट की जानकारी मिलते ही लोगों की भीड़ घटना-स्थल पर जुट गई। मामला जब नहीं थमा तो पुलिस को घटना की सूचना दी गई, इसके बाद वो दोनों पक्षों को थाने ले आई।

वहीं, तेज प्रताप यादव ने फोन पर अपने पीए सृजन स्वराज को थाने जाने से मना कर दिया। हालाँकि, मौक़े पर समझौता न हो पाने पर दोनों ही पक्षों को पुलिस रोहनिया थाने लेकर पहुँची और मामले की तफ़्तीश में जुट गई। चूँकि यह मामला वीआईपी व्यक्ति के वाहन से जुड़ा हुआ है, इसलिए पुलिस ने इसकी सूचना आला अधिकारियों को भी दे दी।      

बता दें कि जिस समय यह दुर्घटना हुई, उस समय तेज प्रताप यादव ख़ुद अपने वाहन में मौजूद नहीं थे, उस वक़्त केवल उनका ड्राइवर जयपाल और उनके पीए सृजन स्वराज यात्रा कर रहे थे। पुलिस ने घटना-स्थल पर पहुँचकर मामले को शांत कराया और दोनों पक्षों को स्थानीय पुलिस स्टेशन में ले गई जहाँ दोनों ने अपनी-अपनी शिकायतें दर्ज कराई।

ख़बर के अनुसार, वाराणसी पुलिस ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से इस मामले के सन्दर्भ में  प्रभारी निरीक्षक रोहनिया के हवाले से बताया कि दोनों पक्षों द्वारा थाने पर आकर सुलह समझौता कर लिया गया है। वहीं, लिखित रूप में दिया गया कि वो कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं चाहते हैं, इसके बाद विवाद का आख़िरकार पटाक्षेप हो गया और दूसरे अन्‍य साधन से बिहार से आया सुरक्षा दस्‍ता तेज प्रताप को लाने के लिए वृंदावन की ओर रवाना हो गया।

कटाक्ष: सुप्रीम कोर्ट बेवफा है: रवीश के अंतरात्मा की आवाज । Ajeet Bharti on Ravish kumar

रवीश जी को अब तक समझ में आ जाना चाहिए कि क्रश की फोटो देख कर फैमिली प्लानिंग और स्कूल के पास घर नहीं खरीदा जाता। सुप्रीम कोर्ट आपकी क्रश थी, अनुरक्त प्रेमिका नहीं कि आप ब्लैकमेल करके कुछ भी करवा लें।

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JNU माओवंशियों ने विवेकानंद की प्रतिमा को किया बदरंग, लोगों ने कहा – ‘ये ह%#मी, Pak से भी खतरनाक’

JNU वालों ने एक बार फिर साबित किया कि उन्हें अर्बन नक्सली, माओवादी, गद्दार, देश के दुश्मन, एंटी-नेशनल जैसे खिताबों से क्यों नवाज़ा जाता है। अपने ही शिक्षकों का अपहरण, दिल्ली की सड़कों को जाम करने के बाद अब उन्होंने अपने परिसर में लगी स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को अपना निशाना बनाया है।

JNU में नई स्थापित हुई स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा को बदरंग करते हुए उसके पेडेस्टल पर माओवंशियों ने अपशब्द लिखे हैं। “भगवा जलेगा”, “Fu&^% BJP” आदि को लाल रंग के पेंट से लिखकर पेडेस्टल को कुरूप बना दिया है। इसकी तस्वीर वैज्ञानिक, लेखक और JNU में मॉलिक्यूलर मेडिसिन के प्रोफ़ेसर आनंद रंगनाथन ने ट्विटर पर शेयर की हैं।

रंगनाथन ने जो तस्वीर शेयर की है, उस प्रतिमा के बारे में उन्होंने बताया कि इसका तो अनावरण भी अभी तक नहीं हुआ था। उसके पहले ही अर्बन नक्सलियों ने इसे अपनी अंधी नफ़रत का शिकार बना दिया।

रंगनाथन के इस पोस्ट के बाद से ट्विटर पर लोग बिफर उठे हैं। उनकी पोस्ट को रीट्वीट कर व उनके कमेंट बॉक्स में लोग कम्युनिस्टों को कोस रहे हैं, JNU को बंद करने की माँग कर रहे हैं। एक यूज़र ने कहा कि भाजपा इन गुंडों के साथ कुछ ज़्यादा ही नरमी से पेश आ रही है। इस यूजर के मुताबिक, “इनसे निपटने का इंदिरा गाँधी का ही तरीका सही था, जिन्होंने JNU को एक साल के लिए बंद कर दिया और कथित तौर पर डी राजा (वर्तमान भाकपा नेता) को वंदे मातरम गा कर सुनाने के लिए मजबूर कर दिया था।” इस यूजर की जानकारी कितनी सही है, ऑपइंडिया इसकी पुष्टि नहीं करता है।

एक अन्य ने कहा कि वोटों की चिंता किए बिना सरकार को ऐसे लूजर्स को जेल में फेंक देना चाहिए। अगर उनकी खुद की 18 साल की बेटी ऐसी हरकत करती, तो उसे भी वे निकाल बाहर करते। इन लफंगों को एक बार में सीधा करने का समय आ गया है।

इस यूज़र की भाषा से तो सहमत नहीं हुआ जा सकता लेकिन इनके सेंटीमेंट गलत नहीं हैं। कई सुरक्षा एजेंसियाँ कई बार अर्बन नक्सलियों को जिहादियों से अधिक खतरनाक बता कर सरकार को आगाह कर चुकीं हैं।

मशहूर सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट साई दीपक ने भी इस हरकत पर व्यथा जताते हुए सरकार और JNU प्रशासन से पूछा कि वे यह गुंडागर्दी कब तक बर्दाश्त करेंगे।

ईद-ए-मिलाद के बहाने चाँदबाबू शेख ने 8 और 9 साल की बच्चियों से किया रेप

ईद-ए-मिलाद पर 8 और 9 साल की दो बच्चियों के साथ रेप करने के आरोप में पुलिस ने 20 साल के युवक को गिरफ्तार किया है। उसकी पहचान चॉंदबाबू शेख के तौर पर की गई है। घटना मुंबई के वडाला की है। चॉंदबाबू बच्चियों को ईद का जश्न दिखाने के बहाने ले गया और फिर पब्लिक टॉयलेट में उनके साथ रेप किया।

मिड-डे की रिपोर्ट के अनुसार 10 नवंबर की शाम करीब 6 बजे दोनों बच्चियाँ अपने घर के बाहर खेल रही थीं। चाँदबाबू ने उनसे पूछा कि क्या वो ईद का जश्न देखना चाहती हैं? दोनों मासूमों के हाँ कहने पर उन्हें अपने साथ ले गया। लेकिन, जश्न दिखाने की बजाए वो उन्हें पब्लिक टॉयलेट में ले गया और वहाँ उसने दोनों के साथ बलात्कार किया।

बच्चियों के गायब हो जाने से परिजनों में हड़कंप मच गया। करीब 2 घंटे तक बाद खोजने के बाद परिजनों को एक लड़की शौचालय के पास रोती-बिलखती मिली। जब उससे उसके रोने की वजह पूछी गई तो पता चला कि उसका यौन उत्पीड़न किया गया है।

बच्ची की बात सुनते ही परिवारवाले तुरंत पुलिस स्टेशन गए और मामले पर शिकायत दर्ज करवाई। परिवारवालों से सारा मामला जानने के बाद पुलिस ने बिना किसी देरी के आरोपित शख्स को पकड़ने के लिए खोजबीन शुरू कर दी। इस बीच सीसीटीवी फुटेज भी खँगाले गए, जिसमें चाँदबाबू बच्चियों को अपने साथ ले जाते देखा गया।

फुटेज की तस्वीरें जब स्थानीय लोगों को दिखाई गई, तो उन्होंने उसकी पहचान चाँदबाबू शेख के तौर पर की।
पुलिस के मुताबिक चाँदबाबू बेरोजगार था और लड़कियों को पहले से नहीं जानता था। स्थानीय लोगों द्वारा पुष्टि किए जाने के बाद उसकी गिरफ्तारी सोमवार को हुई।

अब पुलिस उसके आपराधिक रिकॉर्ड के बारे में छानबीन कर रही है। पुलिस ने बताया कि बच्चियों का मेडिकल टेस्ट करवाया गया है, जिसकी रिपोर्ट अभी आनी बाकी है। चाँदबाबू पर रेप के आरोप में आईपीसी की धारा और पॉस्को एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया है।

शिवसेना विधायकों ने उद्धव ठाकरे के खिलाफ खोला मोर्चा, पूछा- सीएम पद के लिए क्यों लगाया दाँव पर

महाराष्ट्र में ​जारी सियासी उठा-पठक के बीच शिवसेना विधायक दल में बगावत की खबर आ रही है। कुछ विधायकों ने पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे के फैसले पर सवाल उठाते हुए पूछा है कि केवल मुख्यमंत्री पद के लिए उनके और पूरे पार्टी के भविष्य को क्यों दॉंव पर लगा दिया गया? तीन हफ्ते तक चले सियासी ड्रामे के बाद मंगलवार को राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया था।

शिवसेना ने अपने विधायकों को मुंबई के मलाड स्थित रिट्रीट होटल में कैद कर रखा है। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के मुताबिक होटल में कैद विधायक अब बगावत पर उतर आए हैं। उनके तेवर ने उद्धव ठाकरे को भी होटल आने पर मजबूर कर दिया।

रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि मंगलवार और बुधवार की रात होटल में शिवसेना विधायकों के बीच गाली-गलौच तक हो गई। इसकी जानकारी मिलने पर मंगलवार की रात उद्धव के बेटे विधायक आदित्य ठाकरे को होटल आना पड़ा। दोबारा से वैसे ही हालात पैदा होने पर बुधवार की रात खुद उद्धव होटल आने को मजबूर हो गए।

बागी विधायक खुद को आजाद करने की मॉंग करते हुए अपने निर्वाचन क्षेत्र में जाना चाहते हैं। इन विधायकों का यह भी कहना है कि ठाकरे परिवार निजी फायदे के लिए सीएम पद की मॉंग पर अड़ी रही और इसके लिए पूरी पार्टी को ही दॉंव पर लगा दिया। सरकार बनाने के लिए एनसीपी से हाथ मिलाने के फैसले का भी ये विरोध कर रहे हैं। कथित तौर पर एक विधायक ने उद्धव से कहा कि एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार कभी भी सरकार पर उनका नियंत्रण नहीं रहने देंगे और सभी मलाईदार विभाग खुद हड़प लेंगे। विधायकों ने यह भी पूछा कि वे जनता को यह बात कैसे समझाएँगे कि चुनाव के दौरान जिसके खिलाफ लड़े थे, उसके साथ ही सरकार चला रहे हैं।

गौरतलब है कि शिवसेना ने विधानसभा का चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था। 288 सदस्यीय विधानसभा के लिए हुए चुनाव में भाजपा को 105 और शिवसेना को 56 सीटें मिली। युति सरकार बननी तय थी, लेकिन भाजपा के पास अपने दम पर बहुमत नहीं होने के कारण शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम पद मॉंग रही थी। भाजपा ने इस मॉंग को ठुकराते हुए राज्य में सरकार बनाने से इनकार कर दिया था। इसके बाद राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शिवसेना को सरकार गठन न्योता दिया था, लेकिन वह समर्थन पत्र पेश नहीं कर पाई।

अब शिवसेना, कॉन्ग्रेस और एनसीपी मिलकर सरकार बनाने की कोशिश कर रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इसके लिए एक कॉमन मिनिमम प्रोग्राम तैयार किया गया है। इसके अनुसार शिवसेना अपने हिंदुत्व के एजेंडे से पीछे हटते हुए मुस्लिमों को 5 फीसदी आरक्षण देने पर राजी है। साथ ही वह वीर सावरकर को भारत रत्न देने की अपनी मॉंग से भी पीछे हट गई है।

कॉन्ग्रेस के ‘नचनिया’ नेता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर माँगी माफी, फिर कहा – ‘मैं तो मजाक कर रहा था’

सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई रंजन गोगोई की पीठ द्वारा राफेल मामले में दायर की गई सभी पुनर्विचार याचिकाओं को खारिज किए जाने के बाद कॉन्ग्रेस प्रवक्ता संजय झा ने आज अनिल अंबानी पर राफेल को लेकर लगाए गए इल्जामों के लिए माफी माँगी। जब लोग झा साहब को ट्रोल करने लगे तो उसे व्यंग्य बता दिया। संजय झा ने यह साबित कर दिया कि वो अपनी पार्टी की ही तरह जब फँस जाते हैं तो पलटी मार जाते हैं।

अपने ट्विटर पर संजय झा ने पहले लिखा, “अब जब सुप्रीम कोर्ट राफेल मामले में अपना फैसला सुना चुकी है, तो मैं सार्वजनिक तौर पर माननीय श्री अनिल अंबानी जी से अपने बेबुनियादी इल्जामों के लिए माफी माँगता हूँ, जो मैंने कई टीवी शो में उनके ऊपर लगाए।” इसके आगे संजय झा ने अनिल अंबानी के लिए लिखा, “आप सत्यनिष्ठा, इमानदारी और पारदर्शिता के प्रतीक हैं। कृपया मुझे माफ कर दें।”

लेकिन, इस ट्वीट के बाद सोशल मीडिया पर लोग उन्हें उनके पहले की बातों को लेकर ट्रोल करने लगे और पूछने लगे कि अब क्या हो गया। वहीं मीडिया में भी खबरें चलने लगी कि उन्होंने अनिल अंबानी से माफी माँगी। ऐसे में कुछ ही देर बाद उनका एक ट्वीट और आ गया। इसमें उन्होंने लिखा कि उनके बयान को भाजपा नेता गलत तरीके से पेश कर रहे हैं और अनिल अंबानी पर की गई उनकी टिप्पणी केवल व्यंग्य थी।

खैर, उनके इस ट्वीट से ये बात तो साबित हो गई कि उन्होंने केवल अनिल अंबानी से माफी माँगकर उन पर तंज नहीं कसा, बल्कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राफेल पर आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी मजाक के तौर पर लिया है। आपको याद दिला दें कि कॉन्ग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संजय झा ख़ुद को नचनिया मानते हैं। ऐसा उन्होंने एक बार नहीं बल्कि तीन बार कहा है। हाँ, नृत्य की विधा हर बार बदल जाती है।

सोशल मीडिया पर उनकी सफाई के बाद भी यूजर्स उन्हें खरी खोटी सुना रहे हैं और उनका मजाक उड़ा रहे हैं। लोगों का कहना है कि उन्हें अस्पताल में खुद को दिखाना चाहिए, क्योकि वे ठीक नहीं लग रहे। कुछ लोग उन्हें उनकी पार्टी के वरिष्ठों से तुलना करके चुटकी ले रहे हैं।

यहाँ बता दें कि राफेल डील मामले में लगातार संजय झा उद्योगपति अनिल अंबानी के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं। पिछले साल भी उन्होंने रिलायंस डिफेंस के मालिक अनिल अंबानी पर हमला बोला था। उन्होंने इकोनोमिक्स टाइम्स की खबर को ट्वीट करते हुए तंज कसा था, “राफेल घोटाला! रूस के सलाद से फ्रांस का सूप बेहतर है।”

उन्होंने ऐसा इसलिए लिखा था क्योंकि राफेल विमान सौदे के ऑफसेट ठेके में अनियमितता को लेकर विवादों में आए अनिल अंबानी की कंपनी रिलायंस डिफेंस ने इससे पहले रूस से भी रक्षा ठेका लेने की कोशिश की थी, लेकिन तीन बार बड़े सौदे के लिए प्रयास करने के बावजूद उन्हें ठेका नहीं दिया गया था।

राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी लगा चुके हैं इल्जाम

यहाँ बता दें कि केवल कॉन्ग्रेस प्रवक्ता संजय झा ही नहीं बल्कि आप नेता संजय सिंह भी अनिल अंबानी के ऊपर इस मामले में इल्जाम मढ़ चुके हैं। जिसके कारण अंबानी ने संजय सिंह पर 5 हजार करोड़ रुपए का मानहानि दावा भी ठोंका हुआ है। इसके लिए उद्योगपति अनिल अंबानी द्वारा संजय सिंह को पिछले साल कानूनी नोटिस भी भेजा गया था। लेकिन संजय अपनी बात को सही साबित करने के लिए इस बात पर अड़े हुए थे कि वे मानहानि के आरोप से नहीं डरते।

इस दौरान उन्होंने राफेल डील के मामले में अनिल अंबानी और अन्य आरोपियों के खिलाफ FIR दर्ज कराने के लिए केंद्रीय सतर्कता ब्यूरो (सीबीआई) के प्रमुख से समय माँगा था। साथ ही पूरे घोटाले की जाँच ईमानदारी के साथ कराए जाने की बात कही थी। वहीं, अनिल अंबानी ने कहा था कि संजय सिंह के आरोपों से उनकी छवि को बहुत नुकसान हुआ है।

अनिल अंबानी पर इल्जाम मढ़ने वाले अन्य नेता पर भी शिकायत दर्ज

इसके अलावा इस मामले पर इल्जाम मढ़ने के कारण अनिल अंबानी ने पिछले साल कॉन्ग्रेस के एक और प्रवक्ता जयवीर शेरगील को भी लीगल नोटिस भेजा था। इसके अलावा रणदीप सुरजेवाना,अशोक चव्हाण, संजय निरुपम, अनुग्रह नारायण सिंह, अभिषेक मनु सिंघवी पर भी रिलायंस के खिलाफ़ बोलने पर शिकायत दर्ज हो चुकी है। संजय निरुपम पर भी अनिल अंबानी 1000 करोड़ रुपए की मानहानि का मामला ठोंक चुके हैं।

मी लॉर्ड ने बख्श दिया पर राहुल गाँधी को मन से माफ नहीं कर पाएँगे कॉन्ग्रेसी

2019 के आम चुनावों का बिगुल तो 10 मार्च को चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही बज गया था। लेकिन, असली खेल शुरू हुआ था इसके ठीक एक महीने बाद जब 10 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट ने राफेल मामले में दायर पुनर्विचार याचिका पर केंद्र सरकार की प्रारंभिक आपत्तियों को खारिज कर दिया। अगले दिन पहले चरण की वोटिंग होनी थी। लिहाजा, कॉन्ग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गॉंधी (जिनके लिए वामपंथियों का मानना था कि प्रधानमंत्री पद की शपथ बस वक्त की बात है) ने सुप्रीम कोर्ट के इस कदम को हाथोंहाथ लिया। अमेठी के डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर के दफ्तर के बाहर दिन के करीब डेढ़ बजे मीडिया से राहुल गॉंधी बोले,

सुप्रीम कोर्ट ने क्लियर कर दिया है कि चौकीदार जी ने चोरी करवाई है। सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि राफेल मामले में कोई न कोई करप्शन हुआ, कोई न कोई भ्रष्टाचार हुआ है।

इसके बाद बिहार जाकर भी उन्होंने यह बयान दोहराया। 12 अप्रैल को भाजपा की सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गॉंधी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहीं भी ‘चौकीदार चोर है’ शब्द का प्रयोग नहीं किया, लेकिन राहुल गॉंधी शीर्ष अदालत का हवाला देकर कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि चौकीदार चोर है।

असल में, 2018 के आखिर में राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों के नतीजों से उत्साहित राहुल सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले ही ‘चौकीदार चोर है’ कैंपेन चला रहे थे। पत्रकार संतोष कुमार ने अपनी किताब ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय’ में लिखा है कि इस अभियान से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बेहद आहत थे। इसके बाद पीएम की प्रोफेशनल टीम ने इस नारे और राफेल को लेकर राहुल के आरोपों पर लोगों की प्रतिक्रिया जानने के लिए सर्वेक्षण किया। फीडबैक से पता चला कि इस नारे को लेकर लोगों में बेहद नाराजगी है। खासकर, बिहार, उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर में। इसके बाद भाजपा ने 16 मार्च को ‘मैं भी चौकीदार’ कैंपेन लॉन्च किया।

संतोष कुमार की माने तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी कर राहुल गॉंधी ने भाजपा को एक और मौका ही दिया। लेखी की याचिका पर सुनवाई करते हुए 15 अप्रैल को चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने स्पष्ट कर दिया कि कोर्ट की टिप्पणियों को राहुल गॉंधी ने मीडिया और जनता के बीच गलत ढंग से पेश किया। कोर्ट ने राहुल से उनके बयान के लिए स्पष्टीकरण मॉंगा। कोर्ट की यह टिप्पणी दूसरे चरण की वोटिंग से ठीक पहले आई थी। तीसरे चरण की वोटिंग से एक दिन पहले 22 अप्रैल को राहुल गॉंधी ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया। उन्होंने राजनीतिक सरगर्मी का हवाला देकर अपने बयान का बचाव करने की कोशिश की और बयान के लिए खेद जताया। लेकिन, लेखी ने 23 अप्रैल को स्पष्ट रूप से माफी नहीं मॉंगने पर आपत्ति जताई। जवाब में राहुल गॉंधी के वकील ने कहा कि कोर्ट ने उनसे केवल स्पष्टकीरण मॉंगा था। इस पर नाराजगी जताते हुए सीजेआई गोगोई ने कहा, “कोर्ट ने जो पहले नहीं किया अब कर रही है। हम आपको नोटिस जारी कर रहे हैं। हम आपके पूर्व के जवाब से संतुष्ट नहीं हैं। नोटिस का जवाब दीजिए।”

बावजूद इसके राहुल नहीं सॅंभले। उन्होंने चौथे चरण की वोटिंग के दिन 29 अप्रैल को दूसरा हलफनामा दायर किया। पुरानी गलती दोहराई। हलफनामे में कुछ हेरफेर के साथ खेद ही जताया। इसके बाद 30 अप्रैल को सीजेआई गोगोई ने उन्हें कड़ी फटकार लगाई और राहुल यह कहने को मजबूर हुए कि ‘चौकीदार चोर है’, कॉन्ग्रेस का मोदी के खिलाफ राजनीतिक नारा है। कोर्ट ने कहा कि उसकी दिलचस्पी उनके पॉलिटिकल स्टैंड में नहीं है। राहुल की ओर से तत्काल मौखिक माफी मॉंगते हुए नया हलफनामा दायर करने की अनुमति मॉंगी गई। फिर 8 मई को (12 मई को छठे चरण की वोटिंग थी) राहुल गॉंधी ने तीसरा हलफनामा दायर कर साफ शब्दों में माफी मॉंगी। 10 मई को कहा कि उन्होंने बिना शर्त माफी मॉंग ली है और अदालत से आग्रह करते हैं कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई बंद कर दी जाए। लेकिन, लेखी कार्रवाई को लेकर अड़ी रहीं।

गुरुवार यानी 14 नवंबर को सीजेआई रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और केएम जोसेफ की पीठ ने भविष्य में ऐसी बयानबाजी से बचने की नसीहत देते हुए अवमानना याचिका खारिज कर दी। जस्टिस कौल ने कहा, “कोर्ट को राजनीतिक बयानबाज़ी में नहीं घसीटा जा सकता।” दिलचस्प संयोग है कि गुरुवार को इसी पीठ ने राफेल मामले में समीक्षा याचिकाएँ भी खारिज कर दी। इन्हीं याचिकाओं को जब अदालत ने सुनवाई के लिए मंजूर किया था तो राहुल गॉंधी ने वह बयान दिया था, जिस पर बीजेपी ने करीब-करीब पूरा चुनाव खींच दिया था।

उल्लेखनीय है कि सात चरणों में आम चुनाव के लिए वोटिंग हुए थे। 11 अप्रैल को पहले चरण की वोटिंग से एक दिन पहले यह मामला शुरू हुआ था और राहुल का तीसरा हलफनामा छठे चरण से बस चंद दिन पहले ही दाखिल हुआ था। इसका कितना नुकसान कॉन्ग्रेस को हुआ इसका अंदाजा इन आँकड़ों से लगाया जा सकता है। ‘भारत कैसे हुआ मोदीमय ‘ के मुताबिक भाजपा को पहले चरण की 91 में से 31, दूसरे चरण की 96 में से 38, तीसरे चरण की 115 में से 67, चौथे चरण की 71 में से 49, पॉंचवें चरण की 51 में से 42 और छठे चरण की 59 में से 45 सीटें मिली थी। यानी, बहुमत के लिए जरूरी 272 सीटों का आँकड़ा तो भाजपा ने राहुल के एक नारे से ही जुटा लिया था।

उस भूल के लिए अब सुप्रीम कोर्ट ने भी राहुल गॉंधी को बख्श दिया है। मोदी और भाजपा ने तो शायद आम चुनावों के नतीजों के बाद ही माफ कर दिया हो। लेकिन, क्या वे कॉन्ग्रेसी और वामपंथी राहुल गाँधी को कभी मन से माफ कर पाएँगे जिनके सपने में वे आज भी शपथ लेते रहते हैं?

भगवान राम सभी मुस्लिमों के पूर्वज हैं, इमामे हिन्द हैं: वसीम रिज़वी ने जारी किया ख़त

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद तमाम तरह की प्रतिक्रियाओं का दौर अभी भी जारी है। इस फ़ैसले का स्वागत न सिर्फ़ हिन्दुओं ने किया बल्कि मुस्लिमों ने भी अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का समर्थन किया। इनमें कई नामी हस्तियों के नाम भी शामिल हैं। इसी कड़ी में शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी ने बड़ा बयान देते हुए कहा है कि भगवान राम इमामे हिन्द और मुस्लिमों के पूर्वज हैं।

इतना ही नहीं, रिज़वी ने राम मंदिर के भव्य निर्माण के लिए 51 हज़ार रुपए का चेक भी दिया। उन्होंने कहा कि वो आगे भी मंदिर निर्माण में आर्थिक सहयोग करेंगे। बता दें कि शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी हमेशा से ही अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के समर्थन में रहे हैं। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला आने के बाद उन्होंने कहा था कि शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड अपने मक़सद में क़ामयाब रहा। उन्होंने स्पष्ट किया कि हमारा हमेशा से ही मक़सद रहा है कि अयोध्या में राम जन्मभूमि पर ही राम मंदिर बने।

इस सन्दर्भ में वसीम रिज़वी ने ख़त भी जारी किया है। ख़त में उन्होंने लिखा, “सर्वोच्च न्यायालय का जो फ़ैसला आया है वही एक अकेला रास्ता था जिससे यह मामला सुलझ सकता था। अब हिन्दुस्तान में राम जन्भूमि के स्थान पर दुनिया का सबसे सुन्दर मन्दिर बनने की तैयारी हो रही है।”

शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी द्वारा लिखा ख़त (तस्वीर सौजन्य: newsstate.com)

इसके आगे उन्होंने लिखा, “इमामे हिन्द भगवान श्री राम जो हम सभी मुस्लिमों के पूर्वज भी हैं। उनके राम मन्दिर निर्माण के लिए वसीम रिज़वी फ़िल्म्स द्वारा 51 हज़ार रुपए की भेंट राम जन्मभूमि न्यास को श्री राकेश दास जी और अयोध्या ज़िला प्रभारी शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड सदस्य श्री अशफ़ाक़ हुसैन के माध्यम से भेजी जा रही है।” साथ ही उन्होंने मस्जिद निर्माण के लिए भी आर्थिक सहयोग करने की बात की।

ख़बर यह भी है कि शायद आज (14 नवंबर) वो अयोध्या भी जाएँगे। अयोध्या में वसीम रिज़वी साधु-संतो में मुलाक़ात करने से पहले राम लला के दर्शन करेंगे। इसके बाद वो महंत धर्मदास, दिगंबर अखाड़ा में महंत सुरेश दास से भी मुलाक़ात करेंगे। इसके अलावा, वसीम रिज़वी राम जन्मभूमि न्यास अध्यक्ष महंत नृत्य गोपाल और नारायण मिश्र से भी मुलाक़ात कर सकते हैं। वहीं, ऐसी भी संभावना है कि आज ही के दिन वो वेदांती और परमहंस दास से भी मुलाक़ात करेंगे।

बता दें कि उत्तर प्रदेश सरकार ने अयोध्या विवाद पर फ़ैसला आने के बाद कई लोगों को सुरक्षा प्रदान की थी। इनमें एक नाम वसीम रिज़वी का भी है। जानकारी के अनुसार, शिया वक़्फ़ बोर्ड के चेयरमैन वसीम रिज़वी और शिया सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के अध्यक्ष ज़ुफ़र फ़ारूकी की सुरक्षा को बढ़ाकर उन्हें वाई प्लस श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई है।

इंडियन आर्मी से लड़ने के लिए हमने कश्मीरियों को ट्रेनिंग दी: पूर्व राष्ट्रपति ने ही Pak को किया बेनकाब

पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति सेवानिवृत्त जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने यह क़बूल किया है कि कश्मीर में भारतीय सेना के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए कश्मीरियों को पाकिस्तान में प्रशिक्षित किया गया था और उन्हें ‘हीरो’ कहा गया।

ख़बर के अनुसार, मुशर्रफ़ ने कहा कि ओसामा बिन लादेन और जलालुद्दीन हक़्क़ानी जैसे आतंकवादी ‘पाकिस्तानी हीरो’ हुआ करते थे।

पाकिस्तान के राजनेता फरहतुल्लाह बाबर द्वारा बुधवार को ट्विटर पर साझा किए गए एक साक्षात्कार क्लिप में, मुशर्रफ़ को यह कहते हुए सुना जा सकता है,

“… 1979 में, हमने पाकिस्तान को लाभ पहुँचाने और सोवियत को देश से बाहर निकालने के लिए अफ़ग़ानिस्तान में धार्मिक उग्रवाद की शुरुआत की थी। हम दुनिया भर से मुजाहिदीनों को लेकर आए, हमने उन्हें प्रशिक्षित किया और हथियारों की आपूर्ति की। वे हमारे हीरो थे। हक़्क़ानी हमारा हीरो था। ओसामा बिन लादेन हमारा हीरो था। तब का माहौल अलग था, लेकिन अब यह अलग है। हीरो ने खलनायक की ओर रुख़ कर लिया है।”

कश्मीर में अशांति के बारे में बात करते हुए, मुशर्रफ़ ने कहा,

“… पाकिस्तान में आने वाले कश्मीरियों का हीरो के तौर पर स्वागत किया जाता था। हम उन्हें प्रशिक्षित करते थे और उनका समर्थन करते थे। हम उन्हें भारतीय सेना से लड़ने वाले मुजाहिदीन मानते थे। इस अवधि में लश्कर-ए-तैयबा जैसे विभिन्न आतंकवादी संगठन उठे। वे हमारे हीरो थे।”

मुशर्रफ़ द्वारा उगला यह ज़हर इस बात का सबूत है कि जो पाकिस्तान, कश्मीर में किसी भी तरह के हस्तक्षेप की बात को हमेशा नकारता आया है, उसका यह दावा कितना खोखला है। वही पाकिस्तान, क्षेत्र में तनाव बढ़ाने के लिए आतंकवादियों को न सिर्फ़ प्रशिक्षित कर रहा है बल्कि आतंक फैलाने के लिए उनका इस्तेमाल भी करता आया है।

भारत ने एक बार नहीं बल्कि अनेकों बार कहा कि पड़ोसी देश (पाकिस्तान) आतंक को ख़त्म करने के लिए अपनी ज़मीन का इस्तेमाल करना बंद करे। लेकिन, पाकिस्तान अपनी ओछी हरक़तों से कभी बाज नहीं आता। अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने इस्लामाबाद को देश में सक्रिय आतंकवादी समूहों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने के लिए कहा है।