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2600 खाते, ₹300 करोड़: स्विस बैंकों में भारतीयों के खातों का ‘वारिस’ नहीं, सरकार को मिल सकता है जमा धन

साल 2014 में भारत में आम चुनावों से पहले स्विस बैंक में जमा काले धन के मामले ने काफी तूल पकड़ा था। कुछ समय बाद स्विट्जरलैंड सरकार ने वैश्विक दबाव के चलते साल 2015 में निष्क्रिय खातों की जानकारी को सार्वजनिक करना शुरू कर दिया था। इस दौरान स्विस बैंक ने नीति बनाई थी कि खातों के दावेदारों को उसमें मौजूद धन हासिल करने के लिए आवश्यक प्रमाण उपलब्ध कराने होंगे। हालिया ख़बरों के मुताबिक स्विट्जरलैंड के बैंकों में भारतीयों के करीब 12 निष्क्रिय खातों के लिए कोई दावेदार सामने नहीं आया है। आशंका जताई जा रही है कि इन खातों में पड़े पैसे स्विट्जरलैंड सरकार को स्थानांतरित किए जा सकते हैं।

इनमें से कुछ खाते भारतीय निवासियों और ब्रिटिश राज के दौर के नागरिकों से जुड़े हैं। स्विस बैंक के पास मौजूद आँकड़ों के अनुसार पिछले 6 साल में इनके खातों पर किसी ‘वारिस’ ने सफलतापूर्वक दावा नहीं किया है। बताया जा रहा है कि इनमें से कुछ खातों के लिए दावा करने की अवधि अगले माह ही समाप्त हो जाएगी। वहीं कुछ अन्य खातों पर 2020 के अंत तक दावा किया जा सकता है।

इस पूरे मामले में खास बात है कि निष्क्रिय खातों में से पाकिस्तानी निवासियों से संबंधित कुछ खातों पर भी दावा किया गया है। इसके अलावा खुद स्विट्जरलैंड ने अपने देश सहित कई और देशों के निवासियों के खातों पर भी दावा किया है।

बता दें, साल 2015 में पहली बार स्विट्जरलैंड बैंक द्वारा इस तरह के खातों को सार्वजनिक किया गया था। जिसके बाद मालूम चला था कि स्विस बैंक में इस तरह के करीब 2,600 खाते हैं, जिनमें 4.5 करोड़ स्विस फ्रैंक या करीब 300 करोड़ रुपये की राशि पड़ी है। खबरों के अनुसार 1955 से इस राशि पर दावा नहीं किया गया है।

इस सूची को सर्वप्रथम सार्वजनिक किए जाते समय करीब 80 सुरक्षा जमा बॉक्स थे। लेकिन स्विस बैंकिंग कानून के तहत इस सूची में हर साल नए खाते जुड़ रहे हैं। ताजा जानकारी के अनुसार इन खातों की संख्या करीब 3,500 हो गई है।

गौरतलब है कि 2014 के बाद से शुरू हुई भारतीय राजनीति में स्विस बैंक में जमा बेहिसाब धन बड़ी बहस का हिस्सा रहा है। कहा जाता है कि पहले की सरकारों ने स्विट्जरलैंड के बैंक खातों में अपना अथाह धन रखा है।

ऐसे में लगातार सवालों के घेरे में आने के बाद और वैश्विक दवाब के कारण कुछ समय पहले ही स्विट्जरलैंड ने अपनी बैंकिंग प्रणाली को नियामकीय जाँच के लिए खोला है। साथ ही भारत सहित विभिन्न देशों के साथ वित्तीय मामलों पर सूचनाओं के स्वत: आदान-प्रदान के लिए समझौता भी किया है। जिसके मद्देनजर ही भारत सरकार को हाल में विदेशी बैंकों में जमा काले धन को लेकर बड़ी कामयाबी हाथ लगी थी। स्विट्जरलैंड सरकार ने भारत को स्विस बैंक में भारतीय खातों की पहली सूची दी थी। भारत उन चुनिंदा देशों में से एक है जिसे स्विस बैंक से जुड़ी जानकारी मिली है।

स्विट्जरलैंड के टैक्स विभाग द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक भारत सरकार को दूसरी सूची सितंबर 2020 में मिलेगी। फिलहाल इस समय स्विट्जरलैंड में दुनिया के 75 देशों के करीब 31 लाख खाते हैं जो कि निशाने पर हैं। इनमें भारत के भी कई खाते शामिल हैं। 

कॉन्गेस नेता ने कहा- शिवसेना का हो सकता है CM, पवार बोले- मुझे नहीं पता

महाराष्ट्र में तेज़ी से बदलते सियासी घटनाक्रम के बीच अब सरकार गठन की ज़िम्मेदारी राज्य की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) पर आ गई है। NCP को आज शाम साढ़े आठ बजे तक का वक्त दिया गया है। फ़िलहाल, NCP और कॉन्ग्रेस ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने को लेकर आधिकारिक रूप से कोई बयान नहीं दिया है।

इस बीच, महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के नेता कगडा चंड्या पडवी (केसी पडवी) का बयान आया है कि बातचीत की प्रक्रिया चल रही है। इसका अंत सुखद होगा। उन्होंने कहा, “व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि तीनों पार्टियाँ (शिवसेना-कॉन्ग्रेस-NCP) सरकार का गठन करेंगी और शिवसेना का नेता मुख्यमंत्री होगा।”

वहीं, NCP अध्यक्ष शरद पवार से जब पूछा गया कि क्या कॉन्ग्रेस और NCP के बीच कोई बैठक होनी है तो उन्होंने कहा, “कौन कहता है कि कोई बैठक है? मुझे नहीं पता।”

इससे पहले, NCP नेता अजीत पवार राज्यपाल से मुलाक़ात कर चुके हैं। मुलाक़ात के बाद उन्होंने कहा था कि NCP, कॉन्ग्रेस और शिवसेना अगर मिल जाएँ तो राज्य में सरकार बनाई जा सकती है।

इससे पहले मीडिया के सामने बहुमत का दावा करने के वाली शिवसेना ने सोमवार शाम को राज्यपाल से 3 दिनों का अतिरिक्त वक़्त माँगा था। आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में राजभवन पहुँचे शिवसेना नेताओं को राज्यपाल ने अतिरिक्त वक़्त देने से इनकार कर दिया। शिवसेना बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों के समर्थन का पत्र नहीं दे पाई।

इसके अलावा, NCP नेता जयंत पाटिल ने कहा था कि NCP नेताओं ने राज्यपाल से है कहा कि वो अपने साथी दलों से बात करउन्हें जवाब देंगे। सोमवार को उद्धव ठाकरे और शरद पवार की मुलाक़ात भी हुई थी। उद्धव की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से भी फोन पर बात हुई। लेकिन, शिवसेना को समर्थन पत्र हासिल करने में कामयाबी नहीं मिल पाई।

उधर, भाजपा की भी कोर टीम की बैठक हुई। बैठक ख़त्म होने के बाद भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार ने कहा कि उनकी पार्टी अभी ‘वेट एंड वाच’ की रणनीति पर काम कर रही है। इस बैठक में महाराष्ट्र के ताज़ा राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा हुई।

ग़ौरतलब है कि 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105, शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली है। भाजपा-शिवसेना और कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, नतीजों के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम का पद मॉंग रही थी जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया। रविवार को भाजपा ने गवर्नर से कहा कि वह सरकार नहीं बनाएगी। इसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को न्योता दिया था।

रामलला ​ही रहे विराजमान… क्योंकि गुरु नानक देव भी कभी गए थे अयोध्या

क़ानूनी रूप से राम मंदिर का निर्माण प्रशस्त होने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के उन पहलुओं पर ध्यान देना ज़रूरी है, जो आपको इतिहास में पीछे ले जाकर यह बताएगा कि सारी चीजें सार्वजनिक रूप से ज्ञात थीं लेकिन फिर भी मामले को अटकाने, लटकाने और भटकाने की कोशिशें जारी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि मंदिर वहीं बनेगा और मस्जिद कहीं और बनेगा। मस्जिद के लिए अयोध्या में ही किसी और जगह पर 5 एकड़ ज़मीन मुहैया कराने का आदेश दिया गया। सीजेआई गोगोई की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय पीठ ने यह माना कि मुस्लिम पक्ष राम जन्मभूमि पर अपना एक्सक्लूसिव स्वामित्व नहीं साबित कर पाया।

यह भी एक संयोग ही था कि जिस दिन राम मंदिर पर फ़ैसला आया, उसी दिन करतारपुर साहिब कॉरिडोर का उद्घाटन भी हुआ। इसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह और पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह सम्मिलित हुए। करतारपुर कई वर्षों तक सिखों के प्रथम गुरु नानक देव जी का निवास स्थान रहा है। उन्होंने वहाँ 18 वर्ष गुजारे थे। ऐसे में, सिखों के लिए यह ख़ुशी का क्षण रहा क्योंकि जिस पवित्र स्थल को वो सीमा के इस पार से देख कर ही संतोष कर लेते थे, अब वहाँ जाकर दर्शन करने का भी सौभाग्य प्राप्त होगा।

इन सबके बीच राम मंदिर मामले में भी गुरु नानक देव जी का जिक्र आया। अयोध्या फ़ैसले की जो कॉपी है, उसमें पृष्ठ संख्या 991-995 में सिखों के प्रथम गुरु का जिक्र किया गया है। एक तरह से ये प्रमुख आधार रहा, जिसका संज्ञान लेते हुए अदालत ने यह माना कि बाबर के आक्रमण से वर्षों पहले भी अयोध्या एक तीर्थस्थल था और वहाँ पूजा-पाठ होते थे। दरअसल, सुनवाई के दौरान राजिंदर सिंह नामक वकील कोर्ट में पेश हुए थे, जो सिख इतिहासकार हैं और सिख साहित्यों के बड़े विद्वान भी हैं। उन्होंने सिख साहित्यों के आधार पर यह साबित किया कि गुरु नानक देव 1510 में भगवान श्रीराम का दर्शन करने गए थे।

गुरु नानक देव जी ने सं 1510-1511 में अयोध्या में भगवान श्रीराम का दर्शन किया था। गुरु नानक देव सं 1507 (विक्रम संवत 1564) में भद्रपद पूर्णिमा के दिन तीर्थाटन के लिए निकले थे। उससे पहले उन्हें भगवान का साक्षात्कार हो चुका था। उसके बाद वो दिल्ली से हरिद्वार और सुल्तानपुर होते हुए अयोध्या पहुँचे। उनका ये तीर्थाटन 3-4 सालों तक चला। वो 1510-11 (विक्रम संवत 1567-68) में अयोध्या पहुँचे। सुप्रीम कोर्ट ने इस ओर ध्यान दिलाया है कि जब उनका ये दौरा हुआ, तब तक बाबर ने भारत पर आक्रमण नहीं किया था। राजिंदर सिंह ने सिखों के पवित्र साहित्य ‘जन्म साखी’ को सबूत के रूप में पेश कर बताया कि गुरु नानक देव ने भगवान राम का दर्शन किया था।

सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट का वो हिस्सा, जिसमें गुरु नानक देव जी के अयोध्या दर्शन का जिक्र है

इलाहबाद हाईकोर्ट के फ़ैसले में भी जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने ‘जन्म साखी’ का जिक्र करते हुए इस घटना की तरफ़ ध्यान दिलाया था। राजिंदर सिंह ने ‘आदि साखी’, ‘पुरातन जन्म साखी’, ‘पोढ़ी जन्म साखी’ और ‘गुरु नानक वंश प्रकाश’ जैसे पवित्र पुस्तकों का जिक्र करते हुए अपनी बात का सबूत पेश किया। यह भी पता चला कि बाद के दिनों में गुरु तेग बहादुर और गुरु गोविन्द सिंह भी भगवान श्रीराम का दर्शन करने अयोध्या पहुँचे थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि गुर नानक देव द्वारा वहाँ जाकर दर्शन करना हिन्दुओं की आस्था और विश्वास पर मुहर लगाता है। कोर्ट ने माना है कि बाबर के आक्रमण से पहले के कई धार्मिक दस्तावेज मौजूद हैं, जो जन्मभूमि की बात का समर्थन करते हैं।

यहाँ एक और घटना का याद दिलाना ज़रूरी है, जो निहंग सिखों को लेकर है। नवम्बर 30, 1858 को अवध के थानेदार ने एक एफआईआर दर्ज की थी, जिसमें उसने कहा था कि 25 सिख राम जन्मभूमि में घुस आए और उन्होंने गुरु गोविन्द सिंह का हवन किया। इन सिखों ने वहाँ की दीवारों पर ‘राम-राम’ लिखा और कई धार्मिक प्रक्रियाएँ पूरी करते हुए पूजा-पाठ भी किया। यह बताता है कि यह आंदोलन सिर्फ़ हिन्दुओं का नहीं था बल्कि पूरा भारत इससे जुड़ा हुआ था। निहंग सिखों की कहानी गुरु गोविंद सिंह और उनके पुत्रों के बलिदान तक जाती है। निहंग सिख संख्याबल में कम होने बावजूद दुश्मन को नाकों चने चबवाने वाले इतिहास के कारण विख्यात हैं।

यह सब बताता है कि अयोध्या विवाद को जबरदस्ती लम्बा खींचा जा रहा था जबकि सारी चीजें पब्लिक डोमेन में पहले से ही थीं। गुरु नानक देव द्वारा वहाँ दर्शन करना और फिर निहंग सिखों द्वारा जन्मभूमि में राम की आराधना करने से यह पता चला है कि राम जन्मभूमि से भारत के लोगों की भावनाएँ जुड़ी थीं, सिर्फ़ हिन्दुओं की नहीं।

हर घर से 1 शिला, 1 मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपए: जहाँ सीता ने ली थी भू-समाधि वहाँ बनेगा भव्य मंदिर

अयोध्या में राम मंदिर का रास्ता साफ होने के साथ ही पड़ोसी राज्य उत्तराखंड में सीता माता का मंदिर बनाए जाने की बात सामने आई है। सीता की भू-समाधि वाले स्थान के रूप में प्रख्यात उत्तराखंड के पौड़ी जिले के फलस्वाड़ी गाँव में एक भव्य मंदिर बनाया जाएगा। प्रदेश के मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने पौड़ी में आयोजित शरदोत्सव में बतौर मुख्य अतिथि अपने संबोधन में कहा कि प्रस्तावित सीता माता सर्किट, पौड़ी के विकास में मील का पत्थर साबित होगा।

इस पर काम भी शुरू कर दिया गया है। मुख्यमंत्री का कहना है कि इस सर्किट के विकास से दुनिया का हर वह व्यक्ति जिसकी भगवान राम और माता सीता में आस्था है, फलस्वाड़ी गाँव में ज़रूर आना चाहेगा, जहाँ माता सीता ने भू-समाधि ली थी। उन्होंने आह्वान किया है कि फलस्वाड़ी में माता सीता का भव्य मंदिर बने, इसके लिए क्षेत्र के हर गाँव-हर घर से एक शिला (पत्थर), एक मुट्ठी मिट्टी और 11 रुपए दान लिया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि इसके लिए जल्द ही यात्रा की जाएगी। वे स्वयं देवप्रयाग से यह यात्रा करेंगे। संत-महात्माओं ने भी इसमें शामिल होने की इच्छा व्यक्त की है। इस यात्रा में यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ भी साथ होंगे। मुख्यमंत्री ने त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि जिले के कोट ब्लॉक के फलस्वाड़ी गाँव स्थित सीता माता मंदिर को सीता सर्किट के रुप में विकसित करने की कार्ययोजना तैयार की गई है। सर्किट में फलस्वाड़ी के सीता माता मंदिर, कोटसाड़ा के महर्षि वाल्मीकि मंदिर, देवल गांव स्थित श्री लक्ष्मण मंदिर समूह, विदाकोटी व देवप्रयाग स्थित श्री रघुनाथ मंदिर को जोड़ने की योजना है।

बता दें कि जैसे श्रीराम को पुरुषों में उत्तम कहा गया है, उसी तरह माता सीता को भी महिलाओं में सबसे उत्तम माना जाता है। माता सीता मिथिला के राजा जनक की पुत्री थीं इसलिए उन्हें ‘जानकी’ भी कहा जाता है। वनवास भगवान राम को मिला था, लेकिन बचपन से महलों में पली-बढ़ी माता सीता ने अपना पतिव्रत धर्म निभाने के लिए महलों के सारे सुख, धन और वैभव को छोड़ कर पति के साथ वन के लिए चल दीं। 14 वर्ष का वनवास काटा। रावण द्वारा हरण के बाद उन्हें अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ी।

पौराणिक और आध्यात्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम के माता सीता को त्यागने के बाद लक्ष्मण उन्हें विदाकोटी में छोड़ वापस अयोध्या लौट गए थे। कोटसाड़ा गाँव स्थित महर्षि वाल्मीकि ने सीता माता को अपने आश्रम में रखा था। जब भगवान राम ने माता सीता की पवित्रता पर संशय व्यक्त किया तो माता सीता ने हाथ जोड़कर नीचे मुख करके बोलीं, “हे धरती माँ, यदि मैं पवित्र हूँ तो धरती फट जाए और मैं उसमें समा जाऊँ।” सीता के यह कहते ही नागों पर रखा एक सिंहासन पृथ्वी फाड़कर बाहर निकला। सिंहासन पर पृथ्वी देवी बैठी थीं। उन्होंने सीता को गोद में बैठा लिया। माता सीता के बैठते ही वह सिंहासन धरती में धँसने लगा और सीता माता धरती में समा गईं।

राष्ट्रीय और क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं रोहिंग्या: बांग्लादेश की PM शेख हसीना

बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सोमवार (12 नवंबर) को कहा कि ‘उत्पीड़न’ के कारण म्यांमार से भाग कर बांग्लादेश में आए 10 लाख से अधिक रोहिंग्या पूरे क्षेत्र की ‘सुरक्षा के लिए ख़तरा’ हैं। उन्होंने वैश्विक समुदाय से इस मुद्दे को हल करने का आग्रह किया है।

संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 24 मई, 2018 तक 9,00,000 से अधिक रोहिंग्याओं ने म्यांमार के रखाइन प्रांत से पलायन किया है। 2017 में सैन्य कार्रवाई के बाद बड़े पैमाने पर हुई हिंसा के कारण ये भागे हैं। बड़ी संख्या में इनके शरण लेने से पड़ोसी देश बांग्लादेश में बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

हसीना ने तीन दिवसीय ‘ढाका ग्लोबल डायलॉग -2019’ को संबोधित करते हुए कहा, “क्षेत्रीय सुरक्षा के संदर्भ में, मैं कहना चाहूँगी कि म्यांमार के 1.1 मिलियन से अधिक रोहिंग्या नागरिक उत्पीड़न के चलते भाग कर बांग्लादेश आ गए थे और वे न केवल बांग्लादेश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं बल्कि पूरे क्षेत्र के लिए ख़तरा हैं।”

बांग्लादेश की आधिकारिक समाचार एजेंसी संगबाथा (बीएसएस) के अनुसार उन्होंने कहा,

“मैं विश्व समुदाय से आग्रह करती हूँ कि वह इस ख़तरे को गंभीरता से लेते हुए इस पर उचित कार्रवाई करे। शांति और सुरक्षा के बिना किसी भी देश के विकास और समृद्धि को सुनिश्चित करना संभव नहीं होगा।”

सोमवार को शुरू हुआ यह संवाद बांग्लादेश इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज (BIISS) और भारत स्थित स्वतंत्र थिंक-टैंक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ORF) द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया है। 50 से अधिक देशों के 150 से अधिक प्रतिनिधियों ने बातचीत, विचार-विमर्श करने और सबसे अधिक दबाव वाली वैश्विक अनिवार्यताओं पर बहस करने के लिए इसमें हिस्सा ले रहे हैं।

ख़बर के अनुसार, इस समारोह में बांग्लादेश के विदेश मंत्री एके अब्दुल मोमन, ओआरएफ अध्यक्ष समीर सरन और बीआईआईएसएस के महानिदेशक एकेएम अब्दुर रहमान ने भी बात रखी।

भारत और म्यांमार दोनों पड़ोसी हैं। इनके संबन्ध अत्यन्त प्राचीन और गहरे हैं और आधुनिक इतिहास के तो कई अध्याय बिना एक-दूसरे के उल्लेख के पूरे ही नहीं हो सकते। भारत और म्‍यांमार की सीमाएँ आपस में लगती हैं जिनकी लंबाई 1,600 किमी से भी अधिक है तथा बंगाल की खाड़ी में एक समुद्री सीमा से भी दोनों देश जुड़े हुए हैं। अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड की सीमा म्यांमार से सटी हुई है।

एक महिला सहित पंजाब से 2 खालिस्तानी आतंकी गिरफ़्तार, हिंदूवादी नेता थे निशाने पर

पंजाब पुलिस के ऑपरेशन सेल ने दो खालिस्तानी आतंकियों को गिरफ़्तार किया है। इनमें एक महिला भी शामिल हैं। उसे लुधियाना से गिरफ़्तार किया गया, जहाँ वह बतौर नर्स कार्यरत थी। वहीं, दूसरी गिरफ़्तारी गुरदासपुर से हुई। करतारपुर कॉरिडोर खोले जाने के कुछ ही दिन बाद हुई इन गिरफ़्तारियों ने ख़ुफ़िया एजेंसियों व सुरक्षा बलों को चौकन्ना कर दिया है। पाकिस्तान द्वारा करतारपुर साहिब में कई आपत्तिजनक चीजें लिखी जाने की बात सामने आई थी। पाक ने लिखा था कि भारत ने यहाँ बम गिराया। पंजाब के सीएम अमरिंदर सिंह करतारपुर कॉरिडोर खोले जाने जाने के पीछे पाकिस्तानी एजेंसी आईएसआई की साजिश होने की आशंका पहले ही जता चुके हैं।

जिन खालिस्तानी आतंकियों को गिरफ़्तार किया गया है, उनके निशाने पर कई हिन्दू नेता थे। इन्हें पंजाब में आतंकी गतिविधियों को बढ़ाने के लिए विदेश से फंड मिल रहे थे। हिंदूवादी नेताओं को इस्लामिक आतंकियों व कट्टरपंथियों द्वारा निशाना बनाए जाने की ख़बर भी आई थी। गुरदासपुर से गिरफ़्तार खालिस्तानी आतंकी ड्राइवर के रूप में काम करता था। दोनों मिल कर किसी बड़ी घटना को अंजाम देने की साजिश रच रहे थे, जिसमें हिंदूवादी नेताओं की हत्या भी शामिल थी।

गिरफ़्तार हुए खालिस्तानी आतंकियों की पहचान भी हो चुकी है। सुरिंदर कौर फरीदकोट की रहने वाली है। वह लुधियाना के किसी निजी अस्पताल में नर्स का काम करती थी। सुरिंदर कौर के साथी की पहचान लखबीर सिंह के रूप में हुई है। वह होशियारपुर का रहने वाला है। वह दुबई में ड्राइवर का काम करता था। पंजाब पुलिस की साइबर क्राइम सेल इन दोनों पर कई दिनों से नज़र बनाए हुए थे। पुलिस ने बताया कि दोनों ही सोशल मीडिया के माध्यम से दोस्त बने थे और फेसबुक पर सक्रिय थे।

दोनों आतंकियों से पूछताछ भी की गई है। पूछताछ में उन्होंने स्वीकार किया है कि वो पंजाब में आतंकी गतिविधियों को पुनर्जीवित करने के लिए काम कर रहे थे। पंजाब पुलिस यह पता लगाने में जुटी है कि इन्हें विदेश में कहाँ से फंड मिल रहा था और कौन लोग इनकी मदद कर रहे थे। दोनों ही आतंकियों को अदालत ने दो दिनों की पुलिस हिरासत में भेज दिया है।

लश्कर की आतंकी गतिविधियों के लिए फंड जुटाता था मुजफ्फरनगर का जावेद अली, NIA ने दिल्ली में धर दबोचा

राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने टेरर फंडिंग मामले में लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े जावेद अली को गिरफ्तार किया है। वह यूपी के मुजफ्फरनगर का रहने वाला है। वह लश्कर आतंकी शेख अब्दुल नईम उर्फ सोहेल खान को आतंकी गतिविधियों के लिए धन मुहैया कराने के मामले में पकड़ा गया है। अरसे से फरार जावेद को एनआईए ने रविवार को दिल्ली में दबोचा।

सोहेल को एनआईए पहले ही गिरफ्तार कर चुकी है। उस पर अपने साथियों के साथ मिलकर पूरे देश में आतंकवादी गतिविधियॉं चलाने के लिए आपराधिक साजिश रचने के मामले में आरोप-पत्र भी एजेंसी दाखिल कर चुकी है। जाँच में पता चला कि जावेद का संबंध लश्कर से है और वह उसके लिए फंड जुटाता था। फंड का इस्तेमाल भारत के विभिन्न स्थानों की रेकी करने, लश्कर के लिए आतंकवादियों की भर्ती करने और विदेशी नागरिकों और पर्यटकों सहित सॉफ्ट टारगेट की पहचान करने के लिए किया जाता था।

गिरफ्तार जावेद उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के खामपुर गाँव का रहने वाला है। उसकी गिरफ्तारी 2017 में आतंकी फंडिंग के एक मामले में की गई है। 2017 में वह सऊदी अरब से मुजफ्फरनगर तक हवाला के जरिए धन मुहैया कराने में शामिल था। उसने सोहेल खान को धन मुहैया कराया था।

NIA द्वारा जारी की गई प्रेस रिलीज

एनआईए लश्कर के लिए धन जुटाने से संबंधित मामले की जाँच कर रही है, जिसका पाकिस्तान और अन्य देशों में स्थित आतंकी संचालनकर्ता भारत में आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं।

दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर का स्क्रीनशॉट

इस मामले ने एनआईए पहले ही 5 आरोपितों को गिरफ्तार कर चुकी है। गिरफ्तार किए गए आरोपितों के नाम शेख अब्दुल नईम, बेदार बख्त, तौसीफ अहमद मलिक, दिनेश गर्ग और आदिश कुमार जैन हैं। मामले में पाँच अन्य आरोपित अमजद, हबीब-उर-रहमान, गुल नवाज, जावेद और मोहम्मद इमरान फरार थे। इनमें से जावेद अब पकड़ में आ चुका है।

एनआईए प्रवक्ता ने बताया कि पाकिस्तान स्थित लश्कर के मुख्यालय से पैसा दुबई भेजा जाता था। दुबई में बैठा हैंडलर हवाला कारोबार के जरिए यह पैसा भारत में भेजता था। इस पैसे को जावेद और उसके साथी लश्कर के नए एजेंट बनाने के लिए प्रयोग करते थे। वह इस पैसे के बदले लश्कर के लिए भारत के विभिन्न ठिकानों की रेकी कराते थे। एनआईए का दावा है कि जावेद सीधे तौर पर आतंकी संगठन लश्कर से जुड़ा हुआ था।

कश्मीर पर पाक का समर्थन करने वाले तुर्की में कॉन्ग्रेस ने खोला दफ्तर, युसूफ ख़ान को बनाया इंचार्ज

हाल ही में पश्चिमी एशिया में स्थित तुर्की ने जम्मू-कश्मीर मुद्दे पर न सिर्फ़ पाकिस्तान का साथ दिया था, बल्कि भारत के ख़िलाफ़ ज़हर उगला था। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान ख़ान ने यूएन में अपने सम्बोधन के दौरान जम्मू-कश्मीर, इस्लाम और पैगम्बर मुहम्मद के बारे में बातें की थी। इसके बाद तुर्की ने पाकिस्तान के सुर में सुर मिलाया था। अब भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी कॉन्ग्रेस ने तुर्की में अपना नया दफ्तर खोला है। कॉन्ग्रेस की ओवरसीज शाखा ने तुर्की में अपना दफ़्तर खोला है। ऐसे समय में जब तुर्की लगातार भारत की आलोचना कर रहा है, कॉन्ग्रेस का वहाँ पर ऑफिस स्थापित करना बहुतों की समझ में नहीं आया।

तुर्की ने जब जम्मू-कश्मीर पर बयान दिया, उसके बाद भारतीय विदेश मंत्रालय भी उसके काट में लग गया। विदेश मंत्रालय ने एक एडवाइजरी जारी कर तुर्की की यात्रा पर जा रहे भारतीयों को सावधानी बरतने की सलाह दी। भारत ने अपने नागरिकों को तुर्की न जाने की सलाह दी। इससे पहले भारत ने रक्षा क्षेत्र में तुर्की के साथ समझौतों में कटौती की, क्योंकि उसने पाकिस्तान का साथ देते हुए भारत के आंतरिक मसले में दखल दिया था। तुर्की ने साइप्रस के एक भू-भाग पर अवैध कब्ज़ा कर रखा है। पीएम मोदी ने साइप्रस की अखंडता और सम्प्रभुता का समर्थन कर तुर्की की काट निकाली।

अनादोलू की एक ख़बर के अनुसार, कॉन्ग्रेस पार्टी ने तुर्की में अपना दफ़्तर खोला है। ‘इंडियन ओवरसीज कॉन्ग्रेस’ ने एक प्रेस स्टेटमेंट जारी कर इस बात की जानकारी दी। इस्ताम्बुल में स्थापित किए गए इस दफ़्तर में मोहम्मद युसूफ ख़ान नामक व्यक्ति के नेतृत्व में कार्य किया जाएगा। कॉन्ग्रेस ने कहा है कि युसूफ ख़ान के नेतृत्व में पार्टी भारत और तुर्की के बीच संबंधों को प्रगाढ़ करते हुए राजनीति, संस्कृति, शिक्षा, स्वास्थ्य और पर्यटन के क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच परस्पर सहयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।

तुर्की के राष्ट्रपति तैय्यप एर्दोगन ने कहा था कि जम्मू-कश्मीर मसले को तनाव नहीं, बल्कि बातचीत के द्वारा हल किया जाना चाहिए। उन्होंने यह दिखाने की कोशिश की थी कि भारत ने ही जम्मू-कश्मीर में संघर्ष की स्थिति पैदा की है। उन्होंने पूरे दक्षिण एशिया की शांति और समृद्धि को जम्मू-कश्मीर मसले से जोड़ते हुए कहा था कि इस क्षेत्र के शांत हुए बिना शांति मुश्किल है। एर्दोगन बाद में भी अपने बयान से बाज नहीं आए और उन्होंने कहा कि वो कश्मीर मुद्दे को उठाते रहेंगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तुर्की को घेरने के लिए ग्रीस, साइप्रस और अर्मेनिया के साथ संबंधों को और प्रगाढ़ करना शुरू कर दिया है। ये तीनों ही देश तुर्की के प्रतिद्वंद्वी माने जाते हैं। मोदी ने तुर्की को उसी की भाषा में जवाब देने के लिए इन देशों के राष्ट्राध्यक्षों से भी बात की। ऐसे में कॉन्ग्रेस का इस समय वहाँ ऑफिस खोलना सोशल मीडिया में आलोचना का विषय भी बन गया है।

महाराष्ट्र में नया ट्विस्ट: शिवसेना नहीं जुटा पाई जादुई आँकड़ा, अब गवर्नर ने एनसीपी को दिया मौका

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बाद अब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने एनसीपी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है। बता दें कि जहाँ भाजपा ने सरकार बनाने का दावा ही नहीं पेश किया, मीडिया के सामने बहुमत का दावा करने के वाली शिवसेना ने राज्यपाल से 3 दिनों का वक़्त माँगा। आदित्य ठाकरे के नेतृत्व में राजभवन पहुँचे शिवसेना नेताओं को राज्यपाल ने अतिरिक्त 3 दिनों का वक़्त देने से इनकार कर दिया। शिवसेना बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों के समर्थन का पत्र नहीं दे पाई। अब एनसीपी नेताओं ने राज्यपाल से मुलाक़ात के बाद अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्हें मंगलवार (नवंबर 12, 2019) रात 8.30 बजे तक की समय-सीमा दी गई है।

एनसीपी नेता जयंत पाटिल ने कहा कि पहले और दूसरे सबसे बड़े दल के विफल रहने के बाद राज्यपाल ने नियमानुसार तीसरे सबसे बड़े दल यानी एनसीपी को सरकार गठन करने के लिए आमंत्रित किया है। एनसीपी नेताओं ने राज्यपाल से कहा कि वो अपने साथी दलों से बात कर के उन्हें जवाब देंगे। एनसीपी ने राज्यपाल से कहा कि पार्टी जल्द से जल्द जवाब देने की कोशिश करेगी। सोमवार को उद्धव ठाकरे और शरद पवार की मुलाक़ात भी हो चुकी है। उद्धव की कॉन्ग्रेस अध्यक्ष सोनिया गाँधी से भी फोन पर बात हुई। लेकिन, शिवसेना को समर्थन पत्र हासिल करने में कामयाबी नहीं मिल पाई।

एनसीपी नेता अजीत पवार और छगन भुजबल ने अन्य नेताओं के साथ राज्यपाल से मुलाक़ात की। एनसीपी ने इशारा किया है कि वो सरकार गठन के लिए प्रयास करेगी। एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा कि कॉन्ग्रेस के साथ इस बात पर विचार-विमर्श किया जाएगा कि कैसे महाराष्ट्र को एक स्थिर सरकार दी जाए। नवाब मलिक ने मंगलवार को कॉन्ग्रेस से बात करने के बाद अपनी पार्टी का रुख साफ़ करने की बात कही।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने इस बात से इनकार कर दिया है कि पार्टी ने शिवसेना को समर्थन दिया है। खड़गे ने कहा कि ऐसा कोई पत्र राज्यपाल को नहीं सौंपा गया है। उधर भाजपा की भी कोर टीम की बैठक हुई। बैठक ख़त्म होने के बाद भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार ने कहा कि उनकी पार्टी अभी ‘वेट एंड वाच’ की रणनीति पर काम कर रही है। इस बैठक में महाराष्ट्र के ताज़ा राजनीतिक परिदृश्य पर चर्चा हुई।

गौरतलब है कि 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105, शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और एनसीपी को 54 सीटें मिली है। भाजपा-शिवसेना और कॉन्ग्रेस-एनसीपी ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, नतीजों के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम का पद मॉंग रही थी जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया। रविवार को भाजपा ने गवर्नर से कहा कि वह सरकार नहीं बनाएगी। इसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को न्योता दिया था। शुरुआत में कॉन्ग्रेस और एनसीपी के सहयोग से सरकार बनाने को लेकर शिवसेना बेहद उत्साहित दिखी। उसके मंत्री ने भी मोदी कैबिनेट से इस्तीफा दे दिया। उम्मीद थी कि सोमवार शाम तक उसे समर्थन का कॉन्ग्रेस ऐलान कर सकती है। लेकिन, आखिरी पलों में कॉन्ग्रेस ने पत्ते खोलने से इनकार कर दिए।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ओवैसी का बयान भड़काऊ, भोपाल में मामला दर्ज

अपने बयानों के चलते हमेशा विवादों में घिरे रहने वाले AIMIM नेता और हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी एक बार फिर अपनी इसी आदत के चलते मुसीबत में फँस गए हैं। उनके खिलाफ भोपाल के जहाँगीराबाद पुलिस स्टेशन में मामला दर्ज कराया गया है। वकील पवन कुमार यादव ने मामला दर्ज करवाया है। यादव ने अयोध्या भूमि विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर दी गई ओवैसी की प्रतिक्रया को भड़काऊ बताया है।

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अयोध्या भूमि विवाद का फैसला सुना दिया। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच सदस्यीय संविधान पीठ ने एकमत से अयोध्या को भगवान राम का जन्मस्थान मानते हुए पूरी 2.77 एकड़ विवादित जमीन रामलला विराजमान को सौंपकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त कर दिया। वहीं, मुस्लिम पक्षकारों को मस्जिद बनाने के लिए 5 एकड़ जमीन देने का निर्णय सुनाया।

ओवैसी ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर नाखुशी जाहिर करते हुए कहा था कि वो इस फैसले से संतुष्ट नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम (सर्वोच्च) जरूर है, लेकिन वह अचूक नहीं है। समुदाय विशेष का जिक्र करते हुए ओवैसी ने कहा कि उन्हें खैरात में पाँच एकड़ जमीन नहीं चाहिए। ओवैसी ने कहा था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को इस पर सोचना चाहिए।

ओवैसी के इस बयान को अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने भी देशद्रोह बताया है। उन्होंने कहा है कि ओवैसी भारत और हिंदुओं के खिलाफ जहर उगलते रहते हैं। नरेंद्र गिरी का कहना है कि अगर उन्हें भारतीय न्यायपालिका और संविधान पर विश्वास नहीं है, तो उन्हें पाकिस्तान चले जाना चाहिए। उन्होंने ओवैसी द्वारा सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर असंतोष व्यक्त करने को देशद्रोह बताते हुए उनके खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने की बात कही है।