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‘द वायर’ के हिसाब से भारतीय हिन्दू ही आतंकी हैं जिन्होंने समुदाय विशेष पर हिंसा की है! हाउ क्यूट!

हमारे सहकर्मी ने एक लेख दिखाया जो ‘द वायर’ नामक प्रोपेगेंडा पोर्टल पर छपा था। लिखने वाले अजय गुदावर्दी (Ajay Gudavarthy) हैं, जो जेएनयू में असोसिएट प्रोफेसर हैं। मैं जेएनयू के होने भर से जज नहीं करता, क्योंकि उन्होंने जो लम्बी बकवास लिखी है, उसके हिस्सों को लेकर मैं जज करूँगा। लेख का मक़सद यह बताना है कि भारत में समुदाय विशेष को लेकर ‘फोबिया’ या ‘डर’ नहीं है, बल्कि साम्प्रदायिकता के कारण उनके ऊपर हिंसा की घटनाएँ होती हैं।

जी, आपने सही पढ़ा कि इस देश में समुदाय विशेष के ऊपर हिंसा की घटनाएँ होती हैं। यही नैरेटिव है ‘द वायर’ का। इस देश में समुदाय विशेष के ऊपर हिंसा कहाँ हुई, कब हुई, इसका कोई ब्यौरा लेखक ने देने की ज़हमत नहीं उठाई। एक जगह ज़िक्र भी किया तो वो यह कि गौरक्षकों द्वारा किए गए अपराध न तो रैंडम हैं, न एपिसोडिक (यानी रह-रह कर होने वाले), बल्कि उन्हें सत्ता का समर्थन हासिल है। ये उन्होंने अंग्रेज़ी के शब्द ‘टैसिट’ का प्रयोग करके लिख दिया, क्योंकि अंग्रेज़ी के ऐसे शब्दों से बहुत कुछ छुप जाता है, आपको साबित नहीं करना पड़ता। ‘टैसिट’ का मतलब होता है अनकहा। आप इस बात को साबित नहीं कर सकते, गुदावर्दी साहब ने भी ऐसा करने की ज़रूरत नहीं समझी।

वामपंथियों या वैसे लोग जिनके पास कहने को ज़्यादा नहीं होता, वो अक्सर किसी विदेशी लेखक का नाम ठूँस कर अपने आप को ऑथेन्टिकेट करने की कोशिश करते हैं। भारत की जनता भी सोचती है कि विदेशी लेखक को पढ़ा है इस व्यक्ति ने। जबकि उससे साबित कुछ नहीं होता सिवाय इसके कि आपके तर्क कमजोर हैं, और आपको बाहर की मदद चाहिए।

भला स्लावोज जिजेक जैसे राजनैतिक दार्शनिक का ज्ञान देकर क्या बता दिया लेखक ने? एक टर्म उन्हें अच्छा लगा, उन्हें उसका इस्तेमाल करना था, उन्होंने कर दिया और चुपके से बताया कि स्लोवाज जिजेक साहब ने इसका नामकरण किया है। इसी तरह बीच में एक जगह और एक विदेशी लेखक आ गए जिन्होंने भारत पर लिखा है।

ख़ैर, बिना कुछ काम का लिखे मैंने चार पैराग्राफ़ जाया कर दिए। यही काम जेएनयू के अजय जी ने इस लेख में किया है जहाँ वो ‘इस्लामोफोबिया’ के ‘फोबिया’ वाले हिस्से को समझाने में आधा आर्टिकल निकाल ले गए। ये बात और है कि उन्होंने अपने ही लेख के शीर्षक में इस्तेमाल शब्द ‘कम्यूनलिज्म’ को समझाने के लिए कोई कोशिश की ही नहीं। मतलब, उन्होंने लिख दिया तो हमें मान लेना चाहिए। जेएनयू के प्रोफेसर हैं, मान लीजिए।

शुरुआत ही हास्यास्पद है कि ‘समुदाय विशेष के प्रति हिंसा’! इस वाक्यांश को धीरे से ऐसे रखा गया है मानो यह बात इतनी मेनस्ट्रीम है कि आए दिन हिन्दू लोग मजहब विशेष वालों को राह चलते काट देते हैं, खुद में बम बाँध कर ‘जय श्री राम’ का नारा लगाते हुए उड़ा देते हैं, नेपाल की सीमा से घुसपैठ करते हैं, और मस्जिदों में नमाज़ पढ़ते वक्त ‘जय बजरंग बली’ कह कर लोगों को गोलियों से भून देते हैं, या फिर यह कि हिन्दुओं ने अफ़्रीका के एक द्वीप पर हिन्दू लड़ाकों की सेना बना ली है और खास मजहब वालों पर जहाँ-तहाँ कार चढ़ाने से लेकर, सुसाइड बॉम्बिंग से उड़ा दे रहे हैं।

जबकि ऐसा है नहीं। मजहब विशेष के प्रति जो हिंसा है इस देश में वो या तो दंगों में हुई है, जिसे ‘समुदाय विशेष के प्रति’ तो कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि दंगों में दो समुदाय मरते-कटते हैं, न कि सिर्फ एक। दूसरी बात, भारत के चुनिंदा दंगे ऐसे होंगे जो भाजपा कार्यकाल में हुए हैं क्योंकि नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा दंगे कॉन्ग्रेस या इनके समर्थक पार्टियों के राज्य में हुए हैं, जो खुद को सेकुलर और मजहब विशेष के हिमायती बताते थकते नहीं। सबसे बड़े दंगों का नाम लीजिए तो कॉन्ग्रेस आपको केन्द्र और राज्य दोनों में लगभग हर बार मिल जाएगी।

तो, इस लेख का मूल भाव ही एक झूठ पर आधारित है। आगे लिखने की आवश्यकता नहीं है, फिर भी प्रोपेगेंडा को काटने के लिए कीचड़ में उतरना ज़रूरी है। लेखक ने लिखा है कि हाल ही में हुई कई घटनाओं को देखने पर पता चलता है कि ऐसी घटनाएँ समुदाय विशेष को लेकर पूर्वग्रह और ‘ऐतिहासिक ज़ख़्म’ के नाम पर हुई हैं। ये किन घटनाओं की बात कर रहे हैं मुझे नहीं पता। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन एक भी हाइपरलिंक नहीं मिला जो किसी घटना/घटनाओं पर प्रकाश डाल रहा हो।

ये भी वामपंथियों की पुरानी आदत होती है। वो मान कर चलते हैं कि चूँकि उनका नाम, ‘द वायर’ जैसा प्रोपेगैंडा पोर्टल का नाम आदि है ही, तो इन पोर्टलों पर विचरने वाले प्राणी बाय डिफ़ॉल्ट हर बात को बिना सत्यापित किए ही सही मान लेंगे। ऐसा होता भी है, वरना हमारे जैसे लोगों को लिखना ही नहीं पड़ता कि भाई ये लोग बस प्रपंच फैला कर हिन्दुओं को ही आतंकवादी साबित करने पर तुले हुए हैं।

दूसरी बात, ‘हिस्टोरिकल इन्जुरी’ या ‘ऐतिहासिक ज़ख़्म’ की बात झूठ है क्या? क्या ये महज़ नैरेटिव है कि इस्लामी आक्रांताओं, लुटेरों और शासकों ने यहाँ की जनता पर हर तरह के ज़ुल्म किए जिसमें गाँवों को आग लगाने से लेकर, बलात्कार, हत्या, ज़बरन धर्मान्तरण और तमाम हिन्दू प्रतीकों को ध्वस्त करने की घटनाएँ हैं? क्या ये महज़ नैरेटिव है कि हिन्दुओं के चार हजार बड़े मंदिर आतंकी आक्रांताओं ने तोड़ दिए? क्या गौरी, गजनी, तैमूर, नादिरशाह, ख़िलजी, बाबर आदि अलिफ लैला के पात्र हैं? क्या नालंदा विश्वविद्यालय के ऊपर सल्फ़र की बारिश हुई थी और वहाँ भक्क से आग लग गई?

अजय गुदावर्दी और ‘द वायर’ वालो, पैदा बाद में होने से उसके पीछे का इतिहास गायब नहीं हो जाता। उस हिसाब से हम सबके परदादा भी गायब हो जाएँगे, इसलिए क्या लिखते हो, क्या छापते हो, इस पर ध्यान रखा करो भाई! ऐसे ही एक जगह समुदाय विशेष का इस भूभाग की एक बड़ी आबादी होने को ऐसे इस्तेमाल किया गया जैसे कि पीछे कोई रक्तरंजित इतिहास है ही नहीं! भाई मेरे, आज भी ऐसे लोग मिल जाएँगे जो मंदिरों के गिरने की बात पर खुश होते हैं। पाकिस्तान में भी तो यहीं के लोग हैं, उनके मिसाइलों के नाम इस्लामी लुटेरों के नाम पर होते हैं।

आगे लिखा है कि समुदाय विशेष इस देश के शासक वर्ग से ताल्लुक़ रखते हैं, और भारतीय मध्यम वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा थे। ये दोनों बातें बिलकुल सही हैं, लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि इन शासकों ने हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किए और उनकी आस्था पर चोट नहीं पहुँचाई। हाँ, ये कहना गलत होगा कि समुदाय के आज के लोगों ने ही अत्याचार किया। बिलकुल नहीं। हाँ, समुदाय के आज के कुछ लोगों ने, लगातार इस देश की संप्रभुता पर और यहाँ के नागरिकों पर हमले किए हैं। और हाँ, इस पर आम तौर पर पढ़े-लिखे कट्टरपंथियों ने निंदा तक करना मुनासिब नहीं समझा। ख़ैर, वो अलग विषय है।

आगे अंग्रेज़ी में बाँचा गया है कि भारतीय समाज की परिचर्चा में यह बात आम हो गई है कि समुदाय विशेष ने भारत की बहुसंख्यक आबादी पर ज़ुल्म किए। यह बात ऐसे लिखी गई है जैसे यह कोरी बकवास हो। जबकि कोरी बकवास तो यह पोर्टल हर दिन छापता है, जिसकी नई बकवास यह लेख है। ‘डीप सेन्स ऑफ़ हिस्टोरिकल इन्जुरी’ किसी कैम्पेन के ज़रिए नहीं आया अजय जी, क्योंकि कैम्पेन चलाने की स्थिति में हिन्दू बहुसंख्यक तो मोदी के शासनकाल में भी नहीं आ पाया है।

नैरेटिव पर क़ब्ज़ा तो हमेशा से वामपंथियों और कॉन्ग्रेसियों का रहा है। फिर ये कैम्पेन दक्षिणपंथियों के नाम पर कैसे लिख रहे हैं आप? कैम्पेन और नैरेटिव तो यह है कि भारत के महान हिन्दू राजाओं की गाथा दो पैराग्राफ़ में खत्म हो जाती है और मजहबी शासकों पर अध्याय-दर-अध्याय गुणगान होते हैं। किताबों को देख लीजिए तो समझ में आ जाएगा कि अशोक और चंद्रगुप्त की धरती पर औरंगज़ेब को भी उनसे दस गुणा ज़्यादा पढ़ा और पढ़ाया गया है। मुझे तो समझ में नहीं आता कि जेएनयू में कैसे-कैसे लोग प्रोफेसर बन जाते हैं! ये है इनका इतिहास का ज्ञान?

आगे, पता नहीं क्यों, पॉल ब्रास को लेखक ने अपनी बात मनवाने के लिए घसीट लिया है जिसमें उनकी बात को लिखा गया है कि अधिकतर साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएँ और दंगे अधिकांशतः सुनियोजित तरीके से होती हैं। इस बात को मैं भी मानता हूँ और यह भी बताना चाहता हूँ कि अधिकतर साम्प्रदायिक हिंसा और दंगे की घटनाओं में हिन्दू और दूसरे मजहब वाले, दोनों ही मरते हैं। साथ ही, अधिकतर बार इन राज्यों और केन्द्र में कॉन्ग्रेस या उनकी वर्तमान समर्थक पार्टियाँ ही सत्ता में रही हैं।

लेकिन, लेखक ने पॉल ब्रास की बात कहने के बाद जो बात कही है उससे उनके अल्पज्ञान का मुज़ाहिरा हो जाता है। आगे उन्होंने गौरक्षकों द्वारा की गई हिंसक घटनाओं को इसी ‘साम्प्रदायिक हिंसा’ और दंगे में लपेट लिया है। जबकि, ऐसा बिलकुल ही नहीं है। गौरक्षकों वाली घटनाओं का एक पहलू अगर यह है कि गौतस्करों को कुछ लोगों ने कानून हाथ में लेते हुए घेर कर पीटा और कुछ बार हत्या भी कर दी, लेकिन उन्हें सरकारी समर्थन कहीं नहीं मिला, जो लेखक ने लिखा है।

अगर इन घटनाओं पर राज्य सरकारों और पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की होती, उन पर केस न हुए होते, उन्हें हर बार सम्मानित किया जा रहा होता, तो यह माना जा सकता था कि इन लोगों को सत्ता का मौन समर्थन हासिल है। लेकिन, ऐसा है नहीं। गौतस्करी एक सुनियोजित अपराध है, उनको पकड़ने की कोशिश नहीं। गाय को काट कर खाना एक कानूनी अपराध है, उसे काटने से रोकना नहीं। हाँ, उन्हें रोकने के दौरान हिंसा हुई हो, तो उसकी निंदा ज़रूरी है, कानूनी कार्रवाई जरूरी है।

लेकिन हम यह कैसे भूल जाएँ कई बार इन गौतस्करों ने पुलिस के ऊपर गाड़ी चढ़ाकर प्रकाश मेशराम जैसे सिपाहियों की जान ले ली है? हम यह कैसे भूल जाएँ कि ग़ैरक़ानूनी होते हुए भी गायों को चुरा कर काटने की योजना बनाई जाती है। इसे आप किसी समुदाय की ‘कल्चरल हैबिट’ नहीं कह सकते। अल्पसंख्यक होने का यह मतलब नहीं है कि आप कानून से परे हैं। आपकी हैबिट अगर कानून के रास्ते में आती है तो आप गाय चुरा कर काटने की जगह, दूसरा भोजन तलाशिए। इन बेहूदे तर्कों से अराजकता और अपनी बात मनवाने की बू आती है, तर्क की नहीं।

दूसरी बात, लेखक ने कौन-सा रिसर्च किया या पढ़ा कि सत्ता की मौन सहमति है ऐसे अपराधियों को? प्रधानमंत्री ने स्वयं इस पर बयान दिया है। कानून ने हर जगह पर इन मामलों में काम किया है। लेखक को कम से कम दो-चार मामले तो रखने थे कि हिन्दुओं ने कैसे समुदाय विशेष का जीना हराम कर रखा है इस देश में कि गौरक्षकों से पिटवाने के बाद केस भी दर्ज नहीं कर रहे। कोई एक वाक़या ले आते जहाँ पुलिस ने कार्रवाई नहीं की हो। तब तो साबित होता है कि स्टेट का टैसिट अप्रूवल है! या अंग्रेज़ी में लिख दिए तो वो अंग्रेज़ी होने के कारण ही सही हो गया!

प्रोपेगैंडा पोर्टल के प्रोपेगैंडा लेख में इस्तेमाल हुई खूबसूरत तस्वीर

‘टैसिट’ से याद आया, फोटो ऐसा लगाया है जैसे भारत में मजहब विशेष वाले हाथ में तीन रंगों के कबूतर लेकर ही घूमता रहता है। जब आपको ऐसी तस्वीर लगाने की ज़रूरत पड़ती है इसका मतलब है कि आपको अच्छे से पता है कि इनके खिलाफ जो ‘वंदे मातरम्’ से लेकर ‘जन गण मन’ और ‘भारत माता की जय’ को लेकर इनके इमामों, नेताओं के बयान आते हैं, उसकी स्वीकार्यता इन समुदायों में कितनी ज़्यादा है।

अगर ऐसी बातें एकाध बार हुई होतीं, तो इस फोटो की ज़रूरत नहीं पड़ती। यहाँ दिखाना पड़ रहा है कि समुदाय विशेष वाले देशभक्त हैं। किसने कहा कि नहीं हैं? मेरे कुछ मजहबी मित्र हैं, भारत माता की जय भी बोलते हैं, वंदे मातरम भी गाते हैं, और जो नहीं गाते उनको तहेदिल से गरियाते भी हैं। जब आप ऐसे चित्र लगाते हैं, तो आप ही उनकी की देशभक्ति पर सवाल उठा रहे होते हैं, टैसिटली!

अजय जी इसके बाद समुदाय के ‘घेटोआयजेशन’ की बात करते हैं। ‘घेटो’ का मतलब होता है कि किसी खास जनसमूह का किसी निश्चित इलाके में सिमट कर रहना। ये बात इस तरह से लिखी गई है मानो समुदाय विशे द्वारा अलग गाँव, समुदाय, जगह आदि में एक साथ रहना, हिन्दुओं की गलती है। इस तरह की व्यवस्था क्या किसी सरकार ने की? क्या मोदी या योगी जैसे नेताओं ने लोगों को ऐसे रहने पर मजबूर किया?

या, इसके उलट अपने घेटोआयजेशन के लिए समुदाय ही सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार है? लेखक ने एक उदाहरण तो दिया होता कि इस देश के समुदाय विशेष के लोग अलग जगहों पर सिमट कर रहने को मजबूर हैं! जबकि सत्य यह है कि हर ऐसे स्लम, बस्तियों या गाँवों पर, जिसे आप घेटो कह सकते हैं, दस ऐसे स्लम, बस्तियाँ या गाँव मिलेंगे जहाँ भारत की बहुसंख्यक आबादी भी गरीबी के कारण खराब स्थिति में रहने को मजबूर है।

अब बात आती है कि मजहबी विशेष के लोग जहाँ रहते हैं उन्हें पाकिस्तान कहा जाता है। आखिर क्यों? इसका एक बहुत अच्छा कारण है, पाकिस्तान की क्रिकेट टीम से लेकर आतंकियों तक को इस देश के समुदाय के कई लोग लगातार समर्थन देते हैं। चाहे हाल का पुलवामा हमला हो, या वर्ल्ड कप में भारत बनाम पाकिस्तान मैच, पटाखे किसके लिए फूटते हैं, और कैसे उसके बाद हिंसक घटनाएँ होती हैं, उसके लिए एक सरल गूगल सर्च काफी है।

बिना आग के धुआँ नहीं निकलता। आतंकियों को अगर मौन सहमति के साथ-साथ, आपका ‘हा-हा’ रिएक्शन मिलता रहेगा, तो देश के कुछ लोग, देश के कुछ लोगों को, कुछ खास समयों पर पाकिस्तानी कहेंगे ही। लेकिन, इससे न तो यह साबित होता है कि हर मजहबी यही करता है, न ही यह कि हर हिन्दू मजहब के हर आदमी को पाकिस्तानी कहता फिरता है। कुछ लोग उस खेमे में पगलैती करते हैं, कुछ इधर से।

आगे लेखक जज़्बाती होकर जानबूझकर अंग्रेज़ी न समझने की बेवक़ूफ़ी करते हुए बंग्लादेशी घुसपैठियों पर अमित शाह के बयान को भारतीय समुदाय विशेष की ‘एथनिक क्लिजिंग’ (एक तरह के लोगों का पूरा सफ़ाया) पर ले आते हैं। ऐसा काम तर्कों की कमी से जूझता लेखक या फिर धूर्त व्यक्ति करता है। अजय जी, दोनों ही मालूम पड़ते हैं। अमित शाह ने कहा था कि बंग्लादेशी घुसपैठिए दीमक हैं, उनका सफ़ाया जरूरी है।

इस बात में क्या गलती है? दीमक भीतर से खोखला करने का कार्य करते हैं। लेखक को यह बात पता है लेकिन बंग्लादेशी घुसपैठिए को वो सुविधानुसार भारत के मजहब विशेष का पर्यायवाची मान लेते हैं। अमित शाह का कहना बिलकुल सही है कि भारत जैसे देश के संसाधनों पर पहला हक़ भारतीय लोगों का है, न कि अवैध रूप से घुसे बंग्लादेशी घुसपैठियों का। और दूसरी बात, अमित शाह ने उन्हें भारत से बाहर करने की बात की थी, न कि नरसंहार का आइडिया दिया था।

चूँकि लेखक जेएनयू के प्रोफेसर हैं, और हिंसक विचारधारा के पोस्टरों से उनका दो-चार होना लगा रहता होगा, तो उन्हें स्वतः ऐसा लगा होगा कि देश से निकालना और नरसंहार एक ही बात है।

कुल मिला कर यह लेख बेहद दुःखी कर देने वाला है। दुःखी इसलिए करता है कि ज्योंहि आप सोचते हैं जेएनयू में अब लोग सुधर जाएँगे, अजय गुदावर्दी टाइप के ज्ञानी यह बताने आ जाते हैं कि खास मजहब पर हिंसा हो रही है। मतलब, संकट मोचन मंदिर से लेकर लोकतंत्र के मंदिर संसद तक हमले में मरने वाले अधिकतर लोग हिन्दू ही होते हैं (क्योंकि जनसंख्या ज्यादा है और टार्गेट पर भी वही होते हैं) और मारने वाले हर बार कट्टरपंथी होते हैं, फिर भी असली हिंसा तो गौरक्षकों द्वारा गौतस्करों को सरेराह पीट देना है।

वाह अजय जी, वाह! एक ही दिल है कितनी बार जीतोगे!
वाह ‘द वायर’ वाह! एक ही प्रोपेगैंडा है, कितनी बार फैलाओगे!

गढ़चिरौली को अब पुलवामा वाली प्रतिक्रिया की ज़रूरत है: निशानदेही और घेर कर वार

देश में LWT (वामपंथी आतंक) एक बार फिर अपने असली चेहरे के साथ सामने आया है। महाराष्‍ट्र के गढ़चिरौली में आज सुबह ने सशस्‍त्र बल कमांडो की C 60 टीम पर जबर्दस्‍त आतंकी हमला किया है। ऐसे समय में, जब देश में लोकसभा चुनाव प्रगति पर हैं, नक्सलियों का इस तरह पूर्वनिर्धारित तरीके से कायराना हमला करना कई संकेत देता है।

कुरखेड़ा तहसील के दादापुरा गाँव में नक्सलियों ने 36 वाहनों को आग लगा दी थी, उसके बाद क्विक रिस्पॉन्स टीम के कमांडो घटनास्थल के लिए रवाना हुए थे। ये कमांडो नक्सलियों का पीछा करते हुए जंबुखेड़ा गाँव की एक पुलिया पर पहुँचे ही थे कि नक्सलियों ने विस्फोट के जरिए जवानों पर हमला कर दिया। इस  हमले में 15 जवान वीरगति को प्राप्त हुए हैं।

छत्‍तीसगढ़ और तेलंगाना की सीमा से सटे महाराष्‍ट्र के गढ़चिरौली जिले में नक्‍सली आतंक का इतिहास काफी पुराना है। छत्‍तीसगढ़, महाराष्‍ट्र और तेलंगाना के त्रिकोण पर नक्‍सलियों की सक्रियता सबसे अधिक है। यह इलाका जंगल वाला होने के कारण आतंकियों को छुपने और पड़ोसी राज्‍य में दुबक जाने में काफी मदद करता है।

नक्सलियों की बौखलाहट का नतीजा है इस तरह का गोरिल्ला युद्ध

आतकंवाद और LWT के खिलाफ जिस तत्परता से मोदी सरकार के दौरान अभियान चलाए गए हैं, इसने हर तरह से नक्सलियों के आत्मविश्वास को तोड़ने का काम किया है। वहीं, वर्षों तक सत्ता पर राज करने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी आज 15 जवानों की मृत्यु को भी मोदी सरकार की विफलता बताने से बाज नहीं आ  रही है। कॉन्ग्रेस के लिए जितना राजनीतिक लाभ लेने की घटना पुलवामा आतंकी हमला थी, ये राजनीतिक लाभ लेने का अवसर मात्र है। कॉन्ग्रेस को शायद ही कभी इन बातों से फ़र्क़ पड़ा हो कि किस आतंकी हमले में कितने जवानों ने अपनी जान गँवाई है। कॉन्ग्रेस आज भाजपा सरकार के दौरान हुए आतंकी हमलो के आँकड़े दिखा रही है, लेकिन लगभग हर दूसरा तथ्य कॉन्ग्रेस सरकार के विपरीत ही जाता है।

कॉन्ग्रेस पार्टी प्रवक्ता के अनुसार पिछले 5 सालों में 390 जवान नक्सली हमलों में वीरगति को प्राप्त हुए। अब अगर इसी प्रकार की तुलना की जाए, तो हम देखते हैं कि कॉन्ग्रेस के दौरान मात्र 1 वर्ष में ही 317 जवान नक्सली हमलों में वीरगति को प्राप्त  गए थे। इसी क्रम में 2009 से 2013 के बीच इसी प्रकार के हमलों में 973 जवान बलिदान हुए थे। ये सभी आँकड़े कॉन्ग्रेस के कार्यकाल के ही हैं।

लेकिन कॉन्ग्रेस का प्रकरण अब दूसरा ही हो चुका है। यह बुजुर्ग राजनीतिक दल अब इतना सठिया चुका है कि किसी दफ्तर में आग लगने की खबर तक को मोदी द्वारा फ़ाइल जलाने के लिए लगाईं गई आग नजर आती है। शायद यह बात कॉन्ग्रेस का ‘अनुभव’ कहता हो कि कब, किस दफ्तर में और किन कारणों से आग लगवाई जा सकती है।

जल-जंगल-जमीन नहीं, बल्कि सिर्फ दहशत पैदा करना है उद्देश्य

देखा जाए तो नक्सल प्रभावित इलाकों में  नक्‍सली आतंकियों की गतिविधि कश्‍मीर घाटी में जैश-ए-मोहम्‍मद और लश्‍कर-ए-तैयबा से ज्यादा भिन्न नहीं है। वर्तमान सरकार से पहले की सरकारें कश्‍मीर घाटी के मुकाबले, नक्‍सली आतंकवाद के साथ हमेशा नरमी से ही पेश आती थीं।

गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने नक्सली हमलों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का अभियान जारी रखा और इनसे लड़ने में मजबूत इच्छाशक्ति का परिचय भी दिया है। कहीं ना कहीं नक्सलियों की चुनावों के दौरान आतंकी हमले इसी बात की बौखलाहट का नतीजा हैं।

नक्सली मामलों के ‘विचारकों’ से मिलता है नक्सलियों को हौंसला

लिबरल प्रतीत होने की जद्दोजहद में लगे तमाम ‘नव-क्रांतिकारी’ और नक्सलवाद के समर्थकों का एक बड़ा वर्ग नक्सलियों के लिए भूमिका बनाने में मशगूल रहता है। ये नक्सलियों का प्रबुद्ध ‘थिंक टैंक’ पहले एक आभासी जमीन तैयार करता है, जो हर संभव प्रयास करता है कि लोगों के बीच ऐसी धारणा विकसित कर सके कि देशभर में नक्सलवाद की हर हाल में आवश्यकता है। इसी क्रम में शब्द रचना की जाने लगती है, ‘वॉर अगेन्स्ट वॉर’ जैसे जुमलों से लोगों को गौरवान्वित महसूस करवाया जाने लगता है। समाज में इस बात का बीजारोपण किया जाने लगता है कि युद्ध के हालात हैं और यह ‘करो या मरो’ वाली स्थिति है।

कुछ दिन पहले ही चुनावों के दौरान इसी प्रकार के हमले में छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में भाजपा के एक विधायक भीमा मांडवी के काफिले पर हमला किया था, जिसमें भाजपा विधायक समेत 4 अन्य लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी थी।

माओवादी कहीं ना कहीं अब ये बात जान और समझ गए हैं कि ‘जल-जंगल-जमीन’ का उनका नारा अब प्रासंगिक नहीं रहा है। इनके पोषक ये बात अच्छे से जानते है कि यदि अब यह 3 मुद्दे ही प्रासंगिक नहीं रहे, तो अब माओवंशी कामपंथी किस तरह से अपना अभियान आगे बढ़ाएँ? लोगों के बीच डर पैदा कर के ही ये आतंकवादी संगठन अब प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं।

पूर्वी महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला नक्सलवाद से सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में से एक है। नक्सलवाद की यह समस्या कितनी गंभीर है, इसे हम पुलिस द्वारा जारी किए गए आँकड़ों से भी समझ सकते हैं। पुलिस विभाग के अनुसार, जिले में पिछले 25 साल में सत्ता विरोधी संगठनों की ओर से कुल 417 वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया, जिनकी कीमत 15 करोड़ रुपये से ज्यादा थी।

नक्सली पिछले साल ही 22 अप्रैल के दिन सुरक्षा बलों द्वारा मारे गए अपने 40 साथियों की मौत की पहली बरसी मनाने के लिए एक सप्ताह से चल रहे विरोध प्रदर्शन के अंतिम चरण में थे। गढ़चिरौली में ही जिन वाहनों को नक्सलियों ने अपना निशाना बनाया, उनमें से ज्यादातर अमर इंफास्ट्रक्चर लिमिटेड के थे, जो दादापुर गाँव के पास NH-136 के पुरादा-येरकाड सेक्टर के लिए निर्माण कार्यों में लगे थे। क्या नक्सलियों के कारनामों से यह समझ पाना मुश्किल है कि उनका मुद्दा विकास विरोधी है?

वर्तमान में नक्सली ये बात अच्छे से समझ चुके हैं कि उनकी विचारधारा ICU में पड़ी कराह रही है। जिन लोगों को वो अधिकारों के नाम पर बरगलाते आ रहे हैं, वो लोग अब ज्यादा समझदार हो चुके है और उनका ब्रेनवॉश करना पहले जितना आसान नहीं रह गया है। जनता जानती है कि माओ की इन नाजायज़ नक्सली औलादों की यह लड़ाई सिर्फ सत्ता और शासन की भूख तक सीमित है, ना कि वंचितों के अधिकारों की।

इन नक्सली हमलों के पीछे वजह स्पष्ट है, और वो है लोकसभा चुनाव। यह भी जानना आवश्यक है कि नक्सलियों ने चुनाव का बहिष्कार किया था और कहा था कि जो भी मतदान में शामिल होगा, उसे गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।

जिस प्रकार का कड़ा रुख वर्तमान सरकार ने नक्सलवाद के खिलाफ उठाया है, उसे देखते हुए नक्सलियों के पोषक भी भली-भाँति समझते हैं कि इस सरकार के दोबारा सत्ता में आने पर उनके हथियार, बारूद और यहाँ तक कि ‘संस्थागत’ तरीके से मिलने वाली आर्थिक मदद, सभी ठप्प होने तय हैं। उम्मीद है कि नक्सलवाद जैसे अंदरूनी बीमारी से इस देश को जल्द ही छुटकारा मिलेगा लेकिन ऐसा कर पाने का मात्र एक ही जरिया है और वो मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति ही है।

नेहरू के हजारों लाशों वाले कुम्भ से बदली नीयत वाली सरकार के कुम्भ तक: बदलाव हर तरफ

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बुधवार को उत्तरप्रदेश के कौशाम्बी में चुनावी रैली को संबोधित करते हुए कहा कि 1954 में कॉन्ग्रेस सरकार के दौरान जब पूर्व प्रधानमंत्री पंडित नेहरू कुम्भ में आए थे, तब भगदड़ मच गई थी। हजारों लोग मारे गए थे। तब सरकार की लाज बचाने के लिए, पंडित नेहरू पर कोई दाग न लग जाए, इसके लिए खबरें दबा दी गईं। मगर इस बार कुम्भ में करोड़ों लोग आए, लेकिन कोई भगदड़ नहीं हुई, कोई नहीं मरा। व्यवस्थाएँ कैसे बदलती हैं, यह उसका उदाहरण है।

ऑपइंडिया ने इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट छापी थी जिसमें नेहरू के समय के कुम्भ में क्या हुआ था इसका विस्तृत वर्णन था। उसी रिपोर्ट से:

प्रधानमंत्री नेहरु के संसदीय क्षेत्र प्रयाग में आजादी के बाद आयोजित प्रथम कुम्भ की दर्दनाक भगदड़

जब भी कुम्भ मेले की भगदड़ों का नाम आता है तो वर्ष 1954 के प्रयाग कुम्भ का रक्तरंजित इतिहास आँखों के सामने आ जाता है। ‘द गार्जियन’ के अनुसार 3 फरवरी, 1954 को मौनी अमावस्या के दिन शाही स्नान में 800 से अधिक श्रद्धालुओं की भयानक भगदड़ में मौत हुई। ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ के अनुसार यह आँकड़ा हजार मौतों से ज्यादा का है। तत्कालीन प्रधानमंत्री और इलाहबाद से सांसद जवाहरलाल नेहरू उस दिन कुम्भ मेला क्षेत्र में ही उपस्थित थे। सरकार द्वारा केवल कुछ भिखारियों के मरने का दावा किया गया था। लेकिन तत्कालीन नेहरू सरकार का ‘सरकारी झूठ’ तब सामने आया जब एक पत्रकार ने गहनों से लदी महिलाओं की लाशों की तस्वीर अख़बार में छाप दी थी।

प्रयागराज (इलाहबाद) की इस भयावह घटना के गवाह कुछ लोग बताते हैं कि मृतक संख्या कम दिखाने के लिए शासन द्वारा दर्जनों शव पेट्रोल डाल कर जला दिए गए थे। हालाँकि, यह सब आधिकारिक रिकॉर्ड्स में कब दर्ज होता है? लाशों के कई ढेर पुलिस की घेराबंदी करके जलाए गए लेकिन कुछ पत्रकार फिर भी तस्वीरें खींच लाए। हादसे की तस्वीरें खींचने वाले अकेले फोटो पत्रकार एनएन मुखर्जी ने संस्मरण में बताया था कि दुर्घटना के अगले दिन अख़बारों में शवों की तस्वीरें देखकर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविंदबल्लभ पंत ने दाँत पीसते हुआ कहा था, “कौन है ये हरामज़ादा फ़ोटोग्राफ़र?”

कुम्भ मेले में भगदड़ से मौतों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। ‘द गार्जियन’ के अनुसार, मार्च 1986 के हरिद्वार कुम्भ मेले में हुई 3 भगदड़ों 600 से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई। इसी साल 1986 में ही जनवरी में हुए प्रयाग कुम्भ मेले में भगदड़ में 50 से अधिक लोगों की मौत हुई थी।

सरकार बदली, नियत बदला तो बदलाव दिख रहा है

मोदी ने कहा कि मुझे पिछली बार कुम्भ में अनेक बार आने का मौका मिला। जब सरकार बदलती और नीयत बदलती है तब कैसा परिणाम आता है, यह प्रयागराज ने इस बार दिखा दिया है। पहले कुम्भ होता था तो खबरें आती रहती थीं कि अखाड़ों के बीच जमीन को लेकर विवाद है। किसी को इतनी जमीन दी, किसी को यह किया। पहले कुम्भ मेले में भ्रष्टाचार की बातें सामने आती थीं। इस बार मेला हुआ, शान से माथा ऊँचा हो गया। एक आरोप नहीं लगा। पहले मेला होता था तो यह चोरी हो गया, वो चोरी हो गया, शिकायत आती थीं। इस बार चोरी, मारधाड़ की कोई शिकायत नहीं आई।

मोदी ने बताया कि इस बार कुम्भ का मेला दुनियाभर के अखबारों में छपा है। पहले सिर्फ नागा साधुओं के बारे में छपता था। इस बार कुम्भ में सफाई के बारे में छपा। पहले कहा जाता था उत्तर प्रदेश में व्यवस्था की बातें हो ही नहीं सकतीं। इस बार यूपी ने दिखा दिया कि आप लोग बहादुर हैं और व्यवस्था को मानने वाले हैं।

मोदी ने कहा कि पंडित नेहरू जब प्रधानमंत्री थे, तब वे एक बार कुम्भ के मेले में आए थे। मैं जो बात आज बता रहा हूँ, उसे पाँच-छह दशक में दबा दिया गया, छिपा दिया गया। असंवेदनशीलता की सीमा पार की गई। जब नेहरू जी आए तो मेला इतना बड़ा नहीं होता था। दूसरी पार्टियों का तो निशान भी नहीं था। केंद्र और राज्य में कॉन्ग्रेस की सरकार थी। तब कुम्भ में भगदड़ मच गई थी। हजारों लोग कुचल के मारे गए थे। लेकिन सरकार की लाज बचाने के लिए, पंडित नेहरू पर कोई दाग न लग जाए, इसके लिए खबरें दबा दी गईं। कुछ अखबारों में कोने में खबर छिपा दी गई। इसमें पीड़ितों को भी कुछ नहीं दिया गया। ऐसा पाप देश के पहले प्रधानमंत्री के काल में हुआ। इस बार करोड़ों लोग आए लेकिन कोई भगदड़ नहीं हुई, कोई नहीं मरा।

AIDS पीड़ित पाकिस्तानी डॉक्टर ने सैकड़ों को लगाया संक्रमित इंजेक्शन, 59 के टेस्ट HIV+

पाकिस्तान के सिंध प्रांत के लरकाना क्षेत्र में एक ऐसी सनसनीखेज वारदात सामने आई है, जिसे सुनकर हर कोई दहशत में है। दरअसल, लरकाना के रातोदेरो जिले में एक साथ कम से कम 59 लोगों के HIV पॉजिटिव होने का मामला सामने आया है, जिसमें 25 बच्चे शामिल हैं।

मामला सामने आते ही उस इलाके में हड़कंप मच गया। लरकाना के पुलिस कमिश्नर के अनुसार, जाँच में रातोदेरो जिले का एक क्लिनिक शक के दायरे में आया। मामले की पड़ताल करने पर पता चला कि इस क्लिनिक का एक डॉक्टर मुज्फफर घांघर खुद HIV पॉजिटिव है। रिपोर्ट्स के अनुसार, डॉक्टर ने ही क्लिनिक में आने वाले बच्चों और बाकी मरीजों को HIV संक्रमित इंजेक्शन लगाया, जिससे ये बीमारी अचानक से फैल गई। पुलिस ने डॉक्टर को गिरफ्तार कर लिया है।

बताया जा रहा है कि किसी ‘इंतकाम’ को पूरा करने के लिए डॉक्टर ने सैंकड़ों मरीजों को संक्रमित सूई से इंजेक्शन लगाया है। इस वहशियाना हरकत का मंजर ये है कि अब तक 25 बच्चों के मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें ज्यादातर बच्चों की उम्र 4 महीने से 8 साल के बीच है।

हालाँकि, अभी तक ये पता नहीं चल पाया है कि डॉक्टर ने ऐसा क्यों किया। पुलिस का कहना है कि डॉक्टर एड्स पीड़ित होने के चलते दिमागी से रूप अस्वस्थ है, जिस कारण उसने इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया। पुलिस अभी तक ये उगलवाने में नाकामयाब रही है कि ये डॉक्टर कब से ऐसी हरकत कर रहा था क्योंकि मरीजों की संख्या धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। पिछले हफ्ते तक सिर्फ 14 केस सामने आए थे, लेकिन अभी तक इन केसों की संख्या 59 को पार कर चुकी है।

प्रभावित इलाके में स्वास्थ्य विभाग अब उन लोगों के टेस्ट कराने को कह रहा है, जिनको कभी न कभी इस पब्लिक क्लिनिक ने इंजेक्शन लगाया था। जिससे HIV पॉजिटिव मरीजों की संख्या में भारी इजाफा होने की संभावना है। शायद ये पहला ऐसा केस होगा, जब किसी डॉक्टर ने जानबूझकर इस तरह से HIV एड्स को हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया हो। पाकिस्तान अजूबों से भरा पड़ा है और ये किस्सा उसी का एक नमूना नजर आता है।

अगर जिहादी है मेरा बेटा, तो जेल में ही सड़ा दो: आइएस आतंकी के पिता

एनआइए द्वारा केरल के पलक्कड़ से गिरफ्तार 29-वर्षीय संदिग्ध इस्लामिक स्टेट आतंकी रियास अबूबकर के पिता ने साफ़ किया कि अगर उनका बेटा एंटी-नेशनल या आतंकवादी निकलता है तो वह उसकी कोई मदद नहीं करना चाहते; उनके अनुसार उस हालात में रियास को जेल में ही सड़ना चाहिए। एनआइए ने अबूबकर को कोई फिदाइन जिहादी घटना हिंदुस्तान में प्लान करने के आरोप में गिरफ्तार किया है। बीते सोमवार को गिरफ्तार आरोपी के बारे में शीर्ष आतंकी जाँच एजेंसी का कहना है कि रियास दो रविवार पहले श्री लंका में हुए ईस्टर धमाकों के सूत्रधार ज़ाहरान हाशिम के वीडियो और भाषणों से प्रभावित था।

तीन साल से हो रहे थे बदलाव, नाम रख लिया था ‘अबू दुजाना’

इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए उसके वालिद अबूबकर ने बताया कि तीन साल पहले से रियास में संदेहास्पद बदलाव आने लगे थे। उसने अरबी कपड़े पहनना, दाढ़ी बढ़ाना शुरू कर दिया था। गुमसुम और एकाकी होता जा रहा था, और परिवार के ऐतराज से उसे कोई फर्क नहीं पड़ता था। रियास ने फ़िल्में और टीवी आदि देखना भी एकदम से बंद कर दिए, और अपने स्मार्टफोन पर केवल इस्लाम से जुड़े वीडियो और लेखों में डूबने लगा था। उसके फेसबुक लेख भी इतने आपत्तिजनक हो गए थे कि उसके छोटे भाई को उससे बात करनी पड़ी थी।

कभी नहीं सोचा था इस्लामिक स्टेट से निकलेंगे रिश्ते  

इलाके के आम बागान में मजदूर अबूबकर को यह चिंता तो थी कि उनका सबसे बड़ा बेटा किसी गलत राह पर जा रहा है, पर यह कभी नहीं उम्मीद थी कि वह इस्लामिक स्टेट जैसे खूँखार स्तर पर पहुँच जाएगा। वहीं एनआइए का कहना है कि रियास केरल से आइएस में शामिल हो जिहाद छेड़ने गए 22 में से कम-से-कम 2 दहशतगर्दों के सम्पर्क में था। एजेंसी के अनुसार हाल ही में उसने फेसबुक पर अपना नाम भी बदल कर “अबू दुजाना” कर लिया था

मस्जिद में मिला था आतंकियों से

याह्या और ईसा नामक पलक्कड़ के दो भाई ईसाई से इस्लाम अपनाकर आइएस में शामिल होने चले गए थे। रियास के बहनोई काजा के अनुसार रियास ने उन्हें अपना दोस्त बताया था। जब जिहादियों के तौर पर उन दोनों भाइयों के फोटो मीडिया में आने लगे तो रियास ने परिवार को बताया कि वह उनसे पलक्कड़ की एक मस्जिद में मिला था।

जब प्रियंका स्वीकारती है कि कॉन्ग्रेस वोट-कटवा पार्टी है, तो पार्टी का भविष्य चमकता है

पाँच साल पहले जब गुजरात के एक मुख्यमंत्री ने कॉन्ग्रेस के घोटालों से जर्जर देश के विकास की बात की तो ‘कॉन्ग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया। वह व्यक्ति बीजेपी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और पिछले पाँच सालों में न सिर्फ देश मजबूत हुआ बल्कि पार्टी भी उतनी ही मजबूत हुई। जो कॉन्ग्रेस कभी खुद को ही लोकतंत्र समझती थी, जिसके नेताओं ने कभी ‘इंदिरा इज इंडिया’ कहा था, आज उसी कॉन्ग्रेस के कैसे दिन आ गए हैं कि देश की सबसे बड़ी पार्टी कॉन्ग्रेस का मनोबल इतना गिर चुका है कि वह अब चुनाव जीतने के लिए नहीं बल्कि ‘वोट काटने’ के लिए लड़ रही है।

यह बात कोई और नहीं बल्कि कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी खुद कह रही हैं। तो क्या उत्तर प्रदेश में कॉन्ग्रेस और बसपा-सपा गठबंधन का चुनाव में उतरना मतदाताओं को बेवकूफ बनाने के लिए मात्र एक चाल है? क्या इनकी आपसी चुनावी बयानबाजी देश की जनता को बेवकूफ बनाने की हिस्सा है? कब तक ये लोग आम जनता को बेवकूफ समझ कर उसका बेजा फायदा उठाते रहेंगे? क्या जनता का बहुमूल्य वोट जो ऐसे वोटकटवा पार्टी को जा रही है वह लोकतंत्र के मूलभूत स्तम्भ के साथ मजाक नहीं है?

निराश-हताश कॉन्ग्रेस की महासचिव प्रियंका गाँधी ने भी जिन्हें पार्टी ने कॉन्ग्रेस की डूबती नैया बचाने के लिए आखिरी तारणहार के रूप में उतरा था, हथियार डाल दिए हैं। बुधवार (मई 1, 2019) को यूपी में एक बड़ा खुलासा करते हुए प्रियंका वाड्रा ने खुद कहा कि हर सीट जीतने के लिए नहीं होती है और हारने वाली सीटों पर हमनें वोट काटने वाले कैंडिडेट्स को उतारा है ताकि बीजेपी के वोट काटे जा सकें।

प्रियंका वाड्रा के इस खुलासे ने अब कॉन्ग्रेस पार्टी की उस मंशा पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसमें पार्टी फ्रंट फुट पर खेलते हुए हर राज्य में अपने बल पर बेहतर प्रदर्शन कर सत्ता में आने का दम भर रही थी। यहाँ तक कि लोकसभा चुनाव से पहले कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने कहा था कि उनकी पार्टी देश के हर राज्य में फ्रंट फुट पर खेलने को तैयार है। उन्होंने कहा था कि हमारी पार्टी देश की सबसे बड़ी और पुरानी पार्टी है। लिहाजा हम प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने के लिए इस चुनाव में उतरेंगे। इसके लिए अपने तरफ से राहुल ने कोई कसर नहीं छोड़ी तमाम झूठ बोले, कई झूठे आरोप लगाए, राफेल-राफेल चिल्लाए। यहाँ तक कि अपने पूरे गिरोह को भी फर्जी माहौल बनाने के लिए लगा दिया लेकिन झूठ का हवाई किला कितनी देर तक टिकता उसे ढहना ही था और अब इसकी पूर्व सूचना प्रियंका ने अपने आज के खुलासे से दे दिया। आज का प्रियंका का बयान कॉन्ग्रेस के बचे मनोबल को भी तोड़ने वाला है।

वैसे प्रियंका और राहुल कब क्या बोल जाएँ कुछ कहा नहीं जा सकता। प्रियंका गाँधी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश में भाजपा को एक बड़ा झटका लगेगा और वे बुरी तरह हार जाएँगे। उन्होंने कहा कि उन सीटों पर जहाँ कॉन्ग्रेस मजबूत है, कॉन्ग्रेस जीत जाएगी और अन्य जहाँ कॉन्ग्रेस कमजोर है, वहाँ उम्मीदवारों का चयन यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया है कि वे भाजपा के ‘वोट काट’ सकें।

2019 के लोकसभा चुनावों में, अनिवार्य रूप से शुरुआती कयास लगाए गए थे कि केवल दो राष्ट्रीय पार्टियाँ हैं जो चुनावी संग्राम में हैं- भाजपा और कॉन्ग्रेस। जहाँ भाजपा ने पीएम मोदी पर अपनी उम्मीदें बाँधी हैं और अपने दम पर बहुमत हासिल करने की कोशिश कर रही है, वहीं कॉन्ग्रेस अब क्षेत्रीय दलों के लिए सहायक की भूमिका निभाते हुए केवल “वोट कटर” तक ही सीमित रह गई है। कॉन्ग्रेस की स्थिति ऐसी हो गई है कि वह ‘न घर की रही न घाट की।’ सोचिए कॉन्ग्रेस के इतने बुरे दिन आ गए हैं कि बीएसपी जैसी पार्टी ने भी जिसके संसद में जीरो सांसद हैं, कॉन्ग्रेस को नकार दिया।

हालाँकि, प्रियंका गाँधी वाड्रा के बयान का एक बड़ा निहितार्थ है। मीडिया को दिए अपने बयान में, उन्होंने स्वीकार किया कि उत्तर प्रदेश में जहाँ कॉन्ग्रेस की स्थिति कमजोर है, वहाँ पार्टी ने ‘वोट-कटर’ को उतारा है। वोट काटने वाले ऐसे उम्मीदवार होंगे जो जीत नहीं पाएँगे, लेकिन भाजपा के वोट शेयर में खाएँगे, जिससे उस निर्वाचन क्षेत्र से बसपा या सपा के उम्मीदवार को मदद मिलेगी।

प्रियंका गाँधी वाड्रा के बयान से, यहाँ यह भी स्पष्ट हो जाता है कि सार्वजनिक रूप से केवल दिखावा करने के लिए था कि ये तीनों पार्टियाँ एक-दूसरे के खिलाफ हैं। दरअसल, कॉन्ग्रेस, बसपा और सपा वास्तव में बीजेपी को हराने के लिए एक साथ हैं। इनके बीच की फाइट और बयानबाजी छद्म है। इन पार्टियों को पहले से पता है कि अब ये जनता को और बेवक़ूफ़ नहीं बना सकते, इनका बचा-खुचा जनाधार भी खिसक चुका है।

पहले बसपा के लिए, कोर वोट बैंक दलित गुट, सपा के लिए कोर वोट बैंक यादव और समुदाय विशेष वाले थे। कॉन्ग्रेस के साथ गठबंधन से इन दोनों पार्टियों का ये जनाधार भी और बँट जाता, क्योंकि इन्हे अच्छी तरह पता था कि कॉन्ग्रेस उत्तर प्रदेश से लगभग सफा है। कॉन्ग्रेस के इनका गठबंधन इनके लिए चुनावी आपदा के रूप में साबित हो सकता है। तो ऐसे में जब सभी का सामूहिक उद्देश्य विकास या आम जनता की सेवा न होकर केवल हर हाल में मोदी को हराना रह गया है तो ऐसे में मोदी के वोटों में किसी भी प्रकार से ध्रुवीकरण या कटाव उनके जीत की सम्भावना को कुछ कम कर सकता था।

ऐसे में शुरू हुआ इनका शैडो बॉक्सिंग का खेल जिसका मक़सद बस वोट काटना और जनता को बेवकूफ बनाना रह गया। यह वही है जो प्रियंका गाँधी वाड्रा के बयान की पुष्टि करता है। कॉन्ग्रेस और एसपी, बीएसपी के बीच चुनावी मैदान में शैडो बॉक्सिंग केवल बीजेपी के वोट काटने के लिए एक छद्म मोर्चा था, क्योंकि उनमें से कोई भी वास्तव में इतना आश्वस्त नहीं था कि वो लोकसभा चुनाव में अपने दम पर कुछ कर सकते हैं।

कुल मिला कर लोकसभा चुनाव में अपने हर झूठ को प्रोजेक्ट करने के बाद भी, जनता से कई झूठे वादे करने और उन्हें बीजेपी के खिलाफ भड़काने की पूरी कोशिश के बाद भी अपना हर झूठ बेअसर और बेनकाब होता देख अब कॉन्ग्रेस सहित बाकी सभी पार्टियों ने लगभग अपनी हार मान ली है। प्रियंका के आज के बयान ने बची-खुची उम्मीद का भी बेड़ा गर्क कर दिया। अब देखना ये है कि अब कॉन्ग्रेस किसे आगे करती है जो कॉन्ग्रेस के लिए संजीवनी साबित होती है। वैसे प्रियंका ने महासचिव का दायित्व निभाते हुए कॉन्ग्रेस को ‘वोट कटवा’ पार्टी बना कर अपने दृष्टिकोण का परिचय दे दिया है। अब उनसे न पार्टी को कोई उम्मीद बची है न कार्यकर्ता को, राहुल पहले ही अपनी मेधा का परिचय दे चुके हैं।

अब शायद ही कॉन्ग्रेस कभी वापसी कर पाए, जिसका नेतृत्व ही लगातार पार्टी को गर्त की तरफ ले जा रहा हो, उससे किसी भी तरह की उम्मीद करना भी बेमानी है।

‘बुर्का छोड़िए अब तो दाढ़ी-टोपी से भी होने वाली है परेशानी’

ईस्टर के मौके पर श्री लंका में हुए सिलसिलेवार आतंकी हमले के बाद वहाँ की सरकार ने चेहरा छिपाने वाले हर एक कपड़े को प्रतिबंधित कर दिया है। इसमें मुस्लिम महिलाओं द्वारा पहना जाने वाला बुर्का और हिज़ाब, दोनों शामिल हैं। श्री लंका सरकार की ओर से इस तरह का कदम उठाए जाने के बाद शिवसेना ने इस नियम को भारत में भी लागू करने की माँग करते हुए अपने मुखपत्र ‘सामना’ में लेख लिखा है।

सामना पत्रिका में ‘प्रधानमंत्री मोदी से सवाल, रावण की लंका में हुआ, राम की अयोध्या में कब होगा?’ शीर्षक से लिखे संपादकीय में शिवसेना ने माँग की है कि श्रीलंका की तरह ही भारत में भी बुर्का पर प्रतिबंध लगना चाहिए।

‘सामना’ की इस माँग पर ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने आपत्ति व्यक्त करते हुए पलटवार किया है। असदुद्दीन ओवैसी ने शिवसेना पर हमला बोलते हुए कहा है, “यह हमारा संवैधानिक अधिकार है, बाकी आप यह हिंदुत्व सब पर नहीं लागू कर सकते हैं। यही लोग कल को बोलेंगे कि आपके चेहरे पर दाढ़ी ठीक नहीं है, आप टोपी मत पहनिए।”

इसके आगे असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “आप जींस पहनें, बुर्का पहनें, नकाब पहनें, घूँघट पहनें, आप कुछ न पहनें, ये समझने की जरूरत है। क्योंकि शिवसेना ने गुलाटी मारकर मोदी का हाथ पकड़ लिया, तो उनके पास अब कुछ छिपाने के लिए है ही नहीं, इसीलिए ये बकवास कर रहे हैं। संविधान में इसकी इजाजत है। मुझे दूसरे देशों के बारे में कुछ नहीं कहने की जरूरत है, क्योंकि हिंदुस्तान में संविधान, जो शिवसेना पोपट नहीं समझ सकती है।”

मसूद अजहर वैश्विक आतंकवादी घोषित: भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत, पाक-चीन की फजीहत

संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के सरगना मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया है। कूटनीतिक स्तर पर यह भारत के लिए बहुत बड़ी जीत है। जबकि पाकिस्तान और चीन के लिए शर्म की बात। UNSC के इस एक फैसले से यह साबित (जो पहले से तय था लेकिन अब अंतरराष्ट्रीय मुहर लग गई) हो गया कि पाकिस्तान आतंकियों और आतंकी गतिविधियों को पनाह देने वाला देश है। चीन की फजीहत इसलिए क्योंकि अपने साथी देश पाकिस्तान को वह वीटो के नाम पर कई सालों से बचाता आ रहा था।

ऑपइंडिया ने कल (30 अप्रैल, 2019) ही यह खबर प्रकाशित की थी कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारतीय कूटनीति के कारण मसूद अजहर को 1 मई को वैश्विक आतंकवादी घोषित किया जा सकता है।

14 फरवरी को पुलवामा में हुए सीआरपीएफ के काफिले पर हुए आतंकी हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। इससे पहले 2016 में पठानकोट एयरबेस पर हुए हमले का भी जिम्मेदार भी यही आतंकी संगठन है। पुलवामा हमले के बाद संयुक्त राष्ट्र में अमेरिका, फ्रांस और यूके के नेतृत्व में मसूद को ग्लोबल टेररिस्ट घोषित करने की माँग की गई थी, लेकिन चीन ने उसका बचाव किया था। अमेरिका, ब्रिटेन और फ्राँस द्वारा 13 मार्च को रखे गए प्रस्ताव पर चीन के अलावा सुरक्षा परिषद के सभी अन्य सदस्यों ने पहले ही मंजूरी दे दी थी। आज चीन की मंजूरी भी मिल ही गई।

‘AAP’, वादे और धोखा: केजरीवाल के शिक्षा और स्वास्थ्य के दावों का कड़वा सच

श्रीमान अरविंद केजरीवाल बदलाव की राजनीति करने आए थे। वे व्यवस्था में परिवर्तन की बात करते थे और कहते थे कि सारे नेता चोर हैं और एकमात्र उनकी ‘आम आदमी पार्टी’ ही दूध की धुली है। अरविंद केजरीवाल ने 2015 के पार्टी मैनिफेस्टो में अनेक ऐसे वादे किए थे जिनसे दिल्ली की सूरत बदल सकती थी। यदि उन वादों का आधा हिस्सा भी पूरा किया जाता तो भले पूरी दिल्ली की सूरत नहीं बदलती कम से कम दिल्ली की जनता के जीवन स्तर में बहुत हद तक सुधार हो सकता था। लेकिन केजरीवाल को मैनिफेस्टो में किए गए वादे पूरे करने ही नहीं थे, उन्हें तो केवल राजनीति चमकानी थी।

केजरीवाल द्वारा किए गए अनेक वादों में यह भी था कि आम आदमी पार्टी की सरकार शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देगी और इन क्षेत्रों में सुधार करेगी। आइये देखते हैं केजरीवाल सरकार ने बीते पाँच सालों में इन दो क्षेत्रों में क्या किया और कितने वादे पूरे किए।  

वादा #1: 500 नए सरकारी स्कूल

आम आदमी पार्टी ने 2015 के मैनिफेस्टो में वादा किया था कि 500 नए सरकारी स्कूल खोले जाएँगे। लेकिन PPRC की रिपोर्ट के अनुसार अभी तक केवल 26 स्कूल ही खोले गए हैं। हिंदुस्तान टाइम्स में 2017 में छपी रिपोर्ट के अनुसार दो सालों में केवल 17 स्कूल ही खोले गए थे। आम आदमी पार्टी सरकार यह दावा करती है कि उन्होंने 8000 ‘क्लासरूम’ खोले, और एक स्कूल में 80 क्लासरूम के हिसाब से 100 नए स्कूल खुले। यह दावा अपने आप में खोखला है क्योंकि क्लासरूम की संख्या तो पहले से बने स्कूलों में भी बढ़ाई जा सकती है। 2016 की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार के स्कूलों की दीवारों पर दरारें आ गई थीं। आज उनकी क्या हालत है पता नहीं।

वादा #2: हायर एजुकेशन गारंटी स्कीम

अरविंद केजरीवाल ने अपने चुनावी वादे में यह कहा था कि दिल्ली के किसी भी स्कूल से कक्षा 12 पास किए हुए बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए बिना किसी कोलैटरल के 10 लाख रुपये तक का लोन दिया सकेगा। लेकिन बीते चार वर्षों में इस स्कीम के प्रति जनता ने कोई ख़ास रुचि नहीं दिखाई। PPRC रिपोर्ट के अनुसार चार सालों में दिल्ली के स्कूलों से पास हुए केवल 0.13% छात्रों को ही लोन दिया गया। यह भी चिंता का विषय है कि जून 2018 तक केवल 678 छात्रों ने ही इस स्कीम का लाभ उठाने के लिए आवेदन किया। क्या केजरीवाल सरकार ने इसके कारण जानने की कोशिश की? क्या इस स्कीम का प्रचार उस स्तर पर किया गया कि छात्रों को पता चल सके कि ऐसी कोई स्कीम भी है? जनता को योजना का लाभ देने की घोषणा करने मात्र से ही जिम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। उस योजना को जनता तक पहुँचाना भी सरकार का दायित्व होता है।    

वादा #3: 20 नए डिग्री कॉलेज

केजरीवाल सरकार ने दिल्ली शहर के बाहरी क्षेत्रों में 20 नए डिग्री कॉलेज खोलने का वादा किया था जो अभी तक पूरा नहीं हो सका। अब दिल्ली सरकार अंबेदकर यूनिवर्सिटी से मान्यता प्राप्त पहले से मौजूद कॉलेजों में सीटें बढ़ाने पर विचार कर रही है। हिंदुस्तान टाइम्स की 2017 की रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली सरकार में मंत्री मनीष सिसौदिया कहते थे कि नए कॉलेज नहीं खुले तो क्या हुआ सीटें बढ़ाने पर भी छात्रों की संख्या तो बढ़ ही जाएगी क्योंकि आखिरकार छात्रों को डिग्री ही चाहिए होती है। अर्थात सिसौदिया को नए कॉलेज खुलने और सीटें बढ़ाने में अंतर समझ में ही नहीं आता। मौजूदा कॉलेज में सीटें बढ़ाने से उस कॉलेज के इंफ्रास्ट्रक्चर पर अतिरिक्त भार पड़ता है जिससे शिक्षा की गुणवत्ता में कमी आती है लेकिन केजरीवाल को इससे कोई मतलब नहीं, उनको केवल डिग्री बाँटने से मतलब है।

वादा #4: प्राइवेट स्कूलों की फीस कम की जाएगी

केजरीवाल सरकार ने प्राइवेट स्कूलों की फीस कम करने के लिए तीन साल तक कोई ठोस नियमावली नहीं बनाई। अप्रैल 2018 में एक सर्कुलर के द्वारा यह निर्देश जरूर दिया गया कि सरकारी भूमि पर बने प्राइवेट स्कूल मनमाना ढंग से ट्यूशन फीस नहीं बढ़ाएँगे। लेकिन प्रश्न उठता है कि क्या दिल्ली के सभी स्कूल सरकारी भूमि पर बने हैं? जवाब है नहीं। तो उन स्कूलों की आसमान छूती फीस का क्या जो निजी भूमि पर बने हैं। कोर्ट के बाहर अभिभावकों की लंबी लाइन लगी है जो न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन दिल्ली सरकार ने अपने स्तर पर स्कूलों की मनमानी रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

वादा #5: स्कूल एडमिशन में पारदर्शिता

आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि दिल्ली के स्कूलों में नर्सरी और केजी के एडमिशन में पारदर्शिता लाने के लिए एक केंद्रीकृत सिस्टम होगा। लेकिन आज तक ऐसा कोई पोर्टल या सिस्टम नहीं बन पाया है।  

वादा #6: सरकारी स्कूलों का स्तर सुधारा जाएगा ताकि वे प्राइवेट स्कूल जैसी शिक्षा दे सकें

सरकारी स्कूलों की हालत सुधारने के केजरीवाल के दावों की सच्चाई यह है कि दिल्ली के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों के कुल 64,000 पद स्वीकृत हैं जिनमें से केवल 36,000 शिक्षक ही स्थाई हैं। अस्थाई रूप से अतिथि शिक्षक के रूप में 22,000 शिक्षक काम करते हैं और 6000 पद रिक्त हैं। मनीष सिसौदिया ने 2017 में कहा था कि जब तक शिक्षकों की नियुक्ति स्थाई नहीं हो जाती तब तक उन्होंने शिक्षकों का वेतन बढ़ा दिया है। मनीष सिसौदिया कहते हैं कि वे रातोंरात शिक्षकों की नियुक्ति नहीं कर सकते। जब दिल्ली सरकार सरकारी स्कूलों में नए शिक्षक नहीं रख सकती और पुराने शिक्षकों की नियुक्ति स्थाई नहीं कर सकती तो सरकारी स्कूलों में प्राइवेट स्कूल जैसी सुविधाएँ कहाँ से देगी?

चुनाव पूर्व अरविन्द केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने बड़े-बड़े वादे किए थे कि गेस्ट शिक्षकों को स्थाई किया जाएगा और रिक्त पड़े सभी पदों को भरा जाएगा। स्थिति यह है कि अभी भी हज़ारों पद रिक्त पड़े हैं और जिन पदों पर बहाली भी की गई है, उसमें भी हज़ारों अतिथि शिक्षक शामिल हैं। केजरीवाल यह दावा करते हैं कि उन्होंने शिक्षा व्यवथा में सुधार के लिए ज़रूरी आधारभूत संरचना का विकास किया है, इंफ़्रास्ट्रक्चर मज़बूत किया है लेकिन सवाल यह है कि शिक्षकों की बहाली के बिना ये सब अधूरा है। भवन और कक्षा भले रहें लेकिन पढ़ाने के लिए शिक्षक ही न रहें तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार कैसे आएगा?

यही नहीं हालत यह है कि टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में 9वीं से 12वीं तक के 66% छात्र जो 2017 में अनुत्तीर्ण रह गए थे, अब औपचारिक शिक्षा प्रणाली से बाहर हो गए हैं। आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार 1,55,436 अनुत्तीर्ण छात्रों में से 52,582 छात्रों को ही फिर से कक्षा में प्रवेश दिया गया। दिल्ली के कई स्कूलों में पढ़ रहे छात्रों के माता-पिता से बातचीत करने पर पता चलता है कि 11वीं में स्ट्रीम के चयन को लेकर एक अनौपचारिक प्रचलन आम हो चुका है जिसमें कम अंक प्राप्त छात्रों को आगे की कक्षा में विज्ञान या गणित लेने की अनुमति नहीं देने का निर्णय लिया गया। सरकारी स्कूलों में अधिकतर विद्यार्थी गणित या विज्ञान में ही अनुत्तीर्ण होते हैं, अतः अनौपचारिक रूप से उनके चयन पर प्रतिबंध लगाकर सरकार उनके करियर के साथ खेल रही है ताकि उत्तीर्ण होने के प्रतिशत को ज्यादा दिखाया जा सके। थिंक टैंक PPRC के अनुसार 1029 स्कूलों में से 279 स्कूलों में ही विज्ञान और गणित की पढ़ाई हो रही है।

वादा #7: हेल्थकेयर इंफ्रास्ट्रक्चर का विस्तार किया जाएगा

केजरीवाल ने चुनाव लड़ने से पहले घोषणापत्र में कहा था कि वे 900 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाएँगे और दिल्ली के अस्पतालों में 30,000 अतिरिक्त बेड मुहैया कराए जाएँगे जिसमें से 4000 मैटरनिटी वार्ड में होंगे। केजरीवाल ने प्रति 1000 लोगों पर 5 बेड देने का वादा किया था। लेकिन हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। आम आदमी पार्टी की सरकार ने 1000 मोहल्ला क्लिनिक खोलने का वादा किया था लेकिन 2018 तक केवल 160 मोहल्ला क्लिनिक ही खुल पाए थे। दिल्ली के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार अब तक 9,098 बेड की व्यवस्था ही हो पाई है।

दावा #8: अच्छी दवाइयाँ कम कीमत पर

आम आदमी पार्टी ने वादा किया था कि सरकार बनते ही वे सस्ती दवाइयाँ कम कीमत पर उपलब्ध कराएगी। लेकिन इसपर कुछ नहीं किया गया। केजरीवाल सरकार का एक लाख शौचालय बनवाने का दावा भी झूठा निकला।

अब हिंदी में भी काम करेगा पटना हाईकोर्ट, ऐसा करने वाला देश का पाँचवाँ उच्च न्यायालय

राजभाषा हिंदी को पटना उच्च न्यायालय में आखिरकार प्रवेश मिल ही गया है। अब पटना हाईकोर्ट में सुनवाई अंग्रेजी के अलावा हिंदी में दायर याचिकाओं पर भी हो सकेगी। यह निर्णय वकील इन्द्रदेव प्रसाद की याचिका की सुनवाई के बाद लिया गया। इस याचिका में उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 351 में हिंदी के प्रचार और विकास की संवैधानिक हिदायत का हवाला दिया था।

अहम है न्यायिक उपयोग में हिंदी

मंगलवार को दिए गए इस फैसले में तीन न्यायाधीशों की पूर्ण पीठ ने अपने आदेश में कहा कि पटना हाईकोर्ट के जज अब हिंदी में दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर सकेंगे। मुख्य न्यायाधीश अमरेश्वर प्रताप शाही के अलावा आशुतोष कुमार और राजीव रंजन प्रसाद इस पीठ के अन्य सदस्य हैं। याचिका में पटना हाइकोर्ट के वकील इंद्रदेव प्रसाद ने संविधान के अनुच्छेद 351 को उद्धृत करते हुए यह इंगित किया कि हिंदी का प्रचार और विकास तभी होगा जब हाईकोर्ट में याचिकाएँ दायर करने में हिंदी का प्रयोग लागू किया जाए। सुनवाई में अदालत ने यह भी कहा कि बिहार और उत्तर प्रदेश हिंदी भाषी क्षेत्र हैं और अगर यहाँ भी हिंदी के साथ भेदभाव हुआ तो यह अन्याय होगा।

सचिवालय की अधिसूचना से हुआ था भ्रम

प्रसाद ने अदालत को बताया कि राज्य सरकार के मंत्रिमंडल (राजभाषा) सचिवालय ने 9 मई, 1972 को एक जारी अधिसूचना में एक ओर जहाँ आपराधिक और फौजदारी मामलों में हाईकोर्ट में हिंदी के प्रयोग की बात कही, वहीं दूसरी ओर संविधान के अनुच्छेद 226 और 227 के तहत इसके विरोधाभास में हाईकोर्ट के मामलों को अंग्रेजी में दायर करने की बात की गई है।

पूर्ण पीठ ने राज्य सरकार को 4 हफ्ते के भीतर अधिसूचना को संशोधित करने का आदेश दिया था। साथ में यह भी जोड़ा था कि अगर ऐसा नहीं किया गया तो अधिसूचना रद्द भी हो सकती है।

ऐसा करने वाला पाँचवाँ हाईकोर्ट

इस आदेश के साथ ही पटना हाईकोर्ट हिंदी को अनुमति देने वाला पाँचवाँ उच्च न्यायालय बन गया है। इससे पहले मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, इलाहाबाद और राजस्थान के हाइकोर्ट भी हिंदी के न्यायिक कार्यों में प्रयोग की अनुमति दे चुके हैं।