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बाराबंकी में वकीलों ने जज के साथ की बदसलूकी, कहा- हड़ताल है तो क्यों कर रहे हो काम?

दिल्ली में पुलिस और वकीलों के बीच विवाद का असर देश के कई जगहों पर देखने को मिला। लेकिन, यूपी के बाराबंकी में वकीलों द्वारा जज के साथ मारपीट और अभद्रता करने की घटना सामने आई है। वकीलों ने जज के चेंबर में घुसकर उनके साथ अभद्रता की। आरोप है कि वकीलों ने जज का कॉलर पकड़ लिया उनके साथ गाली-गलौज की।

दरअसल, तीस हजारी कोर्ट में हुए विवाद के कारण जिले के अधिवक्ताओं की शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) को हड़ताल चल रही थी। इसी दौरान तहसील के सामने स्थित मोटर दुर्घटना कार्यालय में वकीलों के समूह ने जज संदीप जैन के कार्यालय में घुस कर उनके और उनके कर्मचारियों के साथ बदसलूकी की। 

बता दें कि संदीप जैन मोटर दुर्घटना दावा अभिकरण के पीठासीन अधिकारी (जज) हैं। उन्होंने बताया कि वो अपने कार्यालय में बैठ कर कुछ जरूरी आदेश आशुलिपिक से लिखवा रहे थे। तभी 40- 50 वकील उनके कार्यालय में घुस आए और उनके साथ अभद्रता करते हुए मारपीट पर उतारू हो गए। 

विरोध कर रहे वकील जज के कार्यालय में घुस आए और उनका कॉलर पकड़ कर अभद्रता कर कहने लगे कि हड़ताल के दिन काम क्यों करवा रहे हो। उनके अलावा वकीलों ने उनके आशुलिपिक, गनर और स्टाफ के लोगों के साथ भी गाली गलौज और अभद्रता की। मोबाइल से फोटो खींचने पर वकीलों ने मोबाइल फोन छीन लिया और जम कर उत्पात मचाया।

इस घटना का विवरण देते हुए संदीप जैन ने पुलिस अधीक्षक को पत्र लिखकर दोषी वकीलों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने की माँग की है। इस मामले में बाराबंकी के अपर पुलिस अधीक्षक अशोक कुमार शर्मा ने बताया कि इस संबंध में संदीप जैन की तहरीर पर अज्ञात वकीलों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर लिया गया है। आगे जाँच में जो तथ्य सामने आएँगे उसके अनुसार कार्यवाई की जाएगी। उन्होंने बताया कि अभी अभद्रता की बात सामने आई है और सरकारी कार्य में बाधा डालने का अभियोग पंजीकृत किया गया है। सीसीटीवी कैमरे की भी जाँच में यदि कोई फुटेज मिलता है तो उसे भी संज्ञान में लिया जाएगा।

अयोध्या: सुप्रीम कोर्ट के आज के फ़ैसले के बाद भी बचे रहेंगे 2 कानूनी विकल्प

अयोध्या विवाद में सुप्रीम कोर्ट 40 दिनों की नियमित सुनवाई के बाद शनिवार (नवम्बर 9, 2019) को सुबह 10.30 बजे फ़ैसला सुनाएगी। इस मामले में सीजेआई रंजन गोगोई, भावी मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बोड़बे, जस्टिस अब्दुल नज़ीर जस्टिस वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण ने सुनवाई की। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने 16 अक्टूबर को फ़ैसला सुरक्षित रख लिया था। पूरे देश में कई हिस्सों में स्कूल-कॉलेजों को बंद कर दिया गया है। सुरक्षा की दृष्टि से अतिरिक्त पुलिस बल तैनात किए गए हैं और सोशल मीडिया पर नज़र रखी जा रही है। ऐसे में सवाल का उठना लाजिमी है कि फ़ैसला आने के बाद दोनों पक्षों के पास क्या क़ानूनी विकल्प रहेगा?

न्यायिक व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला अंतिम होता है। उसे किसी और अदालत में चुनौती नहीं दी जा सकती।लेकिन, अंतिम फ़ैसले के बाद भी पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। फैसला आने के 30 दिन के भीतर पुनर्विचार याचिका दाखिल की जा सकती है। पुनर्विचार याचिका में असंतुष्ट पक्ष यह साबित करने की कोशिश करता है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले में त्रुटि है।

अमूमन इस तरह की याचिका पर खुली अदालत में सुनवाई नहीं होती। मुक़दमे और फाइलों के रिकॉर्ड के आधार पर सुनवाई की जाती है। आपको याद होगा कि सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद भी कई पुनर्विचार याचिकाएँ दाखिल की गई थीं। पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के दौरान सामान्यतः वकीलों की दलीलें नहीं होतीं। जज चैंबर में सर्कुलेशन के जरिए सुनवाई कर सकते हैं।

दैनिक जागरण की रिपोर्ट: असंतुष्ट पक्ष के पास होंगे 2 अंतिम विकल्प

असंतुष्ट पक्ष के पास दूसरा विकल्प क्यूरेटिव याचिका दाखिल करने का होगा। इसे उपचार याचिका भी कहा जाता है। पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई के बाद भी असंतुष्ट पक्ष के पास क्यूरेटिव याचिका दायर करने का विकल्प खुला रहता है। इसमें फ़ैसले में उन मुद्दों पर चर्चा करने को कहा जाता है, जहाँ ऐसा लगता है कि ध्यान दिए जाने की जरूरत है। इसके लिए भी 30 दिनों की समयसीमा तय की गई है। पुनर्विचार याचिका ख़ारिज होने के 30 दिनों के भीतर क्यूरेटिव याचिका दायर की जा सकती है। इसके बाद जो भी फ़ैसला आता है, वह सर्वमान्य हो जाता है।

अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के बाद असंतुष्ट पक्ष इन दोनों विकल्पों का इस्तेमाल करता है या नहीं। फ़िलहाल फ़ैसले को लेकर सभी की नज़रें सुप्रीम कोर्ट की 5 सदस्यीय बेंच पर टिकी है। ख़ुद सीजेआई ने यूपी के उच्चाधिकारियों को तलब कर सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया है।

AMU में कक्षाएँ बंद, उपद्रव की आशंका से इंटरनेट बंद: देश के कई शहरों में हाई अलर्ट

अयोध्या विवाद में आज (9 नवंबर 2019) सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। पाँच सदस्यीय पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले की सुनवाई की थी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर शामिल हैं।

फैसले को देखते हुए न सिर्फ उत्तर प्रदेश बल्कि देश के कई हिस्सों में सुरक्षा के भारी इंतजाम किए गए हैं। अलीगढ़ जिला प्रशासन ने जिले भर में 8 नवंबर की रात 12 से 9 नवंबर की रात 12 बजे तक मोबाइल इंटरनेट सेवाएँ बंद रखने का आदेश दिया है। अलीगढ़ डीएम ने जिले में शुक्रवार रात 12 बजे से इंटरनेट सेवाएँ बंद करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा अलीगढ़ स्थित अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में भी सभी कक्षाएँ रद्द कर गई है। यूनिवर्सिटी से जुड़े स्कूल 11 नवंबर तक बंद कर दिए गए हैं।

अलीगढ़ प्रशासन द्वारा जारी किया गया आदेश

इधर, सुरक्षा के मद्देनजर पूरी अयोध्या नगरी को छावनी में तब्दील कर दिया गया है। अयोध्या मामले के फैसले के मद्देनजर केंद्रीय गृह मंत्रालय ने सभी राज्यों को सतर्क रहने की हिदायत दी है। अयोध्या में धारा 144 लागू है। साथ ही सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। अयोध्या में अर्धसैनिक बलों के 4000 जवानों को तैनात किया गया है। अयोध्या के सभी प्रमुख मार्गों पर सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की गई। शहर के भीतर चार पहिया वाहनों की आवाजाही को प्रतिबंधित किया गया। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रदेशवासियों से अपील की है कि आने वाले फैसले को जीत-हार के साथ जोड़कर न देखा जाए। अयोध्या की ओर जाने वाली बसों व अन्य बड़े वाहनों को भी रोक दिया गया है। ऐहतियात के तौर पर शनिवार को जिले के सभी स्कूल, कॉलेज, इंस्टीट्यूट और कोचिंग सेंटर बंद कर दिए गए हैं।

राम मंदिर पर शनिवार को सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले शुक्रवार (नवंबर 8, 2019) रात ही यूपी हाई अलर्ट मोड पर आ गया था। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने देर रात वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बैठक कर शांति-व्यवस्था को बनाए रखने के कड़े निर्देश दिए हैं। कहीं भी भीड़ इकट्ठा न हो इसके लिए पूरे प्रदेश में धारा 144 के लागू कर दिया गया। यूपी पुलिस सेना व एयर फोर्स के वरिष्ठ अधिकारियों के भी संपर्क में है। सरकार ने सभी डीएम को परिस्थितियों के अनुरूप अपने-अपने जिले में आवश्यक कड़े कदम उठाने के निर्देश भी दिए हैं। उत्तरप्रदेश में 9 नवंबर से 11 नवंबर तक स्कूलों का अवकाश घोषित किया गया है।

राज्य के पुलिस महानिदेकश ओ पी सिंह के अनुसार प्रदेश में पहले से ही सुरक्षा के इंतजाम कर रखे हैं और अयोध्या निर्णय को ध्यान में रखते हुए सभी जिलों में हाई अलर्ट है। उन्होंने बताया कि इसके अलावा सुरक्षा एजेंसियों के अधिकारी प्रदेश में हर गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं। उन्होंने बताया सोशल मीडिया पर माहौल बिगाड़ने का प्रयास करने वालों के खिलाफ पहले ही कड़ी कार्रवाई करने के निर्देश दिए गये हैं। उन्होंने बताया कि प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था के लिए सुरक्षा बलों की 150 कंपनियों को तैनात किया गया है।

अयोध्या मामले में फैसला आने की सूचना के बाद राजस्थान, झारखंड और छत्तीसगढ़ में संवदेनशील जगहों पर सुरक्षा बढ़ा दी गई है। कानून व्यवस्था को चाक-चौबंद बनाए रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश की गई है। राजस्थान में भी शनिवार को सभी स्कूलों को बंद रखा गया है। भरतपुर में इंटरनेट मोबाइल सेवा पर पाबंदी लगा दी गई है।

कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर में भी एहतियात के तौर पर धारा 144 लागू की गई है। सभी स्कूल और कॉलेजों में आज के दिन का अवकाश घोषित किया गया है। महाराष्ट्र के सभी जिलों में अलर्ट घोषित किया गया है और धारा 144 लागू है। वहीं मध्य प्रदेश में भी शनिवार को प्रदेश के सभी स्कूल-कॉलेज बंद रहेंगे। शराब की दुकानें भी बंद रहेंगी। प्रदेश के सभी जिलों में धारा 144 लागू रहेगी।

जम्मू के क्षेत्रीय आयुक्त संजीव वर्मा ने कहा, “जम्मू-कश्मीर में आधी रात से धारा 144 के तहत अगले आदेश तक निषेधाज्ञा लागू कर दी गयी है।” उन्होंने बताया कि सभी स्कूल और कॉलेज (निजी और सरकारी) एहतियातन शनिवार बंद रहेंगे तथा एक स्थान पर पाँच से अधिक व्यक्तियों को इकट्ठा होने की इजाजत नहीं होगी।

वहीं दिल्ली के शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया ने एक ट्वीट कर कहा है कि अयोध्या पर आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर सुरक्षा-व्यवस्था का मुद्दा अहम है। उन्होंने कहा कि महीने का दूसरा शनिवार होने के कारण सभी सरकारी स्कूल और कुछ प्राइवेट स्कूल बंद हैं। हरियाणा सरकार ने भी अयोध्या मामले में आने वाले फैसले को लेकर हाई अलर्ट जारी किया है। हर संवेदनशील इलाके में भारी पुलिस बल तैनात रहेगा। डीजीपी मनोज यादव ने बताया कि पूरे प्रदेश में संवेदनशील क्षेत्रों में भारी पुलिस बल की तैनाती की गई है। किसी भी स्थान पर स्थिति बिगड़ने नहीं दी जाएगी।

साथ ही बिहार और झारखंड में भी हाई अलर्ट है। पटना में पुलिस अलर्ट हो गई है। सड़क से लेकर सोशल मीडिया पर निगरानी रखी जा रही है। शुक्रवार की रात से पुलिस बल की मुस्तैदी कर दी गई है। वहीं राँची में पुलिस मुख्यालय ने सभी एसपी को यह निर्देश दिया है कि संवेदनशील क्षेत्रों में सीसीटीवी कैमरे व वीडियोग्राफी की व्यवस्था रखें। उपद्रव करने वालों की वीडियोग्राफी होगी, ताकि उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सके। वहीं उपद्रवियों के विरुद्ध सख्ती बरती जाएगी।

अयोध्या पर फैसले से पहले राणा अयूब ने उगला जहर, कहा- आज जो सत्ता में हैं, उन्होंने ही बाबरी गिराया था

वाशिंगटन पोस्ट की ग्लोबल ओपिनियंस राइटर राणा अयूब ने अयोध्या मामले को लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी की, जिसके बाद यूपी पुलिस ने उन्हें चेतावनी दी। हिन्दुओं व भारत के ख़िलाफ़ अक्सर बयान देने वाली राणा अयूब जम्मू-कश्मीर को लेकर भी ज़हर उगलती रहती हैं। अयोध्या विवाद पर फैसला आने से पहले उन्होंने ट्वीट किया:

“शनिवार (नवंबर 9, 2019) का दिन भारत के लिए बहुत बड़ा दिन होगा। बाबरी मस्जिद भारतीय मुस्लिमों की आस्था का स्मारक था। इसे दिसंबर 6, 1992 को उन्हीं लोगों ने ध्वस्त कर दिया, जो आज सत्ता में हैं। इसने मेरी ज़िंदगी बदल दी। इस घटना ने मेरे जैसी करोड़ों मुस्लिमों की ज़िंदगी बदल दी, जिन्हें रातोंरात बेदखल कर दिया गया। मुझे उम्मीद है कि मेरा देश फ़ैसले के दिन मुझे निराश नहीं करेगा।”

राणा अयूब ने इस ट्वीट में सीधा-सीधा आरोप लगाया कि आज जो लोग सत्ता में हैं, उन्होंने ही मस्जिद को ध्वस्त किया था। इसके बाद अमेठी पुलिस ने उन्हें तुरंत अपना ट्वीट डिलीट करने को कहा। अमेठी पुलिस ने राणा अयूब से कहा कि उन्होंने एक राजनीतिक टिप्पणी की है। साथ ही पुलिस ने कहा कि अगर अयूब ने तुरंत अपना ट्वीट
डिलीट नहीं किया तो उनके ख़िलाफ़ वैधानिक कार्रवाई की जाएगी। हालॉंकि बाद में अमेठी पुलिस ने अपना ट्वीट डिलीट कर दिया।

अमेठी पुलिस ने राणा अयूब को फटकारा

राणा अयूब अक्सर अपने भारत-विरोधी रुख का प्रदर्शन करते रहती हैं। हाल ही में उन्होंने दावा किया था कि भारत सरकार ने जम्मू-कश्मीर में सैकड़ों बच्चों को गिरफ़्तार कर रखा है। साथ ही उन्होंने आरोप लगाया था कि सुरक्षा बलों ने एक 92 वर्षीय वृद्ध महिला पर हमला किया। राणा अयूब गैंग के अन्य पत्रकारों ने आरोप लगाया कि अयूब के उपर्युक्त ट्वीट के कारण अमेठी पुलिस एक पत्रकार को धमकाने का कार्य कर रही है। जॉय अयूब ने लिखा कि राणा अयूब के इस ट्वीट के जवाब में नरसंहारक प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।

वहीं, फ़ाय डिसूजा ने पुलिस से पूछा कि उक्त ट्वीट के माध्यम से राणा अयूब ने आईपीसी की कौन सी धारा का उल्लंघन किया है? उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि अयोध्या पर फ़ैसले के दिन डिबेट करने वाले सभी पत्रकारों को सावधान रहना चाहिए। ‘फॉरेन पॉलिसी’ के मैनेजिंग एडिटर रवि अग्रवाल ने लिखा कि पुलिस राणा अयूब को चुप कराने की कोशिश कर रही है। रेबेका विन्सेंट ने तो ट्विटर के सीईओ जैक को टैग कर के उन्हें यूपी पुलिस को रोकने को कहा। ताज़ा सूचना के अनुसार, अमेठी पुलिस ने ट्विटर पर राणा अयूब को ब्लॉक कर दिया है। हालाँकि, इसका कारण स्पष्ट नहीं हो सका है।

राणा अयूब को अमेठी पुलिस ने किया ब्लॉक

गौरतलब है कि अयोध्या विवाद में आज (9 नवंबर 2019) सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। पाँच सदस्यीय पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले की सुनवाई की थी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर शामिल हैं।

अयोध्या: अंग्रेज जज ने 356 साल पुरानी गलती नहीं सुधारी, 491 साल पुरानी भूल सुधार का वक्त आया

अयोध्या विवाद में फैसले की घड़ी आ गई है। आज (9 नवंबर 2019) सुबह 10:30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्टूबर को सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। पाँच सदस्यीय पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले की सुनवाई की थी। पीठ में मुख्य न्यायाधीश के अलावा जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस अशोक भूषण और जस्टिस एसए नजीर शामिल हैं।

शीर्ष अदालत में चली सुनवाई के दौरान जो तथ्य उभरकर सामने आए थे उससे राम मंदिर के हक में फैसला आने की उम्मीद है। ऐसा हुआ तो यह पहला मौका नहीं होगा जब विवादित ढॉंचे पर हिंदुओं का हक होने के दावे पर मुहर लगेगी। हाई कोर्ट ने भले अपने फैसले में जमीन को तीन हिस्सों में बॉंट दिया था, लेकिन विवादित स्थल को रामजन्भूमि ही माना था। अंग्रेजों के जमाने में भी अदालत ने मंदिर तोड़कर मस्जिद बनाने की बात मानी थी, लेकिन इस घटना के 356 साल पुरानी होने का हवाला देकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया था।

विवादों का सिलसिला

इस पूरे विवाद की शुरुआत 1528 से होती है जब बाबर के सेनापति मीर बाकी ने अयोध्या में भगवान राम के जन्मस्थान पर ​मस्जिद का निर्माण करवाया। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ में बताया है कि 1528-1731 के बीच इस स्थान पर कब्जे को लेकर हिंदू और मुगलों के बीच 64 बार संघर्ष हुए। फैजाबाद अदालत के मुलाजिम हफीजुल्ला ने 1822 में सरकार को भेजी एक रिपोर्ट में भी कहा था कि राम के जन्मस्थान पर मस्जिद बनवाई गई है। दोनों मजहबों के बीच तनाव को देखते हुए 1859 में ब्रिटिश हुकूमत ने इस जगह की घेराबंदी कर दी। अंदर का हिस्सा नमाज के लिए और बाहर का हिस्सा हिंदुओं को पूजा के लिए दिया गया।

अदालत में विवाद

अदालत में इस जगह मंदिर बनवाने की माँग पहली बार 15 जनवरी 1885 को पहुॅंची। महंत रघुबर दास ने केस फाइल किया। उन्होंने राम चबूतरा पर एक मंडप बनाने की इजाजत माँगी। 24 फरवरी 1885 को फैजाबाद की जिला अदालत ने उनकी अर्जी यह कहते हुए खारिज कर दी कि वह जगह मस्जिद के बेहद करीब है। लेकिन, जज ने अपने फैसले में माना कि चबूतरे पर रघुबर दास का कब्जा है। उन्हें एक दीवार उठाकर चबूतरे को अलग करने को कहा। इसके बाद महंत रघुबर दास ने 17 मार्च 1886 को फैजाबाद के जिला जज कर्नल एफईए कैमियर की अदालत में अपील दायर की। कैमियर ने अपने फैसले में कहा, “मस्जिद हिंदुओं के पवित्र स्थान पर बनी है। पर अब देर हो चुकी है। 356 साल पुरानी गलती को सुधारना इतने दिनों बाद उचित नहीं होगी। यथास्थिति बनाए रखें।”

प्रकट हुए रामलला

22-23 दिसंबर 1949 की दरम्यानी रात विवादित ढाँचे में रामलला की मूर्ति प्रकट हुई। मामला अदालत में पहुॅंचा और सरकार ने इलाके को विवादित घोषित कर इमारत की कुर्की के आदेश दिए। लेकिन, पूजा-अर्चना जारी रही। इस घटना के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने मूर्ति हटाने का निर्देश प्रदेश की तत्कालीन सरकार को दिया था। लेकिन, फैजाबाद के तत्कालीन जिलाधिकारी केकेके नायर के अड़ने के कारण ऐसा नहीं हो पाया।
ढॉंचे में चोरी-छिपे मूर्ति रखने का दावा करते हुए सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने 1961 में याचिका दायर की। उसने कहा कि मस्जिद और उसके आसपास की जमीन एक कब्रगाह है, जिस पर उसका दावा है।

काले बंदर की प्रेरणा से आदेश, 40 मिनट में तामील

फैजाबाद की अदालत ने 1 फरवरी 1986 को इमारत का ताला खोलने का आदेश दिया। हेमंत शर्मा ‘युद्ध में अयोध्या’ में लिखते हैं कि शाम के 4:40 में जज ताला खोलने का आदेश देते हैं और शाम 5:20 मिनट पर ताला खुल गया। जिला जज कृष्णमोहन पांडेय ने यह फैसला वकील उमेश चंद्र पांडेय की अर्जी पर दिया था। बकौल उमेश चंद्र पांडेय, “हमें इस बात का अंदाजा नहीं था कि सब कुछ इतनी जल्दी हो जाएगा।” जज कृष्णमोहन पांडेय ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “जिस रोज मैं ताला खोलने का आदेश लिख रहा था, मेरी अदालत की छत पर एक काला बंदर पूरे दिन फ्लैग पोस्ट को पकड़कर बैठा रहा। जो फैसला सुनने अदालत में आए थे, उस बंदर को फल और मूॅंगफली देते रहे पर बंदर ने कुछ नहीं खाया। चुपचाप बैठा रहा। फैसले के बाद जब मैं घर पहुॅंचा तो उस बंदर को अपने बरामदे में बैठा पाया। मुझे आश्चर्य हुआ। मैंने उसे प्रणाम किया। वह कोई दैवीय ताकत थी।” उनके फैसले के खिलाफ 3 फरवरी 1986 को हाशिम अंसारी ने हाई कोर्ट में अपील की। हाई कोर्ट ने 14 अगस्त 1989 को यथास्थिति बरकरार रखने के निर्देश दिए।

ताला किसके आदेश से लगा था?

‘युद्ध में अयोध्या’ के मुताबिक ताला किसके आदेश से और कब लगा था यह किसी को पता नहीं। इस बात का कहीं कोई आदेश भी नहीं मिलता। स्थानीय लोगों की मानें तो ताला 1971 में लगा था। पूरे मामले का कानूनी पहलू यह था कि यह जगह एक ‘रिसीवर’ के अधिकार क्षेत्र में था। 1949 में अदालत ने संपत्ति को कुर्क कर प्रिया दत्त राम को ‘रिसीवर’ बनाया था। 1971 में उनकी मौत हो गई। इसके बाद नए ‘रिसीवर’ और निर्मोही अखाड़े के बीच विवाद खड़ा हो गया। पुलिस ने दखल दिया और ताला लगाकर चाबी अपने पास रख ली। तब भी एक दरवाजा भोग लगाने और प्रार्थना के लिए हमेशा खुला रहता था। यानी यह जगह कभी पूरी तरह ताले में बंद ही नहीं रही।

हाई कोर्ट ने माना विवादित स्थल ही रामजन्मभूमि

अप्रैल 2002 में हाई कोर्ट की तीन सदस्यीय बेंच ने इस बात पर सुनवाई शुरू की कि विवादित स्थल पर किसका अधिकार है। 30 सितंबर 2010 को वह ऐतिहासिक फैसला आया जिसने काफी हद तक इस विवाद की तस्वीर और तकदीर दोनों साफ कर दी। इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ पीठ ने विवादित स्थल को रामजन्मभूमि घोषित किया। 2.77 एकड़ जमीन को तीन हिस्सों में बाँट दिया। जहाँ रामललला की मूर्ति स्थापित है, वह जगह रामलला विराजमान को मिली। राम चबूतरा और सीता रसोई वाला दूसरा हिस्सा निर्मोही अखाड़े को दिया। तीसरा हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड को मिला। फैसले में स्पष्ट रूप से कहा गया कि विवादित ढाँचा ही भगवान राम का जन्मस्थान है।

फैसले का आधार

हाई कोर्ट ने फैसले का आधार भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट को माना। इसके अलावा भगवान राम का जन्मस्थान होने की मान्यता को भी आधार माना गया। हाई कोर्ट ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को खुदाई का आदेश 2003 में दिया था। खुदाई के बाद एएसआई ने 22 सितंबर 2003 को अपनी 574 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट को सौंपी। हेमंत शर्मा ने अपनी किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ और ‘अयोध्या का चश्मदीद’ में इसका विस्तार से ब्यौरा दिया है। वे लिखते हैं, “एएसआई ने कुल 90 खाइयाँ खोदीं। पूरे क्षेत्र को पॉंच हिस्सों में बॉंटा। इनमें पूर्वी, दक्षिणी, पश्चिमी, उत्तरी क्षेत्र और उभरा हुआ प्लेटफॉर्म शामिल था। सभी क्षेत्रों में क्रमवार खुदाई हुई, जिससे ढॉंचों की प्रकृति और उसकी सांस्कृतिकता का अंदाजा लगे। जो अवशेष मिले, उससे साबित होता था कि वहाँ 11वीं शताब्दी का हिंदू मंदिर था।”

खुदाई के दौरान निष्पक्षता और पारदर्शिता को लेकर सवाल नहीं उठे, इसके भी बकायदा इंतजाम किए गए थे। हेमंत शर्मा ने इसका ब्यौरा देते हुए लिखा है, “समूची खुदाई और ढॉंचों के अभिलेखीकरण की पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी की गई। खुदाई न्यायिक पर्यवेक्षकों, वकीलों और संबंधित पक्षों या उनके नामित व्यक्तियों की मौजूदगी में संपन्न हुई। खुदाई में पारदर्शिता हो, इस खातिर सारी उत्खनित सामग्री दोनों पक्षों की मौजूदगी में ही सील की जाती थी। इसे उसी दिन फैजाबाद के कमिश्नर की ओर से उपलब्ध कराए गए स्ट्रांग रूम में रखा जाता था। हर रोज इस स्ट्रांग रूम को बंद करने के बाद सील किया जाता था।”

दिसंबर 2010 में अखिल भारतीय हिंदू महासभा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। मई 2011 में सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए यथास्थिति बनाए रखने को कहा। शीर्ष अदालत ने 21 मार्च 2017 को मामले को संवेदनशील बताते हुए सभी पक्षों से एक राय बनाकर अदालत से बाहर समाधान ढूॅंढ़ने को कहा। सुप्रीम कोर्ट ने 14 मार्च 2018 को सभी 32 हस्तक्षेप अर्जियों को खारिज कर दिया। इसके बाद इस मामले में वही पक्षकार बचे जो इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में शामिल थे। मध्यस्थता प्रक्रिया नाकाम होने के बाद 6 अगस्त 2019 से मामले की रोजाना सुनवाई शुरू हुई।

अब वह घड़ी आ गई है जिसका देश को दशकों से इंतजार है। शीर्ष अदालत के फैसले से पता चल जाएगा कि रामलला का वनवास खत्म होता है या नहीं!

मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले इस मामले को अंजाम तक पहुँचा दूँ: रामलला के 92 वर्षीय वकील

अगर आप अदालती कार्यवाहियों का हिस्सा रहे हैं या फिर आपने यह व्यवस्था देखी है तो आपको पता होगा कि वकील खड़े होकर बहस करते हैं। कम से कम फ़िल्मों में तो आपने देखा ही होगा। सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद पर चली 40 दिन की सुनवाई के दौरान रामलला विराजमान की तरफ से पैरवी कर रहे थे के पराशरण। बहस के दौरान कई ऐसे मौके आए जब उन्होंने अपनी दलीलों से मुस्लिम पक्षकारों को पस्त कर दिया।

सुनवाई के दौरान एक दिन मुख्य न्यायाधीश ने पराशरण से पूछा, “क्या आप बैठ कर दलीलें पेश करना चाहेंगे?” लेकिन, उन्होंने कहा, “मिलॉर्ड आप बहुत दयावान हैं लेकिन वकीलों की परंपरा रही है कि वे सुनवाई के दौरान खड़े होकर दलीलें पेश करते रहे हैं और मैं इस परम्परा से लगाव रखता हूँ।” सीजेआई द्वारा इस सवाल को पूछने की वजह थी पराशरण की उम्र। अदालत में घंटों खड़े होकर दलील देने वाले पराशरण 92 साल के हैं।

तमिलनाडु के अधिवक्ता जनरल रहे पराशरण के अनुभवों के बारे में अंदाजा लगाना हो तो जान लीजिए कि वह इंदिरा गाँधी और राजीव गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ही भारत के अटॉर्नी जनरल रह चुके हैं। हालाँकि, 2016 के बाद पराशरण अदालती कार्यवाहियों में कम ही दिखते हैं और और चुनिन्दा मामलों में ही अदालत जाते हैं। चेन्नई से दिल्ली तक के इस सफ़र में उन्होंने न जाने कितने अच्छे-बुरे दौर देखे।

उन्होंने सबरीमाला मंदिर मामले में भी पैरवी की थी। उन्हें हिंदुत्व का विद्वान माना जाता है। 2012 से 2018 तक राज्यसभा सांसद रह चुके पराशरण 70 के दशक से ही अधिकतर सरकारों के फेवरिट वकील रहे हैं। धार्मिक पुस्तकों का उन्हें इतना ज्ञान है कि वह अदालत में बहस के दौरान भी उनका जिक्र करते रहते हैं। मद्रास हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजय किशन कॉल के शब्दों में “पराशरण भारतीय वकालत के पितामह हैं जिन्होंने बिना धर्म से समझौता किए भारतीयों के लिए इतना बड़ा योगदान दिया।”

पराशरण ने सबरीमाला मंदिर विवाद के दौरान महिलाओं की एंट्री की अनुमति न दिए जाने के लिए पैरवी की थी। उन्होंने श्रद्धालुओं की राय अदालत में अपने मजबूत दलीलों के साथ रखी। राम सेतु मामले में तो दोनों ही पक्षों ने उन्हें अपनी साइड करने के लिए सारे तरकीब आजमाए लेकिन धर्म को लेकर संजीदा रहे पराशरण ने रामसेतु सरकार के ख़िलाफ़ पैरवी करना उचित समझा। ऐसा उन्होंने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट से रामसेतु को बचाने के लिए किया। उन्होंने अदालत में कहा, “मैं अपने श्रीराम के लिए इतना तो कर ही सकता हूँ।

के पराशरण के पिता वेदों के विद्वान थे, अतः कहा जा सकता है कि ये संस्कार उन्हें विरासत में मिले हैं, जिसे उन्होंने एक नया आयाम दिया। बाबरी मस्जिद पक्ष के वकील राजीव धवन को अदालत की रोजाना सुनवाई से दिक्कतें थीं और उन्होंने प्रतिदिन सुनवाई न करने की अपील की थी, जिसे अदालत ने ठुकरा दिया था। लेकिन, क्या आपको पता है इस मामले को लेकर पराशरण का क्या कहना है? वे कहते हैं, “यह मेरी अंतिम इच्छा है कि मरने से पहले मैं इस मामले को अंजाम तक पहुँचा दूँ।

अयोध्या: वामपंथी इतिहासकारों के दावों को सुप्रीम कोर्ट ने सबूत मानने से कर दिया था इनकार

दशकों पुराने अयोध्या विवाद पर शनिवार (9 नवंबर 2019) को सुप्रीम कोर्ट फैसला सुनाएगा। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली संविधान पीठ ने 16 अक्ट्रबर को इस मामले की सुनवाई पूरी की थी। पीठ ने छह अगस्त से लगातार 40 दिन इस मामले में सुनवाई की। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट की एक टिप्पणी से उन वामपंथी इतिहासकारों को तगड़ा झटका लगा था, जिन्होंने इतिहास को अपनी जागीर समझ कर न जाने क्या-क्या लिखा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ द्वारा लिखी गई चीजों को सिर्फ़ उनका विचार माना जा सकता है, कोई सबूत नहीं। इन ‘प्रख्यात इतिहासकारों’ में कौन लोग शामिल हैं, ये जानने के लिए हमें कोई माथापच्ची नहीं करनी होगी। यह जगजाहिर है।

दरअसल, सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकार राजीव धवन ने कोर्ट को एक बड़ा नोट सौंपा था। ‘Historians’ Report To The Indian Nation’ नामक इस नोट को जल्दबाजी में तैयार किया गया था। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के वकील द्वारा सुप्रीम कोर्ट में इस नोट को इसीलिए रखा गया, क्योंकि इसमें इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि अयोध्या का विवादित स्थल न तो श्रीराम का जन्मस्थान है और न ही बाबर ने मंदिर तोड़ कर मस्जिद बनवाया। धवन द्वारा इस नोट को पेश किए जाने के बाद रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने उपर्युक्त बात कही।

इस रिपोर्ट को 1991 में 4 वामपंथी इतिहासकारों द्वारा तैयार किया गया था। आरएस शर्मा, एम अतहर अली, डीएन झा और सूरज भान ने अयोध्या में हुए पुरातात्विक उत्खनन से निकले निष्कर्ष का अध्ययन किए बिना ही इस रिपोर्ट को तैयार किया था। उत्खनन का आदेश इलाहबाद हाईकोर्ट ने दिया था। इसके बाद निकले निष्कर्षों से साफ़ पता चलता है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण मंदिर को तोड़ कर किया गया था। बावजूद इसके चारों वामपंथी इतिहासकारों ने लिख दिया कि वहाँ कोई मंदिर नहीं था।

जब धवन ने इस रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट के सामने रखा तो कोर्ट ने कहा कि वे अधिक से अधिक इसे बस एक विचार अथवा अभिमत मान सकते हैं, इससे ज्यादा कुछ नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इन इतिहाकारों ने
पुरातात्विक उत्खनन से मिली चीजों और उससे निकले निष्कर्षों को ध्यान में नहीं रखा था। एएसआई द्वारा की गई खुदाई में मंदिर के पक्ष में कई अहम साक्ष्य मिले थे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस रिपोर्ट का कोई मतलब नहीं है क्योंकि वह उत्खनन के पहले तैयार किया गया था।

कोर्ट ने कहा कि इन इतिहासकारों द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया असावधानीपूर्वक संचालित की गई लगती है। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि उन्होंने बिना सबूतों को देखे और अहम पहलुओं का अध्ययन किए बिना रिपोर्ट तैयार कर के कुछ भी दावा कर दिया। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट ने भी ऐसे इतिहासकारों के दावों को नकार दिया था। सुप्रिया वर्मा नामक एक कथित एक्सपर्ट ने भी एएसआई के डेटा को ही ग़लत ठहरा दिया। मजे की बात यह कि उन्होंने खुदाई से जुड़ी ‘रडार सर्वे रिपोर्ट’ को पढ़े बिना ही ऐसा कर दिया।

सुप्रिया वर्मा और जया मेनन नामक कथित एक्सपर्ट्स खुदाई के समय वहाँ मौजूद नहीं थीं। लेकिन उन्होंने दावा कर दिया कि वहाँ मिले स्तम्भ कहीं और से लाकर रख दिए गए थे। सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड के एक अन्य ‘एक्सपर्ट’ गवाह डी मंडल ने कोर्ट में स्वीकार किया कि अयोध्या गए बिना ही उन्होंने विवादित स्थल के ऊपर ‘Ayodhya: Archaeology after Demolition’ नामक एक भारी-भरकम पुस्तक लिख डाली। उन्होंने कोर्ट को बताया कि उन्हें बाबर के बारे में बस इतना पता है कि वह 16वीं शताब्दी का शासक था। इसके अलावा उन्हें बाबर के बारे में कुछ नहीं पता।

‘हिन्दू फासिस्ट’ से लिबरल-दुलारी हुई शिव सेना, उद्धव बने आँख के तारे: ‘मीडिया गिरोह’ ने जमकर उड़ेला प्यार

हमारे समय की राजनीति किस तरह से नरेंद्र मोदी और भरतीय जनता पार्टी के पक्ष और विपक्ष पर शुरू और खत्म हो रही है, आज (8 नवंबर, 2019 को) शाम ट्विटर इसकी नज़ीर बन गया। कल तक जो शिव सेना ‘कट्टर हिंदूवादी’ की छवि के नाम पर लिबरल गैंग की दुश्मन थी, भाजपा से अलग होते ही लिबरल गैंग की डार्लिंग हो गई। जो उद्धव ठाकरे एक फ़ासिस्ट पार्टी के प्रमुख थे, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते ही ‘शेर’ की उपाधि से नवाज़े जाने लगे।

यहाँ तक कि गोलवलकर-सावरकर के समय के संघ और आडवाणी काल की भाजपा से भी अधिक नफरत मीडिया गिरोह जिन बाला साहेब ठाकरे से करता था, महज़ इसलिए कि कुछ हिन्दू उन्हें ‘हिन्दू हृदय सम्राट’ कहते थे और वह कश्मीरी पंडितों और राम मंदिर के समर्थक थे, अचानक से वह भी याद किए जाने लगे। उद्धव ठाकरे के विशुद्ध राजनीतिक दाँव और उनकी ‘रैंटिंग‘ अर्थात भड़ास की पीठ थपथपाई जाने लगी कि बाला साहेब की ‘छवि’ दिख रही है उद्धव में।

सबसे ज़्यादा खुश स्वाति चतुर्वेदी नज़र आईं जिनकी खुशी ताबड़तोड़ ट्वीट पर ट्वीट में बहती नज़र आई। उद्धव को ‘सॉफ़्ट स्पोकन’ से लेकर ‘शेर’ तक बता डाला। बताने लगीं कि उद्धव ने दिखा दिया कि भाजपा और उसके अध्यक्ष अमित शाह का मुकाबला कैसे किया जाना है। और यह भूल गईं कि इनकी लिबरल गैंग विचारधारा में हिन्दू हितों के पैरोकार होने के चलते उद्धव भी उतने ही अस्पृश्य हैं जितने कभी भाजपा और संघ रहे थे और जिसके बारे में वाजपेयी ने ‘राजनीतिक अस्पृश्यता’ शब्द ईजाद किया था।

स्वाति चतुर्वदी का आज बस चलता तो वे राहुल गाँधी समेत विपक्ष के नेताओं को उद्धव के निवास ‘मातोश्री’ में ट्यूशन लेने भेज देतीं।

सागरिका घोष की ख़ुशी ट्विटर पर बल्लियों उछल कर बाहर आ रही थी। वे शायद वह समय भूल गईं जब उनके लिबरल गैंग ने इन्हीं उद्धव ठाकरे के पिता को हत्यारा, फासिस्ट और न जाने क्या-क्या कहा था।

यही हाल स्वाति चतुर्वेदी का भी था। वे न केवल उद्धव की शान में एक के बाद एक कसीदे पढ़ रहीं थीं, जैसे कि मानो उद्धव सेक्रेड गेम्स 2 के अंत में सैफ अली खान के किरदार की जगह न्यूक्लियर बम डिफ्यूज करने के लिए रुक गए हों, बल्कि उनकी बाला साहेब से तुलना भी तारीफ़ के ‘सेंस’ में कर रहीं थीं।

बीबीसी वाले खांडेकर जी ‘अलग एंगल’ निकालने के चक्कर में 280 कैरेक्टरों के ट्वीट में एक ही साथ उद्धव के बर्ताव को सही साबित करते, क्योंकि कथित तौर पर बाला साहेब ठाकरे भी ऐसे ही करते थे, और इसे भाजपा के पिछले 5 साल के न जाने कौन से दुर्व्यवहार का ‘दंड’ बताते नज़र आए।

अभिसार शर्मा की तो ख़ुशी इतनी ज़्यादा थी शायद कि विह्वल होकर उनके मुखण्डल से शब्द ही नहीं फूटे। सो स्वाति चतुर्वेदी को केवल एक मूक रीट्वीट देने में वे बुक्का फाड़कर दिवाली मनाते दिखे।

अशोक स्वाइन (जिनके नाम की स्पेलिंग में कोई छेड़छाड़ नहीं की गई है, बाला साहेब की कसम!) की सूई अमित शाह के आगे ही नहीं बढ़ी, वहीं मर्या शकील एक तरफ महायुति की मैरिज काउंसिलिंग करने लगीं, और दूसरी ओर उसी के साथ सेना-एनसीपी-कॉन्ग्रेस का ‘संयुक्त परिवार’ की बाट भी साथ में जोहना चालू कर दिया।

अयोध्या मामले में कल सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट सुनाएगा फैसला, यूपी में अलर्ट जारी: रिपोर्ट्स

अयोध्या मामले पर ताज़ा जानकारी के हिसाब से सूचना आ रही है कि कल सुबह 10.30 बजे सुप्रीम कोर्ट अपना फैसला सुनाएगा। अदालत की 5 जजों की संविधान पीठ ने 40 दिन सुनवाई करने के बाद 16 अक्टूबर को फैसला सुरक्षित कर लिया था। 2010 में इलाहबाद हाई कोर्ट ने दो-तिहाई जमीन ज़मीन हिन्दुओं और एक तिहाई मुस्लिमों को दे दी थी।

इस फैसले के साथ ही लगभग 500 साल पुराने इस विवाद के हल हों जाने की उम्मीद बढ़ गई है। बता दें कि इधर, यूपी सरकार ने अयोध्या जमीन विवाद को लेकर आने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मद्देनजर अयोध्या समेत पूरे प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है।

साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार ने सभी स्कूल, कॉलेज, ट्रेनिंग सेंटर, सहित सभी शैक्षणिक केंद्रों को 9 से लेकर 11 नवंबर तक बंद रखने का आदेश दिया है।

अयोध्या में राम जन्मभूमि जाने वाले सभी रास्तों को बंद कर दिया गया है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, टेढ़ी बाजार से दोपहिया और चारपहिया वाहनों की आवाजाही पर भी रोक लगा दी गई है। आज से ही सघन चेकिंग शुरू कर दी गई है।

बता दें कि रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि के विवादित 2.77 एकड़ जमीन के स्वामित्व के लिए हिंदू और मुस्लिम पक्षकारों द्वारा दायर की गई अपील पर 40 दिन सुनवाई चली। CJI रंजन गोगोई की अध्यक्षता में 5 जजों वाली पीठ ने इस मामले पर 16 अक्टूबर को अपना फैसला सुरक्षित रखा था।

इस मामले में दोनों पक्षों ने इतिहासकारों, ऐतिहासिक यात्रियों, गैजेटियर, अंग्रेज के जमाने से चले आ रहे जमीन संबंधी कागजातों के साथ अपनी-अपनी आस्था का पक्ष भी रखा। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों को भी सुनवाई के दौरान जजों के समक्ष रखा गया। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सितंबर 2010 के अपने फैसले में विवादित भूमि को तीन हिस्सों में बाँटा था – राम लला, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड।

(यह डेवलपिंग स्टोरी है। और जानकारी मिलने पर इसे अपडेट किया जाएगा।)

महिला शिक्षक का अपहरण, जबरन बिठा कर गुंडागर्दी: JNU को ‘गढ़चिरौली’ बनाने की ओर एक और कदम

ऐसा लग रहा है कि देश की राजधानी दिल्ली के बीच स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को इसके वामपंथी छात्र अपने राजनीतिक आका नक्सलियों के केंद्र ‘गढ़चिरौली’ जैसा बनाने पर ही तुले हुए हैं।

ट्विटर पर वायरल हो रहे एक वीडियो को देख कर लग रहा है कि माओ-लेनिन-मार्क्स के वंशजों के गढ़ में यूनिवर्सिटी के नियम तो दूर की बात, नागरिक कानून व्यवस्था ही पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है और विश्वविद्यालय लेफ्ट वाले छात्रों के रहमो करम पर आ चुका है। वीडियो के ट्वीट में बताया जा रहा है कि जेनएयू की एसोशिएट डीन ऑफ़ स्टूडेंट्स, डॉ. वंदना मिश्रा, को सुबह से यूनिवर्सिटी के छात्रों ने उनकी मर्ज़ी के खिलाफ एक कमरे में कैद कर रखा है (यानि अपहृत कर रखा है)।

वीडियो में उनके चारों ओर नारेबाजी करते, चीखते और दहाड़ते छात्र दिख रहे हैं। साथ ही डॉ. मिश्रा बहुत ही बेबस नज़र आ रहीं हैं। वीडियो शेयर करने वाले ट्वीट में यह भी दावा किया गया है कि उनकी सेहत सुबह से गिरती ही जा रही है। यह भी बताया गया है कि उन्हें उनकी ही स्कूल ऑफ़ इंटरनेशनल स्टडीज़ की बिल्डिंग में स्थित क्लास में कैद कर के रखा गया है।

ज़ी न्यूज़ की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इसके पीछे कारण छात्रों और यूनिवर्सिटी प्रशासन के बीच फीस, ड्रेस कोड, लाइब्रेरी के समय जैसी चीज़ों को लेकर टकराव है। इसके चलते छात्रों के भूख हड़ताल पर होने की बात कही गई है।

इस बीच कैम्पस ‘नक्सलियों’ की हरकतों से ट्विटर पर कई प्रबुद्ध व्यक्तित्व बिफर उठे हैं। पत्रकार आदित्य राज कौल ने ट्वीट करके कहा है कि भले ही उन छात्रों को शांतिपूर्वक अपनी बात कहने का अधिकार हो, लेकिन अवैध रूप से किसी को बंदी बनाना कानून के खिलाफ है। कौल ने जेएनयू के कुलपति वीके सारस्वत को निशाने पर लेते हुए सवाल किया है कि उन्होंने अब तक कार्रवाई क्यों नहीं की या दिल्ली पुलिस को क्यों नहीं बुलाया।

एएनआई सम्पादक स्मिता प्रकाश ने भी घटना की आलोचना की है। वरिष्ठ पत्रकार कंचन गुप्ता ने जेएनयू को ‘रिपब्लिक ऑफ़ जेएनयू’ बताते हुए बेबस देश की जनता के पैसों से चल रही एक समानांतर राजनीतिक सत्ता करार दिया है।

ख़ास ही नहीं, आम लोग भी जेएनयू की घटना से बेहद नाराज़ हैं। एक ट्विटर यूज़र ने कहा कि खाली ट्वीट कर अपने आप को पीड़ित दिखा रहे जेएनयू कुलपति खुद को नाकारा साबित कर रहे हैं। वहीं एक दूसरे ट्वीटर हैंडल ने जेएनयू की तुलना दुर्दांत जिहादी संगठन इस्लामिक स्टेट से कर दी है।