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सदियों पुरानी मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ पड़ी हुई हैं सरकारी दफ्तर में कूड़े की तरह, म्यूजियम ने रखने से कर दिया मना

एक समय में तमिलनाडु के अलग-अलग मंदिरों से चुराई गई मूर्तियाँ और कलाकृतियाँ इस समय कई सौ की तादाद में चेन्नै के गुइंडी स्थित सीबीआई-सीआईडी की आर्थिक अपराध शाखा (Economic Offence Wing ) के परिसर में खुली पड़ी हुई हैं।

इनमें से कुछ मूर्तियाँ लकड़ी से निर्मित हैं तो कुछ तांबे, पत्थर और अन्य धातुओं से। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इन्हें तमिलनाडु सरकार की आइडल विंग द्वारा जगह-जगह से बरामद किया गया है। जिसका दफ्तर (आइडल विंग) सीबीआई-सीआईडी की EOW के भवन में ही स्थित है।

रिपोर्ट के अनुसार इन कलाकृतियों में सदियों पुरानी मूर्तियाँ, पत्थर के खंभे, लकड़ी से बने वाहन, रथ आदि जैसी प्राचीन वस्तुएँ हैं। जिन्हें भवन के परिसर में खुली जगह पर बिन किसी खास देख-रेख के कूड़े की तरह फेंक दिया गया। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इन अमूल्य वस्तुओं को जिस जगह पर एक के ऊपर एक करके रखा गया है, उस जगह में और अद्यार (ADYAR) नदी के बीच केवल एक दीवार का अंतर है।

इसके अलावा रिपोर्ट में इस बात का भी उल्लेख है कि ये कलाकृतियाँ आइडल विंग पुलिस द्वारा सालों से मारी जा रही छापेमारी में बरामद हुई हैं। इनमें करीब 800 से ऊपर पत्थर की मूर्तियाँ हैं, जिन्हें आइडल विंग पुलिस ने साल 2016 में अलवरपेट के जी दीनदयालन नामक एक व्यवसायी के गोदाम से बरामद किया था।

इसके बाद चेन्नैई से थोड़ी दूर कुच्चीकादु में दीनदयालन के साथी के पास से भी लकड़ी की 200 कलाकृतियाँ बरामद हुई थीं। जिसकी छापेमारी एजी पॉन मनीकावेल (AG Pon Manickavel ) के इंस्पेक्टर जनरल रहते हुए हुई थी।

द हिंदू की रिपोर्ट्स के अनुसार, इन कलाकृतियों को उनके स्वामियों या संरक्षकों को सौंपने के लिए कई न्यायिक और ब्यूरोक्रेटिक परेशानियाँ हैं। जिस कारण इन्हें बिना कोर्ट की सुनवाई पूरे हुए नहीं दिया जा सकता। आइडल विंग ने किसी तरह की भी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक इन कलाकृतियों को संभाले रखने के लिए अपने दफ्तर के परिसर में रखा हुआ है।

जानकारी के लिए बता दें कि इस अभियान के तहत प्रसिद्ध कल्लिडईकुरुचि (Kallidaikurichi) की नटराज मूर्ति भी ऑस्ट्रेलिया वापस लाकर श्री कुलासेकरनमुद्दैयर मंदिर (Sri Kulasekaramudaiyar) को लौटा दी गई है। और तनजवुर भ्रिहादीशवर मंदिर की मूर्तियाँ भी साराभाई म्यूजियम से मंगवा ली गई हैं। जबकि बाकी सभी कलाकृतियाँ अब भी अपनी न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के इंतजार में हैं, ताकि उनकी कस्टडी उनके संरक्षकों को सौंपी जा सके।

बता दें कि AG Pon Manickavel को उनकी रिटायरमेंट के बाद आइडल विंग का स्पेशल ऑफिसर बनाया गया था। जिसके बाद उनके निर्देशों में ये छापेमारियाँ हुई। लेकिन, चेन्नई के एग्मोर स्थित सरकारी म्यूजियम ने इन कलाकृतियों को रखने के लिए मना कर दिया और अन्य जगहों पर भी कागजी कार्रवाइयों के कारण अटकी हुई है।

महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन, राज्यपाल ने की अनुशंसा: सरकार गठन में विफल हुए सभी दल

महाराष्ट्र में राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा कर दी है। राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राष्ट्रपति शासन की अनुशंसा की। राज्यपाल ने इस सम्बन्ध में केंद्र सरकार को रिपोर्ट भेज दी है। कहा जा रहा है कि भाजपा, शिवसेना और एनसीपी- राज्य में तीनों सबसे बड़े दलों के सरकार गठन में असफल रहने के कारण ये फैसला लिया गया। राज्यपाल ने सबसे पहले भाजपा नेताओं से मुलाक़ात की थी लेकिन शिवसेना के अड़ंगे के कारण महायुति को पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद सरकार का गठन नहीं हो सका।

इसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को सरकार गठन के लिए आमंत्रित किया। पार्टी मीडिया में अपने पास बहुमत के लिए ज़रूरी विधायकों का समर्थन होने का दावा कर रही थी लेकिन राज्यपाल से उसने 3 दिनों का वक़्त माँगा था। राज्यपाल ने उन्हें अतिरिक्त समय देने से इनकार कर दिया।

राज्यपाल ने एनसीपी को भी सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया क्योंकि वो राज्य में तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी है। कॉन्ग्रेस द्वारा शिवसेना को समर्थन के सम्बन्ध में रुख स्पष्ट न किए जाने के कारण शिवसेना के नेतृत्व में सरकार गठन नहीं हो सका। उद्धव ने सोमवार (नवंबर 11, 2019) को पवार से मुलाक़ात भी की थी लेकिन बात नहीं बन सकी। कॉन्ग्रेस के सभी विधायक जयपुर में रुके हुए हैं और पार्टी ने अभी तक विधायक दल का नेता भी नहीं चुना है।

राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित फ़िल्म के निर्देशक समेत 7 लोगों पर जातिवादी गालियों के इस्तेमाल पर मामला दर्ज

रिलीज के चार दिनों के भीतर, एक संवाद में जातिवादी गालियों का उपयोग करने के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गुजराती फ़िल्म ‘हेलारो’ (Hellaro) के निर्देशक सहित सात लोगों के ख़िलाफ़ शिक़ायत दर्ज की गई है। फ़िल्म के निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक और संपादक के ख़िलाफ़ अहमदाबाद में शिक़ायत दर्ज की गई है।

अहमदाबाद म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन (AMC) की पार्षद जमनाबेन वेग्डा ने एक मुख्य चरित्र का उल्लेख करने के लिए एक जातिवादी गाली का इस्तेमाल करने का आरोप लगाया। ख़बर के मुताबिक़, फ़िल्म के एक डायलॉग में वेग्डा ने आपत्ति जताई थी, जिसमें एक ढोल वादक मूलजी से सरपंच ने पूछा था कि वह किस जाति का है। AMC पार्षद ने कहा है कि मूलजी का जवाब जातिवादी गाली था, जिससे उनकी भावनाएँ आहत हुईं।

पुलिस में दर्ज कराई गई शिक़ायत में फ़िल्म हेलारों के निर्देशक अभिषेक शाह, निर्माता आशीष सी पटेल, नीरव सी पटेल, आयुष पटेल, मीट जानी के साथ-साथ संवाद लेखक सौम्या जोशी और संपादक प्रतीक गुप्ता के ख़िलाफ़ सरकार द्वारा कथित रूप से ‘समुदाय का अपमान करने और भावनाओं को आहत करने’ से प्रतिबंधित ‘शब्द’ का उपयोग करने के ख़िलाफ़ कार्रवाई किए जाने की माँग की गई है।

अहमदाबाद के कागदपीठ के पुलिस निरीक्षक यू डी जडेजा ने बताया कि शिक़ायत दर्ज कर ली गई है और आगे की जाँच के लिए एससी/ एसटी सेल को भेज दी गई है।

बता दें कि ‘हेलारो’ पहली गुजराती फ़िल्म है जिसे राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। 66वें वार्षिक राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में इसे ‘सर्वश्रेष्ठ फीचर फ़िल्म’ घोषित किया गया। यह फ़िल्म 1975 में गुजरात के कच्छ के रण गाँव के सुदूर गाँव में बनाई गई थी। इस फ़िल्म में गुजरात के नृत्य, गरबा को फ़िल्माया गया है। इस फ़िल्म की कहानी ग्रामीण गुजरात की पितृसत्ता पर आधारित है। साथ ही कुरीतियों के ख़िलाफ़ खड़े महिलाओं के एक समूह को भी दिखाया गया है। यह फ़िल्म 8 नवंबर को रिलीज़ हुई थी, जिसका ट्रेलर आप यहाँ देख सकते हैं।

कॉन्ग्रेस नेताओं ने रद्द किया मुंबई दौरा, सरकार गठन को लेकर होने वाली थी चर्चा

महाराष्ट्र में सरकार गठन की उम्मीदों को कॉन्ग्रेस ने एक बार फिर झटका दिया है। कॉन्ग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने बताया कि केसी वेणुगोपाल और मल्लिकार्जुन खड़गे ने अपना मुंबई दौरा रद्द कर दिया है। दोनों महाराष्ट्र में सरकार गठन और शिवसेना को समर्थन देने के तौर-तरीकों पर चर्चा करने के लिए मुंबई आने वाले थे। इस यात्रा का ऐलान सोमवार को तब किया गया जब अंतिम क्षणों में सोनिया गॉंधी ने शिवसेना को समर्थन देने पर पत्ते खोलने से इनकार कर दिया था।

महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष माणिकराव ठाकरे ने बताया कि NCP प्रमुख शरद पवार ने बताया कि दोनों दलों के प्रांतीय नेता पहले सरकार गठन के ‘नियम और शर्तों’ पर चर्चा करेंगे। उन्होंने कहा, “महाराष्ट्र कॉन्ग्रेस के नेता शिवसेना को बातचीत के लिए आमंत्रित करने से पहले मंगलवार को अपने NCP समकक्षों के साथ सरकार बनाने के व्यापक संदर्भों पर चर्चा करेंगे।”

ठाकरे ने बताया कि कॉन्ग्रेस प्रमुख सोनिया गाँधी ने सोमवार (11 नवंबर) को पवार के साथ राज्य की राजनीतिक स्थिति पर चर्चा की और तदनुसार, यह निर्णय लिया गया कि राज्य NCP और कॉन्ग्रेस के नेता “सरकार के गठन के लिए नियम और शर्तों और एक ‘कॉमन मिनिमम प्रोग्राम’ पर चर्चा करेंगे।”

उन्होंने कहा, “शिवसेना के नेता, कॉन्ग्रेस और NCP के बीच एक समझौते के बाद चर्चा में शामिल हो सकते हैं। शरद पवार ने कॉन्ग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को सूचित किया है कि वह दिल्ली आएँगे और उनके साथ विवरण को अंतिम रूप देंगे।”

उन्होंने कहा, “ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी (AICC) के महासचिव वेणुगोपाल और खड़गे, जो मुंबई आने वाले थे, उन्होंने अपनी यात्रा स्थगित कर दी है।” इस बीच, NCP के एक वरिष्ठ नेता ने नाम न छापने की शर्त पर इकनॉमिक्स टाइम्स को बताया कि जब तक तीनों पार्टियाँ- कॉन्ग्रेस, NCP और शिवसेना, सरकार में शामिल नहीं हो जातीं, तब तक कोई स्थिरता नहीं आएगी। उन्होंने कहा, “हम चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस सरकार का हिस्सा हो।”

महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बाद अब राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने NCP को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया है। NCP को आज शाम साढ़े आठ बजे तक का समय दिया गया है। अभी तक तो कॉन्ग्रेस ने शिवसेना के साथ सरकार बनाने को लेकर आधिकारिक रूप से कोई बयान जारी नहीं किया है। वहीं, भाजपा की कोर टीम बैठक हुई थी, जिसके बाद भाजपा नेता सुधीर मुनगंटीवार ने कहा था कि उनकी पार्टी ‘वेट एंड वॉच’ की रणनीति पर काम कर रही है। 

ग़ौरतलब है कि 288 सदस्यीय महाराष्ट्र विधानसभा के चुनाव में भाजपा को 105, शिवसेना को 56, कॉन्ग्रेस को 44 और NCP को 54 सीटें मिली है। भाजपा-शिवसेना और कॉन्ग्रेस-NCP ने मिलकर चुनाव लड़ा था। लेकिन, नतीजों के बाद शिवसेना ढाई साल के लिए सीएम का पद मॉंग रही थी जिसे भाजपा ने ठुकरा दिया। रविवार को भाजपा ने गवर्नर से कहा कि वह सरकार नहीं बनाएगी। इसके बाद राज्यपाल ने शिवसेना को न्योता दिया था। वह समर्थन पत्र पेश करने में विफल रही और गवर्नर ने फिर सरकार गठन को लेकर तीसरे सबसे बड़े दल एनसीपी को मंगलवार शाम साढ़े बजे तक का वक्त दिया था।

नई मस्जिद का नाम डॉ कलाम, परमवीर अब्दुल हमीद या अशफाकउल्ला खान के नाम पर हो: VHP की माँग

सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से लंबित अयोध्या विवाद पर 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए विराम लगा दिया। अपने ऐतिहासिक फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने रामजन्मभूमि पर मंदिर निर्माण के लिए तीन महीने में ट्रस्ट के गठन का आदेश दिया है। विश्व हिंदू परिषद (VHP) के कार्यकताओं ने सोमवार (नवंबर 11, 2019) को अपनी इच्छा जताते हुए कहा कि वो चाहते हैं कि भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह भी उस ट्रस्ट के सदस्य हों।

साथ ही विहिप ने यह भी कहा कि वह केंद्र से अनुरोध करेगा कि 5 एकड़ जमीन पर बनने वाली मस्जिद का नाम बाबर के नाम पर रखने की अनुमति न दे। विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा, “बाबर एक विदेशी आक्रांता (हमलावर) था। हम सरकार को इसकी अनुमति नहीं देने के लिए संपर्क करेंगे। भारत में बहुत सारे अच्छे मुस्लिम हैं। देश की शांति और विकास में उनका काफी योगदान रहा है। इनमें वीर अब्दुल हमीद, अशफाकउल्ला खान और पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम का नाम आता है।। नई मस्जिद का नाम उनमें से किसी के नाम पर रखा जाना चाहिए।”

बता दें कि शरद शर्मा राम जन्मभूमि न्यास कार्यशला की देखभाल करते हैं, जहाँ राम मंदिर के लिए तराशे गए पत्थर रखे गए हैं। वहीं मुस्लिम याचिकाकर्ताओं में से एक का कहना है कि मस्जिद का नामकरण महत्वपूर्ण नहीं है। प्राथमिक मुद्दा मस्जिद के लिए भूमि को स्वीकार करने या न करने पर आम सहमति का था।

मुस्लिम पक्ष की ओर से मुख्य याचिकाकर्ता इकबाल अंसारी ने कहा, “मस्जिद कोई बाबर की मोहताज नहीं, बाबर एक बादशाह था।” उन्होंने आगे कहा कि अभी जमीन का अधिग्रहण किया जाना बाकी है और इस पर सुन्नी वक्फ बोर्ड की एक बैठक होगी। उन्होंने कहा कि वो देश को आश्वस्त कर सकते हैं कि वो हिन्दुओं के साथ बिना किसी उपद्रव के, गरिमा के साथ रहेंगे। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वो शांति व्यवस्था को बिगड़ने नहीं देंगे।

मस्जिद को मिलने वाली जमीन को लेकर अंसारी का एक और बयान सामने आया है, जिसमें उन्होंने कहा है, “अगर सरकार हमें जमीन देना चाहती है तो हमें हमारी सुविधा के हिसाब से देना चाहिए। आवंटित जमीन 67 एकड़ जमीन में से ही होनी चाहिए। तभी हम यह जमीन लेंगे। नहीं तो हम जमीन लेने की पेशकश को ठुकरा देंगे। लोग कह रहे हैं कि 14 कोस से बाहर जाकर मस्जिद बनाओ, यह उचित नहीं है।”

राम मंदिर पर कॉन्ग्रेस में फूट: सुरजेवाला के बयान को ख़ुर्शीद ने नकारा, कहा- मस्जिद को हाइलाइट करते

राम मंदिर मुद्दे को लेकर कॉन्ग्रेस के भीतर ही खींचतान देखने को मिल रही है। पार्टी प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि कॉन्ग्रेस अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत करते हुए राम मंदिर निर्माण का समर्थन करती है। लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान ख़ुर्शीद ने कहा है कि अगर सुरजेवाला की जगह वे पार्टी का रुख रखते तो कुछ अलग कहते। उन्होंने कहा कि राम मंदिर पर अगर उन्हें कॉन्ग्रेस का पक्ष रखने भेजा जाता तो उनकी राय वो नहीं होती, जो सुरजेवाला ने कही

ख़ुर्शीद ने कहा कि उनकी पार्टी का शुरू से यह मानना रहा है कि अयोध्या मामले में सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला आएगा उसे स्वीकार किया जाएगा। लेकिन, फ़ैसले के डिटेल में जाने पर अलग-अलग चीजों को उठा कर पेश किया जा सकता है। ख़ुर्शीद ने कहा कि राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में लिखा गया है कि 3 बार मस्जिद के साथ ग़ैर-क़ानूनी कार्य किया गया। उन्होंने कहा कि क्या हमें ये चीजें हाइलाइट नहीं करनी चाहिए?

सलमान ख़ुर्शीद ने ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ से बात करते हुए रणदीप सुरजेवाला के बयान को नकार दिया और कहा कि इससे ग़लत सन्देश गया है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि फ़ैसले में मस्जिद को ध्वस्त करने या फिर मंदिर और मस्जिद दोनों बनाने की बातें कही गई है। बकौल ख़ुर्शीद, वो मीडिया के सामने इन बातों को उठाते। उनका इशारा था कि जिस तरह उनकी पार्टी ने केवल मंदिर की बात की, उससे ग़लत सन्देश गया। उन्होंने कहा कि पार्टी को सीधा कहना चाहिए था कि वो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान करती है।

ख़ुर्शीद ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेता कठपुतली नहीं हैं, अगर बोलते समय किसी चीज को लेकर स्पष्ट राय है तो उसे रखना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कॉन्ग्रेस के सभी नेताओं ने तय किया था कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का सम्मान किया जाएगा और यही कहना चाहिए था। ख़ुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के ‘पूरे फ़ैसले’ का सम्मान किए जाने की बात कही जानी चाहिए थी, सिवाय उसमें से चुन कर किसी एक चीज का समर्थन करने की बात कहने के। एचटी को दिए गए इंटरव्यू में ख़ुर्शीद ने एक तरह से सुरजेवाला और अपनी पार्टी से एकमत न होने की ओर इशारा किया।

राम मंदिर पर सलमान ख़ुर्शीद का इंटरव्यू (साभार: HT)

ज्ञात हो कि रणदीप सुरजेवाला ने कहा था कि वो राम मंदिर बनाने के पक्ष में हैं। उन्होंने कहा था कि अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला न तो किसी की जीत है और न ही किसी की हार। लेकिन कॉन्ग्रेस पार्टी द्वारा राम मंदिर के निर्माण का समर्थन किए जाने पर ही ख़ुर्शीद नाराजगी दिखा रहे हैं। ख़ुर्शीद ने ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में एक लेख लिख कर बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में रामलला की मूर्ति रखे जाने की निंदा की है। साथ ही ख़ुर्शीद ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में कहा है कि वहाँ मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात एएसआई की रिपोर्ट साबित नहीं कर पाई। उन्होंने लिखा कि ये फ़ैसला ‘हिन्दू राष्ट्र’ को ख़ारिज करता है।

अयोध्या अधिनियम 1993 की वो धारा, जिसके तहत बनेगा राम मंदिर के लिए ट्रस्ट

शनिवार को सुप्रीम कोर्ट में 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने सदियों पुराने अयोध्या मामले पर अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया। इस फैसले में सर्वोच्च न्यायलय ने विवादित जमीन को रामलला के मंदिर निर्माण के लिए सौंपा और केंद्र सरकार को 3 महीने में इसके लिए ट्रस्ट के गठन का आदेश दिया। जिसके बाद कल खबर आई कि केंद्र सरकार के अधिकारियों ने इस विषय पर जानकारी देते हुए बताया है कि ट्रस्ट के गठन की प्रक्रिया शुरु हो गई है और फिलहाल टीम कोर्ट के फैसले का विस्तृत अध्य्यन कर रही है।

यहाँ स्पष्ट कर दें कि यह दिशा-निर्देश अयोध्या अधिनियम 1993 में निश्चित क्षेत्र के अधिग्रहण के खंड 6 और 7 के तहत केंद्र सरकार में निहित शक्तियों के मद्देनजर आया है। अब ये अधिनियम क्या है और इसके लिए तय किए गए खंडों की मंदिर निर्माण में क्या भूमिका है, आइए जानें

7 जनवरी 1993 को औचित्य में आए इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम कतिपय क्षेत्र अर्जन अधिनियम 1993 है। जिसमें उल्लेखित है कि इसके प्रारंभ होने के साथ ही क्षेत्र के संबंध में अधिकार, हक-हित, इस अधिनियम के आधार पर केंद्रीय सरकार को अंतरिक और उसमें निहित हो जाएगें। इसी अधिनियम की धारा 3 ने केंद्र सरकार को विवादित भूमि और उसके आसपास के क्षेत्र के संबंध में अधिकार, टाइटल और हित स्थानांतरित किया है।

इस अधिनियम की धारा 6 में कहा गया है कि केंद्र सरकार किसी भी प्राधिकरण या अन्य निकाय, या किसी ट्रस्ट के ट्रस्टियों को अधिग्रहित क्षेत्र को अधिनियम के प्रारंभ होने के बाद स्थापित कर सकती है, यदि निकाय इस तरह के अनुपालन के लिए तैयार है और जिसमें सरकार के नियम और शर्तें लागू हो सकती हैं।

इसके अलावा इसमें यह भी निर्धारित किया गया है कि क्षेत्र के संबंध में केंद्र सरकार के अधिकारों को उस प्राधिकरण या निकाय या उस ट्रस्ट के ट्रस्टी के अधिकार के रूप में माना जाएगा, जैसा कि मामला हो।

अब इसी प्रावधान का इस्तेमाल करके सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को एक ट्रस्ट को जमीन सौंपने के लिए कहा है, जो सरकार द्वारा बनाई गई योजना के अनुसार क्षेत्र का प्रबंधन और विकास करेगा।

अयोध्या मामले पर फैसला इसलिए था अनूठा-

  • 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित रखने के बाद सभी जजों ने किया था आपस में विचार साझा और एक ही जज से लिखवाया गया पूरा फैसला।
  • फैसला लिखने वाले जज के नाम का नहीं किया गया पूरे जजमेंट में खुलासा।
  • अयोध्या फैसले के नाम से विशेष तौर पर हुआ सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर पूरा जजमेंट अपलोड।
  • 10:30 पर आना था फैसला लेकर 10:20 पर ही खुला था कोर्ट का गेट।
  • 3 नवंबर को तैयार हो चुका था जजमेंट का ड्राफ्ट, लेकिन 7 नवंबर को दिया गया इसे अंतिम रूप।
  • 8 नवंबर को ही तय हुआ कि 9 नवंबर को सुनाया जाएगा अयोध्या फैसला।
  • फैसले के बाद 5 जजों ने ख़िचवाई थी ग्रुप फोटो, जिसे बाद में मीडिया से भी किया गया साझा।

दरअसल, इसी अधिनियम की धारा 7 के आधार पर ही भूमि के प्रबंध अधिकारों को केंद्र सरकार या किसी अन्य प्राधिकरण ट्रस्ट को सौंपा गया है। जिसमें ये बात साफ है कि किसी संविदा या लिखत अथवा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के आदेश में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी इस अधिनियम के प्रारंभ से ही धारा 3 के अधीन केंद्र सरकार में निहित संपत्ति का प्रबंध, केंद्रीय सरकार द्वारा अथवा उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति या किसी निकाय या किसी न्यास के न्यासियों द्वारा किया जाएगा।

वहीं धारा 7 की उपधारा 2 बताती है कि प्रबंध निकाय यथास्थिति को बनाए रखेगा, जिसे आमतौर पर “राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद” के रूप में जाना जाता है, जो देवता के पक्ष में भूमि के टाइटल की घोषणा के साथ है। अब केंद्र सरकार की योजना के अनुसार, भूमि पर मंदिर बनाने के लिए प्रबंध निकाय को अधिकृत किया जाएगा।

यहाँ बता दें कि इस मामले में अयोध्या अधिनियम की वैधता को ‘डॉक्टर एम इस्माइल फारुकी और अन्य’ बनाम ‘भारत संघ व अन्य’ 1994 SCC (6) 360 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा बरकरार रखा गया था। अगर उस समय ऐसा नहीं होता तो अधिनियम की धारा 4(3) को रद्द कर दिया जाता और जो सुनवाई अयोध्या पर हुई, वो कभी संभव ही नहीं होती। बता दें अधिनियम की ये धारा अधिग्रहित भूमि के अधिकार, उपाधि और हित के संबंध में किसी भी मुकदमे, अपील या अन्य कार्यवाही को रद्द करने की माँग करता था, जो अधिनियम के प्रारंभ के समय किसी भी अदालत या ट्रिब्यूनल प्राधिकरण के समक्ष लंबित था।

लोग कह रहे 14 कोस से बाहर बनाओ मस्जिद, लेकिन हम वहीं बनाएँगे: बाबरी का पक्षकार

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या की विवादित जमीन रामलला को सौंपते हुए सरकार को मुस्लिम पक्ष को मस्जिद बनाने के लिए अलग से 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया था। इसको लेकर कई तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। AIMIM प्रमुख और हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने फैसले पर नाखुशी जाहिर करते हुए इसे खैरात बताया था। वहीं सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कहा है कि मस्जिद के लिए जमीन के बारे में वह 17 नवंबर की बैठक में फैसला करेगा। इस बीच यह भी खबर आई की मस्जिद के लिए जमीन अयोध्या से सटे सहनवा गॉंव में दी जा सकती है। यही बाबरी मस्जिद बनाने वाले बाबर का सेनापति मीर बाकी दफ़न है।

अब अयोध्या मामले के याचिकाकर्ताओं में से एक इकबाल अंसारी इकबाल का बयान सामने आया है। इकबाल अंसारी ने कुछ स्थानीय मुस्लिम नेताओं के साथ मिलकर माँग की है कि सुप्रीम कोर्ट ने जो 5 एकड़ जमीन मस्जिद के लिए देने को कहा है वह अयोध्या में अधिग्रहित 67 एकड़ जमीन में से ही सरकार दे।

अंसारी ने कहा, “अगर सरकार जमीन देना चाहती है तो हमें हमारी सुविधा के हिसाब से मिलनी चाहिए। आवंटित जमीन 67 एकड़ जमीन में से ही होनी चाहिए। तभी हम यह जमीन लेंगे। नहीं तो हम जमीन लेने की पेशकश को ठुकरा देंगे। लोग कह रहे हैं कि 14 कोस से बाहर जाकर मस्जिद बनाओ, यह उचित नहीं है।”

स्थानीय मौलवी मौलाना जलाल अशरफ ने कहा कि मुस्लिम मस्जिद बनाने के लिये खुद जमीन खरीद सकते हैं और उसके लिए सरकार पर निर्भर नहीं हैं। उन्होंने कहा, “अदालत या सरकार हमारी संवेदनाओं को कुछ हद तक शांत करना चाहती है तो 5 एकड़ जमीन अधिग्रहित इलाके में ही मिलनी चाहिए, क्योंकि 18 वीं शताब्दी के सूबे के संत क़ाज़ी कुद्दत सहित कई दरगाह और कब्रिस्तान इसी क्षेत्र में हैं।”

मुस्लिम पक्ष की तरफ से एक अन्य याचिकाकर्ता हाजी महबूब ने कहा, “हम इस झुनझुने को स्वीकार नहीं करेंगे। उन्हें निश्चित रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि वो हमें कहाँ जमीन देना चाहते हैं।” अयोध्या नगर निगम में पार्षद हाजी असद अहमद ने कहा, “अगर अदालत या सरकार मस्जिद के लिए जमीन देना चाहती है तो उन्हें इसे अधिग्रहित 67 एकड़ जमीन में से ही देना चाहिए, अन्यथा हमें दान नहीं चाहिए।”

जमीयत उलेमा हिंद के अयोध्या प्रमुख मौलाना बी. खान ने कहा कि मुस्लिम पक्ष बाबरी मस्जिद के लिए लड़ रहा था न कि किसी दूसरी जमीन के लिए। उन्होंने कहा, “हमें मस्जिद के लिए कहीं और जमीन नहीं चाहिए। इसके बजाए हम यह जमीन भी राम मंदिर के लिए दे दें।”

सामाजिक कार्यकर्ता यूसुफ खान ने कहा कि यह मामला उच्चतम न्यायालय के फैसले के बाद बंद हो गया है और मस्जिद के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता नहीं थी। उन्होंने कहा, “अयोध्या में हमारी धार्मिक जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त मस्जिदें हैं। शीर्ष अदालत ने राम मंदिर के पक्ष में अपना फैसला दिया है। यह मामला अब बंद हो चुका है।”

रामलला के 92 वर्षीय वकील के बेटे ने रामसेतु पर मनमोहन सरकार की पैरवी से कर दिया था इनकार

राम मंदिर मामले में रामलला विराजमान के 92 वर्षीय वकील के. पराशरण काफ़ी चर्चा में हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण होते देखना उनकी अंतिम इच्छा थी, जिसके लिए उन्होंने इस उम्र में भी अदालत में घंटों खड़े होकर बहस की। जजों ने उन्हें बैठ कर जिरह करने की छूट दी, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया था। के. पराशरण की तरह ही उनके बेटे मोहन पराशरण भी एक सिद्धहस्त वकील हैं। वो भी अपने पिता की तरह भारत के सॉलिसिटर जनरल रह चुके हैं। उन्हें भी अपने पिता की ही तरह कई बड़े केस को सफलतापूर्वक हैंडल करने का अनुभव है।

मोहन पराशरण यूपीए काल में भारत के सॉलिसिटर जनरल थे। उन्होंने रामसेतु मामले में सरकार की पैरवी करने से इनकार कर दिया था। डॉक्टर मनमोहन सिंह की सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पर क़दम बढ़ाने का निर्णय लिया था। इससे हिन्दुओं की आस्था पर चोट पहुँची, जो रामसेतु को किसी भी तरह का नुकसान होते नहीं देखना चाहते थे। भारी विरोध-प्रदर्शन हुआ। ‘राम ने कौन सी इंजीनियरिंग कॉलेज से डिग्री ली थी?’ पूछने वाले तमिलनाडु के तत्कालीन मुख्यमंत्री एम करुणानिधि इस प्रोजेक्ट के पक्के समर्थक थे। केंद्र सरकार ने तो अदालत में एफिडेविट तक दे दिया था कि राम का कोई अस्तित्व ही नहीं है।

ऐसे में, मोहन पराशरण को सरकार की तरफ़ से ये केस लड़ना था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया। मोहन ने कहा कि जिस पवित्र रामसेतु पर कभी भगवान के चरण पड़े थे, उसके ख़िलाफ़ मैं कैसे केस लड़ सकता हूँ? सितम्बर 2013 में मोहन पराशरण ने कहा था कि चूँकि वो उसी इलाक़े से आते हैं, वो इस केस से ख़ुद को अलग कर रहे हैं। मोहन ने कहा था कि संविधान उन्हें अलग राय रखने की अनुमति देता है। ये भी जानने लायक बात है कि उस वक़्त उनके पिता के. पराशरण ही सेतुसमुद्रम के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ताओं का केस लड़ रहे थे। मोहन ने कहा था कि उन्होंने जितनी जल्दी हो सके, सरकार को अपने रुख से अवगत कराने की कोशिश की।

मोहन पराशरण की माँग थी कि ऐसे किसी केस में लोगों की राय ज़रूर जाननी चाहिए। उन्होंने सरकार से कहा था कि इस केस में भी अयोध्या मामले की तरह ही स्थानीय लोगों की भावनाओं का ख्याल रखा जाना चाहिए। मोहन पराशरण ने उस दौरान नासा का जिक्र करते हुए सरकार के ख़िलाफ़ स्टैंड लिया था और कहा था कि अमेरिकी स्पेस एजेंसी भी मान चुकी है कि रामसेतु का अस्तित्व है। उन्होंने तत्कालीन यूपीए सरकार को कड़ा सन्देश देते हुए उसे बता दिया था कि रामसेतु पर उसका स्टैंड सही नहीं है। यूपीए सरकार ने पर्यावरण सम्बन्धी चिंताओं को भी ख़ारिज कर दिया था और कहा था कि इस प्रोजेक्ट से आर्थिक विकास में तेज़ी आएगी।

उस समय भी भाजपा इस प्रोजेक्ट के ख़िलाफ़ थी। सरकारी पद पर रहते हुए भी मोहन पराशरण ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट पर यूपीए सरकार की तरफ़ से पैरवी करने से ख़ुद को अलग कर लिया था और करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं का सम्मान किया था। आज उनके पिता ने इस उम्र में भी राम मंदिर के लिए सुप्रीम कोर्ट में केस लड़ा और सफल हुए। दोनों पिता-पुत्र धर्म और लोगों की भावनाओं को लेकर ख़ासे सजग रहते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें कोई नुकसान ही क्यों न उठाना पड़े। तभी तो मोहन ने पूछा था- “मैं श्रीराम में विश्वास रखता हूँ। फिर भला कैसे उनके द्वारा बनाए गए सेतु को तोड़ने के लिए अदालत में सरकार की पैरवी करूँ? नहीं। ये मुझसे नहीं हो सकता।

कश्मीरियों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जा रहा: NDTV की निधि राजदान और Pak चैनलों ने फैलाया झूठ

एनडीटीवी की पत्रकार निधि राजदान ने जम्मू-कश्मीर पर एक बार फिर से पाकिस्तान के एजेंडे को आगे बढ़ाया है। उन्होंने भारत सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए हजरतबल दरगाह को लेकर पाकिस्तानी नैरेटिव को आगे बढ़ाया। उन्होंने ट्विटर पर लिखा कि शायद यह पहली बार है जब श्रीनगर स्थित हजरतबल दरगाह में मुस्लिमों को नमाज पढ़ने के लिए पाबन्दी का सामना करना पड़ रहा है। उन्होंने ईद-ए-मिलाद को लेकर ऐसा कहा। निधि ने लिखा कि अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए 3 महीना हो गया, भयंकर ठंडी भी आ गई है, लेकिन जमीनी स्थिति ऐसी है कि लोगों को नमाज़ पढ़ने से भी रोका जा रहा है।

निधि राजदान ने सरकार पर एसएमएस सर्विस रोकने का भी आरोप लगाया। निधि ने ‘द कश्मीर वाला’ के संपादक फहद शाह के आरोपों को ट्वीट करते हुए ऐसा कहा। शाह ने ‘द ट्रिब्यून’ की एक ख़बर शेयर की थी, जिसमें एक अनाम वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि हजरतबल दरगाह पर केवल आसपास के लोगों को ही नमाज़ पढ़ने की इजाजत दी जाएगी और बड़ी संख्या में लोगों को कहीं भी एकत्रित नहीं होने दिया जाएगा। निधि ने इस ट्वीट पर प्रतिक्रिया देते हुए लिखा कि कश्मीरियों को बाकी भारतीय नागरिकों जैसे अधिकार नहीं मिल रहे।

निधि ने सरकार पर संचार-व्यवस्था ठप्प करने का आरोप लगाया। उन्होंने हिरासत में रखे गए या गिरफ़्तार किए गए कश्मीरी नेताओं को छोड़ने की पैरवी करते हुए लिखा कि इससे घाटी में लोकतंत्र बहाल होगा। इसके बाद कई लोगों ने निधि को आइना दिखाया और सच्चाई से वाकिफ कराया। पत्रकार आरती टीकू सिंह ने लिखा कि मीडिया का एक धड़ा दुष्प्रचार कर रहा है कि हजरतबल दरगाह पर मुस्लिमों को नमाज नहीं पढ़ने दिया जा रहा। उन्होंने एक वीडियो ट्वीट किया, जिसमें सैकड़ों लोग दरगाह के पास नमाज पढ़ते दिख रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि पाकिस्तान द्वारा ऐसा झूठ फैलाया जा रहा है।

श्रीनगर के डीएम शाहिद चौधरी ने ख़ुद कई ऐसे फोटो शेयर किए, जिसमें लोग दरगाह के पास इकट्ठे होकर ईद-उल-मिलाद मनाते दिख रहे हैं। इन लोगों ने वहाँ नमाज पढ़ी और वहाँ के इमाम भी इसमें सम्मिलित हुए। इन फोटोग्राफ्स के साथ ही निधि राजदान के झूठ का पर्दाफाश हो गया। अपना झूठ पकड़े जाने के बाद निधि ने ख़ुद का बचाव करने की असफल कोशिश की। उन्होंने लिखा कि वो बस ख़बरों को ट्वीट कर रही थीं। कुछ ऐसा ही झूठ पाकिस्तान के कई मीडिया चैनलों पर भी चलाया जा रहा है।

इससे पहले निधि राजदान लंदन में एक ऐसे कार्यक्रम में शामिल हुई थीं, जिसमें जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत को भला-बुरा कहा गया। जेकेएलएफ ने इस कार्यक्रम के आयोजन के लिए इसके आयोजकों व अतिथियों की प्रशंसा की थी। इस कार्यक्रम में निधि राजदान ने आरोप लगाया कि भारत ने अनुच्छेद 370 को लेकर कश्मीरी जनता की राय नहीं ली और पूरे राज्य में संचार- व्यवस्था ठप्प कर दी गई है। निधि राजदान ने कहा कि भारत दावा करता है कि यह सब जम्मू-कश्मीर के भले के लिए है। एनडीटीवी इससे पहले भी जम्मू-कश्मीर को लेकर प्रोपगेंडा फैलाता रहा है।