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‘कॉन्ग्रेस महाराष्ट्र की दुश्मन नहीं, हम सरकार बनाने को तैयार’ – संजय राउत के बयान के बाद अब कॉन्ग्रेसी MLA भी…

महाराष्ट्र में सरकार गठन को लेकर चल रही उठा-पटक के बीच शिवसेना के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद संजय राउत ने कहा है कि अगर कोई सरकार बनाने को तैयार नहीं है तो शिवसेना यह जिम्मा ले सकती है। इसके साथ ही उन्होंने कॉन्ग्रेस को लेकर भी बड़ा बयान दिया है। संजय राउत ने कहा है कि कॉन्ग्रेस राज्य की दुश्मन नहीं है। सभी पार्टियों के बीच कुछ मुद्दों को लेकर मतभेद होता है।

बता दें कि महाराष्ट्र के राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को बीजेपी को सरकार बनाने के लिए न्योता दिया था। विधानसभा चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरी बीजेपी को मिले राज्यपाल के न्योते के बाद संजय राउत का यह बयान आया है। वहीं इस बीच कॉन्ग्रेस विधायकों के शिवसेना को समर्थन देने की बात भी सामने आ रही है।

जानकारी के मुताबिक कॉन्ग्रेस विधायकों ने सर्वसम्मति से शिवसेना को सरकार बनाने के लिए समर्थन देने का फैसला किया है। इसको लेकर कॉन्ग्रेस पार्टी राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी (NCP) को एक पत्र प्रस्तुत करने की योजना बना रही है। इसको लेकर राजस्थान के कॉन्ग्रेस में मीटिंग हो रही है। 

बता दें कि कॉन्ग्रेस के 44 विधायकों में से 35 विधायक जयपुर में ही हैं। महाराष्ट्र से भारतीय जनता पार्टी की सरकार को हटाने के लिए कॉन्ग्रेस के अधिकतर विधायकों के शिवसेना के साथ जुड़ने की संभावना जताई जा रही है। इसके साथ ही एनसीपी प्रमुख शरद पवार की भी विधायकों के साथ मीटिंग की बात सामने आ रही है। ऐसा बताया जा रहा है कि शरद पवार भी अपने विधायकों से शिवसेना को समर्थन देने के लिए कहेंगे।

उल्लेखनीय है कि परसों देवेंद्र फड़णवीस को सोमवार (11 नवंबर, 2019) तक विधानसभा के पटल पर फ्लोर टेस्ट पास करने (सदन में बहुमत साबित करने) का मौका होगा। फडणवीस ने शुक्रवार (8 नवंबर, 2019 को) राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया है।

राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का JNU में विरोध, ‘रामलला हम आएँगे, मंदिर…’ के नारे से मिला करारा जवाब

जेएनयू के कुछ छात्रों काे सुप्रीम कोर्ट का शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अयोध्या पर आया फैसला रास नहीं आया। सुप्रीम कोर्ट ने रामलला विराजमान के पक्ष में फैसला सुनाया, जिससे अयोध्या में भगवान राम के पैदा होने के स्थान पर राम मंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है। इसके विरोध में जेएनयू के छात्रों ने शनिवार शाम को विरोध प्रदर्शन किया।

नवभारत टाइम्स द्वारा शेयर किए गए एक वीडियो में जेएनयू के छात्रों को यह कहते हुए देखा जा सकता है कि अयोध्या भूमि टाइटल मामले पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला ’अनुचित’ था। विरोध करने वाले छात्र कहते हैं, “जय श्री राम लीगल हो गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे लीगल कर दिया है। ये पब्लिक नारा बन गया है। इसे याद रखना। इससे निराश नहीं होना है।” हास्यास्पद यह है कि जितनी भीड़ वामपंथियों ने विरोध के लिए जुटाई थी और जितनी ऊँची आवाज में वो विरोध कर रहे थे, उससे कहीं अधिक जय श्री राम के नारे की गूँज सुनाई दे रही थी। नीचे के वीडियो में वामपंथी विरोध की दम तोड़ती आवाज को सुनिए और मजे लीजिए।

लेकिन बेचारे वामपंथी! विरोध के नाम पर विरोध करना था, सो किया। वीडियो में राम मंदिर पर विरोध कर रही भीड़ को संबोधित करता एक छात्र नेता कहता है कि दूसरे पक्ष को 5 एकड़ जमीन मिली है, जो उस भूमि का दोगुना है, जो कभी विवादित थी। उसने कहा, “इस तरह से तो मुस्लिम पक्ष जीत गया है। लेकिन यह जमीन का सवाल नहीं था। यह गरिमा का सवाल था। यह अधिकार और न्याय का प्रश्न है। यह कभी जमीन के बारे में था ही नहीं। 1992 के विध्वंस के बाद जो भी दंगे हुए, उसमें केवल मुस्लिमों ने ही अपनी जान गँवाई। यूपी में, मुंबई में और फिर गुजरात में दंगे हुए। तुम्हारा नरेंद्र मोदी भी उसी का प्रोडक्ट है। वह बाबरी मस्जिद विध्वंस का प्रोडक्ट है। भारतीय राजनीति का मौजूदा स्थिति भी उसी बाबरी मस्जिद विध्वंस की उपज है। ये तुम्हें नहीं भूलना है और वही मोदी जी आज आपको अयोध्या के फैसले पर देश को संबोधित करते हैं। ये चीजें नहीं भूलनी है। हमें निराश नहीं होना है।”

मतलब इन्हें राम मंदिर पर विरोध करना हो या सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर… घूम-फिर कर इनका सारा तर्क एक ही नाम पर आकर अटकता है, वो है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। वामपंथी छात्रों ने जेएनयू के साबरमती ढाबा के पास भी विरोध रैली की योजना बनाई थी। उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया भी। हालाँकि उनकी ये योजना असफल हो गई, क्योंकि वहाँ पर एक और ग्रुप भी मौजूद था, जिसने “रामलला हम आएँगे, मंदिर वहीं बनाएँगे” के नारे लगाए। और इस नारे की गूँज इतनी थी कि वामपंथियों की योजना धरी की धरी रह गई।

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने दशकों से चले आ रहे विवाद को खत्म करते हुए सर्वसम्मति से रामलला विराजमान के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार से तीन महीने के अंदर एक ट्रस्ट स्थापित करने के लिए कहा है, जो राम मंदिर निर्माण का प्रभारी होगा। वहीं, मस्जिद बनाने के लिए अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन दिया जाएगा।

राम मंदिर के बाद अब सबरीमाला का इंतजार… रिटायरमेंट से पहले CJI गोगोई सुनाएँगे फैसला

राम मंदिर मामले पर ऐतिहासिक फ़ैसले के बाद, अब चीफ़ जस्टिस ऑफ़ इंडिया (CJI) को चार अन्य प्रमुख मामलों में फ़ैसला सुनाना है। वैसे अब तक अयोध्या भूमि विवाद मामले को ही सबसे बड़ा माना जा रहा था, लेकिन इस पर फ़ैसला सुना दिए जाने के बाद अब बाक़ी चार मामलों में फ़ैसले का इंतज़ार किया जा रहा है। दरअसल, इनकी सुनवाई CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने की थी और फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। अगले सप्ताह इन मामलों में फ़ैसला आना है।

बता दें कि अयोध्या विवाद की सुनवाई करने वाली सुप्रीम कोर्ट की स्पेशल बेंच की अगुवाई चीफ जस्टिस रंजन गोगई ने की थी। CJI के अलावा इस बेंच में जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एस अब्दुल नज़ीर शामिल थे।

ये मामले कौन से हैं, इन्हें विस्तार से समझते हैं…

1. सबरीमाला में महिलाओं का प्रवेश-

कोर्ट ने पिछले साल 28 सितंबर को केरल के सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी पाबंदी को लिंग आधारित भेदभाव ठहराते हुए रद्द किया था। हालाँकि, ये फैसला 4-1 के बहुमत से था। जिसमें जस्टिस इंदू मल्होत्रा ने बहुमत से असहमति जताई थी। लेकिन फैसला आने के बाद अयप्पा अनुयायी इस फैसले का भारी विरोध करने लगे। नतीजतन इसके ख़िलाफ़ 55 पुनर्विचार याचिकाओं सहित कुल 65 याचिकाएँ कोर्ट में दर्ज हुईं। जिस पर सुनवाई करते हुए बीती 6 फरवरी को CJI गोगोई, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस एएम खानविल्कर, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस इंदु मल्होत्रा ​​ने 45 से अधिक समीक्षा याचिकाओं पर फैसला सुरक्षित रख लिया था। 

2. राहुल गाँधी द्वारा अवमानना किए जाने पर माफी माँगने का मामला

कॉन्ग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी के ‘चौकीदार चोर है’ बयान पर उनके खिलाफ लंबित अवमानना मामले में उन्हें माफी दिए जाने पर भी फैसला आना बाकी है। जिसमें भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने उन्हें माफी न देने की अपील कोर्ट से की है और कहा है कि इसके लिए केवल माफी काफी नहीं है बल्कि उन्हें सजा दी जानी चाहिए।

3. राफेल सौदे पर पुनर्विचार

दिसंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने राफेल फाइटर जेट सौदे में आपराधिक जाँच से इनकार कर दिया था। इसके खिलाफ याचिकाएँ दायर हुई थीं। CJI गोगोई की अगुवाई वाली पीठ ने इस साल मई में इन पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। अब सीजेआई को रिटायरमेंट से पहले इस पर फैसला सुनाना है।

4. आरटीआई के दायरे में सुप्रीम कोर्ट और सीजेआई का ऑफिस ‘लोक प्राधिकार’ है या नहीं

एक दशक से सुप्रीम कोर्ट के समक्ष लंबित पड़े इस मामले पर भी फैसला आने की पूरी संभावना है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 2010 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील की थी और CJI गोगोई की अध्यक्षता वाली पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने अप्रैल 2019 के मामले में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। बता दें इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति रवींद्र भट ने फैसला सुनाया था कि CJI का कार्यालय RTI जाँच के लिए खुला है।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

राम मंदिर पर फैसले के बाद मेरठ के मुस्लिम बहुल इलाकों में माहौल खराब करने की कोशिश, 10 गिरफ्तार

सालों से चले आ रहे अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने 9 नवंबर को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के बाद प्राय: हर जगह शांति व्यवस्था कायम रही, लेकिन कुछ जगहों पर पुलिस को सख्ती भी दिखानी पड़ी। उत्तर प्रदेश के मेरठ जोन में मुस्ल‍िम बहुल इलाकों में शांत‍ि भंग करने की कोश‍िश की गई। जिसे पुल‍िस ने नाकाम कर द‍िया।

मामले में पुलिस ने कुल 10 लोगों को गिरफ्तार कर लिया है। इन सभी को शांति भंग करने की कोशिश के आरोप में आईपीसी की धारा 151 के तहत गिरफ्तार किया गया। फैसला आने के तकरीबन एक महीने पहले से ही पुलिस पूरी तरह से मुस्तैद है और सुरक्षा-व्यवस्था को भी चाक-चौबंद रखा गया है। तमाम राजनेताओं और धर्मगुरूओं ने फैसला आने से पहले और फैसला आने के बाद भी शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील की। 

अपील के बावजूद मेरठ के मुस्लिम बहुल इलाके में अराजतक तत्वों की शरारतें देखने को मिली। हालाँकि सुरक्षाा-व्यवस्था पर नजर रख रही पुलिस ने उन्हें पकड़ लिया है। बता दें कि मेरठ जोन में कई ऐसे इलाके हैं, जो मुस्लिम बाहुल्य हैं। नोएडा से भी पुलिस ने 2 लोगों को गिरफ्तार किया है।

एडीजी प्रशांत कुमार ने इस संबंध में कहा, “उत्तर प्रदेश पुलिस सुरक्षा के ल‍िए सदैव तत्पर है। हमने सोशल मीडिया की भी पूरे दिन मॉनिटरिंग की और अभी भी कर रहे हैं। किसी को भी कानून तोड़ने और शांति भंग करने पर बख्शा नहीं जाएगा।”

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने के पहले ऐहतियात के तौर पर कई शहरों में इंटरनेट सेवाएँ बंद कर दी गई हैं। फैसले को देखते हुए न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि देश के कई हिस्सों में सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए हैं। अलीगढ़ जिला प्रशासन ने जिले भर में 8 नवंबर की रात 12 से 9 नवंबर की रात 12 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद रखने का आदेश दिया था। इसके अलावा अलीगढ़ स्थित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी सभी कक्षाएँ रद्द कर दी गई हैं। यूनिवर्सिटी से जुड़े स्कूल 11 नवंबर तक बंद कर दिए गए हैं।

राम मंदिर पर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) रात से ही यूपी प्रशासन हाई अलर्ट मोड पर आ गया था। सुरक्षा के मद्देनजर पूरी अयोध्या नगरी को छावनी में तब्दील कर दिया गया। साथ ही अयोध्या में अर्धसैनिक बलों के 4000 जवानों को तैनात किया गया।

अपनी सगाई तक कैंसल कर दी मुस्लिम पक्ष की एक महिला वकील ने, 9 साल तक सिर्फ राम मंदिर मामले में…

अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने शनिवार (नवंबर 9, 2019) को अपना फैसला सुना दिया है। कोर्ट ने इस फैसले में विवादित जमीन रामलला को देने का फैसला किया है, जबकि मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही दूसरी जगह 5 एकड़ जमीन देने का आदेश दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने मामले पर लगातार 40 दिन तक रोजाना सुनवाई करने के बाद 9 नवंबर को फैसला सुनाया। 40 दिनों की मैराथन सुनवाई के दौरान हिन्दू और मुस्लिम पक्ष के वरिष्ठ वकीलों ने बेहतरीन तरीके से अपनी दलीलें पेश कीं। इन वरिष्ठ वकीलों में के परासरण, राजीव धवन, सीएस वैद्यनाथन, रंजीत कुमार, जफरयाब जिलानी, पीएस नरसिम्हा, पीएन मिश्रा और एजाज मकबूल का नाम शामिल है।

रामलला के तुलसी: 92 की उम्र में लड़ा अयोध्या का धर्मयुद्ध, दलीलों से मुस्लिम पक्ष को किया चित

बता दें कि इन वकीलों के बहतरीन परफॉर्मेंस के पीछे इनके कुछ जूनियर वकीलों का भी हाथ है। इस केस में उनका साथ देने के लिए किसी जूनियर वकील ने अपनी सारी कानूनी व्यस्तताओं को दरकिनार कर दिया तो किसी ने अपनी सगाई तक को रद कर दिया। उन्होंने अपने प्रोफेशनल माँग को निजी माँग से ज्यादा तरजीह दी।

इनमें से एक हैं 50 वर्षीय वकील पी वी योगेश्वरन। जिन्होंने इस मामले पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अन्य अदालती व्यस्तता से किनारा कर लिया। किथेई जिले में एक छोटे से गाँव उप्पुकोट्टई से आने वाले पी वी योगेश्वरन ने हिन्दू पक्ष के लिए काम किया। उन्होंने 1994 में कानून की पढ़ाई पूरी की थी और वरिष्ठ वकील एस बालकृष्णन और फिर लाला राम गुप्ता के जूनियर के रूप में सुप्रीम कोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की।

योगेश्वरन पिछले नौ साल से अयोध्या मामले पर काम कर रहे थे। जब इलाहाबाद उच्च न्यायालय के 30 सितंबर, 2010 के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी, वो तभी से इस केस से जुड़े रहे। योगेश्वरन रोजाना स्वेच्छा से पाँच घंटे वकील भक्ति वर्धन सिंह के साथ मामले पर अध्ययन करने के लिए समर्पित थे। इसके बाद वे वरिष्ठ अधिवक्ता परासरन, वैद्यनाथन और रंजीत कुमार के साथ एक से दो घंटे तक चलने वाले ब्रीफिंग सत्र में भी शामिल होते थे।

उनके प्रपंच का गुंबद था अयोध्या, आज ढह गया, पर राम मंदिर के उत्साह में मथुरा-काशी का दर्द न दबे

योगेश्वरन ने इस बारे में बात करते हुए टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि उन्हें इस मामले पर ध्यान केंद्रित करने के लिए अदालत के सभी अन्य कामों को छोड़ना पड़ा। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले से जुड़ने के बाद उन्हें पता चला कि कैसे उनके जैसे एक साधारण वकील को सीखने के लिए पूरी ज़िंदगी लगानी होती है।

मुस्लिम पक्ष के वकील एजाज मकबूल की जूनियर वकील आकृति चौबे ने इस मामले को गहराई से जानने के लिए अपने निजी जीवन में बहुत बड़ा त्याग किया। चौबे को अपने ब्वॉयफ्रेंड के साथ सगाई करनी थी, लेकिन कोर्ट की सुनवाई 6 अगस्त से 16 अक्टूबर तक चलनी थी। और इस बीच उनके सगाई करने का मतलब था कि वो कोर्ट की सुनवाई में उपस्थित नहीं हो पातीं। फिर उन्होंने सोचा कि सगाई तो इंतजार कर सकती है, लेकिन कोर्ट नहीं।

बाद में उन्होंने अपने सगाई के कार्यक्रम को रद कर दिया। अब वो अपना ‘रोका’ समारोह न करके अगले साल फरवरी में सीधा शादी ही करने वाली हैं। आकृति का ब्वॉयफ्रेंड इंडियन एयरलाइंस में वकील हैं। आकृति का फैमिली बैकग्राउंड भी योगेश्वरन की तरह ही है। आकृति चौबे ने तभी अपने पिता को खो दिया था, जब वो पाँचवीं कक्षा में थीं।

दूसरे मजहब वालों ने भी दिए मंदिर होने के सबूत, ASI की रिपोर्ट भी बनी रामलला के पक्ष में फैसले का आधार

आकृति ने बताया कि उनकी माँ दिल्ली सरकार के साथ काम करती है और वो उनका काफी सपोर्ट करती हैं। चौबे ने कहा कि वो पिछले दो वर्षों से इस पर बिना किसी ब्रेक काम कर रहीं थी। आकृति ने बताया कि वो दलीलें शुरू होने के बाद रोजाना वकील राजीव धवन को ब्रीफ करती थीं।

मुस्लिम पक्ष की वकालत कर रहे धवन और जिलानी कई तथ्यों और रिकॉर्डों के लिए आकृति की मदद लिया करते थे। इसके साथ ही अन्य महिला वकील कुर्रातुलेन का भी सीनियर वकीलों का साथ देने में अहम योगदान रहा। योगेश्वर और आकृति जैसे और भी कई ऐसे जूनियर वकील हैं, जिन्होंने इस केस में काफी मेहनत की है।

अयोध्या पर SC के फ़ैसले को चुनौती नहीं दी जानी चाहिए: शाही इमाम अहमद बुखारी

दशकों पुराने अयोध्या मामले में शनिवार को सुप्रीम कोर्ट की पॉंच जजों की पीठ ने अपना फैसला सुनाया। इसके साथ ही इस बेहद संवेदनशील मामले की कानूनी लड़ाई का अंत हो गया है। फ़ैसले के बाद तमाम तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आई है। इसी कड़ी में दिल्ली के जामा मस्जिद के शाही इमाम सैयद अहमद बुखारी ने कहा है कि अयोध्या मामले को अब आगे नहीं बढ़ाना चाहिए। उनके मुताबिक सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले के ख़िलाफ़ पुनर्विचार याचिका दायर करने की ज़रूरत नहीं है। उन्होंने उम्मीद जताई कि अब देश में साम्प्रदायिक तनाव के लिए जगह नहीं होगी और आगे ऐसे मुद्दों को हवा नहीं दी जाएगी।

शाही इमाम ने एक प्रेस कॉन्फ्रेन्स में कहा, “मैंने पहले भी कहा था कि देश क़ानून और संविधान के अमल पर चलता है। 134 साल से चल रहे विवाद का अंत हुआ। पाँच सदस्यीय पीठ ने निर्णय लिया। गंगा-जमुनी संस्कृति और सद्भाव को देखते हुए कि यह प्रयास करना होगा कि आगे देश को इस तरह के विवाद से फिर नहीं गुज़रना पड़े।”

उन्होंने कहा, “देश संविधान के तहत चले, कानून का अमल होता रहे, सांप्रदायिक तनाव नहीं हो और समाज नहीं बाँटे, इसके लिए सभी को अपनी भूमिका अदा करनी होगी। हिंदू-मुस्लिम की बात बंद होनी चाहिए और देश को आगे बढ़ाने के लिए सब मिलकर चलें।” शाही इमाम ने कहा कि प्रधानमंत्री के बयान से यह उम्मीद की जानी चाहिए कि देश सद्भाव की तरफ आगे बढ़ेगा।

फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील से जुड़े ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के बयान के बारे में पूछे जाने पर बुखारी ने कहा, “मेरी अपनी राय है कि मामले को ज्यादा बढ़ाना उचित नहीं है। पुनर्विचार के लिए उच्चतम न्यायालय में जाना बेहतर नहीं है।” उन्होंने कहा कि मुस्लिम समुदाय पहले से कहता रहा है कि वह फ़ैसले का सम्मान करेगा और अब फ़ैसला आने के बाद लोग इससे सहमत हैं।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।

मेरे दोस्त इमरान ने करतारपुर कॉरिडोर में ‘अल्लाह का काम’ किया है: सिद्धू

कॉन्ग्रेस नेता, पूर्व सांसद व पंजाब सरकार में भूतपूर्व मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ने आज करतारपुर साहिब के उद्घाटन समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की शान में जम कर कसीदे पढ़े। उन्होंने करतारपुर कॉरिडोर के निर्माण के लिए इमरान खान का शुक्रिया किया और कहा कि इमरान ने ‘अल्लाह का काम’ किया है।

पूर्व क्रिकेटर और क्रिकेट कमेंटेटर सिद्धू ने अपने भाषण में यह दावा किया कि ‘उनके दोस्त’ इमरान ने यह काम (करतारपुर कॉरिडोर का निर्माण) बिना कोई नफा नुकसान देखे किया है। यहाँ यह जान लेना ज़रूरी है कि पाकिस्तान के पीएम इमराना भी पूर्व क्रिकेटर हैं, और सिद्धू के समकालीन खेल चुके हैं। दोनों क्रिकेट के दिनों से ही काफी करीबी दोस्त माने जाते हैं। सिद्धू इमरान खान के न्यौते पर उनके शपथ ग्रहण में भी गए थे जहाँ उनकी पाकिस्तानी सेना के अफसरों और खालिस्तानी आतंकियों से नज़दीकी का प्रदर्शन कॉन्ग्रेस पार्टी के लिए शर्म का कारण बन गया था।

करतारपुर कॉरिडोर के समरोह में भी सिद्धू भारतीय विधायक, पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री होने के बावजूद भारत नहीं बल्कि पाकिस्तान के कोटे से मौजूद थे। उन्हें न ही भारत सरकार और न ही उनके राज्य की सरकार ने अपने प्रतिनिधिमंडल में रखा। यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के प्रतिनिधिमंडल और पाकिस्तान की सरकार और विदेश मंत्रालय के कोटे से भी न्यौता नहीं आया था। वे, मीडिया खबरों के अनुसार, इमरान खान की पार्टी के न्यौते पर समारोह में उपस्थित थे। 

फडणवीस को सरकार बनाने का मिला मौका, 11 तक साबित करना होगा बहुमत

महाराष्ट्र की राजनीति ने एक बार फिर से करवट ली है। शिव सेना और भारतीय जनता पार्टी का गठबंधन लगभग टूट जाने के और देवेंद्र फडणवीस व  शिव सेना  के एक दूसरे के खिलाफ बयानबाजी के बाद भाजपा को सरकार बनाने का निमंत्रण मिला है।

आ रही मीडिया खबरों के मुताबिक राज्य के गवर्नर भगत सिंह कोश्यारी ने फडणवीस को सबसे बड़ी पार्टी का नेता होने के चलते सरकार बनाने के लिए निमंत्रण भेजा है। उनके पास परसों ( सोमवार, 11 नवंबर, 2019 को) तक विधानसभा के पटल पर फ्लोर टेस्ट पास करने (सदन में बहुमत साबित करने) का मौका होगा। फडणवीस कल ही (शुक्रवार, 8 नवंबर, 2019 को) राज्य के कार्यवाहक मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे कर हटे हैं।

हाल ही में (21 अक्टूबर, 2019 को) हुए विधानसभा चुनावों में भाजपा और शिव सेना को क्रमशः 105 और 56 सीटें मिलीं थीं। 288 सदस्यों की विधानसभा में उनके पास बहुमत से काफी ज़्यादा का आँकड़ा था, लेकिन शिव सेना ने नतीजों की घोषणा वाले दिन (24 अक्टूबर, 2019) से ही घोषणा कर दी कि वह भाजपा के साथ सरकार तभी बनाएगी अगर उसे आधे मंत्रालय और ढाई साल के लिए सीएम के पद की लिखित गारंटी मिलेगी। उसने इसे चुनाव के ठीक पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का शिव सेना सुप्रीमो उद्धव ठाकरे से वादा बताया।

साथ ही, शिव सेना के मुखपत्र सामना में जनादेश को भाजपा के अहंकार और दूसरी पार्टियों में तोड़फोड़ और भितरघात की कथित तौर पर अनैतिक राजनीति की हार बताया, बावजूद इसके कि सबसे ज़्यादा सीटें भाजपा को ही मिलीं थीं। दूसरी और भाजपा ने शिव सेना के लिए बातचीत के दरवाज़े खुले रखने की बात की लेकिन साफ कर दिया कि सीएम भाजपा का ही होगा क्योंकि उसकी सीटें अधिक हैं। इसके बाद केंद्रीय मंत्री और हालिया दौर में महाराष्ट्र में शरद पवार के बाद सबसे अनुभवी और शक्तिशाली क्षत्रप माने जाने वाले पूर्व भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी ने कल दावा किया कि ऐसी कोई डील कभी हुई ही नहीं थी।

इसके बाद फडणवीस ने कार्यवाहक सीएम पद से इस्तीफ़ा सौंपा और प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर कहा कि यह दुःखद बात है कि उद्धव के पास एनसीपी और कॉन्ग्रेस से सौदेबाजी करने का समय है, लेकिन शिव सेना सुप्रीमो उनका फोन तक नहीं उठाते। इसके जवाब में उद्धव ने भी प्रेस से बात करते हुए भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व पर हमला बोला और कहा कि भरोसा दोनों ओर से ही खत्म हो चुका है- और वे ‘अमित शाह एन्ड कम्पनी’ पर कोई विश्वास नहीं कर सकते।

मैं सही साबित हुआ, मेरी मेहनत लाई रंग: राम रथी आडवाणी का अयोध्या फैसले पर कथन

आज अयोध्या का फैसला आने के बाद सबसे ज़्यादा जिन दो लोगों के बारे में बात हुई, वे हैं विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्गीय मुखिया अशोक सिंघल, और उनके साथ राम रथ यात्रा निकालने वाले भाजपा के पितृ पुरुष लाल कृष्ण आडवाणी। इस ऐतिहासिक क्षण के एक दिन पहले कल ही अपना 93वाँ जन्मदिन मनाने वाले आडवाणी, जिन्होंने अपना कैरियर फिल्म समीक्षा पत्रकार के रूप में शुरू किया था, ने अंग्रेजी में एक बयान जारी कर फैसले से संतोष जाहिर किया है। साथ ही कहा है कि अंततः उनका स्टैंड सही साबित हुआ है।

 
पेश है उनके कथन का हिंदी रूपांतरण: 

आज मैं अपने देशवासियों के साथ खुले दिल से अयोध्या मामले में 5 सदस्यों वाली सुप्रीम कोर्ट की संविधानिक पीठ द्वारा दिए गए इस ऐतिहासिक निर्णय का स्वागत करता हूँ।

मेरा स्टैंड सही साबित हुआ है और मुझे बेहद ख़ुशी है कि सुप्रीम कोर्ट ने एकमत से निर्णय देकर अयोध्या में राम जन्मभूमि पर श्री राम का भव्य मंदिर बनाने की राह प्रशस्त की है।

मेरे लिए यह बेहद संतुष्टि का क्षण है क्योंकि ईश्वर ने मुझे एक मौका दिया था इस जनांदोलन का छोटा सा हिस्सा बनने का। यह आंदोलन भारत की आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन था, जिसका लक्ष्य वही था जो आज सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद से पूरा होने जा रहा है।

मैंने हमेशा इस पर ज़ोर दिया था कि राम और रामायण भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतात्मक विरासत में एक सम्मानित स्थान रखते हैं, और रामजन्मभूमि की देश और विदेश में हमारे करोड़ों देशवासियों के दिल में विशेष और पवित्र जगह है। अतः यह अभिभूत कर देने वाली बात है कि उनके विश्वास और भावनाओं को सम्मान मिला है।

मैं सर्वोच्च न्यायालय के अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए पाँच एकड़ ज़मीन दिए जाने का भी स्वागत करता हूँ। आज का निर्णय एक ऐसी लम्बी और दुरूह प्रक्रिया का पटाक्षेप है जो पिछले कई दशकों से कई मंचों पर चल रही थी- न्यायिक भी, और गैर-न्यायिक भी। अब जबकि इतना लम्बा चला अयोध्या का मंदिर-मस्जिद विवाद अपने अंत पर पहुँच गया है, तो समय आ गया है कि सभी विरोध और वैमनस्यता पीछे छोड़ें और साम्प्रदायिक सौहार्द और शांति को गले लगाएँ। इस हेतु के लिए , मैं हमारे विभिन्नताओं वाले समाज से एक साथ काम कर भारत की राष्ट्रीय एकता और अखंडता को मज़बूत करने की  करता हूँ।

रामजन्भूमि आंदोलन के दौरान मैंने कई बार कहा है कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने जा सच्चा मकसद एक भव्य राष्ट मंदिर बनाने का है- भारत को एक सशक्त, वैभवपूर्ण, शांतिप्रिय और सौहार्दपूर्ण राष्ट्र बनाने का जिसमें सभी के साथ न्याय को और कोई जिससे बाहर न हो। हम सभी को उस आर्य लक्ष्य के लिए आज से समर्पित हो जाना चाहिए। 

अब आंदोलन नहीं करेगा RSS, चरित्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगा: अयोध्या फैसले पर मोहन भागवत

अयोध्या मामले में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए, RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि इस फ़ैसले को जीत या हार के दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए, और सभी को मंदिर निर्माण के लिए एक साथ आगे आना चाहिए। प्रेस कॉन्फेन्स को संबोधित करते हुए उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का स्वागत किया। साथ ही लोगों से भाईचारा बनाए रखने की अपील भी की।

उन्होंने कहा कि मामला दशकों से चल रहा था और यह सही निष्कर्ष पर पहुँच गया है। RSS प्रमुख ने कहा कि इस फ़ैसले को जय-पराजय की दृष्टि से बिलकुल नहीं देखा जाना चाहिए। सत्य व न्याय के मंथन से प्राप्त निष्कर्ष को भारतवर्ष के सम्पूर्ण समाज की एकात्मकता व बंधुता के परिपोषण करने वाले निर्णय के रूप में देखना और उपयोग में लाना चाहिए। सम्पूर्ण देशवासियों से अनुरोध है कि विधि और संविधान की मर्यादा में रहकर संयमित व सात्विक रीति से अपने आनंद को व्यक्त करें।

भागवत ने कहा कि RSS को उम्मीद है कि सरकार जल्द ही सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार दोनों पक्षों के बीच विवाद को समाप्त करने के लिए क़दम उठाएगी। अतीत से सब कुछ भूलकर, हम सभी को एक साथ मिलकर राम जन्मभूमि स्थल पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

मुस्लिम पक्षों को दी गई 5 एकड़ भूमि के बारे में पूछे जाने पर, RSS प्रमुख ने कहा कि वे सर्वोच्च न्यायालय के फ़ैसले का सम्मान करते हैं और हम सभी को झगड़े और विवादों को समाप्त कर देना चाहिए। बोर्ड को जमीन कहॉं दी जानी चाहिए यह पूछे जाने पर RSS प्रमुख ने कहा कि उन्हें इस मसले पर कुछ नहीं कहना है। सुप्रीम कोर्ट ने जो फ़ैसला दिया है, उसके अनुसार पालन किया जाएगा। ज़मीन हमें नहीं बल्कि सरकार को देनी है, इसलिए जो करना है वो सरकार ही तय करेगी।

यह पूछे जाने पर कि क्या RSS इसके बाद मथुरा और काशी के मुद्दों को उठाएगा, भागवत ने कहा कि RSS कोई आंदोलन नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि अब RSS केवल चरित्र निर्माण पर ध्यान केंद्रित करेगा और भविष्य के किसी आंदोलन में शामिल नहीं होगा।

ग़ौरतलब है कि CJI रंजन गोगोई की अगुवाई वाली सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने अयोध्या की जिस जमीन को लेकर विवाद था वहॉं मंदिर निर्माण का आदेश दिया है। साथ ही मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को सुन्नी वक्फ बोर्ड को 5 एकड़ ज़मीन देने के निर्देश दिए हैं। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से 3 महीने के भीतर इसके लिए एक योजना तैयार करने को कहा है।