Home Blog Page 5325

एशिया के सबसे बड़े फ़िल्म फेस्टिवल में ‘पर्रिकर’ को देख भावुक हुए लोग: देखें Video

अखंड एक निश्चय
प्रतिभा का संचय
कुछ यूँ हो एक योद्धा का परिचय
संस्कृति की धरोहर
सादगी का सरोवर
अनंत एक गूँज
अपना भाई मनोहर

गोवा की राजधानी में आयोजित एक मौके पर जैसे ही ये पंक्तियाँ गूँजी, वहाँ उपस्थित एक-एक व्यक्ति भावुक हो उठा। राज्यपाल सत्यपाल मलिक, केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर और श्रीपद नाइक सहित कई वरिष्ठ जन इस मौके पर मौजूद थे। आइए, जानते हैं कि आज गोवा में क्यों याद किए गए मनोहर पर्रिकर? दरअसल, ये मौक़ा एशिया के सबसे बड़े फ़िल्म फेस्टिवल के आयोजन का था।

गोवा की राजधानी पणजी में 50वें ‘इंटरनेशनल फ़िल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI)’ के दौरान गोवा के लोग पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर को याद कर भावुक हो उठे। पर्रिकर के प्रयासों के कारण ही आईएफएफआई का आयोजन पणजी में हो पाया और ये फेस्टिवल गोवा की पहचान बन गया। इस वर्ष महानायक अमिताभ बच्चन और सुपरस्टार रजनीकांत जैसे वरिष्ठ अभिनेता इसका हिस्सा बने और उन्हें सम्मानित भी किया गया। इस अवसर पर पीआईबी ने पर्रिकर पर बनी फ़िल्म का एक वीडियो शेयर किया, जिसे देख कर न सिर्फ़ गोवा बल्कि पूरे भारत के लोगों के जेहन में मनोहर पर्रिकर की यादें ताज़ा हो गईं।

इस वीडियो में बताया गया है कि मनोहर पर्रिकर ने अपनी पत्नी से वादा किया था कि वो सार्वजनिक जीवन से विदा लेकर कभी न कभी निजी जीवन में वापस लौटेंगे और परिवार को पूरा समय देंगे। अफसोस ऐसा हो नहीं पाया, लेकिन अपने दोनों बेटों के लिए उन्होंने माँ और पिता, दोनों की ही भूमिका निभाई। उनकी पत्नी का निधन सन 2000 में ही हो गया था।

भारत के पूर्व रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर पर बनी इस फ़िल्म को बॉलीवुड के फ़िल्म निर्माता करण जौहर ने पेश किया। इस फ़िल्म की शुरुआत में पर्रिकर की आवाज़ गूँजती है, जिसमें वह पद एवं गोपनीय की शपथ लेते दिखते हैं। इस फ़िल्म में बताया गया कि पर्रिकर ने कैसे इंजीनियरिंग का करियर छोड़ कर सार्वजनिक जीवन में क़दम रखा और सारी जिम्मेदारियाँ निभाई। इस फ़िल्म में बताया गया है:

“पर्रिकर जी के सार्वजनिक जीवन से औपचारिकताएँ शून्य हो गईं और उनके निजी जीवन की जिम्मेदारियाँ भी उनका हिस्सा बन गईं। अपने दोनों बेटों को माता और पिता का प्यार देते, वो गोवा के लिए भी एक पिता की छवि बन चुके थे। उनका जीवन सिर्फ़ अपने प्रदेश और वहाँ के लोगों से ही प्रभावित होता था। वो अक्सर मुलाकातियों से घिरे रहते थे और शायद ही उन्हें कोई ख़बर अख़बारों से पता चलती थीं। अपनी योजनाओं को जन-जन तक पहुँचाने के लिए उन्होंने स्वयं को ही माध्यम चुना। इन योजनाओं में वैज्ञानिक सोच और सोशल इंजीनियरिंग का एक मिश्रण था। इनमें युवाओं के लिए स्टार्ट-अप योजनाएँ थीं तो बुजुर्गों के लिए पेंशन योजनाएँ। उनका व्यवहार विनम्र था और व्यक्तित्व सुलझा हुआ था।”

ऊपर संलग्न किए गए वीडियो में आप उस फ़िल्म को देख सकते हैं। इसमें मनोहर पर्रिकर के जीवन के कई महत्वपूर्ण पलों की झलकियाँ भी दिखाई गई हैं, जिन्हें देख कर आप भी पुराने दिनों में खो जाएँगे।

अमेरिका में बैठ भारतीय युवाओं को भड़काने वाले रवीश जी, मॉलिक्यूल नाक की जगह कहीं और भी धँस सकता है

वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार का अंतिम सहारा अब सड़क पर उतर कर होने वाला विरोध-प्रदर्शन ही रह गया है। अगर आप सोच रहे हैं कि रवीश डफली बजाते हुए सड़क पर लाल झंडा लिए उतरने की योजना बना रहे हैं, तो शायद आप उनकी घाघ-बुद्धि से परिचित नहीं हैं। वो भला ख़ुद क्यों सड़क पर आएँ? इसमें उनका घाटा है। सरकार का क्या जाता है? इसलिए, उनके धूर्त दिमाग ने नई योजना तैयार की है। क्यों न युवाओं, ख़ासकर छात्रों को ही भड़का कर सड़क पर उतार दिया जाए। साँप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी। एनडीटीवी की टीआरपी पाताल में धँसते जा रही है और रवीश नाक में धँसने वाला मॉलिक्यूल बनाने की बात कर रहे हैं। उनका मीडिया संस्थान कंगाल होने की ओर अग्रसर है और वो युवाओं को बौद्धिक रूप से कंगाल बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

अफवाह ऐसे फैलाई जा रही है, जैसे लगता हो कि जेएनयू की फी काफ़ी महँगी है। जबकि देखा जाए तो विश्वविद्यालय ने सालाना 240 रुपए के ट्यूशन या 9 रुपए के लाइब्रेरी फी में कोई बदलाव नहीं किया है। बस हॉस्टल मैनुअल अपडेट हुआ है। जिन सेवाओं का छात्र इस्तेमाल करेंगे, उनका शुल्क देना होगा। शुल्क कम देना है, कम बिजली पानी यूज कीजिए। 10 रुपए से 300 रुपए हुए मासिक हॉस्टल फी को 3000% की वृद्धि बता कर प्रचारित किया जा रहा है। क्या ये भ्रामक नहीं? इससे जेएनयू महँगा तो नहीं हो जाता। उसकी तुलना उसके इर्द-गिर्द स्थित आईआईटी और आईआईएमसी से न ही करें तो बेहतर।

मुफ्त शिक्षा के लिए बजट कहाँ से आएगा? सरकार ने 12वीं तक की शिक्षा पहले ही मुफ़्त कर रखी है। जर्मनी और नॉर्वे जैसे देशों में उच्च-शिक्षा काफ़ी सस्ती है, लेकिन उसकी जनसंख्या से ज्यादा लोग तो बिहार के कई जिलों में रहते हैं। 130 करोड़ लोगों के देश में सभी के लिए मुफ्त शिक्षा की बात ही बेमानी है, जहाँ की जीडीपी अपना राजस्व घाटा कम करने के लिए संघर्ष कर रही हो। जेएनयू के आंदोलन के पीछे राजनीति हो रही है, इसमें कोई शक नहीं। सत्ता में अस्थिरता फैलाने की मंशा रखने वाले वामपंथी इस पर जवाब देंगे कि चीन की वामपंथी सरकार ने हॉन्गकॉन्ग के छात्रों के साथ कैसा व्यवहार किया है?

दरअसल, रवीश ने एक लेख लिखा। इसमें उन्होंने युवाओं को सड़क पर उतर कर अराजकता फैलाने की अपील की। भले ही उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा किया लेकिन उनकी मोदी-विरोधी मंशा हिलोरे मारते हुए अपना प्रत्यक्ष परिचय दे रही थी। रवीश ने हिंदी पट्टी के नौजवानों को अभिशप्त करार दिया। उन्होंने हिंदी बेल्ट के युवाओं की राजनीतिक समझ पर सवाल खड़े किए। रवीश ने कहा कि यहाँ के युवाओं की राजनीतिक समझ थर्ड क्लास की है। वो कहते हैं कि थर्ड क्लास न होती तो वो भी जेएनयू वालों की तरह ही सड़क पर होते।

क्या रवीश चाहते हैं कि यूपी-बिहार के युवा भी अपने कॉलेज के किसी डीन को घेर कर दुर्व्यवहार करें, जिससे वो वहीं अचेत होकर गिर पड़े? उसकी बीवी और बच्ची गिड़गिड़ाते रहें, क्योंकि बीमार डीन को जल्दी अस्पताल पहुँचाना है और छात्र नारेबाजी करते हुए एम्बुलेंस को घेर कर खड़े हो जाएँ? जी हाँ, ऐसा जेएनयू में हुआ, जब प्रोफेसर उमेश कदम मरते-मरते बचे। क्या रवीश चाहते हैं कि हिंदी पट्टी की छात्राएँ भी अपने कॉलेज की किसी महिला प्रोफेसर के कपड़े फाड़ने का प्रयास करे? ऐसा जेएनयू में हुआ। उन्हीं छात्रों ने किया, एक हाथ में जो महिलाधिकार का झंडा और दूसरे हाथ में कैंडल लिए आए दिन सड़कों पर निकलती हैं।

युवाओं को भड़काते हुए रवीश कुमार का फेसबुक पोस्ट

कहीं रवीश की इच्छा ये तो नहीं कि बिहार के छात्र संगठनों में वामपंथ काबिज हो जाए और नेता झूठी अफवाह फैलाएँ कि कैम्पस में सीआरपीएफ तैनात कर छात्रों को पिटवाया जा रहा है। जेएनयू के छात्र नेता साकेत मून ने कुछ ऐसा ही किया। आवाज़ उठाने और सड़क पर उतरने के लिए युवाओं को जेएनयू से सीखने की सलाह देने वाले रवीश कहीं ऐसा तो नहीं चाहते कि यूपी-बिहार के कॉलेजों में भी महिला पत्रकारों के साथ बदतमीजी की जाए और उनके ‘मजे लेने’ की बात कही जाए। महिला मीडियाकर्मियों को घेर कर गुंडागर्दी करने का काम जेएनयू के उपद्रवी कर चुके हैं।

आखिर पढ़ने के लिए राजनीति करना अनिवार्य क्यों है? राजनीति की समझ होना, राजनीतिक चर्चा करना और सड़क पर उतर कर राजनीति करना अलग-अलग चीजें हैं। जब रवीश कहते हैं कि हिन्दू पट्टी के युवा चुप हैं, तब क्या वो उन्हें अराजकता फैलाते हुए जेएनयू के उपद्रवियों की तरह पुलिस बैरिकेडिंग तोड़ कर क़ानून-व्यवस्था की ऐसी-तैसे करने को नहीं भड़का रहे? क्या रवीश कुमार जवाब देंगे कि सोमवार (नवंबर 18, 2019) को दिल्ली में उद्योग भवन, लोक कल्याण मार्ग, सेंट्रल सेक्रेटेरिएट और पटेल चौक मेट्रो स्टेशनों पर सेवाओं को ठप्प क्यों किया गया था? इससे कितने लोगों को परेशानी हुई, इसका कोई हिसाब नहीं। उस दिल्ली में ऐसा हुआ, जहाँ मेट्रो को सिटी की लाइफलाइन कहा जाता है।

बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी भी तो इसी देश का हिस्सा है। वहाँ के छात्र भी तो युवा ही हैं। वो अपने ही विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना मदन मोहन मालवीय के मूल्यों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उनके बारे में रवीश ने कभी लिखा क्या? बीएचयू में महमना का नियम चलेगा या फिर किसी वामपंथी वीसी की मनमानी? अगर ऐसा है तो वहाँ शिलापट्टों पर लिखे महामना के विचारों को उसी स्प्रे पेंट्स से मिटा देना चाहिए, जिसका प्रयोग कर के विवेकानंद को अपमानित किया गया था। और हाँ, उस स्प्रे पेंट की कीमत जेएनयू के कई छात्रों के हॉस्टल फी से ज्यादा होती है।

लेकिन, रवीश कुमार बीएचयू पर नहीं लिखेंगे। वे कैलिफोर्निया से अराजकता भड़काने की मीठी गोली फेंकेंगे। उन्होंने मंगलवार को ख़ुद बताया कि वो फ़िलहाल कैलिफोर्निया के कॉलेज ऑफ केमिस्ट्री में घूम रहे हैं। मज़ाकिया अंदाज़ में उन्होंने लिखा कि वो एक ऐसा मॉलिक्यूल बना रहे हैं, जो कम्युनल/ फेक टेक्स्ट के साथ अपने आप चिपक जाएगा। हालाँकि, उन्होंने ये नहीं बताया कि ये मॉलिक्यूल झूठ बोल कर और भ्रामक बातें कर के युवाओं को अराजकता फैलाने के लिए भड़काने वालों के कहाँ जाकर चिपकेगा? रवीश ने लिखा कि जैसे ही कोई कम्युनल टेक्स्ट पढ़ेगा, उसकी नाक से होते हुए मॉलिक्यूल दिमाग़ में अलार्म बजाने लगेगा।

अगर सच में ऐसा है तो रवीश को इस मॉलिक्यूल का प्रयोग ख़ुद पर तो कभी नहीं करना चाहिए। वरना वो डूबते चैनल एनडीटीवी के लो-टीआरपी शो ‘प्राइम टाइम’ में बैठेंगे तो उनके रुदन की जगह जनता को एक घंटे तक अलार्म की आवाज़ ही सुनने मिलेगी। दावा तो उन्होंने ये किया है कि ये अलार्म दिमाग में बजेगा लेकिन रवीश के मामले में कहाँ से आवाज़ निकलेगी, इस पर वो फ़िलहाल चुप हैं। राज्यसभा का 250वाँ सत्र चल रहा है। ऐसे में रवीश चाहते हैं कि इस ऐतिहासिक मौके पर कुछ ऐसा हो, जिससे जनता का ध्यान वहाँ से हट कर कहीं और चला जाए। सड़कों पर ख़ून बहे और अराजकता फैले।

ये भी पढ़ें: पत्रकारिता के अंतिम पैगंबर रवीश जी के अंतरात्मा की आवाज: सुप्रीम कोर्ट बेवफा है!
ये भी पढ़ें: ख़ुद में ‘ढुका लाग के’ देखिए रवीश जी, दूसरों को ‘लबरा’ बता कर नेतागिरी करना बंद कर देंगे

अलीगढ़ नहीं हरिगढ़ कहिए जनाब! योगी सरकार से की गई नाम बदलने की माँग

बीते दिनों खबर आई थी कि उत्तर प्रदेश की सरकार आगरा का नाम बदलकर अग्रवन करना चाहती है। इस संबंध में सरकार की ओर से ऐतिहासिक प्रमाण मॉंगे गए हैं। अब अलीगढ़ का नाम बदलने की भी मॉंग उठने लगी है। योगी सरकार से अलीगढ़ का नाम बदलकर ‘हरिगढ़’ करने की मॉंग भाजपा के स्थानीय नेताओं ने किया है। अलीगढ़ का नाम बदलने की पहल तब भी हुई थी जब कल्याण सिंह प्रदेश के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। लेकिन, उस समय केंद्र में कॉन्ग्रेस की सरकार होने के कारण यह मुमकिन नहीं हो पाया था।

भाजपा की महानगर उपाध्यक्ष सुबोध स्वीटी ने इस बारे में बात करते हुए कहा कि तत्कालीन सीएम कल्याण सिंह ने 1992 में मुख्यमंत्री रहते हुए शहर का नाम हरिगढ़ करने कोशिश की थी लेकिन उस वक्त केंद्र में कॉन्ग्रेस सरकार थी, इसलिए उनकी कोशिशें कामयाब नहीं हुईं।

उल्लेखनीय है कि साल 2015 में विश्व हिन्दू परिषद ने अलीगढ़ में एक प्रदेशव्यापी बैठक में प्रस्ताव पास कर शहर का नाम हरिगढ़ करने की माँग की थी। बीते साल जब आजमगढ़ का नाम आर्यमगढ़ करने का प्रस्ताव योगी सरकार तैयार कर रही थी, तब सांसद सतीश गौतम और शहर विधायक संजीव राजा ने शासन स्तर पर अलीगढ़ को हरिगढ़ करने की माँग की थी।

सांसद सतीश गौतम ने बताया कि पूर्व में भी अलीगढ़ को उसका प्राचीन नाम हरिगढ़ दिलाने की माँग अरसे से उठाई जा रही है। शासन स्तर पर भी इससे अवगत कराया गया है। वहीं, विधायक संजीव राजा ने कहा, पुरातन समय से हरिगढ़ नाम से ही शहर को जाना जाता था, लेकिन मुगलकाल में इसे अलीगढ़ कर दिया गया। पुराना स्वरुप वापिस लौटने का समय आ गया है।

बीते दिनों आम्बेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. अरविंद कुमार दीक्षित ने बताया था कि उन्हें शासन की ओर से आगरा का नाम अग्रवन करने के संबंध में पत्र मिला है। पत्र में उससे जुड़े ऐतिहासिक साक्ष्य के बारे में पूछा गया है। विश्वविद्यालय ने इस संबंध में शोध के लिए टीम बना दी है।

आगरा के एत्माद्दौला में हनुमान मूर्ति की आँखें निकाली, तनाव के बाद पुलिस तैनात

उत्तरप्रदेश के आगरा में भगवान हनुमान की मूर्ति क्षतिग्रस्त किए जाने की घटना सामने आई है। घटना शहर के एत्माद्दौला क्षेत्र के घनी आबादी वाले महावीर नगर की है। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक कुछ शरारती तत्वों ने हनुमान मूर्ति की आँखें निकाल ली। लोगों को इसकी भनक मंगलवार (19 नवंबर 2019) की सुबह लगी जब वे मंदिर पहुँचे।

घटना की सूचना मिलते ही बड़ी संख्या में लोग मौके पर जमा हो गए। आनन-फानन में पुलिस भी पहुॅंची और लोगों को समझा-बुझाकर शांत कराया। तनाव को देखते हुए पुलिस बल की तैनाती की गई है। अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर पुलिस जॉंच कर रही है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, मंदिर के पुजारी महावीर दास ने बताया कि घटना सोमवार और मंगलवार की दरम्यानी रात घटी। वहीं एत्माद्दौला थाने के स्टेशन ऑफिसर उदयवीर सिंह मलिक का कहना है कि मंगलवार की सुबह घटना की जानकारी मिलते ही पुलिस हरकत में आई। खंडित मूर्ति को हटाकर उसकी जगह नई मूर्ति स्थापित करा दी गई है। इस मामले में पुलिस द्वारा अज्ञात शरारती तत्वों के खिलाफ आईपीसी की धारा 153 के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस ने बताया है कि वे इलाके में किसी सीसीटीवी कैमरे को ढूँढने का प्रयास कर रही है, ताकि मंदिर के पास घूम रहे संदिग्धों की पहचान करके आरोपितों की पहचान की जा सके।

गौरतलब है कि हिंदुओं की भावना आहत करने के इरादे से मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्ति खंडित करने का ये पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी आगरा के पड़ोसी जिलों से कम से कम 15 ऐसी घटनाओं की खबर बीते कुछ दिनों में सुनने को मिल चुकी हैं। इससे पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के चांदनी चौक इलाके में भी हिंदू मंदिर में देवी-देवताओं की मूर्तियों के साथ तोड़फोड़ की खबर ने तूल पकड़ा था। जब पुलिस ने मोहम्मद जुबेर और अनस नाम के शख्स को गिरफ्तार किया था और बाद में 10 लोगों की गिरफ्तारी हुई थी।

इसके अलावा जून महीने में उत्तर प्रदेश के पीलीभीत के रोहनिया गाँव में एक मुस्लिम भीड़ द्वारा लाउडस्पीकर का विरोध करने पर भी एक मंदिर में तोड़-फोड़ की गई थी। जिसके बाद इलाक़े में साम्प्रदायिक तनाव फैल गया था। इस दौरान भीड़ ने लाउडस्पीकर को तोड़ दिया था और मंदिर की मूर्तियों को अपने साथ ले गए। इस घटना में महबूब, मोनिस, इज़राइल, आज़ाद और अलनूर को गिरफ्तार किया गया था।

फिर, खतौली से भी खबर आ चुकी है कि वहाँ एक मुस्लिम युवक ने कुछ समय पहले मंदिर में प्रवेश करके वहाँ स्थापित हनुमान जी की मूर्ति को तोड़ने का प्रयास किया था। इस दौरान आरोपित ने मंदिर में पूजा करने वाले भक्तों के साथ दुर्व्यवहार भी किया था। हालाँकि इस घटना में घटनास्थल पर मौजूद लोग अपराधी को पकड़ने में क़ामयाब रहे, लेकिन वह उसे मंदिर के शीशे को तोड़ने से नहीं रोक सके। पुलिस ने आकर उसे गिरफ़्तार किया। आरोपी की पहचान मूसा के रूप में हुई।

ये भी पढ़ें: देश भर के मंदिरों में तोड़-फोड़, पेशाब करने, गंदी फोटो लेने की 10 घटनाएँ

पाक परस्त संगठन के साथ जुड़ेंगे शशि थरूर, लंदन के कार्यक्रम में NDTV की निधि राजदान भी हुई थी शामिल

राहुल गॉंधी सहित कई कॉन्ग्रेसी नेताओं के बयानों का हवाला देकर कश्मीर पर पाकिस्तान अपने प्रोपगेंडा को हवा देता रहता है। अब कॉन्ग्रेस के चर्चित सांसद शशि थरूर ने एक ऐसे संगठन से जुड़ने का फैसला किया है जो पाक परस्त माना जाता है। हाल ही में इस संगठन ने लंदन में कार्यक्रम आयोजित कर कश्मीर पर पाकिस्तानी प्रोपगेंडे को हवा दी थी। कार्यक्रम के दौरान भारत विरोधी बातें की गई थी। इस कार्यक्रम में एनडीटीवी की एंकर निधि राजदान भी शामिल हुई थीं। ब्रिटेन की इस पाकिस्तान परस्त संस्था का नाम है सीटीडी एडवाइज़र्स। थरूर इस संस्था के रणनीतिक सलाहकार का पद संभालेंगे।

सीटीडी एडवाइज़र्स का गठन पिछले साल पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश बैंकर शोएब बाजवा ने किया था। उनकी संस्था ने 7 नवम्बर को लन्दन में एक कार्यक्रम आयोजित किया था। “द कॉस्ट टू ब्रिटेन ऑफ़ द कश्मीर क्राइसिस-इज़ देयर अ सोल्यूशन” नाम यह कार्यक्रम भारत विरोधी एजेंडे का हिस्सा था। कार्यक्रम में कश्मीर को लेकर कई तरह के भ्रम और झूठ फ़ैलाने की कोशिश की गई।

इस कार्यक्रम में एनडीटीवी की एंकर निधि राजदान भी शामिल हुई थीं। निधि ने भी कश्मीर पर उसी सुर में बात की जैसे पाकिस्तान करता रहता है। निधि ने कश्मीर में भारत की कार्रवाई को विश्व का सबसे बड़े लोकतंत्र पर धब्बा बताया था।

इस कार्यक्रम में संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की दूत रहीं मलीहा लोधी और ब्रिटेन के पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ल्या ग्रांट भी मौजूद थे। ग्रांट ने भी विवादित बयान देते हुए कहा था कि मोदी सरकार का कदम कश्मीरियों को कट्टरपंथ की ओर ढकेल रहा है। उन्होंने कहा कि इसका सीधा प्रभाव ब्रिटेन की सुरक्षा पर पड़ेगा, क्योंकि यहाँ करीब 10 लाख कश्मीरी रहते हैं।

गौरतलब है कि इस कार्यक्रम का समर्थन जेकेएलएफ जैसे आतंकी संगठन ने भी किया था। कश्मीर में कट्टरपंथ और आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले जेकेएलएफ ने निधि को भी शाबाशी दी थी। निधि राज़दान के भाषण की सराहना करते हुए जेकेएलएफ ने इसे कश्मीरियों को एक मंच पर लाने का अच्छा प्रयास बताया था। थरूर के साथ ब्रिटेन के पूर्व एनएसए ग्रांट भी सीटीडी एडवाइज़र्स को ज्वाइन करेंगे। ब्रिटेन की खुफिया सुरक्षा सेवा के पूर्व प्रमुख क्रिस निकोलस और फ्रेंड्स ऑफ इजरायल ग्रुप्स के मानद अध्यक्ष लॉर्ड स्टुअर्ट पोलॉक भी इस संस्था के साथ जुड़ने जा रहे हैं।

ये भी पढ़ें: कश्मीरियों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जा रहा: NDTV की निधि राजदान और Pak चैनलों ने फैलाया झूठ
ये भी पढ़ें: कश्मीर पर पाक प्रायोजित कार्यक्रम में शामिल हुईं NDTV की निधि राजदान, आतंकी संगठन ने कहा- शाबाश

एक छात्र पर सालाना खर्च ₹7 लाख, नतीजा नील बटे सन्नाटा: JNU की कहानी, आँकड़ों की जुबानी

जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में हॉस्टल मैन्युअल अपडेट किए जाने को लेकर विवाद चल रहा है। इस सम्बन्ध में कुछ बातें हैं, जो आपके लिए जाननी ज़रूरी है। इसे आँकड़ों के माध्यम से समझने की ज़रूरत है। दरअसल, इस यूनिवर्सिटी में सबसे ज्यादा छात्र आर्ट्स, सोशल स्टडीज, लैंग्वेज कोर्स और इंटरनेशनल स्टडीज पढ़ते हैं। जेएनयू में लगभग 8,000 छात्र हैं। इनमें से आधे से ज्यादा आर्ट्स, लैंगवेज, लिटरेचर और सोशल साइंस के हैं। 57% छात्र इन्हीं चार विषयों की पढ़ाई करते हैं। बाकी बचे छात्रों में से 15% इंटरनेशनल स्टडीज में हैं। कुल छात्रों में से 55% एमफिल और पीएचडी कर रहे हैं।

एजुकेशन को लेकर ट्विटर पर अक्सर जानकारी साझा करने वाले अनुराग सिंह ने इन आँकड़ों को ट्वीट किया है। सवाल उठता है कि सरकार जेएनयू पर कितना ख़र्च करती है? अनुराग सिंह ने इस सवाल का जवाब भी दिया है। उन्होंने 2014 से लेकर 2018 तक जेएनयू को हुए वित्तीय लाभ और हानि का विवरण दिया है। ये आँकड़े जेएनयू के एनुअल रिपोर्ट से लिए गए हैं, जो क़रीब 600 पन्नों का है। अनुराग लिखते हैं कि जिन आँकड़ों को पहले पन्ने पर होना चाहिए, वो बीच में कहीं दबे रहते हैं।

जेएनयू को सब्सिडी और सहायता के रूप में सरकार से 352 करोड़ मिलते हैं। जेएनयू प्रतिवर्ष 556 करोड़ ख़र्च करता है। यूनिवर्सिटी के सभी कार्यों को मिला कर सालाना ख़र्च होने वाली रक़म यही है। अब सवाल उठता है कि अगर छात्रों की हिसाब से देखें तो यूनिवर्सिटी प्रति छात्र सालाना कितनी रक़म ख़र्च करता है? छात्रों की संख्या लगभग 8,000 है। कुल ख़र्च 556 करोड़ है। कैलकुलेट करने पर पता चलता है कि जेएनयू हर एक छात्र पर सालाना 6.95 लाख रुपए ख़र्च करता है। अगर हम बाकी चीजों को हटा दें और केवल सरकारी सब्सिडी और ग्रांट्स की बात करें, तब भी आँकड़ा 352 करोड़ होता है। यानी, 4.40 लाख रुपए प्रति छात्र।

अब आपको लगता होगा कि इतनी ज्यादा रक़म ख़र्च हो रही है तो छात्र ज़रूर बेहतर अकादमिक प्रदर्शन करते होंगे? आपको लगता होगा कि काफ़ी उम्दा गुणवत्ता वाले रिसर्च पेपर्स प्रकाशित होते होंगे। दुनिया भर के नामी जर्नल्स में जेएनयू के छात्रों के रिसर्च पेपर्स छपते होंगे और उनकी वाहवाही होती होगी। अनुराग बताते हैं कि ऐसा नहीं है। रिसर्च और प्लेसमेंट के बारे में जेएनयू कुछ स्पष्ट नहीं बताता। अपनी रिपोर्ट्स में वह नहीं बताता कि प्लेसमेंट्स की स्थिति क्या है? फिर भी, उपलब्ध आँकड़ों पर गौर करें तो एमफिल और पीएचडी के छात्रों की संख्या भले ही 4360 हो पर रिसर्च पेपर्स की संख्या 1000 छूने में भी हाँफ जाती है।

अनुराग सिंह ने आगे कैलकुलेट कर के बताया कि प्रतिवर्ष औसतन 4.5 छात्रों में से 1 के ही ‘आर्टिकल’ जर्नल में छप पाते हैं। हर साल 2000 से भी अधिक इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस में छात्र हिस्सा लेते हैं। जब रिसर्च पेपर नहीं छप रहे और न कोई पेटेंट्स आ रहे, तो फिर उन कॉन्फ्रेंस से क्या प्राप्त होता है, ये तो भगवान ही जानें। हर साल क़रीब 600 पीएचडी धारक निकलते हैं और न कोई उम्दा रिसर्च पेपर और न कोई पेटेंट।

तो फिर हंगामा क्यों? फी बढ़ाने का आरोप लगा कर विरोध-प्रदर्शन क्यों? जेएनयू में ट्यूशन फी मात्र 240 रुपए प्रतिवर्ष है। लाइब्रेरी फी के नाम पर प्रतिवर्ष मात्र 6 रुपए लिए जाते हैं। सिक्योरिटी डिपाजिट मात्र 40 रुपए है, जो वापस भी मिल जाते हैं। ये आँकड़े एमफिल और पीएचडी के हैं।

आईआईटी दिल्ली जेएनयू के बगल में ही स्थित है। वहाँ छात्रों के प्रतिवर्ष 2.25 लाख ख़र्च होते हैं। इसी तरह आईआईएमसी में प्रतिवर्ष 5 से 10 लाख रुपए फी लगते हैं। जब चार्जेज में मामूली बढ़ोतरी की गई है, तब इस सवाल का उठना लाजिमी है कि जेएनयू छात्र संगठन के इस विरोध-प्रदर्शन का औचित्य क्या है? वैसे भी जेएनयूएसयू के विभिन्न पदों पर वामपंथी छात्र संगठन के लोग काबिज हैं।

यह भी पढ़ें: देश का सबसे बेहतर शोध संस्थान जो रैंकिंग में फिसड्डी और राजनीति का अड्डा है
यह भी पढ़ें: 10 रुपए महीने पर कमरा उपलब्ध है, ‘अंकल-आंटियों’ को चट्टानों पर रात में भी जाना होता है

2017 में घर से निकला इंजीनियर 2 साल बाद पाक में पकड़ा गया, कहा- गर्लफ्रेंड से मिलने तुर्की जा रहा था

पाकिस्तान ने 2 भारतीय नागरिकों को गिरफ्तार किया है। इनकी पहचान हैदराबाद के सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रशांत मैदाम और मध्यप्रदेश के किसान डुरमी लाल के रूप में हुई है। दोनों को पिछले हफ्ते पंजाब के बहावलपुर के रेगिस्तानी इलाके से पकड़ा गया। बहावलपुर पुलिस ने 14 नवंबर को इनके खिलाफ मामला दर्ज किया। बताया जा रहा है कि दोनों युवकों बिना किसी वैध कागजात के पाकिस्तान के सीमा में प्रवेश कर गए थे। इनके पास न तो वीजा था और न ही पासपोर्ट।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार प्रशांत मैदाम ने बताया है कि वह तुर्की में रहने वाली महिला से प्यार करता है। पाकिस्तान-अफ्गानिस्तान के रास्ते वह उससे मिलने जा रहा था। वहीं, डुरमी लाल का कहना है कि वह बॉर्डर देखना चाहते था और गलती से सीम पार कर गया।

बहावलपुर के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने स्थानीय पुलिस को इन दोनों भारतीयों को मुल्तान में संघीय जाँच एजेंसी को सौंपने को कहा। जाँच के बाद एजेंसी ने दोनों को पुलिस के हवाले कर दिया। फिलहाल दोनों युवक बहावलपुर पुलिस की हिरासत में हैं।

पाकिस्तान के एक पुलिस अधिकारी ने बताया, “प्रशांत खुशनसीब है कि वो यहीं गिरफ्तार हो गया। हमें नहीं मालूम अगर वो पाकिस्तान से अफ़ग़ानिस्तान पहुँच गया होता, तो उसका क्या होता।” बताया जा रहा है कि जरूरी कार्रवाई पूरी होने के बाद जल्द ही दोनों युवकों को भारत भेजा जा सकता है।

वहीं, तेलंगाना पुलिस के मुताबिक प्रशांत साल 2017 से ही हैदराबाद से गायब है। लेकिन अब इस सूचना के बाद साइबराबाद के पुलिस कमिश्नर वीसी सज्जनर ने राज्य सरकार को एक पत्र लिखा है, जिससे विदेश मंत्रालय को संपर्क किया जा सके और प्रशांत की वापसी संभव हो सके।

पाकिस्तान में बेटे के पकड़े जाने की खबर मिलने के बाद से प्रशांत मैदाम के पिता बाबू राव परेशान हैं। उनके अनुसार उन्हें प्रशांत के पाक में होने की खबर न्यूज चैनलों से मिली। उन्होंने पुलिस कमिश्नर सज्जानर से मिलकर अपने बेटे को वापस लाने की अपील की है। उन्होंने बताया है कि 2 साल पहले उनका लड़का घर से ऑफिस के लिए निकला था, लेकिन वापस नहीं है। जिसके संबंध में उन्होंने 11 अप्रैल को लड़के के गुमशुदगी की शिकायत साइबराबाद की माधापुर पुलिस में दर्ज भी करवाई थी।

उस पादरी ने पहले मुझे अपनी जाँघों पर बिठाया, फिर छूने लगा, धीरे-धीरे…

वेटिकन चर्च से एक बार फिर यौन शोषण के मामले उजागर हुए हैं। एक समय में सामुदायिक सेवाओं के दौरान सहयोग करने वाले 3 लड़कों ने आरोप लगाया है कि चर्च के कम से कम 2 पादरियों ने उनका यौन उत्पीड़न किया। वेटिकन चर्च द्वारा फादर गैबरिल मार्टिनेली ( Father Gabriele Martinelli) और फादर एनरिको रेडिक (Father Enrico Radice) को यौन अपराध के आरोपों पर सुनवाई करने की जिम्मेदारी देने के 2 महीने के भीतर ये मामले प्रकाश में आए हैं।

इससे पहले इस मामले के संबंध में एक इटेलियन टीवी प्रोग्राम ली लेने (द हाइनास) ने भी साल 2017 में खुलासा कर बताया था कि रोम की कैथोलिक पाठशाला में पढ़ाने वाले सेमिनेरियन, जो फिलहाल पादरी है ने सेंट पीटर बेसिलिका में सामुदायिक सेवाओं में सहयोग करने वाले किशोरों का यौन शोषण किया था। जानकारी के अनुसार पादरियों पर पर लगे सभी आरोप 1980 और 1990 के समय के हैं जब पीड़ित लड़के 10 या 14 साल की उम्र के थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आयोजन में शामिल एक लड़के ने एक पादरी पर इल्जाम लगाते हुए आपबीती सुनाई। लड़के ने बताया, “स्कूल में कम्यूनल शॉवर का प्रबंधन करने वालों में से एक पादरी ने पहले मुझे अपनी गोद में बिठाया और फिर मेरे प्राइवेट पार्ट को छूने लगा। धीरे-धीरे पादरी मेरे कपड़े उतारने की कोशिश करने लगा और मैं उसे दूर हटाने का प्रयास करता रहा। तब मैं केवल 13 साल का था। मैं जमीन पर गिर गया और उससे पूछा कि ये आप क्या कर रहे हैं? इसके बाद मैं उठा और वहाँ से भाग गया।”

इसके बाद दूसरे पीड़ित लड़के के मुताबिक उसका उत्पीड़न कासा सांता मारता में हुआ था, जहाँ बहुत से पादरी रहते थे। पीड़ित के मुताबिक उसे एक पादरी ने यूथ पाठशाला के दौरान पकड़ लिया था। उस समय वो करीब 10 साल का था। इसके बाद पादरी ने उसे सीढ़ियों के ऊपर अपने कमरे में जाने को कहा और वहाँ उसके साथ छेड़खानी करने लगा। लड़के के अनुसार, “पादरी ने कमरे में पहले मुझे अपनी जाँघों पर बिठाया और मेरी जाँघों पर हाथ फेरने शुरू कर दिए। इसके बाद उसने अपना हाथ मेरे प्राइवेट पार्ट पर रख दिया। लेकिन थोड़ी देर बाद मेरे बार-बार विरोध करने पर उसे रुकना पड़ा।”

जानकारी के अनुसार आज इन पीड़ितों की उम्र 37-40 के बीच की है और अब ये खुलकर सार्वजनिक पटल पर आकर अपनी आपबीती दुनिया को सुना रहे हैं। दो पीड़ितों की तरह तीसरे ने भी एक पादरी पर ऐसे ही आरोप लगाए हैं, लेकिन उसने अपने साथ हुई घटना को विस्तार से बताने से मना कर दिया। इसके अलावा एक चौथा लड़का भी है, जिसके बारे में बताया जा रहा है कि उसने इन लड़कों से भी बुरा यौन उत्पीड़न झेला। लेकिन बोलने को तैयार नहीं हुआ। यहाँ बता दें कि यौन शोषण के आरोप के अलावा कई लोगों ने दावा किया है कि वे इनमें से कई उत्पीड़नों के चश्मदीद हैं।

बता दें बीते कुछ समय से वेटिकन चर्च ऐसी खबरों को लेकर कई बार चर्चाओं में आ चुका है। पिछले साल कार्डिनल जियॉर्ज पेल को 1990 के दशक में 2 लड़कों का यौन उत्पीड़न करने के आरोप में 6 साल की सजा मुकर्रर की गई थी। इसी साल जनवरी में वेटिकन चर्च और पोप फ्रांसिस को तब बेहद शर्मिंदा होना पड़ा था, जब हरमैन गेस्लर नामक पादरी को उन्होंने यौन उत्पीड़न से संबंधित मामलों की सुनवाई करने के लिए नियुक्त किया था। लेकिन वह खुद ऐसे मामलों में लिप्त था। इसके कारण उसे दो महीने में ही अपना पद छोड़ना पड़ा।

J&K में हालात कब होंगे सामान्य: सांसद माजिद मेमन के सवाल पर शाह ने कहा- हो चुका है

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने बुधवार (नवंबर 20, 2019) को राज्यसभा में बयान दिया। जम्मू-कश्मीर के हालात पर उन्होंने बात रखी। शाह ने कहा कि राज्य में दवाओं की कोई कमी नहीं है और दवा दुकानों से लेकर अस्पतालों तक, हर जगह दवाओं की व्यवस्था की गई है।

उन्होंने बताया कि सिर्फ़ सितम्बर में श्रीनगर में 7,67,000 लोगों का ओपीडी में इलाज किया गया। अक्टूबर में ये आँकड़ा 7,91,000 रहा। जब एनसीपी के सांसद माजिद मेमन ने पूछा कि जम्मू-कश्मीर में स्थिति समान्य कब होगी तो शाह ने कहा कि स्थिति सामान्य हो चुकी है। शाह ने कहा कि 5 अगस्त के बाद से अब तक एक भी निर्दोष व्यक्ति की जान पुलिस की गोली से नहीं गई है।

पत्थरबाजी के आँकड़े गिनाते हुए गृहमंत्री ने कहा कि पिछले वर्ष इस वक़्त तक 802 पत्थरबाजी की घटनाएँ हुई थी, लेकिन इस साल ये आँकड़ा उससे कम होकर 544 पर जा पहुँचा है। उन्होंने बताया कि सभी 20,400 स्कूल खुले हैं। उन्होंने कहा कि 50,000 से भी अधिक (99.48%) छात्रों ने 11वीं की परीक्षा दी है। घाटी के सभी हॉस्पिटल खुले हैं। शाह ने बताया कि चावल और केरोसिन की बिक्री में गत साल से 8 से 16% तक वृद्धि हुई है। उन्होंने आगे कहा कि इस बार 22.5 लाख मीट्रिक टन सेब की उपज हुई है, जिनमें से भारी मात्रा में सेब बाहर भी गए हैं।

इससे पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री सुब्रह्मण्यम स्वामी और भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साफ़ कर दिया कि गाँधी परिवार की एसपीजी सिक्योरिटी हटाना कोई राजनैतिक निर्णय नहीं है बल्कि गृह मंत्रालय ने ‘थ्रेट परसेप्शन’ ख़तरे के स्तर को देखते हुए प्रोटोकॉल के तहत निर्णय लिया है। आनंद शर्मा ने इस फ़ैसले को राजनीतिक करार दिया। उनके बयान का जवाब देते हुए स्वामी ने कहा कि लिट्टे के ख़त्म होने के बाद गाँधी परिवार को कोई ख़तरा नहीं है।

लिट्टे ख़त्म हो गया तो गाँधी परिवार को खतरा कैसा, SPG सुरक्षा हटाना सही निर्णय: स्वामी

राज्यसभा सांसद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी की एसपीजी सुरक्षा हटाए जाने पर कॉन्ग्रेस नेताओं को करारा जवाब दिया है। कॉन्ग्रेस नेताओं ने बुधवार को राज्यसभा में एक सुर में आलोचना करते हुए कहा कि सरकार राजनीतिक रंजिश के कारण गाँधी परिवार की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रही है। इसके बाद भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने साफ़ कर दिया है कि यह निर्णय किसी राजनेता का नहीं बल्कि गृह मंत्रालय का है और नियमानुसार ही हुआ है। नड्डा ने कहा कि किसी भी नेता के ‘थ्रेट परसेप्शन’ को देखते हुए मंत्रालय तय प्रोटोकॉल के तहत निर्णय लेता है।

स्वामी ने कहा कि राजीव गाँधी की हत्या के बाद गाँधी परिवार को लिट्टे से ख़तरा था। अब लिट्टे ख़त्म हो गया है और इसलिए गाँधी परिवार को भी कोई ख़तरा नहीं है। बता दें कि मई 2009 में श्रीलंका ने प्रभाकरण को मार गिराया था। वह लिट्टे (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ तमिल ईलम) का संस्थापक था। तमिल कट्टरवादी संगठन लिट्टे ने ही राजीव गाँधी की हत्या की साज़िश रची थी। लिट्टे के ख़िलाफ़ लड़ाई में राजीव ने श्रीलंका सरकार की मदद की थी, जिससे वह ख़फ़ा था। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने कहा कि लिट्टे के खात्मे के बाद गाँधी परिवार को एसपीजी सिक्योरिटी की कोई ज़रूरत नहीं है।

बता दें कि गाँधी परिवार ने राजीव गाँधी के हत्यारों की सज़ा कम करने की माँग की थी। स्वामी ने जब इस मामले को सदन में उठाया तो हँगामा मच गया। कॉन्ग्रेस नेताओं ने स्वामी के इस बयान की आलोचना करते हुए शोर-शराबा किया। राजीव गाँधी के दोनों हत्यारे पेरारिवलन और नलिनी जेल में बंद हैं। प्रियंका गाँधी और सोनिया गाँधी अक्सर उनकी सज़ा कम करने की बात कहते हैं। कई लोगों का ये भी कहना है कि उस आत्मघाती हमले में कई और लोग भी मारे गए थे और उन सबकी तरफ़ से हत्यारों को क्षमादान देने का गाँधी परिवार को कोई अधिकार नहीं है।

स्वामी के बयान के बाद राज्यसभा के सभापति व उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी कहा कि वो राजीव गाँधी के हत्यारों की सज़ा कम किए जाने के पक्ष में नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ये एसपीजी सुरक्षा कवर हटाने से अलग मुद्दा है, लेकिन वे भी नहीं चाहते हैं कि नलिनी और पेरारिवलन की सज़ा कम की जाए। वहीं राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष आनंद शर्मा ने कहा कि सुरक्षा के मामलों में राजनीति से हैट कर काम किया जाना चाहिए।

ये भी पढ़ें: मामूली आदमी नहीं हैं सोनिया और राहुल गाँधी: कॉन्ग्रेस सांसदों का लोकसभा में हंगामा
ये भी पढ़ें: SPG सुरक्षा हटी, लेकिन प्रियंका गाँधी ने खाली नहीं किया सरकारी बंगला