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श्री लंका: गर्भवती फातिमा ने खुद को बच्चों सहित उड़ाया

श्री लंका को जेहादी झटके लगने बंद नहीं हो रहे हैं। ईस्टर के बम धमाकों में मरने वालों की बढ़ती संख्या के बीच आत्मघाती हमलावरों में से एक की गर्भवती बीवी ने गिरफ़्तारी से बचने के लिए खुद को बम से उड़ा लिया। वह भी अपने दो बच्चों के साथ। उसके इस हमले में श्री लंका पुलिस के तीन अफसरों को भी अपनी जान गँवानी पड़ी है। वह तीनों आत्मघाती हमलावरों में से दो भाइयों के घर छापा मारने पहुँचे श्री लंका पुलिस के दल का हिस्सा थे।

इंसाफ-इल्हाम इब्राहीम थे धमाकों के मास्टरमाइंड

अब तक आई ख़बरों के मुताबिक श्री लंका में मसालों और ताँबे का व्यापार करने वाले व्यापारी घराने के ये दो भाई ‘गरीब/अनपढ़’ आतंकवादी की छवि के बिलकुल उलट थे। इनमें से इल्हाम तो खुल कर अपनी कट्टरता का प्रदर्शन करता था- यहाँ तक कि वह स्थानीय कट्टरपंथी संगठन नेशनल तौहीद जमात की मीटिंगों में खुल कर हिस्सा लेता था। मगर इंसाफ इब्राहीम अपने आपको उदारवादी दिखाता था। अपने ताँबा कारखाने के कर्मचारियों और अन्य गरीब लोगों की भी भरपूर मदद करता था। धमाकों के केंद्रबिंदु माने जा रहे इन भाइयों के पिता मोहम्मद इब्राहीम को श्री लंका पुलिस ने पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया है।

‘नैरेटिव-बाजी’ से बाज नहीं आ रहा मीडिया  

चरम-वामपंथी वैचारिकता से ग्रसित मुख्यधारा का मीडिया यहाँ भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। श्री लंका धमाकों के मृतकों, घायलों और पीड़ितों की बजाय वह लोगों का ध्यान बाँटने के लिए मुद्दे खोज रहा है। आप किसी भी मुख्यधारा के मीडियाहाउस की कवरेज खोल कर पढ़ेंगे तो लंबे-चौड़े लेखों में शायद 40% भी पीड़ितों के लिए नहीं छोड़ा है। उनके लेख धमाकों की सोशियोलोजी नापने, धमाकों के बाद ‘लोगों के गुस्से से सहमे (बेचारे?) मुस्लिम समाज’ के प्रति सहानुभूति जताने, इन हमलों की गंभीरता कम कर के दिखाने जैसे मुद्दों से भरे पड़े हैं। यहाँ तक कि और कुछ नहीं मिल रहा तो यही शिगूफा छेड़ा जा रहा है कि कैसे श्री लंका में लगे आपातकाल से वहाँ ‘नागरिक अधिकारों के हनन की संभावना’ है।

शासन का ‘नमो’काल: 2014 में प्रधान सेवक से 2019 तक चौकीदार बनने की यात्रा

पूर्ण बहुमत की सरकार को पाँच साल पूरा हुआ। इन पाँच वर्षों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने प्रधान सेवक से चौकीदार तक की यात्रा तय की है। ऐसे में उस समय की कुछ मजेदार बातें याद आती हैं जब नरेंद्र मोदी भाजपा की तरफ से लोकसभा के प्रत्याशी बनाए गए थे। सन 2014 जैसा चुनाव का मौसम मैंने कभी नहीं देखा था। और यदि बड़े-बूढ़ों की मानें तो इंदिरा गाँधी के बाद देश ने भी किसी नेता के प्रति ऐसी दीवानगी पहली बार देखी थी। वह दिन था 24 अप्रैल 2014 जब नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट से नामांकन भरा था।

आम चुनाव के उस मौसम में बनारस मीडिया वालों से अटा पड़ा था। सड़कों पर केवल बड़े-बड़े ओबी वैन दिखाई पड़ते थे और उनसे भी बड़े पत्रकार यूँ ही टहलते मिल जाते थे। नगर में सड़कों की वास्तविक चौड़ाई नज़र आने लगी थी। एक न्यूज़ चैनल का ड्रोन कैमरा देख कर कुछ लोग छोटा हेलीकॉप्टर समझ रहे थे। चौराहे के आसपास ‘मोदी’ चाय के साथ ‘मोदी’ लस्सी भी बिक रही थी। न जाने कितने वर्षों के बाद किसी भावी प्रधानमंत्री ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सामने खड़े महामना के सामने शीश झुकाया था।

सन 2014 में देश में एक करिश्माई व्यक्तित्व उभरा था। बनारस से बहुत दूर गुजरात में। मज़बूत कद काठी और दमदार जन संवाद की शैली उस व्यक्ति की विशेषता थी। वह एक बेहद शक्तिशाली इंसान था। बनारस आने पर उन्होंने कहा था, “सोमनाथ की धरती से विश्वनाथ की धरती पर आया हूँ।” यह ताक़त उधार की नहीं थी। मेरी समझ से नरेंद्र मोदी अंतःकरण से शक्तिशाली हैं। उन्हें नियंत्रण, संकर्षण और समर्पण में नियमन के साथ संतुलन कैसे और कितना रखना है इसका भरपूर ज्ञान है।

पाँच वर्ष पहले नरेंद्र मोदी के चुनावी नामांकन वाले दिन स्थिति ऐसी थी कि जिस चौराहे से विवेकानंद की मूर्ति तक जाने में साधारण ट्रैफिक में मात्र पाँच मिनट लगते हैं उस दूरी को तय करने में मोदी के काफिले को 2 घंटे से अधिक समय लगा था। शहनाई के उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के परिवारवालों को नरेंद्र मोदी का प्रस्तावक बनने का निमंत्रण दिया गया था जिसे उस समय उस्ताद के पुत्र और पोते द्वारा ठुकरा दिया गया था। इसके बाद महामना मालवीय जी के पोते गिरिधर मालवीय और प्रख्यात संगीतकार छन्नूलाल मिश्र नरेंद्र मोदी के प्रस्तावक बने थे। शायद इस वर्ष उस्ताद के पोते और बेटे को अपनी गलती का एहसास हुआ और उन्होंने इस बार ‘प्रधानमंत्री’ नरेंद्र मोदी का प्रस्तावक बनने की इच्छा जताई है।   

नरेंद्र मोदी द्वारा नामांकन भरने के बाद राहुल गाँधी बनारस में रोड शो करने आए थे तब एक हास्यास्पद बात हुई। अस्सी क्षेत्र में कांग्रेस के दिग्गज नेता मोहन प्रकाश का पुश्तैनी घर है। राहुल का छोटा सा रेला उधर से गुजरने वाला था। रोड शो से एक दिन पहले मोहन प्रकाश के घर से 10 घर आगे और 10 घर पीछे हर घर में कॉन्ग्रेस का झंडा लगा दिया गया था। मजेदार बात यह थी पूरे शहर में सिर्फ यही 20-21 घर थे जहाँ खाँटी भाजपाई वोटरों के घरों पर कॉन्ग्रेस का झंडा लगा था। राहुल के जाने के बाद लोगों ने अगले दिन फिर से भाजपा का झंडा लगा लिया था।

वाराणसी में प्रत्याशी के रूप में नामांकन भरने के बाद चुनाव जीतकर जब नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तब उन्होंने कुछ ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किए जो उन्हें विशिष्ट बनाते हैं। एक बार प्रधानमंत्री ने संसद की कैंटीन में खाना खाया और ₹29 स्वयं अपनी जेब से भुगतान किया। ऐसी बहुत सी चीज़ें हैं जो उन्हें कुछ अलग बनाती हैं। पुराने ज़माने में अटल जी जैसे नेता और सांसद अपने निवास से संसद तक पैदल चल कर चले जाते थे और ये कोई बहुत बड़ी बात नहीं होती थी। लेकिन आज के समय में कोई व्यक्ति प्रधानमंत्री बनने के बाद जब पहली बार संसद जाए और चौखट पर शीश नवाए तो यह कोई छोटी बात नहीं समझी जानी चाहिए। हमारी पीढ़ी के कुछ लोग आश्चर्यचकित रह गए थे जब नरेंद्र मोदी ने संसद की दहलीज पर सर झुका कर भारत के प्रजातंत्र को नमन किया था।   

जिस दिन नरेंद्र मोदी को सांसद दल का नेता चुना जाना था उस दिन अपने भाषण में उन्होंने दक्षिण की किसी पार्टी के एक सांसद की पत्नी के काम को बहुत सराहा था। उस पार्टी का नाम तक किसी ने नहीं सुना था और राजग (NDA) में उस पार्टी का एक ही सांसद है। जहाँ गठबंधन में 315 से अधिक का आँकड़ा हो वहाँ एक के काम को महत्व देना बड़ी बात थी। इसके अलावा उसी दिन नरेंद्र मोदी ने 5000 चुनावी रैलियों में से एक रैली को याद किया जो नहीं हो सकी थी क्योंकि भाजपा के किसी स्थानीय जिला अध्यक्ष की मृत्यु हो गयी थी। अपने संगठन में नीचे से ऊपर तक सबकी खबर रखना नरेंद्र मोदी की कई खूबियों में से एक है।

जब नरेंद्र मोदी अस्सी घाट की सफाई करने बनारस आये थे तो जिस सहजता से उन्होंने एनजीओ के मालिक से बात की थी वह देख कर शहर के लोग आश्चर्य में पड़ गए थे। दूसरी बार प्रधानमंत्री ने बड़ी तन्मयता से फावड़ा चला कर कई मिनट तक सफाई की थी। उनके बगल में खड़ा बनारस का मेयर काठ की तरह खड़ा था। उन्होंने उससे मिट्टी हटाने को कहा तब उसने फावड़ा उठाया। उसके बाद नरेंद्र मोदी आए तो अस्सी पर ही एक गली की बहुत दूर तक सफाई की थी। बाहरी लोग नहीं जानते हैं उस गली में लोग पेशाब करते थे।

उस दिन मुझे अपने नगर के लोगों पर बड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई थी। एक बार अपनी वाराणसी यात्रा में नरेंद्र मोदी माता आनंदमयी अस्पताल गए थे जो बहुत छोटा सा अस्पताल है। वहाँ ₹10-20 में अच्छे डॉक्टर मिल जाते हैं। वह कोई नामी गिरामी आधुनिक सुविधाओं युक्त बड़ा अस्पताल नहीं है। फिर भी प्रधानमंत्री बनने के बाद नरेंद्र मोदी वहाँ इसलिए गए थे क्योंकि कई साल पहले एक बार किसी क्षेत्र में संघ के प्रचारक के तौर पर जब उन्हें और उनके साथियों को बड़ी भूख लगी थी तब माता आनंदमयी के आश्रम में उन्हें भोजन मिला था। इतने बड़े पद पर पहुँच कर इतनी पुरानी बात याद रखना अचंभे में डालती है।

नवंबर 2014 में सांसद आदर्श ग्राम योजना के अंतर्गत गाँव को गोद लेने जब प्रधानमंत्री वाराणसी के जयापुर गाँव गए थे तो उन्होंने गाँव की ग्राम प्रधान के लिए स्वयं उठकर माइक नीचे कर दिया था और वो भी बहुत सहज भाव से। ध्यान रहे की ग्राम प्रधान भारतीय शासन व्यवस्था में सबसे नीचे का पद होता है और प्रधानमंत्री सबसे ऊंचा ओहदा। यानी शासन व्यवस्था (Governance) में सबसे ऊँचे पद पर बैठे व्यक्ति का समन्वय सबसे निचले स्तर पर बैठे व्यक्ति से इस तरह से हो सकता है यह दिखाकर नरेंद्र मोदी ने एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत किया था। उस महिला ग्राम प्रधान ने बाद में कहा की मैं इस दिन को जीवन भर नहीं भूल सकती।

2014 चुनाव से पहले लोग कहते थे कि नरेंद्र मोदी आएगा तो मुस्लिमों का जीना दूभर हो जाएगा। मुझे याद है मार्च 2017 में जब बनारस में रोड शो हुआ था तब प्रधानमंत्री ने मुस्लिम मोहल्ले में अपना काफिला रुकवाकर एक व्यक्ति से द्वारा दिया गया शॉल स्वीकार किया और उसे माथे पर रखा था। दाउदी बोहरा समुदाय हो या साईं बाबा को मानने वाले, सभी की आस्था को एक आदर्श नेता और स्टेट्समैन की भाँति नरेंद्र मोदी ने सर माथे लगाया।  

नरेंद्र मोदी ने अपने कार्यकाल में भारत के लोगों को ही नहीं विदेशी राष्ट्राध्यक्षों को भी गले लगाया है। वो चाहे ओबामा हों, पुतिन, शिंज़ो आबे या बेन्जामिन नेतान्याहू। यह वही नरेंद्र मोदी थे जिन्हें कॉन्ग्रेस के आनंद शर्मा ने कहा था कि उन्हें जिओपॉलिटिक्स, डिप्लोमेसी और अंतरराष्ट्रीय राजनीति की समझ नहीं है। पिछले महीने (मार्च 2019) ही इस्राएल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने वॉशिंगटन में दिए अपने व्याख्यान में इस्राएल की तकनीक के गुण गाए और नरेंद्र मोदी को अपना ‘मित्र’ संबोधित करते हुए कहा कि आज गुजरात के किसानों के खेतों की पैदावार में इस्राएली तकनीक के कारण उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

लगभग हर महत्वपूर्ण देश में जाकर मोदी ने प्रवासी भारतवासियों से भारत माता की जय के नारे लगवाकर सॉफ्ट डिप्लोमेसी का बेहतरीन उदाहरण प्रस्तुत किया। जब हम भारत में टीवी के सामने बैठकर प्रवासी भारतीयों को मातृभूमि की जय बोलते सुनते थे तो सहसा विश्वास नहीं होता था। यह अकल्पनीय बात थी क्योंकि भारत के आर्थिक-राजनैतिक तंत्र ने हमें हमेशा ही ‘अमेरिकन ड्रीम’ को जीना सिखाया था। नरेंद्र मोदी ने एक झटके में उसे एक ‘ग्रेट इंडियन ड्रीम’ में परिवर्तित कर दिया था।

एक प्रधानमंत्री के रूप में मोदी की पाकिस्तान नीति राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण है ही, जनता की सोच में भी ऐसा परिवर्तन हुआ जो कई दशकों से नहीं देखा गया था। पाकिस्तान पर सर्जिकल और एयर स्ट्राइक के विकल्प अटल जी और मनमोहन सिंह के समय भी थे। किसी चीज की कमी थी तो वह था ‘नेशनल कनसेन्सस।’ किसी भी मुद्दे पर राष्ट्रीय सहमति होना आवश्यक है जो किसी भी सरकार से वह करवा सकती है जो अन्यथा संभव नहीं होता।

यही लोकतंत्र की शक्ति है। नरेंद्र मोदी ने इस शक्ति को पहचाना और जनता के आक्रोश को सेना के मनोबल में बदल दिया। जब कन्हैया कुमार ने सेना पर लांछन लगाए थे तब सोशल मीडिया पर लोगों ने अपनी डीपी में सेना के चित्र लगाकर जवाब दिया था। लेकिन जब एयर स्ट्राइक की गई तब जनता ने वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल का चित्र लगाकर पाकिस्तान पर की गई दंडात्मक कार्यवाही का स्वागत किया। यह अनोखा बदलाव था क्योंकि देश ने 1971 के बाद वायुसेना का पराक्रम देखा ही नहीं था। एयर स्ट्राइक ने देश को वायुसेना से अभिनंदन नामक एक हीरो दिया।   

नरेंद्र मोदी कार्यकाल की आलोचना, विवेचना अपनी जगह है। देश के विकास की योजनाओं का मूल्यांकन भी समय करेगा ही लेकिन नरेंद्र मोदी ने देश के जनमानस के मन पर एक छाप जरुर छोड़ी है। भविष्य में जब कभी नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं रहेंगे तब लोग इतना ज़रूर कहेंगे की शासन तंत्र के तंतुओं को अलग तरीके से बुनने वाला एक ऐसा नेता भी था।

J&K के किश्तवाड़ में तिरंगा फहराने के लिए भारतीय छात्रों को करना पड़ रहा है आन्दोलन

जम्मू-कश्मीर राज्य भारत-विरोधी ताकतों के चंगुल में किस कदर फँसता चला जा रहा है, इसका जीता-जागता उदाहरण किसी को देखना हो तो जम्मू के किश्तवाड़ में चले जाना चाहिए। सरकारी डिग्री कॉलेज में छात्रों को देश का राष्ट्रीय झंडा फहराने के लिए आंदोलनरत होना पड़ रहा है। एएनआई के ट्वीट के मुताबिक छात्रों ने उन्हें पत्र लिखकर दो दिन के भीतर झंडा फहराए जाने की माँग की। इसपर उन्होंने कहा कि ‘नियमों के दायरे के भीतर’ इसके लिए कार्रवाई की जाएगी। सवाल है कि देश के अन्दर राष्ट्रीय झंडा फहराने के लिए किसी अनुमति की आवश्यकता ही क्यों हो?

‘बाहरी लोग’ लगा रहे ‘आग’, पुलिस से कर दी है शिकायत: प्रिंसिपल

इस बीच कॉलेज के प्रिंसिपल पवन कुमार ने यह भी कहा कि भारत का झंडा फहराने की माँग की घटना पहली बार हो रही है। उन्हें यह माँग लिखित में दो दिन पहले मंगलवार को ही प्राप्त हो गई थी। बुधवार को हुए विरोध प्रदर्शन के बारे में उनका आरोप है कि यह कुछ बाहरियों का काम है, जो छात्रों को भड़का रहे हैं, उन्होंने यह भी जोड़ा कि उन्होंने पुलिस को बाहरियों को यथासंभव ढूँढ़ निकालने के लिए इत्तला दे दी है

कुटाई की खबरों के बाद लौटा ‘आत्ममुग्ध बौना’, लोगों ने ‘जग्गा जासूस’ बनकर तलाशे घूँसों के निशान

आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल काफी दिनों से गायब चलने के बाद आज लोकसभा चुनाव 2019 के लिए आम आदमी पार्टी का घोषणापत्र रिलीज करते हुए नजर आए। अरविन्द केजरीवाल कुछ दिनों से गायब चल रहे थे, यहाँ तक कि वो अपने ही पार्टी के नेताओं के नामांकन के दौरान भी नदारद रहे।

2 दिन पहले ही सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी के बागी विधायक द्वारा यह खबर भी वायरल की गई थी कि आम आदमी पार्टी के विधायकों ने अपनी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल का लप्पड़ और घूँसों से मार-मारकर मोर बना डाला।

हालाँकि, इस दावे की वास्तविकता की अभी तक पुष्टि नहीं हो पाई है, फिर भी ट्विटर यूज़र्स ने ये जिम्मेदारी अपने कन्धों पर लेते हुए खुद जानने की कोशिश की है कि अरविन्द केजरीवाल के चेहरे पर मार-पीट के निशान हैं या नहीं? सोशल मीडिया यूज़र्स ने लिखा है कि केजरीवाल की नाक पकौड़े जैसी फूली-फूली लग रही है और सूजी हुई नजर आ रही है, इसका मतलब है कि सच में उन्हें तबीयत से कूटा गया है।

एक अन्य ट्विटर यूज़र ने केजरीवाल की ‘पहले और बाद’ (Before and After Images) की तस्वीरों के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि जब अरविन्द केजरीवाल गायब हुए, उस दिन वो कैसे दिख रहे थे और वापस दोबारा नजर आने पर वो कैसे दिख रहे हैं।

ट्विटर यूज़र्स इतने पर ही नहीं रुके, एक कदम आगे जाते हुए उन्होंने आम आदमी पार्टी अध्यक्ष अरविन्द केजरीवाल के चश्मे तक की समीक्षा कर डाली और बताया कि उनके चश्मे का फ्रेम बदला-बदला नजर आ रहा है। इसके साथ उन्होंने आशंका जताई कि शायद चेहरे पर मुक्का पड़ने के कारण उनका चश्मा टूटा हो, जैसा कि AAP विधायक कपिल शर्मा ने दावा किया था।

वहीं कुछ ऐसे भी लोग हैं, जिन्होंने अरविन्द केजरीवाल जी के वापस सकुशल नजर आने पर ख़ुशी प्रकट की है। अभी तक भी अरविन्द केजरीवाल के साथ हुई इस कथित मार-कुटाई की घोषणा नहीं हुई है लेकिन, मीडिया और चर्चा से अचानक से उनके गायब हो जाने की वजह से उनके समर्थकों को उनकी चिंता जरूर थी।

स्पष्टीकरण होना अभी बाकी है लेकिन, इस प्रकार की मारपीट की घटनाओं को मजाक के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए। भले ही सच्चाई यह है कि सोशल मीडिया पर हर दूसरी खबर लोगों के बीच Fun और मनोरंजन का जरिया बन जाती है।

दुश्मनों से निपटने के लिए आर्मी बनाएगी 4 सुरंगे, रखे जाएँगे गोले-बारूद

कई सालों से आर्मी अपना गोला-बारूद सुरक्षित रखने के लिए सुरंग बनाने की कोशिशों में जुटी हुई थी, जो कि अब जल्द ही बनने वाली है। आर्मी NHPC (नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन) की मदद से ये सुरंग बनाएगी। इस संबंध में गुरुवार (अप्रैल 25,2019) को आर्मी और एनएचपीसी ने एक एमओयू (समझौता ज्ञापन) पर हस्ताक्षर किए हैं।

बता दें कि सेना लंबे समय से पाक और चीन बॉर्डर के समीप गोला बारूद रखने के लिए सुरंग तैयार करने के लिए प्रयासरत थी, लेकिन सेना के पास इसे बनाने की विशेषज्ञता नहीं थी। जब टनल बनाने की कोशिशें शुरू हुईं तो कभी सीलन की दिक्कत आई तो कभी सीपेज की। इन परेशानियों को देखते हुए सेना ने तय किया कि वे टनल बनाने में एक्सपर्ट NHPC की योग्यता का इस्तेमाल करेगी।

गत वर्ष इसे लेकर बात शुरू हुई थी, जिसके बाद NHPC ने डिटेल प्रपोजल आर्मी को दिया था। इस प्रपोजल पर ही तय हुआ कि पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर 4 टनल बनेंगी। इसके बाद बाकी टनल बनाने पर विचार होगा।

इन सुरंगों का निर्माण भारतीय सेना के ऑपरेशन की तैयारियों के तहत किया जा रहा है जिससे सेना तक हथियार और गोला बारूद पहुँचाने में भी आसानी होगी।

NHPC और आर्मी के बीच जो एमओयू साइन किया गया है उसके अनुसार इन 4 सुरंगों को बनाने की लागत 15 करोड़ रुपए आएगी। नवभारत टाइम्स में छपी खबर के मुताबिक एक सुरंग जम्मू-कश्मीर (भारत-पाकिस्तान बॉर्डर) पर और अन्य तीन सुरंगे नार्दन बॉर्डर( भारत-चीन बॉर्डर) पर बनाई जाएँगी। प्रत्येक सुरंग में करीब 200 मिट्रिक टन गोला बारूद रखा जाएगा। खबर के मुताबिक ये सुरंग दो साल में पूरी होंगी।

बता दें कि इन सुरंगों के बन जाने से आर्मी को अपना गोला-बारूद रखने की सुरक्षित जगह मिलेगी। साथ ही ये सुरंगे बारूद को दुश्मन की नज़रों से बचाएँगी। दुशमनों के सैटेलाइट भी इसे पकड़ने में अक्षम होंगे।

रोहित शेखर हत्याकांड: 3 महीने में ही मुलाक़ात, प्यार, Live In और शादी करनेवाली अपूर्वा का सच

रोहित शेखर हत्याकांड में रोज़ नए ख़ुलासे हो रहे हैं। अब जब कातिल के ऊपर से पर्दा उठ ही गया है और तस्वीर साफ़ हो गई है कि उनकी पत्नी और सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता अपूर्वा शुक्ला ने ही अपने पति का ख़ून कर दिया, हम आपको रोहित और अपूर्वा के ऐसे इतिहास से परिचय कराने जा रहे हैं, जिसके कारण आज रोहित शेखर तिवारी की जान ही चली गई। असल में उस रात जो कुछ भी हुआ, उसके बीज पूर्व में ही बोए जा चुके थे। जैसा कि हमने बताया था, रोहित ने अपनी एक रिश्तेदार महिला के साथ कार में शराब पी थी और इसी बात से अपूर्वा नाराज़ थी। अपूर्वा ने जब अपने पति रोहित शेखर को वीडियो कॉल किया तब उसे वह महिला कुमकुम गाड़ी में बैठी हुई दिखी और इसी बात को लेकर दोनों में झगड़ा हुआ। जब रोहित ने बताया कि वो और कुमकुम एक ही ग्लास से बारी-बारी शराब पी रहे थे, तो अपूर्वा ने उसका नाक, मुँह और गला दबा दिया।

रोहित और अपूर्वा के बीच झगड़ा हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गई, ये सारे प्रकरण में सिर्फ़ 80 मिनट लगे। रोहित अक्सर देर तक सोता था और इसी का फायदा उठाते हुए उसके सोने की बात कह अपूर्वा ने किसी को शक नहीं होने दिया। रोहित और अपूर्वा एक मैट्रिमोनियल साइट के जरिए मिले थे। दोनों की पहली मुलाक़ात लखनऊ में हुई थी। अपूर्वा के दिमाग पर प्रॉपर्टी का भूत सवार था और वो रोहित से सिर्फ़ इसीलिए शादी करना चाहती थी क्योंकि उसे लगता था कि उसके बाद बहुत सारी प्रॉपर्टी होगी। रोहित के पिता एनडी तिवारी उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे थे और बाद में राज्यपाल भी बने। अपूर्वा ने शादी के तुरंत बाद ही नखरे शुरू कर दिए थे। वह अपने मायके वालों के लिए रोहित से एक अलग मकान बनवाने की माँग करने लगी थी।

शादी से लिव-इन रिलेशनशिप में भी रहे थे। शादी के तुरंत बाद रिश्तों में आई कड़वाहट अपूर्वा के लिए अवसाद का कारण बनती जा रही थी। जब अपूर्वा को पता चला कि रोहित के नाम पर ज्यादा प्रॉपर्टी नहीं है तो वो मायके चली गई थी, वो भी शादी शादी के सिर्फ़ 18 दिनों बाद। परिजनों के समझाने-बुझाने के बाद वो वापस आ गई। अपूर्वा की कुछ राजनीतिक महत्वाकांक्षा भी थी। वो कॉन्ग्रेस में जगह बनाना चाहती थी और रोहित की पारिवारिक पृष्ठभूमि को सीढ़ियों की तरह इस्तेमाल करना चाहती थी। रोहित और अपूर्वा अलग-अलग कमरों में सोते थे। रोहित का ख़ुद का राजनीतिक भविष्य नहीं बन पाया, इससे अपूर्वा और नाराज़ थी। नवभारत टाइम्स के सूत्रों के अनुसार, अपूर्वा को संतान की भी चाहत थी और रोहित इसके लिए तैयार नहीं थे।

उधर रोहित शेखर की माँ ने भी अपनी बहू अपूर्वा को क्रूर बताया है। उज्ज्वला ने कहा कि अपूर्वा शादी के बाद महोनों अपने पति को छोड़ मायके में रहती थी। उज्ज्वला ने कहा कि जिस महिला के पति की बाईपास सर्जरी हुई हो और वो बार बार चली जाए, इससे पता चलता है कि वो अच्छी नहीं थी। अपूर्वा ने रोहित को कॉन्ग्रेस नेताओं से कहकर विधानसभा टिकट दिलवाने की माँग भी की थी। उज्ज्वला ने कहा कि वो अपूर्वा को बार-बार समझाती थी कि नारायण दत्त तिवारी कोई अकूत संपत्ति छोड़कर नहीं गए हैं।

इससे पहले हमने अपनी एक रिपोर्ट में बताया था कि किसी नौकर ने देखा कि रोहित की नाक से ख़ून निकल रहा था। इसकी जानकारी उनकी माँ और मैक्स अस्पताल को दी गई। पुलिस का सीधा सवाल है कि एक व्यक्ति 16 घंटे तक सोया रहता है और घर में कोई उसकी सुध भी नहीं लेता, क्यों? एक अन्य ख़बर में हमने जिक्र किया था कि कैसे सीसीटीवी फुटेज के अनुसार, रात 1:30 बजे अपूर्वा नीचे से पहली मंजिल पर स्थित रोहित के कमरे में जाते हुए दिखाई देती हैं। इसके ठीक एक घंटे बाद रात 2.30 बजे वह पहली मंजिल से भूतल पर आते दिख रही हैं। अपूर्वा बार-बार अपना बयान बदल रही थी और रोहित की माँ उज्ज्वला ने अपनी बहू पर कई आरोप लगाए थे, ये भी हमने एक अलगख़बर में बताया था।

क्या कुछ बदला है नरेंद्र मोदी द्वारा गोद लिए गाँव जयापुर में, टीवी पत्रकार ने दिखाया बदलाव

अक्सर ये सवाल किया जाता है मोदी ने क्या बदल दिया? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वाराणसी के लिए क्या किया है, ये भी पूछा जाता है। लेकिन, ज़मीन पर जाकर कोई नहीं देखना चाहता, सिर्फ़ सोशल मीडिया खोलकर मोबाइल के कीपैड के पीछे बैठे लोग उँगलियाँ तो लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त से वो काफ़ी दूर होते हैं। सीएनएन न्यूज़ 18 के पत्रकार भूपेंद्र चौबे ने इस मामले में सराहनीय कार्य किया है। उन्होंने ग्राउंड जीरो पर पहुँच कर पड़ताल की और प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गोद लिए गए गाँव जयापुर में लोगों से बातचीत भी की। इस दौरान लोगों ने जो बताया और चौबे ने जो कवरेज की, उसे आप नीचे दी गई वीडियो में देख सकते हैं। इसमें देखा जा सकता है कैसे जयापुर गाँव में महिलाओं की स्थिति भी काफ़ी सुधर गई है।

इस वीडियो में देखा जा सकता है कि भूपेंद्र चौबे सबसे पहले एक सरकार नल के पास पहुँचते है। फिर वो चेक करते हैं कि क्या नल से पानी आ भी रहा है या फिर इसे यूँ ही लगाकर छोड़ दिया गया है। जब उन्होंने नल खोला तो उसमे से धाराप्रवाह पानी निकलने लगा। ये पानी इस तरह निकल रहा था जैसे किसी प्रकार का प्रेशर दिया जा रहा हो। पास खड़े ग्रामीण ने बताया कि 24 घंटे में जब भी नल खोलो, यूँ ही पानी निकलता है। उसने यह भी बताया कि गाँव में ऐसे कई नल लगे हुए हैं। चौबे ने उस पानी को पीकर देखा, उससे चेहरा साफ़ किया। जल निगम से डायरेक्ट आने वाला ये पानी इतना साफ़ था कि आश्चर्यचकित चौबे ने कहा कि ऐसा पानी तो दिल्ली में भी आता। उन्होंने कहा कि 5 वर्ष पहले शायद ही ये संभव था।

इसके बाद चौबे एक ऐसे घर के पास पहुँचते हैं, जिसे प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत 2016-17 में बनाया गया था। उस घर की दीवाल पर कुल ख़र्च का ब्यौरा लिखा हुआ था। उस आवास को बनाने में लगी कुल लागत 1,35,750 रुपए थी। इस घर को देखकर भूपेंद्र पूछ बैठे कि एक तरफ तो ‘न्याय’ है जहाँ 72,000 देने की बात की जा रही है और दूसरी तरफ साफ़-साफ़ सबूत हैं जो दिख रहे हैं। इस घर के ऊपर मोदी-योगी का एक पोस्टर लगा है जिसमे 2022 तक सबको आवास मुहैया कराने की बात की गई है।

इसके बाद भूपेंद्र एक फैक्ट्री में पहुँचते हैं जिसे मोदी के सत्ता संभालने के बाद बनाया गया है। इसमें काम कर रही महिला बताती हैं कि वे महीने में 3-4 हज़ार रुपए यहाँ काम कर के कमा लेती हैं और काम ज्यादा कठिन भी नहीं है। सब्बसे बड़ी बात, यहाँ भूपेंद्र एक लड़की से मिलते हैं जो 12वीं की छात्रा हैं और साथ-साथ महिलाओं को प्रशिक्षित भी करती हैं, उन्हें भी इसके लिए रुपए मिलते हैं। उस लड़की की माँ भी वहीं पर कार्य करती हैं। देखा जाए तो स्किल डेवलपमेंट के क्षेत्र में काम होने से ऐसे छोटे-छोटे न जाने कितने जॉब्स क्रिएट हुए हैं जिनसे महिलाओं व ग्रामीणों को रोज़गार मिला है। ऐसे कार्यों में मेहनत कम एवं स्किल, प्रशिक्षण और दक्षता की ज़रुरत ज्यादा होती है। और सरकार इन सब के लिए कार्य कर रही है, ऐसे इस ग्राउंड रिपोर्ट में दिखता है।

भूपेंद्र को मिली महिलाओं ने बताया कि वो चाहते हैं कि नरेंद्र मोदी फिर से जीत कर प्रधानमंत्री के रूप में लौटें। इसके बाद भूपेंद्र एक आवासीय कॉलोनी ‘मोदीजी का अटल नगर’ में जाते हैं, जहाँ के रहनेवाले अधिकतर दलित हैं। यहाँ कई सारे प्राइवेट आवासीय परिसर हैं जिन्हे सरकारी मदद द्वारा बनाया गया है। इसमें दिख रही हरियाली व व्यवस्थित पेड़-पौधों को देखकर कोई भी कह दे कॉलोनियाँ तो सिर्फ़ महँगे शहरों में ही मिलती हैं। यहाँ अंदर सड़कें भी काफ़ी अच्छी है। सभी घरों को पहचान संख्याएँ दी गई है। यहाँ पार्क और गार्डन भी हैं। ये सभी अंतिम 4 वर्षों में बने हैं। ऐसा वहाँ के निवासियों ने भी बताया।

घर संख्या 1 के निवासी ने भूपेंद्र चौबे को बताया कि ये घर 5 वर्ष पहले (मोदी के आने के बाद) सरकारी रुपयों से बना। इसमें कमरा, बाथरूम, किचन वगैरह सबकुछ है। स्थानीय निवासियों ने कहा कि पक्का घर मिलने से झोंपड़ियों में रहा करते थे। वहाँ रह रहे ग्रामीणों ने साफ़ कर दिया कि दलितों का नेता कही जाने वाली मायावती ने भी उनलोगों के लिए कभी इस तरह का कुछ नहीं सोचा। उन्होंने बताया कि मोदीजी ने उसका सपना साकार किया। परिसर के अंदर डस्टबिन वगैरह की भी अच्छी व्यवस्था है।

मोदी-शाह की सत्ता में वापसी के लिए ‘केवल राहुल गाँधी’ होंगे ज़िम्मेदार: केजरीवाल

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने आज (25 अप्रैल, 2019) आम आदमी पार्टी का घोषणा-पत्र (मैनिफिस्टो) जारी कर दिया है। अपने मेनिफैस्टो में उनका सबसे पहला एजेंडा है केंद्र में मोदी-शाह की जोड़ी को सरकार बनाने से रोकना।

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने गुरुवार को कहा, “अगर मोदी सरकार सत्ता में लौटती है, तो इसके लिए ‘सिर्फ़ राहुल गाँधी’ जिम्मेदार होंगे”। इसके अलावा उन्होंने यह भी कहा कि इसके पीछे सबसे बड़ी वजह कमज़ोर विपक्ष का होना है। इसके अलावा उन्होंने कहा कि वो दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के लिए लड़ेंगे। केजरीवाल के मुताबिक़ कॉन्ग्रेस ने पिछले बुधवार को अपना फैसला सुनाया, जिसके अनुसार वो दिल्ली के अलावा किसी अन्य राज्य में AAP के साथ सीट शेयर करने में कोई दिलचस्पी नहीं रखते।

AAP पार्टी ने वर्तमान परिस्थितियों पर एक दो-पृष्ठ का नोट भी जारी किया और अंतिम घोषणा की कि किसी भी तरह का कोई गठबंधन नहीं होगा। AAP मुख्यालय में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में केजरीवाल ने बताया कि वर्तमान में जो परिस्थितियाँ है, उन पर लेख तैयार किया गया है। उन्होंने कहा कि अगर सत्ता में मोदी-शाह की वापसी होगी तो उसके लिए ‘केवल राहुल गाँधी’ ही ज़िम्मेदार होंगे। उन्होंने राहुल को यूपी, बंगाल, दिल्ली, हरियाणा, गोवा में विपक्ष के कमजोर करने का दोषी भी ठहराया।

AAP सुप्रीमो ने कहा कि पार्टी के कार्यकर्ताओं की नाराज़गी के बावजूद लोकतंत्र को बचाने के लिए वो हर संभव प्रयास कर रहे हैं। AAP पार्टी अनिवार्य रूप से कॉन्ग्रेस के भ्रष्टाचार से लड़ते हुए शुरू हुई थी। हम एक समय में कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन का सपना भी नहीं देख सकते थे। लेकिन देश में मौजूदा परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, हमने एक तरह के टाई-अप के लिए कॉन्ग्रेस से संपर्क किया। केजरीवाल ने कहा कि हमने कॉन्ग्रेस को समझाया कि मोदी-शाह को हराना क्यों महत्वपूर्ण है। और हमने सभी प्रयास किए। लेकिन वे हमारी बातों पर कोई रुचि नहीं ले रहे हैं।

कॉन्ग्रेस पर पलटवार करने का आरोप लगाते हुए केजरीवाल ने कहा कि पिछले मंगलवार को कॉन्ग्रेस के गुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी के फैसले से अवगत कराया कि वो दिल्ली और हरियाणा में गठबंधन के लिए तैयार हैं, लेकिन एक दिन के भीतर ही वो इससे मुकर गए। जानकारी के मुताबिक़, पिछले मंगलवार को लगभग 11 बजे, AAP राज्यसभा सांसद संजय सिंह को गुलाम नबी आज़ाद द्वारा उनके स्थान पर बुलाया गया था। उन्होंने कहा कि वो AAP के साथ दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ में गठबंधन करेंगे। संजय सिंह इस पर मान गए थे। इसके बाद यह निर्णय लिया गया कि अगले दिन एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर इसकी घोषणा कर दी जाएगी।

केजरीवाल ने कहा, “अगले दिन, हम इंतज़ार करते रहे। उन्होंने कुछ शर्तों को बदलते हुए शाम को हमें फोन किया। हमने नई शर्तों को भी स्वीकार कर लिया। लेकिन वो अपनी बातों से मुकर गए।”

दिल्ली के सीएम पर ‘यू-टर्न’ लेने का आरोप लगाने वाले राहुल गाँधी के ट्वीट का जिक्र करते हुए केजरीवाल ने कहा, “मैं उनसे पूछना चाहता हूँ कि दुनिया में ट्विटर पर कहाँ-कहाँ गठबंधन हुए हैं।”

केजरीवाल ने कॉन्ग्रेस पर तीखा हमला करते हुए कहा, “मैं उन सभी लोगों से अपील करता हूँ जो मोदी को पराजित देखना चाहते हैं, वो मतों को विभाजित न होने दें। कॉन्ग्रेस को हिन्दू वोट नहीं मिल रहे हैं। मुस्लिमों में भ्रम की स्थिति है। कॉन्ग्रेस देश भर में भाजपा-विरोधी गठबंधन को नुकसान पहुँचा रही है।”

इसके अलावा सीएम केजरीवाल ने कहा कि अगर कॉन्ग्रेस जीतने की स्थिति में होती, तो मैं सभी सात सीटें कॉन्ग्रेस को दे देता। इसलिए दिल्ली-विशेष गठबंधन का कोई मतलब नहीं है क्योंकि आज हम सभी सात सीटों पर भाजपा को हराने की स्थिति में हैं। प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिल्ली लोकसभा के AAP पार्टी के सभी सात उम्मीदवार भी शामिल थे।

बदले की राजनीति पर उतरी कॉन्ग्रेस, RSS से जुड़े लोगों को बर्खास्त करने की धमकी

लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहे हैं, कॉन्ग्रेस नेताओं के बयानों का स्तर गिरता ही जा रहा है। पूर्व में विदेश मंत्री जैसा महत्वपूर्ण और गरिमामय पद संभाल चुके फर्रूखाबाद के लोकसभा प्रत्याशी सलमान खुर्शीद ने सुप्रीम कोर्ट के सामने एफआईआर फाड़ देने की धमकी दी। अब राष्ट्रीय ज्ञान आयोग के अध्यक्ष रहे सैम पित्रोदा ने सरकारी संस्थानों के राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे कर्मचारियों को चेतावनी दी है। उन्होंने कहा है कि अगर कॉन्ग्रेस की सरकार बनी तो प्राथमिकता से पहला काम सरकारी संस्थाओं और संस्थानों को ‘संघ-मुक्त’ करने का किया जाएगा। इसके लिए संघ से जुड़ाव रखने वाले लोगों को पहले 100 दिन के भीतर निकाल बाहर किया जाएगा।

घोषणापत्र बाद में, संघी-निकालो अभियान पहले

कॉन्ग्रेस की घोषणापत्र समिति के सदस्य पित्रोदा के अनुसार ‘संघियों’ को निकाल बाहर करना इतना जरूरी है कि कॉन्ग्रेस का घोषणापत्र लागू करना भी उसके सामने गौण है। पहले संघियों की सफाई का काम शुरू करेगी कॉन्ग्रेस, उसके बाद अपना घोषणापत्र लागू करना शुरू करेगी। उन्होंने शिकागो के भारतीय महावाणिज्य दूतावास के बारे में आरोप लगाया कि वहाँ लोगों को दिक्कत इसलिए हो रही है क्योंकि संघ की पृष्ठभूमि से आने वाले व्यक्ति को वहाँ नियुक्त कर दिया गया था

बाकी मुद्दों के लिए समय-सीमा,अफस्पा-राष्ट्रद्रोह पर ‘मैं विशेषज्ञ नहीं’

अपनी पार्टी के घोषणापत्र के बारे में उन्होंने दावा किया कि हर मुद्दे पर किए गए वादे को पूरा करने के लिए एक समय-सीमा निश्चित की जाएगी। कुछ मुद्दों के लिए तो यह 50, 100 और 150 दिनों तक भी हो सकती है। पर जब कॉन्ग्रेस से सबसे विवादास्पद मुद्दों अफस्पा हटाने और राष्ट्रद्रोह पर ‘पुनर्विचार’ करने के बारे में पूछा गया तो पित्रोदा ने अपने को इन मामलों का विशेषज्ञ न होने का हवाला देकर पल्ला झाड़ लिया।

उन्होंने यह भी दावा किया कि कॉन्ग्रेस सरकार बनाने में सफल होगी, पर सीटों की संख्या का अनुमान लगाने से इंकार कर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि अंत में गठबंधन की जो भी तस्वीर उभरेगी, प्रधानमंत्री का निर्णय उसके भागीदार दल करेंगे।

पहले भी हो चुका है राज्य सरकारों में

पिछले साल तीन राज्यों मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान का विधानसभा चुनाव जीतने वाले कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री पहले भी ऐसा कर चुके हैं। शासन के महत्वपूर्ण पदों पर अपने करीबी अफसरों को बैठाने के लिए इन तीनों राज्यों की नवगठित कॉन्ग्रेस सरकारों ने बड़े पैमाने पर तबादले किए थे।

शशि थरूर ने भाजपा पर लगाया था नौकरशाही के राजनीतिकरण का आरोप

अपनी किताब ‘The Paradoxical Prime Minister’ में कॉन्ग्रेस के ही नेता शशि थरूर प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाते हैं कि मोदी ने गुजरात कैडर के कुछ अफसरों को केन्द्रीय काडर में बुलाकर नौकरशाही का राजनीतिकरण करने की कोशिश की है (तीसवाँ अध्याय, ‘सिविलाइज़िन्ग द सिविल सर्विसेज़?’)। यह सवाल ऐसे में लाजमी है कि अपनी पार्टी की उस नीति के बारे में शशि थरूर क्या कहना चाहेंगे जहाँ उनकी पार्टी एक सांस्कृतिक और गैर-राजनीतिक संगठन से अतीत में रहे जुड़ाव के आधार पर लोगों को हटाने की बात करती है।

CJI यौन शोषण मामले में SC का फैसला: रिटायर्ड जस्टिस पटनायक करेंगे साजिश की जाँच

बीते दिनों अपने ऊपर लगे यौन शोषण के आरोप को चीफ़ जस्टिस रंजन गोगोई ने कोर्ट के ख़िलाफ़ साजिश करार दिया था। जिसके मद्देनज़र सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए जाँच कमेटी का गठन कर दिया है। इस मामले पर जस्टिस पटनायक हलफनामे और सबूतों के आधार पर मामले की जाँच करेंगे। दिल्ली पुलिस, सीबीआई और आईबी को जस्टिस पटनायक को जाँच में सहयोग करने के लिए कहा गया है।

कोर्ट का कहना है कि प्रधान न्यायाधीश गोगोई पर लगाए गए आरोप इस जाँच से बाहर होंगे। ये कमेटी केवल साजिश की जाँच के लिए है। आजतक की ख़बर के अनुसार जस्टिस पटनायक सीलबंद लिफ़ाफे में जाँच की रिपोर्ट अदालत को सौंपेंगे।

उल्लेखनीय है कि आज गुरुवार (अप्रैल 25, 2019) की सुबह वकील उत्सव बैंस ने अतिरिक्त हलफनामा और सीलबंद सबूत अदालत को दिए। विशेष पीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनी। कोर्ट ने इस मामले में बड़ी साजिश का इशारा करते हुए कहा कि इसके पीछे बड़े और ताक़तवर लोग हो सकते हैं, लेकिन वे (साजिशकर्ता) जान लें कि वे आग से खेल रहे हैं।

इस सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके पास दस्तावेजों का निरीक्षण करने का अधिकार है। साथ ही कोर्ट ने विशेषाधिकार वाले दस्तावेजों पर अटॉर्नी जनरल से अपना कानूनी तर्क देने को भी कहा है। जिस पर अटॉरनी जनरल ने कोर्ट स्टाफ की नियुक्ति और व्यवहार के नियम बताए।

केके वेणुगोपाल (अटॉर्नी जनरल) ने इस दौरान कोर्ट में कहा कि अदालत से निलंबित हुए कर्मचारियों ने वकील से संपर्क किया था और वो प्रेस क्लब में प्रेस कॉन्फ्रेंस करना चाहते थे। उन्होंने बताया कि उत्सव के हलफनामे के अनुसार अजय उनके पास आता था और कहता था कि प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए उसे 50 लाख रुपए देगा। उत्सव द्वारा दिए हलफनामे की मानें तो अजय क्लाइंट नहीं था, लेकिन कौन था ये भी नहीं पता चल पाया।

वहीं इंदिरा जयसिंह (वरिष्ठ वकील) ने कोर्ट को दी अपनी दलीलों में कहा कि यौन उत्पीड़न के आरोप को नकारा गया है। उसकी जाँच अभी होनी है। लेकिन इसके साथ ही साजिश का भी मुद्दा जुड़ा हुआ है, इसलिए दोनों मामलों की जाँच एकसाथ होनी चाहिए।

इंदिरा की दलील पर अदालत ने कहा कि दोनों मामलों की जाँच हो रही है। इंदिरा जय सिंह ने पूछा कि बिना स्टिकर की गाड़ी सुप्रीम कोर्ट पार्किंग में कैसे आई? इसकी जाँच कराई जाए। साथ ही उत्सव की विश्वसनीयता की भी पड़ताल हो। गौरतलब है कि इंदिरा जयसिंह ने यह भी कहा है कि सरकार संस्थानों को कंट्रोल कर रही है। जैसे ही किसी बड़े विवाद का मामला हमारे पास आता है किताबें छपने लगती हैं। रिपोर्ट बनने लगती हैं।

बता दें कि इस मामले की सुनवाई न्यायाधीश अरुण मिश्रा, न्यायाधीश आर एफ नरिमन और न्यायाधीश दीपक गुप्ता की पीठ कर रही थी। एनडीटीवी इंडिया में छपी खबर के अनुसार अरूण मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की इस विशेष पीठ ने कहा कि शीर्ष न्यायालय की पीठ में ‘फिक्सिंग’ के बारे में अधिवक्ता उत्सव सिंह बैंस द्वारा दाखिल हलफनामे में लगाए गए आरोप और कुछ नामों का खुलासा बहुत ही गंभीर पहलू है।

पीठ ने कहा, “यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि अदालत को पाक-साफ रखा जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि इस तरह के आरोपों से इस संस्था की छवि धूमिल ना हो…”

मामले में जाँच का आश्वासन देते हुए पीठ ने कहा, “हम जाँच करेंगे और फिक्सरों के सक्रिय होने और न्यायपालिका के साथ हेराफेरी करने के कथित दावों की तह तक जाएँगे। यदि वे अपना काम करते रहे तो हममें से कोई भी नहीं बचेगा। इस व्यवस्था में ‘फिक्सिंग’ की कोई भूमिका नहीं है। हम इसकी जाँच करेंगे और इसे अंतिम निष्कर्ष तक ले जाएँगे।”