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सवाल पर बवाल: शिवाजी के नाम से छत्रपति हटाने पर भड़के मराठी, केबीसी के बहिष्कार की माँग

मशहूर टीवी गेम शो ‘कौन बनेगा करोड़पति’ अपनी एक छोटी सी भूल से एक राजनीतिक विवाद का केंद्रबिंदु बन गया है। गेम शो में पूछे गए एक प्रश्न में हिन्दू शासक और मराठा साम्राज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज के नाम में उपनाम ‘छत्रपति’ न लगाने, और उसी सवाल में अन्य हिन्दू राजाओं, और मुग़ल बादशाह औरंगज़ेब के लिए उपयुक्त राजनीतिक उपनामों का प्रयोग करने को लेकर ट्विटर पर देश भर की जनता की आलोचना का सामना करना पड़ रहा है

यही नहीं, फ़िलहाल मराठा पार्टी शिव सेना से सत्ता संघर्ष में उलझी भारतीय जनता पार्टी की महाराष्ट्र इकाई ने भी इस पर आपत्ति जताई है। भाजपा के महाराष्ट्र विधायक नितेश राणे ने चैनल और आयोजकों से माफ़ी की माँग की है।

बवाल का कारण एक सवाल है जिसमें स्क्रीन पर औरंगज़ेब और शिवाजी महाराज समेत पाँच ऐतिहासिक शासकों के बारे में पूछा गया था। इसमें से शिवाजी के अलावा बाकी सभी शासकों, जैसे महाराणा प्रताप, राणा सांगा, महाराज रंजीत सिंह आदि के लिए सही उपनामों का इस्तेमाल हुआ और छत्रपति शिवाजी को केवल “शिवाजी” लिखा गया।

इसे उनका इसलिए अपमान माना जा रहा है क्योंकि ऐतिहासिक रूप से भी उनकी जन्म की जाति के चलते उनके राजतिलक में अड़चन आने की बात कही जाती है। उस समय वाराणसी के सम्मानित ब्राह्मण पंडित विश्वेश्वर ‘गागा’ भट्ट ने यह ढूँढ़ कर निकाला कि वे जाति-भ्रष्ट(या कुछ विवरणों के अनुसार, पूर्वजों के कुछ कृत्यों के चलते जातिच्युत) सिसोदिया क्षत्रिय हैं। सूर्यवंशी सिसोदिया भगवान श्री राम के इक्ष्वाकु कुल के माने जाते हैं। उसके बाद ही उनका राजतिलक सम्भव हो पाया था।

इस चूक से नाराज़ लोगों के केबीसी के आयोजकों और सोनी चैनल वालों को आड़े हाथों लिया। किसी ने क्रूर जिहादी औरंगज़ेब को सम्मान देने पर आपत्ति जताई तो कुछ लोगों ने होस्ट अमिताभ बच्चन से भी माफ़ी की माँग कर डाली।

विवाद बढ़ता देख कर सोनी टीवी ने एक ट्वीट कर विवाद पर माफ़ी माँग ली है। साथ ही दावा किया है कि कल जिस एपिसोड की शूटिंग हुई है उसमें उन्होंने माफीनामे का एक ‘स्क्रॉल’ जोड़ दिया है।

ज़ाकिर ने नाबालिग के साथ किया सेक्स, बाद में वेश्या बनाने की कोशिश, पुलिस ने फोड़ा सेक्स रैकेट

आंध्र प्रदेश में एक सेक्स रैकेट का पुलिस ने भंडाफोड़ किया है, और उसमें शामिल ज़ाकिर हुसैन को हिरासत में ले लिया है। मामला आंध्र प्रदेश के कौवववुरु और नेल्लोर जिलों का है।

द न्यूज़ मिनट की रिपोर्ट के अनुसार कौवववुरु की रहने वाली एक लड़की दो साल पहले (वर्ष 2017 में) नेल्लोर के रहने वाले महेश उर्फ़ ज़ाकिर हुसैन से मिली। उस समय 32 साल के युवक ज़ाकिर ने अपना पेशा शार्ट फिल्मों के निर्माता का बताया था। ज़ाकिर ने उस समय 16 वर्ष आयु वाली लड़की के साथ सेक्स किया और उसे फिल्मों में काम करने का मौका दिलाने का वादा किया।

दो साल बाद, 3 दिन पहले (मंगलवार, 5 नवंबर, 2019 को) ज़ाकिर ने लड़की को एक वीडियो दिखाया जिसमें वे दोनों सेक्स करते हुए दिख रहे थे। उसने बताया कि उसने दो साल पहले यह वीडियो लड़की की जानकारी और सहमति के बिना रिकॉर्ड कर लिया था। अब जबकि वह लड़की 18 साल की हो चुकी है, तो वह उस पर वेश्यावृत्ति अपनाने (सेक्स वर्कर बनने) का दबाव डालने लगा। ज़ाकिर ने यह भी धमकी दी कि अगर उसने सेक्स वर्कर बनने से इंकार किया तो वह उस सेक्स वीडियो को सोशल मीडिया पर लीक कर देगा।

लड़की ने उसकी धमकी को दरकिनार कर पुलिस की सहायता ली। पुलिस ने उसकी शिकायत के आधार पर ज़ाकिर को गिरफ़्तार कर लिया था। “उससे (ज़ाकिर से) पूछताछ करने पर हमें पता चला कि वह कस्बे भर में फैले हुए 5 वेश्यालयों से जुड़ा हुआ है। वह अकसर इन वेश्यालयों को औरतों की सप्लाई करता था, 50 प्रतिशत कमीशन पर।” घटना की जाँच कर रहे डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट ऑफ़ पुलिस जे श्रीनिवास रेड्डी ने द न्यूज़ मिनट से बात करते हुए जानकारी दी।

इसके बाद कल (बृहस्पतिवार, 7 नवंबर, 2019 को) पुलिस ने औरतों की सेक्स वर्क (वेश्यावृत्ति) के लिए ट्रैफिकिंग करने वाले एक गिरोह के कई लोगों को छापा मारकर हिरासत में ले लिया। ज़ाकिर के अतिरिक्त पुलिस ने 8 अन्य ‘आयोजकों’ को भी हिरासत में लिया जो वेश्यालयों का प्रबंधन कर रहे थे। इसके अलावा पुलिस ने 5 ‘ग्राहकों’ को भी गिरफ्तार किया है। पुलिस ने छापेमारी नेल्लोर के चिन्ना बाजार, नवाबपेट, दरगामित्ता, वाड्यापलेम और बालाजीनगर इलाकों में की है।

पुलिस ने बताया कि आयोजकों में से भी दो को ज़ाकिर द्वारा फिल्मों में काम दिलाने के झाँसे में आकर सेक्स करने और उसके बाद उन सेक्स वीडियो के ज़रिए ब्लैकमेल कर सेक्स के काम में उतारा गया है।

करतारपुर कॉरिडोर: पाक आर्मी चीफ बाजवा ने इमरान का दूसरा वादा भी तोड़ा, अब पहले दिन से वसूलेगा 20 डॉलर

करतारपुर कॉरिडोर को लेकर लगातार अपना रुख बदलने वाले पाकिस्तान ने एक बार फिर से पलटी मारी है। पाकिस्तानी सेना ने अपने प्रधानमंत्री इमरान खान का दूसरा वादा भी रद्द कर दिया है। पाकिस्तानी सेना ने साफ कर दिया कि कल यानी 9 नवंबर को करतारपुर कॉरिडोर आने वाले भारतीय श्रद्धालुओं से 20 डॉलर वसूला जाएगा।

बता दें कि इससे पहले इमरान खान ने ऐलान किया था कि करतारपुर कॉरिडोर के उद्घाटन और गुरु नानक देव की 550वीं जयंती पर आने वाले श्रद्धालुओं से एंट्री फीस नहीं ली जाएगी, इसके बावजूद उन्हीं की सेना प्रमुख बाजवा ने पीएम की बात को खारिज कर दिया।

इससे पहले 7 नवंबर को पाकिस्तान ने पासपोर्ट जरूरी न होने की बात से भी पलटी खाई थी। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने ट्वीट कर कहा था कि करतारपुर साहिब दर्शन के लिए आने वाले भारतीय श्रद्धालुओं को पासपोर्ट की जरूरत नहीं होगी, लेकिन पाकिस्तानी सेना की तरफ से अपने ही पीएम की बात को खारिज कर दिया गया। पाकिस्तानी सेना ने कहा, “हम सुरक्षा कारणों से पासपोर्ट में छूट नहीं दे सकते हैं।” पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता मेजर जनरल आसिफ गफूर ने कहा था, “हम अपनी संप्रभुता और सुरक्षा के साथ समझौता नहीं कर सकते।”

इसके अलावा पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने तीसरा ऐलान किया था कि करतारपुर साहिब दर्शन के लिए रजिस्ट्रेशन की जानकारी दस दिन पहले पाकिस्तान को देनी जरूरी नहीं होगी, लेकिन उन्हीं की सरकार के प्रवक्ता ने इमरान की बातों से विपरीत बयान दिया। पाकिस्तान विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता शाह फैसल ने कहा कि 10 दिन पहले जानकारी देनी होगी। पाकिस्तान की नीयत से भारत अच्छी तरह से वाकिफ है। इसलिए उसने यहाँ से जाने वाले श्रद्धालुओं को पहले ही कह दिया था कि भारत सरकार भारतीय श्रद्धालुओं की लिस्ट पाकिस्तान को दस दिन पहले भेजा करेगी।

गुरूवार (नवंबर 7, 2019) को भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि पाकिस्तान से बहुत ही विरोधाभासी खबरें आ रही हैं। कभी कहा जाता है कि पासपोर्ट चाहिए और कभी कहा जाता है कि नहीं चाहिए। उन्हें इस तरह का दिखावा करने की कोई जरूरत नहीं है कि वह इस कॉरिडोर के लिए बहुत कुछ कर रहे हैं। जहाँ तक भारत का सवाल है तो हम समझौते के मुताबिक चल रहे हैं। समझौते में साफ है कि पहचान पत्र के तौर पर पासपोर्ट अनिवार्य होगा।

1990 के बाद पहली बार VHP ने पत्थर तराशने का काम रोका, राम मंदिर फैसले के बाद दोबारा शुरू होगा काम

अयोध्या मामले में उच्चतम न्यायालय के फैसले से पहले विश्व हिंदू परिषद (VHP) ने राम मंदिर निर्माण के लिए पत्थरों को तराशने का काम बंद कर दिया है। विहिप ने 1990 के बाद से पहली बार पत्थरों को तराशने का काम बंद किया है। विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा ने बताया कि इस काम में लगे सभी कारीगर अपने घर वापस लौट गए हैं।

न्यूज 18 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, विहिप ने पत्थरों को तराशने में शामिल सभी कारीगरों को फिलहाल रुकने के लिए कहा है। विहिप के प्रवक्ता शरद शर्मा ने कहा है कि आगामी अयोध्या के फैसले को ध्यान में रखते हुए विहिप की विभिन्न गतिविधियों के सभी प्रस्तावित कार्यक्रम रद्द कर दिए गए हैं।

उन्होंने कहा कि पत्थरों की नक्काशी को बंद करने का निर्णय राम जन्मभूमि न्यास द्वारा लिया गया है। बता दें कि यह एक हिंदू सांस्कृतिक संगठन है, जो राम जन्मभूमि स्थल पर भगवान राम को समर्पित एक भव्य मंदिर के निर्माण की माँग को लेकर आंदोलन में सबसे आगे रहा है।

शरद शर्मा ने कहा, “न्यास ने संगठन की विभिन्न गतिविधियों से जुड़े हमारे सभी प्रस्तावित कार्यक्रम को रोकने का फैसला किया। न्यास ने अयोध्या पर सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की प्रतीक्षा करने का निर्णय लिया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने का बाद फिर से काम शुरू करने का निर्णय लिया जाएगा। अब राम जन्मभूमि न्यास तय करेगा कि तराशने का काम दोबारा कब शुरू किया जाएगा।”

उल्लेखनीय है कि उच्चतम न्यायालय 17 नवंबर से पहले राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में फैसला सुना सकता है। इसी दिन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई सेवानिवृत हो रहे हैं, जिन्होंने इस मामले पर दलीलें सुनने वाली पाँच न्यायाधीशों की पीठ की अध्यक्षता की है।

बता दें कि विहिप ने राम मंदिर निर्माण कार्यशाला में 1990 में यहाँ राम मंदिर के निर्माण के लिए पत्थरों को तराशना शुरू किया था। उस समय समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। तब से कारीगर निर्बाध तरीके से यह काम कर रहे हैं। यह काम तब भी नहीं रूका था, जब 1992 में बाबरी मस्जिद के ध्वस्त होने के बाद विहिप और आरएसएस को 6 महीने के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया था। यह तब भी अनवरत रूप से चल रहा था।

फैसले का समय नजदीक आने के साथ ही अयोध्या के कारसेवकपुरम में न्यास वर्कशॉप कथित तौर पर बड़ी संख्या में आगंतुकों को आकर्षित कर रही है। विहिप के अनुसार 1.25 लाख घन फुट पत्थर पहले ही तराशा जा चुका है। संगठन का दावा है कि इतना पत्थर प्रस्तावित मंदिर की पहली मंजिल के निर्माण के लिए पर्याप्त है और शेष ढाँचे के लिए 1.75 लाख घन फुट पत्थर अभी भी तराशा जाना है। 

राम जन्मभूमि न्यास के अनुसार पूरा मंदिर लाल पत्थर से बना होगा और इसमें कोई लोहे का काम नहीं होगा। विहिप ने विवादित मुद्दे पर फैसला आने से पहले अपने कार्यकर्ताओं से शांति बरतने और उन्मादी जश्न का माहौल बनाने से बचने की अपील की है। विहिप के केंद्रीय उपाध्यक्ष चंपत राय ने कहा, “फैसला हिंदू और दूसरे मजहब का मामला नहीं होना चाहिए। यह सच्चाई को स्वीकार करने के बारे में है। इसलिए समाज में जश्न का उन्माद पैदा न करें और किसी पर तंज न कसा जाए।”

Video: महिला IPS अधिकारी मोनिका भारद्वाज से वकीलों की भीड़ ने की थी बदसलूकी, जाँच के आदेश

तीस हज़ारी कोर्ट में पुलिस और वकीलों के बीच शनिवार को हुए हंगामे के दौरान उत्तरी ज़िला पुलिस उपायुक्त मोनिका भारद्वाज के साथ हुई बदसलूकी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। मामले को शांत करने पहुँची महिला IPS अधिकारी को सैकड़ों वकीलों ने घेर लिया था। इसके बावजूद हिम्मत दिखाते हुए उन्होंने अंत समय तक भीड़ को समझाने-बुझाने की कोशिश की, लेकिन माहौल बिगड़ने लगा तो वहाँ मौजूद पुलिसकर्मियों ने उन्हें किसी तरह से सुरक्षित बाहर निकाला।

2 नवंबर को तीस हज़ारी कोर्ट परिसर में जब यह घटना हुई तो उसका वीडियो भी वायरल हो गया। इसके अलावा, गुरुवार (7 नवंबर) को इस घटना का सीसीटीवी फुटेज वायरल हो गया है। क़रीब डेढ़ मिनट के इस वीडियो में यह पूरी घटना दिख रही है। इस वीडियो में हंगामे के बाद वहाँ मौजूद गाड़ियों में आग की लपटों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

दरअसल, इस वीडियो की शुरूआत में महिला अधिकारी अपने स्टाफ़ के साथ लॉकअप की तरफ भागती नज़र आ रही है। तभी लॉकअप के पास ज़ोरदार धमाका होता है और आग की लपटें व धुआँ दिखाई देता है। इसके बाद भीड़ इतनी उग्र हुई कि महिला अधिकारी अपने स्टाफ़ के साथ जान बचाते हुए कोर्ट से बाहर जाने के लिए भागती नज़र आ रही हैं। इसी दौरान उनके साथ बदसलूकी के आरोप वकीलों पर लग रहे हैं। 

ख़बर के अनुसार, महिला अधिकारी को बचाने के दौरान एक एसएचओ व कई पुलिसकर्मी भी घायल हो गए। हालाँकि, हमलावर के बारे में अभी कुछ नहीं पता चल सका है, इसकी जाँच जारी है। इसके अलावा, दो पुलिसकर्मियों का ऑडियो भी वायरल हो रहा है, जिसमें एक बता रहा है कि उसने कैसे मैडम (महिला IPS अधिकारी) को बचाया और उसके साथ भीड़ ने मारपीट की। वहीं, एक महिला पुलिसकर्मी की पिस्टल घटना के बाद से ग़ायब है। 

इस घटना को संज्ञान में लेते हुए राष्ट्रीय महिला आयोग की चेयर पर्सन रेखा शर्मा ने जाँच की माँग की है। इस वायरल हुए वीडियो के सन्दर्भ में दिल्ली पुलिस के एडिशनल पीआरओ अनिल मित्तल ने बताया कि 2 तारीख को तीस हज़ारी में हुई घटना को लेकर मामला दर्ज कर लिया गया है और इसकी जाँच क्राइम ब्रांच की SIT कर रही है। हंगामें के दौरान जो भी महिला अधिकारी तैनात थीं, उनके बयान दर्ज किए जा रहे हैं। महिला अधिकारियों के बयान के अनुसार ही इस मामले में IPC की धाराएँ जोड़ी जाएँगी।

70 वर्षों में पहली बार, त्रिपुरा के अंतिम राजा के जन्मदिन पर राजकीय अवकाश घोषित

देशी रियासत के भारतीय संघ में विलय के बाद 70 वर्षों में पहली बार, त्रिपुरा में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार ने राज्य के अंतिम राजा महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य के जन्मदिन 19 अगस्त को अगले साल से एक आधिकारिक राजकीय अवकाश के रूप में अधिसूचित किया है। शुक्रवार (8 नवंबर) को इसकी जानकारी अधिकारियों द्वारा दी गई।

त्रिपुरा सरकार के एक अधिकारी ने बताया कि राज्य के अंतिम राजा महाराजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य के अपार योगदान के मद्देनज़र, राज्य सरकार ने अगले साल यानी 2020 से उनके जन्मदिन को (19 अगस्त को) आधिकारिक अवकाश के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया है।

अधिकारी ने कहा कि राजा बिक्रम (1908-1947), जिन्होंने 1923 से 17 मई, 1947 तक राज्य पर शासन किया था, उन्होंने 28 अप्रैल, 1947 को एक शाही फ़रमान जारी करके त्रिपुरा की तत्कालीन रियासत को भारतीय संघ में विलय करने का फ़ैसला किया था। बैरिस्टर गिरिजा शंकर गुहा को संविधान सभा में अपने डोमेन के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया गया था।

राज्य सरकार के अनुरोध पर केंद्र सरकार ने पिछले साल राजा बिक्रम के नाम पर अगरतला हवाई अड्डे का नाम बदल दिया। उन्होंने 1942 में हवाई अड्डे का निर्माण करवाया था और उस हवाई पट्टी ने द्वितीय विश्व युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। अगरतला हवाई अड्डा, जिसे पहले सिंगरबिल हवाई अड्डे के रूप में जाना जाता था, राजधानी से 20 किलोमीटर उत्तर में स्थित है और बांग्लादेश सीमा के साथ सटा हुआ है।

इससे पहले, अंतिम राजा के नाम पर 1947 में एक कॉलेज की स्थापना की गई थी, जबकि पिछली वाम मोर्चा सरकार ने महाराजा के नाम पर अगरतला में एक विश्वविद्यालय और एक क्रिकेट स्टेडियम की स्थापना की थी। जानकारी के लिए बता दें कि 184 राजाओं द्वारा कई सौ वर्षों के शासन के बाद, अक्टूबर 1949 में त्रिपुरा का भारतीय संघ में विलय हुआ था।

फडणवीस ने सौंपा इस्तीफा, कहा- मुझे दुख है कि शिवसेना के पास कॉन्ग्रेस और NCP से बात करने का समय

महाराष्ट्र के पिछले विधानसभा कार्यकाल का समय समाप्त होने के साथ ही राज्य के मुख्यमंत्री रहे देवेंन्द्र फडणवीस ने आज (नवंबर 8, 2019) राजभवन में जाकर राज्यपाल भगत सिंह कोशयारी से मिलकर अपने पद से इस्तीफा दे दिया।

उन्होंने अपना इस्तीफा देने के बाद मीडिया से बात की और जानकारी दी कि वे अपना इस्तीफा राज्यपाल को सौंप चुके हैं। आगे पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा, “5 साल महाराष्ट्र की सेवा करने का मौका मिला इसके लिए नरेंद्र मोदी, अमित शाह, जेपी नड्डा का आभारी हूँ।”

फडणवीस ने इस दौरान पिछले कार्यकाल में भाजपा की सहयोगी पार्टी रही शिवसेना का भी धन्यवाद किया। उन्होंने कहा, “आपको महसूस हुआ या नहीं, मैं नहीं जानता लेकिन, मैं हमारे मित्र शिवसेना का भी आभारी हूँ।”

इसके अलावा शिवसेना द्वारा 50-50 वाले कॉन्सेप्ट पर भी फडणवीस ने साफ मना किया। उन्होंने कहा कि शिवसेना ने ऐसा फैसला किया है जिसके बारे में उन्होंने पहले कभी बात ही नहीं की। इसके लिए मैंने उद्धव ठाकरे को फोन किया था, लेकिन वो मेरी कॉल नहीं उठा रहे। मुझे दुख हैं कि हमसे बात करने की जगह उनके पास कॉन्ग्रेस और एनसीपी से बात करने का समय है।

मुख्यमंत्री के मुताबिक, मुमकिन हैं कि शिवसेना ऐसे समय में कॉन्ग्रेस-एनसीपी के साथ सरकार बनाने का फैसला लें।

शिवसेना पर इस दौरान निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि शिवसेना ने उनसे बातचीत करने के बजाए मीडिया का सहारा लिया, मीडिया पर बयान देने से सरकार नहीं बनती।

उन्होंने परिणाम आने के बाद आए उद्धव ठाकरे के बयान को भी दुर्भाग्यपूर्ण कहा। उन्होंने लिखा कि उनके पास सरकार बनाने के लिए बहुत विकल्प खुले हैं। ये हमारे लिए हैरान करने वाला था क्योंकि लोगों ने अपना मत गठबंधन को दिया था। इसलिए ये बड़ा सवाल है कि उन्होंने क्यों कहा कि उनके लिए सरकार बनाने के लिए बहुत विकल्प हैं।

‘1971 में यहाँ भारत ने गिराया था बम’ – करतारपुर में बोर्ड लगाकर पाकिस्तान भड़का रहा सिख भावना

करतारपुर कॉरिडोर मामले पर पाकिस्तान का लगातार दोमुँहा रवैया देखने को मिल रहा है। पहले खबर थी कि पाक प्रशासन करतारपुर जाने वाले लोगों की सुरक्षा से खिलवाड़ कर रहा है। लेकिन अब भारत के ख़िलाफ़ उसके द्वारा चलाए जा रहे प्रोपेगेंडा का भी सोशल मीडिया के जरिए खुलासा हुआ है।

अब जिस समय करतारपुर कॉरिडोर का उद्घाटन होने में एक दिन से भी कम का समय बचा है, उस वक्त वहाँ के परिसर में लगी एक तस्वीर सामने आई है। इसका उद्देश्य वहाँ जा रहे सिखों की भावनाओं को भड़काने के अलावा कुछ नहीं लग रहा। दरअसल, इस तस्वीर में नजर आ रहा है कि दरबार साहिब के परिसर में पाकिस्तान ने भड़काऊ पोस्टर लगाए हैं। जिसमें बताया जा रहा है कि भारत ने पवित्र गुरुद्वारे पर बम गिराए थे।

इस तस्वीर को भाजपा नेता तजिंदर सिंह बग्गा ने अपने ट्विटर पर शेयर किया है। साथ ही उन्होंने दावा किया है कि ये तस्वीर करतारपुर कॉरिडोर के परिसर की है। उनका कहना है कि इसके जरिए पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार कर रहा है।

इस तस्वीर में देखा जा सकता है कि गुरुद्वारा परिसर में एक बोर्ड लगा है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इसमें वाहेगुरु जी का चमत्कार लिखा हुआ है। साथ ही लिखा है कि भारतीय वायुसेना ने 1971 में गुरुद्वारा दरबार साहिब श्री करतारपुर साहिब पर बमबारी की थी, लेकिन वाहे गुरुजी की कृपा से गुरुद्वारे को कोई नुकसान नहीं पहुँचा।

आजादी से लेकर आज तक भारत और पाकिस्तान के बीच प्रत्यक्ष तौर पर चार युद्ध हो चुके हैं। परोक्ष तो खैर हर दिन चल रहा है। लेकिन पाकिस्तान आज तक हर बार हारा है। इसी हार की टीस को वो आज तक नहीं भुला पाया है। और अब जब भारत से 550 लोगों का जत्था करतारपुर दर्शन करने जाने के लिए तैयार है तो वो सिख भावना भड़काने के लिए भारतीय सेना के बारे में झूठ फैला रहा है।

‘मैं और एला नग्न तैरते, एनर्जी-सेंसेशन बढ़ाने को लेते थे MDMA’ – आतिश तसीर ने अपने प्यार को ऐसे किया बदनाम

प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ये बात जगजाहिर है कि किसी भी प्रेम संबंध में एक दूसरे के साथ बिताए समय का सम्मान करना सबसे अधिक महत्वपूर्ण होता है। लेकिन प्यार के हसीन क्षणों में आई नजदीकियों को किसी एक के द्वारा अपनी बपौती समझ लेना या उसे परिस्थितियों के अनुरूप अपने फायदे के लिए जगजाहिर करना, न केवल उस रिश्ते में आई करीबियों को अश्लीलता से पेश करना है बल्कि आपके साथी को भी कई सवालों के कठघरे में खड़ा कर देता है। हालाँकि, मुमकिन है कि ऐसी हरकत कोई जाहिल, दिमाग से पैदल व्यक्ति चार लोगों के बीच में शेखी बघारते हुए करता दिख जाए, पर क्या इसकी उम्मीद समाज के पढ़े-लिखे और बुद्धिजीवी तबके से की जा सकती है? शायद नहीं। लेकिन हिंदुओं के ख़िलाफ़ लगातार जहर उगलने वाले और टाइम मैगजीन में लिखने वाले पत्रकार आतिश तासीर ऐसे शख्स हैं, जो न सिर्फ ऐसा लिखते हैं बल्कि इसमें संदर्भ और संदेश ढूँढकर उसे जस्टिफाई करने का भी प्रयास करते हैं।

साल 2018 में वैनिटी फेयर नामक वेबसाइट पर आतिश तासीर का एक लेख छपा। हालाँकि, लेख का शीर्षक ऐसा था, जैसे वह ब्रिटेन के शाही केंसिंगटन पैलेस में पसरे नस्लवाद पर कुछ गंभीर अनुभव साझा करने वाले हैं। लेकिन जब लेख की शुरुआत हुई तो इसके लिए सबसे पहले उन्होंने एला एंडरसेन के साथ अपने संबंधों के बारे में बताना शुरू किया।

लेख की शुरुआत में आतिश ने बताया कि एला, केंट के प्रिंस और प्रिंसेज मिशेल की बेटी थी और एक हाउस पार्टी के दौरान उनकी मुलाकात हुई थी। आतिश के मुताबिक धीरे-धीरे दोनों में नजदीकियाँ बढ़ी और दोनों ने साथ में वहाँ 3 साल बिताए।

इस दौरान आतिश केंसिंगटन पैलेस से जुड़े रहे और दोनों के बारे में मीडिया में भी कई विवादित बाते हुईं। उनके लेख को पढ़कर लगा जैसे इस बीच वे मीडिया में आई एक हेडलाइन से आहत भी हुए थे- जो “PRINCESS PUSHY ‘DELIGHTED’ OVER HER DAUGHTER’S ROMANCE WITH INDIA’S CAPTAIN CONDOM” नाम से पब्लिश हुई थी। उन्होंने इस लेख के शीर्षक को उनके रिश्ते के लिए आपत्तिजनक बताया और नीचे अपने संबंधों की शुरुआत पर बात करने लगे। अफसोस जिस तरह के शीर्षक को लेकर आतिश ने आपत्ति जताई, उससे कहीं ज्यादा गंदगी उन्होंने अपने लेख में परोस दी।

आतिश तासीर ने लिखा कि टाइम मैगजीन में बतौर संवाददाता अपना करियर शुरू करने के बाद और लंदन ब्यूरो में शिफ्ट होने से पहले उन्होंने एला के साथ खूबसूरत वक्त गुजारा। हालाँकि, ये वक्त उन्होंने कैसे गुजारा, इसका उल्लेख आतिश ने लेख के शुरू में ही कर दिया। उन्होंने लिखा, “मैं और एला उस दौरान बकिंग्घम पैलेस में महारानी के स्विमिंग पूल में नंगे तैरते थे। दोनों ने साथ में MDMA (एनर्जी और सेंसेशन बढ़ाने के लिए लिया जाने वाला एक तरह का ड्रग) भी लेते थे।” इसके बाद आतिश अपने लेख को थोड़ा एंगल देते हैं – भावनाओं का तड़का लगा कर। वो बताते हैं कि उनके पिता एक पाकिस्तानी बिजनेसमैन और राजनेता थे, जिन्होंने उनकी माँ को उस समय छोड़ दिया था जब वो सिर्फ 2 साल के थे।

शब्दों के साथ कैसे खेला जाता है, यह पत्रकार या लेखक से बेहतर कौन समझ सकता है। लेकिन शब्दों की भी अपनी गरिमा होती है। अगर यह खबरों में एंगल देने के लिए प्रयोग की जाए तो प्रोपेगेंडा कहलाता है लेकिन आपसी संबंधी के लिए प्रयोग किए जाएँ तो नीचता कहलाती है। आतिश कैसे पत्रकार हैं, इसका तो पता नहीं लेकिन अपनी प्रेमिका के साथ अंतरंग संबंधों पर बोलकर उन्होंने साबित कर दिया कि वो नीच इंसान हैं, निहायत ही घटिया मानसिकता वाले। वे ट्विटर पर जिस तरह हर मुद्दे को गौमूत्र तक खींच लाते हैं, उसी तरह ब्रिटेन में नस्लवाद के मुद्दे को समझाते-समझाते वो अपने और एला के बीच अंतरंग संबंधों को उजागर कर देते हैं। वे बता देते हैं कि उनके और एला के बीच कैसे संबंध थे और उसमें ऊर्जा भरने के लिए वे क्या-क्या करते थे। बिना यह सोचे कि एला अब किसी और की ब्याहता है, बिना यह सोचे कि इन बातों का शायद उसके परिवार पर असर पड़ सकता है।

इस दौरान उनका इस बात से कोई सरोकार नहीं रह जाता कि वे अपने लेख में अपनी जिस प्रेमिका की पहचान उजागर करके उसके बारे में बातें कर रहे हैं, उससे सार्वजनिक पटल पर उस महिला की छवि पर क्या असर पड़ेगा? उन्हें अपने लेख में एला का संदर्भ देते हुए बिलकुल महसूस नहीं होता कि क्या उन्हें इसका अधिकार है? या फिर वो इतने बड़े स्तंभकार बन चुके हैं कि किसी की निजता को तार-तार करना उनके लिए मात्र लेख में इस्तेमाल होने वाला एक किस्सा भर है?

इस लेख में वो एला के साथ बिताए किस्से का प्रयोग करके ब्रिटिश राजघराने से संबंधित लोगों में पसरे घमंड और उनके नस्लवादी होने का उल्लेख करते हैं और अपने-एला के रिश्ते से जुड़े एक किस्से के बारे में बताते हैं। वो कहते हैं कि एक बार उन्हें प्रिसेंज मिशेल की दोस्त ने कहा था कि ब्रिटिश लोगों को ये बात बिलकुल पसंद नहीं कि कोई विदेशी आए और उनकी राजकुमारियों को चुरा (प्यार में फँसा कर) कर ले जाए। वे बताते हैं कि ब्रिटिश लोगों में चिंता, आक्रोश और नफरत के होने का मतलब ही ये था कि वो अपने शाही परिवार को कितना प्यार करते हैं। उनके लेख के मुताबिक एला और उनके रिश्ते के दौरान जो समय, उन्होंने वहाँ गुजारा उस वक्त लगभग हर कोई नस्लवादी हुआ करता था।

ये बात स्वीकार्य है कि विश्व के अधिकतर देश एक समय तक नस्लवाद से काफी काफी प्रभावित रहे हैं, अभी भी हैं और ये भी सच है कि इन मुद्दों पर अपनी बात और अपनी राय रखना बहुत महत्वपूर्ण है। लेकिन इसके लिए एक लड़की के साथ अपने संबंधों को उजागर करना और उसके साथ बिताए समय को बिना अनुमति के जगजाहिर करना, न किसी के अधिकार क्षेत्र में आता है और न ही यह नैतिक रूप से सही है। खैर आतिश तासीर से नैतिकता की उम्मीद कैसी!

हम बहुत से नाट्य प्रस्तुति और कहानियाँ पढ़ते हैं, जिसमें पूरी घटना सत्य पर आधारित होती है, लेकिन उसके पात्रों के नाम बदलकर उसकी निजता को सुरक्षित रखा जाता है और अपना मूल संदेश भी दे दिया जाता है। पर आतिश का लेख शुरुआत से ही पढ़ने पर महसूस होता है कि शायद वे अपने बौद्धिक स्तर को इस्लाम, कट्टरपंथ आदि के आगे विस्तार दे ही नहीं पाए हैं। उन्हें पता ही नहीं है कि किसी के साथ संबंध होने का अर्थ उसकी सालों बाद में बदनामी करना नहीं होता। उन्हें मालूम है तो सिर्फ़ अपने पिता की तरह भारत और हिंदुओं के लिए जहर उगलना, साथ में अपने लेख के लिए महिलाओं को एक मात्र विषय वस्तु समझना।

यह जानना भी जरूरी है कि भारत सरकार को धोखा देने के कारण अपना OCI (Overseas Citizenship of India) रद्द करवा चुके आतिश के इस लेख से इस बात का भी पता चलता है कि एला से संबंधों के दौरान उन्होंने अपने पाकिस्तान मूल के पिता होने की पहचान भी छिपाई थी और खुद को भारतीय बताया था। क्योंकि शाही पैलेस के बाहर घूम रहे पुलिस वाले जब उन्हें मिलते थे तो वह उनसे यही सवाल करते थे कि क्या तुम ही वो भारतीय शख्स हो, जो एला के साथ रह रहे हो? इसके अलावा मीडिया हेडलाइन्स में भी उस समय उनके लिए ‘इंडियन’ शब्द का ही प्रयोग होता था। ऐसा इसलिए क्योंकि आतिश की माँ भारतीय मूल की हैं।

₹820 करोड़ खर्च कर डाले कॉन्ग्रेस ने चुनाव प्रचार में… रोना ये कि फंड की कमी है!

ऐसा कहा गया कि केंद्र की सत्ता से दूर कॉन्ग्रेस फंड की कमी का सामना कर रही है। कॉन्ग्रेस पिछले दो-तीन साल से कह रही है कि उसके पास फंड्स की कमी है। लेकिन वर्तमान में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उससे कॉन्ग्रेस के फंड की कमी वाली थ्योरी सोचने पर मजबूर कर देगी।

जानकारी के मुताबिक कॉन्ग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव और अरुणाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा और सिक्किम के विधानसभा चुनावों में प्रचार अभियान के लिए 820 करोड़ रुपए खर्च किए थे। यह आँकड़ा 2014 में पार्टी द्वारा आम चुनाव के दौरान खर्च किए गए 516 करोड़ रुपए से कहीं ज्यादा है।

खुद कॉन्ग्रेस ने चुनाव आयोग को सौंपी रिपोर्ट में यह जानकारी दी है। नोटबंदी और उसके बाद आर्थिक मंदी को लेकर लगातार केंद्र और नरेंद्र मोदी सरकार पर हमलावर रही कॉन्ग्रेस ने 31 अक्‍टूबर को चुनाव आयोग के सामने अपनी डिटेल्‍स सौंपी। इसके अनुसार पार्टी ने अपने प्रचार के लिए 626.36 करोड़ रुपर्य खर्च किए, जबकि उम्‍मीदवारों पर तकरीबन 193.9 करोड़ रुपए खर्च किए। चुनावों की घोषणा से लेकर प्रक्रिया खत्‍म होने तक कॉन्ग्रेस ने कुल 856 करोड़ रुपए खर्च किए।

मई 2019 में कॉन्ग्रेस पार्टी की सोशल मीडिया हेड दिव्या स्पंदना ने मई में कहा था, “हमारे पास पैसा नहीं है।” उन्होंने कहा था कि पार्टी को सरकारी बॉन्ड के माध्यम से पर्याप्त योगदान नहीं मिल रहा है। जो पार्टी को पैसे जुटाने के लिए ऑनलाइन क्राउड सोर्सिंग का विकल्प चुनने के लिए मजबूर कर रहा है। कॉन्ग्रेस नेता शशि थरूर ने भी ट्वीट करते हुए इसका समर्थन किया था। उन्होंने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि हमें यह स्वीकार करने के बारे में शर्मिंदा होने की आवश्यकता है कि कॉन्ग्रेस फंडिंग संकट का सामना कर रहा है।”

आम चुनाव 2019 में कॉन्ग्रेस द्वारा प्रचार पर खर्च किए गए 626.36 करोड़ रुपए में से 573 करोड़ रुपए का भुगतान चेक द्वारा किया गया। केवल 14.33 करोड़ रुपए नकद में किया गया। केंद्रीय पार्टी मुख्यालय ने मीडिया प्रचार और विज्ञापनों पर 356 करोड़ रुपए खर्च किए।

लगभग 47 करोड़ रुपए पोस्टर और मतदान सामग्री पर खर्च किए गए, जबकि 86.82 करोड़ रुपए स्टार प्रचारकों की यात्रा खर्च पर किए गए। कॉन्ग्रेस ने छत्तीसगढ़ और ओडिशा में 40 करोड़ रुपए, यूपी में 36 करोड़ रुपए और महाराष्ट्र में 18 करोड़ रुपए खर्च किए। पार्टी ने पश्चिम बंगाल में लगभग 15 करोड़ रुपए और 13 करोड़ रुपए केरल में खर्च किए थे, जहाँ से राहुल चुनाव मैदान में खड़े थे।

वहीं अगर लोकसभा चुनाव में अन्य पार्टियों द्वारा खर्च किए गए रकम की बात करें तो तृणमूल कॉन्ग्रेस ने 83.6 करोड़ रुपए, बहुजन समाज पार्टी ने 55.4 करोड़ रुपए, राष्ट्रवादी कॉन्ग्रेस पार्टी ने 72. 3 करोड़ रुपए, वहीं सीपीएम ने 73.1 लाख रुपए खर्च किए। बीजेपी ने 2014 के चुनाव में 714 करोड़ रुपए खर्च किए। 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के द्वारा खर्च का ब्यौरा देना बाकी है।