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Record लोकसभा मतदान प्रतिशत: लक्षद्वीप, त्रिपुरा रहे अव्वल, यूपी-बिहार 60% के नीचे

लोकसभा 2019 के निर्वाचन में मतदान प्रतिशत सर्वकालिक उच्चतम स्तर (67.11%) का रहा। हालाँकि यह आँकड़ा एक लोकसभा क्षेत्र वेल्लोर को हटा कर है (यानि 542 सीटों का है), जहाँ निर्वाचन आयोग ने मतदान स्थगित कर दिया था। वहाँ मतदान सम्पन्न होने के बाद ही अंतिम राष्ट्रीय आँकड़ा सामने आएगा। इससे पहले इन 542 सीटों का रिकॉर्ड 65.95% का 2014 में था- वह भी मोदी लहर के दौरान। सभी 543 सीटों को मिला भी दें तो 2014 का अंतिम रिकॉर्ड 66.4% का है।

पूर्वी राज्यों का प्रदर्शन बेहतर, पश्चिमी राज्य रहे पीछे

राज्यवार हिसाब से देखें तो 18 राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में पहले (2014) से अधिक मतदान प्रतिशत रहा, जबकि 16 राज्यों में यह 2014 से नीचे चला गया। तेलंगाना में 2014 का आँकड़ा अलग से उपलब्ध नहीं हो पाया क्योंकि राज्य पिछली लोकसभा का निर्वाचन होने के बाद ही संयुक्त आंध्र से अलग हुआ था। उसके लिए 2014 के आँकड़े से ही तुलना की गई है।

जहाँ देश के पश्चिमी और मध्य क्षेत्रों के राज्यों यूपी, बिहार, महाराष्ट्र और दिल्ली सबसे कम मतदान वाले रहे (एक अपवाद के तौर पर न्यूनतम मतदान प्रतिशत, 29.4%, वाला जम्मू-कश्मीर उत्तरी राज्य है), वहीं सर्वाधिक मतदान प्रतिशत वाले राज्यों/केंद्र-शासित प्रदेशों में दक्षिण-पश्चिमी लक्षद्वीप के अलावा बाकी सभी पूर्वी भारत के हैं।

साभार: टाइम्स ऑफ़ इंडिया

कश्मीर में भारी गिरावट, एमपी-हिमाचल में उछाल

आतंक-ग्रसित जम्मू-कश्मीर में इस बार मतदान प्रतिशत में पिछली बार (2014) के मुकाबले 20% की गिरावट रही। पिछली बार वहाँ 49.7% मतदान हुआ था। भारी हिंसा के बीच भी पश्चिम बंगाल में 2014 के 82.2% से थोड़ा ही कम 81.9% मतदान हुआ। मध्य प्रदेश में दूसरी ओर 2014 के मुकाबले 9.6% की उछाल के साथ मतदान प्रतिशत 71.2% जा पहुँचा, वहीं हिमाचल में 64.5% से 71.5% तक मतदान का स्तर पहुँचा। कश्मीर के अलावा केवल दो राज्यों में 60% के नीचे मतदान हुआ- बिहार में 58.1% और यूपी में 59.6%।

भाजपा विरोधी गठबंधन के सूत्रधार नायडू की CM की कुर्सी भी नहीं बचेगी: Exit Polls

चंद्रबाबू नायडू ने भले ही हाल के दिनों में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव, बसपा प्रमुख मायावती, एनसीपी संस्थापक शरद पवार, कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी, तृणमूल की सर्वेसर्वा ममता बनर्जी और वामपंथी नेता सीताराम येचुरी से विपक्षी एकता बनाए रखते हुए भाजपा विरोधी गठबंधन के निर्माण के लिए मुलाक़ात की हो, लेकिन एग्जिट पोल्स के अनुसार, उनकी ख़ुद की सीएम की कुर्सी पर ही संकट के बादल मँडरा रहे हैं। तीन एग्जिट पोल्स के औसत के अनुसार, चंद्रबाबू नायडू आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में बुरी तरह हार रहे हैं और वाईएसआर कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष जगन मोहन रेड्डी राज्य के नए मुख्यमंत्री बनते दिख रहे हैं।

अगर नायडू की सीएम की कुर्सी भी नहीं बचती है तो राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा किरदार अदा करने के लिए उनके द्वारा लगातार की जा रही मेहनत पर पानी पड़ने की संभावना है। जगन मोहन रेड्डी लोकसभा चुनाव में भी आंध्र प्रदेश की कई सीटें जीतते दिख रहे हैं, ऐसे में इसका सीधा नुकसान किंगमेकर बनने का सपना पाल रहे नायडू को ही उठाना पड़ सकता है क्योंकि राज्य में अभी यही दोनों पार्टियाँ प्रभावी हैं। इंडिया टुडे के अनुसार, तीन एग्जिट पोल्स का औसत निकालने पर पता चलता है कि 175 सीटों वाली राज्य की विधानसभा में टीडीपी को मात्र 65 सीटें आएँगी जबकि 106 सीटों के साथ रेड्डी की पार्टी पूर्ण बहुमत के लिए ज़रूरी न्यूनतम आँकड़े से काफ़ी आगे निकल जाएगी।

पीपल्स प्लस ने वाईएसआर कॉन्ग्रेस को 112 सीटें दी हैं जबकि मिशन चाणक्य ने पार्टी को 91-105 सीटें जीतते हुए दिखाया है। टीडीपी को दोनों एजेंसियों ने क्रमशः 59 और 55-61 सीटें दी है। एक अन्य एग्जिट पोल में टीडीपी को जगन की पार्टी से अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। 2014 में राज्य में हुए विधानसभा चुनाव में नायडू की पार्टी को 117 सीटें मिली थीं जबकि वाईएसआर कॉन्ग्रेस पार्टी को 70 सीटों से संतोष करना पड़ा था। कॉन्ग्रेस की राज्य में स्थिति अच्छी नहीं है और भाजपा अभी पाँव जमाने की कोशिश में ही लगी है।

इस बार आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव में दोनों ही नेताओं ने एक-दूसरे पर जम कर आरोप लगाए। जहाँ चंद्रबाबू नायडू ने अपने द्वारा किए गए विकास कार्यों को हाइलाइट करते हुए फ़ारूक़ अब्दुल्लाह को जम्मू कश्मीर से बुलाकर मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कई नई योजनाओं के वादे किए, जगन मोहन रेड्डी ने जनता के बीच यह बताने की कोशिश की कि नायडू अपने वादे पूरे करने में विफल रहे हैं। चंद्रबाबू नायडू ने मार्च 2018 में राजग ने नाता तोड़ लिया था, उसके बाद से वह पीएम मोदी के विरोध में मुखर रहे हैं।

नायडू ने अपने राज्य में इस बार आंध्र प्रदेश को विशेष दर्जा दिए जाने को मुद्दा बनाया था। इस मुद्दे को लेकर उन्होंने अपने हर भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को घेरा। आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव के परिणाम लोकसभा चुनाव परिणामों के साथ ही 23 मई को जारी किए जाएँगे। किसी भी एग्जिट पोल ने राज्य में दोनों राष्ट्रीय पार्टियों (भाजपा एवं कॉन्ग्रेस) के खाता खुलने की भी संभावना नहीं जताई है। सभी एग्जिट पोल्स ने इन दोनों ही बड़े दलों को शून्य सीटें मिलती हुई दिखाई हैं। अब देखना यह है कि विपक्षी एकता के नए सूत्रधार नायडू अपना गढ़ बचाने में कामयाब हो पाते हैं या नहीं।

लिबरल गिरोह दोबारा सक्रिय, EVM पर लगातार फैला रहा है अफवाह, EC दे रही करारा जवाब

उत्तर प्रदेश में मतदान के चौथे चरण के बाद दूसरे दिन सिटी मजिस्ट्रेस समेत प्राइवेट गाड़ी में ईवीएम और वीवीपैट मिलने के कारण नेताओं ने खूब हंगामा किया था। मौक़े पर ड्राइवर के भाग जाने के कारण मामले ने भी काफ़ी तूल पकड़ा। हालाँकि सूचना मिलते ही डीएम मौक़े पर पहुँचे और नेताओं की उपस्थिति में हुई जाँच में साफ़ हो गया कि दूर के क्षेत्रों से मशीनें आने में देरी हुई है। इसके अलावा भड़के नेताओं को शांत कराने के लिए मशीनों को उनके सामने चेक भी किया गया, सारी मशीनें वैसी थीं जिनका उपयोग नहीं हुआ था।

इस पूरी घटना की खबर को दैनिक भास्कर ने 30 अप्रैल को अपने वेबसाइट पर प्रकाशित किया। लेकिन बावजूद इसका संज्ञान लिए चुनाव परिणाम का दिन नजदीक होने के कारण मामले को उछाला गया। दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री ने 20 मई को अपने ट्विटर पर लिखा, “देशभर में मतगणना केंद्रों के आसपास इवीएम खुली गाड़ियों में पकड़ी जा रही हैं। जनता पकड़ रही है…लेकिन ख़ुद को पत्रकार कहने वाले बड़े-बड़े लोग आँख मूँदकर बैठे है …. उन्हें इंतज़ार है कि इस हेराफेरी से मोदी जीते तो ये फिर इवीएम पर सवाल उठाने वालों पर भौंकना शुरू करें।”

मनीष सिसोदिया के इस ट्वीट पर जब वरिष्ठ पत्रकार ब्रजेश कुमार सिंह ने उन्हें जवाब दिया और बताया, “पत्रकार आँख मूंद कर नहीं बैठे हैं, बल्कि पड़ताल कर रहे हैं और फिर अफवाहों का खंडन भी!” उन्होंने दैनिक भास्कर का स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए कहा, “आप खुद देख लीजिए, आपके सहयोगियों के आरोप और सच्चाई में कितना बड़ा फर्क है!”

इस पर मनीष सिसोदिया भी शांत नहीं बैठे, उन्होंने सबूत देखे और ब्रजेश कुमार पर निशाना साधते हुए फिर एक ट्वीट किया। उन्होंने भास्कर के स्क्रीनशॉट पर कहा, “अपने चैनल पर भी ज़रा इस सच को दिखा दीजिए..सिर्फ़ दैनिक भास्कर की वेबसाईट पर सच क्यूँ? सारन, फगवाड़ा, चंदौली, मेरठ, फ़तेहाबाद, सकलडीह, ग़ाज़ीपुर में अपनी पड़ताल का सच भी बता दीजिए… उम्मीद है 23 से पहले आपकी पड़ताल पूरी हो जाएगी। बॉक्स में महोबा वाली ख़बर का सच भी बता दीजिएगा।”

मनीष सिसोदिया की लीक पर चलते हुए स्वरा भास्कर ने भी ट्विटर पर निर्वाचन आयोग से जवाब माँगा है। उन्होंने पूछा है कि ये सब क्या हो रहा है। उनके मुताबिक बिहार से लेकर हरियाणा तक हर जगह ईवीएम की मशीनें मिल रही हैं।

इन्हीं सवालों के कारण उत्तर प्रदेश, चंदौली में हुई घटना पर निर्वाचन आयोग ने सफाई दी है। उन्होंने सभी आरोपों को निराधार बताते हुए यह सुनिश्चित किया कि ईवीएम कड़ी सुरक्षा में हैं। आयोग ने अपनी ओर से हर घटना पर अलग-अलग जवाब दिए। उत्तर प्रदेश गाजीपुर मामले में चुनाव आयोग ने बता दिया है कि स्ट्रॉन्ग रूम को लेकर प्रत्याशियों द्वारा जो सवाल खड़े किए गए थे, उन्हें सुलझा लिया गया है।

चुनाव आयोग के अनुसार, हर काउंटिंग सेंटर पर ईवीएम और VVPAT मशीन को राजनीतिक दलों के सामने वीडियोग्राफी करके सुरक्षित रखा गया है। आयोग के मुताबिक, ईवीएम जिस जगह पर ये सभी हैं, वहाँ पर सीसीटीवी कैमरे की भी पूरी व्यवस्था है। सुरक्षा के लिए CPAF की तैनाती है, प्रत्याशियों को भी स्ट्रॉन्ग रूम में जाने की अनुमति दी गई है। ऐसे में किसी तरह का गलत आरोप लगाना निराधार है।

BJP को वोट देने पर पति ने की पत्नी की हत्या, ससुराल वालों पर FIR दर्ज

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर ज़िले से एक चौंकाने वाली घटना का ख़ुलासा हुआ है। इस ज़िले के तरवनिया वार्ड नंबर-3, सैदपुर, के निवासी रामबचन ने अपनी पत्नी नीलम (25 वर्षीय) की कथित तौर पर बेरहमी से हत्या कर दी।

ख़बर के अनुसार, रामबचन नाम के इस शख़्स ने अपनी पत्नी को केवल इसलिए मार डाला क्योंकि उसकी पत्नी ने उसके कहे अनुसार बीएसपी को वोट देने की बजाए बीजेपी को वोट दे दिया था। हैवानियत पर उतारू इस शख़्स ने अपनी पत्नी को मारने के लिए फावड़े का इस्तेमाल किया। हत्या की वारदात को अंजाम देने के बाद वो तब तक लाश के पास खड़ा रहा जब तक कि मौक़े पर ग्रामीणों की भीड़ इकट्ठी नहीं हो गई। भीड़ इकट्ठी होने के बाद वो वहाँ से भाग गया।

हत्या की ख़बर जब मृतका के परिजनों तक पहुँची तो उन्होंने उस गाँव में पहुँचकर हत्या के विरोध में सड़क जाम किया। सूचना पाकर गाजीपुर पुलिस ने मौके पर पहुँचकर पहले तो भीड़ को तितर-बितर किया और फिर मृतका के पति और ससुराल वालों के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कर उन्हें हिरासत में ले लिया। हालाँकि, मृतका (नीलम) की माँ ने रामबचन और उसके माता-पिता के ख़िलाफ़ दहेज को लेकर हत्या का मामला दर्ज करवाया है।

बता दें कि खानपुर पुलिस स्टेशन के सिंगारपुर के गहिरा बस्ती की रहने वाले ईशू राम की बेटी नीलम की शादी 19 जून 2014 को रामबचन के साथ हुई थी। उनके 2 बच्चे हैं। कुछ अन्य ख़बरों के अनुसार, रामबचन को अपनी पत्नी पर शक़ रहता था, इस वजह से दोनों के बीच आए दिन तकरार का माहौल रहता था। एक अन्य ख़बर के अनुसार, पत्नी पर शक़ करना भी हत्या की वजह हो सकती है।

SC ने की EVM से VVPAT मिलान की एक और याचिका खारिज, कहा- ‘लोकतंत्र को नुकसान पहुँचेगा’

मंगलवार (मई 21, 2019) को सर्वोच्च न्यायालय ने ईवीएम और वीवीपैट पर्चियों के 100 फीसदी मिलान वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि अगर इस मामले में दखल दिया गया तो यह लोकतंत्र को नुकसान होगा।

इस याचिका को ‘टेक4ऑल’ नाम के टेक्नोक्रैटों के समूह द्वारा दायर किया गया था। उनकी दलील थी कि ईवीएम विश्वस्नीय नहीं हैं, इसकी टैपरिंग की जा सकती है। इसलिए उन्होंने न्यायालय से सभी ईवीएम और वीवीपैट की पर्चियों से मिलान की माँग की थी।

कोर्ट ने इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा, “इस मामले पर पहले ही मुख्य न्यायाधीश की बेंच फैसला दे चुकी है फिर आप इस मामले को वेकेशन बेंच के सामने क्यों उठा रहे हैं?” इस याचिका को बकवास बताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यही करते रहे तो इससे लोकतंत्र को नुकसान होगा।

गौरतलब है इससे पहले ऐसे ही एक मामले पर 7 मई को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई थी। इस दौरान विपक्ष द्वारा दाखिल की गई याचिका कोर्ट ने खारिज की थी।

दरअसल, आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में 21 विपक्षी नेताओं द्वारा दायर याचिका में माँग की थी कि 50 फीसदी VVPAT पर्चियों की ईवीएम से मिलान करने का आदेश निर्वाचन आयोग को दिया जाए। जिसे सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया था। इससे पहले चुनाव आयोग ने विपक्ष की इस माँग पर कहा था कि वीवीपीएटी स्लिप काउंटिंग की वर्तमान पद्धति में कोई बदलाव नहीं होगा, और अगर ऐसा हुआ तो लोकसभा परिणाम 6-9 दिनों के बाद आएगा।

Exit Polls से नाराज़ मणिशंकर समर्थक पत्रकार इरीना अकबर ने देश की जनता को सुनाई खरी-खोटी

एग्जिट पोल्स के नतीजों से नाराज़ इंडियन एक्सप्रेस की पूर्व पत्रकार ने देश की जनता को भला-बुरा कहना शुरू कर दिया है। एग्जिट पोल्स में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले राजग को पूर्ण बहुमत मिलता दिखाया गया है। नाराज़ पत्रकार इरीना अकबर ने पहले तो ईवीएम, फिर देश की जनता को ही भला-बुरा कहा। इरीना अकबर ने अपनी ट्वीट में लिखा:

“अगर भाजपा ईवीएम में गड़बड़ियाँ कर के फिर से चुनी जाती है तो ईवीएम पर से मेरा विश्वास उठ जाएगा। अगर भाजपा जनता द्वारा वोट देने के कारण फिर से सत्ता में आती है तो मेरा देश की जनता पर से ही विश्वास उठ जाएगा। दूसरी वाली स्थिति बहुत बुरी है, बहुत बुरी।“

इरीना अकबर की इस ट्वीट को लेकर सोशल मीडिया पर उन्हें निशाना बनाते हुए पाकिस्तान चले जाने की सलाह दी। लोगों ने इरीना को याद दिलाई कि जिन्हें इस देश पर और देश की जनता पर भरोसा नहीं था, उन्हीं के लिए 1947 में एक देश बनाया गया था, इरीना को वहीं चली जाना चाहिए। बाद में परेशान इरीना ने लिखा कि उन्होंने इस ट्वीट को लेकर आने वाली नोटिफिकेशन को म्यूट कर दिया है और ‘मूर्ख संघी’ उनके समय के लायक नहीं हैं। इरीना ने कहा कि संघी हंगामा मचा कर उन्हें डिस्टर्ब कर रहे हैं और उनका फोन नोटिफिकेशन्स के कारण बार-बार बज रहा है।

कॉन्ग्रेस पार्टी की तरफ झुकाव रखनी वाली इरीना ख़ुद को बिज़नेस वुमन बताती हैं और संजय झा जैसे कॉन्ग्रेस नेताओं के ट्ववीट्स को अक्सर रीट्वीट करती रहती हैं। हाल ही में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आध्यात्मिक दौरे पर भी निशाना साधा था और गिरोह विशेष के क्रंदन में शामिल होते हुए सवाल किया था कि पीएम जब ध्यान कर रहे थे, तब वहाँ कैमरा क्यों था? कुछ दिनों पहले इरीना अकबर ने पत्रकारों, कार्यकर्ताओं, गायकों, अभिनेताओं और क्रिकेटरों पर निशाना साधते हुए कहा था कि इन लोगों ने वर्षों अपने क्षेत्र में काम कर के जो इज्जत कमाई, उन्होंने पिछले पाँच वर्षों में एक ‘हत्यारे’ का समर्थन करते हुए ये इज्जत गँवा दी।

इरीना ने लिखा था कि एक ‘हत्यारे’ का समर्थन करते हुए इन लोगों ने जो इज्जत गँवाई है, क्या उसे फिर ये वापस पा सकेंगे? इरीना का इशारा किस तरफ था, ये समझा जा सकता है। इससे पहले कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा पीएम मोदी पर अभद्र टिप्पणी करते हुए उन्हें नीच कहे जाने का भी इरीना ने खुल कर समर्थन किया था। इरीना ने लिखा था कि मणिशंकर अय्यर बिलकुल सही थे और वो उनकी बातों से पूरी तरह सहमत हैं।

एग्जिट पोल्स के नतीजे आने के बाद से ही लगातार गिरोह विशेष के पत्रकारों में बेचैनी दिख रही है। बीबीसी ने भी अपनी वेबसाइट पर राहुल गाँधी की प्रोफाइल में बदलाव करते हुए उनकी सफलता का वास्तविक लक्ष्य 2019 से बढ़ा कर 2014 कर दिया। बीबीसी ने राहुल को एक उम्दा बैकरूम ऑपरेटर कहा और अनाम विश्लेषकों के हवाले से दावा किया कि उनके पास राजनीतिक मुद्दों को लेकर व्यापक समझ है। बीबीसी ने प्रियंका गाँधी के चमत्कारिक व लोकप्रिय होने के भी दावे किये लकिन इसके पीछे का कारण नहीं बताया।

20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी को 35+ सीटें: ‘क्रन्तिकारी’ पत्रकार का क्रन्तिकारी Exit Poll

पिछले कुछ दिनों से वह जिस भी मीडिया संस्थान में नौकरी करने जा रहे हैं, वहाँ से उन्हें निकाल बाहर किया जा रहा है। कभी अरविन्द केजरीवाल के साथ अपनी केमिस्ट्री को लेकर ‘क्रन्तिकारी’ का दर्जा पा चुके पुण्य प्रसून वाजपेयी पर अब उम्र के साथ-साथ नौकरी छूटने का असर भी साफ़-साफ़ दिख रहा है। जहाँ कई मीडिया चैनल, सर्वे एजेंसियाँ मिल कर एग्जिट पोल्स जारी कर रही हैं और फिर भी वो चेतावनी दे रहे हैं कि फाइनल नतीजे इससे बिलकुल अलग हो सकते हैं, पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ‘अपना ख़ुद का एग्जिट पोल’ जारी किया है। उन्होंने कहाँ-कहाँ जाकर मतदताओं से बात की, इस बारे में कुछ न ही पूछिए तो बेहतर है। वाजपेयी अब टीवी चैनलों से ऊपर उठ कर स्वयं में ही एक संस्थान बन बैठे हैं।

उनके एग्जिट पोल के अनुसार, भारतीय जनता पार्टी की सीटें 282 से घट कर सीधा 145-152 पर आ जाएगी। कॉन्ग्रेस को 100 से अधिक आएँगी और यूपी महागठबंधन को 50 से ज्यादा सीटें मिलेंगी। उन्होंने तृणमूल को 35 से भी अधिक सीटें मिलने का अनुमान लगाया है। बंगाल में भाजपा केउद्भव को वाजपेयी ने सीधे तौर पर नकार दिया है। लेकिन, वाजपेयी ने इससे भी बड़ी ग़लती या यूँ कहें, ब्लंडर किया है। उन्होंने डीएमके के 35 से भी अधिक सीटें जीतने की बात कही है।

क्या डीएमके 35 से अधिक सीटें जीत सकती है? अगर पुण्य प्रसून वाजपेयी जैसा विरिष्ठ और बड़ा पत्रकार इस तरह के दावे करे, तो भले ही अनुमानों में भिन्नता हो सकती है लेकिन कुछ बेसिक फैक्ट चेक तो उन्होंने किया ही होगा। लेकिन नहीं, पुण्य प्रसून वाजपेयी ने ऐसा करने की ज़रूरत नहीं समझी। ऐसी पार्टी, जो सिर्फ़ 20 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है, उसे वाजपेयी ने 35 सीटें दे दी है। ऐसा कैसे संभव है? क्या डीएमके द्वारा जीती गई एक सीट को दो या डेढ़ गिना जाएगा? 20 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली पार्टी 35 सीटें कैसे जीत सकती है?

सबसे बड़ी बात कि मध्य प्रदेश कॉन्ग्रेस के आधिकारिक पेज ने इस कथित एग्जिट पोल को शेयर भी किया। हो सकता है पुण्य प्रसून वाजपेयी का इरादा ही यही रहा हो- बिना फैक्ट जाने कुछ भी आँकड़े दे देना, ताकि फाइनल रिजल्ट्स आने तक कॉन्ग्रेस पार्टी के लोग तो उनका वीडियो शेयर करें। अगर डीएमके तमिलनाडु की सारी सीटों पर चुनाव लड़ती तो पुण्य प्रसून वाजपेयी शायद उसे देश में पूर्ण बहुमत देते हुए स्टालिन के भारत का प्रधानमंत्री बनने का अनुमान लगा लेते।

इससे पहले भी वाजपेयी ने अपनी राजनीतिक नासमझी का परिचय तब दिया था, जब उन्होंने कहा था कि आचार संहिता लागू होते मोदी सरकार ‘केयरटेकर सरकार’ की भूमिका में आ जाएगी। इसपर उन्हें लताड़ लगाते हुए एक आईएएस अधिकारी ने उन्हें कहा था, “बाजपेयी जी, एंकरिंग आपको संवैधानिक विशेषज्ञ नहीं बनाती है। लोकसभा भंग होने पर ही सरकार केयर-टेकर बनती है। कृपया भारत में पाकिस्तान और बांग्लादेश का संविधान लागू न करें।” पुण्य प्रसून वाजपेयी बड़े मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं लेकिन उनके ताज़ा कांडों से लगता है कि उन्हें संविधान और राजनीति पर ट्यूशन लेने की ज़रूरत है।

सोनिया, प्रियंका किस हैसियत से हत्यारों को माफ कर रही हैं? 20 अन्य लोगों की जान की कीमत क्या?

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की आज 28वीं पुण्यतिथि है। गाँधी परिवार के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी समेत अन्य पार्टी नेताओं ने वीरभूमि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी। प्रधानमंत्री मोदी ने भी उन्हें श्रद्धांजलि देते हुए ट्वीट किया, “पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को उनकी पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि।”

एक तरफ जहाँ देश राजीव गाँधी की हत्या का शोक मना रहा है और उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है, वहीं उन 20 लोगों को पूरी तरह से भुला दिया जिन्होंने श्रीपेरंबदुर विस्फोट में अपनी जान गँवाई थी। जब-जब राजीव गाँधी के हत्यारों को माफ़ करने की बात सामने आती है, तो उन 20 लोगों को क्यों भुला दिया जाता है जिनके नाम के आगे गाँधी नहीं लगा हुआ था? चाहे सोनिया हों या प्रियंका गाँधी वाड्रा, आखिर किस हैसियत से ये लोग उन हत्यारों को रिहा करने या उनकी सजा कम करने की बात करती हैं? क्या ये हत्यारे सिर्फ राजीव गाँधी के हत्यारे थे? या इन्होंने अन्य 20 परिवारों से भी ऐसा करने की अनुमति ले रखी है? अगर नहीं तो कानून को अपना काम करने देना चाहिए और ऐसे मार्मिक मुद्दों पर राजनीति से बचना चाहिए।

हिन्दुस्तान टाइम्स – 22 मई 1991

राजीव गाँधी पहले देश के प्रधानमंत्री थे बाद में पिता या पति – शुद्ध राजनैतिक सिद्धांत यही कहता है। वह जनता के प्रतिनिधियों के प्रतिनिधि थे और उनकी हत्या की माफ़ी का अधिकार किसी को भी नहीं। वस्तुतः किसी भी नागरिक की हत्या की माफी का अधिकार किसी को भी नहीं है। इसलिए देश के 20 आम नागरिक जो उस हादसे की भेंट चढ़ गए थे, उन्हें इस तरह भुला देना कहीं से भी न्यायसंगत नहीं। राजनीतिक रोटियाँ सेंकने के लिए आप उनके शोक-संतप्त परिवारों की भावनाओं से नहीं खेल सकते।

राजीव गाँधी का संबंध राजनीतिक घराने से था और वर्चस्व राजनीति से। शायद इसलिए हर साल उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाती है। लेकिन वो 20 लोग आम नागरिक होने ज़्यादा शायद कुछ नहीं थे, इसलिए उन्हें श्रद्धाजंलि देना तो छेड़िए, उनके हत्यारों तक को माफ करने की बात चलती है, माफ कर भी दिया जाता है, विधानसभा से राज्यपाल को चिट्ठी लिखी जाती है लेकिन लगातार हार से परेशान कॉन्ग्रेस तमिलनाडु में जीत (भले ही सहयोगियों द्वारा) का स्वर सुनने में व्यस्त है। विरोध करे भी तो कैसे करे! विरोध मतलब एक मजबूत दिख रहे सहयोगी का चला जाना।

गाँधी परिवार के लिए हो सके राजीव गाँधी को खोने का दर्द हो (और होना भी चाहिए) लेकिन उन्हें यह कतई नहीं मानना चाहिए कि उन 20 लोगों के परिवार का दर्द, गाँधी परिवार के दर्द से कुछ कम है। वो बात अलग है कि उन परिवारों का दर्द कभी सामने नहीं आ सका क्योंकि उन्हें अपना दर्द साझा करने के लिए आज तक कोई राजनीतिक मंच ही नहीं मिला। इसलिए गाँधी परिवार को हत्या और हत्यारों की माफी पर राजनीति नहीं करनी चाहिए।

गाँधी परिवार को कम से कम ऑल इंडिया कॉन्ग्रेस कमिटी के प्रवक्ता अमेरिकाई वी नारायणन को जरूर पढ़ना चाहिए। 14 जून 2018 को उन्होंने टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए एक आर्टिकल लिखा था। इस लेख में उन्होंने भी राजीव के साथ-साथ मरने वाले अन्य लोगों के परिवार वालों की भावनाओं का सम्मान करने की बात करते हुए सजा माफी पर आपत्ति जताई थी।

मध्य प्रदेश के बाद अब कर्नाटक सरकार पर भी संकट के बादल, राहुल गाँधी ने की बैठक

लोकसभा चुनाव ख़त्म होने के साथ ही विभिन्न न्यूज़ चैनलों द्वारा एग्जिट पोल्स किए गए और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाला राजग अधिकांश एग्जिट पोल्स में बहुमत का आँकड़ा पार करता दिख रहा है। मोदी लहर का असर अब भोपाल और बंगलौर के राजनीतिक गलियारों तक पहुँच गया है। दोनों राजधानियों में सियासी पारा उच्च स्तर पर पहुँच गया है। इन राज्यों में सत्ता पर काबिज कॉन्ग्रेस पार्टी के पास ख़ुद के दम पर बहुमत का आँकड़ा नहीं है और सहयोगियों के भरोसे सरकार चल रही है। जहाँ कर्नाटक में भाजपा को रोकने के लिए कॉन्ग्रेस ने अपने से काफ़ी कम विधायकों वाली पार्टी जेडीएस को मुख्यमंत्री पद सौंपा हुआ है, मध्य प्रदेश में बसपा और निर्दलीयों की मदद से कॉन्ग्रेस की सरकार चल रही है।

एग्जिट पोल्स के अनुसार, कर्नाटक में कॉन्ग्रेस-जेडीएस गठबंधन एक बड़ी हार की तरफ बढ़ रहा है। राज्य में 28 लोकसभा सीटें हैं और अधिकतर एग्जिट पोल्स में भाजपा 20 का आँकड़ा पार करती दिख रही है। राज्य की विधानसभा में भी 104 विधायकों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी है और 78 विधायकों के साथ दुसरे नंबर की पार्टी कॉन्ग्रेस उससे काफ़ी पीछे है। लोकसभा चुनाव के परिणाम अगर एग्जिट पोल्स के अनुसार आते हैं, फिर राज्य में अधिकांश लोकसभा और विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्ज़ा होने के कारण गठबंधन के लिए सरकार चलाना बहुत मुश्किल हो जाएगा।

एक वरिष्ठ कॉन्ग्रेस नेता ने कहा कि कर्नाटक गठबंधन का पहला लक्ष्य अधिकतम लोकसभा सीट जीतने का था लेकिन अब यह लक्ष्य फेल होता दिख रहा है, ऐसे में गठबंधन को जारी रखने में कोई भलाई नहीं है। कर्नाटक कॉन्ग्रेस की कलह सतह पर न आ जाए, इस डर से पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गाँधी ने पहले ही राज्य के नेताओं को गठबंधन बचाए रखने की नसीहत दे डाली है। इंडिया टुडे-एक्सिस के एग्जिट पोल की मानें तो भाजपा राज्य में 23 से 25 लोकसभा सीटें जीत सकती है, जबकि कॉन्ग्रेस को 3 से 5 सीटों के साथ संतोष करना पड़ेगा।

उधर मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता गोपाल भार्गव ने राज्यपाल को पत्र लिख कर कमलनाथ सरकार को विधानसभा में बहुमत साबित करने की माँग की है। राज्य में 114 विधायकों वाली कॉन्ग्रेस और 109 विधायकों वाली भाजपा के बीच ज्यादा गैप नहीं है और कमलनाथ सरकार को समर्थन दे रहे कई अन्य विधायकों ने नाराज़गी जताते हुए लोकसभा चुनाव का परिणाम आने के बाद अपना रुख स्पष्ट करने की बात कही है। मध्य प्रदेश सरकार 6 महीने पूरे हुए हैं, कर्नाटक में 1 वर्ष से कॉन्ग्रेस-जेडीएस की सरकार चल रही है। मार्च में कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा ने कहा था कि अगर उनकी पार्टी को राज्य में 22 लोकसभा सीटें आ जाती हैं तो वो 24 घंटे के भीतर मुख्यमंत्री बन जाएँगे।

कर्नाटक के कई कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ दिल्ली में राहुल गाँधी की बैठक भी हुई, जिसमें चुनाव परिणाम के बाद के हालातों से निपटने के तरीकों पर चर्चा की गई। मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने तो एग्जिट पोल्स के लिए भी ईवीएम पर अपना गुस्सा निकाला। मध्य प्रदेश में भाजपा को उम्मीद है कि कॉन्ग्रेस के कुछ विधायक नाराज़ होकर कमलनाथ के पक्ष में वोट नहीं करेंगे और सपा-बसपा के विधायक भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। ऐसी स्थिति से बचने के लिए कॉन्ग्रेस द्वारा जल्द ही मंत्रिमंडल विस्तार किए जाने की बातें सामने आ रही हैं।

देश की जनता पर है स्वरा भास्कर को शक, और बातें लोकतंत्र बचाने की करती हैं…

लगभग सभी न्यूज चैनल्स के एग्जिट पोल पर एनडीए के समर्थन में पूर्वानुमान देखकर मोदी विरोधियों के सुर बदलने लगे हैं। जो लोग कल तक इस बात का शोर मचा रहे थे कि इन लोकसभा चुनावों में जनता मोदी सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकेगी, वही लोग अब अपनी पिछली बातों को सही साबित करने के लिए तरह-तरह की उलाहनाएँ दे रहे हैं। इसी सूची में फिल्म जगत का एक जाना-माना चेहरा स्वरा भास्कर भी शामिल हैं।

यूँ तो आपने चुनावी माहौल में स्वरा को पिछले दिनों उनके ‘दोस्त’ कन्हैया कुमार के समर्थन में प्रचार करते देखा होगा। इसके अलावा आम आदमी पार्टी के उम्मीदवारों की रैली में शामिल होते देखा होगा या फिर लोगों के पोस्ट पर जाकर मोदी के लिए वोट न देने की अपील करते देखा होगा। लेकिन एग्जिट पोल आने के बाद आप स्वरा को नहीं बल्कि उनका एक नया ट्वीट देखिए! जिसमें उन्होंने किसी द्वेपान मित्रा का ट्वीट रिट्वीट करते हुए “BASICALLY…” लिखा है। द्वेपान के मुताबिक अगर लोकसभा की 543 सीटों पर भी भाजपा जीत जाती है, तब भी यह पार्टी कट्टर ही रहेगी, धर्मांध ही रहेगी। और स्वरा ने इसे शेयर करके इस बात पर अपनी सहमति जताई है।

इस ट्वीट पर स्वरा ने ‘बेसिकली’ लिखकर जहाँ भाजपा के ख़िलाफ़ अपनी कुंठा व्यक्त की, वहीं इस एक शब्द ने स्वरा और उनकी ‘क्रांतिकारी’ सोच पर सवालिया निशान लगा दिए। द्वेपान के इस ट्वीट को शेयर करके वो खुद ही अपनी बातोंं में फँस गईं। एक ओर जहाँ वो जनता के बीच जाकर लोकतंत्र और देश को बचाने की बातें करती रहीं, वहीं इस पोस्ट में वो देश की जनता पर अप्रत्यक्ष रूप से उंगली उठाती दिखीं। उन्होंने 543 सीटों पर भाजपा के आने की एक कल्पना की और कहा अगर ऐसा होता भी है तो भी वो पार्टी एक कट्टर पार्टी ही रहेगी। स्वरा की इस आभासी कल्पना का क्या मतलब है?

इसका मतलब है कि एक उनके विचारों के आगे देश की करोड़ों जनता का मत बेकार है। इसका यही पर्याय है कि सिर्फ एक वो ही सेकुलर देश की नागरिक हैं और बाकी सब भाजपा जैसी ‘कट्टर’ पार्टी के अधीन हैं। उनके कहने का क्या मतलब है कि अगर भाजपा को जनता 543 सीट देकर लोकसभा पहुँचाती है तो जनता बेवकूफ़ है! क्या नागरिक अपने मताधिकारों का प्रयोग देश में कट्टरता फैलाने के लिहाज़ से करेंगे?

सोचिए, भाजपा का हिंदूवादी चेहरा देखकर स्वरा को देश में कट्टरता पसरने का डर सताता रहता है! तब तो कन्हैया के जीतने पर हिन्दुओं को अपने धर्म पर खतरा मंडराता दिखना चाहिए! अगर पार्टी और व्यक्ति को विचारधारा से आँका और परखा जाता है तो कन्हैया तो कम्युनिस्ट हैं, हम कैसे मान लें कि कल को देश के उच्च पद पर आसीन होने के बाद कन्हैया इस बात पर जोर नहीं देंगे कि सबको कम्युनिस्ट होना पड़ेगा? कैसे मान लें कि वो ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ जैसे नारे कथित तौर पर दोबारा नहीं लगाएँगे, कैसे यकीन करें कि ऐसा शख्स देश की अखंडता को बचाए रखेगा जो अपनी बात पर ही कायम न रह पाया हो…

स्वरा ने अपने इस ट्वीट से केवल यह बताया है कि वो न चाहते हुए भी जानने-समझने लगी हैं कि देश मोदी के नेतृत्व में भाजपा को ही सत्ता में चाहता है, बल्कि इस बात को भी बताया है कि वो देश की जनता और उनके फैसलों के बारे में क्या सोचती हैं। देश की जनता ने स्वरा का हमेशा साथ दिया है, उनके काम की प्रशंसा की है। उनके नारीवादी जज्बे को सराहाया है। उसके बावजूद बिना सोचे-समझे ऐसा कमेंट उनकी सोच और समझ पर दूसरों को उन पर उँगली उठाने का मौक़ा देता है। ट्वीट कीजिए! लेकिन सोच समझकर। आपको पढ़ने-सुनने वाले लोग बहुत हैं, उसका गलत इस्तेमाल करेंगे तो यूजर्स ट्रोल करेंगे ही।