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बंगाल में चुनावी हिंसा: EVM पर BJP उम्मीदवार के नाम और सिंबल पर चिपकाई काली टेप

व्यापक हिंसा होने की आशंकाओं के चलते पश्चिम बंगाल में चुनाव सात चरणों में सम्पन्न कराए जाने का निर्णय लिया गया, ताकि मतदान के लिए अधिकतम सुरक्षा बल तैनात किए जा सकें। लेकिन लगता है कि इससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा है, क्योंकि राज्य में आज दूसरे चरण के मतदान के दौरान हिंसा की कई ख़बरें सामने आई हैं।

ख़बर के अनुसार, दार्जिलिंग निर्वाचन क्षेत्र के चोपरा में व्यापक हिंसा देखी गई, जहाँ उपद्रवियों ने मतदाताओं को वोट डालने से रोकने की कोशिश की। स्थानीय लोगों ने इसके विरोध में बाहर आकर राजमार्ग को अवरुद्ध किया। सुरक्षा बलों को आँसू गैस के गोले दागने पड़े और लोगों पर लाठीचार्ज भी करना पड़ी, जिससे भीड़ पर क़ाबू पाया जा सके। चुनाव अधिकारियों के अनुसार, बाद में स्थानीय लोगों को सुरक्षा बलों के संरक्षण में मतदान करने की अनुमति दी गई।

उसके बाद, TMC के कार्यकर्ताओं ने चोपरा में दिघीरपार पोलिंग बूथ के अंदर भाजपा कार्यकर्ताओं से मार-पीट की। इस झड़प के दौरान, एक इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को तोड़ दिया गया।

इस वीडियो को देखने से पता चलता है कि पूरे पोलिंग बूथ पर काफ़ी बर्बरता की गई थी, और VVPAT मशीन और बैलट यूनिट सहित EVM ज़मीन पर पड़ा था। इस घटना के बाद चोपरा के बूथ नंबर 112 पर मतदान रोक दिया गया

दार्जिलिंग निर्वाचन क्षेत्र की एक अन्य घटना में, EVM में हेराफेरी की घटना सामने आई। बागडोगरा के एक मतदान केंद्र में, भाजपा उम्मीदवारों को वोट ना पड़े, इसके लिए दिमाग लगाया गया। यहाँ EVM पर भाजपा के प्रतीक चिन्ह के आगे और उम्मीदवार के नाम पर भी काला टेप चिपका हुआ पाया गया। इस बात के पता चलने के बाद बूथ में आधे घंटे के लिए मतदान रोक दिया गया। टेप हटाने के बाद बूथ में मतदान फिर से शुरू किया गया और अधिकारियों द्वारा EVM की जाँच की गई।

‘हिन्दू आतंकवाद’: एक शिगूफ़ा, एक थ्योरी एक नैरेटिव, क्यों ढह गई झूठ की यह इमारत


बीबीसी पत्रकार तुफ़ैल अहमद ने दो साल पहले एक लेख का लिंक देकर कर ट्वीट किया था- ‘Hindu Terrorism is a valid Concept’ अर्थात हिन्दू आतंकवाद कोई अफवाह नहीं बल्कि सत्य और वास्तविक परिघटना है। तुफ़ैल अहमद ने MEMRI की वेबसाइट पर 2010 में प्रकाशित अपने लेख में यह सिद्ध करने का भरसक प्रयास किया था कि हिन्दू भी आतंकवादी हो सकता है। अपने तर्कों के समर्थन में उन्होंने मीडिया में प्रकाशित ढेर सारी रिपोर्ट का संदर्भ दिया था।

तुफ़ैल अहमद निस्संदेह एक सम्मानित पत्रकार हैं और उन्होंने इस्लामिक आतंकवाद पर गहन शोध भी किया है। लेकिन आज उनके नौ वर्ष पुराने उस लेख की चर्चा प्रासंगिक इसलिए हो जाती है क्योंकि अहमद की जमात में शामिल लोग आज फिर से सक्रिय हो गए हैं जो यह कहते हैं कि हिन्दू भी आतंकी हो सकता है। गत कुछ महीनों में साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, कर्नल पुरोहित और असीमानंद को कोर्ट से आंशिक राहत मिलने पर कुछ पत्रकार हद दर्ज़े तक असहिष्णु हो गए हैं। और जब से साध्वी प्रज्ञा ठाकुर ने लोकसभा चुनाव लड़ने का निर्णय लिया है तब से उन्हें ‘आतंकी’ प्रत्याशी कहकर संबोधित किया जा रहा है।

बहरहाल, तुफैल अहमद ने वास्तव में कुछ मीडिया रिपोर्ट को इकट्ठा कर लेख लिखा था। उन्हें शायद यह पता नहीं है कि मीडिया प्रचार का माध्यम है न कि किसी समुदाय को आतंकी घोषित करने की स्थापना करने का। मीडिया में आई रिपोर्ट से यह स्थापित नहीं किया जा सकता कि हिन्दू आतंकवाद वास्तविकता है अथवा नहीं। हिन्दू आतंकवाद मिथक है अथवा वास्तविकता इस पर विचार करने से पहले यह सोचना जरूरी है कि आतंकवाद की क्या परिभाषा है।

किसी भी शब्द की परिभाषा दो प्रकार से वैध मानी जाती है- या तो वह शब्द अंतरराष्ट्रीय कानून द्वारा परिभाषित हो अथवा अकादमिक जगत में उसकी सर्वमान्य परिभाषा होनी चाहिए। दोनों ही न होने पर घटनाओं का एक इतिहास होना चाहिए जो उस ‘phenomena’ की व्याख्या करने में सहायक हो। दुर्भाग्य से आतंकवाद की कोई एक परिभाषा अंतरराष्ट्रीय कानून में नहीं लिखी है। अभी तक केवल तीन देशों- जर्मनी, ब्रिटेन और अमेरिका के विभिन्न कानूनों में ही आतंकवाद को परिभाषित किया गया है। इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र महासभा में एक Comprehensive Convention on International Terrorism नामक संधि विचाराधीन है जिसपर अभी तक सदस्य देशों की सहमति नहीं बन पाई है।

ऐसी स्थिति में हमें आतंकवाद की अकादमिक परिभाषा से काम चलाना पड़ेगा। लेकिन अकादमिक जगत भी आतंकवाद की किसी एक परिभाषा से सहमत नहीं है। तो क्या यह मान लिया जाए कि आतंकवाद कुछ होता ही नहीं है? यह तो संभव नहीं। बिना आग के धुँआ नहीं होता। आधुनिक युग में आतंकवाद का स्वाद पहली बार संभवतः ब्रिटेन ने चखा था जब वहाँ आयरिश रिपब्लिकन आर्मी के लड़ाके राजनैतिक हत्याएँ करते थे। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी में और युद्ध के बाद अमेरिका में कम्युनिस्टों को आतंकवादी कहा जाता था। सन 1964 में फ़लस्तीन को मुक्त करवाने के लिए बने संगठन PLO को आतंकी संगठन का दर्जा दिया गया था।

सोवियत संघ के विघटन के बाद अफ़ग़ानी मुजाहिद जब पाकिस्तान की रणनीति के तहत भारत में खून खराबा करते तो विश्व उसे भारत की आंतरिक कानून व्यवस्था की समस्या बताता था। लेकिन 9/11 के बाद आतंकवाद किसी एक देश की ‘आंतरिक’ समस्या नहीं रह गया था। जब अमेरिका ने आतंकवाद का स्वाद चखा तब उसने ग्लोबल वॉर ऑन टेररिज्म प्रारंभ किया जिसका उद्देश्य अमेरिका के हित साधना ही था।

बहरहाल, आतंकवाद के इतिहास से हमें यह समझ में आता है कि आज के वैश्विक परिदृश्य में आतंकवाद एक ऐसी परिघटना है जिसमें राजनैतिक हितों को साधने के लिए सामान्य जीवन जी रहे निर्दोष लोगों का खून बहाया जाता हो। यहाँ ‘राजनैतिक हित’ का लक्ष्य किसी देश की सत्ता से सीधा टकराव हो सकता है। इसकी प्रेरणा राजनैतिक स्वार्थ भी हो सकती है और मजहबी उन्माद भी हो सकता है। जब विशुद्ध राजनैतिक कारण हों तब ‘किसी के लिए आतंकवादी, किसी दूसरे के लिए क्रांतिकारी’ बन जाता है। उसी तरह जैसे क्रांतिकारी भगत सिंह जो अपनी मातृभूमि के लिए लड़े थे, अंग्रेजों के लिए आतंकवादी थे।

लेकिन जब मजहबी उन्माद जैसे कारण हों तब क्रांतिकारी और आतंकवादी एक ही सिक्के के दो पहलू नहीं हो सकते। जब 9/11 की घटना को अंजाम देने वाले मोहम्मद अट्टा की ज़ुबान पर क़ुरआन की आयतें हों तब वह केवल आतंकवादी ही हो सकता है। क्योंकि मजहब व्यक्तियों के समूहों को जीवन जीने का तरीका सिखाता है। यदि उस तरीके को गलत रूप में पेश करने वाले लोग दूसरे मत या मजहब को मानने वालों की निर्मम हत्या करना सिखाते हों तो ऐसे लोगों को क्रांतिकारी नहीं कहा जा सकता।

अब यदि हम इस कसौटी पर ‘हिन्दू आतंकवाद’ के जुमले को कसें तो पाएंगे कि हिन्दू आतंकवाद न तो आतंकवाद की किसी कानूनी परिभाषा पर सही बैठता है न अकादमिक पुस्तकों में लिखी किसी परिभाषा से मेल खाता है और न ही ऐसा कोई इतिहास रहा है जो यह कहता हो कि हिन्दू समाज कभी आतंकी रहा है। ऐसे में जो लोग यह कहते हैं कि हिन्दू आतंकवाद एक वास्तविक परिघटना है उन्हें अपनी बौद्धिक क्षमता पर पुनर्विचार करना चाहिए।      

हिन्दू आतंकवाद वास्तव में भारत की एक राजनैतिक पार्टी द्वारा एक समुदाय विशेष के तुष्टिकरण के लिए गढ़ा गया नैरेटिव था जिसकी बुनियाद ही झूठ पर रखी गई थी। इस पूरी कहानी की पोल गृह मंत्रालय के पूर्व अधिकारी आर वी एस मणि ने अपनी पुस्तक The Myth of Hindu Terror में खोली थी। मणि अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि NIA ने 2008 के मुंबई हमले के बाद 2009-10 तक जितनी भी जाँच की वह हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी को प्रमाणित करने के उद्देश्य से की। समझौता, मालेगाँव और अजमेर शरीफ ब्लास्ट से जुड़े हर केस की हर जाँच में प्राथमिक साक्ष्य छोड़कर हिन्दू आतंकवाद को स्थापित करने की दिशा में जाँच की गई। गृह मंत्रालय में अधिकारी रहते हुए मणि पर भी दबाव डाला जाता था कि वे हिन्दू आतंकवाद को सिद्ध करने में साथ दें नहीं तो उनकी जान को खतरा था।

स्थिति यह थी कि गोवा में जब एक जगह हिन्दू जागरण मंच और सनातन संस्था ने दिवाली पर पुतले जलाने का कार्यक्रम किया तो NIA ने उसकी जाँच कर निष्कर्ष निकाल लिया कि वे लोग IED प्लांट करने की योजना बना रहे थे। मणि ने लिखा है कि किस तरह 26/11 के हमले को कथित हिन्दू आतंकवादियों के सिर मढ़ने का षड्यंत्र गृह मंत्रालय में चलाया जा रहा था। साध्वी प्रज्ञा ठाकुर, असीमानन्द और कर्नल पुरोहित समेत संघ के भी बड़े नेताओं को इसमें फँसाने की पूरी साज़िश थी।

आज भले ही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर के ऊपर से मामला पूरी तरह खतम न हुआ हो लेकिन यह भी सच है कि कॉन्ग्रेस के कार्यकाल में ऐसा कोई भी व्यक्ति दंडित नहीं किया जा सका जिसे हिन्दू आतंकी कहा गया। यदि साक्ष्य और प्रमाण मौजूद थे तो मोदी सरकार आने से पहले कथित हिन्दू आतंकियों को सज़ा क्यों नहीं मिल सकी? आज जब साध्वी प्रज्ञा अपने ऊपर किए गए टॉर्चर को बताती हैं तो कोई पुलिस अधिकारी सामने आकर क्यों नहीं कहता कि यह झूठ है?

समझौता, मालेगाँव और अजमेर ब्लास्ट में पाए गए विस्फोटक भी पाकिस्तान की तरफ इशारा करते थे लेकिन जानबूझकर आज से दस साल पहले इस प्रकार का नैरेटिव गढ़ा गया ताकि हिन्दू आतंकवाद का एक इतिहास लिखा जा सके जिसके बल पर इस थ्योरी को प्रमाणित किया जा सके। संयोग से कॉन्ग्रेस के जाते ही इस नैरेटिव की बखिया उधड़नी प्रारंभ हो गईं। आज जो बुद्धिजीवी साध्वी प्रज्ञा के चुनाव लड़ने पर आतंकी कह कर सवाल उठा रहे हैं उनके प्रयास सफल नहीं होने वाले। हिन्दू आतंक का शिगूफा बहुत जल्दी ही जनता की स्मृति से ओझल हो चुका है क्योंकि किसी भी प्रोपगैंडा को जीवित रहने के लिए घटनाओं की एक शृंखला खड़ी करनी पड़ती है। दुर्भाग्य से तीन चार घटनाओं को छोड़कर हिन्दू आतंक को प्रमाणित वाली कोई घटना घटी ही नहीं।

जया प्रदा की खाकी अंडरवियर ‘छोटी सी बात’, डिंपल यादव पर दिखने लगा ‘ससुराल’ का असर

समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव की पत्नी और कन्नौज से प्रत्याशी डिंपल यादव ने बुधवार (अप्रैल 17, 2019) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में आजम खान को डिफेंड करते हुए उनकी ‘अंडरवियर’ वाली टिप्पणी को “छोटी सी बात” बताया।

रामपुर के प्रत्याशी और विवादित बयानों के ब्रांड अम्बैसडर बन चुके आजम खान के बचाव में बात करते हुए डिंपल यादव ने कहा कि बीजेपी जनता का असली मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए तरह-तरह की बातें बना रही है। उनकी मानें तो मीडिया को इन छोटी-छोटी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।

इस कॉन्फ्रेंस के दौरान डिंपल यादव ने भाजपा पर आरोप मढ़ा कि वे महिलाओं के सम्मान को लेकर गंभीर नहीं हैं। उनकी मानें तो भाजपा महिलाओं को लेकर गंभीर होती तो वह बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती पर टिप्पणी करने वाले दयाशंकर को दोबारा उपाध्यक्ष नहीं बनाती।

राजनीति में सराबोर हो चुकीं डिंपल यादव ने इस दौरान एक बार भी जया प्रदा के पक्ष में या आजम खान के इस बयान पर प्रतिक्रिया देना जरूरी नहीं समझा, बल्कि वे इस बात को छोटी सी बात बताकर दूसरी पार्टियों पर निशाना साधती रहीं।

उनका कहना है कि उनके ख़िलाफ़ और प्रियंका गाँधी के ख़िलाफ़ भी अभद्र बातें की गईं, लेकिन तब मीडिया में इन बातों को तूल नहीं दिया गया। उनकी मानें तो आजम खान के इस बयान पर मीडिया में बात होने के सिवा इस पर बात होनी चाहिए कि भाजपा ने 5 साल में क्या काम किए।

भाजपा की कमियों को हाइलाइट करते हुए डिंपल यादव ने इस दौरान अपने पति अखिलेश द्वारा शुरू की गई महिला कल्याण हेतु योजना का भी जिक्र किया। हालाँकि इस दौरान (शायद) वे भूल गईं कि आजम खान के विवादित बयान पर एक्शन लेने की जगह उनके पति अखिलेश भी उन्हीं की तरह उनके पक्ष में बात कर चुके हैं।

उन्होंने आजम की गलती स्वीकारने की जगह जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि वे वहाँ जया प्रदा के बारे में नहीं बल्कि किसी और के बारे में बात कर रहे थे। अखिलेश की मानें तो समाजवादी पार्टी के लोग महिलाओं के लिए ऐसी भाषा का प्रयोग कर ही नहीं सकते हैं।

याद दिला दें कि अखिलेश यादव और डिंपल यादव से पहले सपा के पूर्व अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को मामूली गलती करार दिया था और बलात्कारियों के लिए बेचारा शब्द इस्तेमाल करते हुए अपनी ओछी सोच का प्रमाण दिया था। कहना गलत नहीं होगा कि डिंपल यादव पर उनके ससुराल की सोच का असर दिखने लगा है। जिसमें उन्हें सिर्फ़ राजनीति में मौजूद गंदगी ही प्राथमिकता लग रही है। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि इन बयानों के चलते और आजम खान जैसे व्यक्ति के सपा से जुड़े होने के कारण उनकी पार्टी का स्तर किस हद तक नीचे गिर चुका है।

पंगा मत लो… मैं तेरे घर आकर तुझे ख़त्म कर दूँगी: शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले ने दी धमकी, ऑडियो हो गया Viral

कथित तौर पर लीक हुए एक ऑडियो टेप के वायरल होने की ख़बर का ख़ुलासा हुआ है। यह अंदेशा लगाया जा रहा है कि इस ऑडियो में जो आवाज़ है वो एनसीपी प्रमुख शरद पवार की बेटी सुप्रिया सुले की है, इसमें वो हाल ही बीजेपी में शामिल हुए राहुल शेवाले को गुस्से में धमकी दे रही हैं कि वो उनके घर जाएँगी और उन्हें मार देंगी।

ख़बर के अनुसार, एक टेलीफोनिक बातचीत का ऑडियों बीजेपी द्वारा शेयर किया गया। सुले द्वारा कथित तौर राहुल के अपमान की ख़बरें मराठी दैनिक समाचार पत्रों में भी प्रकाशित हुईं। इस घटना पर आपा खोते हुए सुले ने कहा, “क्या मैंने कभी तुम्हारा अपमान किया है? मेरे साथ पंगा मत लो। आप एनसीपी छोड़ कर बीजेपी में शामिल हो सकते हैं लेकिन मुझे परेशान मत करो। मैं आपके घर आऊँगी और आपको ख़त्म कर दूँगी और मैं इस बारे में गंभीर हूँ।”

अपनी भड़ास को बाहर निकालते हुए सुले ने आगे कहा कि अगर वह उसे बदनाम करना जारी रखते हैं तो वह राहुल शेवाले के ख़िलाफ़ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगी। धमकी भरे लहज़े में सुप्रिया ने कहा, “इस एक बात को ध्यान में रखो। मैं कोई ठेकेदार नहीं हूँ। मुझसे बुरा कोई नहीं है। मेरे साथ कभी धोखा न करें। यदि आप चाहते हैं तो इसे रिकॉर्ड कर लें। मेरा व्यवहार आपके साथ बहुत अच्छा रहा है, लेकिन अगर आप मुझे बदनाम करना जारी रखेंगे, तो मैं यह तय करूँगी कि मुझे क्या करना चाहिए।”

बातचीत के दौरान, हाल ही में बीजेपी में शामिल हुए राहुल शेवाले ने यह कहते हुए सुले को शांत करना जारी रखा कि उन्होंने सुले या उनके पिता शरद पवार के बारे में कोई अपमानजनक बातें नहीं की हैं। क्षेत्रीय समाचार पत्रों में उन्हें ग़लत तरीके से प्रदर्शित किया गया। उनमें प्रकाशित ख़बर में उनके बयानों को तोड़-मरोड़ कर छापा गया है।

प्रीतिश नंदी का ट्वीट बहुतों की हिंसक मानसिकता को उजागर करता है

इसमें कोई दोराय नहीं कि स्व-घोषित ‘लिबरल्स’ शायद सबसे नॉन-लिबरल्स का नमूना होता है, जो हमेशा केवल अपने दृष्टिकोण को ही सर्वोपरि रखते हैं। इनके द्वारा बीजेपी कार्यकर्ताओं की हत्याओं का न केवल समर्थन किया गया बल्कि जश्न भी मनाया गया। इसका उदाहरण हम एक ट्वीट के ज़रिए नीचे प्रस्तुत कर रहे हैं। इस ट्वीट में हत्याओं का समर्थन तब किया गया जब मनसे (महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना) के गुंडों ने नागरिकों को पीटा और इस पर ‘पत्रकार’ प्रीतिश नंदी ने अपनी ख़ुशी प्रकट की।

प्रीतिश नंदी ने एक वीडियो का हवाला दिया, जिसमें मनसे कार्यकर्ताओं द्वारा मुंबई निवासी को पिटते हुए देखा जा सकता है। मनसे प्रमुख द्वारा एक रैली के बाद उक्त निवासी ने फेसबुक पर राज ठाकरे की आलोचना की थी, और यह भी कहा था कि राज ठाकरे राष्ट्रविरोधी हैं। उस व्यक्ति ने केवल एक सार्वजनिक नेता की आलोचना करते हुए फेसबुक पर कुछ टिप्पणियाँ की थीं और ऐसा कुछ भी नहीं कहा था जो क़ानून के ख़िलाफ़ हो, जैसे कि हिंसा की धमकी देना। लेकिन राज ठाकरे के ख़िलाफ़ उनकी टिप्पणियों ने नेता जी के समर्थकों को इतना नाराज कर दिया कि वे उनके घर तक पहुँच गए और उन्हें शारीरिक रूप से चोट पहुँचाना शुरू कर दिया। इस वीडियो में यह स्पष्ट देखा जा सकता है कि वह व्यक्ति अपनी टिप्पणियों के लिए माफ़ी माँग रहा था, लेकिन भीड़ उस पर लगातार हमला करती रही।

प्रीतिश नंदी ने राज ठाकरे की प्रशंसा करते हुए वीडियो को यह कहते हुए संदर्भित किया कि कोई तो है, जो यह जानता है कि कैसे भक्तों को उसी की भाषा में सूद सहित वापस दिया जाए। मतलब नेता राज ठाकरे के साथ कोई पंगा नहीं ले सकता।

यहाँ यह ध्यान रखना आवश्यक है कि जिस व्यक्ति की पिटाई की गई थी, उसने केवल अपने निजी फेसबुक पेज पर अपना विचार पोस्ट किया था, जिसमें उसने किसी को शारीरिक हिंसा पहुँचाने की कोई धमकी नहीं दी थी। फिर भी, प्रीतिश नंदी जैसे ‘बुद्धिजीवियों’ ने सोचा कि राजनीतिक गुंडों द्वारा एक नागरिक की लिखित विचार का जवाब उसे शारीरिक क्षति पहुँचाकर दिया जाना चाहिए। वे बिना किसी प्रमाण के ‘मोदी समर्थकों’ पर इसका आरोप मढ़ते हैं और दावा करते हैं कि मोदी के भारत में, बोलने की स्वतंत्रता हमेशा ख़तरे में है। लेकिन, ख़ुद प्रीतिश नंदी किसी व्यक्ति की राय के लिए उसे शारीरिक रूप से पिटाई करवाए जाने को ‘एक सबक सिखाना’ मानते हैं।

फेसबुक पर अपनी राय रखने के बदले में मनसे के गुंडों द्वारा एक व्यक्ति को धमकाना और उसकी पिटाई करने की घटना को NDTV के पत्रकार श्रीनिवासन जैन ने कोई महत्व नहीं दिया। MNS कार्यकर्ताओं द्वारा इस हिंसा की निंदा करने के लिए जैन ने टिप्पणी की थी, “हिंसात्मक गतिविधि का जवाब हिंसात्मक गतिविधि नहीं हो सकता।” यह जानते हुए कि मोदी समर्थक ने केवल फेसबुक पर अपनी राय व्यक्त की थी, जैन ने शारीरिक हिंसा को सही ठहराया। इससे दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है कि जैन ने ऐसा सिर्फ़ इसलिए लिखा क्योंकि उस व्यक्ति के राजनीतिक विचार उनसे मेल नहीं खाते थे।

एक बार ऐसा भी मामला सामने आया था कि एक संपादक ने दारू पार्टी के साथ RSS प्रमुख की मृत्यु का जश्न मनाया था। लंबे समय से यह अफ़वाह है कि जब हिंदू कार्यकर्ताओं को मार दिया जाता था, तब तथाकथित लिबरल्स नियमित रूप से जश्न में शामिल होते थे। हिंसा के लिए इस तरह का खुला समर्थन इस तरह की घटनाओं को पैर पसारने का मौक़ा देता है।

राजदीप सरदेसाई ने कम्युनिस्टों द्वारा प्रशांत पूजारी की निर्मम हत्या को ‘राजनीतिक संदर्भ’ से जोड़ दिया था। बजरंग दल के कार्यकर्ता को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के लिए निर्दयता से काट दिया गया था। इस पर राजदीप सरदेसाई ने बेशर्मी से एक लेख लिखा था, “प्रशांत पूजारी की हत्या के राजनीतिक संदर्भ, दादरी गोमांस की हत्या के साथ तुलना नहीं की जा सकती है” जिससे प्रशांत पूजारी और अन्य लगभग हिंदू कार्यकर्ता के हत्यारों को बौद्धिक रूप से सक्षम करार दिया गया।

दूसरी ओर, बरखा दत्त ने नाज़ियों का हवाला तब दिया जब उन्होंने कश्मीरी पंडितों के नरसंहार और पलायन का उदाहरण दिया। जब उन्होंने कहा कि मुस्लिम आबादी में गुस्सा था क्योंकि हिंदू धनवान थे और उनके पास बेहतर आर्थिक अवसर थे।

हिंदुओं पर किए गए अत्याचार में घिरी दारुबाज एलीट का सबसे घृणित उदाहरण शायद साध्वी प्रज्ञा के साथ हुआ, उनकी यातना और उनकी दुर्दशा के बारे में ‘लिबरल’ चुप हैं। हाल ही में, जब साध्वी प्रज्ञा बीजेपी में शामिल हुईं और उन्हें भोपाल से चुनाव लड़ने के लिए टिकट दिया गया, तो उन पर अपमानजनक टिप्पणी की गई क्योंकि उनकी पोशाक का रंग भगवा था।

हिंदुओं के लिए घृणा और ‘लिबरल्स’ की विचारधारा से असहमत होने वाले व्यक्ति अपमान, पिटाई और अमानवीयता के ही योग्य हैं। यही वो संदेश है, जो प्रीतिश नंदी और श्रीनिवासन जैन जैसे ‘लिबरल्स’ समाज में प्रचारित करना चाहते हैं।

जंगल के बीच गाय को कंधे पर उठाकर इस ‘बाहुबली’ ने कैसे पेश की मिसाल, क्या है कहानी!

गाय को माँ का स्थान देकर पूजने वालों के बीच उत्तराखंड का ये नौजवान सोशल मीडिया पर एक प्रेरणा बन गया है। कुछ लोग उन्हें सुपर हीरो कह रहे हैं तो कुछ लोग ‘बाहुबली’ कह कर इस ‘गोभक्त’ की तारीफ कर रहे हैं।

28-30 साल का युवा, कंधे पर गाय लादे हुए, तस्वीर सोशल मीडिया… अचानक से देशभर में चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया पर वायरल हुई इस तस्वीर में घने जंगल के बीच इस युवा को गाय को कंधे पर ले जाते हुए देखा जा सकता है। शेयर की जा रही इस तस्वीर के अनुसार बताया जा रहा है कि उत्तराखंड के एक घने जंगल मे ये गाय भटक गई थी और पानी न मिलने के कारण चलने में असमर्थ हो चुकी थी। गाय को जंगल में ऐसे हालात में देखकर उत्तराखंड के इस नौजवान ने उसे अपने कंधे पर उठाया और काफी दूर पैदल चल कर इसे पानी के स्रोत तक पहुँचा कर गाय की जान बचाई।

गाय की मदद करने वाला ये युवा लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है

इन दिनों सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों को खूब शेयर किया जा रहा है। हालाँकि, इस युवा की जानकारी अज्ञात ही है, लेकिन उसकी टी-शर्ट पर ‘वर्ल्ड हेल्प’ लिखा हुआ जरूर देखा जा सकता है। कुछ लोगों के अनुसार इसे चमोली जिले का बताया जा रहा है, तो किसी के अनुसार उत्तरकाशी जिले का। इस युवा की पहचान चाहे जो भी हो, लेकिन यह तस्वीरें सुकून देने वाली जरूर हैं।

घने जंगल के बीच युवक के चेहरे की प्रसन्नता बता रही है कि इन्हें कहते हैं ‘सच्चे गोभक्त’
सुस्ताती हुई गाय

अक्सर उत्तराखंड में गाय चारे और घास की खोज में अपने झुण्ड से बिछड़ कर घने जंगल में खो जाती है और रास्ता भटक जाने की वजह से पानी के स्रोतों से दूर हो जाती है। इसके बाद बहुत संभावना होती है कि उसे कोई जंगली जानवर अपना शिकार बना दे। शायद यही सोचकर इस युवा ने गाय की मदद की और जैसा कि हम देख सकते हैं, एक तस्वीर में गाय पानी पीने के बाद सुस्ता रही है। गाय को अपने कंधे पर उठाकर ले जाना आसान काम नहीं है, शायद दिलेरी के ऐसे ही उदाहरणों की वजह से गढ़वाल में ‘वीर भड़‘ की उपाधियाँ प्रचलित हैं।

माँ-बाप व भाई को प्रताड़ित करने वाले, IT छापे से परेशान लैंड माफिया ने BJP नेता पर फेंका जूता

भाजपा नेता व राज्यसभा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव पर जूता फेंकने का मामला सामने आया है। ये घटना एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान हुई। भाजपा कार्यालय में ये अपने-आप में पहली ऐसी घटना है। ये घटना हुई तब हुई जब नरसिम्हा राव, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर की उम्मीदवारी को लेकर पत्रकारों से बात कर रहे थे। जीवीएल ने घटना के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस को नहीं रोका और पत्रकारों से बात करते रहे। भाजपा के महासचिव भूपेंद्र यादव की मौजूदगी में हुई इस घटना को राव ने कॉन्ग्रेसी मानसिकता का परिचय करार दिया। हालाँकि, जूता फेंकने वाला व्यक्ति शक्ति भार्गव को लोगों ने धर लिया और उसे बाहर ले गए। ख़ुद को व्हिसल ब्लोअर बताने वाला भार्गव, साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर को टिकट दिए जाने से नाराज़ बताया जा रहा है।

भार्गव ने दावा किया कि उसने अपनी फेसबुक पोस्ट में ‘लाल इमली मिल्स’ के कर्मचरियों और पीएसयू कर्मचारियों की आत्महत्या का मामला उठाया था। इसके लिए उसने सरकार को ज़िम्मेदार ठहराया था। लेकिन हिंदुस्तान में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, शक्ति भार्गव आयकर विभाग की रडार पर है। कई संदेहास्पद ख़रीददारियों के लिए आयकर विभाग की नज़रों में चढ़ा भार्गव अपने ठिकानों पर सरकारी एजेंसी की छापेमारी से परेशान बताया जा रहा है। डॉक्टर शक्ति भार्गव कानपुर के भार्गव अस्पताल का मालिक है और शहर के नामचीन डॉक्टरों में से एक गिना जाता है। बीआईसी बंगले की ख़रीद-फ़रोख़्त में उसने कई गड़बड़ियाँ की है।

इन बंगलों को लेकर उसके घर में भी सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। हाईकोर्ट में उनके ख़िलाफ़ याचिका दायर की गई है और ये याचिका ख़ुद उसके माता-पिता ने दायर की है। शक्ति भार्गव के माता-पिता ने बहू-बेटे पर प्रताड़ित करने का आरोप लगाया है। शक्ति पर आरोप है कि उसने बीआईसी बंगलों को माँ डॉ. दया भार्गव के नाम पर ख़रीदा और फिर उन्‍हें एक कंपनी बनाकर ट्रांसफर करा लिया। बाद में उसने अपने माँ व भाई को ही अलग कर दिया। अभी छह महीने पहले उसके पिता वेद प्रकाश भार्गव का निधन हो गया था।

2018 में आयकर विभाग ने डॉक्टर भार्गव के कई ठिकानों पर छापा मारा था। उसका रियल एस्टेट का भी बड़ा कारोबार है। डॉ. शक्ति भार्गव ने स्काई लाइन निर्माण प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में करीब आठ करोड़ रुपए का निवेश किया था लेकिन वह आयकर विभाग को इस रक़म का स्रोत बताने में नाकाम रहा। भार्गव ने 500 करोड़ रुपए के बीआईसी के तीन बेशकीमती बंगले 11.5 करोड़ रुपए में ख़रीदे। उनके माँ-बाप ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर शक्ति व उसकी पत्नी शिखा भार्गव पर प्रताड़ना का आरोप लगाया था। हाईकोर्ट ने डीएम को आदेश देकर बेटे-बहू को घर से निकाल कर वृद्ध दम्पति को राहत देने की बात कही थी।

भार्गव ने माँ के नाम पर हॉस्पिटल ख़रीद कर बाद में अपने माँ व भाई को ही उसकी हिस्सेदारी से निकाल बाहर किया था। लोगों का कहना है कि वह पिछले कुछ दिनों से मानसिक रूप से परेशान चल रहा था। मीडिया में आई ख़बरों के अनुसार उसे लैंड माफिया भी बताया जा रहा है। लेकिन उसकी जीवीएल नरसिम्हा राव से क्या दुश्मनी थी, इस बारे में कुछ पता नहीं चल सका है।

बस को रोका, यात्रियों को एक-एक कर उतारा और 14 लोगों को गोलियों से भून डाला – बलूचिस्तान से आई बुरी ख़बर

पाकिस्तान के प्रतिबंधित बलूचिस्तान प्रांत में बंदूकधारियों ने यात्रियों को बसों से उतरने के लिए मजबूर किया। इसके बाद वर्दीधारी आतंकियों ने उन यात्रियों में से कम से कम 14 लोगों की हत्या कर दी।

ख़बर के अनुसार, प्रांतीय गृह सचिव हैदर अली ने बताया कि हमलावरों की संख्या दो दर्जन के आसपास थी और उन्होंने अर्धसैनिक फ्रंटियर कोर की वर्दी पहनी हुई थी।

उन्होंने कहा, “मकरान कोस्टल हाईवे पर बस को रोका गया और 14 लोगों को मार दिया गया।” उन्होंने कहा कि चार वाहन कराची के पोर्ट मेगासिटी से तटीय शहर ओरमारा की ओर जा रहे थे। आतंकियों ने तभी इस घटना को अंजाम दिया। अली ने यह जानकारी भी दी कि मृतकों में एक नौसेना अधिकारी और एक तट रक्षक सदस्य भी मारा गया। ऐसा अनुमान है कि सभी पीड़ित पाकिस्तानी हैं।

प्रांतीय गृह मंत्री मीर जिया लैंगोव ने मीडिया को बताया कि इस हमले की बड़े पैमाने पर जाँच शुरू कर दी गई है। आतंकी बंदूकधारियों को ट्रैक करने का आदेश दे दिया गया है। उन्होंने कहा, “ऐसी घटनाएँ असहनीय हैं और हम उन आतंकवादियों को नहीं छोड़ेंगे, जिन्होंने इस नृशंस हमले को अंजाम दिया।”

प्रांतीय राजधानी क्वेटा में एक आत्मघाती विस्फोट के बाद हुए इस ताज़ा हमले की अभी तक किसी भी समूह ने ज़िम्मेदारी नहीं ली है। आपको बता दें कि बलूचिस्तान अफगानिस्तान और ईरान की सीमा पर है। यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे गरीब प्रांत है। साथ ही साथ इस्लामवादी, सम्प्रदायवादी और अलगाववादी विद्रोहियों का स्थल भी है। यहाँ ISIS भी सक्रिय है। पिछले सप्ताह क्वेटा में फल मार्केट में शिया जाति को टारगेट करके किए गए हमले की ज़िम्मेदारी ISIS ने ली थी।

इसके अलावा बलूचिस्तान अरबों डॉलर के चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) की परियोजना का प्रमुख स्थल भी है।

बंगाल में निष्पक्ष, शांत चुनाव के लिए राष्ट्रपति शासन लगाना ज़रूरी: सुब्रमण्यम स्वामी

लोकसभा चुनाव के बीच EVM पर कब्जा करने, बूथ कैप्चर करने जैसी घटनाएँ देखने को मिलती आ रही हैं। इस मामले में अक्सर लोकतंत्र की हत्या की दुहाई देने वाली ममता बनर्जी के राज्य पश्चिम बंगाल से ही इस प्रकार के प्रकरण सबसे ज्यादा सामने आए हैं। पश्चिम बंगाल में 6 चरण में मतदान हो रहे हैं। शुरुआती चरणों में सबसे ज्यादा हिंसक घटनाएँ पश्चिम बंगाल में हो रही हैं। आज भी वामपंथी नेता मोहम्मद सलीम पर हमला हुआ है।

बीजेपी (BJP) से राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी का कहना है कि चुनाव आयोग को पश्चिम बंगाल के हालात देखने चाहिए और वहाँ राष्ट्रपति शासन लगा देना चाहिए। उनकी राय है कि निष्पक्ष और शांत चुनाव के लिए पश्चिम बंगाल में ममता सरकार की जगह राष्ट्रपति शासन जरूरी है।

राम मंदिर का ना बनना, यूपी में करेगा नुकसान

सुब्रमण्यम स्वामी ने मीडिया से बातचीत में कहा, “उत्तर प्रदेश की जनता इस बात से जरूर दुखी होगी कि 5 साल सरकार रहने के बावजूद राम मंदिर का निर्माण नहीं हुआ। लेकिन मैं UP की जनता से यह कहना चाहता हूँ कि बीजेपी को एक मौका और दीजिए, इस बार राम मंदिर का निर्माण जरूर होगा। अगर बीजेपी अपने दम पर सत्ता में नहीं आ पाई, तो NDA की सरकार बनेगी। शिवसेना जैसे गठबंधन के दलों की विचारधारा हमसे मिलती है और राम मंदिर बनाने में कोई समस्या नहीं आएगी।”

जेट एयरवेज का राष्ट्रीयकरण होना चाहिए

जेट एयरवेज के विषय पर स्वामी ने कहा, “मैंने ही जेट एयरवेज के खिलाफ कोर्ट में याचिका दायर की थी और अब यह लगभग तय हो गया है कि मैं केस जीतने वाला हूँ। पुरानी सरकार तो एयर इंडिया को बंद कराना चाहती थी, लेकिन अगर जेट एयरवेज में काम करने वाले 20,000 लोगों के लिए कुछ करना है, तो जेट का एयर इंडिया में विलय करके राष्ट्रीयकरण करना ही एकमात्र विकल्प है।

भारत आने के लिए 1 साल से बेताब अली को सुषमा स्वराज ने दिया सहारा, कहा- ‘हम हैं न’

इन दिनों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्विटर पर उनकी सक्रियता के कारण पहचाना जाता है। वे विदेश में रह रहे भारतीय लोगों की समस्याओं को ट्विटर के ज़रिए सुलझाने के लिए हमेशा तत्पर रहती हैं। इस बात का हालिया उदाहरण तब देखने को मिला जब सऊदी अरब की राजधानी रियाद में फँसे अली नाम के एक शख्स ने विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को ट्वीट किया और सुषमा ने तुरंत उनको मदद का आश्वासन दिया।

अली ने सुषमा स्वराज को ट्वीट करते हुए लिखा “एक बात बताएँ आप लोग मेरी मदद कर सकते हो या मुझे खुदकुशी कर लेनी चाहिए। लगभग 12 महीनों से मैं दूतावास से गुहार लगा रहा हूँ, लेकिन दूतावास मुझे समझा रहा है। मुझे भारत भिजवा सकते हो तो मेहरबानी होगी क्योंकि मेरे चार बच्चे भी हैं।”

गौरतलब है कि अली पिछले एक साल से भारत आने के लिए परेशान हैं। अली के इस ट्वीट का जवाब देते हुए सुषमा स्वराज ने लिखा है, “खुदकुशी की बात नहीं सोचते हैं। हम हैं न।” सुषमा ने कहा हमारी ऐम्बेसी आपकी पूरी मदद करेगी। इस मामले में उन्होंने रियाद में भारतीय दूतावास से पूरी रिपोर्ट भी माँगी।

इतना ही नहीं सुषमा स्वराज ने एक दूसरे ट्वीट में सैन फ्रांसिस्को में रहने वाले क्षितिज को धन्यवाद किया। दरअसल, क्षितिज ने सुषमा स्वराज को ट्वीट करते हुए कहा था कि सैन फ्रांसिस्को का उच्चायोग सत्यापन के लिए मनी ऑर्डर या कैशियर चेक के जरिए भुगतान करने को कहता है। डिजिटलाइजेशन के जमाने में विदेश में भारत सरकार भुगतान के पुराने तरीकों का इस्तेमाल क्यों कर रही है? क्षितिज ने अपने ट्वीट के जरिए कहा कि कम से कम कार्ड तो स्वीकार कीजिए। भारत में आप करते हैं तो अमेरिका में क्यों नहीं। इस पर सुषमा स्वराज ने उनको रिप्लाई करते हुए कहा कि मामले को उनकी जानकारी में लाने के लिए धन्यवाद।

बता दें कि अभी कुछ समय पहले न्यूज़ीलैंड में मस्जिद पर हुए हमले के दौरान भी असदुद्दीन ओवैसी द्वारा इकबाल नामक व्यक्ति के वीज़ा प्रबंधन की गुहार लगाई थी, जिसके बाद सुषमा स्वराज ने मामले पर तत्काल सक्रियता दिखाई और खुद ओवैसी को उनके प्रयासों से अवगत कराया, इस पर ओवैसी ने ट्वीट करते हुए धन्यवाद भी कहा था।