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अमेठी: जब चुनाव प्रचार छोड़ ग्रामीणों के साथ फसल में लगी आग बुझाने पहुँची स्मृति ईरानी

अमेठी में केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने अपना पूरा ध्यान केंद्रित किया हुआ है। 2014 में राहुल गाँधी से मिली हार के बावजूद स्मृति ईरानी क्षेत्र में सक्रिय रहीं और कई विकास कार्यों को पूरा कराने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। ऐसे कई मौक़े आए जब स्मृति ईरानी ने अपने सहज व्यवहार से क्षेत्रवासियों का दिल जीत लिया। भाजपा और पार्टी से जुड़े लोगों का कहना है कि यह स्मृति का प्रभाव ही था कि राहुल गाँधी 2 सीटों से चुनाव लड़ने को मज़बूर हो गए। राहुल गाँधी केरल की वायनाड सीट से भी चुनाव लड़ रहे हैं, जिसे कॉन्ग्रेस के लिए सुरक्षित सीट माना जा रहा है। कई कॉन्ग्रेस नेताओं का बयान भी आया है कि वहाँ अल्पसंख्यकों की अच्छी-ख़ासी संख्या होने के कारण राहुल जीतने में सफ़ल रहेंगे। राहुल गाँधी के नामांकन रैली में भी हरे झंडे देखे गए। कॉन्ग्रेस से इस सीट को जीतने के लिए मुस्लिम लीग से गठबंधन किया है।

इधर स्मृति ईरानी जब अमेठी में चुनाव प्रचार कर रही थीं तो उन्हें कुछ गाँवों में आग लगने की सूचना मिली। मुंशीगंज के पश्चिम दुआरा गाँव स्थित खेतों में आज रविवार (अप्रैल 28, 2019) को आग लग गई। इस आग से सैंकड़ों बीघा गेहूँ की फसल को जबरदस्त नुकसान पहुँचा। इसकी सूचना मिलते ही स्मृति ईरानी तुरंत गाँव में पहुँची और ग्रामीणों के साथ आग बुझाने में मदद की। सूचना देने के बावजूद एसडीएम मौके पर नहीं पहुँचे तो स्मृति ईरानी ने डीएम को फोन लगाया। एसडीएम के वीआईपी ड्यूटी में होने की सूचना मिलने पर नाराज़ स्मृति ने कहा कि वीआईपी जनता की मदद के लिए होते हैं और जनहित सर्वोपरि होनी चाहिए।

स्मृति के गाँव में पहुँचने के बाद प्रशासनिक महकमों में हड़कंप मच गया और फायर ब्रिगेड की टीम भी थोड़ी देर बाद मौके पर पहुँची। स्मृति ईरानी ने स्वयं हैंडपंप चलाकर आग बुझाने के लिए बाल्टियों में पानी भरा और रो रही महिलाओं को पानी भी पिलाया। भाजपा कार्यकर्ताओं ने भी उनका पूरा साथ दिया और आग बुझाने में मदद की। गाँव की महिलाएँ दुःख की इस घड़ी में स्मृति ईरानी को अपने बीच पाकर भावुक हो गईं और उनसे लिपटकर रोने लगी। स्मृति ईरानी ने महिलाओं को सांत्वना दी और उनकी समस्या को सरकार तक पहुँचाने की बात कही।

अमेठी में इस बार भी राहुल गाँधी और स्मृति ईरानी आमने-सामने हैं। गाँधी परिवार की परंपरागत सीट रही अमेठी को बचाने के लिए कॉन्ग्रेस ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया हुआ है। स्मृति ईरानी ने आग से पीड़ित परिवारों से मुलाक़ात की और अमेठी की बदतर स्थिति के लिए वहाँ के सांसद राहुल गाँधी पर निशाना साधा।

Easter Blasts: ISIS मॉड्यूल का पर्दाफाश करने के बाद भारत ने श्री लंका को किया था आगाह

हाल के दिनों में ऐसी कई रिपोर्ट्स सामने आई हैं जिनसे पता चलता है कि भारत ने श्री लंका में हुए बम धमाकों से पहले कई बार द्वीपीय देश को इस बारे में आगाह किया था। श्री लंका में ईस्टर के मौक़े पर हुए हमलों में 360 से भी अधिक लोगों के मारे जाने की सूचना है और हज़ारों लोग अभी भी घायल हैं। भारतीय अधिकारियों ने श्री लंका को इस बारे में पहले से ही चेता रखा था। एनआईए ने श्री लंका हमलों में 9 मुख्य आरोपितों में से एक ज़हरान हाशिम से जुड़े कई वीडियो प्राप्त किए थे। ये वीडियो कोयम्बटूर में गिरफ़्तार किए गए खूँखार आतंकी संगठन आईएसआईएस के गुर्गों के पास से ज़ब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से प्राप्त किए गए थे। एनआईए ने देश के कई हिस्सों में छापा मारकर आतंकियों द्वारा हिन्दू संगठन के नेताओं को मारे जाने की साज़िश का ख़ुलासा किया था।

आईएसआईएस के इन आतंकियों को हाशिम ने भारत की यात्रा पर इस्लामिक कट्टरपंथी बना दिया था। इन आतंकियों ने कई हिंदू नेताओं को मारने की साज़िश रची थी, जिनमें हिंदू मक्कल काची प्रमुख अर्जुन संपत और हिंदू मुन्नानी नेता मुक्कंबिकई मणि शामिल थे। इन वीडियो के आधार पर भारतीय प्राधिकारियों ने हाशिम की पहचान राष्ट्रीय तोहिथ जमात (NTJ) के सरगना के रूप में की और जाँचकर्ताओं को यह विश्वास हो गया कि हाशिम श्रीलंका में “कुछ बड़ा” करने की योजना बना रहा है। एनआईए की इस जानकारी के आधार पर भारतीय अधिकारियों ने संभावित हमलों के बारे में 4 अप्रैल को अपने श्रीलंकाई समकक्षों को सतर्क भी किया था। श्री लंका ने शायद इन चेतावनियों के आधार पर मुस्तैदी से काम नहीं किया।

भारतीय जाँचकर्ताओं ने यह भी पाया है कि हाशिम ने केरल में मलप्पुरम और तमिलनाडु में कोयंबटूर, तिरुचिरापल्ली, तिरुनेलवेली, वेल्लोर और नागपट्टिनम का दौरा किया। उसके भारत के पूर्वी तट पर रामनाथपुरम और श्रीलंका के उत्तर-पश्चिमी तट पर कल्पितिया के बीच एक स्मगलिंग रैकेट में शामिल होने का भी संदेह था। वास्तव में, हाशिम ने राष्ट्रीय तोहिथ जमात का नेतृत्व किया था, जो एक आतंकी समूह है। बता दें कि इसी आतंकी संगठन ने श्री लंकाई हमले की जिम्मेदारी ली है। सुरक्षा बलों ने श्री लंका में हुए हमलों के बाद एक वीडियो में हाशिम की पहचान की। हाशिम व सात अन्य को आईएस प्रमुख के प्रति शपथ लेते हुए देखा गया था।

40 वर्षीय मुख्य साजिशकर्ता की खोज में श्री लंकाई पुलिस लगातार लगी हुई थी। बाद में श्रीलंका के राष्ट्रपति मैत्रिपाला सिरिसेना ने मीडिया को पुष्टि की कि श्रीलंका में ईस्टर बम विस्फोटों के लिए मोस्ट वॉन्टेड आतंकी और इस्लामी चरमपंथी ज़हरान हाशिम होटल शांगरी-ला में हमले के दौरान मारा गया। हालाँकि, स्थानीय मुस्लिम नेताओं ने पुष्टि की थी कि उन्होंने हाशिम के ख़िलाफ़ उसके उग्र विचारों और व्यवहार के लिए पहले भी कई बार रिपोर्ट की थी, फिर भी उसके ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गई। हाशिम के साथ, ख़ुफ़िया रिपोर्टों से यह भी पता चला है कि श्रीलंका के एक अन्य जिहादी मोहम्मद मुबारक अज़ान ने 2017 में दो बार भारत का दौरा किया था।

इस्लामिक आतंकवादी समूह नेशनल तोहिथ जमात द्वारा विस्फोटों की ज़िम्मेदारी लेने का दावा करने के बाद श्री लंकाई पुलिस ने आतंकवाद-रोधी अभियानों को तेज़ कर दिया है। एक राष्ट्रव्यापी संबोधन में राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरिसेना ने ख़ुलासा किया कि पुलिस ने ईस्टर संडे बम विस्फोटों के बाद से जिहादी गतिविधि के सिलसिले में लगभग 70 व्यक्तियों को गिरफ्तार किया है।

UPA काल में विदेश में बैठ ₹5 लाख प्रति महीना पाने वाले अमर्त्य सेन और मनमोहन का काला रिश्ता

यह खबर नई सूचनाओं के आने के बाद अपडेट (02-05-2019, 20:57) की जा रही है। हमने भारती जैन की जिन ट्वीट्स के ऊपर यह आर्टिकल बनाया था, उन्होंने उन ट्वीट्स को डिलीट कर दिया है (हालाँकि आप उन ट्वीट्स को अभी भी नीचे पढ़ सकते हैं) और नीचे लिखे ट्वीट के माध्यम से यह कह कर माफ़ी माँगी है कि उनके पास जो भी सूचनाएँ आई थीं वो पूर्णतः गलत थीं:

अमर्त्य सेन ने नरेंद्र मोदी सरकार पर हमला बोला है। अमर्त्य सेन ने मोदी सरकार के दौरान रोज़गार की कथित रूप से बद्तर हालात को लेकर भाजपा पर निशाना साधा। अमर्त्य सेन ने मोदी मैजिक को बाकी मामलों से ध्यान भटकाने के लिए लाए जाने की बात कही। अमर्त्य सेन की इस टिप्पणी और मोदी सरकार के ख़िलाफ़ उनके द्वारा लगातार दिए जा रहे बयानों को लेकर टाइम्स ऑफ इंडिया की सम्पादक (आतंरिक सुरक्षा) भारती जैन ने उनकी पोल खोलते हुए उन्हें आड़े हाथों लिया। भारती जैन ने अमर्त्य सेन और यूपीए काल में उन्हें मिले पद का जिक्र कर मोदी सरकार के ख़िलाफ़ दिए जा रहे उनके बयानों के कारण गिनाए। भारती ने बताया कि अमर्त्य सेन को 2007 में नालंदा मेंटर ग्रुप का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था।

2012 में अमर्त्य सेन को तत्कालीन यूपीए सरकार द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय का प्रथम कुलपति नियुक्त किया गया। उन्हें पाँच लाख रुपए प्रति महीने का वेतन दिया जाता था। बेहिसाब विदेशी दौरे, सीधी नियुक्तियाँ करने का अधिकार सहित उन्हें कई अन्य सुविधाओ से नवाजा गया था। सबसे बड़ी बात कि इतना सब कुछ पाने के बाद भी अमर्त्य सेन कोई काम नहीं कर रहे थे। अपने 9 वर्षों के कार्यकाल में उन्होने अधिकतर नालंदा यूनिवर्सिटी को विदेश में बैठ कर ही चलाया। उन्होंने 7 फैकल्टीज की नियुक्तियाँ की थी। उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय को 5 सितारा होटल बनाकर रख दिया था। भारती ने आगे अमर्त्य सेन की पोल खोलते हुए लिखा कि इस दौरान कुल ख़र्च 2729 करोड़ रुपए से भी पार चला गया।

सबसे बड़ी बात कि इस दौरान अमर्त्य सेन ने 4 महिला फैकल्टीज की नियुक्तियाँ की। इनके नाम हैं- डॉक्टर गोपा सभरवाल, डॉक्टर अंजना शर्मा, नयनजोत लाहिरी और उपिंदर सिंह। उपिंदर सिंह पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह की बेटी हैं और बाकी तीनों फैकल्टीज उनकी क़रीबी मित्र थीं। डॉक्टर दमन सिंह और डॉक्टर अमृत सिंह के रूप में दो अन्य फैकल्टीज की नियुक्तियाँ की गई। ये दोनों ही डॉक्टर मनमोहन सिंह की बेटियाँ हैं। ये लोग विदेशों में बैठ कर ही सैलरी उठाते रहे। लेकिन, नरेंद्र मोदी के आने के बाद बदलाव आया।

नरेंद्र मोदी द्वारा सत्ता संभालने के साथ ही इन सभी को बाहर निकाला गया और अमर्त्य सेन को भी यूनिवर्सिटी प्रशासन से निकाल बाहर किया गया। और इसके बाद से अमर्त्य सेन ने मोदी के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना शुरू कर दिया। अमर्त्य सेन को अब विदेश में बैठ पर पद, वेतन और सुविधाएँ नहीं मिल रही हैं, इसीलिए उन्हें मोदी सरकार से दिक्कत है। भारती जैन ने अमर्त्य सेन की बख़िया उधेड़ते हुए इन ट्वीट्स में उनकी पोल खोल दी है।

अगर अनुच्छेद 370 बुरा है, PM मोदी छोड़ दें कश्मीर, क्यों ख़तरे मोल ले रहे हैं: महबूबा मुफ्ती

पीडीपी की अध्‍यक्ष महबूबा मुफ्ती ने शनिवार (अप्रैल 27, 2019) को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान पर पलटवार किया है, जिसमें उन्‍होंने कहा था कि अनुच्‍छेद-370 और 35A ने जम्‍मू-कश्‍मीर को भारी नुकसान पहुँचाया है। महबूबा मुफ्ती ने कहा, “अनुच्‍छेद-370 ही जम्‍मू-कश्‍मीर और भारत के संबंधों का आधार है और यदि प्रधानमंत्री को लगता है कि इससे कश्‍मीर खतरे में है तो इस खतरे को उन्‍हें छोड़ देना चाहिए। महबूबा ने कहा कि अगर उनको लगता है कि 370 के बिना पर हमारे रिश्ते की बुनियाद है, कश्‍मीर को छोड़ दें, अब वो कैसे छोड़ना चाहते हैं…क्‍यों खतरा मोल लेना चाहते हैं इतने सालों से।”

बता दें कि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार (अप्रैल 26, 2019) को आज तक न्यूज़ चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा था कि अनुच्‍छेद-370 और 35A ने जम्‍मू-कश्‍मीर को भारी नुकसान पहुँचाया है। पीएम ने कहा था कि कश्‍मीर में एम्स और आईआईएम की स्थापना की गई, लेकिन अच्छे प्रोफेसर वहाँ जाने के लिए तैयार नहीं हैं, क्‍योंकि वो वहाँ पर कोई इनवेस्टमेंट नहीं कर सकते, संपत्ति नहीं खरीद सकते हैं। यही नहीं कश्‍मीर में कमरों का किराया भी ज्‍यादा है।

इसके साथ ही उन्होंने कहा कि कश्मीर दिवालियापन का सामना कर रहा है। आतंकवादियों की वजह से राज्य में पर्यटन को समाप्त हो गया है। अनुच्छेद 370 और 35A के कारण लोग यहाँ निवेश नहीं करते हैं। कश्‍मीर के युवाओं को नौकरियाँ भी नहीं मिल रही हैं। अब कश्‍मीर के लोगों को लगता है कि यह स्थिति बदलनी चाहिए।

इसके साथ ही पीडीपी अध्यक्ष ने कहा कि यह उनकी पार्टी थी, जिसने बीजेपी के साथ राज्य में गठबंधन सरकार के दौरान आर्टिकल 370 और 35A को बचाया था। महबूबा मुफ्ती ने दावा किया था कि राज्य में पीडीपी-बीजेपी के शासन के दौरान अनुच्छेद 370 की रक्षा के लिए उन्होंने दो साल तक भाजपा के साथ लड़ाई लड़ी थी। महबूबा ने कहा, “मैंने मोदी को स्पष्ट कर दिया था कि अगर वे राज्य के विशेष दर्जे के साथ छेड़-छाड़ करते हैं तो पीडीपी सरकार छोड़ देगी।”

महबूबा मुफ्ती ने कॉन्ग्रेस और एनसीपी को भी नहीं बख्‍शा। उन्‍होंने दोनों पार्टियों पर आर्टिकल 370 को कमजोर करने का आरोप लगाया है। महबूबा ने कहा कि जब कॉन्ग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने साल 2008 में राज्य की हजारों कनाल भूमि अमरनाथ श्राइन बोर्ड को बेचकर आर्टिकल 370 को कमजोर किया था। इसी तरह, एनसीपी के संस्थापक स्वर्गीय शेख मुहम्मद अब्दुल्ला ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के साथ 1975 के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद मुख्यमंत्री बने थे।

फैक्ट चेक: गोरखनाथ मंदिर के बारे में ‘द वायर’ की पत्रकार ने फैलाया फेक न्यूज़, ट्विटर पर छिड़ा घमासान

यह तो सर्वविदित है कि वामपंथियों, इस्लामियों और पत्रकारिता के समुदाय विशेष के लोगों को हिन्दू धर्म से सख्त नफ़रत है। अब ऐसे में अगर कोई इन तीनों विशेषताओं से लैस हो, जैसे ‘द वायर’ की आरफ़ा खानम शेरवानी, तो ज़ाहिर है हिन्दुओं को नीचा दिखाने के लिए किसी भी हद तक खुद नीचे जाया जा सकता है- फ़ेक न्यूज़ भी फैलाई जा सकती है। शेरवानी जी ने भी यही किया- यह बात और है कि सोशल मीडिया पर पकड़ीं गईं।

हिन्दू मंदिर को बताया मुगल शासक के ‘अहसानों’ की ज़मीं पर बना

आरफ़ा खानम शेरवानी ने ट्वीट कर बताया कि वह गोरखपुर में हैं- इमामबाड़े में। साथ में उन्होंने यह बताया कि योगी आदित्यनाथ का मठ, जिसके वह मठाधीश हैं, एक मुस्लिम नवाब आसिफ़-उद्-दौला के ‘अहसान’ से उनके द्वारा दान की गई जमीन पर बना है। यानि एक तरह से, अव्यक्त तौर पर, हिन्दुओं को उनके ‘शासित’ स्टेटस की याद दिला दी।

ट्रू इंडोलॉजी ने दिखाया आईना

भारत के इतिहास के बारे में वामपंथी इतिहासकारों द्वारा फैलाए जा रहे भ्रम को दूर करने के लिए जाने जाने वाले ट्विटर हैंडल ट्रू इंडोलॉजी ने आरफ़ा खानम के ट्वीट पर एक के बाद एक ट्वीट कर फैक्ट-चेक करना शुरू किया। उन्होंने यह दिखाया कि कैसे यह मंदिर कम-से-कम 800 साल पुराना है, जबकि शेरवानी जी के प्रिय नवाब आसिफ़-उद्-दौला केवल सवा दो सौ साल पहले के।

उन्होंने अलग-अलग किताबी और आर्कियोलोजिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया आदि का सन्दर्भ देकर आरफा खानम के झूठ के गुब्बारे को पंचर कर दिया। साथ ही यह भी बताया कि इस अफ़वाह की शुरुआत कहाँ से हुई।

हिन्दूफोबिया से निकला है यह झूठ  

सवाल केवल एक ऐतिहासिक तथ्य का नहीं है- उसमें गलती किसी से भी हो सकती है। पर आरफ़ा खानम के ट्वीट एक नैरेटिव बुनने के लिए था- हिन्दुओं को मानसिक रूप से दबाने और इस्लामी संप्रभुता को अपने ऊपर स्वीकार कर लेने का नैरेटिव। यह एक अकेली या विशेष घटना नहीं, एक श्रृंखला का हिस्सा है, जिसका अंतिम ध्येय पिछले हज़ार वर्षों से अधिक समय से यही रहा है कि किसी तरह हिन्दू अपनी संस्कृति, सभ्यता, अपने धर्म को आक्रान्ताओं से निम्न कोटि का मान लें, जिससे उन्हें ‘इकलौते सच’ का मुरीद बनाया जा सके। और पत्रकारिता का समुदाय विशेष इस पाक जंग की पहली पंक्ति की टुकड़ी है।

मैं कन्हैया समर्थक, उसे टिकट न देकर RJD ने की बहुत बड़ी ग़लती, गाँधी-मार्क्स एक जैसे: दिग्विजय

मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने अपने-आप को कन्हैया कुमार का बड़ा समर्थक बताया है। कॉन्ग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय ने वामपंथी पार्टी सीपीआई के नेता कन्हैया कुमार की तारीफों के पुल तब बाँधे हैं जब सीपीआई और कॉन्ग्रेस गठबंधन में नहीं है। बेगूसराय में राजद-कॉन्ग्रेस महागठबंधन के प्रत्याशी तनवीर हसन हैं और दिग्विजय ने अपने गठबंधन के प्रत्याशी का समर्थन न करके कन्हैया की प्रशंसा की है। दिग्विजय सिंह ने इस बारे में बोलते हुए कहा, “मैं कन्हैया कुमार का समर्थक हूँ। मैंने अपनी पार्टी में भी इस बात को कहा था कि राजद ने बहुत बड़ी ग़लती की है। मैंने इस बात के लिए प्रयास भी किए कि ये सीट (बेगूसराय) सीपीआई के हिस्से में दे दी जाए।

भोपाल से कॉन्ग्रेस प्रत्याशी दिग्विजय सिंह ने बताया कि 8 और 9 मई को कन्हैया कुमार उनके पक्ष में चुनाव प्रचार करने के लिए भोपाल आ रहे हैं। दिग्विजय ने उक्त बातें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यालय पहुँच कर कही। भाकपा कार्यालय पहुँचे ‘दिग्गी राजा’ ने कॉन्ग्रेस को एक इंद्रधनुष बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी में लेफ्ट भी है और राइट भी है। उन्होंने यूपीए की पहली जीत का श्रेय भी लेफ्ट को दिया। कन्हैया पर देशविरोधी नारे लगाने के आरोपों को उन्होंने झूठा करार दिया। उन्होंने दावा किया कि एक चैनल ने भाजपा-संघ के लड़कों को खड़ा करा कर देशविरोधी नारे लगाए और कन्हैया को फँसा दिया।

दिग्विजय यहीं नहीं रुके, उन्होंने महात्मा गाँधी और कार्ल मार्क्स की तुलना करते हुए कहा कि दोनों में थोड़ा ही फ़र्क़ था। भारतीय कम्युनियस्ट पार्टी की भोपाल इकाई ने दिग्विजय सिंह का समर्थन करने की बात कही है। भोपाल के चुनाव पर पूरे देश की नज़रें हैं क्योंकि भाजपा द्वारा साध्वी प्रज्ञा को मैदान में उतारने के बाद यह सीट हाई प्रोफाइल हो गई है। पिछले डेढ़ दशक से दिग्विजय ने कोई लोकसभा या विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा है। ऐसे में, उनकी चुनावी वापसी की राह में साध्वी प्रज्ञा के आने से दिग्विजय भोपाल में पूरा ज़ोर लगा रहे हैं।

वहीं अगर कन्हैया कुमार की बात करें तो बेगूसराय में सीपीआई प्रत्याशी के रूप में उनका मुक़ाबला भाजपा के फायरब्रांड नेता गिरिराज सिंह और राजद प्रत्याशी तनवीर हसन से है। जहाँ कन्हैया के लिए जेएनयू से आए लोग प्रचार कर रहे हैं, हसन ने भी एएमयू से लड़कों को चुनाव प्रचार के लिए बुलाया है। दिग्विजय द्वारा कन्हैया की प्रशंसा भोपाल में भाकपा का समर्थन पाने के बाद किया गया। बेगूसराय में कॉन्ग्रेस राजद के साथ है और सीपीआई के विरुद्ध है जबकि भोपाल में कॉन्ग्रेस सीपीआई का समर्थन ले रही है।

भाजपा को हराने के लिए डाल आओ महागठबंधन के गुंडे को भी वोट: आप नेता

आम आदमी पार्टी भाजपा को हराने के लिए किस हद तक तड़फड़ा रही है, यह रह-रह कर हास्यास्पद तरीकों से सामने आ रहा है। कभी केजरीवाल राहुल गाँधी से कातर स्वर में गठबंधन की भीख माँगने लगते हैं, कभी भाजपा के सत्ता में लौटने की भविष्यवाणी कर के कॉन्ग्रेस को दोष देने लगते हैं। अब उनकी नेता आतिशी ने महागठबंधन के गुंडे नेताओं को भी ‘मन मार के’ वोट करने की अपील की है, ताकि भाजपा को हराया जा सके।

ट्विटर पर आया वीडियो

“हम सबकी ज़िम्मेदारी बनती है कि हमें वहाँ पे वोट ऐसे कैंडिडेट को, ऐसी पार्टी को डालना है, जो वहाँ पर बीजेपी को हरा सके। लेकिन हमें ये भी पता है सबको कि ये एक फैक्ट है कि पूरे देश भर में कोई ऐसी सिंगल पार्टी नहीं है जो बीजेपी को हरा सके। अलग अलग स्टेट्स में अलग-अलग पार्टियाँ हैं जो बीजेपी को हराने का माद्दा रखतीं हैं। फॉर इग्ज़ाम्पल (उदाहरण के तौर पर) आज या कल में यूपी का एक फेज़ था। तो अगर आप यूपी में देखें तो यूपी में बीजेपी को सिर्फ एसपी और बीएसपी की कोएलीशन (गठबंधन) हरा सकती है और कोई नहीं हरा सकता। सो इफ़ वे वर यूपी वोटर्स (तो अगर हम यूपी के मतदाता हैं) तो हमें क्या करना चाहिए था? हमें अपना वोट जा के एसपी-बीएसपी के गठबंधन को देना चाहिए, चाहे उनका जैसा भी कैंडिडेट हो। हमारे एक जानकार हैं उनसे बात हो रही थी। तो कहते हैं जी हमारे इलाके का (महागठबंधन) कैंडिडेट गुंडा है, मैं क्या करूँ? आइ सेड (मैंने कहा) अभी आँख बंद कर के कोएलीशन को डाल दो वोट। बिकॉज़ दिस इज़ एन इलेक्शन (क्योंकि यह एक ऐसा चुनाव है) जहाँ पर बीजेपी को हराना ज़रूरी है।”

ऐसे ही तैयार हुआ है महागठबंधन

आतिशी जिस प्रकार की वोटिंग की बात कर रहीं हैं, महागठबंधन वैसी ही वैचारिक भूमि पर तैयार हुआ है। दो दशक से ज्यादा समय तक एक दूसरे से लड़ने वाले सपा-बसपा साथ आ खड़े हुए हैं, कॉन्ग्रेस किसी राज्य में महागठबंधन का नेतृत्व कर रही है, किसी में तीसरे-चौथे नंबर की साझीदार है और किसी-किसी में महागठबंधन के खिलाफ़ ही चुनाव लड़ रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल कभी देश में खुद को भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा शत्रु बताते थे, अब वह राहुल गाँधी से गठबंधन के लिए मनुहार करने से लेकर लालू यादव के गले लगने तक सब कर चुके हैं।

लिंगलहरी कन्हैया कुमार के गुंडे चुनावी गाड़ियों में डंडे-ईंट-पत्थर लेकर क्यों चलते हैं?

कुछ दिन पहले जेएनयू के पूर्व लिंगलहरी अध्यक्ष श्री कन्हैया कुमार के गुंडों का चुनावी क़ाफ़िला बेगूसराय के टेकनपुरा गाँव से निकला। काली स्थान के पास उनकी गाड़ी रुकी तो कुतूहल में अंकित नाम के लड़के ने गाड़ी के पास जा कर देखने की कोशिश की। अंकित के शर्ट पर भाजपा का सफ़ेद कमल वाला चिह्न लगा हुआ था। फिर गुंडों ने बाताबाती की, और थोड़ी ही देर में गाड़ी से डंडे निकाल कर अंकित को बुरी तरह पीट दिया।

अंकित समेत कई ग्रामीणों ने बताया कि उनके पास ‘हथियार’ या बेगूसराय की बोलचाल की भाषा में ‘समान’ भी था। बेगूसराय में ‘समान’ का मतलब ‘सामान’ यानी पिस्तौल या बंदूक जैसा हथियार होता है। कन्हैया के मुँह से शराब की गंध आ रही थी, और सिर्फ गाड़ी के पास किसी भाजपा समर्थक को देख कर उसने उसका कॉलर पकड़ा और उसके गुंडों ने पुलिस की मौजूदगी में मार-पीट की।

कन्हैया कुमार एक छोटे नेता हैं जो जेएनयू में पहले लड़कियों के सामने लिंग लहरा कर सार्वजनिक स्थल पर मूत्र विसर्जन करने और लड़कियों को धमकाने के दोषी पाए जा चुके हैं। साथ ही उनकी ख्याति में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाला कलंक भी लगा हुआ है। इनकी बुद्धि का स्तर इतना ज़्यादा है कि सिलिंडर चार दिन में खत्म हो जाता है। लेकिन, सब ने इनको चढ़ा दिया है तो ये गाड़ी पर चढ़ कर घूम रहे हैं, और जेएनयू कैम्पस से सीधे सांसद होने के लिए माओवंशी कामपंथियों के सारे तरीके अपना रहे हैं।

अगर वहाँ पुलिस नहीं होती, तो ‘समान’ का वामपंथी तरीके से इस्तेमाल करते हुए सर्वहारा की ख़ूनी क्रांति की बलि अंकित वैसे ही चढ़ जाते जैसे अस्सी और नब्बे के दशक में कन्हैया के गाँव बीहट में हर दूसरे दिन चढ़ जाया करते थे।

बीहट गाँव मेरे पूर्वजों का गाँव है। उस गाँव ने लगभग 15 साल कम्यूनिस्टों के उस ख़ूनी दौर को झेला है जब वामपंथियों और उनके विरोधियों में लाश का जवाब लाश से दिया जाता था। ये बिहार का वह बुरा दौर था जब गुंडई, रंगदारी और हत्याओं के तमग़े सर पर लेने वाले विधायक हुआ करते थे, और किसी को सबक सिखाना, वामपंथी तरीके से उसकी हत्या करना ही हुआ करता था।

बेगूसराय के इस गाँव ने वो बुरा दौर देखा है जब लगातार खबरों में किसी की हत्या हुआ करती थी। बड़े जतन से इस गाँव ने उस दौर से पीछा छुड़ाया है। आपको मौका लगे तो 45-50 साल के ऊपर के किसी भी ग्रामीण व्यक्ति से बीहट के उस दौर की बात कीजिए, पता चल जाएगा कि वो कम्यूनिस्टों का गढ़ क्यों था।

ख़ैर, लिंगलहरी कन्हैया कुमार छोटे नेता हैं, इसलिए जान नहीं ली। ‘समान’ लेकर चलते हैं, लेकिन फायर नहीं कर पाए क्योंकि ये नब्बे का बिहार नहीं है कि पुलिस भी मूक दर्शक बनी देखती रहती। बड़े नेता होते और बीहट में नब्बे की तारीख़ होती तो अंकित शायद अगले दिन किसी खेत में, कई टुकड़ों में कटा हुआ मिलता। वो अगले दिन के अख़बार में ‘बीहट में हुई एक और हत्या’ की एक संख्या बन कर रह जाता।

लेकिन, ये नब्बे का बीहट नहीं है, ये नब्बे का बिहार नहीं है, और ये नब्बे का वामपंथ नहीं है। हिंसक विचारधारा से और क्या उम्मीद की जा सकती है। कन्हैया उसी माहौल की पैदाइश है जहाँ विश्वविद्यालय चुनावों में अपने मतलब के लिए नजीब अहमद को गायब कर दिया जाता है। ये उसी माहौल से बाहर आए हैं जहाँ विरोधियों को पीटना, घेर कर बुरी तरह से मार देना, और हाँ, सीडी देने के बहाने नशा मिला कर बलात्कार करना एक आम बात है।

कन्हैया कुमार के पीछे उसके विश्वविद्यालय के वामपंथी कामरेडों का पूरा इतिहास चलता है जहाँ वो अपने महिला काडरों का इस्तेमाल विरोधियों पर सेक्सुअल मोलेस्टेशन के आरोप लगा कर उनकी छवि धूमिल करने के लिए करते रहे हैं। हिंसा और सेक्स तो कामरेडों का प्रमुख हथियार है, यूनिवर्सिटी में तो जबरदस्ती करते ही हैं, बाद में, विद्यार्थी से नक्सली बनने तक, जंगलों में ‘नारी देह कम्यून की प्रॉपर्टी है’ के नाम पर महिला काडरों को आईसिस की तर्ज़ पर सेक्स स्लेव बना कर रखते हैं। जब कोई इस नर्क से बाहर निकल कर आती है, तो पता चलता है कि सर्वहारा की क्रांति में महिला काडरों की योनियों का कितना बड़ा योगदान, वामपंथी जबरदस्ती लेते हैं।

तो, कन्हैया ने जो किया या जो आगे भी करेगा, वो आश्चर्यजनक नहीं है। आश्चर्यजनक यह है कि अंकित ज़िंदा है और विडियो पर हिम्मत के साथ बता पा रहा है कि कन्हैया के गुंडों ने उसके साथ डंडों से मार पीट की और उसकी गाड़ी में ईंट-पत्थर और डंडे थे, तथा उसके साथ के गुंडों की कमर में ‘समान’ था।

ये बात और है कि कल को रवीश कुमार कन्हैया की गाड़ी में डंडे, ईंट और पत्थर के टुकड़े होने की बात पर चालीस मिनट का प्राइम टाइम या रवीश की रिपोर्ट कर दें और कन्हैया की गाड़ी में कैमरा घुसा कर यह स्क्रिप्ट पढ़ दें: “मैं अभी कन्हैया की गाड़ी के पास हूँ। यह वही गाड़ी है जिसके भीतर डंडे, ईंट और पत्थर के टुकड़े होने की बात कही गई है। मैं अपने सहयोगी कैमरामैन से कहूँगा कि वो गाड़ी खोलने से लेकर, उसकी सीटों के नीचे तक दिखाएँ ताकि पता चले कि मोदी जी के समर्थक डर के मारे कन्हैया पर जो आरोप लगा रहे हैं उनमें कितनी सच्चाई है।

“आप देख सकते हैं कि मटिहानी के बलुआ मिट्टी और बभनगामा के गोरकी माटी की धूल के अलावा, इस गाड़ी में कुछ भी नहीं है। हाँ हैं तो कुछ पानी की बोतलें जो एक गरीब घर का बेटा किसी के दिए चंदे से पी पा रहा है। कन्हैया से मैंने पूछा कि वो मिनरल वाटर कैसे पीते हैं तो उन्होंने कहा कि सिर्फ बोतल ही मिनरल वाटर की है, इसमें पानी तो रास्ते के किसी चापाकल का ही है।

“कार में तो खैर कुछ नहीं निकला, अब मैं इनके साथियों की कमर में कैमरा घुसाऊँगा और दर्शकों को दिखाऊँगा कि कन्हैया के साथियों की कमर में सिवाय काली डोरी के, जिसे बेगूसराय में डरकडोर कहते हैं जो बुरी नज़रों से बचाने के लिए बच्चों की कमर में बाँधा जाता है, यहाँ कोई हथियार या समान नहीं है। मैं यह देख पा रहा हूँ कि सत्ताधीश, सुप्रीम लीडर जब डर जाता है तो वो एक छोटे से लड़के पर, जो चंदा माँग कर चुनाव लड़ रहा है, जिसके समर्थन में कश्मीर से लेकर कर्नाटक और बम्बई से लेकर बिहार तक के लोग आ जाते हैं, वो सत्ताधीश इन पर किस तरह के हमले करता है।”

मीडिया के एक गिरोह को केजरीवाल से लेकर प्रियंका गाँधी ने जिस तरह से धोखा दिया है, अब उनकी सारी उम्मीद इस लिंगलहरी पर ही टिकी हुई है। लेकिन कन्हैया कुमार नामक चैप्टर इस देश की परिचर्चा से तीस मई तक गायब हो जाएगा, जब वामपंथियों के ढाबे की उड़ी हुई छत और बैठने के पत्थरों के नीचे की ज़मीन जा चुकी होगी।

कन्हैया इस गिरोह का एक प्रयोग है। कन्हैया की गुंडई में पुरानी वामपंथी परिपक्वता नहीं आई है। वो अभी लिंग लहराने और नारेबाज़ी में शरीक होने तक ही आ पाया है। उसे केरल के वामपंथियों की तकनीक नहीं पता कि कैसे सड़क पर भाजपा या संघ के कार्यकर्ता को फूल बेचते वक्त काट दिया जाता है। उसे अपने केरल के वैचारिक पूर्वजों की वह तकनीक नहीं मालूम कि नमक की बोरियों के साथ कैसे ज़िंदा दफ़नाने पर हड्डियाँ भी नहीं मिलती।

कन्हैया कुमार इस चुनाव के बाद डिबेट से भी गायब हो जाएगा, और उसकी आमदनी जो भाषणों से होती थी, वो भी बंद हो जाएगी। उसे एक उम्मीद के तौर पर पाक अकुपाइड पत्रकारों से लेकर छद्म बुद्धिजीवियों का समर्थन मिलता रहा है वरना इस व्यक्ति को न तो बोलने का सहूर है, न सही तरीके से मूत्र त्यागने का। ये वो महानुभाव हैं जो लालू के पाँव छूते हैं जिसने चंद्रशेखर जैसे प्रभावशाली छात्र नेता को सहाबुद्दीन की मदद से मरवाया था।

वही चंद्रशेखर जो मेरे सैनिक स्कूल के सीनियर थे। वही चंद्रशेखर जिसकी वक्तृता का ‘व’ कन्हैया अपने पूरे जीवन में हासिल नहीं कर सकता। वही चंद्रशेखर जिसमें यह हिम्मत थी कि वो सड़कों पर खड़े होकर लालू के प्राइम टाइम में उसकी गुंडागर्दी के खिलाफ घंटों बोल सकता था। वही चंद्रशेखर जिसे सुनने के लिए जेएनयू के प्रांगण में लोग अटते नहीं थे।

दुर्भाग्य से कन्हैया भी उसी विश्वविद्यालय की एक सड़ी-गली सोच की पैदाइश है। कन्हैया भी उसी बिहार का बदबूदार उत्पाद है जिसने महानता के सिवाय और कुछ देखा ही नहीं था। कन्हैया उसी बेगूसराय की धरती का बेटा बन कर आज कल खुद को बेच रहा है जहाँ से दिनकर जैसे लोग पैदा हुए हैं।

सतमासू कम्युनिस्ट और कर भी क्या पाएगा। इन्क्यूबेटर से निकले चूज़ों के लिए बाहर में सर्वाइव करना मुश्किल होता है। ये प्रयोगशाला के अविकसित और विकृत भ्रुण हैं जिन्होंने न विचार को समझा, न समाज को। विचार से हिंसा उठाई और समाज को उपहार स्वरूप बाँट रहे हैं। ये न ठीक से वामपंथी हो पाए, न भारत के नागरिक। वामपंथ से बस लाठी, ईंट और पत्थर ही उठा पाए हैं। इनकी बैसाखियाँ मई के अंत तक झटके से खींच ली जाएगी, तब यही यूथ आइकॉन रेंग भी नहीं पाएगा।

CRPF की वर्दी में संदिग्ध नदीम ख़ान को CISF ने किया गिरफ्तार, पूछताछ जारी

दिल्ली के चाँदनी चौक मेट्रो स्टेशन पर शनिवार (अप्रैल 27, 2019) को केंद्रीय औद्यौगिक सुरक्षा बल (CISF) ने एक शख्स को हिरासत में लिया है, जो कि केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल (CRPF) की वर्दी में था। CISF ने गुप्त सूचना के आधार पर इस संदिग्ध व्यक्ति को शनिवार की शाम लगभग 8:22 बजे गिरफ्तार किया।

ख़बर के अनुसार, पकड़े गए संदिग्ध शख्स को पूछताछ के लिए CISF के सुरक्षा कक्ष में ले जाया गया, जहाँ उसने कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया और ना ही उसके पास से CRPF का कोई आईडी कार्ड या फिर फोर्स से जुड़ा कोई सबूत मिला। मगर इस जाँच के दौरान उसके पास से अलग-अलग जन्म तिथि, पिता के नाम और पते वाला दो आधार कार्ड और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया है।

पूछताछ के दौरान शख्स ने अपना नाम नदीम खान और शामली का रहने वाला बताया, साथ उसने दावा किया कि वो CRPF में ट्रेनी है और श्रीनगर में उसकी ट्रेनिंग चल रही है। उसने बताया कि वो अपनी माँ के अंतिम संस्कार में शामिल होने के लिए शामली आया था। मगर जब उसके द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर श्रीनगर में CRPF और शामली पुलिस से बात की गई तो उसका दावा झूठा निकला।

जाँच में पता चला कि यह शख्स श्रीनगर में ट्रेनिंग नहीं कर रहा है और साथ ही इसके माता-पिता भी एकदम ठीक हैं। मामले में आगे की कानूनी कार्रवाई के लिए संदिग्ध व्यक्ति से बरामद किया गया सामान दिल्ली मेट्रो रेल पुलिस स्टेशन (DMRP) कश्मीरी गेट को सौंप दिया गया है।

शिकायत के बाद सचिन ने कहा: Mumbai Indians से एक रुपया भी नहीं लेता

महान बल्लेबाज़ सचिन तेंदुलकर ने मुंबई इंडियंस टीम मैनेजमेंट में किसी भी प्रकार का दखल रखने की बात से साफ़ इनकार कर दिया है। तेंदुलकर ने कहा कि वो मुंबई इंडियंस के ‘आइकॉन’ हैं और निर्णायक मंडली में भी शामिल नहीं हैं। सचिन ने हितों के टकराव के मामले में भारत में क्रिकेट की गवर्निंग एजेंसी बीसीसीआई को जवाब देते हुए कहा कि वे मुंबईं इंडियंस के मार्गदर्शक हैं वो अपने अनुभवों के आधार पर खिलाड़ियों को सही रास्ता दिखाते हैं। सचिन के ख़िलाफ़ दर्ज की गई शिकायत में कहा गया था कि वह मुंबईं इंडियंस में लाभ का पद धारण करने के साथ-साथ बीसीसीआई की क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी (CAC) के भी सदस्य बने हुए हैं। ख़ुद को मिली नोटिस के जवाब में औपचारिक प्रतिक्रिया देते हुए सचिन ने मुंबई इंडियन से किसी प्रकार का मुआवजा या सैलेरी न लेने की बात बताई है।

पूर्व भारतीय कप्तान सचिन तेंदुलकर ने अपने जवाब में कहा;

“मेरा किरदार बस फ्रैंचाइजी मुंबई इंडियंस का मार्गदर्शन करने तक सीमित है। मैं मुंबईं इंडियंस के ‘मैनेजमेंट’, ‘गवर्नेंस’ या फिर ‘एम्प्लॉयमेंट’ में शामिल नहीं हूँ। मेरी भूमिका खिलाड़ियों ख़ासकर युवाओं को सिखाने, उनका मार्गदर्शन करने, अपनी अंतर्दृष्टि रखने और अपने अनुभव साझा करने तक सीमित है। मैं बस टीम का मेंटर हूँ जो मैनेजमेंट के भीतर नहीं आता। मुंबईं इंडियंस के पास हेड कोच के अलावा और भी कई कोच हैं जो अन्य कार्यों को देखते हैं।”

भारत रत्न सचिन तेंदुलकर के ख़िलाफ़ दायर की गई शिकायत में कहा गया था कि वह डगआउट में मुंबई इंडियंस के खिलाड़ियों के साथ बैठे रहते हैं। इसका जवाब देते हुए सचिन ने इस शिकायत को अजीब बताया। उन्होंने कहा कि इस बेतुके लॉजिक के हिसाब से तो टीम के सपोर्टिंग स्टाफ, ट्रेनर, थेरेपिस्ट ये सभी के सभी मैनेजमेंट के भीतर आ जाएँगे। बता दें कि मुंबई इंडियंस सचिन तेंदुलकर को टीम का ‘मेंटर’ या ‘आइकॉन’ के रूप में प्रचारित करती है। मुंबई के मैचों में अक़्सर उपस्थित रहते हैं और टीम के खिलाड़ियों को प्रैक्टिस कराते हुए भी देखे जा सकते हैं।

अभी चल रही आईपीएल के मौजूदा सीजन में चेन्नई सुपर किंग्स शीर्ष पर काबिज़ है और अंक तालिका में मुंबई इंडियंस दूसरे नंबर पर है। मुंबई ने चेन्नई को दोनों मैच हरा डाले हैं। सचिन तेंदुलकर सीडब्ल्यूसी के भी सदस्य हैं जो बीसीसीआई को महत्वपूर्ण मुद्दों पर राय देती है।