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आतिशी ने कहा गौतम ने मेरे नाम के ‘गंदे’ पर्चे बाँटे, गौतम ने भेजा मानहानि नोटिस

पूर्वी दिल्ली से आम आदमी पार्टी की प्रत्याशी आतिशी ने गुरुवार (मई 9, 2019) को भाजपा के उम्मीदवार गौतम गंभीर पर संगीन आरोप लगाए। आतिशी ने अपने खिलाफ ‘आपत्तिजनक और अपमानजनक’ टिप्पणियों वाला एक पर्चा पढ़ते हुए दावा किया कि गंभीर ने निर्वाचन क्षेत्र में ऐसे पर्चे बँटवाए हैं। इस पर गौतम ने आतिशी पर मानहानि का केस करने का फैसला किया।

गौतम गंभीर ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और प्रत्याशी आतिशी को मानहानि का नोटिस भिजवाया। गंभीर ने कहा कि वे बिना शर्त, माफ़ी माँगे और अपना झूठा बयान वापस लें, नहीं तो मानहानि का केस किया जाएगा।

इससे पूर्व गौतम गंभीर ने अपने ऊपर लगे कथित आरोपों पर ट्वीट करते हुए लिखा था, “मैं घोषणा करता हूँ कि केजरीवाल और आतिशी अगर साबित कर दें कि मैंने कुछ गलत किया है तो मैं अभी अपनी उम्मीदवारी वापस ले लूँगा, लेकिन वह अगर ऐसा न कर पाए तो क्या वे राजनीति छोड़ देंगे?”

अपने ऊपर लगे आरोपों पर गंभीर ने एक के बाद एक ट्वीट किए। गंभीर ने केजरीवाल पर ट्वीट करते हुए लिखा, “मैं किसी महिला की इज्जत उछालने के कृत्य से घृणा करता हूँ। अरविंद केजरीवाल, अपनी सहयोगी के साथ ऐसा काम आपने केवल चुनाव जीतने के लिए किया? श्रीमान मुख्यमंत्री आप गंदे हैं और आपके दिमाग को साफ करने के लिए आपकी झाड़ू की जरूरत पड़ेगी”

बता दें इन सब के बीच आप के बागी विधायक कपिल मिश्रा ने अपने ट्विटर पर एक स्क्रीनशॉट ट्वीट किया है। इसमें लोगों से उस पैम्पलेट को ट्वीट के जरिए शेयर करने को कहा जा रहा है, जिसमें आतिशी के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया है। इस स्क्रीनशॉट में एक ट्वीट करने पर 200 रुपए दिए जाने का भी दावा है। कपिल मिश्रा का कहना है कि इस सबूत को कोर्ट में ‘आप’ के ख़िलाफ़ इस्तेमाल किया जा सकता है।

शरद पवार का दावा, मैंने खुद देखा कि मेरी पार्टी को दिया वोट भाजपा में चला गया

राकांपा प्रमुख शरद पवार ने चुनावों में इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन के प्रयोग पर बृहस्पतिवार को चिंता जताते हुए दावा किया कि उन्होंने खुद एक प्रस्तुति के दौरान देखा था कि उनकी पार्टी के पक्ष में डाला गया वोट, भाजपा के पक्ष में चला गया। बहरहाल, पवार ने यह भी कहा कि वह इस बात का दावा नहीं कर रहे हैं कि सभी ईवीएम इसी प्रकार काम करती हैं।

पवार ने सतारा में संवाददाताओं से कहा, ‘‘मैं भी मशीन के बारे में चिंतित हूँ। हैदराबाद एवं गुजरात में कुछ लोगों ने एक ईवीएम मेरे सामने रखी और मुझसे एक बटन दबाने को कहा।’’

उन्होंने कहा, ‘‘मैंने घड़ी (राकांपा का चुनाव चिन्ह) पर बटन दबाया और वोट कमल (भाजपा का चुनाव चिन्ह) के पक्ष में गया। मैंने खुद ऐसा होते देखा है।’’ 

पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं अन्य विपक्षी दल ईवीएम के प्रयोग को लेकर चिंता जताते रहे हैं। उनका दावा है कि इस मशीन में गड़बड़ी की जा सकती है।

‘द हिन्दू’ की ‘फ्रंटलाइन’ और TV9 ने 20 लाख EVM गायब होने की फेक न्यूज़ लगाने की बात स्वीकारी

भारतीय चुनाव आयोग (EC) ने कुछ मीडिया हाउसेस द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के बारे में स्पष्टीकरण जारी किया है जिसमें आरोप लगाया गया था कि 20 लाख इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (EVM) ECI के कब्जे से गायब हो गए थे। शेफाली बी. शरण, ईसीआई की प्रवक्ता ने आयोग की ओर से फ्रंटलाइन पत्रिका और टीवी 9 भारतवर्ष चैनल के संपादकों को संबोधित करते हुए एक आधिकारिक बयान जारी किया, जिसमें उनके झूठे दावों का खंडन किया गया है।

वेंकटेश रामाकृष्णन द्वारा लिखित “मिसिंग ईवीएम” शीर्षक की स्टोरी ‘24 मई, 2019’ फ्रंटलाइन पत्रिका के प्रिंट संस्करण में प्रकाशित हुई थी। फ्रंटलाइन एक पाक्षिक अंग्रेजी भाषा की पत्रिका है जिसका प्रकाशन चेन्नई के द हिंदू ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन द्वारा किया जाता है। टीवी चैनल TV9 भारतवर्ष ने यही आरोप दोहराते हुए एक रिपोर्ट प्रसारित की थी।

रिपोर्ट में बंबई उच्च न्यायालय में एक आरटीआई-आधारित जनहित याचिका के स्रोतों का हवाला देते हुए अपने दावे को सही ठहराने की कोशिश की गई थी। इस रिपोर्ट के माध्यम से, लेखक ने बताया है कि 2019 के आम चुनावों में ईवीएम के प्रति अविश्वसनीयता थी। इसी संदेह के दायरे में ECI को भी बदनाम करने की कोशिश की गई थी।

फ्रंटलाइन मैगज़ीन को जारी नोटिस

यह ध्यान देने योग्य है कि इस रिपोर्ट में आरटीआई आवेदन के माध्यम से प्राप्त की गई कुछ सूचनाओं को चुनिंदा रूप से उद्धृत किया है, जो कई सार्वजनिक प्राधिकरणों और बॉम्बे उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका का हिस्सा है। पूरी रिपोर्ट में केवल आंशिक और एकतरफा जानकारी दी गई है, जो कि गलत तथ्यों पर आधारित है और आम जनता के मन में EVM एवं ECI के प्रति संदेह पैदा करने की कोशिश की गई है।

TV9 भारतवर्ष को जारी नोटिस

ईसीआई के बयान में EVM के रखरखाव से लेकर परिवहन तक के लिए कोई उचित प्रणाली और बुनियादी ढाँचे की अनुपस्थिति की रिपोर्ट में की गई अटकलों को खारिज कर दिया गया है, इन दावों को खारिज करते हुए, बयान में कहा गया है कि ईसीआई ईवीएम और वीवीपीएटी के सम्बन्ध में सख्त प्रोटोकॉल और अनुपालन प्रक्रियाओं का पालन करता है और कोई भी मशीन चुनाव आयोग की पूर्व अनुमति के बिना ईसीआई गोदाम से कहीं भी नहीं ले जाया जा सकता है।

बयान में इस तथ्य पर भी प्रकाश डाला गया कि राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) स्वतंत्र संवैधानिक निकाय हैं जो स्थानीय निकाय चुनाव कराते हैं और ईसीआई के अधिकार क्षेत्र में नहीं आते हैं। बयान में मतदाताओं के मन में संदेह पैदा करने के लिए ईवीएम के बारे कुछ मीडिया हाउसेस द्वारा झूठ फैलाने के लिए ऐसी फेक रिपोर्ट को दुर्भावनापूर्ण प्रयास बताया गया।

ईसीआई के प्रवक्ता ने बताया कि फ्रंटलाइन के संपादक ने स्वीकार किया है कि उनकी रिपोर्ट झूठी है और इस सम्बन्ध में एक अन्य रिपोर्ट प्रकाशित की जाएगी। वहीं दूसरी ओर, TV9 Bharatvarsh ने अपनी वेबसाइट और Youtube से अपनी रिपोर्ट हटा दी है।

यह पहली बार नहीं है जब हिंदू समूह के प्रकाशनों से जुड़ी पत्रिका झूठी और फर्जी खबर फैलाते हुए पकड़ी गई है। हमने पहले भी बताया था कि कस्तूरी एंड संस लिमिटेड के अध्यक्ष एन. राम और द हिंदू के प्रकाशक ने राफेल सौदे के बारे में भी झूठ बोला था।

हालाँकि, TV9 भारतवर्ष ने अपनी रिपोर्ट को डिलीट कर दिया है, लेकिन इस फर्जी रिपोर्ट को सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से अभी भी फैलाया जा रहा है। भले ही वे रिपोर्ट और वीडियो ईसीआई द्वारा झूठ करार दिए गए हों। मीडिया हाउसेस के अपनी फर्जी रिपोर्ट वापस लेने के बाद भी, वे सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर तेजी से वायरल होते हैं, और इस तरह से ऐसी फर्जी रिपोर्ट बनाने का उद्देश्य पूरा हो जाता है।

प्रिय मीडिया गिरोह, हर दलित जीतेन्द्र की मौत जातिवाद के कारण नहीं होती

हाल ही में उत्तराखंड से के एक जनजातीय क्षेत्र से आई एक खबर ने देशभर में दलित-सवर्ण के मुद्दे को नई चिंगारी देने का काम किया। यदि मीडिया में बैठे गिद्द-गिरोह के शब्दों में कहें तो इस घटना ने दलित-सवर्ण मुद्दे को एक दिशा देने का काम किया। इस सारे प्रकरण में सबसे हैरान करने वाली बात ये देखने को मिली, कि जो भी मीडिया गिरोह इस खबर को, जिस लिबास में बेचकर अपनी विकृत मानसिकता को बेच सकता था, उसने वही किया। जौनसार-जौनपुर क्षेत्र में ‘जौनपुर में एक दलित युवक की पिटाई’ के नाम से खबर पढ़ते ही मैं शंका से इस मामले को देखता रहा और हुआ भी यही। जिस प्रकार देशभर के तमाम प्रमुख मीडिया चैनल्स से लेकर, निष्पक्ष पत्रकारों और हिटलर के लिंग नापने वाले मीडिया गिरोह के पत्थरकारों ने बिना ‘दलित’ शब्द के नहीं पढ़ाया या सुनवाया, एक बार के लिए मैं भी इस प्रकरण को संदेह की दृष्टि से देखने को मजबूर हो गया।

मीडिया के गिद्ध-गिरोहों को ‘दलित’ की मृत्यु से फ़र्क़ पड़ता है?

निस्संदेह, टिहरी जिले के जौनपुर-जौनसार जैसे जनजातीय क्षेत्र में घटी यह घटना हैरान करने वाली है। हैरान इसलिए, क्योंकि मैं इसी जगह में पला-बढ़ा हूँ और इस समाज में किसी व्यक्ति की मृत्यु को ‘दलित की मृत्यु’ बताना सबसे ज्यादा चौंकाने वाली बात थी। हालाँकि, किसी व्यक्ति की मृत्यु को कोई भी तर्क सही साबित नहीं करता है। लेकिन, जब इस सम्पूर्ण प्रकरण को एक ‘दलित’ की मृत्यु में समेट दिया गया, तब यह जरूरी हो जाता है कि हम इस बात की समीक्षा करें।

यह समीक्षा खासकर मीडिया में हर वक़्त इस प्रकार की घटनाओं के इन्तजार में लार टपकाने वाले उस गिद्ध-गिरोह के कारण आवश्यक हो जाती है, जो दलित की मृत्यु में ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे विशेषणों के साथ अपनी पूर्वग्रही मानसिकता के कीर्तिमान स्थापित करने का प्रयास करता है। ब्राह्मण और हिन्दू जैसे शब्दों से भी घृणा करने वाले कुछ लोग जब कुछ विकृत मानसिकता के लोगों को अपना हथियार बनाकर, एक युवक की मृत्यु पर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे कैप्शन बेचते हैं, तो स्पष्ट हो जाता है कि वो पूरे देश भर में अपनी घृणित मानसिकता से निकलने वाले टार की मार्केटिंग में जुटे हुए हैं।

कुछ इसी प्रकार का उदाहरण मीडिया के इस समुदाय विशेष ने तब दिया था, जब पुलवामा आतंकी घटना के बाद JNU की  फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद के जरिए देहरादून में बैठे प्रेमनगर के जंगलों में छुपकर हर नशा करने वाले, जिहाद पढ़ने वाले, आतंकवादियों का समर्थन करने और दंगाई मानसिकता वाले कश्मीरी, कथित विद्यार्थियों के बारे में पेश किया था। यह गिरोह है, जो बस इस इन्तजार में रहता है कि आखिर कब मौका मिले और कब वो अपनी विषैली मानसिकता का बीजारोपण वहाँ पर कर सकें।

हिंसात्मक मानसिकता का शिकार सवर्ण और दलित कोई भी हो सकता है

यह भी जानना आवश्यक है कि इस घटना में जीतेन्द्र की जाति को दलित बताकर ‘देवभूमि में ऐसा चलता रहता है’ जैसे प्रसंग चलाने वाले वही लोग हैं, जो आज तक आतंकवाद का मजहब पता लगा पाने में नाकाम रहे हैं। यह सही भी है, यदि हर दूसरी आतंकवादी घटना का मजहब ढूँढा जाने लगे और घटना की संगीनता से ज्यादा हमारी चिंता का विषय धर्म-जाति और सम्प्रदाय ही बन जाए, तो ऐसे में श्री लंका में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के पीछे तो स्पष्ट रूप से मुस्लिम संगठन का हाथ है और न्यूजीलैंड में मस्जिद में मारे गए लोगों के पीछे एक क्रिश्चियन का हाथ है। लेकिन, हम सभी जानते हैं कि आतंकवाद का मजहब तलाशने से ज्यादा जरूरी उस मानसिकता द्वारा हुई हानि को कवर करना है। ठीक इसी प्रकार, यदि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता है, तो फिर एक शादी समारोह के दौरान हिंसात्मक मानसिकता से उपजे विवाद में किसी ‘दलित’ की मृत्यु कैसे हो जाती है?

अमेरिका में बैठकर जनजातीय समाज पर चिंतन से बेहतर अपनी पढ़ाई पर ध्यान देना है

शादी में जिस जीतेन्द्र के साथ मारपीट हुई, वह दलित था या नहीं से पहले उन लोगों पर विचार किया जाना चाहिए, जिन्होंने उन्माद में एक व्यक्ति को पीट दिया और उसने अवसाद में घर जाकर मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगल ली थीं, जिस कारण उसे अगली सुबह अस्पताल ले जाना पड़ा। लेकिन क्या गिद्ध मीडिया के अमेरिका के कनेक्टिकट के न्यू हेवन में बैठी, येल में पीएचडी कर रही सामाजिक विचारक को यह पता है कि जिस घटना को वो एक AC कमरे में बैठकर सिर्फ अपने संगठन की विचारधारा को  खुश करने के लिए ‘देवभूमि में दलित की मृत्यु’ मात्र में समेट रही हैं, उस समाज में तो दलित-सवर्ण-अगड़ा-पिछड़ा जैसे शब्द महत्वहीन हैं?

लेकिन यह आम चलन है कि अपना कोई विदेशी सम्बन्ध बताकर भारत जैसे देश में अपने पाठकों और सम्पादकों की बौद्धिक क्षमता को चकमा देते हुए आसानी से अपनी विश्वसनीयता साबित की जाए। फिर चाहे वह अमेरिका में बैठा EVM एक्सपर्ट सैयद शूजा हो, या फिर NDTV द्वारा जर्मनी से उठाकर लाए गए प्रॉपेगैंडा पत्रकार ध्रुव राठी हो।

जौनपुर-जौनसार में नहीं है जातिगत भेदभाव

जनजातीय इलाका होने के कारण, जौनपुर-जौनसार में जातिगत भेदभाव मामूली स्तर पे भी नहीं है। यदि सामान्य शब्दों में कहूँ तो लोग आपस में एकदूसरे को खुलकर औजी-ओड-भामण-खस कहकर बुलाते हैं। यदि किसी खेत में बैल चोरी करने घुस जाए तो पूरा गाँव एक स्वर में आवाज लगाकर बुलाता है कि फलां खेत में ‘ल्वार-ओड-भामण’ की गाय-बैल घुस गई है। यहाँ के लोग वर्षों अशिक्षित जरूर रहे, नेहरू से लेकर इंदिरा, राजीव गाँधी के ऐतिहासिक नेतृत्व के समय भी। लेकिन, यहाँ पर सभी सामाजिक समीकरणों और जिम्मेदारियों से बँधे हुए जाति व्यवस्था को निभाते आए हैं। और किसी का, कभी भी इस आधार पर दमन या शोषण नहीं किया गया। ब्राह्मण-राजपूत-दलित, सभी यहाँ पर ‘जिमदार’ यानी भूमि के स्वामी हैं। ‘डोम’ यदि गाँव के लोगों की कृषि और पशुधन को संभालता है, तो औजी के बिना कोई भी पारम्परिक अनुष्ठान और कार्यक्रम संभव ही नहीं है, बदले में सारे गाँव के लोग उसे हर माह अनाज से लेकर, कपड़े, जमीन और धन देते हैं।

बढ़ई का काम करने वाले ‘ओड’, मकान बनाने से लेकर मिस्त्री कामों में पीढ़ी दर पीढ़ी इस परम्परा को सिखाते आए हैं। यह भी बताना जरूरी है कि इस इलाके में घरों की नक्काशी और लकड़ी का काम बेहद उम्दा किस्म का है। लोहार से लेकर तमाम अन्य जातियाँ, अपनी अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए रहते हैं। यह तालमेल भी मैंने शायद ही कहीं देखा होगा कि जितनी जमीन एक दलित परिवार के पास है, लगभग उतनी ही ब्राह्मण और राजपूतों के पास भी हैं। आर्थिक असमानता इस इलाके में नगण्य है।

जनजातीय क्षेत्रों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि यहाँ पर बिना नारीवाद और प्रगतिशील होने का आडंबर किए ही, हर किसी को बराबर अधिकार और सम्मान प्राप्त हैं। यहाँ तक कि जौनपुर-जौनसार में पारिवारिक व्यवस्था मातृसत्तात्मक ही है। सभी जातियाँ एक ही गाँव में रहती हैं, सभी के मकान एक-दुसरे से चिपककर बसे हुए हैं। बिना किसी भेदभाव के लोग एक-दूसरे के साथ उठते-बैठते हैं। और शादी-विवाह और अन्य समारोह में भी सभी जातियाँ एक ही लंगर में खाना खाने बैठा करती हैं। ऐसे में इस बात की विश्वसनीयता स्वतः शून्य हो जाती है कि बसाण-गों में किसी युवक को उसकी जाति की वजह से मार दिया गया। लेकिन, आदत से मजबूर मीडिया गिरोहों के गिद्धप्रमुखों ने अपनी मक्कारी को खूब बेचा है। अब इनके निशाने पर उत्तराखंड भी है, तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं।

मिर्गी की दवाएँ एक साथ निगलने के कारण हुआ था जीतेन्द्र बेहोश

स्थानीय लोगों का कहना है कि जीतेन्द्र मिर्गी का मरीज था और लम्बे समय से दवाएँ ले रहा था। शादी के दौरान खाने के वक़्त हुई झड़प के बाद जीतेन्द्र ने अवसाद में घर जाकर सभी दवाएँ एकसाथ निगल ली जिस कारण सुबह उसे अस्पताल ले जाना पड़ा। हालाँकि,अभी पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट्स का आना बाकी है। सामाजिक समारोह में इस प्रकार की झड़प और हिंसा जौनपुर-जौनसार में आम बात है और यही वजह है कि समय-समय पर यहाँ पर 10-15 गाँव मिलकर शादी-विवाह में शराब और DJ को प्रतिबंधित करते आए हैं लेकिन ऐसे में किसी व्यक्ति की मृत्यु होना बेहद चौंकाने वाला प्रकरण है।

यह दुर्भाग्य है कि इस घटना में जिस जीतेन्द्र की मृत्यु हुई वह दलित था और मीडिया ने इसे ही मुद्दा बनाकर उत्तराखंड के सर पर जातिवाद जैसे शब्द स्थापित करने के हर सम्भव प्रयास कर रही है। यह मैं अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से कहना चाहूँगा की यह घटना हिंसात्मक है, सामजिक उन्माद का उदाहरण है लेकिन इसकी वजह यदि मीडिया आपको पीड़ित की जाति दलित होना बता रही है, तो आपको आज ही उनसे किनारा कर लेना चाहिए क्योंकि वो उस विष को बेच रहे हैं, जिसे शायद आप पढ़ना चाहते हैं।

निष्पक्ष मीडिया के पत्थरकारों से सावधान

इस समय के महान निष्पक्ष पत्रकार रविश कुमार पांडेय जी अपने हालिया प्राइम टाइम के प्रेम्बल में कलेजे पर चोट खाए आशिक़ की भाँति उत्तराखंड में हुई जातिगत हत्या पर बोले। लेकिन, ध्यान देने वाली बात ये है कि रवीश बाबू बनारस में चुनाव कवर करने गए थे। प्राथमिकताओं का अंदाजा और विमर्श का केंद्र इसी एक हरकत से समझा जा सकता है कि किस तरह ‘डर का माहौल’ का राग अलाप उत्तराखंड में बची खुची, रही सही शांति के भी भंग करने का प्रोपगंडा चलाया जा रहा है। अपवादों को छोड़ दें, तो यह वही उत्तराखंड है, जो लोकपाल को सबसे पहले लागू करता है, कन्या धन योजना और ऐसे ही न जाने कितनी चीजों को सबसे आगे रखता है। इसी उत्तराखंड से सबसे ज्यादा प्रतिभाएँ संगीत और कला से लेकर तमाम अन्य क्षेत्रों में खूब नाम कमा रही हैं और यह बताना भी जरूरी हो जाता है कि उनमें से अधिकांश दलित ही हैं।

ये उसी देवभूमि की बात है, जिसमें धर्म-सम्प्रदाय, जाति आज भी चुनाव का मुद्दा नहीं हैं। यदि समकालीन परिदृश्य में ही बात करें तो वो सभी मुद्दे, जिन पर अन्य राज्यों में राजनीतिक दल हमेशा से ही हार-जीत के समीकरण का जायजा करती है, इस उत्तराखंड राज्य से नदारद मिलती है।

सवर्ण, अगड़ा, पिछड़ा या फिर दलितों के विषय पर ही आ जाएँ,  तो उत्तराखंड के हर पारम्परिक अनुष्ठान, छोटे-बड़े कार्यों, जागर (जगार) में भी ऐसा व्यक्ति जो कागजों और गिद्ध मीडिया  की नजर में ‘दलित’ है, उसके बिना कोई मंगलकार्य पूरा नहीं होता है। मात्र रस्मी तौर पर ही नहीं, अपितु पूर्ण भागीदारी के साथ उसका होना अनिवार्य होता है।

शादी समारोह के दौरान घटित हुई इस घटना में धूर्तता के साथ ‘देवभूमि’ शब्द जोड़ने वाले दी लल्लनटॉप जैसे निकृष्ट मीडिया गिरोहों को लार टपकाने से पहले यह बात मालूम होनी चाहिए कि भले ही वो सम-विषम नारी किस्म के पत्थरकारों से जितना भी उन्माद मचवाने की कोशिश कर लें, लेकिन इस राज्य की संरचना को वो और उनके सहयोगी पत्थरकार कोई हानि नहीं पहुँचा सकते हैं।

लार टपकाती मीडिया के ‘पत्थरकारों’ के उदाहरण इन तस्वीर में आप देख सकते हैं


राजीव ने ‘शाही छुट्टियों’ के लिए तो नेहरू ने लेडी माउंटबेटन के ‘सम्मान’ में किया था नेवी वॉरशिप का निजी उपयोग

प्रधानमंत्री मोदी के कल एक खुलासे ने चुनावी माहौल में तब हलचल मचा दी जब उन्होंने उल्लेख किया कि कैसे राजीव गाँधी ने अपने निजी उपयोग के लिए भारतीय नौसेना के युद्धपोत आईएनएस विराट का इस्तेमाल किया। युद्धपोत का उपयोग गाँधी परिवार को 10 दिनों की लंबी छुट्टी के लिए लक्षदीप द्वीप समूह के एक छोटे से निर्जन द्वीप पर एक निजी टैक्सी की तरह ले जाने के लिए किया गया था।

पीएम ने 1987 में गाँधी परिवार की छुट्टी का जिक्र किया। मेहमानों की सूची में राजीव गाँधी के साथ, सोनिया गाँधी, राहुल गाँधी, प्रियंका और उनके चार दोस्त, सोनिया गाँधी की माँ, उनके भाई और एक मामा शामिल थे। साथ ही तब के सांसद अमिताभ बच्चन, उनकी पत्नी जया बच्चन और उनके बच्चे, अमिताभ के भाई अजिताभ की बेटी और पूर्व मंत्री अरुण सिंह के भाई बिजेंद्र सिंह की पत्नी और बेटी भी मौजूद थे। छुट्टी का स्थान बंगारम था, जो लक्षद्वीप द्वीपसमूह में एक छोटा निर्जन द्वीप है। उस समय भारतीय नौसेना के एकमात्र वाहक आईएनएस विराट का इस्तेमाल गाँधी परिवार और उनके साथियों के परिवहन के लिए किया गया था, जो इस छुट्टी के लिए 10 दिनों के लिए अरब सागर में चले गए थे। बता दें कि एक विमान वाहक युद्धपोत अकेले समुद्र में नहीं चलता है, यह हमेशा कई युद्धपोतों से घिरा रहता है। यहाँ तक ​​कि एक पनडुब्बी भी यात्रा के दौरान मौजूद थी। इसका मतलब इस शाही छुट्टी का खर्च बहुत तगड़ा था।

जैसा कि द्वीप निर्जन था, मेहमानों के लिए आवश्यक सभी चीजों को अन्य स्थानों से ले जाने की भी आवश्यकता थी। लक्षद्वीप प्रशासन ने 10-दिवसीय अवकाश के लिए सभी शाही इंतज़ाम किए, और इस उद्देश्य के लिए लक्षद्वीप प्रशासन के हेलीकॉप्टर को सेवा में लगाया गया।

नई पीढ़ी के लिए यह खुलासा ही अपने आप में आश्चर्यजनक है। लेकिन आपको जानकर और हैरानी होगी कि अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए नौसेना की संपत्ति का उपयोग करने की परंपरा राजीव गाँधी द्वारा शुरू नहीं की गई थी। कायदे से जवाहरलाल नेहरू ने इस चलन की शुरुआत की थी। राजीव ने तो इस ‘पुश्तैनी’ परंपरा को बस आगे बढ़ाया था।

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने सबसे पहले ऐसी शाही परंपरा की शुरुआत करते हुए INS देल्ही (INS Delhi) का इस्तेमाल अपने परिवार के साथ छुट्टियाँ मनाने के लिए किया था। उसकी अब जो तस्वीरें सामने आई हैं, उनसे भी यह बात साफ पता चलती है कि नेहरू ने उस आईएनएस देल्ही का इस्तेमाल किया था, जो 1933 में नौसेना के लिए बनाया गया एक हल्का क्रूजर था। इसे ब्रिटिश राज में एचएमएस अकिलिस के नाम से जाना जाता था। 1950 में अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने के लिए इसी वॉरशिप का इस्तेमाल नेहरू ने किया था।

इन फोटोज में नेहरू के साथ इंदिरा गाँधी और उनके बच्चों संजय गाँधी और राजीव गाँधी की मौजूदगी को देखा जा सकता है।

1950 में ही भारतीय नौसेना की संपत्ति का दुरुपयोग करने की परंपरा जवाहरलाल नेहरू के साथ शुरू हुई थी। यह एक ऐसी घटना है, जिस पर शायद ही कभी बात की गई हो, जो यह बताने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह नेहरू के पूरे परिवार ने अपने व्यक्तिगत उपयोग के लिए भारतीय संपत्ति के निजी इस्तेमाल की अनोखी परंपरा की शुरुआत की थी।

जवाहरलाल नेहरू और एडविना माउंटबेटन के बीच का संबंध कोई रहस्य नहीं है। एक लेख में माउंटबेटन को “आदमखोर” तक कहा गया था। यहाँ “आदमखोर” से संबंध उनके पर-पुरुष प्रेम से था। डेली मेल ने अपने इस आर्टिकल में बताया है कि कैसे माउंटबेटन को नेहरू से प्यार हो गया था और कैसे उनके बच्चों के प्रति वो समय-समय पर प्रेम प्रदर्शित करते रहते थे।

माँ एडविना को लेकर उनकी बेटी पामेला ने कहा, “वह पंडितजी (नेहरू) में साहचर्य और समझ को देखती है, जिसके लिए वह तरसती थी। दोनों ने एक-दूसरे के अकेलेपन को दूर करने में मदद की।”

एडविना की इच्छा समुद्र में दफन होने की थी और जब 1960 में उनकी मृत्यु हुई, तो उनके शव को पोर्ट्समाउथ लाया गया। प्रिंस फिलिप की माँ, ग्रीस की राजकुमारी एंड्रयू सहित परिवार के लोगों के साथ ताबूत को एचएमएस “वेकफुल” पर सवार किया गया था। कैंटरबरी के आर्कबिशप, लॉर्ड माउंटबेटन और उनकी दो बेटियाँ भी राजकुमार प्रिंस फिलिप के साथ थीं। पोर्ट्समाउथ से 12 मील की दूरी पर, ‘वेकफुल के’ इंजनों को रोक दिया गया था, और अंतिम शब्द बोले गए। फिर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

जब 59 वर्ष की आयु में एडविना की मृत्यु 1960 में हुई तो सरकारी खर्चे पर लेडी माउंटबेटन को ऐसी श्रद्धांजलि देने की व्यवस्था की गई थी। उनकी इच्छा के अनुसार लॉर्ड माउंटबेटन द्वारा उन्हें समुद्र में दफन किया गया। ऐसे में नेहरू भी पीछे नहीं रहे। नेहरू ने भारतीय नौसेना के फ्रिगेट आईएनएस त्रिशूल को एस्कॉर्ट के रूप में और साथ ही उनकी याद में पुष्पांजलि देने के लिए भेजा।

लेडी माउंटबेटन की बेटी लेडी पामेला हिक्स का कहना है, “1960 में उनकी मृत्यु पर, एडविना को उनकी इच्छा के अनुसार समुद्र में दफनाया गया था। जब उनका शोक संतप्त परिवार घटनास्थल पर माल्यार्पण के बाद हट गया, तो भारतीय फ्रिगेट आईएनएस त्रिशूल उस जगह पर आया और पंडितजी के निर्देशों के अनुसार मैरीगोल्ड के फूलों से उस पूरे एरिया को आच्छादित कर दिया गया था।”

दिलचस्प बात यह है कि पीएम मोदी द्वारा राजीव गाँधी का उल्लेख किए जाने के बाद भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने भी ऐसी ही एक कहानी के बारे में ट्वीट किया।

स्वामी ने कहा कि उनके ससुर, जेडी कपाड़िया 1950 के दशक में रक्षा सचिव थे। उन्होंने नेहरू के ‘यूरोपीय महिला मित्र’ को एयरफोर्स के विमान का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। स्वामी ने कहा कि इस घटना के बाद उनके ससुर का तबादला कर दिया गया था और अगले रक्षा सचिव ने ऐसा करने की अनुमति दे दी थी।

नेहरू-गाँधी परिवार ने लंबे समय से भारत और उसकी संपत्ति को अपनी निजी संपत्ति माना है। चाहे राजीव गाँधी छुट्टी के लिए नौसेना के जहाज का उपयोग कर रहे हों, या जवाहरलाल नेहरू ऐसा ही कर रहे हों, या फिर उन्होंने एडविना की मृत्यु के बाद समुद्र में मेरीगोल्ड बिखेरने के लिए नौसेना के जहाज का उपयोग किया हो। सरकारी और देश की संपत्ति को अपनी बपौती समझ कर इस्तेमाल करने का इस परिवार का इतिहास बहुत पुराना है। और भी सच्चाइयाँ हैं जो इतिहास के आगोश में हैं। जब भी उन्हें कुरेदा जाएगा, गाँधी परिवार के ‘कुकर्मों’ का अंगार फूट पड़ेगा।

प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने दिए थे सिखों की हत्या के आदेश: सीनियर एडवोकेट फूलका

दिल्ली उच्च न्यायालय में सीनियर एडवोकेट हरविंदर सिंह फूलका ने दिवंगत प्रधानमंत्री राजीव गाँधी पर संगीन आरोप लगाए हैं। फूलका ने कहा कि 1984 दंगों के समय सिखों की हत्या करने के लिए आदेश सीधा प्रधानमंत्री कार्यालय से आते थे।

फूलका ने अपनी बात को विस्तार देते हुए कहा कि शांति भूषण (जो मोरारजी देसाई के समय मंत्री थे) ने नानावटी आयोग के सामने बयान दिया था कि उन्होंने 1 नवंबर 1984 को तत्कालीन गृह मंत्री नरसिम्हा राव से सेना बुलाने का आग्रह किया था जो राव ने स्वीकार कर लिया था।

फूलका ने ANI को बताया कि इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि सिखों को मारने के आदेश सीधा राजीव गाँधी के कार्यालय से आते थे और जानबूझकर दंगों को रुकवाने के लिए सेना नहीं बुलाई गई थी। फूलका के अनुसार उन्होंने दंगों की जाँच कर रहे नानावटी आयोग और मिश्रा आयोग के सामने भी यह बात कही थी।

नरसिम्हा राव ने शांति भूषण के आग्रह पर RAX फोन द्वारा किसी मंत्री से बात की थी लेकिन उधर से दंगों को रोकने के लिए सेना की तैनाती के संबंध में कोई उत्तर नहीं मिला जिसके बाद राव चुप हो गए थे तब शांति भूषण वहाँ से चले गए थे।

उस समय चरण सिंह, देवी लाल, शरद यादव, और रामविलास पासवान ने भी सिखों के कत्लेआम को रोकने के लिए सेना बुलाने का आग्रह राष्ट्रपति से किया था। लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने सेना नहीं बुलाई और दंगे होने दिए। सेना की एक टुकड़ी सफदरजंग पहुँच चुकी थी और सैनिकों ने दंगे रोकने की कोशिश की थी लेकिन तभी एक सैन्य अधिकारी ने उनसे कहा कि हमें दंगे रोकने के आदेश नहीं मिले हैं, और फिर सेना की टुकड़ी वापस कैंटोनमेंट चली गई।

फूलका के अनुसार ये सभी बातें दंगों की जाँच कर रहे आयोग के सामने दर्ज की गई थीं। फूलका ने कहा कि 1 नवंबर 1984 को सिखों का नरसंहार हो रहा था और 5000 सैनिक दिल्ली में मौजूद थे लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने उन्हें दंगे रोकने के आदेश नहीं दिए जिसके कारण 2000 सिखों की जान गई।

फूलका ने कहा कि कमलनाथ रकाबगंज गुरुद्वारा गए थे। गुरुद्वारा जल रहा था और गुरुद्वारे में दो सिखों को ज़िंदा जला दिया गया था। यह पुलिस रिपोर्ट में दर्ज है कि कमलनाथ गुरुद्वारा गए थे और उन्हें प्रधानमंत्री ने भेजा था। फूलका के अनुसार कॉन्ग्रेस पार्टी के लोगों ने सत्ता का लाभ उठाते हुए सभी सबूत मिटा दिए लेकिन अभी भी बहुत से साक्ष्य ऐसे हैं जो 1984 के सिख नरसंहार में राजीव गाँधी की प्रत्यक्ष संलिप्तता को सिद्ध करते हैं।   

सिद्धू की रैली में गूँजा ‘मोदी-मोदी’ का स्वर, महिला ने फेंकी चप्पल

लोकसभा चुनाव 2019 की सरगर्मी लगभग हर दिशा में देखने को मिल रही है। कहीं जुमलेबाजी का दौर है तो कहीं व्यक्तिगत हमले थमने का नाम नहीं ले रहे। अभी हाल ही में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को थप्पड़ मारने की ख़बर सामने आई थी, इसी बीच कॉन्ग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू पर एक महिला द्वारा अपनी चप्पल (स्लीपर) फेंकने की ख़बर का ख़ुलासा हुआ है।

दरअसल, रोहतक में एक रैली को संबोधित करते हुए, एक महिला ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बोलने पर पंजाब के मंत्री पर अपनी चप्पल फेंकी। हालाँकि, उस महिला का निशाना चूक गया और मौक़े पर मौजूद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया। महिला ने पुलिस को बताया कि उसने चप्पल इसलिए फेंकी थी क्योंकि वो पीएम मोदी के ख़िलाफ़ बात कर रहे थे।

हालाँकि, इस घटना को दिखाने वाला कोई वीडियो तो सामने नहीं आया है, लेकिन एक छोटा वीडियो सामने आया है जिसमें हिरासत में ली गई महिला पुलिस कर्मियों से बात कर रही है, जिसमें सुना जा सकता कि उसने अपनी चप्पल इसलिए फेंकी थी क्योंकि सिद्धू, नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ बात कर रहे थे।

चप्पल फेंकने वाली महिला एकमात्र ऐसी नहीं थी जो सिद्धू की रैली के विरोध में थी, बल्कि वहाँ मौजूद कई लोग मोदी-मोदी के नारे भी लगा रहे थे।

₹33 का रिफंड, 2 साल की लंबी कानूनी लड़ाई: IRCTC ने आखिरकार मानी हार, लौटाए पैसे

भारतीय रेलवे के नियमानुसार जब हम अपनी बुक हुई टिकट को कैंसिल कराते हैं तो हमें रिफंड मिलता है। इस रिफंड में रेलवे हमसे टिकट कैंसिल करने का चार्ज काट लेता है और बाकी पैसे हमें लौटा दिए जाते हैं। लेकिन, दो साल पहले कोटा के सुजीत स्वामी नामक इंजीनियर के साथ ऐसा नहीं हुआ। इसके कारण सुजीत को अपने रुपयों के लिए दो साल की लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।

दरअसल, सुजीत ने साल 2017 में कोटा से दिल्ली जाने के लिए 765 रुपए की टिकट बुक कराई थी लेकिन किसी कारणवश उन्हें अपनी टिकट कैंसिल करनी पड़ी। कैंसिलेशन चार्ज कटने के बाद उन्हें 700 रुपए मिलने चाहिए थे, लेकिन उन्हें सिर्फ़ 665 रुपए वापस रिफंड किए गए। 35 रुपए को सर्विस टैक्स बताकर काटा गया।

सुजीत ने अपना पैसा वापस लेने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपनी शिकायत को लोक अदालत में दर्ज कराया लेकिन लोकअदालत ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर मामले को ख़ारिज कर दिया।

सुजीत ने अपने हक के लिए RTI के जरिए जानकारी हासिल करने की ठानी। इसके लिए उन्हें दिसंबर 2018 से अप्रैल 2019 तक में कई बार एक विभाग से दूसरे विभाग के चक्कर भी लगाने पड़े। आखिरकार लंबी लड़ाई के बाद बैंक ने 4 मई को उनके बैंक अकॉउंट में 33 रुपए भेजे। मीडिया खबरों के मुताबिक सुजीत कहते हैं कि इस लंबी लड़ाई के कारण उन्हें काफ़ी परेशानी झेलनी पड़ी, और आईआरसीटीसी ने उन्हें क्षतिपूर्ति देने की बजाए 2 रुपए रिफंड में से काट लिए।

दिव्यांग महिला को पति ने WhatsApp से दिया तलाक़, ₹10 लाख के लिए घर से निकाला

महाराष्ट्र के ठाणे में एक शारीरिक रूप से विकलांग महिला को उसके पति द्वारा Whatsapp के माध्यम से तीन तलाक़ देने का मामला सामने आया है। आरोपित ने Whatsapp के माध्यम से तीन बार तलाक़ लिख कर भेजा और रिश्ता ख़त्म करने की बात कही। इसके बाद पीड़िता ने कई बार फोन कॉल किया लेकिन उसने उठाने से इनकार कर दिया। पति द्वारा इस तरह की हरकत किए जाने से दुःखी पीड़िता ने भोईवाड़ा पुलिस स्टेशन में शिकायत की है। भोईवाड़ा थाने के वरिष्ठ निरीक्षक कल्याण कार्पे ने बताया कि उन्हें पीड़ित दिव्यांग महिला की ओर से सोमवार को शिकायत मिली है। पुलिस ने बताया कि वो लोग इस पर क़ानूनी सलाह ले रहे हैं।

शारीरिक रूप से विकलांग 23 वर्षीय महिला के अनुसार, उसका निकाह 18 मई 2014 को हुआ था। उसने अपने सास-ससुर पर भी प्रताड़ित करने का आरोप लगाया। उसके ससुराल पक्ष के लोग उससे 10 लाख रुपए की माँग कर रहे थे। जब वो रुपए देने में असमर्थ साबित हुई तो उसके पति ने उसे घर से निकाल बाहर कर दिया। पुलिस अधिकारी कार्पे ने कहा, “फिलहाल भिवंडी में अपने माता-पिता के साथ रह रही महिला ने आरोप लगाया कि हाल ही में उसके पति ने Whatsapp पर ‘तीन तलाक़’ का संदेश भेजा।” पीड़िता ने महिला संस्थानों से मिल कर भी अपनी बात रखी है।

पीड़िता ने गुहार लगाई है कि उसे तलाक़ नहीं चाहिए और वो अपने पति के साथ रहना चाहती है। अभी तक आधिकारिक रूप से पुलिस ने कोई मामला दर्ज नहीं किया है। इस सम्बन्ध में क़ानूनी सलाह लेने की प्रक्रिया पर कार्य किया जा रहा है। बता दें कि अगस्त 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने महिला विरोधी तीन तलाक़ प्रक्रिया को ख़त्म कर दिया था और सरकार ने भी तीन तलाक़ पर संसद में बिल पेश किया था। अभी हाल ही में एक मुस्लिम महिला की पति ने पड़ोसी के साथ मिल कर सिर्फ़ इसीलिए पिटाई की क्योंकि उसने मोदी से प्रभावित होकर भाजपा को वोट दे दिया था।

रविवार (मई 5, 2019) को उत्तर प्रदेश के भदोही में एक जनसभा को सम्बोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर की मुस्लिम महिलाओं को सन्देश देते हुए कहा था, “मुस्लिम बहनों से एक बात कहना चाहता हूँ। आज कई मुस्लिम देशों में तीन तलाक़ की परंपरा नहीं है। हम भी भारत की मुस्लिम बहनों को वही अधिकार देना चाहते हैं। हम किसी की धार्मिक भावनाओं का अनादर नहीं करते हैं। महिलाओं को समान अधिकार मिले, इसके लिए हम लगातार काम कर रहे हैं।

स्वरा भास्कर के बाद अरविन्द केजरीवाल के जुमलों की याद दिला रहे हैं The Placard Guy

प्लाकार्ड्स की मदद से सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों पर अपनी राय रखने वाले The Placard Guy नाम से मशहूर मधुर सिंह एक बार फिर सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गए हैं, लेकिन इस बार उनका मुद्दा स्वरा भास्कर की ऊँगली नहीं, बल्कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल हैं।

हाल ही में मतदाताओं से अपनी ऊँगली का इस्तेमाल स्वरा भास्कर की तरह नहीं, बल्कि समझदारी से मतदान के लिए करने की अपील करने वाले ‘प्लाकार्ड गाय’ ने नई पहल शुरू की है। इस बार तख्तियों की मदद से मधुर सिंह, दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल द्वारा उनके राज्य दिल्ली में ही फैलाए गए उनके ‘रायतों’ और धरनों के बीच भुला दिए गए वायदों की याद दिला रहे हैं।

इन प्लाकार्ड्स में अरविन्द केजरीवाल के पर्यावरण के लिए उठाए गए Odd-Even फॉर्मूला से लेकर दिल्ली को सिंगापुर बना देने के उनके वादों को याद दिला कर मतदाताओं से समझदारी से मतदान करने की अपील कर रहे हैं।

अर्बन नक्सल हैं AAP प्रत्याशी
केजरीवाल के नेतृत्व में दिल्ली बन गई कचरे के ढेर की ‘सिंगापुर’
ऑड-इवन फॉर्मूला कहाँ गया?
दिल्ली के मतदाताओं की ‘फर्जी गर्लफ्रेंड’
दिल्ली है पूरे भारत की राजधानी
मोहल्ला क्लिनिक में स्वास्थ्य लाभ लेते हुए गाय -बछड़े
‘गन्दी बात’

@ThePlacardGuy ने दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के उन सभी जुमलों की सच्चाई दिखाने का प्रयास किया है, जिनके दम पर वो पहले भी मतदाताओं की आँखों में धुल झोंककर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने और अब दिल्ली की 7 की 7 लोकसभा सीट जीतने का सपना देख रहे हैं। इन तस्वीरों में अरविन्द केजरीवाल के अनुसार मोहल्ला क्लिनिक में मिलने वाली ‘विश्वस्तरीय स्वास्थ्य सुविधाओं’ में कचरा खा रही गाय भी देखी जा सकती है।

DU में दाखिले की प्रक्रिया को अति विचित्र बताने वाले अरविन्द केजरीवाल ने राजनीतिक लाभ के लिए अन्य राज्यों से आकर दिल्ली के विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों के खिलाफ बयान दिया था। इसके साथ ही दिल्ली को लंदन बना देने वाले अरविन्द केजरीवाल की दिल्ली हर जगह कूड़े और कचरे के ढेर से भरी पड़ी है। आम आदमी पार्टी प्रमुख के हर गली-मोहल्ले को CCTV से पाट देने जैसे वादे मात्र जुमले साबित हुए हैं। इन्हीं में से एक तख्ती में प्लाकार्ड गाय बता रहे हैं कि AAP नेता मार्लेना आतिशी अर्बन नक्सल हैं और उनके पैरेंट्स ने आतंकवादी अफजल गुरु की रिहाई के लिए दया याचना भी दायर की थी।

इन सबके बीच एक तख्ती में अरविन्द केजरीवाल द्वारा दिल्ली के मतदाताओं को फर्जी कॉल कर के AAP को वोट डालने की कोशिशों पर कटाक्ष करते हुए लिखा है, “इतनी बार गर्लफ्रेंड भी मुझे कॉल नहीं करती है, जितनी बार अरविन्द केजरीवाल फर्जी खबर देने के लिए करते हैं।”

एक आखिरी तख्ती में The Placard Guy ने कॉन्ग्रेस के लिए कुछ ‘गन्दी बात’ लिखी है। हालाँकि, जो लिखा है वह अस्पष्ट है, लेकिन विरोध करने के लिए इस प्रकार की भाषा का प्रयोग करना शोभा नहीं देता है।