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ISRO के चंद्रयान-2 ने भेजी क्रेटर (गड्ढे) की 3-D तस्वीरें, ‘अन्धविश्वासी’ बताने वालों के मुँह पर यह है एक तमाचा

इसरो का चंद्रयान-2 चन्द्रमा की सतह के बारे में जानकारी लगातार भेज रहा है। हाल ही में इसके मिशन पेलोड की भेजी हुई एक तस्वीर को अंतरिक्ष एजेंसी ने जनता के साथ साझा किया है। ट्विटर पर शेयर की गई यह तस्वीर चाँद के लिंडरबर्ग नामक इलाके के पास के विशालकाय गड्ढे (क्रेटर) की है।

इसरो ने लिखा, “एक नज़र डालिए चंद्रयान-2 के टीएमसी-2 से बनाई गई क्रेटर की 3-D तस्वीर पर।”

इस तस्वीर के अलावा एजेंसी ने चंद्रयान-2 के एक दूसरे हिस्से टेरेन मैपिंग कैमरा-2 (टीएमसी-2) से चाँद की सतह के बारे में मिली जानकारी भी जारी की है। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार टीएमसी-2 चंद्रयान-1 पर भेजे गए कैमरे टीएमसी-1 का फॉलो-ऑन है।

इस तस्वीर के स्पष्टीकरण में इसरो ने बताया कि सतह से 100 किलोमीटर ऊपर से ली गईं ये तस्वीरें पूरे चाँद की सतह का डिजिटल एलिवेशन मॉडल (डीईएम) बनाने में काम आएँगी। गौरतलब है कि इसरो ने चंद्रयान-2 को चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास उतारा था, जिस जगह पर अभी तक कोई और मिशन नहीं भेजा गया था और अतः यह हिस्सा अपेक्षाकृत रूप से कम जाना हुआ है।

जारी तस्वीरों में अंतरिक्षीय उल्का आदि पिंडों की मार से चाँद पर बने क्रेटरों के अलावा लावा से बनी हुई कई तरह की संरचनाएँ जैसे रिल्स, ग्रेबेन स्ट्रक्चर्स आदि के अलावा भविष्य में रिहाइश की संभावना वाली लावा ट्यूब्स भी दिखाई गईं हैं।

यहाँ याद दिलाना ज़रूरी है कि चंद्रयान-2 मिशन की 98% सफलता और केवल विक्रम लैंडर की लैंडिंग के अंतिम चरण की नाकामी को लेकर हमारे देश के कुछ कथित अति-बुद्धिजीवियों ने एजेंसी का मज़ाक बनाया था। यहाँ तक कि ऑल्ट न्यूज़ के संस्थापक और सम्पादक प्रतीक सिन्हा, दलित नेता उदित राज जैसी विचारधारा वाले बहुतों ने ऐसा जताने की प्रत्यक्ष-परोक्ष कोशिश की थी कि चंद्रयान-2 मिशन न केवल पूरी तरह विफल रहा, बल्कि इसके पीछे कारण इसके निदेशक के शिवन की निजी आस्था (लॉन्च से पहले पूजा, कथित तौर पर ज्योतिषीय रूप से शुभ घड़ी में लॉन्च करना आदि) है। इसके ज़रिए बिना सीधे-सीधे बोले ऐसा दिखाने की कोशिश की गई थी कि हिन्दू आस्था, धार्मिक कर्म कांडों में विश्वास करने वाला व्यक्ति वैज्ञानिक तौर पर अक्षम होता है, और चंद्रयान-2 को इसी हाइपोथिसिस का सबूत दिखाया गया था। चंद्रयान-2 को लगातार मिलती जा रही सफलता ऐसी ही ओछी बातें करने वाली लोगों को जवाब है।

वामपंथियों का खोखलापन, लिब्रहान रिपोर्ट की इन बातों पर साध लेते हैं चुप्पी

6 दिसंबर 1992 को उत्तर-प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद ढहा दिया गया। घटना के 10 दिन बाद पीवी नरसिम्हाराव के नेतृत्व वाली तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार ने मामले की जाँच के लिए लिब्रहान आयोग का गठन किया था। इसके बाद 17 साल तक चली मामले की जाँच के बाद आयोग ने अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार को सौंप दी थी।

लिब्रहान की इस रिपोर्ट ने भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर ढाँचा गिराने के मामले में उंगली उठाई गई थी। यही वजह है कि लिबेरल्स के लिए यह एक पसंदीदा विषय है, मगर इस रिपोर्ट के कई अन्य पहलुओं को वे देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। अपनी इस रिपोर्ट में जस्टिस लिब्रहान ने जो लिखा है, उसमें से बहुत कुछ ऐसा है जिस पर लोकतंत्र की दुहाई देने वाला कोई भी लिबरल सहमत नहीं होता। जबकि दूसरी तरफ उन बातों से पूरा इत्तेफाक रखता है, जिन्हें वह भुनाना चाहता है।

रिपोर्ट के मुताबिक यह एक ऐतिहासिक तर्क है कि हिन्दू और मजहब विशेष, दोनों के ही रिश्ते हमेशा से ही तनावपूर्ण रहे हैं। अपनी रिपोर्ट में लिब्रहान ने माना है कि इस घटना के बाद हिन्दू समाज के भीतर हिन्दू राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से लेकर हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना सुदृढ़ होती चली गई।

अपनी इस रिपोर्ट में लिब्रहान ने ज़ोर दिया है कि हिंदुत्व के बढ़ने में भले हिन्दू और मजहब विशेष के सांप्रदायिक तनाव का योगदान रहा हो मगर इसे पूर्णतः सच नहीं कहा जा सकता। दरअसल हिंदुत्व की ताकत दुनिया भर में उभरते हुए देश हैं। जबकि यह तनाव धार्मिक समुदायों के बीच आपसी संबंधों की स्थिति से तय हुआ है।

जस्टिस लिब्रहान ने अपने आयोग की रिपोर्ट में यह स्वीकार किया था कि देश में आज़ादी के पहले भी हिन्दू और दूसरे समुदाय के बीच तनाव था। दोनों समुदायों के बीच की यह कड़वाहट हाल-फिलहाल में नहीं बनी बल्कि लम्बे समय से चली आ रही है।

दोनों समुदायों के बीच तनाव बढ़ने के उच्चतम स्तर पर जाने के बाद पाकिस्तान बनने जैसे हालात हुए। पाकिस्तान ने खुद को एक इस्लामिक देश घोषित कर दिया। अपना संवैधानिक स्वरुप भी वैसा ही बना लिया जबकि विविधताओं का सम्मान करते हुए भारत ने खुद को एक सेकुलर, बहु-धार्मिक देश बनाया जहाँ कई क्षेत्र और कई राज्य अस्तित्व में आए। रिपोर्ट में कहा गया कि पार्टीशन के ज़ख्म आज भी लोगों के अन्दर जिंदा हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि ऐसी घटनाएँ भयावह थीं और शायद कभी भुलाई न जा सकें।

कमीशन की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि बँटवारे के बाद सर्वश्रेष्ठ नेतृत्व भी साम्प्रदायिकता उखाड़कर फेंकने में फेल हो गई। आगे चलकर जाति, धर्म और क्षेत्र इसी साम्प्रदायिकता का कारण बने। आज़ादी के बाद नेताओं ने हिन्दुओं और मुसलामानों के बीच खाई को मिटाने की कोई बड़ी कोशिश नहीं की।

लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में माना गया है कि भगवान राम का जन्म अयोध्या में ही हुआ था। अपनी इस रिपोर्ट में हिन्दू धर्म ग्रन्थ रामायण के आधार पर लिब्रहान कमीशन ने इस राम और अयोध्या दोनों के अस्तित्व को स्वीकार किया है। वहीं उन वामपंथी इतिहासकारों से पूछा जाना चाहिए कि जिस लिब्रहान आयोग का हवाला वे देते हैं, इस रिपोर्ट के राम और अयोध्या को मानने के बावजूद वे दोहरा रवैय्या क्यों रखते हैं।

रिपोर्ट ने कहा है कि बाबरी मस्जिद एक्शन कमिटी में एक भी मजहब विशेष का शख्स शामिल नहीं था जबकि इस कमिटी का गठन ही तब हुआ था जब मंदिर का ताला खोलकर हिन्दुओं को पूजा करने के लिए इजाज़त दी गई थी।

दरअसल यह बात किसी से छिपी नहीं है कि लिबरल अक्सर समुदाय विशेष से ज़हर उगलने वाले नेताओं को बढ़ावा देते आए हैं। इनमें जमा मस्जिद के शाही इमाम जैसे शामिल हैं जिन्होंने 1987 में खुले-आम दंगे भड़काने की बात कही थी। वहीं रिपोर्ट में शहाबुद्दीन ओवैसी (असदुद्दीन ओवैसी के पिता) का भी नाम है जिसने गणतंत्र दिवस के बहिष्कार का भी ऐलान किया था।

आयोग भले आम आदमी की भागीदारी से इनकार करे मगर रामजन्म भूमि आन्दोलन एक बहुत ही व्यापक आन्दोलन था, इस तथ्य से कतई इनकार नहीं किया जा सकता। देश की राजनीति पर किसी भी आन्दोलन का इतना प्रभाव नहीं पड़ा जितना कि देश की राजनीति पर इस मुद्दे से पड़ा।

लिहाज़ा आयोग का यह कहना पूरी तरह से गलत है कि इस आन्दोलन में आम आदमी की कोई भागीदारी थी ही नहीं। यह एक तथ्य है जो सभी को ज्ञात है कि राम मंदिर के लिए इस आन्दोलन में आम आदमी ने बढ़-चढ़कर भूमिका निभाई थी। जन्मभूमि के अन्दोलन में जनसमर्थन इस हद तक था कि लोगों को संभालने में सेकुलर सरकार की मशीनरी खुद ही फेल हो गई।

मीडिया खुद अपनी भूमिका पर उठने वाले सवालों पर चुप्पी साध लेता है। आयोग की इस रिपोर्ट में मीडिया की गैर-जिम्मेदाराना रिपोर्टिंग पर टिप्पणी की गई है। लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट में तमाम झुकावों के बावजूद यह भी साफ़ हो गया कि मीडिया ने अहम तथ्यों को अपनी रिपोर्टिंग से ही गायब कर दिया। वहीं आयोग की निष्पक्षता पर भी सवाल उठाना लाजिमी है क्योंकि व्यापक जनसमर्थन वाले इस आन्दोलन में कमीशन ने तो जनता के होने से ही इनकार कर दिया था।

J&K: दुकानदार मेहराजुद्दीन को जिहादियों ने मारी गोली, पुलवामा के त्राल की घटना

जम्मू कश्मीर में जिहादी आतंकवादियों ने एक कपड़े के दुकानदार की गोली मारकर हत्या कर दी है। दुकानदार की शिनाख्त मेहराजुद्दीन के रूप में हुई है। उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाया गया लेकिन वहाँ उन्हें डेड ऑन अराइवल यानी मौके पर ही मृत घोषित कर दिया गया। घटना पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित पुलवामा के त्राल सेक्टर की है।

रिपब्लिक की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से दावा किया गया है कि मेहराजुद्दीन को गोली पॉइंट-ब्लैंक पर यानी बेहद करीब से मारी गई है। इस घटना के बाद आतंकित लोगों ने इलाके के काम-धंधे, दुकानें आदि बंद कर दिए हैं। उनकी हत्या टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार अपनी दुकान में ही हुई। ऐसा अंदेशा जताया जा रहा है कि यह हत्या जिहादियों की हड़ताल को अनसुना करने वालों को धमकी के रूप में की गई है।

पुलिस उनके हत्यारों को ढूँढ़ने का प्रयास कर रही है, लेकिन अभी तक कोई सफ़लता हाथ नहीं लगी है।

इस हत्याकांड जैसे ही कई मामलों में जिहादी 5 अगस्त, 2019 को अनुच्छेद 370 को कश्मीर से निरस्त करने के लिए लगाए गए कर्फ्यू के हटने के बाद से इलाके में कामधंधा चालू करने की कोशिश कर रहे लोगों की हत्याएँ कर चुके हैं। वे कभी सेबों की कश्मीर से बाहर ढुलाई करने करने आए ट्रक चालकों की हत्याएँ कर रहे हैं, तो कभी कामगारों और मजदूरों की।

अभी कल ही रक्षा विशेषज्ञ अभिजित अय्यर-मित्रा ने ऐसी ही घटनाओं का हवाला देते हुए दावा किया था कि इनके चलते अभिवावक बच्चों को घाटी में स्कूल नहीं भेज रहे हैं और स्कूलों को अख़बार में विज्ञापन देकर उसके ज़रिए पाठ्यक्रम पूरा कराना रहा है।

केजरीवाल बढ़ा सकते हैं ऑड-इवेन स्कीम की डेडलाइन, सुप्रीम कोर्ट ने भेजा नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने आज (बुधवार, 13 नवंबर 2019 को) दिल्ली सरकार को 4 नवंबर से 15 नवंबर, 2019 तक लागू ऑड-इवेन स्कीम को लेकर नोटिस भेजी है। यह नोटिस सरकार के इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती के बाद भेजी गई है। और इस बीच दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने घोषणा की है कि अगर ज़रूरत पड़ी को इस स्कीम को आगे और भी खींचा जा सकता है

इस स्कीम के तहत चौपहिया वाहनों को दिल्ली की सड़क पर आने की अनुमति अपनी नंबर प्लेट के अंतिम अंक के हिसाब से मिलेगी। यानी ‘ऑड’ वाले दिन (विषम संख्या वाली तारीख वाले दिन) केवल ‘ऑड’ नंबर पर खत्म होने वाली नंबर प्लेट वाली कारों को अनुमति होगी, वहीं ‘इवेन’ तारीख वाले दिन इवेन नंबर पर खत्म होने वाली नंबर प्लेट वाली कारों को। इस व्यवस्था को नोएडा के एक वकील ने चुनौती दी है, जिन्होंने इसे मूलभूत अधिकारों का उल्लंघन बताया है। याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि यह रोज़गार करने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत मिले संरक्षण का उल्लंघन है। साथ ही उन्होंने इसे ‘महज़ एक राजनीतिक और वोट बैंक के लिए खिलवाड़ जैसा स्टंट’ करार दिया है।

जस्टिस अरुण मिश्रा और दीपक गुप्ता की पीठ ने आज दिल्ली सरकार और सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) को आदेश दिया है कि उनके सामने इस साल अक्टूबर से आगामी कल (14 नवंबर, 2019) तक का प्रदूषण डाटा रखा जाए। उन्होंने पिछले साल के अक्टूबर से 31 दिसंबर, 2018 तक का डाटा भी माँगा। याचिका में सीपीसीबी, दिल्ली पॉल्यूशन कंट्रोल कमेटी (डीपीसीसी) समेत तीन स्रोतों के डाटा का हवाला देकर दावा किया गया था कि ऑड-इवेन का प्रदूषण पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता।

अपने आदेश में पीठ ने यह भी कहा कि वह चाहेगी दिल्ली सरकार उसे समझाए कि दोपहिया वाहनों, तीनपहिया वाहनों और टैक्सियों के मुकाबले कम प्रदूषण करने वाली कारों को रोककर वह क्या हासिल कर रही है

जेएनयू: जहाँ 10 रुपए महीने पर कमरा उपलब्ध है, ‘अंकल-आंटियों’ को चट्टानों पर रात में भी जाना होता है

जेएनयू का नाम सुनते ही कोई ऐसा शोध याद आ जाए जिसने भारतीय समाज की दिशा बदल दी हो, ऐसा आज तक नहीं हुआ। जेएनयू का नाम सुनने पर जो सबसे पहले शब्द जेहन में आते हैं वो ये हैं: नक्सलियों का गढ़, भारतविरोधी नारेबाजी करने वाले, टुकड़े-टुकड़े गैंग, और हाँ सुशिक्षित बच्चों का फेवरेट नारा- नीम का पत्ता कड़वा है, मोदी साला भड़वा है’।

ये है जेएनयू की कुल कमाई। कुछ लोग ये भी कहते हैं कि इस विश्वविद्यालय को इस तरह से परिभाषित नहीं करना चाहिए, ज्यादातर बच्चे अच्छे हैं। जबकि इसके उलट, ज्यादातर बच्चे उन्हीं वामपंथियों को वोट देकर छात्र संघ में भेजते हैं जो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ के चीफ आर्किटेक्ट हैं। अगर उनकी विचारधारा इस तरह की नहीं है, तो फिर ये नक्सली सोच वाली पार्टियाँ कैसे सबसे ज्यादा वोट पा जाती हैं? मुझे उनके जीतने से समस्या नहीं है, कम से कम ये स्वीकार तो करो कि तुम लोगों का नेता कैसा है, और वो क्या चाहता है?

आज कल जेएनयू फिर से चर्चा में है। जेएनयू चर्चा में कभी भी अच्छी बात के लिए नहीं आता। हमेशा किसी आंदोलन, किसी का घेराव, किसी के एम्बुलेंस को रोकने, किसी महिला के कपड़े फाड़ने, प्रधानमंत्री को भड़वा और भंगी बुलाने या फिर अपनी विचारधारा से अलग किसी भी व्यक्ति को कैम्पस में घुसने न देने आदि के कारण ही जेएनयू के छात्र चर्चा में आते हैं।

हाल ही में खबर आई कि जेएनयू में हॉस्टल का रेंट 3000% बढ़ा दिया गया। सही बात है, ये सुन कर किसी का भी दिमाग हिल जाएगा कि ये क्या बात हुई कि तीस गुणा रेंट बढ़ा दिया। लेकिन हेडलाइन से नीचे उतरने पर पता चला कि हॉस्टल में एक बेड का रेंट 10 रुपया प्रति महीना है। जी, दिल्ली में 10 रुपया प्रति महीना। इसे बढ़ा कर 300 रुपया किया गया है तो बच्चे सड़कों पर हैं। ताजा खबर यह आई है कि फीस की बढ़ोत्तरी को वापस ले लिया गया है।

कोई ये बता दे कि दिल्ली में किस जगह पर एक कमरे का किराया, जेएनयू के बढ़े हुए चार्ज के भी बराबर है? इसके साथ-साथ खाना बनाने वाले, सफाई करने वाले, अन्य मेस सहायकों के लिए विद्यार्थियों से 1700 रुपया प्रति महीना लेने की बात हुई है। मतलब हॉस्टल में रहने का पूरा खर्चा 2000 रुपया आ रहा है। इस पर भी बवाल हो रहा है।

बिहार-यूपी-झारखंड आदि जगहों से आने वाले हजारों बच्चे जब नरेला से लेकर नजफगढ़, नेहरू विहार, गांधी विहार आदि जगहों पर रहने जाते हैं तो उसका एक कमरे का रेंट 7-8000 से कम नहीं होता। ये इलाके छात्रों के रहने के इलाके हैं, जिसे सस्ता कहा जाता है। पूरे महीने का खर्चा 12-15,000 से कम नहीं आता। लेकिन यहाँ 300 रुपया देने में कष्ट हो रहा है।

भावुक कहानियाँ रची जा रही हैं

रवीश कुमार ने किसी ‘जे सुशील’ की कहानी छापी है कि उसने अपने संस्थान में टॉप किया था, नौकरी नहीं मिली, बस स्टॉप पर पेट में गमछा बाँध कर सोया, किसी ने गैरकानूनी तरीके से हॉस्टल में रहने की जगह दी। कहानी बहुत भावुक करने वाली है। लेकिन इसके उलट मेरे भी पास एक भावुक कहानी है। एक आदमी है बेगूसराय के रतनमन बभनगामा गाँव में। उसका नाम है राम विलास सिंह।

उसके हिस्से कुल डेढ़ बीघा जमीन है, परिवार में पत्नी और तीन बच्चे, और एक माँ। जीविकोपार्जन के लिए और कोई साधन नहीं। उसके बच्चे का एक अच्छे स्कूल में एडमिशन हो जाता है, 1997 में फीस करीब 35,000/वर्ष। उसकी आमदनी इतनी नहीं थी कि वो पैसे दे पाता। कर्ज लेता है, और बच्चे को सैनिक स्कूल तिलैया भेजता है।

लेकिन। पहले कर्ज के बाद वो सो नहीं जाता। वो अपनी आय बढ़ाने के लिए उपाय ढूँढता है, वो नए तरीके आजमाता है ताकि उसे दोबारा कर्ज न लेना पड़े। वो मेहनत करता है ताकि उसके बच्चे को बेहतरीन शिक्षा मिले। ऐसा नहीं है कि सात सालों के स्कूल और अगले पाँच साल तक दिल्ली में रहने वाले उस बच्चे के लिए राम विलास ने दोबारा कर्ज नहीं लिया। लिया, लेकिन उसी जमीन से, उसी एक जोड़ी बैल और दो-तीन गाय से उसने इतनी कमाई की कि उसका बेटा सैनिक स्कूल से पढ़कर, किरोड़ीमल कॉलेज में पहुँचा, फिर देश के बड़े मीडिया संस्थानों में नौकरी की।

राम विलास सिंह मेरे पिता हैं और उनका नाम पास के दस गाँव के लोग सिर्फ इसलिए जानते हैं कि ये आदमी बहुत मेहनती है। मेरे पिता भी पेट पर गमछा बाँध कर अपने बचपन में सोते थे। उसके लिए सरकार को नहीं कोसा, बल्कि जो उनकी भुजाओं की शक्ति से दोहन योग्य था, उन्होंने वैसा किया। आप गरीब पैदा होते हैं, ये प्रकृति की क्रूरता कह लीजिए, लेकिन अगर आप 20 साल तक भी गरीब ही हैं, तो ये आपकी गलती है।

फीस ही एक मुद्दा नहीं: जेएनयू के ‘IStandWithJNU’ वाले छात्र

जब मैंने ट्विटर पर लिखा कि जेएनयू पर चर्चा करूँगा तो मुझे वहाँ के एक छात्र ने बताया कि फीस ही एक मुद्दा नहीं है। जानने की कोशिश की तो उन्होंने कई बातें बताईं जिसमें रात में कैम्पस के कुछ गेटों को बंद करना, बाहरी असामाजिक तत्वों को घुसने से रोकने, छात्र अनुशासन हेतु कुछ नियमों की चर्चा है। साथ ही पार्थसारथी रॉक पर रात में जाने से लगी रोक, रात में स्टडी रूम को बंद करने की बात, SIS बिल्डिंग को जोड़ने वाले रास्ते बंद करना, सोते छात्रों को वार्डन द्वारा जगाना आदि भी चर्चा के बिंदु हैं।

उसके बाद उस लड़के ने ‘एडमिन से छात्र ही नहीं स्टाफ भी गुस्सा हैं’ आदि की बात करते हुए बताया कि कई कर्मचारियों को निकाला गया है, बोनस नहीं दिया जा रहा आदि की भी बातें की। बताया कि प्रशासन बस बच्चों को तंग करना चाह रहा है अनुशासित करने की आड़ में।

आप इन सारी बातों को अलग संदर्भ से अलग कर के देखें तो लगेगा कि सारी बातें जायज हैं। अगर कैम्पस है तो पूरी रात खुला होना चाहिए, स्टडी रूम खुला होना चाहिए, गेट आदि खुले रहें ताकि बच्चे बाहर आ-जा सकें। लेकिन जेएनयू को आप आज के संदर्भ में ही देख सकते हैं, चालीस साल पहले के नहीं।

संदर्भ यह है कि अगर यहाँ के पुराने छात्र हॉस्टलों में डटे रहते हैं, तो उन्हें निकालने के लिए रात में वार्डन छापा मारेगा ही। अगर यहाँ गैर-जेएनयू वाले भीड़ का हिस्सा बन कर आंदोलन का हिस्सा बनते हैं, उपद्रव करते हैं, तो रात में रास्ते बंद करना आवश्यक है। अगर यहाँ किसी के भी आने-जाने पर रोक नहीं है, और उसका परिणाम यह होता है कि भीड़ जुटती है, आतंकियों का समर्थन करती है, और इस राष्ट्र के खिलाफ नारे लगते हैं, तो बेशक हर हॉस्टल के गेट पर न सिर्फ ताला लगना चाहिए, बल्कि दिन में तीन बार सारे बच्चों की हाजिरी भी लगनी चाहिए। इन बच्चों और वहाँ के स्टाफ आदि के अलावा जो भी वहाँ मिलें, उन्हें उचित कारण न होने पर कैम्पस से तुरंत बाहर किया जाना चाहिए।

पार्थसारथी रॉक पर रात में क्यों जाना है? कैम्पस अगर गार्डों का कमी के कारण आपकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो फिर विद्यार्थियों को आंदोलन करने की बजाय प्रशासन का साथ देना चाहिए। सब लोग चंदा कर के गार्ड की तनख्वाह दें। अगर लगता है कि पैसा नहीं दे सकते, तो दो-दो घंटे की ड्यूटी दीजिए ताकि नजीब अहमद की तरह बच्चे गायब न हों कैम्पस से।

इन सारी माँगों में एक माँग मुझे उचित लगती है वो यह है कि स्टडी रूम पूरी रात खुली होनी चाहिए। कैम्पस पढ़ाई की जगह है, और लोग रात-बेरात जब पढ़ाई लगे, पढ़ना चाहेंगे। उसकी समुचित व्यवस्था होनी चाहिए। इस पर आप ये नहीं कह सकते कि गार्ड नहीं हैं। सीसीटीवी कैमरा लगा दीजिए, बायोमेट्रिक पंच इन की व्यवस्था कर दीजिए, सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी।

जेएनयू वालों को इसलिए भी गाली पड़ती है, क्योंकि ये लोग कभी भी ढंग की बातों को लेकर आंदोलन नहीं करते। कुछ समय पूर्व विद्यार्थियों को इससे समस्या हो गई थी कि उनकी उपस्थिति क्यों दर्ज करनी जरूरी है। वाह! मतलब शिक्षा लेने आए हैं, कैम्पस में रहते हैं, लेकिन क्लास कर रहे हैं, कि बाहर घूम रहे हैं, इस पर कोई उनसे सवाल न करे! इसे इन्होंने स्वतंत्रता का हनन तक कहा है। अगर इतना ही कम नहीं था, तो इनके शिक्षकों को भी इस बात से आपत्ति हुई कि वो बायोमेट्रिक सिस्टम से अपनी अटेंडेंस नहीं लगाएँगे।

आप यह देखिए कि ये किस तरह का कल्चर बनाना चाह रहे हैं। एक तरफ दलील यह कि हम तो पढ़ने वाले बच्चे हैं, गरीब हैं, दस रुपया ही फीस दे सकते हैं, हमें पढ़ने दो, अनुशासन की आड़ में परेशान मत करो। दूसरी तरफ, जो न्यूनतम उम्मीद प्रशासन करता है इन लोगों से, उसे भी पूरा करने में इन्हें ‘स्वतंत्रता का हनन’ और ‘सरकार का दवाब’ जैसे बड़े वाक्यांशों के ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना पड़ जाता है।

शिक्षा का फंडामेंटल अधिकार वाले कुतर्की

अब एक मूर्खतापूर्ण बातें करने वाला समूह वह है जो ‘बेहतरीन शिक्षा पर सबका संवैधानिक अधिकार है’ लिखता दिख रहा है। वो यह कहता फिर रहा है कि जेएनयू जैसे संस्थानों में शिक्षा मुफ्त होनी चाहिए, गरीब का बच्चा कहाँ पढ़ेगा आदि। यहाँ ये लोग भूल जाते हैं कि गरीब का बच्चा यहाँ पढ़ने आता है, लेकिन वो यहीं रुक क्यों जाता है? क्या जेएनयू में वो लोग नहीं रह रहे जो कहीं नौकरी करते हैं, लेकिन किसी भी विषय में प्रवेश लेकर जेएनयू की सब्सिडी वाली व्यवस्था का सतत लाभ ले रहे हैं?

कोई इसका ऑडिट करेगा कि कितने लोग बार-बार विषय बदल कर रहते हैं यहाँ? कोई इस बात पर चर्चा करेगा कि गरीब का बच्चा आखिर दो बार एमए, एमफिल, पीएचडी क्यों कर रहा है? मैं ये नहीं कह रहा कि नहीं करना चाहिए, लेकिन क्या आपको नहीं लगता कि एमए के बाद गरीब के बच्चे को नौकरी करने की कोशिश करनी चाहिए? क्योंकि गरीब का बच्चा अगर पीएचडी और पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च कर रहा है, और वहीं किसी गरीब की बच्ची से शादी कर लेता है, तो उनके बच्चे भी गरीब के ही बच्चे कहे जाएँगे।

ये कैसी विडंबना है कि ‘गरीब का बच्चा’ के नाम पर आपने हर साल उन बच्चों का रास्ता बंद रखा है जो वाकई ऐसी शिक्षा पाकर, तीन साल में निकल जाएँगे और नौकरी कर अपने परिवार को ग़रीबी से बाहर निकालेंगे। दाढ़ी पके हुए लड़के अगर ‘गरीब का बच्चा’ की लड़ाई लड़ रहे हैं तो उन्हें पार्थसारथी रॉक पर बिखरे बीयर के बोतलों को सर पर मारना चाहिए, ताकि उनके दिमाग के कुछ तंतुओं में ऊर्जा प्रवाह शुरु हो और वो सही सोचना चालू करें।

शिक्षा एक मौलिक अधिकार है, और पूजा करना भी एक मौलिक अधिकार है। लेकिन, कोई ये कह कर अड़ जाए कि मैं तो रामेश्वरम् में ही पूजा करूँगा और सरकार उसका खर्चा उठाए, तो ये कुतर्क है। मौलिक अधिकार के नाम पर आप ये भी कह सकते हैं गरीब के बच्चे को भी IIT और IIM में जगह मिलनी चाहिए। जबकि, यहाँ गरीबी प्रवेश का आधार नहीं है, कौशल है।

उसी तरह, शिक्षा मौलिक अधिकार है, तो सरकार की जिम्मेदारी शिक्षण संस्थान खोलने, उन्हें सुचारू रूप से चलाने की है, न कि यह कि शिक्षा मुफ्त कर दी जाए। वैसे, आदर्श स्थिति तो यही है कि शिक्षा मुफ्त कर दी जाए, लेकिन क्या आपके बजट में वैसी संभावना है? यहाँ 13 लाख बच्चे कुपोषण से हर साल मरते हैं, बच्चों के टीकाकरण के पैसे बजट में नहीं निकल पाते और हम वहाँ देख रहे हैं कि शिक्षा तो मौलिक अधिकार है, मुफ्त होनी चाहिए।

फिर गरीब छात्र कहाँ जाएँ?

ऐसा तो है नहीं कि गरीब छात्रों को लिए सरकार ने कोई प्रावधान किया ही नहीं है! प्राथमिक शिक्षा से लेकर कॉलेज, यूनिवर्सिटी तक आरक्षण की सुविधा है। यह सुविधा इसीलिए है क्योंकि इस देश में एक बहुत बड़ा तबका गरीब है, वंचित है, शोषित है। सरकारों ने हर स्तर पर इसे स्वीकारा है और इस बार तो सामान्य वर्ग के गरीब लोगों को भी आरक्षण की सुविधा दी गई है।

आरक्षण न सिर्फ प्रवेश पाने के लिए है, बल्कि फॉर्म भरने से लेकर एडमिशन फीस तक हर स्तर पर आर्थिक मदद के रूप में है। जितनी मदद की जा सकती है, और जिस तरह का शिक्षा बजट है, उस दायरे में मदद हो रही है। इसलिए ‘गरीबों के बच्चे कहाँ जाएँगे’ वाली बात बेमानी लगती है। दिल्ली विश्वविद्यालय की भी फीस पता कर लीजिए कितनी है। इस तरह के सारे कॉलेज सरकारी पैसों से ही चलते हैं और बच्चों से न्यूनतम योगदान माँगा जाता है।

हो सकता है कि आने वाले समय में हमारी अर्थव्यवस्था उस स्तर पर पहुँचे कि शिक्षा मुफ्त हो जाए, हर व्यक्ति को स्वास्थ्य सुविधा मिले। लेकिन आज का सत्य यही है कि साल-दर-साल शिक्षा और स्वास्थ्य पर सरकारें समुचित ध्यान नहीं दे पा रहीं। इसलिए, यह सोचना बहुत अच्छा है कि शिक्षा मौलिक अधिकार है, लेकिन मौलिक अधिकार को ऐसे मत देखिए कि फलाना आदमी अरमानी का सूट पहनता है तो हर गरीब को सरकार सूट बाँट दे। नहीं, गरीब को मेहनत करनी चाहिए और सूट खरीद कर पहनना चाहिए।

जेएनयू वालों को सोचना चाहिए कि उनके शोधों पर समाज का ध्यान क्यों नहीं जाता है? आखिर सकारात्मक बातें गायब क्यों है कि लोग ऐसे बेहतरीन विश्वविद्यालयों की नौटंकी से इतना उब गए हैं कि उसे बंद करने के लिए सोशल मीडिया पर कैम्पेन चलाने लगते हैं? आखिर ऐसी क्या ‘स्वतंत्रता’ इन विद्यार्थियों को चाहिए जहाँ उनकी अपनी सुरक्षा तक की उन्हें चिंता नहीं, कि बाहर से कोई आएगा और नजीब अहमद को गायब कर देगा?

कैम्पस है, तो कैम्पस के लोग सुनिश्चित करें कि वहाँ छात्र-छात्राएँ ही विचरेंगे न कि उनके दोस्त, उनके दोस्त के दोस्त और उनके दोस्त के दोस्त के दोस्त का दोस्त! एक तरफ किसी लड़की को सीडी देने के बहाने नशा खिला कर बलात्कार कर दिया जाता है और दूसरी तरफ बच्चे चाहते हैं कि छात्र-छात्राएँ एक दूसरे के छात्रावासों में आते-जाते रहें?

दोनों को कुछ काम है तो वो काम क्या सार्वजिनक जगहों पर नहीं हो सकता? उसके लिए हॉस्टल का एक छोटा कमरा क्यों चाहिए? पुस्तकालय में जाइए, कैंटीन में जाइए, मैदान में जाइए, पार्क में जाइए, क्लासरूम में जाइए! हॉस्टल में ही क्यों जाना है? किताबों की लेन-देन हॉस्टल के गेट पर भी हो सकती है। चूँकि वहाँ बलात्कार जैसे अपराध हो रहे हैं, मोलेस्टेशन में जेएनयू देश का प्रतिनिधित्व कर रहा है, तब इस तरह की माँगों का क्या औचित्य है?

जेएनयू के सारे आंदोलनरत विद्यार्थियों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उनका मूल उद्देश्य विद्यार्जन करते हुए राष्ट्र निर्माण में सहयोग देना है, न कि अनंतकाल तक छात्रावास में, विषय बदल-बदल कर कैम्पस में टिके रहना और रात में पार्थसारथी रॉक पर जाने की जिद बाँधना। अगर सारे छात्र-छात्राएँ अपनी सुरक्षा की जिम्मेदारी ले लें, अपने माता-पिता से अनुमति ले लें कि उन्हें अंधेरे में कैम्पस के खास गेटों से बाहर जाना है, किसी चट्टान पर विचरना है, किसी विपरीत लिंग वाले विद्यार्थी के कमरे में जाना है, तो प्रशासन निश्चिंत हो कर सो जाएगा।

आपकी ही सुरक्षा की बातों के लिए प्रशासन एहतियाती कदम उठा रहा है तो उसके लिए आंदोलन करना बताता है कि आपकी मंशा सही नहीं है। हर बात को ‘सरकार हमें दबाना चाहती है’ के नाम पर खेल जाना, सर्वथा अनुचित है। आंदोलन के नाम पर वीसी को कमरे में बंद कर देना, रोगी शिक्षक को घेर लेना, महिला के कपड़े फाड़ देना, बताता है कि प्राथमिकताएँ हिली हुई हैं।

छात्र जीवन में आंदोलन करना, विरोधी स्वर तीव्र रखना, रेबेल होना, सत्ता के खिलाफ चर्चा करना आदि एक वांछित गुण है, क्योंकि इससे आपके सोचने-समझने की क्षमता का विकास होता है। लेकिन, इसी आंदोलन के नाम पर आपकी नारेबाजी में गाली, देश को तोड़ने की बात, अश्लील हरकतें, सामने वाले की परेशानी को दरकिनार करने जैसी बातें, बताती हैं कि ये आंदोलन मानसिक या शैक्षणिक नहीं है, ये आंदोलन शक्ति का क्रूर प्रदर्शन है कि हाँ, हमारे पास लोग हैं, जो रास्ता रोक सकते हैं, कपड़ा फाड़ सकते हैं, आगजनी कर सकते हैं।

फिर तो करते रहिए। आप अगर इसे सही मानते हैं तो फिर वो भी सही हैं जो आपको ‘फ्री लोडर’, ‘अंकल-आंटी ऑफ जेएनयू’, ‘एंटी नेशनल’ कहते हुए ‘शट डाउन जेएनयू’ जैसे हैशटैग चलाते हैं।

कुशीनगर के मस्जिद में धमाका: इमाम ने ही रखा था विस्फोटक, 4 गिरफ्तार

उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में एक मस्जिद में हुए धमाके के मामले में पुलिस ने चार लोगों हिरासत में लिया है। मीडिया खबरों में बताया जा रहा है कि उन चार लोगों में से एक इमाम भी है और उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया है। धमाका कुशीनगर के तुर्कपट्टी थाना क्षेत्र के अवरवा सोफीगंज गांव में बैरागीपट्टी टोला स्थित मस्जिद में हुआ था

मीडिया खबरों के मुताबिक इमाम अज़्मुद्दीन रिज़वी नामक मौलवी ने मस्जिद में विस्फोटक पदार्थ रखे जाने की बात कबूल की है। लेकिन न ही उसने किसी उद्देश्य का खुलासा किया है और न ही अब तक की जाँच में पुलिस को कोई इरादा समझ में आया है।

सोमवार (11 नवंबर, 2019) को हुए इस धमाके का कारण पहले एक इन्वर्टर बैट्री में धमाका बताया गया था, जिस कारण से मामले ने मीडिया में अधिक तूल नहीं पकड़ा। लेकिन पुलिस ने धमाके की साइट से फोरेंसिक सैम्पलों को जाँच के लिए भेजा तो साफ हो गया कि धमाका मस्जिद में रखे गए विस्फोटकों से ही हुआ है।

इसके बाद गोरखपुर एटीएस, लोकल इंटेलिजेंस यूनिट और अन्य इंटेलिजेंस एजेंसियों ने मामले की गंभीर पड़ताल शुरू कर दी है। इसी सिलसिले में इमाम अज़्मुद्दीन को साथियों इज़हार, आशिक और जावेद समेत हिरासत में ले लिया। कुशीनगर के एसपी विनोद कुमार मिश्रा के हवाले से टाइम्स नाउ ने दावा किया है कि यह सभी बैरागीपट्टी के ही रहने वाले हैं।

धमाका इतना शक्तिशाली था कि मस्जिद की खिड़कियों और दरवाज़े के परखच्चे उड़ गए। यही नहीं, मस्जिद की छत भी चटक गई। पुलिस को तभी शक हो गया था कि ऐसा धमाका किसी इन्वर्टर जैसी घरेलू चीज़ से नहीं, केवल विस्फोटक से ही हो सकता है।

इसके अलावा एसओ संजय कुमार को धमाके का कारण बैटरी बताए जाने के बावजूद जाँच में मस्जिद में लगी बैटरी सही-सलामत मिली। उसी रात गोरखपुर से पहुँचे बीडीडीएस (बम निरोधक दस्ता) के दल ने मौके का निरीक्षण किया। धमाके के चलते पूरे इलाके में अफरातफरी का माहौल हो गया था।

महाराष्ट्र का ‘पवार प्ले’: बाल ठाकरे ने जिसे कहा था ‘नीच मानुष’, उसी शरदराव के व्यूह में फँसी शिवसेना

महाराष्ट्र में 105 सीटों वाली भाजपा बैठ कर पूरा नाटक देख रही है, वहीं 56 सीटों वाली शिवसेना, 44 सीटों वाली कॉंग्रेस और 54 सीटों वाली एनसीपी मिल कर सरकार गठन की कोशिशों में हैं। एनसीपी, जिसके मुखिया राज्य के सबसे अनुभवी नेता शरद पवार हैं के मुक़ाबले कॉन्ग्रेस और शिवसेना में उनके क़द का कोई मराठा नहीं है। अगर आप परिणाम घोषित होने के बाद से ही शरद पवार के रुख को देखेंगे तो आपको एक पल के लिए राजनीति के लालू, मुलायम और ममता भी फीके नज़र आने लगे। शरद पवार ने नतीजों के बाद विपक्ष में बैठने की बात कह सबको हैरत में डाल दिया था।

महाराष्ट्र चुनाव के बाद शरद पवार के रुख को समझने के लिए चुनाव के 2 दिन पहले की एक घटना को देखना पड़ेगा। 17 अक्टूबर को शरद पवार चुनाव प्रचार के लिए सतारा पहुँचे। वहाँ विरोधी उम्मीदवार कोई साधारण व्यक्ति नहीं था। भाजपा ने 13वें छत्रपति और शिवाजी महाराज के वंशज उदयनराजे भोसले को लोकसभा उपचुनाव के लिए उम्मीदवार बनाया था। 3 बार सांसद रह चुके भोंसले ने एनसीपी छोड़ कर भाजपा का दामन थामा था। उनके गढ़ में पवार ने कहा कि लोकसभा चुनाव के दौरान उम्मीवार चुनने में उनसे ग़लती हुई और अबकी इस ग़लती को सुधार करना है। तभी बारिश शुरू हो गई। पवार भींगते-भींगते बोलते रहे। पवार ने कहा कि इंद्रदेव ने आशीर्वाद दिया है और सतारा में चमत्कार होगा। बाकी नेता पानी से बचने के लिए आसरा ढूँढ़ते रहे, पवार भाषण देते रहे।

परिणाम ये हुआ कि सोशल मीडिया में उनका भाषण वायरल हो गया। लोकसभा उपचुनाव का परिणाम आया तो 5 महीने पहले ही बड़ी जीत दर्ज करने वाले उदयनराजे हार गए। विधानसभा चुनाव में एनसीपी को कम सीटें आई। नतीजों के बाद टीवी बहसों में पार्टी प्रवक्ताओं ने कॉन्ग्रेस को सीधा सन्देश दिया कि जितनी भी सीटें आई हैं, वो पवार की मेहनत के कारण आई हैं। कॉन्ग्रेस के आला नेताओं ने सक्रियता से प्रचार नहीं किया था, उन्हें पवार को नेता मानना पड़ा। यानी जो पवार का रुख, वो कॉन्ग्रेस का फ़ैसला। अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण जैसे दिग्गजों के रहते भी कॉन्ग्रेस को पवार ने अपने ‘एहसान’ तले लाद दिया। दोनों चव्हाण सोनिया दरबार में हाजिरी लगाते रह गए।

शरद पवार ने चुनाव परिणाम घोषित होते विपक्ष में बैठने की बात कही। मीडिया ने लाख उनके मुँह में जवाब डालना चाहा, वो जनादेश की बात करते रहे। इधर शिवसेना-भाजपा की कलह के बीच उन्हें पता था कि जब तक ठाकरे की पार्टी राजग में बनी हुई है, उसके साथ बातचीत करने तो दूर, दिखना भी सही नहीं होगा। संजय राउत 2 बार पवार के पास गए, लेकिन उन्होंने भाव नहीं दिया। यही कारण है कि दोनों बार राउत यह कहने को मजबूर हुए कि वे पवार से सरकार गठन पर चर्चा करने नहीं आए थे। एक बार उन्होंने दीवाली का बहना बनाया तो दूसरी बार कहा कि राज्य के राजनीतिक परिदृश्य तक ही चर्चा सीमित रही।

इसी बीच, शरद पवार दिल्ली आकर सोनिया से भी मिले। पवार के रुख में सबसे बड़ा बदलाव उसी समय दिखा लेकिन मीडिया ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। सोनिया से मुलाकात के तुरंत बाद पवार ने विपक्ष में रहने के जनादेश की बात दुहराई, लेकिन एक अतिरिक्त लाइन के साथ। पवार ने कहा कि भविष्य में क्या होगा, वो नहीं बता सकते। पवार की इस बात के गूढ़ निहितार्थ थे। इसका पता तब चला, तब मुंबई के ताज होटल में उद्धव ठाकरे उनसे मिलने पहुँचे और सोनिया ने उनसे बात करने के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे और अहमद पटेल सरीखे वफादार वरिष्ठ नेताओं को भेजा। बस, यहीं से शरदराव का ‘पवार प्ले’ चालू हो गया और इस पूरी प्रक्रिया के वे केंद्र बिंदु बन गए।

शिवसेना को मजबूर किया कि वह मोदी कैबिनेट के अपने इकलौते मंत्री अरविंद सावंत का इस्तीफा दिलवाए। फिर हिंदुत्व का पहरेदार होने का दंभ भरने वाली पार्टी को अपना रुख नरम करने को मजबूर किया। अब तो यह भी चर्चा है कि सरकार बनाने के लिए शिवसेना मुस्लिमों को आरक्षण देने और वीर सावरकर को भारत रत्न देने की मॉंग से भी पीछे हट गई। यह सब कुछ उस पवार के दबाव में शिवसेना ने किया जो कुछ दिन पहले तक उसके निशाने पर थे।

मुस्लिम आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जो शिवसेना को उसके कोर वोटर से दूर कर सकता है और संभावित नई सरकार के एजेंडे में इसके शामिल होने से शिवसेना को नए मुस्लिम वोट मिलेंगे नहीं, पुराने हिन्दू वोट ज़रूर छिटक सकते हैं। तभी तो पवार शिवसेना को हर उस चीज पर राजी करना चाहते हैं, जिससे उसका कोर वोटर उससे दूर जाए। पवार जानते हैं कि उन्हें किसी राष्ट्रीय पार्टी से ख़तरा नहीं है।

उस जमाने का बंबई दो नेताओं के कारण थम जाता था। एक जॉर्ज फर्नांडीस और दूसरे बाल ठाकरे। इनके बीच जगह बनाकर सत्ता भोगना साधारण काम नहीं था। लेकिन, पवार ने ऐसा ही किया था। शायद, यही कारण है कि बाल ठाकरे क़रीबी सम्बन्ध होने के बावजूद राजनीतिक रूप से पवार से दूरी बना कर ही चलते थे। उन्होंने साफ़-साफ़ कहा था कि शरद पवार जैसे ‘लुच्चे’ के साथ तो वो कभी नहीं जा सकते। बाल ठाकरे के भाषण सुन कर राजनीतिक में आए छगन भुजबल ने 1990 में शिवसेना तोड़ दी थी। मनोहर जोशी को नेता प्रतिपक्ष बनाए जाने के बाद कॉन्ग्रेस में आए भुजबल को मंत्री बनाया गया था। ठाकरे को लगा कि पवार व्यक्तिगत संबंधों के कारण इस टूट के ख़िलाफ़ होंगे लेकिन पवार ने चुप्पी साध ली। बाल ठाकरे ने इस धोखे को याद रखा। ये वही शरद पवार हैं, जिन्होंने 1978 में वसंतदादा पाटिल की सरकार तोड़ दी और राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने थे। ठाकरे मानते थे कि शरद पवार ने अपने मेंटर यशवंतराव चव्हाण को भी धोखा दिया है

तभी तो बालासाहब ने शरद पवार से चिढ कर उन्हें ‘नीच मानुष’ करार दिया था। ये वही शरद पवार हैं, जिन्होंने मुंबई बम ब्लास्ट के दौरान धमाकों की संख्या को 12 से 13 कर दिया था। उन्होंने 1 अतिरिक्त बम धमाका अपने मन से गढ़ा। उन धमाकों में केवल हिन्दू बहुल इलक़ों को निशाना बनाया गया था। पवार ने एक मस्जिद में विस्फोट होने की बात कह यह दिखाया कि यह ‘सेक्युलर’ धमाका था। ये वही शरद पवार हैं, जिन्होंने सोनिया गाँधी के विदेशी मूल के होने की बात को लेकर कॉन्ग्रेस तोड़ दी थी, लेकिन बाद में उसी कॉन्ग्रेस के साथ सत्ता का सुख भोगा।

याद कीजिए जब लोकसभा चुनाव के दौरान शरद पवार ने बारामती सीट से अपनी उम्मीदवारी को नकार दिया था। अपने गढ़ में भी उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा और कहा कि वो बहुत चुनाव लड़ चुके। तब पीएम मोदी ने उनके बारे में बोलते हुए कहा था:

“शरदराव पवार समझ जाते हैं कि हवा का रुख किस तरफ है। चारों तरफ भगवा बादल हैं। शरदराव एक चतुर राजनेता हैं, जिन्होंने बदली परिस्थितियों को भाँप लिया है। वह कभी भी ऐसी किसी चीज में शामिल नहीं होते, जो उन्हें या उनके परिवार को नुकसान पहुँचाए। इसलिए, उन्होंने चुनावी मैदान छोड़ दिया।”

कहते हैं, असली योद्धा वही होता है जिसे पता हो कि कब मैदान में डटे रहना है और कब मैदान छोड़ देना है। पवार को यह बखूबी पता है। महाराष्ट्र चुनाव परिणाम के बाद एकदम चुप्पी साध लेना और धैर्य से प्रतीक्षा करते हुए कुछ ही दिनों बाद सरकार गठन के प्रयासों पर हावी हो जाना इस 79 वर्षीय राजनेता का हुनर ही है। ज्यादा पीछे क्यों जाएँ? 1999 में भी तो शिवसेना और भाजपा झगड़ती रह गई थी, शरद पवार सत्ता हथिया ले गए थे। तब गोपीनाथ मुंडे को सीएम बनाने में जुटी भाजपा और उसे ‘कमलाबाई’ बता कर मोलभाव में जुटी शिवसेना के कलह के बीच विलासराव देशमुख सीएम बने और शरद पवार सत्ता के साझीदार।

अमेठी: बीच-बचाव करने पहुँचे भाजपा नेता के बेटे की गोली मारकर हत्या

उत्तरप्रदेश के अमेठी में मंगलवार (नवंबर 12, 2019) को दिनदहाड़े भाजपा नेता शिवनायक सिंह के बेटे सोनू सिंह की गोली मारकर हत्या कर दी गई। घटना गौरीगंज कोतवाली क्षेत्र के मुसाफिरखाना स्थित बिशुनदासपुर इलाके में घटी। कहा जा रहा है कि आपसी रंजिश के चलते पूरी घटना को अंजाम दिया गया।

मीडिया खबरों के अनुसार भाजपा नेता शिवनायक सिंह का बेटा एवं भट्टा व्यापारी सोनू सिंह मंगलवार की देर शाम अर्पित और चंद्रशेखर नामक दो लोगों की आपसी झड़प में बीच-बचाव करने गए थे। इसी दौरान चंद्रशेखर ने उन पर गोली चला दी। चंद्रशेखर ने ताबड़तोड़ कई राउंड गोलियाँ दागीं। जख्मी सोनू को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। हत्या की खबर सुनते ही बड़ी संख्या में शिवनायक सिंह के समर्थक और भाजपा नेता मौक़े पर पहुँचे। पुलिस मामले की जॉंच में जुटी है।

गौरतलब है कि आम चुनावों के बाद अमेठी में भाजपा नेता सुरेंद्र सिंह की हत्या कर दी गई थी। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के करीबी रहे सुरेंद्र सिंह को रात के करीब तीन बजे गोली मारी गई थी। इस मामले में पुलिस ने वसीम को गिरफ्तार किया था। उसने बताया था कि चुनावी रंजिश की वजह से सुरेंद्र सिंह की हत्या की गई।

बंगाल के मंत्री पर TMC सांसद के समर्थकों ने किया हमला, ममता बनर्जी ने माँगा जवाब

राजनीतिक हिंसा के लिए कुख्यात पश्चिम बंगाल से एक बड़ा हैरान करने वाला मामला सामने आया है। राज्य के विद्युत मंत्री सोवनदेब चट्टोपाध्याय ने अपनी ही पार्टी की सांसद माला रॉय के समर्थकों पर मारपीट का आरोप लगाया है। मंत्री का कहना है कि उन पर हमला दक्षिण कोलकाता में एक कार्यक्रम के दौरान किया गया।

चट्टोपाध्याय के मुताबिक यह कार्यक्रम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा शुरू की गई ‘परे परे सिनेमा’ का हिस्सा था। इसका मकसद क्षेत्रीय इलाकों में बांग्ला फिल्मों का विस्तार करना है। मंगलवार की शाम ऋतुपर्ण सेनगुप्ता और प्रसन्नजीत चटर्जी की फिल्म के ओपन एयर स्क्रीनिंग के दौरान मंत्री ने स्ट्रीट लाइटें बंद करवा दी।

इसके बाद सांसद माला रॉय के समर्थक आयोजन स्थल पर आकर हंगामा करने लगे। वे लाइट चालू करने की मॉंग कर रहे थे। उनका कहना था कि लोग अंधेरे से परेशान होकर सांसद से शिकायत कर रहे हैं। दोनों पक्षों के बीच बहस धीरे-धीरे इतनी बढ़ गई कि चट्टोपाध्याय और माला रॉय के समर्थकों में झड़प हो गई और फिर रास्ते जाम कर दिए गए।

पुलिस ने किसी तरह हालात पर काबू पाया। मंत्री ने बताया, “हम पार्टी के निर्देशों पर ही कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का राज्य के हर क्षेत्र में विस्तार करने के लिए ये आयोजन रासबिहारी एवेन्यू में करा रहे थे। हर कोई जानता की अच्छी दृश्यता के लिए सड़कों की बत्तियाँ बुझानी पड़ती हैं। हमने में भी सिविक बॉडी से एनओसी मिलने के बाद ही ऐसा किया।”

आयोजन में हुई घटना पर आगे की जानकारी देते हुए उन्होंने बताया, “हम शाम के 6 बजे कार्यक्रम शुरू करने वाले थे, लेकिन माला रॉय के समर्थकों ने सड़क की बत्तियाँ आकर जला दीं। इस दौरान मैंने कोलकाता के नगर निगम के एक वरिष्ठ अधिकारी को भी फोन किया, जिसके कुछ देर बाद जाकर सारी लाइटें बंद हुईं और हमने शो शुरू किया। लेकिन शो शुरू होने के कुछ ही सेकेंड बाद फिर से लाइट जला दी गई और माला रॉय के समर्थकों ने मुझसे मारपीट की। अंत में हमें शो बंद करना पड़ा।”

बता दें टीएमसी नेता ने अपने साथ हुई इस घटना की कड़ी निंदा की है। माला रॉय ने अपने समर्थकों के ऊपर लगे सभी आरोपों को खारिज किया है। उन्होंने कहा है कि स्थानीय लोगों ने उनसे शिकायत की थी कि सोवनदेब ने उन जगहों की लाइटें भी बंद करवा दी है जहाँ कोई शो नहीं चल रहा।

सांसद माला रॉय के अनुसार विद्युत मंत्री से निवेदन किया गया था कि केवल वहीं की लाइटें बंद हों, जहाँ फिल्म दिखाई जा रही है। लेकिन उन्होंने पूरे रासबिहारी एवेन्यू की ही बत्तियाँ बंद करवा दी। इसके कारण स्थानीय लोग भड़क गए और प्रदर्शन करने लगे। लेकिन किसी ने चट्टोपाध्याय के साथ मारपीट नहीं की।

इस मामले में ममता बनर्जी ने पार्टी के दोनों नेताओं से जवाब-तलब किया है। भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने ट्वीट कर कहा है कि जिस पार्टी में आपसी तालमेल न हो, वो पार्टी लोकतंत्र की रक्षा कैसे करेगी। गौरतलब है कि टीएमसी कार्यकर्ताओं पर आए दिन भाजपा नेताओं को निशाना बनाने के आरोप भी लगते रहते हैं।

SPG सुरक्षा हटी, लेकिन प्रियंका गाँधी ने खाली नहीं किया सरकारी बंगला

कॉन्ग्रेस महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा एसपीजी सुरक्षा हटा लिए जाने के बाद भी दिल्ली के लोधी एस्टेट स्थित सरकारी बंगले में जमी हुईं हैं। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी और कॉन्ग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गाँधी की बेटी प्रियंका को यह बंगला एसपीजी, गृह मंत्रालय और कैबिनेट सचिवालय की सुरक्षा सलाह के बाद दिया गया था। गौरतलब है कि कानूनी रूप से एक सामान्य नागरिक प्रियंका को वर्ष 1997 के फरवरी माह में टाइप IV का सरकारी आवास अलॉट किया गया था

हाल ही में मोदी सरकार ने सोनिया गाँधी, उनके बेटे, वायनाड सांसद और कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी व प्रियंका गाँधी को मिला हुआ एसपीजी सुरक्षा कवच हटाने का निर्णय लिया था। अब उनकी सुरक्षा का स्तर घटा कर ज़ेड प्लस कर दिया गया है। यानी इनकी सुरक्षा अर्द्धसैनिक बल सीआरपीएफ (सेंट्रल रिज़र्व पुलिस फ़ोर्स) की ज़िम्मेदारी है। सोमवार (11 नवंबर, 2019 को) को सीआरपीएफ़ ने एसपीजी जवानों से तीनों की सुरक्षा के संबंध में जानकारी ली थी। फिलहाल एसपीजी सीआरपीएफ़ के सहायक की भूमिका में है।

इजरायली हथियारों एक्स-95, एके सीरीज़ और एमपी-5 गनों से लैस केंद्रीय अर्धसैनिक बल के स्पेशल वीवीआईपी सिक्योरिटी यूनिट के कमांडोज़ की एक टुकड़ी राहुल गाँधी के तुग़लक़ लेन स्थित आवास पर तैनात है। प्रियंका गाँधी के लोधी एस्टेट के घर पर भी एक दूसरी टीम ने सुरक्षा-व्यवस्था का ज़िम्मा सँभाल लिया है।

मीडिया खबरों के अनुसार सोनिया गाँधी के 10 जनपथ स्थित आवास पर भी सीआरपीएफ के कमांडोज़ ने सुरक्षा का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया है। जेड प्लस सिक्योरिटी का अर्थ 100 सीआरपीएफ़ कमांडोज़ की सुरक्षा घेरा है, जो उनके साथ देश भर में रहेगा। इसके अलावा उनके आवासों की भी सुरक्षा इसी एजेंसी के हाथ में होगी।

इसके अलावा उनके साथ एक डॉग स्क्वाड भी होगा, जो उनके आगमन के पहले किसी भी स्थान की सुरक्षा पड़ताल इन कमांडोज़ के साथ करेगा। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ दिन तक एसपीजी और सीआरपीएफ की मिलीजुली सुरक्षा इन तीनों को मिलेगी और उसके बाद राज्य पुलिस की सहायता से सीआरपीएफ इनकी सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले लेगी।

इन तीनों की सुरक्षा घटाने का निर्णय इंटेलिजेंस एजेंसियों के इनपुट पर गृह मंत्रालय और कैबिनेट सचिवालय द्वारा बनाई गई एक कमेटी ने लिया था। सुरक्षा प्राप्त लोगों की सुरक्षा और खतरे की समीक्षा सालाना तौर पर होती है।