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प्रियंका की रैली में कॉन्ग्रेस विरोधी नारे लगाने पर वकील को दौड़ा कर पीटा गया

एक व्यक्ति को प्रियंका गाँधी की रैली में कॉन्ग्रेस विरोधी नारे लगाना महंगा पड़ गया। लोकसभा चुनाव के आखिरी चरण के लिए चुनाव प्रचार के दौरान कॉन्ग्रेस महासचिव वाराणसी पहुँची थी। प्रियंका ने वाराणसी में कॉन्ग्रेस प्रत्याशी अजय राय के समर्थन में रोड शो किया और पंडित मदन मोहन मालवीय की प्रतिमा पर माल्यार्पण किया। इस दौरान उनके रोड शो से पहले कार्यकर्ताओं द्वारा मारपीट करने की ख़बर आई। बुधवार (मई 15, 2019) को कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने व्यक्ति को पीटना शुरू कर दिया, जिसके बाद वहाँ हंगामा खड़ा हो गया। कार्यकर्ताओं का आरोप था कि उसने पार्टी विरोधी नारे लगाए हैं, इसीलिए उसे पीटा जा रहा है।

नीचे संलग्न किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे प्रियंका की रैली से पहले कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता मारपीट पर उतारू हो गए हैं। ये घटना बनारस में लंका की है। जब ये घटना हुई, तब प्रियंका के रोड शो की शुरुआत नहीं हुई थी। जिस व्यक्ति की पिटाई हुई है, वह पेशे से अधिवक्ता है। पुलिस द्वारा बीच-बचाव करने के बाद कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं को शांत कराया जा सका। इस दौरान वहाँ पर अफरा-तफरी का माहौल बना रहा। पुलिस ने सबको शांत करा कर रोड शो शुरू करवाया।

वाराणसी में प्रियंका गाँधी का रोड शो बीएचयू गेट से शुरू हुआ। इसके बाद उनका रोड शो शहर के अस्‍सी, सोनारपुरा, मदनपुरा, गोदौलिया होते हुए विश्‍वनाथ मंदिर के रास्ते पर बढ़ा। रोड शो के दौरान बड़ी संख्या में कॉन्ग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रियंका के काफिले पर पुष्पवर्षा की, वहीं प्रियंका ने सभी का हाथ हिलाकर अभिवादन किया। इससे पहले नामांकन के लिए वाराणसी पहुँचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 6 किलोमीटर लम्बा रोड शो कर अपनी ताक़त दिखाई थी।

वाराणसी में पिछली बार रिकॉर्ड मतों से जीत करने वाले नरेंद्र मोदी इस बार भी भाजपा की तरफ से मैदान में हैं, वहीं कॉन्ग्रेस ने भी अपने प्रत्याशी में कोई बदलाव नहीं किया गया है। प्रधानमंत्री ने वाराणसी दौरे के समय गंगा आरती में भी हिस्सा लिया था। इस दौरान उनके साथ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी मौजूद थे।

कमल हासन पर चुनाव प्रचार के दौरान चला चप्पल, गोडसे को कहा था पहला हिन्दू आतंकी

बुधवार (मई 15, 2019) को मक्कल निधि मय्यम के संस्थापक और अध्यक्ष कमल हासन पर चप्पल फेंकी गई। उन्होंने हाल ही में महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे को स्वतंत्र भारत का पहला आतंकी कहा था। उन्होंने कहा था कि गोडसे पहला हिन्दू आतंकी था। मदुरै के थिरुकरमपुण्ड्रम क्षेत्र में अभिनेता से नेता बने कमल हासन पर चप्पल तब फेंकी गई, जब वह वहाँ चुनाव प्रचार के लिए गए थे और उन्हें सुनने के लिए बड़ी भीड़ इकट्ठी हो गई। कमल हासन ने शाम 5 बजे थोप्पुर से अपनी चुनावी रैलियों की शुरुआत की लेकिन पेरियार नगर, सामनाथम, पनाइयुर और चिंतामणि- इन चार जगहों पर उनके कार्यक्रमों को बिना किसी पूर्व-सूचना के स्थगित कर दिया गया।

उन्होंने फिर से शाम 8 बजे विल्लापुरम से रैलियों की शुरुआत की, जहाँ कार्यकर्ताओं ने अच्छी-ख़ासी भीड़ जुटाने में सफलता पाई थी। इसके आधे घंटे बाद उन पर चप्पल फेंकी गई, जो सीधे भीड़ में जाकर गिरी। इसके बाद कुछ लोग कमल हासन के मंच के नजदीक पहुँच गए और उनके ख़िलाफ़ नारेबाजी शुरू कर दी। कमल हासन का विरोध किया गया। कमल हासन ने वहाँ उपस्थित भीड़ को धीरज रखते हुए चिंता न करने की सलाह दी। उन्होंने कहाआपको टेंशन लेने की ज़रुरत नहीं है, पुलिस देख लेगी कि क्या करना है और क्या नहीं।

इस मामले में 11 लोगों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई गई है। इनमें भाजपा कार्यकर्ताओं और हनुमान सेना के सदस्यों के नाम हैं। ज्ञात हो कि हाल ही में कमल हासन ने चुनाव प्रचार के दौरान कहा था कि स्वतंत्र भारत का पहला आतंकवादी एक हिंदू था और उसका नाम नाथूराम गोडसे था। उन्होंने कहा कि वो इसलिए ये नहीं कह रहे हैं, क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाक़ा है, बल्कि वो ऐसा इसलिए कह रहे हैं, क्योंकि महात्मा गाँधी की प्रतिमा सामने है।

उनके इस बयान के बाद भारी बवाल खड़ा हो गया था। इसके बाद उनकी पार्टी ने सफाई देते हुए कहा, “कमल हासन (उक्त भाषण दे कर, जिसमें भारत का पहला आतंकवादी एक हिन्दू, नाथूराम गोडसे, को बताया गया था) सभी गुटों में मजहबी सहिष्णुता और सहअस्तित्व के लिए अपील करना चाहते थे और हर मजहब तथा हर रूप के चरमपंथ की निंदा करना चाहते थे।” कुछ दिनों पहले फ़िल्म निर्देशक विशाल भारद्वाज ने भी नाथूराम गोडसे को हिन्दू आतंकी बताया था। मक्कल नय्यम ने अपने नेता का बचाव करते हुए कहा कि उनके भाषण को संदर्भ से परे समझ लिया गया है और दुर्भावना से एंटी-हिन्दू बताया जा रहा है। इससे आम आदमी में कन्फ्यूजन और चिंता पैदा हो रहा है।

Make In India: पहली बार मिसाइलें निर्यात करने को तैयार भारत, कई देश ख़रीदने को आए आगे

अब तक हथियारों का बड़ा आयातक के रूप में जाना जाने वाला भारत अब दूसरे देशों को मिसाइलें निर्यात करेगा। हम जानते हैं कि भारत अब तक हथियारों का आयात ही करता रहा है, लेकिन अब इसके उलट निर्यात करने की भी तैयारी चालू हो गई है। भारत की तरफ़ से दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और कुछ खाड़ी देशों को मिसाइलों की पहली खेप का निर्यात इसी साल की जाएगी। एक शीर्ष रक्षा अधिकारी के अनुसार, दक्षिण पूर्व एशिया और खाड़ी के देशों की ओर से रुचि दिखाए जाने के बाद भारत सरकार द्वारा यह निर्णय लिया गया है।

कार्यक्रम ‘इमडेक्स एशिया 2019 एग्जिबिशन’ को संबोधित करते हुए ब्रह्मोस एरोस्पेस के एचआर कोमोडर एसके अय्यर ने कहा कि सरकारों के बीच करार के बाद पहली बार मिसाइलों का एक्सपोर्ट किया जाएगा। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया, “ऐसे कई दक्षिण पूर्व एशियाई देश हैं, जो हमारी मिसाइलों को खरीदने के लिए तत्पर हैं।” भारतीय रक्षा क्षेत्र के लिए अब अच्छे मौके इसीलिए बन रहे हैं क्योंकि खाड़ी देशों में धीमी आर्थिक विकास के साथ ही उन्हें कम दामों पर विश्वसनीय रक्षा उत्पादों की तलाश है। भारत अब ये चीजें उचित मूल्य में उन्हें मुहैया कराने की क्षमता रखता है।

तीन दिन तक चलने वाले इस कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा, “यह हमारा पहला मिसाइल निर्यात होगा। इसके साथ ही हमारी मिसाइलों में खाड़ी के देश भी रुचि दिखा रहे हैं।” भारतीय डिफेंस सेक्टर के समक्ष दक्षिण पूर्व एशियाई देशों और खाड़ी देशों में निर्यात के अच्छे अवसर बन रहे हैं। भारत-रूस जॉइंट वेंचर ब्रह्मोस और डिफेंस कंपनी लार्सन ऐंड टर्बो ने इमडेक्स एग्जिबिशन में दक्षिण पूर्व एशियाई बाजार के लिए कई रक्षा उपकरणों को प्रदर्शित किया। कुछ छोटी अर्थव्यवस्थाएँ नवीनतम तकनीकों के साथ प्लेटफॉर्म अपग्रेड के माध्यम से पुराने उपकरणों को नया करने की तलाश में हैं, जिसके लिए उन्होंने भारत का रुख किया है।

तीन दिवसीय आईएमडीईएक्स एशिया एग्जिबिशन 2019 में विश्व की कुल 236 कम्पनियाँ भाग ले रही हैं। दुनिया भर से करीब 10,500 कंपनी प्रतिनिधि यहाँ आए हुए हैं। 30 देशों के 23 युद्धपोत भी प्रदर्शनी में शामिल किए गए हैं। भारत द्वारा मिसाइलें निर्णय करने को ‘मेक इन इंडिया’ की सफलता के रूप में भी देखा जा रहा है। भारत अब रक्षा मामलों में कई तरह के उत्पादन की तरफ़ अपना ध्यान दे रहा है और फैक्ट्रियाँ स्थापित की जा रही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अक़्सर कहते आ रहे हैं कि अब हमें इन क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता की तरफ़ बढ़ना होगा।

बंगाल की चुनावी हिंसा की सबसे बड़ी कवरेज, इतनी हिंसा कि मेनस्ट्रीम मीडिया चर्चा भी नहीं करता

बंगाल पर ताजा ख़बर यह है कि आज चुनाव आयोग की नींद टूटी और उन्होंने बंगाल में हो रही चुनावी हिंसा पर संज्ञान लेते हुए चुनाव प्रचार पर अनुच्छेद 324 का प्रयोग करते हुए एक दिन पहले ही रोक लगा दी। आयोग ने अपने बयान में कहा कि कई पार्टियों ने उनसे बंगाल में हो रही हिंसा पर शिकायत दर्ज की थी और उन्होंने भी पाया कि कई जिलों में जिला प्रशासन और जिला पुलिस ने हर प्रत्याशी और पार्टी को समान रूप से सुरक्षा और बाकी सुविधाएँ नहीं प्रदान की।

आयोग ने कहा कि आम मतदाताओं की सुरक्षा चिंतनीय है और उन्हें बंगाल में स्वछंद और भयमुक्त वातावरण नहीं मिल पा रहा। आयोग ने यह भी कहा कि इस अनुच्छेद का प्रयोग शायद पहली बार हुआ है और अगर ऐसी ही स्थिति बनी तो वो फिर इसके प्रयोग से नहीं हिचकेंगे। हालाँकि, चुनाव आयोग ने यह नहीं बताया कि वो किस चुनाव में इसका प्रयोग करेंगे क्योंकि लोकसभा चुनाव तो अब लगभग निपट ही गया है और एक दिन पहले प्रचार रोक कर उन्होंने कोई तीर तो मारा नहीं है।

चुनाव आयोग इस लोकसभा चुनाव में, बंगाल के मामले में पूरी तरह से निकम्मी, डरपोक और ग़ैरज़िम्मेदार साबित हुई है। मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ, वो आगे अच्छे तरीके से साबित हो जाएगा। छठे चरण के मतदान हो जाने के बाद, सिर्फ एक चरण के मतदान बचे रहने पर चुनाव आयोग ने जिस तरह का एक्शन लिया है उसे अंग्रेज़ी में ‘टू लिटिल, टू लेट’, यानी ‘बहुत देर से, बहुत कम’ कहा जाता है।

मैं अब आप लोगों के सामने पिछले कुछ चरणों में तृणमूल के गुंडों और बंगाल प्रशासन की मिलीभगत से बंगाल में हुई हिंसा, मतदान के दौरान मतदाताओं को डराने, धमकाने, प्रॉक्सी वोटिंग करने, कार्यकर्ताओं की हत्या, पोलिंग अजेंट की पिटाई, विरोधी पार्टियों को रैली की इजाज़त न देने, हेलिकॉप्टर उतरने न देने से लेकर लगभग हर चुनावी क्षेत्र में भाजपा प्रत्याशी और नेताओं की गाड़ी तोड़ने, पोलिंग अजेंट की उँगली काटने तक, तथा बेतरतीब होती रही मार-पीट, तोड़-फोड़ एवं आगजनी आदि की घटनाओं का ज़िक्र करने जा रहा हूँ।

बंगाल की तस्वीर जो हरी नहीं, रक्तरंजित है

14 मई को तृणमूल के गुंडों ने भाजपा नेता अरविन्द मेनन के साथ कई जिला स्तर के नेताओं को पीटा। साथ ही, तुहीन मंडल नामक नेता के घर में भी उत्पात मचाया। इस साल की जनवरी के मामले को दोहराते हुए, ममता बनर्जी ने 13 मई को अमित शाह की जाधवपुर रैली के लिए इजाज़त नहीं दी और उनके हेलिकॉप्टर को उतरने से मना कर दिया गया। इसके साथ ही, दर्जनों भाजपा नेताओं व कार्यकर्ताओं को मध्यरात्रि में उनके होटलों से कोलकाता पुलिस ने उठा लिया।

12 मई को ही मेदिनीपुर में हिन्दुओं को वोट देने से रोका गया। उसी दिन तृणमूल के गुंडों को मोदी के पोस्टर फाड़ते देखा गया। भाजपा प्रत्याशी भारती घोष की गाड़ी पर हमला हुआ और ममता के गुंडों ने उन्हें वोट डालने से भी रोका। इसी दिन छठे चरण के चुनाव के दौरान तृणमूल और भाजपा के एक-एक कार्यकर्ता की हत्या की गई, तथा दो और भाजपा कार्यकर्ताओं पर गोली चलाई गई। साथ ही, घटाल क्षेत्र में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों पर कुछ दूसरे ग्रामीण लोगों ने पत्थरबाज़ी की।

7 मई को हिमांता बिसवा शर्मा और दिलीप घोष की गाड़ियों पर हमले किए गए। 6 मई को पाँचवे चरण के चुनाव के दौरान भाजपा पोलिंग एजेंट को क्रूरता से पीटा गया, वहीं भाजपा के बैरकपुर प्रत्याशी अर्जुन सिंह पर तृणमूल के गुंडों ने हमला किया। साथ ही, वहाँ के वोटरों को डराने-धमकाने की बातें भी सामने आईं। उसी दिन हुगली जिले में ईवीएम को तोड़ने की घटना हुई। वहीं, भाजपा प्रत्याशी लॉकेट चटर्जी की कार पर तृणमूल के गुंडों ने अटैक किया और शीशे तोड़ दिए। बनगाँव से ख़बर आई कि वहाँ तृणमूल के लोग वोटरों को बूथ में घुसने से ही रोक रहे थे।

1 मई को सीपीएम पोलिंग अजेंट शेख़ ख़िलाफ़त के घर को ममता दीदी के गुंडों ने आग के हवाले कर दिया। बीरभूम में भाजपा पोलिंग अजेंट की उँगली काट दी गई इन्हीं गुंडों के द्वारा। बाबुल सुप्रियो की कार को भी तोड़ा गया था। भाजपा नेता अपूर्बा चक्रवर्ती को इस्लामपुर में तृणमूल के गुंडों ने बुरी तरह से पीटा। सिलीगुड़ी में भाजपा कार्यकर्ता उत्तम मंडल और उनके भाई गौतम मंडल को तृणमूल के गुंडों ने मतिगारा क्षेत्र में पीटा और उनके दुकान में तोड़-फोड़ की। बाँकुरा के रानीबंध में भाजपा कार्यकर्ता अजीत मुर्मु को कथित तौर पर ममता दीदी के गुंडों ने इतना मारा कि अस्पताल में उनकी मृत्यु हो गई।

29 अप्रैल को दुबराजपुर इलाके में सुरक्षाबलों और ग्रामीणों में झड़प हो गई और उन्हें ब्लैंक फायर करना पड़ा। उसी दिन, आसनसोल में हो रहे दंगों पर तृणमूल नेत्री मुनमून सेन का जवाब था कि उन्हें बेड टी नहीं मिला। इंडिया टुडे और रिपब्लिक टीवी के पत्रकारों पर भी बंगाल के चुनावी हिंसा पर रिपोर्टिंग के दौरान हमले किए गए, जिसमें महिला पत्रकार भी शामिल थीं। आश्चर्य की बात यह है कि एडिटर्स गिल्ड ने इस पर चुप्पी बनाए रखी। वस्तुतः, यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

पूर्वी बर्दवान में तृणमूल के लोगों द्वारा कैमरे पर ईवीएम में दूसरों के वोट डालते देखे जाने पर चुनाव आयोग ने उस अफसर को सस्पैंड किया। इसी तरह 23 अप्रैल को भी तृणमूल के पोलिंग अजेंट और बूथ के प्रेज़ाइडिंग अफसर खुद ही वोट डालते पाए गए।

18 अप्रैल को रायगंज के हिन्दू मतदाताओं को वोटिंग करने से रोका गया और उनकी जगह कोई और वोट डालता रहा। कुछ लोग अगर वहाँ पहुँचे भी तो किसी और ने ही उनका वोट डाल रखा था। उसी दिन भाजपा के एक कार्यकर्ता शिशुपाल की लाश पेड़ से लटकती मिली। ये घटना परुलिया में हुई जहाँ पिछले साल भी दो और भाजपा कार्यकर्ताओं, त्रिलोचन महतो और दुलाल कुमार, की लाशें मिली थीं। महतो की लाश पेड़ से लटकी हुई थी, और दुलाल की एक हाय-टेंशन वाले बिजली के पोल पर।

इसी दिन एक साथ कई और खबरें आई थीं कि एक जगह ईवीएम पर भाजपा के प्रत्याशी के नाम और चिह्न पर काला टेप लगा हुआ मिला। कहीं से ट्वीट आया कि ममता के तृणमूल पार्टी के लोग सीआरपीएफ़ की वर्दी पहन कर घूम रहे हैं। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता ऑडियो क्लिप में बूथ क़ब्ज़ा करने की बात कह रहा है। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता अपने कार्यकर्ताओं को कह रहा है कि सीआरपीएफ़ आदि के जवानों को खदेड़ कर मारो और भगा दो।

मेनस्ट्रीम मीडिया और बंगाल की चुनावी हिंसा की कवरेज

मेनस्ट्रीम मीडिया में आपको ऐसी खबरें नहीं मिलेंगी। आपको यहाँ रवीश कुमार जैसे धूर्त लोग मिलेंगे जो बैलेंस करते रहेंगे कि भाजपा वाले मरे, तो तृणमूल वाले भी मरे हैं। इस समय रवीश कुमार यह बहुत ही कन्वीनिएंटली भूल जाते हैं कि राज्य सरकार ममता बनर्जी की है और किसी की भी हत्या की ज़िम्मेदारी उसी सरकार की है, चाहे मरने या मारने वाला कोई भी हो। इस मामले में ममता बनर्जी पूरी तरह से असफल रही हैं।

आप जब भी बंगाल और चुनावी हिंसा पर कुछ सर्च करेंगे तो अधिकतर बार आपको एक आँकड़ा मिल जाएगा जिसमें इस बात को छुपाने की पूरी कोशिश होगी कि ममता बनर्जी के कार्यकाल में हिंसक घटनाओं और हत्या का सिलसिला थमता ही नहीं। वहाँ आपको खबरों का पूरा दायरा इतने में समेट दिया जाएगा कि बंगाल तो हिंसा का गढ़ रहा ही है। अरे भाई! ‘रहा ही है’ से क्या मतलब? यहाँ पहले भी हिंसा होती रही तो क्या ममता बनर्जी को क्लीन चिट दे दें?

दुर्भाग्य से मेनस्ट्रीम मीडिया यही करता है। वह आपको 2003 में हुए पंचायत चुनावों में हुई हत्याओं की संख्या बता देगा और कहेगा कि पिछले साल के पंचायत चुनावों में एक नया रिकॉर्ड बना जिसमें सबसे ज़्यादा प्रत्याशी निर्विरोध चुन लिए गए। टाइम्स ऑफ इंडिया की एक ख़बर के अनुसार 2018 के पंचायत चुनावों में बंगाल में 25, तो हिंदुस्तान टाइम्स के अनुसार 29 लोगों की हत्या हुई। इन 29 में से 13 लोग सिर्फ एक दिन में मार दिए गए। लेकिन मुख्यधारा की मीडिया को तो इसमें रुचि है कि 2003 में तो 76 मरे थे, जिनमें से 45 मुर्शीदाबाद से थे।

ये किस तरह का माहौल है?

इसकी बात कोई नहीं करता कि ये जो माहौल बना है, ये किस तरह का माहौल है। क्या ये डर का माहौल है? क्या ये आपातकाल वाला माहौल है? क्या दो-चार गौरक्षकों और गौतस्करों वाली घटनाओं पर सीधे मोदी से जवाब माँगने वाले पत्रकारों का समुदाय विशेष यह बताएगा कि आखिर ऐसा क्या है बंगाल में कि मजहबी दंगे हर जगह पर कुकुरमुत्तों की तरह हो जाते हैं। यहाँ पर किसकी शह पर यह हो रहा है? आखिर विरोधी पार्टियों के काडर की हत्या इतनी सहजता से कैसे हो जाती है?

क्या यही माहौल यह सुनिश्चित नहीं करता कि लोग चुनावों में ममता और उसकी पार्टी से डर कर रहें? आपका पड़ोसी किसी दिन पेड़ पर ख़ून से लथपथ लटका मिले और संदेश हो कि भाजपा को वोट देने पर यही हश्र होगा, तो आप कौन-सा विकल्प चुनेंगे? पंचायत चुनावों में आप कैसे प्रत्याशी बनेंगे जब तृणमूल के गुंडे सर पर तलवार लेकर मँडरा रहे हों? आखिर आप नोमिनेशन कैसे करेंगे?

यही तो कारण है कि आज के दौर में भी 48,650 पंचायत सीटों में से 16,814; 9,217 पंचायत समिति सीटों में से 3,059; और 825 ज़िला परिषद सीटों में से 203 पर निर्विरोध चुनाव हुए। आप यह सोचिए कि तृणमूल लगभग एक तिहाई, यानी 30% सीटों पर निर्विरोध जीत जाती है! कमाल की बात नहीं है ये? बीरभूम जैसी जगहों पर 90% सीट पर तृणमूल के खिलाफ कोई खड़ा ही नहीं हुआ!

चुनाव आयोग और राष्ट्रपति से अपील

बंगाल पूरी तरह से धधक रहा है। अगर हमारे देश के चुनाव आयोग को चुनावों के समय होने वाली हिंसा का भान छठे चरण के चुनाव हो जाने के बाद, अंतिम चरण के चुनाव से तीन दिन पहले होता है तो इसका सीधा मतलब है कि यह संस्था इस मामले में बिलकुल ही बेकार साबित हुई है। आखिर चुनाव आयोग को किस बात का इंतजार है?

सत्तारूढ़ पार्टी के पोलिंग अजेंट बूथों के भीतर वोट डाल रहे हैं, तृणमूल के गुंडों ने हर लोकसभा क्षेत्र में विरोधी पार्टियों के नेताओं के कार से लेकर घर तक पर हमले किए हैं, लोगों को डरा कर वोट कराया जा रहा है, लोगों को वोट करने से रोका जा रहा है, कार्यकर्ताओं की हत्या हो रही है, सुरक्षाबलों से झड़पें हो रही हैं, रैलियाँ रोकी जा रही हैं…

आखिर चुनाव आयोग क्या पोलिंग बूथ में बम फटने के इंतजार में है? इस तरह की कुव्यवस्था पर संज्ञान लेने में इतना समय कैसे लग गया? और आप करते भी क्या हैं? चुनाव प्रचार रुकवा देते हैं एक दिन पहले! इससे क्या हो जाएगा? जब सारी बात चुनावों के दिन होने वाली गड़बड़ियों और हिंसा पर आधारित है, तो प्रचार रोक कर चुनाव आयोग क्या बताना चाह रहा है?

इस मामले में राष्ट्रपति को संज्ञान ले कर, चुनाव आयोग को निर्देश देना चाहिए कि ऐसे संवेदनशील इलाके में मतदाताओं के लिए अगर सुरक्षित माहौल नहीं है, जो आयोग ने स्वयं ही माना है, तो मतदान दोबारा कराया जाए। आयोग की यह ज़िम्मेदारी है कि मतदाता बिना भय के वोट करे और मतदान कराने वाले तमाम अधिकारी भी भयमुक्त होकर उचित कार्यवाही करें।

अभी चक्कर यह है कि बाहर से आए मतदान कराने वाले अधिकारी, ऐसे मामलों में बस किसी भी तरह मतदान के वो चंद घंटे ज़िंदा रह कर घर को वापस जाने के लिए निकाल देते हैं। उन पर ‘संवेदनशील’ इलाके के नाम पर इतना दबाव होता है कि वो वहाँ के दबंगों के भरोसे ही मतदान करवाते हैं। उन्हें लगता है कि ज़िंदा रहना उनकी प्राथमिकता है, और वो वही करते भी हैं।

अगर राज्य स्वयं ही गुंडों को पाले, उनसे पूरा का पूरा बूथ मैनेज करवाए, उनके नेता यह आदेश देते पाए जाएँ कि सुरक्षाबलों को घेर कर मारो, उनके गुंडे इतने बदनाम हों कि वहाँ आनेवाला अधिकारी ईवीएम ही उन्हें सौंप दे, तो फिर इसमें चुनाव सही तरीके से कैसे हो पाएगा?

यही कारण है कि बंगाल में हुए चुनाव रद्द किए जाएँ और सारे सुरक्षा बलों को एक साथ बंगाल में रख कर, नए सिरे से, पूरी सुरक्षा के साथ, मतदान दोबारा कराए जाएँ। चाहे परिणाम किसी के भी पक्ष में जाए, मतलब उससे नहीं है। मतलब इससे है कि एक भी वोट जबरदस्ती न दिलवाया जाए। मतलब इससे है कि हर मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग अपनी इच्छा से करे। मतलब इससे है कि चुनाव हिंसा और डर के माहौल से मुक्त हो।

प्रियंका गाँधी गुंडों को संरक्षण देती हैं, लोगों को लड़वा के 5 साल के लिए चली जाती हैं: कॉन्ग्रेस MLA

कॉन्ग्रेस महासचिव पूर्वी उत्‍तर प्रदेश की प्रभारी प्रियंका गाँधी वाड्रा पर उनके ही पार्टी के विधायक का गुस्सा फूट पड़ा है। प्रियंका गाँधी वाड्रा पर कॉन्ग्रेस विधायक राकेश सिंह ने आरोप लगाते हुए कहा कि वह यहाँ आती हैं और लोगों को लड़वाकर दिल्ली चली जाती हैं, इसके बाद पाँच साल तक यहाँ के लोग आपस में लड़ते रहते हैं।

अपराधियों को संरक्षण देती है प्रियंका गाँधी’

राकेश सिंह ने आगे कहा कि मनी लॉन्ड्रिंग मामले में रोजाना ED ऑफिस के चक्कर काट रहे रॉबर्ट वाड्रा की पत्नी प्रियंका गाँधी बहुत दिन से अपराधियों को संरक्षण दे रही हैं। रायबरेली के हरचंदपुर विधानसभा क्षेत्र से कॉन्ग्रेस विधायक ने दावा किया कि उनके पास इसकी जानकारी भी है। प्रियंका गाँधी द्वारा ही यह साजिश रची जा रही है, जिसका परिणाम आने वाले समय में और खराब होगा। बता दें कि हरचंदपुर विधानसभा सीट सोनिया गाँधी के संसदीय क्षेत्र रायबरेली के अंतर्गत आती है।

MLA राकेश सिंह ने अपने दोनों भाई दिनेश सिंह और अवधेश सिंह का बचाव करते हुए कहा, “मेरे भाई पर प्रियंका गाँधी वाड्रा गलत आरोप लगा रही हैं। प्रियंका गाँधी को लगता है कि यहाँ पर दबाव बनाकर काम करेंगी।” दरअसल, लोकसभा चुनाव में दिनेश सिंह बीजेपी की तरफ से रायबरेली में सोनिया गाँधी को चुनौती दे रहे हैं। कभी कॉन्ग्रेस में सोनिया-प्रियंका के खास रहे दिनेश सिंह के खिलाफ आज पूरी पार्टी हमलावर है।

प्रियंका गाँधी एक घंटे के लिए आएँगी, लोगों को लड़वा के 5 साल के लिए चली जाएँगी

मंगलवार को हुई हिंसा में घायल जिला पंचायत सदस्यों और कॉन्ग्रेस MLA अदिति सिंह से मिलने प्रियंका गाँधी आज रायबरेली पहुँची थी। लेकिन इस दौरान उनकी ही पार्टी के हरचंदपुर से विधायक राकेश सिंह ने उन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। राकेश सिंह ने कहा, “प्रियंका गाँधी बहुत दिनों से अपराधियों को संरक्षण दे रही हैं। वह इसी तरह चुनाव में एक घंटे के लिए आएँगी और फिर जिले के लोगों को लड़वा के पाँच साल के लिए चली जाएँगी। मैं विधिक रूप से कॉन्ग्रेस का विधायक हूँ, लेकिन अगर वे (प्रियंका) मेरे भाइयों पर बाहर से गुंडा बुलवाकर हमला कराना चाहे या फिर कार्रवाई कराएँ तो ये भी गलत है।”

इस दौरान MLA राकेश सिंह ने कहा कि पार्टी और पद अस्थाई होता है, लेकिन भाई स्थाई होता है। ऐसे में अगर भाई के साथ गलत कार्रवाई होगी, तो वो भाई के साथ ही खड़े रहेंगे।

गुवाहाटी में ग्रेनेड धमाका, 1 की मौत, 7 घायल, उल्फा आतंकियों ने ली ज़िम्मेदारी

गुवाहाटी की जू रोड पर अभी कुछ देर पहले (बुधवार 15 मई की रात) ग्रेनेड धमाके की खबरें आ रहीं हैं। धमाका जू रोड स्थित एक शॉपिंग मॉल के बाहर हुआ है। हमले में हालाँकि अभी तक किसी की मृत्यु की खबर नहीं है पर आठ लोग घायल बताए जा रहे हैं।

पुलिस और सुरक्षाबलों ने मौके पर पहुँच कर इलाके को घेर लिया है। ऑल इंडिया रेडियो के अनुसार आतंकी संगठन उल्फा ने हमले की जिम्मेदारी ली है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस हमले में एक व्यक्ति की मौत हो गई जबकि सात लोगों के घायल होने की सूचना है। घटना की सूचना पाकर मौके पर पुलिस और सुरक्षाबल पहुँच गए हैं और जाँच की जा रही है।

मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस हमले की निंदा की है। मीडिया के अनुसार, ग्रेनेड से हुए विस्फोट के कारण कई लोग सड़क पर ही गिर पड़े। खून से लथपथ लोगों को स्थानीय लोगों द्वारा तुरंत उपचार के लिए गोवाहाटी मेडिकल कॉलेज में भर्ती कराया गया है। बताया जा रहा है कि हमलावर ग्रेनेड फेंकने के बाद वहाँ से फरार हो गए हैं।

मुख्यमंत्री ने इस घटना पर गहरा दुःख जताया है।

स्वरा भास्कर से ‘आएगा तो मोदी ही’ कहने वाले युवक ने माँगी माफ़ी, मारा केजरी-टर्न

कुछ दिन पहले ही कम्युनिस्ट चुनाव प्रचारक स्वरा भास्कर को दिल्ली एयरपोर्ट पर ‘आएगा तो मोदी ही’ कहकर ट्रोल करने वाले वी राँझा नाम के युवक सोशल मीडिया पर खूब छाए रहे। स्वरा भास्कर के साथ बनाया गया उनका ये वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुआ है। लेकिन, आज वो ट्विटर पर स्वरा से माफ़ी माँगते हुए देखे गए हैं।

इस वायरल वीडियो को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समर्थकों द्वारा बड़े स्तर पर शेयर किया गया, जबकि विरोधियों के बीच इस वीडियो को लेकर मायूसी छाई रही। स्वरा भास्कर ने भी इस पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए स्पष्टीकरण दिया था कि वो सेल्फी लेने वालों के साथ कोई भेदभाव नहीं करती हैं। हालाँकि, उनका दर्द आखिर में छलक ही गया और उन्होंने लिखा कि ये ‘भक्तों’ के गंदे तरीके हैं।

इस प्रकरण से आहत स्वरा भास्कर के जख्मों पर बरनोल लगाने के लिए इसी युवक वी राँझा ने आज एक नया वीडियो शेयर करते हुए स्वरा भास्कर से माफ़ी माँगी है, लेकिन इसमें आखिर में उन्होंने अरविन्द केजरीवाल की तरह ही यू-टर्न ले लिया है।

आज ट्विटर पर जारी किए इस वीडियो में पंजाबी गायक वी राँझा कह रहे हैं, “स्वरा भास्कर मैम, मैंने ‘आएगा तो मोदी ही’ कहा जो बिलकुल भी गलत नहीं है क्योंकि ये बात तो सबको पता ही है। अगर आपको उससे 1% भी दिक्कत थी, तो आप उस वीडियो को वहीं पर डिलीट करवा देते। खैर, जो भी है सारी बात साइड में कर देते हैं। मैं भी एक इंसान ही हूँ और हिन्दुस्तानी होने के नाते आपसे सॉरी बोलता हूँ। पर एक बात है, आएगा तो मोदी ही। जय हिन्द।”

इस वीडियो के बाद ये देखना बाकी है कि स्वरा भास्कर इसके बाद किस तरह की प्रतिक्रिया देती है। आएगा तो मोदी ही सुनकर उनका फिर से गुस्सा होना तो स्वाभाविक है लेकिन क्या वो हँसी-मजाक के इस माहौल का समर्थन करती हैं या फिर हर दूसरे मोदी विरोधी की तरह ही अपनी परिचित शैली में ही नाराजगी दर्ज करती है।

बता दें कि 8 मई 2019 को, एक छोटी सी वीडियो क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हुई, जिसमें एक व्यक्ति अभिनेत्री से ट्रोल हो चुकी स्वरा भास्कर के साथ एक सेल्फी ले रहा था। क्लिप में, सेल्फी लेते हुए, मुस्करा कर स्वरा भास्कर से कहता है, “पर मैम, आएगा तो मोदी ही”।

बंगाल में हिंसा पर चुनाव आयोग ने लिया संज्ञान, रुक जाएगा सारा प्रचार, बड़े अधिकारियों पर गिरी गाज

लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल सुर्खियों में है। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के रोड शो में हुई हिंसा के बाद चुनाव आयोग सख्त है। पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान ज़बरदस्त हिंसा को देखते हुए चुनाव रैली और सभाओं पर चुनाव आयोग की तरफ से रोक लगा दी गई है। चुनाव आयोग की तरफ से जारी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी गई है। यह फैसला 16 मई अर्थात कल से प्रभावी होगा।

चुनाव आयोग को ऐसा निर्णय लोकसभा चुनाव के दौरान पश्चिम बंगाल में हो रही जमकर हिंसा के मद्देनज़र लेना पड़ा। राज्य में चुनाव प्रचार पर 16 तारीख को ही रोक लग जाएगी। वैसे नियमानुसार प्रचार 17 तारीख को शाम 5 बजे समाप्त होता, लेकिन अब ये 16 मई को रात 10 बजे ही हो जाएगा।

पश्चिम बंगाल के 9 संसदीय क्षेत्रों- दम दम, बारासात, बसीरहाट, जयनगर, मथुरापुर, जाधवपुर, डायमंड हार्बर, दक्षिण और उत्तरी कोलकाता में कोई भी चुनाव प्रचार कल रात 10 के बाद नहीं होगा। 

यह पहली बार है जब चुनाव प्रचार को एक दिन पहले समाप्त करने का निर्णय चुनाव आयोग को लेना पड़ा। चुनाव आयोग ने अपने बयान में कहा, “यह संभवत: पहली बार है जब ईसीआई ने अनुच्छेद 324 को इस तरीके से लागू किया है, लेकिन यह अराजकता और हिंसा की पुनरावृत्ति के मामलों में अंतिम बार नहीं समझा जाए, क्योंकि यह शांतिपूर्ण तरीके से चुनाव प्रक्रिया के संचालन को प्रभावित करता है।”

साथ ही, पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ अधिकारियों पर भी आयोग ने कड़ा रुख लेते हुए प्रधान सचिव, गृह और एडीजी सीआईडी राजीव कुमार को उनके पद से हटा दिया है।

बता दें कि पश्चिम बंगाल में चुनाव के हर चरण में हिंसा की खबरें लगातार आ रही थीं। कल अमित शाह की रैली के दौरान भी बंगाल में ज़बरदस्त हिंसा और आगज़नी का माहौल दिखा। ममता बनर्जी खुद बीजेपी को धमकी देतीं नज़र आईं।

विद्यासागर की प्रतिमा के साथ की गई बर्बरता पर भी आयोग को गहरा दुख जताया है। उम्मीद है कि राज्य प्रशासन द्वारा ऐसा करने वालों का पता लगाया जाएगा। 

एडिटर्स गिल्ड की चुप्पी: लाख गाली खा लें, लेकिन चाटेंगे उन्हीं के… तलवे

पत्रकारिता के समुदाय विशेष की एक मजदूर यूनियन है- नाम है एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इण्डिया। इसके अध्यक्ष हैं शेखर गुप्ता। शेखर गुप्ता ‘राजीव गाँधी जवान थे, बाल-बच्चों वाले थे, देश के सबसे महत्वपूर्ण जंगी जहाजों को टैक्सी बना भी लिया तो क्या?’ जैसे तर्क देते हैं, और ‘हिन्दू प्रतिमाओं से मुस्लिम बेचैन हो जाते हैं’ जैसी बातें छापने वाला प्रोपेगंडा पोर्टल ‘द प्रिंट’ चलाते हैं।

उनकी एडिटर्स गिल्ड म्याँमार में पत्रकारिता के नाम पर हस्तक्षेप कर रहे रॉयटर्स के विदेशी पत्रकारों को जेल भेजे जाने की निंदा करती है, पत्रकारों से सोशल मीडिया पर आम आदमी के सवाल पूछ लेने और खरी-खोटी सुना दिए जाने पर, क्विंट के ऊपर पड़ने वाले आयकर विभाग के छापे पर चिंता प्रकट करती है। लेकिन जब देश के पूर्व केंद्रीय मंत्री और कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर एक पत्रकार से बदतमीजी से बात करते हैं, उसे ‘आई विल किल यू’ कहते हैं, उसका माइक झटक देते हैं, कैमरे पर ‘फ़क ऑफ़’ बोलते हैं तो एडिटर्स गिल्ड को साँप सूँघ जाता है। इसलिए कि ‘दुधारू गाय की लात सहनी पड़ती है।’

पहले भी एडिटर्स गिल्ड का व्यवहार दोहरा

एडिटर्स गिल्ड ऐसे ही दोहरे चाल-चरित्र के लिए बदनाम है। #MeToo मूवमेंट के समय में एमजे अकबर, जो कि अब पत्रकार थे भी नहीं, नेता बन चुके थे, के खिलाफ निशाना साधा लेकिन विनोद दुआ के मामले पर सन्नाटा बाँधे रहे। इसलिए कि एमजे अकबर अब भाजपा सरकार के मंत्री थे, जबकि विनोद दुआ हर रोज भाजपा के खिलाफ जहर उगलते हैं।

जैसा कि हमने बताया, अपने दोहरे व्यवहार पर सोशल मीडिया में उठते हर सवाल को ‘अब्यूसिव बिहेवियर विद् जर्नलिस्ट्स’ के लेबल के साथ यह हौआ बना देते हैं। और जब अर्णब गोस्वामी के रिपब्लिक टीवी के संवाददाताओं को तृणमूल के कार्यकर्ता असल में मारते-पीटते हैं, तो यह गैंग मुँह पर उँगली रख लेता है।  

ANI की सम्पादिका स्मिता प्रकाश ने नरेंद्र मोदी का इंटरव्यू लिया तो राहुल गाँधी ने उनपर सस्ते हमले करने शुरू कर दिए। उस समय एडिटर्स गिल्ड ने बयान तो जारी किया लेकिन साफ़ पता चल रहा था कि यह कॉन्ग्रेस नहीं, भाजपा के खिलाफ था। एक वाक्य में स्मिता प्रकाश पर राहुल गाँधी के हमले को ‘नोट’ भर करने वाला उनका बयान पूरी तरह भाजपा को घेरने के लिए था। और-तो-और, ‘अपने लोगों’ की सोशल मीडिया आलोचना न सह पाने वाला यह गैंग स्मिता प्रकाश को ‘प्रवचन’ देता है कि पत्रकारों को आलोचना से परे होने का गुमान नहीं पालना चाहिए।

यह बयान आया भी अरुण जेटली के ललकारने के बाद ही था।

पी चिदंबरम ने भी जिस बुरी तरह शेखर गुप्ता के ही द प्रिंट की ज्योति मल्होत्रा को झिड़का, वैसा अगर किसी भाजपाई ने किया होता तो अब तक मोमबत्तियाँ निकल आईं होतीं, और इंडिया गेट पर मार्च शुरू हो गया होता। लेकिन चूँकि चिदंबरम ‘माई-बाप’ थे तो एडिटर्स गिल्ड को भी अस्थमा हो गया, आवाज नहीं निकली।

मीडिया को हेडलाइन मैटीरियल न मिले तो लोकतंत्र रुक नहीं जाता: नरेंद्र मोदी

एडिटर्स गिल्ड और पत्रकारों के इसी चरित्रहीन चरित्र के सबसे बड़े भुक्तभोगियों में एक भारत के प्रधानमंत्री पद पर बैठा है। इसी गिल्ड के लोगों ने 12 साल उसे हर तरीके से खून का प्यासा दरिंदा दिखाने की कोशिश की। फिर जब हार गए और वह पीएम बन इनकी छाती पर मूँग दलने आ ही गया तो पहले दिन से उसके कार्यकाल को असफल घोषित कर बदनाम करने की कोशिश की- केवल इसलिए कि मलाई कटनी बंद हो गई, अवैध रूप से, लीक होकर आ रहीं खबरों से हेडलाइन मिलनी बंद हो गई। इसीलिए जब उस व्यक्ति को अपनी बात कहने, अपनी भड़ास निकालने का मौका मिला तो उसने भी बता दिया कि मीडिया को हेडलाइन मैटीरियल न मिले तो लोकतंत्र रुक नहीं जाता।

गर्भवती नक्सली को जंगल में छोड़कर भाग गए साथी आतंकी, पुलिस ने दिखाया मानवीय चेहरा

छत्तीसगढ़ के कांकेर में एक लाख की इनामी महिला नक्सली ने अपने 5 दिन के बच्चे के साथ आत्मसमर्पण कर दिया है। महिला नक्सली अपने एक साथी नक्सली से गर्भवती हुई थी। गश्त के दौरान सुरक्षा बलों को महिला नक्सली मिली थी, जो गर्भवती होने के कारण चलने में असमर्थ थी। इस कारण उसके साथी नक्सली उसे वहीं जंगल में अकेला छोड़कर चले गए थे।

नक्सली आतंकी प्रसव से पहले ही इस महिला को आलपरस गाँव में छोड़कर चले गए थे। नक्सलियों ने जहाँ उसे मरने के लिए छोड़ दिया, वहीं पुलिस ने मानवीय चेहरा दिखाते हुए उस महिला नक्सली को अस्पताल में भर्ती कराया। अस्पताल में जच्चा-बच्चा दोनों का इलाज जारी है। फिलहाल दोनों की हालत खतरे से बाहर बताई जा रही है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, छत्तीसगढ़-ओडिशा बॉर्डर पर कोयलीबेड़ा के आलपरस के जंगलों में मंगलवार (मई 14, 2019) को जिला पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ हुई थी। इस मुठभेड़ में जवानों ने 8 लाख रुपए की इनामी महिला नक्सली उप कमांडर फूलो बाई उर्फ महरी को गिरफ्तार किया था। डीआरजी और पुलिस के जवान नक्सलियों की सूचना पर वहाँ सर्चिंग के लिए पहुँचे थे। अचानक नक्सलियों ने वहाँ फायरिंग कर दी, जवाबी कार्रवाई में नक्सली वहाँ से भाग निकले।

इसके बाद डीआरजी के जवान बुधवार (मई 15, 2019) को आलपरस के जंगलों की ओर गश्त पर निकले थे। इसी दौरान उन्हें जंगल में महिला नक्सली अपने 5 दिन के बच्चे के साथ मिली। पूछताछ में उसने बताया कि उसे बच्चे के प्रसव से पहले ही नक्सली वहाँ छोड़कर गए थे, इसके बाद से महिला वहीं पर थी। उसे इस हालत में देख पुलिस के जवान उसे लेकर कैंप लौटे और महिला और उसके बच्चे को जिला अस्पताल में भर्ती कराया।