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पत्नी के साथ खेत जा रहे थे हरिराम, मुस्लिमों ने धारदार हथियारों से काट डाला: मालपुरा दंगा में कोर्ट ने 8 को सुनाई उम्र कैद की सजा

किसान हरिराम की हत्या के मामले में अदालत ने 8 मुस्लिम दंगाइयों को उम्र कैद की सजा सुनाई है। उनकी हत्या साल 2000 में राजस्थान के टोंक जिले के मालपुरा में दंगों के दौरान की गई थी। इस दंगे में कुल 6 लोगों की मौत हुई थी। इनमें कैलाश माली भी शामिल थे। उनकी हत्या के मामले में अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए 5 आरोपितों को बरी कर दिया गया है। जयपुर की विशेष अदालत ने दोनों मामलों में 2 दिसंबर 2024 को फैसला सुनाया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक हरिराम हत्याकांड में उम्रकैद की सजा पाए दंगाइयों के नाम इस्लाम, मोहम्मद इशाक, अब्दुल रज्जाक, इरशाद, मोहम्मद जफर, साजिद अली, बिलाल अहमद और मोहम्मद हबीब हैं। बचाव व अभियोजन पक्ष की तमाम दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि धारदार हथियारों से निर्मम हत्या करने वालों के खिलाफ कोई नरमी नहीं बरती जा सकती है। हालाँकि कैलाश माली केस में कोई चश्मदीद गवाह न होने की बुनियाद पर अदालत ने 5 आरोपितों को बरी कर दिया है।

हरिराम की हत्या के मामले में उनकी विधवा धन्नी देवी ने 10 जुलाई 2000 को मालपुरा थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। इसमें कहा गया कि था कि वह अपने पति के साथ खेत पर जा रही थी। इस दौरान दंगाइयों ने धारदार हथियार से उसके पति पर हमला कर दिया। उनके शरीर पर कई जगह वार किए। इसके चलते उनकी मौत हो गई।

कैलाश माली की हत्या केस में उनके बेटे ने FIR दर्ज करवाई थी। उस FIR में शिकायतकर्ता ने बताया था कि गाँव के कुछ लोगों ने उन्हें उनके पिता पर हमले के बारे में बताया था। इस सूचना पर जब वो घटनास्थल पर गए तो उनके पिता की मौत हो चुकी थी। इस मामले में कुल 5 आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई थी। बचाव पक्ष ने इस केस में कोई चश्मदीद गवाह न होने की दलील दी। अदालत ने इस दलील को माना और आरोपितों को बरी कर दिया।

क्यों हुआ था दंगा

10 जुलाई 2020 को टोंक जिले के मालपुरा में भारतीय जनता पार्टी के नेता कैलाश माली की हत्या कर दी गई थी। कैलाश माली को चलती बाइक से धक्का दिया गया था और चाकुओं से वार किए गए थे। जयपुर ले जाते समय रास्ते में उनकी मौत हो गई थी। कैलाश माली की हत्या की खबर टोंक के शहरी और ग्रामीण इलाकों में फ़ैल गई। भारी तनाव के बीच मुस्लिम भीड़ ने कई जगहों पर हिन्दुओं को निशाना बनाया।

इस दौरान दोनों पक्षों से लोगों की मौतें हुईं थी। इस हिंसा में अभी 17 अन्य लोगों पर कोर्ट में केस विचाराधीन है। कैलाश माली को पुलिस ने बाबरी ध्वंस के बाद टोंक जिले में हुए साल 1992 के दंगों का मुख्य आरोपित बनाया था। इसी वजह से वो कट्टरपंथियों के निशाने पर थे। हालाँकि उनकी पत्नी का कहना है कि उनके पति को झूठा फँसाया गया था।

संभल के मुस्लिम पत्थरबाजों को बचाने में जुटा विकिपीडिया, ‘जय श्रीराम’ के नारों को हिंसा के लिए ठहराया जिम्मेदार: ‘द वायर’ का दिया रेफरेंस, सवाल उठने पर हटाया लिंक

संभल हिंसा पर विकिपीडिया का रुख हमेशा की तरह संदिग्ध और सवालों के घेरे में है। दरअसल, खुद को ‘विश्वकोश’ कहने वाले विकिपीडिया ने 24 नवंबर 2024 कोर्ट के आदेश से हो रहे सर्वे के दौरान हुई हिंसा को लेकर एक अलग पेज बनाया। विकिपीडिया के इस पेज में दावा किया गया कि ‘कोर्ट द्वारा नियुक्त न्यायिक आयोग के सामने मुस्लिमों को भड़काने के लिए ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया गया’, इस घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। विकिपीडिया पर ऐसे दावे विपक्षी सांसदों के हवाले से किए गए।

विकिपीडिया के पेज पर लिखा है, “विपक्षी सांसदों ने आरोप लगाया है कि मस्जिद में अदालत द्वारा नियुक्त सर्वे टीम के सामने आए लोगों ने वरिष्ठ पुलिस और जिला अधिकारियों की मौजूदगी में मुसलमानों को भड़काने के लिए ‘जय श्री राम’ का नारा लगाया, इस घटना का वीडियो वायरल हो रहा है।”

स्रोत:विकिपीडिया

दिलचस्प बात यह है कि विकिपीडिया ने शुरू में वामपंथी प्रोपेगेंडा आउटलेट ‘द वायर’ के लिए विवादास्पद स्तंभकार अपूर्वानंद झा द्वारा लिखे गए एक लेख का इस्तेमाल किया था, जिसमें दावा किया गया था कि ‘जय श्री राम’ के नारे से मुसलमान भड़क गए थे। हालाँकि, बाद में लिंक हटा दिया गया और द टेलीग्राफ का एक अन्य लिंक उसी दावे का मुख्य स्रोत बन गया।

इस पेज के पुराने संस्करण (एडिटिंग से पहले) में पहले पैराग्राफ में “जय श्री राम” नारे का उल्लेख किया गया था, जिसे अपूर्वानंद के लेख से जोड़ा गया था।

स्रोत: विकिपीडिया

बाद में द वायर के ओपिनियन आर्टिकल के रेफरेंस लिंक को हटा दिया गया।

स्रोत: विकिपीडिया

यही नहीं, अपडेट के बाद अब लेख के पहले पैराग्राफ से ‘जय श्री राम’ नारे का उल्लेख हटा दिया गया।

स्रोत: विकिपीडिया

‘द वायर’ पर लिखे अपने लेख में अपूर्वानंद ने कई निराधार दावे किए थे। सबसे पहले झा ने दावा किया कि दूसरा सर्वे 19 नवंबर की रात को हुए शुरुआती सर्वे के ‘दो दिन बाद’ किया गया था। यह तथ्यात्मक रूप से गलत है, साथ ही द वायर की संपादकीय टीम की भी चूक है। सच ये है कि दूसरा सर्वे पाँच दिन बाद 24 नवंबर 2024 को किया गया था।

फोटो साभार: द वायर

अपूर्वानंद ने यह भी दावा किया कि सर्वे बिना किसी पूर्व सूचना के किया गया था। यह फिर से गलत है। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने एक्स पर साझा किया कि मस्जिद समिति को सर्वे के दूसरे दौर के बारे में एक दिन पहले 23 नवंबर 2024 को उचित दस्तावेज़ों के साथ सूचित किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि यह लेख 26 नवंबर 2024 को प्रकाशित हुआ था, जबकि वकील विष्णु शंकर जैन ने 25 नवंबर 2024 को ही यह जानकारी सार्वजनिक कर दी थी कि मस्जिद समिति को इस सर्वे के बारे में 23 नवंबर 2024 को ही सूचित किया गया था।

टेलीग्राफ की रिपोर्ट में समाजवादी पार्टी के नेता और संभल के सांसद जियाउर रहमान बर्क के हवाले से कहा गया है, “आयोग के साथ मौजूद कुछ लोग ‘जय श्री राम’ के नारे लगा रहे थे। जब स्थानीय लोगों ने इसका विरोध किया, तो पुलिस ने गोलियाँ चलाईं और चार लोगों की मौत हो गई।” बर्क ने आगे माँग की कि पुलिस अधिकारियों की पहचान की जाए और घटना के लिए उन पर मामला दर्ज किया जाए।

फोटो साभार: टेलीग्राफ

गौरतलब है कि बर्क को संभल हिंसा मामले में दर्ज सात एफआईआर में से एक में मुख्य आरोपित के तौर पर नामित किया गया है। बर्क पर घटना से दो दिन पहले अपने दौरे के दौरान इलाके में रहने वाले मुसलमानों को भड़काने का आरोप है। दिलचस्प बात यह है कि विकिपीडिया ने यह नहीं बताया कि किस ‘विपक्षी नेता’ ने दावा किया कि हिंसा ‘जय श्री राम’ के नारे के बाद हुई, जबकि पेज पर इसका उल्लेख किया गया था। इसके अलावा, बर्क पर मामला दर्ज होने की जानकारी केवल एक अलग सेक्शन में शामिल की गई थी।

दिलचस्प बात यह है कि बातचीत के दौरान दो संपादकों, Xoocit और Cerium4B के बीच चर्चा हुई, जिसमें बाद वाले ने जोर देकर कहा कि ‘जय श्री राम’ के नारे के कारण हिंसा हुई, इस दावे को बरकरार रखा जाना चाहिए। नारे लगाने की बात ‘दावों’ के तौर पर बरकरार रखी गई, जबकि इस बात के पर्याप्त सबूत थे कि ये नारे सुबह 11 बजे के बाद लगाए गए थे, जबकि हिंसा सुबह 9:30 बजे से पहले भड़की थी।

तस्वीर स्रोत: विकिपीडिया

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने वकील विष्णु शंकर जैन और प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा विवादित स्थल पर सर्वे के लिए अंदर जाने का वीडियो भी शेयर किया है। करीब 3 मिनट के इस वीडियो में ‘जय श्री राम’ के नारे लगाने का कोई संकेत नहीं था।

पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने भी सबूत शेयर करते हुए कहा कि नारे उस समय नहीं लगाए गए जब टीम विवादित स्थल में प्रवेश कर रही थी, बल्कि नारे सुबह 11 बजे के बाद लगाए गए। उस समय तक वकील विष्णु शंकर जैन वहाँ से निकल चुके थे।

इसके अलावा, उन्होंने संभल पुलिस द्वारा बरामद सीसीटीवी फुटेज भी साझा की, जिसमें नारे लगने से काफी पहले सुबह करीब साढ़े नौ बजे उपद्रवियों द्वारा सीसीटीवी कैमरा तोड़ते हुए देखा जा सकता है।

AMASR अधिनियम और पूजा स्थल अधिनियम के बारे में गलत फैक्ट चेक

संभल हिंसा पर विकिपीडिया पेज पर गौर करने वाली एक अहम बात ये है कि इस लेख में AMASR अधिनियम और पूजा स्थल अधिनियम के बारे में जिस फैक्ट चेक का लिंक को लगाया है, वो अपेक्षाकृत अज्ञात संस्थान/वेबसाइट का लिंक है। उस संस्थान का नाम टाइमलाइन डेली है। इस फैक्ट चेक वाले लेख में भी गलत फैक्ट्स दिए गए थे।

ऑपइंडिया ने डोजियर में निकाली थी विकिपीडिया के फर्जीवाड़े की हवा

बता दें कि ऑपइंडिया ने कुछ समय पहले विकिपीडिया द्वारा गलत सूचना परोसने और भारत के खिलाफ राजनीतिक रूप से प्रेरित पूर्वाग्रह पर एक विस्तृत डोजियर जारी किया था। उस डोजियर को इस लिंक पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है। ऑपइंडिया के शोध में पता चला है कि विकिपीडिया ने मुट्ठी भर लोगों को असीमित शक्तियाँ दे रखी हैं, जिन्हें ‘प्रशासक’ कहा जाता है।

ऑपइंडिया द्वारा डोजियर जारी करने के तुरंत बाद एक अन्य वामपंथी प्लेटफॉर्म फेसबुक ने डोजियर को बैन कर दिया, ताकि इसके दर्शकों की संख्या सीमित हो सके। फेसबुक पर अमेरिकी चुनावों में हस्तक्षेप करने और एक खास विचारधारा के राजनीतिक हित को आगे बढ़ाने के कई आरोप हैं।

अडानी के खिलाफ कैंपेन चलाने वाला OCCRP उस अमेरिकी एजेंसी USAID से लेती है पैसा जो भारत को निशाना बनाने के लिए कुख्यात, फ्रांस के अखबार ने किया खुलासा

भारत के बड़े कारोबारी समूह अडानी ग्रुप को निशाना बनाने वाला ऑर्गनाइज्ड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) अमेरिका से भारी फंडिंग लेता है। वही अमेरिकी एजेंसियाँ उसे पैसा देती हैं, जो भारत विरोधी कामों में लिप्त रही हैं। यह सारा खुलासा एक फ्रांसीसी अखबार ने अपनी रिपोर्ट में किया है।

OCCRP को 2007 में स्थापित किया गया था। यह दावा करता है कि विश्व के 6 महाद्वीपों में पत्रकारों का एक नेटवर्क है, जो इस अपराध और भ्रष्टाचार की रिपोर्टिंग में एक्सपर्ट हैं। OCCRP का दावा है कि वह पूरी तरह स्वतंत्र संस्थान है लेकिन अब फ्रांसीसी अखबार मीडियापार्ट ने खुलासा किया है कि यह अमेरिका के विदेश विभाग और एजेंसी USAID से पैसा लेते हैं।

मीडियापार्ट ने 2 दिसम्बर, 2024 को इस संबंध में एक खोजी रिपोर्ट प्रकाशित की है। ‘द हिडेन लिंक्स बिटवीन जायंट ऑफ़ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिज्म एंड यूएस गवर्मेंट’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट में मीडियापार्ट ने बताया है कि कैसे OCCRP पर अमेरिका की सरकार का बड़ा प्रभाव है।

मीडियापार्ट ने बताया, “जहाँ OCCRP खुद को पूरी तरह से स्वतंत्र बताता है, इसके मैनेजमेंट ने अमेरिका पर पूरी तरह से निर्भर कर दिया है। यह जानकारी इस जाँच में पता चली है।” मीडियापार्ट ने बताया है कि OCCRP का गठन ही अमेरिकी सरकार के पैसे से हुई थी।

किस तरह अमेरिकी पैसे पर जिंदा है OCCRP

मीडियापार्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अभी भी OCCRP की फंडिंग का लगभग 50% से अधिक अमेरिकी एजेंसियाँ देती हैं। यह एजेंसियाँ OCCRP में अपने लोगों को नियुक्त करती हैं। ड्रियू सुलिवान इनमें से एक हैं। मीडियापार्ट ने यह भी बताया कि OCCRP जहाँ अमेरिकी एजेंसियों से फंडिंग लेने की बात स्वीकारती है, वहीं यह नहीं बताती कि इसको कितनी फंडिंग मिलती है।

मीडियापार्ट ने यह भी बताया कि OCCRP अपने लेखों में भी कभी यह जानकारी नहीं दी कि उन्हें अमेरिका से फंडिंग मिलती है। USAID का OCCRP दखल कितना अधिक है, इसका अंदाजा USAID के एक अधिकारी की एक बात से लगाया जा सकता है।

USAID के यूरोप और यूरेशिया के सीनियर एडवाइजर माइक हेनिंग ने OCCRP को USAID की सबसे बड़ी उपलब्धि में से एक बताया था। OCCRP ने अपने रिकॉर्ड से भी यह बात हटा दी है कि अमेरिकी सरकार ने उसकी स्थापना में क्या रोल निभाया था।

इस रिपोर्ट में केवल यूनाइटेड नेशन द्वारा पैसे दिए जाने का उल्लेख किया है। ड्रयू सुलिवन ने दावा किया है कि यूनाइटेड नेशंस से मिला पैसा असल में OCCRP को मिला पहला फंड था। OCCRP को स्थापना के बाद से अब तक अमेरिकी सरकार से कम से कम 47 मिलियन डॉलर, यूरोपियन देशों (ब्रिटेन, स्वीडन, डेनमार्क, स्विट्जरलैंड, स्लोवाकिया और फ्रांस) से 14 मिलियन डॉलर तथा यूरोपियन यूनियन से 1.1 मिलियन डॉलर मिल चुके हैं। यह धनराशि OCCRP ने अपनी वेबसाइट पर नहीं बताई है।

OCCRP की रिपोर्टिंग पर अमेरिकी सरकार का प्रभाव

मीडियापार्ट के अनुसार, OCCRP ने एक और प्रोजेक्ट को भी चलाया है जिसके अंतर्गत यह उन रिपोर्ट के आधार पर कानूनी कार्रवाई करता है जिनकी इसने जाँच की है। दिलचस्प बात यह है कि तथाकथित ‘स्वतंत्र संगठन’ अमेरिकी सरकार की कभी आलोचना नहीं करता है।

इसकी अधिकांश रिपोर्ट रूस, माल्टा, साइप्रस और वेनेजुएला जैसे देशों के बारे में खूब एक्टिविज्म करता है। मीडियापार्ट ने खुलासा किया है कि अमेरिका के विदेश विभाग ने वेनेजुएला के भ्रष्टाचार को उजागर करने और उसका मुकाबला करने के मिशन के लिए OCCRP को 173,324 डॉलर भी दिए है।

वेनेजुएला पर अमेरिका ने सैंक्शन लाद रखे हैं। मीडियापार्ट ने कहा, “एक पत्रकार संगठन द्वारा अमेरिका की पहल पर और उससे पैसे लेकर ऐसी गतिविधियों का नेतृत्व करना, यहाँ तक ​​कि एक उचित कारण के लिए भी, महत्वपूर्ण नैतिक प्रश्न उठाता है।”

अडानी पर हमले का OCCRP का है इतिहास

अगस्त 2023 में, ऑपइंडिया ने भविष्यवाणी की थी कि OCCRP अमेरिका स्थित शॉर्ट सेलर ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ के नक्शेकदम पर चलते हुए भारतीय बाजार में उथल-पुथल मचाने की योजना बना रहा है।हमने खुलासा किया था कि OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF), फोर्ड फाउंडेशन और रॉकफेलर ब्रदर्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से फंड मिलता है।

OSF ने संगठन की क्रॉस-बॉर्डर रिपोर्टिंग को ‘मजबूत’ करने और प्रभाव बढ़ाने के लिए संगठित OCCRP को $8,00,000 (₹6.61 करोड़) का अनुदान भी दिया। ‘पत्रकारों के नेटवर्क’ ने अब तक दो हिट लेख प्रकाशित किए हैं। एक अगस्त 2023 में और दूसरा मई 2024 में। अडानी समूह और मॉरीशस स्थित फंड ‘360 वन’ द्वारा OCCRP के इन दावों को खारिज कर दिया गया।

यहाँ तक ​​कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भी फैसला सुनाया था कि OCCRP की रिपोर्ट का इस्तेमाल सेबी द्वारा चल रही जाँच पर संदेह जताने के लिए नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना किसी सत्यापन के किसी संगठन की रिपोर्ट पर सबूत के तौर पर भरोसा नहीं किया जा सकता।

मीडियापार्ट के खुलासे ऐसे समय में हुए हैं जब गौतम अडानी को रिश्वतखोरी के कथित आरोपों को लेकर अमेरिका में परेशान किया जा रहा है। गौरतलब है कि जिस USAID से OCCRP पैसा लेता है, वह कई देशों में सरकारें बदलने के लिए ज़िम्मेदार रहा है।

USAID का है सरकारें बदलने में इतिहास

USAID हाल ही में बांग्लादेश भी सत्ता परिवर्तन के खेल में शामिल था। USAID ने यहाँ ऐसी एजेंसियों को मदद दी थी जो शेख हसीना की सत्ता को अस्थिर करने के लिए लगी हुई थीं।बांग्लादेश में यह योजना अमेरिका ने 2019 से ही चालू कर दी थी। USAID ने यहाँ IRI नाम की एक संस्था को पैसा दिया था।

IRI ने इसके लिए एक कार्यक्रम चलाया और यह जनवरी 2021 तक चला । IRI ने कहा इस कायर्क्रम का उद्देश्य बांग्लादेश के भीतर उन लोगों को आवाज देना है, जो हसीना की दमनकारी सत्ता के विरुद्ध खड़े हो सकें। IRI ने अपने इस कार्यक्रम में LGBT, बिहारी और बाकी समुदायों के लोगों के समूहों को समर्थन दिया।

इसके तहत 77 ‘एक्टिविस्ट’ को ट्रेनिंग भी दी गई। इन लोगों को बड़ी धनराशि भी दी गई। इसका अर्थ यह लगाया जा सकता है कि अमेरिका उन लोगों को अपने पक्ष में बोलने के लिए तैयार कर रहा था जो हसीना का विरोध कर सकें। IRI ने 2021 में एक और प्रोग्राम चलाया था। इसके लिए उसे अमेरिकी एजेंसी NED से 9 लाख डॉलर की मदद मिली थी। इस कार्यक्रम के तहत IRI ने उन नेताओं को तैयार करने का लक्ष्य रखा था जो आगे जाकर बड़ी आवाज बन सकें। 

ईसाई बनने से किया इनकार तो जंजीरों से बाँधा, 1 महीने के बेटे से अलग कर इतना किया टॉर्चर कि मानसिक स्थिति हुई खराब: चल-फिर भी नहीं सकती

राजस्थान के सिरोही में धर्म परिवर्तन से इनकार कर पर एक महिला को बुरी तरह प्रताड़ित करने का मामला सामने आया है। महिला पर उसके ससुराल के लोग ही ईसाई बनने का दबाव डाल रहे थे। 2 दिसंबर 2024 को इस संबंध में शिकायत मिलने के बाद पुलिस मामले की जाँच कर रही है।

रिपोर्टों के अनुसार धर्मांतरण से इनकार करने पर महिला को जंजीरों से बाँध कर रखा गया था। उसके साथ मारपीट की गई। उसे उसके एक महीने के बेटे से अलग कर दिया गया। इतना टॉर्चर किया गया कि उसकी मानसिक स्थिति खराब हो गई है। अब वह चल-फिर भी नहीं सकती है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक मामला सिरोही जिले में आने वाले अनादरा थाना क्षेत्र के गाँव धानेरा का है। जगसी राम ने पुलिस में शिकायत दर्ज करवाई है। शिकायत में बताया है कि करीब 1 साल पहले उनकी बेटी की शादी दीपाराम से हुई थी। कुछ दिनों तक ससुराल में सब सही रहा, लेकिन बाद में उनकी बेटी के साथ मारपीट की जाने लगी। करीब 1 माह पहले उनकी बेटी एक बच्चे की माँ बनी।

शादी के कुछ दिनों बाद उनकी बेटी को पता चला कि उसका पति दीपाराम सोशल मीडिया पर ईसाई मत का प्रचार करता है। वह फोटो और वीडियो शेयर कर अन्य लोगों को भी ईसाई बनने के लिए उकसाया करता था। पोल खुलने के बाद दीपाराम अपनी पत्नी पर भी ईसाई बनने का दबाव बनाने लगा। उससे ईसाईयों के आयोजनों में जाने के लिए कहने लगा। जब पत्नी ने खुद को हिंदू बताते हुए ईसाई बनने से इनकार कर दिया। इसके बाद दीपाराम उसे बुरी तरह से टॉर्चर करने लगा।

दीपाराम के अलावा जेठ शंकर, उमाराम, जेठानी फूली देवी, मंजू और परिवार के अन्य सदस्य भी महिला को प्रताड़ित करने लगे। कथित तौर पर ये सभी लोग ईसाई बन चुके हैं और प्रार्थनाओं में भी शामिल होते थे। प्रताड़ना के बाद भी जब महिला धर्मांतरण को तैयार नहीं हुई तो ससुराल के लोगों ने उसे जंजीरों से बाँध दिया। उसे उसके बच्चे से अलग कर दिया।

महिला को टॉर्चर किए जाने की जानकारी मिलने पर उसके मायके वाले ससुराल पहुँचे। महिला को जंजीरों से मुक्त करवाया और मायके ले आए। इसके बाद पुलिस को शिकायत दी गई। शिकायत में बताया गया है कि अत्याचार से पीड़िता की मानसिक हालत खराब हो गई है। पीड़िता ठीक से चल-फिर भी नहीं पा रही है। पुलिस ने मामले का संज्ञान ले कर जाँच शुरू कर दी है। पुलिस अधीक्षक अनिल कुमार बेनीवाल के मुताबिक जाँच से निकले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

अपने ही पिता की चिता को जलते देख रहे इन दो बच्चों का दर्द बताने के लिए हमारे पास शब्द नहीं हैं, खुद पढ़िए कैसे एक मुस्लिम परिवार ने इन्हें कर दिया अनाथ

दिल्ली के नारायणा इलाके में शनिवार (30 नवंबर 2024) को 36 वर्षीय मनोज की चाकू घोंप कर हत्या कर दी गई। पुलिस ने इस मामले में अब तक कुल 7 आरोपितों को गिरफ्तार किया है, जिनमें 2 मुस्लिम महिलाएँ, 3 नाबालिग, मकसूद और मोहम्मद अख्तर नाम के दो आरोपित शामिल हैं। पुलिस के अनुसार, छह महीने पहले आरोपितों के परिवार ने मनोज के बड़े भाई प्रदीप को भी हत्या कर दी थी। दोनों हत्याओं की वजह प्रदीप द्वारा एक हिंदू लड़की के परिजनों को यह बताने की थी कि उनकी बेटी का अफेयर एक मुस्लिम लड़के से चल रहा था।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, शनिवार की रात मनोज अकेले कहीं जा रहे थे। इस दौरान मकसूद, मोहम्मद अख्तर, अंगूरी और जूही खातून ने अपने 3 नाबालिग परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर मनोज को घेर लिया और उसकी पिटाई शुरू कर दी। जब मनोज ने बचने की कोशिश की, तो आरोपितों ने उन पर चाकुओं के कई वार किए। गंभीर रूप से घायल मनोज को अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया।

मनोज की हत्या के बाद उनके पिता ने अपनी बेबसी बयाँ की। उन्होंने बताया, “प्रदीप के तीन बच्चे हैं, छोटे वाले बेटे के 2 बच्चे हैं। मेरे छोटे बेटे का मर्डर इसलिए किया गया था, क्योंकि मुस्लिम लड़के का हिंदू लड़की से अफेयर था। उसने लड़की के पिता को समझाया था, लेकिन इसके बाद वो लोग रंजिश रखने लगे।” इस बीच, मनोज के दोनों बच्चों की एक तस्वीर सामने आई है, जहाँ दोनों मासूम अपने पिता की चिता को मुरझाई आँखों से जलता देख रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि वो अब अपने पिता को कभी नहीं देख पाएँगे।

यह मामला साल 2024 के मई महीने से जुड़ा हुआ है, जब मनोज के भाई प्रदीप की भी चाकुओं से हत्या कर दी गई थी। पुलिस के मुताबिक, प्रदीप के हत्यारों में से एक नाबालिग लड़के का इलाके की एक हिंदू लड़की से प्रेम संबंध था। यह बात जब प्रदीप को पता चली, तो उसने लड़की के परिवार को यह बात बता दी, जिसके बाद लड़की के परिजनों ने उस पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दीं। इसके बाद लड़के ने गुस्से में आकर, अपने एक अन्य नाबालिग साथी के साथ मिलकर प्रदीप की हत्या कर दी।

इस हत्या के बाद पुलिस ने दोनों नाबालिगों को गिरफ्तार कर बाल सुधार गृह भेज दिया। इनमें से एक की जमानत जुलाई में और दूसरे की सितंबर में हो गई थी। इसके बाद आरोपितों का परिवार मनोज से भी रंजिश रखने लगा और उसे मारने की योजना बना रहा था।

शनिवार को पुलिस ने मकसूद, मोहम्मद अख्तर, अँगूरी, जूही खातून और 3 नाबालिगों को गिरफ्तार कर लिया। मामले की जाँच जारी है और अन्य कानूनी कार्रवाई की जा रही है। इस घटना के बाद नाराज हिंदू समुदाय ने मनोज की शव यात्रा के दौरान विरोध प्रदर्शन किया। पुलिस ने प्रदर्शनकारियों पर लाठीचार्ज किया, और मृतक के परिवार का आरोप है कि पुलिस ने उनके घर की महिलाओं तक को पीटा।

प्रेमी अब्दुल्ला के साथ मिलकर विजय को उसकी बीवी ने ही मार डाला, सुलभ शौचालय के पास मिली थी लाश: 9 साल की बेटी ने खोला हत्या का राज

हरियाणा के फरीदाबाद में 2 दिसंबर 2024 को विजय कुमार नाम के एक युवक की लाश सुलभ शौचालय के पास मिली थी। पुलिस जाँच से पता चला है कि उसकी हत्या उसकी ही बीवी रेखा ने अपने प्रेमी अब्दुल्ला के साथ मिलकर की थी। पुलिस दोनों की तलाश कर रही है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक घटना फरीदाबाद के एनआईटी नंबर 2 पुलिस चौकी क्षेत्र की है। यहाँ के शिवाजी पार्क इलाके में विजय कुमार अपनी पत्नी रेखा और 3 बेटियों के साथ रहता था। उसके घर में अब्दुल्ला का आना-जाना था। इसी दौरान अब्दुल्ला और रेखा के बीच नजदीकी बढ़ गई। दोनों को विजय ने भी आपत्तिजनक हालत में देखा था।

विजय ने रेखा को कई बार समझाया। उसे अब्दुल्ला से दूर रहने को कहता था। रेखा हर बार अपनी गलती मान लेती थी। लेकिन विजय के पीठ पीछे अब्दुल्ला से मिलना बंद नहीं किया। कुछ ही दिन पहले अचानक घर पहुँचे विजय ने दोनों को आपत्तिजनक हालत में पकड़ लिया था। इसको ले कर विजय और रेखा के बीच झगड़ा भी हुआ था।

इसके बाद 2 नवंबर को अचानक से विजय की लाश एक सुलभ शौचालय के बाहर मिली। घर में विजय की तीनों बेटियाँ थी, लेकिन रेखा फरार थी। पुलिस ने विजय की 9 साल की बेटी सोनम से बात की तो मामले का खुलासा हो गया। सोनम ने बताया कि 1 नवंबर को उसकी मम्मी (रेखा) और अब्दुल्ला ने मिल कर विजय को खूब पीटा था। इसी दौरान रेखा और अब्दुल्ला ने विजय के मुँह पर तकिया रखकर उसका दम घोंट दिया।

सोनम को यह सब देखते हुए रेखा ने पकड़ लिया था। इसके बाद उसे दूसरे कमरे में भेज दिया था। हत्या के बाद रेखा और अब्दुल्ला ने विजय के शव को पास के ही एक सुलभ शौचालय के पास फेंक दिया और फरार हो गए। पुलिस ने मृतक के भाई बलवीर की तहरीर पर रेखा और अब्दुल्ला के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत केस दर्ज कर लिया है।

मृतक के भाई बलवीर ने बताया कि विजय ने अपनी 25 लाख रुपयों की बीमा करवा रखी थी। बकौल बलवीर उसकी भाभी लालची थी और बीमा के इसी पैसे को हड़पने के लिए विजय की हत्या कर दी। विजय की तीनों बेटियों की देखभाल में खुद को असमर्थ बताते हुए बलवीर ने उन्हें बाल कल्याण समिति को सौंपने की माँग की है। विजय के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया गया है। रेखा और अब्दुल्ला की तलाश में पुलिस टीमें संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही है।

मोहम्मद युनुस के इशारे पर बांग्लादेश में हो रहा है हिंदुओं का कत्लेआम: शेख हसीना, खूनखराबे की उस साजिश का भी किया खुलासा जिसके कारण छोड़ना पड़ा देश

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने मौजूदा अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद युनुस पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि देश में हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों के पीछे मोहम्मद युनुस का हाथ है। शेख हसीना ने युनुस को इन हमलों का ‘मास्टरमाइंड’ बताते हुए कहा कि उनकी साजिश के तहत ही यह हिंसा हो रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, शेख हसीना जो 5 अगस्त के तख्तापलट के बाद भारत में हैं, ने कहा कि सत्ता में बने रहकर वह नरसंहार का हिस्सा नहीं बनना चाहती थीं। उन्होंने कहा, “मुझे सत्ता का लालच नहीं। मैं खूनखराबा रोकना चाहती थी, इसलिए देश छोड़ने का फैसला लिया। हथियारबंद लोग मेरी हत्या की योजना बना रहे थे। अगर मैं रुकती, तो नरसंहार होता।”

न्यूयॉर्क में अवामी लीग के कार्यकर्ताओं के कार्यक्रम को वर्चुअली संबोधित करते हुए शेख हसीना ने यह भी कहा कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हमले बढ़ते जा रहे हैं। हिंदुओं, बौद्धों और ईसाइयों को निशाना बनाया जा रहा है। 11 चर्च, कई मंदिर और यहाँ तक कि इस्कॉन पर भी हमले हुए हैं। उनके अनुसार, मोहम्मद युनुस एक तय योजना के तहत देश को अस्थिर कर रहे हैं।

इस्कॉन चटगांव के प्रमुख चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी ने हिंसा को और भड़काया है। इस गिरफ्तारी के खिलाफ शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे हिंदुओं पर जमात और बीएनपी के कार्यकर्ताओं ने हमले किए। इन हमलों में 50 से ज्यादा लोग घायल हो गए। कई हिंदू संगठनों ने इन घटनाओं के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया है।

बांग्लादेश की अपदस्थ प्रधानमंत्री शेख हसीना ने कहा कि इन हमलों का मकसद अल्पसंख्यक समुदाय को डराना और उन्हें देश से बाहर करना है। उन्होंने बताया कि बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) के नेता तारिक रहमान ने खुद कहा था कि अगर हत्याएं जारी रहीं तो सरकार नहीं टिकेगी।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अंतरिम युनुस सरकार के पाकिस्तान की ओर झुकाव के चलते बांग्लादेश के ऐतिहासिक नेताओं और स्थलों को अपमानित किया जा रहा है। बंगबंधु शेख मजीबुर रहमान की प्रतिमा तोड़ी गई, और उनकी तस्वीरें सरकारी दफ्तरों से हटा दी गईं। यहाँ तक कि उनके योगदान से जुड़े राष्ट्रीय अवकाश भी रद्द कर दिए गए हैं।

हिन्दू और जैन मंदिर को बनाते थे निशाना, मूर्तियाँ-कीमती सामान करते थे चोरी:अमीन उर पठान और यासीन शेख को पुलिस ने पकड़ा, बंगाल से अहमदाबाद आकर बनाया था ठिकाना

गुजरात के अहमदाबाद में पुलिस ने हिन्दू और जैन मंदिर से मूर्तियाँ चोरी करने वाला एक गैंग पकड़ा है। पुलिस ने इस गैंग के 2 चोर को गिरफ्तार किया है। इनमें से एक 32 साल का यासीन शेख जबकि दूसरा 30 वर्ष का अमीन उर पठान है। इसी गैंग के तीसरे चोर को भी बंगाल में पकड़ा गया है। इसका नाम अहसामुद्दीन है।

इन चोरों ने जैन और हिन्दू मंदिरों को निशाना बना कर कई जगह मूर्तियाँ चोरी की थीं। पुलिस ने बताया है कि इनके खिलाफ पहले से ही डेढ़ दर्जन मामले दर्ज हैं। यह पूरा खुलासा गुजरात के ही नवसारी के एक जैन मंदिर में हुई चोरी के बाद खुला। यहाँ बिलिमोरा इलाके में स्थित एक मंदिर में पुलिस को चोरी की शिकायत मिली थी।

चोरों ने यहाँ से मूर्तियों समेत कई अन्य कीमती सामान चुरा लिए थे। इसके अलावा गाँधीनगर के अदालज थानाक्षेत्र में भी एक मंदिर को निशाना बना कर मूर्तियों के साथ अन्य महँगी वस्तुएँ चोरी कर ली गईं थीं। इन चोरियों का खुलासा करने के लिए अहमदाबाद क्राइम ब्रांच की टीम को लगाया गया था।

पुलिस ने मामले की जाँच के बाद अमीन उर पठान और यासीन शेख नाम को चिन्हित किया। ये दोनों मूल रूप से पश्चिम बंगाल के निवासी निकले। अभी यह अहमदाबाद की चंदोला झील के पास बंगाली कॉलोनी में रह रहे थे। इन दोनों से जब पूछताछ की गई तो इन्होनें अपने गिरोह के तीसरे साथी के तौर पर अहसामुद्दीन शेख का नाम बताया।

पूछताछ में पता चला कि अहसामुद्दीन शेख गुजरात से ट्रेन पकड़ कर कोलकाता भाग रहा है। अहमदाबाद क्राइम ब्रांच ने पश्चिम बंगाल रेलवे पुलिस से सम्पर्क किया और अहसामुद्दीन को ट्रेन में ही गिरफ्तार कर लिया गया। अहसामुद्दीन भी मूलतः पश्चिम बंगाल का ही निवासी है।

गिरफ्तार किए गए अमीन उर पठान और यासीन शेख के पास से लगभग ₹7 लाख के सामान बरामद किए गए हैं। ये सामान मंदिरों से चोरी कर के जुटाए गए थे। दोनों चोरों से हुई पुलिस की पूछताछ में 5 ऐसे पुराने मामलों से भी पर्दा उठ गया जिसका अब तक खुलासा नहीं हो पाया था।

इसमें गुजरात के अलग-अलग जगहों में घरों व मंदिरों में की गई चोरी शामिल है। पुलिस को यह भी पता चला कि यासीन और अमीन उर के खिलाफ साल 2013 से 2018 के बीच लगभग 16 केस दर्ज किए गए हैं। इसमें से 10 मुकदमे अमीन उर पठान जबकि 6 केस यासीन शेख पर दर्ज हैं।

क्राइम ब्रांच की पूछताछ में यह भी सामने आया है कि अमीन उर पठान का गिरोह पहले घरों व मंदिरों की रेकी कर के अपने टारगेट सेट करता था। बाद में मौका देख कर यहाँ हाथ साफ कर दिया जाता था। यह भी सामने आया है कि इन्होने कई और जगहों को निशाने पर लिया था लेकिन उससे पहले ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

अजमेर दरगाह से 450 मीटर दूर एक और मस्जिद, इसका भी हो सर्वे… मंदिर और संस्कृत यूनिवर्सिटी तोड़ कर बनाया था: डिप्टी मेयर ने की माँग

राजस्थान के अजमेर में स्थित अढाई दिन का झोपड़ा मस्जिद के सर्वे की माँग उठी है। यह माँग अजमेर दरगाह के सर्वे की याचिका स्वीकार किए जाने के बाद उठाई गई है। यह दोनों पास में ही स्थित हैं। अजमेर के डिप्टी मेयर नीरज जैन ने कहा है कि पहले यह संस्कृत विश्वविद्यालय और मंदिर था। नीरज जैन ने ASI से इसका सर्वे और संरक्षण करने की माँग की है।

नीरज जैन ने कहा, “यह पाठशाला करीब 1000 साल पुरानी है और यहाँ स्वास्तिक के निशान, घंटियाँ और संस्कृत में लिखे शिलालेख पाए गए हैं। इसके बाद भी इस जगह पर अवैध कब्जा किया गया है। हम पहले माँग कर चुके हैं कि इस संस्कृत पाठशाला से अवैध कब्जा हटाया जाए और जो अनैतिक गतिविधियाँ हो रही हैं उन्हें रोका जाए। हम चाहते हैं कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) इसे अपने कब्जे में लेकर संरक्षित और संवर्धित करें, जैसे नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्निर्माण किया गया है।”

नीरज जैन ने कहा, “हाल ही में जैन संतों ने भी इस जगह का दौरा किया था और महसूस किया कि यहाँ एक जैन मंदिर भी था, क्योंकि यहाँ जैन धर्म से सम्बन्धित मूर्तियाँ मिली हैं। उनका मानना ​​है कि यह स्थान ना केवल धार्मिक आस्था का केंद्र था, बल्कि यहाँ संस्कृत की शिक्षा भी दी जाती थी। इस जगह का जिक्र कई ऐतिहासिक किताबों में भी मिलता है। मैं केंद्र और राज्य सरकारों से अनुरोध करता हूँ कि वह इस स्थान को संरक्षित करने और इसके गौरव को वापस लाने के लिए कदम उठाएँ।”

अढाई दिन का झोपड़ा का इतिहास

आज जिसे ‘अढाई दिन का झोंपड़ा‘ कहा जाता है, वो मूल रूप से विशालकाय संस्कृत महाविद्यालय (सरस्वती कंठभरन महाविद्यालय) हुआ करता था, जहाँ संस्कृत में ही विषय पढ़ाए जाते थे। यह ज्ञान और बुद्धि की हिंदू देवी माता सरस्वती को समर्पित मंदिर था। इस भवन को महाराजा विग्रहराज चतुर्थ ने अधिकृत किया था। वह शाकंभरी चाहमना या चौहान वंश के राजा थे। कई दस्तावेजों के अनुसार, मूल इमारत चौकोर आकार की थी। इसके हर कोने पर एक मीनार थी।

भवन के पश्चिम दिशा में माता सरस्वती का मंदिर था। 19वीं शताब्दी में, उस स्थान पर एक शिलालेख (स्टोन स्लैब) मिली थी जो 1153 ई. पूर्व की थी। विशेषज्ञों का मानना है कि शिलालेख के आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मूल भवन का निर्माण 1153 के आसपास हुआ था। हालाँकि, कुछ स्थानीय जैन किंवदंतियों का कहना है कि इमारत सेठ वीरमदेव कला द्वारा 660 ई में अधिकृत किया गया था। यह एक जैन तीर्थ के रूप में बनाया गया था और पंच कल्याणक माना जाता था।

मस्जिद में परिवर्तन

कहानी के अनुसार, 1192 ई. में, मुहम्मद गोरी ने महाराजा पृथ्वीराज चौहान को हराकर अजमेर पर अधिकार कर लिया। उसने अपने गुलाम सेनापति कुतुब-उद-दीन-ऐबक को शहर में मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया। ऐसा कहा जाता है कि उसने ऐबक को 60 घंटे के भीतर मंदिर स्थल पर मस्जिद के एक नमाज सेक्शन का निर्माण करने का आदेश दिया था ताकि वह नमाज अदा कर सके। चूँकि, इसका निर्माण ढाई दिन में हुआ था, इसीलिए इसे ‘अढाई दिन का झोंपड़ा’ नाम दिया गया।

हालाँकि, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि यह सिर्फ एक किंवदंती है। मस्जिद के निर्माण को पूरा करने में कई साल लग गए। उनके अनुसार, इसका नाम ढाई दिन के मेले से पड़ा है, जो हर साल मस्जिद में लगता है। मस्जिद के केंद्रीय मीनार में एक शिलालेख है जिसमें इसके पूरा होने की तारीख जुमादा II 595 AH के रूप में उल्लेखित है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह तारीख अप्रैल 1199 ई है। बाद में, कुतुब-उद-दीन-ऐबक के उत्तराधिकारी इल्तुतमिश ने 1213 ई में मस्जिद में और निर्माण करवाया था।

मस्जिद पर सीता राम गोयल की रिपोर्ट

प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम गोयल ने अपनी पुस्तक ‘हिंदू टेंपल: व्हाट हैपन्ड टू देम’ (‘Hindu Temples: What Happened To Them’) में मस्जिद का उल्लेख किया है। उन्होंने लेखक सैयद अहमद खान की पुस्तक ‘असर-उस-सनदीद’ का हवाला दिया, जिसमें उन्होंने उल्लेख किया था कि अजमेर की मस्जिद, यानी अढाई दिन का झोंपड़ा, हिंदू मंदिरों की सामग्री का उपयोग करके बनाई गई थी।

मस्जिद पर अलेक्जेंडर कनिंघम की रिपोर्ट

अलेक्जेंडर कनिंघम को 1871 में ASI के महानिदेशक के रूप में नियुक्त किया गया था। उन्होंने ‘चार रिपोर्ट्स मेड ड्यूरिंग द इयर्स, 1862-63-64-65’ में मस्जिद का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। कनिंघम ने उल्लेख किया कि स्थल का निरीक्षण करने पर, उन्होंने पाया कि यह कई हिंदू मंदिरों के खंडहरों से बनाया गया था। उन्होंने कहा, “इसका नाम ‘अढाई दिन का झोंपड़ा’ इसके निर्माण की तेज गति को दिखाता है और यह केवल हिंदू मंदिरों के तैयार मुफ्त सामग्री के इस्तेमाल से ही संभव था।”

कनिंघम ने आगे रिपोर्ट में मस्जिद का दौरा करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य के लेफ्टिनेंट-कर्नल जेम्स टॉड का हवाला दिया। टॉड ने कहा था कि पूरी इमारत मूल रूप से एक जैन मंदिर हो सकती है। हालाँकि, उन्होंने उन पर चार-हाथ वाले कई स्तंभ भी पाए जो स्वभाविक रूप से जैन के नहीं हो सकते थे। उन मूर्तियों के अलावा, देवी काली की एक आकृति थी।

उन्होंने आगे कहा, “कुल मिलाकर, 344 स्तंभ थे, लेकिन इनमें से दो ही मूल स्तंभ थे। हिंदू स्तंभों की वास्तविक संख्या 700 से कम नहीं हो सकती थी, जो 20 से 30 मंदिरों के खंडहर के बराबर है। रिपोर्टों के अनुसार, 1990 के दशक तक, मस्जिद के अंदर कई प्राचीन हिंदू मूर्तियाँ बिखरी हुई थीं। 90 के दशक में, एएसआई ने उन्हें संरक्षित करने के लिए एक सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट कर दिया था। अब यह पूरा मामला भी कोर्ट में ले जाए जाने की माँग हो रही है।

‘तिलक-भगवा, तुलसी माला छोड़ो, छुप-छुप कर करो पूजा’: इस्लामी कट्टरपंथियों से बचने को ISKCON की सलाह, चिन्मय कृष्ण दास के वकील पर हमला, ICU में हालत गंभीर

बांग्लादेश में इस्लामी कट्टरपंथियों के हिन्दुओं पर अत्याचार बढ़ते जा रहे हैं। उन्होंने बीते दिनों में विशेष कर ISKCON को निशाना बनाया है। अब ISKCON कोलकाता ने अपने अनुयायियों की सुरक्षा को देखते हुए कहा है कि वह बांग्लादेश में ना ही तिलक लगाएँ और ना ही भगवा वस्त्र पहनें। ISKCON ने साधुओं को सलाह दी है कि वह अपने इष्ट की पूजा छुप-छुप कर करें। इस बीच इस्लामी कट्टरपंथियों ने गिरफ्तार किए गए हिन्दू संत चिन्मय दास के वकील रामेन रॉय पर जानलेवा हमला किया। उनका अब ICU में इलाज चल रहा है।

ISKCON कोलकाता के प्रवक्ता और उपाध्यक्ष राधारमण दास ने बांग्लादेश में मौजूद ISKCON अनुयायियों और साधुओं को अपनी सुरक्षा को प्राथमिकता बनाने को कहा है। उन्होंने कहा, “मैं सभी साधुओं और सदस्यों को सलाह दे रहा हूँ कि संकट की इस घड़ी में उन्हें खुद को बचाने और संघर्ष से बचने के लिए काफी सावधान रहना चाहिए। मैंने उन्हें भगवा कपड़े पहनने और माथे पर तिलक लगाने से बचने का सुझाव दिया है।”

राधारमण दास ने आगे कहा, “अगर उन्हें भगवा वस्त्र और तुलसी माला पहनने की ज़रूरत महसूस होती है, तो उन्हें इसे बाकी कपड़ों के अंदर छिपाकर रखना चाहिए और यह गर्दन के आसपास दिखाई नहीं देना चाहिए। अगर संभव हो तो उन्हें अपने सिर को भी ढकना चाहिए। कुल मिलाकर, उन्हें वह हर संभव उपाय करना चाहिए जिससे वे साधुओं की तरह न दिखें।”

राधारमण दास ने कहा कि बीते एक सप्ताह में बांग्लादेश के भीतर ISKCON के अनगिनत साधुओं और अनुयायियों को धमकियाँ मिल चुकी हैं। उन्होंने कहा है कि ऐसे समय में जो भी उपाय सुरक्षा के लिए जरूरी हो, वह करना चाहिए। उन्होंने बांग्लादेश में गिरफ्तार किए गए साधु चिन्मय कृष्ण दास पर भी चिंता जताई है। उन्होंने कहा है कि कुछ दिन पहले तक उनके सचिव से बात हो जाती थी, लेकिन बीते कुछ दिनों से यह भी संभव नहीं हो पा रहा है।

बांग्लादेश में कथित देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार चिन्मय कृष्ण दास का मुकदमा लड़ना भी एक हिन्दू वकील के लिए भारी पड़ा है। इस्लामी कट्टरपंथियों ने चिन्मय कृष्ण दास के वकील रामेन रॉय पर जानलेवा हमला किया है। इस हमले में वह गंभीर रूप से घायल हैं। उनका बांग्लादेश में ICU में इलाज चल रहा है। उनके इस हमले की जानकारी राधारमण दास ने दी है। उन्होंने रामेन रॉय के जल्द स्वस्थ होने की कामना की है। रामेन रॉय पर हमले को लेकर लोगों ने गुस्सा जताया है।

गौरतलब है कि बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस सरकार के अंतर्गत लगातार हिन्दू निशाने पर हैं। कई जगह इस्लामी कट्टरपंथी हिन्दू मंदिरों पर हमला कर रहे हैं, वह ISKCON की कई शाखाओं को भी बंद करवा चुके हैं। इस्लामी कट्टरपंथी लगातार ISKCON के लोगों को निशाना बना रहे हैं। हाल ही में यूनुस सरकार ने सारे कागज होने के बावजूद 63 साधुओं को बांग्लादेश से भारत नहीं आने दिया था। इससे पहले चिन्मय कृष्ण दास को जमानत नहीं दी गई थी। इसका विरोध करने पर हिन्दुओं को भी निशाना बनाया गया था।