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RaGa इधर उद्योगपतियों को कोसते हैं, उधर अंबानी-कोटक युवा कॉन्ग्रेस नेता को सांसद बनाने के लिए लगाते हैं गुहार

रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड के चेयरमेन मुकेश अंबानी ने मुंबई दक्षिण लोकसभा सीट से कॉन्ग्रेस नेता मिलिंद देवड़ा की उम्मीदवारी का समर्थन किया है। इस सीट पर 29 अप्रैल को चुनाव होना है। एशिया के सबसे अमीर बैंकर उदय कोटक ने भी देवड़ा को अपना समर्थन देने की घोषणा की है।

हाल ही में, देवड़ा ने अपने ट्वविटर हैंडल से एक वीडियो शेयर किया है। इसमें अंबानी कहते हैं, “मिलिंद दक्षिण मुंबई का आदमी है… 10 साल तक दक्षिण मुंबई का प्रतिनिधित्व करने के बाद, मेरा मानना ​​है कि मिलिंद को दक्षिण मुंबई के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पारिस्थितिकी तंत्र का गहन ज्ञान है। उनके नेतृत्व में, छोटे और बड़े उद्यम दक्षिण मुंबई में पनपेंगे।”

एक उम्मीदवार के समर्थन में उद्योगपतियों का खुलकर सामने आना सामान्य नहीं है। इसके अलावा, देवड़ा के लिए अंबानी का समर्थन ऐसे समय में आया है जब कॉन्ग्रेस राफ़ेल सौदे से कथित रूप से लाभ के लिए उनके भाई अनिल अंबानी को लगातार निशाना बना रही है।

मुकेश और अनिल अंबानी अलग-अलग हस्तियाँ हैं: देवड़ा

वीडियो में कोटक कहते हैं, “सही मायने में मुंबई का कनेक्शन देवड़ा है। मेरा मानना ​​है कि मिलिंद दक्षिण मुंबई को समझते हैं, उनका परिवार लंबे समय से मुंबई से जुड़ा हुआ है, उनका परिवार (एक) नई दिल्ली में व्यापार और उद्योग का समर्थक है।” वीडियो में अन्य उद्यमी, व्यापारी और सामान्य नागरिक भी देवड़ा को समर्थन देते दिखाई दे रहे हैं, जिन्हें हाल ही में कॉन्ग्रेस की मुंबई शहर इकाई अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

जहाँ एक तरफ मुकेश अंबानी देवड़ा का समर्थन कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राहुल गाँधी उनके भाई अनिल अंबानी पर हमलावर रुख़ अपनाते रहे हैं। इस स्थिति को लेकर जब देवड़ा से प्रश्न पूछा गया, तो उन्होंने TOI से कहा, “मुकेश और अनिल अलग-अलग हस्तियाँ हैं, दोनों की एक-दूसरे से तुलना करना अनुचित होगा।” उन्होंने एक टीवी चैनल से कहा कि उन्हें इस बात पर भी समान रूप से ही गर्व है कि उन्हें छोटे व्यापारियों और पानवालों का भी समर्थन मिल रहा है।

दिवंगत कॉन्ग्रेस नेता मुरली देवड़ा के पुत्र, मिलिंद को शिवसेना सांसद अरविंद सावंत के ख़िलाफ़ खड़ा किया गया है, जिन्होंने 2014 में उन्हें 1.28 लाख वोटों के अंतर से हराया था। मिलिंद देवड़ा 2004 में पहली बार लोकसभा के लिए चुने गए थे, जब उन्होंने भाजपा के जयवंतीबेन मेहता को 10,000 मतों के अंतर से हराया था। 2009 के चुनावों में, उन्होंने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के बाला नंदगांवकर को 1.12 लाख मतों के अंतर से हराया था।

देवड़ा को इस समय पूरे दक्षिण मुंबई में व्यापारी वर्ग की तरफ से समर्थन मिल रहा है। स्टेनलेस स्टील मर्चेंट एसोसिएशन, बुलियन, रत्न और ज्वेलरी एसोसिएशन ऑफ ज़ावेरी बाज़ार, डायमंड मर्चेंट्स फेडरेशन और अन्य प्रमुख व्यापारिक समूहों ने उन्हें अपना समर्थन दिया है। भारत डायमंड बोर्स में हाल ही में आयोजित एक कार्यक्रम में, भरत शाह ने देवड़ा की प्रशंसा करते हुए कहा कि मुंबई को उनके जैसे नेता की ज़रूरत थी जो चौबीसों घंटे सुलभ रहें।

त्रिपुरा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष की गुंडागर्दी: थाने में घुसकर युवक को जड़ा थप्पड़… लेकिन किस्मत खराब, वीडियो हो गया Viral

त्रिपुरा के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष प्रद्योत किशोर देव बर्मन का एक वीडियो सामने आया है, जिसमें वो थाने में घुसकर एक शख्स को थप्पड़ मारते हुए नजर आ रहे हैं। जानकारी के मुताबिक, जिस शख्स को बर्मन थप्पड़ मारते हुए नजर आ रहे हैं, उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर रखा था। इस शख्स पर प्रद्योत देव बर्मन की बहन व त्रिपुरा कॉन्ग्रेस उम्मीदवार प्रज्ञा देव बर्मन के काफिले पर हमला करने का आरोप है। पुलिस आरोपी शख्स को गिरफ्तार कर उससे पूछताछ कर रही है। इस बीच थाने में घुसकर आरोपी शख्स को थप्पड़ मारने का त्रिपुरा के कॉन्ग्रेस अध्यक्ष प्रद्योत देव बर्मन का ये वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल होने लगा है।

प्रद्योत किशोर को जब आरोपी के गिरफ्तार होने की बात पता चली, तो वो अपने समर्थकों के साथ पुलिस स्टेशन पहुँचे और आरोपी शख्स को जोरदार तमाचा जड़ दिया। पुलिस स्टेशन में मौजूद पुलिस वालों ने बीच बचाव किया, लेकिन प्रद्योत किशोर का पारा सातवें आसमान पर था। वो किसी की भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं थे। पुलिस उप महानिरीक्षक अरिंदम नाथ के अनुसार, आरोपी इंडिजिनियस पीपुल्स फ्रंट ऑफ त्रिपुरा (आईपीएफटी) का समर्थक है।

इस मामले पर बात करते हुए भाजपा के वरिष्ठ नेता रतन लाल नाथ ने कहा कि वीडियो में ये साफ-साफ दिखाई दे रहा है कि कैसे प्रद्योत किशोर ने अपने राजनीतिक विरोधियों को डराने-धमकाने की कोशिश की है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि अगर ये इंसान पुलिस स्टेशन के अंदर किसी शख्स के ऊपर हाथ उठा सकता है, तो फिर तो ये कहीं भी किसी की भी हत्या कर सकता है। त्रिपुरा में 23 अप्रैल को तीसरे चरण में मतदान होना है और आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद भी त्रिपुरा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष का थाने में घुसकर थप्पड़ मारने की घटना उनको मुश्किल में डाल सकती है।

बता दें कि, प्रज्ञा देव बर्मन त्रिपुरा संसदीय सीट से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी हैं और त्रिपुरा ईस्ट से चुनाव लड़ रही हैं। इस मामले में प्रज्ञा का भी बयान सामने आया है। प्रज्ञा ने कहा है कि वो तुलाशिखर में सभा को संबोधित करके लौट रही थी, तभी आईपीएफटी के समर्थकों ने उनके काफिले पर ईंट फेंक कर हमला किया। उन्होंने कहा कि ऐसा लगा था कि इस शख्स के साथ कुछ और लोग भी थे। इसके साथ ही प्रज्ञा ने कहा कि जनता से मिल रहे समर्थन को देखते हुए राजनीतिक ईर्ष्या के तहत उनकी कार पर पथराव करने का प्रयास किया गया।

वहीं, प्रद्योत ने थप्पड़ मारने वाली घटना के बाद कहा, “यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण घटना थी। इस व्यक्ति ने मेरी बहन पर ईंट से हमला किया था, जिससे वह बाल-बाल बचीं। मैं अपने खिलाफ होने वाले हर कार्रवाई के लिए तैयार हूँ, लेकिन मैंने वही किया जो कोई भी भाई या त्रिपुरा का एक जिम्मेदार नागरिक करता।” जबकि आईपीएफटी ने इन आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि उसके समर्थकों ने प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवार के काफिले पर कोई पत्थरबाजी नहीं की थी।

कलियुग का ‘एकलव्य’: BSP को देना चाहता था वोट, गलती से दे दिया BJP को – अफसोस में काट डाली उँगली

लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के तहत गुरुवार (अप्रैल 18, 2019) को उत्तर प्रदेश के आठ सीटों पर वोट डाले गए। इस दौरान बुलंदशहर से एक हैरान करने वाला मामला सामने आया। दरअसल, यहाँ के शिकारपुर क्षेत्र में एक मतदाता को बसपा को वोट करना था, लेकिन गलती से उन्होंने बीजेपी को वोट डाल दिया। जिसके बाद उन्हें अपनी इस गलती से इतना पछतावा हुआ कि उन्होंने जिस उँगली से मतदान किया था उसे ही काट डाला।

जानकारी के मुताबिक, शिकारपुर तहसील के गाँव अब्दुल्लापुर हुलासन निवासी 22 वर्षीय पवन कुमार वोट डालने को लेकर काफी उत्साहित थे। गुरुवार को पवन कुमार मतदान केंद्र पर खुशी-खुशी अपना वोट डालने पहुँचे। निर्धारित प्रक्रिया पूरी करने के बाद जब पवन कुमार ईवीएम पर वोट डालने के लिए गए तो गलती से हाथी के निशान वाला बटन दबाने की जगह कमल के निशान का बटन दब गया।

वीवीपैट मशीन से पवन ने अपना वोट भाजपा को जाते देखा तो उन्हें काफी अफसोस हुआ। इसके बाद वह घर पहुँचे और उसने अपने बाएँ हाथ की तर्जनी उँगली का अगला हिस्सा धारदार हथियार से काट लिया। इसका पता चलने पर परिजनों में हड़कंप मच गया। परिजन तत्काल पवन को अस्पताल ले गए, जहाँ उनका उपचार किया गया। परिजनों के पूछने पर घायल पवन ने सारी बात बताई। उन्होंने सोशल मीडिया ट्विटर पर एक वीडियो जारी करते हुए इसके पीछे का कारण बताया। उन्होंने कहा, “अपनी गलती पर पश्चाताप करने के लिए मैंने अपनी उंगली काटी है।”

पवन कुमार बहुजन समाज पार्टी के समर्थक हैं और वह बसपा-सपा-आरएलडी के गठबंधन के तहत चुनाव लड़ने उतरे प्रत्याशी योगेश वर्मा को वोट देने पहुँचे थे, लेकिन उनसे गलती से वोट भाजपा को चला गया। जिसका पवन को इतना अफसोस हुआ कि उन्होंने गुस्से में आकर अपने आपको सजा देते हुए यह कदम उठा लिया।

मॉडर्न वॉरफेयर का पहला उदाहरण हनुमानजी द्वारा रामायण में दिखाया गया था

म्यांमार और नियंत्रण रेखा (LoC) के पार की गयी सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में तो सभी जानते हैं। परन्तु क्या आपको पता है कि विश्व में पहली सर्जिकल स्ट्राइक किसने की थी? चलिये अपनी समझ से हम बताते हैं। सबसे पहले हम ये समझते हैं कि सर्जिकल स्ट्राइक क्या होती है। इसे समझने के लिए हमें सर्जरी को समझना होगा। शरीर दो प्रकार से अस्वस्थ होता है- पहला तब जबकि शरीर की रासायनिक क्रियाएँ (metabolism) प्रभावित हों, दूसरा तब जब किसी अंग विशेष में विकार उत्पन्न हो।

सामान्यतः किसी अंग विशेष की सर्जरी तभी की जाती है जब औषधियों के सेवन मात्र से व्यक्ति स्वस्थ नहीं हो पाता। यहाँ ध्यान देने वाली बात ये है कि सर्जरी पूरे शरीर की नहीं की जा सकती। किसी अंग विशेष को ही सर्जरी द्वारा ठीक किया जा सकता है जिसके उपरांत समूचा शरीर स्वास्थ्य लाभ करता है। अतः सर्जिकल स्ट्राइक का अर्थ है शत्रु के शरीर रूपी क्षेत्र में भीतर घुस कर किसी विशेष अंग को नेस्तनाबूत कर देना। यह अंग शत्रु का कोई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाना हो सकता है। युद्धनीति में इसे स्पेशल ऑपरेशन कहा जाता है।

शत्रु के चंगुल से किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या व्यक्तियों को छुड़ा लाना भी स्पेशल ऑपरेशन में आता है। सर्जिकल स्ट्राइक जैसा ऑपरेशन सेना की सामान्य टुकड़ियां नहीं करतीं। इस कार्य के लिए विशेष बल (Special Operation Force) का गठन किया जाता है। अब हम रामायण काल में चलते हैं। जब समुद्र तट पर श्रीराम की सेना पहुँची तो प्रश्न उठा कि समुद्र पार कर सीता जी का हालचाल लेने लंका कौन जायेगा। तब जाम्बवंत जी ने हनुमान जी से कहा: “जाम्बवंत कह सुनु हनुमाना, का चुपि साध रहे बलवाना।”

इस पर हनुमान जी को अपने बल और शक्ति का ज्ञान हुआ जो शाप के कारण विस्मृत हो गई थी। उसके पश्चात जो हुआ वो सेना की स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्स के क्रियाकलाप से बहुत मेल खाता है। कथित सर्जिकल स्ट्राइक सेना के सामान्य सैनिक नहीं बल्कि स्पेशल फ़ोर्स के दस्ते करते हैं। हनुमान जी भी पूरी रामायण में विशेष स्थान रखते हैं। हनुमान जी उड़ कर लंका गए थे उसी तरह जैसे किसी भी स्पेशल ऑपरेशन में तीव्र गति से उड़ने वाले विमान का प्रयोग किया जाता है।

अब यह देखिये कि जब सुरसा को चकमा देकर हनुमान जी लंका पहुँचे तो उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण कर लिया। उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि स्पेशल ऑपरेशन में गोपनीयता का बहुत महत्व है। सैनिकों को अपनी पहचान छुपा कर टास्क पूरा करना पड़ता है। इसके पश्चात हनुमान जी इंटेलिजेंस अर्थात गुप्त रूप से सूचना इकठ्ठा करने का कार्य पूर्ण करते हैं। वे जाकर सीताजी से मिलते हैं, अंगूठी दिखाते हैं और पूरा समाचार कह सुनाते हैं। इतना ही नहीं अशोक वाटिका में श्रीराम और सीताजी से सहानुभूति रखने वाली कुछ राक्षसियाँ भी थीं। यानि शत्रु के देश में लॉजिस्टिक्स सपोर्ट देने वाले कुछ लोग भी थे जो स्पेशल ऑपरेशन को आसान बना देते हैं।

हनुमान जी बस एक जगह चूक जाते हैं। जब उनको भूख लगती है तब रावण की बगिया उजाड़ देते हैं। किंतु चूँकि हनुमान जी रुद्रावतार थे इसलिए उनके पास डैमेज कण्ट्रोल के साधन भी थे। अब जरा हिंदी व्याकरण की पुस्तक में अतिशयोक्ति अलंकार के उदाहरण याद कीजिए तो ध्यान आयेगा कि ‘हनूमान की पूँछ में लगन न पाई आग, और लंका ससुरी जर गयी गए निसाचर भाग’। लंका के जलने से आपको यह भी याद आयेगा कि उस कांड में लंका के किसी भी साधारण नागरिक की जान नहीं गयी थी, केवल राक्षस मरे थे और लंका के भवन जले थे वह भी इसलिए क्योंकि रावण को सबक सिखाना था।

इससे मिलता जुलता उदाहरण आप हॉलीवुड की फ़िल्म Lone Survivor में देख सकते हैं जब यूएस नेवी सील के जवान अफगानिस्तान के नागरिकों को इसीलिए छोड़ देते हैं क्योंकि यदि वे उन सामान्य नागरिकों को मार देते तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकार वाले हो हल्ला मचाने लगते। रामायण काल में हनुमान जी ने इसका भी ध्यान रखा था। अंत में यह देखिए कि सब कुछ करने के पश्चात हनुमान जी श्रीराम के पास लौट आये थे। यह स्पेशल ऑपरेशन जैसा ही था क्योंकि एक तरफ जहाँ पारंपरिक युद्ध में प्रत्येक सैनिक की जान बचा पाना कठिन होता है वहीं स्पेशल ऑपरेशन फ़ोर्स दल के हर सैनिक को निर्धारित समय पर काम ख़त्म करने के पश्चात लौट आने के सख्त निर्देश दिए जाते हैं।

प्रश्न यह भी है कि क्या रावण ने सीताजी को मात्र रूप सौंदर्य देखकर वासना से ग्रसित होकर अपहृत किया था। यदि ऐसा होता तो जब रावण ने सीताजी को छुप कर देखा तभी राम लक्ष्मण की हत्या का विचार उसके मन में क्यों नहीं आया? वस्तुतः रावण के मन में सीताजी के सौंदर्य के प्रति आसक्ति के अतिरिक्त रणनीतिक भाव भी था। सीताजी के अपहरण से पूर्व ऋषि विश्वामित्र की प्रेरणा से श्रीराम ने रावण के उत्तर और दक्षिण स्कंधावार नष्ट कर खर दूषण त्रिशिरा समेत चौदह हजार राक्षसों का वध कर डाला था। रावण को इसका प्रतिशोध लेना था इसलिए वह श्रीराम की शक्ति का आकलन करने आया था।

श्रीराम द्वारा राक्षसों का वध रावण की विस्तारित होती राक्षसी सत्ता को प्रत्यक्ष चुनौती थी। इसीलिए रावण मनोवैज्ञानिक छद्म युद्ध लड़ने का इच्छुक था। उसने श्रीराम को सर्वप्रथम मनोवैज्ञानिक रूप से पराजित करना चाहा। इसीलिए उसने उनकी पत्नी सीताजी का अपहरण किया था। आजकल सैन्य शब्दावली में इसे PSYOPS अर्थात Psychological Operations कहा जाता है। इसका उत्तर श्रीराम ने Information Warfare के रूप में दिया। जब श्रीराम सीताजी को ढूंढने निकले तब मार्ग में वन, पर्वत हर स्थान पर इसका प्रचार किया गया कि सीताजी अर्थात नारी का अपहरण दुष्ट रावण ने किया है इसलिए रावण से प्रताड़ित सभी जन एवं पशु श्रीराम के नेतृत्व में युद्ध लड़ें, यही धर्मसंगत है। क्षत्रिय वंश के श्रीराम की सेना में कोल, किरात, वानर, शूद्र सभी सैनिक बन गए थे। श्रीराम की इस सेना को ब्राह्मण ऋषि मुनियों का आशीर्वाद प्राप्त था। सैन्य प्रशिक्षण तो छोड़िये इस सेना में किसी ने किसी का वर्ण तक नहीं पूछा क्योंकि उनका शत्रु एक था- रावण।

वास्तव में यह Information या Propaganda Warfare साधारण जनमानस को अपनी पक्ष में करने की तकनीक होती है। आज पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत विरोधी प्रोपगैंडा चलाता है। भगवान राम ने इस युद्धनीति का उपयोग रावण के आतंक को समाप्त करने के लिए किया था लेकिन आज पाकिस्तान उसी तकनीक का प्रयोग भारत के विरुद्ध जिहादी छद्म युद्ध में करता है। वह हमारी सेना को लक्षित कर सैनिकों के शीश काट कर ले जाने जैसे घृणास्पद कार्य कर हमारा मनोबल गिराने की यथासंभव चेष्टा करता है क्योंकि भारतीय सेना हमारे मान सम्मान की रक्षा करने वाला संस्थान है। इस प्रकार के युद्ध को भली भाँति समझने की आवश्यकता है। क्योंकि ऐसा कर के पाकिस्तान हमें मनोवैज्ञानिक रूप से पराजित करना चाहता है।

इस प्रकार हमें पता चलता है कि आज की युद्धनीति रामायण काल में भी थी। यह मात्र एक संयोग नहीं है, हमें हमारे प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन केवल प्रेम वात्सल्य और भक्ति की कथा सुनने के लिए नहीं करना चाहिए। हमारे ग्रंथों में राष्ट्रीय सुरक्षा के तत्व भी हैं जिनपर शोध की आवश्यकता है।

बंगाल जो चुनावी हिंसा का पर्याय है, ममत्व ऐसा कि भाजपाइयों की लटकती लाश आम दृश्य है

शीर्षक एक रक्तरंजित माहौल की बात कहता है। शीर्षक बताता है कि बंगाल में क्या हो रहा है, और किस स्तर पर हो रहा है। शीर्षक बताता है कि सत्ता पाकर कुछ लोग किन तरीक़ों से तंत्र का दुरुपयोग करते हैं। शीर्षक बताता है कि नैरेटिव पर जिनका क़ब्ज़ा है वो अब लालू के जंगल राज को याद नहीं कर पा रहे, क्योंकि बंगाल बिहार के उस दौर से कहीं ज्यादा गिर चुका है।

मुख्यमंत्री का नाम है ममता। ममता शब्द का मूल है ‘मम्’ अर्थात् अपना। उसमें जब ‘ता’ प्रत्यय लगता है तो अर्थ होता है वैसा भाव जो स्नेह, अपनापन या मोह लिए हो। यह एक सकारात्मक नाम है। यह शब्द सुन कर किसी भी हिन्दीभाषी व्यक्ति के मन में एक शांत, स्नेहिल छवि बनती है। लेकिन आज के दौर में ममता सुनते ही बनर्जी भी साथ ही आ जाती है और गूगल के हजारों चित्रों की तरह इस शब्द का मूल अर्थ इस संदर्भ में गौण हो जाता है।

बंगाल ममता बनर्जी का राज्य है। वो वहाँ की मुख्यमंत्री हैं। लालू बिहार के मुख्यमंत्री थे, और लालू बिहार की मुख्यमंत्री के पति भी थे। उस दौर की चुनावी हिंसा की कहानियाँ अखबारों और पत्रिकाओं का काला पन्ना बन कर हम जैसे बिहारियों के भविष्य पर एक कालिख की तरह पुत जाया करती थीं। बिहार की बदनामी में लालू का सत्ता पर क़ब्ज़ा, और हिंसा के दौर का सबसे बड़ा हाथ था। चूँकि लालू उस समय कॉन्ग्रेस से अलग थे, तो नैरेटिव ने उनको क़ायदे से जंगल राज का खुल्ला राजा बना कर बेचा। ऐसा नहीं है कि वो नैरेटिव गलत था, लेकिन अगर वो कॉन्ग्रेस के साथ होते तो, शायद बिहार भी ‘भद्रलोक’ टाइप सिर्फ इंटेलेक्चुअल बातों के लिए जाना जाता।

बंगाल का नाम सुनते ही अब दंगे, अराजकता, हिन्दुओं के हर पर्व पर समुदाय विशेष के आतंक, मालदा में छपने वाले नकली नोट, पंचायत चुनावों से लेकर लोकसभा चुनावों तक के हर चुनाव में विरोधी पार्टियों के कार्यकर्ता और समर्थकों की लाश, कानून व्यवस्था की उदासीनता आदि दिमाग में घूमने लगते हैं।

लेकिन क्या ग़ज़ब की बात है कि आपको कभी भी उस आतंक की दास्तान किसी भी चैनल पर सुनाई नहीं देती। छोटे रिपोर्ट्स जरूर आते हैं, लेकिन इस कुव्यवस्था और हिंसक होते राजनैतिक माहौल पर कोई डिबेट या परिचर्चा नहीं होती। क्या बात है कि हेलिकॉप्टर नहीं उतरने देने की बात पर चर्चा हो जाती है, लेकिन कार्यकर्ता की लाश पेड़ से लटका कर, कहीं तार पर बाँध कर, यह धमकी दी जाती है कि भाजपा को वोट देने वालों के साथ यही होगा, ऐसी बातों पर चर्चा नहीं होती।

इस पर चार बजे तक फेसबुक पर सक्रिय रहने वाला पत्रकार कुछ नहीं लिख पाता। जब लिखता है तो तीन साल का लेखा-जोखा एक लेख में और मुख्यमंत्री का नाम तक नहीं ले पाता! ये वही व्यक्ति है जिसने पिछले साल की रामनवमी के मौक़े पर बिहार के एक जिले में समुदाय विशेष के गाँव में जुलूस पर चप्पल फेंके जाने पर ‘मेरा बिहार जल रहा है’ वाला लेख लिखा था। उसने लिखा था कि बिहार को जाति और मज़हब के नाम पर बाँट कर लोगों को भड़काया जा रहा है।

बंगाल में चुनावों के दौरान क्या नहीं हुआ, और क्या नहीं हो रहा! आज ही की ख़बर है कि एक जगह ईवीएम पर भाजपा के प्रत्याशी के नाम और चिह्न पर काला टेप लगा हुआ मिला। दूसरी ख़बर यह आई कि समुदाय विशेष बहुल गाँव में हिन्दुओं के पहुँचने से पहले ही वोट डाल दिए गए थे। कहीं से ट्वीट आया कि ममता के तृणमूल पार्टी के लोग सीआरपीएफ़ की वर्दी पहन कर घूम रहे हैं। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता ऑडियो क्लिप में बूथ क़ब्ज़ा करने की बात कह रहा है। एक ख़बर थी कि तृणमूल नेता अपने कार्यकर्ताओं को कह रहा है कि सीआरपीएफ़ आदि के जवानों को खदेड़ कर मारो और भगा दो। भाजपा कार्यालय से लेकर पेड़ तक पर भाजपा कार्यकर्ताओं की लाशें लटकी होने की ख़बर इतनी आम हो गई हैं कि सुन कर पहले ही सोच लेता हूँ कि बंगाल की ही ख़बर होगी।

नहीं, ये मेरे दिमाग की समस्या नहीं है। यह समस्या ममता द्वारा चलाए जा रहे आतंक के राज की है। अगर एक आईपीएस अफसर यह लिखकर आत्महत्या कर लेता है कि ममता ने बंगाल को नर्क से भी बदतर बना दिया और ख़ौफ़ से वो मरना चुन लेता है, तो मेरा दिमाग नहीं, ममता का शासन खराब है। सीबीआई को घुसने से रोक देना, केन्द्र सरकार के खिलाफ पुलिस के आला अफसर का ममता के समर्थन में धरने पर बैठ जाना आदि सुनना आपको आश्चर्य में नहीं डालता क्योंकि ‘चिल मारिए, आप बंगाल की बात कर रहे हैं’ टाइप की फीलिंग आती है।

दो साल पहले सरस्वती पूजा पर पुलिस ने विद्यार्थियों को निर्ममता से पीटा था, इस साल मंदिर में घुस कर पुलिस ने फिर से तोड़-फोड़ की। दुर्गा पूजा के विसर्जन की तारीख़ बदलने की क़वायद तो आपको याद ही होगी कि मुहर्रम है, तो नहीं होगा विसर्जन। यहाँ तक कि मुहर्रम के एक दिन पहले या बाद होने तक में विसर्जन पर रोक या दिन बदलने की बात ममता सरकार ने ‘संवेदनशील’ होने के नाम पर कोर्ट में कही।

बर्धमान, धूलागढ़, कालियाचक (मालदा), इल्लमबाजार, हाजीनगर, जलांगी, मिदनापुर, पुरुलिया, रानीगंज, मुर्शीदाबाद, आसनसोल… ये वो जगह हैं, जहाँ ममता काल में दंगे हुए। उसके बाद दुर्गा पूजा, रामनवमी और मुहर्रम पर होने वाली हिंसक घटनाएँ, तो हर साल इतनी आम हो कि उस पर बात भी नहीं होती।

इसकी बात कोई नहीं करता कि ये जो माहौल बना है, ये किस तरह का माहौल है। क्या ये डर का माहौल है? क्या ये आपातकाल वाला माहौल है? क्या दो-चार गौरक्षकों और गौतस्करों वाली घटनाओं पर सीधे मोदी से जवाब माँगने वाले पत्रकारों का समुदाय विशेष यह बताएगा कि आखिर ऐसा क्या है बंगाल में कि मजहबी दंगे हर जगह पर कुकुरमुत्तों की तरह हो जाते हैं। यहाँ पर किसकी शह पर यह हो रहा है?

बंगाल की हिंसा पर और ममता की मनमानी पर सब-कुछ यहाँ पढ़ें

क्या यही माहौल यह सुनिश्चित नहीं करता कि लोग चुनावों में ममता और उसकी पार्टी से डर कर रहें? क्या आपका पड़ोसी किसी दिन पेड़ पर ख़ून से लथपथ लटका मिले और संदेश हो कि भाजपा को वोट देने पर यही हश्र होगा, तो आप कौन-सा विकल्प चुनेंगे? पंचायत चुनावों में आप कैसे प्रत्याशी बनेंगे जब तृणमूल के गुंडे सर पर तलवार लेकर मँडरा रहे हों? आखिर आप नोमिनेशन कैसे करेंगे?

यही तो कारण है कि आज के दौर में भी 48,650 पंचायत सीटों में से 16,814; 9,217 पंचायत समिति सीटों में से 3,059; और 825 ज़िला परिषद सीटों में से 203 पर निर्विरोध चुनाव हुए। आप यह सोचिए कि तृणमूल लगभग एक तिहाई, यानी 30% सीटों पर निर्विरोध जीत जाती है! कमाल की बात नहीं है ये? बीरभूम जैसी जगहों पर 90% सीट पर तृणमूल के खिलाफ कोई खड़ा ही नहीं हुआ!

आपने बिहार के बारे में खूब सुना होगा, पर इन प्रतिशतों पर, इन आँकड़ों पर कोई विश्लेषण नहीं किया जाता। यहाँ न तो जंगलराज आता है, न आपातकाल। क्योंकि भद्रलोक और छद्मबुद्धिजीवियों की जमात हर जगह बैठी हुई है जिसे ममता में ममता ही दिखती है, उसकी निर्ममता नहीं। आज कै दौर में अगर लालू आता है, तो अपने साथ हिंसा भी लाएगा। वस्तुतः, नितिश के साथ सरकार आते ही बिहार में हिंसा का भयावह दौर वापस आया था, लेकिन मीडिया और लिबरल्स की निगाह नहीं गई क्योंकि वहाँ भाजपा या मोदी सत्ता में परोक्ष रूप में भी नहीं था।

आज जब बंगाल सही मायनों में जल रहा है, और चुनावी हिंसा चरम पर है, तब भी स्टूडियो से कैम्पेनिंग और रैली करते पत्रकारों को कुछ गलत नहीं लग रहा। ये दंगे शायद सेकुलर हैं, ये चुनावी हिंसा किसी खास रंग की है। इस जगह की सत्ता में जब ममता है, तो फिर उसके राज्य में हिंसा कैसे होंगे, शायद यही सोच कर चैनल वाले इस विषय को छूते भी नहीं।

लेकिन, ऐसे पैंतरे आपको बहुत देर तक सत्ता में नहीं रख सकते। लालू जैसे चोरों का राज भी गया, आपके भी गिन लद गए हैं। आपको भी पता है कि पकड़ ढीली हो रही है, और जिस आशा की रोटी आपने बंगाल को बेची थी, उसमें ख़ून के थक्के भरे हुए हैं। यही कारण है कि आपको असम में हो रहे बंगलादेशी घुसपैठियों की शिनाख्त पर आपत्ति हो जाती है। यही कारण है कि शारदा जैसे घोटालों के लिए सीबीआई को आप बंगाल में घुसने नहीं देतीं। यही कारण है कि आप अपनी रैलियों में अपने कर्म गिनाने की बजाय मोदी को ज़्यादा गाली देती रहती हैं।

लेकिन ध्यान रहे ममता दीदी, होश सबको आता है। जनता ने आपको वामपंथियों की हिंसा से परेशान होकर चुना था। लेकिन आपने हिंसा का वही दौर, शायद उससे भी भयावह, वापस लाया है। मरने वाले तो बंगाली ही है, उन्हें होश आएगा, और आपका भी हिसाब होगा।

LOC पर भारत ने किया पाक के साथ व्यापार स्थगित, आतंकियों के करीबी कर रहे थे दुरुपयोग

गृह मंत्रालय ने जम्मू और कश्मीर में सीमा पार व्यापार को निलंबित करने के आदेश जारी कर दिए हैं। सरकार ने ये कदम उन रिपोर्ट्स को बाद उठाया है, जिनमें बताया जा रहा है कि पाकिस्तान में रहने वाले कुछ लोग नियंत्रण रेखा (LOC) के रास्ते होने वाले व्यापार मार्गों का दुरुपयोग कर रहे हैं और इसके जरिए अवैध हथियार, मादक पदार्थों और नकली मुद्रा आदि भेज रहे हैं। गृह मंत्रालय के द्वारा जारी किए गए नोटिस में कहा गया कि जम्मू-कश्मीर में 19 अप्रैल से सरहद पार व्यापार नहीं किया जाएगा।

NIA द्वारा कुछ मामलों की चल रही जाँच के दौरान यह सामने आया है कि LOC के रास्ते होने वाले व्यापार में कुछ चिंताजनक व्यापारिक कार्यों को अंजाम देने वाले लोग आतंकवाद और अलगाववाद को बढ़ावा देने वाले प्रतिबंधित आतंकी संगठनों से बहुत करीब से जुड़े हैं, इसलिए जम्मू और कश्मीर में सलामाबाद और चक्कां-दा-बाग में LOC व्यापार को निलंबित करने का निर्णय लिया गया है। इस बीच, विभिन्न एजेंसियों के परामर्श के बाद सख्त विनियामक और प्रवर्तन तंत्र विकसित कर लागू किया जाएगा। इसके बाद LOC पर व्यापार को खोलने के मुद्दे पर फिर से विचार किया जाएगा।

जम्मू-कश्मीर सीमा पर होने वाले व्यापार के जरिए सामान्य उपयोग की चीजों-उत्पादों का आदान-प्रदान होता है। सप्ताह में 4 दिन होने वाला यह व्यापार बार्टर सिस्टम और जीरो ड्यूटी पर आधारित है। व्यापार के दो केंद्र हैं, इनमें बारामूला के उरी और सलामाबाद, पूंछ का चक्कां-दा-बाग शामिल है।

गौरतलब है कि पुलवामा हमले के बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान से MFN का दर्जा वापस ले लिया था। इस दौरान भी सरकार को व्यापार के जरिए अनैतिक गतिविधियों के संचालन की सूचनाएँ मिल रही थीं। इसी के मद्देनजर सरकार ने तत्काल प्रभाव से जम्मू-कश्मीर में मौजूद सलामाबाद और चक्कां-दा-बाग से व्यापार को स्थगित कर दिया है।

आलिया की ड्रामेबाज मम्मी जुनैद की झूठी मॉब लिंचिंग की कहानी फैलाती है, फिर कहती है ‘Vote against Hate’

राजनीति में बॉलीवुड की सक्रियता लगातार बढ़ती ही जा रही है। आजकल बॉलीवुड अभिनेत्री पायल रोहतगी को भी लोकसभा चुनावों के बीच सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों को प्रोपगैंडा फैलाने वाले लोगों के खिलाफ जागरूकता फैलाते हुए देखा जा रहा है। इस क्रम में इस बार पायल रोहतगी के निशाने पर हैं आलिया भट्ट और उनकी मम्मी सोनी राजदान। ये वही सोनी राजदान हैं, जिन्होंने हाल ही में भारत में असहिष्णुता का हवाला देकर भारत छोड़कर पाकिस्तान जाकर रहने की बात कही थी।  

पायल रोहतगी ने एक नया वीडियो जारी करते हुए कहा है कि सोनी राजदान इंडियन नहीं बल्कि ब्रिटिश मुस्लिम है और भड़काऊ बातें बोलकर लोगों के बीच डर फैलाती हैं, फिर घृणा के विरोध में वोट करने की अपील का नाटक करती हैं। साथ ही, सोनी राजदान को दादी बोलते हुए उन्होंने कहा कि वो सठिया गई हैं।  

पायल रोहतगी का कहना है कि आलिया भट्ट और उनकी माँ सोनी राजदान देश में वोट नहीं डाल सकतीं। पायल ने एक वीडियो जारी कर इस बारे में बताया था। पायल ने सोनी राजदान पर आरोप लगाते हुए कहा, “वह देश में चुनावों के बीच मतदाताओं को भटकाने की कोशिश कर रही हैं।”

पायल का अब एक और नया वीडियो सामने आया है। इस वीडियो में पायल कहती हैं कि सोनी राजदान ने ट्विटर पर पायल को ब्लॉक कर दिया है। पायल अपने वीडियो में कहती हैं, “सोनी राजदान कह रही हैं कि प्यार के लिए वोट कीजिए और मुझे ब्लॉक कर के वह प्यार का संदेश दे रही हैं। क्योंकि मैंने उनकी सिटीजनशिप के बारे में कहा है।”

पायल अपने वीडियो के साथ कैप्शन में लिखती हैं, “British Muslim दादी जी सठिया गई है।” पायल इसके साथ ही लिखती हैं, “मैं भारतीय मुस्लिमों से प्यार करती हूँ, लेकिन रोहिंग्या मुस्लिम, बंगलादेशी मुस्लिम, पाकिस्तानी मुस्लिम से इतना प्यार नहीं करती कि भारत में रहने वाले भारतीय नागरिकों का हक छीन के उनको दे दूँ। भारत पर सभी भारतीय नागरिकों का हक बनता है जिनके पूर्वज यहाँ थे।”

पायल अपने वीडियो में कह रही हैं, “जुनैद नाम के लड़के को ट्रेन में सीट शेयर करने के नाम पर हुए बवाल में लिंच किया गया था, जबकि जुनैद की मौत ट्रेन में यात्रा कर रहे उन लोगों से फाइट के दौरान हुई थी, जो लोग उनके साथ यात्रा कर रहे थे। मामला सीट शेयरिंग का ही था, लिंचिंग या बीफ का नहीं। हमारे देश में सोनी राजदान जैसे कुछ ऐसे लोग हैं, जो भारतीय नागरिक न होने के बावजूद भी भड़काऊ ट्वीट करते हैं।”

पायल आगे कहती हैं, “सोनी राजदान और आलिया भट्ट दोनों ही भारत में वोट नहीं कर सकते हैं। लेकिन वह कह रही हैं कि वोट करते समय जुनैद को याद रखें, वह जुनैद जो आपसी झगड़े के दौरान गुजर गया था, जो कि ठीक बात नहीं थी। जुनैद की मौत को वह जबरदस्ती लिंचिंग और बीफ से जोड़कर दिखाने की कोशिश कर रही हैं। लोकसभा इलेक्शन की पोलिंग शुरू हो गई है। जिनको सच्चाई नहीं पता, वह इस तरह के भड़काऊ और गलत जानकारी वाले ट्वीट से अपना विचार बदल सकते हैं।”

पायल ने आगे कहा, “कुछ दिन पहले अमित शाह जी ने कहा था कि देश में NRC लागू करेंगे, जिसके बाद अवैध मुसलामानों को भारत से निकाल दिया जाएगा। शायद अमित शाह के इस फैसले की वजह से सोनी राजदान इस तरह के ट्वीट कर नफरत फैलाने की कोशिश कर रही हैं। अगर NRC लागू होता है, तो सोनी राजदान को भारत से वापस जाना पड़ सकता है, क्योकि सोनी राजदान और आलिया भट्ट के पास ब्रिटिश पासपोर्ट है।”

पायल आगे कहती हैं, “सोनी राजदान हमें ट्विटर पे ब्लॉक कर के ‘Vote against Hate’ कर के ट्वीट करती है, कितनी दोगली इंसान है। वो माफी नहीं माँगती कि कैसे वो जुनैद की नकली मॉब लिंचिंग वाली कहानी शेयर कर लोगों को गुमराह कर रही हैं और मानवता का ड्रामा कर रही हैं। यह मानवता इनको कश्मीरी पंडितो की उजड़ी हुई जिंदगी में नहीं दिखती। महबूबा मुफ्ती के ऊपर कश्मीर में पत्थरबाज पत्थर फेंकते हैं और हमें यह सुनकर अच्छा लगता है, क्योंकि वो पत्थरबाज को मासूम बच्चे मानती है।”

1 कॉन्ग्रेस नेता और 3 पुलिसकर्मी ₹1 करोड़ लूटने के आरोप में गिरफ्तार

उत्तराखंड पुलिस ने कथित रूप से एक करोड़ रुपये के नोटों से भरे एक बैग को लूटने के आरोप में एक कॉन्ग्रेस नेता और तीन पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार किया है। लूटपाट की वारदात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली से एक दिन पहले 4 अप्रैल की रात हुई थी। पुलिसकर्मिंयों को विभाग से बर्खास्त भी किया जा सकता है। पुलिस पकड़े गए चारों आरोपितों से लगातार पूछताछ कर रही है।

पुलिस महानिदेशक (कानून व व्यवस्था) अशोक कुमार ने कहा कि चारों को मंगलवार (अप्रैल 16, 2019) रात को गिरफ्तार किया गया, जिनकी पहचान कॉन्ग्रेस नेता अनुपम शर्मा, सब इंस्टपेक्टर दिनेश नेगी, कांस्टेबल मनोज अधिकारी, पुलिस ड्राइवर हिमांशु उपाध्याय के रूप में हुई है।

चारों पर विभिन्न आरोपों समेत प्रॉपर्टी डीलर अनुरोध पंवार को लूटने के आरोप लगाए गए हैं, जिसके पास एक काले थैले में कथित रूप से ₹1 करोड़ थे। यह घटना 4 अप्रैल की है। अनुरोध पंवार ने शुरुआत में जाँच अधिकारी को कहा था कि पैसे का प्रयोग उत्तराखंड में 11 अप्रैल को होने वाले चुनाव के लिए किया जाना था।

IG गढ़वाल की सरकारी गाड़ी में सवार होकर दिया लूट को अंजाम

प्रॉपर्टी डीलर अनुरोध पंवार निवासी कैनाल रोड, बल्लूपुर को WIC में आरोपित अनुपम शर्मा ने प्रॉपर्टी से संबधित रकम लेने के लिए बुलाया। अनुरोध जब वहाँ से बैग लेकर लौट रहे थे, तो रास्ते में होटल मधुबन के पास एक सफेद रंग की स्कॉर्पियो में बैठे तीन लोगों ने ओवरटेक कर उन्हें रोक लिया। उनके रुकते ही स्कॉर्पियो से दो वर्दीधारी पुलिसकर्मी उतरे। चुनाव की चेकिंग के नाम पर उन्होंने कार की तलाशी ली और उसमें रखा बैग कब्जे में ले लिया। 6 अप्रैल को अनुरोध ने दून पुलिस से शिकायत की। पुलिस ने जाँच शुरू की तो पाया कि स्कॉर्पियो IG गढ़वाल के नाम आवंटित है और उसमें बैठे दारोगा दिनेश नेगी, सिपाही हिमांशु उपाध्याय और मनोज अधिकारी ने वारदात को अंजाम दिया है। 

प्रारंभिक जाँच से पता चला कि चुनाव उद्देश्यों के लिए कालेधन की तलाशी के नाम पर तीनों पुलिसकर्मियों ने पंवार का बैग जब्त कर लिया। पुलिसकर्मियों ने पंवार को धमकाया और उसे वहाँ से भाग जाने के लिए कहा।

2-3 दिनों के बाद पीड़ित अनुरोध पंवार ने पैसे के बारे में पता लगाना शुरू किया और विभिन्न पुलिस स्टेशनों के चक्कर लगाए। हालाँकि, कोई सूचना नहीं मिलने के बाद, पंवार ने एक FIR दर्ज कराई और पूरी घटना के बारे में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी को सूचित कर दिया।

अशोक कुमार ने कहा कि उन्होंने रिद्धिम अग्रवाल की अगुवाई में विशेष कार्य बल (SIT) को जाँच सौंप दी थी। एक सप्ताह की जाँच के बाद, SIT ने 4 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। कुमार ने कहा, “तीनों पुलिसकर्मियों को निलंबित कर दिया गया है। उन्हें संभवत: सेवा से हटाया जा सकता है, क्योंकि यह मामला पुलिस विभाग के लिए शर्मिदगी का विषय है।”

बंगाल: रायगंज में मुस्लिम बहुल गाँव के हिन्दुओं को मतदान करने से रोका गया

आज लोकसभा चुनाव के दूसरे चरण के शुरू होते ही पश्चिम बंगाल में बड़े पैमाने पर राजनीतिक हिंसा और चुनावी हिंसा की ख़बरें सामने आ रही हैं। इस बीच, एक ख़बर सामने आई है कि राज्य के रायगंज निर्वाचन क्षेत्र में एक मुस्लिम बहुल गाँव के हिन्दू निवासियों को मतदान करने से रोक दिया गया।

न्यूज़ चैनल के दल ने बूथ के प्रभारी और पहचान अधिकारी के साथ-साथ उन लोगों को भी सामने किया, जिन्होंने आरोप लगाया था कि उनके नाम पर छद्म-वोट (proxy-vote) डाले गए हैं। बूथ के स्टाफ ने कोई जवाब नहीं दिया।

टाइम्स नाउ की ख़बर बताती है कि रायगंज निर्वाचन क्षेत्र के बूथ संख्या 191 पर पीठासीन अधिकारी को इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि वे लोग कौन थे जिन्होंने अपना वोट डाला, जबकि गाँव के लगभग 600 हिन्दुओं ने यह दावा किया कि वे अपना वोट डालने में असमर्थ थे।

ख़बर में यह भी स्पष्ट किया गया कि इलाक़े में बड़े पैमाने पर छद्म वोटिंग हुई है। कुछ हिन्दुओं ने आरोप लगाया है कि उन्हें पुरुषों के समूहों द्वारा मतदान केंद्र के पास जाने से रोका गया। अन्य हिन्दुओं ने दावा किया है कि जब वे मतदान केंद्र तक पहुँचने में कामयाब रहे, तो उन्हें पता चला कि उनके नाम पर पहले ही डाले जा चुके हैं।

पहला मतदान अधिकारी, जो पहचान अधिकारी भी है, इस बात पर कोई जवाब नहीं दे पाया कि इस तरह का छद्म वोटिंग कैसे हुई। पीठासीन अधिकारी ने कथित तौर पर दावा किया है कि मतदाताओं की पहचान की पुष्टि करना उनकी ज़िम्मेदारी नहीं है।

द टाइम्स नाउ के दल ने बड़े पैमाने पर छद्म मतदान का खुलासा किया, जिसमें पीठासीन अधिकारी द्वारा कथित रूप से दुर्व्यवहार और धमकी भी दी गई थी। ख़बर में कहा गया है कि हिन्दुओं के छद्म-वोटिंग और ज़बरदस्ती उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल करने से रोकने जैसे मामले निर्वाचन क्षेत्र के अन्य कई गाँवों में भी हुए हैं।

भाजपा पश्चिम बंगाल ने इस मुद्दे को उठाया है और इस मुद्दे को लेकर चुनाव आयोग में गए हैं। यहाँ यह बात ध्यान देने वाली है कि रायगंज निर्वाचन क्षेत्र से पहले भी हिंसा और चुनावी कदाचार की खबरें आ रही थीं। भाजपा उम्मीदवार देबाश्री चौधरी ने आरोप लगाया था कि TMC कार्यकर्ता मुस्लिमों के समूह के साथ प्रचार कर रहे थे और उन्होंने वहाँ एक बूथ पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश भी की थी।

महबूबा जी, आतंकी की लाश देख उसका छोटा भाई बंदूक उठा ले तो उसकी परवरिश खराब है

महबूबा मुफ़्ती कश्मीर की हैं। महबूबा जी महिला हैं। महबूबा जी मजहब विशेष की हैं। महबूबा जी कश्मीरी आतंकियों की हिमायती हैं। महबूबा जी, इनसे सबसे अलग, एक नेत्री हैं। नेत्री शब्द नेता का स्त्रीलिंग है, लेकिन इस में भी नेता या ‘नेत्ता’ वाले सारे गुण होते हैं। यही गुण आपको मजबूर करता है कि आप वाहियात बातें लिखती रहें ताकि अपने जनाधार को किसी भी क़ीमत पर बचाया जा सके।

महबूबा जी जानती हैं कि कश्मीर में उनकी पार्टी की पोजिशन कैसी है, इसलिए वो कभी आतंकियों को माटी के पूत तो कभी आतंकियों को नेता बताती रहती हैं। साथ ही, महबूबा जी यह भी कहती रहती हैं कि धारा 370 हटा तो पूरा देश जल उठेगा, कोई तिरंगा नहीं उठाएगा और यहाँ तक कि कश्मीर हिन्दुस्तान से अलग हो जाएगा और उनके हाथ काट दिए जाएँगे जो ऐसी कोशिश करेंगे। हालाँकि, महबूबा मुफ़्ती ने यह नहीं बताया कि वो कश्मीर को हिन्दुस्तान से अलग कराएँगी कैसे।

अब कल की बात करते हैं जब श्रीमती महबूबा ने ट्वीट के माध्यम से जीवन-दर्शन दिया कि हर मानव, चाहे वो आतंकी ही क्यों न हो, मृत्यु के बाद मर्यादा का पात्र होता है। आगे उन्होंने भारतीय सेना को आदतानुसार घेरते हुए कहा कि उन्हें पता चला है कि सेना आतंकियों के लिए रसायनों का प्रयोग करती है जिससे लाश बिगड़ जाती है। महबूबा लिखती हैं कि सोचिए उस बालक की स्थिति जो अपने भाई की जली-कटी लाश देखेगा। क्या वह लड़का बंदूक उठा ले तो कोई आश्चर्य होगा हमें?

महबूबा जी, ऐसा है कि आप कई मायनों में गलत हैं। पहली बात तो यह है कि यह ज्ञान अपने पास रखिए कि आतंकियों की लाश भी मर्यादित व्यवहार का पात्र होती है। ये किसने कहा, और कहाँ कहा, और क्यों कहा, यह मुझे पता नहीं लेकिन मेरे लिए आतंकी और मर्यादा, टेररिस्ट और डिग्निटी, दोनों शब्द एक पंक्ति में आने योग्य नहीं हैं। दूसरी बात, फर्जी बातों कहते हुए सेना पर लांछन तो मत लगाओ देवी! क्योंकि इस सेना ने जितने जवान खोए हैं, जिस हालात में खोए हैं, और फिर भी जिस सहिष्णुता का परिचय दिया है, उसके मत्थे कैमिकल इस्तेमाल करने की बातें अविश्वसनीय ही लगती हैं।

किस सेना पर इस तरह के आरोप लगा रही हैं आप? भारतीय सेना पर जो सिर्फ सहती आई है, जिन्होंने ग़ज़ब का धैर्य दिखाया है, जिन्होंने हर बाढ़ और आपदा में उन्हीं लोगों को सहारा दिया है जिनकी गलियों में उनकी गाड़ियों पर पत्थर, और उनके जवानों के पैदल जाने पर थप्पड़ तथा गालियाँ सही हैं। इस सेना के तो पाँव भी चूमो तो जन्नत मिल जाए जिन्होंने हर तरह के दुर्व्यवहार के बाद भी, असीम धैर्य का परिचय दिया है।

जिसने मानवता के खिलाफ, अपने मज़हब के नाम पर, या किसी और कारण से निर्दोषों को मारने के लिए हथियार उठा लिए हों, उसके लिए मेरे पास कोई दया, करूणा, क्षमा आदि नहीं। एक आतंकी सिर्फ मारता ही नहीं, वो ख़ौफ़ भी पैदा करता है, वो पूरे समाज को नकारात्मकता की ओर धकेल देता है। आतंकी वारदातों के बाद लोगों की दिनचर्या बदल जाती है, ज़िंदगियाँ बुरी तरह से प्रभावित होती हैं।

इसलिए, आतंकियों के लिए किसी भी तरह के मर्यादित व्यवहार की बात उनके ऊपर ही रहने दीजिए जिनके दोस्त, देशवासी, सहकर्मी, जवान या संबंधी उनका शिकार बने हैं। उनकी मर्ज़ी कि वो आतंकियों में ख़ौफ़ कैसे पैदा करें कि अगर कोई बच्चा अपने भाई की जली-कटी लाश देखे तो वो बंदूक न देखे, वो यह देखे कि बारह सालों के भीतर उसे भी सेना खोज कर मार देगी, अगर उसने गलत राह चुनी।

आखिर आतंकियों के सम्मान का कोई सोच भी कैसे सकता है? फिर याद आता है कि ये तो नेत्री भी हैं, इनको तो वोट भी वही लोग देते हैं जो आतंकियों के जनाज़े में टोपियाँ पहन कर पाकिस्तान परस्ती और भारत को बाँटने की ख्वाहिश का नारा लगाते शामिल होते हैं। आखिर महबूबा इन आतंकियों के सम्मान के लिए नहीं लड़ेगी तो कौन लड़ेगा!

महबूबा जी, अगर कोई बच्चा अपने भाई की लाश देख कर बंदूक उठाता है, और आपको आश्चर्य नहीं होता तो उस बच्चे की और आपकी अपनी परवरिश में समस्या है। मुझे दुःख होता है हर उस बच्चे के लिए जो आतंकी भाई की लाश को देख कर यह नहीं सोच पाता कि किसी निर्दोष की हत्या करना पूरी मानवता के खिलाफ अपराध है, बल्कि यह सोचता है कि उसके भाई को किसी ने मार दिया, तो वो भी किसी की जान ले लेगा।

इसके बाद आप आतंक और उसके कुत्सित चक्र को जस्टिफाय कर रही हैं कि चोर का बेटा चोर बने, रेपिस्ट का भाई पुलिस वाले के घर में बम फोड़ दे, और आतंकी के घर वाले उसकी मौत पर घर से आतंकी होने का कैम्पस सेलेक्शन लेकर एरिया कमांडर बन जाएँ। अगर ऐसा करना एक प्राकृतिक चुनाव होता कि अपराधी के घर वाले, अपराधी की फाँसी पर राष्ट्र के खिलाफ होकर हथियार उठा लेते, तो अपराध कभी कम ही नहीं होते।

लेकिन, कश्मीरी परिवारों का तो पता नहीं, सामान्य बुद्धि का इंसान यह समझता है कि अगर सेना या पुलिस ने किसी आतंकी को, चाहे वो उसका घर वाला ही क्यों न हो, सजा दी है, या एनकाउंटर में वो मारा गया, तो वो एके सैंतालीस लेकर नमाज़ तो पढ़ नहीं रहा होगा, या प्रवचन तो दे नहीं रहा होगा। वो तो इसी फेर में होगा कि सैनिक दिखें तो उसको गोली मार दे। कभी वो गोली मार देता है, कभी सेना उसे घेर कर मार देती है। इसलिए, उसे सगे-संबंधी यह कहते हैं कि उसे वही मिला, जो उसने बोया था। ये न्याय है।

जबकि, आप या आपके राज्य के नेता जब इन आतंकियों की पैरवी में आवाज उठाते हैं, उन्हें एक मौका देने की बात करते हैं, शांति की पहल करने को कहते हैं, तो आप यह भूल जाते हैं कि सरकार ने हर संभव कोशिश कर ली लेकिन भारतीय लोगों की असमय मृत्यु पर रोक नहीं लगी। हर दूसरे दिन सेना के जवान, या आम आदमी को इनके आतंक ने निगल लिया। फिर इनके लिए कैसी दया?

इसलिए महबूबा जी, यह ध्यान रखिए कि लाशों का सम्मान तो ज़रूरी है, लेकिन उन लाशों का जिन्होंने समाज की रक्षा के लिए, उसकी बेहतरी के लिए, देश की सीमा और आंतरिक सुरक्षा के लिए जान दी हो। उन लाशों का सम्मान ज़रूरी है जिन्होंने गाँव-घर में एक अच्छा जीवन जिया, जिन्होंने कुछ वैसा नहीं किया जिससे समाज नकारात्मक रूप से प्रभावित हुआ हो। सम्मान उस सामान्य व्यक्ति के शव का होना चाहिए जो एक अच्छा व्यक्ति हो, अच्छा पिता हो, अच्छी माँ हो, बहन हो, भाई हो, पति हो, पत्नी हो, किसी का अच्छा मित्र रहा हो, और मानव जीवन की छोटी कमियों के बावजूद उसकी अच्छाई उसके अवगुणों पर भारी पड़ती हो।

आतंकी की लाश इनमें से किसी भी परिभाषा के दायरे में नहीं आती। आतंकियों को ठिकाने लगाने में सरकार का खर्चा होता है। पैसे भी जाते हैं, समय भी, वरना उत्तम तो यही होता जो मैं लिख या बोल नहीं सकता। वैसे भी, जब आतंकी कोई वारदात करता है, तो यही लोग तो सबसे पहले कहते हैं कि वो सच्चा मजहबी नहीं था, आतंक का मज़हब नहीं होता आदि। फिर मरने के बाद उसकी लाश को मज़हब की ज़रूरत क्यों पड़ जाती है?

ऐसे लोग तो उदाहरण बनाए जाने चाहिए ताकि इन्हें देख कर आने वाली पीढ़ी उन्हें हीरो की तरह नहीं, एक आतंकवादी की तरह देखे। माफ कीजिएगा, कश्मीर में तो दोनों शब्द पर्यायवाची हैं। मेरे कहने का अर्थ है कि इन्हें अपनी ही आबादी, अपने ही समाज, अपने ही राज्य और राष्ट्र का दुश्मन समझा जाए ताकि परिवार वाले भी इन्हें नकार दें।

जब आपके जैसे लोग ऐसे ट्वीट करते हैं, और जब हजारों लोग उन आतंकियों के जनाज़े में जाते हैं तब संदेश यही जाता है कि आतंकी ही सही था। अच्छा लगा कि कम से कम आपके लिए इस ट्वीट के हिसाब से आतंकी गलत तो है। लेकिन जब आप उसे मर्यादा और सम्मान देने की बात करते हैं तो आप उन लोगों को मंसूबों का हवा दे रही होती हैं जो इसे आज़ादी की लड़ाई मानता है, जिसके लिए इस्लाम का परचम लहराना मुख्य लक्ष्य है, जिसके लिए पूरी दुनिया पर ख़िलाफ़त के लिए लड़ना शहादत है।

इसलिए, एक ज़िम्मेदार जगह से इस तरह की भाषा का प्रयोग, और यह कहना कि आतंकी के भाई का बंदूक उठा लेना नेचुरल सी बात है जिस पर किसी को आश्चर्य नहीं होगा, तो आप उसी व्यवस्थित आतंक की बात के पक्ष में खड़ी हो रही हैं, जहाँ हर परिवार का हर व्यक्ति आतंक के सहारे, आज़ादी और इस्लामी शासन की तथाकथित लड़ाई लड़ रहा है। ये जस्टिफिकेशन कश्मीरी जनता को तीस सालों से साल रहा है क्योंकि जिस आवाम के नेता और नेतृत्व आतंकियों के भाई के आतंकी हो जाने पर आश्चर्य नहीं कर पा रहे हों, वहाँ की जनता के लिए तो सच में यह एक नेक कार्य है।

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