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विपक्ष और मीडिया का अंतिम तीर, जो कैक्टस बन कर उन्हीं को चुभने वाला है (भाग 1)

आवारगी में हद से गुज़र जाना चाहिए,
लेकिन कभी-कभार तो घर जाना चाहिए

देश में दस लाख पोलिंग बूथ थे, लाखों EVM का इस्तेमाल हुआ, लगभग 60 करोड़ लोगों ने मतदान किया, हजारों सुरक्षा बलों और चुनाव कर्मचारियों ने इसे संपन्न कराया। पूरे चुनाव तक माहौल यही रहा कि राज्यवार गठबंधन काम कर जाएँगे, कॉन्ग्रेस ने तीन राज्य जीते तो क्या पता लोकसभा में भी चकित कर दे, क्या पता लोग राफेल और ‘चौकीदार चोर है’ को सच मान लें…

एक ओर ये चलता रहा और दूसरी ओर एग्जिट पोल्स ने कुछ और ही मामला बना दिया। मूर्ख-से-मूर्ख व्यक्ति भी उमर अब्दुल्ला की सलाह मान कर ये मन बना लेगा कि दस में से नौ संस्था भाजपा को बहुमत दे रही है तो, कुछ तो कारण रहा होगा। लेकिन कुछ लोगों ने एक अंतिम जोर लगाना बेहतर समझा है। वो लोग कौन हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है, उनका लक्ष्य क्या है, ये हम और आप जानते हैं। फिर भी इस पर विस्तार से चर्चा बहुत आवश्यक है क्योंकि यही तय करेगा कि भारत का भविष्य क्या है।

विपक्ष का ‘बुलशिट’ वाला मिसाइल, जो इन्हीं की तरफ पलट गया है

विपक्ष की पूरा जोर इस बात पर रहा कि किसी भी तरह सत्ता उनमें से किसी भी के हाथ एक बार लग जाए, ताकि जो बड़े बदलाव इस देश में हो रहे हैं, जिससे इन पार्टियों को सीधे तौर पर नुकसान हुआ है, उन फ़ैसलों को पलट दिया जाए। जो केस चल रहे हैं, उन्हें रोक दिया जाए। जो फ़ंडिंग क़ानून की मदद से रोकी गई है, उसमें ढील दी जाए। पैसा इनका सूख चुका है, और जो कैश रिज़र्व था वो नोटबंदी में बेकार हो गया। अगर बेकार नहीं भी हुआ, तो उन्हें इसका हिसाब इनकम टैक्स वालों को देना ही होगा।

विपक्ष ने मुद्दे नहीं उठाए। विपक्ष ने सनसनी बनाने पर ज़्यादा ध्यान दिया। विपक्ष को समर्थन देने वाली मीडिया में भी वही सारी बातें होती रहीं जिनका आम जनता से कम, और विपक्ष की इमेज को बेहतर करने से ज्यादा वास्ता था। जस्टिस लोया की मौत को मुद्दा बनाया गया, गलत वित्तीय ज्ञान परोस कर अमित शाह के बेटे की कम्पनी को मुद्दा बनाया गया, अजित डोभाल के बेटों पर माहौल बनाने की कोशिशें हुई, नोटबंदी पर लाशें पैदा की गईं, जीएसटी पर उन व्यापारियों के नुकसान की बात हुई जो कहीं थे ही नहीं! कई ऐसी बातें कही गईं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने कई बार नकार दिया गया।

डर और साम्प्रदायिकता का ज़हर विपक्ष ने फैलाया

अगर आप गौर से देखें तो साम्प्रदायिकता और समुदाय विशेष को डराने के नाम पर जो ज़हर विपक्ष और इनके समर्थन वाले मीडिया ने फैलाया है, वो सिर्फ ‘फ़ियर मॉन्गरिंग’ ही है। इस मामले में वामपंथी और छद्म-लिबरल गिरोह, पाक अकुपाइड पत्रकार और पत्रकारिता का समुदाय विशेष जिस तरह से नमक-पानी और सत्तू लेकर अपनी घृणा को तर्क और तथ्य बना कर बेचा है, वो गहन शोध का विषय है।

आप गौर से कुछ तथ्यों को देखिए। आप इस बात पर सवाल कीजिए कि आखिर जिस साम्प्रदायिकता की बात इन मीडियावालों ने खूब बेची है, वो आखिर है क्या? उसका आधार क्या है? क्या भाजपा से ताल्लुक़ रखना, मोदी के समर्थन में खड़े होना, भगवा कपड़े पहनना, तिलक लगाना ही साम्प्रदायिकता है? दंगे इस देश में सबसे ज़्यादा किन पार्टियों ने कराए? एक पैटर्न है दंगों का इस देश में। एक सपोर्ट सिस्टम है कान्ग्रेस और उनकी समर्थित पार्टियों का यहाँ पर।

अगर दंगे नहीं होंगे तो फिर ये तथाकथित सेकुलर पार्टियाँ वोट कैसे माँगेंगी? समुदाय विशेष को सिर्फ यह कहते रहना कि हिन्दू तुम्हें मार देगा, काम नहीं करता। इसलिए, मस्जिदों के बाहर सूअर और मंदिरों के बाहर गाय का सर फेंक कर दंगे कराना जरूरी हो जाता है कि अल्पसंख्यक इस नैरेटिव को सच मान ले। आप यह बात जान लीजिए कि दंगे स्वयं नहीं होते। दंगों के लिए पूरी व्यवस्था होती है। इस देश के सारे बड़े दंगे, कॉन्ग्रेस के केन्द्र या राज्य में रहते हुए ही हुए हैं। गोधरा में भी कारसेवकों को जलाया नहीं जाता, तो वो दंगा नहीं होता। कुछ दंगे एक पार्टी पर दाग लगाने के लिए किए गए।

अगर ऐसा नहीं है तो आप मुझे यह बताइए कि पिछले पंद्रह सालों में आपने किस दंगे की चर्चा सबसे ज्यादा सुनी? आप याद कीजिए कि गोधरा को दंगों का पर्याय कैसे बना दिया गया। आप यह याद कीजिए कि कैसे राजीव गाँधी जैसा दंगाई व्यक्ति इस देश की मीडिया का लाड़ला हो जाता है, और उसे डैशिंग और हैंडसम कह कर, उसके पापों को क्यूटनेस से धोने की बात की जाती है।

साम्प्रदायिकता और भाजपा दो अलग ध्रुव हैं। भाजपा कभी भी साम्प्रदायिक रही ही नहीं। अगर भाजपा साम्प्रदायिक है, तो फिर भारत की बाकी हर पार्टी उससे ज्यादा कट्टरपंथी रही है। हिन्दुओं को हितों की बात करना साम्प्रदायिकता नहीं है। पेपरों में भाजपा और भगवा को कम्यूनल होने का पर्याय बना देने से वो ऐसे नहीं हो जाते। क्या आपने इनसे आँकड़े माँगे कि बताओ और तुलनात्मक अध्ययन करो कि भाजपा ही साम्प्रदायिक क्यों है तुम्हारे लिए, और बाकी की पार्टियाँ कैसे साफ हो जाती हैं?

आशा की राजनीति

इस देश में आशाओं को भुनाने के लिए नायाब तरीके ढूँढ़े गए। इंदिरा ने गरीब को गरीब ही रहने दिया, ताकि ‘गरीबी हटाओ’ का नारा चिरकाल तक ‘न्याय’ के नाम से उनके पोते तक भुनाते रहें। लालू ने बिहार को साज़िशन निरक्षर रखने की योजना बनाई क्योंकि पढ़ा-लिखा बिहारी किसी घोटालेबाज़ को वोट क्यों देता! मायावती, मुलायम आदि ने एक जाति को दूसरे का डर दिखा कर अपनी नेतागीरी चमकाई।

किस पार्टी ने विशुद्ध विकास के मुद्दे पर राजनीति की है? किस पार्टी को सच में देश को हित से मतलब रहा है? आप गिनेंगे तो शायद उत्तर-पूर्व के कुछ मुख्यमंत्रियों और भाजपा को छोड़ कर आपको कोई याद नहीं आएगा। आखिर चुनावों में साम्प्रदायिकता सबसे बड़ा मुद्दा कैसे हो जाता है?

आखिर स्टूडियो में बैठे एंकर स्वयं ही यह रोना क्यों रोते हैं कि मुद्दों पर बात नहीं हो रही! वो खुद ही मुद्दे क्यों नहीं उठाते?

एडिटर्स गिल्ड और प्रेस क्लब क्या हैप्पी आवर में दारू और फ़िश फिंगर्स खाने के लिए बना है? कब इन संस्थाओं ने नेताओं को खिलाफ मोर्चा खोला और कहा कि बात इस पर होगी कि स्कूलों के शिक्षकों को वेतन नहीं मिल रहा, बात इस पर होगी कि अस्पतालों में बेड कम क्यों हैं, बात इस पर होगी कि शोध में पैसा कम क्यों है, बात इस पर होगी कि किसानों से सरकार सीधे उत्पाद क्यों नहीं ख़रीदती…

ऐसा नहीं होता क्योंकि मीडिया के चाटुकार-चम्पक-एंकरों का गिरोह राहुल गाँधी जैसे नालायक व्यक्ति को देश का भविष्य बताने पर तुला हुआ था। ऐसा नहीं होता क्योंकि ये पत्रकार अपना ज़मीर बेच कर एक व्यक्ति से खुले तौर पर घृणा करते हुए, नेताओं के साथ स्टेज पर खड़े दिखे। ऐसा इसलिए नहीं हुआ क्योंकि पत्रकारों के भीतर की नैतिकता मर चुकी थी, और संस्थानों की विचारधारा सर्वोपरि हो गई थी। यही कारण है कि ये एंकर, ये पत्रकार, ये रिपोर्टर, ये आलोचक, ये विश्लेषक हर बार उन बातों पर नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे हुए दिखे, जिससे किसी एक नेता की छवि बिगाड़ दी जाए।

मीडिया पूरी तरह से जनसामान्य से कटा हुआ दिखा, और स्टूडियो से कैम्पेनिंग में लगे लोगों ने बग़ल के गमले को छूकर भारत के खेतों की हालत पर रिपोर्टिंग कर दी। ये लोग कमरों में बैठ कर वोटरों का मूड और अंडरकरेंट बताने में लीन थे। जिन्हें धान और गेहूँ का फ़र्क़ नहीं पता, उन्होंने किसानों की स्थिति पर लेख लिखे। जिन्हें लोगों को किसी के व्यक्ति होने से पहले उनके मजहब में रुचि थी, उन्होंने बताया कि निकाह हलाला में मौलवी के साथ किसी महिला को इच्छा के विरुद्ध भी सोना पड़े तो वो उनका अपना मसला है।

ये है आपकी मीडिया जिसे आपने अपना समय दिया, अपने विचार इन्हें सुन कर बनाए, जिन्हें सच मान कर दोस्तों से लड़ाइयाँ कीं। याद कीजिए कि कितनी बार आपने सच जानने के लिए दूसरी तरह की बातें खोजीं? ध्यान से सोचिए कि जब आप एक ही तरह के, एक ही जगह से, एक ही व्यक्ति से प्रभावित हो कर उसी आधार पर अपनी सूचना का चुनाव करते हैं, तो क्या आप सही मायनों में सच जानने को उत्सुक होते हैं, या फिर आपके लिए जो सही ‘लग’ रहा हो, जो सही होने का चोला ओढ़े हो, जो आपने पूर्वग्रहों को संतुष्ट करता है, उसे चाहते हैं कि वही सच हो?

दोनों स्थिति में बहुत अंतर है। आप जो चाहते हैं कि वो सच हो जाए, वो कई बार सच नहीं होता। आपको लगता होगा कि जुनैद की हत्या गोमाँस के कारण हुई, जबकि सत्य यह है कि वो सीट के झगड़े में मारा गया। आपको लगता होगा कि रोहित वेमुला की आत्महत्या राजनीतिक थी, जबकि उसने अपने सुसाइड लेटर में लिखा कि उसके नाम पर राजनीति न हो। आपको लगता रहा कि अखलाख की भीड़ हत्या का पाप सारे हिन्दुओं के सर है, लेकिन सत्य यह है कि भले ही सारे आतंकी हमलों का सूत्रधार, धरती को ख़लीफ़ा के शासन में लाने की चाह रखने वाले एक खास मज़हब के दरिंदे करते हैं, लेकिन उस पाप का बोझ वो मज़हब नहीं उठाता।

इस लेख के बाकी तीन हिस्से यहाँ पढ़ें:
भाग 2: ज़मीर बेच कर कॉफ़ी पीने वाली मीडिया और लिबटार्डों का सामूहिक प्रलाप
भाग 3: वास्कोडिगामा की वो गन जो विपक्ष ने अपना नाम लेकर फायर किया
भाग 4: लिबरलों का घमंड, ‘मैं ही सही हूँ, जनता मूर्ख है’ पर जनता का कैक्टस से हमला

MEME और फेकिंग न्यूज के Fact Check की बेरोजगारी से बढ़िया है, मुद्रा लोन लेकर स्वरोजगार अपनाओ

मोदी सरकार के दौरान देश में रोजगार के अनाप-शनाप आँकड़े जुटाकर बेरोजगारी-बेरोजगारी चिल्लाने वाले कुछ गिरोहों ने ये बात कबूल करने में समय लगाया है कि उन्हें सबसे ज्यादा रोजगार के अवसर मोदी सरकार ने ही लाकर दिए हैं। फैक्ट चेक के नाम पर जो खिलवाड़ अपने पाठकों के साथ इन मीडिया गिरोहों ने किया है और करते जा रहे हैं वह फैक्ट चेक के इतिहास में शर्मनाक कहानियों की तरह याद किया जाएगा।

राजनीति के खानदान विशेष के आदेशों पर उनकी प्रेस वार्ताओं में राफेल डील को घोटाला साबित करने के लिए घटिया और वाहियात सबूत जुटाए। प्रधानमंत्री की गरिमा को नुकसान पहुँचाने और व्यक्ति विशेष के तौर पर नरेंद्र मोदी की छवि ख़राब करने के प्रयास के लिए कुछ विशेष सस्ती कॉमेडी करने वाले सचल दस्ते बड़ी मात्रा में तैयार किए गए। फिर भी रोजगार की कमी को मुद्दा बनाया गया। अभिजात्यों ने पकौड़े बनाने वालों से लेकर चौकीदारों तक का भरपूर मजाक बनाया।

लेकिन विगत कुछ दिनों में एक नया ट्रेंड सोशल मीडिया में देखने को मिला है। देशभर में मेनस्ट्रीम मीडिया ने सदियों से पत्रकारिता और विचारधारा को अपनी बपौती समझकर इकतरफा समाचार, मनगढ़ंत आरोप और दुष्प्रचार का जमकर इस्तेमाल किया। इसमें TOI से लेकर द हिन्दू जैसे बड़े मीडिया घरानों ने वाहवाही भी लूटी। मौजूदा सरकार के खिलाफ भड़ास को प्रमुखता से बड़ी हेडलाइन पर छापने के बाद माफीनामा 10 दिन बाद आखिरी के किसी पन्ने पर छापने का खूब बढ़िया धंधा चलाया गया। यह भी कहना जरुरी है कि माफ़ी माँगने का सिलसिला भी तब जाकर शुरू हुआ, जब सोशल मीडिया देश में अपने पाँव पसार रहा था। और दूसरी तरफ के लोगों को भी प्रतिक्रिया करने का अवसर मिलना शुरू हुआ।

आप सोचिए, आप संचार के माध्यम हैं। लेकिन आपको इस बात पर गर्व के बजाय घमंड है कि आपकी बात कितने लोगों को प्रभावित कर सकती है। फिर भी आप किसी संस्थान, नेता, व्यवस्था पर बिना सोचे-समझे आरोप लगा देते हैं। बाकायदा इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया के माध्यम से किसी सूचना को एक बड़े वर्ग को पढ़वाकर आप बड़े स्तर पर जो हानि कर चुके होते हैं, क्या उसकी भरपाई एक छोटे से और लगभग अदृश्य माफीनामे से की जा सकती है?

साल भर में एक दिन की बरसात के लिए छाते की दुकान हैं फैक्ट चेकर वेबसाइट्स

झूठे दावों, घटनाओं और आँकड़ों की वास्तविकता बताने के लिए फैक्ट चेक नामक व्यवस्था ने जन्म लिया था। धीरे-धीरे हुआ यह कि फैक्ट चेक के अच्छे बाजार को देखते हुए उन्हीं लोगों ने फैक्ट चेक को अपना व्यवसाय बना लिया, जो फैक्ट्स और आँकड़ों के लिए सबसे बड़ा खतरा रहे हैं। इसका उदाहरण राफेल को विमानवाहक पोत (एयरक्राफ्ट कॅरियर) बताने वाली अरुंधति रॉय द्वारा फंड किए गए ऑल्ट न्यूज़ जैसी वेबसाइट्स हैं, जिनके झूठे प्रोपेगैंडा और फैक्ट के फैक्ट चेक्स की नग्नता को ऑपइंडिया अक्सर सामने लाता रहता है। दुखद बात यह है कि ऑल्ट न्यूज़ वेबसाइट का फाउंडर नफरत से भरा हुआ एक ऐसा व्यक्ति है, जो सोशल मीडिया से लेकर लोगों के के व्यक्तिगत जीवन में नजर रखता है और उनकी बेहद निजी जानकारियों को सार्वजानिक करते हुए और ज्यादा माँसल हुए जा रहा है।

इंटेरनेट के बढ़ते इस्तेमाल के साथ ही सोशल मीडिया से लेकर व्हाट्सएप्प यूनिवर्सिटी पर चलने वाली फर्जी यानी, फेक ख़बरों का बाजार जमकर बढ़ा है। इसी बात का फायदा उठाकर पत्रकारिता के नाम पर दुकान चलाने वाले कुछ लोग उल-जुलूल और बेहद हास्यास्पद ख़बरों तक का फैक्ट चेक करते हुए देखे जा रहे हैं। यहाँ तक कि MEME और फोटोशॉप तस्वीरों तक का फैक्ट चेक करने वाले लोग खूब फलते-फूलते देखे जा रहे हैं। यह कहना गलत नहीं होगा कि वो समय दूर नहीं है जब फैक्ट चेक ही अपने आप में एक MEME बन चुका होगा।

फैक्ट चेक हम शर्मिंदा हैं, दी लल्लनटॉप…

इतिहास का सबसे निराशाजनक दिन वो था जब हिटलर के लिंग की नाप-छाप करने वाले कुछ मीडिया गिरोह फेकिंग न्यूज़ वेबसाइट की ख़बरों का फैक्ट चेक करते पाए गए। इससे भी दुखद यह देखना था कि इस फैक्ट चेक को करने के लिए वो अपने पाठकों को उल्टा समझाते हुए पाए गए कि यह खबर वास्तव में लोगों द्वारा सच समझी जा रही थी, इसलिए इसका फैक्ट चेक किया गया। हालाँकि, दी लल्लनटॉप ने मम्मी कसम खाकर पाठकों को मारक मजा देने की कसम खाई हुई है, इसलिए दी लल्लनटॉप में ये सब चलता रहता है। सिर्फ इस एक घटना के कारण मीडिया के समुदाय विशेष की इस छोटी सी टुकड़ी के विवेक को शंका की दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए। क्योंकि, चीते की चाल, बाज की नजर और दी लल्लनटॉप की ‘कसम’ पर शक नहीं करते!

फ़ेकिंग न्यूज़ की खबर का फैक्ट चेक, फैक्ट चेक के इतिहास का सबसे शर्मनाक फैक्ट चेक है – ‘यूनेस्को ‘

ट्विटर पर India Today के पत्रकार राहुल कंवल को कल ही एक ऐसे फोटोशॉप का फैक्ट चेक शेयर करते हुए देखा गया, जिसे देखकर उनकी बौद्धिक क्षमता पर सवालिया निशान लगाने की गुंजाइश ही ख़त्म हो जाती है। इस वीडियो को बनाने वालों ने खुद जाकर राहुल कंवल को समझाने का प्रयास किया कि ये सिर्फ Meme है और महज हास्य के लिए ट्विटर पर चलाया गया है।

एक नजर ऐसे ही कुछ वाहियात फैक्ट चेक पर, जिनके जरिए ये मीडिया गिरोह अपने पाठकों को ये जताना चाहते हैं कि उनके पाठक उनके जैसे बेहद बुद्धू और उन्हीं के जैसे दिमाग से पैदल हैं।

एक नजर स्वघोषित फैक्ट चेकर्स की मार्मिक एवं दुखद कहानी पर

मान गए, आपकी पारखी नजर और राहुल कँवल, दोनों को …
ट्विटर पर मोदी की रैलियों को स्पीड-अप कर के चलाने वाले लोग जब फैक्ट चेकर बन जाते हैं तब ऐसी ही बीसी
होती है
राहुल को बचाने में NBT ने भी दिया योगदान!
एग्जिट पोल के रुझान देखते ही फैक्ट चेकर्स के रुझान भी बदल गए
मारक मजा देने के लिए अपनी कसम के अनुसार ,पत्रकारिता के नाम पर संक्रामक रोग परोसते हुए दी लल्लनटॉप
ओ माई गॉड! डिम्पल गाँधी -दी क्यूटेस्ट को घूँसा पड़ा
स्वघोषित जिन्नाजीवी फैक्ट चेकर्स

इस फैक्ट चेक को पढ़ने के बाद अपने आप को ‘फेसबुक पर सुरक्षित’ अवश्य चिन्हित करें

हमारी राय: प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) है स्वरोजगार का सबसे बेहतर विकल्प

ऐसे समय में, जब देश का एक बड़ा वर्ग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजनाओं का लाभ उठाकर स्वरोजगार की ओर बढ़ रहा है, अपने नाम के आगे बेरोजगार लिखने वालों को भी कुछ स्कीम्स का लाभ जरूर लेना चाहिए। पकौड़े बेचना और ‘चौकीदार’ होना ‘बेराजगार’ होने से कहीं बेहतर विकल्प है।

प्रधानमंत्री मुद्रा योजना (PMMY) में कैसे मिल सकता है लोन?

मुद्रा योजना (PMMY) के तहत लोन के लिए आपको सोशल मीडिया और व्हाट्सएप्प ग्रुप में फेक न्यूज़ का कच्चा माल तलाशने से थोड़ा फुर्सत निकालकर किसी बैंक की शाखा में आवेदन करना होगा। इंटरनेट पर लोगों को भक्त साबित करते हुए अगर आप दिन प्रति दिन चिड़चिड़े होते जा रहे हैं और इसके कारण अगर आप अब निराश होकर खुद का कारोबार शुरू करना चाहते हैं, तो आपको मकान के मालिकाना हक़ या किराए के दस्तावेज, काम से जुड़ी जानकारी, आधार, पैन नंबर सहित कई अन्य दस्तावेज देने होंगे।

नेहरू ने जो बैंक इस देश को दिए थे, उस बैंक का ब्रांच मैनेजर आप से कामकाज से बारे में जानकारी लेता है। ध्यान रखें कि उसे ये मत बताइएगा कि आपके पास आपसे भिन्न विचारधारा रखने वालों को भक्त साबित करने और पकौड़े बनाने वाले और चौकीदारों को गाली देने के अलावा और कोई काम बाकी नहीं है। आपके काम के आधार पर आपको PMMY लोन मंजूर करता है। कामकाज की प्रकृति के हिसाब से बैंक मैनेजर आपसे एक प्रोजेक्ट रिपोर्ट बनवाने के लिए कह सकता है। उसे मोदी का एजेंट समझकर पारित हो चुके लोन के लिए मना मत कर देना।

इतना सीधा नहीं है ओपी राजभर को हटाने के पीछे का गणित, समझें शाह के व्यूह की तिलिस्मी संरचना

भाजपा ने अमित शाह की अध्यक्षता में एक नया तरीका ईजाद किया है, या यूँ कहें कि एक ऐसा तरीका चुना है, जिससे बागी नेताओं से अच्छी तरह निपटा जा सकता है। पिछले कुछ वर्षों में नवजोत सिंह सिद्धू, शत्रुघ्न सिन्हा और उदित राज जैसे नेताओं ने पार्टी छोड़ी। अगर ध्यान से देखें तो ये तीनों ही बड़े नेता थे। जहाँ शत्रुघ्न वाजपेयी काल के सबसे वफादार नेताओं में से एक रहे थे, वहीं उदित राज को दलितों का बड़ा चेहरा बना कर पेश किया गया था। जबकि नवजोत सिंह सिद्धू पंजाब में पार्टी के कर्ताधर्ताओं में से एक थे। भाजपा ने धीमे-धीमे सोची-समझी रणनीति के तहत इन बाग़ी नेताओं को पार्टी छोड़ने को मज़बूर कर दिया और इन्हें सहानुभूति का पात्र भी नहीं बनने दिया। लेकिन ओम प्रकाश राजभर का मामला थोड़ा अलग है।

आगे बढ़ने से पहले जान लेते हैं कि ओपी राजभर हैं कौन? ओम प्रकाश राजभर अपने समुदाय के सबसे बड़े नेताओं में से एक माने जाते रहे हैं। क्योंकि पूर्वी उत्तर प्रदेश में 18% लोग राजभर समुदाय से आते हैं। राज्य के बाकी हिस्सों में भी इस समुदाय की अच्छी-ख़ासी जनसंख्या है। ओपी राजभर की पार्टी सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी का मुख्यालय पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी के अंतर्गत ही आता है, इसीलिए उन्हें हैंडल करने के लिए भाजपा ने अतिरिक्त सावधानी बरती। उन्हें मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। उत्तर प्रदेश जैसे महत्वपूर्ण राज्य में एक-एक समुदाय के वोट का अलग महत्व होता है, ऐसे में राजभर को भाजपा ने कैसे अप्रासंगिक बनाया?

ओपी राजभर का राजनीतिक कार्यक्षेत्र गाज़ीपुर रहा है। गाज़ीपुर और वाराणसी की दूरी ज्यादा नहीं है, ऐसे में इस मामले में थोड़ी सी भी गड़बड़ी का अर्थ था- पीएम मोदी के संसदीय क्षेत्र या आसपास के क्षेत्रों में चुनाव के दौरान भाजपा को नुकसान। ओपी राजभर मंत्री बनने के बाद कुछ दिनों तक तो शांत रहे लेकिन उसके बाद अचानक से उनकी बयानबाज़ी बढ़ गई। भाजपा ने उन्हें बोलने दिया, उदित राज और शत्रुघ्न सिन्हा की तरह। ऑपइंडिया से भी बात करते हुए राजभर ने कहा था कि वह मोदी को अपना नेता नहीं मानते हैं और वो अपने नेता ख़ुद हैं। ओपी राजभर को अप्रासंगिक बनाने के लिए तीन नए किरदारों की एंट्री होती है। इसके बारे में पहले समझना पड़ेगा।

इस कहानी के पहले किरदार हैं– सकलदीप राजभर। भाजपा ने सकलदीप राजभर को तब आगे बढ़ाया, जब पार्टी किसी भी बड़े नेता को राज्यसभा भेज सकती थी। मार्च 2018 में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा में भेजने के लिए कई बड़े नेताओं का नाम दरकिनार कर सकलदीप को चुना गया। बलिया के रहने वाले और 2002 में विधानसभा चुनाव हार चुके सकलदीप राजभर को राज्यसभा सांसद बना कर भाजपा ने राजभर समुदाय के भीतर यह सन्देश दिया कि अकेले कोई पार्टी उसकी हितैषी नहीं है बल्कि भाजपा ही उनके बारे में सोचती है। चूँकि राजनीति में कई निर्णय जाति के आधार पर लिए जाते रहे हैं, इसलिए यहाँ हमारी विवशता है कि राजनीतिक दलों द्वारा लिए गए ऐसे निर्णयों में जाति का उल्लेख करें।

पुराने संघी सकलदीप राजभर को ‘सड़क’ से उठा कर सांसद बना दिया गया

सकलदीप राजभर संघ और भाजपा से काफ़ी समय से जुड़े रहे हैं लेकिन ग्राम प्रधान से ज्यादा उन्होंने किसी चुनाव में कोई ख़ास प्रदर्शन नहीं किया। यहाँ तक कि 2017 विधानसभा चुनाव में भी उन्हें टिकट नहीं दिया गया था। ओपी राजभर के बड़बोलेपन के बाद भाजपा ने उन्हें अचानक से राज्यसभा भेजकर बड़ा दाँव खेला।पार्टी 2017 विधानसभा चुनाव में राजभर समुदाय के वोटों को लेकर आश्वस्त थी क्योंकि ओपी राजभर गठबंधन साथी थे लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को पता चल गया था कि ओपी राजभर के बगावत के कारण लोकसभा चुनाव के दौरान दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है। इसीलिए, सकलदीप को आगे किया गया।

इस कहानी के दूसरे किरदार हैं– हरिनारायण राजभर। हरिनारायण ने 2014 लोकसभा चुनाव में घोसी सीट से जीत दर्ज की थी। पूर्वांचल में घोसी सीट के लिए इस बार भाजपा ने उम्मीदवार की घोषणा सबसे अंत में की। इससे पहले पूर्वांचल की सभी सीटों के लिए उम्मीदवारों के नामों की घोषणा की जा चुकी थी। चूँकि यह सीट सुहलदेव भारतीय समाज पार्टी को जानी थी, भाजपा ने अंत तक गठबंधन की उम्मीद बनाए रखी। लेकिन, ओपी राजभर की बढ़ती माँगों के आगे झुकने की बजाए भाजपा ने फिर से हरिनारायण राजभर पर दाँव खेला। दरअसल, ओपी राजभर बलिया या घोसी की सीट अपने बेटे अरुण राजभर के लिए चाहते थे, जिसमें उन्हें कामयाबी नहीं मिली।

घोसी सांसद हरिनारायण राजभर को टिकट देकर भाजपा ने ओपी राजभर को उनके घर में ही घेरा

लोकसभा चुनाव का अंतिम चरण आते-आते ओपी राजभर की हालत यह हो गई कि बौखलाहट में उन्होंने अपनी पार्टी के लोगों से भाजपा कार्यकर्ताओं को जूते से पीटने का आह्वान किया। दरअसल, भाजपा ने बड़ी चालाकी से ज़मीनी स्तर पर सुहलदेव समाज पार्टी से गठबंधन टूटने वाली न्यूज़ को फैलने नहीं दिया या फिर रोकने का प्रयास किया ताकि आम लोगों को ऐसा लगे कि भाजपा के विरोध में ओपी राजभर की पार्टी का कोई उम्मीदवार नहीं खड़ा है। जबकि, असल में ओपी राजभर ने यूपी की लगभग आधी सीटों पर उम्मीदवार उतार दिए थे। उनके उम्मीदवारों को लेकर ज़मीनी स्तर पर सूचनाएँ पहुँचनी ही नहीं दी गई (ज़ोर-ज़बरदस्ती से नहीं, रणनीति के तहत), इससे वह बौखला उठे थे।

एक कारण यह भी है कि भाजपा बीच चुनाव में ओपी राजभर पर कार्रवाई कर के उन्हें ख़बरों में लाना नहीं चाहती थी, परिणाम यह हुआ कि वो अधिकतर नेगेटिव कारणों से चर्चा में रहे। धीरे-धीरे भाजपा ने उनकी इमेज को नेगेटिव होने दिया और उनका पर कतर दिया। इस्तीफा पॉकेट में लेकर घूमने वाले राजभर की बातों पर कोई ध्यान ही नहीं दिया गया। घोसी से हरिनारायण राजभर को टिकट दिए जाने के बाद ओपी राजभर अपने ही घर में घिर गए। लोकसभा चुनाव ख़त्म होते ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक्शन में आए और उन्होंने ओपी राजभर, उनके बेटे सहित कई बाग़ी नेताओं को निकाल बाहर किया। ओपी राजभर से उनका मंत्रालय छीन लिया गया।

ओपी राजभर के पास कौन सा मंत्रालय था? इसमें भी बहुत कुछ राज़ छिपा है क्योंकि इसे जाने बिना आप ओपी राजभर को निकाले जाने के पीछे की रणनीति को नहीं समझ पाएँगे। उनके पास ‘पिछड़ा वर्ग कल्याण’ मंत्रालय था क्योंकि राजभर समुदाय भी पिछड़ा वर्ग में ही आता है। भाजपा के पास पहले से ही इस बात की रणनीति तैयार थी कि उन्हें हटाने के बाद यह मंत्रालय किसे दिया जाएगा? यहीं पर इस कहानी के तीसरे किरदार की एंट्री होती है– अनिल राजभर। अनिल राजभर का क़द भाजपा में पिछले कई महीनों से ही बढ़ना शुरू हो गया था और इसके पीछे एक सोची-समझी रणनीति थी।

योगी मंत्रिमंडल के सदस्य अनिल राजभर का क़द बढ़ाना कई महीनों से शुरू कर दिया गया था

अनिल राजभर के पिता भी भाजपा के विधायक रहे थे, ऐसे में पार्टी को उनके नाम के साथ राजभर समुदाय के बीच जाने में कोई परेशानी महसूस नहीं हुई। छात्र राजनीति में सक्रिय रहे अनिल को अपने पिता की मृत्यु के बाद पराजय का सामना करना पड़ा था लेकिन 2017 में उन्होंने जीत का परचम लहराया। ओपी राजभर के सभी विभाग उन्हें सौंप दिए गए ताकि राजभर समुदाय के भीतर कोई ग़लत सन्देश न जाए और ओपी राजभर को सहानुभूति पाने का कोई मौक़ा न मिले। इससे एक बात तो साफ़ हो गई – भाजपा ने एक से एक तीर चला कर ओपी राजभर को इस बात के लिए विवश कर दिया कि वो भाजपा पर राजभर समुदाय की उपेक्षा का आरोप न मढ़ सकें। दूसरे मामले में अगर इसका उलटा होता तो पार्टी को ख़ासा नुकसान उठाना पड़ सकता था।

ओपी राजभर को कड़ा जवाब देने के लिए ही अनिल अनिल राजभर को चुना गया। ओपी राजभर को मंत्री पद से हटाए जाने के बाद अनिल राजभर ने कहा, “यह एक बड़ा फ़ैसला है। राजभर समाज की भावनाओं का ख्‍याल करते हुए उनको बरख़ास्त किया है। इसका पूरा राजभर समाज स्वागत करता है। आप जिस सरकार में रहते हैं, उसी सरकार के ख़िलाफ़ बोलते हैं। अगर आप नाख़ुश हैं तो फिर सरकार में बने क्‍यों हैं? वह तो बहुत दिनों से पॉकेट में इस्‍तीफा लेकर घूम रहे थे, आज उनके मन की मुराद मुख्‍यमंत्री जी ने पूरी कर दी।” अनिल राजभर के बयान को गौर से पढ़ें और आपको पता चल जाएगा कि ओपी राजभर को किस तरीके से राजभर समुदाय के उल्लेख करते हुए जवाब दिया गया।

तो इस तरह से इन तीन किरदारों की मदद से भाजपा ने ओपी राजभर को अप्रासंगिक बना दिया, यूपी का जीतन राम माँझी बना दिया। उन्हें राष्ट्रीय मीडिया में मज़ाक का पात्र तो बनाया ही गया (जिसके ज़िम्मेदार वह ख़ुद हैं), साथ में उन्हें अपने समुदाय के बीच अपने पक्ष में सहानुभूति लहर पैदा करने का मौक़ा भी नहीं दिया गया। सीएम योगी के कड़े तेवर और अमित शाह की रणनीति से यह सब संभव हो पाया क्योंकि भाजपा अध्यक्ष के बारे में कहा जाता है कि वह बूथ स्तर तक पर पार्टी के मामलों की जानकारी रखते हैं, ख़ासकर यूपी में, जहाँ वो 2014 लोकसभा चुनाव में पार्टी के प्रभारी भी रह चुके हैं।

लेकिन, इसकी पटकथा लिखी जानी कब की शुरू हो गई थी। 29 दिसंबर 2018 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गाज़ीपुर की रैली में उन्हें बुलाया लेकिन वह नहीं आए। इसके बाद इसे सीधा प्रधानमंत्री से पंगा लेने के रूप में देखा गया। पीएम ने यहाँ सुहलदेव पर डाक टिकट जारी कर ओपी राजभर को चारों खाने चित कर दिया। लेकिन, भाजपा के अंदर तभी से इस बात को लेकर चर्चा चल रही थी कि पीएम की रैली स्किप करने का क्या परिणाम हो सकता है! यानी पूरी योजना बनाने और इसे धरातल पर उतारने में 6 महीनों का समय लगा। वहीं अनिल राजभर को पीएम की रैली के लिए राजभर समुदाय के लोगों की भीड़ जुटाने का इनाम मिला। उन्होंने राजभरों की टीम बना कर पीएम की रैली के लिए व्यवस्था की।

238-248 सीट: BJP को नहीं मिलने वाला है पूर्ण बहुमत, करोड़ों-अरबों के सट्टा बाजार का अनुमान

19 तारीख को सभी मीडिया संस्थाओं के एग्जिट पोल आने के बाद अब सट्टा बाजार भी इस बात का दावा कर रहा है कि एक बार फिर 23 मई को देश की सत्ता मोदी सरकार को मिलने वाली है। जनसत्ता में प्रकाशित खबर के मुताबिक केंद्र में दोबारा एनडीए की सरकार बनने वाली है और एक बार फिर देश के प्रधानमंत्री पद को नरेंद्र मोदी संभालेंगे।

मुंबई और दिल्ली सट्टा बाजार ने भाजपा को इन चुनावों में 238-241 सीटें दी हैं, जबकि कॉन्ग्रेस को लेकर अनुमान है कि पार्टी को 78-81 सीटें मिलेंगी।

इसी तरह गुजरात और राजस्थान के सट्टा बाजार में भी बीजेपी के पक्ष में अनुमान लगाए गए हैं। गुजरात के सट्टा बाजार के मुताबिक भाजपा को 242-244 सीटें और कॉन्ग्रेस को 80-82 जीतने के अनुमान हैं। वहीं राजस्थान सट्टा बाजार के अनुसार भाजपा को 242-245 सीटें और कॉन्ग्रेस को 75-80 सीटें मिलने वाली है।

कॉन्ग्रेस शासित राज्य मध्य प्रदेश की राजधानी में भी शहर के पंटर्स का अनुमान है कि भाजपा को 246-248 के बीच सीट मिलेंगी जबकि कॉन्ग्रेस के खाते में 80-82 सीट आएँगी।

हालाँकि, इन सबका कोई आधिकारिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है लेकिन कहा जा रहा है कि चुनावों में पार्टियों के प्रदर्शन पर सट्टा बाजार में करोड़ों के दाँव लगे हुए हैं। इसके अलावा सट्टा बाजार में इस बार नरेंद्र मोदी के पीएम बनने को लेकर, अमेठी में राहुल गाँधी को जीतने को लेकर और यूपी में सपा-बसपा के गठबंधन पर भी खूब पैसे लगे हुए हैं।

खबर के मुताबिक इस चुनाव में सट्टा बाजार का आकार साल 2014 के लोकसभा चुनाव से अच्छा खासा बड़ा है। कुछ पंटर्स के अनुमान के मुताबिक इस बार दुगना पैसा सट्टा में लगा हुआ है। बता दें कि देश के अधिकांश भागों में सट्टा लगाना गैरकाननूनी है। लेकिन ऑनलाइन सट्टेबाजी को लेकर किसी प्रकार की कोई गाइडलाइन नहीं है। सट्टा लगाने वाले मोबाइल फोन, एप्लीकेशन और वेबसाइट के जरिए सट्टा लगाते हैं।

‘सड़कों पर बहेगा खून अगर मनमुताबिक चुनाव परिणाम न आए, समर्थक हथियार उठाने को तैयार’

एग्जिट पोल को ‘गप’ करार देने से शुरू हुआ विपक्ष का स्तर अब खुलेआम हिंसा करने और खून बहाने तक आ गया है। बिहार महागठबंधन के भागीदार और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा ने मतदान परिणाम मनमुताबिक न होने पर सड़कों पर खून बहा देने की धमकी दी है। साथ ही इस संभावित हिंसा का ठीकरा एक ही साँस में बिहार की नीतीश और केंद्र की मोदी सरकार के सर फोड़ दिया है।

‘हथियार भी उठाना हो तो हथियार उठाना चाहिए’

पत्रकारों से बात करते हुए पूर्व में भाजपा नीत एनडीए के साथ सत्ता की मलाई काट चुके उपेंद्र कुशवाहा ने कहा कि लोगों में इस समय आक्रोश है। ऐसे में अगर ‘रिजल्ट लूटने’ की घटना हुई तो सड़कों पर खून बहेगा। उन्होंने अपने समर्थकों से हथियार उठाने के लिए तैयार रहने को भी कहा है। साथ में कहा कि अगर ऐसी कोई हिंसा होती है तो उसके लिए बिहार और केंद्र की सरकार जिम्मेदार होंगे।

निर्वाचन के पहले, इसके दौरान और एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से विपक्षी नेताओं का EVM और निर्वाचन आयोग पर आरोप लगाना बदस्तूर जारी है। EVM और निर्वाचन आयोग को लेकर जिस तरह से संगठित दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसे देखते हुए यह शंका जताई जा सकती है कि नतीजों के समय कहीं बड़े स्तर पर हिंसा करने के लिए पृष्ठभूमि तो नहीं तैयार की जा रही?

मायावती ने करीबी पार्टी MLA को किया निलंबित, भाजपा प्रत्याशी से गले मिलने का आरोप

एग्जिट पोल के नतीजे आने के बाद से ही विपक्ष के नेताओं में सिमटते जनाधार को लेकर चिंता का माहौल है। पहले ममता बनर्जी ने सर्वेक्षणों को ही ‘गॉसिप’ करार दिया, और अब मायावती ने अपनी संभावित हार के लिए बलि के बकरे तलाशने शुरू कर दिए हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश के पूर्व ऊर्जा मंत्री और विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के सचेतक (व्हिप – whip) रामवीर उपाध्याय को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। उन पर पार्टी-विरोधी गतिविधियों में भागीदारी का आरोप लगाया गया है।

मिले थे गले, भाई पहले से भाजपाई

सोशल मीडिया पर कुछ दिन पहले भाजपा के आगरा प्रत्याशी एसपी सिंह बघेल को गले लगाते हुए रामवीर उपाध्याय की तस्वीर सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुई थी। हालाँकि रामवीर उपाध्याय ने सफाई दे दी थी कि बघेल उनसे रास्ते में ‘टकरा’ गए थे और उन्होंने शिष्टाचारवश कुशल-क्षेम पूछा था, लेकिन अटकलबाजियों का दौर शुरू हो ही गया था। इससे पहले पिछले वर्ष रामवीर के भाई मुकुल उपाध्याय पहले ही भाजपा में शामिल हो चुके हैं।

मायावती के माने जाते थे करीबी

पार्टी महासचिव मेवालाल गौतम की ओर से कभी मायावती के करीबी माने जाने वाले रामवीर उपाध्याय को भेजे गए पत्र में कहा गया है कि कि उन्हें पहले भी पार्टी विरोधी गतिविधियों में भागीदारी को लेकर सचेत किया गया था। इसके बावजूद आगामी लोकसभा के निर्वाचन के समय कई सीटों पर, जिनमें आगरा, फतेहपुर सीकरी, अलीगढ़ शामिल हैं, न केवल उन्होंने पार्टी के प्रत्याशियों का समर्थन नहीं किया बल्कि विरोधी पार्टियों के उम्मीदवारों के पक्ष में समर्थन किया। इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें पार्टी से निलंबित किया जाता है। उनसे प्रदेश विधानसभा में पार्टी के विधायक दल के मुख्य सचेतक (व्हिप) के पद से भी पदमुक्त कर दिया गया है। साथ ही, वह पार्टी के किसी भी कार्यक्रम, मीटिंग आदि में भी हिस्सा लेने के अधिकारी नहीं होंगे।

निराश कार्यकर्ताओं में प्रियंका गाँधी ने भरी चाबी, कहा-‘एग्जिट पोल से न घबराएँ, मतगणना केंद्र पर ध्यान दें’

एग्जिट पोल में दर्शाए पूर्वानुमान के बाद चारों ओर हल्ला उठ चुका है कि सत्ता में दोबारा मोदी सरकार ही आ रही है। ऐसे में कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने सोमवार (मई 20, 2019) को पार्टी के कार्यकर्ताओं से अपील की है कि वे अफवाहों के कारण और एग्जिट पोल देखकर हताश न हों। उन्होंने कार्यकर्ताओं को स्ट्राँग रूम तथा मतगणना केंद्रों पर डटे रहने की भी सलाह दी हैं। प्रियंका ने कहा है कि असली परिणाम 23 मई को आएँगे, उसके लिए तैयार रहें।

प्रियंका ने सोमवार (मई 21, 2019) को ऑडियो संदेश जारी करते हुए कहा, ” मेरे प्यारे कॉन्ग्रेस के भाइयों और बहनों… अफवाहों में पड़ने की जरूरत नहीं है। एग्जिट पोल आपको हतोत्साहित करने के लिए है।”

प्रियंका के मुताबिक यह सब सिर्फ़ कॉन्ग्रेस पार्टी के कार्यकर्ताओं की दृढ़ता को तोड़ने का एक प्रयास है। अपनी ऑडियो में प्रियंका ने पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा, “आपका इन सबसे अलर्ट रहना बहुत महत्वपूर्ण है। स्ट्रॉन्ग रूम और मतगणना केंद्र के बाहर आप निगरानी बनाए रखिए हमें यकीन है कि हमारे संयुक्त प्रयास का फल जरूर मिलेगा।”

प्रियंका गाँधी का यह बयान मिर्जापुर से कॉन्ग्रेस उम्मीदवार ललितेश पति त्रिपाठी के पत्र के बाद आया है। इसमें उन्होंने निर्वाचन आयोग से शिकायत की है कि जिस स्ट्रॉन्ग रूम में सारी ईवीएम रखी हैं, वहाँ पहले से ही 300 अतिरिक्त ईवीएम पहुँचाई जा चुकी हैं।

गौरतलब है कि 19 मई को आए तकरीबन सभी एग्जिट पोल में एनडीए को बहुमत मिलने का अनुमान लगाया गया है। लोकसभा की 542 सीटों पर भाजपा और एनडीए के गठबंधन को सबसे ज्यादा सीटें दी गई हैं। एनडीए के खाते में एग्जिट पोल में सबसे ज्यादा 267-350 सीटें आई।

Breaking: अरुणाचल प्रदेश में आतंकी हमला, MLA तिरोंग अबो सहित 7 लोगों की मौत

अरुणाचल प्रदेश में नेशनल पिपल्स पार्टी (NPP) के विधायक तिरोंग अबो और 6 अन्य लोगों की मंगलवार (मई 21, 2019) को आतंकी हमले में मौत हो गई है। अभी तक की रिपोर्टों के अनुसार, संदिग्ध NSCN (नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड) के आतंकियों का हाथ इस हमले के पीछे हो सकता है। यह घटना अरुणाचल प्रदेश में तिरप जिले के बोगापानी गाँव में हुई है। 

तिरोंग अबो खोंसा वेस्ट से विधायक थे। टाइम्स नाउ की रिपोर्ट के अनुसार, मेघालय के मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा ने इस हमले की पुष्टि की है।

सीएम संगमा ने एक ट्वीट में इस घातक हमले की कड़ी निंदा की है। उन्होंने गृहमंत्री राजनाथ सिंह और पीएमओ से इस हमले के ज़िम्मेदार लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है।

हालाँकि, अभी तक इस हमले की ज़िम्मेदारी किसी ने नहीं ली है लेकिन NSCN पर इस वारदात में शामिल होने के कयास लगाए जा रहे हैं।

BJP से हाथ मिला लें मुस्लिम: कॉन्ग्रेसी MLA ने अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं को दी ‘गाली’

कर्नाटक में कॉन्ग्रेस पार्टी के विधायक ने अपनी ही पार्टी के बड़े नेताओं को अपशब्द कहे हैं। साथ ही उन्होंने पार्टी छोड़ने के भी संकेत दिए। कर्नाटक में एग्जिट पोल के सामने आने के बाद से ही अंदरूनी कलह शुरू हो गई है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने राज्य के कई नेताओं से मुलाक़ात कर धीरज रखने की सलाह दी थी। एग्जिट पोल्स में भाजपा को राज्य में 28 में से 25 सीटें तक मिलती हुई दिखाई दे रही हैं। इससे कॉन्ग्रेस खेमे में हड़कंप है और नेता पार्टी आलाकमान से गठबंधन पर पुनर्विचार करने की माँग कर रहे हैं। सार्वजनिक तौर पर बयानबाज़ी रोकने की लाख कोशिशों के बावजूद विधायक रौशन बेग ने हालिया लोकसभा चुनावों में पार्टी के ख़राब प्रदर्शन को लेकर नाराज़गी जताई है।

कॉन्ग्रेस द्वारा राज्य में आशानुरूप प्रदर्शन न कर पाने के लिए बेग ने सीधे तौर पर पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया और राज्य में पार्टी के प्रभारी केसी वेणुगोपाल को ज़िम्मेदार ठहराया। उन्होंने इन दोनों नेताओं के लिए अपशब्दों का भी प्रयोग किया। साथ ही उन्होंने मुस्लिमों को भी ख़ास सलाह दी। विधायक बेग ने मुस्लिमों से कहा कि अगर अगली बार भी राजग की सरकार बनती है तो वे लोग समझौता कर लें। उन्होंने कहा कि राजग की सरकार बनने की स्थिति में मुस्लिम भाइयों को परिस्थितियों से समझौता कर लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर ज़रूरत पड़ती है तो मुस्लिमों को भाजपा से हाथ मिलाने से भी नहीं हिचकना चाहिए।

रौशन बेग मुस्लिमों के बीच राज्य में जाना-पहचाना चेहरा हैं। उन्होंने मुस्लिमों को सलाह देते हुए कहा कि उन्हें किसी ख़ास पार्टी का वफ़ादार नहीं बने रहना चाहिए। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर मुस्लिमों की उपेक्षा करने का आरोप लगाते हुए कहा कि पार्टी एक ही मुस्लिम को टिकट दिया है। बेग ने ज़रूरत पड़ने पर पार्टी छोड़ने की भी बात कही। साथ ही मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का भी बचाव किया। मुख्यमंत्री का बचाव करते हुए विधायक ने कहा कि राज्य में कॉन्ग्रेस के ख़राब या कमजोर प्रदर्शन के लिए वेणुगोपाल, सिद्धारमैया और गुंडु राव ज़िम्मेदार हैं।

कॉन्ग्रेस पर बड़ा आरोप लगाते हुए विधायक ने कहा कि मुख्यमंत्री लाचार हैं, उन्हें काम ही नहीं करने दिया जा रहा है। बैकॉल रौशन बेग, इसी कारण हार के लिए कुमारस्वामी को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। उन्होंने कॉन्ग्रेस पर एक और बड़ा आरोप लगाते हुए कहा कि सरकार गठन के दौरान मंत्रालय बेचे गए थे। उन्होंने सिद्धारमैया पर महत्वाकांक्षी होने का आरोप लगाते हुए कहा कि उनके मन में लगातार मुख्यमंत्री बनने की इच्छा पल रही है।

वहीं कॉन्ग्रेस पार्टी ने विधायक रौशन बेग के आरोपों से किनारा कर लिया है। कर्नाटक के उप मुख्यमंत्री जी परमेश्वरा ने कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है। उन्होंने आशा जताई कि 23 मई को लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के साथ ही राज्य में परिस्थितियाँ बदलेंगी। आगे की रणनीति पर चर्चा के लिए प्रभारी वेणुगोपाल बंगलौर आएँगे। मुस्लिमों के बीच लोकप्रिय रौशन बेग 8 बार विधायक रह चुके हैं और कॉन्ग्रेस की सरकार के दौरान आधा दर्जन मंत्रालय संभाल चुके हैं। गृह मंत्रालय से लेकर हज मामला मंत्रालय संभालने वाले रौशन बेग के आरोपों से पार्टी को झटका लगना तय है।

देशभर में मदरसों की स्थापना के लिए RSS ने कसी कमर, उत्तराखंड से होगी शुरुआत

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) देश भर में मदरसों की स्थापना की अपनी योजना पर काम करने के लिए कमर कस रहा है। संघ ने उत्तराखंड में अपना पहला मदरसा स्थापित करने की योजना बना ली है। इस काम के लिए जमीन पहले से ही खरीदी जा चुकी है और निर्माण कार्य भी जल्द ही शुरू किया जाएगा।

ख़बर के अनुसार, संघ बहुत पहले से देश में ऐसे मदरसों को स्थापित करने की योजना बना रहा है जो इस्लामी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक शिक्षा भी प्रदान करेगा। इस संबंध में संघ ने उत्तराखंड से शुरूआत करने की योजना बनाई है, जिसे देवभूमि भी कहा जाता है। यहीं पर संघ द्वारा संचालित पहला मदरसा स्थापित किया जाएगा। बता दें कि यह मदरसा उत्तराखंड के हरिद्वार ज़िले के एक गाँव में स्थापित किया जाएगा। संघ परिवार के अनुषांगिक संगठन मुस्लिम राष्ट्रीय मंच बैनर तले खोले जाने वाले मदरसे शुरुआत में 50 छात्राओं को प्रवेश देंगे।

मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की राज्य प्रमुख सीमा जावेद ने भी इस बात की पुष्टि की कि मदरसे की स्थापना के लिए सभी आवश्यक कामों को पूरा कर लिया गया है, और इसके लिए ज़मीन भी ख़रीदी जा चुकी है। उन्होंने बताया कि पाठ्यक्रम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की परिकल्पना के अनुकूल तैयार किया गया है। पिछले साल पीएम मोदी ने एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की दृष्टि सामने रखी थी जिसमें मुस्लिम छात्रों के एक हाथ में क़ुरान और दूसरे में कंप्यूटर हो।

जहाँ एक तरफ़ कुछ मुस्लिमों को इस तरह के मदरसों पर कोई आपत्ति नहीं हैं, वहीं मुस्लिम सम्प्रदाय में एक दूसरा तबका इस तरह की ख़बरों से आशंकित है। उनका कहना है कि संघ परिवार का इतिहास बताता है कि अगर संघ परिवार मदरसा स्थापित करना चाहता है, तो यह केवल अल्पसंख्यकों की संस्कृति को प्रभावित करने के लिए हो सकता है।