तेज बहादुर यादव ने जब बीएसएफ में रहते हुए खाने में कथित ख़राबी का वीडियो बनाकर वायरल किया था, तभी से वह लगातार विवादित कारणों से न्यूज़ में बने हुए हैं। उसके बाद उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई और उन्हें बीएसएफ से निकाल दिया गया। इसके बाद ख़बर आई कि उन्होंने अपने फेसबुक प्रोफाइल पर बहुत सारे पाकिस्तानी दोस्त जोड़ रखे हैं। इसके बाद वो राजनीति में उतरे और सीधा वाराणसी पहुँच कर पीएम मोदी से निर्दलीय लड़ने का ऐलान कर दिया। ऐन वक्त पर सपा-बसपा महागठबंधन ने भी उन्हें टिकट देकर बहती गंगा में हाथ धोने की सोची लेकिन चुनाव आयोग का डंडा चला और तेज बहादुर यादव का नामांकन रद्द हो गया।
अब तेज बहादुर यादव का नया वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें वह दारू पीते हुए दिख रहे हैं। लोगों का कहना है कि तेज बहादुर इसमें अपने परिचितों संग दारू पी रहे हैं। इस वीडियो के बारे में पूछने पर हाँ-ना, हाँ-ना करने के बजाय तेज बहादुर ने पत्रकारों को बताया कि यह वीडियो 2 वर्ष पुराना है। इसका अर्थ यह कि इस वीडियो में तेज बहादुर यादव उपस्थित हैं। 1 मिनट 40 सेकण्ड्स के इस वीडियो को सोशल मीडिया, ख़ासकर फेसबुक पर काफ़ी सर्कुलेट किया जा रहा है।
इस वीडियो को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि इसे किसी ने चोरी-छिपे शूट कर लिया है। वीडियो में 2 लोग दारू पीते हुए दिख रहे हैं और उनके सामने खाने-पीने का सामान रखा हुआ है। कमरे में अन्य लोग भी हैं, जिनकी आवाज़ें सुनीं जा सकती हैं। इसमें एक व्यक्ति तेज बहादुर यादव से परिचय कराते हुए कह रहा है कि ये बीएसएफ के जवान रहे तेज बहादुर यादव हैं। वीडियो देखने पर यह भी पता चलता है कि जो व्यक्ति तेज बहादुर यादव के बारे में बात कर रहा है, वह पूरी तरह नशे में धुत है। वे लोग दिल्ली पुलिस व पंजाब पुलिस के बारे में मज़ाकियाँ बातें करते दिख रहे हैं।
इसमें एक व्यक्ति शांत बैठा हुआ है, जिसके तेज बहादुर यादव होने की बात कही जा रही है। यादव बड़बोले व्यक्ति को चेताते हुए भी दिख रहे हैं ताकि वो धीमा बोले। यादव उसे ‘आराम से, आराम से’ कहते दिख रहे हैं। तेजबहादुर को वीडियो में दारू पीते व स्मोकिंग करते देखा जा सकता है। इस वीडियो वाले पोस्ट पर फेसबुक पर सैंकड़ों लोगों ने कमेंट किया, जिनमें से कुछ ने जानना चाहा कि क्या इसमें सच में तेज बहादुर यादव उपस्थित हैं? ख़बर लिखे जाने तक इस वीडियो को लाखों लोगों ने शेयर किया है।
चूँकि तेज बहादुर ने खुद इस वीडियो के बारे में स्वीकार लिया है, इसलिए यह वीडियो सच है। हाँ यह जरूर है कि जो लोग सिर्फ दारू पीने के लिए तेज बहादुर को निशाना बना रहे हैं, वो गलत हैं। जिस स्टेट में शराब बैन नहीं है और आप शांति के साथ दोस्तों संग पीते हैं, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। विरोध की राजनीति में किसी व्यक्ति का चरित्र-हनन करना अनुचित है।
हैदराबाद में भाजपा विधायक टी राजा सिंह को रविवार (मई 5, 2019) को पुलिस द्वारा हिरासत में ले लिया गया। दरअसल, हैदराबाद के अंबरपेट इलाके में जमीन के एक हिस्से पर शेड की स्थापना को लेकर दो समुदायों में झड़प हो गई।
मौके पर पहुँची पुलिस ने वहाँ पर इकट्ठा हुई भीड़ को हटाया। इसका एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें साफ तौर पर देखा जा सकता है कि भाजपा के विधायक के साथ पुलिस बुरी तरीके से पेश आ रही है। इस वीडियो में पुलिस आयुक्त अंजनी कुमार अपनी टीम से भाजपा विधायक को वहाँ से ले जाने के लिए कहते हैं। अंजनी कुमार कहते हैं, “ले जा इसको, उठा कर ले जाओ।”
Arrested by @hydcitypolice Police Commissioner while opposing for Illegal masjid construction on road opposed by hindu vahini & local Hindu karayakartas at Amberpet #Hyderabadpic.twitter.com/w2qbdTm07c
— Chowkidar Raja Singh (@TigerRajaSingh) May 5, 2019
राजा सिंह इसका विरोध कर रहे होते हैं, मगर पुलिस बलपूर्वक राजा सिंह को पकड़कर ले जाती है और हिरासत में ले लेती है। हालाँकि राजा सिंह को इसके बाद जल्द ही रिहा कर दिया गया। विधायक राजा सिंह ने इसके बाद ट्वीट कर बताया कि वो और उनके समर्थक लोग सड़क पर गैर-कानूनी मस्जिद निर्माण का विरोध करने गए थे लेकिन पुलिस ने उन्हें ही गिरफ्तार कर लिया जबकि गैर-कानूनी काम करने वाले लोग अभी भी खुला घूम रहे हैं।
भाजपा की तेलंगाना इकाई के नेताओं का आरोप है कि पुलिस ने पक्षपातपूर्ण ढंग से काम किया और केवल हिंदू संगठनों के सदस्यों पर लाठीचार्ज किया। उनका कहना है कि मुस्लिम समुदाय सरकारी जमीन पर अवैध रूप से अतिक्रमण करना चाहती थी, जिसे वो रोकने का प्रयास कर रहे थे। मगर पुलिस ने उनके साथ भेद-भाव वाला रवैया अपनाया।
उन्होंने कहा कि वो शहर के गोशामहल निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सिंह की स्थिति के बारे में जानने के लिए मौके पर पहुँचे थे, लेकिन उन्हें पुलिस ने हिरासत में लिया जो निंदनीय है। भाजपा नेताओं ने प्रदेश भाजपा अध्यक्ष के लक्ष्मण की अगुवाई में पुलिस महानिदेशक एम महेंदर रेड्डी से सोमवार (मई 6, 2019) शाम मुलाकात की और इस संबंध में एक ज्ञापन सौंपा।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 52 वर्षीय एक वकील से 14 वर्ष की नाबालिग से हुई शादी को वैध ठहराया है। ये शादी 4 वर्ष पूर्व हुई थी और नाबालिग लड़की अब 18 वर्ष की हो चुकी है। लड़की ने 18 वर्ष की हो जाने के बाद उक्त वकील के साथ रहने की इच्छा जताई, जिसके बाद यह निर्णय दिया गया। जस्टिस रंजीत मोरे और जस्टिस भारती डांगरे की खंडपीठ ने उक्त वकील की याचिका पर सुनवाई के बाद पिछले सप्ताह यह निर्णय लिया। शिकायतकर्ता (जो अब 18 वर्ष की है) ने आरोप लगाया था कि उसके दादा-दादी ने उसे शादी करने के लिए मज़बूर किया था। वकील 10 महीने तक न्यायिक हिरासत में भी रहा था। उस पर बलात्कार का मामला दर्ज किया गया था।
17 सितम्बर 2018 को लड़की 18 वर्ष की हो गई थी, अर्थात क़ानूनी तौर पर बालिग हो गई। इसके बाद वकील ने हाईकोर्ट का रुख कर मामले को रद्द करने की माँग की। गत सप्ताह महिला ने भी एक हलफनामा दायर कर कोर्ट से मामले को रद्द करने को कहा और बताया कि वह अपने पति के साथ ही रहना चाहती है। उसने कहा कि मामले को रद्द किए जाने से उसे कोई आपत्ति नहीं है और विवाद सुलझा लिया गया है। अतिरिक्त सरकारी अभियोजक अरुण कुमार पाई ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि इस तरह से मामले को रद्द करने से ग़लत उदाहरण पेश होगा और व्यापक पैमाने पर जनता के बीच एक ग़लत प्रकार का संदेश जाएगा।
2 मई को दिए गए आदेश में पीठ ने कहा कि उसे महिला के भले-बुरे की चिंता है। अदालत ने अपने आदेश में आगे कहा, “इसमें कोई विवाद नहीं है कि आरोपित के साथ शादी के समय वह नाबालिग थी लेकिन अब वह बालिग हो गई है और उसने आरोपी व्यक्ति के साथ रहने की इच्छा जताई है।” इसके बाद दोनों की शादी को भी अदालत ने वैध करार दिया।
2017 में उक्त वकील को पॉक्सो ऐक्ट के तहत 14 साल की लड़की से शादी करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया था। तब वकील की नाबालिग (17 वर्षीय) पत्नी ने उस पर शारीरिक उत्पीड़न का आरोप लगाया था। पुलिस के अनुसार, सांगली में रहने वाले लड़की के बुजुर्ग माता-पिता अपनी मौत से पहले बेटी की शादी होते देखना चाहते थे और उसी वक्त आरोपी वकील की पहली पत्नी की भी मौत हुई थी। इसके बाद सहमति से दोनों शादी के लिए राजी हो गए थे। आरोपित पर बाल विवाह से जुड़े ऐक्ट, पॉक्सो और रेप संबंधी आईपीसी की धारा लगाकर मामला दर्ज किया गया था।
लोकसभा चुनाव 2019 के पाँचवे चरण का मतदान 6 मई की सुबह से शुरू हुआ। ज्ञात हो कि सात राज्यों की 51 सीटों पर होने वाले मतदान में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, राजस्थान, मध्य प्रदेश और पश्चिम बंगाल रहे। एक तरफ मतदान की प्रक्रिया जारी रही, तो वहीं दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल में हिंसक हमलों का सिलसिला भी चला।
पश्चिम बंगाल में हावड़ा क्षेत्र से सांसद प्रसून बनर्जी और सुरक्षा बलों के बीच मतदान केंद्र संख्या 40 और 50 पर हाथापाई तक की नौबत आ गई, इसके बाद बनर्जी को मतदान केंद्र से बाहर निकाल दिया गया।
ऊपर के वीडियो में साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि TMC सांसद बनर्जी किस तरह से सुरक्षा बलों से बहस कर रहे हैं। इसके अलावा वो मतदान केंद्र पर भी अधिकारियों से बहस कर रहे थे। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के रंतिदेव सेन गुप्ता के ख़िलाफ़ भी हमला बोला। बनर्जी 2014 के लोकसभा चुनाव में माकपा (मार्कसवादी कम्यूनिस्ट पार्टी) के उम्मीदवार श्रीदीप भट्टाचार्य को हराकर विजयी हुए थे। TMC सांसद बनर्जी को हराने के लिए इस बार माकपा ने सुमित्रा अधिकारी को मैदान में उतारा है, वहीं कॉन्ग्रेस ने सुव्रा घोष को अपना उम्मीदवार घोषित किया है।
लोकसभा चुनाव 2019 में पश्चिम बंगाल अपनी हिंसक गतिविधियों को लेकर शुरुआती दौर से ही चर्चा में रहा है। बीजेपी कार्यकर्ताओं और समर्थकों को लेकर तो वहाँ आए दिन विवादों की ख़बरें सामने आती रहती हैं। कभी चुनाव अधिकारी के ग़ायब होने की ख़बर आती है, तो कभी बीजेपी कार्यकर्ताओं पर बम बरसाने की ख़बर का ख़ुलासा होता है। कभी मौलवियों का फ़रमान जारी होता है तो कभी TMC कार्यकर्ताओं की ख़ूनी झड़प का शिकार होकर कोई मतदाता अपनी जान से हाथ धो बैठता है। इसके अलावा बेतुकी हरक़तों भी सामने आती हैें, जिसमें मतदाताओं की इत्र लगी ऊँगली तक सूँघी जाती है।
रिलायंस ग्रुप ने कॉन्ग्रेस पर पलटवार करते हुए करारा जवाब दिया है। अभी हाल ही में राहुल गाँधी ने अनिल अम्बानी को क्रोनी कैपिटलिस्ट करार दिया था। रिलायंस ग्रुप ने जवाब देते हुए कहा कि यूपीए सरकार के दौरान भी उन्हें 1 लाख करोड़ रुपए के कॉन्ट्रैक्ट्स मिले थे। रिलायंस समूह ने यह भी कहा कि कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करते हुए एक मिथ्या आरोपों का अभियान चला रहे हैं। रिलायंस ग्रुप ने राहुल गाँधी के दावों पर जवाब देते हुए आगे कहा:
“कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने जो दावे किए हैं, उनका न तो उन्होंने कोई आधार बताया है और न ही इन बयानों को जायज ठकराने के लिए कोई विश्वसनीय सबूत पेश किया है। कॉन्ग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दस वर्षों के कार्यकाल में 2004 से 2014 के दौरान अनिल अंबानी की रिलायंस ग्रुप को बिजली, दूरसंचार, सड़क, मेट्रो सहित ढाँचागत क्षेत्र की एक लाख करोड़ रुपए से अधिक की परियोजनाओं का ठेका मिला था।“
@reliancegroup would like to remind @RahulGandhi that during UPA regime, from 2004-14, govt handed Mr Ambani and Reliance Group over Rs 1 lakh crore of projects towards nation building in power, telecom, road, metro, etc. 4/5
रिलायंस ग्रुप ने राहुल गाँधी को गैर-ज़िम्मेदार करार दिया। राहुल गाँधी द्वारा अनिल अम्बानी को बेईमान कहे जाने को भी रिलायंस ग्रुप ने असत्य करार दिया। समूह ने पूछा की अगर अनिल अम्बानी के लिए राहुल ने जो बातें कहीं हैं वो सच हैं, तो फिर उनकी सरकार ने 10 वर्षों तक एक क्रोनी कैपिटलिस्ट और एक बेइमान व्यवसायी की मदद क्यों की? राहुल ने अम्बानी को राजनीतिक साँठ-गाँठ से काम करने वाला पूंजीपति बताया था। समूह ने कहा कि हमारे चेयरमैन पर उनके द्वारा लगाए गए सारे आरोप झूठे हैं।
राहुल गांधी जी गला फाड़ कर मोदी सरकार पर 30000 करोड़ की रकम अनिल अम्बानी जी की जेब में डालने का आरोप लगा रहे है। इसका खंडन करते हुए रिलायंस के अनिल अंबानी ग्रुप ने ट्वीट करके कहा है कि 2004 से 2014 के बीच ग्रुप की जेब में एक लाख करोड़ से ज्यादा राहुल जी की सरकार ने डाले थे।
रिलायंस ने राहुल गाँधी से स्पष्ट करने को कहा कि आख़िर उनकी सरकार ने एक दशक तक रिलायंस और अम्बानी को इतने कॉन्ट्रैक्ट्स दिए ही क्यों? बता दें कि पीएम मोदी पर हमला करते वक्त राहुल गाँधी अक्सर अनिल अम्बानी का नाम लेते हैं और कहते हैं कि मोदी ने अम्बानी की जेब में हजारों करोड़ डाल दिया। हालाँकि, उनका आँकड़ा बदलता रहता है। इसी तरह कपिल सिब्बल अम्बानी की आलोचना भी करते हैं और फिर उनके लिए अदालत में ज़िरह भी करते हैं।
बिहार के मुजफ्फरपुर शेल्टर होम मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जाँच ब्यूरो (सीबीआई) को निर्देश दिया है कि वे 11 लड़कियों की कथित रूप से हत्या मामले की जाँच पर 3 जून तक स्टेटस रिपोर्ट पेश करें। सुप्रीम कोर्ट में सीबीआई की तरफ से बताया गया कि 11 लड़कियाँ गायब हैं, जिनकी हत्या का संदेह है।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 3 जून को होगी। शुक्रवार (मई 3, 2019) को सीबीआई ने स्टेटस रिपोर्ट दाखिल कर कहा था कि 11 हत्याओं के मामले में मुख्य आरोपी ब्रजेश ठाकुर समेत अन्य लोगों की भूमिका की जाँच हो रही है। जाँच एजेंसी को शक है कि जो 11 लड़कियाँ गायब हैं, उनकी हत्या कर दी गई है। फिलहाल उन लोगों के खिलाफ चार्जशीट की गई है जो शेल्टर होम में आते जाते थे।
Muzaffarpur shelter home case: Supreme Court asks CBI to complete investigation into the alleged murder of 11 girls, in two weeks time. SC posts the matter for hearing on June 3 and asks CBI to file a status report.
सीबीआई ने सनसनीखेज का खुलासा करते हुए कहा था कि एक आरोपित के कहने पर श्मशान के एक खास स्थान की खुदाई करने पर वहाँ से हड्डियों की पोटली बरामद हुई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले सभी आरोपियों के खिलाफ पॉक्सो (POCSO) एक्ट समेत विभिन्न धाराओं में आरोप तय करते हुए मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया था।
गौरतलब है कि, टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (टीआईएसएस) की रिपोर्ट सामने आने के बाद इस बात का खुलासा हुआ था कि बिहार के मुजफ्फरपुर में गैर सरकारी संस्थान (NGO) द्वारा संचालित एक आश्रय गृह में कई लड़कियों के साथ कथित रुप से बलात्कार और यौन उत्पीड़न जैसी घटनाओं को अंजाम दिया गया। इस शेल्टर होम में रहने वाली 42 लड़कियों में से 34 लड़कियों के साथ यौन उत्पीड़न की पुष्टि हुई थी। मामला सामने आने पर शुरू में इसकी जाँच राज्य पुलिस कर रही थी, लेकिन फिर बाद में इसे सीबीआई को सौंप दिया गया। सीबीआई ने मुख्य आरोपी बृजेश ठाकुर समेत 21 आरोपियों के खिलाफ अदालत में आरोप-पत्र दाखिल किया था।
मीडिया पोर्टल ‘द क्विंट’ ने नवरात्र के दौरान एक वीडियो पोस्ट किया था, जिसमें उपवास के गुण-दोष की व्याख्या की गई थी। हालाँकि, इस वीडियो में चीजों को बायोलॉजिकल ढंग से समझाने की कोशिश की गई थी, लेकिन इसके हेडिंग में कहा गया था कि जानिए उपवास आपके शरीर के लिए आरोग्यवर्धक है या नहीं? ठीक इसी तरह रमज़ान के लिए भी क्विंट ने एक ट्वीट डाला – शब्दों के साथ थोड़ा ‘सेकुलर’ होकर! इसमें साफ़-साफ़ हेडिंग में ही उपवास (यहाँ रोज़ा) के फायदे गिना दिए गए। इतना ही नहीं, इसमें कुछ सस्पेंस की बात नहीं रखी गई और कह दिया गया कि रोज़ा रखने से फलाना-फलाना वैज्ञानिक फ़ायदे होते हैं। सबसे पहले नवरात्रि के दौरान क्विंट द्वारा शेयर की गई वीडियो को देखिए।
इस वीडियो में शुरुआत में तो सभी धर्मों और अन्ना हजारे तक को दिखाया गया है लेकिन क्लिप में उदाहरण के तौर पर सिर्फ और सिर्फ नवरात्रि को ही लिया गया है। अभी रमजान वाले पोस्ट के बाद जब किसी ने इस पर आवाज़ उठाई तो इस वीडियो में दिख रही पत्रकार ने शुरुआत में दिखाए गए चित्र को लेकर डिफेंड करते हुए लिखा कि ये सभी धर्मों के लिए था और उन्होंने नवरात्रि सिर्फ़ उदाहरण के तौर पर लिया। अब ज़रा रमजान के समय डाली गई पोस्ट को देखिए और समझिए कि कैसे नवरात्रि और रमजान के समय डाली गई चीजों से अलग-अलग नैरेटिव बन कर आते हैं। ये सब ‘Headline Framing’ का कमाल है, जो त्यौहार बदलते ही बदल जाता है। और ‘मीडिया समूह’ ऐसा करके ‘मीडिया गिरोह’ में तब्दील हो जाता है।
रमज़ान के दौरान रोज़ा के फ़ायदे बताता ‘The Quint’
कुल मिलाकर बात यह कि नवरात्री के दौरान उपवास के फ़ायदे और नुकसान दोनों दिखाए जाते हैं। हेडलाइन ऐसे बनाए जाते हैं, जिसको पढ़-सुन कर ऐसा लगे कि उपवास करने से न जाने क्या-क्या नुकसान होते हैं। लेकिन जब रमजान के दौरान रोज़ा की बात आती है, तो वही मीडिया गिरोह उसके गुणगान पर उतर आता है। उपवास और रोज़ा भले ही दो धर्मों द्वारा पालन की जाने वाली एक ही पद्धति हो, लेकिन ‘The Quint’ जैसे मीडिया गिरोह इसे दो अलग-अलग चश्मे से देखते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई द्वारा गठित तीन सदस्यीय जाँच पैनल ने उन्हें क्लीन चिट दे दी है। जाँच पैनल को सीजेआई रंजन गोगोई के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी द्वारा लगाए गए यौन शोषण के आरोपों का कोई सबूत नहीं मिला। इस पैनल का नेतृत्व जस्टिस एसए बोडबे कर रहे थे। उन्होंने बताया कि पैनल की रिपोर्ट मुख्य न्यायाधीश एवं दूसरे सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को सबमिट कर दी गई है। चूँकि यह एक अनौपचारिक जाँच थी, इसीलिए इस जाँच की रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया जाएगा।
#Breaking: In-House committee clears Chief Justice of India Ranjan Gogoi, says no substance in allegations of former Employee. pic.twitter.com/5B6x72XXdy
बता दें कि 20 अप्रैल को कई मीडिया पोर्टल्स द्वारा प्रकाशित की गई रिपोर्ट्स में सुप्रीम कोर्ट की पूर्व कर्मचारी द्वारा मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई पर यौन शोषण के आरोप लगाने की बात कही गई थी। उक्त महिला कर्मचारी जस्टिस गोगोई के आवास स्थित दफ्तर में कार्यरत थीं। उस महिला द्वारा 22 जजों को दी गई एफिडेविट के आधार पर ये आरोप लगाए गए थे। उस एफिडेविट में महिला ने यौन शोषण की दो घटनाओं का जिक्र किया था। महिला का आरोप था कि जब उन्होंने यह सब करने से इनकार किया, तब उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।
#Breaking : In-House Committee Finds No Substance In Allegations Against CJI, Report Not Liable To Be Made Publichttps://t.co/L6bUuij6x1
पिछले दिनों थप्पड़ कांड के कारण सुर्खियों में रहने वाले दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का एक और वीडियो सोमवार (मई 6, 2019) को सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इस वीडियो में केजरीवाल जहाँ रोड शो करते नजर आ रहे हैं वहीं कुछ लोग ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाते भी सुनाई पड़ रहे हैं।
सोशल मीडिया पर आप समर्थकों ने इस घटना के पीछे भाजपा के कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार बताया है। खबरों के मुताबिक वीडियो दिल्ली के करावल नगर का है। यहाँ सोमवार को केजरीवाल प्रचार के लिए पहुँचे थे।
Hahaha ?? Delhi ka Mawаli CM Arvind Kejriwal greeted with “Modi Modi Modi” Chants as he takes out Road Show surrounded by Police to avoid another #Slарgate ? pic.twitter.com/UOCBuaml1j
शनिवार (मई 4, 2019) को मोतीनगर में थप्पड़ वाली घटना के बाद वीडियो में अरविंद केजरीवाल के चारों ओर कड़ी सुरक्षा देखने को मिल रही है।
बता दें कि जनता के बीच प्रचार के दौरान ‘मोदी-मोदी’ नारे सुनने वाले केजरीवाल पहले नेता नहीं हैं इससे पहले राहुल गाँधी, कन्हैया कुमार और उर्मिला मातोंडकर की भी रैली के दौरान या उनके भाषण के बीच में मोदी समर्थकों ने नारेबाजी की थी।
प्रोपेगेंडा और झूठों के काले जाल को लाल बैकग्राउंड पर यूएसबी की फोटो के साथ ‘द वायर’ ने अपना न सिर्फ लोगो बनाया है, बल्कि उनका ध्येय भी यही है कि प्रपंच अपनी पूर्णता में, इस पोर्टल पर रिस-रिस कर फैलता रहे। आज जिस व्यक्ति के विचारों को इन्होंने जगह दी है, और जिन बातों को तथाकथित संपादन के बाद भी रहने दिया है, वो बताता है कि ‘द वायर’ की प्रतिबद्धता कम से कम इस देश या पत्रकारिता के लिए तो बिलकुल भी नहीं है।
पीडीपी कश्मीर की एक राजनैतिक पार्टी है जिसकी मुखिया महबूबा मुफ़्ती हैं। महबूबा मुफ़्ती ने आतंकियों को माटी के सपूत कहने से लेकर, भारत से कश्मीर को अलग करने, तिरंगा न फहराने जैसे कई प्रलाप किए हैं। उस पार्टी के प्रवक्ता भी उसी रौ में रहते हैं। वहीद-उर-रहमान पारा नामक पीडीपी प्रवक्ता ने ‘द वायर’ से बातचीत की, और ‘द वायर’ ने उनके प्रोपेगेंडा को अपने फर्जीवाड़ों के पोर्टल पर प्रमुखता से जगह दी।
आतंकी के जनाज़े में आई भीड़ की फोटो के साथ ‘द वायर’ का प्रोपेगेंडा
शुरुआत ही इस तरह से हुई है कि ‘द वायर’ और पारा दोनों के लक्ष्य को कोई भी समझदार व्यक्ति आराम से समझ जाएगा। ध्यान रहे कि इन पोर्टलों को सम्पादक बहुत ही सावधानी से, जानबूझकर शब्दों और घटनाओं को चुनते हैं। जब पारा ने लिखा कि उनके गाँव में कोई गाय मरती है तो पूरा गाँव मातम करने आता है, तो फिर लतीफ़ टाइगर (हाल ही में मारा गया आतंकी) तो किसी का बेटा था, उसे तो उन्होंने क्रिकेट खेलते और पढ़ते देखा था। कितना आसान है यह कहना कि हाँ, वो आतंकी था, और हमारी विचारधाराएँ अलग थीं, लेकिन वो क्रिकेट खेलता था।
आप यह समझिए कि कैसे एक आतंकी को नॉर्मल बताने की कोशिश हो रही है। जैसे वो हेडमास्टर का बेटा था, उसका बेटा तो दसवीं में पास कर गया, फ़लाँ आतंकी तो एक अच्छा पिता था, उसकी माँ आजकल रो रही है। ये सारी बातें आपको एक हार्डकोर आतंकी को मानवीय बताने के लिए इस्तेमाल होती है। वही कार्य ‘द वायर’ पर पीडीपी प्रवक्ता कर रहे हैं। जब आपने उसे क्रिकेट खेलते देखा, तो जब उसने बैट की जगह एके-47 उठा ली, तब क्यों नहीं देखा?
गाय की मौत पर इकट्ठा होने वाला संवेदनशील गाँव उस बच्चे को पहली ही बार बहकने पर, इकट्ठा होकर क्यों नहीं समझाने आया कि बेटा, हथियार मत उठाओ? तब आपके गाँव की संवेदना और नैतिकता कहाँ थी! और आप एक गाय को बीच में ले आते हैं? क्या गाय ने किसी पर ग्रेनेड फेंका था, या किसी परिवार का भरण-पोषण करती थी? किस हिसाब से गाय की मृत्यु और आतंकी की मौत एक समान हो जाती है? ये तो पारा जी वही सम्प्रदाय और वामपंथी लम्पटों वाला एंगल घुसा रहे हैं जहाँ गाय किसी आतंकी को समकक्ष सहजता से घुसा दी गई है!
आप यह समझिए कि लिखने वाला कितनी शातिरता से कुछ बातें ऐसे लिखता है जैसे वो बिलकुल सामान्य हो, “दस हजार लोग एक साथ आ जाते हैं जनाज़े में, बिना किसी आमंत्रण के।” किसी आतंकी के जनाज़े में आ जाने से यह साबित नहीं हो जाता कि वो सही कर रहे हैं। आप तो उस ब्रीड के लोग हैं जो आज तक लोकतांत्रिक तरीके से चुनी हुई सरकारों को, बहुमत के बावजूद, अपनी सरकार नहीं मानते, फिर ये दस हजार के एक जगह इकट्ठा होने से क्या साबित करना चाह रहे हैं? बड़ी संख्या होने से उस विचारधारा को सही मान लिया जाए?
आतंक-विरोधी ऑपरेशन पर सवाल
घाघ आदमी ने तथ्यों को अपने हिसाब से मरोड़ कर आगे लिखा कि लोगों में भावुकता चरम पर है क्योंकि पहली बार सरकार ने चुनावों के आसपास आतंकरोधी ऑपरेशन में रुचि दिखाई है। यहाँ पर पारा ने तो राजनीतिक कारणों से झूठ लिख दिया लेकिन ‘द वायर’ के सम्पादक सो रहे थे कि उन्होंने यह कन्फर्म करना ज़रूरी नहीं समझा कि लतीफ़ टाइगर, बुरहान वनी गैंग का ग्यारहवाँ सदस्य था, जो कि देर से मरा, पर मार दिया गया।
बुरहान वनी का गैंग जिसके सारे सदस्य नर्क पहुँचाए जा चुके हैं
बुरहान वानी के ग्रुप फोटो के सारे 11 आतंकियों को सेना ने चुनावों के परे मारा है। सेना को चुनावों से क्या मतलब? ये ऑपरेशन तो काफी समय से चल रहा था, और आतंकियों को एक के बाद एक, घेर कर, सूचना के मुताबिक़ मारा जा रहा है। इसमें चुनाव कहाँ से आ गया?
लिखने वाले ने अनभिज्ञता में सिर्फ चुनाव को ही नहीं घसीटा बल्कि अमरनाथ यात्रा के दौरान उन इलाकों में ऑपरेशन पर रोक लगने की बात को ले आए। रोक तो रमज़ान में भी लगी थी। अमरनाथ यात्रा पर फिर भी हमला हुआ था। और आतंकियों को सेना ने घेरना शुरु कर दिया था। रमज़ान में तो इस्लामी आतंक हमेशा बाकी महीनों से ज़्यादा ही डैमेज पहुँचाता है।
पुराने इस्लामी युद्धों को अगर भूल भी जाएँ, जिसमें बद्र, मक्का, गुआदालाते, अल ज़ल्लाक़ा, हात्तिन, ऐन जलुत शामिल हैं, तो भी हाल के सालों में लगभग 15 आतंकी हमले हर दिन की औसत से 2006 से 2015 के बीच हुए हैं। 2016 में 400, 2017 में 300 हमले रमज़ान के दौरान हुए हैं। ये सूचना आपको ग्लोबल टेरर डेटाबेस की वेबसाइट से मिल जाएगी। आप कुछ जानकारी इस लिंक पर भी पा सकते हैं।
चुनावों के दौर में हिंसा, हिंसा के दौर में चुनाव
फिर किस लिहाज से कश्मीर में सेना ऑपरेशन रोक दे? पारा जी लिखते हैं कि लोग डेमोक्रेसी से दूर होते हैं। सही बात तो यह है कि जिस चुनाव के दौरान सेना को आप संवेदना के नाम पर रुकने की बात कह रहे हैं, क्या वही संवेदना आतंकी भी दिखाएँगे? क्या आपका गाँव इस बात को समझा पाएगा कि चुनाव हो जाने दो, फिर अपने हथियार उठाना? वो तो इन मौक़ों पर इकट्ठा होंगे, अपनी मुहिम को मज़बूती प्रदान करेंगे, संसाधन जुटाएँगे और हमला करेंगे। जब सामने वाला पक्ष आँख मूँद कर मरने को निकल पड़ा हो, तो सेना उससे गोली छोड़ कर और कैसे बात कर पाएगी? वैसे आत्मसमर्पण का रास्ता तो हमेशा खुला हुआ ही है।
आगे ‘द वायर’ और वहीद-उर-रहमान का कवि हृदय दुःखी हो जाता है कि कश्मीर लगातार उठते जनाजों में ही उलझ गया है। वो कहते हैं कि इस मातमी माहौल में हम उनसे यह नहीं कह सकते कि वोट दो। भाई मेरे, जब तुम यह भी नहीं समझा सकते कि एके 47 मत उठाओ, तुम यह भी नहीं समझा सकते कि हिंसा का रास्ता मौत की तरफ ले जाता है, और यह भी नहीं समझा सकते कि चुनावों में मतदान करो और अपने मतलब की सरकार चुनो, तो फिर लोकतंत्र की प्रक्रिया पर सवाल क्यों उठा रहे हो? बच्चों को स्कूलों में, मदरसों में, मस्जिद की नमाजों के बाद यह बताओ कि कोई पाँच सौ रुपए देकर पत्थर उठाने कहे तो वो ऐसा न करें, बल्कि प्रेम की बात करें, और हर मानव मात्र को प्यार से देखें जैसे कि वो उनका परिवार हो।
चुनावी प्रक्रिया पर सवाल
पारा जी ने यह सवाल उठाए हैं कि तीन चरणों में चुनाव क्यों हो रहे हैं! बंगाल में सात चरणों में हो रहे हैं, बिहार में भी सात चरणों में हो रहे हैं। कारण सीधा सा है कि संवेदनशील जगह है, यहाँ ज्यादा सुरक्षा चाहिए और अलग-अलग चरणों में चुनाव होने से लोग ज्यादा सुरक्षित रहते हैं। ये तो चुनावी प्रक्रिया को बेहतर और सुचारू रूप से चलाने के लिए है। पारा जी ने सुरक्षा वाली बात को पकड़ कर घुमाया और यहाँ तक कह दिया कि जब सब कुछ ठीक हो जाए, हिंसा का सिलसिला थम जाए, तब ही चुनाव कराना चाहिए। लेकिन वो यह नहीं बता पाए कि ऐसा शुभ दिन कब आएगा कश्मीर में।
आगे शब्दों के चुनाव पर फिर से मुझे आपत्ति है लेकिन वहीद साहब के पास ‘द वायर’ के संपादक हैं, तो वो कह सकते हैं कि ‘They are enforcing democracy!’ आप कहिए वॉव! मतलब पूरी दुनिया डेमोक्रेसी से चल रही है, और पारा जी के लिए चुनावी प्रक्रिया लोकतंत्र जबरदस्ती ठूँसने जैसा है। अगर लोकतंत्र एन्फोर्स न किया जाए, तो क्या इस्लाम की ख़िलाफ़त हो कश्मीर में? क्या हम आतंकियों के हवाले कर दें कश्मीर, कि भाई लो चला लो तुम लोग?
आगे उन्होंने फिर से एक बेकार-सा आरोप मढ़ा है कि अगर कम लोग वोट देंगे तो जनादेश के साथ छेड़-छाड़ करना आसान हो जाएगा। ये मेरी समझ में नहीं आया कि 6,000 लोग ही वोट देने आएँगे तो उनके वोटों के साथ मेनिपुलेशन कैसे होगा। क्या ईवीएम पर शक हो रहा है? या, बिना किसी पुख़्ता तर्क के यह कहा जा रहा है?
आतंकियों के लिए सॉफ़्ट कॉर्नर
तर्क तो खैर इस बात के पीछे भी कुछ नहीं है कि जमात-ए-इस्लामी पर प्रतिबंध के बाद वहाँ एक ख़ालीपन की स्थिति बनी है जिसे पारा साहब भरना चाहते हैं। आखिर वैसी मजहबी संस्था के लिए ऐसा सॉफ़्ट कॉर्नर क्यों है जो आतंकी गतिविधियों में मदद पहुँचाता हो? अगर वहीद साहब के हिसाब से वहाँ के लोग उनके समर्थन में हैं, तो गलती लोगों की है, न कि सरकार की जिसने उन्हें बैन किया है। यहाँ पर भी जनाज़े की भीड़ वाला तर्क मत लगाइए कि ज्यादा लोग हैं तो वो सही हो जाएगा।
लेख के अंतिम हिस्सों में जो लिखा गया है वो बहुत निंदनीय है। कहा गया कि पुलवामा हमले में बलिदान हुए जवानों को जिस तरह से रिपोर्ट किया गया वो राजनैतिक कारणों से ऑप्टिक्स, यानी दिखावे के लिए इस्तेमाल हुआ। मतलब इतने जवानों को आतंकियों ने एक मिनट में उड़ा दिया और उस पर अगर देश में चर्चा हो रही है तो वो दिखावा है? वहीद ने स्वीकारा कि ‘हाँ, पुलवामा में 50-60 आतंकी सक्रिया हैं, और कई हत्याएँ हुई हैं।’ ये बात इतनी सहजता से लेखक ने लिख दी मानो एक इलाके में इतने आतंकियों का होना सामान्य बात है।
इसकी जगह वो कहते हैं कि पुलवामा को हमें वहाँ के केसर, दूध और सेव के लिए याद करना चाहिए जो कि इसकी पहचान है। बिलकुल पहचान है। पुलवामा भारत का हिस्सा है और हमें गर्व है वहाँ के हर घास के तिनके पर भी, लेकिन आतंकी हमले और वहाँ के आतंकी भी उसकी एक पहचान बनने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें दबाना बहुत आवश्यक है। ऐसा बिलकुल नहीं है कि हम पुलवामा के हर व्यक्ति को आतंकी मानते हैं। बिलकुल नहीं, वो मेरी ही तरह के भारतीय नागरिक हैं, जिन्हें आतंकी कहना सर्वथा अनुचित है। लेकिन हाँ, अगर वो आतंकियों के जनाजों में न जाएँ तो अच्छा ऑप्टिक्स होगा देश के लिए।
अंत में लेखक के भीतर का ‘मजहब’ जग गया और तर्क की तिलांजलि देते हुए वो कह बैठे कि हिन्दू इंडिया के विचार को मुस्लिम कश्मीर में बेचना गलत है। हिन्दू इंडिया क्या, पूरी दुनिया को हिन्दू विचारों से चलना चाहिए फिर न तो क्रूसेड होंगे, न बद्र की लड़ाई, न इस्लामी आतंक और लूट की घटनाएँ, न मतपरिवर्तन के लिए तलवारों और रुपयों का प्रयोग, पूरे जगत में शांति होगी। आप अपना मज़हब न छोड़ें लेकिन सनातन दर्शन के दो-तीन वाक्य भी लोग जीवन में उतार लें, तो सारी समस्या ही निपट जाएगी।
‘मुस्लिम कश्मीर’ क्या होता है? शिव और माँ शारदा की धरती मुस्लिम किस हिसाब से हो गई? इस्लामी आक्रान्ताओं ने वहाँ से हिन्दुओं को खदेड़ दिया तो वो मुस्लिम कश्मीर हो गया? और वहीद-उर-रहमान जैसे पढ़े लिखे लोग इस तरह के वाक्यांशों का प्रयोग करते हैं, जिसे ‘द वायर’ छाप भी देता है! कश्मीर को सबसे ज़्यादा ज़रूरत है ‘हिन्दू इंडिया’ के विचारों की। यही वो हीलींग टच है जिससे वहाँ के लोगों का भला हो सकता है। आप बेशक अपना मज़हब रखिए लेकिन सनातन विचारों से चलने से जीवन बेहतर हो जाएगा।
लेखक ने लिखा कि जब आतंकी मरते हैं तो संदेश यह जाता है कि एक मुस्लिम को गैरमुस्लिम ने मार दिया। यह संदेश क्यों जाता है, यह तो पता नहीं लेकिन जनाज़े की भीड़ इस बात पर ज़रूर मुहर लगाती दिखती है कि वो जो कुत्ते की मौत मरा है, उसके अपराध ‘हिन्दू इंडिया’ के ऊपर हुए थे। वो इसी में खुश रहते हैं। ये अजम्पशन मैं बिलकुल उसी आधार पर कर रहा हूँ जिस आधार पर पारा साहब ने कश्मीरी आतंकियों की मौत में आतंकी को सेना द्वारा न्यूट्रलाइज करना न मानकर, समुदाय विशेष वाले की हिन्दू द्वारा हत्या मान लेते हैं।
जबकि सत्य यह है कि अधिकतर बार किसी को पता भी नहीं होता कि आतंकी को मारने वाला जवान किस धर्म या मज़हब का था। मरने वालों में तो कश्मीरी मुस्लिम अफसर और सैनिक भी रहे हैं। मरने वाले बलिदानियों में तो कश्मीर पुलिस के भी अफसर रहे हैं। लेकिन पारा जैसे नेताओं को उससे ज़्यादा मतलब कहाँ रहा। उन्हें तो आतंकी की मौत और एक निरीह गाय की मृत्यु में कोई अंतर ही नहीं दिखता।