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ट्विटर (X) से सूचनाएँ लेगा पर खबरें नहीं देगा ब्रिटेन का ‘द गार्डियन’, फ्रांस की मीडिया कंपनियों ने एलन मस्क के प्लेटफॉर्म पर ठोका मुकदमा: जानिए क्यों

फ्रांस के प्रमुख समाचार संगठनों ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) के खिलाफ मुकदमा दायर किया है। मुकदमा करने वाले इस ग्रुप में Le Monde, Le Figaro, Les Echos, Le Parisien, Télérama, Courrier International, Le Huffington Post, Malesherbes Publications, और Le Nouvel Obs शामिल हैं। उन्होंने आरोप लगाया है कि यह प्लेटफॉर्म उनकी खबरों को बिना भुगतान के इस्तेमाल कर रहा है।

फ्रांसीसी कानून में यूरोपीय निर्देशों के तहत ‘Neighboring Rights‘ का प्रावधान है, जिसके अनुसार सोशल मीडिया कंपनियों को समाचार सामग्री के पुनःप्रकाशन के लिए भुगतान करना होता है। इन मीडिया कंपनियों ने पहले भी आपातकालीन आदेश की माँग की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि एक्स बातचीत करने से बच रहा है।

इसके बाद 24 मई को पेरिस की एक अदालत ने मीडिया कंपनियों के पक्ष में फैसला सुनाया और एक्स को दो महीने का समय दिया ताकि वह उनके कंटेंट से होने वाली आय से संबंधित डेटा प्रदान कर सके। हालाँकि, अब तक एक्स ने इस आदेश का पालन नहीं किया, जिससे मीडिया संस्थानों ने इसे कानून की अनदेखी बताते हुए 12 नवंबर 2024 को फिर से मुकदमा दायर किया है।

गार्डियन ने बंद की आर्टिकल शेयरिंग

इसी बीच, The Guardian ने घोषणा की है कि वह अब एक्स पर अपनी संपादकीय सामग्री पोस्ट नहीं करेगा। गार्डियन का मानना है कि इस प्लेटफॉर्म पर बने रहने से होने वाले फायदे अब उसके नुकसान से कम हैं। गार्डियन का यह निर्णय लंबे समय से चल रहे विचार-विमर्श का नतीजा है, जिसमें उन्होंने देखा कि एक्स पर कई बार विवादास्पद सामग्री जैसे दक्षिणपंथी साजिशों और नस्लवाद को बढ़ावा दिया जाता है।

गार्डियन के संपादकीय स्टाफ का कहना है कि वे पत्रकारिता के लिए इस प्लेटफॉर्म का उपयोग जारी रखेंगे, लेकिन उनकी प्राथमिकता अब अपनी वेबसाइट और अन्य माध्यमों पर सामग्री साझा करने की होगी। समाचार संगठन एक्स का उपयोग अपने कंटेंट को बढ़ावा देने के लिए एक माध्यम के रूप में कर सकते हैं, लेकिन मौजूदा समय में गार्डियन का मानना है कि इस प्लेटफॉर्म का महत्व कम हो गया है।

‘पहले यहाँ जंगल था, अब यहाँ सिर्फ मुसलमानों के घर हैं’: झारखंड में घुसपैठ ने कैसे बदले हालात स्थानीय लोगों ने बताए, कहा- अब ST के लिए कोई जगह नहीं बची, शादी कर हड़प रहे जमीन

झारखंड में 13 नवंबर 2024 को एक चुनावी सभा के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्य में घुसपैठ का मुद्दा फिर उठाया। उन्होंने जनता को समझाया कि कैसे राज्य में बढ़ रही विदेशी घुसपैठियों की तादाद झारखंडियों की पहचान बदलने की एक साजिश है और इन घुसपैठियों को बल झारखंड मुक्ति मोर्चा और कॉन्ग्रेस से मिला है।

उन्होंने बताया कि JMM और कॉन्ग्रेस ने इन घुसपैठियों को झारखंड में स्थानीय बनाया, फिर यहाँ बसकर इन्होंने जनजातीय लड़कियों को ठगा और उनसे शादी करके न केवल झारखंडियों की जमीनें हड़पीं बल्कि रोजी रोटी तक छीन ली। पीएम मोदी कहते हैं कि बावजूद इतना सब होने के राज्य सरकार ने कोर्ट में दोहरा रवैया दिखाते हुए कहा कि झारखंड में कोई घुसपैठ हुई ही नहीं है।

बता दें कि राज्य की सोरेन सरकार इस गंभीर मुद्दे से जहाँ आँख मूँदे बैठी है वहीं भारतीय जनता पार्टी ने अपने संकल्प पत्र में इस समस्या से निपटने का वादा किया है। उन्होंने अपने संकल्प पत्र में झारखंड में उद्योगों, खदानों के कारण विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए आयोग का गठन करने को तो कहा ही है। साथ ही भाजपा ने झारखंड में घुसपैठियों से जमीन वापस लेने के लिए कानून बनाने, हिंदुओं पर होने वाले हमले, अत्याचार और चरम पर पहुँचे तुष्टीकरण को रोकने का वादा भी किया है।

भाजपा के इस प्रकार इस मुद्दे के उठाने के बाद घुसपैठ की हकीकत पर स्थानीय भी मुखर होकर बोलने लगे हैं। बीते कई दिनों से ऐसी कई रिपोर्टें आई जिनमें स्थानीयों ने बदलती डेमोग्राफी और उससे उत्पन्न समस्याओं को खुलकर मीडिया के सामने रखा। जैसे रिपब्लिक वर्ल्ड पर प्रकाशित एक एक्सक्लूसिव रिपोर्ट में साहिबगंज और पाकुर जिलों में हो रही अवैध घुसपैठ की बात सामने आई।

स्थानीयों ने बताया कि घुसपैठिए झारखंड के जनजातीय जिलों को निशाना बना रहे हैं। वो केवल फर्जी आधार कार्ड लेकर राज्य में नहीं घुस रहे बल्कि उनका मकसद तो जमीन हड़पना और लोगों में डर बैठाना है। पहले उनके निशाने पर सिर्फ जनजातीय समाज था, मगर अब उनकी बढती आबादी का असर हिंदुओं पर भी पड़ रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार रिपब्लिक की विशेष जाँच टीम से बात करते हुए एक स्थानीय महिला ने बताया, “पहले यहाँ जंगल हुआ करता था, लेकिन अब यहाँ सिर्फ मुसलमानों के घर हैं। यहाँ महिलाएँ नौकरी की तलाश में जाती हैं, लेकिन बदले में उन्हें अपनी जमीन देने को कहा जाता है। अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए कोई जगह नहीं बची है।”

गाँव के मुखिया देबू ने बताया, “ये लोग पहले गरीब जनजातीय महिलाओं से शादी करते हैं फिर परिवार से जमीन पर माँगते हैं।” वहीं, अन्य निवासियों ने बताया कि पिछले महीने इन्हीं घुसपैठियों ने एक गाय की हत्या की और जब उन लोगों ने ऐसा करने से मना किया तो उन्हें ये कहकर धमकाया गया- हम तो इसे काटेंगे, तुम क्या कर लोगे?

इसी तरह कुछ दिन पहले सोशल मीडिया पर झारखंड में चुनावी रिपोर्टिंग करने गईं अदिति त्यागी की रिपोर्ट वायरल हुई थी। रिपोर्ट मधुपुर से थी। जहाँ अदिति त्यागी से बात करते हुए बुजुर्ग ने भावुक बताते होकर बताया था कि कैसे मुस्लिम आबादी उन लोगों को कुएँ से पानी नहीं भरने देते और उनके मुस्लिम मंत्री हफीजुल अंसारी द्वारा कहा जाता है कि वो हिंदू हैं इसलिए पानी नहीं ले सकते।

गौरतलब है कि डेमोग्राफी में आए बदलाव का मुद्दा कोर्ट में भी है। याचिका डालते हुए याचिकाकर्ता ने बताया था कि कैसे समय के स्थिति बद्तर हो रही हैं। बॉर्डर इलाकों से घुसपैठिए झारखंड में एंट्री ले रहे हैं और राज्य की जनसांख्यिकी बदल रही है।

रिपोर्ट्स के अनुसार तो संथाल परगना जैसे इलाकों में तो डेमोग्राफी में आया बदलाव बहुत बड़ा है। सितंबर में आई रिपोर्ट्स बताती हैं कि पहले वहाँ जनजातीय समाज की हिस्सेदारी 44 फीसदी थी लेकिन अब ये घटकर 28 फीसदी रह गई है। वहीं प्रमंडल के छह जिलों की डेमोग्राफी में मुस्लिम 20 से 40 फीसदी बढ़े हैं। सबसे ज्यादा बढ़ोतरी पाकुड़ और साहिबगंज में ही हुई है। ये लोग यहाँ आकर मदरसे बनाते हैं, स्थानीय लड़कियों से शादी करते हैं और फिर यहाँ बसने के बाद अब एजेंडा चलाना शुरू करते हैं।

बिहार के एक अस्पताल से शुरू हुई दलित लड़के-मुस्लिम लड़की की प्रेम कहानी, मुंबई में रघुनंदन को काटकर मोहम्मद सत्तार ने कर दिया अंत: 7 टुकड़ों में मिली लाश

मुस्लिम लड़की से प्रेम की वजह से बिहार के रघुनंदन पासवान (21 साल) की मुंबई में हत्या कर दी गई। उसका शव सात टुकड़ों में मुंबई के गोराई में मिला। इस हत्याकांड को मोहम्मद सत्तार और अन्य आरोपितों ने मिलकर अंजाम दिया था, जिसमें सत्तार को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है।

पुलिस के अनुसार, इस हत्या की वजह अंतरधार्मिक प्रेम संबंध हो सकता है। दरभंगा के रघुनंदन पासवान का 17 वर्षीय मुस्लिम प्रेमिका से संबंध था, जिससे लड़की के परिवार के लोग नाराज थे। लड़की के परिवार वालों खासकर मोहम्मद सत्तार ने रघुनंदन के करीबी दोस्त के साथ मिलकर इस हत्या की साजिश रची और उसे मौत के घाट उतार दिया।

हत्या के दिन यानी 31 अक्टूबर 2024 को सत्तार और लड़की के भाइयों ने रघुनंदन को मुंबई आने का झांसा दिया। उसे मीरा-भायंदर के घर में बुलाया गया, जहाँ शराब के नशे में एक पार्टी के दौरान फोन पर रघुनंदन की बात उसकी प्रेमिका से कराई गई। जैसे ही ये साफ हुआ कि रघुनंदन अब भी लड़की के साथ संबंध में है, तो सत्तार ने गुस्से में आकर धारदार चाकू से उस पर हमला कर दिया। शव को भयानक तरीके से सात हिस्सों में काटा गया, जिससे क्रूरता की हदें पार हो गईं। इसके बाद शव के टुकड़ों को पेंट के चार डिब्बों में भरकर गोराई के सुनसान इलाके में फेंक दिया गया।

रघुनंदन के पिता जितेंद्र पासवान ने सोशल मीडिया पर अपने बेटे के शव की तस्वीर देखी। शव की पहचान उसके दाएँ हाथ पर बने “RA” टैटू से हुई, इसमें R से रघुनंदन और A उसकी प्रेमिका के नाम का शुरुआती शब्द था। जितेंद्र पासवान ने बताया कि उनके बेटे की जान को पहले भी लड़की के भाइयों से खतरा था, जिन्होंने उसे धमकियाँ दी थीं।

अस्पताल से शुरू हुई प्रेम कहानी का खौफनाक अंत

रघु के पिता जितेंद्र पासवान ने गोराई पुलिस को बताया कि उसका परिवार बिहार के दरभंगा जिले के मनीगाछी थाने के कन्हौली गाँव का रहने वाला है। रघुनंदन दरभंगा के अस्पताल में सिक्योरिटी गार्ड का काम करता था। उसके ही गाँव की रहने वाली मुस्लिम लड़की अपनी भाभी का इलाज कराने उसी अस्पताल जाती थी, जहाँ रघुनंदन से उसके प्रेम-संबंध बन गए। इस मामले में हल्ला मचा, तो पंचायत कराई गई, जिसके बाद रघुनंदन पुणे चला गया। यहीं से उसे मीरा-भायंदर बुलाकर लड़की के भाई ने 7 टुकड़ों पर काट डाला और उसे ऑटो पर लादकर फेंक दिया। लड़की का भाई मुंबई में बकरा बेचने का काम करता है।

इस घटना के बाद मोहम्मद सत्तार को गिरफ्तार कर लिया गया है, और अन्य आरोपितों की तलाश जारी है। रघुनंदन के इस क्रूर अंत ने न केवल परिवार बल्कि पूरे गाँव को सदमे में डाल दिया है।

ट्रंप सरकार में हिंदू नेता भी, जानिए कौन हैं तुलसी गबार्ड जो होंगी अमेरिकी इंटेलीजेंस की मुखिया: बांग्लादेशी हिंदुओं के लिए भी उठा चुकी हैं आवाज

अमेरिका के राष्ट्रपति चुने के जाने के बाद डोनाल्ड ट्रम्प ने जनवरी में अपना कार्यकाल चालू होने से पहले ही महत्वपूर्ण नियुक्तियाँ चालू कर दी हैं। इसी कड़ी में ट्रम्प ने अमेरिका की पहली हिन्दू सांसद तुलसी गबार्ड को डायरेक्टर ऑफ़ नेशनल इंटेलिजेंस (DNI) नियुक्त किया है। उनका यह कार्यकाल जनवरी, 2025 से चालू होगा।

डोनाल्ड ट्रम्प ने गुरुवार (14 नवम्बर, 2024) को यह नियुक्ति की है। उन्होंने एक्स (पहले ट्विटर) पर डोनाल्ड तुलसी गबार्द के नाम का ऐलान करते हुए लिखा, “दशकों से तुलसी हमारे देश और सभी अमेरिकियों के लिए लड़ती रही हैं। राष्ट्रपति पद के लिए नामांकन में भाग लेने वाली तुलसी को दोनों पार्टियों में अच्छा समर्थन भी है।”

ट्रम्प ने आगे लिखा, ”अब वह एक रिपब्लिकन हैं! मुझे पता है कि तुलसी अपने शानदार करियर को परिभाषित करने वाली निडर भावना को हमारी इंटेलिजेंस कम्युनिटी में लाएँगी। वह हमारे संवैधानिक अधिकारों की वकालत करेगी और शांति भी सुनिश्चित करेगी। तुलसी हम सभी को गौरवान्वित करेंगी।” तुलसी गबार्ड ने अपनी नियुक्ति पर ट्रम्प को धन्यवाद दिया है।

DNI अमेरिका में काफी ताकतवर पद होता है और CIA समेत थल सेना, नौसेना और वायुसेना तक की खुफिया शाखाएँ इसी के अंतर्गत काम करती हैं। CIA का मुखिया सीधे तौर पर DNI को जवाबदेह होता है। DNI के अंतर्गत 10 से अधिक खुफिया एजेंसियाँ होती हैं। DNI सीधे तौर पर इनसे आई जानकारियाँ अमेरिकी राष्ट्रपति को देता है।

तुलसी गबार्ड पूर्व में डेमोक्रेट पार्टी की सदस्य थीं लेकिन 2020 के बाद उनका मोहभंग हो गया और ट्रम्प की समर्थक बन गईं। उन्होंने 2022 में ट्रम्प को समर्थन दिया था। अब वह अमेरिका में खुफिया नेटवर्क का नेतृत्व करेंगी। अमेरिकी कैबिनेट में यह महत्वपूर्ण जगह पाने वाली वह पहली भारतीय-अमेरिकी हैं।

तुलसी गबार्ड ने अमेरिकी सेना में भी अपनी सेवाएँ दी हैं। उन्होंने ईराक, कुवैत और अफ्रीका समेत बाकी जगहों पर सैन्य सेवाएँ दी हैं। वह वर्तमान में अमेरिकी सेना के रिजर्व बलों में लेफ्टिनेंट कर्नल हैं। तुलसी गबार्ड अमेरिकी कॉन्ग्रेस में चुनी जाने वाली पहली हिन्दू महिला थीं।

तुलसी गबार्ड हिन्दुओं के अधिकारों को लेकर भी बोलती आई हैं। उन्होंने 2021 में अमेरिकी कॉन्ग्रेस में एक बिल भी पेश किया था जिसमें बांग्लादेशी हिन्दुओं और बाकी अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लकर बात कही गई थी। उन्होंने इस बिल में पाकिस्तान और पाकिस्तानी फ़ौज की भी आलोचना की थी।

तुलसी गबार्ड पाकिस्तान और उसके द्वारा भारत में फैलाए गए आतंक को लेकर भी लगातार बोलती रही हैं। उन्होंने 2019 में पुलवामा में फिदायीन हमले के बाद पाकिस्तान पर कड़ी कार्रवाई की माँग की थी। उन्होंने कहा था कि जब तक पाकिस्तान इन आतंकियों को पालना पोसना बंद नहीं करेगा तब तक शांति स्थापित नहीं हो सकती।

तुलसी गबार्ड की नियुक्ति के बाद विदेशी सम्बन्धों के विशेषज्ञ इस बात की आशा जता रहे हैं कि अब भारत और अमेरिका की खुफिया एजेंसियों के बीच सामंजस्य और मजबूत होगा। साथ ही में पाकिस्तान पर भी आतंक को मदद ना करने का दबाव बढ़ने की उम्मीद जताई जा रही है।

भारत माता की मूर्ति क्यों उठवाई: मद्रास हाई कोर्ट ने तमिलनाडु पुलिस की कार्रवाई को बताया ‘अत्याचार’, कहा- BJP को वापस करो

तमिलनाडु के विधुनगर जिले में स्थित भारतीय जनता पार्टी के कार्यालय से भारत माता की उठाई गई मूर्ति अब चेन्नई पुलिस को वापस बीजेपी ऑफिस में देनी होगी। मद्रास हाईकोर्ट ने इस मामले में सुनवाई करते हुए आदेश दिए हैं। कोर्ट ने इस तरह किसी के निजी स्थान से मूर्ति उठाने को एक तरह का ‘अत्याचार’ बताया और कहा कि मूर्ति को उसके मालिक को वापस किया जाए।

जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ये राज्य का अधिकार नहीं है कि वो किसी के निजी स्थान पर जाकर इस तरह कोई संपत्ति उठाए। ये भविष्य में भी करने की अनुमति नहीं दी जाती। अदालत ने मामले के संबंध में फैसला सुनाते हुए कहा, “हमारे मन में कोई संदेह नहीं है कि प्रतिवादी ने निजी संपत्ति से भारत माता की मूर्ति हटाई, शायद उनपर ऐसा किसी ने ऐसा करने का दबाव डाला हो, लेकिन ये बेहद निंदनीय है।”

कोर्ट ने कहा, “हम एक कल्याणकारी राज्य में रह रहे हैं, जो कानून के द्वारा शासित है। इसलिए, भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने वाले संवैधानिक न्यायालय द्वारा इस तरह की मनमानी को कभी बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। इससे कहीं न कही भारत माता की अस्मिता को भी ठेस पहुंची है, इसलिए सरकार-पुलिस सतर्क रहे।”

उन्होंने ये भी कहा कि ये मामला निजी संपत्ति पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा एक दिलचस्प मुद्दा भी है। कोई भी व्यक्ति अपने सही होश में गंभीरता से यह तर्क नहीं दे सकता कि किसी की देशभक्ति और अपने देश के प्रति प्रेम को व्यक्त करने से राज्य या समुदाय के हितों को खतरा होगा।

बता दें कि भाजपा ऑफिस में ये मूर्ति 2016 में लाई गई थी, लेकिन पिछले साल खबर आई कि इसे देर रात हटा दिया गया। उस समय पुलिस ने मूर्ति हटाते हुए कोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया था। अधिकारियों ने कहा था कि पहले भाजपा कार्यकर्ताओं से ही मूर्ति को हटाने के लिए कहा गया था, लेकिन उन्होंने इसे हटाने से इनकार कर दिया।

हालाँकि बाद में भाजपा के जिला अध्य जी पांडुरंगन इस संबंध में कोर्ट गए कि उन्हें मूर्ति लौटाई जाए और कम से कम कार्यालय परिसर में लगी मूर्तियों को लेकर हस्तक्षेप न किया जाए। भाजपा ने जो मूर्ति लगवाई को एक राष्ट्र के प्रतीक के तौर पर लगवाई। मगर, तमिलनाडु पुलिस उसे उठा ले गई।

अमेरिकी कैंपसों को ‘मेरिट’ वाले दिन लौटाएँगे डोनाल्ड ट्रंप? कॉलेजों को ‘वामपंथी सनक’ से मुक्त कराने का जता चुके हैं इरादा, जनिए क्या है उनका 7 सूत्री प्लान

सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर कोलिन रग्ग ने 11 नवंबर को अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का एक वीडियो साझा किया। इस वीडियो में ट्रंप ने अमेरिका में उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए एक व्यापक योजना की घोषणा की थी। वीडियो में ट्रम्प ने कहा कि ‘कट्टरपंथी मार्क्सवादी सनकी’ ने कॉलेजों में घुसपैठ की है और करदाताओं के पैसे को अपने वैचारिक एजेंडे को फैलाने में लगाया है।

यह वीडियो एक साल पहले राष्ट्रपति ट्रम्प के एजेंडा 47 के हिस्से के रूप में जारी किया गया था। वीडियो में बताया गया था कि ट्रंप उच्च शिक्षा के लिए क्या योजना बना रहे हैं। ट्रंप ने कहा कि उनकी योजना शैक्षणिक संस्थानों में योग्यता, पारदर्शिता और दक्षता बहाल करने की है। उन्होंने घोषणा की, “हमारा गुप्त हथियार कॉलेज मान्यता प्रणाली होगी।” यहाँ उनके 7-सूत्रीय प्रस्ताव का विवरण दिया गया है।

‘मान्यता सुधार’ के माध्यम से फंड जब्त करना

ट्रम्प ने उन संस्थानों की फंडिंग रोकने के लिए कॉलेज मान्यता प्रणाली का लाभ उठाने का वादा किया है, जो शिक्षा प्रणाली में बदले हुए प्रारूप के साथ चलने से इनकार करते हैं। ट्रंप इसे ‘वास्तविक मानक’ कहते हैं और वे इसे लागू करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि उनका प्रशासन मान्यता देने वाले ‘कट्टरपंथी वामपंथियों’ को बर्खास्त करेगा, जिन्होंने इन कॉलेजों को मार्क्सवादी उन्मादियों का प्रभुत्व बनने दिया है। ट्रंप ने आगे कहा कि पारंपरिक मूल्यों को लागू करने और जवाबदेही में सुधार के लिए नए मान्यता देने वालों को नियुक्त किया जाएगा।

अमेरिकी परंपराओं की रक्षा करना और लागत में कटौती करना

अपने बयान में ट्रम्प ने ट्यूशन की बढ़ती लागत की आलोचना की। इसके लिए ‘व्यर्थ प्रशासनिक स्थिति’ को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि उनकी योजना कॉलेजों को अमेरिकी परंपराओं की रक्षा करने, फ्री स्पीच की रक्षा करने और अनावश्यक नौकरशाही में कटौती करने के लिए बाध्य करेगी। उनका उद्देश्य सस्ती शिक्षा प्रदान करने के लिए प्रशासनिक सुधारों पर ध्यान केंद्रित करना और उन पदों को खत्म करना है, जो ट्यूशन लागत को बढ़ाते हैं।

‘विविधता, समानता और समावेशन’ की स्थिति को खत्म करना

डोनाल्ड ट्रंप के बयान का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वह शिक्षा प्रणाली से विविधता, समानता और समावेशन (DEI) की खत्म करना चाहते हैं। उन्होंने विविधता जैसी पहल को ‘मार्क्सवादी एजेंडा’ का हिस्सा बताया है और कहा है कि उनकी योजना डीईआई विभागों को खत्म करने की है।

इसके बजाय उन्होंने छात्रों को वास्तविक मूल्यों वाली शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए कम लागत वाले विकल्प, करियर सेवाएँ और कॉलेज प्रवेश परीक्षाओं का प्रस्ताव रखा। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ये कदम शैक्षणिक संस्थानों में पहचान की राजनीति से प्रेरित माहौल के बजाय योग्यता आधारित माहौल को बढ़ावा मिलेगा।

कॉलेजों में नस्लीय भेदभाव को रोकना

अपने प्रस्ताव में ट्रम्प ने कहा है कि वह न्याय विभाग को उन स्कूलों के खिलाफ फेडरल सिविल राइट मामले दर्ज करने का निर्देश देंगे, जो ‘समानता की आड़ में गैरकानूनी भेदभाव’ जारी रखते हैं। बता दें कि शैक्षणिक संस्थानों में एशियाई अमेरिकी और श्वेतों के खिलाफ नस्लीय भेदभाव की खबरें आती रहती हैं। अगस्त 2020 में ऑपइंडिया ने बताया था कि कैसे येल विश्वविद्यालय पर एशियाई अमेरिकी के प्रति पक्षपात का आरोप लगा था।

नन-कमप्लाएंस के लिए बंदोबस्ती कराधान

इसके अलावा डोनाल्ड ट्रम्प ने अनुपालन नहीं करने वाले संस्थानों की बंदोबस्ती पर कर लगाने की योजना बनाई है। इन स्कूलों पर उनकी बंदोबस्ती की पूरी राशि तक जुर्माना लगाने का प्रस्ताव रखा है। उन्होंने सुझाव दिया कि उपाय को तेजी से पूरा करने के लिए बजट का उपयोग करेगा और उनका प्रशासन ‘अमेरिका विरोधी पागलपन’ को खत्म करने का प्रयास करेगा।

पीड़ितों की सहायता के लिए फंड को रिडायरेक्ट करेंगे

ट्रम्प ने शिक्षा विभागों में ‘अन्यायपूर्ण और अवैध नीतियों’ से प्रभावित लोगों के लिए क्षतिपूर्ति के रूप में जब्त किए गए धन का उपयोग करने का भी प्रस्ताव रखा है। ट्रम्प के अनुसार, फंड को भेदभाव के पीड़ितों का सहयोग करने और पहचान-संचालित नीतियों से वंचित लोगों के लिए शैक्षिक पहुँच में सुधार करने के लिए पुनर्निर्देशित किया जाएगा।

छात्रों के लिए ‘वास्तविक शिक्षा’

शिक्षा को वैचारिक प्रभाव से मुक्त कराने के लिए ट्रम्प व्यावहारिक परिणामों और कैरियर की तैयारी पर केंद्रित नीतियों को शामिल किए हैं। उन्होंने इसे सुनिश्चित करने के लिए कॉलेज प्रवेश और निकास परीक्षा लागू करने की योजना बनाई है, ताकि छात्रों को वास्तव में अमेरिका में शिक्षा प्रणाली से लाभ हो।

अरबपति एलन मस्क ने भी इस वीडियो को शेयर किया है। बता दें कि डोनाल्ड ट्रम्प ने विवेक रामास्वामी के साथ मस्क को सरकारी दक्षता विभाग (DOGE) का नेतृत्व करने के लिए नियुक्त किया है। 12 नवंबर को जारी एक बयान में ट्रम्प ने कहा कि मस्क और रामास्वामी उनके प्रशासन के लिए सरकारी नौकरशाही को खत्म करने, अतिरिक्त नियमों को कम करने, फिजूलखर्ची में कटौती करने और संघीय एजेंसियों के पुनर्गठन का मार्ग प्रशस्त करेंगे।

उनकी योजना देश में उच्च शिक्षा में सुधार करना है, जिसका लक्ष्य वह राजनीतिक पूर्वाग्रहों को दूर करना है। उनका मानना ​​है कि शिक्षा प्रणाली को योग्यता, निष्पक्षता और अमेरिकी मूल्यों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। कॉलेजों को फंडिंग प्राप्त करने के तरीके में बदलाव करके और अनावश्यक भूमिकाओं में कटौती करके, वह कॉलेज को अधिक किफायती और व्यावहारिक बनाने की उम्मीद करते हैं।

पानी की बोतलों में थूक रहा मौलवी, लेने के लिए मुस्लिमों में मची होड़: Video वायरल, जानिए इस्लाम में ‘थूक’ कितने काम की… कैसे भगाता है ‘शैतान’

सोशल मीडिया पर एक मुस्लिम मौलवी का एक वीडियो वायरल हो रहा है। इसमें वह यहाँ मौजूद अपने शागिर्दों की बोतलों में सूरा (इस्लामिक प्रार्थनाएँ) पढ़ने के बाद थूक रहा है। यह वीडियो बांग्लादेशी लेखिका तस्लीमा नसरीन ने साझा किया है।

नसरीन ने वीडियो के साथ ट्वीट किया, “एक मुल्ला सूरा पढ़ रहा है और फिर पानी पर थूक रहा है या फूंक रहा है, इसे उन लोगों को दे रहा है जो मानते हैं कि यह पानी पवित्र है और इसे पीने से वे बीमारियों और परेशानियों से मुक्त हो जाएँगे। मुल्ला सयाना है और शागिर्द बेवकूफ हैं।”

इस्लाम में थूकने का महत्व

‘इस्लाम’ में थूकने के भी खास मायने हैं। खासकर, शैतान या बुरी आत्माओं को भगाने के लिहाज से। कई हदीसों में खास तरीके से थूकने को बरकत पाने और शैतान को दूर भगाने के तरीके के तौर पर वर्णित किया गया है। सहीह-अल-बुखारी (वॉल्यूम 4, पुस्तक 54, संख्या 513) के अनुसार बाईं ओर थूकने से बुरे सपनों से छुटकारा मिलता है।

किताब के अनुसार इस्लाम के पैगंबर कहते हैं, “एक अच्छा सपना अल्लाह से जुड़ा है। वहीं बुरा सपना शैतान से। जब भी किसी को बुरा सपना आए और वह डरे तब उसे अपनी बाईं ओर थूकना चाहिए, जिससे उसे अल्लाह की शरण मिले और वह बुरी आत्मा से बच जाए।”

सहीह मुस्लिम (किताब 026, संख्या 5463) में भी कहा गया है कि बाईं ओर तीन बार थूकने से शैतान से दूरी बनी रहती है। उतमन अबु-अल के मुताबिक रसूल ने कहा कि जब शैतान इबादत में खलल डाले। कुरान की आयतें पढ़ने से रोके। जब शैतान का असर होने लगे। तो अपनी बाईं ओर तीन बार थूकने से शैतान दूर रहता है।

इस्लाम के अतिरिक्त कहीं और इस प्रकार थूकना वीभत्स और अनादर का भाव उत्पन्न करता है। किसी व्यक्ति के ऊपर थूकने पर तो हाथापाई की नौबत आ जाएगी। किन्तु इस्लाम में कई ऐसे संदर्भ मिलते हैं, जिनमें बताया गया है कि पैगंबर आशीर्वाद देने के लिए लोगों को थूकते थे।

ये संदर्भ नीचे दिए हुए हैं :

1. सहीह बुखारी (वॉल्यूम 1, किताब 12, हदीस 801) महमूद बिन अर-रबी ने कहा, “मुझे याद है अल्लाह का दूत और उसके द्वारा घर पर लाया गया मुँह में भरा पानी जो उसने मुझ पर डाल दिया।”

2. उरवा अपने लोगों के पास वापस आया और बोला, “मैं कई राजाओं, सीजर, खुसरो और अन-नजाशी के पास गया किन्तु कोई भी उतना सम्माननीय नहीं है जितना मोहम्मद अपने साथियों में। यदि वह थूकेंगे तो थूक उनमें से किसी के हाथ में फैल जाएगा जो उसे अपने चेहरे और त्वचा में रगड़ लेगा।” (सहीह-अल-बुखारी, वॉल्यूम 3, किताब 50, हदीस 891)

3. जबिर-बिन-अब्दुल्लाह का वक्तव्य, “मेरी बीवी भी पैगंबर के पास एक लोई लेकर आई और पैगंबर ने उसमें थूका जिससे अल्लाह का आशीर्वाद प्राप्त हो। इसके बाद पैगंबर ने हमारे माँस पकाने वाले बर्तन में भी थूका और उसमें भी अल्लाह की मेहरबानियाँ बिखेर दी।” (सहीह अल-बुखारी, वॉल्यूम 5, किताब 59, हदीस 428)

4. इस्लामिक हदीसों में यह भी संदर्भ मिलता है कि मोहम्मद जिस पानी से स्वयं को साफ करते थे, लोग उस पानी का उपयोग अपने लिए करते थे। (सहीह अल-बुखारी, वॉल्यूम 1, किताब 8, हदीस 373)

5. अबु जुहैफा का कहना है, “मैंने बिलाल को पैगंबर द्वारा उपयोग में लाए गए पानी का उपयोग करते हुए देखा। बाकी लोग भी वही पानी उपयोग कर रहे थे और अपने शरीर पर रगड़ रहे थे। कुछ एक-दूसरे के हाथों पर लगे पानी का उपयोग करने के लिए आतुर थे।” (सहीह अल-बुखारी, वॉल्यूम 1, किताब 8, हदीस 373)

‘अब्दुल फिर तुम्हारा जीजा बन गया’: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की बेटी-जमाई को इस्लामी कट्टरपंथियों ने बनाया निशाना, जानिए किससे हुई है अंजलि की शादी

लोकसभा स्पीकर और कोटा के सांसद ओम बिरला की बेटी अंजलि बिरला की मंगलवार (12 नवम्बर, 2024) को शादी सम्पन्न हो गई। उनकी शादी में देश के दिग्गज नेता भी पहुँचे। भारतीय रेल लेखा सेवा की अधिकारी अंजलि बिरला की शादी उनके दोस्त अनीश राजानी से हुई है।

अनीश राजानी अंजलि के दोस्त थे और दोनों लम्बे समय से एक दूसरे को जानते हैं। अनीश सिंधी हिन्दू परिवार से आते हैं। कोटा में अनीश के परिवार का बड़ा कारोबार है। बताया गया है कि अनीश का परिवार हिन्दू हिट कार्यों में जुटा है और उन्होंने कई मंदिर भी बनवाए हैं।

अनीश के साथ विवाह का यह कार्यक्रम कोटा के ही GMA टाउनशिप में सम्पन्न हुई हैं। अंजलि के विवाह में राजस्थान CM भजनलाल शर्मा और मध्य प्रदेश के CM मोहन यादव भी शामिल हुए। अंजलि बिरला और अनीश राजानी की शादी की भी कुछ तस्वीरें सामने आई हैं। दोनों का साथ में डांस करने का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है।

अंजलि बिरला की शादी को लेकर एक्स (पहले ट्विटर) पर अब कुछ मुस्लिम हैंडल झूठ फैलाने में जुट रहे हैं। अंजलि और अनीश का नाम डाल कर यह धारणा बनाने का प्रयास किया जा रहा है कि अंजलि बिरला की शादी एक मुस्लिम व्यक्ति से हुई है। इसके साथ ही मुस्लिम अंजलि बिरला को लेकर अपमानजनक बातें भी कर रही हैं।

ट्विटर पर लगातार झूठ फैलाने वाले इस्लामी कट्टरपंथी अली सोहराब ने भी यही प्रयास किया। उसने अनीश नाम को ‘अनीस’ लिख कर पेश किया और यह दिखाने की कोशिश की कि वह सिन्धी हिन्दू ना होकर एक मुस्लिम हैं। अली सोहराब के अलावा भी कई मुस्लिम हैंडल ऐसे ही आपत्तिजनक पोस्ट किए।

वहीं तनवीर नाम के एक शख्स ने लिखा कि आखिर क्यों मुस्लिम विरोधी नेता अपने दामाद अनीस और मुख्तार चुनते हैं। उसके पोस्ट के नीचे इस्लामी कट्टरपंथियों ने काफी भद्दे कमेन्ट किए। एक यूजर ने लिखा, “क्योकि हममें 12 बच्चे करने की क्षमता होती है।”

वहीं इम्तियाज अहमद नाम के शख्स ने DNA ही मुस्लिम बता डाला। एक और मुस्लिम मुबीन ने इसे लव जिहाद करार दिया और कहा कि मुल्ले बड़े घरों में लव जिहाद करते हैं।

इस्लामी कट्टरपन्थियों के इन ट्वीट के बाद कई लोगों ने स्पष्ट किया कि जैसा यह दावा कर रहे हैं, वैसा कुछ नहीं है और सच्चाई बताई।

बंद नहीं होगा बुलडोजर एक्शन, जानिए अब कैसे अवैध निर्माण किए जाएँगे समतल: सुप्रीम कोर्ट ने दिया है जो फैसला उसको बिंदुवार समझिए

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (13 नवंबर 2024) को बुलडोजर की कार्रवाई को असंवैधानिक बताया और कहा कि इमारतों को केवल इसलिए गिराना गैर-कानूनी है क्योंकि वह अपराध के आरोपित व्यक्ति का है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने बुलडोजर की कार्रवाई कब हो सकती है और कब नहीं, इसको लेकर एक विस्तृत निर्देश भी जारी किया।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि अधिकारी किसी आरोपित व्यक्ति के अपराध या निर्दोषता का निर्धारण नहीं कर सकते हैं और ना ही सजा के रूप में ऐसे व्यक्ति के घर को ध्वस्त कर सकते हैं। इस काम को असंवैधानिक बताते हुए पीठ ने कहा कि किसी व्यक्ति का अपराध निर्धारित करने और उसे दंडित करने की जिम्मेदारी न्यायपालिका की है।

कोर्ट ने माना कि अगर कोई दोषी है, तब भी उस व्यक्ति के खिलाफ बुलडोजर की कार्रवाई नहीं हो सकती, क्योंकि कार्यपालिका की यह कार्रवाई अवैध है। ऐसा करना कार्यपालिका द्वारा कानून को अपने हाथ में लेने के समान होगा। कोर्ट ने कहा कि किसी का घर ध्वस्त करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत आश्रय के अधिकार उल्लंघन है और यह आरोपित के परिवार को सामूहिक दंडित करने के समान है।

पीठ ने कहा कि हालाँकि कानून और व्यवस्था बनाए रखना और कानून तोड़ने वालों के खिलाफ कार्रवाई करना राज्य का दायित्व है, लेकिन राज्य द्वारा ऐसी शक्ति का मनमाना प्रयोग नहीं किया जा सकता है और किसी व्यक्ति की संपत्ति को मनमाने ढंग से उससे नहीं छीना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि कार्यपालिका किसी मामले में न्यायपालिका को रिप्लेस नहीं कर सकता।

निर्देश का पालन नहीं करने पर अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई

सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीश बीआर गवई और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने इस मामले पर सुनवाई की। इसके साथ ही उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत न्याय करने की सुप्रीम कोर्ट की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए बुलडोजर की कार्रवाई को लेकर दिशा-निर्देश जारी किए। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि आरोपित व्यक्ति के घर/इमारत को तोड़ने से पहले उसकी सूचना दी जानी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि तोड़फोड़ की कार्रवाई के बीच प्रभावित व्यक्ति को अपील करने का समय दिया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने आगे कहा, “महिलाओं, बच्चों और वृद्धों को रात भर सड़कों पर घसीटते हुए देखना कोई सुखद दृश्य नहीं है। अगर अधिकारी कुछ समय के लिए हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि उसके निर्देशों का उल्लंघन करने वाले जिम्मेदार अधिकारियों पर न्यायालय की अवमानना ​का मुकदमा चलेगा। इसके साथ ही ऐसे अधिकारियों को ध्वस्त की गई संपत्ति को अपनी लागत पर बहाल करना। इसके साथ ही तोड़फोड़ के लिए उन्हें मुआवजा भी देना होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि उसके द्वारा जारी दिशा-निर्देश सड़कों, नदी तटों आदि पर बने अवैध इमारतों या संरचनाओं के खिलाफ की जाने वाली कार्रवाई पर लागू नहीं होंगे। कोर्ट ने कहा कि ये निर्देश सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजे जाएँगे।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी निर्देश

  1. यदि तोड़फोड़ का आदेश दिया जाता है तो संबंधित व्यक्ति को इसकी सूचना देनी होगी। इसके साथ ही उसे इस आदेश के खिलाफ अपील करने के लिए समय देना होगा।
  2. कारण बताओ नोटिस के बिना तोड़फोड़ नहीं होगी। नोटिस को इमारत के मालिक को पंजीकृत डाक द्वारा भेजना होगा। इसके साथ ही जिस इमारत को तोड़ा जना है, उस पर चिपकाना होगा। तोड़फोड़ की कार्रवाई करने से पहले नोटिस की तारीख से कम-से-कम 15 दिन का समय देना होगा।
  3. नोटिस में तोड़फोड़ के कारणों को को बताना होगा। यानी यह बताना होगा कि किस नियम के उल्लंघन पर यह कार्रवाई हो रही है। नोटिस में यह बताना होगा कि किस तारीख पर प्रभावित पक्ष के लिए व्यक्तिगत सुनवाई तय की गई है और यह किसके (किस प्राधिकारी) के समक्ष तय की गई है। इसमें उन दस्तावेज़ों की सूची भी शामिल होनी चाहिए, जिन्हें नोटिस प्राप्तकर्ता को उत्तर देते समय प्रदान करना होगा।
  4. ऐसे नोटिसों को पिछली तारीख में भेजने के किसी भी आरोप को रोकने के लिए उसका सम्मन जिले के कलेक्टर/जिला मजिस्ट्रेट (डीएम) को ईमेल द्वारा भेजा जाएगा। मेल की प्राप्ति की पुष्टि वाला एकनॉलेजमेंट कलेक्टर/डीएम के कार्यालय से भी जारी करना होगा। कलेक्टर/डीएम को इसके लिए नोडल अधिकारी नियुक्त करने और एक ईमेल पता निर्दिष्ट करना है। यह ईमेल आज से एक महीने के भीतर भवन नियमों और विध्वंस के प्रभारी सभी नगर निगम और अन्य अधिकारियों को सूचित करना होगा।
  5. तीन महीने के भीतर एक डिजिटल पोर्टल उपलब्ध कराया जाना है जहाँ ऐसे नोटिस, जवाब और पारित आदेश का विवरण उपलब्ध होगा।
  6. नामित प्राधिकारी प्रभावित व्यक्ति को व्यक्तिगत सुनवाई का अवसर देगा और ऐसी सुनवाई का विवरण दर्ज किया जाएगा।
  7. एक बार अंतिम आदेश पारित होने के बाद उसे जवाब देना चाहिए कि क्या अनधिकृत संरचना के निर्माण का अपराध समझौता योग्य है। यदि संरचनात्मक निर्माण का केवल एक हिस्सा अवैध पाया जाता है तो इसकी जाँच की जानी चाहिए कि तोड़फोड़ ही इसका एकमात्र उपाय क्यों है। इस प्रकार पारित आदेश (यह निर्धारित करने पर कि विध्वंस की आवश्यकता है या नहीं) डिजिटल पोर्टल पर प्रदर्शित किए जाएँगे।
  8. तोड़ने के आदेश के 15 दिनों के भीतर मालिक को अनधिकृत संरचना को ध्वस्त करने या हटाने का अवसर दिया जाना चाहिए। संपत्ति को ध्वस्त करने का कदम केवल 15 दिन की अवधि बीत जाने के बाद ही उठाया जा सकता है, यदि व्यक्ति ने अवैध संरचना को हटाए नहीं या यदि किसी अपीलीय निकाय ने इस पर रोक नहीं लगाई है। केवल अनाधिकृत और समझौता योग्य नहीं पाए जाने वाले निर्माण को ध्वस्त किया जाएगा।
  9. तोड़फोड़ से पहले संबंधित प्राधिकारी द्वारा दो पंचों (गवाहों) द्वारा हस्ताक्षरित एक विस्तृत निरीक्षण रिपोर्ट तैयार की जाएगी।
  10. तोड़फोड़ की कार्यवाही की वीडियोग्राफी की जाएगी। वीडियो रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखना होगा। एक विध्वंस रिपोर्ट तैयार करना होगा, जिसमें यह दर्ज किया जाएगा कि किन अधिकारियों/पुलिस अधिकारियों/सिविल कर्मियों ने विध्वंस की कार्रवाई में भाग लिया था। इसे संबंधित नगर निगम आयुक्त को भेजी जाएगी। इस रिपोर्ट को डिजिटल पोर्टल पर भी प्रदर्शित करना होगा।

डाक विभाग को ‘अतिक्रमणकारी’ बता रहा था वक्फ बोर्ड, केरल हाई कोर्ट ने सजा देने से किया इनकार: कहा- उन पर नहीं चलेगा मुकदमा जिनका कब्जा 2013 से पुराना

केरल हाई कोर्ट ने एक हालिया फैसले में कहा है कि उन लोगों पर वक्फ सम्पत्ति कब्जा करने का मुकदमा नहीं चलेगा जहाँ कब्जा 2013 से पहले का है। हाई कोर्ट ने कहा है कि वक्फ सम्पत्ति पर कब्जा करने के मामले में सजा का कानून 2013 में आया था, ऐसे में इससे पहले के मामलों पर यह लागू नहीं हो सकता।

केरल हाई कोर्ट के जस्टिस पी वी कुन्हीकृष्णन ने यह निर्णय दिया है। हाई कोर्ट ने इसी के साथ उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई भी रोक दी जिन पर वक्फ की सम्पत्ति पर 1999 से कब्जा करने का आरोप लगाया गया था। इसी के साथ वक्फ बोर्ड का आपराधिक कार्रवाई का दावा भी खत्म हो गया।

यह मामला केरल वक्फ बोर्ड ने दायर किया था। वक्फ बोर्ड ने केरल के कोझिकोड जिले के डाक विभाग पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने वक्फ की एक सम्पत्ति पर कब्जा किया और डाकखाना चलाने के लिए वक्फ बोर्ड की अनुमति नहीं ली। यह डाकखाना 1999 में खोला गया था। वक्फ बोर्ड ने 2016 में डाक विभाग को अतिक्रमणकारी बता दिया।

वक्फ बोर्ड ने आरोप लगाया कि इस विभाग के कर्मचारियों ने अपराध किया है। वक्फ बोर्ड ने इस मामले में विभाग के दो कर्मचारियों पर वक्फ कानून की धारा 52A के तहत कार्रवाई की माँग की थी। इस धारा के तहत यदि कोई व्यक्ति बिना वक्फ बोर्ड की अनुमति के उसकी किसी सम्पत्ति का ट्रांसफर, खरीद-बिक्री या फिर कब्जा करता है, तो उसे 2 साल तक की हो सकती है।

हाई कोर्ट के सामने वक्फ के खिलाफ डाक विभाग के कर्मचारियों ने दलील दी थी कि वह 2013 से पहले उस सम्पत्ति में थे जिसे वक्फ बताया गया है। ऐसे में उनके ऊपर आपराधिक कार्रवाई का मामला नहीं बनता है। उन्होंने हाई कोर्ट से अपने खिलाफ कार्रवाई खत्म करने की माँग की थी।

केरल हाई कोर्ट ने उनकी इस दलील को सही पाया। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “वक्फ एक्ट पर गौर करने से यह नहीं पता चलता कि जो व्यक्ति इसकी धारा 52A के लागू होने से पहले भी वक्फ संपत्ति पर कब्जा में रहा है, क्या उसके खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। स्पष्ट तौर पर डाक विभाग के पास वक्फ एक्ट की धारा 52A लागू होने से पहले भी संपत्ति का कब्जा था। डाकघर 1999 से काम कर रहा था। इसलिए मेरा मानना ​​है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ मुकदमा नहीं चल सकता।”