चुनावी मौसम में भाजपा नेताओं की योग्यता और डिग्री को अक्सर मुद्दा बनाने वाली कॉन्ग्रेस पार्टी का इस बार सुब्रमण्यम स्वामी से सामना हुआ है। बीजेपी के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की शैक्षणिक योग्यता को आधार बनाकर उन पर निशाना साधा है।
स्वामी ने शुक्रवार (अप्रैल 12, 2019) रात ट्वीट कर कहा, “बुद्धु के कैम्ब्रिज सर्टिफिकेट के मुताबिक उसका नाम रौल विंसी है। उन्होंने एम.फिल की पढ़ाई की है, लेकिन वो नेशनल इकोनॉमिक प्लानिंग एंड पॉलिसी में फेल हो गए थे।”
Buddhu’s Cambridge Certificate says his name is Raul Vinci and he read MPhil and failed in National Economic Planning & Policy pic.twitter.com/22kBHSRbcR
स्वामी ने दूसरे ट्वीट में लिखा है कि स्मृति ईरानी की डिग्री पर प्रश्न करने वाली कॉन्ग्रेस की भुलक्कड़ प्रवक्ता को पहले प्री-थीसिस में फेल अपने पार्टी अध्यक्ष राहुल गाँधी पर विचार करते हुए हुए उनसे उनकी थीसिस और एग्जाम रिजल्ट माँगना चाहिए।
The scatter brained spokesperson is now ranting about Smriti Irani’s degree.Buddhu has also in his nomination form falsely claimed that he got MPhil degree. He failed the pre-Thesis exam so so not permitted to write his thesis. Ask him to produce his thesis or exam results proof.
राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी की डिग्री भी है विवादित
स्वामी ने इसके सबूत के रूप में यूनिवर्सिटी द्वारा जारी दस्तावेज को भी ट्वीट किया है। राज्यसभा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी पहले भी गाँधी परिवार के सदस्यों की शैक्षणिक योग्यता पर सवाल उठाते रहे हैं। साल 2000 की शुरुआत में उन्होंने राहुल गाँधी की मम्मी सोनिया गाँधी की डिग्री को लेकर तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की थी। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट से गलत जानकारी देने के आधार पर उनकी लोकसभा सदस्यता खत्म करने की गुहार लगाई थी।
दरअसल, स्वामी ने तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष मनोहर जोशी के पास सोनिया गाँधी के खिलाफ शिकायत दर्ज कराकर कहा था, “लोकसभा पेज के ‘Who is who’ यानी ‘कौन क्या है’ सेक्शन में लिखा है कि सोनिया गाँधी ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में डिप्लोमा किया था। स्वामी के मुताबिक उन्होंने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से इस बारे में जानकारी माँगी थी। इसके जवाब में यूनिवर्सिटी ने बताया कि सोनिया ने वहाँ कभी पढ़ाई ही नहीं की है।
स्वामी के मुताबिक, तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष ने शिकायत पर स्पष्टीकरण के लिए सोनिया गाँधी से पत्राचार किया था। तब सोनिया गाँधी के हवाले से जवाब आया था कि उन्होंने कैम्ब्रिज से डिग्री ली है, न कि कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से, लोकसभा पब्लिकेशन में यूनिवर्सिटी शब्द गलती से छप गया है।
छत्तीसगढ़ में नक्सलियों की दरभा डिविजन कमिटी ने मंगलवार (अप्रैल 09, 2019) को दंतेवाड़ा में हुए नक्सली हमले और भाजपा विधायक भीमा मंडावी की हत्या की जिम्मेदारी ली है। इस हमले में भाजपा विधायक और 4 पुलिसकर्मी मारे गए थे। प्रतिबंधित संगठन ने केंद्र सरकार पर कॉरपोरेट हाउसों को फायदा पहुँचाने के लिए बस्तर के प्राकृतिक संसाधनों की लूटखसोट करने और उन्हें कौड़ी के दाम पर बेचने का भी आरोप लगाया है।
भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के दरभा डिविजन कमिटी के सचिव साईंनाथ के नाम से बृहस्पतिवार को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में माओवादियों ने दावा किया है कि सुरक्षा के बीच में पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने जनता की मदद से इस हमले को अंजाम दिया था।
भाकपा (माओवादी) द्वारा जारी बयान सोशल मीडिया पर काफी वायरल हो रहा है। इसमें कहा गया है, “हमारे पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी ने 9 अप्रैल को हुए हमले को अंजाम दिया था। इसमें दंतेवाड़ा से भाजपा विधायक भीमा मंडावी और चार सुरक्षाकर्मी मारे गए थे। हम उनके चार हथियार भी उठा ले गए थे।”
इससे पहले पुलिस ने कहा था कि हमले के बाद से सुरक्षा कर्मियों के तीन हथियार गायब हैं, इनमें से दो राइफल हैं। दो पेज का बयान नक्सलियों के दंडकारण्य विशेष क्षेत्र की दरभा डिवीजन समिति के सचिव साईनाथ के नाम से जारी किया गया। इसने कई भीषण हमलों को अंजाम दिया है। इसमें बस्तर की झीरम घाटी में 25 मई 2013 का हमला भी शामिल है। इसमें छत्तीसगढ़ प्रदेश कॉन्ग्रेस के कई बड़े नेता मारे गए थे।
प्रेस विज्ञप्ति में माओवादियों ने कारतूस और हथियार की तस्वीर भी जारी की है। विज्ञप्ति में उन्होंने लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) सत्ता में आते ही अंधराष्ट्रवाद को बढ़ावा देते हुए जातिगत भेदभाव को उकसा रही है तथा आरएसएस के अजेंडे, हिंदू राष्ट्र स्थापना के लक्ष्य की ओर आक्रामक रूप से काम कर रही है। दरभा डिविजन कमिटी पर क्षेत्र में कई नक्सली घटनाओं को अंजाम देने का आरोप है।
नक्सल विरोधी अभियान के पुलिस उप महानिरीक्षक सुंदरराज पी ने कहा है कि पुलिस इस विज्ञप्ति की सत्यता की जाँच कर रही है। यह उनके प्रॉपेगैंडा का ही हिस्सा है। माओवादी संगठन को अपने कृत्य को सही ठहराने का कोई अधिकार नहीं है।
साल 2018 में जम्मू कश्मीर के कठुआ जिले के एक गाँव में एक बच्ची रहस्यमय हालात में गायब हो गई। कुछ दिन बाद कुछ दरिंदों ने बच्ची के साथ दुष्कर्म कर उसकी हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया, देश भर में खूब हंगामा हुआ। देश-विदेश के कुछ मीडिया व मानवाधिकारों के कथित कार्यकर्ताओं ने भी इस मुद्दे को खूब उछाला था। पीड़िता के न्याय को लेकर काफी सियासत हुई, राजनीतिक गलियारों से लेकर बॉलीवुड जगत की तमाम हस्तियों ने खूब सक्रियता दिखाई और पीड़िता को न्याय दिलाने में किसी तरह की दिक्कत न आए इसके लिए देश-विदेश से लाखों रुपए का चंदा भी इकट्ठा किया गया।
चंदे के लिए पीड़िता के पिता व परिवार के नाम पर संयुक्त रूप से जम्मू कश्मीर बैंक में खाता खुलवाया गया था। मगर जिस तरह से बीते एक साल के दौरान पीड़िता को न्याय के नाम पर सियासत करने वाले धीरे-धीरे लापता हुए, उसी तरह से उसके पिता के खाते से पैसे भी अज्ञात लोग गायब करते गए। रिपोर्ट्स के मुताबिक, रेप पीड़िता को न्याय दिलाने के नाम पर जिन लोगों ने पैसे इकट्ठे किए थे, उसमें से किसी अज्ञात शख्स ने ₹10 लाख निकाल लिए हैं। ये प्रक्रिया जनवरी 2019 से ही चल रही है। अगर पीड़िता के पिता 10 अप्रैल को बैंक न जाते, तो उन्हें इसके बारे में पता भी नहीं चलता कि उनके बैंक अकाउंट से कोई पैसे गायब कर रहा है।
पीड़िता के पिता ने कहा कि किसी ने उनके ज्वॉइंट अकाउंट से ₹10 लाख से अधिक की राशि निकाल ली है जिसके बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है। बैंक स्टेटमेंट में लगातार निकासी दिखाई दे रही है और अब उनके खाते में केवल ₹35,000 बचे हैं। उन्होंंने कहा कि हमें बताया गया था कि दुनिया भर से ₹1 करोड़ का दान दिया गया था, लेकिन पता वो पैसे नहीं कहाँ गए। पीड़िता के पिता ने पासबुक दिखाते हुए आरोप लगाया है कि असलम खान नामक किसी आदमी ने इसी साल 11, 14, 15 व 18 जनवरी को चेक के जरिए दो-दो लाख रुपए निकाले हैं। उन्होंने बताया कि असलम को वो जानते हैं, वो एक दो बार उनके साथ बैंक भी गया था। उन्होंने जब इस बारे में उससे बात की, तो उसने उनके साथ बुरा बर्ताव किया जिसकी वजह से उन्हें इस बात का शक है कि ये काम शायद उसी ने किया हो।
इसके अलावा 21 और 22 जनवरी को भी बैंक से ₹4 लाख निकलवाए गए और इस बार भी पैसा परिवार की तरफ से नहीं बल्कि किसी नसीम नामक व्यक्ति ने चेक के जरिए निकला है। पीड़िता के पिता का कहना है कि वो तो अनपढ़ हैं और चेक पर भी अंगूठा ही लगाते हैं। उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि पैसा कैसे और कहाँं जा रहा है। इस मामले पर संबंधित बैंक अधिकारी का कहना है कि ऐसा लगता है कि पीड़ित परिवार के बारे में पूरी जानकारी रखने वाले ही किसी शख्स ने ऐसा किया है, क्योंकि ये राशि चेक के जरिए निकाली गई है और इस चेक पर तारीख के साथ-साथ अंगूठे का निशान और बाकी सारी औपचारिकताएँ पूरी की गईं थी, जिसकी वजह से उसे रोका नहीं जा सकता था और ये काम परिवार का कोई करीबी ही कर सकता है। बैंक अधिकारी ने कहा कि परिवार अगली सूचना तक चेक बुक को ब्लॉक करवा सकता है।
वहीं, पीड़िता के दादाजी का कहना है कि जो लोग न्याय की गुहार लगाने की दौड़ में सबसे होने का दावा करते थे अब वो उनका फोन कॉल भी नहीं उठाते हैं। यहाँ पर यह कहना शायद गलत नहीं होगा कि कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं की तरफ से पीड़िता के परिवार को मदद या न्याय दिलाने का ढोंग रचा जा रहा था। कुछ लोग पीड़िता के न्याय के नाम पर अपनी जेब गर्म करना चाहते थे। पिछले दिनों एक ऑडियो क्लिप जारी हुआ था, जिसमें दो लोगों को बात करते हुए सुना गया था कि उन दोनों ने पीड़िता के नाम पर बड़ी रकम जमा कर ली है, जो कि कभी उस परिवार के पास नहीं जाएगी। इस ऑडियो में साफ हो गया था कि कुछ लोगों ने अपने हित को साधने के लिए ये पैंतरा आजमाया था।
पीड़िता के लिए न्याय के नाम पर धनराशि इकट्ठा करने वालों में से एक हैं जेएनयू की फ्रीलांस प्रोटेस्टर शेहला रशीद। उन्होंने दावा किया था कि उनके द्वारा ₹40 लाख से अधिक की धनराशि जमा की गई थी और फिर बाद में उन्होंने यह भी कहा था कि वकील पैसे नहीं ले रहे हैं, तो इसलिए बलात्कार पीड़िता के परिवार को ₹10 लाख की राशि सौंपी जाएगी। मगर सच्चाई तो यही है कि पीड़िता के परिवार के हाथ में अब तक एक भी पैसा गया ही नहीं। शेहला इस बात को इंकार करते हुए कहती है कि उनके पास पैसे पहुँचने में देर इसलिए हुई क्योंकि पीड़ित परिवार के पास ज्वॉइंट अकाउंट और पैन कार्ड नहीं था।
इस अभियान के मुख्य कार्यकर्ताओं में से एक है तालिब हुसैन, जिसे बाद में बलात्कार के आरोप में गिरफ्तार किया गया और जेल भेज दिया गया। और फिर वो महबूबा मुफ्ती की पार्टी पीडीपी में शामिल हो गया। शेहला रशीद ने भी कश्मीर के पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फ़ैसल के साथ राजनीति में शामिल होने का संकल्प लिया है, जिसने भारत को ‘रेपिस्तान’ कहा था।
बीते साल हुआ कठुआ गैंगरेप काफी चर्चा में आया था तो ऐसा लगा था कि नेताओं ने रेप पड़िता के परिवार के लिए आर्थिक मदद का पिटारा ही खोल दिया। कुछ कार्यकर्ताओं ने तो इनके लिए पैसे इकट्ठा करने की भी बात कही। और कुछ तथाकथित सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि उन्होंने ऐसा किया भी। मगर अब जो खबर सामने आ रही है, उससे यह सवाल उठना तो तय है कि आखिर बैंक अकाउंट से पैसे गए कहाँ? इस अभियान में मुख्य रूप से शेहला राशिद और तालिब हुसैन शामिल थे। इनमें से एक बलात्कारी है, तो दूसरी ऐसे लोगों के संपर्क में है, जिसने भारत को रेपिस्तान कहा था।
ये लोग समाजसेवा की मूरत बनकर लोगों के सामने आए थे। यहाँ पर एक बात खटकती है कि जो इंसान खुद बलात्कारी हो वो भला क्या किसी और बलात्कार पीड़िता के दर्द को समझेगा और उसके न्याय के लिए पैसे जुटाएगा। ऐसा माना जा रहा है कि इन लोगों ने सबकी नज़रों में आने के लिए पीड़िता के नाम पर पैसे तो जुटाए, लेकिन पीड़िता के परिवार के लिए नहीं, बल्कि अपने लिए। इसलिए तो पैसे जमा भी हुए अकाउंट में और गायब भी हो गए। इससे साफ जाहिर होता है कि इनके ही करीबियों ने इस घोखाधड़ी को अंजाम दिया है।
इनके लिए ये अभियान चलाना तो महज एक दिखावा था, इन्हें तो पीड़िता की आड़ में अपने लिए लोगों से पैसे लूटने थे। 23 दिसंबर 2018 तक बैंक अकाउंट में लगभग ₹23 लाख थे। जिसके बाद जनवरी से मार्च 2019 के बीच बिना पीड़िता के परिवार की जानकारी के बैंक से पैसे की निकासी की प्रक्रिया शुरू हुई और अब उसमें सिर्फ ₹35,000 हैं। एक पिता अपनी बच्ची को इंसाफ दिलाना चाहता है। ऐसे में इन लोगों ने जिस तरह का घटिया खेल खेला है, पीड़ित परिवार को बेहद तगड़ा झटका लगा है। वहीं जिन नेताओं ने परिवार से मदद की उम्मीद जताई थी, वो नेता भी अब सामने आते नहीं दिखाई दे रहे हैं।
विवेक अग्निहोत्री के निर्देशन में बनी फिल्म ‘द ताशकंद फाइल्स’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म के रिलीज़ से पहले कॉन्ग्रेस कुछ ज़्यादा बेचैन थी और कॉन्ग्रेस समर्थित कुछ पत्रकार भी, दोनों का बेचैन होना स्वाभाविक था। रिलीज़ के दो-दिन पहले कॉन्ग्रेस ने पूरी कोशिश की कि फिल्म की रिलीज को रोक दिया जाए, विवेक अग्निहोत्री को लीगल नोटिस भी भेजा गया। लेकिन, तमाम विवादों को दरकिनार करते हुए फिल्म अब सिनेमा घरों में है। कॉन्ग्रेस की परेशानी की वजह फिल्म की कहानी थी। कहानी देश के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मृत्यु की गुत्थी पर आधारित है।
विवेक रंजन अग्निहोत्री इससे पहले कई फिल्मे बना चुके हैं लेकिन इनकी फिल्म ‘बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम’ ने खासा ध्यान आकर्षित किया था। कई वामपंथी पत्रकार तो विवेक से तभी से चिढ़े हुए हैं। अब वो “द ताशकंद फाइल्स” के रूप में लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत की कहानी लेकर आए हैं। ऐसी कहानी ऐसी जो भारत की सबसे बड़ी मिस्ट्री के कुछ राज़ पर्दे पर खोल रही है। कुछ बड़े सवाल हैं जो आज के युवाओं को आकर्षित कर रहे हैं। बता दूँ कि भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की मौत एक बेहद संजीदा मामला है जो आज तक हल नहीं हो पाया है। सवाल कई है, इस फिल्म के माध्यम से मनोरंजक अंदाज में उन रहस्यों की कई परतों को खोलने की कोशिश की गई है।
फिल्म में क्या है? लाल बहादुर शास्त्री के रहस्यमय मौत की पीछे के कारणों की पड़ताल में मैं नहीं जाना चाहूँगा। अभी प्रमुख मुद्दा ऐसे कई कूढ़मगज कॉन्ग्रेसी चाटुकार वामपंथी पत्रकार हैं जिन्होंने बिना फिल्म देखे ही अघोषित रूप से इस फिल्म का बहिष्कार किया और कुछ ने घोषित तौर पर भी अपने प्रोफेशन को धता बता फिल्म का दुष्प्रचार करने के लिए कमर कस ली है।
अभिव्यक्ति और कलात्मक स्वतंत्रता जैसे जुमलों का भयंकर दुरुपयोग करने में जिस गिरोह को महारत हासिल है वह किसी से छिपा नहीं है। लोकसभा चुनाव के दौरान इस वामपंथी गिरोह का नेक्सस कितना मजबूत है इसकी बानगी लगातार देखने को मिल रही है। कैसे ये पूरा गिरोह नैरेटिव गढ़ने में माहिर है। ये पूरा गिरोह छद्म आदर्शों की आड़ में एजेंडा सेटिंग, फेक न्यूज़ के साथ ही फेक माहौल गढ़ने में भी खुद को सिरमौर मानता है। ऐसा इस वजह से है कि इस गिरोह की पकड़ लेखन, साहित्य, फिल्म से लेकर लगभग हर क्षेत्र में है। जहाँ भी ये रहेंगे विचारधारा की चाशनी को बड़े-बड़े लफ्फबाजी में घोल कर पिलाने के बाद भी निष्पक्षता का चोला ओढ़े रहेंगे। इतना कुछ इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि आज एक बार फिर इनके रंग देख कर हैरान हूँ क्योंकि मुद्दा विवेक अग्निहोत्री की फिल्म “द ताशकंद फाइल्स” की रिलीज़ का है।
फिल्म सिनेमाघरों में आ चुकी है, फिल्म के प्रति दर्शकों का रेस्पॉन्स अच्छा है लेकिन वामपंथी फिल्म समीक्षक और कुछ फिल्म पत्रकारों को मिर्ची लगी हुई है। ये वही गिरोह है जो ताशकंद फाइल के रिलीज़ से पहले चाहता था कि फिल्म रिलीज़ ही न हो और अब ऐसी ख्वाहिश पाले बैठा है कि फिल्म फ्लॉप हो जाए। कुछ ने तो फिल्म का रिव्यु कर रेटिंग देने से भी इंकार कर दिया है।
शायद ये सभी वामपंथी मुर्गे इस भ्रम के शिकार हैं कि यदि बांग नहीं देंगे तो सूरज निकलेगा ही नहीं। ये शायद भूल रहे हैं कि ऐसा कहकर और करने से ये खुद अपनी भद्द पिटवा रहे हैं। कहाँ गई इनकी कलात्मक स्वतंत्रता या अभिव्यक्ति की रक्षा का संकल्प? खैर, निर्देशक ने अपनी अभिव्यक्ति कलाकारों के माध्यम से दर्शकों के सामने रख दी है, अब जनता को तय करने दीजिए कि फिल्म कैसी है। ये जो पूरा गिरोह, जो इस फिल्म की रेटिंग घटाने का अथक प्रयास कर अपने ही प्रोफेशन से बेईमानी पर उतर आया है।
कुछ तो इसे 0.5-1 की रेटिंग के बीच समेट कर अपनी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता प्रदर्शित करने में जुटे हैं तो कुछ ने सीधे-सीधे फिल्म की समीक्षा से ही इनकार कर दिया है। इसमें प्रमुख नाम हिंदुस्तान टाइम्स का पत्रकार राजा सेन है। राजा सेन ने फिल्म के रिव्यु से सीधे इनकार किया है। राजा की विवेक अग्निहोत्री से दुश्मनी जग ज़ाहिर है कि इससे पहले इन्होंने विवेक की फिल्म “बुद्धा इन अ ट्रैफिक जाम” की समीक्षा न करके विवेक अग्निहोत्री के राजनीतिक रुझान की समीक्षा में कई पेज काले किए थे।
वैसे भी, इस समय ये पूरा गिरोह बहुत सकते में हैं क्योंकि इनका कोई भी हथकंडा काम नहीं आ रहा। द ताशकंद फाइल्स ’देश के दूसरे प्रधानमंत्री, जय जवान जय किसान के प्रणेता लाल बहादुर शास्त्री की रहस्मयी मृत्यु के बारे में है। एक ऐसा रहस्य जिसने राष्ट्र को लंबे समय तक परेशान किया है और कुछ ऐसे चुभते सवाल जो सभी के ज़ेहन में थे लेकिन तब के किसी पत्रकार ने भारतीय राजनीति के पहले पारिवारिक राजवंश से पूछने की हिम्मत जुटा सका। और अब जब इस विमर्श को उठाया गया है तो ये पूरा गिरोह इस बात से आशंकित है कि फिल्म में ऐसा माहौल बनाया गया है कि नेहरू राजवंश की तत्कालीन मलिका इंदिरा सवालों के घेरे में आ जाएँगी।
वामपंथी बॉलीवुड गिरोह के एक दूसरे सैनिक असीम छाबड़ा ने फिल्म के पीआर एजेंट को जवाब दिया और कहा कि वह बिल्कुल भी फिल्म नहीं देखना चाहते हैं। छाबड़ा ने तो फिल्म देखने से इस अंदाज़ में इंकार किया जैसे अगर छाबड़ा नहीं गए तो दर्शक भी फिल्म से किनारा कर लेंगे। सिलसिला यही नहीं रुका राजीव मसंद और अनुपमा चोपड़ा जैसे फिल्म समीक्षकों ने भी विवेक अग्निहोत्री की फिल्म की समीक्षा करने से इनकार कर दिया है। यहाँ भी इन दोनों ने ऐसा करने के लिए कोई कारण नहीं दिया है, लेकिन लोग इनके कारणों से अच्छी तरह वाकिफ हैं। शायद इनकी घृणित विचारधारा ने ही इन्हें अपने पेशे के साथ विश्वासघात करने के लिए मजबूर किया होगा।
फिल्मों से करीबी सम्बन्ध रखने के कारण यह कह सकता हूँ कि फिल्म निर्माण एक जटिल प्रक्रिया है। आज जो कुछ ये पूरा गिरोह कर रहा है, इसे हैंडल करना, किसी भी फिल्म निर्माता के लिए इतना आसान नहीं हो सकता है। ऑपइंडिया ने विवेक अग्निहोत्री से इस तरह के संगठित विरोध पर प्रतिक्रिया के लिए संपर्क किया।
क्या फिल्म उद्योग इस हद तक कुछ वामपंथी समीक्षकों शिकार हो सकता है?
उन्होंने कहा, “ऐसा नहीं होता अगर मैंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में कोई फिल्म बनाई होती”। अग्निहोत्री ने कहा उन्हें विशेष रूप से बॉलीवुड के एलीट क्लास द्वारा टारगेट किया जा रहा है क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थक रहे हैं।
यहाँ इस बात का जिक्र करना लाज़मी होगा कि बॉलीवुड एक एलीट क्लब की तरह है, जो वामपंथी राजनीतिक विचारधारा का गढ़ है, अगर कोई इन मठाधीशों वाली विचारधारा रखता है। अगर कोई उस खेमे का हिस्सा है जो पीएम मोदी को गाली देता है, तो वे अपने हैं, उन्हें ये पूरा गिरोह झाड़ पर चढ़ा के रखेगा। उसके किसी घटिया फिल्म के प्रचार में ये पूरा गिरोह एक साथ हुँआ-हुँआ करेगा और अगर कोई उन 900 लोगों का हिस्सा है जो प्रधानमंत्री और उनकी नीतियों का समर्थन करना चाहते हैं, तो इंडस्ट्री का यह गिरोह बहिष्कार और गाली तक का सहारा लेकर, परेशान करने की हर संभव कोशिश करता है। ये पूरा गिरोह असहिष्णुणता की सभी हदें पार करने के बाद भी इतना बड़ा हिप्पोक्रेट है कि दूसरे पर ही असहिष्णु होने का आरोप मढ़ नंगा हो सड़क पर भी निकल सकता है।
विवेक अग्निहोत्री ने इस गिरोह पर तंज करते हुए कहा कि यह ऐसे लोग हैं जो फिल्म उद्योग का राजनीतिकरण कर रहे हैं। हमने कभी किसी से नहीं पूछा कि वे एक मंदिर में ‘बिस्मिल्लाह’ क्यों गाएँगे और एक मस्जिद में ‘हरे राम हरे कृष्ण’ का जाप करते हुए गीत क्यों नहीं गाएँगे। यह सब उनके लिए मायने नहीं रखता है, लेकिन उद्योग के तथाकथित उदारवादियों के लिए, यह सिद्धांत हैं जो तय करता हैं कि किसी को फिल्में बनाने की अनुमति दी जानी चाहिए या नहीं।
ताशकंद फाइल लाल बहादुर शास्त्री की रहस्यमय मौत के बारे में बात करती हैं। विवेक ने कहा कि उनसे नफरत करने में इन “उदारवादियों” ने लाल बहादुर शास्त्री से सिर्फ इसलिए नफरत करना शुरू कर दिया है क्योंकि वह राष्ट्रवाद के प्रतीक थे। एक ग्रामीण नेता जो नेहरू की तरह अंग्रेजी में बात नहीं कर सकते थे।
विवेक अग्निहोत्री ने आगे कहा, “क्यों उन्हें ताशकंद फाइल के साथ ही समस्या है? जबकि मद्रास कैफे राजीव गाँधी की मृत्यु पर आधारित होते हुए भी एक शानदार फिल्म थी। ये दोनों फिल्में एक ही शैली और विषय वस्तु की हैं। इन्हे मद्रास कैफे से समस्या नहीं है लेकिन द ताशकंद फाइल्स से है? क्योंकि पहली इनकी विचारधारा को आगे बढ़ाती है। जबकि ताशकंद फाइल कुछ ज़रूरी सवाल खड़े करती है।”
“अगर मैंने जय प्रकाश नारायण या इंदिरा गाँधी पर एक फिल्म बनाई होती, तो उन्हें बहुत अच्छा लगता। तब ये पूरा गिरोह इसे वैज्ञानिक टेम्परामेंट के साथ कला को आगे बढ़ाने का काम कहता। लेकिन वहीं अगर मैंने श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर फिल्म बनाई होती, तो वे मुझे मार डालते। बस यहाँ भी ये विरोध कर वही कर रहे हैं।”
आगे ‘अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के छद्म योद्धाओं’ की निंदा करते हुए, उन्होंने कहा कि लोगों का यह गिरोह केवल उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और भाषण के विचार में विश्वास रखता है, जो सिर्फ इस गिरोह के हैं। जो लोग इनकी विचारधारा से अलग हटकर, जो सच है या वे जिस असहज सच को उठाना चाहते हैं। जो लोग इस बने-बनाए ढाँचे से विद्रोह करने की हिम्मत रखते हैं, इस गिरोह को सबक सिखाने-समझाने की हिम्मत रखते हैं उसे ये हतोत्साहित करते हैं।
आज जो कुछ भी हो रहा है और घृणा के जिस स्तर पर एक फिल्म को देखे बिना भी ये पूरा गिरोह लॉबिंग कर एक तरह से बहिष्कार करने की मुद्रा में है। किसी भी फिल्म के लिए यह चलन खतरनाक है। आज ये पूरा गिरोह विवेक अग्निहोत्री को मोदी समर्थक होने के लिए दंडित कर रहा है। इससे इसकी चाटुकारिता ही नहीं बल्कि नकली निष्पक्षता की भी कलई खुल रही है।
खैर जितना ये पूरा वामपंथी गिरोह फिल्म के दुष्प्रचार में लगा है उतना ही दर्शक और पाठक भी ऐसे गिरोहों को मुहतोड़ जवाब दे फिल्म का अपने स्तर पर प्रचार कर रहे हैं। फिल्म और अपने काम को तवज्जो देने वाले कई फिल्म समीक्षकों ने फिल्म को 5 में से 3-4 स्टार दिया है। जहाँ तक मुझे पता है फिल्म अच्छी है। इस देश के सबसे रहस्यमय मौत की गुत्थी से परदे हटाती है बिना किसी तरह के जजमेंट थोपे हुए। मौका निकालिए देख आइए, फिर लिखिए अपनी फिल्म समीक्षा, ऐसा करना इन वामपंथी छद्म सेक्युलरों के मुँह पर करारा तमाचा होगा। इन्हे भी पता चलेगा कि देश इन मुर्गों को यह एहसास दिलाने के लिए एकजुट है कि सूरज को तुम्हारे बांग देने से कुछ नहीं लेना-देना। भ्रम से बाहर निकलो मठाधीशी जाने वाली है।
AIUDF (ऑल इंडिया यूनाईटिड डेमोक्रेटिक फंड) पार्टी के प्रमुख बदरूद्दीन अजमल ने पीएम मोदी को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की है। उन्होंने असम के चिरांग में कहा कि जितने भी मोदी विरोधी गठबंधन है, वो सभी मिलकर मोदी को देश से बाहर निकालेंगे, जिसके बाद मोदी कहीं न कहीं जाकर चाय की दुकान चलाएगा और साथ में पकौड़े भी बेचेगा। आए दिन राजनीति में बयानबाजी का स्तर काफी नीचे गिरता जा रहा है और समूचा विपक्ष जिस तरह की बयानबाजी कर राजनीति चमकाने की कोशिश कर रहा है, उससे ऐसा लग रहा है जैसे वो भाजपा सरकार से कम मोदी से अधिक बौखलाया हो। उनका निशाना कोई पार्टी नहीं बल्कि प्रधानमंत्री मोदी हैं। वैसे बदरूद्दीन अजमल का विवादों से पुराना नाता रहा है और ये भाजपा और कॉन्ग्रेस दोनों को ही अपनी विरोधी पार्टी बताते हैं।
Badruddin Ajmal. All India United Democratic Front (AIUDF) in Chirang, Assam: Modi virodhi jitna gathbandhan hai, hum bhi usme hain, vo sab mil ke Modi ji ko iss desh se bahar nikalega. Modi ji jake kahi na kahi chaye ka dukaan bana ke chalayega, pakoda bhi bechega. (12/4/19) pic.twitter.com/KH5kfgvsQ3
गौरतलब है कि अभी कुछ दिन पहले ही AIUDF के प्रत्याशियों के खिलााफ कॉन्ग्रेस द्वारा अपनी पार्टी के उम्मीदवार खड़े करने पर बदरूद्दीन ने कॉन्ग्रेस पर विश्वासघात का आरोप लगाया था। बदरूद्दीन ने असम प्रदेश कॉन्ग्रेस कमेटी पर आरोप लगाया था कि वो AIUDF को खत्म करने की कोशिश कर रही है। उनका कहना था कि कॉन्ग्रेस का मकसद AIUDF को खत्म करना है। कॉन्ग्रेस के मुस्लिम नेता नहीं चाहते हैं कि कॉन्ग्रेस और AIUDF में गठबंधन हो, क्योंकि अगर ऐसा होता है तो उनका राजनैतिक भविष्य हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
अजमल ने कहा था कि अगर भाजपा उनकी पहली दुश्मन है, तो वहीं कॉन्ग्रेस दूसरी नंबर की दुश्मन है। उनका कहना था कि उन्होंने ‘धर्मनिरपेक्षता’ के नाम पर सीटों का त्याग किया था, उनकी कॉन्ग्रेस को मदद करने की कोई मंशा नहीं थी। बदरूद्दीन का कहना है कि उन्होंने यह निर्णय असम की भाषा, संस्कृति, पहचान और हर परिप्रेक्ष्य को देखकर लिया था। वो चाहते थे कि कॉन्ग्रेस भी उन तीनों सीटों पर अपने प्रत्याशी न उतारकर उनकी तरह त्याग करे इससे वो तीन सीटों पर तो कॉन्ग्रेस 7 सीटों पर और भाजपा को मुश्किल से 2 सीटें मिलती।
इसके साथ ही बदरूद्दीन ने कॉन्ग्रेस की कठोरता पर प्रहार करते हुए कहा था कि कॉन्ग्रेस अपने रवैये के कारण ही हिंदू इलाकों में जीरो हैं। उनकी मानें तो राज्य में कॉन्ग्रेस पूरी तरह से मुस्लिम आधारित पार्टी है क्योंकि पार्टी में 25 में से 15 विधायक अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। इसके साथ ही अजमल का आरोप है कि कॉन्ग्रेस पार्टी वोटों के लिए मुस्लिम को बेवकूफ बनाकर ब्लैकमेल कर रही है। उनकी मानें तो दशकों से समुदाय विशेष के वोट का इस्तेमाल करके, अब कॉन्ग्रेस को AIUDF जैसी पार्टी से डर लग रहा है कि कहीं उनके वोट न छिन जाएँ।
रामनवमी के साथ ही चैत्र नवरात्र का समापन हो जाता है। चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मध्याह्न के समय पुनर्वसु नक्षत्र और कर्क लग्न में राजा दशरथ के यहाँ भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। यही वजह है कि इस दिन को राम नवमी के नाम से जाना जाता है। रामनवमी के दिन माँ दुर्गा के नौवें रूप सिद्धिदात्री की पूजा के साथ मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की पूजा का भी विधान है।
इससे पहले कि राम के व्यक्तित्व के कुछ विशेष पहलुओं पर बात करें, कुछ मूलभूत बातें जैसे कि हिन्दू कैलेंडर के अनुसार रामनवमी हर साल चैत्र माह की शुक्ल पक्ष की नवमी को मनाई जाती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार यह पर्व हर साल मार्च या अप्रैल महीने में आता है। इस बार राम नवमी दो दिन मनाई जाएगी। विक्रमी संवत के अनुसार 13 अप्रैल को 11:40 तक अष्टमी है उसके बाद नवमी तिथि लग जाएगी। पंडितों के अनुसार इस बार रामनवमी दो दिन अर्थात 13 और 14 अप्रैल को मनाई जाएगी।
सनातन धर्म में रामनवमी का विशेष महत्व है। इसी दिन भगवान विष्णु ने अयोध्या के राजा दशरथ की पहली पत्नी कौशल्या की कोख से भगवान राम के रूप में मनुष्य योनि में जन्म लिया था। हिन्दू धर्म की मान्यताओं में भगवान राम को सृष्टि के पालनहार श्री विष्णु का सातवाँ अवतार माना गया है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने बनारस के तुलसीघाट पर जिस राम चरित मानस की रचना की थी, उसका आरंभ भी राम के जन्मदिवस अर्थात रामनवमी को ही हुआ था।
रामकथा पर लगभग 1000 से भी ज़्यादा प्राप्त ग्रन्थ हैं। इनमें वाल्मीकि रामायण को आधार माना जाता है। राम की लगभग सम्पूर्ण गाथा इस महाकाव्य में है। आज रामनवमी के अवसर पर श्रीराम के व्यक्तित्व की कुछ मूलभूत बातों पर गौर करते हैं जिन्हे अगर हमने ठीक से समझ लिया तो आज रामनवमी मनाने का यह एक नया अंदाज होगा। वैसे भी सनातन में हर भक्त की भगवान हो जाने की पूरी सम्भावना व्यक्त की गई है।
चलिए, रामायण में घटी एक सुंदर घटना का जिक्र कर रहा हूँ। इससे पहले राम के जीवन में बहुत सी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटित हो चुकी थीं। जैसे पिता की आज्ञा पालन के लिए उन्हें अपने राज्य से बाहर 14 वर्ष के लिए वनवास जाना पड़ा था। जंगल का जीवन आसान नहीं होता, ज़ाहिर है उन्हें एक मुश्किल जीवन जीना पड़ा होगा। फिर उनकी पत्नी सीता का रावण ने हरण कर लिया। प्रेम और चिंता से भरे राम दक्षिण भारत पहुँचे, एक सेना तैयार की, और लंका पहुँच कर युद्ध लड़ा, रावण पर विजय प्राप्त की। एक तरह से इस युद्ध में रावण का समूल नाश हो गया।
इतनी कहानी तो आप सभी को पता है और ये भी कि रावण के दस सिर थे। रावण को मारने के लिए, राम को सभी दस सिर काटने पड़े। सवाल यहाँ यह भी हो सकता है कि एक व्यक्ति के दस सिर भला कैसे संभव हैं। इसके कई जवाब हैं अभी के लिए आप इतना समझिए कि चूँकि पहले लिपि नहीं थी, ऐसे में जो भी पहली भाषा विकसित हुई होगी वह चित्रात्मक होगी। क्योंकि चित्रों के माध्यम से कुछ भी व्यक्त करना आसान रहा होगा। इस मत के कई प्रमाण हैं। बाकी दस सिरों पर आगे बात होगी।
योगवशिष्ठ में ये कथा आती है, रावण से युद्ध जीतने के बाद राम बोले, “मैं हिमालय जाकर प्रायश्चित करना चाहता हूँ, क्योंकि मैंने एक गलत काम किया है। मैंने एक ऐसे मनुष्य को मार दिया जो महान शिव भक्त था, एक विद्वान था, एक महान राजा था और दानवीर भी था।” यह सुनकर सबको बहुत आश्चर्य हुआ। कहते हैं कि राम के भाई लक्ष्मण बोले, “आप यह क्या कह रहे हैं? उसने आपकी पत्नी का हरण किया था। फिर प्रायश्चित क्यों?” राम बोले, “उसके दस सिरों में एक सिर ऐसा था जिसमें बहुत ज्ञान था, पवित्रता और भक्ति थी। उस सिर को काटने का पश्चाताप है मुझे।”
इस कथा का सार यह है कि हर किसी के दस या ज्यादा सिर होते हैं। हमारा सिर अलग-अलग प्रवृत्तियों का जन्मस्थान है जिनसे हमारा पूरा कृतित्व और व्यक्तित्व निर्धारित होता है। जैसे एक दिन, हमारा सिर लालच से भरा होता है, दूसरे दिन ईर्ष्या से फिर किसी दिन नफरत, प्रेम, कामनाएँ, सुंदर या फिर कुरूपता से या अनेक अन्य तरह की दुर्भावनाओं से, ये सारे विचार सिर में ही तो अपनी जड़ें जमाते हैं, वहीं से अपनी सत्ता चलाते हैं। या फिर हो सकता है कि एक ही दिन में कोई ऐसी सभी भावनाओं से गुजरता हो।
जैसे ही कोई किसी को ईर्ष्या के एक पल में देखता हैं, तो वह निष्कर्ष निकाल लेता हैं कि वो ईर्ष्यालु है। अगर कोई किसी को लालच के एक पल में देखता हैं, तो तुरंत निष्कर्ष निकाल लेता है कि वह लालची है। पर असल में, यह सब अलग-अलग समय पर, सभी में अलग-अलग सिरों के काम करने की वजह से होता है। हम सभी में कम-से-कम एक सिर प्रेम, सुंदरता, उदारता और करुणा का होता है। जो गलती लोग करते हैं वो यह है कि एक गुण या अवगुण की पहचान करने की जगह हम उस व्यक्ति की बुराई करते हैं।
यहाँ, राम के पश्चाताप का अर्थ है कि राम कहना चाहते थे, कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि रावण ने कितने बुरे काम किए हैं, उसमें एक आयाम ऐसा था जो कि जबरदस्त संभावनाओं से भरा था। सनातन में जो भी कथाएँ हैं, उन सभी कथाओं का एक गूढ़ अर्थ भी है। अगर हम उसे समझ जाएँ तो जीवन जीने का पूरा अंदाज़ ही बदल जाए, यूँ ही किसी कथा को पीढ़ी दर पीढ़ी हज़ारों सालों से आगे नहीं बढ़ाया जा रहा है।
जैसे यहाँ है, किसी व्यक्ति में छिपे अवगुण की बुराई करें उस व्यक्ति की नहीं। राम को जिसने भी समझा, अनुभूत किया, वह उसमे एक नए आयाम में प्रकट हुए चाहे वह कबीर के राम हों या रामानुजन के राम, भगवान राम ने सदैव अपने आत्मसात करने वाले के व्यक्तित्व को एक नई ऊँचाई दी। गाँधी ने भी जब राम को अपनाया तो महात्मा कहलाए।
साधारण से नियम के पालन के भी कई दूरगामी परिणाम हैं। जब भी हमें किसी में कुछ गलत दिखे, तो हम उस अवगुण की बुराई करें न कि उस व्यक्ति की। अगर हम अपने जीवन में इस विवेक को शामिल कर लेते हैं तो हम निश्चित रूप से अपने कई बोझों से मुक्ति पा लेंगे। जब हम दूसरों के साथ ऐसा करेंगे तो यक़ीनन हमारे साथ भी ऐसा होगा।
राम की कहानी में प्रेम की पीड़ा भी है और प्रेम की पराकाष्ठा भी। अक्सर कहा जाता है कि ‘प्रेम एक ऐसे पुरुष और स्त्री के बीच होता है जो एक दूसरे को नहीं जानते।’ ये तभी सही हो सकता है जब कोई एक सारहीन, आलोचनात्मक या फिर नासमझी भरा जीवन जीता है। कायदे से होना तो यह चाहिए कि जितना हम किसी को जानते हैं, उतना ही अधिक प्रेम और करुणा हममें जागनी चाहिए। जब हम उनके सभी संघर्ष जान जाते हैं, तो हम समझ जाते हैं कि वे भी हमारी ही तरह मनुष्य हैं।
राम ने ऐसे मनुष्य को मारने का प्रायश्चित किया जिसने उनकी पत्नी का हरण किया था, और कई सारे बुरे काम किए थे। फिर भी राम ने रावण के उस एक सिर को पहचाना जो कि सुंदर था। राम एक जबरदस्त बोध वाले मनुष्य हैं, जिन्होंने अपने जीवन की उच्चतर सम्भावना को जीया और इसीलिए वह मानवता के आदर्श होकर पूजनीय हुए, उनकी पूजा की जाती है। माना कि वे अपने जीवन में कई सारी चीज़ों में विफल हुए, पर उनकी विफलता ने कभी उनके बोध और गुणों को नहीं बदला। जीवन ने उनके साथ चाहे जो भी किया, वे हमेशा उससे ऊपर रहे।
आज रामनवमी के अवसर पर जब राजनीतिक बयानबाजी की बिसात बिछी है, राजनेताओं में गिरने की होड़ मची है तो आज राम-राज्य और राम ज़्यादा प्रासंगिक हो जाते हैं। राम के व्यक्तित्व का ये उदाहरण यदि हम याद रखें। सोचिए, अगर व्यक्ति की बुराई करने के बजाए गुणों को पहचानने की समझ है तो उसके जीवन में दैवीय गुणों अर्थात जीवन के उच्चतर आयामों का समावेश क्यों नहीं होगा।
कहते हैं कि गुलाब के पौधे में गुलाब से ज्यादा काँटे होते हैं। पर हम फिर भी उसे गुलाब का पौधा कहते हैं, काँटे का नहीं, क्योंकि हम सुंदरता को देखते हैं। जीवन के उच्चतर आयाम को। आम के पेड़ में आम से ज्यादा पत्ते होते हैं, पर हम फिर भी उसे आम का पेड़ कहते हैं क्योंकि हम फलों की मिठास को देखते हैं।
ऐसे ही हर मनुष्य में मिठास की कम-से-कम एक बूँद तो होगी ही। फिर हम उसे क्यों नहीं देख पाते? जरा सोचिए अगर राम को ठीक से समझ जाएँ तो भी जीवन की गुणवत्ता में आमूल परिवर्तन संभव है। कल्पना कीजिए अगर हर किसी के साथ हम ऐसा ही करें। ऐसे लोग जिन्हें हम भयानक समझने की भूल करते हैं, उनमें भी मिठास की एक बूँद को भी यदि पहचानने में हम सफल हो जाएँ तो निश्चित रूप से हमारी मिठास को पहचानने की काबिलियत हमारे भी व्यक्तित्व को ऊपर उठाएगी। उसकी मिठास हमारे व्यक्तित्व में भी झलकेगी। राम हो जाने की संभावना को चरितार्थ करने की दशा में यह एक बड़ा कदम होगा।
इसका यह मतलब भी नहीं कि कोई अपनी आंखें मूँद अन्धे हो जाए। हम पेड़ में पत्ते देखते हैं, पेड़ में काँटे देखते हैं पर हम फूलों और फलों का होना भी स्वीकारते हैं। बस एक सार्थक और आनंददायक जीवन जीने की इतनी ही मर्यादा है जिसके पालन की जरुरत है। फिर हमें मर्यादा पुरुषोत्तम होने से कोई नहीं रोक सकता। तो क्यों न सनातन की इस सबसे बड़ी सीख को जीवन का हिस्सा बनाएँ। आज रामनवमी के दिन से ही राम को अपने व्यक्तित्व का हिस्सा बनाएँ, फिर जीवन चाहे जिस पथ पर ले जाए विजय हमारी होगी। राम के वंशज होने के कारण हमें यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए।
कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी की 14 अप्रैल को पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में होने वाली रैली पर विवादों का साया छाया रहा। सिलीगुड़ी पुलिस ने राहुल गाँधी के हेलीकॉप्टर को लैंडिंग की मंजूरी नहीं दी है। सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पुलिस ने हेलीकॉप्टर लैंडिंग से मना किया है।
देश में लोकसभा चुनाव 2019 का प्रचार चरम पर है। सभी नेता देश भर में घूम-घूम कर रैली कर रहे हैं। इस बीच पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में कॉन्ग्रेस अध्यक्ष राहुल गाँधी के हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति नहीं मिली है। रिपोर्ट्स के अनुसार, स्थानीय प्रशासन ने उनके हेलिकॉप्टर को उतरने की अनुमति देने से इनकार कर दिया है।
कॉन्ग्रेस ने बताया इसे ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल
इससे पहले भी पश्चिम बंगाल में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के विमान को उतरने की अनुमति नहीं मिली थी। कॉन्ग्रेस नेता इसे ममता बनर्जी की राजनीतिक चाल बता रहे हैं। कुछ दिन पहले ही राहुल गाँधी ने ममता बनर्जी के एक बयान पर पलटवार किया था। ममता बनर्जी ने कॉन्ग्रेस पर आरोप लगाया था कि कॉन्ग्रेस भाजपा के खिलाफ एकजुट होकर नहीं लड़ रही है।
राहुल गाँधी ने तंज कसते हुए कहा था, “ममता बनर्जी ने केंद्र में मंत्री पद पाने के लिए कभी न कभी बीजेपी से समझौता किया था और अब ममता बनर्जी पूछ रही हैं कि हम बीजेपी के खिलाफ सच में नहीं लड़ रहे हैं।”
पश्चिम बंगाल में लोकसभा की 42 सीटें हैं। यहाँ सभी 7 चरणों में मतदान होना है। बृहस्पतिवार (अप्रैल 11, 2019) को पश्चिम बंगाल की 2 सीटों पर प्रथम चरण का मतदान हुआ। लोगों ने बढ़-चढ़कर मतदान में हिस्सा लिया और मतदान प्रतिशत करीब 81% रहा।
अयोध्या में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में गैर विवादित जमीन पर पूजा करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। याचिका को खारिज करते हुए चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि आप देश में किसी को शांति से रहने नहीं देंगे, कुछ ना कुछ अड़चन डालनी है। चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने टिप्पणी करते हुए कहा, ‘’आप देश में शांति नहीं रहने देना चाहते हैं, कोई न कोई हमेशा फच्चर फँसाने में लगा रहता है।”
The Supreme Court on April 12 dismissed a plea to conduct puja in temples located on the undisputed sites in #Ayodhyahttps://t.co/zPbXqH2qLf
सुप्रीम कोर्ट ने पंडित अमरनाथ मिश्रा की याचिका को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले पर भी रोक लगाने से इनकार कर दिया, जिसमें इस याचिका को दाखिल करने पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया गया था।
अयोध्या और बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद मध्यस्थता से सुलझाने की कोशिश की जा रही है। इस मध्यस्थता के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन सदस्यों की एक समिति गठित की और इसे कैमरे की निगरानी में की जा रही है। समिति के अध्यक्ष सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एफएमआई खलीफुल्ला हैं और इसमें आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू शामिल हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राजनीतिक दलों को चुनावी बॉन्ड के माध्यम से प्राप्त किए गए चंदे का ब्योरा निर्वाचन आयोग को उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना की पीठ ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि बॉन्ड के माध्यम से 15 मई तक प्राप्त धनराशि का विवरण, दानकर्ताओं के नाम के साथ, राजनीतिक दलों द्वारा 30 मई तक चुनाव आयोग को बताना होगा।
शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि वो संबंधित क़ानून में किए गए बदलावों की व्यापक समीक्षा करेगी और यह भी सुनिश्चित करेगी कि इससे किसी ख़ास दल को अनावश्यक लाभ न मिल पाए।
इसके अलावा न्यायालय ने वित्त मंत्रालय को निर्देश दिया कि वो अप्रैल-मई में चुनावी बॉन्ड की ख़रीद के लिए 10 दिन के बजाय पाँच दिन का समय रखे। न्यायालत ने ग़ैर-सरकारी संगठन कॉमन कॉज की याचिका पर सुनवाई के बाद कल ही अंतरिम आदेश सुरक्षित रख लिया था।
ख़बर के अनुसार, केंद्र सरकार की इस योजना के ख़िलाफ़ एक NGO (असोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स) ने जनहित याचिका दाखिल की है और कोर्ट में इस NGO का पक्ष सुप्रीम कोर्ट में वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण रख रहे हैं। इस जनहित याचिका के माध्यम से इस योजना पर रोक लगाने या इसके तहत चंदा देने वालों के नाम सार्वजनिक करने की माँग की गई थी।
NGO की याचिका पर अटॉर्नी जनरल के के वेणुगोपाल ने आपत्ति दर्ज करते हुए कहा था कि केंद्र की इस योजना का उद्देश्य चुनावी माहौल में ब्लैक मनी के इस्तेमाल को रोकना है। केंद्र ने कोर्ट से आग्रह किया था कि न्यायालय को इस मामले में अपना हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और चुनावी प्रक्रिया को सम्पन्न होने तक इस पर कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए। उन्होंने केंद्र के पक्ष में बहस की थी कि इससे चुनावी बॉन्ड राजनीतिक दान के लिए पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए एक बड़ा क़दम है।
बता दें कि जनवरी, 2018 में केंद्र ने चुनावी बॉन्ड के लिए योजना को अधिसूचित किया था जिसे एक भारतीय नागरिक या भारत में निगमित निकाय द्वारा खरीदा जा सकता था। इसके अलावा इन बॉन्डस को एक अधिकृत बैंक से ही खरीदने का प्रावधान किया गया और फिर राजनीतिक दलों को जारी किया जा सकता था। राजनीतिक पार्टी 15 दिनों के अंदर इन बॉन्डस की राशि को प्राप्त कर सकती है।
कर्नाटक में कॉन्ग्रेस पार्टी के नाटक थमने का नाम ही नहीं ले रहे हैं। कर्नाटक के कुछ नेताओं को राज्य के मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी के बेटे की उम्मीदवारी का विरोध करने का फैसला भारी पड़ गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, पार्टी ने मंड्या सीट से CM कुमारस्वामी के बेटे निखिल की उम्मीदवारी का विरोध करने पर अपने 7 ब्लॉक अध्यक्षों को पार्टी से बाहर कर दिया है ।
पार्टी नेतृत्व के निर्णय के खिलाफ स्थानीय कार्यकर्ता अपना विरोध भी दर्ज करा चुके हैं। पार्टी कार्यकर्ता इस सीट से दिवंगत अभिनेता अंबरीश की पत्नी सुमालता को टिकट दिए जाने की माँग कर रहे हैं। कार्यकर्ताओं का कहना है कि यदि पार्टी सुमालता को मैदान में नहीं उतारती है, तो उन्हें देवगौड़ा के पोते के पक्ष में प्रचार करने के लिए दबाव नहीं दिया जाना चाहिए।
कॉन्ग्रेस पार्टी ने यह कदम नेताओं के पार्टी लाइन के खिलाफ जाने पर उठाया है। राज्य में गठबंधन की घोषणा के बाद मंड्या लोकसभा सीट के JDS के खाते में जाने के बाद से यहाँ उठापठक थमने का नाम नहीं ले रही है। कॉन्ग्रेस के स्थानीय नेताओं में इस सीट के JDS के खाते में जाने को लेकर बहुत असंतोष व्याप्त है।
यह वही कॉन्ग्रेस है, जिस पर परिवारवाद की राजनीति आरोप लगता रहता है। पार्टी इस विरोध को दबाने को लेकर कई दौर की बातचीत कर चुकी है। कॉन्ग्रेस के पदाधिकारियों का कहना है कि व्यापक हित में सेक्युलर ताकतों को एकजुट होने की जरूरत है। पिछले सप्ताह पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर पार्टी कैडर से संयुक्त उम्मीदवार का समर्थन करने का आग्रह किया था।
विरोध थमता नहीं दिखते हुए पार्टी ने मांड्या के पदाधिकारियों को शुक्रवार (अप्रैल 12, 2019) को निष्कासित कर दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी ने भाजपा से मुकाबला करने के लिए JDS के साथ लोकसभा में गठबंधन किया है। वहीं, भाजपा ने येदियुरप्पा के नेतृत्व में लोकसभा चुनाव में उतरने का फैसला किया है।