राजस्थान के बारां जिला में एक अजीबोगरीब मामला सामने आया है। एक तहसीलदार का एक ही तारीख में 3 बार ट्रांसफर कर दिया गया। उसका गुनाह बस इतना था कि उसने अवैध अतिक्रमण में लिप्त नेताओं के ख़िलाफ़ कार्रवाई की थी। अवैध अतिक्रमण हटाने के एवज में एक ही तारीख में उसका 3 बार तबादला किया गया। राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है। हाल ही में बसपा के सभी विधायक कॉन्ग्रेस में शामिल हो गए थे, जिससे अशोक गहलोत सरकार की स्थिति और मजबूत हो गई है।
अगर बारां की घटना की बात करें तो यहाँ तहसीलदार फूलचंद कश्यप नाहरगढ़ उप-तहसील में भूअभिलेख निरीक्षक के पद पर कार्यरत थे। उनका तबदला कार्यवाहक नायब तहसीलदार के रूप में रविवार (सितम्बर 29, 2019) की तारीख में अटरू तहसील मुख्यालय में कर दिया गया। इसके बाद गुरुवार (अक्टूबर 3, 2019) को एक नया संशोधित आदेश आया। इसमें उनका ट्रांसफर 29 सितम्बर की ही तारीख में उपतहसील केलवाड़ा में कर दिया गया। शनिवार (अक्टूबर 5, 2019) को फूलचंद का तबादला वापस अटरू तहसील में करने का आदेश आया। इस आदेश में भी तारीख 29 सितम्बर ही बताई गई।
‘दैनिक भास्कर’ के बारां संस्करण में छपी ख़बर
एक ही तारीख में 3 ट्रांसफर ऑर्डर की वजह से जिला कलेक्ट्रट लोगों के निशाने पर है। प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए जा रहे हैं। फूलचंद ने बताया है कि भँवरगढ़ में अतिक्रमण हटाने के कारण वे नेताओं के निशाने पर आ गए हैं।
लोग इस बात को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं कि जब तहसीलदार ने कुछ ग़लत किया ही नहीं तो कार्रवाई किस बात के लिए की गई? उसने तो बस क़ानून के तहत अवैध अतिक्रमण करने वालों के ख़िलाफ़ एक्शन लिया था। अभी तक जिला प्रशासन ने इस सम्बन्ध में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है।
बांग्ला एक्ट्रेस से तृणमूल कॉन्ग्रेस (टीएमसी) सांसद बनीं नुसरत जहां अपने राजनीतिक और फिल्मी करियर से ज्यादा निजी जिंदगी को लेकर सुर्खियों में रहती हैं। शादी के बाद नुसरत जहां पहली बार नवरात्र के आठवें दिन दुर्गा पूजा में पहुँचीं। नुसरत कोलकाता के सुरुचि संघ पंडाल में पति के साथ माँ दुर्गा के दर्शन के लिए पहुँची थी। सामने आई तस्वीरों में नसुरत और उनके पति निखिल माँ दुर्गा की हाथ जोड़कर आराधना करते नजर आए। हालाँकि नुसरत की ये तस्वीरें कुछ ट्रोलर्स को पसंद नहीं आई और उन्होंने धर्म पर बहस शुरू कर दी।
दरअसल नुसरत दुर्गा पंडाल में भारतीय परिधान में पहुँचीं। तस्वीरों में नुसरत लाल और पीले रंग की साड़ी में नजर आ रही हैं। साथ ही गोल्डन ज्वेलरी के साथ सिंदूर लगाया हुआ है। नुसरत की इस तस्वीर पर सोशल मीडिया पर प्रतिक्रियाएँ आनी शुरू हो गई हैं। कई लोगों ने इस तस्वीर पर कमेंट किया कि जल्द ही कट्टरपंथियों की तरफ से नुसरत के खिलाफ फतवा जारी हो सकता है।
Madam @nusratchirps ji, Beware, you will soon face a fatwa by the islamic bigots.
Btw happy Navratri, May Mata “Mahagauri” bless you with her choicest blessings.?#durgaashtami
एक यूजर ने लिखा, “अच्छा हो अगर इन्होंने अपना धर्म बदल लिया हो।” एक अन्य यूजर ने लिखा, “सावधान रहिए। जल्द ही आपको फतवा जारी हो जाएगा। वैसे नवरात्रि की शुभकामनाएँ। माता महागौरी आप पर अपना आर्शीवाद बनाए रखें।”
मेमून अहमद नाम के एक यूजर ने इस पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लिखा, “ये न तो हिंदू का सम्मान करती है और न ही मु###न का। ये सिर्फ दोनों धर्मों का अनादर कर रही है। जब आप अपने धर्म में विश्वास रखती हैं तो आप किसी अन्य धर्म का पालन नहीं कर सकते।”
She respect Hindu nor Muslim. She just disrespecting both of religions. When you are a muslim and you believe in your religion. You just cannot follow any other religions. @nusratchirps
वहीं कुछ यूजर्स ने इसे पॉलीटिकल स्टंट बताया है। हालाँकि सासंद बनने के बाद से ही नुसरत को कभी उनके कपड़ों के लिए तो कभी दूसरे मजहब के लड़के से शादी करने के लिए लगातार ट्रोल किया जा रहा है। खैर नुसरत को इन ट्रोलर्स को हैंडल करना आता है। उन्हें किसी की बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। नुसरत कई मौकों पर कह भी चुकी हैं कि वो सोशल मीडिया पर आए कमेंट्स को इग्नोर करती हैं।
वैसे ये पहला मामला नहीं है जब उन्हें किसी वजह से ट्रोल किया जा रहा हो। अपनी शादी के बाद 25 जून को नुसरत पहली बार संसद पहुँचीं और शपथ ली। इस दौरान उनके गले का मंगलसूत्र और माँग का सिंदूर चर्चा का विषय बना। इसी के चलते नुसरत जहां के खिलाफ देवबंद के धर्मगुरुओं ने फतवा जारी कर दिया। उनका कहना है कि मजहब लड़कियों को सिर्फ मजहब लड़कों से ही निकाह करना चाहिए। उनका कहना था कि नुसरत सिंदूर कैसे लगा सकती हैं। माँग में सिंदूर देख नुसरत से ये सवाल किया जा रहा था कि क्या उन्होंने अपना धर्म बदल लिया है।
उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले में तीन लोगों द्वारा एक बंदर की गोली मारकर हत्या किए जाने के बाद से इलाक़े में साम्प्रदायिक तनाव का माहौल बन गया है। इसकी जानकारी ख़ुद पुलिस ने दी। दरअसल, हिंदू मान्यता के अनुसार बंदर को भगवान हनुमान का रूप माना जाता है और इसे चोट पहुँचाना पाप माना जाता है।
“तीन भाइयों- आसिफ़, हाफिज़ और अनीस के ख़िलाफ़ एक प्राथमिकी दर्ज कर ली गई है, जो शनिवार को कथित रूप से बंदर के इर्द- गिर्द घूम रहे थे और उनमें से एक ने परिवार के चार लाइसेंसी हथियारों में से एक से बंदर को गोली मार दी।”
पुलिस के अनुसार, बंदर की पीठ पर गोली लगी और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई। वन विभाग के अधिकारी मौके पर पहुँचे और बंदर के शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया, जिसके बाद उसे दफ़ना दिया गया। वन विभाग ने वन्यजीव सुरक्षा अधिनियम-1972 की धाराओं में मामला दर्ज किया है, जिसके अंतर्गत छ: महीने की जेल और जुर्माने का प्रावधान है। हालाँकि, इस मामले में अभी तक किसी की गिरफ़्तारी नहीं हुई है।
घटना के बाद बजरंग दल के स्थानीय कार्यकर्ताओं ने विरोध-प्रदर्शन किया और ख़बर फैलते ही उनके साथ ग्रामीण भी जुड़ गए। बजरंग दल की युवा इकाई के जिला अध्यक्ष सन्नी सरोहा ने कहा, “अल्पसंख्यक समुदाय के तीन युवकों ने बंदर को गोली मार दी। उन्होंने कुछ आपत्तिजनक बयान भी दिए हैं। हम उन्हें तत्काल गिरफ़्तार किए जाने और उनके हथियारों के लाइसेंस रद्द करने की माँग करते हैं।” स्थिति को देखते हुए क्षेत्र में अतिरिक्त बल तैनात कर दिया गया है।
ख़बर के अनुसार, आरोपित का कहना है कि इलाक़े में बंदरों ने काफी परेशान किया हुआ है। यह काफ़ी नुकसान कर चुके हैं और परिवार के सदस्यों को भी चोट पहुँचा चुके हैं। फ़िलहाल, पुलिस ने आरोपित युवक और उसके भाई के नाम जारी लाइसेंसी हथियार समेत कारतूस ज़ब्त कर लिए हैं।
पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान को एक बार फिर से झटका लगा है। संयुक्त राष्ट्र में इमरान खान के रवैये और उनके भाषण को लेकर आलोचनाएँ हो रही हैं। यूपोरियन थिंक टैंक ने पाकिस्तानी पीएम इमरान खान की संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में दिए गए भाषण को लेकर कहा कि पाकिस्तान के पिछले रवैये की तरह ही पाकिस्तानी पीएम इमरान खान ने एक बार फिर से यह साबित कर दिया है कि वह जम्मू-कश्मीर के लोगों के सच्चे दोस्त नहीं हैं। वे बस उनके लिए धोखा करते हुए विरोध और गुस्से का दिखावा कर रहे हैं।
एम्सटर्डम स्थित यूरोपीय फाउंडेशन फॉर साउथ एशिया स्टडीज ने कहा है कि यूएनजीसी के भाषण में इमरान खान ने अपने भाषण में जम्मू-कश्मीर, आतंकवाद, कश्मीरी जैसे शब्दों का सबसे ज्यादा बार इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि इमरान खान ने बड़़ी ही चालाकी से अपने भाषण के जरिए कश्मीरी युवाओं को भड़काने का काम किया है। इतना ही नहीं उन्होंने बड़ी चालाकी से परमाणु युद्ध की धमकी भी दे दी।
आगे उन्होंने कहा कि एक महत्वपूर्ण पक्ष जो कि इमरान खान ने फिर भी नहीं खोला, वह यह है कि आखिर किसने उन्हें कश्मीरियों को खून बहने के लिए डराने और उनकी जिंदगियों को खत्म किए जाने का डर दिखाने का अधिकार दिया?
European think-tank calls Imran Khan’s speech at UNGA ‘unmistakable bluster’
थिंक टैंक ने कहा अगर इस सवाल को लेकर इमरान खान का जवाब पाकिस्तानी सेना है, तो इस मामले में लगभग-लगभग सच्चाई है। यह उनके लिए मान लेने का वक्त है कि पाकिस्तानी जनता की आँखों पर कश्मीर का पर्दा डालकर उन्हें मजबूती का दिखावा करने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि ये बीते जमाने की बात है।
गौरतलब है कि 27 सितंबर को संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली के 74वें अधिवेशन में अपने भाषण के दौरान इमरान खान ने 15 मिनट के बजाए करीब 50 मिनट तक भाषण दिया। उन्होंने अपने भाषण में भारत के खिलाफ काफी जहर उगला, परमाणु हमले की बात कही। कश्मीरी युवाओं को भड़काने की कोशिश की। इस दौरान उन्होंने दुनिया के दूसरे बोलने वाले वक्ताओं का भी ख्याल नहीं रखा।
थिंक टैंक ने कहा कि खान ने अपने भाषण के दौरान अच्छा खासा समय इस्लामोफोबिया के लिए पश्चिमी देशों पर आरोप लगाने में खर्च किया था। और लोगों को इस्लाम और उसके मानने वालों के बारे में समझाने की बात कही थी।
जम्मू कश्मीर में सब कुछ कैसा चल रहा है? मीडिया के एक वर्ग की मानें तो सरकार वहाँ के लोगों की आवाज़ दबा रही है क्योंकि सब कुछ शांत सा है। अंतरराष्ट्रीय मीडिया की मानें तो लोग भारतीय सेना से ही सहमे हुए हैं। सरकार बार-बार स्पष्ट कर चुकी है कि पाबंदियाँ हटाई जा चुकी हैं और जनजीवन सामान्य है। रवीश कुमार की मानें तो इंटरनेट पर प्रतिबन्ध से छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म नहीं भर पा रहे। वामपंथी गिरोह की मानें तो जम्मू कश्मीर में वहाँ की जनता पर अत्याचार किया जा रहा है। पाकिस्तान झूठा दावा करता रहा है कि कर्फ्यू लगा कर वहाँ के नागरिकों का दमन किया जा रहा है। आख़िर में फिर वही सवाल। सच क्या है?
यही जानने के प्रयासों के क्रम में हमारी बात डीएमसीएच (दरभंगा मेडिकल कॉलेज ऐंड हॉस्पिटल) में कार्यरत एक डॉक्टर से हुई, जो हाल ही में जम्मू कश्मीर से लौटे हैं। डॉक्टर प्रशांत वत्स हाल ही में ‘नेशनल मेडिकोज आर्गेनाईजेशन’ संगठन के बैनर तले कश्मीर गए थे। वह वहाँ सामाजिक कार्यों से गए थे, नागरिकों को मेडिकल सुविधाएँ मुहैया कराने। एक आम भारतीय की तरह अनुच्छेद 370 को निरस्त किए जाने वाले फ़ैसले को लेकर उनके मन में भी उत्सुकता थी। कुछ सवाल थे। हालाँकि, उनके मन में कुछ आशंकाएँ भी थीं लेकिन ये भाव भी था कि आख़िर कश्मीरी भी तो अपने हैं, भारतीय हैं। ऐसे में वह देश-सेवा का भाव लिए निकल पड़े।
जब उनकी फ्लाइट राजधानी श्रीनगर में लैंड हुई, तब शाम के 4.30 बज चुके थे। आपको पता ही है कि राज्य में अभी इंटरनेट पर प्रतिबन्ध है और मोबाइल सेवाओं पर भी फ़िलहाल रोक लगाई गई है। हाँ, संपर्क के लिए लैंडलाइन की व्यवस्था है। इसीलिए कॉल करने के लिए डॉक्टर प्रशांत ने टूरिस्ट रिसेप्शन सेंटर पर उपलब्ध लैंडलाइन सेवा का इस्तेमाल किया। इस दौरान उन्होंने हालात के बारे में अधिक जानकारी लेने के लिए वहाँ उपस्थित सुरक्षा बलों के अधिकारियों से बातचीत भी की। इसके बाद जम्मू कश्मीर में पर्यटन घटने का रोना रोने वालों की पोल खुल गई।
जवानों ने बताया कि टूरिस्ट सेवाओं में कोई रुकावट नहीं आई है और पर्यटक भले ही कम आ रहे हों लेकिन उन पर कोई पाबंदियाँ नहीं लगाई गई हैं। हाँ, टूरिज्म कम होने से स्थानीय लोगों पर ज़रूर असर पड़ा है। मीडिया का गिरोह विशेष लगातार ये चला रहा था कि बाहर से आए लोगों को जम्मू कश्मीर में फटकने भी नहीं दिया जा रहा और उन्हें एयरपोर्ट से ही वापस कर दिया गया। जबकि, वहाँ दिन-रात स्थिति पर नज़र रख रहे जवानों ने बताया कि पर्यटकों के घूमने-फिरने पर कोई पाबन्दी नहीं है। दूसरा मिथक यह भी फैलाया गया था कि राज्य में परिवहन व्यवस्था ठप्प हो गई है और लोगों को कहीं भी आने-जाने में काफ़ी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। मीडिया गिरोह ने ख़बरें चलाई थीं कि आवागमन ठप्प हो गया है।
डॉक्टर प्रशांत जब एयरपोर्ट से बाहर निकले तो गिरोह विशेष द्वारा फैलाया गया ये झूठ भी बेनक़ाब हो गया। उन्होंने देखा कि टैक्सी सेवाएँ पूरी तरह से चालू थी। हाँ, टैक्सियों की संख्या थोड़ी कम ज़रूर थी लेकिन इतनी भी नहीं कि लोगों को कहीं आने-जाने के लिए दिक्कतों का सामना करना पड़े। एयरपोर्ट पर डॉक्टर प्रशांत और उनकी टीम को रिसीव करने लोग आए हुए थे। आवागमन की सुविधाओं के बारे में बात करते हुए डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि अगर रिसीव करने के लिए लोग नहीं भी आते तो भी वे सही गंतव्य तक पहुँच जाते क्योंकि टैक्सियाँ चल रही थीं।
डॉक्टर प्रशांत ने अपने अनुभव साझा करते हुए ऑपइंडिया को बताया कि मीडिया के एक गिरोह विशेष की पूरी रोजी-रोटी ही जम्मू कश्मीर को लेकर झूठा प्रोपेगंडा फैलाने से चलती है। एयरपोर्ट से आगे बढ़ते ही उन्हें एक पार्क में तिरंगा झंडा लहराता दिखा- पूरे शान के साथ। गर्व से भरे डॉक्टर प्रशांत पंडित श्यामा प्रसाद मुखर्जी के स्वप्न ‘एक देश, एक निशान’ को याद कर अभिभूत हो उठे। वो बताते हैं कि कश्मीर में तिरंगे को यूँ लहराते देख उनका मन गाड़ी से उतर कर झंडे को सलामी देने के लिए मचल उठा। हाँ, उन्होंने ये ज़रूर देखा कि जम्मू कश्मीर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी है और सुरक्षा बल एहतियातन काफ़ी सावधानी बरत रहे हैं।
श्रीनगर के एक पार्क में लहराते तिरंगे को देख कर डॉक्टर वत्स को बरबस ही श्यामा प्रसाद मुखर्जी का ‘एक देश, एक निशान’ याद आ गया
डॉक्टर प्रशांत ने जम्मू कश्मीर में लगभग 5 दिन गुजारे और उन्हें कहीं कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई। वह 27 सितम्बर से 1 अक्टूबर तक वहाँ रहे। उन्होंने बताया कि मीडिया के लोग केवल श्रीनगर के पॉश इलाक़ों से रिपोर्टिंग करते हैं और इसे ही पूरे कश्मीर के सन्दर्भ में पेश करते हैं। डॉक्टर प्रशांत और उनकी टीम ने जगह-जगह कैम्प लगाए, लोगों को ज़रूरी बातें बताईं और मुफ्त मेडिकल सुविधाएँ दी। इस दौरान उनकी टीम ने श्रीनगर, बडगाम और बारामूला में कैम्प लगाया। उन्होंने कुंजर में भी कैम्प लगाया, जो संवेदनशील इलाक़ों में से एक है। इस दौरान उन्होंने स्थानीय नागरिकों और अलगाववादियों तक से बातें की।
डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि श्रीनगर में कट्टरपंथियों की धमकी के कारण व्यापारियों के काम में बाधा आ रही है। वे स्थानीय दुकानदारों को दुकानें न खोलने को कहते हैं, जिससे बाजार पर असर पड़ा है। इन धमकियों के कारण दुकानदार कभी-कभार शाम के समय दुकानें खोलते हैं। स्थानीय इस्लामिक कट्टरपंथियों के डर से व्यापारियों को घाटा हो रहा है। उन्होंने बताया कि कई बड़े मॉल और शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अलगाववादी नेताओं के स्वामित्व वाले ही हैं। अब जाहिर सी बात है अलगाववादी अपनी बाजार व दुकानें नहीं ही खोलेंगे ताकि मीडिया में न्यूज़ जाए कि सब कुछ ठप्प पड़ा हुआ है और इससे सरकार पर ही दबाव बनेगा। ख़ुद अलगाववादी नेता गिलानी का भी एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है।
श्रीनगर का लाल चौक: मीडिया के एक बड़े वर्ग के लिए पूरा कश्मीर यही है
डॉक्टर प्रशांत ने अपने कश्मीर के हालिया अनुभवों के आधार पर इस नैरेटिव को नकार दिया कि ‘कश्मीर में सुरक्षा बलों के कारण दुकानें नहीं खुल रहीं।’ स्थानीय नागरिकों की बात करते हुए डॉक्टर प्रशांत ने बताया कि राज्य में अधिकतर नागरिकों को अनुच्छेद 370 के बारे में कुछ मालूम भी नहीं है और वे बस इस बात से चिंतित हैं कि पर्यटन कब सामान्य होगा। उन्होंने बताया कि डल झील और गुलमर्ग में पर्यटन काफ़ी कम हो गया है। उन्होंने बताया कि अलगाववादी हवाला से रुपए लेकर दुकानदारों व रेहड़ी वालों को बाँटते हैं और बदले में उन्हें दुकानें बंद रखने को कहते हैं। अलगाववादी दुकानें बंद रखने वाले लोगों के घाटे की भारपाई करते हैं।
कई कश्मीरी लोगों ने डॉक्टर प्रशांत से कहा कि वे अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को निरस्त किए जाने का स्वागत करते हैं। जबकि कई लोगों में ऐसी भावना है कि वे कश्मीर को समुदाय विशेष बहुल बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इसके उलट, जो लोग भारत के अन्य हिस्सों में पढ़ाई करके आए हैं, वे चाहते हैं कि कश्मीर भी भारत के बाकि राज्यों की तरह बने। उन्होंने बताया कि उन्हें टैक्सी में जो ड्राइवर मिला, वो भी पत्थरबाजी किया करता था। कश्मीर में यूपी-बिहार से लाखों लोग काम करने जाते हैं और उनकी कमाई भी अच्छी होती है। राज्य में मिस्त्री, कचड़ा उठाने और मोची वगैरह जैसे काम में अधिकार बिहारी लोग ही हैं।
डॉक्टर प्रशांत कहते हैं कि जम्मू कश्मीर में हिन्दुओं का बसना अत्यावश्यक है क्योंकि इससे वहाँ की डेमोग्राफी में बदलाव आएगा। राज्य अगर ऐसी व्यवस्था कर पाए तो हिंदू और दूसरे मजहब वाले एक-दूसरे को जान-समझ पाएँगे, आपसी द्वैष और टकराव की स्थिति को खुद ही नकार पाएँगे। उन्होंने बताया कि भारतीय सेना पत्थरबाजों की पहचान कर के उन्हें राज्य से बाहर भेज रही है ताकि शांति-व्यवस्था बहाल की जा सके। डॉक्टर प्रशांत वत्स इस बात को लेकर आशान्वित हैं कि कश्मीर के लोग कुछ दिनों बाद ख़ुद अलगाववादियों के चंगुल से बाहर निकलेंगे और रुपए ख़त्म होने के साथ ही दुकानें खोलने लगेंगे। उनका आकलन है कि कश्मीर के लोग जब भारत के अन्य हिस्सों को देखेंगे-समझेंगे और वहाँ के लोगों के रहन-सहन को जानेंगे, तब वे भी अलगाववादियों की करतूतों का विरोध करने लगेंगे।
उन्होंने बताया कि जम्मू कश्मीर में सरकारी दुकानें खुली हुई हैं। फ्लाइट के टिकट की बुकिंग के लिए श्रीनगर में 5 काउंटर्स बने हुए हैं और इंटरनेट बंद रहने के कारण लोग वहीं जाकर बुकिंग करते हैं। डॉक्टर वत्स का मानना है कि जम्मू कश्मीर के सामान्य नागरिक अच्छे हैं। हर 50-100 मीटर की दूरी पर सेना और सीआरपीएफ के जवान तैनात हैं। उन्होंने बताया कि कई दुकानदारों ने पिछले दरवाजें से दुकानें खोल रखी थीं। सुबह 7 बजे दुकानें खुलने के बाद लोग 10 बजे तक रोजमर्रा की ज़रूरत की चीजें ख़रीद कर घर में रख लेते हैं। फिर शाम को कुछ देर के लिए दुकानें खुलती हैं।
पर्यटन में कमी आई है लेकिन पर्यटकों पर कोई पाबंदियाँ नहीं हैं (चित्र: डॉक्टर प्रशांत वत्स गुलमर्ग के पास)
अगर सरकार की बात करें तो डॉक्टर प्रशांत वत्स मानते हैं कि सरकार जम्मू कश्मीर के लोगों की तमाम दिक्कतों से निपटने में काफ़ी मदद कर रही है। उन्होंने रास्ते पर आलू और प्याज से लदे कई ट्रक देखे, जो प्रशासन ने नागरिकों के लिए मँगाए थे। इससे पता चलता है कि सरकार महँगाई को लेकर भी गंभीर है और लगातार इस प्रयास में लगी है कि लोगों को रोजमर्रा की ज़रूरत की चीजें मुहैया कराने में दिक्कतें न आएँ। डॉक्टर प्रशांत वत्स के ग्राउंड पर के अनुभवों से न सिर्फ़ मीडिया के गिरोह विशेष की पोल खुलती है, बल्कि वामपंथियों व विपक्षियों के एक धड़े के झूठे दावे भी बेनक़ाब हो जाते हैं।
(यह लेख DMCH में कार्यरत डॉक्टर प्रशांत वत्स से ऑपइंडिया की बातचीत के आधार पर तैयार की गई है। डॉक्टर वत्स MBBS की पढ़ाई पूरी कर चुके हैं और ‘दरभंगा मेडिकल कॉलेज एन्ड हॉस्पिटल’ में कार्यरत हैं। वह कश्मीर दौरे से वापस बिहार लौट आए हैं।)
राजस्थान के करौली से 14 साल की दलित बच्ची का उसके भाई के सामने यौन उत्पीड़न करते हुए वीडियो बनाकर वायरल करने का मामला सामने आया है। पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तार कर लिया है। कहा जा रहा है मामला 10 दिन पुराना है लेकिन शनिवार को घटना का वीडियो वायरल होने के बाद इस पर संज्ञान लिया गया।
मीडिया में आई खबरों के अनुसार दलित बच्ची अपने रिश्ते में भाई के साथ पहाड़ों पर स्थित मंदिर जा रही थी, जब उसे वहाँ 4-5 अज्ञात लोग मिले। इन लोगों ने पहले लड़की के भाई को पकड़ा और फिर लड़की से छेड़खानी करने लगे। लड़की ने उन युवकों से उन दोनों को छोड़ने की विनती की। लेकिन, आरोपित युवकों में से एक उनकी सुननी के बजाए अपना मोबाइल फोन निकालकर पूरी घटना की रिकॉर्डिंग करने लगा। वहीं, दूसरा युवक लड़की का दुपट्टा खींचते हुए उसे उसके कपड़े हटाने को बोलने लगा।
वायरल हुए इस वीडियो में देखा गया कि ये युवक दोनों भाई-बहन के साथ बदसलूकी, गाली-गलौच एवं मारपीट कर रहे हैं और दोनों पीड़ित सिर्फ़ उनके पाँव पकड़कर उनसे उन्हें छोड़ने की गुहार लगा रहे हैं।
Yet another horror story, this time from Rajasthan. 14-year old Dalit girl sexually harassed, video-filmed, three accused arrested https://t.co/xGvDUDNTts
वीडियो के सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद भरतपुर संभाग के आईजी लक्ष्मण गौड़ ने जिला एसपी सहित सभी थाना अधिकारियों को वीडियो में दिखाई दे रहे आरोपित युवकों की फोटो के आधार पर तलाश करने का निर्देश दिया। इसके बाद पुलिस ने लगातार अलग-अलग स्थानों पर छानबीन की। जाँच में मालूम हुआ कि वायरल वीडियो करौली के कोटे गाँव स्थित कुंडा वाले बालाजी के पास की पहाड़ी का है और तीनों आरोपित भी वहीं कोटे गाँव के निवासी हैं।
पहाड़ी स्थान पर युवक-युवती से मारपीट और बदतमीजी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद हरकत में आई पुलिस ने घटनास्थल का पता लगाकर 3 आरोपियों को हिरासत में लिया है. https://t.co/2i1ASUTyNm
भरतपुर डीआईजी लक्ष्मण गौड़ ने मामले के संबंध में बताया है कि लड़की का बयान लेकर एफआईआर दर्ज कर ली गई है और वीडियो में नजर आने वाले युवकों की गिरफ्तारी हो चुकी है।
यहाँ बता दें कि पुलिस ने आरोपितों के ख़िलाफ़ आईपीसी की धारा 354, 506, 354बी, आईटी एक्ट, एसएसी-एसटी एक्ट और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया है। पुलिस का कहना है कि वीडियो इंटरनेट पर डाले जाने के डर से पीड़ित बच्ची ने इस बारे में किसी को नहीं बताया कि उसके साथ क्या हुआ।
उल्लेखनीय है कि करौली का ये मामला बिलकुल यूपी के कौशांबी जैसा ही मालूम पड़ रहा है। जहाँ दलित लड़की का बलात्कार करते हुए उसका वीडियो बनाया गया था। बाद में वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद मामला संज्ञान में आया था। जिसमें पुलिस ने मोहम्मद आदिल, मोहम्मद आदिक और मोहम्मद नाजिम को गिरफ्तार किया गया। उस घटना के वायरल वीडियो में साफ़ सुना जा सकता था कि बच्ची उन युवकों से रो रोकर कह रही थी, “अल्लाह की कसम, मेरे साथ ऐसा मत करो।”
केरल से एक बेहद ही सनसनीखेज मामला सामने आया है। 14 साल के भीतर एक महिला ने अपने परिवार के 6 सदस्यों की साइनाइड देकर हत्या कर दी। पुलिस ने इस मामले में शनिवार (अक्टूबर 5, 2019) को 47 वर्षीय महिला को गिरफ्तार किया है। पुलिस ने बताया कि आरोपित महिला को उसके पति, सास-ससुर और परिवार के तीन अन्य सदस्यों की हत्या करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया है। हत्याओं में शामिल उसके दो कथित साथियों को भी गिरफ्तार किया गया है।
कोझीकोड जिले के एसपी केजी साइमन ने बताया कि कूडाथई गाँव की जॉली जोसेफ ने परिवार के सभी 6 सदस्यों की हत्या करने का गुनाह कबूल कर लिया है। एसपी केजी साइमन ने कहा कि जॉली की गिरफ्तारी उसके 40 वर्षीय पति रॉय थॉमस की हत्या के मामले में हुई है, जिसमें पुलिस को 2011 में शव परीक्षण के दौरान हत्या के कुछ वैज्ञानिक साक्ष्य मिले थे।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट में थॉमस के शरीर में साइनाइड की मौजूदगी का पता चला था। केस की जाँच का निरीक्षण कर रहे एसपी केजी साइमन ने बताया, “हमने पाया कि परिवार के 5 अन्य लोगों की मौत भी एक ही परिस्थिति में हुई थी। इन सभी स्थितियों को देखते हुए हमारा ध्यान जॉली की तरफ गया। उसने हत्या करने की बात कबूल ली है।”
जानकारी के मुताबिक, ये रहस्यमय मौतें 2002 से लेकर 2016 के बीच हुईं थी। मगर पुलिस ने मृतक बुजुर्ग दंपति के दूसरे बेटे रोजी की शिकायत के बाद केवल दो महीने पहले जाँच शुरू की है। रोजी संयुक्त राज्य अमेरिका में रहता है। उसे 2011 में हुई अपनी भाई की मौत को लेकर संदेह था।
बता दें कि कूडाथाई गाँव के पोन्नम्तमम परिवार में पहली मौत 57 वर्ष की एक सेवानिवृत्त शिक्षिका अन्नामा थॉमस की हुई थी। वह सूप पीने के बाद गिर गईं और अस्पताल में भर्ती होने से पहले ही उनकी मृत्यु हो गई। इसके 6 साल बाद 2008 में अन्नामा के पति टॉम थॉमस भी खाने के बाद गिर गए और उनकी मौत हो गई। वो 66 साल के थे। उस दौरान दोनों मौतों को कार्डियक अरेस्ट माना गया था।
उनकी मृत्यु के बाद बेटे थॉमस रॉय ने भी खाने के तुरंत बाद उल्टी शुरू कर दी थी। उन्हें अस्पताल में मृत घोषित कर दिया गया। उस वक्त रॉय के मामा 68 वर्षीय एम मैथ्यू ने पोस्टमॉर्टम पर काफी जोर दिया। जिसके बाद जाँच में रॉय के शरीर में साइनाइड मिलने की पुष्टि हुई। लेकिन, इसके बाद अगली मौत मैथ्यू की ही हो गई।
2014 में जॉली (आरोपित महिला) मैथ्यू के घर के पास ही रहती थी। उसने अचानक शोर मचाया कि मैथ्यू बेहोश होकर अपने घर में गिर गए हैं। इस दौरान मैथ्यू की पत्नी घर से बाहर थी। स्थानीय लोग मैथ्यू को लेकर अस्पताल गए, मगर तब तक उनकी मौत हो चुकी थी।
जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 को हटाने के बाद से ही आतंकी संगठन भारत में बड़े हमले की साज़िश रच रहे हैं। पाकिस्तान के आतंकी संगठनों ने कश्मीर में अपने मॉड्यूल को फिर से सक्रिय कर दिया है। इन आतंकवादियों को मुँहतोड़ जवाब देने के लिए भारतीय सेना भी काफ़ी मुस्तैदी है। रविवार (6 अक्टूबर) को भारतीय सुरक्षा बल ने उत्तरी कश्मीर के बारामूला सेक्टर से जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी मोहसिन मुस्ताक को गिरफ़्तार किय। सुरक्षा बल को आतंकी के पास से काफ़ी मात्रा में गोला-बारूद और हथियार भी मिले।
Kashmir Police: One active terrorist arrested in Baramulla. He is affiliated with proscribed terror outfit Jaish e Mohammad. Arms & ammunition recovered. Case registered. Investigation in progress
जानकारी के अनुसार, सुरक्षा बलों को एक घर में आतंकी के छिपे होने की सूचना मिली। सूचना के आधार पर सर्च ऑपरेशन चलाया गया और जैश आतंकी को गिरफ़्तार कर लिया गया। आतंकी के पास से एक पिस्टल, 17 गोलियाँ, 1 मैग्ज़ीन बरामद हुई है। फ़िलहाल, पकड़े गए आतंकी से पूछताछ जारी है। इससे पहले भी जैश का एक और आतंकी पकड़ा गया था।
ख़बर के अनुसार, अमेरिकी एजेंसी से मिले इनपुट के मद्देनज़र सुरक्षा एजेंसियाँ हाई अलर्ट पर हैं, जिसमें कहा गया है कि जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद-370 निष्क्रिय किए जाने के बाद आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट (ISI) प्रायोजित आतंकी हमले हो सकते हैं। गृह मंत्रालय के आला अधिकारियों के मुताबिक़, दिल्ली और मुंबई में सभी प्रमुख एयरपोर्ट, बंदरगाह, प्रमुख प्रतिष्ठानों और सरकारी दफ़्तरों पर सुरक्षा सख़्त कर दी गई है।
खबरों के मुताबिक रविवार सुबह चार से पांच आतंकियों ने बारामूला सेक्टर में घुसपैठ की कोशिश की। हालॉंकि सुरक्षाबलों ने उनके मंसूबों को कामयाब नहीं होने दिया। सुरक्षा बल लगातार नियंत्रण रेखा पर नजरें जमाए हुए हैं और आतंकियों की हर नापाक हरकत का मुंहतोड़ जवाब दे रहे हैं।
कश्मीर राग अलापते-अलापते पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान की खुद की कुर्सी पर खतरा मंडराने लगा है। जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम के प्रमुख फजलुर रहमान ने उनकी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए आजादी मार्च का ऐलान किया है। इधर, पीओके में भी इमरान के तेवर ढीले पड़ने लगे हैं। उन्होंने शनिवार को यहॉं जुटे अलगाववादियों को नियंत्रण रेखा पार नहीं करने की चेतावनी दी।
जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद-370 को हटाने के बाद से ही पाकिस्तान तिलमिलाया हुआ है। दुनिया भर में वह कश्मीर पर प्रोपगेंडा फैलाने की कोशिश कर रहा है। हालॉंकि उसे इस दिशा में कोई खास समर्थन अब तक नहीं मिल पाया है। डॉन की ख़बर के अनुसार, पेशावर में शनिवार (5 अक्टूबर) को प्रेस कॉन्फ्रेन्स कर फ़ज़लुर रहमान ने अपने ‘आज़ादी’ मार्च को इमरान सरकार के ख़िलाफ़ जंग करार दिया।
बेहद तल्ख़ अंदाज़ अपनाते हुए उन्होंने कहा कि यह जंग तब तक जारी रहेगी जब तक इमरान ख़ान की सरकार चली नहीं जाती। उन्होंने 27 अक्टूबर को सरकार के ख़िलाफ़ एक मार्च निकालने की घोषणा भी की। उन्होंने कहा,
“हमारी रणनीति एकसमान नहीं रहेगी। हम किसी भी स्थिति से निपटने के लिए इसमें बदलाव करते रहेंगे। पूरे देश से लोगों का जनसैलाब इस मार्च में भाग लेने आ रहा है और फ़र्ज़ी शासक इसमें एक तिनके की तरह डूब जाएँगे।”
यह पूछे जाने पर कि क्या उन्हें इसके लिए अन्य विपक्षी पार्टियों का समर्थन मिल रहा है, उन्होंने कहा, “मैं उन्हें मार्च में देखने की उम्मीद करता हूँ। सभी पार्टियाँ इस बात को लेकर सहमत हैं कि बीते वर्ष हुआ चुनाव फ़र्ज़ी था और दोबारा चुनाव कराए जाने चाहिए, उन्हें निश्चित ही हमारे मार्च में शामिल होना चाहिए।”
कट्टरपंथी नेता फजलुर रहमान की चुनौती से पहले पाकिस्तान के आर्मी चीफ जनरल कमर जावेद बाजवा अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर कारोबारियों संग मीटिंग करते दिखे थे। कुर्सी पर बढ़ते खतरे के बीच कश्मीर पर भी इमरान के तेवर ढीले पड़ते जा रहे हैं।
शनिवार को ट्वीट में उन्होंने पीओके के लोगों से कहा, “AJK (पाक अधिकृत कश्मीर) में कश्मीरियों के गुस्से को मैं समझता हूँ। उन्हें सीमा पार के अपने साथियों की चिंता है, लेकिन किसी भी व्यक्ति का मानवीय सहायता के लिए एलओसी पार करना भारत के नैरेटिव को मजबूत करेगा।”
a narrative that tries to divert from the indigenous Kashmiris’ struggle against brutal Indian Occupation by trying to label it as “Islamic terrorism” being driven by Pakistan. It will give India an excuse to increase violent oppression of Kashmiris in IOJK & attack across LoC
एक अन्य ट्वीट में उन्होंने लिखा कि कोई भी एलओसी पार करेगा तो उसे दुनिया के सामने पाकिस्तान प्रायोजित इस्लामी आतंकवाद करार दिया जाएगा। उन्होंने अपने लोगों को भारत द्वारा किए गए स्ट्राइक की याद दिलाते हुए कहा कि भारत स्ट्राइक करने से पीछे नहीं हटेगा। जरूरत पड़ने पर वो एलओसी के पार भी हमला कर सकता है। इसके साथ ही उन्होंने अलगाववादियों से वापस जाने का भी अनुरोध किया है।
दरअसल, जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने वाले अनुच्छेद 370 के निरस्त किए जाने के लगभग 2 महीने बाद भी पाकिस्तान लगातार कश्मीर में घुसपैठ कराने की कोशिश में है। जानकार के अनुसार, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में एलओसी के पास सैकड़ों पाकिस्तानी इकट्ठा हो गए हैं, जो भारत को ‘आजादी मार्च’ के लिए घुसपैठ कराने के लिए तैयार हैं। इस रैली का आयोजन अलगाववादी समूह जम्मू और कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (JKLF) के नेता यासीन मलिक के समर्थकों ने किया है। इस रैली का उद्देश्य पीओके से शुरू होकर एलओसी को पार करना है।
पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, सैकड़ों प्रदर्शनकारी पीओके के मुजफ्फराबाद में इकट्ठा हुए हैं और वो एलओसी पार करके श्रीनगर पहुँचने की फिराक में हैं। जेकेएलएफ के प्रवक्ता रफीक डार ने पाकिस्तानी न्यूज़ एजेंसी से बात करते हुए कहा कि एलओसी पार करने के लिए पाकिस्तानियों के पास सभी ‘कानूनी अधिकार’ हैं क्योंकि वे “कश्मीरियों के विभाजन को मान्यता नहीं देते हैं”। इतना ही नहीं, उन्होंने तो पाकिस्तानी सैनिकों से उन्हें घुसपैठ करने की अनुमति देने की भी अपील की है।
खबरों के अनुसार, पीओके में 50 महिलाओं समेत 500 से अधिक लोग इकट्ठा हुए हैं और एलओसी पार करने के लिए ‘शांतिपूर्ण मार्च’ करने वालों की कुल संख्या 3,000 के करीब है।
नीतीश कुमार जब पहली बार मुख्यमंत्री बने थे, तो उन्होंने एक लक्ष्य यह तय किया था कि सड़क मार्ग से राज्य के किसी भी कोने से पटना पहुँचने में 6 घंटे से अधिक न लगे! बाकी का तो पता नहीं, हाँ इस बीच उन्होंने ऐसी पुरजोर व्यवस्था जरूर कर दी कि पटना से दरभंगा जैसी 3 घंटे में खत्म होने वाली दूरियाँ 6 घंटे से कम में खत्म न हो।
लालू प्रसाद के जंगलराज पर अब सिर पीटने का फायदा नहीं। लब्बोलुआब यह कि जब जगन्नाथ मिश्र से लालू और फिर उनसे नीतीश बाबू ने बेटन संभाला, तो लोगों की उम्मीदें बेपनाह उछलीं। सड़कों को लेकर केंद्र की वाजपेयी सरकार का काम (बाद में मोदी सरकार ने बढ़ाया) ही है कि दरभंगा से मुजफ्फरपुर अब एक घंटे में आदमी पहुँचता है। वरना वे दिन भी देखे हैं, जब हम 20 किमी प्रति घंटे की मारक रफ्तार से तीन घंटे में मुजफ्फरपुर पहुँचते थे।
1997 में मैं दरभंगा छोड़कर दिल्ली के लिए निकला। मुझे तब से गाँधी-सेतु की मरम्मत और उसके पुनर्निर्माण का हल्ला सुनने को मिला। कुल पाँच किलोमीटर का सेतु पिछले तीन दशकों में नहीं बन सका और वह ऐसा कोढ़ है कि पटना पहुँचने का औसत समय तीन घंटे बढ़ा दे। आप वहाँ अगर जाम में नहीं फँसे, तो आपका सौभाग्य है। अभी जंगलराज-2 में युवा उप-मुख्यमंत्री ने पीपा पुल का उद्घाटन किया था, अब वो गंगा की गोद में है।
2005 से हाजीपुर का ओवरब्रिज बन रहा है, अब तक खत्म नहीं हुआ। पूरे देश के इंजीनियर्स से अलहदा बिहारियों का हाल है। सोनपुर वाले पुल पर चढ़ कर देखिएगा। उसकी चौड़ाई न जाने क्या सोच कर भाई लोगों ने उतनी कम रखी है। पटना के ओवरब्रिज देखिए। आपका मन करेगा कि उस इंजीनियर को जाकर तीन किलो ईंट दे आएँ, जो इस विचित्र प्रकार की रचना करता है।
लेख बहुत लंबा हो जाएगा और ‘गर्वीले बिहारियों’ के जज्बात भी घायल हो जाएँगे, लेकिन सच तो कहना ही होगा। यूँ तो स्वास्थ्य से लेकर शिक्षा तक नीतीश कुमार और उनके छोटे भाई सुशील मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार ने पतन के नए आयाम छुए हैं, लेकिन यह लेख यातायात पर निर्भर है, तो कुछ महत्वपूर्ण बिंदु इस प्रकार हैं:
बिहारी जिस उत्तर प्रदेश की ओर बड़ी उम्मीद से देखकर अपने पतन को जायज ठहराते हैं, वहाँ भी सार्वजनिक परिवहन नाम की एक व्यवस्था है और अच्छी है। बाकी गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु आदि राज्यों की सार्वजनिक व्यवस्था की तो बात न ही करें, तो बेहतर…।
12 करोड़ (जिनमें तीन करोड़ पलायित) बिहारियों को चंद निजी बस-ऑपरेटर्स और टेंपो वाले के भरोसे छोड़ दिया गया है। ये सभी माफिया हैं। घटिया बसें, अनियमित टाइमिंग, गंदगी, अश्लील भोजपुरी गाने और भगवान भरोसे सफर ही बिहारियों के भाग्य में है। अब अगर आपके पास अपनी गाड़ी है, तो शायद आपका सफर सुहाना हो क्योंकि सड़के थोड़ी-बहुत सुधरी हैं, लेकिन कब 15 लौंडे एनएच तक को रोक देंगे, कह नहीं सकते।
निजी उद्यमी जब वॉल्वो लेकर आए, तो नीतीश सरकार ने लाइसेंस देने में इतनी देर कर दी कि उसका 600 करोड़ रुपया डूबा और वह कान-नाक पकड़कर भाग गया।
क्या बिहार में कोई जिम्मेदार व्यक्ति, संस्था या बोर्ड है, जिससे सार्वजनिक व्यवस्था पर सवाल किए जा सकें?क्या सार्वजनिक परिवहन के बारे में सोचने वाला भी कोई है?
बस-अड्डों की तो बात ही मत कीजिए। राज्य की राजधानी पटना का मीठापुर बस अड्डा घूम आइए, सारी गलतफहमी दूर हो जाएगी। महिला यात्री क्या कुछ झेलती हैं, ये उनसे ही पूछिएगा।
सारांश यह है कि मेरे गर्वीले बिहारियों! मिजोरम या असम जैसे पहाड़ी आतंकवाद ग्रस्त राज्यों से अपनी तुलना कर बिहार को महान ठहराकर आप जैसे लोगों ने ही नीतीश तक को शिथिल बना दिया है। किसी नेता को यह उम्मीद ही नहीं है कि कोई उनसे सवाल भी पूछ सकता है ,क्योंकि हम सभी ने शूकरवृत्ति में ही मोक्ष मान लिया है। बिहार मेरा राज्य है और मैं इसके लिए आज की बात करुँगा। मैं मैथिलों की तरह याज्ञवल्क्य और जनक पर अहो-अहो कर गंदगी, कीचड़ और लीचड़ लोगों से भरे मिथिला को डिफेंड नहीं करुँगा। सार्वजनिक परिवहन के मामले में बिहार शून्य के भी बहुत नीचे है, क्योंकि यहाँ वह किसी के जेहन में ही नहीं है।