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बिहार: घटिया जातिवादी गणित को सोशल इंजीनियरिंग कहने से वो सही नहीं हो जाता

बिहार में इस बार चुनावों के दौरान कुछ ऐसा देखने को मिला, जो न सिर्फ़ जाति प्रथा को बढ़ावा देता है बल्कि एक देश के तौर पर, एक राष्ट्र के रूप में हमारी एकता पर भी सवाल खड़े करता है। मामला कुछ यूँ है कि जाति A हमेशा से अपनी जाति के उम्मीदवार को ही वोट देते हैं और जाति B ने भी अपने उम्मीदवार के पक्ष में माहौल बनानी शुरू कर दी, बिना यह देखे कि व्यक्ति अच्छा है या फिर बुरा। जब जाति B के समाज के कुछ अच्छे लोगों ने यह समझाने की कोशिश की कि जातिवाद ग़लत है तो जाति B के लोगों का तर्क था कि चूँकि जाति A के लोग जातिवाद कर रहे हैं, अपनी जाति के उम्मीद्वार को वोट कर रहे हैं, इसीलिए हम जाति B के लोग भी ऐसा ही करेंगे। अर्थात, इनका सीधा अर्थ यह था कि अगर कोई अन्य समाज ग़लत कर कर रहा है तो हम भी ग़लत करेंगे। इस जातिवादी राजनीति के विस्तार और पोषण में व्हाट्सप्प और फेसबुक ग्रुप्स का अहम योगदान रहा है।

जैसे यहाँ हम एक क्षेत्र के तौर पर मोतिहारी का उदाहरण लेते हैं, क्योंकि चुनाव संपन्न हो गया है और मैंने सभी दलों, नेताओं, प्रत्याशियों, स्वघोषित जाति के ठेकेदारों और टुटपुंजिया नेताओं से लेकर सजग युवाओं तक के अब तक के फेसबुक पोस्ट्स, गली-नुक्कड़ के क्रियाकलापों और शेखियों को करीब से देखा है। अतः, मैं अब एक अंतिम विश्लेषण रखने में ख़ुद को सक्षम मानता हूँ। इन सभी वर्णित महानुभावों के प्रचार अभियान, दुष्प्रचार प्रोपेगंडा और नारावीरता सहित सभी पक्षों के गहन अध्ययन के बाद प्रस्तुत है कुछ कड़वी सच्चाइयाँ। यहाँ एक तरफ़ पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री अखिलेश सिंह के बेटे 27 वर्षीय आकाश सिंह उम्मीदवार थे तो दूसरी तरफ़ वर्तमान केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह।

चूँकि, यहाँ बात जातिवादी अभियानों की पोल खोलने के लिए हो रही है और हम किसी भी प्रकार से जातिवाद को बढ़ावा नहीं देते। लेकिन, फिर भी हमें यहाँ जाति की बात करनी पड़ेगी और उम्मीदवारों की जाति भी बतानी पड़ेगी। अखिलेश सिंह भूमिहार हैं और बिहार कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं। राधा मोहन सिंह राजपूत हैं और बिहार भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं। चूँकि, मैं भूमिहार जाति से आता हूँ, मैं किसी अन्य जाति का उदाहरण नहीं लूँगा और न ही मैं किसी अन्य जाति पर कुछ भी टिप्पणी करूँगा। यहाँ मैं आपको वहीं बताऊँगा, जो मैंने सोशल मीडिया और लोकल स्तर पर देखा है। यहाँ मैं वहीं बताने जा रहा हूँ, जो समाज में मैंने पिछले कुछ दिनों में ऑब्ज़र्व किया है।

सबसे पहले बात जाति व समाज के स्वघोषित ठेकेदारों की। ये ऐसे लोग हैं, जो जाति के कारण या यूँ कहिए कि जाति की आड़ में भाजपा उम्मीदवार का विरोध कर रहे हैं। इससे इन्हें काफ़ी फायदे होते हैं। ख़ुद इनकी जाति के लोग इनके विरोध में नही बोल सकते क्योंकि कुलघाती का तमगा लगा दिया जाएगा। दूसरा फ़ायदा यह कि इन्हें भाजपा विरोधियों का भी अच्छा साथ मिल जाता है। जहाँ तक मैंने फेसबुक और व्हाट्सप्प पर भूमिहारों को लेकर बनें ग्रुप में देखा, इनकी पहचान निम्नलिखित है (बाकी जातियों के भी अलग-अलग ग्रुप हैं और शायद ही कोई इन सबसे अछूता है, लेकिन यहाँ मैंने अपनी जाति का उदाहरण लिया है क्योंकि मैं ख़ुद पर टिप्पणी करना चाहता हूँ, किसी को हर्ट करने का मेरा इरादा नहीं है):

  • ये व्हाट्सएप्प और फेसबुक के भूमिहारों वाले ग्रुप में आने वाले फेक मैसेज और पोस्ट शेयर करते हैं। उदाहरण: राधा मोहन सिंह ने भूमिहारों को गाली दी। मुझे अपनी जाति के कुछ लोगों ने यह सूचना दी कि राधा मोहन सिंह ने भूमिहारों को लेकर फलाँ अपशब्द कहे लेकिन मुझे विश्वास नहीं था कि एक केंद्रीय मंत्री किसी जाति विशेष को लेकर अभद्र टिप्पणी कर सकता है। मेरा अंदेशा सही निकला और ये ख़बर झूठी निकली।
  • इन्होंने भगवान परशुराम को नहीं पढ़ा होता, बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री डॉक्टर श्रीकृष्ण सिंह की जीवनी इन्हें नही पता होती और रामधारी सिंह दिनकर की रचनाओं को धता बताते हैं। परशुराम जयंती पर ब्राह्मणों व भूमिहारों द्वारा उनके फोटोज व ग्राफ़िक्स शेयर किए जाते हैं पर उनके विचारों व सुकर्मों का अध्ययन करने में इनकी कोई रूचि नहीं होती।
  • अपनी जाति की बात करते-करते ये अंत में नेहरू-राजीव को सही ठहराने में लग जाते हैं, उनके हर कुकृत्यों का बचाव करते हैं। जैसे, अगर इनकी जाति का उम्मीदवार कॉन्ग्रेस की तरफ़ से खड़ा है तो कल के प्रखर भाजपाई भी आज नेहरू-राजीव के फैन हो सकते हैं। यही बिहार की जातिवादी राजनीति की सच्चाई है।
  • ये भाजपा से नाराज़गी की वजह “भाजपा द्वारा भूमिहारों को टिकट न देना” बताते हैं। जबकि, ये ख़ुद “भूरा बाल साफ़ करो” का समर्थन कर रहे होते हैं। लालू यादव ने एक बार ये नारा दिया था जिसमें ख़ास जातियों के सफाई की बात कही गई थी। इसकी चर्चा हम यहाँ नहीं करेंगे। आप किसी भी उस बिहारी से पूछ सकते हैं, जिसनें लालू राज को देखा है।
  • इनमें से अधिकतर कुछ दिनों पहले तक मोदी के गुणगान करते नहीं तक रहे थे और ख़ुद को हिंदूवादी बताते हुए चल रहे थे। ये अपनी जाति के आपराधिक छवि के नेताओं को भी देवता बना कर उनकी पूजा करते हैं। अपराधियों को मसीहा की तरह देखा जाता है और उनके साथ फोटो क्लिक करवाने में ये गर्व महसूस करते हैं।

अगर मोदी का विरोध करना ही है तो उसके लिए सामान्य वर्ग के ग़रीबों को मिलने वाले आरक्षण का विरोध करने वाले को समर्थन क्यों? कल तक भाजपा-एबीवीपी में हाथ-पाँव मारने वाले अपना स्वार्थ साधने और पहचान स्थापित करने के लिए “चौकीदार चोर है” का नारा लगा रहे हैं तो आप उनके झाँसे में मत आइए। देश सर्वोपरि है, सांसद अगर काम नहीं करेगा तो इतिहास उसे याद नहीं रखेगा। लालू यादव ने 15 वर्षो लगातार राज किया, आज इतिहास का न्याय देखिए, जरा सोचिए कि क्या किसी को हरा देने भर से बदला निकल जाता है? हमेशा कोई समाज इसीलिए क्यों एकजुट होता है कि फलाँ उम्मीदवार हमारे ‘दुश्मन’ जाति का है और इसे हरा देना है। अच्छे उम्मीदवारों को जिताने के लिए जाति के लोग एकजुट क्यों नहीं होते?

और समर्थन किसका करना है? एक ऐसे व्यक्ति का, जो अपने बेटे का कैरियर बनाने के लिए सारे दाँव-पेंच आज़माने में लगा हुआ है? जो पिछले 3 चुनावों से लगातार हार रहा है और ख़ुद कॉन्ग्रेस चुनाव प्रचार समीति का अध्यक्ष रहते हुए भी अपने रालोसपा उम्मीदवार बेटे को जिताने के लिए क्षेत्र विशेष में कैम्प किए हुआ है? जो अपनी पार्टी के प्रति ही गम्भीर नहीं, वो क्षेत्र का क्या विकास करेगा? महागठबंधन को वोट देकर देश में अस्थिरता लानी है तो कोई दिक्कत नहीं है। अखिलेश सिंह कॉन्ग्रेस के बड़े नेता हैं और पूरे राज्य में चुनाव की कमान उनके ज़िम्मे थी और अभी भी है लेकिन वह रालोसपा उम्मीदवार अपने बेटे को जिताने के लिए वह चम्पारण में बैठे रहें। राज्य में पार्टी का जो भी हो, बेटा जीतना चाहिए।

क्या कॉन्ग्रेस एक डूबती नैया है? अगर है भी तो उसके पदाधिकारियों का अपनी पार्टी के प्रति कोई ज़िम्मेदारी नहीं बनती? राजद से कॉन्ग्रेस में गए अखिलेश के बेटे रालोसपा से मैदान में उतरे और अखिलेश ने ख़ास जाति के बड़े नेताओं को बुलाकर प्रचार अभियान शुरू किया। अनंत सिंह, जिन्हें बिहार में छोटे सरकार के नाम से जाना जाता है और जो कई महीनों तक जेल में बंद रहे हैं, उन्हें बुलाकर रोड शो कराया गया ताकि जाति विशेष के मत प्राप्त किए जा सके। किसी भी लोकसभा में कैसे निर्णायक जाति समूहों को अलग-अलग बाँट कर अंकगणित बैठाया जाता है और समीकरण साधा जाता है, इसका ये अच्छा उदाहरण है। उस जाति के बाहुबलियों व दबंगों को बुलाकर सम्बोधन कराए जाते हैं।

और, कुछ ऐसे भाजपा फैन हैं, जिनका मानना है कि एक-दो सीटों से क्या होगा, मोदी तो आ ही रहा है। 2004 में वाजपेयी के समय यही हुआ था। लोगों से अपनी-अपनी सीटों पर भाजपा उम्मीदवारों को हरा दिया और कहते रहे कि वाजपेयी तो आ ही रहा है, उसे कौन हरा देगा। आपके सामने अब बस 2 विकल्प हैं। पहला, देश की सुरक्षा, देश का विकास, बिजली, पानी, सड़क देने वाले और घर-घर उज्ज्वला से गैस पहुँचाने वाली और ग़रीबों का बैंक एकाउंट खुलवाने वाली सरकार को मौका दें या फिर अपने समाज के झूठे ठेकेदारों के लिए देश के लिए कार्य करने वालों को धोखा दें। ख़ुद आडवाणी ने एक इंटरव्यू में कि वाजपेयी की हार इसीलिए हुई क्योंकि संसदीय क्षेत्रों में भाजपा उम्मीदवारों को यह कहते हुए हरा दिया गया कि ‘वाजपेयी तो जीत ही रहा है, इस उम्मीदवार को हरा दो’।

ज्यादा विरोध कीजिएगा तो चंद मुट्ठी भर नेताओं को कुछ अच्छी पदवियाँ मिलेंगी। सीपी ठाकुर हों या अखिलेश सिंह, अपने-अपने दलों में इनकी पूछ बढ़ेगी और इन्हें रुपए कमाने के नए रास्ते दिए जाएँगे, न आपका कुछ होगा और न राष्ट्र का। ये सब क्षणिक आवेश के क्षण हैं, इनसे प्रभावित न होते हुए जनता को उसी उम्मीदवार को वोट देना चाहिए, जो सही लगे। अगर आपको कॉन्ग्रेस पसंद है तो इसीलिए वोट कीजिए क्योंकि उसकी कुछ बातें आपको अच्छी लगती है, इसीलिए नहीं कि उसने आपकी जाति के उम्मीदवार को टिकट दिया है। यही भाजपा के बारे में भी कह सकते हैं। अगर आपको मोदी को जिताना है तो भाजपा को वोट करें। जिस भी पार्टी को वोट करें, जाति के आधार पर नहीं, उसकी नीतियों, इतिहास और प्रदर्शन के आधार पर।

इसमें मीडिया का भी दोष है। मीडिया ने हर जातिवादी नेता की करतूतों को ‘सोशल इंजीनियरिंग’ नाम दिया है और उसे बढ़ावा दिया है। लालू अगर माई (मुस्लिम-यादव) के भरोसे जीतने की बात करता है तो यह उसका ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है, ऐसा मीडिया में बताया जाता है। नीतीश अगर महादलितों के भरोसे बैठे हैं तो यह उनकी ‘सोशल इंजीनियरिंग’ है। जब क्षेत्रीय नेता जाति की बात करते हैं, तो उन्हें इंजीनियर बोलकर उनका मान बढ़ा दिया जाता है, जिससे ऐसा प्रैक्टिस करने वालों को और बल मिलता है। जनता तो जनता है, बरगलाने वाले बरगला ले जाते हैं। ग़रीब, मासूम और आम जनता को क्या पता कि जाति के ये स्वघोषित ठेकेदार उनके काम नहीं आने वाले, काम आएगी एक अच्छी सरकार और एक अच्छी नीतियों वाला प्रधानमंत्री।

पीएम पद की गरिमा, भारत रत्न और मोदी को गालियाँ: JNU के कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-4

मोदीजी के ऊपर सबसे बड़ा आरोप क्या है?
…यही न कि, उन्होंने पीएम पद की गरिमा को गिरा दिया है। आइए, इसके कुछ बिंदुओं पर बात करते हैं।

भारत के प्रधानमंत्री पद की गरिमा थी, है व रहेगी। होनी भी चाहिए। कम्बख्त, आज तक वही गरिमा तो थी, जिसका बोझ इतना अधिक था कि यह मरियल, अधनंगा, सड़ा-गला, भूखों का देश उठा रहा है।

पीएम पद की गरिमा ही तो थी, जो हमारे पहले प्रधानमंत्री ‘दुर्घटनावश हिंदू’ अपने अंग्रेज मित्रों को बुलवाकर संपेरों से मिलवाते थे।

उसी वक्त विक्रम साराभाई नाम के एक जीव भी थे, यह उनको याद नहीं आता था। यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, कि चचा ने खुद को ही भारत-रत्न दे दिया था। नौसेना के जहाजों या युद्धक विमानों का उस गरिमा के चलते ही (दुष्) प्रयोग चचा ने ही तो शुरू किया था एवं यह प्रधानमंत्री पद की ही गरिमा थी कि भरी संसद में उन्होंने चीन के कब्जे पर कहा था कि किसी बंजर ज़मीन पर ही तो कब्ज़ा हुआ है, जिस पर घास भी नहीं उगती। तब, हमारे एक सांसद महावीर जी ने कहा था कि मेरा तो सिर भी गंजा है, तो इसे भी दुश्मनों को दे दीजिए।

भाई, ये पीएम पद की गरिमा का गुरुगंभीर दायित्व ही तो था कि सेना के लिए जीप खरीदने में घोटाला करने वाले आरोपित को तुरंत ही कैबिनेट मंत्री बना लिया चचा ने। यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, कि अपनी बेटी को उत्तराधिकारी बनाकर चचा ने वंशवाद का विषवृक्ष इस देश में बो दिया, एक सनकी, तानाशाह, विनाशकारी सोच की महिला को इस देश पर थोप दिया।

यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, कि तथाकथित ‘लौह-महिला’ ने देश पर आपातकाल थोप दिया, हज़ारों को जेल में डाल दिया एवं अपने महा-अहंकारी, विक्षिप्त पुत्र के हाथ में सत्ता की वास्तविक कमान दे दी। यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी कि इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वालों को अकादमिक जगत में प्रतिष्ठित किया गया, ज्ञान की एकतरफा गंगा बहाई गई तथा दूसरे किसी भी किस्म के विचार को अछूत, सर्वथा विरुद्ध समझा गया।

यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी कि एक राष्ट्रपति को रात के 12 बजे उठाकर आपातकाल के आदेश पर हस्ताक्षर करवाए गए, अपने ड्राइवर, निजी देखभाल करने वाले कर्मचारियों को देश के उच्च पदों पर बिठाया गया, देश के सभी संसाधनों को एक परिवार की जागीर बना दिया गया, निठल्ले बेटों को जन्मदिन में आकाश दिखाने भारत सरकार के जहाजों का उपयोग किया, भिंडरावाले को पैदा किया एवं बाप की राह पर चलकर खुद को ही भारत-रत्न भी दे डाला।

पीएम पद की गरिमा का भार बहुत होता है, रे बाबा। तभी तो धोखे के लिए भी सही, दिखावे के लिए ही सही, न तो कैबिनेट की बैठक बुलाई गई, न ही कहीं से कोई राय ली गई, रातोंरात अचानक से विदेश में बैठे एक युवक को इस देश की कमान सौंप दी गई, जिसके पास पीएम पद की ‘गरिमा’ व ‘पारिवारिक शहादत’ के अलावा था, तो कुलीनता का घमंड, भारत से भयानक अपरिचय तथा इंडिया से असंभव प्यार।

यह पीएम पद की गरिमा ही तो थी, जिसने एक पेड़ के गिरने पर धरती को हिलाया एवं ‘मात्र’ 5000 सिखों को हलाक कर दिया था। पीएम पद की ‘गरिमा’ तभी तो है। यह पीएम पद की गरिमा ही थी, जिसने 400 से अधिक सांसद होने पर भी समुदाय विशेष को पर्सनल लॉ में कैद रहने दिया, शाहबानो मामले में ऐसा फैसला लिया कि आज समुदाय विशेष वाले 14वीं सदी की ‘अरबी भेड़’ बन कर रह गए हैं, यह पीएम पद की गरिमा ही थी जिसने बोफोर्स में दलाली खाई, यह पीएम पद की गरिमा ही थी कि हजारों की मौत के जिम्मेदार भोपाल-गैस कांड के आरोपित को बाकायदा सरकारी कार एवं विमान से देश से भाहर भगाया गया।

…एंड, लास्ट बट नॉट द लीस्ट, वह पीएम पद की गरिमा ही तो है, जो 2002 से 2014 तक एक राज्य के मुख्यमंत्री को हत्यारा, नरसंहारक, मौत का सौदागर, खून बेचने वाला, आदि-अनादि कौन सी गाली नहीं दी गई।

2014 से वह व्यक्ति देश का पीएम है, लेकिन एक मंदबुद्धि, नशेड़ी, पागल उसे बिना किसी सबूत के चोर कह रहा है, उस पीएम को इतनी गालियाँ दी गईं कि गालियों का शब्दकोश भी शर्मिंदा हो जाए, लेकिन उस व्यक्ति ने जब एक तथ्य मात्र कह दिया, तो लुटियंस के पालतू शर्मिंदा हो गए।

सही बात है, आखिर प्रधानमंत्री पद की ‘गरिमा’ का सवाल है…

— व्यालोक पाठक

लेखक सीरीज में लिखते हैं। नीचे पढ़ें उनका हर एक पोस्ट:

एक झूठ को 100 बार बोलकर सच करने का छल : कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-3
मूर्खों और मूढ़मतियों का ओजस्वी वक्ता है कन्हैया : कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-2
कॉमरेड चंदू से लेकर कन्हैया कुमार तक : कपटी कम्युनिस्टों की कहानी, भाग-1

BJP और RSS नेता के घर पर CPI के गुंडों ने किया हमला, फेंका देशी बम

केरल में सोमवार (मई 13, 2019) की सुबह कासारगोड लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले पय्यानूर विधानसभा क्षेत्र में भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नेताओं के घरों पर हमला किया गया। बता दें कि, इनके घरों पर बम फेंक कर हमला किया गया।

जानकारी के मुताबिक, पय्यानूर मंडल के पूर्व भाजपा सचिव पणक्किल बालाकृष्णन के घर पर देशी बम फेंका गया, जो उनके सामने गिरा और वहीं पर फट गया। जिसकी वजह से कोई भी इसकी चपेट में नहीं आया और किसी को कोई चोट नहीं आई।

इसके कुछ समय के बाद ही कोरोम के आरएसएस कार्यकर्ता कारिल राजेश के घर पर भी दो बमों से हमला किया गया। उनके घर पर दो बम फेंके गए थे, लेकिन वो सड़क के किनारे के एक मामूली से पुल के पास गिर गया और कोई बड़ा हादसा होने से टल गया। इस बम धमाके से किसी के घायल होने की खबर नहीं है। बता दें कि, राजेश के ऊपर इस तरह के हमले पहले भी हो चुके हैं। उनके घर के ऊपर पहले भी बम फेंका जा चुका है।

गौरतलब है कि अभी हाल ही में सीपीएम और डीवाईएफआई के गुंडों ने चुनावी कैंपेनिंग पर आपत्ति जताते हुए कासरगोड के भाजपा प्रत्याशी रवीश तांत्री कुंतारु के साथ मारपीट की थी। रवीश तांत्री कुंतारु ने एनडीए के कार्यकर्ताओं के साथ कन्हानगढ़ में एक चुनावी कैंपेन में हिस्सा लिया था। इससे पहले कि एनडीए अपना प्रचार अभियान शुरू करता, सीपीएम ने दो प्रचार वाहन लेकर अपना प्रचार अभियान शुरू कर दिया और फिर बाद में रवीश तांत्री से जबरन माइक्रोफोन छीन लिया और उसके साथ मारपीट की।

गरिमा गई घुइयाँ के खेत में: फिर से गाय छोड़ कर मंदिर ढाहने का दिवास्वप्न मत देखो

सोशल मीडिया के आने से कई बातें अच्छी हुई हैं। लोगों को अभिव्यक्ति की जगह मिली है, मेनस्ट्रीम मीडिया की मोनोपॉली खत्म हुई, मठाधीशों की मठाधीशी पर आम जनता ने लगातार आक्रमण करके उनके क़िलों को ध्वस्त किया और सबसे अच्छी बात यह कि कई लोग अपनी नग्नता और वैचारिक विपन्नता छिपाने में असफल रहे।

देश में राजनीतिक माहौल है, जो कि चुनावों के दौरान लाज़मी है। इस माहौल में लोग विकास के मुद्दों की बात से लेकर राजीव गाँधी के ‘विराट’ पिकनिक से होते हुए, ‘नीच’ मणिशंकर तक पहुँचे हैं। यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि मीडिया और सोशल मीडिया पर लोग दो पक्षों में खड़े हैं। ये पक्ष भी दो स्वतंत्र पक्ष नहीं हैं, बल्कि एक पक्ष है, और दूसरा, उसी पक्ष की ऊर्जा से खुद को प्रासंगिक बनाए रखने वाले लोग।

मोदी समर्थक हैं, और मोदी विरोधी। इसका सीधा मतलब है कि सारी चर्चा मोदी को लेकर ही होगी। मोदी ने अगर किसी और की चर्चा की है, तो बाकी लोग उस व्यक्ति या घटना पर भी बातें करेंगे। चूँकि विरोधियों के पास समर्थन के लिए कोई नेता है नहीं, (क़ायदे से कोई डिजर्व करता भी नहीं) इसलिए वो इधर-उधर भटकते रहते हैं।

इसी भटकने में उन्होंने लालू जैसे अपराधी को सामाजिक न्याय का मसीहा बनाया, ममता जैसी हिंसक प्रवृति की मुख्यमंत्री को महान प्रशासक बताया, अखिलेश जैसे टोंटीचोर में भारत का भविष्य देखा, मायावती जैसी स्वमूर्तिपूजक महिला को दलितों का आईकॉन बताया, टुटपुँजिए कॉलेजिया विद्यार्थी युवाओं के आइडल कहे गए, केजरीवाल जैसे धूर्त लोगों में राजनीति का नया चेहरा खोजा… लिस्ट लम्बी है, रहने दिया जाए।

ये सारे नाम या तो सजायाफ्ता अपराधियों के हैं, या इनके राज्यों में हर तरह की अव्यवस्था फैली हुई है। इन्हीं लोगों पर, यही मेनस्ट्रीम मीडिया किसी अलग समय और संदर्भ में बहुत तीक्ष्ण रही है, और रहती भी। लेकिन, समय और संदर्भ दोनों ही बदल चुके हैं, और मीडिया ने भी पार्टियाँ पकड़ ली हैं। यही कारण है कि इन सबके अपराध, नारकीय प्रशासन, हिंसा को प्रश्रय देना, भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे रहना, मीडिया के लिए सामान्य हो गया है, इस पर बात नहीं होती।

बात इसलिए नहीं होती क्योंकि बात के केन्द्र में मोदी का होना आवश्यक है। हर तरह के इंटरव्यू हुए मोदी के। तरह-तरह के सवाल आए। राफेल पर भी, गोधरा पर भी, सम्प्रदाय विशेष पर भी, विकास पर भी, नोटबंदी पर भी, जीएसटी पर भी। हाँ, ये बात और है कि किसी एंकर ने मोदी का कॉलर नहीं पकड़ा और उसके बोलते वक्त बात काट कर उनके बाल नहीं नोचे। कुछ लोगों को भ्रम है कि इंटरव्यू ऐसे ही होना चाहिए। वैसे एक व्यक्ति ने राहुल गाँधी की चाटुकारिता कैसे की, वो सबको पता चल गया।

गरिमा, मर्यादा, और मोदी

अब सोशल मीडिया और मीडिया के लोग सारे सवालों का जवाब पा कर तृप्त हो गए हैं। देश की जनता ने मोदी को वही सारे सवालों के पूछने पर, उन्हीं दोहराए गए जवाबों को इतनी बार सुना है कि उन्हें आँकड़े याद हो गए हैं कि कितने घरों में बिजली पहुँची, सड़क बनने की रफ़्तार क्या है, कितने करोड़ लोगों को मुद्रा लोन मिला, कितने करोड़ लोगों को पक्का मकान मिला, और इन सब में मजहब की शिनाख्त नहीं की गई।

जो लोग यह कह रहे हैं कि मुद्दों पर मोदी बात नहीं करता, वो लोग अपना ही लिखा पढ़ते हैं, और स्पीच आदि सुनने में यक़ीन नहीं रखते। मोदी ने हर मुद्दे पर बात की है, जिस जगह पर रैली की, वहाँ के स्थानीय मुद्दे और वहाँ किए गए कार्यों को गिनाया। हाँ, यह बात भी है कि हर जगह हर समस्या नहीं सुलझी है, क्योंकि ऐसा होना असंभव है।

इसलिए, अब डिबेट मोदी के वादे, मेनिफेस्टो, नीतियाँ, तथाकथित घोटालों और विकास के मुद्दों से उतर कर, उसकी भाषा शैली पर आ गई है। चूँकि विरोध में खड़े लोगों को लिए समर्थन के लिए कोई नायक या नायिका है नहीं, इसलिए, उनके खेमों से आते ज़हर बुझे तीरों को देखना तो छोड़िए, उनके अस्तित्व को ही नकार कर आगे बढ़ जाते हैं।

मोदी को सिर्फ इस चुनाव में दसियों अलग-अलग गालियाँ दी गईं। मर्यादा की बात करने वालों ने, मोदी नामर्द है, हत्यारा है, बीवी को छोड़ कर भाग गया, भड़वा है, ख़ून की दलाली करता है, आतंकवादी, चोर, तुग़लक़, हिटलर, नालायक बेटा, मोदी का बाप कौन है, नीच, बीमार, बिच्छू, घटिया आदमी, लहूपुरुष, रैबीज ग्रसित, पागल कुत्ता, गंगू तेली, असफल पति, गंदी नाली का कीड़ा आदि कहा गया। ये सारी गालियाँ समय और कॉन्ग्रेस नेताओं के नाम के साथ रिकॉर्डेड हैं।

इनमें से अधिकतर नेता कैबिनेट मंत्री और अपने पार्टियों के बड़े नाम हैं। पार्टी अध्यक्ष से लेकर छुटभैये नेताओं तक ने मोदी को हर तरह की गाली दी है। इस समय भी मोदी उसी प्रधानमंत्री पद पर बैठा था, जिसकी गरिमा की याद आज कल लोगों को लगातार आ रही है क्योंकि मोदी ने उन्हें सभ्य शब्दों में उनसे ज़्यादा तीक्ष्णता से, कुछ कड़वे सत्य बोले।

मोदी ने अपने पाँच साल के कार्यकाल में चार साल नौ महीने प्रधानमंत्री पद की गरिमा बढ़ाई ही है। हम उस पद की बात कर रहे हैं जिसे किसी घर से संचालित किया जाता था। जिस पद के आदेश को कोई सांसद मीडिया के सामने फाड़ देता था। जिस पद पर बैठा व्यक्ति अपने डिसीजन तक नहीं ले पाता था। उस पद को मोदी ने वैश्विक पहचान दिलाई और उस पद की करेंसी का इतना बोलबाला है कि जो पहले असंभव-सा दिखता था, आज हर वैश्विक मंच पर संभव हो गया है।

इसलिए, मोदी पर ऐसे आरोप बेकार और मिसप्लेस्ड हैं। अब चुनाव चल रहे हैं। आपके विरोधी लगातार आप पर वैसे आरोप लगा कर आपकी छवि भ्रष्टाचारी की बनाने की कोशिश कर रहे हैं, जो आपने किया ही नहीं। सुप्रीम कोर्ट का नाम लेकर विपक्ष के नेता आपको चोर साबित करने पर तुले हों, और आप चुप्पी साधे बैठे रहेंगे?

इस देश के लिए सबसे बड़ी ज़रूरत एक बहुमत की सरकार है। उस मायने में फ़िलहाल मोदी और भाजपा ही सबसे सटीक विकल्प है। अगर यह विकल्प आपके या मेरे लिए नहीं भी है, फिर भी सत्तारूढ़ पार्टी तो सत्ता से बाहर जाना नहीं ही चाहेगी। इसलिए, उसकी सबसे पहली प्राथमिकता सत्ता को वापस पाना है।

विरोधी नीच हो, तो अच्छाई मारक हथियार नहीं हो सकती

सत्ता प्राप्ति की इस चुनावी जंग में जब विरोधी नीचता पर उतर आए, आपके सामने गायों की भीड़ हाँक दे और आप गौ माता को प्रणाम कर, अपने अस्त्र-शस्त्र नीचे रख दें, तो आप अपना घर बचा नहीं सकते। भारत का इतिहास ही यही रहा है। हमने सब कुछ इसी मर्यादा के चक्कर में गँवाया है जबकि युद्ध में हर पैंतरा ज़ायज मान कर सामने वाले ने आक्रमण किया है।

इसलिए, विरोधियों की प्रत्यक्ष गाली, अपनी माँ और पत्नी पर किए गए हमले, अपनी ईमानदारी पर लगाए गए लांछन आदि के जवाब में, कोई नेता अगर सभ्य शब्दों में किसी के बाप को भ्रष्टाचारी नंबर वन भी न कहे तो दूसरा उपाय क्या है? वह अपने समर्थकों को क्या विपक्ष में बैठ कर, उन्हीं लुटेरों के हाथों शासित होने दे, जिन्होंने इस देश को बर्बादी के सिवाय और बहुत कुछ दिया नहीं?

आप गरिमा की बात कहाँ से ले आते हैं? क्या पूरा भार भाजपा और मोदी पर ही है? क्या कॉन्ग्रेस का हर शब्द ज़ायज है क्योंकि उसके पारिवारिक प्राइवेट लिमिटेड के दो लोगों की हत्या हो गई? हत्या हो जाने से वो संत हो गए जिन्होंने अपने परिवार को लूट का हिस्सेदार बनाया? लुटेरों के परिवार के लोग दूसरे को घोटालेबाज़ बताते हैं, और आप सोचते हैं कि सामने वाला मर्यादा का पालन करे?

इसे मर्यादा नहीं कायरता कहते हैं। मिथ्याचार को सहना स्वयं और समाज के साथ अन्याय करना है। सामने से आते तीर को यह कह कर छोड़ देना कि उनके खेमे का एक आदमी आधे घंटे पहले मरा है, मूर्खता है। वीरोचित व्यवहार यह है कि उस तीर को न सिर्फ नाकाम किया जाए, बल्कि तीर चलाने वाले को खोज कर, उसके सारे अस्त्र-शस्त्र छीन लिए जाएँ, उसका रथ तोड़ दिया जाए और उसे तीरों से बींध दिया जाए। हाँ, अंतिम संस्कार उसकी पारिवारिक मान्यताओं के साथ हो सके, इसलिए लाश सौंप दिया जाए।

आज हम समय के उसी मोड़ पर खड़े हैं जहाँ इस्लामी आक्रांताओं ने एक बार फिर रूप बदल लिया है, और गायों का झुंड हमारी तरफ छोड़ दिया है। वो जानते हैं कि वाजपेयी जी की भाजपा इन गायों को प्रणाम कर के, उनके सींगों में झुनझुने बाँधने में व्यस्त हो जाती। वो जानते हैं कि इस भाजपा का मूल चरित्र अभी भी वाजपेयी जी से कहीं न कहीं जुड़ा हुआ है। इसलिए वो अपनी शब्दों की गरिमा को लगातार गिराते जा रहे हैं, गायों की संख्या बढ़ा रहे हैं, और गढ़ों पर चढ़ाई भी कर रहे हैं।

विपक्ष इस नई भाजपा के सामने अपनी क़िस्मत आज़माने निकला था। पिछले चुनाव में भी उसे ‘पचास करोड़ की गर्लफ़्रेंड’ सुनने को मिला, और इस चुनाव में भी राहुल गाँधी को अप्रासंगिक बना कर, उसके भ्रष्टाचारी पिता को सामने लाकर, मोदी ने युद्ध के नियम पलट दिए। इस बार मोदी और भाजपा ने सारी गायें अपनी तरफ आने दी, उनको तबेले तक ले गए, उनका दूध पिया, और वापस दुगुनी ऊर्जा से उन पर चढ़ाई कर दी।

इसलिए, गरिमा की बात वही करे जिसने जीवन में कभी गाली न दी हो। वेश्या पर पत्थर वही चलाए जिसने पूरे जीवन में एक भी पाप न किया हो। मर्यादा की बात वही करें जो यह बात दावे के साथ कह सकते हैं कि उन्होंने विरोधियों के ऐसे पचासों बयान पर यह लिखा था कि नेताओं के मुँह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। जो ऐसा नहीं कर सकते, उन्हें टिप्पणी का भी अधिकार नहीं।

आप भाषा की मर्यादा और चुनावी माहौल में आरोपों को गिरते स्तर पर ज़रूर लेख लिखें, लेकिन केन्द्र में कटघरा सिर्फ एक ही नहीं होना चाहिए। मोदी के खिलाफ अगर कटघरे लगाने निकलेंगे तो एक कटघरे के सामने दसियों कटघरों में खड़े लोगों की भीड़ से पूरा मैदान भर जाएगा। इसलिए, दिन में दस बार माँ-बहन की गालियाँ देने वाले, मोदी विरोधियों की गालियों पर मज़े लेने वाले, विपक्ष के क्रूर शब्दों पर ख़ामोश रहने वाले, गरिमा की बात न करें।

यौन शोषण आरोपित दुआ से लेकर IANS तक: BJP विरोधी Exit Polls और EC के आदेशों का उल्लंघन

चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों का खुला उल्लंघन चल रहा है। नेताओं द्वारा किए जाने वाली करतूतों की बात तो आयोग तक पहुँच रही है लेकिन मीडिया एजेंसियों द्वारा जो सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाने का काम किया जा रहा है, उस पर रोक लगाने में चुनाव आयोग विफल रहा है। राजनीतिक पार्टियाँ माहौल बनाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती हैं जिस तरह से माहौल बनाने के लिए विदेशी एजेंसियों को हायर करने की ख़बरें आती हैं, उससे पता चलता है कि इस दौर में मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक, प्रचार-प्रसार के हर आयाम पर नज़र रखना कड़ी चुनौती साबित हो रही है। सबसे पहले जानते हैं कि चुनाव आयोग ने क्या नियम बनाया था और कैसे कुछ मीडिया एजेंसियों ने उसका उल्लंघन किया।

चुनाव आयोग ने साफ़-साफ़ कहा था कि पहले चरण का चुनाव शुरू होने से लेकर अंतिम चरण का चुनाव संपन्न होने तक किसी भी प्रकार का एग्जिट पोल प्रतिबंधित रहेगा। अर्थात, 11 अप्रैल से लेकर 19 मई तक किसी तरह के कोई भी एग्जिट पोल प्रिंट या डिजिटल माध्यम से प्रकाशित या प्रसारित नहीं किए जा सकेंगे। अगर कोई ऐसा करता है तो उसे चुनाव आयोग के निर्देशों का उल्लंघन माना जाएगा। इसके अलावा चुनाव आयोग ने चुनाव से 48 घंटे पूर्व किसी भी प्रकार के ओपिनियन पोल पर भी प्रतिबन्ध चालू हो जाएगा, ऐसा नियम बनाया गया था। ये प्रतिबन्ध प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, सिनेमा, टीवी- इन सभी माध्यमों पर लागू करने की बात कही गई थी।

सभी समाचारपत्रों, टीवी न्यूज़ चैनलों और मीडिया संस्थाओं को आयोग द्वारा ये सूचना भेज दी गई थी। लेकिन तब भी, एग्जिट पोल धड़ल्ले से जारी किए जा रहे हैं और बीच चुनाव में माहौल को प्रभावित करने की कोशिशें हो रही हैं। सबसे पहले बात यौन शोषण के आरोपित पत्रकार विनोद दुआ की। विनोद दुआ की बेटी मल्लिका दुआ यौन शोषण के आरोपों पर तब तक काफ़ी मुखर रही थीं और आरोपितों को सज़ा देने की बात कह रही थीं, जब तक ख़ुद उनके पिता पर आरोप न लग गए। उसके बाद उन्होंने इस पर चुप्पी साध ली। ख़ैर, यहाँ बात एग्जिट पोल्स की हो रही है और विनोद दुआ ने क्या किया, ये भी हम आपको बताते हैं।

स्वराज एक्सप्रेस ने एग्जिट पोल जैसे ही कुछ आँकड़े जारी किए, जिसमें विनोद दुआ बतौर एंकर प्रसारित कर रहे थे। यूट्यूब पर इसका वीडियो डाला गया लेकिन जब जनता ने चुनाव आयोग के दिशानिर्देशों के उल्लंघन को लेकर चेताया तब वीडियो हटा लिया गया। आप इस यूट्यूब लिंक पर जाकर देख सकते हैं कि वीडियो को डिलीट कर लिया गया है। चुनाव आयोग का मानना है कि ऐसे एग्जिट पोल दर्शकों को प्रभावित करते हैं इससे चुनावी प्रक्रिया भी प्रभावित होती है। विनोद दुआ और स्वराज एक्सप्रेस की एग्जिट पोल में कॉन्ग्रेस को भारी फ़ायदा होता दिख रहा था और भाजपा को औंधे मुँह गिरते हुए दिखाया गया था। इससे समझा जा सकता है कि किसके पक्ष में माहौल बनाने के लिए इस एग्जिट पोल को प्रसारित किया गया।

विनोद दुआ के एग्जिट पोल का चुनाव शुरू होने से पहले पहले कई मीडिया एजेंसियों द्वारा कराए गए ओपिनियन पोल्स से कोई लेना-देना नहीं था, जिससे यह साफ़ पता चलता है कि अगर किसी ख़ास पार्टी के पक्ष में नहीं तो एक ख़ास पार्टी के विरोध में माहौल बनाने और मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए इस पोल का प्रयोग किया गया। इसका उद्देश्य ही था कि मतदाताओं को बरगलाया जाए। इसे यूट्यब पर लाखों लोगों ने देखा। एक स्क्रीनशॉट में देखा जा सकता है, इसे 5 लाख से भी अधिक लोग देख चुके थे। इस एग्जिट पोल में यूपीए को 2014 में आईं 49 सीटों के मुक़ाबले 137 सीटें दी गई थीं जबकि राजग को 134 सीटों के मुक़ाबले मात्र 66 सीटें दी गई थीं (पहले तीन चरणों के चुनाव के बाद)। डिलीट किए गए वीडियो का लिंक यहाँ क्लीक कर के देखें।

विनोद दुआ के बारे में सारी बातें जगज़ाहिर है, अतः, उनके इरादों पर शायद ही किसी को संदेह हो। अटल बिहारी वाजपेयी के निधन के बाद उनकी बुराइयाँ गिनाने वाले दुआ ने राजीव गाँधी के बारे में कुछ भी बोले जाने की भर्त्सना की थी। वाजपेयी के निधन के बाद उनकी दलील थी कि मृत व्यक्ति की बुराइयाँ भी जाननी चाहिए जबकि राजीव गाँधी को भ्रष्टाचारी बोले जाने के बाद नाराज़ दुआ ने कहा था कि हमारे देश में नियम है कि मृत व्यक्ति को कुछ नहीं कहा जाना चाहिए। इसीलिए विनोद दुआ के एग्जिट पोल के क्या इरादे थे, इसपर संदेह नहीं होना चाहिए। कुछ इसी तरह की करतूत प्रोपेगंडा वेबसाइट न्यूज़क्लिक ने भी की। असल में, दुआ ने अपना आँकड़ा यहीं से उठाया।

न्यूज़क्लिक की रिपोर्ट अब तक डिलीट नहीं की गई है। अब ताज़ा मामले में देश की प्रमुख समाचार एजेंसियों में से एक आईएएनएस ने भी एक एग्जिट पोल जारी किया। ट्विटर पर अपने आधिकारिक अकाउंट से जारी किए गए इस एग्जिट पोल में कहा गया कि इसे मतदाताओं के बीच किए गए सर्वे के आधार पर तैयार किया गया है। इस एग्जिट पोल में भी यूपीए को भारी बढ़त दिखाई गई और राजग की सीटों में भारी कमी बताया गया। कुछ लोगों ने कहा कि इस पोल में कुछ राज्यों में कॉन्ग्रेस को इतनीं सीटें दे दी गई हैं, जिसे उसे ख़ुद के इंटरनल सर्वे में भी नहीं मिली। एक यूजर ने कहा कि कॉन्ग्रेस नेताओं को खाता खुलने पर भी संशय है लेकिन आईएएनएस ने 4 सीटें दे रखी है।

कई ट्विटर यूजर्स ने इस एग्जिट पोल को हिटजॉब करार दिया। इसी तरह हाल ही में कॉन्ग्रेस ने एक ऐसे एग्जिट पोल के माध्यम से प्रचार किया, जिसे एक ब्रिटिश पत्रकार द्वारा जारी किया गया था। यह सीधा चुनाव आयोग के आदेश का उल्लंघन था। इस एग्जिट पोल में राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने की बात कही गई थी। उस पूरी रिपोर्ट में भाजपा को लेकर प्रोपेगंडा फैलाया गया। इस रिपोर्ट में चार जजों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस से लेकर भारतीय संवैधानिक संस्थाओं पर कथित हमलों की बात की गई थी। तुफैल अहमद जैसे पत्रकारों ने इस रिपोर्ट के माध्यम से कॉन्ग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

अब सवाल यह उठता है कि ऐसे एक भी एग्जिट पोल प्रकाशित होते हैं तो उन्हें हाथोंहाथ लेकर गिरोह विशेष द्वारा प्रचारित-प्रसारित किया जाता है, आयोग इसे कैसे रोकेगा? मान लीजिए कि आयोग ने कारर्वाई की और उन रिपोर्ट्स या वीडियोज को हटा भी दिया जाता है, लेकिन उससे मतदाता प्रभावित तो होता ही है। जैसे, स्वराज एक्सप्रेस आयोग द्वारा फटकारे जाने पर माफ़ी माँग सकता है लेकिन वीडियो हटाए जाने तक भी उसे पाँच लाख लोग देख चुके हैं, उसका क्या? कई लोगों ने उस वीडियो को डाउनलोड कर रखा है और वे इसे सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म्स पर अलग-अलग रूप में काट-छाँट कर प्रस्तुत कर रहे हैं, इसकी पहुँच बढ़ रही है, उसका क्या? आज के दौर में एक मिनट के लिए भी रिपोर्ट आए और 10 मिंट बाद डिलीट भी हो जाए तो बस एक स्क्रीनशॉट ही काफ़ी होता है प्रोपेगंडा फैलाने के लिए।

क्या कोई राजनीतिक पार्टी रुपयों का प्रयोग कर ऐसा कर रही है? सारे के सारे एग्जिट पोल में भाजपा को भारी घाटा होते क्यों दिखाया जा रहा है? चुनाव आयोग के नियमों का उल्लंघन कर के बीच चुनाव में इस तरह के एग्जिट पोल क्यों जारी किए जा रहे हैं? और अव्वल तो यह कि इन एग्जिट पोल्स के आते ही गिरोह विशेष के लोग इसे प्रसारित करने में क्यों व्यक्त हो जाते हैं? क्या दल विशेष को फ़ायदा पहुँचाने के लिए ऐसा हो रहा है? यौन शोषण आरोपित विनोद दुआ, समाचार एजेंसी आईएएनएस, प्रोपेगंडा वेबसाइट न्यूज़क्लिक और ब्रिटिश पत्रकार द्वारा जारी किए गए एग्जिट पोल्स को लेकर चुनाव आयोग उन सब पर कोई कार्रवाई करेगा? इसे आगे बढ़ने वाले पत्रकारों व नेताओं को भी दोषी माना जाएगा? अभी ये सारे ही सवाल अनुत्तरित हैं।

ममता की फोटोशॉप तस्वीर: प्रियंका शर्मा पर SC ने पलटा फैसला, बिना शर्त जमानत, नहीं माँगनी होगी माफी

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (मई 14, 2019) को भाजपा युवा मोर्चा की नेता प्रियंका शर्मा की माफी की शर्त को रद्द करते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। बता दें कि, कोर्ट ने पहले प्रियंका को सशर्त जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया था। इस आदेश में कहा गया था कि कोर्ट ने कहा था कि जेल से बाहर आने के तुरंत बाद प्रियंका को लिखित रूप में ममता बनर्जी से बिना शर्त माफी माँगनी होगी। मगर कुछ ही देर बाद पीठ ने प्रियंका के वकील एनके कौल को वापस बुलाया और अपने आदेश में संशोधन करते हुए जमानत के लिए माफीनामा की शर्त समाप्त कर दी।

बता दें कि, प्रियंका के द्वारा माफी माँगने की शर्त पर वरिष्ठ वकील एनके कौल ने याचिकाकर्ता प्रियंका का पक्ष रखते हुए कहा था कि इससे अभिव्यक्ति की आजादी के खिलाफ संदेश जाएगा। माफी माँगने का निर्देश अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार पर आघात की तरह है। कोर्ट के फैसले पर प्रियंका शर्मा की माँ ने खुशी जाहिर करते हुए कहा कि वो अपनी बेटी के घर लौटने का इंतजार कर रही हैं।

गौरतलब है कि, भाजपा युवा मोर्चा की नेता प्रियंका शर्मा ने ममता बनर्जी की फोटोशॉप्ड तस्वीर शेयर की थी। प्रियंका शर्मा ने ये तस्वीर अपने फेसबुक अकाउंट से शेयर की थी। तस्वीर में अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा के मेट गाला अवतार में ममता बनर्जी को दिखाया गया था। इस तस्वीर को लेकर टीएमसी कार्यकर्ताओं और नेताओं की ओर से बेहद तीखी प्रतिक्रिया आई थी। जिसके बाद प्रियंका को कोलकाता पुलिस ने 10 मई को अरेस्ट कर लिया और 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा दिया गया। प्रियंका पर ये कार्रवाई तृणमूल कॉन्ग्रेस के नेता बिश्वास चंद्र हाजरा की शिकायत पर की गई थी।

बंगाल: अमित शाह के रोड शो से पहले हंगामा, गुजरात से आए BJP कार्यकर्ताओं को होटल से निकाला

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) के बीच उठापटक शांत होने का नाम नहीं ले रही है। अब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के मंगलवार (मई 14, 2019) को कोलकाता में रोड शो से पहले शहर में कल रात बारासात चुनाव क्षेत्र में दोनों पक्षों के बीच खूब हंगामा हुआ।

पश्चिम बंगाल के बारासाट संसदीय क्षेत्र में सोमवार को अमित शाह की रैली के कुछ घंटों बाद रात में हाई वोल्टेज ड्रामा देखने को मिला। यहाँ लोकल होटल में रुके गुजरात से आए कई बीजेपी कार्यकर्ताओं को पुलिस ने बाहर निकाल दिया। इस बीच कार्यकर्ताओं की पुलिस से तीखी बहस भी हुई। पुलिस ने चुनाव से पहले होने वाली रुटीन जाँच के दौरान कार्यकर्ताओं से होटल छोड़ देने के लिए कहा। इसके पीछे का एक कारण ये भी था कि तृणमूल कॉन्ग्रेस की उम्मीदवार काकोली घोष दास्तीदार ने पुलिस को बताया था कि चुनाव के अंतिम दौर से पहले यहाँ कुछ बाहरी बीजेपी समर्थकों के ठहरे होने का शक है, जिनके पास कैश और हथियार हैं। होटल से निकाले जाने के बाद बीजेपी कार्यकर्ता स्थानीय बीजेपी नेता तुहीन मंडल के घर चले गए।

इस बीच, तृणमूल उम्मीदवार ने भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ कार्रवाई की माँग को लेकर स्थानीय पुलिस स्टेशन के बाहर धरना दिया। खबर है कि घटना की रात तुहिन मंडल के घर के बाहर भी खूब हंगमा हुआ। भाजपा नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ वहाँ पहुँचने वाले वाहनों की अचानक हड़बड़ी में स्थानीय लोग उत्तेजित हो गए। कई वाहनों में तोड़फोड़ भी की गई।

रिपोर्ट्स के अनुसार, इस पर मामले की जाँच के लिए पुलिस तुहिन मंडल के घर गई। पुलिस के मुताबिक पूरे घर में अंधेरा था और पुलिस द्वारा कई बार दरवाजा खोलने की अपील करने के बाद अंदर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। बाद में पुलिस ने गेट की ग्रिल तोड़ दी, और बड़े से लकड़ी के दरवाजे को किसी तरह खोला और अंदर से लाइट चालू की।

घर के अंदर स्थानीय भाजपा नेता प्रदीप बनर्जी सहित कुछ लोग थे, जिन्होंने कहा कि वे पार्टी की बैठक शुरू करने वाले थे। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि बैठक में आरएसएस नेता और बंगाल के भाजपा के सह-प्रभारी अरविंद मेनन ने भी भाग लिया। इसी दौरान कई तृणमूल कॉन्ग्रेस समर्थक, भाजपा कार्यकर्ता के घर के बाहर इकट्ठा हो गए और विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया। पुलिस को सुरक्षा के लिए बीजेपी समर्थकों को पुलिस स्टेशन ले जाना पड़ा।

इससे पहले, कल (मई 13, 2019) को जाधवपुर में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के हेलीकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं दी गई, जिससे उनकी रैली भी रद्द करनी पड़ी। इसके बाद प्रदेश भाजपा में भूचाल आ गया और सभी कार्यकर्ताओं व पार्टी पदाधिकारियों ने तृणमूल कॉन्ग्रेस सहित राज्य के प्रशासन पर जम कर निशाना साधा। भाजपा ने कहा कि पश्चिम बंगाल राज्य चुनाव आयोग तृणमूल कॉन्ग्रेस की दलाली करने में लगा हुआ है। भाजपा ने राज्य चुनाव आयोग के दफ़्तर के सामने बड़ी संख्या में विरोध प्रदर्शन किया।

WhatsApp कॉल से आ सकता है वायरस, हो सकता है डाटा डिलीट, सतर्क रहें

WhatsApp ने यह स्वीकार किया है कि उसकी साइबर सिक्युरिटी में गंभीर सेंध लगी है। इसके चलते हैकर आपके फ़ोन में स्पाइवेयर (आपकी जासूसी करने और आपका डाटा लीक करने वाले वायरस) इंस्टॉल कर सकते हैं, वह भी महज एक WhatsApp कॉल से। आप कॉल उठाएँ या न उठाएँ, इससे भी कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यह खतरा एंड्रॉइड और आईफ़ोन दोनों ही स्मार्टफोनों में है।

इज़राइली कंपनी ने बनाया वाइरस, किया WhatsApp को सावधान

इज़राइल की NSO ग्रुप नामक साइबर इंटेलिजेंस कंपनी ने इस वायरस का निर्माण किया है। उन्होंने WhatsApp को इस बारे में चेतावनी देने के साथ ही अमेरिका में कानूनी और पुलिस अधिकारियों, और अन्य साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों को भी आगाह कर दिया है।

इस कमजोरी का फायदा उठाकर कोई भी हमलावर अपने दुश्मन के फ़ोन को साइबर हमले और डाटा लीक का शिकार बना सकता है। इसके लिए उसे केवल WhatsApp के जरिए सामने वाले को फ़ोन करने की जरूरत होगी। यह भी जरूरी नहीं कि फ़ोन सामने वाला उठाए ही। उसके न उठाने पर भी वायरस उसके फ़ोन में भेजा जा सकता है। रिपोर्ट के अनुसार ऐसी किसी कॉल का इतिहास भी कॉल लॉग से मिटाया जा सकता है।

WhatsApp ने दूर की समस्या, जारी किया नया ऍप अपडेट

WhatsApp ने मामले पर जानकारी देते हुए NSO की ढूँढ़ी हुई खामी की पुष्टि तो की, लेकिन साथ में जोड़ा कि खामी को दूर कर दिया गया है। उनके अनुसार यह खामी इसी महीने उनके संज्ञान में आई थी, और सोमवार को जारी ऍप अपडेट में इसे दूर कर दिया गया है। WhatsApp ने अपने सभी उपभोक्ताओं से जल्दी से जल्दी अपनी ऍप अपडेट कर लेने की अपील भी की है, ताकि उनका डाटा सुरक्षित रह सके। इसके अलावा कंपनी ने उपभोक्ताओं को सामान्य एहतियातों का पालन करने के साथ-साथ अपने फ़ोन का ऑपरेटिंग सिस्टम (OS) भी लेटेस्ट अपडेट पर रखने की भी सलाह दी है।

WhatsApp ने अपनी ओर से अमेरिकी सरकार और पुलिस को भी इत्तला दे दी है

बर्थडे पर केक चेहरे पर लगाया तो हो सकती है जेल

गुजरात के सूरत में शहर के कमिश्नर सतीश शर्मा ने निषेधाज्ञा जारी कर बर्थडे में चेहरे पर केक लगाना प्रतिबंधित कर दिया है। निषेधाज्ञा का उल्लंघन करने पर आईपीसी की धारा 188 के तहत एक महीने तक की जेल हो सकती है। विशेष/गंभीर परिस्थितियों में यह सजा बढ़कर छह महीने तक भी जा सकती है।

केक, फोम, टेप सब पर रोक

कमिश्नर शर्मा की यह निषेधाज्ञा केवल केक ही नहीं, सार्वजनिक स्थल पर जन्मदिन समारोह के दौरान किसी दूसरे व्यक्ति के चेहरे या शरीर पर फोम, टेप  या कोई रसायन लगाने पर भी लागू होगी। सोमवार को जारी इस निषेधाज्ञा के पीछे कुछ घटनाओं का प्रकाश में आना है, जहाँ कुछ लोगों की सार्वजनिक स्थल पर जन्मदिन मनाने में मजे-मजे में पिटाई हो रही थी।

पुलिस कमिश्नर के निषेधाज्ञा जारी करने के बाद असिस्टेंट कमिश्नर (स्पेशल ब्रांच) पीएल चौधरी ने इस प्रकार के कार्य प्रतिबंधित करने की अधिसूचना जारी कर दी है। अधिसूचना भारतीय दण्ड विधान (आईपीसी) की धारा 188 के तहत जारी की गई है, जो कि लोकसेवक के आदेश के उल्लंघन से जुड़ी है। यानि इस अधिसूचना के उल्लंघन के आरोप में किसी को भी गिरफ्तार किया जा सकता है।

लोगों की जागरुकता के लिए कर रहें हैं

इस आदेश को तर्कसंगत ठहराने के लिए कमिश्नर जनता में जोखिम भरे जश्न के प्रति लोगों को जागरुक किए जाने की जरूरत का तर्क देते हैं। उनके अनुसार इस अधिसूचना को लोगों में स्पष्ट सन्देश देने और जागरुकता लाने के लिए जारी किया गया है। उन्होंने चेतावनी दी कि गिरफ़्तारी केवल अधिसूचना के उल्लंघन की धारा में ही नहीं, हिंसा समेत हर संभव धारा के अंतर्गत की जाएगी। पुलिस के गश्ती दलों को भी ऐसे जन्मदिन के जश्नों पर नजर रखने की हिदायत दी गई है। किसी भी हिंसा की भनक पड़ते ही पुलिस को हस्तक्षेप का आदेश है। सूरत की डुमास रोड पर अक्सर आपे से बाहर हो जश्न मनाने वाले लोग आ-जा रहे अन्य लोगों के लिए मुसीबत का सबब बनते हैं

दूरदर्शी युगपुरुष, ‘चाराकंठ’ समाजवादी नेता लालू यादव – गोदी मीडिया छिपाता है, अमेरिका ने माना लोहा

साथियो! आजादी के कई सालों बाद भी ये देखने को मिलता था कि केवल जो अमीर और पूँजीपति किस्म के व्यक्ति थे, उनका ही अपहरण किया जाता था या बस उन्हें ही लूटा जाता था। देश की बहुजन आबादी इस चीज के एहसास से सदियों से वंचित थी। खास तौर पे बिहार में तो हालात और विकट थे। ऐसे अन्याय भरे माहौल मे फिर उदय होता है गरीबों के नायक श्री लालू प्रसाद यादव का।

जनसुलभ अपहरण

आज जो बिहार के जातिवादी, सवर्णवादी और मनुवादी लालू जी से इतनी नफरत करते हैं, तो उसका कारण यही है कि पहले जो अपहरण और लूट केवल अमीरों और सामंतों तक सीमित थी, उसे लालू जी ने अपने कुशल नेतृत्व में गरीबों तक पहुँचा दिया। बिहार में सामाजिक न्याय की ऐसी क्रांति आई कि मात्र ₹2000 कमाने वाले टीचर्स का भी अपहरण होने लगा।

समाजवादी लालू ने ही तोड़ी थी अपहरण और लूट की अभिजात्यता

ये सामंतवाद की प्रताड़ना झेल रहे गरीब-गुरबा लोगों के लिए एक सुकून देने वाली क्रांति थी। लूट का ऐसा सामाजवादी विकेंद्रीकरण किया गया कि लोग ₹5000 जैसी छोटी रकम भी लेकर चलना मुनासिब नहीं समझते थे और इतने की भी DD बनवा कर चलते थे। राह चलते लुट जाने का भय जो पहले केवल अमीर और अभिजात्यों तक सीमित था, उसे गरीबों के मसीहा श्री लालू प्रसाद यादव ने एक-एक गरीब तक पहुँचाने का काम किया। हालाँकि, गोदी मीडिया और सवर्णवादी समाज ने यह तथ्य कभी नहीं बताया लेकिन, जानकार तो यह भी बताते हैं कि जिस ‘कैशलेस इकोनॉमी’ का नारा बुलंद कर के वर्तमान प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी हर जगह खुद की वाह-वाही करवा रहे हैं, उसका मॉडल भी लालू की ही उपरोक्त वर्णित नीतियों का हिस्सा है।

असल में, ये लालू यादव के समाजिक न्याय का ही कमाल था कि अब हर गरीब और शोषित भी अपहरण कर लिए जाने के उसी डर के साथ बेचैनी से जी सकता था, जो पहले केवल समाज के ऊँचे तबके तक सीमित हुआ करती थी। अपहरण के लालूकरण नामक इस क्रांति के बारे में एक मशहूर शायर ने भी लिखा था, “जब 85% गरीब ने भी महसूस किया अपहरणकर्ता का राज, उसे जलन से सामंतवादी कहते हैं जंगल राज।”

GST से पहले लालू लेकर आए थे SRT यानी, ‘सरल रंगदारी टैक्स’

लालू जी इतने बड़े दूरदर्शी थे कि उनके सरकार द्वारा किए गए कई कामों को ही मोदी सरकार ने नाम बदलकर लागू कर दिया है। उदाहरण के तौर पर GST ही ले लीजिए, जिसके तहत ‘एक देश, एक टैक्स’ की व्यवस्था करके मोदी जी अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, उसे लालू जी ने कई साल पहले ही लागू कर दिया था। 90 के दशक में बिहार में किसी भी कार्य को करने के लिए, चाहे वो भवन निर्माण हो या दुकानदारी, सब के लिए एक अत्यंत ही ‘सरल रंगदारी टैक्स’ चुकाना पड़ता था। यह एक ‘सिंगल विंडो क्लीयरेंस’ जैसी व्यवस्था हुआ करती थी। जहाँ रंगदारी के एकमुश्त भुगतान के तुरंत बाद ही आप अपना काम करने के लिए स्वतंत्र हो जाते थे।

आज नरेंद्र मोदी, टैक्स चोरी और काला धन को देश की बहुत बड़ी समस्या बताते हैं, लेकिन लालू जी के राज में रंगदारी वसूली की इतनी चाक-चौबंद व्यवस्था थी कि अगर किसी भी व्यक्ति ने रंगदारी ना देने या कम देने जैसा अनैतिक कार्य किया, उसे तत्काल प्रभाव से क्षेत्रीय रंगदारी वसूली अधिकारी द्वारा दंडित किया जाता था। दंड विधान में इस अपराध के लिए दोषी व्यक्ति की हत्या से लेकर, उसकी दुकान, मकान को बम से उड़ा देने जैसी, कठोर सजाओं का प्रावधान था। इससे यह भी साबित होता है कि लालू राज में बिहार में न्याय व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।

आज कई अर्थशास्त्री बताते हैं कि देश GST के बदलाव को झेलने के लिए तैयार नहीं था, जिस कारण देश का काफी आर्थिक नुकसान हुआ। लेकिन, गोदी मीडिया ये कभी नहीं बताता है कि रंगदारी टैक्स के रूप में लालू जी ने इस सरल टैक्स प्रणाली की शुरुआत 20 साल पहले ही कर दी थी, ताकि आज के समय में GST को अपनाते हुए व्यापारी किसी उलझन में ना फँसें।

परमादरणीय लालू जी ऐसे करिश्माई मुख्यमंत्री थे, जिन्होंने अपने कालजयी मुख्यमंत्रीत्व काल में पर्यावरण, पर्यटन से लेकर नारीवाद तक जैसे आज के गंभीर सामाजिक मुद्दों पे आज से 20 वर्ष पूर्व ही कई क्रांतिकारी कदम ऊठा लिए थे। तब इन विषयों पर पूरे विश्व मे कोई सोचता भी नहीं था। किंतु हमारा गैर राजनीतिक गोदी मीडिया हमेशा गरीबों के नायक की इन उपलब्धियों को अपनी ‘एक कठिन सवाल पूछने’ की कुंठा के कारण नजरअंदाज कर देता है या दबाने की कोशिश करता है।

पर्यावरणविद ‘चाराहारी’ लालू ने रोका था ग्रीन हाउस उत्सर्जन, गोदी मीडिया ने छुपाया

विश्व ने 1992 में ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने के लिए क्योटो प्रोटोकाॅल पास किया और आप जानते होंगे कि ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन का एक बड़ा कारण मवेशी हैं। ऐसे में श्री लालू जी ने समाज कल्याण के लिए यह बीड़ा उठाया और जिस जेनेटिकली मोडीफाईड चारे को खाकर मवेशी ग्रीन हाऊस गैसों का उत्सर्जन कर ग्लोबल वॉर्मिंग करते थे, उसे लालू स्वयं डकार गए। इस प्रकार आप देखेंगे कि भगवान शिव ने जिस प्रकार मानव कल्याण के लिए हलाहल निगल लिया था, लालू ने भी उसी प्रकार समाज के लिए सारा चारा तक खा लिया था।

यह जानकार आपको आश्चर्य होगा कि जिस ‘बड़े कदम’ को विश्व ने 1992 में क्योटो प्राॅटोकाॅल के रूप में अपनाया, वो काम दूरदर्शी लालू जी ने 1980 में ही चाईबासा के कोषागार से शुरू कर दिया था। शिव जी की तरह लालू जी ने इस संसार की भलाई के लिए ₹900 करोड़ के चारे को डकारा और उस दिन से ‘चाराकंठ’ रूप में जाने गए।

लालू राज में ‘शेल्टर हाउस’ सुविधा से लेस थे बिहार के दियारा-देहात

आजकल ईको पर्यटन और रूरल पर्यटन का बड़ा क्रेज है। कहने की जरूरत नहीं है कि ये भी लालू जी की नीतियों में ही शामिल था। 90 के दशक में कई अपराधी पड़ोस के राज्यों से बिहार के देहात में छुपने के लिए आते थे। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश के नामी बदमाश श्रीप्रकाश शुक्ला ने UP पुलिस के STF से बचते हुए कई महीने मोकामा के दियारा में बिताया था। जहाँ नरेंद्र मोदी की पर्यटन नीतियाँ केवल पाँच सितारा होटल के मालिकों और पूँजीपतियों को फायदा पहुँचाने वाली हैं, वहीं लालू जी की पर्यटन नीति गरीब, किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को फायदा पहुँचाने वाली थी।

‘वीमेन एम्पावरमेंट’

वर्तमान का एक और ज्वलंत समाजिक मुद्दा जिस पर लालू जी ने वर्षों पहले राह दिखाई थी, वो है नारीवाद। आज जहाँ अमेरिका अभी अपनी पहली महिला राष्ट्रपति का इंतजार कर रहा है, लालू जी ने अपनी सत्ता का त्याग कर राजनीति में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित की। मशहुर अमेरिकी टीवी सीरीज ‘हाऊस ऑफ कार्ड्स’ भी लालू जी के जीवन से ही प्रेरणा लेता है। केविन स्पेसी ने लालू जी द्वारा राबड़ी जी को मुख्यमंत्री बनाने के कदम से ही सीख ली है। तभी तो कहते हैं, “लालू जो आज सोचता है, अमेरिका वो बीस साल बाद सोचता है।”

(यह व्यंग्य राघवेंद्र प्रताप सिंह द्वारा लिखा गया है)