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FT संपादक ने किया आजम खान के बेहूदा बयान का समर्थन, दक्षिणपंथी पत्रकार ने लताड़ा

जहाँ आजम खान के जयाप्रदा पर दिए गए अश्लील बयान की पूरे देश में आलोचना हो रही है, वहीं एक विदेशी पत्रकार ने इसका समर्थन करने की कोशिश की है। फाइनेंशियल टाइम्स के संपादक लायोनेल बार्बर ने आजम खान के वक्तव्य को “कोई बुरा कथन नहीं” कहकर उसे हल्का करने की कोशिश की है।

भारत के निर्वाचन दौरे के दौरान किया लज्जाजनक बचाव

लायोनेल बार्बर अपने समाचारपत्र फाइनेंशियल टाइम्स की ओर से भारत के आम चुनावों को कवर कर रहे हैं। केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी और कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के बीच अमेठी के चुनावी मुकाबले के बारे में लिखते हुए उन्होंने प्रदेश के अपने अनुभव साझा किए। इसी दौरान अपने एक दौरे पर, जिसमें वह खुद आजम खान के मेहमान थे, लिखते हुए उन्होंने जयाप्रदा पर आजम की टिप्पणी का उल्लेख किया और लिखा, “Not a bad line, though Khan was temporarily banned for it।(अनुवाद: कोई बुरा कथन नहीं है, हालाँकि इसके लिए खान पर अस्थाई प्रतिबंध लगा दिया गया।”)

सोशल मीडिया पर कड़ी प्रतिक्रिया

बार्बर के इस कथन को सोशल मीडिया पर दक्षिणपंथी और राष्ट्रवादी धड़ों ने आड़े हाथों लिया। नवम कैपिटल के संस्थापक और कार्यकारी निदेशक राजीव मंत्री ने ट्विटर पर लिखा:

उन्हें रीट्वीट करते हुए प्रख्यात पत्रकार और स्तंभकार शेफ़ाली वैद्य ने बार्बर को आड़े हाथों लिया, और उनके दोहरे मापदंडों को उजागर करते हुए उनसे पूछा कि अगर जयाप्रदा पर आजम खान की बातें बुरी नहीं हैं तो ब्रिटेन की प्रधानमंत्री थेरेसा मे की आलोचना करने वाला नारीद्वेषी कैसे हो जाता है?

RaGa के सिर फिर चढ़ी ‘गर्मी’ कहा, ‘कमलछाप चौकीदार…’ – लोगों ने कमजोरी-कबूतर शब्द फेंक कर मारा

चुनावी दौर के बीच सियासी घमासान की रफ़्तार ज़ोरों पर है। आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी ने अपने ट्विटर हैंडल से पीएम मोदी के ख़िलाफ़ फिर से निशाना साधा है। अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा कि 23 मई को जनता की अदालत में फैसला होकर रहेगा कि कमलछाप चौकीदार ही चोर है। साथ ही चौकीदार को सज़ा मिलेगी जैसी बात भी लिखी।

‘चौकीदार चोर है’ की टिप्पणी के लिए 10 अप्रैल को भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने राहुल गाँधी के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दाखिल की थी। इस याचिका पर कार्रवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी को नोटिस जारी कर 22 अप्रैल तक जवाब देने को कहा था।

सुप्रीम कोर्ट के नोटिस के जवाब में राहुल गाँधी ने आज जो हलफ़नामा दाखिल किया उसमें उन्होंने अपनी टिप्पणी के लिए चुनावी जोश यानी चुनावी गर्मी को इसका कारण बताया। राहुल ने अपने हलफ़नामे में यह भी स्पष्ट किया वो भविष्य में कोर्ट का हवाला देकर ऐसा कुछ नहीं कहेंगे जो कोर्ट ने न कहा हो।

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी का यह चेहरा समझ से परे है, वो स्वांग रचने में माहिर हैं। एक तरफ तो कोर्ट में वो अपनी ग़लती के लिए हाथ जोड़कर माफ़ी माँगने का स्वांग रचते दिखते हैं, तो दूसरे ही पल कोर्ट से बाहर आते ही फिर से अपना वही हमलावर रुख़ अख़्तियार करते हैं। अपने माफ़ीनामे के बाद भी आदतन पीएम मोदी को आड़े हाथों लेना उनकी कुंठित मानसिकता और हताशा को दर्शाता है।

जनता को बरगलाने के लिए राहुल गाँधी जिन ज़ुबानी अल्फ़ाज़ों का इस्तेमाल करते हैं वो सब धरे के धरे ही रह जाते हैं, जब सोशल मीडिया पर यूज़र्स उन्हें आईना दिखाते हैं।

एक यूज़र ने तो यह तक लिख दिया कि राहुल जी, अब आपके पास बोलने को बचा क्या है?

एक अन्य यूज़र ने अपने ट्वीट में लिखा कि कमलछाप का तो पता नहीं लेकिन 281 करोड़ रुपए वाला कमलनाथ जरूर चोर है, और जिसको 20 करोड़ रुपए पहुँचे वो भी !!!

राहुल गाँधी अगर चाहें भी तो भी वो पीएम मोदी को बेवजह घेरने से बाज नहीं आएँगे। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि उनके पास कोई दूसरा चारा या बहाना ही नहीं है जिसके दम पर वो अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेंक सकें। अब वो इसे अगर चुनावी गर्मी का नाम देना चाहते हैं तो यह उनका भ्रम है, जिसमें वो बने रहना चाहते हैं।

दिग्विजय ने युवक से ₹15 लाख को लेकर पूछा सवाल, जवाब सुनकर भरी सभा में हुई किरकिरी

दिग्विजय सिंह का एक वीडियो ख़ूब वायरल हो रहा है। इस वीडियो में दिग्विजय सिंह रैली के मंच से भाषण देते हुए दिखाई दे रहे हैं। इस दौरान नरेंद्र मोदी पर तंज कसते हुए दिग्विजय सिंह ने लोगों से पूछा कि क्या उनके खातों में 15 लाख रुपए आ गए? मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने सभा में से एक युवक को बुलाकर पूछा की क्या उसके खाते में 15 लाख रुपए आ गए हैं? युवक ने मंच पर आकर दिग्विजय की बोलती बंद कर दी। युवक ने मंच पर पहुँच कर सर्जिकल स्ट्राइक का ज़िक्र करते हुए कहा ‘मोदीजी ने आतंकवादियों को मारा।‘ नीचे दिए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कैसे युवक ने दिग्विजय को मुँहतोड़ जवाब दिया।

युवक का इतना कहना था कि मंच पर उपस्थित कॉन्ग्रेस नेताओं ने माइक को युवक से अलग कर दिया। फिर उन्होंने युवक को मंच से नीचे उतार दिया। दिग्विजय ने इसके बाद अपना भाषण फिर से चालू किया। विपक्षी नेताओं के भाषण में उपस्थित लोगों द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रशंसा करना अब आम बात होती जा रही है। आज सोमवार (अप्रैल 22, 2019) को ही तेजस्वी यादव की रैली में उपस्थित कई लोगों ने न सिर्फ़ मोदी-मोदी के नारे लगाए बल्कि कहा कि वे तो तेजस्वी की सभा में हैलीकॉप्टर देखने आते हैं। इसका भी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक की रैली में भी लोग मोदी की प्रशंसा कर चुके हैं।

दिग्विजय सिंह का उक्त वीडियो भोपाल की रैली का है। भोपाल में भाजपा ने दिग्विजय के ख़िलाफ़ साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को उतारकर चुनावी माहौल गरमा दिया है। 71 वर्षीय दिग्विजय ने साध्वी प्रज्ञा का भोपाल में स्वागत करते हुए एक वीडियो भी जारी किया, जिसमें उन्होंने माँ नर्मदा का जिक्र किया। साध्वी प्रज्ञा ने कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा उन पर लगाए गए आतंकवाद के दाग को मुद्दा बनाया है और लोगों की सहानुभूति भी उनकी तरफ़ दिख रही है। 9 वर्षों तक जेल में रहीं साध्वी ने अपने ऊपर किए गए अत्याचारों को चुनावी मुद्दा बनाया है। हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने भी उनका खुला समर्थन किया और कहा कि कॉन्ग्रेस विरोधियों को फँसाने के लिए मनगढंत चार्ज लगाती है।

मध्य प्रदेश में साध्वी बनाम दिग्विजय मुक़ाबले के लिए दोनों पार्टियों ने कमर कस ली है। जब साध्वी प्रज्ञा ने दिग्विजय को ‘भगवा आतंकवाद’ का सूत्रधार बताया तो दिग्विजय ने पलटवार करते हुए कहा कि ‘हिन्दू आतंकवाद’ शब्द उन्होंने नहीं गढ़ा है। नामांकन भरने के बाद दिग्विजय ने कहा कि उनकी डिक्शनरी में हिंदुत्व शब्द है ही नहीं। साध्वी प्रज्ञा साफ़ कर चुकी हैं कि उन्हें आध्यात्मिक जीवन पसंद है लेकिन वो सिर्फ़ और सिर्फ़ भगवा आतंकवाद जैसे शब्द गढ़ने वालों को हराने के लिए ही राजनीति में आई हैं। दिग्विजय ने भी अब अपने ट्वीट्स में ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और सनातन धर्म की बातें करनी शुरू कर दी हैं।

कश्मीरी पंडितों से इतनी नफरत क्यों राहुल गाँधी? आप तो ‘दत्तात्रेय-कौल ब्राह्मण’ हो!

राहुल गाँधी, नमस्कार!

इस खत की शुरुआत मैं अपने परिचय के साथ करती हूँ। मेरा नाम साक्षी है और मैं एक कश्मीरी पंडित हूँ। मेरा जन्म विश्वामित्र-वशिष्ट के गोत्र में हुआ था। हालाँकि एक कश्मीरी युवक के साथ शादी होने के बाद मेरा गोत्र पत स्वमीना कौशिक हो गया है। हमारे समाज में जो गोत्र प्रणाली है, उसके बारे में आपके ज्ञान पर मुझे जरा सा भी शक नहीं है। आपने नवंबर 2018 में पुष्कर में एक मंदिर का दौरा करने के दौरान अपने आपको दत्तात्रेय (कौल) ब्राह्मण बताया था। आपके इस ख़ुलासे से राजनीतिक गलियारे में हलचल पैदा हो गई थी और आपको काफी नाराजगी का सामना भी करना पड़ा था।

जहाँ तक मुझे याद है और सार्वजनिक रिकॉर्ड में है, उसके हिसाब से आपके दादा जी फिरोज गाँधी थे, जो पारसी थे। हालाँकि आपके पिता और स्वर्गीय प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी की आस्था पर भी शक है। मैं आपको बता दूँ कि गोत्र परंपरागत रूप से एक पीढ़ी से दूसरे पीढ़ी तक जाते हैं। जिस तरह से आपको अपना उपनाम अपने पिता से विरासत में मिला, उसी तरह से गोत्र भी आपको अपने पिता से विरासत में मिला होगा। वास्तविकता तो यह है कि आप गोत्र को नहीं चुन सकते, बल्कि गोत्र आपको चुनता है। मैं आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि गोत्र कोई कमोडिटी (बिकाऊ वस्तु) नहीं है, जिसे आप अपनी इच्छा और राजनीतिक जरूरतों के लिए उधार ले सकते हैं या फिर त्याग कर सकते हैं। मुझे आशा है कि आपके संदेहास्पद दावे पर मेरे न्यायसंगत संदेह के मेरे अधिकार से आप सहमत होंगे।

मैं आपकी राजनीतिक विवशता को समझ सकती हूँ; आप वर्षों से भारत में राजनीतिक परिदृश्य में एक मुकाम पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। फिर भी कमोबेश सफलता आपके हाथ नहीं आती लग रही है। आप राजनीतिक परिवार यानी नेहरू-गाँधी परिवार में पैदा होने के लाभ को भुनाने में भी सक्षम नहीं हैं। आश्चर्य की बात यह है कि मेरे 8 साल के बेटे समेत हममें से अधिकतर आम भारतीय मानते हैं कि आप भारतीय राजनीति में बेमेल हैं। मेरे बेटे का विचार है कि आपको सक्रिय राजनीति छोड़कर प्राथमिक रूप से कॉमेडी को तवज्जो देनी चाहिए। आप अपने कॉमिक और अबोधगम्य भाषणों से उसे अचंभित करने से नहीं चूकते। वह कहता है कि आप और राजनीति एक विरोधाभास है!

आप जिस तरह की राजनीति करते हैं और आपकी जो विचारधारा है, उसे व्यक्तिगत तौर पर मैं समझ नहीं पा रही हूँ। वैसे तो आप काफी पक्षपाती हैं, लेकिन धर्मनिरपेक्षता की आड़ में उसे छिपाने का काम किया गया है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि भारतीयों के एक विशेष वर्ग में आपकी तरह की धर्मनिरपेक्षता की भूख है, जो स्पष्ट रूप से हिन्दू-विरोधी भावनाओं में तब्दील हो जाती है।

मिस्टर गाँधी, यह एक खुला रहस्य है कि आपके राजनीतिक दुस्साहसों को वामपंथी लुटियन तंत्र द्वारा छिपाया जाता है और उसे ‘सफेद’ कर दिया जाता है। ऐसा देखा गया है कि सार्वजनिक जीवन में आपकी छवि को साफ-सुथरा दिखाने के लिए मुख्यधारा की मीडिया ने आपका खूब समर्थन किया और आपकी छवि को बेहतरीन बनाने की काफी कोशिश की है। मगर उनके इतनी सफाई से किए प्रयासों के बावजूद, सोशल मीडिया पर आपकी छवि लगातार बिगड़ रही है। आपके झूठ का पर्दाफाश हो रहा है और साथ ही आपके संदेहास्पद इरादे भी उजागर हो रहे हैं।

मिस्टर गाँधी, मैं आपसे कुछ प्रश्न पूछती हूँ। आप जिस समुदाय को अपना कहते हैं, उस समुदाय के प्रति आपके मन में इतनी नफरत क्यों है? मैं ऐसा इसलिए कह रही हूँ क्योंकि भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष के रूप में आप, एक कश्मीरी दत्तात्रेय (कौल) ब्राह्मण, अपने समुदाय के कल्याण की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं? 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कॉन्ग्रेस की तरफ से जारी किए गए घोषणा-पत्र में क्या उस कश्मीरी पंडित समुदाय के लिए एक शब्द का भी उल्लेख नहीं करना चाहिए था, जिस समुदाय के होने का आप दावा करते हैं?

मिस्टर गाँधी, अब आप कृपया यह मत कहिएगा कि आपको इसके बारे में सूचित नहीं किया गया या फिर आप अपनी पार्टी के घोषणा पत्र की सामग्री से ही अनजान थे। यह किसी राजनीतिक दल के प्रमुख के रूप में आपकी स्थिति के लिए बहुत ही निराशाजनक और अपमानजनक होगा। वास्तव में इन दिनों आप पूरे देश में रैलियों में जाकर इसी घोषणा-पत्र के आधार पर ही मतदाताओं से वोट देने की अपील करते हैं। पर इतनी स्पष्ट चूक के बावजूद, मैं आपको लेकर हैरान क्यों नहीं हूँ? इसलिए कि बहुत समय पहले से ही आपके इरादों के बारे में ऐसी बातें कही जा रही थीं।

हिंदुओं के प्रति, हमारे समुदाय के प्रति, आपकी अनभिज्ञता और हिंदुओं के प्रति आपकी घृणा आपके व्यवहार से स्पष्ट है। आपके घोषणा-पत्र में जम्मू और कश्मीर के लिए स्वाभिमान वाले सेक्शन में कश्मीरी हिंदुओं पर एक भी शब्द शामिल नहीं किया गया। तथ्य यह है कि आपको हमारी दुर्दशा और पुनर्वास की कोई परवाह नहीं। वास्तव में आपको सिर्फ अपनी झूठी हिंदुत्ववादी छवि की चिंता है। आपके पास अपने राजनीतिक विरोधियों के आरोपों के लिए इस छवि को महज एक राजनीतिक ‘काट’ के रूप में रखने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

आपकी स्पष्ट नफरत के बावजूद आप चाहते हैं कि हम आप पर भरोसा करें और आपको अपने नेता के रूप में स्वीकार करें! लेकिन कैसे? मैं अपनी अंतरात्मा को धोखा नहीं दे सकती।

एक तरफ तो आप महिलाओं का मसीहा होने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ आप बेहद ही चतुराई से अनुच्छेद-35A पर स्टैंड लेने से बचते हैं। यह आश्चर्यजनक है क्योंकि हर कश्मीरी पंडित इसको लेकर परेशान है। आपको 35A की ख़ामियों से बख़ूबी वाकिफ होना चाहिए था, जिससे हर कश्मीरी पंडित महिला नफरत करती है। 35A जम्मू-कश्मीर की हर एक बेटी के लिए एक बुरा सपना है जो अपनी जाति/राज्य के बाहर शादी करना चाहती है। यह उसके मौलिक अधिकारों को दाँव पर लगाता है, जो कि उसके लिए न्यायसंगत नहीं है। मेरे राज्य की महिलाएँ इस अनुच्छेद के खतरों से अवगत हैं। आश्चर्य है कि आपको इस विषय पर अधिक जानकारी नहीं है और इसी वजह से मुझे गुस्सा आता है।

खुशबू एक कश्मीरी पंडित महिला हैं। उन्होंने गैर-कश्मीरी युवक से शादी की और फ़िलहाल बेंगलुरु में रहती हैं। उनके अंदर अनुच्छेद 35A को लेकर काफी गुस्सा है, क्योंकि यह उनके अधिकारों के साथ विश्वासघात करता है। उनका कहना है कि कश्मीरी पंडित और ऋषि कश्यप की भूमि होने के बावजूद, कानून उनके प्रति और उनके समुदाय से बाहर शादी करने वाली हर लड़की के प्रति भेदभावपूर्ण रवैया अपनाता है। वह आगे कहती हैं कि यह अनुच्छेद जम्मू और कश्मीर के नागरिक के रूप में उनके मौलिक अधिकार को छीन लेता है। राहुल गाँधी, यह निराशाजनक है कि आप जैसे अधिकांश राजनेता इस तथ्य से बेखबर हैं कि 35A उन्हें उनकी पहचान, आवाज, भाषा और संस्कृति से अलग कराता है। वह चाहती हैं कि इस तरह के कानूनों को निरस्त किया जाए, लेकिन वो मानती हैं कि किसी को भी इसकी परवाह नहीं, क्योंकि उनके समुदाय को वोट बैंक के रूप में नहीं देखा जाता है। खुशबू जैसी कई लड़कियाँ हैं, जिन्हें इस कड़वी सच्चाई के साथ जीना पड़ता है। अफसोस की बात तो यह है कि अनुच्छेद 35A, जो हमारे अधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है, इंडियन नेशनल कॉन्ग्रेस या फिर किसी भी कॉन्ग्रेसी नेता के लिए चर्चा योग्य विषय नहीं है।

इसके विपरीत, एक विदेशी माँ की कोख से इंग्लैंड के रोचफ़ोर्ड में पैदा हुए भी उमर अब्दुल्ला को इस तरह की किसी समस्या का सामना नहीं करना पड़ा। वो 5 जनवरी 2009 से लेकर 8 जनवरी 2015 के बीच राज्य के 8वें मुख्यमंत्री बने। उनकी गठबंधन सरकार को आपकी पार्टी का समर्थन प्राप्त था। तो, मिस्टर गाँधी, अगर पुरुष इस अनुच्छेद से बँधे हुए नहीं हैं, तो फिर केवल महिलाएँ ही क्यों? मुझे यकीन है कि आप इस सवाल का कोई तार्किक जवाब देने की बजाए चुप्पी साधना पसंद करेंगे।

आपका यह ढुलमुल रवैया चिंताजनक और विचारनीय है। आप एक नकली हिंदू हैं और यह यूपी के हिंदू गढ़ अमेठी और केरल के मुस्लिम बहुल वायनाड में आपकी उपस्थिति के अंतर से स्पष्ट हो गया है। वास्तव में आपका रवैया हास्यास्पद है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्रों में जनता से रूबरू होते हुए आपको अपने आप पर भरोसा नहीं रहता। या फिर आप अपनी पहचान को लेकर असमंजस में ही रहते हैं?

अब वापस से इस बिंदु पर आते हुए इस बात को समझने में मैं असफल हूँ कि कैसे आप एक हिंदू जनेऊधारी होकर भी अपने ही समुदाय/धर्म के साथ हो रहे दुर्व्यवहार को देखते हुए भी सहिष्णु बने हुए हैं? न तो आपने कभी हमारे लिए आवाज उठाई और ना ही कभी कोई चिंता जाहिर की। आप हमारे नरसंहार और 7वें पलायन के लिए जिम्मेदार अपराधियों को कानून के सामने लाने के बारे में मुखर नहीं हैं, क्यों? इसके इतर, मैंने हमेशा आपको हिंदू-विरोधी ताकतों के साथ खड़ा पाया है। बड़े दुख की बात है कि आप एक उग्र विचारधारा के लोगों के साथ खड़े हो कर उनका और उनकी माँगों का समर्थन करते हैं, लेकिन आप उस जगह पर बिल्कुल ही चुप्पी साध लेते हैं, जहाँ पर आपसे कश्मीरी पंडित समुदाय की ओर से कुछ बोलने की उम्मीद की जाती है।

यह वाकई बड़ा दुखद है कि एक आदमी, जो कश्मीरी हिंदू होने का दावा करता है, वह “भक्त” शब्द के बारे में पूरी तरह अंजान है। मिस्टर गाँधी आपकी जानकारी के लिए बता दूँ कि भक्त महज एक शब्द नहीं है, बल्कि ये शब्द उन लोगों की भावनाओं से जुड़ा हुआ है, जो वास्तव में हिंदू हैं। मगर अफसोस! आप जैसे नकली हिंदू कभी भी इसका गूढ़ अर्थ नहीं समझ पाएँगे।

इसलिए, मिस्टर गाँधी, मैं आपसे आग्रह करती हूँ कि आप अपनी राजनीतिक यात्रा का आत्मविश्लेषण करें और इसे गंभीरता से लें। एक बार के लिए, इस बाहरी लबादे को हटाकर अपने अंतर्मन में झाँके और अपनी आत्मा के प्रति सच्चे रहें। कुछ ऐसा करें, जो करना आपको वाकई में पसंद हो। यह हमारे हित में (और आपके भी) सबसे अच्छा होगा कि आप राजनीति से संन्यास लें और एक शांत तथा गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत करें। शायद आप राजनीति के लिए नहीं बने हैं, एक बार इसके बारे में जरूर सोचें।

भविष्य में आपके प्रयासों के लिए आपको शुभकामनाएँ। आपकी बुद्धि सही रहे, यही मेरी कामना है!

वामपंथी आतंकवाद और आईसिस के मजहबी जिहाद में कोई अंतर नहीं, बिलकुल नहीं

सबसे पहले मैं यह साफ कर देना चाहता हूँ कि मुझे न तो इससे मतलब है कि पहले के तथाकथित क्रांतिकारी लेनिन, माओ या विचारक मार्क्स ने क्या लिखा था, उनके विचार क्या थे, न ही इससे कि किसी आतंकी के हाथों की आसमानी किताब किसी मज़हब के बारे में क्या कहती है। मतलब इसलिए नहीं है कि विचारों का, या किताबी बातों का, सच्चाई और जमीनी हक़ीक़त से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। इसलिए, मैं किसी के विचारों के नाम पर, किसी किताब की कुछ आयतों के नाम पर जो हो रहा है, उसमें ज्यादा रुचि रखता हूँ, बजाय इसके कि कहीं दूसरी जगह यह कहा गया है कि हम तो शांतिप्रिय लोग हैं, या हम सर्वहारा की क्रांति कर रहे हैं।

मैं उन प्रतीकों का, उन बातों के वीभत्स रूप को हर रोज झेल रहा हूँ, इसलिए मैं अपने अनुभव, अपने समाज के अनुभव और अपने आस-पास देख कर बातें करूँगा न कि लेनिन ने जो हत्याएँ कराईं, माओ ने जो सामूहिक नरसंहार कराए, उसके पीछे की वजह क्या थी। मुझे इससे कोई मतलब नहीं है कि फ़लाँ किताब के फ़लाँ चैप्टर में यह लिखा है कि एक मानव की हत्या पूरे मानवता की हत्या है, क्योंकि ये कहने की बातें हैं, इनका वास्तविकता से कोई नाता नहीं है।

वामपंथ क्या है? एक ख़ूनी विचारधारा जिसका नाम लेकर भारत में पिछले 20 सालों में 12000 हत्याएँ कर दी गईं जिसमें 2700 सुरक्षा बलों का बलिदान शामिल है। ये हत्या किसके नाम पर हुई? ‘पीपुल्स’ यानी आम जनता के नाम पर, सर्वहारा के नाम पर। मरने वाले कौन थे? प्राइवेट जेट से घूमने वाले जॉन ट्रवोल्टा टाइप के लोग, या प्राइवेट आइलैंड में छुट्टियाँ बिताने वाले जॉनी डेप्प की हैसियत वाले?

जी नहीं, भारत में नब्बे प्रतिशत लोग या गरीब हैं, या बहुत ज़्यादा गरीब हैं। मरने वाले आँकड़े सरकारी हैं, और जो मरे हैं, वो अधिकतर वैसे लोग हैं जो भारत के सीमित संसाधनों के बीच किसी तरह जीवनयापन कर रहे थे। वो भी वही आम इन्सान थे जिनका नाम इनके पीपुल्स वार ग्रुप से लेकर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी या कम्यून की बातों में होता है।

हत्या तो महज़ एक संख्या है जो बड़ी या छोटी हो सकती है, जिसे हम या आप आँक सकते हैं, लेकिन उन 68 जिलों का क्या जहाँ माओवादी या नक्सली आतंक के साए में लोग जीने को मजबूर हैं? क्या उस डर को आँका जा सकता है? क्या उन बच्चियों पर किए गए बलात्कार, उन परिवारों पर की गई हर रोज की हिंसा को संख्या में आँका जा सकता है? शायद नहीं।

‘सर्वहारा’ शब्द इन वामपंथी आतंकवादियों के लिए एक ढाल है। ‘जन आंदोलन’ इनके निजी स्वार्थ के लिए पावर तक पहुँचने का एक ज़रिया मात्र है। आप खूब ढोल और डुगडुगी बजा लीजिए और क्रांति के गीत गाइए, लेकिन हर वामपंथी नेता के पीछे हिंसा और व्यभिचार की मेनस्ट्रीमिंग आपको दिख जाएगी। ‘तुम्हारी देह कम्यून की संपत्ति है’ जैसे जुमले सुना कर महिला काडरों का सेक्सुअल मोलेस्टेशन और रेप, इन कामपंथियों का ट्रेडमार्क है।

इनके नेताओं को कभी सुनिए कि कैसे इन्होंने शब्दों का सहारा लेकर सपने दिखाए हैं और जहाँ भी इन्होंने राज किया है, वहाँ पोलिटिकल किलिंग्स की बाढ़ ला दी है। मुझे याद आता है इसी विचारधारा के एक नेता का बयान जो सीपीएम जेनरल सेक्रेटरी विजयन थे, जिसने अपने पार्टी के लोगों को बंगाली कम्यूनिस्टों का तरीक़ा अपनाने को कहा था कि विरोधियों को ज़िंदा गाड़ दो नमक की बोरियों के साथ कि उनकी हड्डियाँ भी पुलिस को न मिले। इस एक वाक्य से भारत के दो कम्युनिस्ट शासित राज्य की सच्चाई बाहर आ जाती है। इन दोनों के राज्य में कितनी राजनैतिक हत्याएँ हुई हैं, वो गूगल कर लीजिए।

अब इस बात पर चर्चा कि मैंने इन्हें आईसिस के जिहादियों से क्यों जोड़ा। बहुत आसान है इन्हें ऐसा मानना। दोनों ही विचारधाराएँ आतंकी हैं, हिंसक हैं, और लोगों की जान लेना इन दोनों में जस्टिफाइड है। इस्लामी आतंकी कहते हैं कि मज़हब के नाम पर सारी मार-काट सही है, माओवंशी कामपंथी और लेनिन की नाजायज़ औलादें कहती हैं कि क्रांति की राह में जो भी आएगा निपटा दिया जाएगा।

दोनों के लिए फ़ंडिंग भी बाहर से ही आता है। अपहरण करके पैसा जुटाना दोनों का मुख्य काम रहा है। धमकी और वसूली से पैसा माँगना भारत में हर नक्सल प्रभावित क्षेत्र में एक मुख्य तरीक़ा रहा है। दोनों ही तरीक़ों में बाहरी देशों का खूब इन्वॉल्वमेंट है। दोनों ही तरीक़ों में पोलिटिकल हैंडलिंग और संरक्षण, अपने हितों को देखते हुए राष्ट्र या राज्य की सत्ता देती रही है।

एक तरफ लक्ष्य सबको एक ख़लीफ़ा के नीचे लाना है, दूसरी तरफ कम्यून है। एक तरफ इस्लाम मज़हब और मुस्लिम होना, अपने समाज और देश से बड़ी चीज है, दूसरी तरफ कम्यून के लिए समर्पण इतना प्रबल कि भारत और चीन लड़े तो भारतीय कम्युनिस्ट चीन के साथ खड़े दिखते हैं। विचारधारा सर्वोपरि हो जाती है, और उसके रास्ते में काफ़िर आए तो मारा जाता है, काटा जाता है, गोलियों से छलनी कर दिया जाता है, शांतिदूत बन कर बाज़ारों में फट जाता है या फिर सड़कों पर ट्रक चला कर लोगों को रौंद देता है।

दूसरी तरफ, कम्यून इतना सर्वोपरि हो जाता है कि सीआरपीएफ़ के जवानों को, स्कूली मास्टरों को, उन सरकारी लोगों को जिनके घर में वो अकेले कमाने वाले हों, बहुत गरीब तबके से आते हों, घेर कर मारने में ये एक बार सोचते भी नहीं। खुद घिर जाने पर बच्चों को ढाल बना कर बचते हैं, और अपने कम्यूनिस्ट कामरेड (कॉमरेड नहीं, कामरेड) की लाश में भी बम सिल देते हैं कि उसकी लाश में भी धमाका करके दो-चार और गरीब घरों के जवानों की बलि वामपंथ के नाम पर चढ़ जाए।

दोनों ही विचारधाराएँ, ख़ौफ़ और आतंक के आहार पर ज़िंदा हैं, और ये जिन लोगों की बेहतरी के सपने बेचते हैं, वो मुस्लिम इन इलाकों में सबसे बदतर जीवन जीता है, और वो गाँव वाले बुनियादी सुविधाओं से दूर हैं। बात यह है कि अगर गाँव वाले तक सड़क, स्कूल, हॉस्पिटल पहुँच गए तो फिर इन वामपंथी आतंकवादी नरपिशाचों के जीवन का परपस, यानी लक्ष्य ही खत्म हो जाएगा। क्योंकि जेनएनयू जैसे संस्थानों में चलने वाली दारू की महफ़िलों में, गाँजे के ज्वाइंट फूँकते कामरेड ज्ञान तो बहुत बाँट देते हैं, शब्द तो बहुत जुटा लेते हैं, लेकिन इनकी निजी जिंदगी और इनके आदर्शों की बात में ज़मीन आसमान का फ़र्क़ है।

दोनों ही विचारधाराएँ आम जनता, गरीब, निर्दोष, निर्बल लोगों की लाशों के ख़ून से लाल और काले हो चुके झंडों के नीचे चलती हैं। दोनों के प्रवर्तकों ने भले ही मजहब और विचारों में ‘नशे’ आदि को नकारने की बात कही हो, लेकिन नशा और नशे में धुत्त आतंकी, इसी अफ़ीम को लोगों तक पहुँचा कर रिक्रूट करते हैं। नशा सिर्फ नशीली वस्तुओं का नहीं होता, नशा तो बातों का भी हो सकता है कि देखो वो दिन जब पूरा विश्व इस्लाम के झंडे तले होगा, देखो वो दिन जब पूरी दुनिया सर्वहारा के पैरों तले होगी।

किस जगह, किस नेता ने सर्वहारा को दुनिया दे दी? आईसिस के इस्लामी मूल्यों के तथाकथित रक्षक रात में महिलाओं का बलात्कार करते हैं, और दिन में कहते हैं बुर्क़ा पहन कर चलो, वरना दूसरे मर्द तुम्हें देख लेंगे। वैसे ही, लम्पट कामपंथी हास्यास्पद तरीके से लोकतांत्रिक मूल्यों की बात करता है, और अपने विरोधियों को ज़िंदा दफ़नाने, बीच सड़क काट देने, और स्टेट मशीनरी का दुरुपयोग करके सैकड़ों लोगों को गायब करने से हिचकिचाता नहीं। इनकी नई पौध, लिंगलहरी कन्हैया बेगूसराय के कोरैय गाँव में विरोध का काला झंडा देखने पर अपने गुंडे छोड़ देता है और जो घर में घुस कर लोगों को पीटते हैं, सर फोड़ देते हैं।

इसलिए, जो ज़मीन पर है उसकी बात करते हैं। जो हो रहा है, उसकी ही बात होनी चाहिए। मार्क्स ने किस समाज की बात की थी, और उसके विचारों से प्रभावित तमाम राष्ट्र और नेता कैसे तानाशाह बन गए, उसे भी याद रखना ज़रूरी है। इस्लाम अगर शांति का मज़हब है, तो फिर उसके नाम पर जो हर दूसरे दिन लोगों को मारा जाता है, उस पर इस्लाम चुप कैसे है?

फिर मैं, किताब में क्या लिखा है, और कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो में कौन सी बात कही गई है, उससे क्या मतलब रखूँ? लिखा तो हमारी भी किताबों में बहुत कुछ था जिसमें इसी इस्लामी आतंक की आग लगा दी गई थी। कहने को तो जेएनयू में भी शिक्षा दी जाती है, और स्वतंत्रता है लेकिन वहाँ ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ का नारा तो लगता है।

फिर कम्यूनिस्टों के सत्ता से विरोधियों को किसी भी क़ीमत पर हटाने और आईसिस के ख़िलाफ़त के लक्ष्य में कौन-सा अंतर है? दोनों ही रक्तरंजित विचारधाराएँ हैं। उसके लिए इनके मैनिफेस्टो और मार्क्स की दाढ़ी कितनी अच्छी थी पर मैं क्यों स्खलित होता रहूँ, मेरे लिए तो इनके झंडे का लाल रंग उन करोड़ों लोगों की सामूहिक हत्या का रंग है जो इस आतंकी नक्सल माओवादी लेनिनवादी कामपंथी विचार की बलि चढ़ गए।

इसलिए, जब मैं लिखता हूँ कि अब ऐसी क्रांतियों की प्रासंगिकता नहीं है, तब मैं यह कहना चाहता हूँ कि अब दुनिया से ज़ारशाही और राजाओं का चलन जा चुका है। अब सर्वहारा ही वोट कर के अपने नेता को चुनती है। अब सर्वहारा के ही सर पर कोई पार्टी छत ला रही है, कोई सिलिंडर दे रहा है, कोई बिजली पहुँचा रहा है, कोई सड़क, हॉस्पिटल, स्कूल।

आयुष्मान योजना क्या सर्वहारा के लिए नहीं? गरीब किसानों के लिए तमाम योजनाएँ क्या सर्वाहारा के लिए नहीं? गाँवों की सड़कें क्या सर्वहारा के लिए नहीं? घरों में लटकते बल्ब क्या सर्वहारा के लिए नहीं? शौचालय की व्यवस्था और साफ होती गंगा क्या सर्वहारा के हिस्से नहीं आती? करोड़ों छतें क्या सर्वहारा के परिवार के लिए नहीं?

फिर ये कम्युनिस्ट लम्पट, कामांध कामरेड, लेनिन और माओ जैसे आतंकियों को अपना आदर्श मान कर किसका भला करने का लक्ष्य लिए चल रहे हैं? सर्वहारा की बात तो हर पार्टी कर रही है। कॉन्ग्रेस भी ‘गरीबी हटाओ’ ही कह रही है, भाजपा भी हर भारतीय पर 1,08,000 रूपए हर साल सब्सिडी या योजनाओं के नाम पर ख़र्च कर रही है। केजरीवाल, मायावती, अखिलेश, लालू, नायडू, ममता, कुमारस्वामी, योगी, मोदी सब तो ग़रीबों की ही बात कर रहे हैं।

फिर किस सर्वहारा को सत्ता दिलाने की योजना बना रहे हैं वामपंथी? मतलब साफ है कि ये सब चोर हैं, जिनका उद्देश्य कुछ और ही है। सर्वहारा को सत्ता किस वामपंथी या समाजवादी व्यक्ति ने दे दी, ये इतिहास जानता है। लालू जैसा सर्वहारा जब सत्ता में पहुँचा तो न सिर्फ अपने समय का सबसे बड़ा घोटाला किया बल्कि जानबूझकर शिक्षा से पूरी आबादी को वंचित रखा। कानून व्यवस्था की बर्बादी को चरम तक ले गया। बंगाल और केरल की बात पहले कर चुका हूँ।

इसलिए, ये जंगलों में छुप कर, अपने स्वार्थ के लिए, देश को तोड़ने, सरकारों को डीएस्टेबिलाइज करने, और दूसरी तरह के आतंकियों के लिए एक सपोर्ट सिस्टम बन कर खड़े हो रहे हैं। इनका उद्देश्य अब चिरकुटों वाला हो गया है जिसमें ये किसी गाँव वाले को वोट करने से रोक देते हैं तो खुश हो जाते हैं। आने वाले पाँच सालों में इनको कॉम्बिंग कर के जंगलों से घसीट कर निकाला जाएगा, और इस विचारधारा के ताबूत में अंतिम कीलें बहुत जल्द ठोकी जाएँगी। ज़रूरत थी एक सही तरह के सरकार की, जो आतंकी को आतंकी कहे, वामपंथी चरमपंथी उग्रवादी कह कर, उसे डाउनप्ले न करे।

वो सरकार आई तो ये सिमट गए, वो सरकार फिर आएगी, तो ये लाल सलाम कहाँ जाएँगे, ये कहने की आवश्यकता नहीं है।

कूड़े और बस अड्डे से 87 डेटोनेटर बरामद: आखिर कितनी बड़ी तबाही करना चाहते थे आतंकवादी!

श्री लंका में आतंकी संगठनों के मंसूबे कितने खतरनाक स्तर पर बढ़ गए हैं इसकी एक और बानगी आज देखने को मिली है। ईस्टर पर लगभग 300 के करीब लोगों की बम धमाकों में जान लेने के बाद उनकी योजना और भी हमले करने की थी।

पहले केवल 12, फिर कूड़े में 75 और

बैस्टियन मवाता के निजी बस अड्डे में यह डेटोनेटर पेटा की स्थानीय पुलिस ने बरामद किए हैं। उन्हें पहले तो केवल 12 डेटोनेटर बस स्टैंड के अन्दर से मिले (स्थानीय समय के अनुसार लगभग 1 बजे दोपहर के आसपास), पर फिर वहाँ पर पड़े कूड़े के ढेर को हटाने पर पुलिस ने 75 डेटोनेटर और बरामद किए। यह जानकारी मीडिया से बात करते हुए पुलिस के मीडिया प्रवक्ता एसपी रूवन गुणाशेखरा ने दी।

याद दिला दें कि कल सुबह ईस्टर की प्रार्थनाओं के बीच आतंकवादियों ने श्रीलंका में बम धमाके किए थे। गिरजाघरों और होटलों में हुए इन धमाकों करीब 300 लोग मारे गए थे और 500 घायल हुए थे। मरने वालों में 2 भारतीयों समेत लगभग 36 गैर-श्रीलंकाई नागरिक थे। उसके बाद से हाई-अलर्ट पर चल रहा श्रीलंका आज मध्यरात्रि से आपातकाल में चला जाएगा

नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से मनोज तिवारी के ख़िलाफ़ शीला दीक्षित, कपिल सिब्बल का नाम ग़ायब

कॉन्ग्रेस ने अपने लोकसभा उम्मीदवारों की नई सूची जारी की है। पार्टी ने दिल्ली की छह सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी है। जहाँ दिल्ली कॉन्ग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष शीला दीक्षित नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से चुनाव लड़ेंगी, वहीं पूर्व अध्यक्ष अजय माकन को नई दिल्ली से उतारा गया है। कयास लगाए जा रहे हैं कि भाजपा नई दिल्ली से क्रिकेटर गौतम गंभीर को उतार सकती है। चाँदनी चौक से पिछली बार कॉन्ग्रेस की तरफ़ से कपिल सिब्बल ने चुनाव लड़ा था। पिछले चुनाव में तीसरे स्थान पर रहे सिब्बल को डॉक्टर हर्षवर्धन से मात मिली थी। दूसरे स्थान पर रहे आम आदमी प्रत्याशी आशुतोष भी इस बार चुनाव नहीं लड़ रहे। अतः चाँदनी चौक से आप और कॉन्ग्रेस, दोनों के ही नए कैंडिडेट होंगे।

दिल्ली की 6 सीटों के लिए कॉन्ग्रेस प्रत्याशियों की सूची

चाँदनी चौक से सिब्बल की जगह जेपी अग्रवाल पर भरोसा जताया गया। जय प्रकाश अग्रवाल इससे पहले नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से लोकसभा सांसद रह चुके हैं। 4 बार सांसद रह चुके अग्रवाल ने 1984 में अपना पहला लोकसभा चुनाव जीता था। नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से शीला दीक्षित के उतरने के बाद अब यहाँ का मुक़ाबला दिलचस्प हो गया है। ये दो राष्ट्रीय पार्टियों के प्रदेश अध्यक्षों की लड़ाई होगी। दोनों ही ब्राह्मण हैं और दोनों ही पूर्वांचल से आते हैं। इस सीट पर पूर्वांचलवासियों की अच्छी-ख़ासी तादाद को देखते हुए कॉन्ग्रेस और भाजपा दोनों ने ही उपयुक्त चेहरे पर दाँव खेला है। दोनों में से किसी की भी हार होने उसकी पार्टी के लिए गँवारा नहीं होगा।

ईस्ट दिल्ली से अरविंदर सिंह लवली को उतारा गया है। दिल्ली कॉन्ग्रेस के अध्यक्ष रहे अरविंदर सिंह लवली शीला दीक्षित की कैबिनेट में कई अहम मंत्रालय संभाल चुके हैं। बीच में उन्होंने कॉन्ग्रेस छोड़ दी थी और भाजपा में शामिल हो गए थे लकिन अब वो फिर से अपनी पुरानी पार्टी कॉन्ग्रेस में लौटे हैं और इनामस्वरूप उन्हें लोकसभा टिकट थमाया गया है। वेस्ट दिल्ली से महाबल मिश्रा को टिकट दिया गया है। हाल ही में उनके समर्थकों ने कॉन्ग्रेस मुख्यालय पर धरना देते हुए उन्हें टिकट देने की माँग की थी। समर्थकों ने हंगामा मचाते हुए मिश्रा को पूर्वांचल का चेहरा बताया था। कॉन्ग्रेस ने समर्थकों को नाराज़ न करते हुए उन्हें टिकट दे दिया।

महाबल मिश्रा का मुक़ाबला भाजपा के प्रवेश सिंह वर्मा से होगा। पूर्व केंद्रीय मंत्री और दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश वर्मा ने पिछले आम चुनाव में रिकॉर्ड 2,68,586 वोटों से जीत दर्ज की थी। ये दिल्ली आम चुनाव में जीत का सबसे बड़ा अंतर था। प्रवेश ने इसका श्रेय अपने पिता द्वारा किए गए कार्यों और मोदी लहर को दिया था। नॉर्थ-वेस्ट दिल्ली से कॉन्ग्रेस द्वारा राजेश लिलोठिया पर भरोसा जताया गया है। आम आदमी पार्टी से गठबंधन के विरोधी रहे लिलोठिया दिल्ली कॉन्ग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष भी हैं।

बता दें कि कल रविवार (अप्रैल 21, 2019) को ही भाजपा ने भी दिल्ली की 4 सीटों के लिए प्रत्याशियों के नामों का ऐलान किया था। भाजपा की सूची में मनोज तिवारी, प्रवेश वर्मा, डॉक्टर हर्षवर्धन और रमेश बिधुरी को जगह मिली है। वहीं इंदौर से 8 बार लगातार जीत चुकीं सुमित्रा महाजन ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया है।

VIDEO: तेजस्वी की रैली में लोगों ने लगाए ‘मोदी-मोदी’ के नारे, कहा ‘यहाँ तो जहाज देखने आए हैं’

बिहार में पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव की रैली में आए लोगों ने ‘मोदी-मोदी’ के नारे लगाए। दरअसल, तेजस्वी की रैली में अच्छी-ख़ासी भीड़ थी लेकिन जब लोगों से पूछा गया कि क्या वे राजद समर्थक हैं, तो उन्होंने कहा कि वो तो बस ‘जहाज’ देखने आए हैं। जहाज से उनका तात्पर्य नेताओं के हेलीकॉप्टर से था। लोगों ने कहा कि चूँकि ‘सब कुछ मोदी ने किया है’, इसी लिए वो मोदी को ही वोट करेंगे। सभा में उपस्थित किशोरों व अन्य युवाओं ने भी मोदी को वोट करने की बात कही। इसके बाद सभी ‘मोदी-मोदी’ के नारे भी लगाने लगे। नीचे इंडिया टीवी के एंकर सुशांत सिन्हा द्वारा शेयर किए गए वीडियो में आप देख सकते हैं कि कैसे तेजस्वी की रैली में आए लोग मोदी के गुण गाए जा रहे हैं।

सुशांत सिन्हा ने राजद पर चुटकी लेते हुए कहा कि लोग शूटिंग किसी और फ़िल्म की देख रहे हैं और टिकट किसी और फ़िल्म का ही ख़रीद रहे हैं। बता दें कि बिहार में राजग के ख़िलाफ़ कॉन्ग्रेस, राजद, रालोसपा, हम और वीआईपी ने महागठबंधन बनाया है। बग़ावत झेल रही कॉन्ग्रेस की हालत वैसे भी यहाँ पस्त नज़र आ रही है। पारिवारिक विवादों से घिरे यादव परिवार में भी सब कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। लालू यादव जेल में हैं। ऐसे में राजद नेताओं का कुनबा लगभग बिखरने के कगार पर है।

वहीं दूसरी तरफ़ नीतीश-मोदी के चेहरे के साथ राजग पूरे दम-खम से चुनावी समर में उतर चुका है। स्टार प्रचारक लगातार उड़ान भर रहे हैं। प्रधानमंत्री की भी रैलियाँ हुई हैं। अमित शाह ने कहा है कि इस बार राजग बिहार में 2014 से ज्यादा सीटें जीतेगा।

परमाणु युद्ध का भय दिखाकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने देश को आर्थिक रूप से खोखला किया

कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाड़मेर में चुनावी रैली को संबोधित करते समय कहा कि भारत ने अब पाकिस्तान के परमाणु बम से डरना बंद कर दिया है। उन्होंने कहा कि हमेशा पाकिस्तान के परमाणु बम से हमें डराया जाता था लेकिन हमारे पास भी परमाणु बम हैं और हमने वो दिवाली के लिए नहीं रखे हैं।

बस फिर क्या था, प्रधानमंत्री के इस बयान पर उदारवादी-वामपंथी बुद्धिजीवियों के खेमे के सरदार रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर त्वरित प्रतिक्रिया दी कि नरेंद्र मोदी परमाणु युद्ध छेड़ना चाहते हैं और उन्हें किसी की चिंता नहीं वो केवल अपनी ‘गद्दी’ (पद) की चिंता करते हैं। दूसरी तरफ महबूबा मुफ़्ती ने यहाँ तक कह दिया कि अगर भारत ने अपने परमाणु बम दिवाली के लिए नहीं रखे हैं तो पाकिस्तान ने भी अपने बम ईद के लिए नहीं रखे हैं। यह कहकर महबूबा भारत की जनता को पाकिस्तान के बम से डरा रही थीं।

महबूबा और गुहा के अलावा भी बहुत से लोगों ने प्रधानमंत्री की केवल इस बात को लेकर आलोचना की कि उन्होंने भारत के पास भी परमाणु हथियार होने की बात कही। वास्तव में इस प्रकार की आलोचना शुद्ध अकादमिक रोमांस जैसी होती है, जो प्रायः मार्क्सवाद सी अनुभूति प्रदान करती है। मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ। परमाणु युद्ध और उसके आसपास घूमती विवेचनाएँ ऐसे ही रोमांस का एक अंग हैं।

बार-बार ये कहना कि भारत पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध हो जाएगा और दक्षिण एशिया समाप्त हो जाएगा ये सब निहायत ही बचकानी बातें हैं। वास्तविकता यह है कि कोई भी देश परमाणु युद्ध नहीं चाहता। परमाणु युद्ध का डर दिखाकर देश का मनोबल तोड़ा जाता है और जनता को भयभीत कर लिबरल-वामपंथी एजेंडा सेट किया जाता है। वास्तव में विश्व के हर बड़े देश ने परमाणु अस्त्र इसलिए बनाए ताकि उनके ऊपर परमाणु हमला करने से पहले दूसरा देश दस बार सोचे। इसे ‘deterrence’ कहा जाता है। अब यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता को इस बात की याद दिलाते हैं कि हमारे पास भी परमाणु अस्त्र हैं इसलिए हम दूसरों के बम से सुरक्षित हैं तो इसमें बुरा क्या है?

जनता को परमाणु युद्ध का डर दिखाना आज की बात नहीं है। शीत युद्ध के समय भी अमरीकी बच्चों को स्कूलों में सिखाया जाता था कि जब रूस परमाणु हमला करेगा तो क्या करना होगा। सन ’45 के पश्चात किसी भी देश ने परमाणु बम का प्रयोग किसी अन्य देश पर नहीं किया फिर भी ‘अप्रसार’ तथा ‘निरस्त्रीकरण’ का पाठ प्रत्येक विश्वविद्यालय में जोर-शोर से पढ़ाया जाता है।

जब अमरीका ने बम बनाया तो रूस को मिर्ची लग गई। दक्षिण एशिया में सर्वप्रथम चीन ने बम बनाया तो भारत ने भी बनाया। भारत ने बम बनाया तो पाकिस्तान जल गया। फिर आरंभ हुआ दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन किस प्रकार बिगड़ रहा है इस पर विवेचना की बकैती करने का दौर। विश्वविद्यालयों में Nuclear Disarmament और Non-proliferation पर जमकर शोध किया गया और मोटी-मोटी पुस्तकें लिखी गईं।

बड़े-बड़े विशेषज्ञों ने भारत-पाकिस्तान के मध्य परमाणु युद्ध की संभावनाओं पर प्रश्नोत्तरी के स्वरूप में पुस्तक लिखी। और भी बहुत कुछ लिखा गया और दशकों तक विश्लेषणात्मक टीका-टिप्पणी प्रकाशित की गई। किन्तु इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष लाभ क्या हुआ यह किसी को ज्ञात नहीं। परमाणु युद्ध की आशंकाओं पर इतनी बुद्धि खर्च करने के बाद कोई बहुत बड़ी पॉलिटिकल थ्योरी विकसित नहीं हुई न ही शक्ति संतुलन पर कोई समाधान प्राप्त हुआ। मेरे विचार से इसी को ‘बुद्धिविलासिता’ कहा जा सकता है। प्रख्यात विद्वान प्रो० कपिल कपूर ‘बुद्धिजीवियों’ को बुद्धि बेचकर जीविका कमाने वाला कहते हैं।

परमाणु युद्ध की संभावना के प्रपंच में विज्ञान के उन विषयों पर नीतिगत शोध नहीं हुआ जिनसे जनता का सीधा सरोकार था। उदाहरण के लिए ‘साइंस पॉलिसी’ विषय को लेते हैं। यह ऐसा विषय है जिस पर लेबोरेटरी में शोध नहीं होता। यह विज्ञान के सामाजिक पक्षों के अध्येता सामाजिक विज्ञान फैकल्टी में पढ़ते हैं। विज्ञान को समाज से जोड़ने का कार्य इंडस्ट्री का है लेकिन भारत में उद्योग जगत सदैव उपेक्षित रहा। इसी का लाभ लेकर सरकारी वेतन पर पलने वाले वामपंथी बुद्धिजीवी और सलाहकार जिन पर सरकार को दिशा देने का दायित्व था उन्होंने बेकार के विषयों पर मंथन किया और देश को भ्रमित किया।

सरकार का दृष्टिकोण पूर्णतः विज्ञान की उपलब्धियों पर गाल बजाना नहीं होता अपितु उस अविष्कार का साधारण जनमानस के लिए क्या उपयोग है इस पर केन्द्रित होता है। दुर्भाग्य से साइंस पॉलिसी के संस्थान वामपंथी गिरोह के खेमे के अधीन हैं और वामी गिरोह का मुख्य काम प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान को गाली देना ही रहा है। उनकी समूची ऊर्जा इसी पर खर्च होती है कि भारत के प्राचीन ज्ञान को किस प्रकार ‘छद्म’ तथा महत्वहीन सिद्ध किया जाए।

केमिस्ट्री और कम्प्यूटर साइंस आज के उद्योग जगत की रीढ़ हैं। किन्तु प्रोग्रेसिव सोच के ‘साइंस फिलोसोफर’ इन विषयों पर बात नहीं करते। उदाहरण के लिए जेएनयू में साइंस पॉलिसी के शिक्षक कभी इस पर शोध नहीं करते कि देश में रसायन विज्ञान की किन विधाओं पर शोध हो जिससे इंडस्ट्री को लाभ पहुँचे। वे कभी स्पेस साइंस, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स अथवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्ट सिटी आदि पर बात नहीं करते।

देश के विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय सम्बंध विभाग के अध्ययन क्षेत्र में ‘साइंस डिप्लोमेसी’ जैसा विषय शायद ही पढ़ाया जाता हो। इक्का-दुक्का अध्येता अंतरराष्ट्रीय सम्बंध पर विज्ञान एवं तकनीक के प्रभाव पर निम्न स्तरीय पेपर लिखते मिल जाएँगे जो इधर-उधर से कॉपी पेस्ट किया गया होता है। ये उन्हीं लिबरल-वामपंथी गिरोह के चेले चपाटे हैं जो परमाणु युद्ध की आशंका उत्पन्न कर फर्जी भय बनाते रहते हैं।

परमाणु युद्ध के भय का वातावरण बनाने के अलावा एक और बात गौर करने लायक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात का इतिहास देखें तो ज्ञात होगा कि लिबरल बुद्धिजीवियों से समर्थन प्राप्त माओवाद-नक्सलवाद का विस्तार देश के उन्हीं क्षेत्रों में हुआ जहाँ प्राकृतिक एवं खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। खनिज और जंगल के उत्पाद उद्योग में वृद्धि करते हैं।

उद्योग होगा तो आर्थिक सम्पन्नता होगी। देश आर्थिक रूप से समृद्ध हो यह वामपंथी कैसे होने देंगे? इसीलिए इन्होंने पीछे से नक्सलवाद को समर्थन देकर स्वयं बुद्धिविलासी होना स्वीकार किया ताकि विज्ञान का समाज से कटाव हो सके। जनता यही समझती रही कि विज्ञान तो हमारे किसी काम का नहीं है। ऊपर से परमाणु युद्ध का भय भरा माहौल बनाया गया, इसीलिए भारत द्वारा 1974 में ही परमाणु बम बनाने के बावजूद परमाणु शक्ति का अर्थ विध्वंसक ही समझा जाता रहा। जबकि वास्तविकता यह है कि परमाणु शक्ति संपन्न देश होना गर्व की बात है और तकनीकी दक्षता राष्ट्र की आर्थिक सम्पन्नता के लिए आवश्यक है।

श्री लंका ब्लास्ट: बौद्धों को आतंकी साबित करने पर तुले वामपंथी, अब लिट्टे भी ‘हिन्दू संगठन’

श्री लंका में हुए बम ब्लास्ट दुःखदायी हैं और उससे भी ज़्यादा निंदनीय है उसे लेकर फैलाया जा रहा दुष्प्रचार। अंतरराष्ट्रीय टीवी न्यूज़ चर्चाओं में भी कुछ लिबरल किस्म के लोगों ने इस हमले से हुए नुक़सान पर चर्चा करने की बजाए इतिहास में जाकर श्री लंका में समुदाय विशेष पर हो रहे कथित अत्याचार का ज़िक्र किया। अगर हमला चर्च पर हुआ है तो इसका मुसलमाओं और सिंहलियों के बीच छिटपुट संघर्ष से क्या लेना-देना है? ताज़ा हमले में पीड़ित ईसाई हैं, हमले के पीछे पुलिस उग्र इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकियों का हाथ मान रही है, ऐसे में कुछ लोगों को ज़ल्दबाज़ी हो रही है कि इसके पीछे बौद्धों को दोषी साबित किया जाए। ये वामपंथी विचारधारा के लोग हैं। इनकी पहचान यह है कि ये लोग एकपक्षीय मानवाधिकार की बात करते हैं। ये हर तरह से ये साबित करने में लगे हैं कि कोलंबो में हुए सीरियल ब्लास्ट्स में इस्लामिक आतंकवाद का हाथ नहीं है। आइए इनकी पोल खोलते हैं।

पहले तथ्यों की बात कर लें। नवंबर 2016 में जनवरी में श्रीलंका सरकार ने कहा था कि देश के 32 अच्छी तरह से पढ़े-लिखे और अच्छे परिवारों के समुदाय विशेष वालों ने वैश्विक इस्लामी आतंकी संगठन आईएस में शामिल हो गए हैं। क़ानून मंत्री विजयदासा राजपक्षे ने इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए कहा था कि आईएस में शामिल होने वाले ये लोग ग़रीब या दबे हुए नहीं थे बल्कि अच्छी तरह शिक्षित और इलीट परिवारों से थे। राजपक्षे ने यह भी बताया था कि कुछ विदेशियों ने श्री लंका पहुँच कर इस्लामिक आतंकवाद का प्रचार-प्रसार किया। किसी भी सभ्य समाज में इस बयान के बाद आईएस और उसमे शामिल होने वाले लोगों की निंदा होनी चाहिए लेकिन आइए आपको बताते हैं कि श्री लंका के इस्लामिक संगठनों ने क्या किया?

श्री लंका के मुस्लिम संगठनों के सबसे बड़े समूह ‘द मुस्लिम काउंसिल ऑफ श्रीलंका’ ने मंत्री के इस बयान की ही निंदा कर डाली और उन्हें सबूत दिखाने को कहा। संगठन ने बौद्ध भिक्षुओं द्वारा कथित तौर पर फैलाए जा रहे Racism का जिक्र किया और कहा कि ये कट्टरवादी बौद्ध भिक्षु मुस्लिमों के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं। अगर श्री लंका के मुस्लिम समुदाय ने एकमत से मंत्री के बयान को गंभीरता से लेते हुए अपने समाज में ऐसे लोगों व परिवारों को चिह्नित करने का कार्य किया होता और इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध अभियान छेड़ा होता तो शायद आज श्री लंका को ये दिन नहीं देखने पड़ते। 2014 में श्री लंकाई मुस्लिम संगठनों ने सरकार को आगाह किया था कि मुस्लिम युवा विदेशी आतंकी संगठनों की तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि उन पर बौद्धों द्वारा अत्याचार किया जा रहा है।

यह सबसे बेहूदा कारण होता है किसी भी ग़लत हरकत को ढँकने के लिए। ऐसे लोगों द्वारा कहा जाता है कि कश्मीर में लोगों को प्रताड़ित किया गया तो वे आतंकी बन गए। यही लोग कहते हैं कि श्री लंका में बौद्धों से पीड़ित मुस्लिमों ने आतंकी संगठनों का रुख़ किया। इसी गिरोह विशेष के लोग रोहिंग्या को भारत में बसाने की वकालत करते हुए कहते हैं कि म्यांमार के बौद्धों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के कारण कई रोहिंग्या अपराधी बन गए। ऐसा कहते समय ये लोग भूल जाते हैं कि जिस कश्मीरी पंडित समाज को घाटी से मार-मार कर निकाल दिया गया, उनका ख़ून बहाया गया, उनकी सम्पत्तियाँ छीन ली गईं और उन्हें उनके ही देश में शरणार्थियों की तरह जीवन व्यतीत करने को विवश कर दिया गया, उन पंडितों ने तो कभी हथियार नहीं उठाए। 1984 में कॉन्ग्रेस नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा सिखों का नरसंहार किया गया, वे सिख तो आतंकी नहीं बने? उन्होंने क़ानूनी लड़ाई लड़ी।

जरा इन नैरेटिव पर गौर कीजिए:

  • अगर किसी आतंकी घटना को मुस्लिमों ने अंजाम दिया है तो ज़रूर वे पीड़ित मुस्लिम रहे होंगे।
  • अगर आतंकी पीड़ित नहीं है तो उनका परिवार, समाज ज़रूर पीड़ित रहा होगा।
  • ये भी हो सकता है कि 100 किलोमीटर दूर अपने समाज के किसी व्यक्ति को पीड़ित देखकर वो आतंकी बन गया और लाशें बिछा डाली।
  • प्रताड़ित करने वाला हिन्दू या बौद्ध ही रहा होगा। इनके द्वारा प्रताड़ित किए जाने वाले मुस्लिम आतंकी बनकर लाशें बिछाते हैं तब भी विक्टिम मुस्लिम समाज ही है।
  • अगर घटना के पीछे मुस्लिम आतंकी है तो वो पीड़ित है, वहीं अगर हिन्दू या बौद्ध की तरह ग़लती से कोई अन्य समुदाय का हाथ निकला तब इन वामपंथियों की बल्ले-बल्ले ही है।

श्रीलंका वाली घटना के समय वामपंथियों द्वारा मालेगाँव को याद किया गया। कुछ लोगों ने तो एक क़दम और आगे बढ़कर लिट्टे को एक हिन्दू संगठन बताते हुए उसके द्वारा किए जाने वाली आतंकी वारदातों को हिन्दुओं द्वारा की गई साबित करना चाहा। क्या ये सबका यह सही समय था? लिट्टे ने अपने अजेंडे में ख़ुद को सेक्युलर बताया था। वो ‘तमिल अधिकार’ के लिए लड़ने का दावा करते थे। लिट्टे के आतंकियों ने कभी ख़ुद को हिन्दू धर्म के लिए लड़नेवाला नहीं बताया बल्कि उनकी पूरी लड़ाई तमिल बनाम सिंहला केंद्रित थी। जहाँ लिट्टे ख़ुद को डंके की चोट पर सेक्युलर और धर्मनिरपेक्ष संगठन मानता रहा, ऐसे में उसे हिन्दू ठहराना जायज़ है क्या? संजातीय अल्पसंख्यकों के आतंकी संगठन को जबरन हिन्दू ठहराने की कोशिश की गई।

इसी तरह वामपंथी कविता कृष्णन ने श्रीलंका ब्लास्ट्स को लेकर किए गए ट्वीट में ‘बौद्ध कट्टरवाद’ को हाइलाइट करते हुए कहा कि भले ही इसमें उनका हाथ हो या न हो, ये ब्लास्ट्स मालेगाँव की तरह हैं। अगर स्केल और प्लानिंग की बात करें तो श्री लंका में हुए ब्लास्ट्स मालेगाँव से कहीं ज़्यादा वीभत्स हैं। मालेगाँव की तरफ 2-3 नहीं बल्कि 8 बम फटे और 40-50 नहीं बल्कि लगभग 300 लोगों के मारे जाने की आशंका है। हालाँकि, किसी साधारण हमले में एक व्यक्ति की जान जाती है तो भी यह अपूरणीय क्षति है लेकिन 300 लोगों की जान लेने वाले ब्लास्ट्स को लेकर प्रोपेगेंडा फैला रहे वामपंथियों ने बौद्धों को आतंकी साबित करने का नंगा ठेका रखा है।

इस वर्ष जनवरी में श्री लंका पुलिस ने कई डेटोनेटर और विस्फोटक सामग्रियाँ ज़ब्त की थी। क्या आपको पता है ये सामग्रियाँ किन लोगों से ज़ब्त की गई थी? इस्लामिक आतंकियों से। इतना ही नहीं, पुलिस ने चार मुस्लिमों को गिरफ़्तार भी किया था। स्थानीय इस्लामिक आतंकी संगठन ‘नेशन तोहिथ जमात’ द्वारा चर्चो को निशाना बनाए जाने को लेकर सुरक्षा एजेंसियों को भी कुछ इनपुट्स मिले थे। अगर 2016 में श्री लंकाई मुस्लिमों के आईएस जॉइन करने और इस वर्ष कुछ मुस्लिमों के विस्फोटकों के साथ पकड़े जाने वाली घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर बहुत हद तक साफ़ हो जाती है लेकिन वामपंथियों को किसी भी हमले के बाद हिन्दुओं व बौद्धों को आतंकी साबित करने की जल्दी रहती है। अगर आतंकी मुस्लिम निकल आए तो ये उन्हें हिन्दू या बौद्ध कट्टरवाद से पीड़ित बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी।

बोधगया में बौद्ध भिक्षुओं ने श्री लंका ब्लास्ट्स में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थनाएँ आयोजित की। उन्होंने कैंडल लाइट मार्च भी निकाला। महाबोधि मंदिर में पीड़ितों के लिए प्रार्थना की गई। ये बौद्ध ईसाई चर्चों पर हुए हमलों के बाद हा-हा नहीं रिएक्ट जार खुशियाँ मना रहे हैं। ये पीड़ितों के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं और अपनी संवेदनाएँ ज़ाहिर कर रहे हैं। ऐसे में, दोनों समुदायों के बीच क्या अंतर है, आप ख़ुद देख लीजिए।