Home Blog Page 5897

मोहम्मद फैज को लेकर NIA ने अमरोहा में की छापेमारी, देर रात तक जुटाए साक्ष्य

दिल्ली से गिरफ़्तार हुए संदिग्ध आतंकी मोहम्मद फ़ैज़ को लेकर NIA की टीम गुरुवार (मई 2, 2019) को अमरोहा में सैदपुर इम्मा गाँव पहुँची। यहाँ NIA की टीम आधी रात तक सबूत जुटाने में लगी रही। इस दौरान टीम फैज को लेकर पूर्व में पकड़े गए दो संदिग्ध आतंकी सईद और रईस की दुकान पर भी पहुँची। यहाँ पूछताछ के दौरान फैज की फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी की गई।

अमरोहा पहुँचकर सबसे पहले टीम ने मदरसा जामा मस्जिद में फैज़ की निशानदेही पर सबूत जुटाए, क्योंकि जाँच में फैज़ ने बताया था कि कुछ दिन पहले आतंकी संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम के मुखिया के बुलावे पर वह अपने दो साथियों के साथ अमरोहा आया था और इस दौरान वो जामा मस्जिद में ठहरा था।

जाँच के दौरान टीम ने प्रबंधन समिति से बात करने के साथ वहाँ के रिकॉर्ड को भी चेक किया। इसके बाद उसे मुफ़्ती सुहैल के घर ले जाया गया और बाद में टीम ने मुहल्ला दरबार स्थित उसके ससुराल पर भी छापा मारा। टीम ने इन सब जगह साक्ष्य जुटाए। देर रात होने के कारण टीम नगर कोतवाली में ही ठहरी।

बता दें कि 20 अप्रैल को बांसखेड़ी गाँव के निवासी मौलाना गुफरान की गिरफ्तारी के बाद 9 दिन के भीतर NIA ने अमरोहा में दूसरी बार छापेमारी की है। गुफरान को पाँच दिन की रिमांड पर लिया गया। शुक्रवार (मई 4, 2019) शाम उसकी रिमांड खत्म हो गई परंतु मोहम्मद फैज अभी भी एनआइए की गिरफ्त में है।

इससे पहले पिछले साल 26 दिसंबर को NIA ने अमरोहा में छापा मारकर आतंकी संगठन हरकत-उल-हर्ब-ए-इस्लाम के कथित सरगना मुफ्ती सुहैल के साथ दो सहे भाईयों सईद व रईस तथा मुहल्ला पचदरा के निवासी और आटो चालक इरशाद को भी गिरफ्तार किया था।

बिहार की बच्चियों का कोई माय-बाप नहीं: बलात्कार से हत्या तक सिर्फ़ एक चुप्पी है

मेरे मित्र प्रवीण जी ने लिखा कि बिहार के इस मुज़फ़्फ़रपुर बालिका शेल्टर होम कांड पर सारे मीडिया वाले चुप हैं। उन्होंने मुझे भी कोसा कि मैंने एक एडिटर के तौर पर क्या किया, मैं इस चुप्पी का हिस्सा क्यों हूँ जबकि मैं बिहार का हूँ और इस स्थिति में हूँ कि दस लोग मेरी बात सुन और पढ़ सकें। आख़िर ये ख़बर मुझ तक ख़बर बन कर ही क्यों पहुँची वो भी तब जब सीबीआई ने इस पर कुछ किया।

ये सारी बातें सही हैं। कई बार कुछ चीज़ें इतनी आम हो जाती हैं कि एक पत्रकार के रूप में आपकी संवेदनाएँ या तो मर जाती हैं, या कहीं खो जाती हैं क्योंकि आपको हर आतंकी हमले के बाद लिखना होता है कि कितने वीरगति को प्राप्त हुए; आपको हर बलात्कार की ख़बर पर उस कहानी को दोहराना होता है जो आप नहीं चाहते; आपको हर ऐसे शेल्टर होम कांड पर, चाहे देवरिया हो या मुज़फ़्फ़रपुर, उन बच्चियों की चीख़ को दबा कर उनकी कहानी कहनी होती है। पेशे की यह मजबूरी है जिससे हर पत्रकार का सामना होता रहता है।

ब्रजेश ठाकुर की मुस्कुराहट आपको बहुत कुछ कहती है। ब्रजेश ठाकुर इसी मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टर होम, या बालिका आसरा गृह, का सर्वेसर्वा है। पुरानी ख़बरों के अनुसार, मई 2018 में इस जगह से बहुत बड़ी ख़बर सामने आई जिसमें वहाँ की 42 बच्चियों में से 34 के साथ सेक्सुअल अब्यूज, यानी यौन शोषण, मेडिकली कन्फर्म हुआ। आज की ख़बर है कि जो 11 बच्चियाँ गायब थीं, उनकी शायद हत्या कर दी गई हो।

आप सोचिए कि 11 एक संख्या नहीं है। वो भले ही अनाथ हों, या घर से गायब कर दी गई हों, या उनके परिवार वालों से किसी भी ग़ैरक़ानूनी तरीके से दूर कर दी गई हों, इन बच्चियों के जीवन की भी अहमियत है। अहमियत इसलिए है कि सरकारों की एक बुनियादी ज़िम्मेदारी होती है राज्य या देश के नागरिकों को एक बेहतर जीवन प्रदान करना। इन मौतों की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं की है।

लालू और राबड़ी के दौर को तो हर बिहारी अनंत काल तक जंगलराज का पर्याय कहता रहेगा, लेकिन हमने नीतीश के भी पंद्रह साल देख लिए। एक बिहारी के तौर पर अगर क़ानून-व्यवस्था की बात की जाए तो बहुत ज़्यादा अंतर नहीं आया है। भले ही राजनैतिक हत्याओं का सिलसिला थम गया हो (हालाँकि जब लालू के साथ गठबंधन था तो क़रीब 578 लोगों की हत्या सिर्फ़ पहले दो महीने में हुई थी), और अपहरण का संगठित रोज़गार ख़त्म हो चुका हो, लेकिन अपराधों में कोई बड़ी कमी तो नहीं आई है। सुशासन का एक बड़ा हिस्सा क़ानून-व्यवस्था है, जिसमें नीतीश पूरी तरह से विफल रहे हैं।

आख़िर ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग पुलिस की गिरफ़्त में भी मुस्कुराते क्यों हैं? ये मुस्कुराहट पावर के क़रीब होने की गर्मी से आती है। यूँ तो इस कांड में किसी भी बड़े नेता का नाम नहीं आया है, लेकिन जिस तरह की चुप्पी छाई रही है, संभव है कि इसके तार बिहार के बड़े नामों से जुड़े हों। इन नामों में नेता से लेकर तीनों स्तम्भों के वफ़ादार शामिल हो सकते हैं। अगर ऐसा नहीं है तो फिर इतने बड़े कांड पर चुप्पी क्यों है? इस पर मीडिया स्टूडियो में चर्चा क्यों नहीं हो रही?

अगर नीतीश भाजपा का क़रीबी है तो भाजपा-विरोधी मीडिया इसमें रुचि क्यों नहीं दिखाती? इस पर तो घेर कर सरकार गिराई जा सकती है। इसी कारण मैं यह लिख सकता हूँ कि इनमें जो नाम होंगे वो बहुत बड़े नाम होंगे। बड़े नामों तक सेक्स की निरंतर सप्लाय की भी बातें गुपचुप तौर पर होती रही हैं। दबी ज़ुबान में बहुत सारी बातें कही जाती हैं कि फ़लाँ अधिकारी ऐसा है, फ़लाँ नेता को हर रात लड़की चाहिए, फलाँ साहब को बिना सेक्स नींद ही नहीं आती, फलाँ आदमी का होटल में कमरा बुक रहता है…

कहने को तो यह सब पब्लिक इमेजिनेशन है, कोरी अफ़वाह है। मैं भी इस पर बहुत कुछ नहीं लिख सकता क्योंकि न तो मेरे पास सबूत हैं, न ही मैंने बालिका गृह जाकर किसी से बात करने की कोशिश की है। मेरे लिए मेरी तार्किकता यही कहती है कि आख़िर सुप्रीम कोर्ट को नीतीश कुमार पर बरसने की ज़रूरत क्यों पड़ती है? आख़िर कठुआ की एक पीड़िता पर इतना बवाल होता है तो फिर यहाँ 11 बच्चियाँ गायब हैं, या मृत हैं, 34 का बलात्कार होता रहा है, और इस पर कोई चर्चा ही नहीं हो रही!

ब्रजेश ठाकुर अपनी गिरफ़्तारी में जिस मुस्कुराहट के साथ कोर्ट पहुँचता है वो सत्ता के मुँह पर थूकने जैसा है। सत्ताधीश भी उस थूक को पोंछ ही सकता है, क्योंकि उसमें सामर्थ्य नहीं कि ऐसे दरिंदों पर नकेल कसी जाए। क्या सत्ता के लोकतांत्रिक नेता इस बात से डर रहे हैं कि ब्रजेश ठाकुर का मुँह खुला तो बहुत लोगों के नाम बाहर आ जाएँगे?

यह बात भी जान लीजिए कि किसी दिन ब्रजेश ठाकुर ही मरा हुआ मिल सकता है। ख़ैर, उसकी मौत पर मुझे आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि ऐसे लोगों को क़ानूनन फाँसी ही मिलनी चाहिए जो छोटी बच्चियों को आसरे के नाम पर बलात्कार का शिकार बनाने से लेकर हर रात किसी की यौन कुंठा मिटाने भेज देता है। ऐसे लोगों को तो जो भी सज़ा मिले कम ही होगी।

इस बात का दूसरा पहलू यह भी है कि भारत ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में चाइल्ड शेल्टर होम में सेक्स का कारोबार ख़ूब होता है। मजबूर, बेसहारा बच्चियों और युवतियों की ब्लैकमेलिंग, चर्चों से लेकर इस तरह के एनजीओ संचालित आसरा गृहों में ख़ूब होती है। चूँकि सरकारी तंत्र पूरी तरह से इन मामलों में विफल रहा है, ज़रूरत है कि सुप्रीम कोर्ट स्वतः संज्ञान लेकर, भारत के हर ज़िले के ऐसे शेल्टर होम की ऑडिटिंग करवाए और बच्चियों से बात करे कि उनके साथ क्या-क्या होता है।

जिनके पास कहीं जाने को नहीं, जिन्हें यह भी पता नहीं कि उनके साथ जो हो रहा है वो क्या हो रहा है, जिन्हें यह समझा दिया जाता है कि ज़िंदा रहने के लिए यह करना ज़रूरी है, वो आख़िर करेंगी भी तो क्या! हम जिस समाज में रहते हैं, वहाँ घरों में ही सौ में से 99 लड़कियाँ और कई लड़के यौनशोषण का शिकार होते रहते हैं। ऐसे समाज में एक छोटी बच्ची की क्या अहमियत जिसका परिवार भी नहीं है।

सरकारों और न्यायालयों से आग्रह है कि इन बच्चियों के माता-पिता बन कर, इन्हें न्याय दिलवाएँ। जो बच्चियाँ अब हमारे बीच नहीं हैं, उनके लिए विनम्र श्रद्धांजलि, लेकिन उन हज़ारों, या लाखों बच्चियों को इन शेल्टर होम्स के नरकों से मुक्ति मिले जहाँ हर पल कुछ न कुछ बहुत बुरा घटित हो रहा है। मेरा सबसे बड़ा डर यही है कि मीडिया के इस सन्नाटे के नीचे उन बच्चियों की चीख़ें गायब न हो जाएँ।

मेरी बाध्यता है कि मैं सिर्फ़ लिख ही सकता हूँ। मेरा काम है लिखना। मैं जज नहीं, मैं मंत्री नहीं। मैं एक आम नागरिक के तौर पर बस यह कह सकता हूँ कि इस पर वैसे लोग कुछ करें, जो करने की स्थिति में हैं। यह छोटी घटना नहीं है। घरों से बच्चियाँ गायब हो जाती हैं। मेले में जो बिछड़े हैं वो किसी ऐसे ही दरिंदे के ‘आसरा गृह’ में पहुँचा दिए जाते हैं। हमारे आँगनों से हमारी बहनें, बेटियाँ अचानक से गायब हो जाती हैं। जब कोई ख़बर आती है कि कहीं बिना शिनाख़्त की कुछ बच्चियों की हड्डियाँ पोटली में मिली हैं, तो दिल बैठ जाता है। वो मेरी बहन हो सकती थी, वो किसी की बेटी रही होगी।

खुलासा: राहुल गाँधी के बिज़नेस पार्टनर को कॉन्ग्रेस राज में मिला था डिफेंस ऑफसेट

इस चुनावी मौसम में राहुल गाँधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता का मुद्दा तो उछल ही रहा है साथ में एक और खुलासा सामने आया है। राहुल गाँधी ने एक ब्रिटिश कंपनी, ‘बैकॉप्स’ के दस्तावेज़ों पर हस्ताक्षर किए थे, जिसमें ब्रिटिश नागरिक के रूप में 65% शेयर उनके थे। इस मामले में गृह मंत्रालय ने राहुल गाँधी को नोटिस भेजा था और उन्हें जवाब देने के लिए 15 दिन का समय दिया था।

इस ख़बर में अब एक नया मोड़ आया है जिसके मुताबिक़ 35% शेयरों की स्वामित्व वाली ब्रिटिश कंपनी बैकॉप्स में राहुल गाँधी के पूर्व साथी को कॉन्ग्रेस शासन के दौरान डिफेंस ऑफ़सेट का कॉन्ट्रेक्ट मिला था। इंडिया टुडे की ख़बर में यह खुलासा किया गया है कि उलरिक मैकनाइट (Ulrik Mcknight), की बैकॉप्स यूके में 35% हिस्सेदारी थी। इस कंपनी में 2003 से 2009 के बीच राहुल गाँधी का 65% इक्विटी का मालिकाना हक़ था। उलरिक मैकनाइट को यूपीए शासनकाल में 2011 में स्कॉर्पीन पनडुब्बियों का ऑफसेट कॉन्ट्रैक्ट मिला था।

रिपोर्ट में पाया गया कि 2009 में राहुल गाँधी द्वारा दोनों कम्पनियाँ छोड़ने के बाद, भारत में Backops Private Limited (जिसमें प्रियंका गाँधी को तब निदेशक बताया गया) और Backops UK, कंपनियों को जल्द ही बंद कर दिया गया था। स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माण के लिए 2011 में फ्रेंच नेवल फर्म को कॉन्ग्रेस सरकार ने कॉन्ट्रैक्ट दिया था। कॉन्ग्रेस सरकार द्वारा कॉन्ट्रैक्ट दिए जाने के बाद, भारतीय फर्म फ्लैश फोर्ज को DCNS इंडिया के माध्यम से एक हिस्सेदार बनाया गया था।

2011-12 में, फ्लैश फोर्ज ने यूके आधारित कंपनी ऑप्टिकल आर्मर का अधिग्रहण किया और मैकनाईट कंपनी के निदेशक के रूप में ऑप्टिकल आर्मर से जुड़ गया। 2012-13 में, मैकनाईट को ऑप्टिकल आर्मर कंपनी के 4% शेयर आवंटित किए गए थे।

2013 में, फ्लैश फोर्ज ने एक अन्य यूके आधारित कंपनी का अधिग्रहण किया, जिसका नाम Composit Resin Developments Limited था और उसी वर्ष, मैकनाईट ने फ्लैश फोर्ज लिमिटेड के दो निदेशकों के साथ एक अन्य कंपनी को भी शामिल कर लिया। 2015 में, वेबसाइट PGurus पर प्रकाशित लेख के अनुसार जो प्रोफेसर वैद्यनाथन के ब्लॉग पर पुन: पेश किया गया था, उसमें भी राहुल गाँधी के साथी मैकनाईट पर सवाल उठाए गए थे और कॉन्ग्रेस शासन के तहत एक प्रतिष्ठित रक्षा सौदे के रूप में स्वीकर भी किया।

लेख में निम्नलिखित आरोप लगाए गए थे:

  • राहुल गाँधी और उल्रिक आर मैककनाइट बैकॉप्स के निदेशक थे, जिसे उन्होंने 2009 में बंद कर दिया था।
  • फ्रांस की डीसीएनएस, स्कॉर्पीन पनडुब्बियों के निर्माता ने एक घोषणा की, जिसमें 20,000 करोड़ रुपए ($ 4.5 बिलियन) के सौदे के तहत भारत में 6 पनडुब्बियों की आपूर्ति करना था। यह घोषणा जून 2011 के समय में की गई थी।
  • Ulrik McKnight को 6 जून, 2012 को Optimal Armor Limited (OAL) में एक निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया। उसका कहना है कि उसकी राष्ट्रीयता संयुक्त राज्य अमेरिका है और वो वहीं रहता है।
  • उलरिक मैक्नाइट 19 फरवरी, 2013 को कम्पोजिट रेजिन डेवलपमेंट्स (CRDL) लिमिटेड में निदेशक बन गया। उसने कहा कि वह आमतौर पर अमेरिका में रहता है जबकि उसकी राष्ट्रीयता स्वीडिश है।
  • दो भारतीय नागरिक, गौतम मक्कड़ और सुनील मेनन, जो भारतीय कंपनी फ्लैश फोर्ज प्राइवेट लिमिटेड में निदेशक हैं, इन्हें एक ही समय में ऑप्टिमल आर्मर और कम्पोजिट राल डेवलपमेंट में निदेशक के रूप में भी नियुक्त किया गया।
  • फ्लैश फोर्ज ने 20 दिसंबर, 2013 को कम्पोजिट रेसिन में और 23 मार्च, 2012 को ऑप्टिमल आर्मर में हिस्सेदारी का अधिग्रहण किया।

ऑपइंडिया ने इस स्पष्टीकरण के बारे में एक ख़बर की थी और कॉन्ग्रेस द्वारा इस आरोप के बचाव में तर्क दिया गया कि राहुल गाँधी ने ब्रिटिश नागरिक के रूप में दस्तावेज़ो पर हस्ताक्षर किए थे। हमने पाया कि कॉन्ग्रेस के स्पष्टीकरण ने पहले से अधिक प्रश्नों को जन्म दिया।

हमने पाया कि उलरिक मैकनाइट पत्रकार और NYT स्तंभकार सोनिया फलेइरो के पति हैं। और फिर सोनिया फलेरो कौन है? वह एडुआर्डो फलेइरो की बेटी हैं, जो जीवन भर कॉन्ग्रेस की राजनीतिज्ञ रही हैं और यहाँ तक ​​कि 5 साल तक केंद्रीय मंत्री भी रही हैं। यहाँ कुछ भी अवैध नहीं है, लेकिन अब हम जानते हैं कि राहुल गाँधी उल्रिक मैक्नाइट से कैसे मिले होंगे।

जिस कंपनी के दस्तावेज़ कॉन्ग्रेस ने साझा किए थे (जहाँ राहुल गाँधी ने भारतीय नागरिक के रूप में हस्ताक्षर किए थे), ब्रिस्टल लीगल सर्विसेज लिमिटेड में पंजीकृत है। 6 लोअर पार्क रो, ब्रिस्टल बीएस 15BJ ये वो पता है जो Paul थॉमस पॉल रसेल से संपर्क साधने का भी पता है। यह Services Bourse Company Services नामक एक कंपनी का पता भी है जो कंपनियों को पंजीकृत करने में व्यक्तियों की मदद करती है। कंपनी 70 से अधिक अन्य कंपनियों के साथ अपना पता साझा करती है। थॉमस पॉल रसेल कौन है, इस पर शायद ही कुछ उपलब्ध हो। ऊपर वर्णित ब्रायन लवग्रोव ने भी अपना पता 6, लोअर पार्क रो, ब्रिस्टल के रूप में ही स्थापित किया।

कई अन्य प्रश्न थे जो कॉन्ग्रेस के स्पष्टीकरण के साथ उठाए गए थे और हमारी पूरी ख़बर यहाँ पढ़ी जा सकती है।

‘इस्लाम कुबूल करता तो माँ मुझे मार ही डालती, झूठ बोल रहे हैं केजरीवाल’: हंसराज हंस

उत्तर पश्चिम दिल्ली लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार और प्रसिद्ध पंजाबी लोक गायक हंस राज हंस ने शुक्रवार (मई 3, 2019) को कहा कि वे अरविंद केजरीवाल के खिलाफ मानहानि का मुकदमा दायर करेंगे। दरअसल, आम आदमी पार्टी ने हंसराज हंस के ऊपर आरोप लगाया था कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर लिया है और वह अनुसूचित जाति की सुरक्षित सीट से चुनाव नहीं लड़ सकते हैं। AAP के इसी आरोप का जवाब देते हुए हंसराज हंस ने केजरीवाल को निशाने पर लिया और कहा, “झूठे आदमी ने फिर से झूठ बोला है। गंदगी की परिभाषा को उजागर करने वाली शख्सियत को देखना हो तो वो केजरीवाल हैं।” इसके साथ ही उन्होंने मानहानि का मुकदमा और एससी/एसटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कराने की भी बात कही।

हंसराज हंस ने कहा कि उनका जन्म एक वाल्मीकि परिवार में हुआ है और उनकी माँ वाल्मीकि की पूजा करती है। उन्होंने कहा कि अगर वो धर्म परिवर्तन करके इस्लाम कबूल करते तो उनकी माँ उन्हें मार ही डालती। उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल ने वाल्मीकि समाज और भगवान वाल्मीकि का भी अपमान किया है। वहीं, केंद्रीय राज्य मंत्री विजय गोयल ने कहा कि हंसराज हंस वाल्मीकि समाज से हैं। वह लोकप्रिय सूफी गायक हैं और जो लोग उनकी लोकप्रियता से घबरा रहे हैं वह उनके खिलाफ झूठ फैला रहे हैं ऐसे लोगों को उनसे माफी माँगनी चाहिए।

गौरतलब है कि गुरूवार (मई 2, 2019) को AAP के राजेंद्र पाल गौतम ने कहा था कि भाजपा प्रत्याशी हंसराज हंस 20 फरवरी 2014 को धर्म परिवर्तन कर इस्लाम कबूल कर चुके हैं। गौतम के अनुसार इस संबंध में देश के कई प्रतिष्ठित अखबारों में खबर छपी थी और मीडिया चैनल पर इस संबंध में स्टोरी भी चलाई गई थीं। राजेंद्र का कहना है कि हंसराज हंस ने धर्म परिवर्तन कर अपना नाम मोहम्मद यूसुफ रख लिया था। इसके साथ ही उनका ये भी कहना है कि इस दौरान हंसराज ने कहा था कि उन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया है, लेकिन वह फ़िल्म इंडस्ट्री में अपने पुराने नाम से ही काम करते रहेंगे जिसके बाद अरविंद केजरीवाल ने भी ट्वीट कर यह मुद्दा उठाया था।

मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टरहोम केस में मिली हड्डियों की पोटली: CBI ने जताई लड़कियों की हत्या की आशंका

बिहार के मुज़फ़्फ़रपुर शेल्टरहोम केस में शुक्रवार (मई 4, 2019) को सीबीआई ने सर्वोच्च न्यायालय में 11 लड़कियों के मर्डर की आशंका जताई है। सर्वोच्च न्यायालय में दायर किए हलफनामे में सीबीआई ने कोर्ट को बताया है कि जाँच के दौरान दर्ज किए गए पीड़ितों के बयान में 11 लड़कियों के नाम सामने आए हैं, जिनकी आरोपितों ने कथित रूप से हत्या की थी। जाँच एजेंसी के मुताबिक एक आरोपित के कहने पर श्मशान के एक खास स्थान की खुदाई की गई, जहाँ से हड्डियों की पोटली बरामद की गई।

शुक्रवार को प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सीबीआई ने कोर्ट में यह हलफनामा सामाजिक कार्यकर्ता निवेदिता झा की ऐप्लीकेशन के बाद दायर किया। इस आवेदन में निवेदिता ने सीबीआई पर आरोप लगाया है कि एजेंसी पीड़ितों के बयान न लेकर, ब्रजेश ठाकुर समेत अन्य आरोपितों को बचाने की कोशिश कर रही है।

इसके बाद पीठ ने कहा है कि इस आवेदन पर कोर्ट सीबीआई को औपचारिक नोटिस जारी करेगा, जिसका जवाब एजेंसी को 4 दिन के भीतर देना होगा। पीठ ने संक्षिप्त दलीलों को सुनने के बाद इस मामले की सुनवाई के लिए 6 मई की तारीख तय की है।

इस पूरे मामले को लेकर लालू प्रसाद यादव के बेटे और राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के नेता तेजस्वी यादव ने नीतीश सरकार पर जमकर निशाना साधा है। उन्होंने कहा, “नीतीश कुमार के करीबी दुलरवा ब्रजेश ठाकुर ने सीएम के संरक्षण में 34 बच्चियों का सत्ताधारी नेताओं द्वारा सामूहिक बलात्कार उपरांत 11 बच्चियों को मारकर गाड़ दिया। हिंदू रीति से दाह संस्कार भी नहीं किया। बाकी बच्चियाँ अभी भी गायब हैं। नीतीश सरकार नंगी हो चुकी है।”

बता दें बिहार के मुजफ्फरपुर में एक एनजीओ द्वारा संचालित शेल्टर होम में कई लड़कियों का कथित रूप से बलात्कार और यौन उत्पीड़न किया गया था और टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान की रिपोर्ट के बाद यह मुद्दा उछला था। जिसके बाद इस मामले की जाँच सीबीआई को सौंपी गई थी और एजेंसी ने ब्रजेश ठाकुर सहित 21 लोगों के ख़िलाफ़ आरोपपत्र दायर किया था। 

‘फोनी’ तूफान: जानिए कैसे नए वार्निंग सिस्टम ने ओडिशा में बचाई हजारों जानें

ओडिशा के तटीय जिलो में शुक्रवार (मई 3, 2019) को ‘फोनी’ तूफान ने अपना कहर बरपाया, मगर वॉर्निंग सिस्टम और युद्ध स्तर की तैयारियों की वजह से हजारों लोगों की जान बच गई। सरकार ने आधिकारिक तौर पर मृतकों की संख्या 6 बताई है जबकि न्यूज एजेंसियों की रिपोर्ट में मृतकों की संख्या 8 बताई जा रही है। ओडिशा में तबाही मचाने के बाद यह तूफान अब पश्चिम बंगाल से टकरा चुका है। तूफान की भीषण स्थिति को देखा जाए तो मौत का आँकड़ा काफी कम है, और ये सब कुछ भारतीय मौसम विज्ञान की सतर्कता, बेहतर वॉर्निंग सिस्टम, केन्द्र और राज्य सरकार के बीच बेहतर तालमेल और बड़ी राहत और बचाव दल टीम के होने के कारण संभव हो पाया।

ऐसा भी नहीं था कि तूफान की गिरफ्त में आने वाले इलाके में सब कुछ सही ही रहा। तूफान के रास्ते में आने वाले क्षेत्र इससे अनछुए नहीं रहे। ओडिशा के पुरी जिले में कच्चे घरों को भारी नुकसान पहुँचा है और इस तूफान की चपेट में आए 160 लोगों को इलाज के लिए अस्पतालों में भर्ती करवाया गया है। तूफान से पुरी के डीएम और एसपी आवास भी क्षतिग्रस्त हुए हैं। तूफान आने से पहले ही बिजली की सप्लाई काट दी गई थी ताकि कोई अनहोनी न हो जिसके चलते वहाँ बिजली आपूर्ति पूरी तरह से बाधित रही। हालाँकि मौसम विभाग के नए क्षेत्रीय तूफान मॉडल (जो भारत की चक्रवातों में जीरो कैजुएलिटी का हिस्सा है) की मदद से हजारों लोगों की जान बचाने में मदद मिली और साथ ही इस सिस्टम ने ये भी दिखा दिया कि साल 1999 के भीषण चक्रवात के बाद से मौजूदा समय तक लैंडफॉल पर नजर रखने और पूर्वानुमान लगाने में हमने काफी तरक्की कर ली।

अक्टूबर 2013 में आए ‘फैलिन’ और अक्टूबर 2014 में आए ‘हुदहुद’ तूफान दौरान पाई गई सफलता के बाद केंद्रीय एजेंसियाँ और राज्य सरकारें बड़े पैमाने पर राहत और बचाव प्रबंधन में काफी ज्यादा सक्षम हो गई थीं लेकिन ‘फोनी’ तूफान से राहत और बचाव का अभियान काबिले तारीफ रहा। ‘फोनी’ तूफान के आने से पहले ही मौसम विभाग की तरफ से लगातार चेतावनी दे रहीं थी, जिसकी वजह समुद्र के किनारे और तूफान के रास्ते में आने वाली जगहों पर रहने वाले लोगों को समय रहते सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाकर पहले की तुलना में ज्यादा आसानी से बचाया जा सका।

‘फोनी’ तूफान आने से पहले ओडिशा में स्थानीय आपदा प्रबंधन बल और NDRF की टीमें सक्रिय हो गई थीं। NDRF ने ‘फोनी’ तूफान से निपटने की लिए 65 टीमें उतारी थीं, जिसमें प्रति टीम 45 लोग थे। आपको बता दें कि यह अब तक किसी भी रेस्क्यू ऑपरेशन की सबसे बड़ी तैनाती है। पिछले तीन दिनों में ओडिशा, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से लगभग 11.5 लाख से अधिक लोगों को निकाल कर सुरक्षित स्थानों पर पहुँचाया गया। वहीं कानून व्यवस्था, भोजन और सड़कें दुरुस्त करने के लिए अतिरिक्त टीमें लगाई गई हैं।

पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय (Ministry of Earth Science) के सचिव माधवन राजीवन ने कहा कि यह IMD के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण उपलब्धि है। उन्होंने इस बड़े संकट से निपटने के लिए इसके महानिदेशक के जे रमेश को बधाई दी है। उन्होंने कहा कि विभाग ने अन्य मौजूदा मॉडलों के अलावा अपने क्षेत्रीय तूफान मॉडल (Regional Hurricane Module) का सफलतापूर्वक उपयोग किया है। राजीवन ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बात करते हुए बताया कि मौजूदा प्रणाली की समीक्षा 13 मई को की जाएगी, ताकि पूर्वानुमान एजेंसी अपने चक्रवात की पूर्व चेतावनी प्रणाली में और अधिक सुधार कर सके।

बता दें कि, ओडिशा में आए तूफान ‘फानी’ से निपटने के लिए वहाँ पर युद्धस्तर की तैयारियाँ की गई थी। नौ सेना ने राहत एवं बचाव के लिए 6 जहाजों को तैनात किया था और साथ ही मेडिकल और डाइविंग टीम अलर्ट पर थीं। भारतीय वायु सेना ने दो C -17, दो C -130 और चार AN-32 को स्टैंडबाय पर रखा था। वहीं, गोपालपुर में सेना की तीन टुकड़ी स्टैंडबाय पर थी और पनागर में इंजीनियरिंग टास्क फोर्स थी। इसी तरह कोलकाता, बैरकपुर, सिकंदराबाद और कांकिनारा में भी सेना तत्पर थी।

नरेंद्र मोदी और अमित शाह को EC ने दी क्लिनचिट, आचार संहिता का उल्लंघन नहीं

शुक्रवार (मई 4, 2019) को चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को आचार संहिता उल्लंघन के 2 मामलों में क्लिनचिट दे दी है। प्रधानमंत्री के साथ भाजपा अध्यक्ष अमित शाह को भी नागपुर में दिए भाषण पर क्लिनचिट मिली है। वहीं दूसरी ओर राहुल गाँधी को आचार संहिता उल्लंघन मामले में जवाब दाखिल करने की मोहलत बढ़ा दी गई है।

कुछ दिन पहले नरेंद्र मोदी पर वाराणसी और नांदेड़ में दिए चुनावी भाषणों को लेकर शिकायत दर्ज़ हुई थी जिसपर निर्वाचन आयोग का अपना फैसला आया है। आयोग के अनुसार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने वाराणसी में दिए भाषण में किसी भी प्रकार से आचार संहिता का उल्लंघन नहीं किया था और न ही नांदेड़ में उनकी टिप्पणियों में आयोग ने कुछ गलत पाया। बता दें कि नांदेड़ में पीएम ने कॉन्ग्रेस को ‘डूबता टाइटैनिक जहाज’ बताया था और वाराणसी में उन्होंने एक रैली को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा पर बल दिया था और कहा था कि नया भारत आतंकवाद का मुँहतोड़ जवाब देता है।

नरेंद्र मोदी को अब तक निर्वाचन आयोग की ओर से पाँच मामलों में क्लिनचिट मिल चुकी है। खबरों के अनुसार आयोग ने कहा कि शिकायत आने के बाद मामले की विस्तृत जाँच की गई है। आयोग का मानना है कि इन मामलों में किसी भी तरह से मौजूदा प्रावधानों का उल्लंघन नहीं हुआ।

वहीं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के ख़िलाफ़ भी 22 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के नदिया जिले में आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायत की गई थी। यह शिकायत कॉन्ग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला द्वारा की गई थी। इस मामले में भी अमित शाह को आयोग ने क्लिन चिट दे दी है।

इसके अलावा कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी पर भी 23 अप्रैल को मध्यप्रदेश के शाहडोल में आचार संहित उल्लंघन का आरोप लगा था, जिसपर आयोग ने 1 मई को नोटिस जारी करते हुए 48 घंटे के भीतर जवाब माँगा था। आयोग ने यह समय सीमा 7 मई तक बढ़ा दी है।

जावेद भाई, उस ‘आवरण’ का इस्तेमाल बम फोड़ने के लिए भी होता है… 11 से 4 ज़्यादा मुल्कों ने बैन किया है

1892 में ओटोमन साम्राज्य में एक व्यक्ति ने बुर्क़े की सहारा लेकर डकैती की कोशिश की। कहते हैं कि उस समय के सुल्तान अब्दुल हमीद द्वितीय ने बुर्क़े पर प्रतिबंध लगा दिया। अगर आधुनिक दौर की बात करें तो बुर्क़े का सहारा लेकर 1937 में अमीन अल हुसैनी नामक अपराधी फ़िलिस्तीन से बुर्क़ा पहन कर भागने में सफल हुआ और लेबनान जाकर नाज़ी समर्थित गतिविधियों में शामिल रहा। उसके बाद 1948 के एक वाकये में इराक़ी सेना ने बुर्क़ा पहन कर फ़िलिस्तीन में घुसपैठ किया।

इसके बाद लंदन, टोरंटों, पुणे, ग्लासगो, फिलाडेल्फिया से ज़ेवरों की चोरी से लेकर, दुकानों से दारू चुराने, लाहौर में चर्चों पर बम फेंकने, कहीं बच्चे चुराने, कहीं किसी आतंकी को जेल से भगाने, सैनिकों और पुलिसकर्मियों को अफ़ग़ानिस्तान में कई बार बम से उड़ाने, पैंपोर पुलिस चीफ़ मंजूर अहमद को मारने, एवम् दसियों बार बैंकों में डाका डालने से लेकर ब्रिटेन से संदिग्ध आतंकी यासिन ओमर का भाग निकलने, पाकिस्तान में 2007 में बन्नू में 15 को मारने, पेशावर चेकप्वाइंट पर तालिबानी महिला के खुद को उड़ाने, रोटरडम में पॉकेटमारी में अचानक वृद्धि आने, कर्बला जाते हुए इस्कंदरिया में इराकी शिया श्रद्धालुओं की सुसाइड बॉम्बिंग, मुंबई हमले, जॉर्डन में 2008-9 में 50 लोगों द्वारा 170 अपराधी वारदातें, सोमालिया के 2009 वाले होटल बॉम्बिंग में, सिंगापुर के आतंकी क़ैदी के भागने में, 2010 में पाकिस्तान के खार में 41 लोगों की सुसाइड बॉम्बिंग में हत्या, उसी दिसंबर में सउदी पुलिस पर गोली चलाने में, 2011 में सोमालिया के आंतरिक मंत्री की हत्या में, उसी साल पाकिस्तान में बम धमाकों की जाँच करती पुलिस टोली पर महिला बमबाजों के हमले में, काबुल के रिसॉर्ट होटल पर हमले में, इस्ताम्बुल पुलिस स्टेशन पर 2015 के सुसाइड बॉम्बिंग में, बोको हरम के जिहादियों के भागने में, सउदी मस्जिद पर हुए आत्मघाती हमले में, चैड के अंज़ेमीना बाजार के धमाके में, येमेन के सना में शिया मस्जिद पर हुए हमले में, बलूचिस्तान के इमामबर्गा शिया मस्जिद की सुसाइड बॉम्बिंग में, इंडोनेशियाई बलात्कारी और क़ातिल अनवर के जेल से भागने में, इराक़ के पश्चिमी अनबर इलाके में विस्थापित लोगों के कैम्प पर हुए सुसाइड बॉम्बिंग में पेशावर के कृषि कॉलेज पर हुए तालिबानी हमले में, अफ़ग़ानिस्तान के शिया मस्जिद पर हुए टेरर अटैक में, श्री लंका के ईस्टर हमलों में… सबमें एक ही चीज कॉमन है: बुर्क़ा।

इसमें दसियों मामले ऐसे हैं जो बैंकों में डकैती से लेकर घड़ियाँ छीन कर भागने और बुर्क़े में होने का लाभ उठाकर पॉकेटमारी तक के हैं। पूरे यूरोप और अमेरिका में बैंकों में डाका डालने का यह एक पसंदीदा तरीक़ा है क्योंकि इस पर आप सवाल नहीं कर सकते। सवाल इसलिए नहीं कर सकते क्योंकि आपको संवेदनहीन से लेकर बिगट और रेसिस्ट तक के टैग झेलने पड़ सकते हैं।

जिस तुर्की के चाँद को देख कर भारत के लोग ईद मनाते थे, वहाँ भी हिजाब या किसी भी तरह के वैसे कपड़े पर प्रतिबंध लगा, हटा और फिर लग गया जिससे लोगों की पहचान छुपती हो। साथ ही ऑस्ट्रिया, डेनमार्क, फ़्रान्स, बेल्जियम, ताजिकिस्तान, लातविया, बुल्गारिया, कैमरून, चैड, कॉन्गो-ब्रैज़ाविल, गेबोन, नीदरलैंड्स, चीन, मोरक्को और श्री लंका में बुर्क़े पर प्रतिबंध है।

इन सारी जगहों पर प्रतिबंध का मुख्य कारण अपराध या आतंक ही है जो कि बुर्क़े की ओट में होता रहा है। ये सारी सूचनाएँ आपको बहुत ही आसानी से एक ही जगह, सारे लिंक्स के साथ यहाँ मिल जाएँगी। मुझे इस आर्टिकल को स्क्रॉल करने में क़रीब साढ़े तीन मिनट लगे, पढ़ने की बात तो खैर रहने ही दीजिए।

आप गूगल पर कुछ शब्द टाइप करेंगे जिसमें बुर्क़ा, क्राइम, टेरर आदि हैं, और आपके लिए सैकड़ों खबरें आ जाएँगी जिसके केन्द्र में एक ऐसा लिबास है जो आपके सर के बालों से लेकर चप्पलों के रंग तक को छुपा लेता है मज़हब के नाम पर। आप सवाल करेंगे तो आपको साम्प्रदायिक कहा जाएगा, आपको कहा जाएगा कि तुम्हें दूसरी संस्कृतियों का सम्मान करना चाहिए। आपको संवेदनहीन कहा जाएगा और आप पर तमाम अंग्रेज़ी ठप्पे लग जाएँगे जिसका मतलब न तो सुनाने वाले को पता है, न आपको। ट्विटर पर ऐसे विशेषण टहलते रहते हैं तो लोग बिना अर्थ जाने भी फेंक कर मारते हैं।

अब गूगल पर बुर्क़ा हटा दीजिए और जावेद अख़्तर द्वारा दिए गए बयान वाला ‘घूँघट’ टाइप कर दीजिए। कुछ परिणाम नहीं आएगा सिवाय उन चंद वामपंथी लेखों के जिसमें घूँघट को बंधन, पिछड़ेपन, पितृसत्ता और दासता की निशानी बताया जा रहा होगा। इन्हीं पोर्टलों और वेबसाइटों पर आपको अनिएसा हसीबुआँ के डिज़ायनर हिजाबों द्वारा 2016 न्यूयॉर्क फ़ैशन वीक में समुदाय विशेष की महिलाओं के सशक्तीकरण की बात मिल जाएगी कि आप हिजाबों में भी अब डिजाइन चुन सकते हैं। फिर आपको 2017 में नाइकी द्वारा नए सशक्तीकरण और महिला एथलीटों को ‘इनेबल’ करने के लिए डिज़ायनर हिजाब पर लेख मिल जाएँगे।

हिजाब और बुर्क़ा इनेबलर हैं, समुदाय विशेष की महिलाओं को डिज़ायनर सशक्तीकरण देते हैं क्योंकि अब उनके पास गर्मी में किस रंग और डिजाइन के बुर्क़े में पसीने से तर होना है, इसके लिए विकल्प हैं। अब हिजाब द्वारा सर का ढका रहना अपनी तथाकथित कल्चरल आइडेंटिटी को बरक़रार रखने की तरफ एक सशक्त क़दम है। लेकिन घूँघट! वो तो बंधन की निशानी है, उसका संस्कृति से कोई मतलब नहीं, पब्लिक में अपने सर और शरीर को ढकना सनुदाय विशेष की महिलाओं का चुनाव है, हिन्दुओं को लिए वही सर ढकना पितृसत्ता की एक पीछे ले जाती सोच।

यही कारण है कि आम तौर पर अपने आप को एथीईस्ट मानने वाले जावेद अख़्तर ने श्रीलंका द्वारा बुर्क़े पर लगे प्रतिबंध के बाद, शिवसेना द्वारा भारत में भी इस पर प्रतिबंध लगाने की बात पर घूँघट को बुर्क़े के समकक्ष ला दिया है। उन्होंने कहा है कि दोनों पर बैन लगना चाहिए, अगर बुर्क़ा पर लगाना ही है तो।

जावेद अख़्तर गीत लिखते हैं, फ़िल्मों की पटकथा भी लिखते रहे हैं जिसमें उन्होंने कुछ पीढ़ियों को सहज रूप से यह बताया कि ब्राह्मण, बनिया आदि व्यभिचारी और सूदखोर ही होते हैं, लेकिन अहमद, एंथनी जैसे लोग दयालु, दानी और परोपकारी होते हैं। जिनको लगता है कि यह संयोग मात्र है उनसे कहूँगा कि जावेद साहब द्वारा लिखी फ़िल्मों को दोबारा देखें और उनमें नायकों और बाकी के छोटे नायक/नायिकाओं के नाम और आचरण पर ध्यान दें।

ये सारी बातें इतने सूक्ष्म रूप से फ़िल्मों में डाली गईं हैं कि हम ये मानने लगे कि बनिया तो सूदखोर और अत्याचारी ही होता है, और पंडितों का काम है आँखों में धूल झोंक कर पैसे कमाना। वहीं, ईसाई और समुदाय विशेष का पात्र आपको कभी लाचार, गरीब बच्चे को पालता दिखेगा, या फिर खुदा से दो बेटे माँगता जो देश पर शहीद हो जाए। मुझे इस बात से गुरेज़ नहीं कि ईसाई या समुदाय विशेष वाले नाम के पात्र अच्छे दिखाए जाते हैं। बिलकुल दिखाए जाने चाहिए ताकि समाज में व्याप्त भेदभाव मिटे, लेकिन हर ब्राह्मण ने सबको लूटा, हर बनिए ने सबका पैसा मारा, ऐसा मैं नहीं मानता।

खैर, आगे बढ़ते हुए जावेद अख़्तर जी को बुर्क़े की चर्चा में घूँघट को घुसाने के लिए तो ‘नमन रहेगा’। पहली बात यह है कि लेखक हो कर भी संदर्भ कैसे भूल गए जावेद जी? संदर्भ यह है कि बुर्क़े का इस्तेमाल आतंकी गतिविधियों के लिए होता है और वो किसी भी देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा हैं। दूसरी बात यह है कि बुर्क़ा इस्लाम का अभिन्न अंग नहीं है, बल्कि मज़हब के कुछ ठेकेदारों की करतूत है। ये एक थोपी हुई परम्परा है जिसमें महिलाओं को एक वस्तु की तरह मान कर, उसे कैसे बाहर में जाना चाहिए, इस पर मर्दों ने साज़िशन एक नियम बना दिया है। ये वैसा ही है जैसे तीन तलाक और निकाह हलाला जिसमें कई बार मौलवी साहब ही हलाला की रस्म पूरी कर रहे होते हैं।

बुर्क़ा की बनावट ऐसी है कि उसमें चेहरा तो छोड़िए आदमी ही गायब हो जाता है। उसके भीतर अगर आपने बमों से लैस बेल्ट बाँध लिया हो, आरडीएक्स या आईईडी बैग में लेकर घूम रहे हों, विस्फोटकों को एक जगह से दूसरी जगह ले जा रहे हों, भीड़ भरी जगह में आ जा रहे हों जहाँ कैमरा तक लगा हुआ है, आप पर संदेह नहीं किया जा सकता क्योंकि उसके भीतर एक गर्भवती महिला हो सकती है, एक मोटी महिला हो सकती है, या एक एक महिला हो सकती है जो कोई सामान पीठ पर रखे हुए है। बुर्क़े के भीतर कुछ भी हो सकता है लेकिन आपको यही मानना होगा कि भीतर एक मुस्लिम महिला है जिसे उसका मज़हब इसी तरीके से उनके कल्चर को ढोने के लिए निर्देश देता है।

यूँ तो जावेद साहब ने घूँघट शब्द पर डायलॉग और गाने दोनों ही लिखे होंगे, फिर भी लगता है कि अपनी साम्प्रदायिकता में वो यह भूल गए कि आज तक किसी महिला ने घूँघट ओढ़ कर ‘जय श्री राम’ कहते हुए बाज़ार में खुद को बम से नहीं उड़ाया। आज तक किसी भी महिला की ऐसी तस्वीर नहीं मिली जिसमें वो घूँघट काढ़ कर चेहरे पर आरडीएक्स बाँध कर चर्चों में घुस रही हो। आज तक पुलिस ने एक स्केच जारी नहीं किया है जिसमें साड़ी का घूँघट बनाए एक महिला ने सर पर कूकर प्रेशर बम रखा हो जिसे उसने एक मस्जिद के सामने फोड़ दिया हो।

जानते हैं जावेद जी ऐसा क्यों है? पहली बात तो यह है कि हिन्दुओं ने कभी भी धर्म के नाम पर आतंक नहीं मचाया है। आपके दोस्तों ने एक टर्म ज़रूर बनाया था, पर सत्य सामने आ गया। दूसरी बात यह है कि घूँघट के नीचे सच में बम नहीं छुपाया जा सकता। न तो ऐसा हो सकता है, न ही एक हिन्दी फिल्म की नायिका के साड़ी (या घाघरे) के नीचे जाँघ पर रायफल बाँधने के अलावा कोई उदाहरण मुझे याद आता है जिसमें ऐसी कोई वारदात हुई हो।

इसलिए, जब आपके जैसे लोग इस तरह की बातें करते हैं तो आप हर दिन अपनी क्रेडिबिलटी खोते हैं। आपका झूठ सामने आता है कि आप एथीईस्ट हैं जबकि आप भीतर से ‘मजहबी’ हैं जिसे इस बात की चिंता है कि बुर्क़ा तो इस्लाम का अंग है, इसे कैसे हटा देगा कोई। हमें इससे मतलब नहीं है जावेद जी कि बुर्क़ा हटे या रहे। समय आने पर समुदाय विशेष की महिलाएँ खुद सड़क पर आएँगी कि उन्हें गर्मियों में सोलर कूकर नहीं बनना और उन्हें हवा के थपेड़ों को अपने चेहरे पर महसूस करना है।

वो समय हो सकता है सौ साल बाद आए। लेकिन तब तक, दो बातों को, संदर्भ से बिलकुल हटा कर, अपनी अश्लील हँसी के साथ परोसना बंद कीजिए। ध्यान रहे कि बुर्कों का इस्तेमाल बम फोड़ने के लिए होता रहा है, घूँघट राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला नहीं है।

हिन्दूफ़ोबिक द वायर, मंदिर में पूजा-पाठ और यज्ञ-हवन ही होते हैं

‘लोग हिन्दू होना बंद कर दें’ ही पत्रकारिता के समुदाय विशेष का ‘Endgame’ था, और अब इन असुरों ने अपने पत्ते खोलने भी शुरू कर दिए हैं। ‘क्यों बने भई राम का मंदिर? घर में ही पूजा कर लो’ से शुरू हुआ प्रोजेक्ट ‘सबरीमाला मंदिर में हमारे हिसाब से पूजा होगी (नहीं तो नहीं होगी), ‘शिवरात्रि का दूध शिवलिंग पर मत चढ़ाओ’ से होता हुआ ‘मंदिर में भी हवन-पूजा-यज्ञ क्यों होना चाहिए? यह अन्धविश्वास है, असंवैधानिक है’ के अवश्यम्भावी उपसंहार पर आ गया है। पत्रकार से प्रपोगंडाकार बने सिद्धार्थ वरदराजन के हिन्दूफोबिक पोर्टल ‘द वायर’ में आज छपा लेख सीधे-सीधे मंदिरों में भी पूजा-पाठ, हवन-यज्ञ किए जाने का विरोध करता है।

हुआ यह कि तमिलनाडु के भारी अकाल को लेकर वहाँ की अन्नाद्रमुक सरकार ने अपने हड़पे गए, अपने चंगुल में फँसे 4000 मंदिरों को सर्कुलर दिया कि वह शास्त्रों में वर्णित वह यज्ञ-हवन आदि करें जिससे शास्त्रों में बारिश होने की बात कही गई है। उसी को पकड़ कर वायर उगलता है मंदिरों में पूजा-पाठ कराए जाने का आदेश ‘असंवैधानिक’ है, ‘संविधान में वर्णित ‘साइंटिफिक टेम्पर’ लोगों में लाने के आदेश के खिलाफ है’, ‘ये (दुष्ट) भाजपा करवा रही है यह सब’ वगैरह का विशुद्ध जहर।

सबसे पहले तो मंदिर का काम ही है पूजा-पाठ करना। वो अर्बन नक्सलियों का दिल्ली प्रेस क्लब या जेएनयू नहीं होता। वहाँ लोग भी हवन-यज्ञ के लिए ही जाते हैं और इसीलिए वहाँ पुजारी भी होते हैं। इसलिए वहाँ किसी भी प्रकार का कर्म-कांड होना गलत नहीं, सही है। गलत अगर कुछ है तो वायर की सोच, जो हर चीज इनके अब्राहमी, क्रिस्लामोकॉमी (ईसाई, मुस्लिम और कम्युनिस्ट विचारधारा के घालमेल से बने लेंस से) मानदंडों पर देखती है, और जो न समझ आए उसे नष्ट कर देने पर उतारू हो जाती है।

अब दूसरी बात यह कि पूजा-पाठ करने से ‘क्या’ होता है इसका जवाब क्रिस्लामोकॉमी गिरोह को देना जरूरी नहीं। हर किसी को अपनी आस्था मानने का पूरा हक़ होना चाहिए, चाहे और किसी के कितना भी समझ में न आए। किसी को समझाने का ठेका नहीं लिया हिन्दुओं ने। और जो हिन्दू नहीं है, उसे यह सब जानने में इतनी दिलचस्पी क्यों? हिन्दुओं को अपने योग-आध्यात्म-धर्म के गुरुओं से पता चल जाता है कि शिवलिंग पर दूध क्यों, मंदिर में हवन क्यों।

तीसरी बात ‘साइंटफिक टेम्पर’ की तो, जाओ नहीं करते वह डेवलेप। क्या कर लोगे? आप आए हैं उन्हें ‘साइंटिफिक टेम्पर’ सिखाने जो अपनी धार्मिक सभ्यता के ही चरम पर शून्य, धातुशोधन (metallurgy), चिकित्सा से लेकर स्थापत्य कला के सिरमौर थे। किस चीज में ‘साइंटिफिक’ होना है किसमें नहीं, हमें यह सिखाने वाले पहले खुद में हिन्दुओं के धर्म, आस्था, परंपरा के लिए थोड़ी ‘सहिष्णुता’ विकसित कर लें।

अब तुम्हारे आखिरी सवाल की बात, कि राज्य सरकार ऐसा सर्कुलर क्यों दे रही है तो वह इसलिए आदमपिशाचों कि तुम्हारी ‘सेक्युलर’ सरकारें HR&CE जैसे विभाग बनाकर हमारे मंदिर खा जातीं हैं, हमारे मंदिरों की तिजोरी से अरबों की दान दक्षिणा पर सरकारी डाका डालने और गैर-सरकारी गबन करने के बाद भी हमारे पुजारियों को 19 रुपए, 215 रुपए जैसी नीच तनख्वाहें देतीं हैं। अब जब मंदिर अपने कब्जे में रखा है सरकार ने, सारा चढ़ावा खुद डकार रही है तो पूजा का सर्कुलर सऊदी या वैटिकन से आएगा क्या?

मंदिर किसी के बाप की जागीर नहीं है

हिन्दुओं के मंदिरों में सरकारी हस्तक्षेप से आज वही हो रहा है जिसकी हमेशा से आशंका जताई जा रही थी। इसकी आशंका हमेशा से हिन्दू गुरु जताते थे, पर सेक्युलरिज्म के नशे में अंधी सरकारों के कान पर जूँ नहीं रेंगी। सरकार के हाथों में चले जाने से कोई भी चीज ‘पब्लिक प्रॉपर्टी’ हो ही जाती है- इसी लॉजिक से सबरीमाला को ‘पब्लिक प्लेस है, सबको घुसने मिलना चाहिए’ का हवाला देकर मंदिर की पवित्रता भंग की गई, इसी (कु)तर्क से मदिर टूरिस्ट प्लेस बन रहे हैं और इसी लॉजिक से सरकारें मंदिरों की मलाई काटने की तो हक़दार हैं पर उनसे उम्मीद यह की जाती है कि वे पुजारियों को ज्यादा पैसा न दें (क्योंकि पूजा का काम ‘प्रोडक्टिव’ नहीं है) और पूजा-पाठ में तो सीधा-सीधा विघ्न उत्पन्न करें।

पप्पू यादव ने लालू यादव के दोनों बेटों को कहा कुपुत्र, RJD को बताया BJP की B-टीम

जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के राष्‍ट्रीय संरक्षक सह सांसद पप्‍पू यादव ने RJD अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव के बेटों को कुपुत्र करार दिया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि RJD ने बिहार में मुस्लिम उम्मीदवारों को हराने के लिए भाजपा से समझौता कर लिया है।

जहानाबाद में चुनाव प्रचार के लिए पहुँचे पप्पू यादव ने कहा, “मैं बीजेपी की बी-टीम से बिहार को बचाना चाहता हूँ। लालू के 2 कुपुत्र (तेजस्वी यादव और तेजप्रताप यादव) महागठबंधन के खिलाफ काम कर रहे हैं। चतरा में गुंडे को कॉन्ग्रेस प्रत्याशी मनोज यादव के खिलाफ टिकट दिया गया। सुपौल में महागठबंधन की उम्मीदवार रंजीता रंजन को हराने के लिए अपना उम्मीदवार उतारा। RJD ने बेगूसराय में बीजेपी के समर्थन में अपना उम्मीदवार उतारा है। कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की सभा में बुलाने पर भी तेजस्वी नहीं गए।”

मधेपुरा से प्रत्याशी हैं पप्पू यादव

मधेपुरा से प्रत्याशी पप्पू यादव ने आगे कहा, “राजद और तेजस्वी यादव ने भाजपा से समझौता कर चुनाव में महागठबंधन को कमजोर किया है। और इस बात को पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ने भी कहा है कि NDA सिर्फ बिहार की सीटों पर अच्छा कर रही है। तेजस्वी जहाँ-जहाँ मुस्लिम उम्मीदवार खड़े हैं, उन्हें हराने का काम कर रहे हैं। RJD और नीतीश कुमार मिलकर 2019 का नहीं, बल्कि 2020 का चुनाव लड़ रहे हैं।”

गौरतलब है कि जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) ने कन्हैया कुमार, मधुबनी में निर्दलीय शकील अहमद और जहानाबाद में सांसद अरुण कुमार को समर्थन दिया है। पप्पू यादव को महागठबंधन में शामिल होने से अंतिम समय में रोक दिया गया था।