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पैदा हुई ईसाई, रिजर्वेशन वाली नौकरी के लिए बन गई दलित: सुप्रीम कोर्ट के जज ने कहा- सिर्फ ‘आरक्षण’ के लिए खुद को हिन्दू बताना संविधान के साथ धोखा

पुद्दुचेरी की एक ईसाई महिला ने दलित होने का दावा करते हुए आरक्षण की माँग कर दी। महिला ने दावा किया कि वह पैदा जरूर ईसाई हुई थी लेकिन हिन्दू धर्म में विश्वास रखती अहि और दलित है, इसलिए आरक्षण दिया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने उसके दावे को नकार दिया।

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस आर महादेवन ने कहा कि महिला केवल नौकरी लेने को ही दलित हिन्दू होने की बात कह रही है जबकि सबूत दिखाते हैं कि वह ईसाई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ लेने के लिए ही खुद को दलित हिदू बताना और इसमें विश्वास ना करना संविधान के साथ विश्वासघात है। सुप्रीम कोर्ट ने उसे दलित होने का जाति प्रमाण पत्र देने से इनकार कर दिया है।

क्या है मामला?

यह मामला पुद्दुचेरी की एक ईसाई महिला से जुड़ा हुआ है। सी सेल्वारानी नाम की एक महिला ने कोर्ट में दावा किया कि वह हिन्दू पैदा हुई थी और उसके माँ और बाप वल्लुवन जाति के हैं। ऐसे में वह भी इसी जाति की है और अपने जीवन भर हिन्दू धर्म में विश्वास रखते आई है। उसने यह भी बताया कि उसने अपनी पूरी शिक्षा भी दलित होने के फायदे लेते हुए की है।

महिला सेल्वारानी ने कहा कि उसने 2015 में एक नौकरी के लिए आवेदन किया था। इसमें वह पास भी हो गई थी। इसके नौकरी के लिए दस्तावेज के सत्यापन के दौरान उससे जाति प्रमाण पत्र माँगा गया था। उसने इसके लिए आवेदन दिया था लेकिन इसे रद्द कर दिया गया क्योंकि प्रारम्भिक जाँच में सामने आया कि वह ईसाई है और उसका बाप्तिसमा भी हुआ है।

दलित ना होने का जाति प्रमाण पत्र आवेदन रद्द किए जाने के बाद सेल्वारानी मद्रास हाई कोर्ट पहुँच गई। इसके बाद हाई कोर्ट ने मामले में जाँच करके फैसला लेने को जिला प्रशासन से कहा। जिला प्रशासन ने इसके बाद जाँच की और फिर से उसके दलित होने के दावे को खारिज कर दिया। आदेश में कहा गया कि ना ही वह हिन्दू है और ना ही बौद्ध या सिख।

इसके बाद सेल्वारानी केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण (CAT) पहुँच गई। यहाँ से उसने एक जिस नौकरी में आवेदन किया था, उसके लिए एक पद खाली रखवा लिया। वह हाई कोर्ट दोबारा पहुँची लेकिन उसे कोई राहत नहीं मिली। इसके बाद दलित होने का प्रमाण पत्र लेने की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट आ गई।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुप्रीम कोर्ट में सेल्वारानी ने दावा किया कि वह हिन्दू पैदा हुई थी और तब से हिन्दू धर्म में विश्वास रखती है। उसने दावा किया कि वह मंदिरों में भी जाती है और हिन्दू देवी-देवताओं की पूजा करती है। उसने यह दावा किया कि उसकी माँ एक ईसाई थी और पिता हिन्दू थे। उसने दावा किया उसकी माँ शादी के बाद हिन्दू बन गई थी।

इसके अलावा उसने अपने परिजनों के जाति प्रमाण पत्र भी दिखा दिए। उसने यह भी दावा किया कि उसका बाप्तिसमा तब हुआ था जब वह 3 महीने की थी इसलिए वह ईसाई नहीं बन जाती। उसने साथ ही में यह भी बताया गया कि अपनी पूरी शिक्षा भी उसने दलित होने के आरक्षण का लाभ लेते हुए पूरी की है, इसलिए अब नौकरी में भी उसे आरक्षण मिलना चाहिए।

वहीं इस मामले में जाति प्रमाण पत्र देने का विरोध कर रहे जिला प्रशासन ने बताया कि सेल्वारानी के आवेदन के बाद की गई जाँच में सामने आया था कि उसका पिटा एक धर्मांतरित ईसाई है। इसके अलावा जन्म के तीन महीने बाद ही सेल्वारानी का भी ईसाइयत में बाप्तिसमा करवा दिया गया था। इसका रिकॉर्ड भी है।

इस मामले में गाँव वालों से भी जानकारी माँगी गई। सेल्वारानी के ही गाँव के एक व्यक्ति ने अबूत के साथ बताया कि सेल्वारानी ईसाई है और उसके माता-पिता की शादी भी चर्च में हुई थी। इस बात की तस्दीक सेल्वारानी के गाँव के और भी चार लोगों ने की। जिला प्रशासन ने कहा कि ऐसे में सेल्वारानी को जाति प्रमाण पत्र ना दिया जाना ठीक था।

फैसले में कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि रिकॉर्ड दिखाते हैं कि भले ही सेल्वारानी ने खुद के ईसाई ना होने और हिन्दू धर्म मानने का दावा किया हो लेकिन अगर ऐसा होता तो वह मात्र बयान नहीं देती बल्कि कुछ सही में करती।

कोर्ट ने कहा, ” वह सिर्फ यह दावा नहीं कर सकती कि उसके पिता ने पुनः धर्म परिवर्तन कर लिया है और उसने और उसकी माँ ने भी धर्म परिवर्तन कर लिया है। सेल्वारानी और उसके परिवार ने यदि सही में धर्म परिवर्तन करने का इरादा किया था, तो उन्हें हिंदू धर्म में मानने के लिए दिखावा करने के बजाय इसे सही दर्शाने के लिए कुछ पक्का काम करना चाहिए था।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि मान लिया जाए कि सेल्वारानी की माँ हिन्दू बन गई थी तो फिर उसने अपने बच्चों का बाप्तिसमा क्यों करवाया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, “इस मामले में, सेल्वारानी जन्म से ईसाई थी और उसे किसी भी जाति से नहीं जोड़ा जा सकता। किसी भी मामले में, ईसाई धर्म में धर्मांतरण करने पर, व्यक्ति अपनी जाति खो देता है।”

कोर्ट ने धर्मांतरण को लेकर कहा, “कोई व्यक्ति किसी दूसरे धर्म में तभी धर्मांतरित होता है, जब वह वास्तव में उसके सिद्धांतों और आध्यात्मिक विचारों से प्रेरित होता है। हालाँकि, यदि धर्मांतरण का उद्देश्य केवल आरक्षण का फायदा लेना है। लेकिन अगर दूसरे धर्म में कोई विश्वास सही में नहीं है, तो इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।”

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसा फायदा दिया गया तो आरक्षण के पूरे उद्देश्य को ही खत्म कर देगा। कोर्ट ने कहा कि सबूत साफ़ तौर पर दिखाते हैं कि सेल्वारानी ईसाई धर्म को मानती है और नियमित रूप से चर्च में जाकर इस धर्म का सक्रिय रूप से पालन करती है। कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद वह हिंदू होने का दावा करती है और रोजगार के उद्देश्य से अनुसूचित जाति समुदाय का प्रमाण पत्र चाहती है। कोर्ट ने कहा कि यदि उसे आरक्षण का फायदा दिया गया तो यह संविधान के साथ धोखाधड़ी होगी।

मस्जिद-कब्रिस्तान की जमीन भले ही प्रयोग में नहीं, लेकिन वो रहेगी हमेशा मुस्लिमों की: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट, वक्फ के खिलाफ दायर याचिका खारिज

पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा है कि सरकारी अभिलेखों में दर्ज किसी भी कब्रिस्तान अथवा मस्जिद का संरक्षण किया जाना चाहिए भले ही वो जगह लम्बे समय से प्रयोग में न आ रही हो। गुरुवार (21 नवंबर 2024) को उच्च न्यायालय ने यह फैसला वक्फ ट्रिब्यूनल के निर्णय को चुनौती देती एक याचिका पर दिया है।

लाइव लॉ के मुताबिक यह मामला पंजाब प्रदेश में कपूरथला के गाँव बुधो पंधेर का है। यहाँ की ग्राम पंचायत ने पंजाब वक्फ बोर्ड के एक निर्णय के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका में बताया गया था कि गाँव की एक जमीन को वक्फ बोर्ड द्वारा अपनी सम्पत्ति घोषित कर दिया गया है और कब्ज़ा लेने का प्रयास किया जा रहा है। याचिका में वक्फ बोर्ड का आदेश रद्द करने की माँग की गई थी।

जिस विवादित जमीन के खिलाफ यह मुकदमेबाजी हुई, वह साल 1922 में महाराजा कपूरथला (जगतजीत सिंह) द्वारा सूबे शाह के बेटों निक्के और सलामत को दान की गई थी। निक्के और सलामत ने इस जमीन को तकिया, कब्रिस्तान और मस्जिद की जगह घोषित कर दी थी। साल 1947 में हुए विभाजन के बाद निक्के और सलामत पाकिस्तान चले गए। इसके बाद यह जमीन ग्राम पंचायत के नाम पर दर्ज कर दी गई थी। साल 1966 में इस जमीन का फिर से सर्वे हुआ था। तब इस जमीन को मस्जिद, कब्रिस्तान और तकिया के रूप में दिखाया गया था।

इस याचिका के जवाब में वक्फ बोर्ड ने अपना तर्क कोर्ट में रखा। वक्फ के मुताबिक जमीन राजस्व अभिलेखों में कब्रिस्तान के तौर पर दर्ज है भले ही उसका प्रयोग मुस्लिम समुदाय द्वारा लम्बे समय से नहीं किया गया है। ग्राम पंचायत की तरफ से अधिवक्ता सतिंदर खन्ना ने दलीलें पेश कीं जबकि वक्फ बोर्ड का पक्ष सीनियर एडवोकेट जी एन मलिक ने रखा। दोनों पक्षों ने अपनी-अपनी दलीलें और सबूत पेश किए, जिस पर उच्च न्यायालय ने 6 नवंबर को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।

मामले की सुनवाई जस्टिस सुरेश्वर ठाकुर और न्यायमूर्ति सुदीप्ति शर्मा की अदालत में हुई। 21 नवंबर को बेंच ने अपना फैसला सुनाया। अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्व अभिलेखों में दर्ज मस्जिद, तकिया या कब्रिस्तान का संरक्षण होना चाहिए भले ही मुस्लिम समुदाय द्वारा वो कितने भी समय से प्रयोग में न लाई गई हो। अदालत के मुताबिक ऐसी जगहों का वक्फ के रूप में संरक्षण होना चाहिए। इसी के साथ वक्फ के फैसले के खिलाफ ग्राम पंचायत द्वारा दाखिल की गई याचिका ख़ारिज कर दी गई।

अमेरिकी मुकदमे में गौतम अडानी और सागर अडानी पर रिश्वत देने के आरोप नहीं, मीडिया ने ‘लापरवाही’ में की रिपोर्टिंग: कारोबारी समूह बोला- इससे हुआ बड़ा नुकसान

भारतीय कारोबारी समूह अडानी ग्रुप में सपष्ट किया है कि अमेरिका में उनके खिलाफ दायर किए गए किसी भी मुकदमे में गौतम अडानी और उनके भतीजे सागर अडानी पर सीधे तौर पर रिश्वतखोरी में शामिल होने का आरोप नहीं लगा है। अडानी समूह ने बताया है कि रिश्वत देने के मामले में कोई प्रमाण भी नहीं दिए गए हैं और यह सिर्फ कुछ लोगों के बयान पर आधारित हैं। अडानी समूह ने कहा है कि भारतीय और विदेशी मीडिया ने इस मामले के तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया, जिससे निवेशकों और समूह को बड़ा नुकसान हुआ है।

अडानी समूह के अनुसार, गौतम अडानी, सागर अडानी और विनीत जैन पर अमेरिका में दायर मुकदमे में रिश्वत लेने या देने सम्बन्धी कोई आरोप नहीं लगा है। उन्होंने कहा कि यूएस डिपार्टमेंट ऑफ जस्टिस ने उन्हें भ्रष्ट आचरण से जुड़े आरोपों से बाहर रखा है। समूह ने बताया है कि मुकदमे में सिर्फ एज्युर और CDPQ के अधिकारियों पर रिश्वतखोरी का आरोप लगाया गया है। गौरतलब है कि CDPQ एक कनाडाई निवेशक समूह है और एज्युर अमेरिकी एनर्जी कंपनी है। यह दोनों अडानी समूह के साथ काम करती आई हैं।

अडानी समूह की ग्रीन एनर्जी पर काम करने वाली कंपनी, अडानी ग्रीन एनर्जी ने स्टॉक एक्सचेंज में दी गई एक जानकारी में इस पूरे मामले से सम्बन्धित तथ्य रखे हैं। अडानी ग्रीन एनर्जी ने कहा है कि अडानी समूह के लोगो पर केवल सिक्यूरिटीज में धोखाधड़ी और इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के जरिए गड़बड़ी का आरोप है ना कि रिश्वतखोरी का। उन्होंने साथ ही में यह भी कहा है कि इस बात के कोई सबूत भी नहीं हैं कि अडानी समूह से जुड़े लोगों ने भारत में सरकारी अधिकारियों को रिश्वत दी।

अडानी समूह के अनुसार, पूरा मुकदमा इस सिर्फ बात पर दायर किया गया है कि रिश्वत देने से सम्बन्धित बात की गई थी या उसका वादा किया गया था। यह रिश्वत देने के दावे भी मुकदमे में CDPQ और एज्युर के अधिकारियों के बयान पर आधारित हैं। समूह ने कहा है कि इन सब कारण से उनके खिलाफ दायर किया गया मुकदमा अदालत में काफी कमजोर होगा ही, वह नैतिक रूप से भी मजबूत नहीं है। समूह ने इस मुकदमाबाजी के परिणामों को लेकर चिंता जताई है।

अडानी समूह द्वारा जारी बयान में बताया गया है कि अमेरिका की बिना किसी मजबूत आधार के की गई कार्रवाई और फिर मीडिया में लापरवाह रिपोर्टिंग के कारण उनको अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं का रद्द होना, उनके वित्तीय बाजार पर असर और रणनीतिक साझेदारों, निवेशकों और जनता द्वारा अचानक जाँच-पड़ताल जैसे बड़े नुकसान उठाने पड़े हैं।

अडानी समूह ने कहा है कि वह कई बाजारों में सीधे तौर पर चीन और अमेरिका से प्रतियोगिता में है और इस मुकदमाबाजी के कारण उसकी शेयर बाजार में सूचीबद्ध 11 कम्पनियों में 55 बिलियन डॉलर (लगभग ₹5 लाख करोड़) का नुकसान झेलना पड़ा है।

गौरतलब है कि अमेरिका में हाल ही में दायर किए गए दो मुकदमों में आरोप लगाया गया है कि भारत में निवेश की गलत जानकारी के आधार पर अमेरिका से अडानी समूह ने पैसे जुटाए। इस मुकदमे में कुछ आरोपों में गौतम अडानी और सागर अडानी समेत बाक़ी का नाम भी है।

नमाज के बाद भड़काऊ बातें, फिर जिस DSP को हटाने का वीडियो वायरल… उन्हीं को जान से मारने के लिए दागी गोली: संभल हिंसा में FIR से सामने आई जानकारी

उत्तर प्रदेश के संभल जिले में रविवार (24 नवंबर 2024) को मुस्लिम भीड़ ने पुलिस पर हमला बोल दिया था। यह हमला तब किया गया, जब वहाँ की जामा मस्जिद में कोर्ट के आदेश पर सर्वे चल रहा था। घटना के बाद विपक्षी दलों द्वारा सुरक्षा बलों के बजाय दंगाइयों को समर्थन मिला। हालाँकि इस हिंसा की FIR सामने आने के बाद कहानी कुछ और ही निकल कर आ रही है। सामने आई एक और FIR में खुलासा हुआ है कि दंगाइयों ने उसी डिप्टी एसपी को टारगेट कर के गोली मारी थी, जिनके खिलाफ भीड़ लगातार बयानबाजी कर रही थी। कई दुकानों को भी भीड़ ने निशाना बनाया और आगजनी की।

ऑपइंडिया को मिली एक अन्य FIR में सब इंस्पेक्टर दीपक राठी शिकायतकर्ता के तौर पर दर्ज हैं। दीपक राठी संभल शहर में बतौर चौकी इंचार्ज तैनात हैं। रविवार को उन्होंने थाना कोतवाली संभल में तहरीर दी है। तहरीर में दीपक ने बताया कि न्यायालय के आदेश पर चल रहे सर्वे की टीम को सुरक्षा प्रदान करने के लिए वो जामा मस्जिद पर ही अपनी टीम के साथ तैनात थे। सुबह लगभग 9 बजे 700 से 800 लोगों की भीड़ जामा मस्जिद के पास पहुँच गई।

दीपक राठी ने आगे बताया कि भीड़ के पास घातक हथियार मौजूद थे। इनका मकसद सर्वे के काम में बाधा डालना था। FIR में 2 दिन पहले शुक्रवार को समाजवादी पार्टी के सांसद जियाउर्रहमान बर्क द्वारा दिए गए भड़काऊ भाषण का भी जिक्र है। इस भाषण को पुलिस ने राजनैतिक स्वार्थ की सिद्धि के लिए दिया गया बयान बताया है, जिससे भीड़ उग्र हुई थी। इसी तहरीर में आगे सपा विधायक इकबाल महमूद के बेटे सुहैल इक़बाल द्वारा भीड़ को जियाउर्रहमान के नाम पर उकसाने की बातें भी लिखी गई हैं।

सब इंस्पेक्टर राठी ने आगे बताया है कि उग्र हो रही भीड़ को उनके और DSP अनुज चौधरी द्वारा समझाने की बहुत कोशिश की गई। पुलिस की अपील का भीड़ पर कोई असर नहीं पड़ा। वह नारेबाजी करते हुए सरकारी काम में बाधा डालने लगी। थोड़ी ही देर में भीड़ ने पुलिस की गाड़ियों में तोड़फोड़ शुरू कर दी। पुलिस के वाहनों सहित सार्वजनिक सम्पत्तियों और कुछ दुकानों को भी आग के हवाले कर दिया गया।

तहरीर के अनुसार इसी भीड़ में से किसी उपद्रवी ने डिप्टी एसपी संभल को निशाना बना कर गोली मारी। गोली चलाने वाले का मकसद पुलिस अधिकारी की जान लेना था। यह गोली DSP अनुज चौधरी के पैर में लगी, जिससे वो घायल हो गए। दीपक राठी की तहरीर पर सपा सांसद जियाउर्रहमान बर्क और समाजवादी पार्टी के MLA इक़बाल महमूद के बेटे सुहैल इक़बाल सहित 700 से 800 अन्य अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली गई है। इन सभी पर हत्या के प्रयास, तोड़फोड़ और आगजनी आदि की धाराएँ लगाई गई हैं।

भीड़ के टारगेट पर पहले से DSP चौधरी

मुस्लिम भीड़ ने अपनी हिंसा में जिन डिप्टी एसपी अनुज चौधरी को निशाना बनाया, वो पहले से ही दंगाइयों के टारगेट पर थे। हिंसा के दिन भीड़ से बयानबाजी कर रहे एक व्यक्ति का वीडियो वायरल हो रहा है। वायरल वीडियो में दिख रहा व्यक्ति भीड़ को शांत और DSP संभल को ही गलत बता रहा है। बयानबाज के मुताबिक DSP संभल ने भीड़ से बदतमीजी की है। उसने अपील भी की थी कि डिप्टी एसपी संभल को हटाया जाए।

DSP संभल को न सिर्फ गोली मारी गई बल्कि भीड़ ने बाकायदा टारगेट करके उनकी सरकारी गाड़ी पर भी हमला किया। ऑपइंडिया को मिली एक तस्वीर में CO लिखी गाडी पर हुई पत्थरबाजी के निशान साफ देखे जा सकते हैं। इस पथराव से DSP अनुज चौधरी की गाड़ी का शीशा क्षतिग्रस्त हो गया है। साथ ही गाड़ी को अन्य हिस्सों में भी काफी नुकसान पहुँचा है।

मुस्लिम भीड़ की हिंसा में घायल DSP अनुज चौधरी का वीडियो सामने आया है। वीडियो में उनके पैरों में प्लास्टर बंधा दिखा रहा है। उन्होंने एक बयान में यह भी बताया कि हजारों की भीड़ पुलिसकर्मियों की जान लेने पर आमादा थी। आत्मरक्षा में पुलिस ने संतुलित कार्रवाई की। दंगाइयों के पक्ष में सवाल पूछ रहे पत्रकार से DSP संभल ने उलटे सवाल कर लिया। उन्होंने पूछा कि अगर भीड़ शांत थी तो आपने (पत्रकार) ने उसमें घुस कर वीडियोग्राफी क्यों नहीं की? इसी बयान में उन्होंने कहा, “इन जाहिलों के हाथों मरने के लिए पुलिस में भर्ती हुए हैं क्या?”

एक-एक कर हिन्दू पकड़ो, सबका रेत दो गला: बांग्लादेश में लगे नारे, काली मंदिर पर भी हमला, संत को जमानत ना देने पर युनुस सरकार ने दिखाई बेशर्मी

बांग्लादेश में ISKCON संत चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद उन्हें कोर्ट ने जमानत देने से भी मना कर दिया। बांग्लादेश ने इसके बाद बड़ी बेशर्मी से हिन्दू संत की गिरफ्तारी को सही ठहराने की भी कोशिश की। इसके अलावा बांग्लादेश के चटगाँव में हिन्दुओं को ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें जिबाह करने के लिए इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ निकली और नारे लगाए। बांग्लादेश के किशोरगंज में भी 4 हिन्दुओं की लाशें मिली हैं। एक वकील की भी मौत हुई है। एक काली मंदिर पर हमला भी हुआ है।

संत को जमानत नहीं, वकील की मौत

सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को बांग्लादेश के ढाका में गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को मंगलवार को चटगाँव के कोर्ट में जमानत नहीं मिली। जज काजी नजरुल इस्लाम ने कथित देशद्रोह के मामले में जमानत देने से इनकार कर दिया। उन पर बांग्लादेश के झंडे का अपमान करने का आरोप बनाया गया है।

असल में युनुस सरकार ने यह आवा हिन्दुओं की आवाज दबाने के लिए की है। संत चिन्मय कृष्ण दास लगातार बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा हिन्दुओं के उत्पीड़न पर बोल रहे थे। चटगाँव में इसी दौरान हुए बवाल में एक वकील की मौत हो गई। बताया गया कि यह वकील चिन्मय कृष्ण दास की जमानत का विरोध कर रहा था।

वकील को उसके चैम्बर से खींच कर मारा गया। इसके बाद अस्पताल में उसकी मौत हो गई। वकील की हत्या का आरोप कोर्ट में बवाल करने वाले इस्लामी कट्टरपंथियों पर लगा है। पुलिस भी इस मामले में कुछ नहीं बता पा रही है।

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के दौरान प्रदर्शन करने वाले हिन्दुओं को चटगाँव में पुलिस ने बेरहमी से मारा। उन पर लाठियाँ और गोलियाँ चलाई गईं। कई हिन्दू इस पुलिसिया कार्रवाई में घायल हो गए हैं। उन्हें अस्पताल में भर्ती करवाए गए हैं। इसकी फोटो भी सोशल मीडिया पर सामने आई हैं।

हिन्दुओं को ढूँढ-ढूँढ कर मारने का ऐलान

बांग्लादेश के चटगाँव में ही हिन्दुओं को प्रताड़ित किए जाने के बाद उन्हें मारने के लिए भी इस्लामी कट्टरपंथियों ने एक रैली निकाली और नारे लगाए। इसका एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है। इस वीडियो में इस्लामी कट्टरपंथियों की एक भीड़ रोड पर जा रही है। इस वीडियो में वह बोलते हुए सुने जा सकते हैं, “एक-एक इस्कॉन (हिन्दू) वाले को ढूंढो, उनको जिबाह करो।”

चटगाँव के ही हजारी गली में हिन्दुओं पर हमला हुआ। यहाँ स्थित काली मंदिर में भी तोड़फोड़ की गई। इस गली में हिन्दू रहते हैं। यहाँ इससे पहले बांग्लादेश की सेना ने भी हिन्दुओं को प्राआदित किया था। इसका एक वीडियो भो सोशल मीडिया पर वायरल है।

किशोरगंज में 4 की हत्या

बांग्लादेश के किशोरगंज में भी 4 हिन्दुओं की लाशें मिली हैं। इनके नाम जॉनी बिस्वास, रूपा रानी बिस्वास, ध्रुब बिस्वास और कोथा रानी बिस्वास हैं। उनकी एक किराए के घर से लाशें बरामद की गई हैं। उनकी मौत कैसे हुई, यह स्पष्ट नहीं है। जॉनी की लाश लटकी हुई बरामद हुई जबकि बाकी तीनों का गला रेता हुआ था।

पुलिस ने शव बरामद करके पोस्टमार्टम के लिए भेजे हैं। मौत का कारण साफ़ नहीं हुआ है। उनकी मौतें आत्महत्या थी या फिर किसी ने उनके मार कर इसे आत्महत्या की तरह दिखाया, इसकी पुलिस जाँच कर रही है। पुलिस ने कहा है कि वह पोस्टमार्टम के बाद ही कुछ साफ़ बता सकेगी।

बांग्लादेश के हिन्दुओं ने जारी किया बयान

बांग्लादेश के हिन्दुओं के लिए काम करने वाली सनातनी जागरण जोत बांग्लादेश ने एक बयान जारी करके चटगाँव की घटना की जानकारी दी है। उन्होंने बताया है कि चिन्मय दास की गिरफ्तारी का विरोध करने के समय उन पर पुलिस और इस्लामी कट्टरपंथियों ने ईंट फेंकी और डंडे बरसाए।

उन्होंने उन आरोपों को भी नकार दिया जिनमें वकील की हत्या का आरोप हिन्दू प्रदर्शनकारियों पर लगाया गया था। सनातनी जागरण जोत ने बताया है कि इस्लामी कट्टरपंथियों ने मस्जिद से यह पत्थरबाजी की थी। उन्होंने कहा कि इसके बाद एक कॉलोनी में आगजनी की गई और एक मंदिर को भी निशाना बनाया गया।

भारत ने चिंता जताई, बांग्लादेश ने बेशर्मी दिखाई

भारत ने संत चिन्मय दास की गिरफ्तारी और हिन्दुओं की प्रताड़ना को लेकर मंगलवार को लेकर चिंता जताई थी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा था कि सरकार हिन्दुओं पर हमला करने वाले कट्टरपंथियों की बजाय संतों को पकड़ रही है। भारत ने हिन्दुओं की सुरक्षा की अपील युनुस सरकार से की थी।

बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने इसके जवाब में इसे आंतरिक मामला बता दिया। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने कहा कि चिन्मय दास की गिरफ्तारी पर भारत का बोलना सही नहीं है और यह तथियों को गलत तरीके से पेश करता है। युनुस सरकार ने इस बीच प्रताड़ना को सही ठहराने की कोशिश की।

‘तुम कमल फूल में वोट दिया है, तुमको गाँव से बेदखल करेंगे, मार कर फेंक देंगे’: झारखंड में INDI गठबंधन के जीतते ही इस्लामी गुंडागर्दी शुरू

झारखंड विधानसभा चुनावों INDI गठबंधन की जीत के बाद बीजेपी समर्थकों को धमकी देने की घटनाएँ सामने आई है। साहिबगंज जिले में बीजेपी समर्थक एक मुस्लिम युवक को उसके ही बिरादरी के लोग गाँव से निकालने और हत्या की धमकी दे रहे हैं। वहीं मधुपुर में एक बीजेपी समर्थक के घर पर झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) के कार्यकर्ताओं ने हमला कर दिया। कथित तौर पर हमलावरों ने घर पर लगे भाजपा के झंडे को उखाड़कर उस पर पेशाब किया।

पहला मामला साहिबगंज जिले के रांगा थाना क्षेत्र की है। मोहम्मदपुर गाँव के इमाम मिर्जा ने रविवार (24 नवंबर 2024) को पुलिस में तहरीर दी। उन्होंने बताया है कि भाजपा को वोट देने के कारण रिजल्ट आने के बाद से गाँव के ही महबूब शेख, मजहरुल शेख, मुन्ना शेख, मुस्तफा शेख और आशिक शेख के साथ मोहब्बतपुर का शमीम शेख उसे मानसिक तौर पर प्रताड़ित कर रहे हैं।

पीड़ित ने बताया कि उसको मौत की धमकियाँ मिल रही हैं। कथित तौर पर आरोपितों ने पीड़ित से कहा, “तुम कमल फूल में वोट दिया है, इसीलिए हम तुमको गाँव से बेदखल कर देंगे। तुमको जान से मार कर वैसी जगह में फेंक देंगे कि नामोनिशान मिट जाएगा। तू मेरा बाल भी नहीं बिगाड़ पाएगा। मुख्यमंत्री से लेकर थाना प्रभारी तक हमारे कब्जे में आ गया है।”

चुनाव में हार का सामना करने वाले भाजपा प्रत्याशी ने पीड़ित परिवार से मुलाकात की है। उन्होंने बताया कि पीड़ित के घर पर पत्थरबाजी की भी गई है। 2 लोगों को को चोटें भी आई हैं। भाजपा नेता ने साहिबगंज पुलिस से माँग की है कि वे आरोपितों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे। भाजपा नेता व पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने भी इस घटना का जिक्र करते हुए कहा है कि पूरे प्रदेश में भाजपा के कार्यकर्ताओं को टारगेट किया जा रहा है।

भाजपा के झंडे पर किया पेशाब

दूसरा मामला झारखंड के ही मधुपुर विधानसभा क्षेत्र में पड़ने वाले मदनकट्टा इलाके का है। विधानसभा चुनावों में यहाँ से झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रत्याशी हफीजुल हसन ने जीत दर्ज की है। रविवार (24 नवंबर 2024) को उनकी जीत की ख़ुशी में मदनकट्टा इलाके में विजय जुलूस निकाला गया था। यह जुलूस जैसे ही भाजपा समर्थक संजय गुप्ता के घर से आगे से गुजरा, इसमें शामिल कुछ लोगों ने उपद्रव शुरू कर दिया।

आरोप है कि विजय जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने संजय गुप्ता के घर पर लगा भाजपा का झंडा उखाड़ कर फेंक दिया। बाद में इसी झंडे पर पेशाब भी किया। जब संजय गुप्ता ने इसका विरोध किया तो उनकी पिटाई की गई। गाली-गलौज के साथ जान से मारने की धमकी दी गई। इसमें से कुछ हरकतों का CCTV फुटेज भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। भाजपा नेता निशिकांत दुबे ने इस घटना की निंदा की है। उन्होंने आरोपितों पर कड़ी कार्रवाई की माँग की है।

संभल हिंसा के बाद अलर्ट पर UP पुलिस: मुजफ्फरनगर में कई छतों पर मिले पत्थर, अमेठी में ड्रोन से निगरानी

संभल में 24 नवंबर 2024 को मुस्लिम भीड़ की हिंसा के बाद उत्तर प्रदेश पुलिस अलर्ट पर है। कई जिलों में प्रशासन ने एहतियात बरतने शुरू कर दिए हैं। अमेठी और मुज़फ्फरनगर जिलों में छतों की ड्रोन से निगरानी करवाई गई है।

इस दौरान मुज़फ्फरनगर में कई छतों पर ईंट-पत्थर नजर आए। अमेठी में प्रशासन ने आगाह किया है कि अगर छतों पर अनावश्यक चीज पाई गई तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। मिश्रित इलाकों में फ्लैग मार्च कर लोगों से अफवाहों पर ध्यान न देने की अपील भी की जा रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक मुज़फ्फरनगर जिले में पुलिस ने ड्रोन से मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में छतों की निगरानी करवाई। इसी दौरान 7 घरों की छतों पर ईंट-पत्थर नजर आए। प्रशासन ने तत्काल इसे हटवा दिया। ख़ुफ़िया विभाग को भी जरूरी निर्देश दिए गए हैं। वह भी मिश्रित इलाकों में बने कुछ घरों की निगरानी में जुट गया है। इस दौरान भीड़-भाड़ वाले इलाकों में पुलिस टीम की गश्त बढ़ा दी गई है।

पुलिस बल खालापार और न्याजपुरा जैसे मुस्लिम बहुल इलाके पर भी नजर बनाए हुए है। पुलिस ने मुस्लिम समुदाय के प्रतिनिधियों से भी मुलाकात की है। इस दौरान जिले में अमन चैन बनाए रखने पर जोर दिया गया।

वहीं अमेठी जिले में भी पुलिस बल ने संवेदनशील इलाकों में गश्त की है। इन्हौना और जायस जैसे मिश्रित आबादी वाले क्षेत्रों में गश्त कर के पुलिस ने मकान मालिकों से छतों पर कोई भी ईंट-पत्थर न रखने की सख्त हिदायत दी है। अमेठी में भी ड्रोन से छतों की निगरानी करवाई जा रही है। प्रशासन की तरफ से यह भी साफ किया गया है कि चेतावनी के बावजूद जो निर्देशों को नहीं मानेगा उस पर कानूनी कार्रवाई की जाएगी। इसी के साथ सोशल मीडिया पर भी पुलिस की पैनी नजर है।

बताते चलें कि 24 नवंबर को संभल जामा मस्जिद का सर्वे करने के लिए टीम पहुँची तो मुस्लिम भीड़ ने ईंट-पत्थरों से पुलिस पर हमले किए। इस दौरान हिंसा प्रभावित इलाके की सड़के पत्थर से पट गई थी। करीब 4 ट्रॉली पत्थर प्रशासन ने उठवाए थे। पत्थरबाजी की चपेट में आ कर कई पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिसमें से एक कांस्टबेल की हालत गंभीर है।

बुशरा बीवी के सामने पाकिस्तान सरकार बेबस, देखते ही गोली मारने के आदेश से भी नहीं डरे इमरान खान के समर्थक: इस्लामाबाद फौज के हवाले, फिर भी D चौक में घुसे

पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई की माँग ने हालात बेकाबू कर दिए हैं। राजधानी इस्लामाबाद में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षाबलों के बीच झड़पें जारी हैं। इन घटनाओं में अब तक 6 सुरक्षाकर्मियों की मौत हो चुकी है, जबकि 100 से अधिक घायल हुए हैं। हिंसा को नियंत्रित करने के लिए सरकार ने सेना बुलाकर उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया है। वहीं, प्रदर्शनकारी डी-चौक तक पहुँच गए हैं।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रदर्शनकारियों ने सुरक्षाबलों की गाड़ियाँ तोड़ीं और बैरिकेड्स हटा दिए। इस बीच इमरान खान की वाइफ बुशरा बीबी पीटीआई समर्थकों का नेतृत्व करते हुए इस्लामाबाद के डी-चौक तक पहुँच चुकी हैं, तो इस्लामाबाद के अलावा पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा प्रांतों में भी प्रदर्शन तेज हो गए हैं। PTI ने 3,500 से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का आरोप लगाया है। इमरान खान की पार्टी तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) का कहना है कि उनके शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सुरक्षाबलों ने गोलीबारी की, जिसमें दो कार्यकर्ताओं की मौत हो गई और कई घायल हुए।

बताया जा रहा है कि खैबर पख्तूनख्वा से प्रदर्शनकारी डी-चौक की ओर बढ़ रहे हैं जो राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद जैसी प्रमुख इमारतों के पास है. प्रदर्शनकारियों ने शिपिंग कंटेनरों और बैरिकेड्स को भारी मशीनरी की मदद से हटा दिया।

बता दें कि 72 वर्षीय इमरान खान ने 24 नवंबर को राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शन का आह्वान किया था, जिसमें उन्होंने जनादेश की चोरी, लोगों की अवैध गिरफ्तारी और 26वाँ संविधान संशोधन पारित होने की निंदा की थी। उन्होंने कहा कि इस संशोधन ने ‘तानाशाही शासन’ को मजबूत किया है। उनकी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) पार्टी ने जनता से ‘गुलामी की बेड़ियाँ तोड़ने’ के लिए मार्च में शामिल होने का आह्वान किया है।

इस्लामाबाद में बवाल जारी (फोटो साभार: डॉन)

इस प्रदर्शन का नेतृत्व इमरान खान की वाइफ बुशरा बीबी और खैबर-पख्तूनख्वा के मुख्यमंत्री अली अमीन गंडापुर कर रहे हैं। बुशरा बीबी ने वीडियो संदेश में समर्थकों से जुटने की अपील की।

डी-चौक क्यों है खास?

इस्लामाबाद का डी-चौक देश की महत्वपूर्ण सरकारी इमारतों राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय और संसद के पास स्थित है। इसे प्रदर्शनकारियों ने संघर्ष का मुख्य केंद्र बना दिया है। वहीं, प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सुरक्षाबलों पर हमले की कड़ी निंदा की और दोषियों पर सख्त कार्रवाई के आदेश दिए। आंतरिक मंत्री मोहसिन नकवी ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाते हुए सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही।

सुरभि बोल नहीं सकती, सुन नहीं सकती तो साइन लैंग्वेज से ईसाई बनाने की थी तैयारी, पीड़ित परिवार ने ट्रेन से छुड़ाई बेटी

कोटा की एक लड़की को ईसाइयत के यहोवा विटनेस संप्रदाय वालों ने धर्मांतरित करने की कोशिश की। लड़की मूकबधिर है। लड़की को भीलवाड़ा रेलवे स्टेशन पर परिवार वालों ने पुलिस की सहायता से बरामद किया। परिवार ने आरोप लगाया कि लड़की को धर्मांतरण के लिए इंदौर से दिल्ली ले जाया जा रहा था। परिवार ने लड़की के ब्रेनवाश का आरोप लगाया है। उन्होंने इस मामले में पुलिस के आईजी को भी शिकायत दी है। इस मामले में दो अन्य लड़कियों से पूछताछ की है, जो धर्मांतरण की आरोपित बताई गई हैं।

पुलिस को दी गई शिकायत के अनुसार, कोटा निवासी 23 वर्षीय सुरभि मेहता जयपुर में रहती है। यहाँ रह कर वह पढ़ाई करती है। सुरभि बोल और सुन नहीं सकती है। जयपुर में ही वह यहोवा के साक्षी (Jehova’s Witness) वालों के अनुयायियों के सम्पर्क में आई।

परिवार ने आरोप लगाया कि वह सुरभि को भी धर्मांतरण के लिए प्रेरित करने लगे। उसे बताने लगे कि अगर सुरभि ईसाइयत में धर्मांतरित हो जाती है तो अगले जन्म में उसकी सुनने-बोलने की क्षमता आ जाएगी। परिवार ने आरोप लगाया कि यह मिशनरी संगठन ऐसे ही हिन्दू मूक बधिर बच्चे निशाने पर लेता है।

परिवार ने बताया कि उनकी लड़की ने उन्हें बताया 19 नवम्बर, 2024 को उनकी बेटी बिना बताए इंदौर चली गई थी। परिवार ने जब जानकारी ली तो पता चला कि वह इनके एक सम्मेलन में शामिल है। यहीं से सुरभि को दिल्ली ले जाने की कोशिश की गई।

सुरभि के परिजनों ने पुलिस में सूचना दी कि उनकी बेटी का कोई पता नहीं लग रहा है। इसके बाद पुलिस ने सुरभि को भीलवाड़ा स्टेशन से इंदौर-दिल्ली एक्सप्रेस से बरामद किया। सुरभि के दो और लड़कियाँ पकड़ी गईं। इसने पुलिस ने पूछताछ की और फिर छोड़ दिया।

सुरभि के परिजनों ने शिकायत में बताया है कि उनकी लड़की इस कदर ब्रेनवाश है कि वह अपने मंदिर नहीं जाती और कई बार समझाने पर भी यहोवा विटनेस वालों के सम्पर्क में रहती है। वर्तमान में सुरभि अपने परिजनों के साथ सुरक्षित है। ऑपइंडिया के पास इस मामले में पुलिस को दी गई शिकायत है।

मामले में परिवार का सहयोग कर बजरंग दल के योगेश रेनेवाल ने ऑपइंडिया से बताया, “यहोवा वालों ने एक मित्र के माध्यम से लड़की से सम्पर्क किया। इसके बाद उसे ऑनलाइन क्लासेस के माध्यम से इशारों की भाषा से ईसाइयत की तरफ आकर्षित किया। उसके मूकबधिर होने का फायदा उठाते हुए उसे अगले जन्म में बोलने का लालच दिया और धर्मांतरण का दबाव डाला।”

गौरतलब है कि यहोवा विटनेस ईसाइयत का ही एक हिस्सा है। इसके मानने वाले जीसस में विश्वास नहीं करते है। यह 19वीं शताब्दी के अंत में अमेरिका में शुरू हुआ था। इसके अलग विश्वास हैं। इसके विश्वास का केंद्र यहोवा नाम का भगवान है। इनको लगता है कि दुनिया का अंत आने वाला है।

इस संप्रदाय का नाम अक्टूबर, 2023 केरल से सामने आया था। डोमिनिक मार्टिन ने यहोवा विटनेस की एक सभा में धमाका किया था। उसने यहोवा विटनेस वालों पर आरोप लगाया था कि यह राष्ट्रविरोधी बातें करते हैं। मार्टिन ने एक वीडियो में बताया, “6 साल पहले उसे लगा कि यह संस्था गलत रास्ते पर है। उनकी शिक्षाएँ राष्ट्र विरोधी हैं। मैंने उनसे कई बार इसे सही करने के लिए कहा। लेकिन वह ऐसा करने के लिए तैयार नहीं थे।”

आगे उसने कहा, “किसी मजहब में आस्था रखने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन यह लोग बताते हैं कि बाकी पूरी दुनिया के लोग खत्म होंगे और यह अपना जीवन जीते रहेंगे। हमें ऐसे समूह के साथ क्या करना चाहिए जो कि 850 करोड़ लोगों के बारे में यह सोचता है। मुझे और कोई रास्ता नहीं सूझा और चूँकि मैं इस विचारधारा से वाकिफ हूँ इसलिए मैंने जवाब देने का निर्णय लिया।”

लाइव के दौरान मार्टिन ने कहा था, “इस राष्ट्र में रहते हुए भी यह लोग देश के लोगों को वेश्या और शापित बता कर अपमानित करते हैं। यह अपने लोगों को समझाते हैं कि बाकी लोगों के साथ हाथ मत मिलाओ और खाना मत खाओ। मुझे लगा कि यह गलत विचारधारा है।”

‘आप चुनाव जीते तो EVM सही, आप हारे तो हुई छेड़छाड़’: सुप्रीम कोर्ट ने सिस्टम बदलने से किया इनकार, अब बैलेट पेपर के लिए कॉन्ग्रेस चलाएगी देशव्यापी अभियान

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (26 नवंबर 2024) को एक जनहित याचिका (PIL) को खारिज कर दिया, जिसमें चुनावों में ईवीएम (इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) की जगह पुराने पेपर बैलेट सिस्टम को फिर से लागू करने की माँग की गई थी। याचिकाकर्ता ईसाई प्रचारक डॉ. केए पॉल ने याचिका में यह दलील दी थी कि ईवीएम से छेड़छाड़ की जा सकती है, जिससे लोकतंत्र को खतरा है। वहीं, इस बीच कॉन्ग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने फिर से बैलेट पेपर का राग अलापा है, जबकि सुप्रीम कोर्ट याचिका खारिज कर चुकी है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस पीबी वराले की बेंच ने याचिका को सुनवाई के योग्य ही नहीं पाया। जस्टिस नाथ ने याचिकाकर्ता पॉल से पूछा, “आपको यह अद्भुत विचार कहाँ से मिला?” इस पर पॉल ने कहा, “मैं अभी लॉस एंजेल्स से एक ग्लोबल पीस समिट से लौट रहा हूँ। हमारे साथ रिटायर्ड आईएएस, आईपीएस अधिकारी और जज हैं जो मेरा समर्थन कर रहे हैं।”

कोर्ट ने पॉल की दलील को हल्के अंदाज में लिया और कहा कि नेताओं जैसे चंद्रबाबू नायडू और वाईएस जगनमोहन रेड्डी केवल हारने पर ईवीएम में गड़बड़ी का आरोप लगाते हैं, लेकिन जीतने पर ऐसा कुछ नहीं कहते। जस्टिस नाथ ने कहा, “जब नेता हारते हैं तो ईवीएम को दोष देते हैं, लेकिन जब वे जीतते हैं तो कुछ नहीं बोलते। यह अदालत इस तरह के तर्कों को स्वीकार नहीं कर सकती।”

याचिकाकर्ता डॉ. पॉल ने तर्क दिया कि भारत को अमेरिका जैसे देशों के रास्ते पर चलना चाहिए, जहाँ फिजिकल बैलेट सिस्टम का उपयोग होता है। उन्होंने कहा कि 197 में से 180 देशों में पेपर बैलेट का उपयोग होता है। उन्होंने कहा, “यह लोकतंत्र की रक्षा का मुद्दा है। यहाँ तक कि एलन मस्क ने भी ईवीएम पर सवाल उठाए हैं।”

डॉ. पॉल ने अपनी याचिका में कई और सुधारों की माँग की, जिनमें शामिल थे:
1- पैसे या शराब बाँटने पर प्रत्याशियों की 5 साल की अयोग्यता।
2- मतदाता शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत।
3- राजनीतिक दलों की फंडिंग की जांच के लिए एक तंत्र।
4- चुनाव संबंधी हिंसा रोकने के लिए नीतिगत ढांचा।
पॉल ने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि चुनावी सुधारों के लिए एक व्यापक नीति बनाई जाए। उन्होंने कहा कि 18 राजनीतिक दलों ने उनका समर्थन किया है और चुनाव आयोग (ECI) ने 9000 करोड़ रुपये की जब्ती की घोषणा की थी।

सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को गंभीरता से नहीं लिया और याचिका को खारिज कर दिया। जस्टिस नाथ ने कहा, “भारत को अन्य देशों की नकल करने की आवश्यकता नहीं है। हर देश का अपना सिस्टम होता है।”

इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को खारिज करते हुए साफ कर दिया कि चुनावी प्रक्रियाओं में सुधार के लिए संसद और निर्वाचन आयोग ही उचित मंच हैं। अदालत ने कहा कि याचिकाकर्ता के तर्क कानूनी रूप से ठोस नहीं थे और केवल अनुमान और अटकलों पर आधारित थे। यह फैसला इस बात को दोहराता है कि भारत का चुनावी ढांचा ईवीएम पर भरोसा करता है और इसके खिलाफ सबूतों के अभाव में कोई बड़ा बदलाव संभव नहीं है।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने गाया बैलेट पेपर का राग

एक तरफ सुप्रीम कोर्ट ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की माँग खारिज कर दी है, तो दूसरी तरफ कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की माँग को लेकर पूरे देश में आंदोलन करने की बात कही है। महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में हार के बाद खड़गे ने कहा है कि बैलेट पेपर से ही चुनाव कराने चाहिए। इसके लिए वो सभी विपक्षी दलों के साथ मिलकर चर्चा करेंगे।