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परमाणु युद्ध का भय दिखाकर वामपंथी बुद्धिजीवियों ने देश को आर्थिक रूप से खोखला किया

कल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बाड़मेर में चुनावी रैली को संबोधित करते समय कहा कि भारत ने अब पाकिस्तान के परमाणु बम से डरना बंद कर दिया है। उन्होंने कहा कि हमेशा पाकिस्तान के परमाणु बम से हमें डराया जाता था लेकिन हमारे पास भी परमाणु बम हैं और हमने वो दिवाली के लिए नहीं रखे हैं।

बस फिर क्या था, प्रधानमंत्री के इस बयान पर उदारवादी-वामपंथी बुद्धिजीवियों के खेमे के सरदार रामचंद्र गुहा ने ट्विटर पर त्वरित प्रतिक्रिया दी कि नरेंद्र मोदी परमाणु युद्ध छेड़ना चाहते हैं और उन्हें किसी की चिंता नहीं वो केवल अपनी ‘गद्दी’ (पद) की चिंता करते हैं। दूसरी तरफ महबूबा मुफ़्ती ने यहाँ तक कह दिया कि अगर भारत ने अपने परमाणु बम दिवाली के लिए नहीं रखे हैं तो पाकिस्तान ने भी अपने बम ईद के लिए नहीं रखे हैं। यह कहकर महबूबा भारत की जनता को पाकिस्तान के बम से डरा रही थीं।

महबूबा और गुहा के अलावा भी बहुत से लोगों ने प्रधानमंत्री की केवल इस बात को लेकर आलोचना की कि उन्होंने भारत के पास भी परमाणु हथियार होने की बात कही। वास्तव में इस प्रकार की आलोचना शुद्ध अकादमिक रोमांस जैसी होती है, जो प्रायः मार्क्सवाद सी अनुभूति प्रदान करती है। मैं मजाक नहीं कर रहा हूँ। परमाणु युद्ध और उसके आसपास घूमती विवेचनाएँ ऐसे ही रोमांस का एक अंग हैं।

बार-बार ये कहना कि भारत पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध हो जाएगा और दक्षिण एशिया समाप्त हो जाएगा ये सब निहायत ही बचकानी बातें हैं। वास्तविकता यह है कि कोई भी देश परमाणु युद्ध नहीं चाहता। परमाणु युद्ध का डर दिखाकर देश का मनोबल तोड़ा जाता है और जनता को भयभीत कर लिबरल-वामपंथी एजेंडा सेट किया जाता है। वास्तव में विश्व के हर बड़े देश ने परमाणु अस्त्र इसलिए बनाए ताकि उनके ऊपर परमाणु हमला करने से पहले दूसरा देश दस बार सोचे। इसे ‘deterrence’ कहा जाता है। अब यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता को इस बात की याद दिलाते हैं कि हमारे पास भी परमाणु अस्त्र हैं इसलिए हम दूसरों के बम से सुरक्षित हैं तो इसमें बुरा क्या है?

जनता को परमाणु युद्ध का डर दिखाना आज की बात नहीं है। शीत युद्ध के समय भी अमरीकी बच्चों को स्कूलों में सिखाया जाता था कि जब रूस परमाणु हमला करेगा तो क्या करना होगा। सन ’45 के पश्चात किसी भी देश ने परमाणु बम का प्रयोग किसी अन्य देश पर नहीं किया फिर भी ‘अप्रसार’ तथा ‘निरस्त्रीकरण’ का पाठ प्रत्येक विश्वविद्यालय में जोर-शोर से पढ़ाया जाता है।

जब अमरीका ने बम बनाया तो रूस को मिर्ची लग गई। दक्षिण एशिया में सर्वप्रथम चीन ने बम बनाया तो भारत ने भी बनाया। भारत ने बम बनाया तो पाकिस्तान जल गया। फिर आरंभ हुआ दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन किस प्रकार बिगड़ रहा है इस पर विवेचना की बकैती करने का दौर। विश्वविद्यालयों में Nuclear Disarmament और Non-proliferation पर जमकर शोध किया गया और मोटी-मोटी पुस्तकें लिखी गईं।

बड़े-बड़े विशेषज्ञों ने भारत-पाकिस्तान के मध्य परमाणु युद्ध की संभावनाओं पर प्रश्नोत्तरी के स्वरूप में पुस्तक लिखी। और भी बहुत कुछ लिखा गया और दशकों तक विश्लेषणात्मक टीका-टिप्पणी प्रकाशित की गई। किन्तु इसका प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष लाभ क्या हुआ यह किसी को ज्ञात नहीं। परमाणु युद्ध की आशंकाओं पर इतनी बुद्धि खर्च करने के बाद कोई बहुत बड़ी पॉलिटिकल थ्योरी विकसित नहीं हुई न ही शक्ति संतुलन पर कोई समाधान प्राप्त हुआ। मेरे विचार से इसी को ‘बुद्धिविलासिता’ कहा जा सकता है। प्रख्यात विद्वान प्रो० कपिल कपूर ‘बुद्धिजीवियों’ को बुद्धि बेचकर जीविका कमाने वाला कहते हैं।

परमाणु युद्ध की संभावना के प्रपंच में विज्ञान के उन विषयों पर नीतिगत शोध नहीं हुआ जिनसे जनता का सीधा सरोकार था। उदाहरण के लिए ‘साइंस पॉलिसी’ विषय को लेते हैं। यह ऐसा विषय है जिस पर लेबोरेटरी में शोध नहीं होता। यह विज्ञान के सामाजिक पक्षों के अध्येता सामाजिक विज्ञान फैकल्टी में पढ़ते हैं। विज्ञान को समाज से जोड़ने का कार्य इंडस्ट्री का है लेकिन भारत में उद्योग जगत सदैव उपेक्षित रहा। इसी का लाभ लेकर सरकारी वेतन पर पलने वाले वामपंथी बुद्धिजीवी और सलाहकार जिन पर सरकार को दिशा देने का दायित्व था उन्होंने बेकार के विषयों पर मंथन किया और देश को भ्रमित किया।

सरकार का दृष्टिकोण पूर्णतः विज्ञान की उपलब्धियों पर गाल बजाना नहीं होता अपितु उस अविष्कार का साधारण जनमानस के लिए क्या उपयोग है इस पर केन्द्रित होता है। दुर्भाग्य से साइंस पॉलिसी के संस्थान वामपंथी गिरोह के खेमे के अधीन हैं और वामी गिरोह का मुख्य काम प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान को गाली देना ही रहा है। उनकी समूची ऊर्जा इसी पर खर्च होती है कि भारत के प्राचीन ज्ञान को किस प्रकार ‘छद्म’ तथा महत्वहीन सिद्ध किया जाए।

केमिस्ट्री और कम्प्यूटर साइंस आज के उद्योग जगत की रीढ़ हैं। किन्तु प्रोग्रेसिव सोच के ‘साइंस फिलोसोफर’ इन विषयों पर बात नहीं करते। उदाहरण के लिए जेएनयू में साइंस पॉलिसी के शिक्षक कभी इस पर शोध नहीं करते कि देश में रसायन विज्ञान की किन विधाओं पर शोध हो जिससे इंडस्ट्री को लाभ पहुँचे। वे कभी स्पेस साइंस, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स अथवा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्मार्ट सिटी आदि पर बात नहीं करते।

देश के विश्वविद्यालयों में अंतरराष्ट्रीय सम्बंध विभाग के अध्ययन क्षेत्र में ‘साइंस डिप्लोमेसी’ जैसा विषय शायद ही पढ़ाया जाता हो। इक्का-दुक्का अध्येता अंतरराष्ट्रीय सम्बंध पर विज्ञान एवं तकनीक के प्रभाव पर निम्न स्तरीय पेपर लिखते मिल जाएँगे जो इधर-उधर से कॉपी पेस्ट किया गया होता है। ये उन्हीं लिबरल-वामपंथी गिरोह के चेले चपाटे हैं जो परमाणु युद्ध की आशंका उत्पन्न कर फर्जी भय बनाते रहते हैं।

परमाणु युद्ध के भय का वातावरण बनाने के अलावा एक और बात गौर करने लायक है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात का इतिहास देखें तो ज्ञात होगा कि लिबरल बुद्धिजीवियों से समर्थन प्राप्त माओवाद-नक्सलवाद का विस्तार देश के उन्हीं क्षेत्रों में हुआ जहाँ प्राकृतिक एवं खनिज संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं। खनिज और जंगल के उत्पाद उद्योग में वृद्धि करते हैं।

उद्योग होगा तो आर्थिक सम्पन्नता होगी। देश आर्थिक रूप से समृद्ध हो यह वामपंथी कैसे होने देंगे? इसीलिए इन्होंने पीछे से नक्सलवाद को समर्थन देकर स्वयं बुद्धिविलासी होना स्वीकार किया ताकि विज्ञान का समाज से कटाव हो सके। जनता यही समझती रही कि विज्ञान तो हमारे किसी काम का नहीं है। ऊपर से परमाणु युद्ध का भय भरा माहौल बनाया गया, इसीलिए भारत द्वारा 1974 में ही परमाणु बम बनाने के बावजूद परमाणु शक्ति का अर्थ विध्वंसक ही समझा जाता रहा। जबकि वास्तविकता यह है कि परमाणु शक्ति संपन्न देश होना गर्व की बात है और तकनीकी दक्षता राष्ट्र की आर्थिक सम्पन्नता के लिए आवश्यक है।

श्री लंका ब्लास्ट: बौद्धों को आतंकी साबित करने पर तुले वामपंथी, अब लिट्टे भी ‘हिन्दू संगठन’

श्री लंका में हुए बम ब्लास्ट दुःखदायी हैं और उससे भी ज़्यादा निंदनीय है उसे लेकर फैलाया जा रहा दुष्प्रचार। अंतरराष्ट्रीय टीवी न्यूज़ चर्चाओं में भी कुछ लिबरल किस्म के लोगों ने इस हमले से हुए नुक़सान पर चर्चा करने की बजाए इतिहास में जाकर श्री लंका में समुदाय विशेष पर हो रहे कथित अत्याचार का ज़िक्र किया। अगर हमला चर्च पर हुआ है तो इसका मुसलमाओं और सिंहलियों के बीच छिटपुट संघर्ष से क्या लेना-देना है? ताज़ा हमले में पीड़ित ईसाई हैं, हमले के पीछे पुलिस उग्र इस्लामिक कट्टरपंथी आतंकियों का हाथ मान रही है, ऐसे में कुछ लोगों को ज़ल्दबाज़ी हो रही है कि इसके पीछे बौद्धों को दोषी साबित किया जाए। ये वामपंथी विचारधारा के लोग हैं। इनकी पहचान यह है कि ये लोग एकपक्षीय मानवाधिकार की बात करते हैं। ये हर तरह से ये साबित करने में लगे हैं कि कोलंबो में हुए सीरियल ब्लास्ट्स में इस्लामिक आतंकवाद का हाथ नहीं है। आइए इनकी पोल खोलते हैं।

पहले तथ्यों की बात कर लें। नवंबर 2016 में जनवरी में श्रीलंका सरकार ने कहा था कि देश के 32 अच्छी तरह से पढ़े-लिखे और अच्छे परिवारों के समुदाय विशेष वालों ने वैश्विक इस्लामी आतंकी संगठन आईएस में शामिल हो गए हैं। क़ानून मंत्री विजयदासा राजपक्षे ने इस बारे में अधिक जानकारी देते हुए कहा था कि आईएस में शामिल होने वाले ये लोग ग़रीब या दबे हुए नहीं थे बल्कि अच्छी तरह शिक्षित और इलीट परिवारों से थे। राजपक्षे ने यह भी बताया था कि कुछ विदेशियों ने श्री लंका पहुँच कर इस्लामिक आतंकवाद का प्रचार-प्रसार किया। किसी भी सभ्य समाज में इस बयान के बाद आईएस और उसमे शामिल होने वाले लोगों की निंदा होनी चाहिए लेकिन आइए आपको बताते हैं कि श्री लंका के इस्लामिक संगठनों ने क्या किया?

श्री लंका के मुस्लिम संगठनों के सबसे बड़े समूह ‘द मुस्लिम काउंसिल ऑफ श्रीलंका’ ने मंत्री के इस बयान की ही निंदा कर डाली और उन्हें सबूत दिखाने को कहा। संगठन ने बौद्ध भिक्षुओं द्वारा कथित तौर पर फैलाए जा रहे Racism का जिक्र किया और कहा कि ये कट्टरवादी बौद्ध भिक्षु मुस्लिमों के ख़िलाफ़ अभियान चला रहे हैं। अगर श्री लंका के मुस्लिम समुदाय ने एकमत से मंत्री के बयान को गंभीरता से लेते हुए अपने समाज में ऐसे लोगों व परिवारों को चिह्नित करने का कार्य किया होता और इस्लामिक आतंकवाद के विरुद्ध अभियान छेड़ा होता तो शायद आज श्री लंका को ये दिन नहीं देखने पड़ते। 2014 में श्री लंकाई मुस्लिम संगठनों ने सरकार को आगाह किया था कि मुस्लिम युवा विदेशी आतंकी संगठनों की तरफ़ आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि उन पर बौद्धों द्वारा अत्याचार किया जा रहा है।

यह सबसे बेहूदा कारण होता है किसी भी ग़लत हरकत को ढँकने के लिए। ऐसे लोगों द्वारा कहा जाता है कि कश्मीर में लोगों को प्रताड़ित किया गया तो वे आतंकी बन गए। यही लोग कहते हैं कि श्री लंका में बौद्धों से पीड़ित मुस्लिमों ने आतंकी संगठनों का रुख़ किया। इसी गिरोह विशेष के लोग रोहिंग्या को भारत में बसाने की वकालत करते हुए कहते हैं कि म्यांमार के बौद्धों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के कारण कई रोहिंग्या अपराधी बन गए। ऐसा कहते समय ये लोग भूल जाते हैं कि जिस कश्मीरी पंडित समाज को घाटी से मार-मार कर निकाल दिया गया, उनका ख़ून बहाया गया, उनकी सम्पत्तियाँ छीन ली गईं और उन्हें उनके ही देश में शरणार्थियों की तरह जीवन व्यतीत करने को विवश कर दिया गया, उन पंडितों ने तो कभी हथियार नहीं उठाए। 1984 में कॉन्ग्रेस नेताओं व कार्यकर्ताओं द्वारा सिखों का नरसंहार किया गया, वे सिख तो आतंकी नहीं बने? उन्होंने क़ानूनी लड़ाई लड़ी।

जरा इन नैरेटिव पर गौर कीजिए:

  • अगर किसी आतंकी घटना को मुस्लिमों ने अंजाम दिया है तो ज़रूर वे पीड़ित मुस्लिम रहे होंगे।
  • अगर आतंकी पीड़ित नहीं है तो उनका परिवार, समाज ज़रूर पीड़ित रहा होगा।
  • ये भी हो सकता है कि 100 किलोमीटर दूर अपने समाज के किसी व्यक्ति को पीड़ित देखकर वो आतंकी बन गया और लाशें बिछा डाली।
  • प्रताड़ित करने वाला हिन्दू या बौद्ध ही रहा होगा। इनके द्वारा प्रताड़ित किए जाने वाले मुस्लिम आतंकी बनकर लाशें बिछाते हैं तब भी विक्टिम मुस्लिम समाज ही है।
  • अगर घटना के पीछे मुस्लिम आतंकी है तो वो पीड़ित है, वहीं अगर हिन्दू या बौद्ध की तरह ग़लती से कोई अन्य समुदाय का हाथ निकला तब इन वामपंथियों की बल्ले-बल्ले ही है।

श्रीलंका वाली घटना के समय वामपंथियों द्वारा मालेगाँव को याद किया गया। कुछ लोगों ने तो एक क़दम और आगे बढ़कर लिट्टे को एक हिन्दू संगठन बताते हुए उसके द्वारा किए जाने वाली आतंकी वारदातों को हिन्दुओं द्वारा की गई साबित करना चाहा। क्या ये सबका यह सही समय था? लिट्टे ने अपने अजेंडे में ख़ुद को सेक्युलर बताया था। वो ‘तमिल अधिकार’ के लिए लड़ने का दावा करते थे। लिट्टे के आतंकियों ने कभी ख़ुद को हिन्दू धर्म के लिए लड़नेवाला नहीं बताया बल्कि उनकी पूरी लड़ाई तमिल बनाम सिंहला केंद्रित थी। जहाँ लिट्टे ख़ुद को डंके की चोट पर सेक्युलर और धर्मनिरपेक्ष संगठन मानता रहा, ऐसे में उसे हिन्दू ठहराना जायज़ है क्या? संजातीय अल्पसंख्यकों के आतंकी संगठन को जबरन हिन्दू ठहराने की कोशिश की गई।

इसी तरह वामपंथी कविता कृष्णन ने श्रीलंका ब्लास्ट्स को लेकर किए गए ट्वीट में ‘बौद्ध कट्टरवाद’ को हाइलाइट करते हुए कहा कि भले ही इसमें उनका हाथ हो या न हो, ये ब्लास्ट्स मालेगाँव की तरह हैं। अगर स्केल और प्लानिंग की बात करें तो श्री लंका में हुए ब्लास्ट्स मालेगाँव से कहीं ज़्यादा वीभत्स हैं। मालेगाँव की तरफ 2-3 नहीं बल्कि 8 बम फटे और 40-50 नहीं बल्कि लगभग 300 लोगों के मारे जाने की आशंका है। हालाँकि, किसी साधारण हमले में एक व्यक्ति की जान जाती है तो भी यह अपूरणीय क्षति है लेकिन 300 लोगों की जान लेने वाले ब्लास्ट्स को लेकर प्रोपेगेंडा फैला रहे वामपंथियों ने बौद्धों को आतंकी साबित करने का नंगा ठेका रखा है।

इस वर्ष जनवरी में श्री लंका पुलिस ने कई डेटोनेटर और विस्फोटक सामग्रियाँ ज़ब्त की थी। क्या आपको पता है ये सामग्रियाँ किन लोगों से ज़ब्त की गई थी? इस्लामिक आतंकियों से। इतना ही नहीं, पुलिस ने चार मुस्लिमों को गिरफ़्तार भी किया था। स्थानीय इस्लामिक आतंकी संगठन ‘नेशन तोहिथ जमात’ द्वारा चर्चो को निशाना बनाए जाने को लेकर सुरक्षा एजेंसियों को भी कुछ इनपुट्स मिले थे। अगर 2016 में श्री लंकाई मुस्लिमों के आईएस जॉइन करने और इस वर्ष कुछ मुस्लिमों के विस्फोटकों के साथ पकड़े जाने वाली घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर बहुत हद तक साफ़ हो जाती है लेकिन वामपंथियों को किसी भी हमले के बाद हिन्दुओं व बौद्धों को आतंकी साबित करने की जल्दी रहती है। अगर आतंकी मुस्लिम निकल आए तो ये उन्हें हिन्दू या बौद्ध कट्टरवाद से पीड़ित बताकर पल्ला झाड़ लेते हैं। यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी।

बोधगया में बौद्ध भिक्षुओं ने श्री लंका ब्लास्ट्स में मारे गए लोगों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थनाएँ आयोजित की। उन्होंने कैंडल लाइट मार्च भी निकाला। महाबोधि मंदिर में पीड़ितों के लिए प्रार्थना की गई। ये बौद्ध ईसाई चर्चों पर हुए हमलों के बाद हा-हा नहीं रिएक्ट जार खुशियाँ मना रहे हैं। ये पीड़ितों के साथ खड़े नज़र आ रहे हैं और अपनी संवेदनाएँ ज़ाहिर कर रहे हैं। ऐसे में, दोनों समुदायों के बीच क्या अंतर है, आप ख़ुद देख लीजिए।

Breaking: श्री लंका में बम निष्क्रिय करते हुए चर्च के पास एक और बम धमाका

कोलंबो में आज सैंट एंटनी चर्च के पास एक वैन में विस्फोट हो गया। रॉयटर्स के अनुसार यह धमाका तब हुआ जब बम निरोधक दस्ते के अधिकारी बम को डिफ्यूज करने की कोशिश कर रहे थे। इसके अलावा ईस्टर के मौके पर हुए बम धमाकों के बाद श्री लंका में एक बस स्टैंड से 87 डेटोनेटर भी बरामद हुए हैं।

आपको बता दें कि श्री लंका में ईस्टर के अवसर पर हुए सिलसिलेवार धमाकों के बाद सोमवार (अप्रैल 22, 2019) रात से इमरजेंसी लग जाएगी। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने देशव्यापी आपातकाल की घोषणा कर दी है। इस बीच, श्री लंका सरकार ने ईस्टर संडे के दिन लगातार 8 बम विस्फोटों के पीछे नेशनल तौहीत जमात (NTJ) नामक आतंकी संगठन को सीरियल ब्लास्ट का जिम्मेदार बताया है। श्री लंका सरकार ने बताया कि 7 फिदायिन हमलावरों ने इस सीरियल ब्लास्ट को अंजाम दिया।

श्री लंका में गिरजाघरों और पांच-सितारा होटलों में रविवार को ईस्टर के मौके पर सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद कोलंबो एयरपोर्ट पर पाइप बम भी बरामद हुआ था। हालाँकि, श्रीलंकाई एयरफोर्स ने इस बम को सुरक्षित तरीक से निष्क्रिय कर दिया था। वहीं, इससे पहले कोलंबो में गिरिजाघरों, होटलों में हुए आत्मघाती हमलों समेत आठ बम धमाकों में 290 लोगों की मौत हो गई, जबकि करीब 500 अन्य लोग घायल हो गए।

राहुल गाँधी ने माँगी माफी, वामपंथी-कॉन्ग्रेसी ‘चश्मे’ वाला पत्रकार-गैंग फैला रहा झूठ

कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के द्वारा अदालत में शपथ-पत्र दायर कर गलत बयान स्वीकार करने के बावजूद एक पत्रकार ट्विटर पर इस मसले के बारे में झूठ फैलाता पकड़ा गया। अपने ट्वीट में पत्रकार ने यह दावा किया कि 22 पन्नों के राहुल गाँधी के शपथ-पत्र में उसे एक भी बार क्षमा (apology) या खेद (regret) नहीं मिले। जवाब में लोगों ने राहुल गाँधी के शपथ-पत्र के प्रासंगिक अंशों के सीएनएन-न्यूज़ 18 के वॉटरमार्क वाले स्क्रीनशॉट पोस्ट करने शुरू कर दिए जिनमें खेद का उपयोग रेखांकित किया हुआ था।

रोहिणी सिंह को दिया था जवाब

पत्रकार अरविन्द गुणशेखर ने यह ट्वीट द वायर से जुड़ीं पत्रकार रोहिणी सिंह के ट्वीट के उत्तर में किया था। सिंह ने ट्वीट कर अदालत कवर करने वाले पत्रकारों से पूछा था कि क्या राहुल गाँधी ने अपने उस दावे के लिए माफ़ी माँगी है या नहीं, जिसमें उन्होंने कहा था कि उच्चतम न्यायलय ने उनके ‘चौकीदार चोर है’ नारे का समर्थन किया था।

उनके दावे से क्षुब्ध भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी ने न्यायालय की आपराधिक अवमानना का मुकदमा उन पर कर दिया था। राहुल गाँधी का उपरोक्त हलफ़नामा उसी सन्दर्भ में मीनाक्षी लेखी के आरोपों का जवाब देने के लिए था।

सिंह के ट्वीट के जवाब में गुणशेखर ने लिखा कि उन्हें कॉन्ग्रेस अध्यक्ष के हलफ़नामे में खेद का कोई उल्लेख नहीं मिला। उनके इस ट्वीट के जवाब में लोगों ने स्क्रीनशॉट दे-देकर उन्हें खेद का उल्लेख दिखाना शुरू कर दिया।

रक्षा विशेषज्ञ ने ली चुटकी

अरविन्द गुणशेखर के इस ट्वीट पर दक्षिणपंथी स्तंभकार और रक्षा मामलों के जानकार अभिजित अय्यर-मित्रा ने भी चुटकी लेते हुए ट्वीट किया:

आजम खान का ‘खाकी अंडरवियर’ छोटा था, बेटे ने ‘अनारकली’ के साथ करवा ली थू-थू

लोकसभा चुनावों में नेताओं के बिगड़ते बोलों में समाजवादी पार्टी सबको पछाड़ कर आगे भाग रही है। पहले उसके कद्दावर नेता आजम खान ने जयाप्रदा पर अभद्र टिप्पणी की, अब उनके बेटे अब्दुल्ला आजम ने जयाप्रदा को ‘अनारकली’ कहा है। अनारकली मुगल बादशाह अकबर के दरबार में तवायफ थी।

‘अली हमारे, बजरंगबली भी चाहिए, पर अनारकली नहीं’

रामपुर में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए अब्दुल्ला ने कहा, ‘अली भी हमारे, बजरंगबली भी हमारे। हमें अली भी चाहिए, बजरंगबली भी चाहिए लेकिन अनारकली नहीं चाहिए।’ माना जा रहा है कि यह तंज जयाप्रदा के अभिनेत्री के तौर पर कैरियर को लेकर था, जिसकी अब्दुल्ला ने तवायफ होने के साथ तुलना कर दी है।

‘क्या यही है आपका महिलाओं को लेकर नजरिया?’

रामपुर से ही भाजपा के टिकट पर आजम खान को चुनौती दे रहीं जयाप्रदा ने इस टिप्पणी का जवाब देते हुए कहा, “तय नहीं कर पा रही हूँ कि रोऊँ या हँसूँ, जैसा पिता वैसा पुत्र। अब्दुल्ला से यह उम्मीद नहीं थी। वह पढ़े-लिखे हैं। आपके पिता मुझे आम्रपाली कहते हैं, आप मुझे अनारकली कहते हैं; क्या यही समाज की औरतों को देखने का आपका नजरिया है?”

गौरतलब है कि लगभग तीन साल पहले अमर सिंह ने जब शिकायत की थी कि उत्तर प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव उन्हें मिलने का समय नहीं देते, तो अखिलेश के बचाव में आए आजम खान ने अमर सिंह को ‘आम्रपाली का नाच देखने’ की सलाह दी थी। उस समय भी उनका इशारा जयाप्रदा की ओर ही माना गया था।

श्री लंका में आज रात से लगेगी इमरजेंसी, राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने की घोषणा

श्रीलंका में ईस्टर के अवसर पर हुए सिलसिलेवार धमाकों के बाद सोमवार (अप्रैल 22, 2019) रात से इमरजेंसी लग जाएगी। राष्ट्रपति मैत्रीपाला सिरीसेना ने देशव्यापी आपातकाल की घोषणा कर दी है। इस बीच, श्री लंका सरकार ने ईस्टर संडे के दिन लगातार 8 बम विस्फोटों के पीछे नेशनल तौहीत जमात (NTJ) नामक आतंकी संगठन को सीरियल ब्लास्ट का जिम्मेदार बताया है। श्री लंका सरकार ने बताया कि 7 फिदायिन हमलावरों ने इस सीरियल ब्लास्ट को अंजाम दिया।

इस बीच आई मीडिया खबरों के अनुसार NTJ (नेशनल तौहीद जमात) अहम गिरजाघरों पर फिदायीन हमले करने की साजिश रचने की जानकारी मिली थी। NTJ श्री लंका का कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन है।

सीरियल बम धमाकों में अब तक 5 भारतीय समेत 290 से अधिक लोगों की जान चली गई है और 500 से अधिक लोग घायल हो गए हैं। श्री लंका की पुलिस ने इस मामले में अब तक 24 संदिग्ध लोगों को गिरफ्तार किया है। श्री लंका के पुलिस प्रमुख ने रविवार को बताया था कि 10 दिन पहले ही से ही यहाँ पर किसी बड़े फिदायीन हमले की तैयारी चल रही है। ये आतंकी संगठन देश के प्रमुख चर्चों, भारतीय उच्चायुक्त को निशाना बना सकता है। श्री लंका के पुलिस प्रमुख पुजुथ जयसुंदर ने 11 अप्रैल को देश के आला पुलिस अधिकारियों को इनपुट भेजा था जिसमें हमले के प्रति आगाह करने की बात कही गई थी।

मोतिहारी: ‘टिकट बेचवा’ उपेंद्र कुशवाहा Vs केंद्रीय मंत्री राधामोहन की लड़ाई में चीनी मिल मुद्दा

मोतिहारी लोकसभा सीट से इस बार मुक़ाबला काफ़ी दिलचस्प होने वाला है। यहाँ से केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री राधामोहन सिंह चुनाव लड़ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर भाजपा एवं आरएसएस संगठन में लम्बे समय से सक्रिय अनुभवी राधामोहन के सामने इस बार युवा आकाश सिंह चुनौती पेश कर रहे हैं। आकाश पूर्व केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री अखिलेश प्रसाद सिंह के पुत्र हैं। एक तरह से देखा जाए तो यह मुक़ाबला दो ऐसे दिग्गजों के बीच है जिनमें से एक वर्तमान में केंद्रीय मंत्री हैं तो एक केंद्रीय राज्यमंत्री रह चुके हैं। इसे संयोग कहें या कुछ और लेकिन दोनों ही नेताओं के पास कृषि मंत्रालय की ही ज़िम्मेदारी थी या है। दोनों ही नेता अपनी-अपनी पार्टी के संगठन में अहम पद संभाल चुके हैं। जहाँ राधामोहन बिहार भाजपा के अध्यक्ष रह चुके हैं तो वहीं अखिलेश राज्य में कॉन्ग्रेस प्रचार समिति के अध्यक्ष हैं।

मोदी के गीत ‘सौगंध मुझे…’ को राधामोहन क्षेत्र में भुना रहे हैं

राधामोहन सिंह ने हाल ही में 9वीं बार मोतिहारी लोकसभा सीट से नामांकन दाखिल किया। पुराने परिसीमन में इस सीट को पूर्वी चम्पारण के नाम से जाना जाता था। 9 बार में से उन्हें 5 बार जीत मिली है। वे 1989, 1996, 1999, 2009 और 2014 के चुनावों में जीत चुके हैं। जब राधामोहन सिंह नामांकन दाखिल करने निकले थे, तब उनके साथ गाड़ी में शिवहर सांसद रमा देवी भी थीं। दोनों ने साथ में ही नामांकन दाखिल किया। मज़े की बात तो यह कि 1998 में इन्हीं रमा देवी ने राजद के टिकट पर लड़ते हुए राधामोहन सिंह को मात दी थी। चम्पारण की राजनीति ऐसी है कि 2015 में पूरे बिहार में जदयू-राजद का कब्ज़ा हुआ तब भी यहाँ से भगवा ही लहराया। फलस्वरूप वर्तमान भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार में ज़िले को 2 मंत्री मिले।

अशोक गहलोत, कमलनाथ और अहमद पटेल जैसे दिग्गज कॉन्ग्रेस नेताओं के साथ आकाश सिंह

ताज़ा समीकरण से पहले जरा इतिहास की बात कर लेते हैं। अनुभवी राधामोहन सिंह के सामने आकाश सिंह हैं जो इस क्षेत्र के लिए तो नए नहीं हैं लेकिन उनके लिए ये क्षेत्र नया ज़रूर है। आकाश सिंह पहले यहाँ सक्रिय नहीं रहे हैं। कहा जाता है कि राधामोहन और आकाश के पिता अखिलेश में ईगो का टकराव चलता है। लालू यादव के विश्वस्त सिपाहसलारों में से एक माने जाने वाले अखिलेश ने जब राजद छोड़ी थी, तब उन्हें भाजपा में शामिल होने का ऑफर दिया गया था लेकिन राधामोहन के साथ ईगो क्लैश के कारण उन्होंने कॉन्ग्रेस की डूबती नैया को पार लगाने की ज़िम्मेदारी ली। मज़े की बात तो यह कि अखिलेश ख़ुद कॉन्ग्रेस में अहम पद संभाल रहे हैं और राज्यसभा सांसद भी हैं लेकिन उनके बेटे रालोसपा से चुनाव लड़ रहे हैं।

इसके पीछे भी गणित है। जदयू नेता नागमणि की माने तो पूर्व केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा की छवि अब एक ‘टिकट बेचवा’ की हो गई है। उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा हाल तक केंद्र में सत्ता की भागीदार थी लेकिन चुनाव से पहले कुशवाहा ने राजग छोड़कर बिहार महागठगबंधन का दामन थाम लिया। नागमणि कहते हैं कि प्रदीप मिश्रा से पार्टी मद में 15 करोड़ रुपए ख़र्च कराने के बावजूद उन्हें टिकट नहीं दिया गया। इसके बाद माधव आनंद ने पार्टी मद में 9 करोड़ रुपए दिए लेकिन उन्हें भी टिकट से नदारद रखा गया। प्रदीप मिश्रा ने ख़ुद इस बात को स्वीकार किया कि उनसे रुपए ले लिए गए लेकिन टिकट नहीं दिया गया। पार्टी के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष नागमणि और पूर्व महासचिव प्रदीप, दोनों ही रालोसपा छोड़ चुके हैं। सीतामढ़ी से रालोसपा के टिकट पर सांसद बने रामकुमार शर्मा ने भी उपेंद्र कुशवाहा पर मोतिहारी की टिकट बेचने का आरोप मढ़ा है।

चीनी मिल के मुद्दे पर झेंप गए राधामोहन, नहीं दिया कोई जवाब

जहाँ बिहार में जात-पात की राजनीति सर चढ़कर बोलती है। मोतिहारी में अखिलेश सिंह का भूमिहार जाति के बीच अच्छा प्रभाव माना जाता है लेकिन 2014 मोदी फैक्टर के कारण जातीय समीकरण के बहुत हद तक टूट जाने से इस बार सवर्ण मत विभाजित नज़र आ रहा है। क्षेत्र के एक और स्थानीय युवा अनिकेत पांडेय भी निर्दलीय ताल ठोक रहे हैं और मेहनती छवि व कृषक परिवार से होने के कारण उनके पक्ष में भी युवाओं की एक विशेष लामबंदी दिख रही है। जहाँ अनिकेत अपनी स्थानीय किसान वाली छवि के साथ चुनाव लड़ रहे हैं वहीं आकाश 2004-09 के बीच अपने पिता द्वारा किए गए कार्यों को लेकर मैदान में उतरे हैं। लेकिन, मोतिहारी चुनाव का मुख्य मुद्दा कुछ और ही है।

चीनी मिल है मोतिहारी का प्रमुख मुद्दा

मोतिहारी में प्रमुख चुनावी मुद्दा है- चीनी मिल। कभी गन्ना उत्पादन का हब रहा क्षेत्र आज एक अदद चीनी मिल को तरस रहा है। 2 साल हुए जब अप्रैल 2017 में दो किसानों ने ख़ुद को जलाकर आत्महत्या कर ली थी। चीनी मिल चालू कराने व बकाए के भुगतान को लेकर केंद्रीय कृषि मंत्री के क्षेत्र में इस तरह की घटना से क्षेत्र में रोष पैदा हुआ। 2014 चुनाव के दौरान हुई एक रैली में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जब वो अगली बार यहाँ आएँगे तो चीनी मिल में बनी चीनी की चाय पिएँगे लेकिन अभी तक इस मामले में कोई प्रोग्रेस नहीं हुआ है। जब पत्रकारों ने कृषि मंत्री से इस बाबत सवाल किया तो वह झेंप गए। अब भाजपा के लिए ये मुद्दा उसकी किरकिरी कारण बनता जा रहा है लेकिन अनुभवी राधामोहन ने बड़ी चालाकी से राष्ट्रीय मुद्दों को उछाल दिया है।

जून 2017 में मृत किसानों की विधवाओं सहित कई अन्य कृषकों ने भी जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया था। लेकिन, मोतिहारी में लम्बे समय से सक्रिय राधामोहन सिंह को क्षेत्र की ख़ूबी-ख़ामियों का बख़ूबी पता है क्योंकि वो छात्र जीवन से ही संघ और बाद में जनसंघ का झंडा उठाकर चलते रहे हैं। भाजपा की तरफ़ से 1989 में पहली बार जीतने वाले राधामोहन सिंह ने नरेंद्र मोदी के गीत ‘मैं देश नहीं झुकने दूँगा’ को अपने प्रचार अभियान का थीम बना दिया है क्योंकि उन्हें भरोसा है कि जनता मोदी के चेहरे के कारण उन्हें वोट करेगी। राधामोहन सिंह साइलेंट प्रचार अभियान के लिए जाने जाते हैं लेकिन उनके केंद्रीय मंत्री होने के कारण क्षेत्र को ज़्यादा की अपेक्षा थी। ऊपर से 19 वर्षों का कार्यकाल होने के कारण Anti-Incumbency तो है लेकिन अभी भी अनुभव भारी पड़ रहा है।

क्या है स्थानीय युवाओं की राय

शहर के पुराने राजनीतिक खानदान से आने वाले युवा रॉय राघव शर्मा कहते हैं कि इस चुनाव में प्रत्येक दलों व उनके समर्थकों द्वारा खुलेआम ख़र्च किया जा रहा है, ऐसा प्रतीत होता है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा कि पुराना अनुभव और विपक्ष में मज़बूत प्रत्याशी न होने के कारण राधामोहन सिंह की जीत मतगणना के दिन 12 बजे तक ही सुनिश्चित हो जाएगी। राघव का परिवार पुराने समय से ही जनसंघ से जुड़ा रहा है लेकिन मेडिकल की पढ़ाई कर रहे जागरूक राघव अभी ख़ासकर वोट करने के लिए महाराष्ट्र से बिहार आए हैं। वहीं ख़ुद को निष्पक्ष बताते हुए एक अन्य युवा प्रणय राज कहते हैं कि चूँकि राधामोहन सिंह ने कुछ ख़ास कार्य नहीं किया है, इसीलिए उन्हें वोट नहीं करेंगे। विकल्प क्या है, पूछने पर राजनीतिक विश्लेषक प्रणय कहते हैं कि वे निर्दलीय अनिकेत को ही वोट कर देंगे।

2015 विधानसभा चुनावों में कोलकाता से बिहार पहुँचकर वोट करने वाले स्थानीय युवा आनंद कुमार कहते हैं कि पार्टी और प्रधानमंत्री के नाम पर क्षेत्र में राधामोहन ही एक विकल्प है। हालाँकि वामपंथियों के ख़िलाफ़ क्षेत्र और सोशल मीडिया में मुखर रहे आनंद मेहनती अनिकेत के प्रति भी सहानुभूति जताते हैं लेकिन उन्हें जिताऊ नहीं मानते। वहीं एक अन्य युवा शुभम ठाकुर अखिलेश के प्रशंसक हैं और आकाश को जिताऊ उम्मीदवार मानते हैं लेकिन राधामोहन सिंह के बारे में पूछने पर कहते हैं की टक्कर बराबरी का है। स्थानीय युवाओं की राय देखें तो कुछ जाति के कारण आकाश के पक्ष में लामबंद हैं, कुछ स्थानीय उम्मीदवार होने के कारण अनिकेत की तरफ़ हैं लेकिन युवाओं की भारी तादाद अभी भी भाजपा और मोदी को लेकर आश्वस्त है।

क्या कहता है पिछ्ला समीकरण?

अगर पिछले समीकरणों की बात करें तो राधामोहन सिंह को 4 लाख के क़रीब मत प्राप्त हुए थे। उनके प्रतिद्वंदी विनोद कुमार श्रीवास्तव को 2 लाख के क़रीब मत मिले थे और तीसरे नंबर पर रहे स्थानीय दिग्गज अवनीश कुमार सिंह को सवा 1 लाख मत प्राप्त हुए थे। अगर दूसरे और तीसरे नंबर पर रहे प्रत्याशियों के मत मिला भी दें तो राधामोहन सिंह 75,000 के लगभग वोटों से भारी पड़ते हैं। हाल ही में राजद से टिकट न मिलने पर विनोद श्रीवास्तव रो पड़े थे। 2009 में उन्होंने अखिलेश सिंह को हराया था। अब राधामोहन ज़ोर-शोर से हैट्रिक की तैयारी में लगे हैं लेकिन उनके सामने चुनौती पेश कर रहे युवा उम्मीदवार भी दमदार हैं। नामांकन के दिन राधामोहन जब युवा आकाश से टकरा गए तो उन्होंने आकाश को आशीर्वाद भी दिया था। आकाश ने फेसबुक के माध्यम से बताया कि उन्हें ‘राधामोहन चाचा’ की तरफ से विजयी भव का आशीर्वाद मिला है।

कहा जा रहा है कि विनोद कुमार श्रीवास्तव का टिकट कटने और उनका रोते हुए वीडियो वायरल होने से कायस्थ समाज भी राजद ने नाराज़ चल रहा है और उनका वोट श्याद ही महागठबंधन को जाए। लालू यादव के जेल में होने से यादव मतदाता राजद के लिए कितना लामबंद है, इस पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। भाजपा ने भूमिहारों को विधान परिषद व अन्य पद देने का वादा कर इस जाति को साधने की कोशिश की है। सीपी ठाकुर को आनन-फानन में दिल्ली बुलाकर मनाया गया है। महाचंद्र प्रसाद सिंह को बीच चुनाव में भाजपा में शामिल किया गया। सवाल यह है कि मोतिहारी में अगर मोदी या नीतीश की रैली होती है, उसके बाद क्या माहौल बनता है? हाल ही में वहाँ पहुँचे मनोज तिवारी भी राधामोहन के लिए प्रचार में दिखे थे।

‘वंदे मातरम’ नहीं गा सकता, आस्था के खिलाफ: RJD नेता का विवादित बयान

चुनाव प्रचार में विवादित बयानों का सिलसिला लगातार जारी है। इस कड़ी में अब एक और नाम जुड़ गया है। दरअसल, राजद के वरिष्ठ नेता और दरभंगा लोकसभा सीट से चुनाव लड़ रहे अब्दुल बारी सिद्दीकी ने रविवार (अप्रैल 21, 2019) को एक विवादित बयान देते हुए वंदे मातरम बोलने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि उन्हें भारत माता की जय बोलने से कोई परहेज नहीं है, मगर राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम गाना उनकी आस्था के खिलाफ है। सिद्दीकी ने कहा, ‘‘जो एकेश्वर में विश्वास रखता है वह कभी भी वंदे मातरम नहीं गाएगा।”

इसके साथ ही सिद्दीकी ने महात्मा गाँधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे को पहला आतंकवादी करार दे दिया। सिद्दीकी यहीं नहीं रुके, उन्होंने भारतीय जनता पार्टी को चुनौती देते हुए कहा कि भाजपा में हिम्मत है तो वो गोडसे मुर्दाबाद का नारा लगाकर दिखाएँ। उन्होंने कहा कि क्या मोदी सार्वजनिक रूप से गोडसे की निंदा करेंगे?

सिद्दीकी के इस बयान से बिहार की राजनीति गरमा गई है। भाजपा ने इस बयान की निंदा करते हुए उन्‍हें बिहार का आजम खान बता दिया। सिद्दीकी के इस बयान पर बिहार के उप मुख्यमंत्री एवं भाजपा के वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी ने कहा कि राजद के लोग भारत के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा रखने वालों के साथ हैं, इसलिए उन्हें वंदे मातरम बोलने में परेशानी है।

वहीं, भाजपा के प्रवक्ता निखिल आनंद ने कहा कि सिद्दीकी को पहले ‘कठमुल्लावाद मुर्दाबाद‘ का नारा लगाना चाहिए। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय के विरोधी सिद्दीकी को दरभंगा की जनता सबक सिखाएगी। इसके साथ ही जनता दल यूनाइटेड ने भी इस बयान की निंदा करते हुए कहा कि उन पर ओवैसी या तेजस्‍वी का असर हुआ है।

कॉन्ग्रेस ने सिद्दीकी के बयान से किनारा कर लिया है। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता प्रेमचंद मिश्रा ने कहा कि महागठबंधन के नेताओं को ऐसे विवादित बयानों से बचना चाहिए, क्योंकि इसका असर चुनावों पर पड़ता है। गौरतलब है कि दरभंगा में मुख्य मुकाबला राजद के उम्मीदवार अब्दुल बारी सिद्दीकी और भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार गोपाल जी ठाकुर के बीच है।

फ़ैक्ट चेक: PM मोदी ने ‘बहन’ की गाली दी! कॉन्ग्रेस ने किया वायरल, सोशल मीडिया पर पड़ी लताड़

लंबे समय से कॉन्ग्रेस इस ताक में है कि कब और कैसे पीएम मोदी पर निशाना साधा जाए और उनकी छवि को धूमिल किया जाए। ऐसी ही कोशिश में कॉन्ग्रेस आईटी-सेल के सदस्य गौरव पांधी ने ट्विटर पर प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के कुछ हिस्सों के साथ एक वीडियो शेयर किया। इस वीडियो को संपादित कर लूप के ज़रिए एक ‘अपमानजनक’ शब्द को बार-बार सुनाया गया। इस वीडियो पर यूजर्स ने अपनी आपत्ति दर्ज कर यह दावा किया कि पीएम मोदी के शब्दों को ग़लत रूप से प्रचारित किया जा रहा है। साथ ही उनके (पीएम) गुजराती भाषा में बोले गए शब्दों को सही रूप में भी अवगत कराया।

इस वीडियो क्लिप में, पीएम मोदी ने गुजराती में कहा, “लोको इम के छे भाव्या मा लदाईयो पानि थावैं छे। आल्हा भाई बुरा कहो पानि न लाडई थावैं छे से पाछि अइयार अउ पनि पेहला पेल केम ना बँधइये?” (लोग कह रहे हैं कि आने वाले समय में दुनिया पानी के लिए लड़ेगी। अगर लोग भविष्य में पानी को लेकर लड़ने वाले हैं, तो इस तरह का संकट आने से पहले हम एक बाँध का निर्माण क्यों नहीं कर लें?”

भाग “थवैन छे” जिसका अर्थ है “होगा (या जगह लेंगे)” यदि लूप पर रखा जाता है तो एक वो एक अपमानजनक शब्द (गाली) की तरह लगेगा। गौरव पांधी को शब्दों के लूप से खेलना बहुत पसंद है, इससे उनकी जो छवि उभर कर सामने आ रही है वो ‘पिद्दी’ की है।

पांधी को कई लोगों ने लताड़ लगाते हुए उसके द्वारा भ्रम फैलाने वाले शब्दों के सही अर्थ से अवगत कराया, इसमें ‘द क्विंट’ भी शामिल था, जिसके द्वारा पीएम मोदी के भाषण को लाइव-स्ट्रीम किया गया था, जिसका कुछ हिस्सा पांधी ने संपादित कर देश के प्रधानमंत्री मोदी के व्यक्तित्व को मैला करने की कुटिल चाल चली।

सोशल मीडिया पर यूज़र्स ने पीएम मोदी के शब्दों के सही रूप को बताया, जिससे देश की जनता अपने मन में उनकी ग़लत छवि न बना ले।

Altnews के संस्थापक ने भी पांधी के दुष्प्रचार को ग़लत करार देते हुए लिखा कि पीएम मोदी ने ऐसे किसी ग़लत शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है। साथ ही प्रतीक सिन्हा ने पांधी को कहा कि इसकी पुष्टि के लिए वो किसी गुजराती से पूछ सकते हैं।

इसके जवाब में पांधी ने लिखा कि उसने यह वीडियो गुजरात से ही प्राप्त किया था, जिसे एक से अधिक गुजरातियों ने चेक किया था।

हालाँकि, यह ख़बर लिखे जाने तक तो AltNews ने पांधी की ग़लत जानकारी पर किसी तरह का कोई फ़ैक्ट-चेक नहीं किया था।

फ़िलहाल, अन्य कॉन्ग्रेस-हितैषी लोग और पिद्दी भी इस कुटिल चाल का हिस्सा बन गए हैं।

चूँकि इनमें कुछ ग़ैर-गुजराती शामिल थे और शायद वो बोलचाल की भाषा की बारीकियों से नहीं समझ सके इसलिए ऐसे लोगों को तो दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन गुजरात कॉन्ग्रेस के नेता अर्जुन मोढवाडिया, जो ख़ुद एक गुजराती हैं, उन्हें इस झूठ का हिस्सा नहीं बनना चाहिए था।

गुजरात में 23 अप्रैल को आम चुनाव के लिए मतदान होना है। यह दुर्भाग्यपूर्ण और दु:खद है कि गुजरात कॉन्ग्रेस ने ऐसी सस्ती और घटिया रणनीति का सहारा लिया, जिस पर शर्मिंगदगी होनी चाहिए।

हैदराबाद आतंकवादियों के लिए बन चुका है सुरक्षित ठिकाना: BJP नेता बंडारू दत्तात्रेय

भाजपा नेता और सिकंदराबाद से सांसद बंडारू दत्तात्रेय ने रविवार (अप्रैल 21, 2019) को राज्य सरकार से अपील करते हुए कहा कि राज्य में आतंकी गतिविधियों संबंधित संदिग्धों पर कड़ी निगरानी रखने के लिए एक पुलिस महानिदेशक (आईजी) स्तर के अधिकारी की नियुक्ति की जाए। दरअसल, बंडारू ने यह आरोप लगाया है कि हैदराबाद इस्लामी आतंकवादी गतिविधियों के लिए एक सुरक्षित आश्रय स्थल है। उनका कहना है कि पुलिस इसके खिलाफ ठोस कदम उठाते हुए कोई कार्रवाई इसलिए नहीं कर रही है, क्योंकि चंद्रशेखर राव के नेतृत्व वाली टीआरएस (तेलंगाना राष्ट्र समिति) सरकार असदुद्दीन ओवैसी के एआईएमआईएम के साथ गठबंधन कर रही है।

बंडारू ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा कि राष्ट्रीय जाँच एजेंसी एनआईए (NIA) की हालिया जाँच से पता चलता है कि हैदराबाद इस्लामिक आतंकवादी गतिविधियों का एक सुरक्षित ठिकाना बन गया है और शनिवार (अप्रैल 20, 2019) को एनआईए द्वारा तीन लोगों की गिरफ्तारी चौंकाने वाली थी। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश भर में कई लोग आईएसआईएस की ओर आकर्षित हो रहे हैं। बंडारू का कहना है कि हैदराबाद से अधिकतर लोग आतंकी संगठनों में भर्ती हो रहे हैं। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार को करीमनगर, निजामाबाद, नलगोंडा और अन्य पड़ोसी संदिग्धों स्थानों पर कड़ी नजर रखनी चाहिए।

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी कहा था कि टीआरएस अध्यक्ष और मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव ‘कार के चालक’ हो सकते हैं, लेकिन स्टीयरिंग वास्तव में एआईएमआईएम द्वारा नियंत्रित है। यानी कि टीआरएस सरकार जो भी फैसला लेती है, उसमें अप्रत्यक्ष रूप से एआईएमआईएम का भी हाथ होता है।

गौरतलब है कि साल 2016 में, एनआईए ने इस मामले में चार्जशीट दायर की थी और चार आरोपितों को गिरफ्तार किया था। इस दौरान एनआईए ने आरोपियों के पास से 13 मोबाइल फोन, 11 सिम कार्ड, एक आईपैड, दो लैपटॉप, एक बाहरी हार्ड डिस्क, 6 पेन ड्राइव आदि बरामद किए थे।