Monday, June 21, 2021
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‘द वायर’ के हिसाब से भारतीय हिन्दू ही आतंकी हैं जिन्होंने समुदाय विशेष पर हिंसा की है! हाउ क्यूट!

क्या ये महज़ नैरेटिव है कि हिन्दुओं के चार हजार बड़े मंदिर आतंकी आक्रांताओं ने तोड़ दिए? क्या गौरी, गजनी, तैमूर, नादिरशाह, ख़िलजी, बाबर आदि अलिफ लैला के पात्र हैं? क्या नालंदा विश्वविद्यालय के ऊपर सल्फ़र की बारिश हुई थी और वहाँ भक्क से आग लग गई?

हमारे सहकर्मी ने एक लेख दिखाया जो ‘द वायर’ नामक प्रोपेगेंडा पोर्टल पर छपा था। लिखने वाले अजय गुदावर्दी (Ajay Gudavarthy) हैं, जो जेएनयू में असोसिएट प्रोफेसर हैं। मैं जेएनयू के होने भर से जज नहीं करता, क्योंकि उन्होंने जो लम्बी बकवास लिखी है, उसके हिस्सों को लेकर मैं जज करूँगा। लेख का मक़सद यह बताना है कि भारत में समुदाय विशेष को लेकर ‘फोबिया’ या ‘डर’ नहीं है, बल्कि साम्प्रदायिकता के कारण उनके ऊपर हिंसा की घटनाएँ होती हैं।

जी, आपने सही पढ़ा कि इस देश में समुदाय विशेष के ऊपर हिंसा की घटनाएँ होती हैं। यही नैरेटिव है ‘द वायर’ का। इस देश में समुदाय विशेष के ऊपर हिंसा कहाँ हुई, कब हुई, इसका कोई ब्यौरा लेखक ने देने की ज़हमत नहीं उठाई। एक जगह ज़िक्र भी किया तो वो यह कि गौरक्षकों द्वारा किए गए अपराध न तो रैंडम हैं, न एपिसोडिक (यानी रह-रह कर होने वाले), बल्कि उन्हें सत्ता का समर्थन हासिल है। ये उन्होंने अंग्रेज़ी के शब्द ‘टैसिट’ का प्रयोग करके लिख दिया, क्योंकि अंग्रेज़ी के ऐसे शब्दों से बहुत कुछ छुप जाता है, आपको साबित नहीं करना पड़ता। ‘टैसिट’ का मतलब होता है अनकहा। आप इस बात को साबित नहीं कर सकते, गुदावर्दी साहब ने भी ऐसा करने की ज़रूरत नहीं समझी।

वामपंथियों या वैसे लोग जिनके पास कहने को ज़्यादा नहीं होता, वो अक्सर किसी विदेशी लेखक का नाम ठूँस कर अपने आप को ऑथेन्टिकेट करने की कोशिश करते हैं। भारत की जनता भी सोचती है कि विदेशी लेखक को पढ़ा है इस व्यक्ति ने। जबकि उससे साबित कुछ नहीं होता सिवाय इसके कि आपके तर्क कमजोर हैं, और आपको बाहर की मदद चाहिए।

भला स्लावोज जिजेक जैसे राजनैतिक दार्शनिक का ज्ञान देकर क्या बता दिया लेखक ने? एक टर्म उन्हें अच्छा लगा, उन्हें उसका इस्तेमाल करना था, उन्होंने कर दिया और चुपके से बताया कि स्लोवाज जिजेक साहब ने इसका नामकरण किया है। इसी तरह बीच में एक जगह और एक विदेशी लेखक आ गए जिन्होंने भारत पर लिखा है।

ख़ैर, बिना कुछ काम का लिखे मैंने चार पैराग्राफ़ जाया कर दिए। यही काम जेएनयू के अजय जी ने इस लेख में किया है जहाँ वो ‘इस्लामोफोबिया’ के ‘फोबिया’ वाले हिस्से को समझाने में आधा आर्टिकल निकाल ले गए। ये बात और है कि उन्होंने अपने ही लेख के शीर्षक में इस्तेमाल शब्द ‘कम्यूनलिज्म’ को समझाने के लिए कोई कोशिश की ही नहीं। मतलब, उन्होंने लिख दिया तो हमें मान लेना चाहिए। जेएनयू के प्रोफेसर हैं, मान लीजिए।

शुरुआत ही हास्यास्पद है कि ‘समुदाय विशेष के प्रति हिंसा’! इस वाक्यांश को धीरे से ऐसे रखा गया है मानो यह बात इतनी मेनस्ट्रीम है कि आए दिन हिन्दू लोग मजहब विशेष वालों को राह चलते काट देते हैं, खुद में बम बाँध कर ‘जय श्री राम’ का नारा लगाते हुए उड़ा देते हैं, नेपाल की सीमा से घुसपैठ करते हैं, और मस्जिदों में नमाज़ पढ़ते वक्त ‘जय बजरंग बली’ कह कर लोगों को गोलियों से भून देते हैं, या फिर यह कि हिन्दुओं ने अफ़्रीका के एक द्वीप पर हिन्दू लड़ाकों की सेना बना ली है और खास मजहब वालों पर जहाँ-तहाँ कार चढ़ाने से लेकर, सुसाइड बॉम्बिंग से उड़ा दे रहे हैं।

जबकि ऐसा है नहीं। मजहब विशेष के प्रति जो हिंसा है इस देश में वो या तो दंगों में हुई है, जिसे ‘समुदाय विशेष के प्रति’ तो कहा ही नहीं जा सकता क्योंकि दंगों में दो समुदाय मरते-कटते हैं, न कि सिर्फ एक। दूसरी बात, भारत के चुनिंदा दंगे ऐसे होंगे जो भाजपा कार्यकाल में हुए हैं क्योंकि नब्बे प्रतिशत से ज़्यादा दंगे कॉन्ग्रेस या इनके समर्थक पार्टियों के राज्य में हुए हैं, जो खुद को सेकुलर और मजहब विशेष के हिमायती बताते थकते नहीं। सबसे बड़े दंगों का नाम लीजिए तो कॉन्ग्रेस आपको केन्द्र और राज्य दोनों में लगभग हर बार मिल जाएगी।

तो, इस लेख का मूल भाव ही एक झूठ पर आधारित है। आगे लिखने की आवश्यकता नहीं है, फिर भी प्रोपेगेंडा को काटने के लिए कीचड़ में उतरना ज़रूरी है। लेखक ने लिखा है कि हाल ही में हुई कई घटनाओं को देखने पर पता चलता है कि ऐसी घटनाएँ समुदाय विशेष को लेकर पूर्वग्रह और ‘ऐतिहासिक ज़ख़्म’ के नाम पर हुई हैं। ये किन घटनाओं की बात कर रहे हैं मुझे नहीं पता। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन एक भी हाइपरलिंक नहीं मिला जो किसी घटना/घटनाओं पर प्रकाश डाल रहा हो।

ये भी वामपंथियों की पुरानी आदत होती है। वो मान कर चलते हैं कि चूँकि उनका नाम, ‘द वायर’ जैसा प्रोपेगैंडा पोर्टल का नाम आदि है ही, तो इन पोर्टलों पर विचरने वाले प्राणी बाय डिफ़ॉल्ट हर बात को बिना सत्यापित किए ही सही मान लेंगे। ऐसा होता भी है, वरना हमारे जैसे लोगों को लिखना ही नहीं पड़ता कि भाई ये लोग बस प्रपंच फैला कर हिन्दुओं को ही आतंकवादी साबित करने पर तुले हुए हैं।

दूसरी बात, ‘हिस्टोरिकल इन्जुरी’ या ‘ऐतिहासिक ज़ख़्म’ की बात झूठ है क्या? क्या ये महज़ नैरेटिव है कि इस्लामी आक्रांताओं, लुटेरों और शासकों ने यहाँ की जनता पर हर तरह के ज़ुल्म किए जिसमें गाँवों को आग लगाने से लेकर, बलात्कार, हत्या, ज़बरन धर्मान्तरण और तमाम हिन्दू प्रतीकों को ध्वस्त करने की घटनाएँ हैं? क्या ये महज़ नैरेटिव है कि हिन्दुओं के चार हजार बड़े मंदिर आतंकी आक्रांताओं ने तोड़ दिए? क्या गौरी, गजनी, तैमूर, नादिरशाह, ख़िलजी, बाबर आदि अलिफ लैला के पात्र हैं? क्या नालंदा विश्वविद्यालय के ऊपर सल्फ़र की बारिश हुई थी और वहाँ भक्क से आग लग गई?

अजय गुदावर्दी और ‘द वायर’ वालो, पैदा बाद में होने से उसके पीछे का इतिहास गायब नहीं हो जाता। उस हिसाब से हम सबके परदादा भी गायब हो जाएँगे, इसलिए क्या लिखते हो, क्या छापते हो, इस पर ध्यान रखा करो भाई! ऐसे ही एक जगह समुदाय विशेष का इस भूभाग की एक बड़ी आबादी होने को ऐसे इस्तेमाल किया गया जैसे कि पीछे कोई रक्तरंजित इतिहास है ही नहीं! भाई मेरे, आज भी ऐसे लोग मिल जाएँगे जो मंदिरों के गिरने की बात पर खुश होते हैं। पाकिस्तान में भी तो यहीं के लोग हैं, उनके मिसाइलों के नाम इस्लामी लुटेरों के नाम पर होते हैं।

आगे लिखा है कि समुदाय विशेष इस देश के शासक वर्ग से ताल्लुक़ रखते हैं, और भारतीय मध्यम वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा थे। ये दोनों बातें बिलकुल सही हैं, लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि इन शासकों ने हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं किए और उनकी आस्था पर चोट नहीं पहुँचाई। हाँ, ये कहना गलत होगा कि समुदाय के आज के लोगों ने ही अत्याचार किया। बिलकुल नहीं। हाँ, समुदाय के आज के कुछ लोगों ने, लगातार इस देश की संप्रभुता पर और यहाँ के नागरिकों पर हमले किए हैं। और हाँ, इस पर आम तौर पर पढ़े-लिखे कट्टरपंथियों ने निंदा तक करना मुनासिब नहीं समझा। ख़ैर, वो अलग विषय है।

आगे अंग्रेज़ी में बाँचा गया है कि भारतीय समाज की परिचर्चा में यह बात आम हो गई है कि समुदाय विशेष ने भारत की बहुसंख्यक आबादी पर ज़ुल्म किए। यह बात ऐसे लिखी गई है जैसे यह कोरी बकवास हो। जबकि कोरी बकवास तो यह पोर्टल हर दिन छापता है, जिसकी नई बकवास यह लेख है। ‘डीप सेन्स ऑफ़ हिस्टोरिकल इन्जुरी’ किसी कैम्पेन के ज़रिए नहीं आया अजय जी, क्योंकि कैम्पेन चलाने की स्थिति में हिन्दू बहुसंख्यक तो मोदी के शासनकाल में भी नहीं आ पाया है।

नैरेटिव पर क़ब्ज़ा तो हमेशा से वामपंथियों और कॉन्ग्रेसियों का रहा है। फिर ये कैम्पेन दक्षिणपंथियों के नाम पर कैसे लिख रहे हैं आप? कैम्पेन और नैरेटिव तो यह है कि भारत के महान हिन्दू राजाओं की गाथा दो पैराग्राफ़ में खत्म हो जाती है और मजहबी शासकों पर अध्याय-दर-अध्याय गुणगान होते हैं। किताबों को देख लीजिए तो समझ में आ जाएगा कि अशोक और चंद्रगुप्त की धरती पर औरंगज़ेब को भी उनसे दस गुणा ज़्यादा पढ़ा और पढ़ाया गया है। मुझे तो समझ में नहीं आता कि जेएनयू में कैसे-कैसे लोग प्रोफेसर बन जाते हैं! ये है इनका इतिहास का ज्ञान?

आगे, पता नहीं क्यों, पॉल ब्रास को लेखक ने अपनी बात मनवाने के लिए घसीट लिया है जिसमें उनकी बात को लिखा गया है कि अधिकतर साम्प्रदायिक हिंसा की घटनाएँ और दंगे अधिकांशतः सुनियोजित तरीके से होती हैं। इस बात को मैं भी मानता हूँ और यह भी बताना चाहता हूँ कि अधिकतर साम्प्रदायिक हिंसा और दंगे की घटनाओं में हिन्दू और दूसरे मजहब वाले, दोनों ही मरते हैं। साथ ही, अधिकतर बार इन राज्यों और केन्द्र में कॉन्ग्रेस या उनकी वर्तमान समर्थक पार्टियाँ ही सत्ता में रही हैं।

लेकिन, लेखक ने पॉल ब्रास की बात कहने के बाद जो बात कही है उससे उनके अल्पज्ञान का मुज़ाहिरा हो जाता है। आगे उन्होंने गौरक्षकों द्वारा की गई हिंसक घटनाओं को इसी ‘साम्प्रदायिक हिंसा’ और दंगे में लपेट लिया है। जबकि, ऐसा बिलकुल ही नहीं है। गौरक्षकों वाली घटनाओं का एक पहलू अगर यह है कि गौतस्करों को कुछ लोगों ने कानून हाथ में लेते हुए घेर कर पीटा और कुछ बार हत्या भी कर दी, लेकिन उन्हें सरकारी समर्थन कहीं नहीं मिला, जो लेखक ने लिखा है।

अगर इन घटनाओं पर राज्य सरकारों और पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की होती, उन पर केस न हुए होते, उन्हें हर बार सम्मानित किया जा रहा होता, तो यह माना जा सकता था कि इन लोगों को सत्ता का मौन समर्थन हासिल है। लेकिन, ऐसा है नहीं। गौतस्करी एक सुनियोजित अपराध है, उनको पकड़ने की कोशिश नहीं। गाय को काट कर खाना एक कानूनी अपराध है, उसे काटने से रोकना नहीं। हाँ, उन्हें रोकने के दौरान हिंसा हुई हो, तो उसकी निंदा ज़रूरी है, कानूनी कार्रवाई जरूरी है।

लेकिन हम यह कैसे भूल जाएँ कई बार इन गौतस्करों ने पुलिस के ऊपर गाड़ी चढ़ाकर प्रकाश मेशराम जैसे सिपाहियों की जान ले ली है? हम यह कैसे भूल जाएँ कि ग़ैरक़ानूनी होते हुए भी गायों को चुरा कर काटने की योजना बनाई जाती है। इसे आप किसी समुदाय की ‘कल्चरल हैबिट’ नहीं कह सकते। अल्पसंख्यक होने का यह मतलब नहीं है कि आप कानून से परे हैं। आपकी हैबिट अगर कानून के रास्ते में आती है तो आप गाय चुरा कर काटने की जगह, दूसरा भोजन तलाशिए। इन बेहूदे तर्कों से अराजकता और अपनी बात मनवाने की बू आती है, तर्क की नहीं।

दूसरी बात, लेखक ने कौन-सा रिसर्च किया या पढ़ा कि सत्ता की मौन सहमति है ऐसे अपराधियों को? प्रधानमंत्री ने स्वयं इस पर बयान दिया है। कानून ने हर जगह पर इन मामलों में काम किया है। लेखक को कम से कम दो-चार मामले तो रखने थे कि हिन्दुओं ने कैसे समुदाय विशेष का जीना हराम कर रखा है इस देश में कि गौरक्षकों से पिटवाने के बाद केस भी दर्ज नहीं कर रहे। कोई एक वाक़या ले आते जहाँ पुलिस ने कार्रवाई नहीं की हो। तब तो साबित होता है कि स्टेट का टैसिट अप्रूवल है! या अंग्रेज़ी में लिख दिए तो वो अंग्रेज़ी होने के कारण ही सही हो गया!

प्रोपेगैंडा पोर्टल के प्रोपेगैंडा लेख में इस्तेमाल हुई खूबसूरत तस्वीर

‘टैसिट’ से याद आया, फोटो ऐसा लगाया है जैसे भारत में मजहब विशेष वाले हाथ में तीन रंगों के कबूतर लेकर ही घूमता रहता है। जब आपको ऐसी तस्वीर लगाने की ज़रूरत पड़ती है इसका मतलब है कि आपको अच्छे से पता है कि इनके खिलाफ जो ‘वंदे मातरम्’ से लेकर ‘जन गण मन’ और ‘भारत माता की जय’ को लेकर इनके इमामों, नेताओं के बयान आते हैं, उसकी स्वीकार्यता इन समुदायों में कितनी ज़्यादा है।

अगर ऐसी बातें एकाध बार हुई होतीं, तो इस फोटो की ज़रूरत नहीं पड़ती। यहाँ दिखाना पड़ रहा है कि समुदाय विशेष वाले देशभक्त हैं। किसने कहा कि नहीं हैं? मेरे कुछ मजहबी मित्र हैं, भारत माता की जय भी बोलते हैं, वंदे मातरम भी गाते हैं, और जो नहीं गाते उनको तहेदिल से गरियाते भी हैं। जब आप ऐसे चित्र लगाते हैं, तो आप ही उनकी की देशभक्ति पर सवाल उठा रहे होते हैं, टैसिटली!

अजय जी इसके बाद समुदाय के ‘घेटोआयजेशन’ की बात करते हैं। ‘घेटो’ का मतलब होता है कि किसी खास जनसमूह का किसी निश्चित इलाके में सिमट कर रहना। ये बात इस तरह से लिखी गई है मानो समुदाय विशे द्वारा अलग गाँव, समुदाय, जगह आदि में एक साथ रहना, हिन्दुओं की गलती है। इस तरह की व्यवस्था क्या किसी सरकार ने की? क्या मोदी या योगी जैसे नेताओं ने लोगों को ऐसे रहने पर मजबूर किया?

या, इसके उलट अपने घेटोआयजेशन के लिए समुदाय ही सबसे ज्यादा ज़िम्मेदार है? लेखक ने एक उदाहरण तो दिया होता कि इस देश के समुदाय विशेष के लोग अलग जगहों पर सिमट कर रहने को मजबूर हैं! जबकि सत्य यह है कि हर ऐसे स्लम, बस्तियों या गाँवों पर, जिसे आप घेटो कह सकते हैं, दस ऐसे स्लम, बस्तियाँ या गाँव मिलेंगे जहाँ भारत की बहुसंख्यक आबादी भी गरीबी के कारण खराब स्थिति में रहने को मजबूर है।

अब बात आती है कि मजहबी विशेष के लोग जहाँ रहते हैं उन्हें पाकिस्तान कहा जाता है। आखिर क्यों? इसका एक बहुत अच्छा कारण है, पाकिस्तान की क्रिकेट टीम से लेकर आतंकियों तक को इस देश के समुदाय के कई लोग लगातार समर्थन देते हैं। चाहे हाल का पुलवामा हमला हो, या वर्ल्ड कप में भारत बनाम पाकिस्तान मैच, पटाखे किसके लिए फूटते हैं, और कैसे उसके बाद हिंसक घटनाएँ होती हैं, उसके लिए एक सरल गूगल सर्च काफी है।

बिना आग के धुआँ नहीं निकलता। आतंकियों को अगर मौन सहमति के साथ-साथ, आपका ‘हा-हा’ रिएक्शन मिलता रहेगा, तो देश के कुछ लोग, देश के कुछ लोगों को, कुछ खास समयों पर पाकिस्तानी कहेंगे ही। लेकिन, इससे न तो यह साबित होता है कि हर मजहबी यही करता है, न ही यह कि हर हिन्दू मजहब के हर आदमी को पाकिस्तानी कहता फिरता है। कुछ लोग उस खेमे में पगलैती करते हैं, कुछ इधर से।

आगे लेखक जज़्बाती होकर जानबूझकर अंग्रेज़ी न समझने की बेवक़ूफ़ी करते हुए बंग्लादेशी घुसपैठियों पर अमित शाह के बयान को भारतीय समुदाय विशेष की ‘एथनिक क्लिजिंग’ (एक तरह के लोगों का पूरा सफ़ाया) पर ले आते हैं। ऐसा काम तर्कों की कमी से जूझता लेखक या फिर धूर्त व्यक्ति करता है। अजय जी, दोनों ही मालूम पड़ते हैं। अमित शाह ने कहा था कि बंग्लादेशी घुसपैठिए दीमक हैं, उनका सफ़ाया जरूरी है।

इस बात में क्या गलती है? दीमक भीतर से खोखला करने का कार्य करते हैं। लेखक को यह बात पता है लेकिन बंग्लादेशी घुसपैठिए को वो सुविधानुसार भारत के मजहब विशेष का पर्यायवाची मान लेते हैं। अमित शाह का कहना बिलकुल सही है कि भारत जैसे देश के संसाधनों पर पहला हक़ भारतीय लोगों का है, न कि अवैध रूप से घुसे बंग्लादेशी घुसपैठियों का। और दूसरी बात, अमित शाह ने उन्हें भारत से बाहर करने की बात की थी, न कि नरसंहार का आइडिया दिया था।

चूँकि लेखक जेएनयू के प्रोफेसर हैं, और हिंसक विचारधारा के पोस्टरों से उनका दो-चार होना लगा रहता होगा, तो उन्हें स्वतः ऐसा लगा होगा कि देश से निकालना और नरसंहार एक ही बात है।

कुल मिला कर यह लेख बेहद दुःखी कर देने वाला है। दुःखी इसलिए करता है कि ज्योंहि आप सोचते हैं जेएनयू में अब लोग सुधर जाएँगे, अजय गुदावर्दी टाइप के ज्ञानी यह बताने आ जाते हैं कि खास मजहब पर हिंसा हो रही है। मतलब, संकट मोचन मंदिर से लेकर लोकतंत्र के मंदिर संसद तक हमले में मरने वाले अधिकतर लोग हिन्दू ही होते हैं (क्योंकि जनसंख्या ज्यादा है और टार्गेट पर भी वही होते हैं) और मारने वाले हर बार कट्टरपंथी होते हैं, फिर भी असली हिंसा तो गौरक्षकों द्वारा गौतस्करों को सरेराह पीट देना है।

वाह अजय जी, वाह! एक ही दिल है कितनी बार जीतोगे!
वाह ‘द वायर’ वाह! एक ही प्रोपेगैंडा है, कितनी बार फैलाओगे!

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अजीत भारती
पूर्व सम्पादक (फ़रवरी 2021 तक), ऑपइंडिया हिन्दी

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