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‘द क्विंट’ के राघव बहल को पान की दुकान पर कैसेट रिकॉर्डिंग का धंधा ज़्यादा सूट करता है

ऑल्टरनेट जर्नलिज़्म के नाम पर पत्रकारिता के जो खोखे कुछ लोगों ने खोल रखे हैं, वहाँ टाटा 407 से लेकर महिन्द्रा कमांडर और ऑटोरिक्शा में बजने वाले ढिच्चिक-ढाँय वाले गानों की रिकॉर्डिंग के अलावा और कुछ काम का हो नहीं रहा। आप अगर बिहार, यूपी से लेकर दिल्ली तक की सवारी गाड़ियों में बैठेंगे तो पाएँगे कि ये लोग एक ही तरह के गाने बजाते हैं, एकदम से दिलजले टाइप के। इनके भाव से लेकर गानों का चुनाव तक बिलकुल एक ही होता है।

आज कल चुनाव चल रहे हैं, और चुनाव के दौर में नेता भी चल रहे हैं। नेता चल रहे हैं, तो पत्रकार भी चलायमान हैं। नरेन्द्र मोदी ने पिछले पाँच सालों में जितने इंटरव्यू नहीं दिए, उतने पिछले पाँच सप्ताह में दे दिए हैं। फिर राहुल गाँधी की भी लोगों को याद आई कि देश का असली भविष्य तो वही हैं, तो उनको कैसे टच अप-वच अप दे कर आइकॉनिफाय किया जाए।

इसी संदर्भ में उनके मूर्खतापूर्ण बयानों को ऐसे दिखाया गया जैसे राहुल गाँधी दार्शनिक हो गए हैं, और बुद्धों में गौतम के बाद अब राहुल ही आए हैं। ‘मैं उनके दिल से नफ़रत निकालना चाहता हूँ, प्यार बाँटना चाहता हूँ’, इस वाक्य में मूर्खता इतनी भरी हुई है कि आप सोचने लगेंगे कि आखिर कहा क्या जा रहा है। ‘चाहे जो भी हो जाए, मैं उनके माता पिता पर कोई कमेंट नहीं करूँगा’, इस बात को मीडिया ने ऐसे दिखाया जैसे कितनी मैच्योरिटी आ गई है इस व्यक्ति में जबकि यही आदमी ‘चौकीदार चोर है’ का नारा लगाता फिरता है, वो भी बिना किसी सबूत के।

पत्रकारिता के समुदाय विशेष में क्विंट की भी अपनी एक जगह है। इसके सरगना राघव बहल हैं। राघव बहल ने हाल ही में राहुल गाँधी से बातचीत की। बातचीत में क्या हुआ यह जानने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि गिरोह किस तरीके से काम करता है, वो आप सबको मालूम है। राघव बहल ने इंटरव्यू लेने के बाद जो ट्वीट किया है, वो ज़्यादा चिंता का विषय है।

यूँ तो क्विंट जैसे संस्थान पान की दुकान पर फटे पन्ने पर रिकॉर्डिंग की रिक्वेस्ट लेने वाला कार्य ही करते हैं, लेकिन ट्विटर पर मॉरल हाय ग्राउंड लेने में एक पैसा नहीं हिचकिचाते। इनके सारे सवाल वही होते हैं, जो तीन दिन पहले किसी और ने किए होते हैं। इनकी पूरी पत्रकारिता यही कहने में निकल जाती है कि मोदी से ‘कड़े सवाल’ नहीं पूछे जा रहे, लेकिन राहुल गाँधी के क्यूट डिम्पल देखते ही इनका वैचारिक स्खलन हो जाता है।

बहरहाल, राहुल गाँधी की मानसिक स्थिति का अंदाज़ा तो जनता को है ही, लेकिन राघव बहल ने जो ट्वीट किया है, वो पढ़ कर आपको लग जाएगा कि ये लोग पत्रकार किस हिसाब से कहते हैं खुद को। इन्होंने लिखा कि ‘हमने राहुल गाँधी से लगातार पूछा कि वो गठबंधन बनाने के लिए कितना समझौता करने को तैयार हैं, और उनका यह कहते रहना कि जनता जो कहेगी हम वही करेंगे, बताता है कि वो एक पूर्ण राजनेता बन गए हैं।’

राघव बहल जी, अगर इस स्टेटमेंट से राहुल गाँधी आपको पूर्ण राजनेता लगने लगे हैं तो बेलचा उठाइए और कहीं ट्रकों से गिट्टी-बालू उतारने का काम शुरु कर लीजिए। दो ऐसे वाक्य जिनका एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं है, कोई संबंध नहीं, लेकिन राहुल गाँधी को कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन कहना था तो एक बेकार से बयान पर उन्हें यह कह दिया गया।

क्या राघव बहल का चुनावी विश्लेषण यह कहता है कि राहुल गाँधी किसी भी दृष्टिकोण से ‘कॉलिंग द शॉट्स’ की स्थिति में हैं? क्या उन्हें यह लगता है कि कॉन्ग्रेस आज के दौर में राष्ट्रीय स्तर की पार्टी है? क्या राघव बहल को देश के कई राज्यों में कॉन्ग्रेस द्वारा छोटी पार्टियों के साथ किसी भी तरह, बिना शर्त के सरकार में होने या गठबंधन के लिए लालायित होने में कॉन्ग्रेस की स्थिति ऐसी लगती है कि उन्हें समझौता नहीं करना पड़ेगा?

एक जानकार पत्रकार यह सवाल करेगा ही नहीं। लेकिन वैसा पत्रकार यह सवाल भी करेगा, बार-बार करेगा, और फिर उसके लिए जो जवाब आएगा उसे ऐसे बता देगा जैसे मूसा टेन कमांडमेंट्स लेकर आ गया हो। राहुल गाँधी से हर पत्रकार यही सवाल करता है कि ‘क्या वो खुद को प्रधानमंत्री के रूप में देखते हैं’, और राहुल का यही जवाब आता है कि वो तो जनता तय करेगी।

इन लगातार, रिपीट मोड पर चल रहे राहुली बयानों से क्या पत्रकारों को यह पता नहीं चल रहा कि कॉन्ग्रेस कुछ भी कर ले, वो इस स्थिति में तो बिलकुल नहीं होगी कि महागठबंधन के नेता बन कर राहुल को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे करे। हाल ही में मायावती से लेकर केसीआर तक ने अपने आप को प्रधानमंत्री के रूप में आगे किया है, और कॉन्ग्रेस के नेताओं ने यह बयान दिया है कि वो प्रधानमंत्री पद पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार हैं।

सवाल जो पूछे नहीं गए, सवाल जो पूछे नहीं जाते

क्विंट सरगना बहल साहब ने दूसरे ट्वीट में यह ज्ञान दिया कि ‘राहुल गाँधी ने उनसे सवालों की लिस्ट नहीं माँगी, और जब उन्होंने कहा कि वो यह कार्यक्रम लाइव करेंगे तो राहुल सहजता से तैयार थे। यह आज के समय में काफी अलग है जबकि बाक़ियों के इंटरव्यू कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा होते हैं।’

यहाँ पर राघव बहल दो तरीके से गलत हैं, पहला तो यह कि जिनके पत्रकार टिकटॉक के विडियो का विश्लेषण कर के ‘डेन्जरस हिन्दुत्व प्रोपेगेंडा‘ की बात निकाल लाते हैं, उन्हें दूसरों की पत्रकारिता पर ज्ञान बाँचने की आवश्यकता है नहीं। दूसरी यह कि इंटरव्यू के लिए सवालों की लिस्ट माँगना पत्रकारिता में सामान्य शिष्टाचार और सहज भाव से बेहतर इंटरव्यू संचालन के लिए होता है।

आप यह सोचिए कि आपने किसी नेता से पूछ दिया कि उनके क्षेत्र में कितने मकान बने हैं, सड़कों की लंबाई कितनी है, पोखरों की खुदाई में कितने पैसे ख़र्च हुए, कितने बच्चों की टीकाकरण हुआ। और वो हर बार, अपने सचिव से पूछता है, फिर आपको कहता है कि उनके पास उत्तर है, अब रिकॉर्ड कर सकते हैं। इसमें समय की बर्बादी होती है। आप यह सोच कर नहीं चल सकते कि हर व्यक्ति को, हर बार, सारे आँकड़े याद रहते हैं। यही कारण है कि सवालों की लिस्ट पहले मँगा ली जाती है, ताकि दोनों पक्ष का समय बचे।

आपसे सवालों की लिस्ट नहीं माँगी गई, या आप बस राहुल गाँधी के लिए माहौल बनाने के लिए ऐसा कह रहे हैं, ये आप जानिए। लेकिन जो माँगते हैं, या जो देते हैं, वो किसी भी तरह से गलत नहीं होते। उसे कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा नहीं कहते। कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा क्या है, इसका उदाहरण राघव बहल ने इन्हीं दो ट्वीटों में दे दिया है, और इंटरव्यू देख कर आपको पता चल जाएगा कि कई बार, बहुत सारी बातें नहीं पूछना भी, प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा होता है।

प्रोपेगेंडा यह है कि एक अक्षम, मानसिक रूप से ढीला और आम तौर पर राजनैतिक परिदृश्य से गायब रहने वाले व्यक्ति में आपको एक परिपूर्ण पॉलिटिशियन दिखता है। प्रोपेगेंडा यह है कि आप चालाकी से सिर्फ फर्जी बातों में पूरा इंटरव्यू निकाल ले जाते हैं, जबकि दूसरे चैनलों के लिए आप प्रोपेगेंडा का इस्तेमाल बस इसलिए करते हैं क्योंकि आपको वो इंटरव्यू नहीं मिला। प्रोपेगेंडा यह है कि जिस व्यक्ति के पास न तो कोई विजन है, न रोडमैप है, न ब्लूप्रिंट है, न समझाने के लिए शब्द हैं, उनमें आपको कॉन्ज़ूमेट पॉलिटिशियन दिखता है।

आपको पता है कि आप ये बात लिख देंगे, और जनता के विचार उस तरफ हो जाएँगे। इसलिए आपने उस व्यक्ति को दृश्य से गायब कर दिया और लेबल चिपकाने का काम शुरु कर दिया है। जो जनता कभी शोकेस में सजाए डब्बों को खोलती भी नहीं, उसे आपने गधे के खिलौने के डिब्बे पर घोड़े का चित्र चिपका कर ठग लिया है। ये जनता कभी भी पैसा देते वक्त तक उस डब्बे को खोलेगी भी नहीं, और जब खोलेगी तो उसे पता चलेगा कि राघव बहल ने उसे घोड़ा कह कर गधा थमा दिया। मुझे गधों से कोई समस्या नहीं, बहुत मेहनती होते हैं, जो कि राहुल गाँधी बिलकुल ही नहीं हैं, बस उदाहरण के लिए जो दिखाया जा रहा है और जो है, उसमें अंतर है, इस कारण से मैंने ये उपमा दी है।

कोरियोग्राफ्ड प्रोपेगेंडा के नाम पर जो दो-चार पत्रकार तीतर बन रहे हैं, वो जानबूझकर, आम जनता की अनभिज्ञता का फायदा उठा रहे हैं। राहुल गाँधी से इस तीतर ने यह क्यों नहीं पूछा कि उसने राफेल को लेकर हाल ही में जो बोला कि ‘मुझे इस पर जानकारी नहीं, मैं IAF से पूछूँगा’, कि जब उसे पता ही नहीं है, और एयरफ़ोर्स ने अपना पक्ष इस पर स्पष्ट कर दिया है, फिर भी आप राफेल पर क्यों नाच रहे हैं?

राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा गया कि अगस्ता वेस्टलैंड घोटाले पर उनकी क्या सफ़ाई है? भले ही राहुल गाँधी यह जवाब देते कि मामला कोर्ट में है, और वो न्यायालय का सम्मान करते हैं, लेकिन सवाल क्यों नहीं पूछा गया। उनसे नेशनल हेरल्ड केस पर क्यों सवाल नहीं पूछा गया? उनसे यह क्यों नहीं पूछा गया कि उनकी पार्टी के नेता जब प्रज्ञा ठाकुर पर सवाल उठाते हैं, तो वो स्वयं और उनकी माताजी सोनिया गाँधी भी तो ज़मानत पर घूम रहे हैं, वो क्यों चुनाव लड़ रहे हैं? दोनों में से तो कोई एक स्टैंड क्यों नहीं लेती इनकी पार्टी?

राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा गया कि 1984 के दंगों पर जब वो इतने मुखर हैं तो फिर कमलनाथ मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री कैसे बन जाता है? आपकी और आपके माताजी की पूरी राजनीति पिछले दस सालों में 2002 पर ही अटकी रही है, जो कि अब एक साल से राफेल पर पहुँची है, फिर कमलनाथ जैसे दंगाई को आपने मुख्यमंत्री बना कर क्या यह साबित नहीं किया कि आपके पिता के सहयोग हेतु सिखों की हत्या में हाथ बँटाने वाले को कॉन्ग्रेस पार्टी अवार्ड दे रही है?

राहुल गाँधी से क्विंट ने यह सवाल क्यों नहीं पूछा कि उनके दिमाग में जो डकवर्थ-लुई से भी कॉम्प्लेक्स गणित चलता रहता है उसका आधार क्या है? जिस 30,000 करोड़ और अम्बानी की वो बात करते हैं वो संख्या कहाँ से आई है? राहुल गाँधी ने जो रैलियों में बार-बार 15 उद्योगपतियों के कभी 3.5 तो कभी 5.5 लाख करोड़ रुपए की माफ़ी की बात मोदी के सर पर रखी है, वो आँकड़ा कहाँ से आया? ये 15 उद्योगपति कौन हैं, इनके नाम राहुल गाँधी क्यों नहीं बताते? शायद इस सवाल के लिए राघव बहल को राहुल को लिस्ट दे ही देनी चाहिए थी, ताकि वो नाम लिख लेते क्योंकि इस व्यक्ति को अपना ही नाम याद हो, देश को इस पर संदेह है।

प्रोपेगेंडा न करने की बात करने वाले क्विंट ने राहुल गाँधी से यह क्यों नहीं पूछा कि मोदी द्वारा बनाया गया कानून कि आदिवासियों को कहीं भी गोली मारी जा सकती है, किस पीनल कोड में आया है? आखिर राहुल गाँधी आदिवासियों के बीच जा कर ये बातें कैसे कह देते हैं? राघव बहल को ये सवाल तो पूछना चाहिए था ताकि पता तो चलता कि मोदी ने कोई सीक्रेट मोदी पीनल कोल्ड और मोदी क्रिमिनल प्रोसीजर नामक दो कानूनी किताबें भी लिख रखी हैं जिनका पीडीएफ़ भाजपा शासित राज्यों की पुलिस के पास है। यूपीएससी की तैयारी करने वाले लोगों को इससे कितनी मदद मिल जाती!

राहुल गाँधी से क्विंटाचारी बहल ने ये क्यों नहीं पूछा कि तुमने जो दस दिन में किसानों की लोन माफ़ी और बेरोज़गारी भत्ते देने की बात की थी, और उँगलियाँ छूते हुए पूरे देश को एक दिन बताया था कि तुम्हें दस तक की गिनती आती है, वो इसी ग्रह के दस दिन थे, या फिर कहीं और के, क्योंकि दस दिन तो कब के बीत गए और भत्ता तो किसी को नहीं मिला। लोन किस तरह से, और कितने किसानों के माफ हुए हैं, उस पर भी क्विंट के क्यूट राघव बहल जी एक सवाल पूछ लेते।

ये सारी बातें राफेल की तरह नहीं हैं जो फर्जी हैं, या जिसे सुप्रीम कोर्ट तक ने नकार दिया है। ये सारी बातें राहुल गाँधी की रैलियों की पब्लिक स्पीच से हैं। इसे पूछने की हिम्मत तो क्विंट को हुई नहीं और ये प्रोपेगेंडा पर लेक्चर दे रहे हैं। राघव बहल, इसी को प्रोपेगेंडा कहते हैं। ये जो इमेज बिल्डिंग का ठेका लिया है न आपने और आपके गिरोह ने, इससे बेहतर था कि दीवारों पर ईंट जोड़ते, कम से कम वास्तव में किसी के घर की दीवार तो खड़ी हो जाती, यहाँ आप एक ग़ुब्बारे में हवा भर रहे हैं, जिसे कोई आम आदमी एक पिन मारेगा और वो फुस्स हो जाएगा।

विपक्ष में एक नेता की कमी जो कॉन्ग्रेस ही पूरा कर सकती है

राघव बहल जैसे धूर्त पत्रकारों का गिरोह यह जानता है कि उनके तारणहार कॉन्ग्रेस के युवराज ही हैं। भले ही उनकी मानसिक क्षमता कुछ भी हो लेकिन उनके कैबिनेट में अनुभवी लुटेरे हैं जो तंत्र को वापस अपने हिसाब से चला देंगे ताकि फोन पर से कैबिनेट चर्चा की जानकारी मिल जाया करे, विदेशों से बिना किसी हिसाब-किताब के चंदा मिलता रहे, राज्यसभा की सदस्यता से लेकर पद्म पुरस्कारों में इनके नाम आएँ।

सबको पता है कि महागठबंधन छुटभैये नेताओं की महात्वाकांक्षा की बलि चढ़ता आया है, चढ़ता रहेगा। आखिर ममता को यह कैसे गँवारा होगा कि वो प्रधानमंत्री न बने और मायावती बन जाए? आखिर केसीआर क्यों अपने आप को दूसरे देवगौड़ा की तरह नहीं देखेगा? आखिर स्टैलिन खुद को किंगमेकर की तरह क्यों नहीं देख सकता?

ऐसे में ज़रूरत है एक संयोजक की। लेकिन समय अब वैसा नहीं है जब कॉन्ग्रेस सबसे बड़ी राष्ट्रीय पार्टी हुआ करती थी, और उनकी बात छोटे दल सहज रूप से सुनते थे। समय ऐसा बदला है कि कॉन्ग्रेस अपना मुँह छुपाती फिरती है, और छोटे दलों से कह रही है कि ‘हमसे गठबंधन कर लो’ और वो दल कहते हैं कि करेंगे लेकिन अपनी शर्तों पर।

यही कारण है कि दूसरे संस्थानों पर ‘कठिन सवाल नहीं पूछते’ और ‘स्क्रिप्टेड इंटरव्यू’ का लेबल लगाने वाले, राहुल गाँधी को ही पूर्ण राजनेता, परिपक्व लीडर, समझदार व्यक्ति और तमाम विशेषणों से नवाज़ते हुए लेख और हेडलाइन रच रहे हैं। ये बातें जितनी हास्यास्पद हैं, अब उतनी लगती नहीं क्योंकि इस गिरोह ने राहुल गाँधी के बेकार और मतलबहीन ट्वीट में कालिदास के मुक्के को पंच तत्व के आपसी सहयोग से मानव शरीर की रचना जैसे ज्ञान की बात खोज निकाली है।

राहुल गाँधी का दुर्भाग्य यह है कि वो भरी बारिश में काली माता के मंदिर में दिया जलाने जाते नहीं, और वो सिर्फ चुनावों के समय ही जनऊ पहनते हैं, चुनावों के समय ही राम भक्त और शिव भक्त बनते हैं। साथ ही, उनको एक्सिडेंटली भी, सर पर चोट लगने से ही सही, ज्ञान मिलने की संभावना दिखती नहीं क्योंकि उसके लिए भी पूर्व में अर्जित ज्ञान के लोप होने की बात ज़रूरी है। जिस व्यक्ति की आस्था का काँटा, उसके परिवार द्वारा कुछ शहरों में तीन घंटे के लिए पहुँचाई बिजली का घर के स्टेबलाइजर के वोल्टमीटर के काँटे की तरह 60 से 200 तक बढ़ता-घटता हो, उसे कोई राम, शिव या काली आशीर्वाद देंगी, यह मानना तर्कसंगत नहीं लगता।

मोदी पर चिल्लाने वाले मीडिया गिरोह से कुछ सवाल जो राहुल गाँधी से नहीं पूछे गए

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनसे पूछे जाने वाले सवाल आए दिन चर्चा का विषय बने रहते हैं। इसमें विपक्ष समेत कई बड़े मीडिया हाउस यह बताने का भरसक प्रयास करते हैं कि पीएम मोदी सवालों के जवाब नहीं देते या उनसे जो सवाल पूछे जाते हैं उनमें किसानों की समस्या और रोज़गार जैसे विषयों से संबंधित कठिन सवाल शामिल नहीं होते। दावा तो यहाँ तक किया जाता है कि पीएम मोदी के साक्षात्कार में केवल हँसी-ठिठोली, मनोरंजन और उनकी पसंद के व्यंजनों से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं।

विपक्ष की यह पुरज़ोर कोशिश रहती है कि पीएम मोदी द्वारा दिए गए साक्षात्कार में उन्हें किस तरह बेवजह के मुद्दों पर घेरा जा सके। इनमें कुछ मीडिया संस्थान और मीडियाकर्मी भी शामिल हैं जिन्हें दुष्प्रचार करने में महारत प्राप्त है। ऐसा ही एक नाम क्विंट के संस्थापक राघव बहल का भी है जिन्होंने हाल ही में राहुल गाँधी का साक्षात्कार लिया।

यूँ तो राघव ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी से कई मुद्दों पर पर बातचीत की, इनमें कई मुद्दे शामिल थे। राहुल गाँधी के इस साक्षात्कार का वीडियो जब सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म पर आया तो कुछ लोगों ने इस पर आपत्ति दर्ज की। इस साक्षात्कार में पत्रकार राघव बहल ने अपनी चतुराई का खुला प्रदर्शन करते हुए राहुल गाँधी से वो सवाल नहीं पूछे जिनके जवाब देश की जनता जानना चाहती है। वो कुछ सवाल इस प्रकार हैं, जो अब पत्रकार राघव से पूछे जा रहे हैं।

क्या आपने 30 हज़ार करोड़ रुपए के आंकड़े के बारे में सवाल पूछा?

क्या आपने मोदी के उस “नए कानून” के बारे में पूछा जिसके तहत आदिवासियों को सीधे गोली मारी जा सकती है?

क्या आपने उनसे NYAY योजना के बारे में पूछा?

क्या आपने उनसे अलवर गैंग रेप को रोकने के लिए कहा?

क्या आपने उनसे अमेठी में हुए काम के बारे में पूछा?

क्या आपने नेशनल हेराल्ड और अगस्ता वेस्टलैंड के बारे में पूछा?

क्या राहुल गाँधी से यह नहीं पूछा जाना चाहिए कि सिख दंगों के आरोपी कमलनाथ को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया गया?

ऐसे में यह कहने और स्वीकारने में गुरेज नहीं होनी चाहिए कि मीडिया गिरोह के निशाने पर केवल पीएम मोदी रहते हैं, जिनकी केवल आलोचना करना ही मीडिया गिरोह का एकमात्र ध्येय रहता है। जहाँ एक तरफ साक्षात्कार के नाम पर राहुल गाँधी से ‘समोसे के स्वाद’ और ‘गुड़ से बनी जलेबियों’ के बारे में सवाल पूछे जाते हैं, तो वहीं दूसरी तरफ वो इस बात से भी खासे दु:खी हैं कि पीएम मोदी से कोई कठिन सवाल क्यों नहीं पूछता।

यहाँ जानकारी के लिए यह बताना ज़रूरी है कि प्रधानमंत्री मोदी से राजनीतिक और गै़र-राजनीतिक दोनों तरह के साक्षात्कार लिए गए। हाल में तो लगभग हर बड़े मीडिया संस्थान ने उनका साक्षात्कार लिया। लेकिन अगर हम कठिन सवालों भरे साक्षात्कार का रुख़ करें तो न्यूज़ एजेंसी ANI की पत्रकार स्मिता प्रकाश ने पीएम मोदी से एक घंटे से भी अधिक समय तक एनडीए सरकार की आर्थिक नीतियों, विमुद्रीकरण, जीएसटी और अन्य सभी चुनौतियों से जुड़े सवाल पूछे थे, जिन्हें सरल तो नहीं कहा जा सकता था। वहीं राहुल गाँधी ने इस साक्षात्कार को “व्यवहारिकता वाली पत्रकारिता” का नाम दिया था।

चुनाव पूरे होने के पहले ही चंद्रबाबू सरकार बनाने में जुटे, केजरीवाल और राहुल से मुलाकात

लोकसभा चुनाव सम्पन्न होने के पहले ही सरकार बनाने को लेकर विपक्ष के नेताओं में काफ़ी हलचल का माहौल बन गया है। महागठबंधन के नाम पर विपक्ष की एकजुटता ख़ासतौर पर पीएम मोदी के लेकर है। तेलुगू देशम पार्टी (TDP) अध्यक्ष और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू भी विपक्ष के नेताओं को एकजुट करने की कोशिश में जुट गए हैं। उन्होंने शुक्रवार (17 मई) को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से मुलाक़ात की। इस दौरान उनके बीच चुनाव के परिणाम के बाद की रणनीति को लेकर लंबी बातचीत हुई। इस मौक़े पर मनीष सिसोदिया और पार्टी के वरिष्ठ नेता संजय सिंह भी मौजूद थे।

उधर, कॉन्ग्रेस भी तीसरे मोर्चे की सरकार बनाने के लिए विपक्ष की पार्टियों को एकजुट करने में जुट गई है। इसके लिए कॉन्ग्रेस ने नेताओं से मिलने की क़वायद भी शुरू कर दी है। शुक्रवार (17 मई) को कॉन्ग्रेस ने कहा था कि वो एक प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष सरकार के गठन के लिए प्रतिबद्ध है। इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि अगर कॉन्ग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल जाएगा तो भी वो राज्य स्तरीय नेता का समर्थन लेने में गुरेज नहीं करेगी। ख़बर के अनुसार, सोनिया गाँधी ने विपक्षी दलों को साथ लाने के लिए अपने विश्वासपात्र नेताओं से कहा है कि वो 23 मई को चुनाव परिणाम की घोषणा के साथ ही एक बैठक बुलाएँ।

इसके अलावा यह भी पता चला है कि मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू यूपीए अध्यक्ष सोनिया गाँधी से भी मिलना चाहते थे पर किन्हीं कारणों की वजह से उनसे बातचीत संभव नहीं हो सकी। जानकारी के अनुसार, चंद्रबाबू नायडू आज राहुल गाँधी से मुलाक़ात करेंगे। इस मुलाक़ात में दोनों नेताओं के बीच चुनावी नतीजों के बाद की रणनीति पर गहन चर्चा होने की संभावना है। राहुल गाँधी से उनकी मुलाक़ात इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि राहुल ने सरकार बनाने के लिए गठबंधन को हरी झंडी दिखाई थी। इस संकेत से राहुल गाँधी ने अपने लक्ष्य को साफ़ कर दिया था कि वो बीजेपी को सत्ता में वापसी नहीं करने देना चाहते और इसके लिए वो विपक्ष की हर शर्त मानने को तैयार हैं। ऐसी संभावना है कि चंद्रबाबू नायडू राहुल गाँधी से मुलाक़ात करने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती और सपा अध्यक्ष अखिलेश सिंह यादव से भी मुलाक़ात के लिए लखनऊ रवाना हो जाएँगे।

‘महागठबंधन’ तेरे कितने PM? अब नवीन पटनायक के पक्ष में भी आया बयान

बीजू जनता दल के उपाध्यक्ष व ओडिशा सरकार में मंत्री सूर्य नारायण पात्रो ने शुक्रवार (मई 17, 2019) को ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक का नाम प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में सामने रखा है। मीडिया खबरों के मुताबिक उनका कहना है कि भारत और ओडिशा राज्य के लोग चाहते हैं कि नवीन पटनायक देश के प्रधानमंत्री बनें। सूर्य नारायण का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है, जब चुनावी नतीजे आने में ज्यादा समय नहीं बचा है। ऐसे में अटकलें लगाई जा रही हैं कि यदि किसी पार्टी को बहुमत नहीं मिलता है, और क्षेत्रीय पार्टियों के समर्थन से सरकार चुनी जाती है, तो स्पष्ट है कि बीजद इसमें अपने नेता को प्रधानमंत्री के रूप में देखना चाहेगी इसकी संभावनाएँ प्रबल हो गई हैं।

हालाँकि बीजद उपाध्यक्ष ने यह भी कहा है कि नवीन पटनायक को प्रधानमंत्री बनने के लिए कॉन्ग्रेस का समर्थन नहीं लेना चाहिए, क्योंकि कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है, वह पहले तो किसी नेता को प्रधानमंत्री बनने के लिए समर्थन देती है, लेकिन कुछ ही महीनों बाद पीछे हट जाती है। वैसे, इस बयान को लेकर यह बात स्पष्ट नहीं हो पाई है कि सूर्य नारायण पात्रो के इस बयान में नवीन पटनायक की सहमति है या नहीं।

बहुत जल्द चुनाव का परिणाम आने वाला है और ज्यों-ज्यों ये तारीख करीब आ रही है, वैसे-वैसे पीएम पद के लिए दावेदारी भी बढ़ती जा रही है। गठबंधन के तमाम नेता पीएम बनने का ख्वाब संजोए बैठे हैं। परिणाम आने से पहले ही गठबंधन के कई नेताओं ने पीएम बनने की इच्छा जाहिर की है, तो कुछ ने डिप्टी सीएम बनने की शर्त रख दी है। गौरतलब है कि, नवीन पटनायक के पीएम पद के दावेदारी से पहले मायावती ने अपने आपको पीएम पद के लिए प्रबल दावेदार बताया था और साथ ही वर्तमान पीएम नरेंद्र मोदी को अनफिट करार दिया।

वहीं, पिछले दिनों तेलंगाना के मुख्यमंत्री और तेलंगाना राष्ट्र समिति (TRS) अध्यक्ष केसीआर राव ने विपक्ष के सामने खुद को डिप्टी सीएम बनाने की शर्त रखी थी। उन्होंने कहा था कि अगर लोकसभा चुनाव में किसी एक दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिला, तो वो ग़ैर-बीजेपी गठबंधन की सरकार को अपना समर्थन देने के लिए तैयार हैं, मगर वो सभी उनका समर्थन करेंगे, जब उन्हें सरकार में उप-प्रधानमंत्री का पद दिया जाएगा और इसी भरोसे पर वो 21 मई को होने वाले विपक्ष की मीटिंग में शामिल होंगे।

विपक्ष के नेता जिस तरह से एक के बाद पीएम पद के लिए दावेदारी पेश कर रहे हैं, उससे समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर गठबंधन, पीएम बनाना किसको चाहता है। क्योंकि जिस तरह से नेताओं के बयान आ रहे हैं, उससे तो यही लग रहा है कि सभी लोग पीएम बनने के लिए लालायित हैं।

ऐसे में जब ये लोग खुद पीएम पद के लिए किसी एक नाम पर सहमत नहीं हैं, तो फिर ये लोग सत्ता में आने पर एक साथ मिलकर देश को कैसे चलाएँगे? क्योंकि बिना सत्ता के ही इनकी अंदरुनी खटपट सामने आ रही है, तो सत्ता में आने पर ये देश को किस दिशा में ले जाएँगे, इसके तो बस कयास ही लगाए जा सकते हैं।

दिल्ली में पूरा का पूरा मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस को शिफ्ट हो गया: अरविंद केजरीवाल

राजधानी दिल्ली की 7 लोकसभा सीटों पर 12 मई को मतदान हुआ। इस मतदान को लेकर दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने एक बड़ा बयान दिया है। उनका कहना है कि इस मतदान के दौरान आखिरी समय में सारे मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस की तरफ चले गए।

केजरीवाल चुनाव प्रचार के लिए शुक्रवार (मई 17, 2019) को पंजाब के राजपुरा पहुँचे थे, जहाँ पर 19 मई को मतदान होना है। यहाँ आम आदमी पार्टी 13 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। इस दौरान जब इंडियन एक्सप्रेस ने उनसे पूछा कि आम आदमी पार्टी को दिल्ली में कितनी सीटें मिल रही हैं, तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा कि ये देखने वाली बात होगी कि क्या होता है। केजरीवाल ने आगे कहा कि चुनाव के 48 घंटे पहले तक उन्हें ऐसा लग रहा था कि सातों सीटें आम आदमी पार्टी को जाएँगी, मगर आखिरी वक्त पर पूरे मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गए। उन्होंने कहा कि मतदान के एक दिन पहले वो ये पता लगाने की कोशिश में लगे थे कि आखिर हुआ क्या है और फिर उन्हें पता चला कि पूरा का पूरा मुस्लिम वोट कॉन्ग्रेस को शिफ्ट हो गया जो कि 12 से 13 फीसदी हैं।

अगले साल आम आदमी पार्टी को राजधानी दिल्ली की सत्ता में आए हुए 5 साल पूरे हो जाएँगे। वो दिल्ली में होने वाले आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर काफी आशान्वित नज़र आए। उन्होंने इस बारे में बात करते हुए कहा, “दिल्ली में काम बोलता है। लोग हमारे काम के आधार पर वोट देंगे।” केजरीवाल से जब ये पूछा गया कि क्या पार्टी फिर से पुराने चेहरों को ही दोबारा मौका देगी, तो केजरीवाल ने कहा कि ये फैसला हर किसी के परफॉर्मेंस का आकलन करने के बाद लिया जाएगा।

वहीं, जब उनसे लोकसभा चुनाव के नतीजों के बारे में पूछा गया तो उन्होंने इसका जवाब देते हुए कहा कि अगर ईवीएम के साथ छेड़छाड़ नहीं होती है, तो मोदी की सरकार वापस नहीं आएगी। इसके साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि उन्हें नहीं पता कि वो लोग ऐसा करेंगे या नहीं। आगे केजरीवाल ने यह भी साफ किया कि अगर केंद्र में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की सरकार नहीं आती है और आम आदमी पार्टी को पर्याप्त सीटें मिलती है, तो हम दिल्ली को संपूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की शर्त पर सरकार को समर्थन देंगे।

14 साल बाद NCERT बदलेगा स्कूली पाठ्यक्रम, जनता ने दिए थे 1 लाख सुझाव

स्कूली शिक्षा को बेहतर बनाने की दिशा में 14 साल बाद नैशनल करिकुलम फ्रेमवर्क की समीक्षा बहुत जल्द की जाएगी। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी रिपोर्ट के मुताबिक एनसीईआरटी के निदेशक ऋषिकेश सेनापति ने खुद अखबार से हुई बातचीत में इसका खुलासा किया है।

खबर के मुताबिक ऋषिकेश बताते हैं कि साल 2005 में जारी हुए पिछले एनसीएफ की समीक्षा का प्रारंभिक कार्य शुरू हो चुका है। इसे लेकर कमिटी भी बहुत जल्द बनाई जाएगी। बता दें एनसीएफ का काम देश में टीचिंग प्रैक्टिस पर दिशा निर्देश देते हुए स्कूल में पढ़ाये जाने वाले पाठ्यक्रम बनाने और पाठ्यपुस्तकों के लेखन की रूपरेखा बनाने का होता है।

एनसीईआरटी निदेशक के मुताबिक उन्होंने पाठ्यपुस्तकों को तर्कसंगत बनाने पर जो कार्य किए हैं, वही 2005 में जारी हुए एनसीएफ की समीक्षा का आधार बनेंगे। उनके मुताबिक समाज में बदलाव की जरूरत है और उनका फोकस ‘एक्पेरिमेंटल लर्निंग’ पर है।

नवभारत की रिपोर्ट के मुताबिक लोकसभा चुनावों के नतीजों के बाद इसे मामले को लेकर आधिकारिक घोषणा होगी। निदेशक सेनापति का कहना है कि इस मामले पर अभिभावकों, छात्रों और बुद्धिजीवियों द्वारा 1 लाख सुझाव दिए गए हैं। इन सुझावों बारीकी से विश्लेषण होगा। इस प्रक्रिया में एक साल तक लग सकता है ।

इसके अलावा साल के अंत तक एनसीईआरटी 42 लाख सरकारी एलीमेंट्री स्कूल के टीचर्स के लिए बड़े ट्रेनिंग प्रोग्राम पर भी विचार कर रहा है। इससे पहले इस तरह का एक प्रोग्राम त्रिपुरा में आयोजित किया जा चुका है जहाँ 3-4 महीने के भीतर 31000 शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया था।

मोदी-शाह प्रेस कॉन्फ़्रेंस, रवीश-राजदीप, राहुल गाँधी की बचकानी हरकतें, और सोनिया का मिशन 272

इस वीडियो में हमने पिछले दिनों की कुछ खबरों पर चर्चा की है जिसमें आज हुए BJP प्रेस कॉन्फ्रेंस, राहुल गाँधी की प्रेस कॉन्फ्रेंस, मीडिया के समुदाय विशेष के लोगों के ट्रोल बन कर सिमट जाने की बात और सोनिया गाँधी के मिशन 272 की बात शामिल है।

कॉन्ग्रेस उम्मीदवार की पत्नी का स्विस बैंक में एकाउंट, खुद ₹1.53 करोड़ की चल संपत्ति के मालिक

गुरदासपुर लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस के उम्मीदवार सुनील कुमार जाखड़ ने अपने चुनावी हलफनामे में ₹1.53 करोड़ की चल सम्पत्ति के अलावा एक स्विस बैंक में पत्नी के नाम पर करीब ₹7 करोड़ जमा होने की जानकारी दी है। लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष दिवंगत बलराम जाखड़ के बेटे ने विभिन्न बैंक खातों में ₹1.23 करोड़ जमा होने की जानकारी दी है।

हलफनामे के अनुसार, उन्होंने स्विजरलैंड के ज्यूरिख स्थित ‘ज़ुरखर कैंटोनल बैंक में पत्नी सिल्विया जाखड़ के नाम पर ₹7.37 करोड़ जमा होने की जानकारी दी है। ‘ज़ुरखर कैंटोनल बैंक’ की वेबसाइट के अनुसार वह स्विजरलैंड का सबसे बड़ा बैंक है। वर्तमान में सुनील जाखड़ के पास ₹4.49 लाख रुपए नकद और उनकी पत्नी के पास ₹1.38 लाख रुपए नगद है।

उन्होंने हलफनामे में बताया कि उनके पास ₹2.88 करोड़ की अचल संपत्ति (जो स्वयं अर्जित और विरासत में मिली सहित) और उनकी पत्नी के पास ₹12.06 करोड़ की सम्पत्ति है। जाखड़ गुरदासपुर से मौजूदा सांसद हैं, जिनका मुकाबला अभिनेता से राजनेता बने अजय सिंह धर्मेन्द्र देओल (सनी देओल) से है। उन्हें भाजपा ने टिकट दिया है।

₹87.18 करोड़ है अजय सिहं धर्मेन्द्र देओल की संपत्ति

बॉलीवुड अभिनेता अजय सिंह धर्मेन्द्र देओल (सनी देओल) ने सपत्नी अपनी कुल संपत्ति की घोषणा करते हुए इसे
₹87.18 करोड़ बताई है। संपत्ति और देनदारियों पर उनके हलफनामे से यह पता चलता है कि 2017-18 में उनकी कुल आय ₹63.82 लाख, 2016-17 में ₹96.29 लाख और 2015-16 में ₹2.25 करोड़ थी। उन्होंने सपत्नी अपनी संपत्ति ₹87.18 करोड़ बताई है।

राहुल ने स्वीकारा कि कुछ पत्रकार ‘उनके साइड के हैं’ जो मोदी से कड़े सवाल पूछते हैं

वैसे तो तमाम पत्रकारों ने खुद ही अपने व्यवहार से अपनी ‘पक्षकारिता’ साबित की है लेकिन आज राहुल गाँधी की स्वीकृति ने उस पर मुहर भी लगा दी। राहुल गाँधी ने आज एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्वयं स्वीकार किया कि कुछ पत्रकार उनके साइड के हैं जो विरोधियों से कॉन्ग्रेस पार्टी की ओर से कठिन सवाल पूछने का काम करते हैं।

आज एक तरफ जहाँ बीजेपी की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही थी तो ठीक उसी समय राहुल गाँधी भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। उसी समय राहुल ने कहा, “मैंने अभी सुरजेवाला जी से कहा, उधर मोदी जी की प्रेस कॉन्फ्रेंस चल रही है तो जरा कुछ अपने पत्रकार भी भेज दीजिए जो हमारी तरफ से भी 1-2 सवाल पूछ लें, तो सुरजेवाला ने बताया कि दरवाजे वहाँ बंद कर दिए गए हैं।”

संभवतः यहाँ उन्ही पत्रकारों की बात हो रही है जो खुलेआम ‘पक्षकार’ होने के बाद भी ‘न्यूट्रल’ पत्रकार बने हुए हैं। ऐसे पक्षकार लगातार कॉन्ग्रेस की तरफ से पैडलिंग करते पाए जाते हैं जिन्हें राहुल गाँधी ने आज खुलेआम स्वीकार कर इस हकीकत को मान्यता प्रदान कर दी।

राहुल के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर यह बहस छिड़ गई कि देखिए कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी खुद स्वीकार रहे हैं कि पार्टी के ‘पाले हुए’ कुछ पत्रकार है जो कॉन्ग्रेस के लिए काम करते हैं।

हमने पहले भी कई बार रिपोर्ट किया गया है कि कैसे कुछ कॉन्ग्रेसी ‘पक्षकार’ फेक न्यूज़ फैलाते, कॉन्सिपिरेसी थ्योरीज़ गढ़ते और यहाँ तक कि कॉन्ग्रेस के इलेक्शन कैम्पेन से लेकर स्ट्रैटजी प्लानिंग में भी खुलेआम अपने चवन्नी छाप विचार रखकर भी ‘निष्पक्ष’ बने हुए हैं।

मोदी ने राहुल का नाम लेकर कहा, ‘दया मत दिखाओ, मेरे माता-पिता की जो भी खबर है, ले आओ’

अक्सर देखने को मिलता है कि कॉन्ग्रेस पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी कभी संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गले पड़ रहे होते हैं, तो कभी वो रैलियों में उनके नाम की माला जपते देखे जाते हैं। जबकि, इसके विपरीत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शायद ही कभी राहुल गाँधी का नाम अपनी जुबान से लेते हैं। एक ओर राहुल गाँधी की मीडिया वार्तालाप से लेकर जनसभाएँ भी जहाँ नरेंद्र मोदी के नाम से शुरू होती हैं, वहीं नरेंद्र मोदी नामदार को लेकर बेखबर ही नजर आते हैं।

हाल ही में राहुल गाँधी ने एक बेहद भावुक भाषण में अपना दुःख व्यक्त करते हुए कहा, “मैं मर जाऊँगा, लेकिन नरेन्द्र मोदी के माँ-बाप के बारे में कभी बात नहीं करूंगा।” हालाँकि, इस पर उन्हें जनता ने सोशल मीडिया जवाब देते हुए कहा था कि बोफोर्स घोटाले में नरेंद्र मोदी के माता-पिता नहीं, बल्कि राजीव गाँधी ही मुख्य आरोपित थे, तो ऐसे में वो नरेंद्र मोदी के माँ-बाप पर आखिर कौन-सी टिप्पणी करना चाहते हैं?

आज ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘न्यूज़ 24’ समाचार चैनल को इंटरव्यू देते हुए पहली कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का नाम लिया। पीएम मोदी ने कहा, “मैं राहुल गाँधी से आग्रह करता हूँ, अगर मेरे माता-पिता ने कुछ गलत किया हो तो आकर बताइये। मुझ पर दया करने की कोई ज़रूरत नहीं।” उन्होंने ने कहा, “मैं चुनाव आयोग से आग्रह करूँगा की राहुल जी को प्रेस कॉन्फ्रेंस करने दी जाए, जहाँ वो मेरे माता-पिता के बारे में जो भी बोलना चाहते हैं, वो आकर कहें।”

‘मुझ पर दया करने की कोई ज़रूरत नहीं है’

समाचार चैनल को इंटरव्यू देते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, “श्रीमान राहुल गाँधी जी, आप कॉन्ग्रेस पार्टी के अध्यक्ष हैं, आपको 4-5 पीढ़ी का सार्वजनिक राजनीतिक जीवन का अनुभव है। मैं आज सार्वजनिक रूप से आप से हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि मेरे माता-पिता ने कुछ गलत किया हो, व्यक्तिगत जीवन में गलत किया हो, सामाजिक जीवन में गलत किया हो, तो खुलकर बाहर आकर बताइये। मुझ पर दया करने की कोई ज़रूरत नहीं है। आपके माता-पिता पर न मुझे कुछ कहने का अधिकार है और न इस देश के नागरिक का अधिकार है। लेकिन इस देश के पूर्व प्रधानमंत्री के संबंध में, इस देश के राज परिवार के संबंध में, सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों को देश में चर्चा करने का हक है।”

इसके अलावा नरेंद्र मोदी ने कठोर शब्दों में कहा, “मैं नहीं चाहूँगा कि मेरे देश में मेरे माता-पिता ने कुछ गलत किया हो और माफ़ कर दे। दया जैसे शब्द बोलकर आप मेरे संस्कार और जमीर को चोट पहुँचा रहे हो। हाँ, उन्होंने मुझे जन्म दिया, ये अगर उन्होंने गलत किया तो आपको खुलकर कहने का अधिकार है।”

‘कॉन्ग्रेस के सामने बस नामदार को बचाने की समस्या है’

प्रधानमंत्री मोदी ने दावा किया कि बीजेपी यह चुनाव पिछले बार से बड़े बहुमत के साथ जीतेगी। इस इंटरव्यू में विपक्ष पर कड़ा हमला करते हुए पीएम मोदी ने कहा, “कॉन्ग्रेस के सामने यह समस्या है कि चुनाव की मार के बाद वो नामदार को कैसे बचाएँगे। मेरे दिमाग में चुनाव नतीजे के बाद देश को किस दिशा में ले जाना और कितनी तेजी से ले जाना है, बस यही चलता रहता है, इसके अतिरिक्त मैं कुछ नहीं सोचता।”